Jaankari Rakho & : Bihar History https://m.jaankarirakho.com/rss/category/bihar-history Jaankari Rakho & : Bihar History hin Copyright 2022 & 24. Jaankari Rakho& All Rights Reserved. प्राचीन बिहार का इतिहास (History of Ancient Bihar) https://m.jaankarirakho.com/69 https://m.jaankarirakho.com/69 प्राचीन बिहार (पाषाण काल)

⇒ बिहार का प्राचीन इतिहास वास्तव में भारत का प्राचीनं इतिहास है.

⇒ $        बिहार के दक्षिणी भाग में पुरापाषाण काल के औजार मिले हैं। पत्थर की कुल्हाड़ियों के फल, चाकू और खुर्पी के रूप में प्रयोग किए जाने वाले पत्थर के टुकड़े हैं। ऐसे अवशेष मुंगेर, पटना, गया और नालंदा जिले में उत्खनन से  प्राप्त हुए हैं, जो अनुमानतः 100,000 ई.पू. काल के हैं।

⇒ मध्य पाषाण युग (100,000 से 40,000 ई.पू.) के अवशेष भी मुंगेर से मिले हैं। ये छोटे आकार के पत्थर के बने सामान हैं, जो तेज धार और नोक वाले हैं।

⇒ नवपाषाण युग के अवशेष उत्तर बिहार में चिरांद (सारण जिला) और चेचर (वैशाली जिला) से प्राप्त हुए हैं। इनका काल सामान्यतः 2500 ई.पू. से 1500 ई.पू. के मध्य है, इनमें पत्थर के सूक्ष्म औजारों के साथ-साथ हड्डी के उपकरण भी मिले हैं।

⇒ भारत में चिरांद (सारण) से ही हड्डी के उपकरण प्रचुर मात्रा में मिले हैं।

⇒ ताम्र पाषाण युग एवं इसके परवर्ती चरण के अवशेष चिरांद (सारण), चेचर (वैशाली), सोनपुर (सारण), मनेर (पटना) से  प्राप्त हुए हैं। चिरांद से ताम्र पाषाण युगीन काले-लाल मृदभांड प्राप्त हुए हैं।

वैदिक काल में प्राचीन बिहार 

⇒ उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई.पू.) में आर्यो का प्रसार पूर्वी भारत में आरंभ हुआ। इसमें लौह प्रौद्योगिकी की देन निर्णायक थी।

⇒ भारत में 1000 से 800 ई.पू. के मध्य लोहे का उपयोग आरंभ हुआ और इसी समय आर्यो का बिहार में भी विस्तार प्रारंभ हुआ।

⇒ लगभग 800 ई.पू. में रचित शतपथ ब्राह्मण विदेह माधव और उसके पुरोहित गौतम राहूगण के सरस्वती नदी के  तट से आगे बढ़ते हुए बिहार की सदानीरा नदी (गंडक नदी) के तट पर पहुंचने का विवरण देता है।

⇒ शतपथ ब्राह्मण की रचना – गंगाधारी क्षेत्र (बिहार भी इस क्षेत्र में शामिल) में।

⇒ ऋग्वेद में बिहार क्षेत्र के लिए कीकट एवं व्रात्य शब्दों का उल्लेख किया गया है।

प्राचीन बिहार महाजनपद काल

⇒ छठी शताब्दी ई.पू. के बौद्ध रचनाओं के अनुसार 16 महाजनपदों और लगभग 10 गणराज्यों की जानकारी मिलती है। इसमें तीन महाजनपद  अंग, मगध और लिच्छवी बिहार में स्थित थे।

⇒ इन तीनों के संबंध में विस्तृत जानकारी अंगुत्तर निकाय तथा भगवती सूत्र में मिलती है।

⇒ अंग महाजनपद बिहार के वर्तमान मुंगेर और भागलपुर जिलों के क्षेत्र में फैला था। इसकी राजधानी चम्पा (वर्तमान चम्पानगर) भागलपुर के समीप थी। बौद्ध साहित्य में चम्पा को तत्कालीन 6 प्रमुख नगरों में स्वीकारा गया है।

⇒ मगध महाजनपद के अधीन आधुनिक पटना, नालंदा, गया और शाहाबाद के कुछ क्षेत्र थे। इसकी राजधानी गूवराज अथवा राजगृह (वर्तमान राजगीर) थी।

⇒ वैदिक साहित्य में मगध के लोगों का उल्लेख ब्रात्य अर्थात् पतित के रूप में किया गया है। छठी शताब्दी ई.पू. से पहले मगध में बहिद्रथ राजवंश के शासन का उल्लेख प्राप्त होता है।

⇒ गंगा के उत्तर में वर्तमान तिरहुत प्रमंडल में वज्जियों का संघ था, जो आठ गणराज्यों से मिलकर बना था। इसमें सबसे प्रबल लिच्छवी गणराज्य था। इसकी सीमाएं वर्तमान वैशाली और मुजफ्फरपुर जिलों तक फैली हुई थी तथा राजधानी वैशाली थी।

⇒ वज्जि आठ राज्यों का संघ था जिसमें  तीन प्रमुख राज्य-वैशाली के लिच्छवी, मिथिला के विदेह तथा कुंडग्राम के ज्ञातृक थे।

⇒ आठ गणराज्यों में से एक शातृक (ज्ञातृक) गणराज्य था, जिसके प्रमुख सिद्धार्थ के यहां महावीर का जन्म 540 ई. पू. में कुंडग्राम (वैशाली) में हुआ था।

⇒ उनकी माता त्रिशला लिच्छवी गणराज्य के प्रमुख चेटक की बहन थीं। महावीर स्वामी ने 468 ई.पू. में पावापूरी में निर्वाण प्राप्त किया।

⇒ लिच्छवी (क्षत्रिय (ज्ञातृक कुल) ) सरदार चेटक की पुत्री का विवाह ज्ञातृक कुल के क्षत्रिय महावीर से हुआ था ।

⇒ चेटक की पुत्री चेल्लना का विवाह मगध नरेश बिंबिसार से हुआ।

⇒ कौटिल्य ने लिच्छवी राज्य का उल्लेख ‘राजशब्दोपजीवीसंघ’ के रूप में किया है। लिच्छवी राज्य की राजधानी वैशाली की पहचान बसाढ़ नामक गांव से की गई है।

⇒ वैशाली नगर का संस्थापक राजा विशाल था।

⇒ वैशाली की प्रसिद्ध नर्तकी-आम्रपाली थी।

⇒ आम्रपाली ने बौद्ध संघ को एक उधान समर्पित किया था।

⇒ विशाल राजवंश का अंतिम राजा- सुमति को माना जाता है।

⇒ पूर्वोत्तर बिहार के शाक्य गणराज्य में सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध) का जन्म हुआ था। इस गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु थी, इसी के समीप लुम्बनी में गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था।

⇒ गौतम बुद्ध ने बोधगया में एक पीपल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया।

⇒ गौतम बुद्ध के समकालीन चार प्रमुख महाजनपद- कौशल, वत्स, अवंति, मगध थे।

⇒ यजुर्वेद में सबसे पहले विदेह राज्य का उल्लेख मिलता है। यहां के राजवंश की शुरूआत इक्ष्वाकु के पुत्र निमि विदेह से मानी जाती है।

