Jaankari Rakho & : Biography https://m.jaankarirakho.com/rss/category/Biography Jaankari Rakho & : Biography hin Copyright 2022 & 24. Jaankari Rakho& All Rights Reserved. चार्ली चैप्लिन का जीवन परिचय | Charlie Chaplin Biography Quotes In Hindi https://m.jaankarirakho.com/75 https://m.jaankarirakho.com/75 Charlie Chaplin Biography in Hindi | चार्ली चैपलिन की जीवनी

चार्ली चैप्लिन मौनी युग के जाने-माने हास्य कलाकार थे इसके अलावा वह पेशे से संगीतकार और फिल्म निर्माता भी थे। मौनी युग में आमतौर पर फिल्मों का निर्माण बिना आवाज़ के किया जाता था। चार्ली बीसवीं सदी के बहुत प्रसिद्ध कलाकारों में से एक माने जाते थे। इन्होंने अपने जीवन में बहुत सफलता प्राप्त की और इनका कैरियर 75 साल तक चला। चार्ली की बचपन से ही एक्टिंग के क्षेत्र में रुचि थी इसलिए इन्होंने अपने करियर की शुरुआत बचपन में ही कर दी थी।

मौनी युग में हास्य कलाकार के रुप में चार्ली बहुत प्रसिद्ध थे, अपनी हास्य कला की वजह से चार्ली बहुत जाने जाते थे और इस कला के ज़रिए उन्होंने अपनी पहचान पूरी दुनिया में बना ली थी। हास्य कलाकार होने के अलावा वह संपादक, लेखक, पटकथा लेखक और निर्माता भी थे। इस पोस्ट में हम चार्ली चैपलिन का जन्म, प्रारंभिक जीवन, फिल्मी करियर, रचित फिल्में, मृत्यु आदि से संबंधित जानकारी देंगे।

पूरा नाम चार्ल्स स्पेंसर चैपलिन
उपनाम चार्ली चैपलिन
जन्म 16 अप्रैल 1889
जन्म स्थान लंदन, इंग्लैंड
पेशा हास्य कलाकार, संगीतकार, फिल्म निर्माता, संपादक, लेखक, पटकथा लेखक और निर्माता
पिता का नाम चार्ल्स चैपलिन सीनियर
माता का नाम हैन्ना चैपलिन
पत्नी मिल्ड्रेड हैरिस (पहली शादी)
लिलिता मैकमुरे (दूसरी शादी)
पौलेट्टे गोद्दार्ड (तीसरी शादी)
ऊना ओ’नील (चौथी शादी)
बच्चे 11 बच्चे
मृत्यु 25 दिसंबर 1977

चार्ली चैपलिन का जन्म और शुरूआती जीवन (Charlie Chaplin early life) –

चार्ली चैपलिन का जन्म 16 अप्रैल 1889 में इंग्लैंड के लन्दन में हुआ. चार्ली चैपलिन ने बड़े पर्दे में आने से पहले, बचपन में डांस करना शुरू कर दिया था. चार्ली चैपलिन का नाम रंक से राजा की कहानी से बढ़ना शुरू हुआ. चैपलिन के पिता प्रतिभाशाली गायक और अभिनेता थे, और माता जाने माने “लिली हार्ले” नामक मंच में एक आकर्षक अभिनेत्री और गायिका थी, जिन्होंने अपने काम से लाइट ओपेरा फील्ड में नाम कमाया.

चैपलिन की माता को कुछ दिमागी परेशानी की वजह से यह सब छोड़ना पड़ा और वे कुछ साल तक बस अपने परिवार की सहायक बनी. किन्तु उन्होंने एक प्रदर्शन में अपने बेटे चार्ली चैपलिन को सभी से मिलवाया और बिना किसी स्पष्टीकरण के प्रदर्शन के बीच में उन्होंने अपनी आवाज खों दी और प्रोडक्शन मेनेजर से अपने 5 साल के बेटे को अपनी जगह लेने के लिए कहा. चैपलिन जनता के सामने हास्य कलाकार के रूप में जाने, जाने लगे. किन्तु उनकी माता के लिए यह सब खत्म सा होने लगा था, उनकी आवाज कभी वापस नही आ सकती थी. उस समय चार्ली और उसके भाई ने स्वयं के लिए लन्दन में ही एक घर ले लिया.

चार्ली चैपलिन के निजी जीवन से संबंधित जानकारी

चार्ली चैपलिन की निज़ी जिंदगी में भी कई गंभीर परेशानियां थी, उन्होंने कई बार शादी की और डायवोर्स लिए। सन् 1918 में इन्होंने 16 साल की उम्र की लड़की मिल्ड्रेड हैरिस से शादी की। परंतु उनकी यह शादी सफल नही हुई। यह शादी केवल 2 वर्ष चली और फिर इनका तलाक हो गया।

इसके पश्चात इन्होंने 16 साल की लड़की लिलिता मैकमुरे से सन् 1924 में शादी की। इन्होंने साथ मिलकर ‘दि गोल्ड रश’ में काम किया। शादी के कुछ समय पश्चात लिलिता मैकमुरे गर्भवती हो गई और उनके दो बच्चे हो गए। लेकिन उनकी शादी ज़्यादा समय तक नहीं चल पाई और उनका तलाक हो गया।

चार्ली ने सन् 1936 पौलेट्टे गोद्दार्ड से विवाह किया। चार्ली के सन् 1942 में जोआन बेरी से प्रेम संबंध थे और इनकी एक बेटी भी थी। लेकीन कुछ समय बाद परीक्षण से पता चलता है कि वह बेटी चार्ली चैपलिन की नहीं है।

इसके पश्चात इन्होंने पौलेट्टे गोद्दार्ड से तलाक लेकर 18 वर्ष की एक लड़की ऊना ओ’नील से विवाह किया। उनकी यह शादी सफल रही और इनके और ऊना ओ’नील के 8 बच्चे हुए।

चार्ली चैप्लिन की पत्नियों के नाम-

  • हेट्टी केली -1908 में शादी और 1918 की महान फ्लू महामारी में इन्फ्लूएंजा की वजह से हेट्टी की मौत हो गई थी।
  • मिल्ड्रेड हैरिस (वि। 18 1918–21)
  • लिटा ग्रे (वि 24 1924–27)
  • पॉलेट गोडार्ड (वि। Lette 1936–42)
  • ऊना ओ’नील (वि। O’1943–77) –

ऊना ओ’नील बैरी के मामले में चैप्लिन के कानूनी मुसीबत के दौरान, वह यूजीन ओ’नील की बेटी, ऊना ओ’नील से मिले और उन्होंने 16 जून 1943 में शादी की।उस समय वे 54 साल के थे;और ऊना सिर्फ अठारह साल की थी। ओ’नील के बड़ों ने सगाई को दृढ़ता से अस्वीकृत किया और शादी के बाद, 1977 में उनकी मौत तक, ऊना के साथ किसी भी संपर्क से इनकार कर दिया। आठ बच्चों के साथ, उनकी शादी लंबी और खुशहाल थी। उनके तीन बेटे थे: क्रिस्टोफर, यूजीन और माइकल चैप्लिन और पाँच बेटियाँ थी: गेराल्डिन, जोसफीन, जेन, विक्टोरिया और अन्नेट-एमिली चैप्लिन. चैप्लिन के 73 साल में उनका आखिरी बच्चा पैदा हुआ था। ऊना ने चैप्लिन के साथ चौदह वर्ष बिताए. 1991 में अग्नाशयी कैंसर की वजह से उनकी मौत हो गई।

चार्ली चैप्लिन को अपनी पत्नियों से हुए बच्चों के नाम और जन्म तिथि

  • नॉर्मन स्पेन्सर चैप्लिन -7 जुलाई 1919
  • चार्ल्स स्पेन्सर चैप्लिन जूनियर -5 मई 1925
  • सिडनी अरले चैप्लिन- 31 मार्च 1926
  • गेराल्डिन लेह चैप्लिन -1 अगस्त 1944
  • माइकल जॉन चैप्लिन- 7 मार्च 1946
  • जोसफीन हैन्ना चैपलिन -28 मार्च 1949
  • विक्टोरिया चैपलिन- 19 मई 1951
  • यूजीन एंथनी चैपलिन -23 अगस्त 1953
  • जेन सेसिल चैपलिन- 23 मई 1957
  • अन्नेट एमिली चैपलीन -3 दिसंबर 1959
  • क्रिस्टोफर जेम्स चैपलीन -6 जुलाई 1962

चार्ली चैपलिन का कैरियर (Charlie Chaplin Career)

सन 1897 में चैपलिन ने सोचा कि वे अपनी माता के कॉन्ट्रैक्ट का उपयोग करके उनके व्यवसाय को और बेहतर बनायेंगें. उन्होंने बहुत कोशिश की किन्तु उससे ज्यादा फायदा ना होने के कारण उन्हें यह सब छोड़ना पड़ा. चैपलिन ने बहुत सी छोटी –छोटी नोकारियां भी की, किन्तु वे अपने अभिनेता बनने के लक्ष्य को कभी नही भूले. चार्ली ने 10 साल की उम्र के होने से पहले ही, अपनी पढाई को छोड़ दिया, क्युकि उस समय उनके पिता की मृत्यु हो गई और माता बीमार रहने लगी थी. जिस वजह से चार्ली और उनके भाई के लिए यह जरुरी था कि वे स्वयं के लिए प्रबंध करें.

जब वे 12 साल के हुए, तब उन्हें एक लेजिटिमेट (legitimate) मंच के कार्यक्रम में नाटक प्रस्तुत करने का मौका मिला, और “शर्लाक होल्म्स” में विलियम जिल्लेट के सहयोग में पेज बॉय “बिल्ली” के रूप में उपस्थित हुए. इसके पश्चात सन 1908 में चार्ली ने वौडेविल्ले कंपनी (Vaudeville) में हास्य कलाकार के रूप में कैरियर की शुरुआत की, जिससे आखिरकार उन्हें सन 1910 में यूनाइटेड स्टेट्स की “फ्रेड कार्नो रेपेर्टिरे कंपनी” के साथ प्रधान अभिनेता बना दिया गया.

वे अमेरिका की जनता के साथ तत्काल सफल होते चले गए, विशेष रूप से उनके चरित्र चित्रण की रूपरेखा में उन्होंने बहुत नाम कमाया. सन 1912 में चार्ली को मोशन पिक्चर कॉन्ट्रैक्ट करने का अवसर मिला. सन 1913 में कैमेरा में आने से पहले उन्हें वौडेविल्ले ((Vaudeville)) की जिम्मेदारी को छोड़ना पड़ा और इसके लिए वे तैयार हो गए थे. इसके बाद सिनेमा की दुनिया में उन्होंने कदम रखा, उसी महीने उन्होंने “मैक सेन्नेट” और “कीस्टोन” कंपनी ज्वाइन की. इनकी शुरूआती इनकम हफ्ते में 150 $ थी, लेकिन उनकी रातों रात सफलता के चलते दुसरे निर्माताओ ने उन्हें और अधिक पैसों के ऑफर देने लगे.

चार्ली चैपलिन का फ़िल्मी कैरियर (Charlie Chaplin acting career) –

सन 1914 में चार्ली चैपलिन ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की. सेंनेट फिल्मों में दुसरे अभिनेताओं को खुद से अलग करने के लिए, चैपलिन ने एक विशेष तरह के चरित्र में काम करने का फैसला किया. तब ट्रम्प करके चलने वाला छोटा बच्चा पैदा हुआ. जनता को उनका यह अभिनय बहुत पसंद आया. अगले एक साल में चैपलिन 35 फिल्मों में दिखाई दिए, इनमें एक लाइनअप की ‘टिल्लिस पंक्चर्ड रोमांस’ फ़िल्म भी शामिल है, यह फ़िल्म पूरी हास्य फ़िल्म थी. इस कॉन्ट्रैक्ट को ख़तम करने के बाद चैपलिन सन 1915 में “इस्सानय कंपनी” में काम करने लगे, जहाँ उन्हेंने 1250 $ पर सप्ताह स्वीकार किये. इस कम्पनी के साथ चैपलिन ने 14 फिल्में की. चैपलिन के किरदार को प्रत्याशित नायक के रूप में स्थापित किया है. जब वह किसान की बेटी को लुटेरों से बचाता है, आम तौर इनकी यह पहली क्लासिक फ़िल्म थी.

26 साल की उम्र में वह एक सुपरस्टार था, और वह अपने वौडेविल्ले दिनों से दूर हो गया. वे एक म्यूच्यूअल कंपनी में चले गए, जहाँ उन्हें 670,000 $ पर साल भुगतान मिलता था. इन पैसों ने चैपलिन को अमीर आदमी बना दिया था, लेकिन उसे यह नही मालुम था कि वह अपनी कलात्मक ड्राइव की पटरी से उतरने लगा है. म्यूच्यूअल कम्पनी के साथ उन्होंने बहुत ही अच्छा काम किया, जिनमें उन्होंने सन 1916 में वन A.M., दी रिंक, दी वगाबोंड और सन 1917 में इजी स्ट्रीट फिल्में की.

अपने काम के माध्यम से चैपलिन परफेक्शनिस्ट के रूप में जाने जाने लगे. उनके इन प्रयोगों से उन्हें अपार प्यार मिला. उनके लिए यह समझना मुश्किल था कि वे एक मुख्य अभिनेता वाली फ़िल्म से शुरुआत कर रहे थे, फिर उनको अहसास हुआ कि वे अपनी कास्टिंग में गलती कर रहे है और उन्होंने कुछ नया करने की फिर से ठान ली. 20वीं शताब्दी में चैपलिन का कैरियर और ज्यादा बढ़ने लगा. उसी दशक में उन्होंने कुछ ऐतिहासिक फिल्में की, सन 1921 में “दी किड”, सन 1923 में “दी पिल्ग्रिम”, “अ वुमन इन पेरिस”, सन 1925 में “दी गोल्ड रश”, सन 1928 में फ़िल्म सर्कस आई, चैपलिन इस फ़िल्म को हमेशा याद रखना चाहते थे.

चार्ली चैपलिन के फिल्मों की सूची

■ द ट्रंप (1915)

■ द इम्मीग्रांट वर्ष (1917)

■ A dog’s life (1918)

■ द किड (1921)

■ द गोल्डन रस (1925)

■ सिटी लाइट वर्ष (1931)

■ द सर्कस (1928)

■ मॉडर्न टाइम (1936)

■ द ग्रेट डायरेक्टर वर्ष (1940)

■ एक किंग इन न्यू यॉर्क (1957)

■ चैप्लिन (1992)

पुरस्कार

1972 में फिल्म संगीत के लिए ऑस्कर से सम्मानित किया गया था | उन्हें इस ऑस्कर पुरस्कार के लिए जनता द्वारा इतिहास में सबसे लंबे समय तक खड़े होकर अभिवादन से नवाजा गया । यह पुरस्कार चैपलिन की अंतिम फिल्म, हांगकांग (A Countess from Hong Kong-1967) से ए काउंटीस, फिल्म निर्माता की पहली और एकमात्र रंगीन फिल्म के पांच साल बाद उन्हें मिला था | इस फिल्म में सोफ़िया लॉरेन और मार्लन ब्रैंडो जैसे कलाकारों के होने के बावजूद, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ कमाल नहीं कर पायी | जब उन्हें 1975 में क्वीन एलिज़ाबेथ द्वारा नाइट की उपाधि से नवाजा गया।

इस के अलावा उन्हे दिये गए पुरस्कारों की सूची इस प्रकार है –

  • अकादमी मानद पुरस्कार -1972, 1929 · The Circus
  • सर्वश्रेष्ठ मूल संगीत स्कोर के लिए अकादमी पुरस्कार  -1973 · Limelight
  • BAFTA Fellowship(बाफ्टा फैलोशिप) -1976
  • सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए किनेमा जूनो पुरस्कार -1925 · A Woman of Paris
  • सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए न्यूयॉर्क फिल्म क्रिटिक्स सर्कल अवार्ड -1940 · The Great Dictator
  • लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए गोल्डन लायन -1972
  • सर्वश्रेष्ठ अमेरिकी फिल्म का बोडिल पुरस्कार -1949 · Monsieur Verdoux
  • इरास्मस पुरस्कार -1965
  • सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म निर्माता का जुस्सी पुरस्कार -1974 · The Great Dictator, Modern Times
  • बोडिल मानद पुरस्कार -1959
  • DGA मानद जीवन सदस्य पुरस्कार -1974
  • सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए किनेमा जूनो पुरस्कार -1961, 1953, 1927 ·The Great Dictator, Monsieur Verdoux, The Gold Rush
  • सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के लिए ब्लू रिबन पुरस्कार -1953 ·Monsieur Verdoux

चार्ली चैप्लिन के विचार

  1. मैं हमेशा बरसात में घूमना पसंद करता हूं, ताकि कोई मुझे रोते हुए ना देख सके।
  2. हंसी के बिना बिताया हुआ दिन, बर्बाद किया हुआ दिन हैं।
  3. यदि आप केवल मुस्कुराएंगे तो आप पाएंगे कि जीवन अभी भी मूल्यवान हैं।
  4. असल में हंसी का कारण वही चीज़ बनती है जो कभी आपके दुख का कारण होती हैं।
  5. बिना कुछ किए, सिर्फ कल्पना करने का कोई मतलब नही हैं।
  6. सबसे दुखद जिसकी मैं कल्पना कर सकता हूं वो है विलासता का आदी होना।
  7. किसी आदमी का असली चरित्र तब सामने आता है. जब वो नशे में होता हैं।
  8.  ज़िंदगी करीब से देखने में एक त्रासदी है और दूर से देखने में कॉमेडी।
  9. मैं पैसों के लिए बिजनेस में गया, और वहीं से कला पैदा हुई. यदि इस टिप्पणी से लोगों का मोह भंग होता है तो मैं कुछ नहीं कर सकता. यही सच हैं।
  10. शीशा मेरा सबसे अच्छा मित्र है क्योंकि जब मै रोता हूं तो वह कभी नहीं हँसता।
  11. दुष्ट दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है, हमारी मुसीबतें भी नहीं।
  12. मेरा दर्द किसी के हंसने का कारण हो सकता है पर मेरी हंसी कभी भी किसी के दर्द कारण नहीं होनी चाहिए।
  13. अपने अहम के प्रकाश में हम सब सम्राट है।
  14.  ज़िन्दगी में एक बार अपने बारे में अवश्य सोचे अन्यथा आप संसार की सबसे बड़ी कॉमेडी मिस कर सकते है।
  15.  हम सोचते बहुत हैं और महसूस बहुत कम करते हैं।
  16.  असफलता महत्त्वहीन है। अपना मजाक बनाने के लिए हिम्मत चाहिए होती है।
  17.  इंसानों की नफरत ख़तम हो जाएगी, तानाशाह मर जायेंगे, और जो शक्ति उन्होंने लोगों से छीनी वो लोगों के पास वापस चली जायेगी। और जब तक लोग मरते रहेंगे, स्वतंत्रता कभी ख़त्म नहीं होगी।
  18. मुझे कैरेक्टर के बारे में कुछ पता नहीं था। लेकिन जैसे ही मैं तैयार हुआ, कपडे और मे-कप मुझे उस व्यक्ति की तरह महसूस कराने लगे। मैं उसे जानने लगा, और स्टेज पे जाते-जाते वो पूरी तरह से पैदा हो गया।
  19. मेरी सभी फिल्मे मुश्किल में पड़ने की योजना के इर्द- गिर्द बनती हैं , इसलिए मुझे गंभीरता से एक सामान्य सज्जन व्यक्ति दिखने का मौका देतीं हैं।
  20. मैं एक गरीब राजा की तुलना में जल्द ही एक सफल धूर्त कहलाना चाहूँगा।

मृत्यु

चार्ली चैपलिन की मृत्यु 25 दिसंबर,1977 की क्रिसमस वाले दिन के शुरुआती समय में,स्विट्ज़रलैंड के वॉड वेवी में अपने घर में ही हुई थी।

आज इस आर्टिकल में हमने आपको चार्ली चैप्लिन की जीवनी- Charlie Chaplin Biography Hindi के बारे में बताया इसको लेकर अगर आपका कोई सवाल या कोई सुझाव है तो आप नीचें कमेंट कर सकते है.

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Thu, 20 Mar 2025 10:21:34 +0530 Jaankari Rakho
छत्रपति शिवाजी महाराज की जीवनी – Chhatrapati Shivaji Maharaj Biography Hindi https://m.jaankarirakho.com/76 https://m.jaankarirakho.com/76 छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के राजा और रणनीतिकार थे। उन्होंने 1674 में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी थी। उन्होंने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। 1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ और छत्रपति बने। शिवाजी ने अपनी अनुशासित सेना तथा सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील शासन प्रदान किया। उन्होंने समर-विद्या में कई नवाचार किये और छापामार युद्ध की नयी शैली (शिवसूत्र) विकसित की। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को दोबारा जीवीत किया और फारसी के स्थान पर मराठी और संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया।

छत्रपति शिवाजी महाराज जीवन परिचय (Chhatrapati Shivaji Maharaj Biography)

जीवन परिचय बिंदु शिवाजी जीवन परिचय
पूरा नाम शिवाजी शहाजी राजे भोसले
जन्म 19 फ़रवरी 1630
जन्म स्थान शिवनेरी दुर्ग, पुणे
जाति कुर्मी
गोत्र कश्यप
माता-पिता जीजाबाई, शहाजी राजे
पत्नी साईंबाई, सकबारबाई, पुतलाबाई, सोयाराबाई
बेटे-बेटी  संभाजी भोसले या शम्भू जी राजे, राजाराम, दिपाबाई, सखुबाई, राजकुंवरबाई, रानुबाई, कमलाबाई, अंबिकाबाई
मृत्यु 3 अप्रैल 1680

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म, परिवार एवं आरंभिक जीवन (Birth, Family and Initial Life)

शिवाजी का जन्म पुणे जिले के जुन्नार गाँव के शिवनेरी किले में हुआ था. शिवाजी का नाम उनकी माता ने भगवान शिवाई के उपर रखा था, जिन्हें वो बहुत मानती थी. शिवाजी के पिता बीजापुर के जनरल थे, जो उस समय डेक्कन के सुल्तान के हाथों में था. शिवाजी अपनी माँ के बेहद करीब थे, उनकी माता बहुत धार्मिक प्रवत्ति की थी, यही प्रभाव शिवाजी पर भी पड़ा था. उन्होंने रामायण व महाभारत को बहुत ध्यान से पढ़ा था और उससे बहुत सारी बातें सीखी व अपने जीवन में उतारी थी. शिवाजी को हिंदुत्व का बहुत ज्ञान था, उन्होंने पुरे जीवन में हिन्दू धर्म को दिल से माना और हिन्दुओं के लिए बहुत से कार्य किये. शिवाजी के पिता ने दूसरी शादी कर ली और कर्नाटक चले गए, बेटे शिवा और पत्नी जिजाबाई को किले की देख रेख करने वाले दादोजी कोंडदेव के पास छोड़ गए थे.

छत्रपति शिवाजी महाराज की शिक्षा एवं विवाह, पत्नी (Shivaji Maharaj Education and Marriage, Wife)

शिवाजी को हिन्दू धर्म की शिक्षा कोंडदेव से भी मिली थी, साथ ही उनके कोंडाजी ने उन्हें सेना के बारे में, घुड़सवारी और राजनीती के बारे में भी बहुत सी बातें सिखाई थी.शिवाजी बचपन से ही बुद्धिमानी व तेज दिमाग के थे, उन्होंने बहुत अधिक शिक्षा तो ग्रहण नहीं की, लेकिन जितना भी उन्हें बताया सिखाया जाता था, वो वे बहुत मन लगाकर सीखते थे. 12 साल की उम्र में शिवाजी बंगलौर गए, जहाँ उन्होंने अपने भाई संभाजी और माँ के साथ शिक्षा ग्रहण की. यही उन्होंने 12 साल की उम्र में साईंबाई से विवाह किया.

छत्रपति शिवाजी महाराज का स्वर्णिम इतिहास–

साल 1645 में महज 15 साल की उम्र में छत्रपति शिवाजी ने तोरण किले पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। धीरे-धीरे शिवाजी महाराज अपना प्रभुत्व आगे बढ़ा दे गए और उन्होंने कोंडाना पर भी अपना आधिपत्य जमा लिया।

छत्रपति शिवाजी महाराज के बढ़ते प्रभुत्व को देखकर बीजापुर का सुल्तान भयभीत हो गया और उसने उनकी शक्तियों का दमन करने के लिए उनके पिता शाहजी भोंसले को बंदी बना लिया। पिता को मुक्त कराने शिवा जी महाराज ने कोंडाना का किला छोड़ दिया। 1645 में खराब स्वास्थ्य के कारण शिवाजी महाराज के पिता शाहजी की मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु के बाद 1656 के करीब छत्रपति शिवाजी महाराज ने जावेली पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।

शिवाजी की बढ़ती शक्तियों और प्रभुत्व को देखते हुए आदिल शाह ने उनकी शक्तियों का दमन करने के लिए और उन्हें जान से मारने के लिए अपने सेनापति अफजल खान को शिवाजी महाराज के पास भेजा।

कहा जाता है कि प्रतापगढ़ के किले के पास अफजल खान ने शिवाजी महाराज से भेंट की और भेंट के दौरान गले मिलने पर उन पर आक्रमण कर दिया। लेकिन शिवाजी महाराज पहले से ही अफजल खान की नीतियों को समझ चुके थे इसीलिए शरीर पर कवच पहन कर गए थे और हाथों में बाघ नख लगा रखा था।

जब अफजल खान ने शिवाजी के ऊपर जानलेवा हमला किया तो जवाब में छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी अपने बाघ नख से उसका शरीर घायल कर दिया। कवच के कारण शिवाजी महाराज को कोई क्षति नहीं पहुंची लेकिन उनके भीषण प्रहार से अफजल खान की मौत हो गई।

घटना के तुरंत बाद शिवाजी के सैनिकों ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया। आखिरकार 10 नवंबर 1659 को छत्रपति शिवाजी महाराज ने बीजापुर के सुल्तान की सल्तनत को जड़ से उखाड़ फेंका।

छत्रपति शिवाजी महाराज की लडाइयां (Chhatrapati Shivaji Maharaj Fight)

शिवाजी का जब जन्म हुआ था, उस समय तक मुगलों का साम्राज्य भारत में फ़ैल चूका था, बाबर ने भारत में आकर मुग़ल एम्पायर खड़ा कर दिया था. शिवाजी ने मुगलों के खिलाफ जंग छेड़ दी और कुछ ही समय में समस्त महाराष्ट्र में मराठा साम्राज्य पुनः खड़ा कर दिया. शिवाजी ने मराठियों के लिए बहुत से कार्य किये, यही वजह है, कि उन्हें समस्त महाराष्ट्र में भगवान की तरह पूजा जाता है.

15 साल की उम्र में शिवाजी ने पहला युद्ध लड़ा, उन्होंने तोरना किले में हमला कर उसे जीत लिया. इसके बाद उन्होंने कोंडाना और राजगढ़ किले में भी जीत का झंडा फहराया. शिवाजी के बढ़ते पॉवर को देख बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी को कैद कर लिया, शिवाजी व उनके भाई संभाजी ने कोंडाना के किले को वापस कर दिया, जिसके बाद उनके पिताजी को छोड़ दिया गया. अपनी रिहाई के बाद शाहजी अस्वस्थ रहने लगे और 1964-65 के आस पास उनकी मौत हो गई. इसके बाद शिवाजी ने पुरंदर और जवेली की हवेली में भी मराठा का धव्ज लहराया. बीजापुर के सुल्तान ने 1659 में शिवाजी के खिलाफ अफजल खान की एक बहुत बड़ी सेना भेज दी और हिदायत दी की शिवाजी को जिंदा या मरा हुआ लेकर आये. अफजल खान ने शिवाजी को मारने की कोशिश कूटनीति से की, लेकिन शिवाजी ने अपनी चतुराई से अफजल खान को ही मार डाला. शिवाजी की सेना ने बीजापुर के सुल्तान को प्रतापगढ़ में हराया था. यहाँ शिवाजी की सेना को बहुत से शस्त्र, हथियार मिले जिससे मराठा की सेना और ज्यादा ताकतवर हो गई.

बीजापुर के सुल्तान ने एक बार फिर बड़ी सेना भेजी, जिसे इस बार रुस्तम ज़मान ने नेतृत्व किया, लेकिन इस बार भी शिवाजी की सेना ने उन्हें कोल्हापुर में हरा दिया.

छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लड़े गए युद्ध (Battles fought by Chhatrapati Shivaji Maharaj)

  • प्रतापगढ़ की लड़ाई, जो की साल 1659 शिवाजी महाराज और आदिलशाही जनरल अफजल खान की सेनाओं के बीच महाराष्ट्र के सतारा शहर के पास प्रतापगढ़ के किले में लड़ी गई थी।
  • फिर साल 1660 में किले के आसपास के एक पहाड़ी दर्रे पर “पवन” की लड़ाई लड़ी गई थी।
  • सूरत की बर्खास्तगी, जों की साल 1664 में, गुजरात के सूरत शहर के पास शिवाजी महाराज और मुगल कप्तान इनायत खान के बीच हुई थी।
  • पुरंदर की लड़ाई, जो साल 1665 में मुगल साम्राज्य और मराठा साम्राज्य के बीच लड़ी गई एक प्रमुख लड़ाई थी।
  • सिंहगढ़ की लड़ाई, जो साल 1670 में, महाराष्ट्र के पुणे शहर के पास सिंहगढ़ के किले पर मराठा शासक Chhatrapati Shivaji Maharaj के सेनापति तानाजी मालुसरे और जय सिंह प्रथम के अधीन किले रक्षक उदयभान राठौड़ के बीच हुई थी, जो एक मुगल सेना प्रमुख थे।
  • कल्याण की लड़ाई, जो साल 1682-83 के बिच हुई एक महत्वपूर्ण लड़ाई थी, क्योंकि मुगल साम्राज्य के बहादुर खान ने मराठा सेना को हराकर कल्याण पर अधिकार कर लिया था।
  • संगमनेर की लड़ाई, जो साल 1679 में फिर से मुगल साम्राज्य और मराठा साम्राज्य के बीच लड़ी गई थी। यह Chhatrapati Shivaji Maharaj द्वारा लड़ा गया अंतिम युद्ध था।

मुगलों के साथ मराठों का संघर्ष (Conflict of Marathas with Mughals)

1657 : Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अहमदनगर के पास और जुन्नार में मुगल क्षेत्र पर छापा मारा, जिसके लिए औरंगजेब ने नसीरी खान को भेजकर छापेमारी का जवाब दिया, जिसने अहमदनगर में शिवाजी की सेना को हराया था।

1659 : शिवाजी ने पुणे में शाइस्ता खान (औरंगजेब के मामा) और बीजापुर सेना की एक बड़ी सेना को हराया।

1664 : Chhatrapati Shivaji Maharaj ने सूरत के धनी मुगल व्यापारिक बंदरगाह पर अधिकार कर लिया।

1665 : शिवाजी और राजा जय सिंह प्रथम के बीच पुरंदर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जो पुरंदर की लड़ाई में मराठों की हार के बाद औरंगजेब का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जिसके बाद मराठों को कई कई किलों को मुगलों के हाथो सौपना पड़ा और फिर शिवाजी महाराज और संभाजी आगरा में औरंगजेब से मिलने के लिए सहमत हुए।

1666 : Chhatrapati Shivaji Maharaj जब आगरा में मुगल सम्राट से मिलने गए, तो उन्हें वहा गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें बंदी बना लिया गया। फिर बाद में वह और उसका बेटा वहां से भेष बदलकर फरार हो गए। उसके बाद 1670 तक मराठों और मुगलों के बीच शांति रही।

साल 1670 के बाद शिवाजी ने मुगलों के खिलाफ चौतरफा हमला किया। उन्होंने चार महीने के भीतर ही मुगलों द्वारा घेर लिए गए अपने अधिकांश क्षेत्रों को पुनः प्राप्त कर लिया। अपनी सैन्य रणनीति के माध्यम से, Chhatrapati Shivaji Maharaj ने दक्कन और पश्चिमी भारत में भूमि का एक बड़ा हिस्सा भी हासिल कर लिया था।

अंग्रेजों के साथ शिवाजी महाराज के संबंध (Shivaji maharaj relations with the British)

  • 1660 : शुरू में अंग्रेजों के साथ Chhatrapati Shivaji Maharaj के सौहार्दपूर्ण संबंध थे, लेकिन जब अंग्रेजों ने उनके खिलाफ बीजापुर सल्तनत का समर्थन किया, तो चीजें बिलकुल अलग हो गईं।
  • 1670 : फिर शिवाजी महाराज ने अंग्रेजों के खिलाफ खिलाफ कार्रवाई की और उन्हें बंबई में अपनी युद्ध सामग्री नहीं बेचने दी। यह संघर्ष जारी रहा और दोनों पक्षों के बीच समझौते के लिए कई वार्ता विफल रही।

आगरा यात्रा

अपनी सुरक्षा का पूर्ण आश्वासन प्राप्त होने के बाद शिवाजी आगरा के दरबार में औरंगज़ेब से मिलने के लिए तैयार हो गये। छत्रपति 9 मई, 1666  को अपने पुत्र शम्भाजी और 4000 मराठा सैनिकों के साथ मुग़ल दरबार में उपस्थित हुए, लेकिन औरंगज़ेब द्वारा उचित सम्मान नही होने पर शिवाजी ने भरे हुए दरबार में औरंगज़ेब को ‘विश्वासघाती’ कहा, जिसके फलस्वरूप औरंगज़ेब ने शिवाजी एवं उनके पुत्र को ‘जयपुर भवन’ में क़ैद कर दिया। वहाँ से शिवाजी 19 अगस्त, 1666 को फलों की टोकरी में छिपकर फ़रार हो गये और 22 सितम्बर, 1666 को रायगढ़ पहुँचे। कुछ दिनों के बाद शिवाजी ने मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब को पत्र लिखकर कहा कि “यदि सम्राट उसे (शिवाजी) को क्षमा कर दें तो वह अपने पुत्र शम्भाजी को दोबारा मुग़ल सेवा में भेज सकते हैं।” औरंगज़ेब ने शिवाजी की इन शर्तों को स्वीकार कर उसे ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की।

छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक (Chhatrapati Shivaji Maharaj Coronation)

महाराष्ट्र में हिन्दू राज्य की स्थापना शिवाजी ने 1674 में की, जिसके बाद उन्होंने अपना राज्याभिषेक कराया. शिवाजी कुर्मी जाति के थे, जिन्हें उस समय शुद्र ही माना जाता था, इस वजह से सभी ब्राह्मण ने उनका विरोध किया और राज्याभिषेक करने से मना कर दिया. शिवाजी ने बनारस के भी ब्राह्मणों को न्योता भेजा, लेकिन वे भी नहीं माने, तब शिवाजी ने उन्हें घूस देकर मनाया और फिर उनका राज्याभिषेक हो पाया. यही पर उन्हें छत्रपति की उपाधि से सम्मानित किया गया. इसके 12 दिन के बाद उनकी माता जिजाभाई का देहांत हो गया, जिससे शिवाजी ने शोक मनाया और कुछ समय बाद फिर से अपना राज्याभिषेक कराया. इसमें दूर दूर से राजा पंडितों को बुलाया गया. जिसमें बहुत खर्चा हुआ. शिवाजी ने इसके बाद अपने नाम का सिक्का भी चलाया.

सभी धर्मो का आदर :

शिवाजी धार्मिक विचारधाराओं मान्यताओं के घनी थे. अपने धर्म की उपासना वो जिस तरह से करते थे, उसी तरह से वो सभी धर्मो का आदर भी करते थे, जिसका उदहारण उनके मन में समर्थ रामदास के लिए जो भावना थी, उससे उजागर होता हैं. उन्होंने रामदास जी को पराली का किला दे दिया था, जिसे बाद में सज्जनगड के नाम से जाना गया . स्वामी राम दास एवम शिवाजी महाराज के संबंधो का बखान कई कविताओं के शब्दों में मिलता हैं . धर्म की रक्षा की विचारधारा से शिवाजी ने धर्म परिवर्तन का कड़ा विरोध किया .

शिवाजी ने अपना राष्ट्रीय ध्वज नारंगी रखा था, जो हिंदुत्व का प्रतीक हैं. इसके पीछे एक कथा है, शिवाजी रामदास जी से बहुत प्रेम करते थे, जिनसे शिवाजी ने बहुत सी शिक्षा ग्रहण की थी. एक बार उनके ही साम्राज्य में रामदास जी भीख मांग रहे थे, तभी उन्हें शिवाजी ने देखा और वे इससे बहुत दुखी हुए, वे उन्हें अपने महल में ले गए और उनके चरणों में गिर उनसे आग्रह करने लगे, कि वे भीख ना मांगे, बल्कि ये सारा साम्राज्य ले लें. स्वामी रामदास जी शिवाजी की भक्ति देख बहुत खुश हुए, लेकिन वे सांसारिक जीवन से दूर रहना चाहते थे, जिससे उन्होंने साम्राज्य का हिस्सा बनने से तो इंकार कर दिया, लेकिन शिवाजी को कहा, कि वे अच्छे से अपने साम्राज्य को संचालित करें और उन्हें अपने वस्त्र का एक टुकड़ा फाड़ कर दिया और बोला इसे अपना राष्ट्रीय ध्वज बनाओ, ये सदेव मेरी याद तुम्हे दिलाएगा और मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा.

छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना (Chhatrapati Shivaji Maharaj Army) 

शिवाजी के पास एक बहुत बड़ी विशाल सेना थी, शिवाजी अपनी सेना का ध्यान एक पिता की तरह रखते थे. शिवाजी सक्षम लोगों को ही अपनी सेना में भरती करते थे, उनके पास इतनी समझ थी, कि वे विशाल सेना को अच्छे से चला पायें. उन्होंने पूरी सेना को बहुत अच्छे से ट्रेनिंग दी थी, शिवाजी के एक इशारे पर वे सब समझ जाते थे. उस समय तरह तरह के टैक्स लिए जाते थे, लेकिन शिवाजी बहुत दयालु राजा थे, वे जबरजस्ती किसी से टैक्स नहीं लेते थे. उन्होंने बच्चों, ब्राह्मणों व औरतों के लिए बहुत कार्य किये. बहुत सी प्रथाओं को बंद किया. उस समय मुग़ल हिंदुओ पर बहुत अत्याचार करते थे, जबरजस्ती इस्लाम धर्म अपनाने को बोलते थे, ऐसे समय में शिवाजी मसीहा बनकर आये थे. शिवाजी ने एक मजबूत नेवी की स्थापना की थी, जो समुद्र के अंदर भी तैनात होती और दुश्मनों से रक्षा करती थी, उस समय अंग्रेज, मुग़ल दोनों ही शिवाजी के किलों में बुरी नजर डाले बैठे थे, इसलिए उन्हें इंडियन नेवी का पिता कहा जाता है.

मराठा शक्ति की स्थापना (establishing Maratha’s power)

राज्याभिषेक के बाद, मराठों ने अपनी संप्रभुता के तहत दक्कन के अधिकांश राज्यों को मजबूत करने के लिए आक्रामक विजय प्रयास शुरू किए। फिर उन्होंने खानदेश, बीजापुर, कारवार, कोल्हापुर, जंजीरा, रामनगर और बेलगाम पर विजय प्राप्त की और आदिल शाही शासकों द्वारा नियंत्रित वेल्लोर और गिंगी में मौजूद किलों पर भी कब्जा कर लिया।

Chhatrapati Shivaji Maharaj को अपने सौतेले भाई वेंकोजी के साथ तंजावुर और मैसूर पर अपनी पकड़ को लेकर भी समझौता हुआ। तब उनका उद्देश्य दक्कन राज्यों को एक देशी हिंदू शासक के शासन के तहत एकजुट करना और मुसलमानों और मुगलों जैसे बाहरी लोगों से इसकी रक्षा करना था।

शिवाजी महाराज के अधीन प्रशासन (Chhatrapati Shivaji Maharaj administration)

केंद्रीय प्रशासन (Central administration)

मराठा प्रशासन के पास सर्वोच्च संप्रभु के रूप में Chhatrapati Shivaji Maharaj थे, और इसके साथ विभिन्न नीतियों के प्रवर्तन की निगरानी के लिए आठ मंत्रियों (अष्टप्रधान) की एक टीम की भी नियुक्त की गई थी। इन आठ मंत्रियों ने सीधे शिवाजी महाराज को सारी सूचना दी और राजा द्वारा तैयार की गई नीतियों के निष्पादन के संदर्भ में उन्हें बहुत अधिक शक्ति दी गई। ये आठ मंत्री थे –

  1. पेशवा या प्रधान मंत्री जो की सामान्य प्रशासन के प्रमुख थे और उनकी अनुपस्थिति में राजा का प्रतिनिधित्व करते थे।
  1. मजूमदार या लेखा परीक्षक राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार था।
  1. पंडित राव या मुख्य आध्यात्मिक प्रमुख राज्य की आध्यात्मिक भलाई की देखरेख, धार्मिक समारोहों की तारीखें तय करने और राजा द्वारा किए गए धर्मार्थ कार्यक्रमों की देखरेख के लिए जिम्मेदार थे।
  1. दबीर या विदेश सचिव को विदेश नीतियों के मामलों में राजा को सलाह देने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
  1. सेनापति या सैन्य जनरल सैनिकों के संगठन, भर्ती और प्रशिक्षण सहित सेना के हर पहलू की देखरेख के प्रभारी थे। साथ ही वह युद्ध के समय राजा के सामरिक सलाहकार भी थे।
  1. न्यायधीश या मुख्य न्यायाधीश ने कानून के निर्माण और उनके बाद के प्रवर्तन, नागरिक, न्यायिक और साथ ही सैन्य को देखा।
  1. राजा अपने दैनिक जीवन में जो कुछ भी करता था उसका विस्तृत रिकॉर्ड रखने के लिए मंत्री या क्रॉनिकलर जिम्मेदार था।
  1. सचिव या अधीक्षक शाही पत्राचार के प्रभारी थे।

Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अपने राज्य को चार प्रांतों में विभाजित किया, जिनमें से प्रत्येक का नेतृत्व एक मामलातदार करता था। एक ग्राम इस प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी और इसके मुखिया को देशपांडे कहा जाता था, जो ग्राम पंचायत का नेतृत्व करता था।

शिवाजी महाराज ने अपने दरबार में फारसी के स्थान पर मराठी और संस्कृत के प्रयोग को भी बढ़ावा दिया। हालाँकि वह सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु थे और किसी भी जातिगत भेदभाव के सख्त खिलाफ थे।

राजस्व प्रशासन (Revenue administration)

Chhatrapati Shivaji Maharaj ने जागीरदारी प्रणाली को समाप्त कर दिया और इसे रैयतवाड़ी प्रणाली से बदल दिया, जिससे किसानों और राज्य के बीच बिचौलियों की आवश्यकता समाप्त हो गई।

शिवाजी महाराज उन मीरासदारों का कड़ाई से पर्यवेक्षण करते थे जिनके पास अंतर्देशीय वंशानुगत अधिकार थे। राजस्व प्रणाली मलिक अंबर की काठी प्रणाली पर आधारित थी, जिसमें भूमि के प्रत्येक टुकड़े को रॉड या काठी द्वारा मापा जाता था।

फिर शिवाजी महाराज ने चौथ और सरदेशमुखी करों की शुरुआत की। 

  • चौथ की राशि उस मानक के 1/4 भाग के बराबर थी जो मराठों को गैर-मराठा क्षेत्रों पर हमला करने वाली शिवाजी की सेना के खिलाफ सुरक्षा के रूप में दी जाती थी।
  • साथ ही सरदेशमुखी राज्य के बाहर के क्षेत्रों से 10% अतिरिक्त टैक्स की मांग की गई थी।
सैन्य प्रशासन (Military administration)
  • Chhatrapati Shivaji Maharaj ने एक मजबूत सैन्य बल बनाए रखा, साथ ही अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए कई रणनीतिक किलों का भी निर्माण किया, और कोंकण और गोवा के तटों पर एक मजबूत नौसैनिक उपस्थिति विकसित की।
  • यहाँ सामान्य सैनिकों को नकद में भुगतान किया जाता था, लेकिन प्रमुख और सैन्य कमांडर को जागीर अनुदान (सरंजम या मोकासा) के माध्यम से भुगतान किया जाता था।
  • सेना में इन्फैंट्री (मावली पैदल सैनिक), कैवलरी (घुड़सवार और उपकरण धारक), और नौसेना शामिल थे।

छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु–

3 अप्रैल 1680 को महज 50 साल की उम्र में छत्रपति शिवाजी महाराज की मौत हो गई। आज भी शिवाजी महाराज की मृत्यु एक पहेली बनी हुई है। जिसके बारे में कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उनकी मौत एक स्वाभाविक मौत थी जबकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उन्हें जहर दिया गया था।

निष्कर्ष–

भारत का इतिहास बेहद समृद्धि इतिहास है। भारतीय इतिहास की समृद्धि का सबसे बड़ा कारण है भारतीय वीर सपूतों की शौर्य गाथा जिनका देश प्रेम आज भी भारतीय मिट्टी में सना हुआ है।

छत्रपति शिवाजी महाराज को हिंदू हृदय सम्राट माना जाता है। वह अपने धर्म और राष्ट्र से बेहद प्रेम करते थे। मुगल संघर्ष के दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज ने ही हिंदुओं के साथ होने वाले उत्पीड़नो का बदला लिया और भगवा पताका लहरा दिया।

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Thu, 20 Mar 2025 10:21:28 +0530 Jaankari Rakho
औरंगजेब की जीवनी व इतिहास | Aurangzeb Biography & History in Hindi https://m.jaankarirakho.com/29 https://m.jaankarirakho.com/29 औरंगजेब की जीवनी व इतिहास Aurangzeb Biography & History in Hindi

हिंदुस्तान में सालो तक राज करने वाले औरंगजेब का प्रारंभिक जीवन, उनके पारिवारिक विवाद, शासनकाल और कुछ मशहूर कहानियों के साथ बुंदेला के युद्ध को भी बेहद सरल शब्दों में समझाया गया है।

औरंगजेब जीवन परिचय

जीवन परिचय बिंदु औरंगजेब जीवन परिचय
पूरा नाम अब्दुल मुज्जफर मुहीउद्दीन मोह्हमद औरंगजेब आलमगीर
जन्म 14 अक्टूबर 1618
जन्म स्थान दाहोद , गुजरात
माता-पिता मुमताज , शाहजहाँ
पत्नी औरंगाबादी महल, झैनाबादी महल, बेगम नबाव बाई व उदैपुरी महल
बेटे बहादुर शाह, आज़म शाह, मोह्हमद काम बख्श , मोह्हमद सुल्तान, सुल्तान मोह्हमद अकबर

औरंगजेब का प्रारंभिक जीवन

औरंगजेब मुग़ल साम्राज्य के महानतम शासकों में से एक थे। औरंगजेब का जन्म 3 नवम्बर 1618 को गुजरात राज्य के दाहोद में हुआ था। मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के पुत्र के रूप ये मुमताजमहल की छठी संतान थे। औरंगजेब के जन्म के समय मुग़ल गद्दी पर मुग़ल बादशाह जहाँगीर विराजमान थे। 1626 में गुजरात के सूबेदार शाहजहाँ द्वारा अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह करने पर जहाँगीर द्वारा शाहजहाँ एवं उनके परिवार को बंदी बना लिया गया जिसमे औरंगजेब भी शामिल थे। 1628 में शाहजहाँ ने मुग़ल साम्राज्य की गद्दी संभाली जिसके पश्चात औरंगजेब अपने परिवार के साथ वापस रहने लगे। यहाँ पर औरंगजेब ने अरबी, तुर्की एवं फ़ारसी भाषा का औपचारिक अध्ययन किया। साथ ही इस्लामिक साहित्य पढ़ने के अतिरिक्त उन्होंने हिंदी भाषा का ज्ञान भी प्राप्त किया।

पारिवारिक विवाद 

अपनी सूझ बूझ से औरंगजेब अपने पिता के चहिते बन गए थे, महज 18 साल की उम्र में उन्हें 1636 में दक्कन का सूबेदार बनाया गया. 1637 में औरंगजेब ने सफविद की राजकुमारी दिलरास बानू बेगम से निकाह किया, ये औरंगजेब की पहली पत्नी थी. 1644 में औरंगजेब की एक बहन की अचानक म्रत्यु हो गई, इतनी बड़ी बात होने के बावजूद औरंगजेब तुरंत अपने घर आगरा नहीं गए, वे कई हफ्तों बाद घर गए. यह वजह पारिवारिक विवाद का बहुत बड़ा कारण बनी, इस बात से आघात शाहजहाँ ने औरंगजेब को दक्कन के सुबेदारी के पद से हटा दिया, साथ ही उनके सारे राज्य अधिकार छीन लिए गए, उनको दरबार में आने की मनाही थी. शाहजहाँ का गुस्सा शांत होने पर उन्होंने 1645 में औरंगजेब को गुजरात का सूबेदार बना दिया, ये मुग़ल साम्राज्य का सबसे अमीर प्रान्त था. औरंगजेब ने यहाँ अच्छा काम किया, जिसके चलते उन्हें अफगानिस्तान का भी गवर्नर बना दिया गया था.

1653 में औरंगजेब एक बार फिर दक्कन के सूबेदार बने, इन्होंने अकबर द्वारा बनाये गए राजस्व नियम को दक्षिण में भी लागु कर दिया. इस समय औरंगजेब के बड़े भाई दारा शुकोह अपने पिता शाहजहाँ के चहिते थे, वे उनके मुख्य सलाहकार थे. दोनों की सोच बहुत विपरीत थी, जिस वजह से दोनों के बीच बहुत मतभेद होते थे और सत्ता को लेकर लड़ाई होती रहती थी. 1657 में शाहजहाँ बहुत बीमार पड़ गए, जिसके चलते तीनों भाइयों में सत्ता को लेकर जंग छिड गई, तीनों में औरंगजेब सबसे अधिक बलवान थे, उन्होंने अपने पिता शाहजहाँ को बंदी बना लिया व भाइयों को फांसी दे दी. इसके बाद औरंगजेब ने अपना राज्य अभिषेक खुद ही करवाया. इन्ही सब कार्यो के चलते मुग़ल साम्राज्य की थू थू होती थी और प्रजा भी इनसे नफरत करती थी. औरंगजेब ने अपने पिता को भी मारने की कोशिश की थी, लेकिन कुछ वफादारों के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए.

औरंगजेब के मध्यकालीन वर्ष

मुग़ल साम्राज्य के नियमो के अनुसार मुग़ल राजकुमारों को शासन के विभिन सूबों का सूबेदार नियुक्त किया जाता था। इसी परंपरा के तहत शाहजहाँ द्वारा अपने पुत्र औरंगजेब को वर्ष 1634 में दक्कन का गवर्नर नियुक्त कर दिया गया। अपने गवर्नर बनने के तीसरे ही वर्ष औरंगजेब द्वारा रबिया दुर्रानी के साथ विवाह किया गया। औरंगजेब की बहन वर्ष 1644 में आग लगने के कारण हुयी दुर्घटना में जलकर मारी गयीं थी। इसके पश्चात भी औरंगजेब तीन हफ्तों के समय के पश्चात दिल्ली दरबार पहुँचे। औरंगजेब की इस हरकत से बादशाह शाहजहाँ अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने औरंगजेब से सभी जिम्मेदारियों को वापस लेते हुए उन्हें सूबेदार के पास से भी हटा दिया। साथ ही दंडस्वरूप बादशाह ने औरंगजेब के दरबार आने पर पाबंदी लगाते हुए औरंगजेब पर विविध प्रतिबन्ध भी लगा दिए।

वर्ष 1945 में शाहजहाँ ने औरंगजेब को पुनः बहाल करते हुए उन्हें गुजरात राज्य का सूबेदार बनाया। गुजरात का सूबेदार रहते हुए औरंगजेब ने बेहतर प्रशासनिक कुशलता का परिचय दिया जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अफगानिस्तान, सिंध एवं मुल्तान का सूबा सौंपा गया। वर्ष 1952 में औरंगजेब को पुनः दक्कन क्षेत्र के प्रशासन की जिम्मेदारी प्रदान की गयी।

औरंगजेब के शासन की शुरुआत

बादशाह औरंगजेब के शासन की शुरुआत 1634 को मान सकते हैं जब उसके पिता शाहजहां ने उसे दक्कन का सूबेदार बनाया था। वैसे तो औरंगजेब बचपन से ही युद्ध कला में निपुण था और एक अनुशासित बादशाह था। उसके भाई दारा शिकोह और सुजा जिसमें से दारा शिकोह शाहजहां का सबसे प्रिय पुत्र था। जब औरंगजेब दक्कन का सूबेदार था। तो इधर शाहजहां ने दारा शिकोह को अपने मुगल दरबार का कामकाज सौंप दिया था। जब औरंगजेब आगरा आया तो उसने यह देखा तो बहुत क्रोधित हुआ क्रोध के कारण ही शाहजहां ने उसे दक्कन के सूबेदार पद से बर्खास्त कर दिया।

कुछ समय बाद शाहजहां ने उसे दक्कन को छोड़ गुजरात का सूबेदार बना दिया गुजरात का सूबेदार बनने के बाद उसने उस पर रहते हुए बहुत अच्छा काम किया था। जिसकी वजह से शाहजहां ने उसे उत्तरी अफगानिस्तान उज्बेकिस्तान (यह सभी स्थान आज के इन नामो से जाने जाते हैं) का सूबेदार बना दिया था। इसके बाद औरंगजेब के पद में लगातार उन्नति होती रही उसे बाद में मुल्तान व सिंध का गवर्नर बना दिया था।  इस समय तक औरंगजेब शासन व्यवस्था को बनाए रखने मे अपने दोनों भाइयों से कुशल हो गया था। 

शाहजहां को कैद किया 

1652 को शाहजहां की तबीयत खराब हो गई तब सभी को ऐसा लग रहा था। मुगल सम्राट शाहजहां की मृत्यु हो जाएगी ऐसा देखकर तीनों भाइयों के बादशाह बनने की होड़ लग गई। जिससे गद्दी पर बैठने के लिए संघर्ष होना शुरू हो गया था। औरंगजेब ने अपने भाई दाराशिकोह को फांसी दे दी उसने अपने भाई सुजा जो कि बंगाल का गवर्नर था। उसको हरा दिया। और शाहजहां को आगरा के लाल किले में कैद करवा दिया था।

कहा जाता है,की औरंगजेब द्वारा शाहजहां को कैद करवाने का मुख्य कारण शाहजहां के शासनकाल के अंतिम समय में ताजमहल निर्माण कार्य में अपार धन व्यय होने से था। शासन में वित्तीय व्यवस्था बिगड़ गई थी जिसके कारण औरंगजेब नाखुश था इसलिए औरंगजेब ने शाहजहां को कैद कर लिया था। 

साम्राज्य का विस्तार | Aurangzeb Achievements

Aurangzeb ka itihaas देखे तो औरंगजेब और अकबर मुगल साम्राज्य में दो बादशाह थे। जिन्होंने अपना शासन केवल और केवल विस्तार करने पर जोर दिया था। एक बादशाह से दूर अगर इनके व्यक्तिगत जीवन कि अगर हम बात करें तो मानो ऐसा लगता है। कि वह दो व्यक्ति हैं एक जो बादशाह है और दूसरा वह जो साधारण जीवन व्यतीत करता है। जी हां वह बहुत ही सीधा सादा जीवन व्यतीत करते थे।

वह हमेशा एक बादशाह की तरह फिजूलखर्ची नहीं करते थे। क्योंकि वह अपने शासन को शरीयत के हिसाब से चलाते थे। और खुद भी उस शरीयत का पालन करते थे। उन्होंने परिवहन तथा चुंगी कर को समाप्त कर दिया था। जो कि शरीयत के खिलाफ था वह ज्यादा फिजूलखर्ची नहीं करते थे। वह वक्त निकालकर कुरान की नकल की प्रतियों और टोपियों को सीकर तथा उन्हें बेचकर पैसे कमा लेते थे।

औरंगजेब और बुंदेला का युद्ध Aurangzeb and Bundela’s War in Hindi

यह उस समय की बात है, जब औरंगजेब ने लगभग पूरे हिंदुस्तान पर कब्जा कर लिया था। औरंगजेब के नाम से हर कोई खौफ खाता था।

उसने अपनी तलवार और खौफ के जरिए कई राजाओं को अपने अधीन कर लिया था। औरंगजेब और बुंदेलखंड के शूरवीर राजा छत्रसाल के बीच होने वाला बुंदेला युद्ध बहुत ही प्रसिद्ध है।

औरंगजेब पूरे बुंदेलखंड को बाकी प्रांतों की तरह अपने अधीन कर के वहां के लोगों पर अत्याचार करता था। तमाम मंदिर विध्वंस, मूर्ति खंडन और मारकाट के जरिए लोगों में एक छाप छोड़ दिया था। उस समय किसी की भी हिम्मत मुगल बादशाह औरंगजेब के विरोध के लिए नहीं उठते थी।

लेकिन चंपत राय के पुत्र शूरवीर छत्रसाल जो शिवाजी को अपना गुरु मानते थे, उन्होंने बुंदेलखंड को आजाद करवाने का निश्चय कर लिया था।

महाराजा छत्रसाल कभी भी मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके और लगातार युद्ध करते रहे। छत्रसाल की वीरता और उत्साह देखकर दिल्ली में बैठे बादशाह औरंगजेब को चिंता सताने लगी थी।

औरंगजेब ने 1699 में अपने सैनिकों को बुंदेलखंड में जाकर मंदिरों को नष्ट करने और लोगों को सबक सिखाने का आदेश दिया, जो कि उस समय ओरछा पर आक्रमण करती थी। इसके पहले भी औरंगजेब ने राजा छत्रसाल के साथ बहुत बार युद्ध किया था, लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगी थी।

बुंदेलखंड की प्रजा अब धीरे-धीरे राजा छत्रसाल के साथ आने लगी और खुलकर मुगल सल्तनत का विरोध किया। चंपत राय के कुछ साथी जो बुंदेलखंड के छोटे बड़े जागीरदार और सरदार हुआ करते थे, वह भी बुंदेलखंड के इस युद्ध में शामिल हो गए।

औरंगजेब द्वारा हथियाए गए मऊ को छत्रसाल ने अपने सैनिकों के साथ मिलकर लूटा और जो भी धन प्राप्त हुआ उसे लोगों में बांट दिया।

धीरे धीरे कुछ समय के अंदर ही छोटे बड़े राजा एक साथ मिलकर भूमि विस्तार करते गए। परिणाम स्वरूप मुगल खेडों में एक खलबली सी मच गई।

इस युद्ध के बाद शिवाजी द्वारा नेतृत्व करने वाले मराठों और सिखों ने औरंगजेब के शासनकाल में विद्रोह कर दिया, जिससे मुगलों के हाथ से धीरे-धीरे करके सत्ता निकलने लगी। इस एतिहासिक युद्ध को बुंदेला का युद्ध कहा गया।


मेवाड़ के प्रति नीति :

        मारवाड़ पर औरंगज़ेब की निगाहें काफ़ी दिन से गड़ी थीं। 20 दिसम्बर, 1678 ई. को ‘जामरुद्र’ में महाराजा यशवंतसिंह की मृत्यु के बाद औरंगज़ेब ने उत्तराधिकारी के अभाव में मुग़ल साम्राज्य का बहुत बड़ा कर्ज़ होने का आरोप लगाकर उसे ‘खालसा’ के अन्तर्गत कर लिया। औरंगज़ेब ने यशवंतसिंह के भतीजे के बेटे इन्द्रसिंह राठौर को उत्तराधिकार शुल्क के रूप में 36 लाख रुपये देने पर जोधपुर का राणा मान लिया। कालान्तर में महाराजा यशवंतसिंह की विधवा से एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम अजीत सिंह रखा गया।

        औरंगज़ेब ने यशवंतसिंह के पुत्र और उत्तराधिकारी पृथ्वी सिंह को ज़हर की पोशाक पहनाकर चालाकी से मरवा दिया। औरंगज़ेब ने अजीत सिंह और यशवंतसिंह की रानियों को नूरगढ़ के क़िले में क़ैद करा दिया। औरंगज़ेब की शर्त थी कि, यदि अजीत सिंह इस्लाम धर्म ग्रहण कर ले तो, उसे मारवाड़ सौंप दिया जायगा। राठौर नेता दुर्गादास किसी तरह से अजीत सिंह एवं यशवंतसिंह की विधवाओं को साथ लेकर जोधपुर से भागने में सफल रहा। राठौर दुर्गादास की अपने देश के प्रति निःस्वार्थ भक्ति के लिए कहा जाता है कि, ‘उस स्थिर हृदय को मुग़लों का सोना सत्यपथ से डिगा न सका, मुग़लों के शस्त्र डरा नहीं सके।’

धार्मिक नीति :

• यह कुरान के नियमों का पूर्णत: पालन करता था
• औरंगजेब को जिंदा पीर भी कहा जाता है
• औरंगजेब ने राजपूतों (हिंदुओं में) के अतिरिक्त अन्य किसी हिंदू जाति को पालकी का उपयोग करने तथा अच्छे हथियार रखने पर रोक लगा दी
• इसने इसने भांग का उत्पादन बंद करवा दिया व वेश्याओं को देश से बाहर निकलने को कहा व सती प्रथा पर रोक लगवाई
• औरंगजेब की धार्मिक नीति के विरूध्द सबसे पहले जाटों ने विरोध किया 1669 ई. में स्थानीय जाटों ने गोकुल के नेतृत्व में विद्रोह किया तिलपत के युध्द मे जाट परास्त हो गये

इस्लाम का समर्थक :

• औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था
• औरंगजेब ने मुद्राओं पर कलमा खुदवाना बंद करवा दिया
• उसने नौरोज त्यौहार मनाना, तुलादान एवं झरोखा दर्शन बंद कर दिया
• उसने दरबार में होली, दीपावली मनाना बंद करवा दिया
• उसने 1679 ई. में हिंदुओं पर पुन: जजिया तथा तीर्थ यात्रा कर लगाया

        औरंगज़ेब के शासन में मुग़ल साम्राज्य अपने विस्तार के चरमोत्कर्ष पर पहुंचा| वो अपने समय का शायद सबसे धनी और शक्तिशाली, शातिर व्यक्ति था, जिसने अपने जीवनकाल में मुग़ल साम्राज्य को साढ़े बारह लाख वर्ग मील में फैलाया और 15 करोड़ लोगों पर शासन किया जो उस समय दुनिया की आबादी का 1/4 भाग था| पूरे हिन्दुस्तान को एक करने वाला अकेला औरंज़ेब ही हुआ उसने अशोक और अकबर से भी बड़ा साम्राज्या विस्तार किया था|

        इतने विशाल साम्राज्य को चलाने के लिए धन की भी ज़रूरत होती है, धन एकत्रित करने के लिए उसको बहुत से कठोर कदम उठाने पड़े थे| पूरे साम्राज्य पर फतवा-ए-आलमगीरी (शरियत या इस्लामी कानून पर आधारित) लागू किया और कुछ समय के लिए गैर-मुस्लिमो पर अतिरिक्त कर भी लगाया| गैर-मुसलमान जनता पर शरियत लागू करने वाला वो पहला मुसलमान शासक था| औरंगज़ेब ने जज़िया कर फिर से आरंभ करवाया, जिसे अक़बर ने खत्म कर दिया था।

औरंगजेब की मृत्यु

जीवन भर युद्धों से घिरे रहने वाले औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में हुयी। अपने जीवन के अंतिम वर्ष उन्होंने दक्षिण भारत में ही गुजारे थे। अपने जीवन में विभिन संघर्षो में उलझा रहने के कारण एवं अपनी नीतियों के कारण औरंगजेब मुग़ल साम्राज्य के अंतिम शक्तिशाली शासक के रूप में जाने जाते है। उनकी मृत्यु पर औरंगाबाद में ही उनकी कब्र का निर्माण किया गया था।

Aurangzeb Facts –

  • औरंगजेब ने जहाँगीर को लाहौर वाले दरबार में नूर जहाँ द्वारा बंधक बना के रखा था ।
  • सम्राट औरंगजेब का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा  मुगल साम्राज्य का विस्तार करने का था।
  • औरंगजेब उनके पिताजी को शाहजहां को कैद कर 1659 में अपना राज्यभिषेक करवाया था।
  • मुगल साम्राज्य 1200000 वर्ग मील और कुल 15 करोड़
  • लोगों पर मुगल सम्राट औरंगजेब ने शासन करता था।
  •  Aurangzeb ki biwi ka naam औरंगाबादी महल, झैनाबादी महल, बेगम नबाव बाई व उदैपुरी महल था।
  • औरंगजेब ने अरबी और फारसी की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की हुई थी। 

औरंगजेब जीवन परिचय इतिहास सम्बंधित प्रश्न-उत्तर (FAQ)

औरंगजेब का जन्म कब हुआ ?

औरंगजेब का जन्म 3 नवम्बर 1618 को गुजरात राज्य के दाहोद में हुआ था।

औरंगजेब के पिता का क्या नाम था ?

औरंगजेब के पिता का नाम बादशाह शाहजहाँ एवं माता का नाम मुमताजमहल था।

दिल्ली की गद्दी को प्राप्त करने के लिए औरंगजेब द्वारा किसके साथ युद्ध लड़ा गया ?

दिल्ली की गद्दी को पाने के लिए औरंगजेब एवं दारा शिकोह के मध्य सामूगढ़ का युद्ध हुआ था जिसमे विजय प्राप्त करने के पश्चात औरंगजेब द्वारा दिल्ली की गद्दी पर कब्जा किया गया।

औरंगजेब को मुग़ल साम्राज्य का सबसे बर्बर एवं क्रूरतम शासक क्यों माना जाता है ?

औरंगजेब द्वारा गद्दी प्राप्त करने के लिए अपने भाइयों की हत्या करने एवं अपने पिता को कैद करने, अपनी धर्मान्धता एवं कट्टर सोच एवं अन्य समुदायों के प्रति नफरत को भावना के चलते मुग़ल साम्राज्य का सबसे बर्बर एवं क्रूरतम शासक माना जाता है।

औरंगजेब की मृत्यु कब हुयी ?

औरंगजेब की मृत्यु  3 मार्च 1707 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में हुयी।

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Thu, 20 Mar 2025 10:21:10 +0530 Jaankari Rakho
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जीवन परिचय | Lokmanya Bal Gangadhar Tilak biography in hindi https://m.jaankarirakho.com/32 https://m.jaankarirakho.com/32 बाल गंगाधर तिलक उन स्वतंत्रता सेनानियों में से हैं, जिन्होंने महात्मा गांधी से भी पहले भारतीयों को आजादी की कीमत समझाई और इसे प्राप्त करने के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस के गरम दल का प्रतिनिधित्व किया. भारत की जनता को तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध एकजुट करने के लिए उन्होंने  नारा दिया था- स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे. जनमानस में अपार लोकप्रियता के कारण उन्हें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक भी कहा जाता है.

बाल गंगाधर तिलक जन्म, शिक्षा एवं परिवार –

क्रमांक जीवन परिचय बिंदु  बाल गंगाधर तिलक जीवन परिचय
1.        पूरा नाम केशव गंगाधर तिलक
2.        जन्म 23 जुलाई 1856
3.        जन्म स्थान रत्नागिरी, महाराष्ट्र
4.        माता – पिता पार्वती बाई गंगाधर, गंगाधर रामचंद्र तिलक
5.        मृत्यु 1 अगस्त 1920 मुंबई
6.        पत्नी सत्यभामा (1871)
7.        राजनैतिक पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस

तिलक का जन्म चित्पावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था. इनके पिता गंगाधर तिलक, एक संस्कृत टीचर थे. तिलक को बचपन से ही पढाई में रूचि थी, वे गणित में बहुत अच्छे थे. तिलक जब 10 साल के थे, तब उनके पिता रत्नागिरी से पुणे आ गए थे. यहाँ उन्होंने एंग्लो-वर्नाकुलर स्कूल ज्वाइन किया और शिक्षा प्राप्त की. पुणे आने के थोड़े समय बाद ही तिलक ने अपनी माता को खो दिया. 16 साल की उम्र में तिलक के सर से पिता का भी साया उठ गया.

तिलक जब मैट्रिक की पढाई कर रहे थे, तब उन्होंने 10 साल की लड़की तापिबाई से शादी कर ली, जिनका नाम बाद में सत्यभामा हो गया. मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद, तिलक ने डेक्कन कॉलेज में दाखिला ले लिया, जहाँ से उन्होंने 1977 में बीए की डिग्री फर्स्ट क्लास में पास की. भारत के इतिहास में तिलक वो पीढ़ी थे, जिन्होंने मॉडर्न पढाई की शुरुवात की और कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की थी. इसके बाद भी तिलक ने पढाई जारी रखी और LLB की डिग्री भी हासिल की.

बाल गंगाधर तिलक का करियर – Lokmanya Tilak Career

शिक्षक के रुप में बाल गंगाधर तिलक की भूमिका:

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद बाल गंगाधर तिलक, पुणे के एक निजी स्कूल में गणित और इंग्लिश के शिक्षक बन गए।

वहीं स्कूल के अन्य शिक्षकों और अधिकारियों साथ उनके विचार मेल नहीं खाते थे और असहमति के चलते उन्होंने साल 1880 में स्कूल में पढ़ाना छोड़ दिया था, आपको बता दें कि बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) ने अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली की काफी आलोचना भी की थी, उन्होंने ब्रिटिश विद्यार्थियों की तुलना में भारतीय विद्यार्थियों के साथ दोगुला व्यवहार का जमकर विरोध किया और भारतीय संस्कृति और आदर्शों के प्रति जागरुकता फैलाई।

डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना – Deccan Education Society

भारतीय छात्रों के बीच राष्ट्रवादी शिक्षा को प्रेरित करने, देश के युवाओं को उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान करने और शिक्षा में गुणवत्ता लाने के उद्देश्य से बाल गंगाधर तिलक ने अपने कॉलेज के बैचमेट्स और महान समाज सुधारक गोपाल गणेश आगरकर और विष्णु शास्त्री चिपुलंकर के साथ मिलकर ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना की।

आपको बता दें कि इस सोसायटी ने साल 1885 में माध्यमिक शिक्षा के लिए एक न्यू इंग्लिश स्कूल और उच्च शिक्षा के लिए फर्ग्युसन कॉलेज की भी स्थापना की थी।

‘केसरी’ और ‘मराठा’ का प्रकाशन – Publication of ‘Kesari’ and ‘Maratha’

साल 1881 में  भारतीय संघर्षों और परेशानियों को लोगों से अवगत करवाने और लोगों के अंदर स्वशासन की भावना जागृत करने और अपने हक के लिए लड़ाई लड़ने की भावना विकसित करने केउद्देश्य से लोकमान्य तिलक ने दो साप्ताहिक पत्रिकाओं, ‘केसरी’ और ‘मराठा’ की शुरुआत की। यह दोनों ही समाचार पत्र लोगों के बीच काफी मशहूर हुए।

बाल गंगाधर तिलक का राजनैतिक सफर – Political Career of Lokmanya Bal Gangadhar Tilak

तिलक जी ने स्कूल के भार से स्वयं को मुक्त करने के बाद अपना अधिकांश समय सार्वजनिक सेवा में लगाने का निश्चय किया। अब उन्हें थोड़ी फुरसत मिली थी। इसी समय लड़कियों के विवाह के लिए सहमति की आयु बढ़ाने का विधेयक वाइसराय की परिषद के सामने लाया जा रहा था। तिलक पूरे उत्साह से इस विवाद में कूद पड़े, इसलिए नहीं कि वे समाज-सुधार के सिद्धांतों के विरोधी थे, बल्कि इसलिए कि वे इस क्षेत्र में ज़ोर-जबरदस्ती करने के विरुद्ध थे।

        सहमति की आयु का विधेयक, चाहे इसके उद्देश्य कितने ही प्रशंसनीय क्यों न रहे हों, वास्तव में हिन्दू समाज में सरकारी हस्तक्षेप से सुधार लाने का प्रयास था। अत: समाज-सुधार के कुछ कट्टर समर्थक इसके विरुद्ध थे। इस विषय में तिलक के दृष्टिकोण से पूना का समाज दो भागों, कट्टरपंथी और सुधारवादियों में बँट गया। दोनों के बीच की खाई नए मतभेदों एवं नए झगड़ों के कारण बढ़ती गई।

        भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल के लिए तिलक के विचार ज़रा ज़्यादा ही उग्र थे। नरम दल के लोग छोटे सुधारों के लिए सरकार के पास वफ़ादार प्रतिनिधिमंडल भेजने में विश्वास रखते थे। तिलक का लक्ष्य स्वराज था, छोटे- मोटे सुधार नहीं और उन्होंने कांग्रेस को अपने उग्र विचारों को स्वीकार करने के लिए राज़ी करने का प्रयास किया। इस मामले पर सन् 1907 ई. में कांग्रेस के 'सूरत अधिवेशन' में नरम दल के साथ उनका संघर्ष भी हुआ।

        राष्ट्रवादी शक्तियों में फूट का लाभ उठाकर सरकार ने तिलक पर राजद्रोह और आतंकवाद फ़ैलाने का आरोप लगाकर उन्हें छह वर्ष के कारावास की सज़ा दे दी और मांडले, बर्मा, वर्तमान म्यांमार में निर्वासित कर दिया। 'मांडले जेल' में तिलक ने अपनी महान कृति 'भगवद्गीता - रहस्य' का लेखन शुरू किया, जो हिन्दुओं की सबसे पवित्र पुस्तक का मूल टीका है। तिलक ने भगवद्गीता के इस रूढ़िवादी सार को ख़ारिज कर दिया कि यह पुस्तक सन्न्यास की शिक्षा देती है; उनके अनुसार, इससे मानवता के प्रति नि:स्वार्थ सेवा का संदेश मिलता है।

        1881 में पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश कर मराठा केसरी पत्रिका का संचालन किया । इसके माध्यम से जनजागरण व देशी रियासतों का पक्ष प्रस्तुत किया । ब्रिटिश सरकार की आलोचना के कारण उन्हें चार वर्ष का कारावास भोगना पड़ा । जेल से बाहर आकर उन्होंने डैकन एजूकेशन सोसायटी की स्थापना तथा फग्यूर्सन कॉलेज की स्थापना की । सन् 1888-89 में शराबबन्दी, नशाबन्दी व भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाते हुए पत्रों के माध्यम से कार्रवाई की ।

        सन् 1889 में उन्हें बम्बई कांग्रेस का प्रतिनिधि चुन लिया गया । सन् 1891 को सरकार द्वारा विवाह आयु का स्वीकृति विधेयक का बिल उन्होंने प्रस्तुत किया । एक बार मिशन रकूल में भाषण देने पर उन्हें सनातनी हिन्दुओं के विरोध का तथा उसके प्रायश्चित के लिए काशी स्नान करना पड़ा । जनता की गरीबी को दूर करने के लिए उनकी भूमि सुधार सम्बन्धी नीतियों की काफी आलोचना हुई । 1907 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सूरत यहाँ भरे हुए अधिवेशन में जहाल और मवाल इन दो समूह में का संघर्ष बहोत बढ़ गया इसका परिणाम मवाल समूह ने जहाल समूह को कांग्रेस संघटने से निकाल दिया. जहाल का नेतृत्व लोकमान्य तिलक इनके पास था.

        1908 में तिलक इनपर राजद्रोह का मामला दर्ज हुआ. उसमे उनको छे साल की सजा सुनाई गई और उन्हें ब्रम्हदेश के मंडाले के जेल में भेज दिया गया. मंडाले के जेल में महापुरुषों के अलग अलग ग्रन्थ मंगवाके ‘गीतारहस्य’ का अमर ग्रन्थ लिखा. इतनाही नहीं तो जर्मन और फ्रेंच इस दो समृद्ध भाषा में के महत्वपूर्ण ग्रन्थ पढने आने चाहिए इस लिए उन भाषाका भी अभ्यास किया.

        1916 में उन्होंने डॉ. अनी बेझंट इनके सहकार्य से ‘होमरूल लीग’ इस संघटने की स्थापना की. भारतीय होमरूल आन्दोलन ने स्वयं शासन के अधिकार ब्रिटिश सरकार को मांगे. होमरूल यानि अपने राज्य का प्रशासक हम करे. एसेही ‘स्वशासन’ कहते है. ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिध्द अधिकार है और मै इसे लेकर रहूँगा’ ऐसा तिलक इन्होंने विशेष रूप से बताया. होमरूल आन्दोलन की वजह से राष्ट्रिय आन्दोलन में नवचैतन्य निर्माण हुआ.

        लोकमान्य तिलक इन्होंने स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और स्वराज्य इस चतु: सूत्री  हिन्दी ये राष्ट्र भाषा होनी चाहिए ये घोषणा तिलक इन्होंने सबसे पहले की
। बाल गंगाधर तिलक पहले भारतीय नेता थे जिन्होंने यह कहा, "स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है। मैं इसे लेकर रहूँगा।" वह संस्कृत और गणित के प्रकांड पंडित थे।

बाल गंगाधर तिलक की जेल यात्रा –

लोकमान्य तिलक ने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति का जमकर विरोध किया और अपने अखबारों के माध्यम में अंग्रेजों के खिलाफ उत्तेजक लेख लिखे, वहीं उन्होंने इस लेख में चापेकर बंधुओं को प्रेरित किया, जिसके चलते उन्होंने 22 जून, 1897 में कमिश्चनर रैंड औरो लेफ्टडिनेंट आयर्स्ट की हत्या कर दी, जिसके बाद लोकमान्य तिलक पर इस हत्या के लिए उकसाने के आरोप में राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चला और 6 साल के लिए ‘देश निकाला’ का दंड दिया गया, और साल 1908 से 1914 की बीच उन्हें बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। हालांकि जेल के दौरान भी उन्होंने लिखना जारी रखा, उन्होंने जेल में गीता रहस्य’ किताब लिखी।

वहीं  तिलक के क्रांतिकारी कदमों से अंग्रेज बौखला गए थे और उनके समाचार पत्रों के प्रकाशन को रोकने की भी कोशिश की थी। लेकिन उस समय तक तिलक की लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी,और लोगों में स्वशासन पाने की इच्छा जागृत हो उठी थी।

इसलिए अंग्रेजों को भी इस महान क्रांतिकारी बाल गंगाधर तिलक के आगे झुकने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

होम रुल लीग की स्थापना – Home Rule League

साल 1915 में जेल की सजा काटने के बाद, जब लोकमान्य तिलक भारत वापस लौटे, तो उस दौरान उन्होंने नोटिस किया कि, प्रथम विश्व युद्द के चलते राजनीतिक स्थिति तेजी से बदल रही थी, वहीं उनकी रिहाई से लोकमान्य तिलक के प्रशंसकों में खुशी की लहर दौड़ गई, और लोगों ने मिलकर उनके रिहाई का उत्सव मनाया।

इसके बाद बाल गंगाधर तिलक फिर से कांग्रेस में शामिल हुए, और अपने  साथियों के साथ फिर से एकजुट होने का फैसला करते हुए उन्होंने एनी बेसेंट, मुहम्मद अली जिन्नहा, युसूफ बैप्टिस्टा के साथ मिलकर 28 अप्रैल, साल 1916 में पूरे भारत में होम रुल लीग की स्थापना की, जिसमें उन्होंने स्वराज और प्रशासकीय सुधार समेत भाषीय प्रांतों की स्थापना की मांग की।

समाज सुधारक के रुप में बाल गंगाधर तिलक के काम:

बाल गंगाधर तिलक जी ने एक महान समाज सुधारक के रुप में भी कई काम किए, उन्होंने अपने जीवन में समाज में फैली जाति प्रथा, बाल विवाह जैसे तमाम बुराईयों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और महिलाओं की शिक्षा और उनके विकास पर जोर दिया।

बाल गंगाधर तिलक रचना (Bal Gangadhar Tilak books) –

  • ओरियन – 1893
  • दी आर्कटिक होम इन दी वेद – 1903
  • गीता रहस्य – 1915

लोकमान्य तिलक जी के सम्मान में स्मारक –

पुणे में तिलक म्यूजियम, ‘तिलक रंगा मंदिर’ नाम का थिएटर ऑडिटोरियम भी उनके सम्मान में उनके नाम पर स्मारक के तौर पर बनवाए गए हैं, इसके अलावा भारत सरकार ने साल 2007 में उनकी स्मारक में एक सिक्का भी जारी किया था।

इसके साथ ही ‘लोकमान्य: एक युग पुरुष’ के नाम से उन पर एक फिल्म भी बनाई जा चुकी है।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एक महान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी नेता थे,जिन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों के माध्यम से न सिर्फ लोगों में स्वशासन की इच्छा जागृत की थी, बल्कि समाज में फैली तमाम बुराइयों को दूर कर लोंगो को एकता के सूत्र में बांधने के लिए गणेशोत्सव और शिवाजी समारोह समेत तमाम कार्यक्रमों को शुरु भी किया था।

लोकमान्य तिलक जी के देश के लिए किए गए त्याग और बलिदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। यह राष्ट्र हमेशा उनके कृतज्ञों का ऋणी रहेगा। ऐसे महान युग पुरुष का भारत में जन्म लेना गौरव की बात है।

एक नजर में लोकमान्य तिलक के मुख्य कार्य – Bal Gangadhar Tilak Information

  • 1880 में पुणे में न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना।
  • 1881 में जनजागरण के लिए ‘केसरी’ मराठी और ‘मराठा’ इंग्रेजी ऐसे दो अखबारों की शुरुवात की। आगरकर केसरी के और तिलक मराठा के संपादक बने।
  • 1884 में पुणे में डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी की स्थापना।
  • 1885 में पुणे में फर्ग्युसन कॉलेज शुरू किया गया।
  • 1893 में ‘ओरायन’ नाम के किताब का प्रकाशन।
  • लोकमान्य तिलक ने लोगों मे एकता की भावना निर्माण करने के लिए ‘सार्वजानिक गणेश उत्सव’ और ‘शिव जयंती उत्सव’ शुरू किया।
  • 1895 में मुम्बई प्रांतीय विनियमन बोर्ड के सभासद इसलिए चुना गया।
  • 1897 में लोकमान्य तिलक पर राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें डेढ़ साल की सजा सुनाई गयी। उस समय तिलक ने अपने बचाव में जो भाषण दिया था वह4 दिन और 21 घंटे चला था।
  • 1903 में ‘दि आर्क्टिक होम इन द वेदाज’ नाम के किताब का प्रकाशन।
  • 1907 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सूरत के अधिवेशन में जहाल और मवाल इन दो समूह का संघर्ष बहोत बढ़ गया था। इसका परिणाम मवाल समूह ने जहाल समूह को कांग्रेस संघटने से निकाल दिया। जहाल का नेतृत्व लोकमान्य तिलक इनके पास था।
  • 1908 में तिलक इनपर राजद्रोह का मामला दर्ज हुआ। उसमे उनको छः साल की सजा सुनाई गई और उन्हें ब्रम्हदेश के मंडाले के जेल में भेज दिया गया। मंडाले के जेल में उन्होंने ‘गीतारहस्य’ नाम का अमर ग्रन्थ लिखा।
  • 1916 में उन्होंने डॉ. एनी बेसेंट इनके सहकार्य से ‘होमरूल लीग’ संघटना की स्थापना की। होमरूल यानि अपने राज्य का प्रशासक हम करे। जिसे ‘स्वशासन’ भी कहते है।
  • हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहियें इस बात को सबसे पहले तिलक ने ही रखा था।

बाल गंगाधर तिलक की किताबें – Bal Gangadhar Tilak Books

भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के जनक कहे जाने वाले बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय इतिहास, हिन्दू धर्म और संस्कृति पर कई किताबें लिखीं। आपको बता दें कि उन्होंने साल 1893 में वेदों के ओरियन एवं शोध के बारे में एक पुस्तक लिखी, वहीं उन्होंने जेल के दौरान उन्होंने श्रीमदभगवत गीता रहस्य नामक किताब भी लिखी।

बाल गंगाधर तिलक के कथन – Quotes of Bal gangadhar tilak

1. स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।
2. 
आलसी व्यक्तियों के लिए भगवान अवतार नहीं लेते, वह मेहनती व्यक्तियों के लिए ही अवतरित होते हैं, इसलिए कार्य करना आरम्भ करें।
3. 
मानव स्वभाव ही ऐसा है कि हम बिना उत्सवों के नहीं रह सकते, उत्सव प्रिय होना मानव स्वभाव है। हमारे त्यौहार होने ही चाहिए।
4. 
आप मुश्किल समय में खतरों और असफलताओं के डर से बचने का प्रयास मत कीजिये। वे तो निश्चित रूप से आपके मार्ग में आयेंगे ही।
5. 
प्रातः काल में उदय होने के लिए ही सूरज संध्या काल के अंधकार में डूब जाता है और अंधकार में जाए बिना प्रकाश प्राप्त नहीं हो सकता।
6. 
कमजोर ना बनें, शक्तिशाली बनें और यह विश्वास रखें की भगवान हमेशा आपके साथ है।
7. 
ये सच है कि बारिश की कमी के कारण अकाल पड़ता है लेकिन ये भी सच है कि भारत के लोगों में इस बुराई से लड़ने की शक्ति नहीं है।
8. 
यदि हम किसी भी देश के इतिहास को अतीत में जाएं, तो हम अंत में मिथकों और परम्पराओं के काल में पहुंच जाते हैं जो आखिरकार अभेद्य अन्धकार में खो जाता है।
9. 
धर्म और व्यावहारिक जीवन अलग नहीं हैं। सन्यास लेना जीवन का परित्याग करना नहीं है। असली भावना सिर्फ अपने लिए काम करने की बजाये देश को अपना परिवार बना मिलजुल कर काम करना है। इसके बाद का कदम मानवता की सेवा करना है और अगला कदम ईश्वर की सेवा करना है।

बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु – Bal Gangadhar Tilak Death

जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना का बाल गंगाधर तिलक जी पर गहरा असर पड़ा था, इसके बाद उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा, और बाद में वे मधुमेह की बीमारी की चपेट में आ गए जिससे, उनकी हालत बेहद खराब होती चली गई।

जिसके बाद 1 अगस्त साल 1920 में लोकमान्य तिलक ने अपनी अंतिम सांस ली, वहीं उनकी मृत्यु से पूरे देश में भारी शोक की लहर दौड़ गई, उनके अंतिम दर्शन पाने के लिए उनकी शव यात्रा में लाखों लोगों की भीड़ उमड़ी थी।

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Thu, 20 Mar 2025 10:21:05 +0530 Jaankari Rakho
भगत सिंह की जीवनी | Bhagat Singh Biography in Hindi https://m.jaankarirakho.com/37 https://m.jaankarirakho.com/37 भारत की आजादी की लड़ाई के समय भगत सिंह सभी नौजवानों के लिए यूथ आइकॉन थे, जो उन्हें देश के लिए आगे आने को प्रोत्साहित करते थे. भगत सिंह सिख परिवार में जन्मे थे, बचपन से ही उन्होंने अपने आस पास अंग्रेजों को भारतियों पर अत्याचार करते देखा था, जिससे कम उम्र में ही देश के लिए कुछ कर गुजरने की बात उनके मन में बैठ चुकी थी. उनका सोचना था, कि देश के नौजवान देश की काया पलट सकते है, इसलिए उन्होंने सभी नौजवानों को एक नई दिशा दिखाने की कोशिश की. भगत सिंह का पूरा जीवन संघर्ष से भरा रहा, उनके जीवन से आज के नौजवान भी प्रेरणा ग्रहण करते है.

बिंदु (Point) जानकारी (Information)
नाम (Name) भगत सिंह
जन्म दिनांक(Birth Date) 28 सितंबर 1907
जन्म स्थान (Birth Place) ग्राम बंगा, तहसील जरनवाला, जिला लायलपुर, पंजाब
पिता का नाम (Father Name) किशन सिंह
माता का नाम (Mother Name) विद्यावती कौर
शिक्षा (Education) डी.ए.वी. हाई स्कूल, लाहौर, नेशनल कॉलेज, लाहौर
संगठन नौजवान भारत सभा, हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, कीर्ति किसान पार्टी, क्रांति दल
राजनीतिक विचारधारा समाजवाद, राष्ट्रवाद
मृत्यु (Death) 23 मार्च 1931
मृत्यु का स्थान (Death Place) लाहौर
स्मारक (Memorial) द नेशनल शहीद मेमोरियल, हुसैनवाला, पंजाब

भगत सिंह का जन्म, परिवार एवं आरंभिक जीवन (Birth, Family and Early Life)

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1960 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था जो पाकिस्तान में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह सिंधु था और माता का नाम श्रीमती विद्यावती जी था। यह 10 भाई बहन थे। भगत सिंह का नाम अमर शहीदों में लिया जाता है। उनका पैतृक गांव खटकड़ कलां है जो  पंजाब में है।

शहीद भगत सिंह भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक है जिन्होंने हमें अपने देश के लिए मर मिटने की ताकत दी और यह बताया कि देश प्रेम क्या है। भगत सिंह का जन्म सिख परिवार में हुआ था। जब भगत सिंह का जन्म हुआ तो उनके पिता सरदार किशन सिंह जी जेल में थे। उनके चाचा श्री अजीत सिंह जी स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन भी बनाई थी।

भगत सिंह जी का दाखिला दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल में कराया था बाद में नेशनल कॉलेज BA की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने 1920 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोगआंदोलन में भाग लेने लगे गांधीजी विदेशी चीजों का बहिष्कार करते थे। 14 वर्ष की आयु में भगत सिंह ने सरकारी स्कूलों की किताबें और कपड़े जला दिए।

भगत सिंह क्रांतिकारी (Bhagat Singh Freedom Fighter)

प्रारंभ में भगत सिंह की गतिविधियाँ ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संक्षिप्‍त लेख लिखने, सरकार को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से एक हिंसक विद्रोह के सिद्धांतों को रेखांकित करने, मुद्रित करने और वितरित करने तक सीमित थीं. युवाओं पर उनके प्रभाव और अकाली आंदोलन के साथ उनके सहयोग को देखते हुए, वह सरकार के लिए एक रुचि के व्यक्ति बन गए. पुलिस ने उन्हें 1926 में लाहौर में हुए बमबारी मामले में गिरफ्तार किया. उन्हें 5 महीने बाद 60,000 रुपये के बॉन्ड पर रिहा कर दिया गया.

30 अक्टूबर 1928 को लाला लाजपत राय ने सभी दलों के जुलूस का नेतृत्व किया और साइमन कमीशन के आगमन के विरोध में लाहौर रेलवे स्टेशन की ओर मार्च किया. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की प्रगति को विफल करने के लिए एक क्रूर लाठीचार्ज का सहारा लिया. टकराव ने लाला लाजपत राय को गंभीर चोटों के साथ छोड़ दिया और उन्होंने नवंबर 17, 1928 को अपनी चोटों के कारण दम तोड़ दिया. लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए, भगत सिंह और उनके सहयोगियों ने जेम्स ए स्कॉट की हत्या की साजिश रची, जो पुलिस अधीक्षक थे. माना जाता है कि लाठीचार्ज का आदेश दिया है. क्रांतिकारियों ने स्कॉट के रूप में सहायक पुलिस अधीक्षक जे.पी. सौन्डर्स को गलत तरीके से मार डाला. भगत सिंह ने अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए जल्दी से लाहौर छोड़ दिया. बचने के लिए उन्होंने अपनी दाढ़ी मुंडवा ली और अपने बाल काट दिए, जो सिख धर्म के पवित्र सिद्धांतों का उल्लंघन था.

डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के निर्माण के जवाब में, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने विधानसभा परिसर के अंदर एक बम विस्फोट करने की योजना बनाई, जहां अध्यादेश पारित होने वाला था. 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली के गलियारों में बम फेंका, ‘इंकलाब ज़िंदाबाद!’ और हवा में अपनी मिसाइल को रेखांकित करते हुए पर्चे फेंके. बम किसी को मारने या घायल करने के लिए नहीं था और इसलिए इसे भीड़ वाली जगह से दूर फेंक दिया गया था, लेकिन फिर भी कई परिषद सदस्य हंगामे में घायल हो गए. धमाकों के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों ने गिरफ्तारी दी.

भगत सिंह ने शादी करने से किया इनकार

भगत सिंह ने 1923 में एफए की परीक्षा सोलह वर्ष की उम्र में पास कर ली थी वो बीए में दाखिल हुए। उस समय भारत मे कम उम्र में शादी करने कर दी जाती थी। इसलिए परिवार की तरफ से भगत सिंह को भी शादी की बात चलने लगी।

संभवतः मानांवाला गांव का एक समृद्ध परिवार भगत सिंह को देखने आया और सगाई के लिए तारीख भी निश्चित कर दी गई।” भगत सिंह इस बात से नाराज होकर घर छोड़कर भाग गए और पिताजी के नाम पत्र लिखकर कहा-

पिता जी, नमस्ते! मेरी जिंदगी भारत की आजादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी जिंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो बापू जी (दादाजी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है। लिहाजा मैं उस समय की उनकी प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं। उम्मीद है आप मुझे माफ कर देंगे।  ~ आपका ताबेदार 

जलियाँवाला बाग हत्याकांड

भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी के दिन) रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी। करीब 5,000 लोग जलियांवाला बाग में इकट्ठे थे।

ब्रिटिश सरकार के कई अधिकारियों को यह 1857 के गदर की पुनरावृत्ति जैसी परिस्थिति लग रही थी जिसे न होने देने के लिए और कुचलने के लिए वो कुछ भी करने के लिए तैयार थे।

जिसमें जनरल डायर नामक एक अँग्रेज ऑफिसर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं। जनसमूह के लिए वहाँ से बचकर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। जिसमें 400 से अधिक व्यक्ति मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए।

जलियाँवाला बाग की मिट्टी घर ले आये भगत सिंह

भगत सिंह की उम्र उस समय मात्र बारह वर्ष की थी। इस घटना से उनका गहरा धक्का लगा। दूसरे दिन वह स्कूल बंद होने पर घर नहीं लौटे और वही से 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गये।

वहाँ तैनातपहरेदारों के बीच से किसी तरह वे जलियाँवाला बाग के भीतर चले गये और भारतीयों के रक्त से सनी हुई गीली मिट्टी को एक बोतल में भर लाये।

जब भगत सिंह घर पहुंचे तो उनसे उनकी छोटी बहन ने पूछा-“तुम इतने समय तक कहाँ थे? माताजी तुम्हारे लिए भोजन रखकर कब से तुम्हारी राह देख रही हैं। भगत सिंह ने अपने हाथ की बोतल दिखाते हुए कहा- “यह देखो। यह हमारे भाई-बहनों का खून है, जिन्हें अंग्रेजों ने मार डाला है। इसे प्रणाम करो।”

पिता से स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने की अनुमति मांगी

नवीं कक्षा में प्रवेश करने के पूर्व ही भगत सिंह ने निश्चय कर लिया कि स्वाधीनता-संग्राम में कूदकर अपने देश की खातिर काम करेंगे। उस समय उसकी उम्र केवल तेरह वर्ष की थी।

भगत सिंह ने अपने निश्चय के बारे में पिता जी को बताया। किशन सिंह स्वयं एक क्रांतिकारी थे, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को सहर्ष अनुमति दे दी।

विदेशी वस्त्रों की होली जलाई

वह समय था, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश की आजादी के लिए लड़ रही थी। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार भी उन दिनों जोरो पर था। नेता गण लोगो को समझाते थे कि यदि विदेशी वस्त्र खरीदेंगे तो इससे दूसरे देशों को लाभ होगा। इसलिए हमें स्वदेशी वस्त्र ही पहनने चाहिए।

भगत सिंह बचपन से केवल खादी वस्त्र ही पहनते थे। भगत सिंह ने भी इस आन्दोलन में बड़े उत्साह से भाग लिया। भगत सिंह देशी वस्त्रों को पहनने का लोगों से आग्रह करते और हर हफ्ते विदेशी वस्त्रों को एकत्रित करके उनकी होली जलाया करते थे।

गांधी जी द्वारा अहसयोग आंदोलन वापस लेना

सन् 1922 में कांग्रेस ने गोरखपुर जिले के चोरीचौरा नामक कस्बे में एक जुलूस निकाला। उसी वक्त कुछ उपद्रवी लोगों ने 22 पुलिस सिपाहियों को एक मकान में बन्द करके उसमें आग लगा दी। ऐसी ही हिंसात्मक घटना बम्बई और मद्रास में भी हो चुकी थी, इससे महात्मा गांधी ने आघात होकर असहयोग आंदोलन बीच मे ही रोक दिया।

उस समय वह आन्दोलन देशभर में पूरे जोर-शोर से चल रहा था।महात्मा गांधी के इस निर्णय से देश भर के आन्दोलनकरियो समेत नौजवान भगत सिंह को गहरी निराशा हुई। क्या सिर्फ 22 व्यक्तियों के मर जाने से इतने विशाल महत्वपूर्ण आंदोलन को रोका जा सकता है?

जब जलियावाला बाग में निहत्ते हज़ारों लोगों पर गोलियां चला दी गयी तो क्या वह हिंसा नही थी? कुछ ही समय पूर्व जब एक उन्नीस वर्षीय क्रांतिकारी करतार सिंह को अंग्रेज सरकार ने फांसी पर लटकाया था। तब अहिंसा समर्थक किसी ने भी कोई आपत्ति क्यों नहीं उठाई? फिर अब क्यों अहिंसा इतनी महत्वपूर्ण बन गई?

सशस्त्र क्रांति में प्रवेश

इस तरह के विचारों ने अहिंसा और असहयोग आंदोलनों के प्रति भगत सिंह की निष्ठा को कम कर दिया। फलस्वरूप भगत सिंह ने आयरलैंड, इटली और रूस के क्रांतिकारियों का अध्ययन करने लगें।

इससे उनके मन में यह आस्था जोर पकड़ती गई कि देश की आजादी को प्राप्त करने का एकमात्र व्यावहारिक तरीका सशस्त्र क्रांति ही है। ऐसा सोचकर उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने।

अपने अध्ययन को जारी रखने के लिए भगत सिंह नेशनल कॉलेज मैं भर्ती हो गये। भगत सिंह दिन में क्लास में बैठकर पढ़ते और शाम को कई मित्रों को एकत्रित करके उनसे क्रांति के बारे में चर्चा करते थे। इससे उन्हें देश भर की क्रांतिकारी गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती।

उस समय बंगाल क्रांतिकारियों का प्रान्त था, भगत सिंह को इस बात ने अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने किसी तरह बंगाल प्रांत के क्रांतिकारियों से सम्पर्क स्थापित किया।

मैं जोर देकर कहता हूँ कि मेरे अंदर भी अच्छा जीवन जीने की महत्वकांक्षा और आशाएं हैं लेकिन मैं समय की माँग पर सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ यही सबसे बड़ा त्याग है ~ शहीद भगत सिंह

बंगाल के क्रांतिकारी पार्टी के नेता शचीन्द्रनाथ सान्याल थे। वह प्रत्येक क्रांतिकारी की जांच पड़ताल के पश्चात ही अपने दल में स्वीकार करते थे। औऱ प्रत्येक सदस्य को एक शर्त स्वीकार करनी पड़ती थी कि अपने नेता के आह्वान पर क्रांतिकारी सदस्य को तुरंत शामिल होना आवश्यक है। भगत सिंह ने यह शर्त मंजूर कर ली।

हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना

काकोरी काण्ड में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि सन 1928 में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।

लाला लाजपत राय जी की हत्या का प्रतिशोध

सन 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये प्रदर्शन हुए। राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय के शांतिपूर्ण विरोध करने पर भी पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट जेम्स स्कॉट द्वारा लाठीचार्ज करा दिया गया। जिसमे लाल लालजपात राय घायल हो गए और उनकी मृत्यु हो गयी।

इस घटना का बदला लेने के लिए भगत सिंह, शिवराम राजगुरु, सुखदेव थापर और चंद्रशेखर आज़ाद ने जेम्स स्कॉट को मारने की योजना बनाई गयी। योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे।

जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गये जैसे कि वो ख़राब हो गयी हो। गोपाल के इशारे पर दोनों सचेत हो गये। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० वी० स्कूल की चहार दीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे।

17 दिसंबर 1928 को करीब सवा चार बजे, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी। इसके बाद भगत सिंह ने भी 3-4 गोली दाग दी।

इस प्रकार योजना को सफलता पूर्वक अंजाम दे दिया गया, किंतु उन्होंने जेम्स स्कॉट की बजाय एक अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी। इस घटना को अंजाम देने के बाद सभी क्रांतिकारी घटना स्‍थल से अज्ञात जगह चले गये।

भगत सिंह और सुखदेव का असेंबली में बम फेकना

अंग्रेज सरकार दिल्ली की असेम्बली में ‘पब्लिक सेफ़्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ पास करवाने जा रही थी। इससे भारतीयों पर अंग्रेजों का दबाव और अधिक बढ़ जाता।

ऐसा करने से रोकने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में बम फेंकने का बीड़ा उठाया। इस बम विस्फ़ोट का उद्देश्य किसी को भी चोट पहुंचाना नहीं था। बल्कि दुनिया को ये दिखाना था कि देश के युवा जाग गए है और अब उन्हें स्वतंत्रता चाहते है।

8 अप्रैल 1929 को, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सत्र के दौरान दो बमों फेेंके। बम फटने के बाद उन्होंने “इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!” का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। पर्चे पर लिखा था – ‘बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंचे शब्द की आवश्यकता होती है.’

बम फोड़ने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहां से भागे नहीं बल्कि स्‍वयं को पुलिस के हवाले कर दिया उनका प्लान ही ये था। योजना के अनुसार विस्फोट में कोई भी नहीं मारा गया, हालांकि कुछ लोग घायल जरूर हो गए थे। इसी काण्ड को अंग्रेजों ने “लाहौर षडयंत्र केस” नाम दिया।

भगत सिंह के जेल में दिन

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को बम विस्फोट मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। कुछ समय पश्‍चात पुलिस ने सुखदेव सहित अन्‍य क्रांतिकारियों को भी गिरफ्तार कर लिया। जिससे सॉन्डर्स की हत्या का राज भी खुल गया जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव फांसी की सजा सुनाई गई।

जेल में भगत सिंह करीब 2 साल रहे। जेल में रहते हुए भी उनका अध्ययन लगातार जारी रहा। इस दौरान वे लेखो के माध्यम से अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहते थे।

उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ?

शहीद भगत सिंह की फांसी (Bhagat Singh Death Reason) 

भगत सिंह खुद अपने आप को शहीद कहा करते थे, जिसके बाद उनके नाम के आगे ये जुड़ गया. भगत सिंह, शिवराम राजगुरु व सुखदेव पर मुकदमा चला, जिसके बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई, कोर्ट में भी तीनों इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते रहे. भगत सिंह ने जेल में रहकर भी बहुत यातनाएं सहन की, उस समय भारतीय कैदियों के साथ अच्छा व्यव्हार नहीं किया जाता था, उन्हें ना अच्छा खाना मिलता था, ना कपड़े. कैदियों की स्थिति को सुधार के लिए भगत सिंह ने जेल के अंदर भी आन्दोलन शुरू कर दिया, उन्होंने अपनी मांग पूरी करवाने के लिए कई दिनों तक ना पानी पिया, ना अन्न का एक दाना ग्रहण किया. अंग्रेज पुलिस उन्हें बहुत मारा करती थी, तरह तरह की यातनाएं देती थी, जिससे भगत सिंह परेशान होकर हार जाएँ, लेकिन उन्होंने अंत तक हार नहीं मानी. 1930 में भगत जी ने Why I Am Atheist नाम की किताब लिखी.

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी दे दी गई. कहते है तीनों की फांसी की तारीख 24 मार्च थी, लेकिन उस समय पुरे देश में उनकी रिहाई के लिए प्रदर्शन हो रहे थे, जिसके चलते ब्रिटिश सरकार को डर था, कि कहीं फैसला बदल ना जाये, जिससे उन लोगों ने 23 व 24 की मध्यरात्रि में ही तीनों को फांसी दे दी और अंतिम संस्कार भी कर दिया.

अंग्रेज़ों द्वारा शव को छुपाकर जलाने की कोशिश

फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर जेल की पिछली दीवार के एक छेद से उनके शवों को बाहर निकाला गया।

फिर लाहौर से लगभग 80 किलोमीटर दूर हुसैनीवाला में सतलुज नदी के तट पर ले गये। जहाँ मिट्टी का तेल डालकर शव को नष्ट करने की कोशिश की गई। जलती आग को देखकर गाँव के लोगों को कुछ संदेह हुआ।

इसी दौरान वहां लाला लाजपत राय की बेटी पार्वती देवी और भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर समेत हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा हो गए। इतनी बड़ी भीड़ को वहां देख अंग्रेज लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंककर भाग गये।

लाहौर में सम्मान के साथ निकाली गई शव यात्रा

अंग्रेजों के वहां भागने के बाद तीनों शहीदों के अधजले शवों को बाहर निकाला गया और लाहौर में आकर तीनों शहीदों की बेहद सम्मान के साथ अर्थियां बनाई गईं।

उसके बाद 24 मार्च की शाम हजारों की भीड़ ने पूरे सम्मान के साथ उनकी शव यात्रा निकाली और फिर उनका विधिवत तरिके से रावी नदी के किनारे किया अंतिम संस्कार किया।

शहीद दिवस (Shahid Diwas)

शहीद भगत सिंह के बलिदान को व्यर्थ न जाने देने के कारण हर साल उनके मुत्यु तिथि को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है. इन दिन उन्हें देश के सभी लोग श्रद्धांजलि देते हैं.

शहीद भगत सिंह कविता (Bhagat Singh Kavita or Poem)

“इतिहास में गूँजता एक नाम हैं भगत सिंह
शेर की दहाड़ सा जोश था जिसमे वे थे भगत सिंह  
छोटी सी उम्र में देश के लिए शहीद हुए जवान थे भगत सिंह
आज भी जो रोंगटे खड़े करदे ऐसे विचारो के धनि थे भगत सिंह ..”

भगत सिंह की लोकप्रियता और विरासत (Popularity and legacy of Bhagat Singh)

भगत सिंह उनकी प्रखर देशभक्ति, जो कि आदर्शवाद से जुडी थी. जिसने उन्हें अपनी पीढ़ी के युवाओं के लिए एक आदर्श आइकन बना दिया. ब्रिटिश इंपीरियल सरकार के अपने लिखित और मुखर आह्वान के माध्यम से वह अपनी पीढ़ी की आवाज बन गए. गांधीवादी अहिंसक मार्ग से स्वराज की ओर जाने की उनकी आलोचना अक्सर कई लोगों द्वारा आलोचना की गई है फिर भी शहादत के निडर होकर उन्होंने सैकड़ों किशोर और युवाओं को पूरे स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. वर्तमान समय में उनकी प्रतिष्ठा इस तथ्य से स्पष्ट है कि भगत सिंह को 2008 में इंडिया टुडे द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में, सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी से आगे महान भारतीय के रूप में वोट दिया गया था.