⇒ राजा मिथि जनक विदेह ने मिथिला की स्थापना की थी।  इस वंश के 25वें राजा  सिरध्वज जनक थे, जिनके द्वारा गोद ली गई पुत्री सीता का विवाह कौशल के राजा दशरथ के पुत्र राम से हुआ।

⇒ शतपथ ब्राह्मण में विदेह के जनक का उल्लेख सम्राट के रूप में किया गया है।

⇒ वाल्मीकी रामायण में मलद एवं करूना शब्द का प्रयोग सम्भवतः बक्सर क्षेत्र के लिए हुआ है। माना जाता है कि यहीं ताड़िका (राक्षसी) का वध भगवान राम के द्वारा हुआ था।

⇒ वायुपुराण के अनुसार गया में असुरों का राज था।

⇒ ऋग्वेद में कीकट क्षेत्र के अमित्र शासक प्रेमगंद की चर्चा हुई है, जबकि अथर्ववेद में अंग एवं मगध का उल्लेख मिलता है।

मगध महाजनपद

⇒ ब्रह्द्र्थ वंश की स्थापना एक मान्यतानुसार कुरु वंश के रजा वसु के पुत्र ब्रह्द्र्थ ने की थी.

⇒ ब्रह्द्र्थ वंश में कुल 10 राजा हुए जिसमे से सर्वाधिक प्रतापी राजा जरासंघ था। जरासंघ का विवाह मथुरा के शासक कंस की बहन से हुआ था। भीम ने  जरासंघ को मल्ल युद्ध में पराजित कर मार डाला।

⇒ वृहद्रथ वंश का अंतिम शासक- रिपुंजय था जिसकी हत्या एक मंत्री पुलीक ने कर अपने पुत्र को राजा बनाया किन्तु एक अन्य दरबारी महीय ने पुलीक एवं उसके पुत्र की हत्या कर अपने पुत्र बिम्बिसार को गद्दी पर बिठाया.

⇒ छठी शताब्दी ई.पू. मगध में हर्यक वंश का राज्य स्थापित हुआ। इस राज्य का संस्थापक बिम्बिसार, कौशल के प्रसेनजित, अवंति के चंडप्रद्योत तथा महात्मा बुद्ध का समकालीन था। उसने 544-492 ई.पू. तक शासन किया।

⇒ मगध की राजधानी-गिरिब्रज / राजगीर थी

⇒ बिम्बिसार का राजवैद्य जीवक था, जिसे अवंतिराज के अनुरोध पर उज्जैन भेजा गया था।

⇒ बिम्बिसार ने कौशल नरेश प्रसेनजित की बहन कौशल देवी, लिच्छवी राजा चेटक की पुत्री चेलना तथा मद्र राज्य की राजकुमारी क्षेमा के साथ विवाह किया था। वैशाली की ‘नगरवधू’ आम्रपाली से भी उसके संबंध थे।

⇒ भारतीय इतिहास में बिम्बिसार को स्थायी सेना रखने वाला पहला शासक माना जाता है तथा इस कारण उसे सेनिय भी कहा जाता है।

⇒ मगध की राजधानी राजगृह का निर्माण महागोविन्द नामक वास्तुकार ने किया जो बिम्बिसार के दरबार में रहता था।

⇒ बिम्बिसार की हत्या कर उसका महत्त्वाकांक्षी पुत्र अजातशत्रु सिंहासन पर बैठा। इस तथ्य से बौद्ध स्रोत सहमत हैं जबकि जैन स्रोत असहमत। अजातशत्रु ने 492-460 ई.पू. तक शासन किया।

⇒ अजातशत्रु ने कौशल नरेश प्रसेनजित को पराजित कर उनकी पुत्री वाजिरा के साथ विवाह किया था।

⇒ अजातशत्रु का संघर्ष वज्जि संघ के साथ हुआ, वैशाली पर अभियान में सुविधा हेतु अजातशत्रु ने गंगा, गंडक और सोन नदियों के संगम पर पाटलिग्राम में एक सैनिक छावनी का निर्माण करवाया जो आगे मगध की राजधानी बनी।

⇒ अजातशत्रु ने ने वस्सकार की सहायता से वज्जि संघ में फूट डालकर  लिच्छवियों को पराजित किया।

⇒ अजातशत्रु ने युद्धास्त्रों में शिलाकंटक तथा रथ-मूसल जैसे नवीन शस्त्रों की खोज की थी।

⇒ आजीवक संप्रदाय के संस्थापक मक्खलि गोशाल की मृत्यु मगध-लिच्छवी संघर्ष में हुई थी।

⇒ अजातशत्रु के शासनकाल के समय 483 ई. पू. में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन राजगृह में हुआ था।

⇒ अजातशत्रु ने बुद्ध की मृत्यु महापरिनिर्वाण के पश्चात राजगृह में स्तूप का निर्माण करवाया।

⇒ अजातशत्रु के बाद 460 ई.पू. में उदायीभद्र या उदयिन मगध की राजगद्दी पर बैठा और 444 ई.पू. तक शासन किया।

⇒ महावंश के अनुसार अजातशत्रु  ने पटना में गंगा और सोन के संगम पर एक किला बनवाया, जिसका बाद में कुसुमपुर या पाटलिपुत्र के रूप में विकास हुआ।

शिशुनाग राजवंश

⇒ हर्यक वंश का अंतिम शासन नागदशक था, जिसका च्युत करके काशी के गवर्नर शिशुनाग ने 412 ई.पू. में शिशुनाग राजवंश की स्थापना की। शिशुनाग ने वैशाली को अपनी राजधानी बनाया।

⇒ शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक था, जो काकवरनिन के नाम से प्रसिद्ध था। इसने मगध की राजधानी को स्थायी रूप से पाटलिपुत्र परिवर्तित कर दिया।

⇒ कालाशोक के शासन के दसवें वर्ष (383 ई. पू.) में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन वैशाली में हुआ।

⇒ शिशुनाग वंश का 344 ई.पू. में अंत हो गया।

⇒ शिशुनाग वंश के पश्चात् मगध पर नंद वंश का शासन स्थापित हुआ। इसका संस्थापक महापद्मनंद था।

नंद वंश

⇒ कलिंग विजय महापद्मनंद का प्रमुख अभियान था। विजय स्मारक के रूप में वह कलिंग से जिन की मूर्ति उठा लाया था। हाथी गुम्फा अभिलेख में उसके द्वारा कलिंग में एक नहर निर्मित कराए जाने का उल्लेख मिलता है।

⇒ पुराणों में महापद्मनंद को ब्राह्मणों का विरोधी एवं क्षत्रियों का विनाशक होने के कारण ‘अखिल क्षत्रान्तकारी’ तथा ‘सर्वक्षत्रान्तक’ कहा जाता है। उसे भारतीय इतिहास का प्रथम शूद्र शासक माना जाता है।

⇒ महापद्मनंद ने स्वयं ‘एकराट’ की उपाधि  धारण की थी।

⇒ व्याकरण के विद्वान आचार्य पाणिनि महापदमनंद के मित्र थे।

⇒ पाणिनि ने पाटलिपुत्र में शिक्षा प्राप्त की।

⇒ नंद वंश में कुल नौ शासक हुए, जिसमें अंतिम शासक घनानंद था।

⇒ भारत पर सिकंदर का आक्रमण घनानंद के समय ही हुआ था।

⇒ घनानंद को युनानी लेखको ने अग्रमीज/उग्रसेन कहा है।

⇒ शकटार तथा स्थूलमद घनानंद के मंत्री (अमात्य) थे एवं जैन मत के अनुयायी थे

मौर्य वंश

चन्द्रगुप्त मौर्य (320-298 ई.पू.)

⇒ घनानंद के अत्याचारी शासन का अंत करके चन्द्रगुप्त मौर्य (320-298 ई.पू.) ने चाणक्य की सहायता से मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।

⇒ पश्चिमोत्तर सीमा प्रदेश को सबसे पहले यूनानियों के गिरफ्त से मुक्त कराने के कारण चंद्रगुप्त मौर्य को भारतीय इतिहास में ‘मुक्तिदाता’ के रूप में जाना जाता है।

⇒ चंद्रगुप्त मौर्य ने यूनानी सेनानायक सेल्यूकस निकेटर को युद्ध में पराजित किया तथा उससे काबुल, कंधार, हिरात, बलूचिस्तान और मकरान को प्राप्त किया। साथ ही सेल्यूकस की पुत्री से विवाह भी किया।

⇒ सेल्यूकस का दूत मेगास्थनीज 315 ई.पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में पाटलिपुत्र आया था।

⇒ मेगास्थनीज की इंडिका में राजधानी पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन की विस्तृत चर्चा मिलती है। इसमें पाटलिपुत्र को पालिब्रोथा कहा गया है। पाटलिपुत्र के प्रशासन का दायित्व तीस नागरिकों की सभा पर था जो पांच-पांच सदस्यों की 6 समितियों में संगठित थे।

⇒ मगध की दोनों राजधानियां, राजगीर और पाटलिपुत्र अत्यंत सुरक्षित और सुदृढ़ थीं।

⇒ राजगीर जहां पांच पहाड़ियों से घिरा दुर्भेद्य दुर्ग था, वहीं पाटलिपुत्र की स्थिति जलदुर्ग की थी। पाटलिपुत्र गंगा, गंडक और सोन नदियों के संगम पर स्थित था, जबकि थोड़ी दूर पर सरयू भी गंगा में मिलती थी।

⇒ चंद्रगुप्त मौर्य के राजप्रसाद के अवशेष पटना के समीप कुम्भ्रहार गांव से मिले हैं, इसे खोजने का श्रेय स्पूनर को है।

⇒ भारत में प्रथम केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था लागू करने का श्रेय चंद्रगुप्त मौर्य को ही दिया जाता है। चंद्रगुप्त के प्रशासन का पूर्ण विवरण कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है, जिसमें 28 अध्यक्षों एवं 18 तीर्थों की चर्चा है।

बिन्दुसार (298-272 ई.पू.)

⇒ चंद्रगुप्त मौर्य के उत्तराधिकारी बिन्दुसार (298-272 ई.पू.) के दरबार में यूनानी राजदूत डीमोंक्लस आया था।

⇒ बिन्दुसार आजीवक संप्रदाय का अनुयायी था।

अशोक (272-232 ई.पू.)

⇒ सिंहासन पर बैठने के 4 वर्ष बाद 269 ईसा पूर्व में राज्याभिषेक । राज्याभिषेक से पूर्व वह उज्जैन का राज्यपाल था।

⇒ 261 ईसा पूर्व में (राज्याभिषेक के आठवें वर्ष) कलिंग विजय।

⇒ अशोक के बड़े भाई सुमन के पुत्र निग्रोध के प्रवचन से अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया, मोग्गलिपुत्ततिस का शिष्य बना। इससे पूर्व अशोक शैव था।

⇒ राज्याभिषेक के 10वें वर्ष उसने ‘बोधगया’ की यात्रा की। 14वें वर्ष धम्ममहामात्रों की नियुक्ति की। 20वें वर्ष लुम्बिनी गया और उसे उल्विक (करमुक्त) घोषित करता है तथा ‘भाग कर’ (1/8) कर देता है।

अशोक के अभिलेख

⇒ अशोक के अभिलेखों में शाहनाज गढ़ी एवं मानसेहरा (पाकिस्तान) के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण हैं।

⇒ तक्षशिला एवं लघमान (काबुल) के समीप अफगानिस्तान अभिलेख अरामेइक एवं ग्रीक में उत्कीर्ण हैं।

⇒ इसके अतिरिक्त अशोक के समस्त शिलालेख, लघु शीलास्तंभ लेख एवं लघु लेख ब्रह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं।

⇒ अशोक का इतिहास भी हमें इन अभिलेखों से प्राप्त होता है। अभी तक अशोक के 40 अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं।

अशोक के शिलालेख

⇒ धौली– यह उड़ीसा के पुरी जिला में है।

⇒ शाहबाज गढ़ी– यह पाकिस्तान (पेशावर) में है।

⇒ मानसेहरा– यह पाकिस्तान के हजारा जिले में स्थित है।

⇒ कालपी– यह वर्तमान उत्तरांचल (देहरादून) में है।

⇒ जौगढ़ – यह उड़ीसा के जौगढ़ में स्थित है।

⇒ सोपरा – यह महाराष्ट्र के थाणे जिले में है।

⇒ एरागुडि– यह आंध्र प्रदेश के कुर्नूल जिले में स्थित है।

⇒ गिरनार – यह काठियावाड़ में जूनागढ़ के पास है।

 अशोक के लघु शिलालेख

⇒ रूपनाथ – यह मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में है।

⇒ गुर्जरा – यह मध्य प्रदेश के दतिया जिले में है।

⇒ भबू – यह राजस्थान के जयपुर जिले में है।

⇒ मास्की – यह रायचूर जिले में है ।

⇒ सहसराम   – यह बिहार के शाहाबाद जिले में है।

⇒ धर्म के प्रचार हेतु दूतों, प्रचारकों को विदेशों में भेजा अपने दूसरे तथा 13वें शिलालेख में उसने उन देशों का नाम लिखवाया जहां दूत भेजे गये थे।

⇒ दक्षिण सीमा पर स्थित राज्य चोल, पाण्ड्य, सतिययुक्त केरल पुत्र एवं ताम्रपर्णि बताए गए हैं।

अशोक के लघु स्तम्भ लेख

⇒ सम्राट अशोक की राजकीय घोषणाएं जिन स्तम्भों पर उत्कीर्ण हैं उन्हें लघु स्तम्भ लेख कहा जाता है महत्वपूर्ण अभिलेख निम्न स्थानों पर स्थित हैं –

⇒ सांची – मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में है।

⇒ सारनाथ – उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में है।

⇒ रूमिन्देई – नेपाल के तराई में है।

⇒ कौशाम्बी – इलाहाबाद के निकट है।

⇒ निगली सागर – नेपाल के तराई में है।

⇒ ब्रह्मगिरि – यह मैसूर के चिबल दुर्ग में स्थित है।

⇒ सिद्धपुर– यह ब्रह्मगिरि से एक मील उत्तर-पूर्व में स्थित है।

⇒ जतिंगरामेश्वर – जो ब्रह्मगिरि से तीन मील उत्तर-पूर्व में स्थित है।

⇒ एरागुडि – यह आंध्र प्रदेश के कूर्नुल जिले में स्थित है।

⇒ अहरौरा – यह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित है।

⇒ सारो-मारो – यह मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में स्थित है।