भगत सिंह के लोकप्रिय नारे (Bhagat Singh Quotes, Slogans in Hindi)

  1. इंकलाब जिंदाबाद।
  2. साम्राज्यवाद का नाश हो।
  3. प्रेमी, पागल, और कवी एक ही चीज से बने होते हैं।
  4. मैं एक ऐसा पागल हूँ जो जेल में भी आजाद है, राख का हर कण मेरी गर्मी से गतिमान है।
  5. क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है? गरीबी एक अभिषाप है, यह एक सज़ा है।

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Thu, 20 Mar 2025 10:20:59 +0530 Jaankari Rakho
सीवी रमन का जीवन परिचय | CV Raman Biography in Hindi https://m.jaankarirakho.com/49 https://m.jaankarirakho.com/49 ‘रमन प्रभाव’ (Raman Effect) सीवी रमन की अद्भुत और महत्वपूर्ण खोजों में से एक थी, जिसके लिए उन्हें साल 1930 में नोबेल पुरस्कार से भी नवाजा गया था।

वहीं अगर सीवी रमन ने यह खोज नहीं की होती तो शायद हमें कभी यह पता नहीं चल पाता कि ‘समुद्र के पानी का रंग नीला क्यों होता है, और इस खोज के माध्यम से ही लाइट के नेचर और बिहेवियर के बारे में भी यह पता चलता हैं कि जब कोई लाइट किसी भी पारदर्शी माध्यम जैसे कि सॉलिड, लिक्वड या गैस से होकर गुजरती है तो उसके नेचर और बिहेवियर में बदलाव आता है।

वास्तव में उनकी इन खोजों ने विज्ञान के क्षेत्र में भारत को एक नई दिशा प्रदान की, जिससे देश के विकास को भी बढ़ावा मिला। इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि सीवी रमन को देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न और लेनिन शांति पुरस्कार समेत विज्ञान के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण कामों के लिए तमाम पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।

सीवी रमन का जीवन परिचय (C V Raman Biography in Hindi)

नाम चंद्रशेखर वेंकट रमन
जन्म 7 नवंबर 1888
जन्म स्थान तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु
मृत्यृ 21 नवंबर 1970
कार्य भौतिक वैज्ञनिक
उपलब्धियां प्रकाश के प्रकीर्णन और रमन प्रभाव की खोज
पुरस्कार नोबेल पुरस्कार
संपत्ति पता नहीं
जाति पता नहीं
स्कूल सेंट अलोय्सिअस एंग्लो-इंडियन हाई स्कूल
कॉलेज प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास
पिता का नाम चंद्रशेखर अय्यर
माता का नाम पार्वती अम्मा

सी वी रमन का जन्म और शुरूआती जीवन (C V Raman Early Life)

चंद्रशेखर वेंकट रमन का जन्म तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली शहर में 7 नवम्बर 1888 को हुआ था। उनके पिता का नाम चंद्रशेखर अय्यर व माता का नाम पार्वती अम्मा था। वो अपने माता-पिता के दूसरे नंबर की संतान थे। उनके पिता चंद्रशेखर अय्यर ए वी नरसिम्हाराव महाविद्यालय, विशाखापत्तनम, (आधुनिक आंध्र प्रदेश) में भौतिक विज्ञान और गणित के प्रवक्ता थे। उनके पिता को पढ़ने का बहुत शौक़ था इसलिए उन्होंने अपने घर में ही एक छोटी-सी लाइब्रेरी बना रखा थी। इसी कारण रमन का विज्ञान और अंग्रेज़ी साहित्य की पुस्तकों से परिचय बहुत छोटी उम्र में ही हो गया था। संगीत के प्रति उनका लगाव भी छोटी आयु से आरम्भ हुआ और आगे चलकर उनकी वैज्ञानिक खोजों का विषय बना। उनके पिता एक कुशल वीणा वादक थे जिन्हें वो घंटों वीणा बजाते हुए देखते रहते थे। इस प्रकार बालक रमन को प्रारंभ से ही बेहतर शैक्षिक वातावरण प्राप्त हुआ।

सी वी रमन की शिक्षा (C V Raman Education)

13 साल की उम्र में उन्होंने स्कॉलरशिप के साथ इंटरमिडियट की परीक्षा पास की. उन्होंने मद्रास जोकि अब चेन्नई है, विश्वविद्यालय से अपनी स्नातक की परीक्षा 1904 में पास की. 1902 मे उनके पिता मद्रास में प्रेसीडेंसी कॉलेज में गणित और भौतिकी के व्याख्याता के रूप में आ गये थे. सी वी रमन ने पहली बार भौतिकी विषय में स्वर्ण पदक जीता था, फिर वे 1907 में अपनी मास्टर डिग्री में पुरे मद्रास विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान में प्रथम आये थे. अपनी मास्टर डिग्री के दौरान ही वह प्रयोगशाला में नई खोज करते रहते थे, जिस वजह से उनके प्रोफेसर उन्हें बहुत प्यार करते थे. बहुत पहले छात्र जीवन से ही उन्होंने प्रकाशिकी और ध्वनिक दो क्षेत्रों में अपना शोध करना शुरु कर दिया था. उनके प्रोफेसर आर एस जोन्स ने उन्हें सुझाव दिया कि वह अपने प्रयोग को अपने शोध पेपर के रूप में प्रकाशित करवाए, जिस पर अम्ल कर उन्होंने अपने शोध पेपर को लन्दन से प्रकाशित होने वाली पत्रिका में छपवाया. उस पत्रिका का नाम फिलोसिफिकल पत्रिका थी, उसमें 1906 के नवम्बर माह में सी वी रमन जी की शोध को प्रकाशित किया गया था. जिसका नाम था प्रकाश का आणविक विकिरण.                         

सीवी रमन का निजी जीवन ( विवाह और बच्चे ) – CV Raman Spouse and Children

सीवी रमन ने लोकसुंदरी नाम की कन्या को वीणा बजाते हुए सुना था, जिसे सुनकर वह मंत्रमुग्ध हो गए थे और इसके बाद उन्होंने लोकसुंदरी से विवाह करने की इच्छा जताई थी, वहीं इसके बाद परिवार वालों की रजामंदी से वे 6 मई साल 1907 को लोकसुंदरी अम्मल के साथ शादी के बंधन में बंध गए।

जिनसे उन्हें चंद्रशेखर और राधाकृष्णन नाम के दो पुत्रों की प्राप्ति हुई। वहीं आगे चलकर उनका बेटा राधाकृष्णन एक प्रसिद्ध खगोलशास्त्री के रुप में भी मशहूर हुआ था।

सीवी रमन ने सहायक लेखपाल के तौर पर की अपने करियर की शुरुआत – CV Raman Career

मास्टर डिग्री हासिल करने के बाद सीवी रमन की अद्भुत प्रतिभा को देखते हुए कुछ प्रोफेसर्स ने उनके पिता से हायर स्टडीज के लिए उन्हें इंग्लैंड भेजने की भी सलाह दी, लेकिन सीवी रमन का स्वास्थ्य ठीक नहीं होने की वजह से वह आगे की पढ़ाई के लिए विदेश तो नहीं जा सके।

लेकिन इसी दौरान ब्रिटिश सरकार की तरफ से एक परीक्षा आयोजित करवाई गई थी, जिसमें सीवी रमन ने भी हिस्सा लिया था और वह इस परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद उन्हें सरकार के वित्तीय विभाग में नौकरी करने करने का मौका मिला, फिर कोलकाता में उन्होंने सहायक लेखापाल के तौर पर अपनी पहली सरकारी नौकरी ज्वाइन की।

हालांकि इस दौरान भी उन्होंने एक्सपेरिंमेंट और रिसर्च करना नहीं छोड़ा, वे कोलकाता में ‘इण्डियन एसोसिएशन फॉर कल्टिवेशन ऑफ साइंस’ लैब में अपनी खोज करते रहते थे, नौकरी के दौरान जब भी उन्हें समय मिलता था, वह अपनी खोज में लग जाते थे।

सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर कलकत्ता यूनिवर्सिटी में बने प्रोफेसर

हालांकि, विज्ञान के क्षेत्र में कुछ करने के उद्देश्य से उन्होंने साल 1917 में ही उन्होंने अपनी  सरकारी नौकरी छोड़कर  ‘इण्डियन एसोसिएशन फॉर कल्टिवेशन ऑफ साइंस’ लैब में मानद सचिव के पद पर ज्वाइन कर लिया था। वहीं इसी साल उन्हें कलकत्ता यूनिवर्सिटी से भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर का भी जॉब ऑफर मिला था, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया और वे भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर के तौर पर कलकत्ता यूनिवर्सिटी में अपनी सेवाएं देने लगे, और अब वे अपनी रुचि के क्षेत्र में काम करके बेहद खुश भी थे।

इसके बाद साल 1924 में सीवी रमन को ‘ऑपटिक्स’ के क्षेत्र में उनके सराहनीय योगदान के लिए लंदन की ‘रॉयल सोसायटी’ की सदस्य बनाया गया।

‘रमन इफ़ेक्ट’ की खोज – Raman scattering or the Raman effect 

‘रमन प्रभाव’ की खोज उनकी वो खोज थी, जिसने भारत को विज्ञान के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान दिलवाई। उन्होंने 28 फरवरी, साल 1928 को कड़ी मेहनत और काफी प्रयास के बाद ‘रमन प्रभाव’ की खोज की।

वहीं उन्होंने अगले ही दिन इसकी घोषणा कर दी थी। उनकी इस खोज से न सिर्फ इस बात का पता चला कि समुद्र का जल नीले रंग का क्यों होता है, बल्कि यह भी पता चला कि जब भी कोई लाइट किसी पारदर्शी माध्यम से होकर गुजरती है तो उसके नेचर और बिहेवियेर में चेंज आ जाता है।  

प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर’ ने इसे प्रकाशित किया। वहीं उनकी इस खोज को ‘रमन इफेक्ट’ (Raman effect) या ‘रमन प्रभाव’ का नाम दिया गया। इसके बाद वह एक महान वैज्ञानिक के तौर पर पहचाने जाने लगे और उनकी ख्याति पूरी दुनिया में फैल गई।

इसके बाद मार्च, साल 1928 में सीवी रमन ने गलोर स्थित साउथ इंडियन साइन्स एसोसिएशन में अपनी इस खोज पर स्पीच भी दी। इसके बाद दुनिया की कई लैब में उनकी इस खोज पर अन्वेषण होने लगे।

आपको बता दें कि उनकी इस खोज के द्धारा लेजर की खोज से अब रसायन उद्योग, और प्रदूषण की समस्या आदि में रसायन की मात्रा पता लगाने में भी मद्द मिलती है। सीवी रमन एक विज्ञान के क्षेत्र में वाकई में यह एक अतुलनीय खोज थी।

वहीं उन्हें इस खोज के लिए साल 1930 में प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘नोबेल पुरस्कार’ से भी नवाजा गया। वहीं सीवी रमन की इस महान खोज के लिए भारत सरकार ने 28 फरवरी के दिन को हर साल ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रुप में मनाने की भी घोषणा की।

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस (आईआईएससे रिटायरमेंट –

 बेंगलौंर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में सीवी रमन को साल 1934 में डायरेक्टर बनाया गया था। हालांकि इस दौरान भी वे स्टिल की स्पेक्ट्रम प्रकृति, हीरे की संरचना, स्टिल डाइनेमिक्स के बुनियादी मुद्दे और गुणों समेत कई रंगदीप्त पदार्थो के प्रकाशीय आचरण पर खोज करते रहे।

इसके साथ ही आपको यह भी बता दें कि सीवी रमन को वाध्य यंत्र और संगीत में भी काफी रुचि थी, इसी वजह से उन्होंने तबले और मृदंगम के संनादी (हार्मोनिक) की प्रकृति की भी खोज की थी। इसके बाद साल 1948 में सी.वी रमन आईआईएस से रिटायर्ड हो गए थे।

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट  की स्थापना – Raman Research Institute

साल 1948 में सी.वी रमन ने  वैज्ञानिक सोच और अनुसन्धान को बढ़ावा देने के लिए रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट, बैंग्लोर (Raman Research Institute, Bangluru) की स्थापना की थी।

सी वी रमन का विवाद (C V Raman Controversy)

कृष्णन को जब साथ में नोबेल पुरस्कार नहीं मिला तो यह एक विवाद उनके साथ जुडा जबकि कृष्णन उनके बहुत अच्छे व्यावसायिक मित्र थे. रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी में इस बात की चर्चा हुई है. इसके साथ ही अर्नेस्ट रदरफोर्ड में भी बताया गया है. 1929 में उन्होंने अपने रॉयल सोसाइटी के अपने राष्ट्रपति भवन के अभिभाषण में भी बोला.

वैज्ञानिक सीवी रमन की महान उपलब्धियां – CV Raman Awards

भारत के महान वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकट रमन को विज्ञान के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए कई पुरुस्कारों से भी नवाजा गया, जिनके बारे में हम आपको नीचे बता रहे हैं-

  • वैज्ञानिक सीवी रमन को साल 1924 में लन्दन की ‘रॉयल सोसाइटी’ का सदस्य बनाया गया।
  • सीवी रमन ने 28 फ़रवरी 1928 को ‘रमन प्रभाव’ की खोज की थी, इसलिए इस दिन को भारत सरकार ने हर साल ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रूप में बनाने की घोषणा की थी।
  • सीवी रमन ने भारतीय विज्ञान कांग्रेस की 16 वें सत्र की अध्यक्षता साल 1929 में की।
  • सीवी रमन को साल 1929 में उनके अलग-अलग प्रयोगों और खोजों के कई यूनिवर्सिटी से मानद उपाधि, नाइटहुड के साथ बहुत सारे पदक भी दिए गए।
  • साल 1930 में प्रकाश के प्रकीर्णन और ‘रमन प्रभाव’ जैसी महत्वपूर्ण खोज के लिए उन्हें उत्कृष्ठ और प्रतिष्ठित सम्मान नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। आपको बता दें कि वे इस पुरस्कार को पाने वाले पहले एशियाई भी थे।
  • विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए साल 1954 में उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया।
  • साल 1957 में सीवी रमन को लेनिन शांति पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।

सी वी रमन का अंतिम समय 

अक्टूबर 1970 के अंत में उन्हें दिल का दौरा आया तथा जिसकी वजह से वह अपनी प्रयोगशाला में ही गिर पड़े. उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने जांच करने के बाद कहा कि ये 4 घंटे से ज्यादा नहीं जी पाएंगे. हालांकि वे कुछ दिनों तक जिंदा रहे और अपने संस्थान के बगीचे में रहने की इच्छा जताई.

मरने से 2 दिन पहले उन्होंने अपने एक पूर्व छात्र को बुलाकर एकेडमी के जर्नल्स के बारे में नसीहत की, उसी शाम रमन ने अपने शयनकक्ष (bedroom) में अपने संस्थान के प्रबंधन बोर्ड से मुलाकात की तथा अपने संस्थान के भविष्य के प्रबंधन पर चर्चा की. उन्होंने पत्नी को अपनी मृत्यु पर बिना किसी तामझाम के साधारण अंतिम विदाई करने को भी कहा. 

21 नवंबर 1970 को 82 साल की उम्र में सीवी रमन की स्वाभाविक मौत हो गई.

सीवी रमन भारत के महान वैज्ञानिकों में से एक थे. जिनकी कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प ने भारत को गौरवान्वित किया तथा विज्ञान में पहला नोबेल पुरस्कार दिलवाया. 

उन्होंने ये साबित कर दिया कि अगर कोई व्यक्ति वास्तव में अपनी इच्छाओं को पाना चाहता है तो उसे कोई भी नहीं रोक सकता है.

विज्ञान में इनकी रूचि तथा शोध (research) के प्रति समर्पण ने इसके ‘रमन प्रभाव’ को खोजने की राह को आसान बना दिया. उन्हें हमेशा एक महान वैज्ञानिक, भौतिक विज्ञानी और नोबेल पुरस्कार विजेता के रूप में याद किया जाएगा.

सी वी रमन के चर्चित वचन (C V Raman Quotes)

  1. मौलिक विज्ञान के बारे में अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि मुझे मौलिक विज्ञान में पूरा विश्वास है, और इसको किसी भी औधोगिक, अनुदेशात्मक, सरकारों के साथ ही किसी भी सैन्य बल से प्रेरित नहीं किया जाना चाहिए.
  2. आधुनिक भौतिक विज्ञान के बारे में उन्होंने कहा कि आधुनिक भौतिक विज्ञान को पूरी तरह से परमाणु संविधान की मूल भुत परिकल्पना पर बनाया गया है.
  3. अपने महान अनुभव के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि 1921 में जब गर्मियों में वो यूरोप गए, तब उन्हें पहला अवसर भूमध्य सागर के विचित्र नीले रंग के बदलने का अवलोकन प्राप्त हुआ.
  4. सफलता और असफलता के बारे में उन्होंने अपने विचार रखते हुए कहा है कि हम अपनी असफलता के खुद ही जिम्मेवार है. अगर हम असफल नहीं होंगे तो हम कभी भी कुछ भी सीख नहीं पायेंगे. असफलता से ही सफलता पाने के लिए प्रेरित होते है.
  5. ज्ञान की खोज के बारे में उन्होंने कहा है कि हम अक्सर यह अवसर तलासते रहते है कि खोज कहा से की जाये, लेकिन हम यह देखते है प्राकृतिक घटना के प्रारंभिक बिंदु में ही एक नई शाखा का विकास छुपा हुआ है.
  6. किसी भी सवाल से नहीं डरता अगर सवाल सही किया जाये तो प्राकृतिक रूप से उसके लिए सही जवाब के दरवाजे खुल जायेंगें.
  7. मैंने अपने माता जी और पिता से आज्ञा लेकर 3 जून 1941 को नौसेना में भर्ती होने के लिए चला गया.
  8. आप ये हमेशा नहीं चुन सकते की कौन आपके जीवन में आएगा, लेकिन जो भी हो आप उनसे हमेशा शिक्षा ले सकते हो वो हमेशा आपको एक सीख ही देगा.
  9. अगर कोई मुझसे सही से पेश आये तो हमेशा एक सही दिशा में सफलता को देखेगा, अगर मुझसे गलत तरीके से पेश आये तब तुम्हारी गर्त निश्चित है.
  10. अगर कोई आपके बारे में वे अपने तरीके से सोचता है, तो वह अपने दिमाग के सबसे अच्छे जगह को बर्बाद करता है और यह उनकी समस्या हो सकती है आपकी नहीं.
  11. आणविक विवर्तन के विषय का मूल महत्व लार्ड रेले के सैधांतिक काम के माध्यम से आकाश के नीले रंग में दिखने पर उसको इस रंग में पहचानने के लिए आया था, जिसमे उन्होंने बताया कि वातावरण की गैसों द्वारा सूर्य के प्रकाश के बिखरे हुए परिणाम का नतीजा है.
  12. जिस पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए मैंने 7 साल तक मेहनत करते हुए इंतजार किया और जब नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, तो मैंने इसे अपना और अपने सहयोगी की उपलब्धि माना. लेकिन जब मै ब्रिटिश जैक में बैठा था और जब मै पीछे मुड कर देखा तब मुझे यह अहसास हो रहा था कि मेरा देश भारत कितना गरीब है, कि उसके पास अपने देश का एक झंडा भी नहीं है यह मेरे लिए बहुत पीड़ादायक स्थिति थी, और मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मेरा सारा शरीर टूट रहा है.
  13. मुझे ऐसा लगता है और ये अहसास भी होता है कि अगर भारत की महिलाएं विज्ञान और विज्ञान की प्रगति में अपनी रूचि दिखाए, तो आज तक जो भी पुरुष हासिल करने में नाकाम रहे है वो वह सब कुछ वे प्राप्त कर सकती है. महिलाओं में भक्ति की एक गुणवत्ता है वह किसी भी काम को बहुत ईमानदारी से करती है यही गुणवत्ता विज्ञान के क्षेत्र में उन्हें महत्वपूर्ण सफलता दिला सकती है. इसलिए आईये हम एक कल्पना करते है विज्ञान के क्षेत्र में सिर्फ पुरुष ही अपना एकाधिकार न समझे.     

FAQ

Q : सीवी रमन ने किस चीज की खोज की?

Ans : सीवी रमन ने 1928 में भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में एक खोज की थी।

Q : कौन से पुरस्कार से नवाजे गए सीवी रमन?

Ans : सीवा रमन को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया।

Q : सीवी रमन का जन्म कब हुआ?

Ans : सीवी रमन का जन्म 7 नवंबर 1888 में हुआ।

Q : सीवी रमन की मृत्यृ कब हुई?

Ans : सीवी रमन की मृत्यृ 21 नवंबर 1970 में हुई।

Q : सीवी रमन का पूरा नाम क्या है?

Ans : सीवी रमन का नाम चंद्रशेखर वेंकट रमन।

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Thu, 20 Mar 2025 10:20:52 +0530 Jaankari Rakho
आचार्य चाणक्य का जीवन परिचय | Chanakya Biography In Hindi https://m.jaankarirakho.com/50 https://m.jaankarirakho.com/50 भारतीय इतिहास का सर्वाधिक प्रखर कूटनीतिज्ञ कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगा. चाणक्य जिन्हें लोग कौटिल्य या विष्णुगुप्त के नाम से भी जानते हैं. टनीति, अर्थशास्त्र, राजनीति के अपने महान ज्ञान का सदुपयोग कर उन्होंने जनकल्याण और अखंड भारत निर्माण जैसे रचनात्मक कार्य किए. वह एक विश्व प्रसिद्ध व्यक्तित्व हैं

आप सभी अर्थशास्त्र (Economics) से भलीभांति परिचित होंगे जिसका मतलब होता है धन का अध्ययन. यह संस्कृत भाषा के दो शब्दों को जोड़कर बना है – अर्थ+शास्त्र. निरंतर बढ़ते हुए समय के साथ-साथ अर्थ जगत में और इसके साथ ही अर्थशास्त्र के ज्ञान में भी वृद्धि हुई है. यह सामाजिक विज्ञान की एक ऐसी शाखा है जिसके बिना किसी सभ्यता की कल्पना भी करना मुश्किल है.

आचार्य चाणक्य का नाम इतना प्रसिद्ध है कि उनका नाम सभी ने सुना ही होगा. उनकी चाणक्य नीति विश्व प्रसिद्ध है. आचार्य चाणक्य के शिष्य चंद्रगुप्त ने उनके साथ मिलकर अखंड भारत का निर्माण किया था. कहा जाता है कि वह एक ऐसे शख्स थे जो अपनी बुद्धिमता से सामने वाले को हरा ही देते थे.

आचार्य चाणक्य का परिचय (Introduction to Acharya Chanakya)

पूरा नाम आचार्य चाणक्य/कौटिल्य/विष्णुगुप्त
जन्म 375 ईसा पूर्व, तक्षशिला, भारत
माता चनेश्वरी
पिता ऋषि चणक
गुरु ऋषि चणक
जाति ब्राह्मण
धर्म हिंदू
पेशा अध्यापक, अर्थशास्त्री, लेखक, सलाहकार, मार्गदर्शक
उपलब्धियां मौर्य साम्राज्य के सह-संस्थापक, मौर्य साम्राज्य के प्रधानमंत्री, चाणक्य नीति, अर्थशास्त्र के रचयिता 
मृत्यु 283 ईसा पूर्व, पाटलिपुत्र, भारत
उम्र 92  वर्ष

चाणक्य का जीवन परिचय –

भारतीय अर्थशास्त्र के जनक एव महान विचारों के प्रणेता और महापंडित का जन्म साधारण ब्राह्मण परिवार में 350 ईसा पूर्व में हुआ था। उन्होंने तक्षशिला में अभ्यास किया था और बाद में चाणक्य ने तक्षशिला को उत्तर-पश्चिमी प्राचीन भारत का प्रमुख शिक्षा केंद्र बनाया था। चाणक्य को भारत का मैक्यावली के नाम से भी जाना जाता है। इतिहास और विद्धानो के कुछ मतभेद है। जिसके चलते इतिहास यह बताया जाता है। की कुटिल वंश में जन्म होने के कारन उन्हें कौटिल्य कहते है। दूसरी और विद्धान यह बताते है की गूढ़ और उग्र स्वभाव के कारन उन्हें कौटिल्य कहते थे। आचार्य चाणक्य का जन्म नेपाल की तराई में बताते है। तो जैन धर्म के अनुसार मैसूर राज्य का श्रवणबेलगोला जन्म स्थान बताया जाता है।

चाणक्य का जन्म –

आचार्य चाणक्य के जन्म स्थान को लेकर ‘मुद्राराक्षस‘ के मता अनुसार चाणक्य के पिता का नाम चमक था। उनके कारन पिता के नाम से ही उन्हें चाणक्य नाम प्रसिद्ध हुआ। उनका जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। चाणक्य ने बालयकाल में कंगाल परिस्थिति देखी ऐसी गरीबी की कई समय पर तो उन्हें खाना भी नहीं मिलता था। चाणक्य बाल्यावस्था से ही जिद्दी और क्रोधी स्वभाव के हुआ करते थे। वह अपने शुरुआती जीवन से ही साधारण जीवन जीना पसंद करते थे। उन्होंने अपने जीवन में बहुत उतर चढ़ाव देखे तब जाके एक महान विद्धान बन सके थे। 

चाणक्य की शिक्षा –

आचार्य चाणक्य के समय में नालंदा विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध थी। उसमे चाणक्य ने अपना विद्या अभ्यास पूर्ण किया था। चाणक्य बालयकाल से ही एक होनहार एव बुद्धिमान छात्र हुआ थे। उन्हें पढ़ने में बहुत लगाव रहता था। कुछ ग्रंथों के मतानुसार आचार्य चाणक्य ने तक्षशिला से अपनी शिक्षा प्राप्त की थी।  तक्षशिला भी प्राचीन समय में भारत का प्रमुख शिक्षा केंद्र था। आचार्य चाणक्य को ज्योतिष , अर्थशास्त्र , युद्ध रणनीतियों, दवा और राजनीति जैसे विभिन्न विषयो की बहुत अच्छी जानकारी प्राप्त थी।

Chanakya Biography में आपको बतादे की वह साहित्य, उपनिषद और वेदों पुराणों के बहुत अच्छे ज्ञानी थे। वह फारसी और ग्रीक भाषाएँ भी बहुत अच्छे से बोल सकते थे। अपनी शिक्षा पूर्ण करके चाणक्य ने तक्षशिला विद्यालय में ही अर्थशास्त्र एव राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर की जोब शुरू की थी। उसके बाद सम्राट चंद्रगुप्त के बहुत नजदीकी महामंत्री बने थे। 

वे घटनाएं जिन्होनें चाणक्य का जीवन ही बदल दिया – Chanakya Life Story

चाणक्य एक कुशल और महान चरित्र वाले व्यक्ति थे इसके साथ ही वे एक महान शिक्षक भी थे। अपने महान विचारों और महान नीतियों से वे काफी लोकप्रिय हो गए थे उनकी ख्याति सातवें आसमान पर थी लेकिन इस दौरान ऐसी दो घटनाएं घटी की आचार्य चाणक्य का पूरा जीवन ही बदल गया।

  • पहली घटना  भारत पर सिकंदर का आक्रमण और तात्कालिक छोटे राज्यों की ह्रार।
  • दूसरी घटना – मगध के शासक द्वारा कौटिल्य का किया गया अपमान।

ऊपर लिखी गईं ये दो घटनाएं उनके जीवन की ऐसी घटनाएं हैं जिनकी वजह से कौटिल्य ने देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने का संकल्प लिया और उन्होनें शिक्षक बनकर बच्चों के पढ़ाने के बजाय देश के शासकों को शिक्षित करने और उचित नीतियों को सिखाने का फैसला लिया और वे अपने दृढ़ संकल्प के साथ घर से निकल पड़े।

आपको बता दें कि जब भारत पर सिकन्दर ने आक्रमण किया था उस समय चाणक्य तक्षशिला में प्रिंसिपल थे। ये उस समय की बात है जब तक्षशिला और गान्धार के सम्राट आम्भि ने सिकन्दर से समझौता कर लिया था।

चाणक्य ने भारत की संस्कृति को बचाने के लिए सभी राजाओं से आग्रह किया लेकिन उस समय सिकन्दर से लड़ने कोई नहीं आया। जिसके बाद पुरु ने सिकन्दर से युद्ध किया लेकिन वे हार गए। 

उस समय मगध अच्छा खासा शक्तिशाली राज्य था और उसके पड़ोसी राज्यों की इस राज्य पर ही नजर थी। जिसको देखते हुए देशहित की रक्षा के लिए विष्णुगुप्त, मग्ध के तत्कालीन सम्राट धनानन्द से सिकंदर के प्रभाव को रोकने के लिए सहायता मांगने गए।

लेकिन भोग-विलास एवं शक्ति के घमंड में चूर धनानंद ने चाणक्य के इस प्रस्ताव ठुकरा दिया। और उनसे  कहा कि  –

पंडित हो और अपनी चोटी का ही ध्यान रखो; युद्ध करना राजा का काम है तुम पंडित हो सिर्फ पंडिताई करो।

तभी चाणक्य ने नंद साम्राज्य का विनाश करने की प्रतिज्ञा ली।

चाणक्य की कूटनीति

चाणक्य के बारे में पढने के बाद हमे पता चलता है की कौटिल्य नीति के अंतर्गत शत्रु को नाश करने के लिए अनुचित उपायों का वर्णन है, किन्तु किस परिपेक्ष्य में? इसे भी विस्तार से जानना जरुरी है. कौटिल्य के अनुसार कूटनीति का प्रयोग केवल दुष्ट और अधार्मिक लोगों पर ही करनी चाहिये. अधार्मिक शत्रुओं को नष्ट करने के लिए कूट विद्या का प्रयोग किया जा सकता है.

कौटिल्य का राज्यनीति सिद्धांत

आचार्य चाणक्य और मक्यावली दोनों ही का उद्देश्य केवल राष्ट्र था. वे राष्ट्र को ही सब कुछ समझते थे. दोनों ही के द्वारा राष्ट्र की अभिवृद्धि करने के पक्ष पर जोर दिया गया अर्थात शत्रुओं को दमन (विभिन्न उपायों को अपनाकर) करके राज्य का विस्तार करना. उनके मतानुसार एक राजा का एकमात्र लक्ष्य अपने साध्य की सिद्धि करना तथा दृढ़तापूर्वक शासन करना चाहिये.

कौटिल्य का राज्यनीति सिद्धांत धर्मं का कभी विरोध नहीं करता लेकिन बहुत अधिक धार्मिकता की ओर झुका हुआ भी नहीं है. उनके राजनीति में सामान्य नैतिक बंधन नहीं है बल्कि उससे मुक्त है. सामान्य नैतिक बंधन नहीं होने के कारण ही उनके विचार मक्यावली से मिलते-जुलते प्रतीत होते हैं फलस्वरूप उन्हें भारत का मक्यावली कहा जाता है. चाणक्य का राजनीति सिद्धांत चिंतन हेतु एक महत्वपूर्ण विषय है.

चाणक्य और चन्द्रगुप्त – Chanakya and Chandragupta

चाणक्य और चंद्रगुप्त का गहरा संबंध है। चाणक्य चंद्रगुप्त के सम्राज्य के महामंत्री थे और उन्होनें ही चंद्रगुप्त का सम्राज्य स्थापित करने में उनकी मद्द की थी।

दरअसल  नंद सम्राज्य के शासक द्धारा अपमान के बाद चाणक्य अपनी प्रतिज्ञा को सार्थक करने के निकल पड़े। इसके लिए उन्होनें चंद्रगुप्त को अपना शिष्य बनाया। चाणक्य उस समय चंद्रगुप्त की प्रतिभा को समझ गए थे इसलिए उन्होनें चंद्रगुप्त को नंद सम्राज्य के शासक से बदला लेने के लिए चुना।

जब चाणक्य की चंद्रगुप्त मौर्य से मुलाकात हुई तब चंद्रगुप्त महज 9 साल के थे। इसके बाद चाणक्य ने अपने विलक्षण ज्ञान से चंद्रगुप्त को अप्राविधिक विषयों और व्यावहारिक तथा प्राविधिक कलाओं की शिक्षा दी।

वहीं आपको बता दें कि चाणक्य ने चंद्रगुप्त को चुनने का फैसला इसलिए भी लिया क्योंकि उस समय कुछ मुख्य शासक जातियां ही थी जिसमे शाक्य, मौर्य का प्रभाव ज्यादा था। वहीं चन्द्रगुप्त उसी गण के प्रमुख का पुत्र था। जिसके बाद चाणक्य ने उसे अपना शिष्य बना लिया, और उनके साथ एक नए सम्राज्य की स्थापना की।

चाणक्य की नीतियों से नंद सम्राज्य का पतन और मौर्य सम्राज्य की स्थापना: 

शक्तिशाली और घमंड में चूर नंद वंश का राजा धनानंद जो कि अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल करता था और जिसने यशस्वी और महान दार्शनिक चाणक्य का अपमान किया था जिसके बाद चाणक्य ने चंद्रगुप्त के साथ मिलकर अपनी नीतियों से नंद वंश के पतन किया था।

आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद सम्राज्य के पतन के मकसद को लेकर कुछ अन्य शक्तिशाली शासकों के साथ गठबंधन बनाए थे।

आपको बता दें कि आचार्य चाणक्य विलक्षण प्रतिभा से भरे एक बेहद बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति थे। उन्होंनें अपनी चालाकी से कुछ मनोरंजक युद्ध रणनीतियों को तैयार किया और वे बाद में उन्होनें मगध क्षेत्र के पाटलिपुत्र में नंदा वंश का पतन किया और जीत हासिल की थी।

वहीं नंदा सम्राज्य के आखिरी शासक की हार के बाद नंदा सम्राज्य का पतन हो गया इसके बाद उन्होनें चंदगुप्त मौर्य के साथ मिलकर एक नए सम्राज्य मौर्य सम्राज्य की स्थापना की। चंद्र गुप्त मौर्य के दरबार में उन्होनें राजनीतिक सलाहकार बनकर अपनी सेवाएं दी।

चाणक्य की मौर्य सम्राज्य के विस्तार में अहम भूमिका:

चाणक्य के मार्गदर्शन से मौर्य सम्राज्य के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य गंधरा में स्थित जो कि वर्तमान समय अफगानिस्तान में, अलेक्जेंडर द ग्रेट के जनरलों को हराने के लिए आगे बढ़े। बुद्धिमान और निर्मम, चाणक्य ने अपनी महान नीतियों से चंद्रगुप्त के मौर्य साम्राज्य को उस समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से बदलने में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चाणक्य की नीतियों से मौर्य सम्राज्य का विस्तार पश्चिम में सिंधु नदी से, पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक किया गया बाद में मौर्य साम्राज्य ने पंजाब पर भी अपना नियंत्रण कर लिया था इस तरह मौर्य सम्राज्य का विस्तार पूरे भारत में किया गया।

अनेक विषयों के जानकार और महान विद्धान चाणक्य ने भारतीय राजनैतक ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ लिखा जिसमें भारत की उस समय तक की आर्थिक, राजनीतिक और समाजिक नीतियों की व्याख्या समेत अन्य महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी दी गई है।

ये ग्रंथ चाणक्य ने इसलिए लिखा था ताकि राज्य के शासकों को इस बात की जानकारी हो सके कि युद्ध, अकाल और महामारी के समय राज्य का प्रबंधन कैसे किया जाए।

जैन ग्रंथों में वर्णित एक लोकप्रिय किंवदंती के अनुसार, चाणक्य सम्राट चंद्रगुप्त के भोजन में जहर की छोटी खुराक को मिलाते थे जिससे मौर्य वंश के सम्राट की दुश्मनों द्वारा संभावित जहरीले प्रयासों के खिलाफ मजबूती बन सके और वे अपने प्राणों की रक्षा कर सकें।

वहीं इस बात की जानकारी सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य को नहीं थी इसलिए उन्होनें अपना खाना अपनी गर्भवती रानी दुध्रा को खिला दीया। आपको बता दें कि उस समय रानी के गर्भ के आखिरी दिन चल रहे थे। वे कुछ दिन बाद ही बच्चे को जन्म देने के योग्य थी।

लेकिन रानी द्धारा खाए गए भोजन में जहर ने जैसे ही काम करना शुरु किया वैसे ही रानी बेहोश हो गई और थोडे़ समय बाद ही उनकी मौत हो गई। जब इस बात की जानकारी चाणक्य को हुई तो उन्होनें रानी के गर्भ में पल रहे नवजात बच्चे को बचाने के लिए अपनी बुद्धिमान नीति का इस्तेमाल कर अपना पेट खोल दिया और बच्चे को निकाला।

इस बच्चे का नाम बिंदुसारा रखा गया जिसे बड़ा होने पर मौर्य सम्राज्य का उत्तराधिकारी भी बनाया गया। वहीं चाणक्य ने कुछ सालों बाद बिंदुसारा के राजनैतिक सलाहकार के रूप में भी काम किया।

अर्थशास्त्र का महत्व 

अर्थशास्त्र हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक अति महत्वपूर्ण विषय है जिसके ज्ञान के सहारे हमारा समाज निरंतर विकास कर रहा है. धन से ही समाज को आगे बढाया जा सकता है इसके लिए धन का अध्ययन अनिवार्य है.

हम आर्थिक विश्लेसन करके ही वर्तमान और भविष्य का निति निर्धारण कर सकते हैं. अनेक अर्थशास्त्री जैसे – हेन्स, लियोनेल रोबिनसन, जोयल डीन, एडम स्मिथ इत्यादि ने अर्थशास्त्र को अपनी – अपनी भाषा से परिभाषित किया है.

अर्थशास्त्र और चाणक्य

आपने पढ़ा या सुना होगा की एडम स्मिथ को अर्थशास्त्र का पिता कहा जाता है जो बेशक वो हैं क्योंकि आधुनिक अर्थशास्त्र के विकास में उनका योगदान अविश्वसनीय है. दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और इतिहासकारों को उन्होंने अपने ज्ञान से प्रभावित किया, मुख्य रूप से उनकी पुस्तक ” The Theory of Moral Sentiments” ने अनेक बुद्धिजीवियों का ध्यान आकृष्ट किया है.

दुनिया आज भी एडम स्मिथ से प्रेरणा लेती है. अठारहवीं सदी में उनका योगदान महत्वपूर्ण है जिसके कारण ही उन्हें अर्थशास्त्र का पिता कहा जाता है. किन्तु इनके योगदान से बहुत पहले एक ऐसा नीतिज्ञ या ज्ञानी जिसे दुनिया चाणक्य, कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नामों से जानती है और उसी चाणक्य के द्वारा अर्थशास्त्र जैसे महान ग्रन्थ की रचना मौर्यकाल में ही किया जा चूका था जो आज भी प्रभावपूर्ण है. 

चाणक्य के विभिन्न नाम 

उनकी कृति जिन्हें लोग आज भी याद करते हैं कि वो महान चाणक्य ही थे जिन्होंने नन्द वंश का नाश करके मौर्य वंश की नीव रखी और चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया. इनके पिता का नाम चणक था जो की एक गरीब ब्राम्हण थे. कुछ विद्वानों का मत यह भी है की चणक का पुत्र होने के कारण ही वे चाणक्य कहलाये. एक मत के अनुसार उनका जन्म पंजाब के चणक क्षेत्र में हुआ था इसलिए चाणक्य नाम पड़ा.

कुटिल वंश में जन्म लेने के कारण वे कौटिल्य कहलाये. उनके जन्मतिथि, जन्मस्थान और नाम ये तीनो ही विवाद का विषय रहा है. इस विषय को लेकर विद्वानो के बीच हमेशा मतभेद रहा है. कुछ विद्वान् उनका मूल नाम विष्णुगुप्त ही मानते है किन्तु जो भी हो, चाणक्य, कौटिल्य और विष्णुगुप्त ये तीनो नाम एक ही व्यक्ति के हैं. कथासरित्सागर, भागवत, विष्णुपुराण, बौध आदि ग्रंथों में चाणक्य का नाम आया है.

भारत का मक्यावली किसे कहा जाता है?

आज के लेख में मैं केवल चाणक्य के उन गुणों को प्रकाशित करने का प्रयास कर रहा हूँ जिसके कारण संसार आज भी उनसे प्रेरणा लेती है . विभिन्न सूत्रों से हमें पता चलता है की चाणक्य एक यथार्थवादी पुरुष थे. एक अत्यंत ही स्वाभिमानी और क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति, शारीर से मजबूत और काला रंग. उनकी प्रतिभा का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है, केवल कहा जा सकता है.

बहुआयामी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति जिनकी दूरदर्शिता का आभाष उनके कृतियों को अवलोकन करने से प्राप्त होता है. क्या आप जानते हैं की चाणक्य को भारत का मक्यावली क्यों कहा जाता है? चाणक्य को भारत का मक्यावली क्यों कहा जाता है इसे विस्तार से समझना जरुरी है.

मक्यावली कौन थे?

मक्यावली इटली का एक दार्शनिक था जिसका जन्म 1469 में यूरोप के फ्लोरेंस में हुआ था. दार्शनिक होने के साथ-साथ वे एक कवी, नाटककार, राजनितिक विश्लेषक और कूटनीतिज्ञ थे. अपने समय के वे एक प्रमुख व्यक्तित्व थे जो वहां के गणराज्य यानि फ्लोरिडा चांसलेरी के सचिव चुने गए. जब किसी भी व्यक्ति में कुछ अनोखापन होता है, कुछ नया करने की शक्ति होती है जो क्रांति ला दे तो संसार उसका अनुसरण जरूर करती है.

मक्यावली की रचना ‘ प्रिंस‘ क्या है?

मक्यावली को प्रसिद्ध होने का मुख्य कारण उनकी रचना  प्रिंस है जो कि एक राजनितिक व्यवहार की एक छोटी सी पुष्तक है जिसमे राजनितिक गुर बताये गए हैं. जैसे सत्ता को हासिल करने से लेकर उसे कैसे कायम रखा जाये, एक शासक को अपने सत्ता में बने रहने के लिए क्या करना चाहिये, मुद्राकोष को कैसे संतुलित रखा जाये, एक राजा का गुण कैसा होना चाहिये, इत्यादि.

चाणक्य को भारत का मक्यावाली क्यों कहा जाता है?

इसप्रकार ‘द प्रिंस’ राजनितिक विज्ञान का एक अनूठी पुष्तक माना जाता है. उन्हें पुनर्जागरण का नायक माना जा सकता है. मक्यावली का मुख्य सिद्धांत था की राज्य को कायम रखने के लिए उचित या अनुचित किसी भी प्रकार का उपाय करना चाहिये. यदि दूसरों को हानि पहुंचाकर राज्य की वृद्धि होती है तो उसे करना चाहिये क्यूंकि वे राष्ट्र को ही सब कुछ मानते थे.

अपने साध्य की सिद्धि के लिए नैतिक या अनैतिक आश्रयों का सहारा लेकर भी अपने प्रयोजन को सिद्ध करना एक राजा का कर्तव्य है. देश की सीमा वृद्धि करने के लिए वे युद्ध का भी पक्षधर थे जो उनके अनुसार राष्ट्र नीति का एक आवश्यक अंग है. एक राजा को दृढ़तापूर्वक अपने प्रजा के ऊपर शासन करना चाहिये.

अब बात करते हैं आचार्य चाणक्य की कि उनमे ऐसी कौन सी सामानताएं थी जो उनको भारत का मक्यावाली कहा जाता है. एक बात मैं यहाँ पर स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि दोनों के सिद्धांतों में समानताएं हो सकती है किन्तु दोनों के प्रयोजनों में भिन्नताएं जरुर है.

चाणक्य नीति के मतानुसार राज्य की रचना – राज्य का कार्य

  • राजा – शासक और राजा और राज्य का पहला नागरिक होता हैं। उन्हें युद्ध में आगे ,कुलीन, बुद्दिमान और बलवान होना बहुत जरुरी है।
  • मंत्री – मंत्री राजा और राज्य की आँख हुआ करते है। उन्हें चरित्रवान, साफ और ईमानदार होना आवश्यक है।  
  • जनपद – जनपद साम्राज्य के पैर और जांघ होते है। जिनकी वजह से साम्राज्य का अस्तित्व हुआ करता हैं। जिसमे भूमि, जंगल, तालाबो, पशुधन और नदियो को बताया गया है। 
  • दुर्ग – साम्राज्य के दुर्ग यानि किले को साम्राज्य की बाहें बताते है। उनका काम साम्राज्य की रक्षा के लिये किया जाना चाहिए। और लड़ाई में साम्राज्य को बचाने में योगदान देता है।  
  • राजकोष –राजकोष साम्राज्य के महाराजा के मुख के बराबर होता हैं। जिनके कारन साम्राज्य चलता है। लेकिन उनके बिना राज की सोच ही नहीं की जाती है। 
  • सैनिक – सेना को साम्राज्य का सिर कहते है। क्योकि साम्राज्य की रक्षा में बल होना बहुत जरुरी होता है। 
  • मित्र – दोस्त और मित्र साम्राज्य के कान हुआ करते हैं। क्योकि ख़राब समय और युद्ध दोने वक्त में सहायता करते है। 

चाणक्य की विदेश नीति –

  • संधि –  देश एव राज्य में शांति के लिये अन्य देश के शासक या राजा के साथ कुछ करार किये जाते है। जो ताकतवर हो उसका फायदा यह की शत्रु को कमजोर करना है। 
  • विग्रह – शत्रु के विरुद्ध उचित रणनीति बना के युद्ध करना जिससे अपने राज्य में शांति बनी रहे।
  • यान – कोई भी राज्य से युद्ध घोषणा किये बिना युद्ध की तैयारी करना मुख्य माना जाता है। 
  • आसन – तटस्थता की नीति हमेशा बनाये रखना और उनका पालन करना। 
  • आत्मरक्षा – दुसरे साम्राज्य के राजा से मदद मांगना। 
  • दौदिभाव – मित्र राजा से शांति का करार करके अन्य राजाओ के साथ युद्ध करने की नीति अपनाना। 

चाणक्य की मृत्यु का रहस्य – Chanakya’s death mystery

चाणक्य की मृत्यु 283 ईसा पूर्व में 92 वर्ष की आयु में हुई थी. लेकिन आज भी चाणक्य की मृत्यु के बारे में विवरण स्पष्ट नहीं है. यह तो ज्ञात है कि उन्होंने एक लंबा जीवन जिया लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी मृत्यु कैसे हुई थी. 

चाणक्य की मृत्यु को लेकर कई तरह के कयास लगाए गए हैं और उनकी मृत्यु रहस्य से घिरी हुई है और विद्वानों की लाख कोशिशों के बावजूद अभी तक इसका खुलासा नहीं हो पाया है.

एक पौराणिक कथा के अनुसार, चाणक्य राजकीय सेवाओं को छोड़ कर जंगल में चले गए और अन्नजल त्याग कर मृत्य को प्राप्त हो गए थे. 

एक अन्य किंवदंती के अनुसार, बिन्दुसार के शासनकाल के दौरान एक राजनीतिक साजिश के परिणामस्वरूप उनकी हत्या कर दी गई और उनकी मृत्यु हो गई.

चाणक्य नीति के विचार :–

ऋण, शत्रु  और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।
• 
वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते है।
• 
शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।
• 
सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।
• 
एक ही देश के दो शत्रु परस्पर मित्र होते है।
• 
आपातकाल में स्नेह करने वाला ही मित्र होता है।
• 
एक बिगड़ैल गाय सौ कुत्तों से ज्यादा श्रेष्ठ है। अर्थात एक विपरीत स्वाभाव का परम हितैषी व्यक्ति, उन सौ लोगों से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते है।
• 
आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।
• 
अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।
• 
सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।
• 
सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।
• 
ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है।  अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते है।
• 
जो जिस कार्ये में कुशल हो उसे उसी कार्ये में लगना  चाहिए।
• 
कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।
• 
शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करे।
• 
चाणक्य ने कभी भी अग्नि, गुरू, ब्राह्मण, गौ, कुमारी कन्या, वृद्ध और बालक पर पैर न लगाने को कहा है. इन्हें पैर से छूने से आप पर बदकिस्मती का पहाड़ टूट सकता है.
• 
कहा जा सकता है कि ऋण मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यदि जीवन में खुशहाल रहना है तो ऋण की एक फूटी कौड़ी भी पास नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य सबसे दुखी भूतकाल और भविष्यकाल की बातों को सोचकर होता है। केवल वर्तमान के विषय में सोचकर अपने जीवन को सफल बनाया जा सकता 
• 
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि शिक्षा ही मनुष्य की सबसे अच्छी और सच्ची दोस्त होती है क्योंकि एक दिन सुंदरता और जवानी छोड़कर चली जाती है परन्तु शिक्षा एक मात्र ऐसी धरोहर है जो हमेशा उसके साथ रहती है।
• 
व्यवसाय में लाभ से जुड़े अपने राज किसी भी व्यक्ति के साथ साझा करना आर्थिक दृष्टी से हानिकारक हो सकती है। अत: व्यवसाय की वास्तविक ज्ञान को अपने तक ही सिमित रखें तो उत्तम होगा।
• 
किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर अपने आप से जरुर कर लें कि- क्या तुम सचमुच यह कार्य करना चाहते हैं? आप यह काम क्यों करना चाहते हैं? यदि इन सब का जवाब सकारात्मक मिलता है तभी उस काम की शुरुआत करनी चाहिए।

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Thu, 20 Mar 2025 10:20:46 +0530 Jaankari Rakho
चन्द्रगुप्त प्रथम का जीवन परिचय | Chandragupta 1 Biography in Hindi https://m.jaankarirakho.com/57 https://m.jaankarirakho.com/57 चन्द्रगुप्त प्रथम (Chandragupt Pratham Hindi) गुप्त वंश के द्वितीय शासक घटोत्कच का पुत्र था. यह गुप्त वंश का तृतीय किंतु प्रथम स्वतंत्र एवं शक्तिशाली शासक था. विद्वानों के अनुसार, चन्द्रगुप्त प्रथम के राज्यारोहण की तिथि 319-320 ई. निश्चित की गयी है. कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि उन्होंने उसी तिथि से आरंभ होनेवाले गुप्त संवत की स्थापना भी की थी।

गुप्तों का आधिपत्य आरंभ में दक्षिण बिहार तथा उत्तर-पश्चिम बंगाल पर था। चंद्रगुप्त प्रथम ने साम्राज्य का विस्तार किया। वायुपुराण में प्रयाग तक के गंगा के तटवर्ती प्रदेश, साकेत तथा मगध को गुप्तों की ‘भोगभूमि’ कहा है। इस उल्लेख के आधार पर विद्वान चंद्रगुप्त प्रथम की राज्यसीमा का निर्धारण करते हैं, यद्यपि इस बात का कोई पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

नाम चंद्रगुप्त प्रथम (Chandragupta I)
जन्म पाटलिपुत्र (वर्तमान बिहार)
माता अज्ञात 
पिता घटोत्कच
पत्नी कुमार देवी
पुत्र समुद्रगुप्त (कचा)
पौते चंद्रगुप्त द्वितीय, राम गुप्त
धर्म हिंदू
साम्राज्य गुप्त
पूर्ववर्ती राजा घटोत्कच
उत्तराधिकारी राजा समुद्रगुप्त
उपाधि महाराजाधिराज
मृत्यु 335 ईस्वी, पाटलिपुत्र

चन्द्रगुप्त प्रथम का जीवन परिचय :

चन्द्रगुप्त प्रथम इतिहासकारों के अनुसार गुप्त वंश के प्रथम स्वतंत्र शासक थे । गुप्त वंश को एक साम्राज्य के रूप में स्थापित करने का श्रेय चन्द्रगुप्त प्रथम को ही जाता है ।

अभिलेखों में चन्द्रगुप्त प्रथम के लिए महाराजाधिराज पदवी का प्रयोग हुआ है। पूर्ववर्ती दोनों शासकों श्कीरीगुप्त और घटोत्कच की अपेक्षा चन्द्रगुप्त प्रथम की पदवी बड़ी है और उनके बड़े राज्य का शासक होने का प्रतीक लगती है। चन्द्रगुप्त प्रथम के समय के सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। इस आधार पर अधिकांश विद्वान चन्द्रगुप्त प्रथम को गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक मानते हैं।

चन्द्रगुप्त प्रथम ने उत्तर भारत के अधिकांश भागों पर शासन किया। उसके कारण गुप्त साम्राज्य का नाम पूरे भारत में प्रसिद्ध होने लगा।साथ ही साथ गुप्त साम्राज्य का दूसरे राज्यों के साथ पारिवारिक संबंध बनाकर चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त साम्राज्य को मजबूत बनाया।

चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का तीसरा और प्रतापी राजा था जिसने ‘गुप्त सवंत’ (319-320 ईस्वी) की शुरुआत की थी। उसके पिता का नाम घटोत्कच था। सम्राट बनने के बाद उसने लिच्छवी राज्य के साथ पारिवारिक संबंध बनाया और खुद को ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि दी जो प्रायः एक उच्च शासक के लिए प्रयोग की जाती थी।

अभिलेखों में चन्द्रगुप्त प्रथम के लिए महाराजाधिराज पदवी का प्रयोग हुआ है। पूर्ववर्ती दोनों शासकों की अपेक्षा उसकी पदवी बड़ी है और उसके बड़े राज्य का शासक होने का प्रतीक लगती है। उसके सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। इस आधार पर अधिकांश विद्वान उसे गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक मानते हैं।

चंद्रगुप्त प्रथम का विवाह (Marriage of Chandragupta I)

चंद्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी कुल की राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया। लिच्छवी वंश का शासन वैशाली (वर्तमान बिहार) में हुआ करता था जिन्होंने लगभग 36 पीढ़ियों तक वहां शासन किया। गुप्त वंश के लोगों ने इस विवाह को एक महत्वपूर्ण कड़ी समझी क्योंकि गुप्त वंश का हाल ही में उदय हुआ था जिसने एक मजबूत वंश के साथ संबंध बनाया था।

विवाह के बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम कचा रखा गया था। कचा ने अपने राज्य की सीमाओं को समुद्र तट फैलाने के बाद अपना नाम बदलकर ;समुद्रगुप्त’ रख लिया। जिससे पता चलता है कि कचा ही समुद्रगुप्त था परंतु इस तथ्य के कोई ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं।

कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, चंद्रगुप्त ने लिच्छवी वंश पर आक्रमण कर के हरा दिया था। वापस शांति बनाने के लिए उन्होंने एक संधि की जिसके अनुसार लिच्छवी वंश के राजा ने राजकुमारी कुमार देवी का विवाह चंद्रगुप्त के साथ कर दिया। परंतु ऐसा तथ्य भी इतिहास के पन्नों पर उद्धृत नहीं है जो इसकी सत्यता को प्रमाणित करता हो।

इस विवाह ने चंद्रगुप्त को राजनीतिक व सैन्य ताकत दी, जिसके बाद उसने खुद को महाराजाधिराज की उपाधि दी। कहा जाता है कि उसके सिक्कों पर लिच्छवी नाम लिखा हुआ था जो दर्शाता है कि लिच्छवी वंश से उसे सहायता मिली थी। विवाह के बाद उसने (Chandragupta I) लिच्छवी राज्य को अपने राज्य में मिला लिया था।

चन्द्रगुप्त प्रथम का साम्राज्य विस्तार

चन्द्रगुप्त प्रथम (319-335 ई.) भारतीय इतिहास के सर्वाधिक प्रसिद्ध राजाओं में से एक था। वह गुप्त शासक घटोत्कच का पुत्र था। चन्द्रगुप्त ने एक ‘गुप्त संवत’ (319-320 ई.) चलाया, कदाचित इसी तिथि को चंद्रगुप्त प्रथम का राज्याभिषेक हुआ था। चंद्रगुप्त ने, जिसका शासन पहले मगध के कुछ भागों तक सीमित था, अपने राज्य का विस्तार इलाहाबाद तक किया। ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण करके इसने पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया था।

नाग राजाओं के शासन के बाद गुप्त राजवंश स्थापित हुआ जिसने मगध में देश के एक शक्तिशाली साम्राज्य को स्थापित किया । इस वंश के राजाओं को गुप्त सम्राट के नाम से जाना जाता है। गुप्त राजवंश का प्रथम राजा `श्री गुप्त हुआ, जिसके नाम पर गुप्त राजवंश का नामकरण हुआ। उसका लड़का घटोत्कच हुआ, जिसका पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम 320 ई. में पाटलिपुत्र का शासक हुआ। घटोत्कच के उत्तराधिकारी के रूप में सिंहासनारूढ़ चन्द्रगुप्त प्रथम एक प्रतापी राजा था। उसने ‘महाराजधिराज’ उपाधि ग्रहण की और लिच्छिवी राज्य की राजकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह कर लिच्छिवियों की सहायता से शक्ति बढाई। इसकी पुष्टि दो प्रमाणों से होती है। Chandragupt Pratham Hindi