⇒ नेतुर – यह मैसूर जिले में स्थित है।

⇒ वैशाली – सिंह शीर्ष (केवल शेर, लेख रहित)   – वैशाली बिहार में।

 अशोक के गुहा लेख

⇒ दक्षिण बिहार के गया जिले में स्थित बराबर नामक तीन गुफाओं की दीवारों पर अशोक के लेख उत्कीर्ण प्राप्त हुए हैं।

⇒ इन सभी की भाषा प्राकृत तथा ब्राह्मी लिपि में है। केवल दो अभिलेखों शाहवाजगढ़ी तथा मान सेहरा की लिपि ब्राह्मी न होकर खरोष्ठी है। यह लिपि दायीं ओर बायीं ओर लिखी जाती है।

⇒ तक्षशिला से अरामेइक लिपि में लिखा एक भग्न अभिलेख कंधार के पास शारे-कुना नामक स्थान से यूनानी तथा अरामेइकद्विभाषीय अभिलेख प्राप्त हुआ है।

अशोक के स्तम्भ लेख

⇒ अशोक के स्तम्भ लेखों की संख्या सात है जो छ: भिन्न स्थानों में पाषाण स्तम्भों पर उत्कीर्ण पाए गए हैं। इन स्थानों के नाम हैं-

⇒ कौशाम्बी – इलाहाबाद में अकबर द्वारा लाया गया था।

⇒ दिल्ली टोपरा – यह स्तम्भ लेख प्रारंभ में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में पाया गया था। यह मध्य युगीन सुल्तान फिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाया गया। इस पर अशोक के सातों अभिलेख उत्कीर्ण हैं।

⇒ दिल्ली मेरठ – यह स्तम्भ लेख भी पहले मेरठ में था जो बाद में फिरोजशाह द्वारा दिल्ली लाया गया।

⇒ लौरिया अरेराज तथा लौरिया नन्दनगढ़ – यह स्तम्भ लेख बिहार राज्य के चंपारण जिले में है।

⇒ बिहार में अशोक के अभिलेख बराबर, सहसराम तथा चम्पारण से प्राप्त हुए हैं। वैशाली और पाटलिपुत्र में अशोक के स्तंभ प्राप्त हुए हैं, परन्तु उन पर अभिलेख उत्कीर्ण नहीं हैं।

⇒ अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन 247 ई.पू. में हुआ था।

⇒ अशोक के शासन के अधिकांश समय असंधिमित्ता पटरानी थी तथा इसकी म्रत्यु के बाद तिस्सरक्खा को यह दर्जा प्राप्त हुआ, सम्भवतः इलाहबाद स्तम्भ लेख में उल्लिखित तीवर की माता कुरुवाकी ने ही तिस्सरक्खा की उपाधि धारण की थी.

⇒ संघमित्रा और चारुमती अशोक की दो पुत्रियाँ थी, चारुमती का विवाह नेपाल के एक क्षत्रिय देवपाल के साथ हुआ था जबकि संघमित्रा को अपने पुत्र महेंद्र के साथ श्रीलंका धर्म प्रचार हेतु भेजा था।

⇒ मौर्य शासनकाल में पाटलिपुत्र बौद्धिक क्रियाकलापों का बड़ा केंद्र था। इस समय पाटलिपुत्र के प्रमुख विद्वान थे-

उपवर्षा (मीमांसा एवं वेदांत के टीकाकार),

वैश (पाणिनी के गुरू),

पाणिनी (प्रसिद्ध व्याकरण तथा अष्टाध्यायी के रचयिता),

पिंगला (छंदोविच्चति के लेखक),

व्यादि (ज्यामितीय सूत्र संग्रह के लेखक),

चाणक्य (कूटनीतिज्ञ) आदि।

शुंग वंश

⇒ मौर्य साम्राज्य का अंत 185 ई.पू. में हो गया। अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा की गई।

⇒ पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंश की स्थापना की, जिसके शासनकाल में यवनों (युनानियों) ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया (गार्गी संहिता के अनुसार)। संभवतः यह आक्रमण डेमेट्रीयस ने किया था।

⇒ सम्भवतः पहली इ० पु० कलिंग (उड़ीसा) के शासक खारवेल ने मगध पर विजय प्राप्त की थी।

⇒ पुष्यमित्र शुंग के पुत्र अग्निमित्र द्वारा विदिशा विजय की गई थी।

⇒ शुंग ब्राह्मण थे और ऐसा माना जाता था कि उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रति असहिष्णुता की नीति अपनाई।

⇒ पातंजलि शुंगों के राजदरबार में रहते थे तथा संभवतः मनुस्मृति का संकलन शुंग काल में ही हुआ था।

कण्व वंश

⇒ 75 ई.पू. में शुंग वंश के अंतिम शासक देवभूति का हत्या करके उसके सचिव वसुदेव ने मगध पर कण्व वंश की स्थापना की थी।

⇒ कण्व वंश के अंतिम शासक को आंध्र- सातवाहनों ने अपदस्थ कर दिया, लेकिन इनके मगध पर शासन का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता।

⇒ प्रथम शताब्दी ई. में कुषाण नरेश कनिष्क ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया तथा यहां के प्रसद्धि बौद्ध विद्वान अश्वघोष एवं बुद्ध के भिक्षापात्र/जलपात्र को अपने साथ ले गया।

⇒ अश्वघोष को अपने दरबार में प्रश्रय दिया.

⇒ महावस्तु नामक बौद्ध ग्रंथ के अनुसार ई.पू. दूसरी शताब्दी में  राजगृह में 36 प्रकार के शिल्पी रहते थे।

गुप्त वंश

⇒ गुप्त राजवंश की स्थापना महाराजा गुप्त ने लगभग 275 ई.में की थी। उनका वास्तविक नाम श्रीगुप्त था। इलाहाबाद स्तम्भ लेख के अनुसार इस वंश का पहला शासक श्रीगुप्त था।चीनी यात्री इत्सिंग भी श्रीगुप्त का उल्लेख करता है। उपाधि – महाराजा ।

⇒ गुप्त वंश सम्भवतः पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाहबाद एवं वाराणसी के बीच शासन करते थे।

⇒ घटोत्कच श्रीगुप्त का पुत्र था। 280 ई. पू. से 320 ई. तक गुप्त साम्राज्य का शासक बना रहा। इसने भी महाराजा की उपाधि धारण की थी।

⇒ चन्द्रगुप्त प्रथम- यह घटोत्कच का उत्तराधिकारी था, जो 320 ई. में शासक बना। चन्द्र्गुप्त के सिंहासनारोहण के अवसर पर (320 ई०) को गुप्त सम्वत भी कहा गया है।

⇒ बिहार के गौरव का पुरुरूद्धार गुप्त वंश द्वारा चैथी शताब्दी में हुआ। चंद्रगुप्त प्रथम ने 320 ई. में पाटलिपुत्र में महाराजधिराज की उपाधि धारण की।

⇒ चंद्रगुप्त प्रथम को प्रथम स्वतंत्र गुप्त शासक माना जाता है, उसने लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह करके अपनी प्रतिष्ठा एवं शक्ति में वृद्धि की।