  • स्वर्ण सिक्के जिसमें ‘चन्द्रगुप्त कुमार देवी प्रकार’, ‘लिच्छवि प्रकार’, ‘राजारानी प्रकार’, ‘विवाह प्रकार’ आदि हैं।
  • दूसरा प्रमाण समुद्रगुप्त के प्रयाग अभिलेख हैं जिसमें उसे ‘लिच्छविदौहित्र’ कहा गया है।

कुमार देवी के साथ विवाह कर चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली का राज्य प्राप्त किया। चन्द्रगुप्त कुमारदेवी प्रकार के सिक्के के पृष्ठ भाग पर सिंहवाहिनी देवी दुर्गा की आकृति बनी है। वह एक शक्तिशाली शासक था, चंद्रगुप्त के शासन काल में गुप्त-शासन का विस्तार दक्षिण बिहार से लेकर अयोध्या तक था. इस राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी।

चंद्रगुप्त प्रथम ने अपने शासन काल में एक नया संवत चलाया ,जिसे गुप्त संवत कहा जाता है। यह संवत गुप्त सम्राटों के काल तक ही प्रचलित रहा बाद में उस का चलन नहीं रहा। चन्द्रगुप्त प्रथम ने एक संवत ‘गुप्त संवत’ (319-320 ई.) के नाम से चलाया। गुप्त संवत[2] तथा शक संवत (78 ई.) के बीच 240 वर्षों का अन्तर है। Chandragupt Pratham Hindi

घटोत्कच के बाद महाराजाधिराज चंद्रगुप्त प्रथम हुए। गुप्त वंश के पहले दो राजा केवल महाराज कहे गए हैं। पर चंद्रगुप्त को ‘महाराजाधिराज’ कहा गया है। इससे प्रतीत होता है, कि उसके समय में गुप्त वंश की शक्ति बहुत बढ़ गई थी।

प्राचीन समय में महाराज विशेषण तो अधीनस्थ सामन्त राजाओं के लिए भी प्रयुक्त होता था। पर ‘महाराजाधिराज’ केवल ऐसे ही राजाओं के लिए प्रयोग किया जाता था, जो पूर्णतया स्वाधीन व शक्तिशाली हों। प्रतीत होता है, कि अपने पूर्वजों के पूर्वी भारत में स्थित छोटे से राज्य को चंद्रगुप्त ने बहुत बढ़ा लिया था, और महाराजाधिराज की पदवी ग्रहण कर ली थी। पाटलिपुत्र निश्चय ही चंद्रगुप्त के अधिकार में आ गया था, और मगध तथा उत्तर प्रदेश के बहुत से प्रदेशों को जीत लेने के कारण चंद्रगुप्त के समय में गुप्त साम्राज्य बहुत विस्तृत हो गया था। इन्हीं विजयों और राज्य विस्तार की स्मृति में चंद्रगुप्त ने एक नया सम्वत चलाया था, जो गुप्त सम्वत के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध है।

मगध के उत्तर में लिच्छवियों का जो शक्तिशाली साम्राज्य था, चंद्रगुप्त ने उसके साथ मैत्री और सहयोग का सम्बन्ध स्थापित किया। कुषाण काल के पश्चात् इस प्रदेश में सबसे प्रबल भारतीय शक्ति लिच्छवियों की ही थी। कुछ समय तक पाटलिपुत्र भी उनके अधिकार में रहा था। लिच्छवियों का सहयोग प्राप्त किए बिना चंद्रगुप्त के लिए अपने राज्य का विस्तार कर सकना सम्भव नहीं था। इस सहयोग और मैत्रीभाव को स्थिर करने के लिए चंद्रगुप्त ने लिच्छविकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह किया, और अन्य रानियों के अनेक पुत्र होते हुए भी ‘लिच्छवि-दौहित्र’ (कुमारदेवी के पुत्र) समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी नियत किया। Chandragupt Pratham Hindi

ऐसा प्रतीत होता है, कि इस काल में लिच्छवि गण के राजा वंशक्रमानुगत होने लगे थे। गणराज्यों के इतिहास में यह कोई अनहोनी बात नहीं है। कुमारदेवी लिच्छवि राजा की पुत्री और उत्तराधिकारी थी। इसीलिए चंद्रगुप्त के साथ विवाह हो जाने के बाद गुप्त राज्य और लिच्छवि गण मिलकर एक हो गए थे।

चंद्रगुप्त के सिक्कों पर उसका अपना और कुमारदेवी दोनों का नाम भी एक साथ दिया गया है। सिक्के के दूसरी ओर ‘लिच्छवयः’ शब्द भी उत्कीर्ण है। इससे यह भली-भाँति सूचित होता है कि, लिच्छवि गण और गुप्त वंश का पारस्परिक विवाह सम्बन्ध बड़े महत्त्व का था। इसके कारण इन दोनों के राज्य मिलकर एक हो गए थे, और चंद्रगुप्त तथा कुमारदेवी का सम्मिलित शासन इन प्रदेशों पर माना जाता था।

श्रीगुप्त के वंशजों का शासन किन प्रदेशों पर स्थापित हो गया था, इस सम्बन्ध में पुराणों में लिखा है, कि ‘गंगा के साथ-साथ प्रयाग तक व मगध तथा अयोध्या में इन्होंने राज्य किया।

समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी बनाने के बाद चन्द्रगुप्त प्रथम ने सन्न्यास ग्रहण किया। 330 ई. चंद्रगुप्त प्रथम की मृत्यु हो गई।

चंद्रगुप्त के उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य को बहुत बढ़ा लिया था। अतः पुराणों का यह निर्देश उसके पूर्वजों के विषय में ही है। सम्भवतः महाराजाधिराज चंद्रगुप्त प्रथम बंगाल से प्रारम्भ कर पश्चिम में अयोध्या और प्रयाग तक के विशाल प्रदेश का स्वामी था, और लिच्छवियों के सहयोग से ही इस पर अबाधित रूप से शासन करता था। इस प्रतापी गुप्त सम्राट का सम्भावित शासन काल 315 या 319 से 328 से 335 ई. तक था। Chandragupt Pratham Hindi

चंद्रगुप्त प्रथम की विजय-

चंद्रगुप्त प्रथम की विजयों के विषय में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती। वायुपुराण में किसी गुप्त राजा की साम्राज्य सीमा का वर्णन करते हुए बताया गया है, कि गुप्तवंश के लोग गंगा के किनारे प्रयाग तक तथा साकेत और मगध के प्रदेशों पर शासन करेंगे। जिस साम्राज्य सीमा का उल्लेख यहाँ हुआ है, उसका विस्तार पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में प्रयाग तक था। स्पष्ट है कि यह साम्राज्य सीमा चंद्रगुप्त प्रथम के समय की ही है, क्योंकि उसके पूर्ववर्ती दोनों शासक अत्यंत साधारण स्थिति के थे तथा उसके बाद के शासक समुद्रगुप्त का साम्राज्य इससे कहीं अधिक विस्तृत था।

प्रयाग प्रशस्ति आर्यावर्त तथा दक्षिणापथ में समुद्रगुप्त की विजयों का तो उल्लेख करती हैं, किन्तु पश्चिम की ओर प्रयाग के पूर्व में गंगा नदी तक के भू-भाग की विजयों की चर्चा इसमें नहीं मिलती। इससे स्पष्ट होता है, कि यह भाग चंद्रगुप्त के अधिकार में था। कौशांबी तथा कोशल के मघ राजाओं को चंद्रगुप्त ने जीतकर उनके राज्यों पर अपना अधिकार कर लिया था।

गुप्त संवत् का प्रवर्त्तन

चंद्रगुप्त प्रथम को इतिहास में एक नये संवत् के प्रवर्त्तन का श्रेय भी दिया जाता है। जिसे बाद के लेखों में गुप्त संवत् (गुप्त – प्रकाल) कहा गया है। फ्लीट की गणना के अनुसार इस संवत् का प्रचलन 319-20 में किया गया था। इसके विपरीत शाम शास्त्री जैसे विद्वानों ने इस तिथि को 200 अथवा 272 ईस्वी माना है।

चंद्रगुप्त प्रथम ने लगभग 319 ईस्वी से 350 ईस्वी तक शासन किया । उसने अपने जीवन-काल में ही अपने सुयोग्य पुत्र समुद्रगुप्त को अपना उत्तराधिकारी निर्वाचित कर दिया। निःसंदेह वह अपने वंश का प्रथम महान् शासक था। हम चंद्रगुप्त प्रथम को गुप्त साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक मान सकते हैं।

चंद्रगुप्त प्रथम की मृत्यु (Death of Chandragupta I)

इतिहास की किताबों के अनुसार, चंद्रगुप्त प्रथम की मृत्यु 335 ईस्वी को पाटलिपुत्र में ही हुई थी। परंतु, उसकी मृत्यु के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं है।

अपनी मृत्यु के समय वह एक वृद्ध इंसान था तथा गुप्त साम्राज्य के पूर्ववर्ती राजाओं की तुलना में शासन को अधिक लंबे समय तक संभाला और सफलतापूर्वक चलाया भी।

उत्तराधिकारी – समुद्रगुप्त (Successor of Gupta dynasty)

इलाहाबाद शिलालेख पर उलेखित है कि चंद्रगुप्त प्रथम ने अपनी वृद्धावस्था में पुत्र समुद्रगुप्त को सम्राट बनाया। समुद्रगुप्त ने गुप्त वंश का पाशा ही पलट दिया। उसने पूरे भारत पर गुप्त वंश का झंडा लहराया। 

कुछ जगहों से प्राप्त सोने के सिक्के से पता चला है कि चंद्रगुप्त प्रथम की मृत्यु के बाद कचा नाम का इंसान गुप्त साम्राज्य का सम्राट बना था। संभवतया कचा, समुद्रगुप्त का बड़ा भाई था। 

परंतु कुछ स्रोतों के अनुसार, कचा, समुद्रगुप्त का ही दूसरा नाम था। इस तरह चंद्रगुप्त (Chandragupta I) के बाद समुद्रगुप्त ने गुप्त वंश की राजगद्दी संभाली और उसने भारत के लगभग सभी राज्यों पर विजय प्राप्त करके देश को एकता के धागे में पिरोया। वी ए स्मिथ ने समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन भी कहा है।

चन्द्रगुप्त प्रथम से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

  • गुप्त वंश के संस्थापक तथा प्रथम शासक का नाम श्रीगुप्त था.
  • चन्द्रगुप्त प्रथम, गुप्त वंश के द्वितीय शासक घटोत्कच का पुत्र था. इस प्रकार चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का तृतीय शासक था.
  • चन्द्रगुप्त प्रथम का कार्यकाल (319 ई० – 324 ई०) तक रहा.
  • गुप्त अभिलेखों से पता चलता है कि चन्द्रगुप्त प्रथम ही गुप्त वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था, जिसने ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की.
  • चन्द्रगुप्त प्रथम ने ‘गुप्त संवत्’ की स्थापना ३१९-२० ई० में की थी.
  • चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छवी राजकुमारी ‘कुमार देवी’ के साथ विवाह किया था. इस समय लिच्छवियों के दो राज्य थे: वैशाली का राज्य तथा नेपाल का राज्य
  • ‘कुमार देवी’ से विवाह करके चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली का राज्य प्राप्त कर लिया था.
  • गुप्त वंश में चन्द्रगुप्त प्रथम ने ही सर्वप्रथम रजत मुद्राओं का प्रचलन करवाया था.

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Thu, 20 Mar 2025 10:20:39 +0530 Jaankari Rakho
चन्द्रगुप्त मौर्य इतिहास जीवन परिचय | Chandragupta Maurya History in hindi https://m.jaankarirakho.com/59 https://m.jaankarirakho.com/59 सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (Chandragupta Maurya) अपनी गुरु विष्णुगुप्त अथवा चाणक्य की सहायता से नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को हराकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। मगध के राज सिंहासन पर बैठकर चंद्रगुप्त मौर्य ने एक ऐसे साम्राज्य की नीव डाली जो संपूर्ण भारत में फैला था चंद्रगुप्त के विषय में जस्टिन का कथन है की उसने (चंद्रगुप्त ने) छः लाख की सेना लेकर संपूर्ण भारत को रौंद डाला और उस पर अपना अधिकार कर लिया।

चंद्रगुप्त मौर्य ने उत्तरी-पश्चिमी भारत को सिकंदर के उत्तराधिकारियों से मुक्त कर नंदो का उन्मूलन कर सेल्यूकस को पराजित कर संघ के लिए विवश कर जिस साम्राज्य की स्थापना की उसकी सीमाएं उत्तर पश्चिम में ईरान की सीमा से लेकर दक्षिण में वर्त उत्तरी कर्नाटक एवं पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में सोपारा तक सुराष्ट्र तक फैली हुई थी महावंश की टीका में उसे शकल जम्बूदीप का शासक कहा गया है।

रुद्रदामन के  जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त का साम्राज्य विस्तर पश्चिमी भारत में भी था इसी में चंद्रगुप्त के गवर्नर पुष्यगुप्त का वर्णन है| जिसने सुदर्शन झील का निर्माण कराया था महाराष्ट्र के थाने जिले में सोपारा में स्थित अशोक के शिलालेख से यह पता चलता है| की चंद्रगुप्त ने सौराष्ट्र की सीमाओं से परे पश्चिमी भारत की अपनी विजय से कोकण तक  विस्तार किया था।

चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी – Chandragupta Maurya in Hindi

चन्द्रगुप्त मौर्य की जीवनी
जन्म 340 ईसा पूर्व
जन्मस्थान पाटलीपुत्र, बिहार
मृत्यु 297 ईसा पूर्व
मृत्युस्थल श्रवणबेलगोला, चंद्रागिरी की पहाङियाँ (कर्नाटक)
माता मुरा मौर्य
पिता सर्वार्थसिद्धि मौर्य
पत्नी दुर्धरा व हेलेना
बेटा बिंदुसार
पौत्र अशोक, विताशोक, सुसिम
गुरु आचार्य चाणक्य
उपलब्धियां मौर्य साम्राज्य के संस्थापक, अखंड भारत के निर्माता
शासनकाल 321 ई.पू. – 297 ई.पू.
शासनकाल का समय 23 वर्ष
जाति मौर्य

चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म

इनका जन्म 340 ईसा पूर्व में पाटलीपुत्र (बिहार) में हुआ था।

चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन के बारे में अलग-अलग मत है। कुछ लोगों की मान्यता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य मौर्य शासक के परिवार के थे, ये क्षत्रीय थे।

इनके पिता सर्वार्थसिद्धि मौर्य थे तथा माता मुरा थी।

बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार चन्द्रगुप्त के पिता मौर्य वंश के प्रधान थे। जब चन्द्रगुप्त अपनी माता के गर्भ में था, तभी एक अन्य राजा ने मोरियों पर आक्रमण करके उनके राजा को मार डाला। इस पर चन्द्रगुप्त की विधवा माता सुरक्षित स्थान की खोज में अपने भाई के पास पुष्पपुर (पाटलिपुत्र) चली गई। यहीं चन्द्रगुप्त का जन्म हुआ। बालक को शत्रुओं की दृष्टि से सुरक्षित रखने के लिए एक गोशाला में छोङ दिया गया, जहाँ एक गोपालक ने उसका पालन-पोषण किया। कुछ समय बाद उस गोपालक ने चन्द्रगुप्त को एक शिकारी के हाथ बेच दिया।

ब्राह्मण साहित्य के अनुसार, ’’चन्द्रगुप्त मौर्य शूद्र थे। मुद्राराक्षस में इनको वृषल (शूद्र) बताया गया है अर्थात् नीच कुल का।
पुराण में चन्द्रगुप्त मौर्य को मुरा नामक स्त्री से उत्पन्न शूद्र बताया गया है।

बौद्ध साहित्य के अनुसार, ’’चन्द्रगुप्त मौर्य क्षत्रिय थे। बौद्ध ग्रंथ ’महावंश’ में इनको क्षत्रिय बताया गया है। ’दिव्यावदान’ में भी क्षत्रिय बताया गया है।

जैन साहित्य के अनुसार, ’’चन्द्रगुप्त मौर्य क्षत्रिय थे। जैन ग्रंथ ’परिशिष्टपर्वन’ में इनको ’मोरपालक का पुत्र’ बताया गया है।

चन्द्रगुप्त मौर्य शुरूआती जीवन (Early Life) –

चन्द्रगुप्त मौर्य के परिवार की कही भी बहुत सही जानकारी नहीं मिलती है, कहा जाता है वे राजा नंदा व उनकी पत्नी मुरा के बेटे थे. कुछ लोग कहते है वे मौर्य शासक के परिवार के थे, जो क्षत्रीय थे. कहते है चन्द्रगुप्त मौर्य के दादा की दो पत्नियाँ थी, एक से उन्हें 9 बेटे थे, जिन्हें नवनादास कहते थे, दूसरी पत्नी से उन्हें चन्द्रगुप्त मौर्य के पिता बस थे, जिन्हें नंदा कहते थे. नवनादास अपने सौतले भाई से जलते थे, जिसके चलते वे नंदा को मारने की कोशिश करते थे. नंदा के चन्द्रगुप्त मौर्य मिला कर 100 पुत्र थे, जिन्हें नवनादास मार डालते है बस चन्द्रगुप्त मौर्य किसी तरह बच जाते है और मगध के साम्राज्य में रहने लगते है. यही पर उनकी मुलाकात चाणक्य से हुई. इसके बाद से उनका जीवन बदल गया. चाणक्य ने उनके गुणों को पहचाना और तकशिला विद्यालय ले गए, जहाँ वे पढ़ाया करते थे. चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य को अपने अनुसार सारी शिक्षा दी, उन्हें ज्ञानी, बुद्धिमानी, समझदार महापुरुष बनाया, उन्हें एक शासक के सारे गुण सिखाये.

चन्द्रगुप्त मौर्य की पहली पत्नी दुर्धरा थी, जिनसे उन्हें बिंदुसार नाम का बेटा हुआ, इसके अलावा दूसरी पत्नी देवी हेलना थी, जिनसे उन्हें जस्टिन नाम के पुत्र हुआ.  कहते है चन्द्रगुप्त मौर्य की दुश्मन से रक्षा करने के लिए आचार्य चाणक्य उन्हें रोज खाने में थोडा थोडा जहर मिलाकर देते थे, जिससे उनके शरीर मे प्रतिरोधक छमता आ जाये और उनके शत्रु उन्हें किसी तरह का जहर न दे पाए. यह खाना चन्द्रगुप्त अपनी पत्नी के साथ दुर्धरा बाटते थे , लेकिन एक दिन उनके शत्रु ने वही जहर ज्यादा मात्रा मे उनके खाने मे मिला दिया, उस समय उनकी पत्नी गर्भवती थी, दुर्धरा इसे सहन नहीं कर पाती है और मर जाती है, लेकिन चाणक्य समय पर पहुँच कर उनके बेटे को बचा लेते है. बिंदुसार  को आज भी उनके बेटे अशोका के लिए याद किया जाता है, जो एक महान राजा था.

चंद्रगुप्त मौर्य का वैवाहिक जीवन

धनानंद से युद्ध जीतने के बाद चंद्रगुप्त भारत के राजा बने गए थे और उन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।

चंद्रगुप्त मौर्य की दो पत्नियां थी दुर्धरा और हेलेना। इन दोनों की अलग-अलग कहानियां है। 

पहली पत्नी – दुर्धरा

 धनानंद से युद्ध करने से पहले धनानंद की पुत्री दुर्धरा ने चंद्रगुप्त को देखा। और पहली नजर में ही दुर्धरा को चंद्रगुप्त से मोहब्बत हो गई। चंद्रगुप्त ने धनानंद से युद्ध जीतने के बाद, दुर्धरा को अपनी धर्मपत्नी बना लिया।

 दुर्धरा को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम बिंदुसार था। कुछ इतिहासकार यह बताते हैं कि लगभग 2 साल पहले बिंदुसार के जन्म लेने से पहले दुर्धरा को एक और पुत्र की प्राप्ति हुई थी जिसका नाम केशनाक था। और इस बच्चे की मृत्यु, जन्म के कुछ ही घंटों के बाद हो गई थी।

 दुर्धरा से उत्पन्न बच्चा बिंदुसार मौर्य साम्राज्य का उत्तराधिकारी बना। परंतु विधाता की अनहोनी को कौन टाल सकता था? बिंदुसार को जन्म देने के बाद उसकी माता दुर्धरा का देहांत हो गया।

 चंद्रगुप्त ने दुर्धरा के चले जाने के बाद वर्षों तक शादी नहीं की। क्योंकि उन्हें दुर्धरा से बहुत ज्यादा मोहब्बत थी। 

दूसरी पत्नी – हेलेना

 जब सेल्यूकस निकेटर ने भारत पर आक्रमण किया था तब चंद्रगुप्त ने उसे हरा दिया और हराने के बाद आचार्य चाणक्य की शर्तों के मुताबिक सेल्यूकस को अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चंद्रगुप्त से करना था।

 इस तरह से चंद्रगुप्त का दूसरा विवाह हुआ और उनकी दूसरी पत्नी का नाम हेलेना था जो कि एक ग्रीक थी।

 इतिहासकारों के मुताबिक हेलेना को कोई भी संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। चंद्रगुप्त ने जब राजकार्य बिंदुसार को सौंप दिया था तब हेलेना अपने मायके चली गई।

और चंद्रगुप्त सन्यासी का रूप धारण करके चंद्रावली की पहाड़ियों में चले गए। इस तथ्य की बात हमने आर्टिकल के अंत में गहराई से बात की है।

चंद्रगुप्त की गुरुदेव चाणक्य से भेंट

जब चंद्रगुप्त एक दिन अपने ग्वाले साथियों के साथ शाही कोर्ट का एक नकली खेल खेल रहा था, तब चाणक्य ने चंद्रगुप्त को दूसरे बच्चों को आदेश देते हुए देखा।

और उस समय चाणक्य ने चंद्रगुप्त को अपना शिष्य बना लिया और उसे तक्षशिला विश्वविद्यालय में प्रवेश दिलाया। उसे शास्त्र, धर्म, वेद, सैन्य कलाओं, अर्थ, कानून इत्यादि का ज्ञान दिया

तक्षशिला के बाद दोनों गुरु और शिष्य पाटलिपुत्र की ओर बढ़ गए। जो उस समय में मगध की राजधानी हुआ करता था वहां वे राजा धनानंद से मिले। तो आचार्य चाणक्य ने धनानंद की बेइज्जती कर दी।

कुछ तथ्य यह कहते हैं कि चंद्रगुप्त ने धनानंद की सेना का कमांडर बनकर विद्रोह कर दिया था। इस घटना के बाद चंद्रगुप्त और चाणक्य दोनों वहां से भाग निकले क्योंकि नंद की सेना उनके पीछे लग चुकी थी।

आचार्य चाणक्य का अपमान और प्रतिशोध की ज्वाला

 जब चंद्रगुप्त चाणक्य से नहीं मिले थे उससे पहले चाणक्य मगध के राजा धनानंद के यहां गए हुए थे। वहां पर बहुत सारे लोग और अन्य पंडित आए हुए थे। तो धनानंद ने आचार्य चाणक्य को भरी सभा से बाहर निकाल दिया। 

 आचार्य चाणक्य के गिरते ही उनकी शिखा (चोटी) खुल गई थी। यह देखते ही आचार्य चाणक्य ने भरी सभा के अंदर शपथ ली और कहा कि धनानंद, मैं तुम्हारे इस राज्य को जड़ से उखाड़ फेंकूंगा। और जब तक यह नहीं हो जाता तब तक मैं अपनी शिखा नहीं बांधूगा।

 आचार्य चाणक्य के इस प्रचंड क्रोध और प्रतिशोध की ज्वाला ने उन्हें एहसास करवाया कि उन्हें एक अच्छे इंसान की जरूरत है जो धनानंद के मरने के बाद राजा बन सके। और अखंड भारत का निर्माण कर सकें जहां पर हर व्यक्ति का मान सम्मान किया जाएगा।

मौर्य साम्राज्य की स्थापना

इतिहास में महान मौर्य साम्राज्य को खड़ा करने और सम्पूर्ण भारत को एक करने का श्रेय कौटिल्य अर्थात चन्द्रगुप्त के गुरु प्रधानमंत्री चाणक्य को ही जाता हैं.

वे एक बुद्धिमान शिक्षक और कूटनीतिज्ञ थे. उस समय की बात है जब अलेक्जेंडर अर्थात् सिकंदर अपने विश्व विजयी अभियान को लेकर भारत की ओर बढ़ रहा था. अब उसका अगला लक्ष्य भारत था.

उधर नंदा राजगद्दी के असली हकदार चन्द्रगुप्त अन्यायपूर्ण तरीके से सत्ता से बेदखल किये जा चुके थे. गुरु चाणक्य ने दोनों जिम्मेदारियां उठाई.

उन्होंने चन्द्रगुप्त को वचन दिया कि वे उन्हें अंखड भारत का सम्राट बनाएगे साथ ही सिकन्दर समेत विदेशी आक्रान्ताओं से भारत भूमि के रक्षा करेगे.

सिकन्दर के भारत आगमन के समय ही उसकी विशाल सेना के आगे अधिकतर छोटे छोटे राज्यों ने समर्पण कर दिया जिनमें मगध भी एक था.

पंजाब के शासक पर्वतेश्वर ने प्रतिकार किया मगर विशाल सेना के सामने उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा. चाणक्य ने कई राज्यों से बात की और साथ मिलकर लड़ने का प्रस्ताव रखा मगर बात न बन सकी.

चन्द्रगुप्त मौर्य की सिकंदर पर जीत (Chandragupta Maurya Fight with Alexander)

मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त के शुरूआती जीवन और राजगद्दी पाने तक का विवरण इतिहास में अस्पष्ट हैं, इसे कई तरीको से लिखा गया हैं जिसके चलते किसी एक मत को सत्य मानना या दूसरे को नकारना जटिल हैं.

मान्यता यह भी है कि चन्द्रगुप्त ने सिंकदर महान को युद्ध में पराजित किया था तथा वह भारत विजय के अधूरे सपने को लेकर लौट रहा था और काबुल के पास उसकी मृत्यु हो गई.

एक अन्य मत के अनुसार पंजाब के राजा पोरस के साथ चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने मिलकर सिकन्दर की सेना को हराया था. इस मत के समर्थन में काफी स्पष्ट तथ्य है जब सिकन्दर 325-326 ई पू में सिन्धु पार कर रहा था उस समय उसका सहयोग तक्षशिला के राजा अम्भी उसका सहयोगी बना था,

यह राजा पोरस का प्रतिद्वंद्वी था और सिकन्दर का संधि प्रस्ताव लेकर पंजाब भी गया था. कहते है पांच हजार की सेना के साथ गये अम्भी को जान बचाकर लौटना पड़ा था. सम्भवत इस कारण सिकंदर ने वापस लौटने का निश्चय किया हो.

जैसे ही सिकन्दर की मौत का समाचार चाणक्य तक पंहुचा उन्होंने यूनानी सरदारों के खिलाफ भारतीय प्रजा के उभरे विरोध को पुनः जगाया और विरोधियो की सेना का सेनापति चन्द्रगुप्त को बनाकर छोटे छोटे क्षेत्रों को जीतना शुरू कर दिया.

जैसे जैसे उत्तरी पश्चिमी भारत में चन्द्रगुप्त की सेना क्षेत्रों को विजित करती गई उसकी सेना और अधिक शक्तिशाली होती गई. कहते है पोरस की मदद से ही उन्होंने मगध पर आक्रमण किया और म्हापद्मनाभ को पराजित कर मगध की सत्ता हासिल की.

इस तरह तक्षशिला से शुरू हुआ चन्द्रगुप्त का विजय अभियान समूचे उत्तर और पश्चिम भारत को अपने जद में लेता हुआ मगध और सम्पूर्ण पूर्वी भारत एक एकछत्र राज्य स्थापित किया.

सेल्यूकस और चन्द्रगुप्त मौर्य

25 वर्ष की आयु में मगध के शासक बने चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती यूनानियों की थी. भले ही सिकन्दर की मृत्यु हो गई मगर उसका उत्तराधिकारी सेल्यूकस निकोटर अलेक्जेंडर के विजित क्षेत्रों अफगानिस्तान और बलूचिस्तान का प्रतिनिधि बनकर युद्ध लड़ने की तैयारियों में लगा था.

चन्द्रगुप्त ने भी अपनी सेना को युद्ध की तैयारी के आदेश दे दिया. जब दोनों सेनाएं आमने सामने हुई तो सेल्यूकस को भारतीयों की वीरता के बारे में जो पूर्वाग्रह था वह टूट गया.

एक तरह से चन्द्रगुप्त भारतीय सेना का नेतृत्व कर रहे थे, वीरों के साहस के आगे यूनानी अधिक समय तक टिक न सके और तेजी से आगे बढ़ती सेना से सेल्यूकस और उसकी सेना का आत्मविश्वास टूट गया और सेना ने हथियार डाल दिए और संधि के लिए राजी हो गया.

सेल्यूकस और चन्द्रगुप्त के मध्य 303 ई पू में यह संधि हुई जिसकी शर्तों के अनुसार सेल्यूकस ने हेरात, काबुल, कंधार और मकरान मौर्य सम्राट को दे दिए चन्द्रगुप्त ने भी उपहार स्वरूप 500 हाथी भेंट किये.

यूनानी शासक ने भारत के साथ दीर्घकालीन शांतिपूर्ण रिश्ते के लिए अपनी बेटी हेलन का विवाह चन्द्रगुप्त के संग कर दिया.

चन्द्रगुप्त मौर्य की उपलब्धियाँ

इस विषय में इतिहासकारों में मतभेद है कि चन्द्रगुप्त ने अपने साम्राज्य निर्माण की शुरुआत कहाँ से की। उसने पहले विदेशी यूनानियों को देश से बाहर किया। यह पहले नन्दराजा को परास्त कर मगध के राज्य पर अधिकार  प्राप्त किया।

इसका निश्चित साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। परन्तु बौद्ध साक्ष्यों एवं यूनानी विवरणों के सूक्ष्म अनुशीलन से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि प्रथमत: सीमान्त के छोटे-छोटे राज्यों के डाकू एवं वीर लोंगो को संगठित किया, जिसमें चाणक्य ने उसकी सहायता की।

(1) पंजाब पर विजय

सिकन्दर की मृत्यु (323 ई० पू०) के बाद सिन्ध तथा पंजाब के यूनानी शासक आपस में लड़ने लगे। यूनानियों की शक्ति क्षीण हो गयी। वहाँ स्थानीय जनता स्वन्त्रता के लिये छटपटाने लगी। चन्द्रगुप्त ने इन सभी परिस्थितियोँ का पूरा लाभ उठाया। यूनानी इतिहासकार  लेखक जस्टिन के अनुसार, “सिकन्दर के बाद पश्चिमोत्तर भारत ने गुलामी को उतार फेंकने के लिये यूनानी शासकों का वध कर दिया। इस स्वन्त्रता संग्राम का नेता चन्द्रगुप्त था।” अत: 317 ई० पू० तक सिन्ध तथा पंजाब पर चन्द्रगुप्त ने विजय प्राप्त की।

(2) नन्दवंश का विनाश एवं मगध पर अधिकार

पंजाब और सिन्ध के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य ने मगध को जीता। उसकी मगध विजय का विस्तृत विवरण अभी तक उपलब्ध नहीं हो पाया है। अभी तक उपलब्ध समस्त भारतीय साक्ष्य यह तो स्पष्ट रूप से घोषित करते हैं कि चाणक्य ने नन्दों का विनाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के सिंहासन पर बैठाया, परन्तु वे चन्द्रगुप्त के आक्रमण का ब्यौरा नहीं देते।

जैसा कि हमको मालूम हे कि नन्दों के पास एक विशाल सेना थी, नन्दों को सिंहासन से हटाने के लिये निश्चय ही भयंकर युद्ध लड़ा गया होगा। मुद्राराक्षस नाटक में जिस ढंग से षड्यंत्रों एवं गुप्त मन्त्रणाओँ को महत्व दिया गया, उससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि इस युद्ध में सैनिक शक्ति के साथ-साथ साम, दाम, दण्ड और भेद की कूटनीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी। मगध-विजय में चाणक्य का प्रमुख हाथ रहा।

(3) सेल्यूकस की पराजय और ईरान तक राज्य विस्तार

सिकनदर की  मृत्यु के बाद उसके साम्राज्य पर अधिकार करने के लिये उसके प्रमुख सेनापतियों सेल्यूकस और एण्टिगोनस के मध्य एक गृह-युद्ध आरम्भ हुआ, जिसमें एक लम्बे युद्ध के बाद सेल्यूकस विजयी हुआ और वह बेबीलोन एवं बैक्ट्रिया सहित सम्पूर्ण एशियाई यूनानी साम्राज्य का अधिपति हो गया। इन क्षेत्रों में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद लगभग 306 ई० पू० में सेल्यूकस ने अपना राज्याभिषेक किया और ‘निकेटर’ (विजेता) की उपाधि धारण की।

इसके बाद उसने भारत विजय की योजना बनायी। इस समय भारत पर चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रभुत्व कायम हो चुका था। चन्द्रगुप्त अभी तक अविजित था और चाणक्य जैसा कूटनीतिज्ञ उसकी शासन व्यवस्था की बागडोर सँभाले हुए था। सेल्यूकस एवं चन्द्रगुप्त में संघर्ष हुआ, जिसमें सेल्यूकस पराजित हुआ। सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त से सन्धि कर ली जिसके अनुसार एरिया (हिरात), अराकोसिया (कंधार), पैरोपेनिसेडाई (काबुल) और जैड्रोसिया (बलूचिस्तान) के प्रदेश चन्द्रगुप्त को देने पड़े।

चन्द्रगुप्त ने इसके बदले में सेल्यूकस को 500 हाथी प्रदान किये। सन्धि को सुदृढ़ और स्थायी बनाने के लिये सेल्यूकस ने बदले में अपनी कन्या हेलना का विवाह भी चन्द्रगुप्त के साथ कर दिया। चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में सेल्यूकस के राजदूत मेगस्थनीज की उपस्थिति इसी निर्णय का परिणाम थी। निश्चय ही चन्द्रगुप्त की सेल्यूकस पर विजय अपूर्व थी। इसके परिणामस्वरूप भारत की सीमायें ईरान से छूने लगी थी। पशचिमोत्तर इतिहास में पहली बार  भारत ने अपनी प्राकृतिक सीमायें प्राप्त कीं और हिन्दूकुश पर्वत तक भारत का साम्राज्य फैल गया था।

(4) पश्चिमी भारत पर विजय

चन्द्रगुप्त मौर्य ने पश्चिमी भारत पर विजय प्राप्त की थी, इसमें कोई संशय नहीं है। रुद्रदामन के शिलालेख से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रान्तीय शासक पुष्यगुप्त ने सौराष्ट्र में प्रसिद्ध सुदर्शन झील का निर्माण कराया था। सौराष्ट्र की विजय के परिणामस्वरूप मालवा व उज्जैन पर भी उसका अधिकार हो गया था। मुम्बई के सोपारा नामक स्थान से प्राप्त अशोक के शिलालेख से ज्ञात होता है कि सोपारा भी चन्द्रगुप्त के अधीन रहा था।

(5) दक्षिण विजय

चन्द्रगुप्त ने अपने शासन के अन्तिम दिनों में  दक्षिण भारत पर विजय की थी, किन्तु डॉ० आयंकर दक्षिण विजय का श्रेय चन्द्रगुप्त को नहीं वरन् बिन्दुसार को देते हैं। इतिहासिक साक्ष्यों जैसे मुद्राराक्षस चन्द्रगिरि अभिलेख, जैन ग्रन्थ तथा प्लूटार्क के विवरण से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त ने दक्षिण भारत पर आक्रमण कर उसे अपने साम्राज्य में मिला लिया था। प्लूटार्क के इस कथन में, “उसने छ: लाख सैनिकों की सेना लेकर सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन कर लिया।

” चन्द्रगुप्त की दिग्विजय की ध्वनि सुनायी देती है, क्योंकि यह इतिहासिक सच्चाई है कि अशोक ने सिवाय कलिंग विजय के अलावा अन्य विजय प्राप्त नहीं की और बिन्दुसार की किसी विजय का उल्लेख नहीं मिलता है। जैन साक्ष्यों में भी चन्द्रगुप्त द्वारा अन्तिम दिनों में जैन धर्म स्वीकारने एवं भद्रबाहु के साथ दक्षिण में मैसूर राज्य के ‘श्रवणबेलागोला’ (कर्नाटक) में जाकर रहने के उल्लेख मिलते हैं।

निर्ष्कषत: यह कहा जा सकता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य हिन्दूकुश से लेकर बंगाल तक और हिमालय से लेकर कर्नाटक तक विस्तृत था। इसके अन्तर्गत अफगानिस्तान और बलूचिस्तान के विशाल प्रदेश, पंजाब, सिन्धु, कश्मीर, नेपाल, गंगा-यमुना का दोआब, मगध, बंगाल, सौराष्ट्र, मालवा और दक्षिण भारत में कर्नाटक तक का प्रदेश सम्मिलित था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन-प्रबन्ध

चन्द्रगुप्त मौर्य एक महान् विजेता ही नहीं वरन् कुशल शासन-प्रबन्धक भी था। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’, यूनानी राजदूत मेगस्थनीज द्वारा लिखित ‘इण्डिकाֹ नामक पुस्तक से उसके शासन-प्रबन्ध की विस्तृत जानकारी मिलती है।

केन्द्रीय शासन

सम्राट की शक्ति अपार थी, सर्वोच्च सत्ता उसी में निहित थी। प्रान्तों के शासकों की नियुक्ति वही करता था। शासन की सर्वोच्च शक्तियाँ व्यवस्थापिका, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका उसी में विद्यमान थीं, परन्तु उसका शासन उदार-नरंकुशवाद पर आधारित था। स्वेच्छाचारी होते हुए भी धर्मशास्त्र नीतिशास्त्र एवं मन्त्रिपरिषद् की भावनों का वह आदर करता था।

  1. मन्त्रि-परिषद्— राजा को परामर्श देने के लिये एक मन्त्रि-परिषद् थी। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार मन्त्रि-परिषद् में 18 मंत्री होते थे। केन्द्रीय शासन को 27 विभागों में विभक्त किया गया था। प्रत्येक विभाग का  एक अलग विभागाध्यक्ष होता था, जिसकी नियुक्ति स्वयं सम्राट करता था। 3-4 प्रमुख अधिकारियों की एक सलाहकार समिति भी होती थी जो ‘मन्त्रिण:’ कहलाती थी। इसमें अमात्य, महासंधिविग्रहक, विदेशमन्त्री, कोषाध्यक्ष, दण्डपालक, आदि थे। प्रत्येक मन्त्रिण का वेतन 48,000 पण होता था।
  2. न्याय व्यवस्था— किसी भी राज्य की उन्नति एवं स्थायित्व उचित न्याय व्यवस्था पर आधारित होता है। चन्द्रगुप्त मौर्य ने न्याय व्यवस्था की ओर समुचित ध्यान दिया। गाँवों के मामलों का फैसला ग्राम पंचायतें करती थीं। ग्रामों तथा नगरों के लिये अलग-अलग न्यायलय थे। न्यायलय के दो प्रकार के होते थे— फौजदारी एवं दीवानी। दण्ड  व्यवस्था बहुत कठोर थी। आर्थिक दण्ड से लेकर अंग-भंग तथा प्राण दण्ड तक  दिये जाते थे। फलत: समाज में अपराध प्राय: समाप्त हो गये। सम्राट सबसे बड़ा न्यायाधीश होता था।
  3. सैनिक व्यवस्था— कोई भी राज्य बिना विशाल सेना के टिक नहीं सकता। चन्द्रगुप्त ने साम्राज्य की सुरक्षा के लिये विशाल सेना का गठन किया। सैनिकों को केन्द्रीय सरकार की ओर से नकद नियमित वेतन मिलता था। मेगस्थनीज व अन्य साक्ष्यों के अनुसार चन्द्रगुप्त की सेना में 6 लाख पैदल सैनिक, 30 हजार घुड़सवार, 9 हजार हाथी और 8 हजार रथ थे। सेना के प्रबन्ध के लिये एक सैनिक विभाग होता था, जो 6 समितियों में विभाजित था। ये समितियाँ, जल-सेना, पैदल-सेना, घुड़सवार-सेना, रथसेना, गजसेना तथा यातायात की देखभाल करती थीं और युद्ध सामग्री की व्यवस्था करती थीं। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।
  4. गुप्तचर व्यवस्था— कौटिल्य के अनुसार गुप्तचर राजा के नेत्र होते हैं। राज्य की प्रत्येक घटना की जानकारी के लिये साम्राज्य में गुप्तचरों का जाल फैला हुआ था। स्त्रियाँ भी गुप्तचर का काम करती थीं। ये गुप्तचर सरकारी कर्मचारियों के कार्यों एवं जनता के विचारों को राजा तक पहुँचाते थे। गुप्तचर दो वर्ग  में होते थे— (1) संस्थिल, (2) सथारण। संस्थिल वर्ग के गुप्तचर एक स्थान पर रहते थे और संथारण गुप्तचर भ्रमण किया करते थे।
  5. अर्थव्यवस्था— चन्द्रगुप्त के राज्य की आर्थिक स्थिति बहुत ही सुदृढ़ थी। राजकीय आय के अनेक स्रोत थे, परन्तु कृषिकर आय का मुख्य साधन था। उपज का 1/6 भाग कर के रूप में लिया जाता था। बिक्रीकर, जुर्माने, खानों, चरागाहों, जंगलों के कर आदि सभी से राज्य की आय होती थी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि राज्य करों की आय का अधिकांश भाग जनता के हित के लिये खर्च किया करता था। चिकित्सालय, अनाथालय, विद्यालय, भवनों के निर्माण , वृद्धों एवं किसानों की सहायता, सेना तथा न्याय विभाग का व्यय, राज्य की ओर से किया जाता था। सिंचाई की व्यवस्था भी राजकीय कोष से होती थी।

प्रान्तीय शासन

सम्भवतया शासन की सुविधा के लिये समस्त राज्य को छ: प्रान्तों में विभक्त किया गया था। यह विभाजन निम्न प्रकार से था।—

  1. उत्तरापथ, इसकी राजधानी तक्षशिला थी।
  2. सेल्यूकस से प्राप्त प्रदेश, इसकी राजधानी कपिला थी।
  3. सौराष्ट्र, इसकी राजधानी गिरनार थी।
  4. दक्षिणापथ (कर्नाटक), इसकी राजधानी स्वर्णगिरि थी।
  5. अवन्ति (मालवा) इसकी राजधानी उज्जयिनी थी।
  6. मगध एवं निकटवर्ती प्रदेश, जिसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। सम्राट स्वयं यहाँ का शासन चलाता था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का नगर व्यवस्था

मेगस्थनीज के अनुसार राजधानी पाटलिपुत्र बहुत बड़ा नगर था, जिसकी व्यवस्था जनतन्त्रीय प्रणाली से होती थी। सोन व गंगा के तट पर बसा नगर पाटलिपुत्र लगभग 16 किमी लम्बा एवं 3 किमी चौड़ा था। नगर की सुरक्षा के लिये चारों ओर 600 फुट चौड़ी तथा 60 फुट गहरी खाई थी जो शहर की गन्दगी बहाने के भी काम आती थी।

नगर के चारों ओर लकड़ी की प्राचीर थी, जिसमें 570 मीनारें एवं 64 द्वार बने हुए थे। पटना के निकट कुम्हार गाँव में प्राचीन पाटलिपुत्र के अवशेष प्राप्त हुए हैं। सुन्दरता तथा रमणीयता में चन्द्रगुप्त के राजभवन ईरान के राजप्रासादों से भी अधिक सुन्दर थे। पाटलिपुत्र की व्यवस्था के लिये निम्नलिखित छ: समितियाँ कार्य करती थीं—

  1. शिल्पकला समिति— यह समिति औद्योगिक वस्तुओं की शुद्धता, निरीक्षण, पारिश्रमिक निर्माण तथा शिल्पियों एवं कलाकारों के हितों की रक्षा करती थ। शिल्पी को अपाहिज एवं बेकार करने वाले को राज्य प्राण दण्ड देता था।
  2. वैदेशिक समिति— यह समिति विदेशी यात्रियों की गतिविधियों का पूरा ध्यान रखती थी। राज्य की ओर से ठहरने की व्यवस्था एवं इनकी सुरक्षा तथा चिकित्सा का प्रबन्ध भी यह समिति ही  करती थी। मृत्यु होने पर राजकीय व्यय से अन्त्येष्टि की जाती थी और उसकी सम्पत्ति उनके उत्तराधिकायों को लौटा दी जाती थी।
  3. जनसंख्या समिति—  यह समिति नगर में जन्म-मरण का लेखा-जोखा करती थी। इससे कर निर्धारण में सुविधा रहती थी। यह कार्य आजकल की नगरपालिका भी करती है।
  4. वाणिज्यिक समिति— इस समिति का काम नाप-तौल की जाँच करना, वस्तुओं के भाव निश्चित करना तथा तौलने के बाँटों का निरन्तर निरीक्षण करना था।
  5. औद्य़ोगिक समिति— यह समिति कारखानों में तैयार माल की जाँच करना, उसकी बिक्री के लिये बाजार तैयार करना तथा नयी-पुरानी वस्तुओं का अलग-अलग मूल्य निर्धारण का काम करती थी। मिलावट करने वाले को राज्य की ओर से प्राण-दण्ड दिया जाता था।
  6. कर समिति— वस्तुओं पर विक्रय कर यही समिति लेती थी। मूल्य पर दस प्रतिशत कर लिया जाता था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कर समिति के कार्यों का विशद् वर्णन है। नगर का अधिकारी ‘नागरिक’ कहलाता था। ‘गोप’ और ‘स्थानिक’ उसकी सहायता करते थे। सार्वजनिक कार्यों के लिये सभी समितियाँ मिलकर काम करती थीं।

चन्द्रगुप्त मौर्य का ग्राम प्रशासन

ग्राम, शासन की सबसे छोटी इकाई थी। ग्रामों का शासन पंचायतें चलाती थीं जिनके सदस्यों का चुनाव गाँव के लोग करते थे। इन पंचायतों के प्रमुख ग्रामिक की नियुक्ति राज्य द्वारा की जाती थी। इसको राज्य की ओर से वेतन भी दिया जाता था। ग्राम पंचायतें गाँव के विकास के लिये अपनी योजना बनाती थीं. गाँव में सिंचाई की व्यवस्था करना तथा यातायात प्रबन्ध करना इन्हीं का काम था।

चन्द्रगुप्त मौर्य का व्यक्तित्व

सम्राट चन्द्रगुप्त महत्वाकांक्षी शासक था। उसका जीवन भी शान-शौकत का था। वह सुन्दर पालकी में बैठता था। केवल चार अवसरों पर ही जनता को राजा के दर्शनों का अवसर मिलता था। ये अवसर थे—युद्ध, यात्रा, यज्ञानुष्ठान और न्यायालय में।

आखेट के समय राजा की सुरक्षा के लिये कड़े प्रबन्ध किये जाते थे। महिला अंगरक्षक रखी जाती थी तथा सुरक्षा की दृष्टि से शयन का कमरा प्रति रात्रि बदला जाता था। राजा अपना अधिकांश समय राजकाज में ही लगाता था। उसे आखेट, घुड़दौड़, पशुओँ की लड़ाई तथा मल्ल-युद्ध देखने का बहुत शौक था।

चंद्रगुप्त ने अपनाई अर्थशास्त्र में लिखी बातें 

आचार्य चाणक्य ने शासन को कैसे चलाया जाए, इस पर एक किताब लिखी जिसका नाम अर्थशास्त्र था।

यह किताब निम्नलिखित विषयों पर बातें करती है –

  • राज्य में संपन्न लोगों से ही कर लेना और गरीबों को फ्री में खाना देना।
  • हर गांव, घर, शहर को किस तरह से बनाया जाए कि शत्रु से बचा जा सके।
  • राजा के भवन को किस तरह से बनाया जाए।
  • हर एक व्यक्ति को खेती में सम्मिलित किया जाए।
  • किसी भी किए गए दुष्कर्म के लिए कठोर सजा सुनाई जाए।
  • राजा को किस तरह से अपना समय गुजारना चाहिए।
  • जनता के लिए त्योहारों और मेलों का आयोजन करवाया जाए।
  • राज्य की सेना व मंत्रियों के घरों में गुप्तचरों को रखा जाए।
  • कर एकत्र करने वाले लोगों व जनता के बीच में भी गुप्तचर रखे जाएं।
  • राजा के नियमों का अनुसरण न करने वाले व्यक्ति को सजा दी जाए।
  • दूसरे देश के राजा की मानसिकता को अपने गुप्त चरो के माध्यम से जाना जाए।
  • सरकारी कार्यों में ऑडिट लगाया जाए ताकि भ्रष्टाचारी कम हो।
  • राज्य की सीमा पर अपने जासूसों को रखा जाए।

 इस पुस्तक में बहुत सारी बातें बताई गई है एक देश को सफल बनाने के लिए। आचार्य चाणक्य ने अपनी कुशाग्र बुद्धि से प्राचीन भारत को एक अर्थ संपन्न देश बना दिया जहां पर हर व्यक्ति का जीवन स्तर अच्छा हो गया था। 

 आचार्य चाणक्य चंद्रगुप्त की सुरक्षा के लिए बहुत चिंतित रहते थे। तो उन्होंने चंद्रगुप्त के लिए कई महलों व उनमें कई तरह के कक्ष बनाए जहां से चंद्रगुप्त गुप्त तरीकों से आ जा सकते थे।

चंद्रगुप्त के भ्रमण करने के लिए विशेष तरह के बगीचे व वन तैयार किए गए जहां पर दांत टूटे हुए शेर व कुछ बिना हानिकारक जीवो को रखा जाता था। आम लोगों को इन जंगलों व बगीचों में जाने के लिए मनाही की गई थी।

उनके लिए अलग वन व बगीचों का प्रबंध किया गया था। वहां एक आम इंसान भी शिकार व भ्रमण कर सकता था।

आचार्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त के महलों के चारों तरफ गहरी व चौड़ी खाई खुदाई। इन खाइयों के अंदर पानी भर के मगरमच्छों को छोड़ दिया जाता था ताकि शत्रु इनको पार करके अंदर रह ना सके।

एक मजबूत प्राचीन भारत और अर्थव्यवस्था

चंद्रगुप्त ने आचार्य चाणक्य नीति के अनुसार राज्य में लोगों को अर्थ संपन्न बना दिया। अब आम व्यक्ति का जीवन स्तर ऊंचा हो चुका था क्योंकि हर एक इंसान कमाई कर रहा था और टैक्स भर रहा था।

राज्य में एकत्रित हुआ टैक्स का पैसा लोगों की आधारभूत सुविधाओं जैसे कि पानी, सिंचाई, व्यापार, कृषि, आवागमन  के साधनों, सड़कों  पर खर्च किया जाता। 

 देश में शिक्षा, शास्त्र इत्यादि पर भी बहुत ज्यादा जोर दिया गया और तक्षशिला विश्वविद्यालय को उभार गया। जिससे बाहरी देशों के विद्यार्थी भी यहां पढ़ने आते। क्योंकि अब देश में शांति और अच्छी तरह के नियम आ गए थे जिसकी वजह से दूसरे देश के विद्यार्थियों का विश्वास बढ़ा।

चन्द्रगुप्त मौर्य का जैन धर्म की ओर झुकाव व म्रत्यु (Death) –

चन्द्रगुप्त मौर्य जब 50 साल के थे, तब उनका झुकाव जैन धर्म की तरफ हुआ, उनके गुरु भी जैन धर्म के थे जिनका नाम भद्रबाहु था. 298 BCE में उन्होंने अपना साम्राज्य बेटे बिंदुसरा को देकर कर्नाटक चले गए, जहाँ उन्होंने 5 हफ़्तों तक बिना खाए पिए ध्यान किया, जिसे संथारा कहते है. ये तब तक करते है जब तक आप मर ना जाओ. यही चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने प्राण त्याग दिए.

चन्द्रगुप्त मौर्य के जाने के बाद उनके बेटे ने साम्राज्य आगे बढाया, जिनका साथ चाणक्य ने दिया. चन्द्रगुप्त मौर्य व चाणक्य ने मिल कर अपनी सूझबूझ से इतना बड़ा एम्पायर खड़ा किया था. वे कई बार हारे भी, लेकिन वे अपनी हार से भी कुछ सीखकर आगे बढ़ते थे. चाणक्य कूटनीति के चलते ही चन्द्रगुप्त मौर्य ने इतना बड़ा एम्पायर खड़ा किया था, जिसे आगे जाकर उनके पोते अशोका ने एक नए मुकाम पर पहुँचाया था.

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Thu, 20 Mar 2025 10:20:28 +0530 Jaankari Rakho
चंद्रशेखर आजाद का जीवन परिचय | Chandra Shekhar Azad Biography in hindi https://m.jaankarirakho.com/60 https://m.jaankarirakho.com/60 चन्द्रशेखर आजाद एक महान क्रांतिकारी थे. चन्द्रशेखर आजाद उग्र स्वभाव के थे. वे बचपन से क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रीय थे. चंद्रशेखर आजाद ने कसम खाई थी कि मरते दम तक वह अंग्रेजो के हाथ नहीं आयेंगे. जब आखिरी समय में अंग्रेजों ने उन्हें घेर लिया था तो स्वयं ही खुद को गोली मार दी और शहीद हो गए.