⇒ उसने विवाह की स्मृति में राजा-रानी प्रकार के सिक्‍कों का चलन करवाया, जिसमे एक तरफ चन्द्रगुप्त एवं कुमारदेवी का तथा दूसरी तरफ लक्ष्मी का चित्र है।

⇒ चन्द्रगुप्त प्रथम पहला भारतीय मूल का शासक था जिसने सोने के सिक्के जारी किये।

⇒ समुद्रगुप्त- चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद ३५० ई. में उसका पुत्र समुद्रगुप्त राजसिंहासन पर बैठा।

⇒ समुद्रगुप्त की माता का नाम कुमार देवी था। सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास में महानतम शासकों के रूप में वह नामित किया जाता है। इन्हें परक्रमांक कहा गया है।

⇒ हरिषेण समुद्रगुप्त का दरबारी कवि था जिसने प्रयाग प्रशस्ति की रचना की जिससे समुद्रगुप्त के राज्यारोहण, विजयों एवं साम्राज्य विस्तार की जानकारी मिलती है।

⇒ समुद्रगुप्त को विन्सेट स्मिथ ने भारत का नेपोलियन कहा है।

⇒ समुद्रगुप्त एक विजेता होने के साथ साथ एक सफल प्रशासक, संगीतज्ञ, कवि और विद्या का संरक्षक माना जाता है।

⇒ एक सिक्के पर उसे वीणा बजाते हए दिखाया गया है।

⇒ उसके द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करवाने का भी प्रमाण मिलता है।

⇒ श्रीलंका के राजा मेघवर्मन ने गया में बुद्ध का एक मंदिर बनवाने की अनुमति प्राप्त करने के लिए समुद्रगुप्त (335-380 ई.) के पास अपना दूत भेजा था। समुद्रगुप्त द्वारा अनुमति दी गई।

⇒ समुद्रगुप्त के पश्चात रामगुप्त शासक बना जो पूर्णत: कायर एवं अयोग्य शासक था।

⇒ चन्द्रगुप्त II विक्रमादित्य– चन्द्रगुप्त द्वितीय 375 ई. में सिंहासन पर आसीन हुआ। वह समुद्रगुप्त की प्रधान महिषी दत्तदेवी से हुआ था। वह विक्रमादित्य के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हुआ। उसने 375 से 415 ई. तक (40 वर्ष) शासन किया।

⇒ चन्द्रगुप्त द्वितीय का अन्य नाम देव, देवगुप्त, देवराज, देवश्री आदि हैं। उसने विक्र्मंक, विक्रमादित्य, परम भागवत आदि उपाधियाँ धारण की। उसने नागवंश, वाकाटक और कदम्ब राजवंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये।

⇒ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने नाग राजकुमारी कुबेर नागा के साथ विवाह किया जिससे एक कन्या प्रभावती गुप्त पैदा हुई। वाकाटकों का सहयोग पाने के लिए चन्द्रगुप्त ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया।

⇒ चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त प्रथम का विवाह कदम्ब वंश में हुआ।

⇒ महरौली स्तम्भ लेख से उसके विजय अभियानों की चर्चा मिलती है।

⇒ चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (380-412 ई.) के शासनकाल में चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था। वह 411 ई. में पाटलिपुत्र भी गया तथा वहां के गौरव का वर्णन किया। यहां फाह्यान ने तीन वर्ष तक संस्कृत का अध्ययन किया।

⇒ चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल कला-साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है। उसके दरबार में विद्वानों एवं कलाकारों को आश्रय प्राप्त था।

⇒ कुमारगुप्त प्रथम– चन्द्रगुप्त द्वितीय के पश्‍चात्‌ 415 ई. में उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम सिंहासन पर बैठा। इसकी  माता – ध्रुवदेवी थी। 

⇒ मंदसौर अभिलेख (वत्सभट्टि रचित प्रशस्ति) से कुमारगुप्त के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है।

⇒ स्कंदगुप्त के भितरी अभिलेख से पता चलता है कि कुमारगुप्त के शासनकाल में पुष्यमित्रों का आक्रमण हुआ था। जिसे रोकने के लिए कुमारगुप्त ने स्कंदगुप्त को भेजा था।

⇒ कुमारगुप्त प्रथम के अभिलेखों या मुद्राओं से ज्ञात होता है कि उसने अनेक उपाधियाँ धारण कीं। उसने महेन्द्र कुमार, श्री महेन्द्र, महेन्द्रादित्य आदि उपाधि धारण की थी।

⇒ गुप्त शासकों में सर्वाधिक अभिलेख कुमारगुप्त के ही प्राप्त हुए हैं। उसने अधिकाधिक संख्या में मयूर आकृति की रजत मुद्राएं प्रचलित की थीं। उसी के शासनकाल में नालन्दा विश्‍वविद्यालय की स्थापना की गई थी।

⇒ पुष्यमित्र के आक्रमण के समय ही गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम की 455 ई. में मृत्यु हो गयी थी।

⇒ उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र स्कन्दगुप्त सिंहासन पर बैठा।

⇒ स्कन्दगुप्त ने विक्रमादित्य, क्रमादित्य आदि उपाधियाँ धारण कीं

⇒ जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि स्कन्दगुप्त के शासन काल में भारी वर्षा के कारण सुदर्शन झील का बाँध टूट गया था उसने दो माह के भीतर अतुल धन का व्यय करके पत्थरों की जड़ाई द्वारा उस झील के बाँध का पुनर्निर्माण करवा दिया।

⇒ हूणों का प्रथम आक्रमण स्कन्दगुप्त के काल में हुआ था।

⇒ पुरुगुप्त- पुरुगुप्त बुढ़ापा अवस्था में राजसिंहासन पर बैठा था।

⇒ कुमारगुप्त द्वितीय– पुरुगुप्त का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त द्वितीय हुआ।

⇒ बुधगुप्त– कुमारगुप्त द्वितीय के बाद बुधगुप्त शासक बना जो नालन्दा से प्राप्त मुहर के अनुसार पुरुगुप्त का पुत्र था। उसकी माँ चन्द्रदेवी था।ह्वेनसांग के अनुसार वह बौद्ध मत अनुयायी था। उसने नालन्दा बौद्ध महाविहार को काफी धन दिया था।

⇒ नरसिंहगुप्त बालादित्य– बुधगुप्त की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई नरसिंहगुप्त शासक बना।

⇒ इस समय गुप्त साम्राज्य तीन भागों क्रमशः मगध, मालवा तथा बंगाल में बँट गया। मगध में नरसिंहगुप्त, मालवा में भानुगुप्त, बिहार में तथा बंगाल क्षेत्र में वैन्यगुप्त ने अपना स्वतन्त्र शसन स्थापित किया। नरसिंहगुप्त तीनों में सबसे अधिक शक्‍तिशाली राजा था।

⇒ हूण शासक मिहिरकुल ने पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर नरसिंहगुप्त बालादित्य को पराजित किया तथा उसे बंगाल तक खदेड़ दिया।

⇒ नालन्दा मुद्रा लेख में नरसिंहगुप्त को परम भागवत कहा गया है।

⇒ कुमारगुप्त तृतीय– नरसिंहगुप्त के बाद उसका पुत्र कुमारगुप्त तृतीय मगध के सिंहासन पर बैठा।

⇒ नालंदा महाविहार की स्थापना कुमारगुप्त प्रथम ने की। कालांतर में यह विद्या का प्रमुख केंद्र बना।

⇒ सुल्तानगंज (भागलपुर जिला) का अजगैवीनाथ मंदिर तथा कहलगांव के समीप स्थित गुफाएं गुप्तकाल में निर्मित हुई थीं।

⇒ बोध गया के महाबोधि मंदिर तथा राजगृह के मनियार मठ का निर्माण गुप्तकाल में हुआ था।

⇒ गुप्तकाल के प्रसिद्ध खगोलविद् एवं गणितज्ञ आर्यभट्ट बराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त पाटलिपुत्र के निवासी थे।

⇒ गुप्त काल में बनी दो मीटर से भी ऊंची बुद्ध की एक कांस्य प्रतिमा भागलपुर के निकट सुल्तानगंज में पाई गई है।

⇒ चन्द्रगुप्त –II के नौ रत्न में कालिदास, वराहमिहिर, आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, धन्वन्तरी, अमर सिंह आदि।

परवर्ती गुप्त / उत्तर गुप्त / मगध गुप्त वंश

⇒ इस वंश का संस्थापक कृष्णगुप्त को माना जाता है. वे लोग सम्भवतः गुप्तों के अधीन मांडलिक थे.

⇒ कुमारगुप्त तृतीय इस वंश का पहला स्वतंत्र शासक था.

⇒ परवर्ती गुप्त शासकों के साथ ही बिहार के कुछ हिस्सों पर मौखरियों का भी शासन रहा।

⇒ इसी समय गौड़ (बंगाल) के शासक शशांक ने बिहार के विस्तृत क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। शशांक को नाम के सिक्के तथा मुहरें नालंदा, रोहतास एवं गया से प्राप्त हुई हैं। शशांक ने बोध गया स्थित महाबोधि वृक्ष को क्षति पहुंचाई।

⇒ सातवीं शताब्दी के आरम्भ में हर्षवर्धन ने बिहार के कुछ भागों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया तथा शशांक द्वारा किसी आक्रमण कार्रवाई का निदान आसानी से करने के लिए परवर्ती गुप्त शासकों में माधवगुप्त को मगध क्षेत्र में अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया।

⇒ कुमार गुप्त और माधव गुप्त हर्षवर्धन के ममेरे भाई थे जो मगध पर मौखरियों के नियंत्रण के बाद उसके पास चले गए थे

⇒ हर्षवर्धन के समय भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 6 वर्ष तक नालंदा विश्वविद्यालय (महाविहार) में अध्ययन किया था। इस विश्वविद्यालय की अपनी मुद्रा थी जिस पर ‘श्री नालंदा महाविहार आर्य भिक्षुसंघस्थ’ उत्कीर्ण था।

⇒ चीनी यात्री इत्सिंग भी 670 ई. में नालंदा आया था।

⇒ हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद किसी स्थानीय शासक अर्जुन ने चीनी यात्रियों को क्षति पहुंचाई। प्रतिशोध में तिब्बत और नेपाल के राजाओं ने संयुक्त रूप से बिहार पर आक्रमण कर दिया।

⇒ माधवगुप्त के पुत्र आदित्यसेन ने तिब्बत के प्रभुसत्ता से बिहार को मुक्त कराया।

⇒ परवर्ती गुप्त वंश का अंतिम शासक जीवितगुप्त II था, जिसका 750 ई. के लगभग कन्नौज के शासक यशोवर्मन ने वध कर दिया। इस समय तक पाटलिपुत्र का गौरव भी नष्ट हो चुका था।

पाल कालीन बिहार

⇒ हर्षवर्धन के साम्राज्य के विघटन के बाद आठवीं शताब्दी के मध्य में पूर्वी भारत में पालवंश के अभ्युदय हुआ, इसका संस्थापक गोपाल था जिसने शीघ्र ही अपना अधिकार बिहार के क्षेत्र में विस्तृत कर दिया।

⇒ गोपाल के पुत्र धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण किया तथा चक्र्युद्ध को शासक नियुक्त कर एक दरबार का आयोजन किया तथा उत्तरापथस्वामी की उपाधि धारण की।

⇒ धर्मपाल ने विक्रमशीला महाविहार की स्थापना कराई। ओदंतपुरी और जगदल के विश्वविद्यालय (बौद्ध शिक्षा केंद्र) भी इसी काल में अस्तित्व में आए।

⇒ देवपाल ने जावा के शासक बलपुत्रदेव के अनुरोध पर नालंदा में एक विहार की देखरेख के लिए पांच गांव अनुदान में दिए थे। बलपुत्रदेव ने देवपाल की अनुमति से नालंदा में विदेशी विद्यार्थियों के लिए छात्रावास निर्मित कराया था।

⇒ मिहिरभोज एवं महेन्द्रपाल के शासन के समय बिहार के अधिकांश क्षेत्रों पर प्रतिहारों ने अधिकार कर लिया।

⇒ महिपाल प्रथम, जिसे पाल वंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है, ने समस्त बंगाल और मगध के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। किन्तु इसके उतराधिकारी कमजोर निकले। इसके बाद सेन वंश ने उतर बिहार पर अधिकार कर लिया।

⇒ पालों की शक्ति मगध के कुछ क्षेत्रों तक सिमट कर रह गई।

⇒ रामपाल के शासनकाल में मिथिला (तिरहुत) में कर्नाट वंश का राज्य स्थापित हुआ। इसका संस्थापक नन्यदेव था जिसने ‘कर्नाटकुल भूषण’ की उपाधि धारण की थी।

⇒ उसने 1097-1147 ई. तक शासन किया तथा इस दौरान नेपाल का क्षेत्र भी विजित किया।

⇒ रामपाल की म्रत्यु के बाद गहड़वालों ने भी बिहार में शाहाबाद और गया तक विस्तार कर लिया।

⇒ गहड़वाल वंश के शासक गोविंदचंद्र के मुंगेर ताम्रपत्र में तुरूष्कदंड नामक कर की चर्चा मिलती है। यह कर यहां के किसानों से प्राप्त किया जाता था और इससे तुर्को के आक्रमण रोकने के साधन जुटाए जाते थे।

मिथिला के कर्नाट शासक

⇒ रामपाल के शासनकाल में मिथिला (तिरहुत) में कर्नाट वंश की स्थापना नन्यदेव ने की थी।

⇒ नन्यदेव का पुत्र गंगदेव एक योग्य प्रशासक था जिसकी राजधानी सिमरावगढ़ थी।

⇒ जब बख्तियार खिलजी ने बिहार में अभियान किया था तो कर्नाट शासक नरसिंह देव ने उसे नजराना देकर संतुष्ट किया था।

⇒ तिब्बती यात्री धर्मास्वामिन ने तिरहुत क्षेत्र में तुर्क सेनापति तुगरिल तुगन के असफल सैनिक अभियानों की चर्चा की है।

⇒ हरिसिंहदेव के समय गयासुद्दीन तुगलक का बंगाल अभियान हुआ था, वह नेपाल के तराई में पलायन कर गया।