उपलब्धियांभारतीय क्रन्तिकारी, काकोरी ट्रेन डकैती (1926)वाइसराय की ट्रैन को उड़ाने का प्रयास (1926)लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए सॉन्डर्स पर गोलीबारी की (1928)भगत सिंहसुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्रसभा का गठन किया

चंद्रशेखर आजाद का परिचय (Introduction to Chandra Shekhar Azad)

प्रचलित नाम  चंद्रशेखर आजाद
वास्तविक नाम चंद्रशेखर तिवारी 
जन्म 23 जुलाई 1906, बदरका, उत्तर प्रदेश
माता जागरणी देवी
पिता सिताराम तिवारी
आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम
धर्म हिंदू
राष्ट्रीयता भारतीय
प्रसिद्धि का कारण स्वतंत्रता सेनानी व क्रांतिकारी 
मृत्यु 27 फरवरी 1931, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
मृत्यु का कारण बंदूक की गोली से आत्महत्या 
जीवनकाल 24 वर्ष

चन्द्रशेखर आजाद प्रारंभिक जीवन (Chandra Shekhar Azad Life History)

चन्द्रशेखर आजाद का जन्म भाबरा गाँव (अब चन्द्रशेखर आजादनगर) (वर्तमान अलीराजपुर जिला) में २३ जुलाई सन् १९०६ को हुआ था। उनके पूर्वज बदरका (वर्तमान उन्नाव जिला) से थे। आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी संवत् १९५६ में अकाल के समय अपने पैतृक निवास बदरका को छोड़कर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भाबरा गाँव में बस गये। यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गाँव में बीता अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाये।

        चंद्रशेखर कट्टर सनातनधर्मी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे।  इनके पिता नेक, धर्मनिष्ट और दीं-ईमान के पक्के थे और उनमें पांडित्य का कोई अहंकार नहीं था। वे बहुत स्वाभिमानी और दयालु प्रवर्ति के थे।  घोर गरीबी में उन्होंने दिन बिताए थे और इसी कारण चंद्रशेखर की अच्छी शिक्षा-दीक्षा नहीं हो पाई, लेकिन पढ़ना-लिखना उन्होंने गाँव के ही एक बुजुर्ग  मनोहरलाल त्रिवेदी से सीख लिया था, जो उन्हें घर पर निःशुल्क पढ़ाते थे।

        बचपन से ही चंद्रशेखर में भारतमाता को स्वतंत्र कराने की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी।  इसी कारन उन्होनें स्वयं अपना नाम आज़ाद रख लिया था। उनके जीवन की एक घटना ने उन्हें सदा के लिए क्रांति के पथ पर अग्रसर कर दिया।  13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग़ अमृतसर में जनरल डायर ने जो नरसंहार किया, उसके विरोध में तथा रौलट एक्ट के विरुद्ध जो जन-आंदोलन प्रारम्भ हुआ था, वह दिन प्रतिदिन ज़ोर पकड़ता जा रहा था।

        आजाद प्रखर देशभक्त थे। काकोरी काण्ड में फरार होने के बाद से ही उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख लिया था और इसका उपयोग उन्होंने कई बार किया। एक बार वे दल के लिये धन जुटाने हेतु गाज़ीपुर के एक मरणासन्न साधु के पास चेला बनकर भी रहे ताकि उसके मरने के बाद मठ की सम्पत्ति उनके हाथ लग जाये। परन्तु वहाँ जाकर जब उन्हें पता चला कि साधु उनके पहुँचने के पश्चात् मरणासन्न नहीं रहा अपितु और अधिक हट्टा-कट्टा होने लगा तो वे वापस आ गये।

        प्राय: सभी क्रान्तिकारी उन दिनों रूस की क्रान्तिकारी कहानियों से अत्यधिक प्रभावित थे आजाद भी थे लेकिन वे खुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने में ज्यादा आनन्दित होते थे। एक बार दल के गठन के लिये बम्बई गये तो वहाँ उन्होंने कई फिल्में भी देखीं। उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था अत: वे फिल्मो के प्रति विशेष आकर्षित नहीं हुए।


        चन्द्रशेखर की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही प्रारम्भ हुई। पढ़ाई में उनका कोई विशेष लगाव नहीं था। इनकी पढ़ाई का जिम्मा इनके पिता के करीबी मित्र पं. मनोहर लाल त्रिवेदी जी ने लिया। वह इन्हें और इनके भाई (सुखदेव) को अध्यापन का कार्य कराते थे और गलती करने पर बेंत का भी प्रयोग करते थे। चन्द्रशेखर के माता पिता उन्हें संस्कृत का विद्वान बनाना चाहते थे किन्तु कक्षा चार तक आते आते इनका मन घर से भागकर जाने के लिये पक्का हो गया था। ये बस घर से भागने के अवसर तलाशते रहते थे।

        इसी बीच मनोहरलाल जी ने इनकी तहसील में साधारण सी नौकरी लगवा दी ताकि इनका मन इधर उधर की बातों में से हट जाये और इससे घर की कुछ आर्थिक मदद भी हो जाये। किन्तु शेखर का मन नौकरी में नहीं लगता था। वे बस इस नौकरी को छोड़ने की तरकीबे सोचते रहते थे। उनके अंदर देश प्रेम की चिंगारी सुलग रहीं थी। यहीं चिंगारी धीरे-धीरे आग का रुप ले रहीं थी और वे बस घर से भागने की फिराक में रहते थे। एक दिन उचित अवसर मिलने पर आजाद घर से भाग गये।

मेरा नाम आजाद है.

वैसे तो पण्डित चंद्रशेखर तिवारी को उनके दोस्त पंडितजी, बलराज और क्विक सिल्वर जैसे कई उपनामों से बुलाते थे, लेकिन आजाद उपनाम सबसे खास था और चंद्रशेखर को पसंद भी था. उन्होंने अपने नाम के सा​थ तिवारी की जगह आजाद लिखना पसंद किया. चंद्रशेखर को जाति बंधन भी स्वीकार नहीं था. आजाद उपनाम कैसे पड़ा, इस सम्बन्ध में भी एक रोचक उपकथा विख्यात है. हालांकि इस कथा का पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जिक्र किया है लेकिन यह शुरूआती दौर से ही उनके बारे में सुनी—सुनाई जाती रही है.

हुआ यूं कि 1921 में असहयोग आंदोलन अपने चरम पर था और बालक चंद्रशेखर एक धरने के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया और मजिस्ट्रेट के सामने हाजिर किया गया. पारसी मजिस्ट्रेट मिस्टर खरेघाट अपनी कठोर सजाओं के लिए जाने जाते थे. उन्होंने कड़क कर चंद्रेशेखर से पूछा

क्या नाम है तुम्हारा?

चंद्रशेखर ने संयत भाव से उत्तर दिया.

मेरा नाम आजाद है.

मजिस्ट्रेट ने दूसरा सवाल किया.

तुम्हारे पिता का क्या नाम है.

आजाद का जवाब फिर लाजवाब था

उन्होंने कहा मेरे पिता का नाम स्वाधिनता है.

एक बालक के उत्तरों से चकित मजिस्ट्रेट ने तीसरा सवाल किया.

तुम्हारी माता का नाम क्या है.

आजाद का जवाब था.

भारत मेरी मां है और जेलखाना मेरा घर है.

बस फिर क्या था गुस्साए मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर को 15 बेंत लगाने की सजा सुना दी.

बालक चंद्रशेखर को 15 बेंत लगाई गई लेकिन उन्होंने उफ्फ तक न किया. हर बेंत के साथ उन्होंने भारत माता की जय का नारा लगाया. आखिर में सजा भुगतने के एवज में उन्हें तीन आने दिए गए जो वे जेलर के मूंह पर फेंक आए. इस घटना के बाद लोगों ने उन्हें आजाद बुलाना शुरू कर दिया.

आजाद की क्रांतिकारी गतिविधियां (Azad’s Revolutionary Activities)

चंद्रशेखर आज़ाद 1919 में अमृसतर में हुए जलियां वाला बाग हत्याकांड से बहुत आहत और परेशान हुए। सन 1921 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की तब चंद्रशेखर आज़ाद ने इस क्रांतिकारी गतिविधि में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्हें पंद्रह साल की उम्र में ही पहली सजा मिली। चन्द्रशेखर आज़ाद को क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने के लिए पकड़ा गया। जब मजिस्ट्रेट ने उनसे उनका नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम आज़ाद बताया। चंद्रशेखर आज़ाद को पंद्रह कोड़ों की सजा सुनाई गई। चाबुक के हर एक प्रहार परयुवा चंद्रशेखर “भारत माता की जय” चिल्लाते थे। तब से चंद्रशेखर को आज़ाद की उपाधि प्राप्त हुई और वह आज़ाद के नाम से विख्यात हो गए। स्वतंत्रता आन्दोलन में कार्यरत चंद्रशेखर आज़ाद ने कसम खाई थी कि वह ब्रिटिश सरकार के हांथों कभी भी गिरफ्तार नहीं होंगे और आज़ादी की मौत मरेंगे ।

असहयोग आंदोलन के स्थगित होने के बाद चंद्रशेखर आज़ाद और अधिक आक्रामक और क्रांतिकारी आदर्शों की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने किसी भी कीमत पर देश को आज़ादी दिलाने के लिए खुद को प्रतिबद्ध किया। चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर ऐसे ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाया जो सामान्य लोगों और स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध दमनकारी नीतियों के लिए जाने जाते थे। चंद्रशेखर आज़ाद काकोरी ट्रेन डकैती (1926)वाइसराय की ट्रैन को उड़ाने के प्रयास (1926)और लाहौर में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिए सॉन्डर्स को गोली मारने (1928) जैसी घटनाओं में शामिल थे।

चंद्रशेखर आज़ाद ने भगत सिंह और दूसरे देशभक्तों जैसे सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र सभा’ का गठन किया। इसका उद्देश्य भारत की आज़ादी के साथ भारत के भविष्य की प्रगति के लिए समाजवादी सिद्धांतों को लागू करना था।

काकोरी कांड और कमांडर इन चीफ

काकोरी कांड से कौन नहीं परिचित है जिसमें देश के महान क्रांतिकारियों रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्‍ला खां, राजेन्‍द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशनसिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी. दल के दस सदस्‍यों ने इस लूट को अंजाम तक पहुंचाया और अंग्रेजों के खजाने को लूट कर उनके सामने चुनौती पेश की. इस घटना के बाद दल के ज्‍यादातर सदस्‍य गिरफ्तार कर लिए गए. दल बिखर गया, आजाद के सामने एक बार फिर दल खड़ा करने का संकट आ गया. कई प्रयासों के बावजूद अंग्रेज सरकार उन्‍हें पकड़़ने मे असफल रही थी. इसके बाद छुपते-छुपाते आजाद दिल्‍ली पहुंचे जहां के फिरोजशाह कोटला मैदान में सभी बचे हुए क्रांतिकारियों की गुप्‍त सभा आयोजित की गई. इस सभा में आजाद के अलावा महान क्रांतिकारी भगतसिंह भी शामिल हुए. तय किया गया कि एक नये नाम से नये दल का गठन किया जाए और क्रांति की लड़ाई को आगे बढ़ाया जाए. नये दल को नाम दिया गया-हिन्‍दुस्‍तान सोशलिस्‍ट रिप‍ब्लिकन एसो‍सिएशना. आजाद को इसका कमाण्‍डर इन चीफ बनाया गया. संगठन का प्रेरक वाक्‍य बनाया गया- हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत.

सांडर्स की हत्‍या और असेम्‍बली में बम

दल ने सक्रिय होते ही कुछ ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया कि अंग्रेज सरकार एक बार फिर उनके पीछे पड़ गई. लाला लाजपत राय की मौत की बदला लेने के लिए भगत‍सिंह ने सांडर्स की हत्‍या का निश्‍चय किया और चंद्रशेखर आजाद ने उनका साथ दिया. इसके बाद आयरिश क्रांति से प्रभावित भगतसिंह ने असेम्‍बली में बम फोड़ने का निश्‍चय किया और आजाद ने फिर उनका साथ दिया. इन घटनाओं के बाद अंग्रेज सरकार ने इन क्रांतिकारियों को पकड़ने में पूरी ताकत लगा दी और दल एक बार फिर बिखर गया. आजाद ने भगतसिंह को छुड़ाने की कोशिश भी की लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. जब दल के लगभग सभी लोग गिरफ्तार हो चुके थे, तब भी आजाद लगातार ब्रिटिश सरकार को चकमा देने मे कामयाब रहे थे. 

अल्‍फ्रेड पार्क और आजाद योद्धा

अंग्रेज सरकार ने राजगुरू, भगतसिंह और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई और आजाद इस कोशिश में थे कि उनकी सजा को किसी तरह कम या उम्रकैद में बदलवा दी जाए. ऐसे ही एक प्रयास के लिए वे इलाहाबाद पहुंचे. इसकी भनक पुलिस को लग गई और जिस अल्‍फ्रेड पार्क में वे थे, उसे हजारो पुलिस वालों ने घेर लिया और उन्‍हें आत्‍मसमर्पण के लिए कहा लेकिन आजाद ने लड़ते हुए शहीद हो जाना ठीक समझा. उनका अंतिम संस्‍कार भी अंग्रेज सरकार ने बिना किसी सूचना के कर दिया. लोगों को मालूम चला जो लोग सड़कों पर उतर आए, ऐसा लगा जैसे गंगा जी संगम छोड़कर इलाहाबाद की सड़कों पर उतर आई हों. लोगों ने उस पेड़ की पूजा शुरू कर दी, जहां इस महान क्रांतिकारी ने अ‍तिम सांस ली थी. उस दिन पूरी दुनिया ने देखा कि भारत ने अपने हीरो को किस तरह अंतिम विदाई दी है.

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन संगठन की स्थापना

हिंदुस्तान रिपब्लिकन संगठन के लोग तथा क्रांतिकारी नेताओं ने 1925 में काकोरी ट्रेन में लूटपाट की। ब्रिटिश सरकार ने इस संगठन के मुख्य लोगों व क्रांतिकारियों को पकड़ने का आदेश दिया। कई क्रांतिकारियों को मृत्यु दंड देने का निर्णय लिया गया। चंद्रशेखर आजाद, केशव चक्रवर्ती तथा मुरारी लाल गुप्ता सरकार के हाथों से बच निकले।  आजाद ने फिर एक बार हिंदुस्तान रिपब्लिकन संगठन की पुनर्स्थापना की।

1928 में आजाद ने भगत सिंह तथा कई अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन संगठन का नाम परिवर्तित करके हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन रखा व उसकी पुनर्स्थापना की। इस संगठन में सुखदेव, राजगुरु व अन्य क्रांतिकारी भी सम्मिलित थे।

इन चारों क्रांतिकारियों ने मिलकर लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए जॉन सांडर्स की हत्या करने के लिए योजना बनाई। ब्रिटिश सरकार ने जॉन सांडर्स की हत्या के अपराध में सुखदेव, राजगुरु व भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी।

मन्मथ नाथ गुप्ता इस संगठन में एक सदस्य थे जो संगठन की आंतरिक गतिविधियों की घटनाओं का वर्णन लिखा करते थे उन्होंने आजाद की जीवनी भी लिखी। 

असेंबली में बम विस्फोट (Assembly Bomb Kand)

ब्रिटिश राज्य की तानाशाही का विरोध करने के लिए जब भगत सिंह ने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ 8 अप्रैल, 1929 को दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली में बम विस्फोट कर दिया. इस विस्फोट का मुख्य उदेश्य अंग्रेज़ सरकार द्वारा बनाए गए काले क़ानूनों का विरोध करना था. यह विस्फोट आजाद के नेतृत्व में ही किया गया था.

आजाद की मृत्यु (Chandra Shekhar Azad Death)

अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों से चंद्रशेखर आज़ाद ब्रिटिश पुलिस के लिए एक दहशत बन चुके थे। वह उनकी हिट लिस्ट में थे और ब्रिटिशसरकार किसी भी तरह उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ना चाहती थी। 27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में अपनेदो सहयोगियों से मिलने गए। उनके एक मुखबिर ने उनके साथ विश्वासघात किया और ब्रिटिश पुलिस को इसकी सूचना दे दी। पुलिस ने पार्क को चारो ओर से घेर लिया और चंद्रशेखर आज़ाद को आत्मसमर्पण का आदेश दिया। चंद्रशेखर आज़ाद ने अकेले ही वीरतापूर्वक लड़ते हुए तीन पुलिस वालों को मार गिराया। लेकिन जब उन्होंने स्वयं को घिरा हुआ पाया और बच निकलने का कोई रास्ता प्रतीत नहीं हुआ तोभारत माता के इस वीर सपूत ने स्वयं को गोली मार ली। इस प्रकार उन्होंने कभी जिन्दा न पकड़े जाने की अपनी प्रतिज्ञा का पालन किय। उनका नाम देश के बड़े क्रांतिकारियों में शुमार है और उनका सर्वोच्च बलिदान देश के युवाओं को सदैव प्रेरित करता रहेगा।

आज़ाद के बारे में रोचक तथ्य (Chandra Shekhar Azad Interesting Facts)

चंद्रशेखर आजाद अपने साथ हमेशा एक माउज़र रखते थे. ये पिस्टल आज भी इलाहाबाद के म्यूजियम में रखी हुई है. आज़ाद हमेशा कहा करते थे “दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं. आजाद ही रहेंगे” भगतसिंह पर बनी कई फिल्मो में चंद्रशेखर आजाद के पात्र को बताया गया हैं.

शहीद (1965)
23rd March 1931: Shaheed ( 2002)
The Legend of Bhagat Singh (2002)
रंग दे बसंती (2006)

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Thu, 20 Mar 2025 10:20:23 +0530 Jaankari Rakho
Charles Darwin Biography In Hindi | चार्ल्स डार्विन की जीवनी https://m.jaankarirakho.com/61 https://m.jaankarirakho.com/61         चार्ल्स डार्विन (१२ फरवरी, १८०९ – १९ अप्रैल १८८२) ने क्रमविकास के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उनका शोध आंशिक रूप से १८३१ से १८३६ में एचएमएस बीगल पर उनकी समुद्र यात्रा के संग्रहों पर आधारित था। इनमें से कई संग्रह इस संग्रहालय में अभी भी उपस्थित हैं। डार्विन महान वैज्ञानिक थे - आज जो हम सजीव चीजें देखते हैं, उनकी उत्पत्ति तथा विविधता को समझने के लिए उनका विकास का सिद्धान्त सर्वश्रेष्ठ माध्यम बन चुका है। संचार डार्विन के शोध का केन्द्र-बिन्दु था। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक जीवजाति का उद्भव ऑरिजिन ऑफ स्पीसीज़ प्रजातियों की उत्पत्ति सामान्य पाठकों पर केंद्रित थी। डार्विन चाहते थे कि उनका सिद्धान्त यथासम्भव व्यापक रूप से प्रसारित हो।

चार्ल्स डार्विन संक्षिप्त विवरण

नाम चार्ल्स डार्विन
पूरा नाम चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन
जन्म  12 फरवरी 1809
जन्म स्थान इंग्लैंड
पिता का नाम राबर्ट डार्विन
माता का नाम ब्रिटिश

चार्ल्स डार्विन का प्रारंभिक जीवन :

Charles Darwin का जन्म 12 फरवरी 1809 को इंग्लैंड के शोर्पशायर के श्रेव्स्बुरी में हुआ था। उनका पूरा नाम चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन था।

उनके पिता का नाम राबर्ट डार्विन था जोकि एक जाने -माने डॉक्टर थे

1839 में Charles Darwin ने जोशिया वैजबुड से विवाह कर लिया ।

चार्ल्स डार्विन की शिक्षा

Charles Darwin ने प्रारंभिक शिक्षा के लिए एक इसाई मिशनरी स्कूल में दाखिल करवाया गया था।

डार्विन के पिता उन्हें डॉक्टर बनाना चाहते थे इसलिए वो डार्विन को अपने साथ रखने लगे और डॉक्टर बनने की ट्रेनिंग देने लगे।

1825 ईसवी में जब डार्विन 16 साल के थे तो उन्हें एडिनबर्घ की मेडिकल युनिर्वसिटी में दाखिल करवाया गया।

चार्ल्स डार्विन को मेडिकल में कोई ज्यादा रूचि नहीं थी। वो हमेशा प्रकृति का इतिहास जानने की कोशिश करते रहते।

विविध पौधों के नाम जानने की कोशिश करते रहते और पौधों के टुकडो को भी जमा करते।

एडिनबर्ग युनिर्वसिटी के बाद डार्विन को 1927 में क्राइस्ट कॉलेज में दाखिल करवाया गया ताकि वो मेडिकल की आगे की पढ़ाई पूरी कर सके। पर यहां भी उनका मन मेडिकल में कम और प्राकृतिक विज्ञान में ज्यादा लगा रहता।

क्राइस्ट कॉलेज में रहने के दौरान डार्विन ने प्रकृति विज्ञान के कोर्स को भी दाखिला ले लिया।

प्रकृति विज्ञान की साधारण अंतिम परीक्षा में वे 178 विद्यार्थियों में से दसवे नंबर पर आये थे। मई, 1931 तक वो क्राइस्ट कॉलेज में ही रहे।

प्रकृति विज्ञान में उनकी रूचि (Charles Darwin As a Natural Science) :

यूनिवर्सिटी में वे हमेशा ही प्रकृति का इतिहास जानने की कोशिश करते रहते। विविध पौधों के नाम जानने की कोशिश करते रहते और पौधों के टुकडो को भी जमा करते। ऐसा करते-करते प्रकृतिविज्ञान में उनकी रूचि बढती गयी और धीरे-धीरे उन्होंने प्रकृति की जानकारी इकट्टा करना शुरू किया। बाद में उन्होंने पौधों के विभाजन की जानकारी प्राप्त करना भी शुरू किया।

जब उनके पिता ने उन्हें कैम्ब्रिज के च्रिस्ट कॉलेज में मेडिकल की पढाई के लिये भेजा तब उन्होंने मेडिकल में अपना ध्यान देने की बजाये वे लेक्चर छोड़कर पौधों की जानकारी हासिल करने लगते।

इसके बाद वे बॉटनी के प्रोफेसर जॉन स्टीवन के अच्छे दोस्त बन गये और उनके साथ उन्होंने प्रकृतिविज्ञान के वैज्ञानिको से भी मुलाकात की। Charles Darwin Biography in Hindi

1831 तक डार्विन कैम्ब्रिज में ही रहे थे। वहा उन्होंने पाले की नेचुरल टेक्नोलॉजी का अभ्यास किया और अपने लेखो को भी प्रकाशित किया। उन्होंने प्रकृति के कृत्रिम विभाजन और विविधिकरण का भी वर्णन किया था। प्रकृति से संबंधित जानकारी हासिल करने के लिये उन्होंने कई साल वैज्ञानिक यात्रा भी की थी।

"एक वैज्ञानिक इंसान की कोई इच्छा नही होती, कोई आकर्षण नही होता – केवल पत्थरो का एक दिल होता है।"

1930 से 1950 तक कयी वैज्ञानिको ने जीवन चक्र को बताने की कोशिश की लेकिन उन्हें सफलता नही मिल पायी। लेकिन डार्विन ने सुचारू रूप से वैज्ञानिक तरीके से जीवन विज्ञान में जीवन में समय के साथ-साथ होने वाले बदलाव को बताया था।

1859 में डार्विन ने अपनी किताब "ऑन दी ओरिजिन ऑफ़ स्पिसेस" में मानवी विकास की प्रजातियों का विस्तृत वर्णन भी किया था। 1870 से वैज्ञानिक समाज और साथ ही साधारण मनुष्यों ने भी उनकी इस व्याख्या को मानना शुरू किया।

"सबसे अच्छी संस्कृति वही होती है जिसमे हम अपने विचारो को नियंत्रित कर सकते है "मुझे मूर्खो के एक्सपेरिमेंट पसंद है। क्योकि मै ही उन्हें हमेशा बनाता हूँ।"

भूवैज्ञानिक के रूप में (Charles Darwin As a Geologist)

बाद में 5 साल तक HMS बीगलआ में जलयात्रा करने के बाद उन्होंने स्वयं को भूवैज्ञानिक के रूप में स्थापित किया और साथ ही चलेस ल्येल की एकसमानता की योजना पर उन्होंने अपना लेख भी प्रस्तुत किया था और उनके इसी लेख की वजह से वे एक प्रसिद्ध लेखक भी बन गये थे। लेकिन जीव विज्ञान पर पुरी तरह से खोज करने के लिये उन्हें थोड़े समय की जरुरत थी।

जब अल्फ्रेड रुस्सेल वल्लास ने उन्हें समान विचारो पर अपना निबंध भेजा तभी 1858 में उन्होंने अपनी व्याख्या लिखी, जिसमे दोनों के सह-प्रकाशन से उन्होंने दोनों व्याख्याओ को प्रस्तुत किया था। डार्विन की प्रकृति से संबंधित व्याख्या के बाद प्रकृति में होने वाले विविधिकरण को लोग आसानी से जान पाये थे।

1868 में चार्ल्स डार्विन ने दूसरी पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक का नाम था "द वेरीएशन ऑफ एनीमल्स एंड प्लॅंट्स दॉमेस्तिकेशन" इस पुस्तक मे दर्शाया गया था की गिने-चुने जंतुओं का चयन करके कबूतरों, कुत्तों और दूसरे जानवरों की कई नस्ले पैदा की जा सकती है। इस प्रकार नए पेड़-पौधों की भी नई नस्ले पैदा की जा सकती है।

1871 में उन्होंने मानवी प्रजातियों और उनके लैंगिक चुनाव की भी जाँच की। पौधों पर की गयी उनकी खोज को बहुत सी किताबो में प्रकाशित भी किया गया था। उनकी अंतिम किताब में सब्जियों में फफूंद के निर्माण की क्रिया का वर्णन था, चार्ल्स डार्विन ने मानवी इतिहास के सबसे प्रभावशाली भाग की व्याख्या दी थी और इसी वजह से उन्हें कयी पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया था।

उन्होंने पौधों के फफूंद और वर्म की क्रिया से संबंधित बहुत से प्रभावशाली कार्य किये है। इसके साथ ही उन्हूने मानवी विकास और बदलाव को लेकर भी बहुत से प्रभावशाली कार्य की है, जिसकी सभी ने सराहना और प्रशंसा भी की है।

"किसी भी महान से महान कार्य की शुरुवात हम से ही होती है और कार्य करते समय हमारा काम में बने रहना बहुत जरुरी है।"

24 नवम्बर 1859 को प्रकाशित उनकी "The Origin of Species" पुस्तक के 1250 प्रतियों के संस्करण के ही दिन बिक गये। सभी वैज्ञानिकों, दार्शनिको, विचारको ने इसी स्वीकार किया। डार्विन अपने रोग और कष्ट को छिपाकर भी काम के लिए समर्पित रहते थे।

चार्ल्स डार्विन का करियर

बीगल पर विश्व भ्रमण हेतु अपनी समुद्री-यात्रा को वे अपने जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना मानते थे जिसने उनके व्यवसाय को सुनिश्चित किया।

समुद्री-यात्रा के बारे में उनके प्रकाशनों तथा उनके नमूने इस्तेमाल करने वाले प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के कारण, उन्हें लंदन की वैज्ञानिक सोसाइटी में प्रवेश पाने का अवसर प्राप्त हुआ।

अपने करियर के शुरुआत में  डार्विन ने प्रजातियों के जीवाश्म सहित बर्नाकल (विशेष हंस) के अध्ययन में आठ वर्ष व्यतीत किए।

उन्होंने 1851 तथा 1854 में दो खंडों के जोङों में बर्नाकल के बारे में पहला सुनिश्चित वर्गीकरण विज्ञान का अध्ययन प्रस्तुत किया। इसका अभी भी उपयोग किया जाता है।

चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन ने एच. एम. एस. बीगल की यात्रा के 20 साल बाद तक कई पौधों और जीवों की प्रजातियां का अध्ययन किया और 1858 में दुनिया के सामने ‘क्रमविकास का सिद्धांत’ दिया।

चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन को प्रजातियों के विकास की नयी अवधारणाओं के जनक के रूप में जाना जाता है।

संचार डार्विन के शोध का केन्द्र-बिन्दु था। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक जीवजाति का उद्भव (Origin of Species (हिंदी में – ‘ऑरिजिन ऑफ स्पीसीज़’) प्रजातियों की उत्पत्ति सामान्य पाठकों पर केंद्रित थी।

डार्विन चाहते थे कि उनका सिद्धान्त यथासम्भव व्यापक रूप से प्रसारित हो।

डार्विन के विकास के सिद्धान्त से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि किस प्रकार विभिन्न प्रजातियां एक दूसरे के साथ जुङी हुई हैं।

उदाहरणतः वैज्ञानिक यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि रूस की बैकाल झील में प्रजातियों की विविधता कैसे विकसित हुई।

पत्राचार

कई वर्षों के दौरान जिसमें उन्होंने अपने सिद्धान्त को परिष्कृत किया, डार्विन ने अपने अधिकांश साक्ष्य विशेषज्ञों के लम्बे पत्राचार से प्राप्त किया।

डार्विन का मानना था कि वे प्रायः किसी से चीजों को सीख सकते हैं और वे विभिन्न विशेषज्ञों, जैसे, कैम्ब्रिज के प्रोफेसर से लेकर सुअर-पालकों तक से अपने विचारों का आदान-प्रदान करते थे।

पुस्तक

1859 में डार्विन ने अपनी पहली किताब “ऑन दी ओरिजिन ऑफ़ स्पिसेस” में मानवी विकास की प्रजातियों का विस्तृत वर्णन भी किया था।

1868 में चार्ल्स डार्विन ने दूसरी पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक का नाम था ‘द वेरीएशन ऑफ एनीमल्स एंड प्लॅंट्स दॉमेस्तिकेशन’ इस पुस्तक मे दर्शाया गया था की गिने-चुने जंतुओं का चयन करके कबूतरों, कुत्तों और दूसरे जानवरों की कई नस्ले पैदा की जा सकती है। इस प्रकार नए पेड़-पौधों की भी नई नस्ले पैदा की जा सकती है।

क्रमविकास का सिद्धांत :

  • विशेष प्रकार की कई प्रजातियों के पौधे पहले एक ही जैसे होते थे, पर संसार में अलग अलग जगह की भुगौलिक प्रस्थितियों के कारण उनकी रचना में परिवर्तन होता गया जिससे उस एक जाति की कई प्रजातियां बन गई।
    • पौधों की तरह जीवों का भी यही हाल है, मनुष्य के पूर्वज किसी समय बंदर हुआ करते थे, पर कुछ बंदर अलग से विशेष तरह से रहने लगे और धीरे – धीरे जरूरतों के कारण उनका विकास होता गया और वो मनुष्य बन गए।

पुरस्कार

  • रॉयल मेडल (1853)
  • वोलस्टन मेडल (1859)
  • कोप्ले मेडल (1864)

चार्ल्स डार्विन कि मृत्यु

1882 में एनजाइना पेक्टोरिस की बीमारी की वजह से दिल में सक्रमण फैलने के बाद उनकी मृत्यु हो गयी थी। सूत्रों के अनुसार एनजाइना अटैक और ह्रदय का बंद पड़ना ही उनकी मृत्यु का कारण बना।

19 अप्रैल 1882 को उनकी मृत्यु हुई थी। अपने परिवार के लिये उनके अंतिम शब्द थे:

“मुझे मृत्यु से जरा भी डर नही है – तुम्हारे रूप में मेरे पास एक सुंदर पत्नी है – और मेरे बच्चो को भी बताओ की वे मेरे लिये कितने अच्छे है।”

उन्होंने अपनी इच्छा व्यतीत की थी उनकी मृत्यु के बाद उन्हें मैरी चर्चयार्ड में दफनाया जाये लेकिन डार्विन बंधुओ की प्रार्थना के बाद प्रेसिडेंट ऑफ़ रॉयल सोसाइटी ने उन्हें वेस्टमिनिस्टर ऐबी से सम्मानित भी किया। इसके बाद उन्होंने अपनी सेवा कर रही नर्सो का भी शुक्रियादा किया। और अपने अंतिम समय में साथ रहने के लिये परिवारजनों का भी शुक्रियादा किया।

उनकी अंतिम यात्रा 26 अप्रैल को हुई थी जिसमे लाखो लोग, उनके सहकर्मी और उनके सह वैज्ञानिक, दर्शनशास्त्री और शिक्षक भी मौजूद थे।

चार्ल्स डार्विन के कार्य – Charles Darwin Work

चार्ल्स डार्विन एक बहुफलदायक लेखक थे। उनकी जाँच का प्रकाशन ना होने के बावजूद उन्होंने बहुत सी प्रतिभा हासिल कर ली थी। उन्होंने पौधों के विकास और विविधिकरण से संबंधित बहुत से कार्य किये थे। उन्होंने पौधों की ताकत और उनके विकास से संबंधित कयी किताबे भी प्रकाशित की है। और देश-विदेश के बहुत से वैज्ञानिको और साधारण लोगो ने उनकी इन किताबो का सम्मान भी किया और उन्हें इसके लिए बहुत से पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया।

उन्होंने पौधों के फफूंद और वर्म की क्रिया से संबंधित बहुत से प्रभावशाली कार्य किये है। इसके साथ ही उन्हूने मानवी विकास और बदलाव को लेकर भी बहुत से प्रभावशाली कार्य की है, जिसकी सभी ने सराहना और प्रशंसा भी की है।

चार्ल्स डार्विन सुविचार – Charles Darwin Quotes

“सबसे अच्छी संस्कृति वही होती है जिसमे हम अपने विचारो को नियंत्रित कर सकते है।”

“मुझे मूर्खो के एक्सपेरिमेंट पसंद है। क्योकि मै ही उन्हें हमेशा बनाता हूँ।”

“एक वैज्ञानिक इंसान की कोई इच्छा नही होती, कोई आकर्षण नही होता – केवल पत्थरो का एक दिल होता है।”

“गरीब की गरीबी प्रकृति के नियम के कारण नही आती बल्कि हमारी ही संस्था से आती है, और वह हमारे पाप ही होते है।”

“किसी भी महान से महान कार्य की शुरुवात हम से ही होती है और कार्य करते समय हमारा काम में बने रहना बहुत जरुरी है।”

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Thu, 20 Mar 2025 10:20:13 +0530 Jaankari Rakho
एडोल्फ हिटलर जीवन परिचय | Adolf Hitler Biography In Hindi https://m.jaankarirakho.com/10 https://m.jaankarirakho.com/10 एडोल्फ हिटलर का जन्म 20 अप्रैल, 1889 को ऑस्ट्रो-जर्मन फ्रंटियर के पास एक छोटे से ऑस्ट्रियाई शहर ब्रूनो इन में हुआ था. युवा एडोल्फ ने अपना अधिकांश बचपन 'लिंज़' में (ऊपरी ऑस्ट्रिया की राजधानी) में बिताया था. हिटलर ने 30 अप्रैल 1945 को बर्लिन में जमीन से 50 फुट नीचे एक बंकर में खुद को गोली मारकर अपनी पत्नी इवा ब्राउन के साथ आत्महत्या कर ली थी.

एडोल्फ हिटलर जीवन परिचय ( Adolf Hitler Biography)

एडोल्फ हिटलर के जीवन परिचय के बारे में निम्न सूची के आधार पर दर्शाया गया है-

क्र.. जीवन परिचय बिंदु जीवन परिचय
1. पूरा नाम एडोल्फ हिटलर
2. जन्म 20 अप्रैल सन 1889
3. जन्म स्थान ब्रौनौ ऍम इन्, ऑस्ट्रिया – हंगरी
4. राष्ट्रीयता जर्मनी
5. प्रसिद्ध नाज़ी अध्यक्ष, जर्मन तानाशाह और जर्मनी के चांसलर
6. राजनीतिक विचारधारा नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी (1921 – 1945)
7. पिता एलोईस हिटलर
8. माता क्लारा हिटलर
9. भाई – बहन गस्तव, इदा
10. पत्नी ईवा ब्राउन

आरंभिक जीवन:

हिटलर का जन्म 20 अप्रैल 1889 को ऑस्ट्रिया के हंगरी नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम एलोईस हिटलर और माता का नाम  क्लारा हिटलर था। इनका पूरा नाम एडोल्फ हिटलर था. एडोल्फ़ अपने माता पिता की चौथी संतान थी। हिटलर के माता-पिता के 6 बच्चे हुए थे जिनमें से इनके तीन भाई-बहनों-गस्ताव, ईदा और ऑटो की बचपन में ही मृत्यु हो गई थी। एडोल्फ जब केवल 3 साल के थे तब उनका परिवार ऑस्ट्रेलिया से जर्मनी में जाकर रहने लगा।

एडोल्फ हिटलर बहुत ही होशियार थे और वे अपने स्कूल में बहुत ही प्रसिद्ध थे।  एडोल्फ हिटलर की रुचि फाइन कला में थी लेकिन उनके पिता को यह पसंद नहीं था वे चाहते थे कि एडोल्फ टेक्निकल स्कूल में प्रवेश करें।  एडोल्फ के पिता ने उन्हें सितंबर 1900 में लिंज में रेअल्स्चुयल में भेज दिया।
जिसके कारण उन्हें अपनी फाइन कला रुचि को खत्म कर अपने पिता के साथ झगड़ा करना पड़ा। एडोल्फ हिटलर अपने पिता के प्रभाव के साथ एक बैरागी, असंतुष्ट और एक क्रोधित बच्चे बन गए।

1903 में उनके पिता की अचानक मृत्यु हो गई। हिटलर की माता कैंसर से पीड़ित थे और वह अपने माता के बहुत ज्यादा करीब थे।  हिटलर की उस स्कूल में रुचि ना होने के कारण उनका स्कूल में प्रदर्शन खराब रहा, जिसके कारण उनकी माता ने उन्हें वह स्कूल छोड़ने के लिए अनुमति दे दी।

सितंबर 1904 में हिटलर ने रेअल्स्चुयल में प्रवेश किया और उनकी प्रगति होती चली गई उस समय वह केवल 16 वर्ष के थे। इसके बाद एडोल्फ हिटलर ने 4 साल में बिताए और फिर 1905 में उन्होंने अपना स्कूल पूरा किया और अपने पेंटर बनने के सपने को पूरा करने के लिए लिंज से विएना चले आए. यहां पर उन्हों ने फाइन कला की विनर्स अकैडमी में प्रवेश करने की कोशिश की और दो बार मना कर दिया गया। कला विश्वविद्यालय  में प्रवेश ना हो पाने के कारण व पोस्ट कार्डों पर चित्र बनाकर अपना जीवन यापन करने लगे.

एडोल्फ हिटलर का व्यक्तिगत जीवन

एडोल्फ हिटलर को बचपन से ही पढ़ने से ज्यादा पेंटिंग का बहुत शौक था. वे फ़ाईन कला में माहिर थे. वे बहुत सी बीमारियों से ग्रस्त रहते थे. सन 1929 में उनकी मुलाकात ईवा ब्राउन से हुई, और धीरे – धीरे उनके बीच नजदीकियां बढ़ने लगी और 29 अप्रैल सन 1945 को उन्होंने शादी कर ली. सन 1937 में हिटलर ने नशा करना शुरू किया और सन 1942 तक इसकी उन्हें बहुत बुरी लत लग चुकी थी कि वे रोजाना नशा करने लगे थे. जब हिटलर की युद्ध में हार होने लगी तब उन्हें अपनी मौत का डर था. रूसी सेना लगभग उनके करीब पहुँचने लगी थी तब उन्होंने अपनी मौत के कुछ घंटों पहले ईवा ब्राउन से शादी की और अपनी पत्नी ईवा ब्राउन के साथ जहर खा कर आत्महत्या कर ली. उनकी इच्छा थी की मरने के बाद उनका शव जला दिया जाए. इसलिए उनकी मृत्यु के बाद उनका शव बगीचे में ले जा कर जला दिया गया, और इस तरह वे इस दुनिया से चले गए.

एडोल्फ हिटलर की राजनीतिक शुरुआत (Hitler political career) –

युद्ध समाप्त होने के बाद सन 1919 की गर्मियों में हिटलर को एक साहसिक सैनिक जिनका नाम ‘एर्न्स्ट रोएह्म’ था और वे वहाँ फ़ौजी थे, की मदद से म्युनिक में सेना में एक राजनीतिक अधिकारी के रूप में रोजगार मिला, और यहीं से इनके राजनीतिक कैरियर की शुरुआत हुई. सितम्बर सन 1919 में हिटलर ने तथाकथित जर्मन वर्कर्स पार्टी, राष्ट्रवादी, विरोधी सेमेटिक और समाजवादी समूह की बैठक में भाग लिया. उन्होंने जल्द ही इस पार्टी के सबसे लोकप्रिय, प्रभावशाली वक्ता और प्रचारक के रूप में खुद को प्रतिष्ठित किया, और सन 1921 से कुछ 6 हजार नाटकीय रूप से अपनी सदस्यता बढ़ाने में लग गए. उसी साल अप्रैल में वे राष्ट्रीय सामाजिक जर्मन वर्कर्स पार्टी के नेता बन गए, इस पार्टी का ओफिसिअली नाम नाज़ी पार्टी था.

हिटलर ने बाद के वर्षों में खराब आर्थिक स्तिथि को हटाकर पार्टी में तेजी से विकास के लिए योगदान दिया. सन 1923 के अंत में हिटलर बवेरियन और जर्मन राजनीती में एक मजबूत ताकत के रूप में कुछ 56 हजार सदस्यों, कई और समर्थकों के साथ सामने आये. हिटलर ने बर्लिन सरकार की खुद की पराजय के लिए और संकट की स्थिति का उपयोग करने के लिए आशा व्यक्त की. इस उद्देश्य के लिए उन्होंने नवंबर 8-9 सन 1923 के नाज़ी बीयर हॉल क्रांति का मंचन किया, जिसके द्वारा उन्होंने रूढ़िवादी – राष्ट्रवादी बवेरियन सरकार को “बर्लिन पर मार्च” में उनका सहयोग करने के लिए मजबूर किया. हालांकि यह कोशिश नाकामियाब रहीं.

हिटलर ने देशद्रोह करने की भी कोशिश की, और इसके लिए उन्हें लैंडस्बर्ग के पुराने किले में एक साल के कारावास की बजाय हल्की सजा दी गई. कुछ समय पश्चात उन्हें रिहा कर दिया गया. अपनी रिहाई के बाद हिटलर ने ईमानदार फ़ॉल्लोवर के एक समूह के आसपास ही पार्टी का पुनर्गठन किया जोकि नाजी आन्दोलन और राज्य का केंद्र बने रहने के लिए था. उन्होंने कई सारे राज्यों को अपनी तरफ कर लिया, इस तरह उनकी ताकत बढ़ती चली गई और उनका राजनीतिक कैरियर चलता रहा.

एडोल्फ हिटलर प्रारंभिक एंटी – सेमिटिक विचार

दिसंबर सन 1907 में इनकी माता क्लारा हिटलर का निधन हो गया और एडोल्फ हिटलर के परिवार को बहुत बड़ा झटका लगा, और उन्हें बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ा. वे कुछ सालों के लिए अपने घर से दूर चले गए और हॉस्टल में रहने लगे. उन्होंने पैसे कमाने के लिए अपनी कलाकृतियों को बेच कर अपनी जीविका का छोटा सा साधन बना लिया. कहा जाता है कि उस समय विएना में प्रचलित नस्लीय (Racial) और धार्मिक पूर्वाग्रह (Prejudice) से हिटलर में सेमेटिक विरोधी के बीज बोये गए. यह भी माना जाता है कि युवा हिटलर ने ऑस्ट्रिया – हंगरी के अधिकार की निंदा करते हुए जर्मन राष्ट्रवाद में एक प्रारंभिक रुचि दिखाई, यह राष्ट्रवाद बाद में हिटलर की संरचनाओं की नीति में प्रमुख भूमिका अदा कर सकता था. वे विएना में अपने इन सालों के दौरान ‘अनंत यहूदी’ प्रतीक पर विचार करने के लिए भी सक्षम थे. उन्होंने इस पर विश्वास करना भी शुरू कर दिया कि यहूदी, सभी अराजकता (Chaos), भ्रष्टाचार एवं नैतिकता में विस्मृति (Obliteration), राजनीती और अर्थव्यवस्था के मूल कारण थे.

प्रथम विश्व युद्ध

हिटलर साम्यवादीयों और यहूदियों से घृणा करने लगे। जब प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हुआ तो वह सेना में भर्ती हो गए और फ्रांस में कई लड़ाई हो में उन्होंने भाग लिया। युद्ध में घायल होने के कारण 1918 में वे कई दिनों तक अस्पताल में रहे। जर्मनी की पराजय को उनको बहुत गहरा दुख हुआ।

1918 में एडोल्फ हिटलर ने नाजी दल की स्थापना की। इसका उद्देश्य सामने साम्यवादियों और यहूदियों से सब अधिकार छीनना था।  इस दल के सदस्यों में देशप्रेम की भावना को कूट-कूट कर भरा था। नाजी दल के लोगों ने विरोधियों को प्रथम विश्व युद्ध की हार के लिए दोषी ठहराया। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण जब नाजी दल के नेता हिटलर ने अपने ओजस्वी भाषणों में उसे ठीक करने का आश्वासन दिया तो अनेक जर्मनी लोग इस दल के सदस्य बन गए।

हिटलर ने भूमि सुधार करने बर्साई संधि को समाप्त करने और एक विशाल जर्मन साम्राज्य की स्थापना करने का लक्ष्य जनता के सामने रखा जिसके कारण जर्मन लोग सुख से रह सके। 1922 में हिटलर एक प्रभावशाली व्यक्ति बन गए। उन्हें स्वस्तिक को अपने दल का चिन्ह बनाया जो कि हिंदुओं का शुभ चिन्ह माना जाता है।

1923 में हिटलर ने जर्मन सरकार को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया लेकिन वे इसमें असफल रहे और उन्हें जेल में रहना पड़ा।  जेल में एडोल्फ हिटलर ने मीन कैम्फ (” मेरा संघर्ष”) नामक अपनी आत्मकथा लिखी। इसमें उन्होंने नाजी दल के सिद्धांतों का विवेचन की,और उन्होंने लिखा ‘कि आर्य जाति सभी जातियों से श्रेष्ठ है जो जर्मन आर्य है उन्हें विश्व का नेतृत्व करना चाहिए यहूदी सदा से संस्कृति में रोड़ा अटकाते आए हैं’ जर्मन लोगों को सम्राज्य विस्तार का पूर्ण अधिकार है और रूस से लड़ कर उन्हें जीवित रहने के लिए भूमि प्राप्त करनी चाहिए।

  • 1930-32 में जर्मनी में बेरोजगारी बहुत ज्यादा बढ़ गई। संसद में नाजी दल के सदस्यों की संख्या 230 हो गई।
  • 1932 के चुनाव में हिटलर को राष्ट्रपति के चुनाव में असफलता मिली। जर्मनी की आर्थिक दशा और भी ज्यादा बिगड़ती गई और विदेशों में उससे सैनिक शक्ति बढ़ाने की अनुमति  दी ।
  • 1933 में चांसलर बनते हिटलर ने जर्मन संसद को भंग कर दिया और साम्राज्यवादी दल को गैरकानूनी घोषित कर दिया। राष्ट्र को स्वावलंबी बनने के लिए ललकारा।
  • हिटलर ने डॉक्टर जोजेफ गोएबल्स को अपना प्रचार मंत्री नियुक्त किया। नाजी दल के विरोधी व्यक्तियों को जेल खाने में डाला और कार्यकारिणी और कानून बनाने वाली सारी शक्तियां हिटलर ने अपने हाथों में ले ली।
  • 1920 में हेलो हिटलर ने अपने आप को सर्वोच्च न्यायाधीश घोषित कर दिया।  उसी वर्ष हिडनबर्ग की मृत्यु के पश्चात में राष्ट्रपति भी बन गए। इसके बाद नाजी दल का आंतक जन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छा गया।
  • 1933 से 1938 तक लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई। नौजवानों में राष्ट्रपति के आदेशों को पूर्ण रूप से मानने की भावना भर दी गई और जर्मन जाति का भाग्य सुधारने के लिए हिटलर ने सारी शक्ति अपने हाथ में ले ली।
  • एडोल्फ हिटलर ने 1933 में राष्ट्र संघ को छोड़ दिया और भाभी युद्ध को ध्यान में रखते हुए जर्मनी की सैन्य शक्ति को बढ़ाना शुरू कर दिया। उसी वर्ष ऑस्ट्रिया के नाजी दल ने वहां के चांसलर डॉलफस को मार दिया।

एडोल्फ हिटलर का द्वितीय विश्व युद्ध और युद्ध अपराध

1 सितम्बर सन 1939 में यूरोप को नियंत्रित करने के लिए हिटलर ने द्वितीय विश्व युद्ध की शुरूआत की. वे पुरे ब्रिटेन में अपना अधिकार जमाना चाहते थे इसके लिए कई राज्यों से उन्होंने संधि की और कई राज्यों को अपने वश में कर लिया. युद्ध से पहले उन्होंने सन 1937 में इटली से संधि की और उसके बाद ऑस्ट्रेलिया पर अपना अधिकार जमा लिया. फिर हिटलर ने रूस से संधि कर ली और पौलेंड के पूर्वी भाग को रूस के नाम कर दिया और धीरे – धीरे पश्चिमी भाग पर भी अपना अधिकार कर लिया. इस तरह उन्होंने एक के बाद एक कई राज्यों में अपना अधिपत्य जमा लिया और युद्ध की शुरूआत हो गई. इसके बाद फ्रांस की हार के बाद मुसोलिनी से संधि कर रूस पर भी अपना अधिकार जमाने का विचार किया और उस पर आक्रमण कर दिया.

इस विश्व युद्ध में हिटलर का सबसे बड़ा अपराध यह था कि वे अपना अधिपत्य पुरे विश्व में जमाना चाहते थे. उन्हें इस विश्व युद्ध के छिड़ने का सबसे बड़ा कारण माना जा सकता है, क्यूकि इस युद्ध में कई सारे लोग मारे गए और कईयों के घर बर्बाद हो गए. हिटलर बहुत ही क्रूर व्यक्ति था उसे किसी का भय नहीं था. हिटलर की युद्ध में सबसे बड़ी हार तब हुई जब कुछ समय बाद अमेरिका इस युद्ध में शामिल हो गया. इससे हिटलर की नीति डामा डोल होने लगी, क्यूकि उनके खिलाफ षड्यंत्र रचे जाने लगे, और उनकी इस युद्ध में हार हो गई.

एडोल्फ हिटलर के राज्यों का पतन

जैसे – जैसे युद्ध आगे बढ़ता रहा, हिटलर के युद्ध के दौरान आतंक कम होने लगा और उनकी जीत हार में परिवर्तित होने लगी. उनके युद्ध के प्रयास विफल होते चले गए, उन्होंने अपने सैन्य सलाहकारों से सलाह को सुनना इंकार कर दिया. कुछ समय बाद उन्हें पूरी तरह से युद्ध में असफलता मिलने लगी. उनके खिलाफ षड्यंत्र रचने से उनकी ताकत कम होने लगी. उन्होंने जिन – जिन राज्यों में अपना अधिपत्य जमाया था वे उनके हाथ से निकलते चले गए. इस तरह उनकी हार के साथ – साथ जर्मनी की भी हार होती चली गई. उनको यह सब सहन ना हुआ और वे हताश होते हुए बर्लिन में अपनी हार के अंतिम चरण में प्रवेश किये. जब रूस ने बर्लिन पर आक्रमण किया, तब उनकी पूरी तरह से हार हो गई. उन्होंने 30 अप्रैल सन 1945 की देर रात को आत्महत्या कर ली और वे इस दुनिया से विदा ले गए.

रोचक तथ्य :

• आस्ट्रिया में 20 अप्रैल, 1889 में जन्मे जर्मन तानाशाह हिटलर कभी अच्छी पढ़ाई नहीं कर पाया। वह कभी कॉलेज नहीं गये।
• बचपन में अडोल्फ हिटलर पादरी बनने का सपना देखा करता थे। सिर्फ चार साल की उम्र में एक पादरी ने ही हिटलर को डूबने से बचाया था।
• “माँ, तुम मुझे छोडकर क्यों चली गईं माँ…तुम्हें पता है मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ….अब मैं तुम्हारे बिना कैसे जिऊंगा माँ…. तूने बहुत दुख झेले हैं माँ…. मैं भी तुझे कोई सुख नहीं दे पाया… अब तू चैन से सो जा माँ…. सुनसान कब्रिस्तान में एक ताज़ी कब्र के पास बैठकर फूट-फूटकर रोता हुआ यह 18 साल का लड़का हिटलर था.
• 1936 में जब Germany में Olympic हुए थे तब भारत का मुकाबला जर्मनी से हुआ जिसमें हॉकी के जादुगर Major Dhyanchand की वजह से भारत ने जर्मनी को 8-1 से पटखनी दी थी. इस मैच को हिटलर भी देख रहा था और उसने मेजर ध्यानचंद के खेल से प्रभावित होकर उन्हें अपनी सेना में उच्च पद देने ओर जर्मनी की तरफ से खेलने की पेशकश दी. मगर देशभक्त मेजर ध्यानचंद ने यह पेशकश मुस्कुराते हुए ठुकरा दी.
• आधुनिक इतिहास में हिटलर वह पहला इंसान था जिसने धूम्रपान विरोधी अभियान का आगाज किया।
• इतना कत्लेआम मचाने के बाद भी हिटलर शुद्ध रूप से शाकाहारी था। इतना ही नहीं, उसने पशु क्रूरता के खिलाफ एक कानून भी बना दिया।
• हिटलर की जाती नीति के कारण लगभग 1करोड़ 10 लाख लोगो की मौत हुई थी. दुसरे विश्व युद्ध के कारण लगभग 6 करोड़ लोगो ने अपनी जान गवाई थी.
• हिटलर, ‘Charlie Chaplin’ का बहुत बड़ा प्रशंसक था. चार्ली चैपलिन की मूंछे उसे भा गईं और इस लिए हिटलर भी उन्ही की तरह मूंछे रखने लगा. हिटलर की मूंछो को ‘टुथब्रश मुछें’ कहा जाता है.

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Thu, 20 Mar 2025 10:19:40 +0530 Jaankari Rakho
जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर की जीवनी और इतिहास https://m.jaankarirakho.com/12 https://m.jaankarirakho.com/12 अकबर मुगल राजवंश के सबसे शक्तिशाली सम्राटों में से एक था। वह एक महान मुस्लिम शासक था जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश हिस्सों में विस्तार करते हुए एक बड़ा साम्राज्य बनाया।

13 वर्ष की आयु से, जब उन्होंने मुगल साम्राज्य की बागडोर संभाली, तो उन्होंने उत्तरी, पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों, विशेष रूप से पंजाब, दिल्ली, आगरा, राजपूताना, गुजरात, बंगाल, काबुल, पर विजय प्राप्त की और राज्य और उपमहाद्वीप पर कब्जा कर लिया।

कंधार, और बलूचिस्तान। उनके विजय के बाद अधिकांश भारत उनके नियंत्रण में आ गया। अनपढ़ होने के बावजूद, उनके पास लगभग सभी विषयों में असाधारण ज्ञान था।

उन्होंने अपने गैर-मुस्लिम विषयों से सम्मान अर्जित किया, मुख्यतः उनकी नीतियों के अपनाने के कारण जिन्होंने उनके विविध साम्राज्य में एक शांतिपूर्ण माहौल बनाया।

उन्होंने कराधान प्रणालियों को भी फिर से संगठित किया, अपनी सेना को मनसबदारी प्रणाली के बाद विभाजित किया, और पश्चिम के साथ विदेशी संबंध स्थापित किए।

कला और संस्कृति के संरक्षक होने के नाते, उन्होंने विभिन्न भाषाओं में कई साहित्यिक पुस्तकें लिखीं और अपने शासनकाल के दौरान कई स्थापत्य कला कृतियों का निर्माण किया

 जैसे कि आगरा किला, बुलंद दरवाजा, फतेहपुर सीकरी, हुमायूं मकबरा, इलाहाबाद किला, लाहौर किला, और सिकंदर का अपना मकबरा।

यहां तक ​​कि उन्होंने विभिन्न धर्मों के तत्वों को प्राप्त करके ‘दीन-ए-इलाही’ नामक एक नया संप्रदाय शुरू किया।

बिन्दू जानकारी
पूरा नाम जलाल उद्दी मोहम्मद अकबर
पिता का नाम नसीरुद्दीन हुमायूँ 
माता का नाम हमीदा बानो
जन्म स्थान  अमरकोट पाकिस्तान
वंशज तैमूर वंश
उपाधियां अकबर-ए आज़म, शहंशाह अकबर

अकबर का जन्म कब हुआ था?

अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 ईसवी को सिंध में स्थित राजपूत शासक राणा अमरसाल के महल उमेरकोट में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि अकबर का जन्म पूर्णिमा के दिन में हुआ था, जिस वजह से उनके पिता ने उनका नाम बदरुद्दीन मोहम्मद अकबर रख दिया था।

अकबर के जन्म के बाद उनके पिता हुमायूं ने इन्हें देश से बाहर निकाल दिया था और इसीलिए अकबर अपने पिता से दूर होकर अपने चाचा के यहां अफगानिस्तान चला गया। इतिहास के स्रोतों के अनुसार जब हुमायूं द्वारा काबुल जीत लिया गया था तब हुमायूं ने अकबर को बुरी नज़र से बचाने के लिए अकबर के पैदा होने की तारीख को भी बदल दिया था।

अकबर का प्रारंभिक जीवन

अकबर का जन्म तैमूर राजवंश के तीसरे शासक के रूप में हुआ था। अकबर को कई अलग-अलग उपाधियों से भी जाना जाता है, जिसमें “अकबर-ए आज़म, शहंशाह अकबर, महाबली शहंशाह” इत्यादि प्रमुख है।

अकबर के पिता का नाम नसीरुद्दीन हुमायूँ एवं उनके दादा का नाम जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर था। अकबर की माता का नाम हमीदा बनो था। अकबर को चंगेज खां का वंशज माना जाता है।

अकबर एक ऐसा राजा था, जिसे हिन्दू और मुस्लिम दोनों वर्गो से काफी प्यार मिला था। अकबर ने हिन्दू और मुस्लिम वर्ग के बीच की दूरियों को कम करने के लिए “दीन-ए-इलाही” नामक एक ग्रंथ की भी रचना की थी। अकबर का दरबार राज्य की जनता के लिए हमेशा खुला रहता था।

अकबर जब शासक बना था तो उस समय अकबर की आयु केवल 13 वर्ष की ही थी। एक सम्राट के रूप में अकबर ने राजपुताने के राजाओं से राजनीतिक और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये थे।

अकबर का बचपन

अकबर के बचपन की बात करें तो उनका बचपन उनके चाचा के यहां बिता था। अकबर के चाचा का नाम मिर्जा अस्करी था। अकबर के बचपन में उनकी दोस्ती रामसिंह नामक एक व्यक्ति से हो गई थी, जिसके बाद उनकी यह दोस्ती पूरे जीवन भर रही। अकबर अपने बचपन में कुछ समय अपने चाचा के पास रहने के बाद वे काबुल में रहने लग गये थे।

काबुल से पहले अकबर अपने चाचा के पास कंधार में रहता था। जिस अकबर को हम आज शक्तिशाली मानते है, वह कला अकबर ने अपने चाचा से ही सीखी थी, जिसके बाद अकबर एक शक्तिशाली और निडर शासक बनने में सफल रहा।

अकबर की शादी 

अकबर उन शासकों में से भी है, जिसने एक से अधिक शादियां की है। अकबर ने पहली शादी 1551 में अपने ही चाचा की बेटी रुकैया बेगम से की थी। रुकैया बेगम उनकी पहली और मुख्य बीवी थी।

इसके बाद अकबर ने इस एक शादी के अलावा भी कई राजकुमारियों से शादी की, जिसमें सुल्तान बेगम सहिबा, मरियम उज-जमानी बेगम साहिबा और उसके बाद राजपूत राजकुमारी जोधाबाई से भी शादी की थी।

जोधाबाइ के साथ विवाह :

        जोधाबाइ और अकबर के विवाह के बाद जोधाबाइ कभी अपने माइके नहीं गयी। उन्हे राजपूतना खानदान ने सदा के लिए त्याग दिया था। अकबर के साथ विवाह के बाद जोधाबाइ, मरियम उज-जमनि बेगम साहिबा के नाम से जानी गयी। जोधाबाई और अकबर की कहानी पर वर्ष 2008 में आशुतोष गोवरीकर के द्वारा फिल्म भी बनाई गयी थी। जिसमे मशहूर अभनेता ऋत्विक रोशन ने अकबर का पात्र निभाया था। और जोधाबाई का पात्र ऐश्वर्या राय बच्चन ने निभाया था।

        पूर्व काल सन 1960 में भी “मुगल-ए-आजम” फिल्म बनी थी जो काफी लोकप्रिय हुई थी। इस फिल्म में पृथ्वी राज कपूर साहब ने अकबर का किरदार निभाया था। अकबर के पुत्र का किरदार दिलीप कुमार और उनकी प्रेयसी का पात्र मधुबाला के द्वारा निभाया गया था। निरंतर समय पर अकबर बीरबल के किस्सों, और अकबर की जीवनी पर अलग अलग फिल्म और सीरियल्स बनते आ रहे हैं। इंटरनेट, बुक्स, फिल्म और अन्य कई माध्यम से अकबर और मुग़ल साम्राज्य से जुड़े साहित्य पर नए नए कार्यकर्म बनते आ रहे हैं।

व्यक्तिगत जीवन और विरासत

 उन्होंने अपने पहले चचेरे भाई रुकैया सुल्तान बेगम से 1551 में शादी की। उनके बारे में कहा जाता है कि उनकी अलग-अलग जातीय और धार्मिक पृष्ठभूमि की 12 और पत्नियां थीं।

राजपूतों के साथ एक राजनीतिक गठबंधन 1562 में हीरा कुंवारी (जिसे हरखा बाई या जोधा बाई भी कहा जाता है) के साथ उनकी शादी में परिणत हुआ। वह उनकी मुख्य रानियों में से एक बन गईं और उन्होंने सलीम नाम के एक बेटे को जन्म दिया, जिसे जहांगीर के नाम से जाना जाने लगा। 1569 है।

अक्टूबर 1605 में, वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और तीन सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई। उनके शव को आगरा के सिकंदर के मकबरे में दफनाया गया था। उनका उत्तराधिकारी उनका बेटा बना।

Akbar Ka Jivan Parichay – कई अंतर्राष्ट्रीय उपन्यास, जैसे कि इयर्स ऑफ राइस एंड साल्ट ’(2002), द सॉलिट्यूड ऑफ एम्पर्स’ (2007) और उसके बाद एनचैरेस ऑफ फ्लोरेंस ’(2008) उनके जीवन पर आधारित है।

कई टेलीविजन श्रृंखलाएँ – जैसे ‘अकबर-बीरबल’ (1990 के अंत में) और ‘जोधा अकबर’ (2013-2015) – और फिल्में, जैसे ‘मुगल-ए-आज़म’ (1960) और ‘जोधा अकबर’ (2008) ने इस शक्तिशाली शासक को क्रोधित कर दिया।

अकबर का  राजतिलक

शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद उसके पुत्र इस्लाम शाह और सिकंदर शाह की अक्षमता का फायदा उठाकर हुमायूँ ने 1555 में दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया लेकिन इसके कुछ माह बाद ही 48 वर्ष की आयु में ही हुमायूँ का अपनी पुस्तकालय की सीढ़ी से भारी नशे की हालात में गिरने के कारण आकस्मिक निधन हो गया। तब अकबर के संरक्षक बैरम खां ने साम्राज्य के हित में इस मृत्यु को कुछ दिनों के लिये छुपाये रखा तथा सारी तैयारियां करने के बाद 14 फ़रवरी, 1556 को अकबर का राजतिलक कर दिया. 13 वर्षीय अकबर का पंजाब में गुरदासपुर के कलनौर नामक स्थान पर, सुनहरे वस्त्र तथा एक गहरे रंग की पगड़ी में एक नवनिर्मित मंच पर राजतिलक हुआ। ये मंच आज भी बना हुआ है। उसे फारसी भाषा में सम्राट के लिये शब्द शहंशाह से पुकारा गया। वयस्क होने तक उसका राज्य बैरम खां के संरक्षण में ही चला। इस प्रकार अकबर को सत्ता की बागडोर मात्र 13 साल की उम्र में मिल गई थी जब 16 फरवरी 1556 ईस्वी को वह राजा घोषित हुआ. उसके बाद 1605 ईसवी में में अपनी मृत्यु तक 50 वर्षों तक उसने अपने लंबे शासनकाल में न केवल मुगल साम्राज्य के विस्तार और दृढ़ता प्रदान की वरन भारत को सामाजिक धार्मिक सांस्कृतिक और कलात्मक रूप से समृद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया.

अकबर का राज्य विस्तार

अकबर अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था इसके लिए उसने सीधी संघर्ष करने वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने , अधीनता स्वीकार करने ,वालो को शासन में पद देने तथा मित्रता करने की नीति अपनयायी. अकबर राजपूतो के साथ मित्रता का महत्त्व समझता था इसलिए उसने राजपूत परिवारों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर स्थिति को मजबूत किया और इसके लिए उसने जोधा (Jodha bai )से विवाह भी किया .और जोधबाई और अकबर के पुत्र जहाँगीर ही अकबर Akbar के बाद मुग़ल बादशाह Mugal Badshah बना | इसतरह जोधा अकबर (Jodhaa Akbar History ) की प्रेम कहानी इतिहास में अमर प्रेम कहानी बन गयी.

        अकबर ने आमेर , जोधपुर , बीकानेर ,जैसलमेर , के राजपूतो को दरवार में सम्मान जनक स्थान दिया . राजपूत राजा भगवान् दास तथा उनके पोते मानसिंह को दरवार में सबसे ऊँचा स्थान दिया | उसने हिंदुयो का जजिया कर की समाप्त कर हिंदुयो को खुश किया | जिससे हिन्दू अकबर पर विस्वास करने लगे. कई राजपूतो ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली परंतु मेवाड़ के माहाराणा प्रताप ने सर झुकाने से इनकार कर दिया , तो अकबर Akbar की सेना और  माहाराणा प्रताप Maharana Pratap का सामना सं 1576 में हल्दीघाटी Haldighati के मैदान में हुआ जो भारतीय  इतिहास में हल्दीघाटी के युद्ध ( Haldighati War ) के नाम से पसंद है | माहाराणा प्रताप  भीषण युद्ध करते हुए बुरी तरह घायल हुए , और उन्हें परिवार सहित जंगल जाना पढ़ा उन्होंने प्राण किया जब तक वह मेवाड़ को वापस नहीं ले लेंगे , वह घास की रोटी खाएंगे | जमीन पर सोएंगे और सभी सुखो का त्याग कर देंगे.

        हुमायु के निर्वासन के दौरान अकबर को काबुल लाया गया और उसके चाचाओ ने उसकी परवरिश की | उन्होंने अपना बचपन शिकार और युद्ध कला में बिताया लेकिन पढना लिखना कभी नही सिखा | 1551 में अकबर Akbar ने अपने चाचा हिंडल मिर्जा की इकलौती बेटी रुकैया सुल्तान बेगम से निकाह कर लिया | इसके कुछ समय बाद ही हिंडल मिर्जा की युद्ध के दौरान मौत हो गयी|हुमायु ने 1555 में शेरशाह सुरी के बेटे इस्लाम शाह को पराजित कर दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया | इसके कुछ समय बाद ही हुमायु की मृत्यु हो गयी | Akbar अकबर के अभिभावक बैरम खान ने  13 वर्ष की उम्र में ही 14 फरवरी 1556 में अकबर को दिल्ली की राजगद्दी पर बिठा दिया |

        बैरम खान ने उसके वयस्क होने तक राजपाट सम्भाला और अकबर को शहंशाह का ख़िताब दिया  | सुरी साम्राज्य ने छोटे बालक का भय ना करते हुए हुमायु की मौत के बाद फिर से आगरा और दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया था|बैरम खान के नेतृत्व में उन्होंने सिकन्दर शाह सुरी के खिलाफ मोर्चा निकाला |उस समय सिंकंद्र शाह सुरी का सेनापति हेमू था और बैरम खान के नेतृत्व में Akbar अकबर की सेना ने हेमू को 1556 में पानीपत के दुसरे युद्ध में पराजित कर दिया | इसके तुरंत बाद मुगल सेना ने आगरा और दिल्ली पर अपना आधिपत्य कर दिया | Akbar अकबर ने दिल्ली पर विजयी प्रवेश किया और एक महीने तक वहा पर निवास किया |उसके बाद अकबर और बैरम खान दोनों पंजाब लौट गये जहा पर सिकंदर शाह फिर से सक्रिय हो गया था |

दिल्ली आगरा विजय

अकबर के शासक बनने के बाद यह अकबर की सबसे पहले पहली विजय थी। 1556 ईं. में अकबर के पिता हुमायूं की मृत्यु के बाद तक अकबर के पास पंजाब का एक छोटा से क्षेत्र था।

अकबर ने अपने राज्य विस्तार को लेकर यह पहला युद्ध किया था। इस युद्ध को पानीपत का युद्ध कहा जाता है। यह युद्ध अकबर और हेमू के मध्य हुआ था, जिसमें अकबर जीतकर दिल्ली-आगरा पर अधिकार कर पाया था।

ग्वालियर, अजमेर, जौनपुर 

अकबर की दिल्ली व आगरा विजय के बाद उसने 1556 और 1560 के बीच ग्वालियर, अजमेर और जौनपुर पर भी विजय प्राप्त कर ली और उन राज्यों को मुगल साम्राज्य में मिला दिया।

अकबर की मालवा विजय 

अकबर के समकालीन अफगान सरदार बहादुर शाह मालवा का शासक था। अकबर ने मालवा को अधीन करने के लिए आधम खां और मीर मोहम्मद के नेतृत्व में एक सेना मालवा की चढ़ाई के लिए भेजी।

इसमें इन दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें मालवा का नरेश हार गया और मालवा पर अकबर का अधिकार हो गया। यह घटना 1560 से 1562 के बीच मानी जाती है।

अकबर की गौंडवाना विजय 

अकबर ने अपने राज्य का और विस्तार करने के लिए गोंडवाना के शासक वीर नारायण के साथ भी दो-दो हाथ किए थे। इस युद्ध को भी अकबर जीत गया था।

वीर नारायण अल्पसंख्यक था, जिसके कारण उसकी मां उसकी देखभाल करती थी। वीर नारायण की मां एक कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ वह एक श्रेष्ठ सेनापति भी थी।

चित्तौड़ के राजा से सामना 

1567 ई में अकबर ने अपने राज्य विस्तार में राजपूताने के क्षेत्र को भी अपनी और मिलने का सोचा। अकबर पहले चित्तौड़ पर आक्रमण नहीं करना चाहता था व वहाँ की सामाजिक स्थिति व राजनीतिक प्रतिष्ठा से काफी प्रभावित था।

अकबर चित्तौड़ को अपने अधीन करना चाहता था। वहाँ के शासक महाराणा प्रताप को यह बिल्कुल भी मंजूर नहीं था कि वह मुगल साम्राज्य में मिल जाएं।

काफी समय तक कोशिश चली फिर आखिर चित्तौड़ पाने के लिए अकबर और महाराणा प्रताप के बीच में हल्दीघाटी का युद्ध हुआ। इस युद्ध में किसकी विजय हुई, इस बात पर इतिहासों में अभी भी मतभेद है। पर ऐसा कहा जा सकता है कि बाद में यह राज्य भी मुगल शासक अकबर के अधीन आ गया था।

राजपुताने के अन्य राज्यों पर विजय

चितौड़ को अधीन करने के कुछ ही समय बाद रणथंभौर, कार्लिजर, जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर जैसे राज्य भी अकबर के अधीन आ गये थे। इन सब से एक बात तो पक्की साबित होती है कि अकबर एक विस्तारवादी राजा था।

गुजरात पर विजय

अकबर के उत्तर भारत मे विजय अभियानों के बाद अकबर को अब मध्य भारत और दक्षिण भारत में भी अपना राज्य विस्तार करना था। 1574 में अकबर गुजरात की ओर बढ़ा। अकबर और गुजरात शासक के बीच युद्ध बिलकुल भी नहीं हुआ बल्कि गुजरात शासक ने अकबर की अधीनता युही स्वीकार कर ली थी।

पहली बार जब अकबर यहां से चला गया तो मुरफ्फरशान ने अपने राज्य को एक बार फिर स्वतंत्र घोषित कर दिया, उसके बाद फिर अकबर ने चढ़ाई की और इस बार मुफ्फर शाह हार गया।

अकबर का बंगाल पर विजय

गुजरात विजय के बाद अकबर एक बार फिर पश्चिम बंगाल की ओर रुख किया, उस समय वहाँ का शासक सुलेमान था। सुलेमान ने अकबर के डर से ही अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी।

इसके बाद सुलेमान की मृत्यु के बाद फिर उसके पुत्र ने एक स्वतंत्र राज्य की घोषणा कर दी। जिसके बाद 1574 में अकबर ने इसके विरोध में एक बार फिर बंगाल पर आक्रमण किया और सुलेमान के पुत्र दाऊद खां को हार का सामना करना पड़ा।

अकबर का काबुल विजय

1585 में जब अकबर ने काबुल पर अधिकार करना चाहा तो उस समय वहाँ का शासक अकबर का सौतेला भाई मिर्ज़ा मुहम्मद हाकिम था। यह वही मिर्ज़ा मुहम्मद हाकिम था, जो खुद भी भारत जीतने की इच्छा रखता था। अकबर ने उसके विरुद्ध भी कार्यवाही की और उसके खिलाफ युद्ध किया।

इस युद्ध में अकबर को विजयश्री प्राप्त हुई, पर उसके बाद अकबर ने उसके भाई पर दया दिखाकर उसका राज्य उसे वापस लौटा दिया। हाकिम की मृत्यु के बाद अकबर ने काबुल को मुगल साम्राज्य में मिला दिया।

इन सब विजयों के बाद अकबर ने कई छोटे बड़े राज्यों को मुगल साम्राज्य में मिला दिया था।

अकबर का पंजाब गमन और दिल्ली की सत्ता-बदली

पंजाब जाते समय उसने दिल्ली का शासन मुग़ल सेनापति तारदी बैग खान को सौंप दिया। सिकंदर शाह सूरी अकबर (Akbar) के लिए बहुत बड़ा प्रतिरोध साबित नही हुआ। कुछ प्रदेशो मे तो अकबर के पहुँचने से पहले ही उसकी सेना पीछे हट जाती थी। अकबर की अनुपस्थिति मे हेमू विक्रमादित्य ने दिल्ली और आगरा पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की और इस तरह 6 अक्टूबर 1556 को हेमू ने स्वयं को भारत का महाराजा घोषित कर दिया। इसी के साथ दिल्ली मे हिंदू राज्य की पुनः स्थापना हुई।

दिल्ली में सत्ता की वापसी

अकबर को जब दिल्ली की पराजय का समाचार मिला तो उसने तुरन्त ही बैरम खान से परामर्श कर के दिल्ली की तरफ़ कूच करने का इरादा बना लिया। अकबर के सलाहकारो ने उसे काबुल की शरण में जाने की सलाह दी। अकबर और हेमू की सेना के बीच पानीपत मे युद्ध हुआ। यह युद्ध पानीपत का द्वितीय युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। संख्या में कम होते हुए भी अकबर ने इस युद्ध मे विजय प्राप्त की। डा. आर.पी. त्रिपाठी ने पानीपत के द्वितीय युद्ध के परिणाम के बारे में लिखा है कि-हेमू की पराजय एक दुर्घटना थी, जबकि अकबर की विजय एक दैवीय-संयोग था। इस विजय से अकबर को 1500 हाथी मिले जो बाद में सिकंदर शाह सूरी से युद्ध के समय काम आए। सिकंदर शाह सूरी ने आत्मसमर्पण कर दिया और अकबर ने उसे प्राणदान दे दिया।       

अकबर की विस्तारवादी नीतियां

अकबर (Akbar) ने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए और उसको दृढ़ता प्रदान करने के लिए राजपूत राजाओं से मित्रता करने की अपने पिता हुमायूं की नीति का विस्तार किया। आमेर के राजा भारमल ने अपनी छोटी बेटी हरखा बाई का विवाह अकबर से कर दिया. अकबर ने अपनी हिंदू पत्नियों को धार्मिक स्वतंत्रता दी और उनके माता-पिता और सगे संबंधियों को ऊंचे ऊंचे ओहदों पर रखा। भारमल को उसने एक बड़ा सरदार बना दिया उसके बेटे भगवानदास को पाँच हजारी का दर्जा दिया और पोते मानसिंह को सबसे ऊंचा सात हजारी का दर्जा प्रदान किया। उसने अपने एक बच्चे की देखभाल के लिए भारमल की पत्नियों की देखरेख में आमेर भेज दिया।

जिन राजपूती परिवारों में अकबर के शादी विवाह के संबंध नहीं थे उनसे भी अकबर ने मित्रता स्थापित की. रणथंभौर के राव सुरजन हांडा को गढ़ कटंगा की जिम्मेदारी सौंपी और उसको दो हजारी का दर्जा प्रदान किया। अकबर की सफलता का एक और बहुत बड़ा कारण था उसकी उदारता और उसकी धार्मिक सहिष्णुता की नीति का सुखद संयोग। अकबर ने 1564 में जजिया कर हटा दिया इसी प्रकार बनारस, इलाहाबाद जैसे तीर्थ स्थानों में लगने वाला तीर्थ कर भी हटा दिया गया. युद्ध बंदियों का जबर्दस्ती मुसलमान बनाने के चलन को भी समाप्त कर दिया।

हालांकि कुछ इतिहासकारों के अनुसार अकबर (Akbar) के दरबारी हिन्दू राजाओं की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी और वो अकबर के गुलाम मात्र ही थे. इतिहासकार दशरथ शर्मा लिखते हैं कि हम अकबर को उसके दरबार के इतिहास और वर्णनों जैसे अकबरनामा, आदि के अनुसार महान कहते हैं। लेकिन यदि कोई अन्य उल्लेखनीय कार्यों की ओर देखे, जैसे दलपत विलास, तब स्पष्ट हो जाएगा कि अकबर अपने हिन्दू सामंतों से कितना अभद्र व्यवहार किया करता था। अकबर के नवरत्न राजा मानसिंह द्वारा विश्वनाथ मंदिर के निर्माण को अकबर की अनुमति के बाद किए जाने के कारण हिन्दुओं ने उस मंदिर में जाने का बहिष्कार कर दिया। कारण साफ था, कि राजा मानसिंह के परिवार के अकबर से वैवाहिक संबंध थे। अकबर के हिन्दू सामंत उसकी अनुमति के बगैर मंदिर निर्माण तक नहीं करा सकते थे। बंगाल में राजा मानसिंह ने एक मंदिर का निर्माण बिना अनुमति के आरंभ किया, तो अकबर ने पता चलने पर उसे रुकवा दिया और 1595 में उसे मस्जिद में बदलने के आदेश दिए।

हल्दीघाटी का युद्ध

उस समय पूरे राजस्थान में मात्र एक ऐसा राज्य था जो मुगल अधीनता स्वीकार नहीं कर रहा था और वह था मेवाड़। अकबर ने एक के बाद एक अनेक दूतमंडल महाराणा प्रताप के पास भेज कर उनको राजी करने की कोशिश की लेकिन मानसिंह की मध्यस्था के बावजूद बात नहीं बनी। एक बार तो राणा प्रताप ने अपने बेटे अमर सिंह को मुगल दरबार में भगवान दास के साथ भेज भी दिया था लेकिन स्वाभिमानी राणा प्रताप अकबर (Akbar) के सामने खुद उपस्थित होकर व्यक्तिगत रूप से उसका सम्मान प्रकट नहीं करना चाहते थे इसलिए कोई समझौता नहीं हुआ। इसके पश्चात हल्दीघाटी में दोनों के बीच घमासान लड़ाई हुई. अकबर को राजपूतों का सहयोग प्राप्त था लेकिन राणा प्रताप की सेना में भी उनकी ओर से कुछ मुसलमान लड़ रहे थे. राजपूत योद्धाओं के अलावा राणा प्रताप की सेना में अफ़गानों की एक टुकड़ी भी हकीम खां के साथ थी।

अकबर का प्रशासन

सन 1560 में अकबर ने स्वयं सत्ता संभाल ली और अपने संरक्षक बैरम खां को नपदमुक्त करके मक्का की तीर्थयात्रा के लिए भेज दिया। बैरम खाँ पर मक्का जाते समय गुजरात में अफगानों के एक दल ने आक्रमण कर दिया. मुबारक खाँ नामक एक अफगान ने जिसके पिता को बैरम खाँ ने मच्छीवाङा (1555 ई.) के युद्ध में कत्ल किया था मार डाला। बैरम खाँ की मृत्यु के बाद अकबर ने बैरम खाँ की विधवा सलीमा बेगम से निकाह कर लिया तथा उसके पुत्र अब्दुर्रहीम को अपने नवरत्नों में शामिल करके खान-खाना की उपाधि दी। अबुल फजल ने बैरम खाँ के पतन में सबसे अधिक उत्तरदायी अकबर की धाय माँ माहम अनगा को ठहराया है।

अब अकबर (Akbar) के अपने हाथों में सत्ता थी लेकिन अनेक कठिनाइयाँ भी थीं। जैसे- शम्सुद्दीन अतका खान की हत्या पर उभरा जन आक्रोश (1563), उज़बेक विद्रोह (1564-65) और मिर्ज़ा भाइयों का विद्रोह (1566-67) किंतु अकबर ने बड़ी कुशलता से इन समस्याओं को हल कर लिया। अपनी कल्पनाशीलता से उसने अपने सामन्तों की संख्या बढ़ाई। सन 1562 में आमेर के शासक से उसने समझौता किया – इस प्रकार राजपूत राजा भी उसकी ओर हो गये। इसी प्रकार उसने ईरान से आने वालों को भी बड़ी सहायता दी। भारतीय मुसलमानों को भी उसने अपने कुशल व्यवहार से अपनी ओर कर लिया। धार्मिक सहिष्णुता का उसने अनोखा परिचय दिया – हिन्दू तीर्थ स्थानों पर लगा कर जज़िया हटा लिया गया (सन 1563)। इससे पूरे राज्यवासियों को अनुभव हो गया कि वह एक परिवर्तित नीति अपनाने में सक्षम है। इसके अतिरिक्त उसने जबर्दस्ती युद्धबंदियो का धर्म बदलवाना भी बंद करवा दिया।

अकबर ने मनसबदारी प्रथा के तहत बड़े-बड़े सरदारों के मातहत सेना की टुकड़ियों में ऐसी व्यवस्था रखी कि हर अमीर या सरदार की टुकड़ी में मुगल, पठान हिंदुस्तानी और राजपूत चारों जातियों के सिपाही हो। बादशाह रोज सवेरे प्रजा को झरोखा दर्शन देता था और बहुत सारी अर्जियां वहीं निपटा देता था बाकी मामले दरबारे आम में हल किए जाते थे।

अकबर की कामुकता

तमाम इतिहासकारों ने अकबर (Akbar) को महान अकबर कहा है और उसकी अच्छाइयों को ही चित्रित किया है लेकिन यहाँ पर यह जानना भी जरुरी है कि अकबर में कुछ मानवोचित कमजोरियां भी थी जो उसके चारित्रिक लंपटता को दर्शाती हैं. तत्कालीन समाज में वेश्यावृति को अकबर का संरक्षण प्राप्त था। उसकी एक बहुत बड़ी हरम थी जिसमे बहुत सी स्त्रियाँ थीं। इनमें अधिकांश स्त्रियों को बलपूर्वक अपहृत करवा कर वहां रखा गया था। उस समय में सती प्रथा भी जोरों पर थी। तब कहा जाता है कि अकबर के कुछ लोग जिस सुन्दर स्त्री को सती होते देखते थे, उसे बलपूर्वक जाकर सती होने से रोक देते और सम्राट की आज्ञा बताकर उस स्त्री को हरम में डाल दिया जाता था। हालांकि इस प्रकरण को दरबारी इतिहासकारों ने कुछ इस ढंग से कहा है कि “इस प्रकार बादशाह सलामत ने सती प्रथा का विरोध किया व उन अबला स्त्रियों को संरक्षण दिया।”

अपनी जीवनी में अकबर (Akbar) ने स्वयं लिखा है– यदि मुझे पहले ही यह बुधिमत्ता जागृत हो जाती तो मैं अपनी सल्तनत की किसी भी स्त्री का अपहरण कर अपने हरम में नहीं लाता। इस बात से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि वह सुन्दरियों का अपहरण करवाता था। इसके अलावा अपहरण न करवाने वाली बात की निरर्थकता भी इस तथ्य से ज्ञात होती है कि न तो अकबर के समय में और न ही उसके उतराधिकारियो के समय में हरम बंद हुई थी।

आईने अकबरी के अनुसार अब्दुल कादिर बदायूंनी कहते हैं कि बेगमें, कुलीन, दरबारियो की पत्नियां अथवा अन्य स्त्रियां जब कभी बादशाह की सेवा में पेश होने की इच्छा करती हैं तो उन्हें पहले अपने इच्छा की सूचना देकर उत्तर की प्रतीक्षा करनी पड़ती है; जिन्हें यदि योग्य समझा जाता है तो हरम में प्रवेश की अनुमति दी जाती है। अकबर अपनी प्रजा को बाध्य किया करता था की वह अपने घर की स्त्रियों का नग्न प्रदर्शन सामूहिक रूप से आयोजित करें जिसे अकबर ने खुदारोज (प्रमोद दिवस) नाम दिया हुआ था। इस उत्सव के पीछे अकबर का एकमात्र उदेश्य सुन्दरियों को अपने हरम के लिए चुनना था। गोंडवाना की रानी दुर्गावती पर भी अकबर की कुदृष्टि थी। उसने रानी को प्राप्त करने के लिए उनके राज्य पर आक्रमण भी किया था। युद्ध के दौरान वीरांगना रानी दुर्गावती ने अनुभव किया कि उसे मारने की नहीं वरन बंदी बनाने का प्रयास किया जा रहा है, तो उसने वहीं आत्महत्या कर ली। तब अकबर ने उसकी बहन और पुत्रबधू को बलपूर्वक अपने हरम में डाल दिया। अकबर (Akbar) ने यह प्रथा भी चलाई थी कि उसके पराजित शत्रु अपने परिवार एवं परिचारिका वर्ग में से चुनी हुई महिलायें उसके हरम में भेजे।

अकबर के उपलब्धि

उनके शासनकाल के दौरान, मुगल साम्राज्य का विस्तार अधिकांश भारतीय उपमहाद्वीप तक था, जो उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विंध्य तक और उत्तर-पश्चिम में हिंदुकुश से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक फैला हुआ था।

1563 में, उन्होंने तीर्थयात्रा करते समय हिंदुओं द्वारा देय विशेष कर को रद्द कर दिया। 1564 में, उसने पूरी तरह से गैर-मुस्लिमों द्वारा दिए जाने वाले जजिया या वार्षिक कर को समाप्त कर दिया, इस प्रकार अपने विषयों के सम्मान को अर्जित किया।

1569 में, उन्होंने चित्तौड़गढ़ और रणथंभौर पर अपनी जीत का जश्न मनाने के लिए आगरा की एक नई राजधानी की स्थापना की। गुजरात पर विजय प्राप्त करने के बाद 1573 में राजधानी का नाम फतेहपुर सीकरी (विजय नगर) रखा गया।

अकबर की प्रमुख लड़ाई

नवंबर 1556 में, उनकी सेना ने ‘पानीपत की दूसरी लड़ाई’ में हेमू और सूर सेना को हराया, जहां हेमू को उसकी आंख में गोली मार दी गई थी और बाद में उसे पकड़ लिया गया और मार डाला गया।

आसफ खान ने मुगल सेना का नेतृत्व किया और 1564 में गोंडवाना साम्राज्य पर छापा मारा, इसके शासक रानी दुर्गावती को ‘दमोह की लड़ाई’ में हराया। रानी दुर्गावती ने अपने नाबालिग बेटे राजा वीर नारायण को मार डाला और अपना सम्मान बचाने के लिए आत्महत्या कर ली।

1575 में ‘तुकारोई की लड़ाई’ में अकबर ने बंगाल के शासक दाउद खान को हराया। दाऊद खान को एक और लड़ाई में मुगल सेनाओं ने पकड़ लिया और मार डाला, जिससे बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया गया।

अकबर की मृत्यु

अकबर (Akbar) के बारे में बृहद रूप से जानकारी इकठ्ठा करने पर यह पता चलता है कि उसका व्यक्तित्व बहुआयामी था. वह एक तरफ न्यायपालक, उदार, सर्व धर्म सम्भावी और मित्रवत होने का दिखावा करता था तो दूसरी तरफ क्रूर, हत्यारा, कामान्ध व्यक्ति भी था जो यह जानता था कि भारत में लम्बे समय तक राज करने के लिए यहाँ के मूल निवासियों को उचित एवं बराबरी का स्थान देना बहुत जरुरी है। शायद यही कारण रहा होगा कि जब इसकी मृत्यु 27 अक्टूबर 1605 को फतेहपुर सीकरी, आगरा में हुयी तो  उसकी अन्त्येष्टि बिना किसी संस्कार के जल्दी ही कर दी गयी। परम्परानुसार दुर्ग में दीवार तोड़कर एक मार्ग बनवाया गया तथा उसका शव चुपचाप सिकंदरा के मकबरे में दफना दिया गया।

अकबर बादशाह के नव रत्न :

1. बीरबल- (सन 1528 से सन1583) दरबार के विदूषक, परम बुद्धिशाली, और बादशाह के सलहकार।
2. 
फैजि-  (सन 1547 से 1596) फारसी कवि थे। अकबर के बेटे के गणित शिक्षक थे।
3. 
अबुल फज़ल-  (सन 1551 से सन 1602) अकबरनामा, और आईन-ए-अकबरी की रचना की थी।   
4. 
तानसेन-  (तानसेन उत्तम गायक थे। और कवि भी थे)।
5. 
अब्दुल रहीम खान-ए-खान- एक कवि थे, और अकबर के पूर्व काल के संरक्षक बैरम खान के बेटे थे।
6. 
फकीर अजिओं-दिन-  अकबर के सलाहकार थे।
7. 
टोडरमल-  अकबर के वित्तमंत्री थे।
8. 
मानसिंह- आमेर / जयपुर राज्य के राजा और अकबर की सेना के सेनापती भी थे।
9. 
मुल्लाह दो पिअजा- अकबर के सलहकार थे।

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Thu, 20 Mar 2025 10:19:35 +0530 Jaankari Rakho
अल्बर्ट आइंस्टीन का जीवन परिचय, इतिहास | Albert Einstein Biography in Hindi https://m.jaankarirakho.com/13 https://m.jaankarirakho.com/13 अल्बर्ट आइंस्टीन विश्व के जाने माने वैज्ञानिक और थ्योरिटीकल भौतिकशास्त्री है. इन्होंने साधारण रिलेटिविटी की थ्योरी को विकसित किया. विज्ञान के दर्शन शास्त्र को प्रभावित करने के लिए भी इनका नाम प्रसिद्ध है. अल्बर्ट आइंस्टीन का विश्व में सबसे ज्यादा नाम द्रव्यमान – ऊर्जा के समीकरण सूत्र E=MC square के लिए है, यह विश्व का बहुत ही प्रसिद्ध समीकरण है. अल्बर्ट आइंस्टाइन के सिद्धांतों की बदौलत ही आज मानव जाति टाइम ट्रैवेल अर्थात् समय यात्रा के बारे में सोच सकती है। आइंस्टाइन एक ऐसी शख्सियत थे इस जिन्होंने दुनिया को समय और गुरुत्वाकर्षण के बीच संबंधों और परस्पर प्रभाव के विषय में बताया। साल 1921 में ‘प्रकाश विद्युत उत्सर्जन’ की खोज के लिए इन्हें विश्व के सबसे सम्मानित पुरस्कार ‘नोबेल पुरस्कार’ द्वारा भी सम्मानित किया गया। इन सब के अलावा भी आइंस्टीन द्वारा कई खोज अविष्कार किए गए। 14 मार्च को अल्बर्ट आइंस्टाइन की जयंती (Albert Einstein Birthday) मनाई जाती है। और इसी दिन विश्व पाई दिवस भी मनाया जाता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन का जीवन परिचय  व इतिहास  ( Albert Einstein Biography History In Hindi )

क्र.म.   जीवन परिचय बिंदु             जीवन परिचय
1. पूरा नाम अल्बर्ट हेर्मन्न आइंस्टीन
2. जन्म 14 मार्च 1879
3. जन्म स्थान उल्म (जर्मनी)
4. निवास जर्मनी, इटली, स्विट्ज़रलैंड, ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, यूनाइटेड किंगडम, यूनाइटेड स्टेट्स
5. पिता हेर्मन्न आइंस्टीन
6. माता पौलिन कोच
7. पत्नी मरिअक (पहली पत्नी)

 

एलिसा लोवेन्न थाल (दूसरी पत्नी)

8. शिक्षा स्विट्ज़रलैंड, ज्यूरिच पॉलीटेक्निकल अकादमी
9. क्षेत्र भौतिकी
10. पुरस्कार भौतिकी का नॉबल पुरस्कार, मत्तयूक्की मैडल, कोपले मैडल, मैक्स प्लांक मैडल, शताब्दी के टाइम पर्सन
11. मृत्यु 18 अप्रैल 1955

अल्बर्ट आइंस्टीन का जन्म और शिक्षा (Albert Einstein education) –

आइंस्टीन के पिताजी का नाम हरमन आइंस्टीन था जबकि उनकी माता का नाम पॉलिन आइंस्टीन था। आइंस्टीन के पिता एक इंजीनियर और विक्रेता थे जो बिजली के उपकरण बेचा करते थे। साल 1980 में जन्म के एक साल बाद ही आइंस्टीन अपने परिवार के साथ जर्मनी के म्युनिच शहर में आ गए।

अल्बर्ट आइंस्टाइन बचपन से ही असामान्य थे क्योंकि उनका सर सामान्य बच्चों की अपेक्षाकृत काफी बड़ा था और उनका व्यवहार भी दूसरे बच्चों की तरह नहीं था।

कहा जाता है कि पैदा होने के बाद लगभग 4 सालों तक आइंस्टीन बोलना नहीं जानते थे। लेकिन अचानक से एक दिन टेबल पर जब वह अपने माता पिता के साथ खाना खा रहे थे इस दौरान आइंस्टीन ने पहली बार बोला और कहा कि “सूप बहुत गर्म है!”

आइंस्टीन बचपन से ही बहुत जिज्ञासु प्रकृति के थे। वह हर एक चीज के बारे में जानना चाहते थे। बचपन में वह ज्यादा खेलना कूदना पसंद नहीं करते थे बल्कि इसकी बजाय वह ब्रह्मांड की परिकल्पना करते थे।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने साले 1896 में अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की।माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद आइंस्टीन ने फेडरल पॉलिटेक्निक स्कूल में दाखिला ले लिया।

इसी स्कूल में उनकी मुलाकात मिलेवा मेरिक से हुई जिसके साथ आगे चलकर इनका विवाह हुआ था। आइंस्टीन और मिलेवा दोनों ही भौतिक विज्ञान में बहुत अच्छे थे जिसके कारण उनकी केमिस्ट्री जम गई।

साल 1900 में अल्बर्ट आइंस्टाइन ने 21 साल की आयु में फेडरल पॉलिटेक्निक स्कूल से डिप्लोमा की डिग्री हासिल की।

30 अप्रैल 1905 को अल्बर्ट आइंस्टीन यूनिवर्सिटी आफ ज़्यूरिख़ से पीएचडी की डिग्री भी हासिल की।

साल 1903 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपनी प्रेमिका और फेडरल पॉलिटेक्निक स्कूल की सहपाठी मिलेवा मेरिक के साथ शादी कर ली। इन दोनों का विवाह बर्न स्विजरलैंड में संपन्न हुआ। विवाह के एक वर्ष बाद ही साल 1904 में अल्बर्ट आइंस्टीन को एक बेटा भी पैदा हुआ जिसका नाम हंस अल्बर्ट आइंस्टीन था।

साल 1910 में उन्हें एक और बेटा पैदा हुआ जिसका नाम एडवार्ड आइंस्टीन था। हालांकि उनका यह दूसरा बेटा महज़ 20 साल की उम्र में ही मर गया था।

हालांकि अल्बर्ट आइंस्टीन का विवाह ज्यादा दिन तक चल नहीं पाया और आखिरकार 14 फरवरी 1919 को उनका उनकी पत्नी से तलाक हो गया।

अल्बर्ट आइंस्टीन का कैरियर (Albert Einstein Career) –

अल्बर्ट आइंस्टीन ने बहुत सारे दस्तावेज लिखे इन दस्तावेजों से वे प्रसिद्ध हो गए. उनको जॉब के लिए युनिवर्सिटी में मेहनत करनी पड़ी. सन 1909 में बर्न युनिवर्सिटी में लेक्चरर की जॉब के बाद, आइंस्टीन ने ज्युरिच की युनिवर्सिटी में सहयोगी प्राध्यापक के लिए अपना नाम दिया. दो साल बाद क्ज़ेकोस्लोवाकिया के प्राग शहर में जर्मन युनिवर्सिटी में प्राध्यापक के लिए चुने गए. साथ ही 6 महीने के अंदर ही फ़ेडरल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में प्राध्यापक बन गए. सन 1913 में जाने माने वैज्ञानिक मैक्स प्लांक और वाल्थेर नेर्न्स्ट ज्यूरिक आये और उन्होंने आइंस्टीन को जर्मनी में बर्लिन की युनिवर्सिटी में एक फायदेमंद अनुसंधान प्राध्यापकी के लिए प्रोत्साहित किया और उन्होंने विज्ञान की प्रुस्सियन अकादमी की पूरी मेम्बरशिप भी दी. आइंस्टीन ने इस अवसर को स्वीकार कर लिया. जब वे बर्लिन चले गए, तब उनकी पत्नी ज्यूरिक में अपने दो बच्चों के साथ ही रह रहीं थी और उनका तलाक़ हो गया. सन 1917 में आइंस्टीन ने एलसा से शादी कर ली.

सन 1920 में आइंस्टीन हॉलैंड में लेइदेन की युनिवर्सिटी में जीवनपरियंत सम्माननीय प्राध्यापकी के लिए चुने गए. इसके बाद इन्हें बहुत से पुरस्कार भी मिले. इसके बाद इनका कैरियर एक नए पड़ाव पर पहुँचा. इस समय आइंस्टीन ने कैलिफोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में प्रस्थान किया, यह उनकी यूनाइटेड स्टेट्स में आखिरी ट्रिप थी. वे वहाँ 1933 में गए.

आइंस्टीन ने सन 1939 में एक एटॉमिक बम की संरचना में अपना बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया. सन 1945 में आइंस्टीन ने अपना प्रसिद्ध समीकरण E=MC square का अविष्कार किया.

अल्बर्ट आइंस्टीन के अविष्कार (Albert Einstein Inventions in hindi) –

अल्बर्ट आइंस्टीन ने बहुत से अविष्कार किये जिसके लिए उनका नाम प्रसिद्ध वैज्ञानिको में गिना जाने लगा. उनके कुछ अविष्कार इस प्रकार है -

        प्रकाश की क्वांटम थ्योरी – आइंस्टीन की प्रकाश की क्वांटम थ्योरी में उन्होंने ऊर्जा की छोटी थैली की रचना की जिसे फोटोन कहा जाता है, जिनमें तरंग जैसी विशेषता होती है. उनकी इस थ्योरी में उन्होंने कुछ धातुओं से इलेक्ट्रॉन्स के उत्सर्जन को समझाया. उन्होंने फोटो इलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट की रचना की. इस थ्योरी के बाद उन्होंने टेलेविज़न का अविष्कार किया, जोकि द्रश्य को शिल्पविज्ञान के माध्यम से दर्शाया जाता है. आधुनिक समय में बहुत से ऐसे उपकरणों का अविष्कार हो चूका है. E= MC square – आइंस्टीन ने द्रव्यमान और ऊर्जा के बीच एक समीकरण प्रमाणित किया, उसको आज नुक्लेअर ऊर्जा कहते है.

        ब्रोव्नियन मूवमेंट – यह अल्बर्ट आइंस्टीन की सबसे बड़ी और सबसे अच्छी ख़ोज कहा जा सकता है, जहाँ उन्होंने परमाणु के निलंबन में जिगज़ैग मूवमेंट का अवलोकन किया, जोकि अणु और परमाणुओं के अस्तित्व के प्रमाण में सहायक है. हम सभी जानते है कि आज के समय में विज्ञान की अधिकतर सभी ब्रांच में मुख्य है. विज्ञान के चमत्कार निबंध यहाँ पढ़ें.

        स्पेशल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी – अल्बर्ट आइंस्टीन की इस थ्योरी में समय और गति के सम्बन्ध को समझाया है. ब्रम्हांड में प्रकाश की गति को निरंतर और प्रक्रति के नियम के अनुसार बताया है. जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी – अल्बर्ट आइंस्टीन ने प्रस्तावित किया कि गुरुत्वाकर्षण स्पेस – टाइम कोंटीनूम में कर्व क्षेत्र है, जोकि द्रव्यमान के होने को बताता है.

        ज्यूरिख विश्वविद्यालय में उनको प्रोफेसर की नियुक्ति मिली और लोगो ने उन्हें महान वैज्ञानिक मानना शुरू कर दिया |  सं 1905 में 26 वर्ष की आयु में उन्होंने सापेशिकता का सिद्धांत प्रतिपादित किया जिसने उन्हें विश्वविख्यात कर दिया | इस विषय पर उन्होंने केवल चार लेख लिखे थे जिन्होंने भौतिकी का चेहरा बदल दिया | इस सिद्धांत का प्रसिद्ध समीकरण E=mc2 है जिसके कारण ही परमाणु बम बन सका | इसी के कारण इलेक्ट्रिक ऑय की बुनियाद रखी गयी | इसी के कारण ध्वनि चलचित्र और टीवी पर शोध हो सके | आइन्स्टाइन को अपनी इसी खोज के लिए विश्व प्रसिद्ध नोबल पुरुस्कार मिला था |

        स्नातक की डिग्री लेने के बाद उन्होंने विद्यार्थियों को पढ़ाने के बारे में विचार किया लेकिन अल्बर्ट के अधिक ज्ञान की वजह से प्रारम्भ में उन्हें नौकरी नही मिली | सन 1902 में अल्बर्ट आइन्स्टाइन को स्विज़रलैंड के बर्न शहर में एक अस्थाई नौकरी मिल गयी | अब उन्हें अपने शोध लेखो को लिखने और प्रकाशित कराने का बहुत समय मिला | उन्होंने डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त करने के लिए मेहनत करना शुरू कर दिया और अंत में उन्हें डाक्टरेट की उपाधि मिल ही गयी |

अल्बर्ट आइंस्टीन का दिमाग ( Albert Einstein brain in Hindi )

Albert Einstein brain weight – 1230 g

18 अप्रैल 1955 को अल्बर्ट आइंस्टीन की मृत्यु के बाद, पैथोलॉजिस्ट डॉ थॉमस हार्वे ने आइंस्टीन के परिवार की अनुमति के बिना ही शोध के लिए अल्बर्ट आइंस्टीन का दिमाग निकाल लिया। इस हरकत के कारण डॉ हार्वे को नौकरी से निकाल दिया गया।

डॉ हार्वे ने कहा वो अल्बर्ट आइंस्टीन के दिमाग को केवल शोध के लिए इस्तेमाल करना चाहते है, ताकि हम उनकी बुद्धिमत्ता का राज जान सकें। लेकिन अनुमति न मिलने के कारण अल्बर्ट आइंस्टीन का दिमाग 20 सालो तक एक जार में रखा रहा।

लेकिन फिर अल्बर्ट आइंस्टीन के बेटे हंस आइंस्टीन से अनुमति मिलने के बाद उन्होंने दिमाग के 256 टुकड़े कर बड़े-बड़े शोधकर्ताओं के पास भेज दिया।

कुछ रिसर्च ये कहती है कि उनके दिमाग में Gliale Cell की मात्रा शायद अधिक थी। उनका लेफ्ट हिप्पोकैम्पस थोड़ा बड़ा था जो याद रखने और कुछ सीखने में एक बहुत बड़ा योगदान देता है। और इसी एरिया में आम मस्तिष्क के मुकालबे ज्यादा न्यूरॉन्स थे।

अल्बर्ट आइंस्टीन को पुरस्कार (Albert Einstein Awards) –

अल्बर्ट आइंस्टीन को निम्न पुरस्कारों से नवाज़ा गया.

  • भौतिकी का नॉबल पुरस्कार सन 1921 में दिया गया.
  • मत्तयूक्की मैडल सन 1921 में दिया गया.
  • कोपले मैडल सन 1925 में दिया गया.
  • मैक्स प्लांक मैडल सन 1929 में दिया गया.
  • शताब्दी के टाइम पर्सन का पुरस्कार सन 1999 में दिया गया.

मिलेवा मैरिक और अल्बर्ट के बीच मनमुटाव और तलाक 

अल्बर्ट और मिलेवा के बीच कुछ मतभेद थे जैसे कि उन्होंने ने भी अल्बर्ट आइंस्टीन के रिसर्च पेपर्स तयार करने में काफी सहायता की थी लेकिन अल्बर्ट आइंस्टीन ने जब रिसर्च पेपर्स को प्रकाशित किया उनमे मिलेवा मैरिक का उसमे कोई नाम नही था जिसके कारण वो बहुत चिरचड़ी हो गई थी और अन्य भी कारण थे इसी कारण वो दोनों 1914 में एक दूसरे से अलग होगए। मिलेवा मैरिक अपने दोनों बेटों को लेकर अल्बर्ट से अलग हो गई और पाँच साल बाद सन 1919 में दोनों ने तलाक ले लिया।

तलाक के बाद अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपनी दूसरी जीवन संगिनी चुनी जिनका नाम एल्सा (Elsa) था। उन्होंने एल्सा से शादी कर ली।

2 अप्रैल 1921 अल्बर्ट ने पहली बार USA के न्यू यॉर्क शहर में कदम रखा वहाँ उंन्हे कोलंबिया और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में लेक्चर देने के लिए बुलाया गया था। 

अल्बर्ट आइंस्टीन के विचार 

• दो चीजें अनंत हैं: ब्रह्माण्ड और मनुष्य कि मूर्खता; और मैं ब्रह्माण्ड के बारे में दृढ़ता से नहीं कह सकता।
• जिस व्यक्ति ने कभी गलती नहीं कि उसने कभी कुछ नया करने की कोशिश नहीं की।
• प्रत्येक इंसान जीनियस है। लेकिन यदि आप किसी मछली को उसकी पेड़ पर चढ़ने की योग्यता से जज करेंगे तो वो अपनी पूरी ज़िन्दगी यह सोच कर जिएगी की वो मुर्ख है.
• एक सफल व्यक्ति बनने का प्रयास मत करो। बल्कि मूल्यों पर चलने वाले इंसान बनो।
• जब आप एक अच्छी लड़की के साथ बैठे हों तो एक घंटा एक सेकंड के सामान लगता है। जब आप धधकते अंगारे पर बैठे हों तो एक सेकंड एक घंटे के सामान लगता है। यही सापेक्षता है।
• क्रोध मूर्खों की छाती में ही बसता है।
• यदि मानव जीवन को जीवित रखना है तो हमें बिलकुल नयी सोच की आवश्यकता होगी।
• इन्सान को यह देखना चाहिए कि क्या है, यह नहीं कि उसके अनुसार क्या होना चाहिए।
• कोई भी समस्या चेतना के उसी स्तर पर रह कर नहीं हल की जा सकती है जिस पर वह उत्पन्न हुई है।
• बिना सवाल किसी अधिकृत व्यक्ति का सम्मान करना सत्य के खिलाफ जाना है।
• बीते हुए कल से सीखना, आज में जीना, कल के लिए आशा रखना। सबसे महत्तवपूर्ण चीज़ है, प्रशन पूंछना बंद मत करना।
• मूर्खता और बुद्धिमता में यह फर्क है की बुद्धिमता की एक सीमा होती है।
• जि़न्दगी एक तरह से साइकिल को चलाने के समान है। जिस प्रकार आगे बढ़ने के लिए हमें साइकिल पर संतुलन की ज़रूरत होती है, उसी तरह संतुलित जीवन जीकर हम जि़न्दगी में आगे बढ़ सकते हैं।
• यदि आप किसी कार्य को करने के सारे नियम जानते हैं, तो आप उस कार्य को किसी से भी बेहतर तरीके से कर सकते हैं।
• समुद्री जहाज किनारों पर सबसे ज़्यादा सुरक्षित है, पर वो किनारों पर खड़े रहने के लिए नहीं बना है।

अल्बर्ट आइंस्टीन के रोचक तथ्य (Albert Einstein interesting facts) –

  • अल्बर्ट आइंस्टीन अपने आप को संशयवादी कहते थे, वे खुद को नास्तिक नहीं कहते थे.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन अपने दिमाग में ही सारे प्रयोग का हल निकाल लेते थे.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन बचपन में पढाई में और बोलने में कमजोर हुआ करते थे.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन की मृत्यु के बाद एक वैज्ञानिक ने उनके दिमाग को चुरा लिया था, फिर वह 20 साल तक एक जार में बंद था.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन को नॉबल पुरस्कार भी मिला किन्तु उसकी राशि उन्हें नही मिल पाई.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन को राष्ट्रपति के पद के लिए भी अवसर मिला.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन युनिवर्सिटी की दाखिले की परीक्षा में फेल भी हो चुके है.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन की याददाश बहुत ख़राब होने के कारण, उनको किसी का नाम, नम्बर याद नही रहता था.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन की आँखे एक सुरक्षित डिब्बे में रखी हुई है.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन के पास खुद की गाड़ी नही थी, इसलिए उनको गाड़ी चलाना भी नहीं आता था.
  • अल्बर्ट आइंस्टीन का एक गुरुमंत्र था “अभ्यास ही सफलता का मूलमंत्र है”.

अल्बर्ट आइंस्टीन की मृत्यु (Albert Einstein Death) –

जर्मनी में जब हिटलर शाही का समय आया, तो अल्बर्ट आइंस्टीन को यहूदी होने के कारण जर्मनी छोड़ कर अमेरिका के न्यूजर्सी में आकर रहना पड़ा. अल्बर्ट आइंस्टीन वहाँ के प्रिस्टन कॉलेज में अपनी सेवाएं दे रहे थे और उसी समय 18 अप्रैल 1955 में उनकी मृत्यु हो गई.

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Thu, 20 Mar 2025 10:19:28 +0530 Jaankari Rakho
आर्यभट की जीवनी | Aryabhatta Biography in Hindi https://m.jaankarirakho.com/21 https://m.jaankarirakho.com/21 आर्यभट्ट (Aryabhata) का जन्म 476 ई. में बिहार के मगध, (आधुनिक पटना) के पाटलिपुत्र में हुआ था। वह भारतीय गणितज्ञ और भारतीय खगोल विज्ञान के शास्त्रीय युग के महान गणितज्ञ-खगोलशास्त्री थे। उन्होंने हिंदू और बौद्ध परंपरा दोनों का अध्ययन किया। आर्यभट्ट अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए नालंदा विश्वविद्यालय में आए थे। उस समय नालंदा शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र था। जब उनकी पुस्तक 'आर्यभटीय' (गणित की पुस्तक) को एक उत्कृष्ट रचना मान लिया गया तो तत्कालीन गुप्त शासक बुद्धगुप्त ने उन्हें विश्वविद्यालय का प्रधान बना दिया। आर्यभट्ट ने बिहार के तारेगना में सूर्य मंदिर में एक वेधशाला भी स्थापित की।

आर्यभट की जीवनी (Aryabhatta Biography in Hindi)

पूरा नाम आर्यभट
जन्म          दिसंबर, ई.स.476
मृत्यु          दिसंबर, ई.स. 550 [74  वर्ष ]
जन्म स्थान          अश्मक,  महाराष्ट्र,  भारत
कार्यक्षेत्र          गणितज्ञ,  ज्योतिषविद   एवं  खगोलशास्त्री
कार्यस्थल          नालंदा  विश्वविद्यालय
रचनायें          आर्यभटीय,  आर्यभट सिद्धांत
योगदान          पाई  एवं  शून्य  की  खोज

आर्यभट का जन्म कब हुआ, शुरूआती जीवन (Aryabhatta Birth and Early Life)

आर्यभट्ट का जन्म 476 ईसवी अर्थात विक्रम संवत 533 में हुआ था। इस समय को  भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता था। मगध शासक गुप्त साम्राज्य के काल में, समूचा भारत प्रगति की ओर अग्रसर था। यह सम्राट विक्रमादित्य ।। के समय में हुए थे। 

    आर्यभट्ट का जन्म स्थान वर्तमान पटना अर्थात प्राचीन कालीन मगध की राजधानी पाटलिपुत्र के निकट स्थित कुसुमपुर नामक गांव में हुआ था। लेकिन कुछ इतिहासकार उनके जन्म स्थान में मतभेद रखते हैं। उनका मानना है कि आर्यभट्ट का जन्म अस्मक, महाराष्ट्र में हुआ था।

     आर्यभट्ट अपने जीवन के किसी काल में, उच्च शिक्षा के लिए कुसुमपुर गए थे। वह कुछ समय वहां पर रहे भी थे। सातवीं शताब्दी के महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने, कुसुमपुरा की पहचान पाटलिपुत्र के रूप में की । जो कि आधुनिक समय में पटना के नाम से जाना जाता है।

        यहां पर अध्ययन का एक महान केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय स्थापित था। संभव है कि आर्यभट्ट इससे जुड़े रहे होंगे। यह भी संभव है कि गुप्त साम्राज्य के अंतिम दिनों में आर्यभट्ट, वहां रहा करते थे। गुप्त काल को भारत के स्वर्णिम युग के रूप में जाना जाता है। बिहार में पटना का प्राचीन नाम कुसुमपुर था। जहां आज आर्यभट्ट का जन्म हुआ, वह दक्षिण में भी था।

    इनके शिष्य प्रसिद्व खगोलविद वराहमिहिर थे। आर्यभट्ट ने नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर, मात्र 23 वर्ष की आयु में, आर्यभटीय नामक एक ग्रंथ लिखा था। उनके इस ग्रंथ की प्रसिद्धि और स्वीकृति के चलते। राजा बुध गुप्त ने उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का प्रमुख बना दिया था। 

 इनके बाद 875 ईसवी में, आर्यभट्ट द्वितीय हुए। जिन्हें लघु आर्यभट्ट भी कहा जाता था। जो ज्योतिष और गणित विषयों मे पारंगत व उस समय के प्रसिद्ध आचार्य थे। आर्यभट्ट द्वितीय ने आगे चलकर ज्योतिष विज्ञान पर, महा सिद्धांत नाम का एक ग्रंथ भी लिखा।

आर्यभट के कार्य  (Aryabhatta Work and Contribution)

आर्यभट  ने  गणित  एवं  खगोलशास्त्र  पर  अनेक  रचनायें  की,  इसमें  से  कुछ  रचनाये  विलुप्त  हो  चुकी  हैं.  परन्तु  आज  भी  कई  रचनाओ  का  प्रयोग  किया  जाता  हैं,  जैसे  -: आर्यभटीय.

आर्यभटीय (Aryabhatiya)

यह  आर्यभट  की  एक  गणितीय  रचना  हैं,  जिसमे  अंकगणित,  बीजगणित,  त्रिकोंमिति का  विस्तृत  वर्णन  हैं.  साथ  ही  इसमें  सतत  भिन्न  [ Continued  Fractions ],  द्विघात  समीकरण  [ Quadratic Equations ],  ज्याओं  की तालिका  [ Table  of  Sines ],  घात  श्रंखलाओ   का  योग  [ Sums  of Power  Series ],  आदि  भी  शामिल  हैं.

आर्यभट  के  कार्यों  का  वर्णन  मुख्यतः  इसी  रचना [आर्यभटीय] से  मिलता  हैं.  संभवतः  इसका  यह  नाम  भी  स्वयं  आर्यभट  ने  नहीं,  बल्कि  बाद  के  समीक्षकों  ने  यह  नाम  दिया. भास्कर  प्रथम,  जो  आर्यभट  के  शिष्य  थे,  वे  इस  रचना  को  अश्मक – तंत्र  [ Treatise  from  the  Ashmaka]कहते  थे.  सामान्य  रूप  से  इसे आर्य – शत – अष्ट  [ Aryabhat’s  108 ] भी  कहा  जाता  हैं  क्योंकि  इसमें  108  छंद / श्लोक  हैं.  यह  बहुत  ही  सार – गर्भित  रूप  में  लिखा  गया  सूत्र – साहित्य  हैं,  जिसकी  प्रत्येक  पंक्ति  प्राचीन  जटिल  प्रथाओ  का  वर्णन  करती  हैं.  यह  रचना,  जो  कि  108  छंदों  एवं  13  परिचयात्मक  छंदों  से  बनी  हैं  और  यह  4  पदों  अथवा  अध्यायों  में  विभक्त  हैं;  वे  अध्याय  निम्न-लिखित  हैं -:

  1. गीतिकापद [ 13 छंद ],
  2. गणितपद [ 33 छंद ],
  3. कालक्रियापद [ 25 छंद ],
  4. गोलपद [ 50 छंद ].

आर्य – सिद्धांत (Arya Siddhanta)   

आर्यभट  की  यह  रचना  पूर्ण  रूप  से  उपलब्ध  नहीं  हैं.  परन्तु  इसके  अवशेषों  में  अनेक  खगोलीय  उपकरणों  के  उपयोग  का  वर्णन  मिलता  हैं,  जैसे -:  शंकु – यन्त्र [ Gnomon ],  छाया – यन्त्र [ Shadow Instrument ],  बेलनाकार  यस्ती –यन्त्र [ Cylindrical Stick ],  छत्र–यन्त्र [ Umbrella  Shaped  Device],  जल – घडी  [ Water  Clock ],  कोण – मापी  उपकरण  [ Angle  Measuring Device ],  धनुर – यंत्र / चक्र  यंत्र [ Semi – Circular /  Circular Instrument],  आदि.

इस  रचना  में  सूर्य  सिद्धांत  का  प्रयोग  किया  गया  हैं.  सूर्य  सिद्धांत  में  सूर्योदय  की  उपेक्षा  की  जाती  हैं  और  इसमें  अर्द्ध  – रात्रि  गणना [ Midnight Calculations ] का  उपयोग  किया  जाता  हैं.

गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट के योगदान (Aryabhatta’s Work in Math)

शून्य की उत्पत्ति

आर्यभट्ट ने संख्याओं को आगे बढ़ाने तथा एक पूर्ण गणना करने के लिए दशमलव का उपयोग किया। इसी दशमलव को उन्होंने शून्य कहा। 

अन्य संख्याओं के बराबर आकार देने के लिए उन्होंने इसकी आकृति बदलकर एक वृत्त की तरह बना दिया। वर्तमान समय का शून्य आर्यभट्ट की ही देन है जो उनके समय से ही चलता हुआ आ रहा है।

पाई का मान

आर्यभट्ट ने आर्यभटीय के दूसरे अध्याय के दसवें छंद में पाई का मान बताया है। उन्होंने इसके लिए सबसे पहले एक वृत्त के व्यास का निश्चित मान रखा। यह व्यास उन्होंने 20,000 रखा था। 

इसमें बताया गया है कि 100 में चार जोड़कर उसे 8 से गुणा कर दीजिए तथा प्राप्त हुए परिणाम में एक बार फिर 62,000 जोड़ दीजिए। जो अंतिम परिणाम आया है उसे वृत्त के व्यास से विभाजित कर दीजिए। 

आपके पास प्राप्त हुआ परिणाम ही पाई का मान है और यह मान 3.1416 आता है जो वर्तमान समय की पाई के मान के 3 दशमलव तक सत्य है।

उन्होंने इसकी गणना भी अपने ग्रंथ में करके दिखाई है।

कुछ गणितज्ञ मानते हैं कि उन्होंने पाई को अपरिमेय संख्या बताया था। परंतु उन्हें इस तथ्य का श्रेय नहीं मिला क्योंकि उनके ग्रंथ में इसका कहीं भी सबूत नहीं है। 1761 में लैंबर्ट ने पाई को अपरिमेय संख्या बताया था जिसकी वजह से उसे इस तथ्य का श्रेय मिला।

आज से हजार-बारह सौ वर्ष पहले उनके ग्रंथ को अन्य भाषाओं में अनुवादित किया गया। तो अनुवादित पुस्तकों में पाई को अपरिमेय संख्या लिखा गया जिससे पता चलता है कि संभवतः आर्यभट्ट ने पाई को अपरिमेय संख्या लिखा था।

बीजगणित व समीकरणें

आर्यभट्ट ने संख्याओं के वर्ग व घन की श्रेणी के लिए भी सूत्रों का प्रतिपादन किया। 

प्राचीन भारत के गणितज्ञ हमेशा ही समीकरणों के अनिश्चित चरों का मान निकालने में बहुत ही रुचिकर रहे हैं। आर्यभट्ट ने चरों वाली साधारण समीकरणों का हल निकालने के लिए कुटुक सिद्धांत का प्रतिपादन किया। यह सिद्धांत बाद में मानक सिद्धांत बन गया।

उस समय में उन्होंने इस कुटुक सिद्धांत से ax+by=c जैसी समीकरणों का हल प्राप्त किया। 

आर्यभट्ट ने ही सर्वप्रथम त्रिकोणमिति के ज्या (sine) तथा कोज्या (cosine) फलनों की रचना की थी। जब उनके ग्रंथ का अरब भाषा में अनुवाद किया गया था तब अनुवादक ने इन शब्दों को जैया (Jaiya) तथा कौज्या (Kojaiya) बदल दिया। और जब उन्हीं अरब किताबों को लेटिन भाषा में अनुवादित किया गया तो इनको स्थानिक शब्दों साइन व कोसाइन से प्रदर्शित किया। जिसे पता चलता है कि साइन व कोसाइन की रचना आर्यभट्ट ने ही की थी।

खगोल विज्ञान में आर्यभट्ट के योगदान (Aryabhatta’s Work in Astrology)

ग्रहों की गति

आर्यभट्ट ने यह परिकल्पना की कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और वह हमेशा ही इसी बात पर अड़े रहे। उन्होंने समझाया कि जिस तरह एक चलती हुई नाव में बैठे हुए व्यक्ति को लगता है कि पेड़ पौधे व स्थिर चीजें उसकी गति की विपरीत दिशा यानी किनारे की ओर जा रही हैं उसी तरह पृथ्वी के लोगों को तारे चलते हुए दिखाई देते हैं। 

परंतु तारे स्थिर हैं तथा पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करती है  जिसकी वजह से तारे पश्चिम की ओर जाते हुए दिखाई देते हैं।

उन्होंने बताया कि सूर्य, चंद्रमा सभी पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। यह दो ग्रहचक्कर में गति करते हैं जिसे मंद और तेज कहा गया था। उन्होंने सभी ग्रहों को पृथ्वी से दूरी के आधार पर व्यवस्थित किया, जिसका क्रम यह है – चंद्रमा, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शनि व तारे।

सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण

सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में बताया था। 

जब पृथ्वी और सूर्य के बीच में चंद्रमा आ जाता है तो चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ने लगती है जिसे सूर्यग्रहण कहते हैं।

इसी तरह जब सूर्य व चंद्रमा के बीच में पृथ्वी आ जाती है तब पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ने लगती है जिसे चंद्रग्रहण कहते हैं। 

उन्होंने इन सिद्धांतों को राहु-केतु की मदद से समझाया। उन्होंने पृथ्वी के आकार की गणना करके ग्रहण के वक्त बनी छाया का मापन भी किया जिससे पता चलता है कि वह बहुत ही बुद्धिमान इंसान थे।

दिन-रात व वर्ष का होना 

आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करती है जिसमें उसे 23 घंटे 56 मिनट 4.1 सेकंड का समय लगता है। वर्तमान वैज्ञानिकों के अनुसार यह समय 23 घंटे 56 मिनट 4.09 एक सेकंड है जिससे पता चलता है कि आर्यभट्ट की गणना में मात्र 0.01 सेकेंड का अंतर था।

 उन्होंने यह भी बताया कि पृथ्वी को एक चक्कर तारों के चारों तरफ पूरा करने में 365 दिन 6 घंटे 12 मिनट तथा 30 सेकंड लगते हैं। वर्तमान वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार इस समय में मात्र 3 मिनट की ही त्रुटि है तथा यह मात्र 3 मिनट ही ज्यादा है।

आर्यभट्ट की रचनाएं (Aryabhatta’s Creations)

आर्यभट्ट ने मुख्यतः गणित और खगोल विज्ञान में कार्य किया था। उनके कुछ खोज कार्य खत्म हो गए परंतु ज्यादातर खोज कार्य वर्तमान समय में भी जीवंत है। उनके ग्रंथ का नाम आर्यभटीय है जिसमें उनके सभी खोज कार्य उपलब्ध हैं।

आर्यभट्ट की मुख्य खोज कार्य/रचनाएँ –

  • आर्यभटीय, भाग – गीतिकापद, गणितपद, कलाक्रियापद, गोला पद।
  • पाई का मान
  • शून्य की उत्पत्ति
  • अनिश्चित समीकरणों के हल
  • बीजगणितीय सूत्रों का प्रतिपादन
  • त्रिकोणमिति व ज्या-कोज्या का प्रतिपादन
  • ग्रहों की गति के सिद्धांत
  • चंद्र ग्रहण व सूर्य ग्रहण का ज्ञान
  • नक्षत्र काल
  • अंकगणित
  • आर्य सिद्धांत

आर्यभट्ट का ग्रंथ (Aryabhatta’s Grantha)

आर्यभट्ट ने आर्यभटीय  ग्रंथ की रचना की जिसमें उनके खोज कार्यों का वर्णन किया गया है। हालांकि, इस ग्रंथ का नाम उनके शिष्यों व अन्य लोगों ने आर्यभटीय रखा था। उन्होंने खुद ने इस ग्रंथ का नाम कहीं उल्लेखित नहीं किया है।

ग्रंथ को छंद/पद्य तरीके में लिखा गया है जो इसे पढ़ने में थोड़ा-सा कठिन बनाता है। इसमें कुल 108 छंद/पद्य हैं तथा 13 अन्य परिचयात्मक छंद है।

शुरुआती 13 छंदों में आर्यभट्ट ने अपने जीवन (Aryabhatta Biography) तथा ग्रंथ के बारे में बताया है। ग्रंथ में कुल चार अध्याय हैं जिन्हें पद कहा गया है। इन अध्यायों को हमने एक सारणी के माध्यम से समझाने की कोशिश की है जो आप नीचे देख सकते हैं –

अध्याय का नाम छंद की संख्या अध्याय सामग्री
गीतिकापद 13 समय के मापन की इकाइयां – कल्प, मनवंत्र, युग, ज्या की सारणी।
गणितपद 33 मापन, अंकगणित, ज्यामिति, शंकु छाया, साधारण, द्विघाती तथा अनिश्चित समीकरणों के हल।
कलाक्रियापद 25 ग्रहों की स्थिति, मापन व उनकी इकाइयां, क्षया तिथि, 7 दिनों का सप्ताह तथा सप्ताह के 7 दिन इत्यादि।
गोलापद 50 त्रिकोणमिति, गोला, पृथ्वी की आकृति, भूमध्य रेखा, दिन रात होने का कारण, ग्रहण व नक्षत्र।

आर्यभट्ट ने गति की सापेक्षता के बारे में बताया था कि एक चलती हुई नाव में बैठे हुए व्यक्ति को पेड़ पौधे व स्थिर चीजें चलती हुई दिखाई देती है, उसी तरह स्थिर तारे भी पृथ्वी के लोगों को पश्चिम की ओर चलते हुए दिखाई देते हैं।

आर्यभट्ट उपग्रह एवं आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान – Aryabhatta Satellite

19 अप्रैल, 1975 को भारत सरकार ने अपने पहला उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा था, जिसका नाम उन्होंने महान गणितज्ञ और खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी के नाम पर रखा था। यही नहीं इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) द्धारा वायुमंडल के संताप मंडल में जीवाणुओं की खोज की गई थी।

जिनमें से एक प्रजाति का नाम बैसिलस आर्यभट्ट रखा गया था, जबकि भारत के उत्तराखंड राज्य के नैनीताल में आर्यभट्ट के सम्मान में एक वैज्ञानिक संस्थान का नाम ”आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान” रखा गया है।

आर्यभट्ट जी की मृत्यु – Aryabhatta Death

गणित और विज्ञान के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आर्यभट्ट जी ने लगभग 550 ईसा पूर्व में अपने जीवन की अंतिम सांस ली थी।

आर्यभट्ट जी के बारे में रोचक तथ्य – Facts About Aryabhatta

  • आर्यभट्ट दुनिया के सबसे बुद्दिमान व्यक्तियों में शुमार है, जिन्होंने गणित और विज्ञान के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था,उन्होंने वर्तमान वैज्ञानिक दुनिया के लिए एक आश्चर्य प्रकट किया था। वहीं उनकी रचनाओं का इस्तेमाल ग्रीक और अरब देशों द्धारा और अधिक विकसित करने के लिए किया गया था।
  • आर्यभट्ट जी ने खगोलशास्त्र, गोलीय त्रिकोणमिति से संबंधित अपनी प्रसिद्ध रचना ‘आर्यभाटिया’ को कविता के रुप में लिखा है। यह प्राचीन भारत की सबसे लोकप्रिय और पसंदीदा किताबों में से एक है। आपको बता दें कि उन्होंने अपनी इस प्रसिद्ध रचना में अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोणमिति के 33 महत्वपूर्ण नियम बताए हैं।
  • महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट ने पाई का मान (3.1416) को दशमलव के चार अंकों तक ही सही बताया था।
  • महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी ने दशगीतिका हिस्से में पहले पांच ग्रहों की गणना एवं हिन्दू कालगणना और त्रिकोणमिति की चर्चा की है।
  • कालक्रिया में आर्यभट्ट जी ने हिन्दुकाल की गणना समेत ग्रहों की जानकारी दी थी।
  • गणितपाद में उन्होंने अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित पर संपूर्ण जानकारी प्रदान की थी।
  • आज पूरी दुनिया में पढ़ी जाने वाली त्रिकोणमिति की खोज आर्यभट्ट ने की थी।
  • आर्यभट्ट दुनिया के एक ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण लगने की भी खोज की थी। इसके साथ-साथ ग्रहण लगने का समय निकलने का फॉर्मूला और ग्रहण कितनी देर तक रहेगा, इसके बारे में भी बताया था।
  • शून्य की खोज करने वाले महान गणितज्ञ आर्यभट्ट जी का मानना था कि सौर मंडल के केन्द्र में स्थित है, पृथ्वी समेत अन्य ग्र्ह इसके परिक्रमा करते हैं।

महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी ब्रम्हांड को अनादि-अनंत मानते थे। वहीं भारतीय दर्शन के मुताबिक इस सृष्टि का निर्माण वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी और आकाश इन पांच तत्वों को मिलकर हुआ है, जबकि आर्यभट्ट जी आकाश को इन पंचतत्व में शामिल नहीं करते थे।

आर्यभट्ट के अनमोल विचारAryabhatta Quotes

1.  जरूरत से ज्यादा वक्त और इज्जत देने से लोग आप को गिरा हुआ समझने लगते हैं

2. निंदा से घबराकर अपने लक्ष्य को न छोड़िए। क्योंकि लक्ष्य मिलते ही, निंदा करने वालों की राय बदल जाती है।

3. जिस दिन आप, उसके काम के नहीं रहोगे। उस दिन वह आपकी सारी अच्छाइयां भूलकर, अपनी औकात दिखा देगा।

4. अपनी जुबान की ताकत, कभी भी अपने माता-पिता पर मत आजमाओ। जिन्होंने तुम्हें बोलना सिखाया।

5. दूसरों की गलतियों से सीखो अपने ही अनुभव से सीखने के लिए तुम्हारी उम्र कम पड़ जाएगी।

6. जिंदगी की सुंदरता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि तुम कितने खुश हो। बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि दूसरे तुमसे व तुम्हारी वजह से खुश हो सकते हैं।

7. अगर जिंदगी में कोई बड़ा कदम लेने जा रहे हो। तो ध्यान रखें कि आपका अगला कदम, पिछले से बेहतरीन हो।

8. झुको केवल इतना ही, जितना सही हो। बेवजह झुकना, केवल दूसरों के अहम को बढ़ावा देता है।

9. आलसी मनुष्य का वर्तमान और भविष्य कुछ नहीं होता।

10. प्यार और लगाओ में बहुत अंतर होता है। प्यार आप को आजाद कर देता है। वहीं लगाओ, आप को कमजोर कर देता है।

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Thu, 20 Mar 2025 10:19:22 +0530 Jaankari Rakho
सम्राट अशोक की जीवनी, इतिहास | Samrat Ashok History in Hindi, Biography, Story https://m.jaankarirakho.com/24 https://m.jaankarirakho.com/24 सम्राट अशोक को उनके अदभुत साहस, पराक्रम, निडरता और निर्भीकता की वजह  से अशोक महान के नाम से पुकारा जाता था। इसके अलावा उन्हें प्रियदर्शी एवं देवानाम्प्रिय आदि नामों भी संबोधित किया जाता था। सम्राट अशोक एक ऐसे शासक थे, जिन्होंने अपने शासनकाल में अपनी कुशल कूटनीति का इस्तेमाल कर मौर्य सम्राज्य का विस्तार किया था।

अशोक महान ने उत्तर में हिन्दुकश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी तक दक्षिण और कर्नाटक, मैसूर तक और पूरब में बंगाल से पश्चिम में अफगानिस्तान तक अपने मौर्य सम्राज्य का विस्तार किया था। अशोक महान ने अपने कुशल प्रशासन से मौर्य सम्राज्य को उस समय तक का भारत का सबसे बड़ा सम्राज्य बनाया था। इसलिए सम्राट अशोक को उनकी कुशल प्रशासन नीति और कूटनीति की वजह के लिए भी जाना जाता था।

सम्राट अशोक का जीवन परिचय

नाम सम्राट अशोक  
अन्य नाम प्रियदर्शी
जन्म 304 ईसा पूर्व, पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार)
माता सुभद्रांगी (जिन्हें धर्मा के नाम से भी जाना गया)
पिता बिंदुसार मौर्य
भाई विताशोक और 99 अन्य
पत्नी देवी, करूवकी, पद्मावती, असंधिमित्रा, तिश्यारक्षा
पुत्र महिंदा, कुणाल, तिवाला
पुत्री संघमित्रा,  चारुमति
दादा चंद्रगुप्त मौर्य
दादी दुर्धरा 
साम्राज्य मौर्य साम्राज्य
धर्म बौद्ध
पूर्ववर्ती राजा बिंदुसार मौर्य
उत्तराधिकारी राजा दशरथ
मृत्यु 232 ईसा पूर्व, पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार)
उम्र 71-72 वर्ष

जन्म और शुरूआती जीवन

सम्राट अशोक हिस्ट्री हिंदी – अशोक का जन्म मौर्य वंश के राजा बिन्दुसार एवं धर्मा के यहाँ 304 ईसा पूर्व हुआ था। लंका की परंपरा के अनुसार बिन्दुसार की 16 पटरानी एवं 101 पुत्रो का वर्णन मिलता है। इन पुत्रों में से तीन के ही नामो का उल्लेख रहता है – सुसीम (सबसे बड़ा), अशोक एवं तिष्य। एक बार अशोक की माता धर्मा को अपने बेटे अशोक के सम्राट बनने का सपना आया। इस बात की जानकारी मिलने पर बिन्दुसार ने धर्मा को अपनी पत्नी बना लिया यद्यपि वो महिला किसी राजसी कुल से सम्बंधित नहीं थी। अशोक (Samrat Ashok) को अपने जीवन में बहुत से सौतेले भाइयों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।

थोड़ा ही बड़ा होने के बाद अशोक की सैन्य कौशल देखने को मिलने लगी थी। उनके युद्ध कौशल को और अधिक निखार देने के लिए शाही प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की गयी थी। इस प्रकार से अशोक को काफी कम आयु में तीरंदाजी के साथ अन्य जरुरी युद्ध कौशलो में काफी अच्छी महारत मिल चुकी थी। इसके साथ ही वे उच्च कोटि के शिकारी भी थे और उनके द्वारा एक छड़ी से शेर में मारने की कला का भी वर्णन मिलता है। उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हे मौर्य शासन के अवन्ति में होने वाले दंगों को रोकने भी भेजा गया था।

अपने समय के दो हजार वर्षो ने बाद भी अशोक के राज्य के प्रभाव दक्षिण एशिया में देखने को मिलते है। अपने काल में जो अशोक चिन्ह निर्मित किया था उसका स्थान आज भी भारत के राष्ट्रीय चिन्ह में है। बौद्ध धर्म में भगवान बुद्ध के बाद सर्वाधिक स्थान राजा अशोक और उनके धर्म कार्यों को ही दिया जाता है।

अशोक का साम्राज्य

Samrat Ashok Ka Jivan Parichay – अशोक की पत्नी का नाम दिव्यदान में ‘तिष्यरक्षिला’ वर्णिन है। पुराने लेख में सिर्फ ‘करूणावकि’ को उनकी पत्नी के रूप में बताया गया है। दिव्यदान में अशोक के दो ही भाई बताये गए है – सुसीम एवं विगताशोक। इसमें से अपने बड़े भाई सुसीम तक्षशिला के प्रांतपाल भी थे। तक्षशिला में इस समय भारतीय-यूनानी मूल के लोग भारी संख्या में निवास करते थे। अतः ये स्थान विद्रोह के लिए काफी उपर्युक्त हो गया था। इस स्थान पर सुसीन का प्रशासन था जिनके खराब नेतृत्व के कारण यहाँ काफी विद्रोह पनपने लगा। सुसीन की सलाह पर ही राजा बिन्दुसार ने अशोक को इस स्थान पर प्रशासन का कार्य सौपा। किन्तु अशोक के बिना किसी प्रकार के रक्तपात के ही इन लोगो ने विरोध करना बाद कर दिया। किन्तु कुछ समय बाद दुबारा हुए विरोध को अशोक ने बल से कुचल डाला।

इस प्रकार अशोक के कौशल से भाई सुसीन में सिंहासन का भय बढ़ाता जा रहा था। अशोक को रोकने के लिए सुसीन ने सम्राट बिन्दुसार को कहकर अशोक को निर्वास में डलवा दिया। इसके बाद अशोक कलिंग में पहुंचे तो यहाँ पर उनको मत्यस्य कुमारी कौर्वकी से प्यार हो गया। उपलब्ध साक्ष्य बताते है कि ये उनकी दूसरी या तीसरी रानी थी। बिंदुसार ने अशोक को निर्वासन से बुलाकर फिर से विद्रोह को रोकने के लिए भेजा। यहाँ उनके पिता ने अशोक की पहचान को गुप्त रखा चूँकि उनके भाई सुसीन के द्वारा उनकी हत्या का भी खतरा था।

कलिंग का युद्ध (Kalinga War)

जब अशोक को मौर्य साम्राज्य के सम्राट बने हुए 8 साल हो गए थे तब उसने कलिंग का युद्ध किया। कलिंग के युद्ध में एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए और 1,50,000 से ज्यादा लोग घायल हो गए और कई हजारों जानवर भी मारे गए। इस भयंकर हत्याकांड से सम्राट अशोक को मन ही मन रुदन हुआ।

उसे एहसास हुआ कि इस युद्ध के कारण लाखों बेगुनाह लोगों व जीवों की जाने चली गई। युद्ध के भीषण खून-खौलाब को देखकर उसका (Samrat Ashoka ) हृदय परिवर्तन हो गया और उसने शपथ ली कि वह आने वाले समय में कभी युद्ध नहीं करेगा।

सम्राट अशोक निर्माण कार्य

सम्राट अशोक का शासन तकरीबन पूरे तत्कालीन भारत मे था और सम्राट अशोक मौर्य भी अपने दादा चन्द्रगुप्त मौर्य की तरह ही जैन धर्म का अनुयायी था, उसने अपने जीवनकाल में कई भवन, स्तूप, मठ और स्तंभ का निर्माण करवाया। सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गये मठ और स्तूप राजस्थान के बैराठ में मिलते हैं इसके साथ ही साँची का स्तूप भी काफी प्रसिद्ध है और यह भी सम्राट अशोक द्वारा ही बनाया गया था.

सम्राट अशोक मौर्य के शिलालेख

भारत के महान शासक सम्राट अशोक मौर्य ने अपने जीवन में कई निर्माण कार्य कराए थे. सम्राट अशोक ने अपने जीवन में कई शिलालेख भी खुदवाये जिन्हें इतिहास में सम्राट अशोक के शिलालेखों के नाम से जाना जाता है. मौर्य वंश की पूरी जानकारी उनके द्वारा स्थापित इन्ही मौर्य वंश के शिलालेखों में मिलती है। सम्राट अशोक ने इन शिलालेखो को ईरानी शासक की प्रेरणा से खुदवाए थे. सम्राट अशोक के जीवनकाल के करीब 40 शिलालेख इतिहासकारों को मिले हैं जिसमे से कुछ शिलालेख तो भारत के बाहर जैसे अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, वर्तमान बांग्लादेश व पाकिस्तान इत्यादि देशों में मिले हैं. भारत में मौजूद सम्राट अशोक के शिलालेख एवं उनके नाम निम्नलिखित हैं –

शिलालेख स्थान
रूपनाथ जबलपुर ज़िला, मध्य प्रदेश
बैराट राजस्थान के जयपुर ज़िले में, यह शिला फलक कलकत्ता संग्रहालय में भी है।
मस्की रायचूर ज़िला, कर्नाटक
येर्रागुडी कर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश
जौगढ़ गंजाम जिला, उड़ीसा
धौली पुरी जिला, उड़ीसा
गुजर्रा दतिया ज़िला, मध्य प्रदेश
राजुलमंडगिरि बल्लारी ज़िला, कर्नाटक
गाधीमठ रायचूर ज़िला, कर्नाटक
ब्रह्मगिरि चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक
पल्किगुंडु गवीमट के पास, रायचूर, कर्नाटक
सहसराम शाहाबाद ज़िला, बिहार
सिद्धपुर चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक
जटिंगा रामेश्वर चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक
येर्रागुडी कर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश
अहरौरा मिर्ज़ापुर ज़िला, उत्तर प्रदेश
दिल्ली अमर कॉलोनी, दिल्ली

सम्राट अशोक का शासनकाल एवं विशाल मौर्य सम्राज्य का विस्तार – Mauryan Empire Achievements

जब अशोक के बडे़ भाई सुशीम अवन्ती की राजधानी उज्जैन के प्रांतपाल थे, उसी दौरान अवन्ती में हो रहे विद्रोह में भारतीय और यूनानी मूल के लोगों के बीच दंगा भड़क उठा, जिसको देखते हुए राजा बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को इस विद्रोह को दबाने के लिए भेजा, जिसके बाद अशोक ने अपनी कुशल रणनीति अपनाते हुए इस विद्रोह को शांत किया।

जिससे प्रभावित होकर राजा बिन्दुसार ने सम्राट अशोक को मौर्य वंश का शासक नियुक्त कर दिया गया। अवन्ती में हो रहे विद्रोह को दबाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद सम्राट अशोक को अवंती प्रांत के वायसराय के रुप में भी नियुक्त किया गया था। वहीं इस दौरान उनकी छवि एक कुशल राजनीतिज्ञ योद्धा के रुप में भी बन गई थी।

इसके बाद करीब 272 ईसा पूर्व में सम्राट अशोक के पिता बिंदुसार की मौत हो गई। वहीं इसके बाद सम्राट अशोक के राजा बनाए जाने को लेकर सम्राट अशोक और उनके सौतेले भाईयों के बीच घमासान युद्ध हुआ। इसी दौरान सम्राट अशोक की शादी विदिशा की बेहद सुंदर राजकुमारी शाक्या कुमारी से हुई।

शादी के बाद दोनों को महेन्द्र और संघमित्रा नाम की संतानें भी प्राप्त हुई। कुछ इतिहासकारों के मुताबिक 268 ईसा पूर्व के दौरान मौर्य वंश के सम्राट अशोक ने अपने मौर्य सम्राज्य का विस्तार करने के लिए करीब 8 सालों तक युद्ध लड़ा। इस दौरान उन्होंने न सिर्फ भारत के सभी उपमहाद्धीपों तक मौर्य सम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि भारत और ईरान की सीमा के साथ-साथ अफगानिस्तान के हिन्दूकश में भी मौर्य सम्राज्य का सिक्का चलवाया।

इसके अलावा महान अशोक ने दक्षिण के मैसूर, कर्नाटक और कृष्ण गोदावरी की घाटी में भी कब्जा किया। उनके सम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र (मगध, आज का बिहार) और साथ ही उपराजधानी तक्षशिला और उज्जैन भी थी। इस तरह सम्राट अशोक का शासन धीरे-धीरे बढ़ता ही चला गया और उनका सम्राज्य उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय सम्राज्य बना। हालांकि, सम्राट अशोक मौर्य सम्राज्य का विस्तार तमिलनाडू, श्रीलंका और केरल में करने में नाकामयाब हुआ।

अशोका और कलिंगा घमासान युध्द – Ashok Kalinga War

तक़रीबन 261 ईसापूर्व  में भारतीय इतिहास के सबसे शक्तिशाली और ताकतवर योद्धा सम्राट अशोक ने अपने मौर्य सम्राज्य का विस्तार करने के लिए कलिंग (वर्तमान ओडिशा) राज्य पर आक्रमण कर दिया और इसके खिलाफ एक विध्वंशकारी युद्ध की घोषणा की थी।

इस भीषण युद्ध में करीब 1 लाख लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई, मरने वालों में सबसे ज्यादा संख्या सैनिकों की थी। इसके साथ ही इस युद्ध में करीब डेढ़ लाख लोग बुरी तरह घायल हो गए। इस तरह सम्राट अशोक कलिंग पर अपना कब्जा जमाने वाले मौर्य वंश के सबसे पहले शासक तो बन गए, लेकिन इस युध्द में हुए भारी रक्तपात ने उन्हें हिलाकर रख दिया।

बौध्द धर्म 

        कलिंग युद्ध में हुई क्षति तथा नरसंहार से उसका मन युद्ध से ऊब गया और वह अपने कृत्य को लेकर व्यथित हो उठा। इसी शोक से उबरने के लिए वह बुद्ध के उपदेशों के करीब आता गया और अंत में उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। बौद्ध धर्म स्वीकारने के बाद उसने उसे अपने जीवन मे उतारने का प्रयास भी किया। उसने शिकार तथा पशु-हत्या करना छोड़ दिया। उसने ब्राह्मणों एवं अन्य सम्प्रदायों के सन्यासियों को खुलकर दान देना भी आरंभ किया। और जनकल्याण के लिए उसने चिकित्यालय, पाठशाला तथा सड़कों आदि का निर्माण करवाया। उसने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धर्म प्रचारकों को नेपाल, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, मिस्र तथा यूनान भी भेजा।

        इसी कार्य के लिए उसने अपने पुत्र एवं पुत्री को भी यात्राओं पर भेजा था। अशोक के धर्म प्रचारकों में सबसे अधिक सफलता उसके पुत्र महेन्द्र को मिली। महेन्द्र ने श्रीलंका के राजा तिस्स को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया, और तिस्स ने बौद्ध धर्म को अपना राजधर्म बना लिया और अशोक से प्रेरित होकर उसने स्वयं को 'देवनामप्रिय' की उपाधि दी। अशोक के शासनकाल में ही पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता मोगाली पुत्र तिष्या ने की। यहीं अभिधम्मपिटक की रचना भी हुई और बौद्ध भिक्षु विभिन्‍न देशों में भेजे गये जिनमें अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा भी सम्मिलित थे, जिन्हें श्रीलंका भेजा गया।

        बौद्ध धर्म स्वीकार करने के बाद अशोक ने उसके प्रचार करने का बीड़ा उठाया । उसने अपने धर्म के अनुशासन के प्रचार के लिए अपने प्रमुख अधिकारीयों युक्त ,राजूक और प्रादेशिक को आज्ञा दी। धर्म की स्थापना , धर्म की देखरेख धर्म की वृद्धि तथा धर्म पर आचरण करने वालो के सुख एवं हितों के लिए धर्म – महामात्र को नियुक्त किया । बौद्ध धर्म का प्रचार करने हेतु अशोक ने अपने राज्य में बहत से स्थान पर भगवान बुद्ध की मूर्तियाँ स्थापित की । विदेश में बौद्ध धर्म के प्रचा हेतु उसने भिक्षुओं को भेजा । विदेश में बौद्ध धर्म के लिए अशोक  ने अपने पुत्र और पुत्री तक को भिक्षु-भिक्षुणी के वेष में भारत से बाहर भेज दिया । इस तरह से वें बुद्ध धर्म का विकास करते चले गये। धर्म के प्रति अशोक की आस्था का पता इसी से चलता है की वे बिना 1000 ब्राम्हणों को भोजन कराए स्वयं कुछ नहीं खाते थे ।

अशोक के धर्म साधन – Samrat Ashok Ki Jivani

  • धार्मिक यात्राओं की शुरुआत
  • राजकीय पदाधिकरियो को नियुक्त करना
  • धर्म महापात्रो को नियुक्त करना
  • दिव्य रूपों को प्रदर्शित करना
  • धार्मिक श्रवण एवं उपदेश की व्यवस्था करना
  • लोक चारिता के काम करना
  • धर्मलिपि की खुदाई एवं शिलालेख का निर्माण
  • विदेशों में धर्म का प्रचार करना

    बौद्ध धर्म के प्रचारक के रुप में सम्राट अशोक –

    बौद्ध धर्म अपनाने के बाद सम्राट अशोक एक महान शासक एवं एक धर्मपरायण योद्धा के रुप में सामने आए। इसके बाद उन्होंने अपने मौर्य सम्राज्य के सभी लोगों को अहिंसा का मार्ग अपनाने और भलाई कामों को करने की सलाह दी और उन्होंने खुद भी कई लोकहित के काम किए साथ ही उन्हें शिकार और पशु हत्या करना पूरी तरह छोड़ दिया।

    ब्राह्मणों को खुलकर दान किया एवं कई गरीबों एवं असहाय की सेवा की। इसके साथ ही जरूरतमंदों के इलाज के लिए अस्पताल खोला, एवं सड़कों का निर्माण करवाया यही नहीं सम्राट अशोक ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार को लेकर 20 हजार से भी ज्यादा विश्वविद्यालयों की नींव रखी।

    ह्रद्यय परिवर्तन के बाद सम्राट अशोक ने सबसे पहले पूरे एशिया में बौध्द धर्म का जोरो-शोरों से प्रचार किया। इसके लिए उन्होंने कई धर्म ग्रंथों का सहारा लिया। इस दौरान सम्राट अशोक ने दक्षिण एशिया एवं मध्य एशिया में भगवान बुद्ध के अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए करीब 84 हजार स्तूपों का निर्माण भी कराया।

    जिनमें वाराणसी के पास स्थित सारनाथ एवं मध्यप्रदेश का सांची स्तूप काफी मशहूर हैं, जिसमें आज भी भगवान बुद्ध के अवशेषों को देखा जा सकता है। अशोका के अनुसार बुद्ध धर्म सामाजिक और राजनैतिक एकता वाला धर्म था। बुद्ध का प्रचार करने हेतु उन्होंने अपने राज्य में जगह-जगह पर भगवान गौतम बुद्ध की प्रतिमाएं स्थापित की। और बुद्ध धर्म का विकास करते चले गये। बौध्द धर्म को अशोक ने ही विश्व धर्म के रूप में मान्यता दिलाई।

    बौध्द धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा तक को भिक्षु-भिक्षुणी के रूप में अशोक ने भारत के बाहर, नेपाल, अफगानिस्तान, मिस्त्र, सीरिया, यूनान, श्रीलंका आदि में भेजा। वहीं बौद्ध धर्म के प्रचारक के रुप में सबसे ज्यादा सफलता उनके बेटे महेन्द्र को मिली, महेन्द्र ने श्री लंका के राजा तिस्स को बौद्ध धर्म के उपदेशों के बारे में बताया, जिससे प्रभावित होकर उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना राजधर्म बना दिया।

    सार्वजानिक कल्याण के लिये उन्होंने जो कार्य किये वे तो इतिहास में अमर ही हो गये हैं। नैतिकता, उदारता एवं भाईचारे का संदेश देने वाले अशोक ने कई अनुपम भवनों तथा देश के कोने-कोने में स्तंभों एवं शिलालेखों का निर्माण भी कराया जिन पर बौध्द धर्म के संदेश अंकित थे।

    ‘अशोक चक्र’ एवं शेरों की ‘त्रिमूर्ति’ – महान अशोक की देन – Ashoka Chakra

    भारत का राष्ट्रीय चिह्न ‘अशोक चक्र’ तथा शेरों की ‘त्रिमूर्ति’ भी अशोक महान की ही देंन है। ये कृतियां अशोक निर्मित स्तंभों और स्तूपों पर अंकित हैं। सम्राट अशोक का अशोक चक्र जिसे धर्म चक्र भी कहा जाता है, आज वह हमें भारतीय गणराज्य के तिरंगे के बीच में दिखाई देता है। ‘त्रिमूर्ति’ सारनाथ (वाराणसी) के बौध्द स्तूप के स्तंभों पर निर्मित शिलामूर्तियों की प्रतिकृति है।

    सम्राट अशोक का महान व्यक्तित्व – King Ashoka Story

    भारतीय इतिहास के महान योद्धा सम्राट अशोक ने अपने-आप को कुशल प्रशासक सिध्द करते हुए बेहद कम समय में ही अपने राज्य में शांति स्थापित की। उनके शासनकाल में देश ने विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ चिकित्सा शास्त्र में काफी तरक्की की। उसने धर्म पर इतना जोर दिया कि प्रजा इमानदारी और सच्चाई के रास्ते पर चलने लगी।

    चोरी और लूटपाट की घटानाएं बिलकुल ही बंद हो गईं। अशोक घोर मानवतावादी थे। वह रात-दिन जनता की भलाई के लिए काम  किया करते थे। उन्हें विशाल साम्राज्य के किसी भी हिस्से में होने वाली घटना की जानकारी रहती थी।

    धर्म के प्रति कितनी आस्था थी, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वह बिना एक हजार ब्राम्हणों को भोजन कराए स्वयं कुछ नहीं खाते थे, कलिंग युध्द अशोका के जीवन का आखरी युध्द था, जिससे उनका जीवन ही बदल गया था।

    सम्राट अशोक के बारे में कुछ दिलचस्प एवं रोचक तथ्य – Ashoka Facts

    • अशोका के नाम “अशोक” का अर्थ “दर्दरहित और चिंतामुक्त” होता है। अपने आदेशपत्र में उन्हें प्रियदर्शी एवं देवानाम्प्रिय कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि सम्राट अशोका का नाम अशोक के पेड़ से ही लिया गया था।
    • आउटलाइन ऑफ़ हिस्ट्री इस किताब में अशोका में बारे में यह लिखा है की, “इतिहास में अशोका को हजारो नामो से जानते है, जहां जगह-जगह पर उनकी वीरता के किस्से उल्लेखित है, उनकी गाथा पूरे इतिहास में प्रचलित है, वे एक सर्वप्रिय, न्यायप्रिय, दयालु और शक्तिशाली सम्राट थे।
    • लोकहित के नजरिये से यदि देखा जाये तो सम्राट अशोक ने अपने समय में न केवल मानवों की चिंता की बल्कि उन्होंने जीवमात्र के लिए भी कई सराहनीय काम किए हैं। इसलिए सम्राट अशोक को अहिंसा, शांति, लोक कल्याणकारी नीतियों के लिए एक अतुलनीय और महान अशोक के रुप में जाना जाता था।
    • सम्राट अशोक को एक निडर एवं साहसी राजा और योद्धा माना जाता था।
    • अपने शासनकाल के समय में सम्राट अशोक अपने साम्राज्य को भारत के सभी उपमहाद्वीपो तक पहुचाने के लिये लगातार 8 वर्षो तक युद्ध लड़ते रहे। इसके चलते सम्राट अशोक ने कृष्ण गोदावरी के घाटी, दक्षिण में मैसूर में भी अपना कब्ज़ा कर लिया, लेकिन वे तमिलनाडू, केरल और श्रीलंका पर शासन नहीं कर सके।
    • सम्राट अशोक की कई पत्नियां थी, लेकिन सिर्फ महारानी देवी को ही उनकी रानी माना गया था।
    • कभी हार नहीं मानने वाले सम्राट अशोक एक महान शासक होने के साथ-साथ एक अच्छे दार्शनिक भी थे।
    • भारतीय इतिहास के अद्धितीय शासक अशोक ने लोगों को शिक्षा के महत्व को समझाया एवं इसका जमकर प्रचार-प्रसार भी किया, आपको बता दें कि उन्होंने अपने जीवनकाल में 20 से ज्यादा विश्वविद्यालयों की स्थापना की थी।
    • मौर्य वंश में 40 साल के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले सम्राट अशोक ही एक मात्र शासक थे।
    • सम्राट अशोक भारतीय इतिहास के एक ऐसे य़ोद्धा थे, जो अपने जीवनकाल में कभी हार का सामना नहीं किया।
    • महान शासक सम्राट अशोक का अशोक चिन्ह आज के गौरवमयी भारत को दर्शाता है।
    • सम्राट अशोक के द्धारा बौद्ध धर्म का पूरे विश्व में प्रचार-प्रसार करने एवं भगवान बुद्ध के उपदेशों को लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्हें बौद्ध धर्म के प्रचारक के रुप में भी जाना जाता है।
    • सम्राट अशोक ने अपने सिद्धांतों को धम्म नाम दिया था।

    सम्राट अशोक जैसा महान शासक शायद ही इतिहास में कोई दूसरा हो। वे एक आकाश में चमकने वाले तारे की तरह है जो हमेशा चमकता ही रहता है, भारतीय इतिहास का यही चमकता तारा सम्राट अशोका है।

    एक विजेता, दार्शनिक एवं प्रजापालक शासक के रूप में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा। उन्होंने जो त्याग एवं कार्य किए वैसा इतिहास में दूसरा कोई नहीं कर सका। सम्राट अशोका एक आदर्श सम्राट थे।

    इतिहास में अगर हम देखे तो उनके जैसा निडर सम्राट ना कभी हुआ ना ही कभी होंगा। उनके रहते मौर्य साम्राज्य पर कभी कोई विपत्ति नहीं आयी।

सम्राट अशोक की मृत्यु (Death Of Samrat Ashoka)

सम्राट अशोक की मृत्यु 232 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र में हुई थी। मृत्यु के समय उसकी उम्र 71-72 वर्ष थी। अशोक ने लगभग 37 वर्षों तक प्राचीन भारत पर राज किया।

अपने अंतिम दिनों में उन्होंने राज्य की कमाई को सन्यासियों में बांटना शुरू कर दिया। परंतु, मंत्रियों ने ऐसा करने से रोक दिया। तो अशोक ने खुद की चीजों को दान देना शुरू कर दिया।

जब अपना सब कुछ दान दे दिया तो एक विशिष्ट फल जो अशोक के पास रहता था उसे भी दान के रूप में दे दिया। वह पूरी तरह से बौद्ध धर्म में परिवर्तित हो चुका था। जब अशोक का देहांत हो गया था तो अशोक के शरीर को 7 दिन और रातों तक जलाया गया।

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Thu, 20 Mar 2025 10:19:16 +0530 Jaankari Rakho
अटल बिहारी वाजपेयी जीवनी | Atal Bihari Vajpayee biography in hindi https://m.jaankarirakho.com/28 https://m.jaankarirakho.com/28 बहु प्रतिभावान राजनैतिज्ञ अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीती में पिछले 50 सालों से सक्रीय है. अपने राजनैतिक सफ़र में वाजपेयी जी सबसे आदर्शवादी व प्रशंसनीय राजनेता थे. अटल जी जैसा नेता होना पुरे देश के लिए गर्व की बात है. उनके बहुत से कामों की वजह से देश आज इस मुकाम पर है. जवाहरलाल नेहरु के बाद अगर कोई 3 बार प्रधानमंत्री बना है तो वो अटल जी ही है. अटल जी पिछले 5 दशकों से संसद में सक्रीय रहे, साथ ही वे इकलोते राजनेता है जो 4 अलग अलग प्रदेश से सांसद चुने गए. अटल जी भारत की आजादी के पहले से राजनीती में आ गए थे, उन्होंने गाँधी जी के साथ भारत छोड़ो आन्दोलन में भी भाग लिया था, और कई बार जेल यातनाएं भी सही.

अटल  बिहारी वाजपेयी जीवनी  ( Atal Bihari Vajpayee biography in hindi )

क्रमांक जीवन परिचय बिंदु अटल बिहारी जीवन परिचय
1. पूरा नाम अटल बिहारी वाजपेयी
2. जन्म 25 दिसम्बर 1924
2. मृत्यु 16 अगस्त  2018
3. जन्म स्थान ग्वालियर, मध्यप्रदेश
4. माता-पिता कृष्णा देवी, कृष्णा बिहारी वाजपेयी
5. विवाह नहीं हुआ
6. राजनैतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी
7. अवार्ड 1992 – पद्म विभूषण
1994 – लोकमान्य तिलक अवार्ड
1994 – बेस्ट सांसद अवार्ड
1994 – पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त अवार्ड
2014 – भारत रत्न

अटल बिहारी वाजपेयी प्रारम्भिक जीवन

भारतीय इतिहास में तीन बार के प्रधानमंत्री रहने वाले अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म एक मध्यम वर्गीय परिवार में 25 दिसंबर 1924 में मध्य प्रदेश जिले के ग्वालियर के एक गांव में हुआ था (पैतृक गांव – बटेश्वर)। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी एक शिक्षक और एक कवि भी थे। उनकी माता का नाम कृष्णा देवी वाजपेयी और उनके 7 भाई बहन भी थे, जिनके नाम हम आपको आगे बतायेंगे।

अटल बिहारी शिक्षा

बिहारी वाजपेई की प्रारंभिक शिक्षा बड़नगर के ‘गोरखी विद्यालय’ से पूरी हुई। इस विद्यालय में अटल जी ने 8वीं तक की शिक्षा प्राप्त की। उन्हे एक अच्छे वक्ता के रूप में इसी स्कूल से पहचान मिली थी। जब वे कक्षा 5 में पढ़ते थे। तो पाठयक्रम गतिविधियों के चलते उन्होंने  पहली बार भाषण दिया था, लेकिन बड़नगर में उच्च शिक्षा व्यवस्था न होने के कारण उन्हें ग्वालियर जाना पड़ा। उनका नामांकन विक्टोरिया कॉलेजिएट स्कूल में हुआ और नौवीं कक्षा से इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई इसी स्कूल में की।

इंटरमीडिएट करने के बाद अटल जी ने ‘विक्टोरिया कॉलेज’ में स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रवेश लिया। स्नातक स्तर की शिक्षा के लिए उन्होंने तीनों विषय भाषा पर आधारित लिए जो संस्कृत, हिन्दी और अंग्रेज़ी थे। अटल जी की साहित्यिक प्रकृति थी, जिससे वह तीनों भाषाओं के प्रति आकृष्ट हुए। कॉलेज जीवन में ही उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। शुरूआत में वे ‘छात्र संगठन’ से जुड़े। नारायण राव  ने इन्हें काफ़ी प्रभावित किया, जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख कार्यकर्ता थे।

ग्वालियर में रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के शाखा प्रभारी के रूप में अपने दायित्वों की पूर्ति की। कॉलेज जीवन में उन्होंने कविताओं की रचना करना शुरू कर दिया था। इनकी साहित्यिक अभिरुचि उसी समय काफ़ी परवान चढ़ी। उनके कॉलेज में अखिल भारतीय स्तर के कवि सम्मेलनों का भी आयोजन होता था। इस कारण से कविता की गहराई समझने में उन्हें काफ़ी मदद मिली। 1943 में वाजपेयी जी कॉलेज यूनियन के सचिव रहे और 1944 में उपाध्यक्ष भी बने।
ग्वालियर की स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद अटल बिहारी जी कानपुर आ गए ताकि राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त कर सकें। वहाँ उन्होंने एम. ए. तथा एलएल. बी. में एक साथ प्रवेश लिया। चूंकि स्नातक परीक्षा इन्होंने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी, इस कारण इन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हो रही थी। कानपुर के डी. ए. वी. महाविद्यालय से इन्होंने कला में स्नातकोत्तर उपाधि भी प्रथम श्रेणी में प्राप्त की।

अटल बिहारी वाजपेयी राजनैतिक सफ़र (Atal Bihari Vajpayee Political Life)–

अटल जी का राजनैतिक सफ़र स्वतंत्रता संग्रामी के रूप में शुरू हुआ. 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में बाकि नेताओं के साथ उन्होंने भाग लिया और जेल भी गए, इसी दौरान उनकी मुलाकात भारतीय जनसंघ के लीडर श्यामा प्रसाद मुखर्जी से हुई. अटल जी ने मुखर्जी जी के साथ राजनीती के दाव पेंच सीखे. मुखर्जी जी का स्वास्थ ख़राब रहने लगा और जल्दी ही उनकी मौत हो गई, इसके बाद अटल जी ने ही भारतीय जनसंघ की बागडौर संभाल ली और इसका विस्तार पुरे देश में किया.