⇒ हरिसिंह देव एक महान समाज सुधारक था. उसी के समय पंजी प्रबंध का विकास हुआ तथा पंजिकारों का एक नया वर्ग संगठित हुआ। वर्तमान मैथिली समाज के स्वरूप का विकास इसी के समय हुआ था।

⇒ कर्नाट वंश के बाद वैनवार/ओईनवार वंश का शासन स्थापित हुआ। वैनवार वंश के शासक शिवसिंह कवि विद्यापति के संरक्षक थे. विद्यापति की रचना कीर्तिलता है।

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Thu, 20 Mar 2025 11:07:00 +0530 Jaankari Rakho
आधुनिक बिहार का इतिहास : महत्वपूर्ण तथ्य / History of Modern Bihar : Important Facts https://m.jaankarirakho.com/72 https://m.jaankarirakho.com/72 आधुनिक बिहार का इतिहास: यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों की गतिविधियाँ  

⇒ बिहार के क्षेत्र में सर्वप्रथम पूर्तगाली आए थे।

⇒ बिहार शोरा व्यापार के लिए प्रसिद्ध था, जिसपर डच व्यापारियों का प्रभुत्व था। वर्तमान पटना कालेज की उत्तरी इमारत में 1632 ई. में डच फैक्ट्री स्थापित थी।

⇒ शोरा के व्यापार से लाभ उठाने के लिए अंग्रेजों ने 1620 ई. में पटना के आलमगंज में अपनी प्रथम फैक्ट्री स्थापित की। तत्कालीन बिहार के सुबेदार ‘मुबारक खान’ ने अंग्रेजों के रहने की व्यवस्था कराई, लेकिन 1621 ई. में यह फैक्ट्री बंद हो गई।

⇒ 1664 ई. में जाब चार्नाक को पटना फैक्ट्री का प्रधान बनाया  गया जो इस पद पर 1680-81 तक बना रहा।

⇒ 1680 ई. में बिहार के सुबेदार शाइस्ता खां ने अंग्रेजों की कंपनी के व्यापार पर 3.5 % कर लगा दिया था।

⇒ 1707 ई. में मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही  अंग्रेजों की व्यापारिक गतिविधियों में रूकावट आ गई। 1713 ई. में पटना फैक्ट्री को बंद कर दिया गया।

⇒ 1717 ई. में फर्रूखसियर ने अंग्रेजों को बिहार एवं बंगाल में व्यापार करने की पुनः स्वतंत्रता प्रदान कर दी।

⇒ 23 जून, 1757 ई. को प्लासी के युद्ध के पश्चात लार्ड क्लाइव ने मीर जाफर को बंगाल का नवाब नियुक्त किया और उसके पुत्र मीरन को बिहार का उप नवाब नियुक्त किया। लेकिन बिहार में वास्तविक सत्ता बिहार के नायब नाजिम राजा रामनारायण के हाथों में थी।

⇒ 1760 ई. में अली गौहर ने पटना पर घेरा डाला था, जिसे कैप्टन नाॅक्स के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने मार भगाया।

⇒ मुगल सम्राट आलमगीर द्वितीय की मृत्यु के बाद अली गौहर का पटना में अंग्रेजों की फैक्ट्री में राज्याभिषेक किया गया।

⇒ अंग्रेजों के हस्तक्षेप से मुक्त रहने के उद्देश्य से बंगाल के नवाब मीर कासिम ने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से हटाकर मुंगेर में स्थापित की थी।

⇒ 1764 ई. में बक्सर का युद्ध हुआ। इस युद्ध में बंगाल के नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना को सर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में अंग्रेजों की सेना ने पराजित किया।

⇒ 1765 ई. में शाह आलम द्वितीय ने बिहार, बंगाल व उड़ीसा के क्षेत्रों में दीवानी (लगान-वसूली) का अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को प्रदान किया।

⇒ बंगाल एवं बिहार के क्षेत्र में द्वैध शासन 1765 में लागू किया गया। इस समय बिहार का प्रशासन मिर्जा मोहम्मद कजीम खां था तथा उपसुबेदार धीरज नारायण था।

⇒ 1766 ई. में पटना स्थित अंग्रेजों की फैक्ट्री (व्यापारिक केंद्र) के मुख्य अधिकारी मिडलटन को राजा धीरज नारायण और राजा शिताब राय के साथ एक प्रशासन मंडली का सदस्य नियुक्त किया गया।

⇒ 1770 ई. में बिहार में शीषण अकाल पड़ा। पटना, भागलपुर और दरभंगा जिलों में अकाल का प्रकोप सबसे अधिक रहा।

⇒ 1770 ई. में बिहार के लिए पटना में एक लगान परिषद का गठन किया गया। इसका अध्यक्ष जेम्स अलेक्जैंडर था और इसके सदस्य थे- राबर्ट पाल्क एवं जार्ज वैनसिटार्ट।

⇒ लगान वसूली का कार्य अब लगान परिषद द्वारा देखा जाने लगा, जबकि शिताब राय के अधीन निजामत (सामान्य प्रशासन)के कार्य रहे।

⇒ 1774 ई. के रेग्यूलेटिंग एक्ट पारित होने के बाद निरीक्षक और बिहार परिषद दोनों को समाप्त कर बिहार के लिए एक प्रांतीय सभा का गठन किया गया।

⇒ 1790 ई. तक अंग्रेजों ने बिहार में फौजदारी प्रशासन को भी अपने नियंत्रण में ले लिया। पटना के प्रथम अंग्रेज मजिस्ट्रेट के पद पर चाल्र्स फ्रांसिस ग्रांड की नियुक्ति हुई।

आधुनिक बिहार का इतिहास: वहाबी आन्दोलन

⇒ भारत में वहाबी आंदोलन के प्रवर्तक रायबरेली (उ.प्र.) के सैयद अहमद बरेलवी थे, जो 1821 में पटना आए थे। पटना में सादिकपुर एवं ननमोहिया मोहल्ले के फतह अली एवं इलाही बख्श के परिवार ने उनके विचारों को स्वीकार किया। पटना में ही प्रथम बार इसका एक सांगठनिक आधार तैयार करने का प्रयास किया गया। मोहम्मद हुसैन को खलीफा नियुक्त किया गया। इस प्रकार वहाबी आंदोलन के लिए पटना सदैव एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा।

⇒ बिहार में वहाबी आंदोलन का दमन 1863 के अम्बेला अभियान के पश्चात् हुआ। 1865 में पटना में वहाबियों पर  राजद्रोह के मुकदमें चलाए गए। बिहार से अहमदुल्लाह, अब्दुर रहीम आदि को आजीवन कारावास की सजा देकर कालापानी (अंडमान द्वीप) भेज दिया गया।

⇒ वहाबी आंदोलन का बिहार में प्रमुख नेता मौलवी विलायत अली थे। इस आंदोलन के अंतर्गत सैयद अहमद बरेलवी द्वारा पटना में निम्नलिखित चार खलीफा नियुक्त किए गए थे- विलायत अली, इनायत अली, शाह मोहम्मद हुसैन और फरहात हुसैन।

आधुनिक बिहार का इतिहास: आरम्भिक विद्रोह- बिहार में 1857 की क्रांति

⇒ संथाल विद्रोह के दो प्रमुख नेता चांद और भैरव भागलपुर के समीप युद्ध में शहीद हुए थे।