  • 1954 में बलरामपुर से वे मेम्बर ऑफ़ पार्लियामेंट चुने गए. जवानी के दिनों में भी अटल जी को अपनी सोच व समझ के कारण राजनीती में काफी आदर व सम्मान मिला.
  • 1968 में दीनदयाल उपाध्या की मौत के बाद अटल जी जन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए. इसके बाद उन्होंने कुछ सालों तक नानाजी देसाई, बलराज मध्होक व लाल कृष्ण आडवानी के साथ मिलकर जन संघ पार्टी को भारतीय राजनीती में आगे बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत की.
  • 1977 में भारतीय जन संघ पार्टी ने भारतीय लोकदल के साथ गठबंधन कर लिया, जिसे जनता पार्टी नाम दिया गया. जनता पार्टी ने बहुत जल्दी ग्रोथ की और लोकल चुनाव में उसे सफलता भी मिली, इसके बाद जनता पार्टी के लीडर मोरारजी देसाई जब प्रधानमंत्री बने और सत्ता में आये तब अटल जी को एक्सटर्नल अफेयर मिनिस्टर बनाया गया. इसी के बाद वे चाइना व पाकिस्तान दौरे में गए, जहाँ उन्होंने इस देशों से भारत के संबंध सुधारने का प्रस्ताव रखा.
  • 1979 में जब मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया, तब जनता पार्टी भी बिखरने लगी. अटल जी ने 1980 में लाल कृष्ण आडवानी व भैरव सिंह शेखावत के साथ मिल कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) बनाई, और पार्टी के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए. अगले पांच सालों तक अटल जी ही पार्टी के अध्यक्ष रहे.
  • 1984 के चुनाव में बीजेपी सिर्फ 2 सीट से हारी, जिसके बाद अटल जी ने पार्टी को मजबूत बनाने के लिए जी तोड़ काम किया और पार्लियामेंट के अगले चुनाव 1989 में बीजेपी 88 सीटों की बढ़त के साथ आगे रही.
  • 1991 में विपक्ष की मांग के चलते एक बार फिर पार्लियामेंट में चुनाव हुआ, जिसमें एक बार फिर बीजेपी 120 सीटों के साथ आगे रही.
  • 1993 में अटल जी सांसद में विपक्ष के लीडर बनके बैठे. नवम्बर 1995 में मुंबई में हुई बीजेपी कांफ्रेंस में अटल जी को बीजेपी का प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोषित किया गया.

प्रधानमंत्री के कार्यकाल में अटल जी के द्वारा किए गए प्रमुख कार्य / मुख्य उपलब्धियां

  • भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाया

सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी जी ने प्रधानमंत्री रहते हुए राजस्थान के पोखरण में सन् 1998 में 11 मई और 13 मई को पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके हमारे देश को परमाणु शक्ति संपन्न देश बनाया। यह एक साहसिक कदम था, जिससे हमारे देश को अलग ही पहचान मिली। भारत देश का यह परमाणु परिक्षण इतनी गोपनीयता से किया गया था की पश्चिमी देशों की आधुनिक तकनीक भी नहीं पकड़ पायी थी। परमाणु परिक्षण के बाद कुछ देशों ने अनेक प्रतिबंध भी लगये परन्तु अटल जी ने इन सब चीज़ों की परवाह न करते हुए आगे बढ़े और हमारे देश को नई आर्थिक विकास की ऊँचाईयों तक ले गए।

  • पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारने की पहल की

अटल जी ने 19 फरवरी 1999 में दिल्ली से लाहौर तक की बस सेवा शुरू की, जिसे सदा-ए-सरहद का नाम दिया गया। बस सेवा शुरू कर के दोनों देश के बीच आपसी रिश्ते में सुधार लाने की पहल की और उस समय उन्होंने पाकिस्तान का दौरा भी किया और वहां के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ सरीफ से मुलाकात भी की।

  • कारगिल युद्ध (1999)

कुछ समय बाद पाकिस्तानी सेना प्रमुख परवेज़ मुसर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना और आतंकवादियों द्वारा कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ शुरू कर दी और कई पहाड़ की चोटियों पर अपना कब्ज़ा कर लिया। तब जवाबी कार्यवाही में अटल बिहारी जी की सरकार ने ठोस कदम उठाएं और भारतीय सेना को खुला समर्थन दिया। जिससे कि हमारी सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ दिया और उन्हें धूल चटा दी।

  • स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना

अटल बिहारी वाजपेयी जी ने ही भारत के सड़क मार्ग को जोड़ने का काम चारों कोनों से किया है। इसमें दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों को राजमार्गों से जोड़ने का काम किया गया जिसे स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का नाम दिया गया और अभी तक अटल बिहारी वाजपेय जी की सरकार ने ही सबसे ज्यादा सड़के बनवाई है।

अटल सरकार द्वारा किये गए अन्य प्रमुख कार्य

  • अटल जी की सरकार में 100 वर्ष से भी पुराने कावेरी जल विवाद को सुलझाया गया।
  • कई समितियों और आयोगों का गठन किया गया जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा समिति, आर्थिक सलाह समिति, व्यापार एवं उद्योग समिति आदि।
  • राष्ट्रीय राजमार्गों एवं हवाई अड्डों का विकास किया गया।
  • नयी टेक्नोलॉजी, विद्यतीकरण को गति देना, दूरसंचार को बढ़ावा देना आदि।
  • ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के अवसर पैदा करना और विदेशों में बसे भारतीयों के लिए बिमा योजना को शुरू किया।
  • अर्बन सीलिंग एक्ट समाप्त कर आवास निर्माण को प्रोत्साहन दिया।
  • नई टेलीकॉम नीति और कोकण रेलवे की शुरुआत की। इनके कार्यकाल में टेलीकॉम क्षेत्र और रेलवे विभाग विकास की नई ऊँचाईयों को छुआ।

अटल बिहारी वाजपेयी अवार्ड व अचिवेमेंट्स (Atal Bihari Vajpayee Awards & Achivements)–

  • 1992 में देश के लिए अच्छे कार्य करने के कारण अटल जी को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया.
  • 1994 में उनको बेस्ट सांसद का अवार्ड मिला.
  • 2014 में देश के सर्वोच्य सम्मान भारत रत्न से अटल जी को सम्मानित किया गया. ये सम्मान उनके जन्म दिन 25 दिसम्बर को रास्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा उनके निवास स्थान पर दिया गया. अटल जी के लिए पहली बार किसी राष्ट्रपति ने प्रोटोकॉल तोड़ कर घर जाकर सम्मान दिया.
  • प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अटल जी को भारतीय राजनीती का भीष्म पितामह कहते है.
  • अटल जी चार अलग अलग प्रदेशों उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात व दिल्ली से सांसद चुने गए.

अटल जी को संगीत का भी बहुत शौक है, उनके पसंदीदा संगीतकार लता मंगेश्वर, मुकेश व मो रफ़ी है. अटल जी ने आजीवन शादी ना करने की प्रतिज्ञा ली थी, जिस पर वे कायम भी रहे. उनकी गोद ली हुई बेटी नमिता व नंदिता के वे बेहद करीब है, अटल जी अपने सभी रिश्तेदारों से भी बेहद लगाव रखते है. 

कवि 

अटल बिहारी वाजपेयी राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक कवि भी थे। ‘मेरी इक्यावन कविताएँ’ अटल जी का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह थे। वाजपेयी जी को काव्य रचनाशीलता एवं रसास्वाद के गुण विरासत में मिले हैं। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत में अपने समय के जाने-माने कवि थे।
वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली में काव्य रचना करते थे। पारिवारिक वातावरण साहित्यिक एवं काव्यमय होने के कारण उनकी रगों में काव्य रक्त-रस अनवरत घूमता रहा है। उनकी सर्व प्रथम कविता ‘ताजमहल’ थी। इसमें शृंगार रस के प्रेम प्रसून न चढ़ाकर “एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मजाक” की तरह उनका भी ध्यान ताजमहल के कारीगरों के शोषण पर ही गया। वास्तव में कोई भी कवि हृदय कभी कविता से वंचित नहीं रह सकता।

अटल जी ने किशोर वय में ही एक अद्भुत कविता लिखी थी – ”हिन्दू तन-मन (कविता) हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय”, जिससे यह पता चलता है कि बचपन से ही उनका रुझान देश हित की तरफ था।

राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता आद्योपान्त प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पायी। विख्यात गज़ल गायक जगजीत सिंह ने अटल जी की चुनिंदा कविताओं को संगीतबद्ध करके एक एल्बम भी निकाला था।

अटल जी की प्रमुख रचनायें

उनकी कुछ प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ इस प्रकार हैं –

1. क़दम मिला कर चलना होगा ।

2. हरी हरी दूब पर। 

3. कौरव कौन, कौन पांडव ।

4. दूध में दरार पड़ गई ।

5. क्षमा याचना ।

6. मनाली मत जइयो ।

7. पुनः चमकेगा दिनकर ।

8. अंतरद्वंद्व ।

9. जीवन की ढलने लगी साँझ ।

10. मौत से ठन गई ।

11. मैं न चुप हूँ न गाता हूँ ।

12. एक बरस बीत गया ।

13. आओ फिर से दिया जलाएँ ।

अटल बिहारी वाजपेयी की कुल संपत्ति (Total Assets)

  • अटल जी के पास कुल 2 मिलियन डॉलर की संपत्ति है। इसके अलावा अटल जी का दिल्ली के ईस्ट ऑफ कैलाश इलाके में एक फ्लैट भी है, जिसकी कीमत करोड़ रुपए में है।

अटल बिहारी वाजपेई द्वारा दी गई महत्वपूर्ण टिप्पणियां (Quotes)

1. आज परस्पर वैश्विक निर्भरता का मतलब है कि विकासशील देशों में आर्थिक आपदायें, विकसित देशों पर एक प्रतिक्षेप पैदा कर सकता है।

2. आप दोस्तों को बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसियों को नहीं।

3. किसी भी देश को खुले आम आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक गठबंधन के साथ साझेदारी, सहायता, उकसाना और आतंकवाद प्रायोजित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

4. गरीबी बहुआयामी है यह पैसे की आय से परे शिक्षा, स्वास्थ्य की देखरेख, राजनीतिक भागीदारी और व्यक्ति की अपनी संस्कृति और सामाजिक संगठन की उन्नति तक फैली हुई है।

5. जो लोग हमें यह पूछते हैं कि हम कब पाकिस्तान के साथ वार्ता करेंगे, वे शायद इस तथ्य से वाकिफ नहीं हैं कि पिछले 55 वर्षों में पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए हर बार पहल भारत ने ही किया है।

6. जैव विविधता सम्मेलन से दुनिया के गरीबों के लिए कोई भी ठोस लाभ नहीं निकला है।

अटल जी से जुड़े विवाद (Controversy)

  • अटल बिहारी वाजपेयी जी को हमेशा से ही एक साफ छवि के नेता के तौर पर देखा जाता रहा है और रहेगा भी। पंरतु इसके साथ कुछ विवाद भी जुड़े है। इसमें सबसे पहले बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले का नाम लिया जाता है। जिस वक्त बाबरी मजिस्द को गिराया गया था, उस वक्त विपक्ष के कई नेताओं द्वारा अटल जी की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए गए थे। क्योंकि इस मजिस्द के खिलाफ उस वक्त बीजेपी के कई नेताओं द्वारा रैली निकाली गई थी।
  • दूसरा विवाद कंधार प्लेन हाईजैक से जुड़ा है। यह बाद 24 दिसंबर 1999 की है, तब काठमांडू से दिल्ली से उड़े एक विमान को हथियारबंद आतंकियों द्वारा हाईजैक कर लिया था। तब विमान में 176 यात्रियों और 15 क्रू मेंबर्स की जान बचाने के लिए तीन आतंकी: मसूद अजहर, उमर शेख और अहमद जरगर को रिहा करना पड़ा था। इस मामले को लेकर अटल जी कड़ी निंदा हुई थी। विपक्ष का कहना था की यदि सरकार सूझबूझ से काम लेती तो विमान यात्रिओं की जान आतंकियों को छोड़े बिना भी बचायी जा सकती थी।
  • तीसरा मामला उनपर कारगिल युद्ध को लेकर भी सवाल उठाये जाते थे।

93 वर्ष की आयु में हुआ निधन ( Death)

  • इस महान राजनेता ने अपने जीवन की अंतिम सांस दिल्ली के एम्स में 16 अगस्त2018 को ली. इनका इलाज कर रहे डॉक्टरों के मुताबिक इनका निधन निमोनिया और बहु अंग विफलता के कारण हुआ.
  • गौरतलब है कि अटल जी लंबे समय से बीमार थे और साल 2009 में ये स्ट्रोक का भी शिकार हो गए. जिसके कारण इनके सोचने समझने की क्षमता पर असर पड़ा और ये धीरे धीरे डिमेंशिया नामक बीमारी से ग्रस्त हो गए.
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Thu, 20 Mar 2025 10:19:08 +0530 Jaankari Rakho
Anjali Arora Biography in Hindi | अंजलि अरोड़ा का जीवन परिचय https://m.jaankarirakho.com/7 https://m.jaankarirakho.com/7 अंजलि अरोड़ा एक भारतीय मॉडल, टिकटोक स्टार, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और अभिनेत्री हैं। उनका जन्म 3 नवंबर 1999 को पंजाब में हुआ था। वह 2021 में 21 साल की हैं। उनका गृहनगर नई दिल्ली है। वह अपने लिप-सिंक वीडियो की वजह से सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो चुकी हैं और इसके अलावा वह अपने अकाउंट पर डांसिंग और कॉमेडी के वीडियो भी पोस्ट करती रहती हैं।

अंजलि अरोड़ा का जीवनी – Anjali Arora Wiki / Biograghy

टिक टॉक स्टार और कच्चा बादाम गर्ल अंजलि अरोरा के बारे में हमने उपरही शॉर्ट में सब जानकारी और अंजलि कौन है यह सब देखा ही है. अब निचे दिए गए टेबल का जरिये हम सब अंजलि अरोरा की शिक्षा, राशी, वजन, उचाई, जन्मस्थान, आयु, धर्म और बाकि सब महत्वपूर्ण जानकारी सविस्तार से देखेंगे. (Anjali Arora Biography In Hindi)

पुरा नाम ( Full Name ) अंजली अश्विनी अरोडा
निक नेम ( Nick Name ) अंजी, अंजु
भाई ( Brother ) अभिषेक अरोड़ा
माता ( Mother ) बबीता अरोड़ा
पिता ( Father ) अश्वनी अरोड़ा
बॉयफ्रेंड ( Boyfriend ) आकाश संसनवाल ( Akash Sansanwal )
राशि ( Zodiac sign ) तुला ( Libra )
जन्म तिथि ( Date of Birth ) 3 नवंबर 1999
उम्र ( Age ) 23 Years ( साल 2022 में )
जन्म स्थान ( Birth Place ) पंजाब, भारत
स्कूल ( School ) गुरु हरकिशन पब्लिक स्कूल, नई दिल्ली
कॉलेज ( College ) देश बंधू कॉलेज, दिल्ली युनिव्हर्सिटी
शिक्षा ( Educational Qualification ) ग्रेजुएट बी बी ए ( Graduate – BBA )
धर्म ( Religion ) सिख
नागरिकता ( Nationality ) भारतीय
होम टाउन ( Home Town ) नई दिल्ली, इंडिया
उंचाई ( Height ) 5’61” (1.70m)
वजन (Weight) 55 Kg
फिगर (Body Measurement) 34-28-36
व्यवसाय ( Profession ) मॉडेल, अभिनेत्री, इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर
इनकम ( Net Worth ) 40 से 50 लाख इंडियन रूपीस
वैवाहिक स्थिति ( Marital status ) अविवाहित ( साल 2022 में )

अंजलि अरोड़ा का प्रारंभिक जीवन (Anjali Arora early life)

अंजलि अरोड़ा एक सिख‌ परिवार से बिलॉन्ग करती है, उनका जन्म 3 नवंबर 1999 मैं पंजाब में हूआ। वे दिल्ली में अपने परिवार के साथ ही रहती हैं इनके पिता का नाम अश्विनी अरोड़ा है और उनकी माता का नाम शैली अरोड़ा है। अंजलि के अलावा इनका एक भाई भी है जिनका नाम वंश अरोड़ा है जो कि एक बिजनेसमैन हैं।

अंजलि ने अपने स्कूल की पढ़ाई गुरु हरकिशन पब्लिक स्कूल से पूरी की है और अपनी कॉलेज की पढ़ाई अंजलि ने देशबंधु कॉलेज से की है यहां से इन्होंने अपना ग्रेजुएशन कंप्लीट किया।

अंजलि अरोड़ा की शिक्षा (Anjali Arora Education)

  • अंजलि ने अपने स्कूली शिक्षा गुरु हरकृष्ण स्कूल पंजाब से की है। वह पढ़ाई में इतनी अच्छी थी कि उसके परिवार के सदस्यों ने सोचा कि वे यूपीएससी को बहुत आसानी से पास कर लेगी ।
  • लेकिन अंजलि को कुछ और बनना था। पढ़ाई में अच्छी होने के साथ-साथ उन्हें डांस और एक्टिंग का भी शौक था। शौक नहीं यह उनके लिए एक तरह का जुनून था।
  • स्कूल के बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करना शुरू किया। अगर लॉकडाउन नहीं होता तो उनका ग्रेजुएशन 2020 में ही पूरा हो जाता।
  • लॉकडाउन के कारण उनकी अंतिम वर्ष की परीक्षाएं नहीं हो सकी। उन्होंने ग्रेजुएशन के दौरान मॉडलिंग शुरू कर दी थी । उन्होंने अक्टूबर 2017 में इंस्टाग्राम जॉइन किया था।
  • लेकिन 2017 में उन्होंने ज्यादा नहीं सिर्फ एक या दो तस्वीरें पोस्ट की थी। हजारों टिक टांकर्स की तरह अंजलि ने भी अपने करियर की शुरुआत टिक टॉक से ही की थी।

अंजलि अरोड़ा का करियर – Anjali arora career

अंजली अरोरा का एक ही सपना था एक्ट्रेस बनना और उनको बचपन से ही डांस और एक्टिंग करना बैहद पसंद था, और इसके जलवे उन्होंने स्कूल और कॉलेजसेही दिखाना शुरू कर दिए थे. अंजली अरोरा ने साल 2018 में टिक टॉक अकाउंट चालू किया था उस पर उन्होंने अपने डांसिग और लिप्सींग वीडियोस शेअर किए थे.

2018 में अपने टिक टॉक करिअर के शुरुवाती दिन अंजलि अरोरा फेमस टिक टॉकर मंजुल खट्टर को अपनी प्रेरणा मानती थी और उनको बेहद चाहती भी थी. 2018 और 2019 अंजलि के वीडियो ज्यादा चलते भी नहीं थे, वायरल होने को तो अभी टाइम था. लेकिन 2019 सालके आखिर में अंजलि के 1 लाख फॉलोवर्स हो गए थे.

अंजलीने अपना काम फिरभी चालूहि रखा था और 2020 में अंजलि के एक के बाद एक ऐसे काफी वीडियो वायरल हो गए और एकही साल में अंजलीने 5 मिलियन से भी ज्यादा फॉलोवर्स गेन करे थे. अंजलि अरोड़ा टिक टॉक के जरिये बेहद फेमस भी हो रही थी, और उनके टिक टॉक पर 9.3 मिलियन से भी ज्यादा फालोवर्स हो गए थे. (Anjali Arora Biography In Hindi)

Anjali Arora net worth/salary (अंजली अरोरा की कमाई) 

एकता कपूर और कंगना रनौत का नया रियलिटी शो ‘लॉक अप’। इन दिनों यह काफी चर्चा में है। एएलटी बालाजी और एमएक्स प्लेयर पर 24×7 स्ट्रीमिंग, आप इस शो को 72 दिनों तक बिना रुके देख सकते हैं। जहां 12 विवादित हस्तियां अभी भी शो का हिस्सा हैं। वहीं स्वामी चक्रपाणि महाराज जेल से बाहर आ गए हैं।

‘कच्चा बादाम’ फेम अंजलि अरोड़ा, पूनम पांडे, मुनव्वर फारूकी, सायशा शिंदे, शिवम और सिद्धार्थ शर्मा (शिवम शर्मा-सिद्धार्थ शर्मा), सारा खान (सारा खान), पायल रोहतगी, करणवीर बोहरा समेत कई कंटेस्टेंट बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। दर्शकों के दिलों में अपनी जगह। हालांकि कई बार किसी न किसी बात को लेकर उनकी आलोचना भी हो जाती है। लेकिन क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि अगर आप कंटेंट (लॉक अप कंटेस्टेंट सैलरी) दे रहे हैं तो आप भी उसी के हिसाब से चार्ज कर रहे हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि ये जेल के कैदी एक हफ्ते से कितना चार्ज कर रहे हैं।

कंगना की फर्जी जेल में बंद ये सभी कैदी जेलर की बात मानने को मजबूर हैं। क्योंकि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो सजा के तौर पर उनका क्या होगा इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता. जिंदा रहने के लिए कई बार उन्हें अपनी निजी जिंदगी के कुछ ऐसे पन्ने पलटने पड़ते हैं, जिनके बारे में उनके करीबियों को भी पता नहीं होता है। अब कुछ पाने के लिए कुछ कुर्बानी देनी पड़ती है, यही उनकी शर्त है। खैर, बिना ज्यादा रोल किए आइए जानते हैं हर कंटेस्टेंट की कमाई के बारे में-

11 मिलियन फॉलोअर्स ‘कच्चा बादाम’ से पॉपुलर हुईं अंजलि अरोड़ा हर हफ्ते 3 से 4 लाख रुपए चार्ज करती हैं। वहीं मुनव्वर फारूकी भी 3 से 3.5 लाख रुपए ले रहे हैं।

विवाद (Anjali Arora Controversy)

अगस्त 2022 में उनका एक कथित वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लीक हो गया था, जिसमें अंजलि आपत्तिजनक स्थिति में हैं। बाद में उसने चुप्पी तोड़ी और कहा, “मुझे नहीं पता कि यह लोग क्या कर रहे हैं। लोग मेरी फोटो खींचकर मेरा नाम बदनाम कर रहे हैं और कह रहे हैं कि यह अंजलि है।

मुझे नहीं पता कि लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं। उनका भी एक परिवार है और मेरा भी एक परिवार है। मेरा परिवार भी सभी वीडियो देखता है। कभी-कभी मुझे लगता है कि जब मैं ये सब देखती हूं तो वे ऐसा क्यों कर रहे हैं।

अंजलि अरोड़ा इंस्टाग्राम अकाउंट – Anjali arora instagram account

अंजलि अरोरा अपने करियर के ऐन ऊंचाई पर थी तभी भारतके मोदी सरकारने टिकटाॅक को भारत में बैन कर दिया. तब भारत के सब टिक टॉक स्टार्स की हालत बेहद ख़राब हो गयी थी और हर कोई टिक टॉक का ऑप्शन ढूंढ रहे थे. उसी वक्त टिक टॉक के काफी स्टार्स और अंजलिने भी इंस्टाग्रामपर लिप्सींग वीडियोस और डांसिंग वीडियोस शेयर करना शुरू किया. Visit anjali’s Insta Account.

अंजलि अरोड़ा यूट्यूब चैनल – Anjali arora youtube channel

इसके साथही अंजलिने अपना खुद का यूट्यूब चैनल भी शुरू किया और यूट्यूब पर अपने शॉर्ट वीडियो और vlogs शेयर करना शुरू किया. देखते देखते अंजलीका यूट्यूब चैनल भी ग्रो हुआ और उनके यूट्यूब चैनल पर अभी 3.65 लाख से भी ज्यादा सब्सक्राइबर्स हो गए है. Visit anjali’s Ytb Channel.

अंजलि अरोड़ा के बारें में कुछ रोचक जानकारियां

  • अंजलि अरोड़ा एक फिटनेस फ्रीक हैं और एक सख्‍त फिटनेस रूटीन का पालन करती हैं।
  • वह पैट (pet) लवर भी हैं और उनके घर एक पालतू कुत्‍ता भी हैं, जिसे वे बहुत प्‍यार करती हैं।
  • अंजलि को घूमना और एडवेंचर खेलों का शौक हैं। वह अब तक 8 से अधिक देशों की यात्रा कर चुकी हैं।
  • अंजलि अरोड़ा का कहना हैं कि उनके पसंदीदा जस मानक हैं, उन पर उनका बहुत क्रश हैं।
  • वह हिंदी, पंजाबी, हरियाणवी और अंग्रेजी भाषाओं को बोल लेती हैं।
  • अंजलि अरोड़ा अपना ज्‍यादा समय अपने परिवार के साथ बिताना पसंद करती हैं।
  • अंजलि का सपना था एक बार केदारनाथ घूमने का और उन्‍होंने पूरा भी किया।
  • वे 2018 में केदारनाथ गई थीं, लेकिन कुछ स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के कारण वह मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकीं।

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Thu, 20 Mar 2025 10:19:02 +0530 Jaankari Rakho
सपना चौधरी का जीवन परिचय | Sapna Choudhary Biography in hindi https://m.jaankarirakho.com/1 https://m.jaankarirakho.com/1 Sapna Choudhary सपना गायक और नर्तक हैं, वह हरियाणा और अन्य उत्तरी भारत में काफी लोकप्रिय हैं। सपना चौधरी हरियाणा में सबसे ज्यादा मांग कलाकार है। अपने पहले गीत ‘सॉलिड बॉडी’ के साथ एक हिट बन गई। उनका धमाकेदार हरियाणवी डांस और सॉन्ग लोगों के बीच काफी फेमस है। उनके अद्भुत नृत्य वीडियो के कारण उनके बहुत सारे प्रांसक हैं। यूट्यूब पर उनके नृत्य के कई वीडियो हैं।

सपना चौधरी का परिचय एवं व्यक्तिगत जानकारी (Sapna Choudhary biography in hindi)

नाम सपना चौधरी
उपनाम सपना
जन्म तारीख  25 सितम्बर 1990
आयु 30
जन्म स्थान रोहतक, हरियाणा
राशि तुला
नागरिकता भारतीय
धर्म (Caste) हिन्दू
ऊँचाई 5 फीट 7 इंच
वज़न 55 किलो ग्राम
आँखों का रंग गहरा भूरा
बालों का रंग काला
वैवाहिक स्थिति अविवाहित
पसंद नृत्य, संगीत और यात्रा करना
पसंदीदा अभिनेता दिलजीत दोसांझ
पसंदीदा अभिनेत्री दीपिका पादुकोण
पसंदीदा गायक नेहा कक्कर, सुनन्दा शर्मा, कौर बी, मिस पूजा, प्रीत हरपाल और जस्सी गिल    
पसंदीदा खिलाडी गीता फोगाट, बबिता कुमारी, योगेश्वर दत्त  
मशहूर शो आर्केस्ट्रा शो
मशहूर गाना बहु जमींदार की, गोरा गोरा  
अफेयर्स या बॉय फ्रेंड ए. हूडा
पति वीर साहू

सपना चौधरी जन्म और प्रारंभिक जीवन (Sapna Choudhary Birth and Early Life)

सपना चौधरी का 25 सितम्बर 1990 को रोहतक, हरियाणा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. सपना के पिता उत्तरप्रदेश के रहने वाले हैं और इनकी माता नीलम चौधरी हरियाणा की हैं. इनके माता-पिता ने लव -मैरिज की थी. उनके अलावा परिवार में उनके दो छोटे भाई बहन भी हैं.

सपना की प्रारंभिक शिक्षा रोहतक के विद्यालय में हुई. 12 वर्ष की उम्र में ही सपना के पिता की मृत्यु ही गई थी. जिसके बाद सपना और उसके परिवार को बहुत सी आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा. पारिवारिक आर्थिक समस्याओं को दूर करने के लिए सपना स्टेज पर डांस और गाने का काम करने पड़ा. जिसके बाद सपना रोहतक के स्थानीय ऑर्केस्ट्रा के साथ जुड़ गई. पिता की मृत्यु के बाद सपना को पता चला कि आर्थिक कारणों की वजह से माँ ने घर के कागज गिरवी रखे हुए थे. जिसे सपना ने अपने डांसिंग और सिंगिंग के कमाई से वापस अपनी माँ को लौटा दिया. सपना चौधरी बहुत ही कम समय में एक मशहूर सिंगर और डांसर के रूप में खुद को स्थापित कर लिया.

कौन है सपना चौधरी के पति?

कलाकार सपना अपनी व्यक्तिगत जीवन को अमूमन काफी सीक्रेट रखती है, बहुत से उनके प्रशंसक सपना की पर्सनल लाइफ के बारे में नहीं जानते हैं। सपना ने जनवरी 2020 में वीर साहू से शादी की थी वर्तमान में दोनों वैवाहिक रिश्ते में हैं. शादी से पूर्व भी यह दोनों 4 सालों से एक दूसरे को जानते थे।

सपना के एक बेटा भी है दरअसल दोनों के विवाह के समय साहू के परिवार में स्वजन का निधन होने के चलते शादी की खबर सार्वजनिक नहीं की गई थी। ऐसा कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है. वीर एक पेशेवर गायक और अभिनेता है।

सपना चौधरी का कैरियर (Sapna Choudhary Career)

सपना ने दिल्ली और हरियाणा के कई पार्टियों में अपने गायन और नृत्य का प्रदर्शन किया है. उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत हरियाणा की स्थानीय आर्केस्ट्रा टीम के साथ की थी। वह सलवार कमीज और दुपट्टे के साथ ही नृत्य प्रदर्शन करती है।

बहुत ही कम समय में वह एक प्रसिद्ध गायिका के रूप में लोगों से सराहना और प्रशंसा प्राप्त कर ली है। अपने पहले गीत सॉलिड बॉडी के बाद हुए सुपरस्टार बन गई सपना चौधरी जब भी लाइव शो करती है तब हर उम्र के दर्शक उनकी नृत्य और गायन शैली का भरपूर आनंद लेते हैं।

उनके प्रशंसक उनके नृत्य वीडियो को यूट्यूब पर अपलोड करते हैं। सपना चौधरी यूट्यूब पर भी काफी मशहूर है उन्होंने अपने आप को हरियाणवी गायिका के रूप में स्थापित किया है। अब तक वे 20 से भी अधिक कई मशहूर गाने को गा चुकी है।

सपना चौधरी का विवाद (Sapna Choudhary Controversy) :                     

  • सपना चौधरी का विवादों से अक्सर आमना सामना होता रहा है. सपना चौधरी के बारे में लोगों की अपनी राय है जिनमे से कुछ उन्हें आइटम गर्ल कहते है तो कुछ लोग उनके नृत्य को अश्लील मानते है. कई लोगों ने उन्हें अभद्र की श्रेणी में रखा है, लेकिन सपना ने ऐसे लोगों को अपने मजबूत जवाब में ये कहते हुए अश्लील होने के टैग को अस्वीकार कर दिया है कि अगर वह अश्लील है तो बॉलीवुड में जो भी अभिनेत्री आईटम गानों पर नृत्य करती है वह भी अशिष्ट है.
  • सपना उस वक्त विवादों में फिर से आई जब उन्होंने चूहों को मारने वाले दवा को खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की. अपनी आत्महत्या की कोशिश का कारण उन्होंने यह बताया था कि 2016 में हुए उनके एक शो के दौरान यह आरोप उन पर लगा था की उन्होंने दलित भावनाओं को ठेस पहुँचाया है, इसके लिए उनके खिलाफ़ दो मामले दर्ज किये गए थे. साथ ही संतपाल तंवर ने उनके खिलाफ़ ऑनलाइन अभियान चलाया था जिस वजह से वह उदास हो कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी. 

बिग बॉस में सपना चौधरी

हरियाणा की रोहतक की मशहूर नृत्यकी सपना के नाम से आज हर कोई वाकिफ है कई प्रदेशों में इनके दीवाने बसते हैं एक गरीब किसान परिवार में जन्म लेने वाली सपना चौधरी आज एक उद्यम कलाकार है। उनके फैंस के लिए एक अच्छी खबर है।

सलमान खान द्वारा होस्ट किए जा रहे सोनी एवं कलर्स के बिग बॉस शो 11 की प्रतिभागी भी बन चुकी है। 25 सितंबर 1990 को जन्मे सपना का घर के आर्थिक हालात सामान्य नहीं थे स्थिति तो तब बहुत बुरी हो चली जब इनके पिता का देहांत हो गया था।

इससे सारे परिवार की जिम्मेदारी सपना पर ही आन पड़ी मुश्किलों के बीच बचपन काटते हुए इन्होंने डांस करना शुरू किया जिससे घर का खर्चा हुआ उनका शौक भी पूरा होने लगा था।

सपना चौधरी के हिट गाने (Sapna Choudhary Hit Song’s)

सपना चौधरी ने कई हिट गाने गाए हैं, जिसे लोगों के द्वारा खूब पसंद किया गया है। इसमें से एक गाना “तेरी अंखियों का यो काजल” बहुत ही अधिक पसंद किया गया था इस गाने में वह अपने डांस के कारण लोगों के आकर्षण का बिंदु बन गई थी।

सपना चौधरी का “चेतक” गाना भी काफी पसंद किया गया था सपना चौधरी का एक और गाना है जो कि यूट्यूब पर बहुत ही ज्यादा पसंद किया गया है. वह “नजर लाग जा गी“, यह एक हरियाणवी गाना है। इस गाने को डांस के कारण लोगों द्वारा बहुत ही पसंद किया गया।

छोटे पर्दे पर सपना चौधरी की मौजूदगी

हरयाणवी गानों और फिल्मों के अलावा सपना छोटे पर्दे पर भी दिख चुकी हैं सपना 2017 में कलर्स चैनल पर आने वाले ‘बिग बॉस’ के 11वें सीजन में प्रतिभागी रह चुकी हैं इसके अलावा वो कलर्स चैनल के ही एक अन्य कार्यक्रम ‘लाडो-वीरपुर की मर्दानी’ के दूसरे संस्करण में नजर आ चुकी हैं।

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Thu, 20 Mar 2025 10:18:30 +0530 Jaankari Rakho
Mithali Raj Biography in Hindi | मिथाली राज का जीवन परिचय https://m.jaankarirakho.com/2 https://m.jaankarirakho.com/2 क्रिकेट जगत में अपना अलग ही मुकाम हासिल करने वाली। जिन्हें लेडी सचिन भी कहा जाता है। वो है, भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राजअपने बल्ले के हुनर से देश का दिल जीतने वाली। मिताली राज की गिनती बेहतरीन खिलाड़ी के साथ ही, दुनिया की खूबसूरत महिला क्रिकेटर के रूप में भी होती है। लेकिन क्रिकेट दुनिया में राज करने वाली मिताली को, बचपन में क्रिकेट नहीं। बल्कि कुछ और पसंद था।

मिथाली राज टेस्ट और वन डे भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान हैं. इन्हें क्रिकेट की उन महान बल्लेबाज महिला में से एक माना जाता है, जोकि अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे अधिक रन बनाने वाली महिला है, और ये एक मात्र ऐसी महिला है जिन्होंने वनडे में 6,000 रनों से भी ज्यादा रन बनाकर रिकॉर्ड कायम किया. ये लगातार 7 बार अर्धशतक लगाने वाली पहली महिला खिलाड़ी हैं. मिथाली राज भारत के लिए (पुरुष और महिला दोनों में) पहली कप्तान है जोकि 2005 और 2017 दो बार आईसीसी ओडीआई विश्वकप फाइनल में शामिल हो सकी. इनके जीवन के बारे में यहाँ दर्शाया जा रहा है.

मिथाली राज का जीवन परिचय Mithali Raj Biography in hindi

नाम: मिताली राज  
निकनेम:   लेडी सचिन
जन्म: 3 दिसंबर 1982  
जन्म स्थान: जोधपुर,राजस्थान, भारत  
वर्तमान उम्र:   39 साल
प्रोफेशन: क्रिकेटर  
लिंग: महिला  
 धर्म: हिंदू  
आंखों का रंग: काला काला    
राष्ट्रीयता: भारतीय
बालों का रंग: काला
लंबाई: 5 फुट 4 इंच  
जर्सी नंबर:   3  
कोच: ज्योति प्रसाद, संपत कुमार, विनोद शर्मा  
बैटिंग स्टाइल: राइट हैंड
बॉलिंग स्टाइल: लेग ब्रेक  
अवार्ड: अर्जुन अवार्ड(2005), पद्मश्री अवार्ड(2015), मेजर ध्यानचंद खेल रत्न अवॉर्ड(2021)  
गृह नगर: सिकंदराबाद भारत  
 शैक्षिक योग्यता:   12वीं पास  
जाति: तमिल  
शौक: डांस करना, पढ़ना
वैवाहिक स्थिति: अविवाहित  

मिथाली राज का जन्म और परिवार (Mithali Raj Birth and Family)

माता: लीला राज  
पिता: दुरई राज  
भाई:               मिथुन राज
बहन: नही  

मिथाली राज का जन्म 3 दिसंबर 1982 को राजस्थान के जोधपुर शहर में तमिल परिवार में हुआ. इनके पिता दोराज राज हैं जोकि भारतीय वायुसेना अधिकारी हैं और माता लीला राज हैं जोकि गृहणी हैं. इनका परिवार अन्ध्राप्रदेश में रहता है.

मिताली राज का प्रारम्भिक जीवन Early Life of Mithali Raj

 मिताली राज का जन्म 3 दिसंबर 1982 को राजस्थान के जोधपुर शहर में हुआ था। इनका जन्म एक तमिल परिवार में हुआ। इनके पिता दोराई राज है। जो कि एक इंडियन एयर फोर्स में वारंट ऑफिसर  थे। लेकिन बाद में, यह आंध्रा बैंक में नौकरी करने लगे। वहीं इनकी मां लीला राज है। जो कि Lawrence and Mayo के Engineering instrument division में काम करती थी।

     मिताली ने बचपन से ही क्लासिकल डांस सीखना शुरू कर दिया था। मिताली 10 साल की उम्र में ही, भरतनाट्यम में पारंगत हो गई थी। वह इसी में, कैरियर बनाने के बारे में सोचने लगी। यह बचपन से ही बेहद आलसी प्रवृत्ति की थी। इनके पिता ने इन्हें एक्टिव बनाने के लिए, डांस के साथ-साथ क्रिकेट की ट्रेनिंग दिलानी शुरू कर दी।

     मिताली के पिता की नौकरी में, तबादले की वजह से, इनका परिवार जोधपुर से सिर्फ हैदराबाद आ गया। मिताली का एक बड़ा भाई मिथुन राज भी हैं।

मिताली राज की शिक्षा Education of Mithali Raj

  मिताली राज की प्रारंभिक शिक्षा हैदराबाद में ही हुई। इन्होंने अपना हाई स्कूल, सेंट जॉन स्कूल हैदराबाद से किया। फिर इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त करने के लिए, इन्होंने कस्तूरबा गांधी जूनियर कॉलेज फॉर विमेन में दाखिला लिया। यहां से इन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद मिताली ने, कभी ग्रेजुएशन करने के लिए ट्राई नहीं किया।

मिथाली राज का करियर (Mithali Raj Career)

मिथाली राज ने भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए टेस्ट और एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट दोनों खेले हैं. सन 1997 में महिला क्रिकेट विश्वकप में उन्हें केवल 14 वर्ष की उम्र में शामिल किया गया था, लेकिन ये अंतिम स्क्वाड में शामिल नहीं हो सकीं. इसके बाद सन 1999 में मिल्टन केन्स में आयललैंड के खिलाफ एक दिवसीय मैच में इन्होने नाबाद 114 रन बनाए. उन्होंने सन 2001 – 02 के सत्र में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अपना पहला टेस्ट मैच खेला. 17 अगस्त 2002 में 19 वर्ष की उम्र में इन्होने अपने तीसरे टेस्ट में कैरण रोल्टन के विश्व के सबसे अधिक टेस्ट स्कोर 209* का रिकॉर्ड तोड़ दिया और इंग्लैंड के खिलाफ दूसरे और आखिरी टेस्ट में टांटन के काउंटी मैदान में 214 का नया उच्च स्कोर खड़ा कर दिया. मिथाली सन 2002 में क्रिकइन्फो महिला विश्व कप में टाईफाइड हो गया जिससे भारत की प्रगति में गंभीरता आने लगी. हालाँकि सन 2005 में मिथाली ने टीम को दक्षिण अफ्रीका में अपने पहले विश्व कप में फाइनल तक पहुँचाया, जहाँ वे ऑस्ट्रेलिया टीम से मिली जोकि बहुत मजबूत टीम शाबित हुई.

अगस्त 2006 में, उन्होंने इंग्लैंड में अपनी पहली टेस्ट और सिरीज की जीत के लिए टीम का नेतृत्व किया, और एशिया कप जीतने वाले वर्ष में एक भी गेम छोड़े बिना 12 महीने महीने में दूसरी बार जीत हासिल की.

मिथाली राज पार्ट टाइम लेग ब्रेक गेंदबाज भी हैं. वे वर्तमान में 703 रेटिंग्स के साथ बल्लेबाज तालिका में सबसे ऊपर हैं. तेज गेंदबाजी में क्रीज और स्कोर करने की क्षमता उन्हें खतरनाक क्रिकेटर बनाती हैं. बल्ले के साथ अपनी क्षमता के अतिरिक्त वे गेंदबाजी में भी माहिर हैं. सन 2013 के विश्वकप में मिथाली राज ने अन्य महिलाओं के बीच ओडीआई चार्ट में नंबर 1 क्रिकेटर के रूप में अभिनय किया. इन्होने टेस्ट क्रिकेट में 1 शतक और 4 अर्धशतक, ¾ की सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी के साथ ओडीआईस में 5 शतक और 40 अर्धशतक और टी-20 में 10 अर्धशतक लगाये.

फरवरी 2017 में वे डब्ल्यूओडीआईस में 5,500 रण बनाने वाली दूसरी खिलाड़ी बन गई. मिथाली ने एकदिवसीय एवं टी -20 के अधिकतर मैचों में भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान के रूप में टीम का नेतृत्व किया. जुलाई 2017 में मिथाली डब्ल्यूओडीआईस में 6,000 रन बनाने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनी. जून २०२२ में इन्होने क्रिकेट के सारे फोर्मट्स से रिटायरमेंट ले लिया।

मिताली राज का विवाद (Mithali Raj Controversy )

भारतीय पूर्व महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज का एक सफल करियर रहा है । लेकिन वह अपने खेल के दौरान कुछ विवादों में भी शामिल रही हैं।

वह साल 2018 में आईसीसी महिला विश्व टी20 में खेल के प्रति अपने चाल चलन के कारन क्रिकेट प्रबंधन के साथ विवाद में शामिल थीं। बीसीसीआई को लिखे एक पत्र में मिताली ने ” कोच रमेश पवार और बीसीसीआई सीओए सदस्य डायना एडुल्जी पर टी20 विश्व कप के सेमीफाइनल में उन्हें शामिल नहीं करने के लिए पक्षपाती होने का आरोप लगाया। इस आरोप के जवाब में रमेश ने उसकी आलोचना की और कहा कि बल्लेबाजी क्रम में नीचे खेलने के लिए कहने पर उसने क्रिकेट से संन्यास लेने की धमकी दी। उन्होंने कहा कि

” टीम में एक वरिष्ठ खिलाड़ी होने के बावजूद वह टीम की बैठकों में न्यूनतम इनपुट देती है। वह टीम की योजना को समझ नहीं पाई और उसके अनुकूल नहीं हो सकी। उसने अपनी भूमिका को नजर अंदाज किया और अपने स्वयं के मील के पत्थर के लिए बल्लेबाजी की। गति को बनाए रखने में कमी जो कि दूसरे बल्लेबाजों पर अतिरिक्त दबाव बना रहा था।”

मीडिया द्वारा ये बोला जाता है कि मिताली के संबंध F-20 क्रिकेट कप्तान हरमनप्रीत कौर के साथ भी तनावपूर्ण रहे हैं।

मिताली राज के रिकार्ड्स (Mithali Raj Records )

  • महिला एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय (वनडे) में सर्वाधिक 10,273 रन
  • मिताली सर्वाधिक 232 मैच (वनडे) खेलने के साथ सूची में शीर्ष पर हैं।
  • मितली के वनडे में 71, पचास से अधिक स्कोर और टी20ई में 17 , पचास से अधिक स्कोर हैं। महिला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में किसी भी खिलाड़ी द्वारा 88 , पचास से अधिक स्कोर का उनका संयुक्त मिलान सबसे अधिक है।
  • उनका व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ 214 महिला टेस्ट में दूसरा सबसे बड़ा व्यक्तिगत स्कोर है।
  • मिताली ने कप्तान के तौर पर महिला वनडे में 155 मैचों में 89 मैचों में जीत हासिल की है जोकि महिला वनडे में सबसे बड़ा आकड़ा है।
  • मिताली के पास ICC महिला क्रिकेट विश्व कप में कप्तानी करने वाले सर्वाधिक मैचों का रिकॉर्ड है। वह 28 मैचों में भारतीय टीम की कप्तान रही है।
  • उन्होंने महिला वनडे में 232 मैचों में 7805 रन बनाए है। जोकि महिला वनडे में सबसे ज्यादा है।उनका 50.68 का औसत उन्हें 50 से अधिक औसत के साथ उन्हें एकमात्र खिलाड़ी बनाता है।
  • साल 2002 में टाउनटन में दूसरे अंतिम टेस्ट में इंग्लैंड के खिलाफ 214 रनों बनाने वाली महिला टेस्ट क्रिकेट में दूसरे उच्चतम स्कोर का रिकॉर्ड उनके नाम है।
  • उनके नाम एकदिवसीय मैचों में लगातार 7 अर्धशतक बनाने वाली पहली महिला क्रिकेटर का रिकॉर्ड उनके नाम है।
  • जुलाई 2017 में वह इंग्लैंड की क्रिकेटर शार्लेट एडवर्ड्स (5992) को पीछे छोड़ते हुए वनडे में सबसे ज्यादा रन बनाने वाली खिलाड़ी बन गईं।
  • मिताली राज ने जुलाई 2021 में महिला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन बनाने वाली खिलाड़ी बनीं। उन्होंने इंग्लैंड की शार्लेट एडवर्ड्स (10,273 रन) को पीछे छोड़ा। और महिला क्रिकेट में एडवर्ड्स और मिताली दो ऐसी महिला क्रिकेटर हैं जिन्होंने 10,000 रन का आंकड़ा पार किया है।

मिताली राज को पुरस्कार व सम्मान Mithali Raj - Awards and Honors

 

मिताली राज  

पुरस्कार – सम्मान – उपलब्धियां

वर्ष

पुरस्कार व सम्मान

2003

अर्जुन पुरस्कार

2015

पद्मश्री अवार्ड

2017

यूथ स्पोर्ट्स आइकन ऑफ एक्सीलेंस अवार्ड

2017

वोग स्पोर्ट्सपर्सन ऑफ द ईयर

2017

विज्डन लीडिंग वुमन क्रिकेटर इन द वर्ल्ड

2017

आईसीसी वूमेंस ओडीआई टीम ऑफ द ईयर

2020

वोमेन्स ओडीआई क्रिकेटर ऑफ द डिकेड

2021

खेल रत्न पुरस्कार

उपलब्धियां

ओडीआई मैच में 5000 रन बनाने वाली, दूसरी महिला क्रिकेटर

विसडेन इंडियन क्रिकेटर ऑफ द ईयर का अवार्ड जीतने वाली, पहली भारतीय महिला क्रिकेटर।

ओडीआई में लगातार 7 अर्ध शतक लगाने वाली, पहली महिला खिलाड़ी

टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक 214 रन बनाने वाली महिला खिलाड़ी

ओडीआई मैचेस में सर्वाधिक 6888 रन बनाने वाली खिलाड़ी, जिन्होंने इंग्लैंड के Charlotte Edwards के 5992 रन के रिकॉर्ड को तोड़ा।

200 ओडीआई मैच खेलने वाली पहली महिला खिलाड़ी

क्रिकेट के सभी फॉर्मेट में 10000 रन पूरा करने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी

मिताली राज की इनकम, नेट-वर्थ व लाइफ़स्टाइलMithali Raj - Income, Net-Worth and Lifestyle

 मिताली राज का हैदराबाद में, एक बहुत ही सुंदर और luxurious घर है। जिसमें सभी सुख-सुविधाएं मौजूद हैं। उनके इस घर की कीमत लगभग ₹2 करोड़ है। मिताली राज के पास गाड़ियों का बेहतरीन और सुंदर collection देखने को मिलता है।

मिताली राज के कार कलेक्शन में, BMW 320D और Honda Accord भी शामिल है। इन गाड़ियों की कीमत ₹50 लाख व ₹44 लाख है। इनके पास कई Fords की कार भी है।

   मिताली क्रिकेट खेलकर, तो पैसे कमाती ही हैं। इसके साथ ही, वह Brand Endorsement से भी काफी अच्छे पैसे कमा लेती हैं। मिताली Uber और Zoya Lukash की ब्रांड एंबेसडर भी हैं। सिर्फ Brand Endorsement के जरिए, वह हर साल 50 से 70 लाख रुपए कमाती है। मिताली राज की नेटवर्क लगभग ₹41 करोड़ है।

मिताली राज पर बनी बायोपिक Biopic on Mithali Raj

 मिताली राज के जीवन पर बनी बायोपिक का नाम ‘शाबाश मिठू’ है। यह एक स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्म है। जिसके निर्देशक  श्रीजीत मुखर्जी हैं। इस फिल्म में मिताली राज की भूमिका में, तापसी पन्नू नजर  आएंगी।

      इनके अलावा फिल्में विजय राज और असद अली भी दिखाई देंगे। इस फिल्म में मिताली राज के जीवन के Ups & Downs को दिखाया गया है। जिनसे आप motivate होने के साथ-साथ, inspire भी होंगे। यह फिल्म भारतीय सिनेमाघरों में 15 जुलाई 2022 को रिलीज होगी।

मिताली राज संन्यास [ Mithali Raj Retirement ]

भारतीय महिला क्रिकेट टीम की दिग्गज बल्लेबाज मिताली राज ने ट्विटर पर अपने संन्यास का ऐलान कर दिया है। बता दें कि मिताली राज ने साल 1999 से क्रिकेट में अपने कैरियर की स्टार्टिंग की थी और तकरीबन दो दशक तक इन्होंने बेहतरीन परफॉर्मेंस दी और अब मिताली राज के द्वारा क्रिकेट के खेल को अलविदा कह दिया गया है।

टोटल 232 वनडे मिताली राज के द्वारा भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए खेले गए, साथ ही इन्होंने 89 T20 मैच भी खेले। इसके अलावा यह तकरीबन 12 टेस्ट मैच में भी इंडिया का प्रतिनिधित्व कर चुकी है। वंडे की बात की जाए तो इन्होंने टोटल 7805 रन बनाए जबकि टेस्ट में इन्होने कुल 2364 रन बनाए हुए हैं। इन्होंने टोटल 8 इंटरनेशनल शतक लगाए हुए हैं और वनडे में इन्होंने 7 तथा टेस्ट में 1 सेंचुरी मारी हुई है।

ट्विटर पर अपने सन्यास का घोषणा करने के दरमियान मिताली राज ने अपने सभी चाहने वालों को धन्यवाद कहा है। उन्होंने कहा है कि अब वह दूसरी पारी खेलने के लिए बिल्कुल तैयार है। उन्होंने कहा कि अपने क्रिकेट के कैरियर के दरमियान मैंने बहुत सारी चीजों को सिखा और यह मेरी जिंदगी का बहुत ही यादगार समय रहा है।

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Thu, 20 Mar 2025 10:18:23 +0530 Jaankari Rakho
परिणीति के शादी में मेहमानों को फोन इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं है. https://m.jaankarirakho.com/360 https://m.jaankarirakho.com/360 बॉलीवुड एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा और आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा जल्द ही शादी कर नई जिंदगी की शुरुआत करेंगे। इन दोनों की शाही शादी 24 सितंबर को होगी. दिल्ली में शादी से पहले की रस्में पूरी करने के बाद आज सुबह परिणीति और राघव परिणीति वेडिंग अपने परिवार के साथ उदयपुर पहुंचे। उदयपुर एयरपोर्ट पर दोनों के वीडियो और फोटो वायरल हो गए हैं. इस शाही शादी में बॉलीवुड और राजनीतिक दिग्गज शामिल होंगे। आमंत्रित अतिथियों में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान शामिल हैं। शादी में राजनीतिक दिग्गज से लेकर बॉलीवुड हस्तियां भी शामिल होंगी। शादी के दिन बहन प्रियंका चोपड़ा भी अमेरिका से आएंगी.

इंडिया टुडे के मुताबिक, एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा बेटी मालती के साथ परिणीति की शादी में शामिल होंगी. लेकिन पति निक जोनस उनके साथ नहीं होंगे. क्योंकि वह इस वक्त जोनस ब्रदर्स टूर में बिजी हैं। तो कल प्रियंका अपनी बेटी के साथ बहन की शादी में शामिल होंगी. परिणीति की जिंदगी के इस खास पल के लिए प्रियंका काफी एक्साइटेड हैं।

परिणीति और राघव की शादी उदयपुर के ताज पैलेस में शाही अंदाज में होगी। शादी की शुरुआत दिल्ली में सूफी नाइट्स और अरदास से हुई. अब कल 23 सितंबर को संगीत कार्यक्रम होगा. इस शादी में मेहमानों को फोन इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं है.

वहीं, परिणीति के वर्कफ्रंट की बात करें तो वह जल्द ही 'मिशन रानीगंज' में नजर आएंगी। इसमें उनके साथ एक बार फिर अक्षय कुमार नजर आएंगे। कुमुद मिश्रा और रवि किशन भी अहम भूमिका में हैं। यह फिल्म जयवंत सिंह गिल के जीवन पर आधारित है। मिशन रानीगंज 6 अक्टूबर को रिलीज होगी।

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Fri, 22 Sep 2023 14:40:07 +0530 Jaankari Rakho