⇒ 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का प्रारम्भ पटना सिटी में गुरहट्टा मोहल्ले के एक पुस्तक विक्रेता पीर अली के नेतृत्व में 3  जुलाई, 1857 को हुआ। इस विद्रोह में बिहार में अफीम व्यापार का एजेंट लायल अपने सैनिकों सहित मारा गया।

⇒ कमिश्नर टेलर ने पटना सिटी के विद्रोह का बलपूर्वक दमन किया। पीर अली के घर को पूर्णतः नष्ट कर दिया गया, 17 व्यक्तियों को फांसी की सजा दी गई तथा खाजेकलां थाना के दरोगा को स्थिति की पूर्व सूचना नहीं देने के आरोप में स्थानांतरित कर दिया गया।

⇒ 25 जुलाई, 1857 को मुजफ्फरपुर में कुछ अंग्रेज अधिकारियों की असंतुष्ट सैनिकों ने हत्या कर दी। इस दिन दानापुर में तीन रेजीमेंटो सातवीं, आठवीं तथा चालीसवीं का सैनिक विद्रोह हुआ। ये रेजीमेंट जगदीशपुर के जमींदार कुंवर सिंह से मिल गई तथा इनके सहयोग से कुंवर सिंह ने आरा नगर की कचहरी और राजकोष पर अधिकार कर लिया।

⇒ आरा को मुक्त कराने के उद्देश्य से दानापुर से आया कैप्टन डनवर संघर्ष में मारा गया।

⇒ 2 अगस्त, 1857 ई. को कुंवर सिंह एवं मेजर आयर की सेनाओं के बीच बीबीगंज के निकट भयंकर संघर्ष हुआ, जिसमें कुंवर सिंह के नेतृत्व में विद्रोहियों को आरा छोड़ना पड़ा।

⇒ दिसम्बर, 1857 में कुंवर सिंह ने रीवा में नाना साहब के साथ मिलकर अंग्रेजों से युद्ध किया। तत्पश्चात् उन्होंने आजमगढ़ (उ.प्र.) में अंग्रेजों को पराजित किया।

⇒ बलिया (उ.प्र.) के समीप अंग्रेजों के साथ युद्ध में विजयी होने के बाद जगदीशपुर की ओर लौटने के प्रयास में कुंवर सिंह ने 23 अप्रैल, 1858 को कैप्टन ली ग्रांड के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना को बुरी तरह पराजित किया। लेकिन कुंवर सिंह इस युद्ध में घायल हो गए और दो दिन पश्चात उनकी मृत्यु हो गई।

⇒ कुंवर सिंह के बाद संघर्ष का क्रम उनके भाई अमर सिंह ने आगे बढ़ाया। शाहाबाद क्षेत्र में उनका नियंत्रण बना रहा। नवम्बर, 1858 तक इस क्षेत्र पर अंग्रेजों का अधिकार पुनः स्थापित नहीं हो सका।

⇒ गया तथा समीपवर्ती क्षेत्रों नवादा, जहानाबाद, राजगीर, अमरथू आदि में 1857 के विद्रोह का नेतृत्व हैदर अली खां, मेहंदी अली खां, अहमद खां, गुलाम अली खां, हुसैन बख्श खां, हक्कू सिंह, नन्हकू सिंह, फतह सिंह आदि ने किया था।

⇒ छपरा में 1857 के विद्रोह का नेतृत्व मोहम्मद हुसैन खां ने किया।

⇒ बिहार में 1857 ई. के विद्रोह के प्रमुख केंद्र थे-दानापुर, सारण, तिरहुत, चम्पारण, शाहाबाद, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, गया, रोहतास, सहसराम, राजगीर, बिहार शरीफ आदि।

⇒ 30 जुलाई, 1857 में को ब्रिटिश सरकार ने सारण, तिरहुत, चम्पारण और पटना जिलों में सैनिक शासन लागू किया था।

⇒ अगस्त, 1857 में भागलपुर में विद्रोह भड़क उठा तथा विद्रोहियों ने गया पहुंचकर वहां कैद 400 लोगों को मुक्त करा दिया। इसके अतिरिक्त टिकरी राज पर भी हमला हुआ और वहां से 10,000 रूपए लूट लिए गए।

आधुनिक बिहार का इतिहास:  बंगभंग एवं स्वदेशी आंदोलन

⇒ बिहार में बंगभंग आंदोलन के दौरान 16 अक्टुबर, 1905 को सतीशचंद्र चक्रवर्ती की प्रेरणा से राखी बंधन दिवस मनाया गया।

⇒ बिहार में तरूण स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित होकर 1906 में बिहारी स्टुडेंट कांफ्रेस की स्थापना की गई थी।

आधुनिक बिहार का इतिहास: क्रांतिकारी आन्दोलन

⇒ 1906-07 में बाबाजी ठाकुरदास ने पटना में रामकृष्ण सोसाइटी की स्थापना की तथा क्रांतिकारी विचारों के प्रचार के लिए ‘द मदरलैंड’ पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया।

⇒ 30 अप्रैल, 1908 को मुजफ्फरपुर के प्रमुख वकील प्रिंग्ले केनेडी की गाड़ी पर खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चाकी द्वारा जज डी.एच. किंग्सफोर्ड की हत्या के उद्देश्य से बम फेंका गया। इसमें श्रीमती केनेडी तथा उनकी पुत्री की मृत्यु हो गई।

⇒ प्रफुल्ल चंद चाकी ने 2 मई, 1908 को आत्महत्या कर ली।

⇒ खुदी राम बोस पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें फांसी दे दी गई। इस मुकदमें  में कालीदास बसु बोस के वकील थे।

⇒ 1907 में शांति नारायण ने ‘स्वराज’ नामक एक समाचार पत्र निकाला जिसमें मुजफ्फरपुर बम कांड का जिक्र था और इसके लिए शांति नारायण को लंबी कैद हुई।

आधुनिक बिहार का इतिहास: अलग प्रान्त में सृजन

⇒ 1906 में सच्चिदानंद और महेश नारायण के द्वारा पृथक बिहार की मांग के समर्थन में एक पुस्तिका प्रस्तुत की गई।

⇒ राजेंद्र प्रसाद के द्वारा 1906 ई. में पटना में बिहारी छात्र सम्मेलन का आयोजन हुआ तथा ‘बिहार स्टूडेण्ट्स कान्फ्रेंस’ गठित की गई।

⇒ बिहार प्रादेशिक सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन पटना में 1908 ई. सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में मोहम्मद फखरूद्दीन ने बिहार को बंगाल से पृथक कर एक नए प्रांत के रूप में संगठित करने का प्रस्ताव रखा, जिसे सर्वसम्मति से मान लिया गया।

⇒ 12 दिसम्बर, 1911 को दिल्ली में आयोजित शाही दरबार में बिहार और उड़ीसा के क्षेत्रों को बंगाल से पृथक कर एक नए प्रांत में संगठित करने की घोषणा साम्राज्ञी द्वारा की गई। नया प्रांत 1 अप्रैल, 1912 को विधिवत स्थापित हो गया।

आधुनिक बिहार का इतिहास: स्वतंत्रता आन्दोलन

⇒ 1908 ई. में नवाब सरफराज हुसैन खां की अध्यक्षता में बिहार में कांग्रेसियों की एक सभा का आयोजन हुआ। इसमें बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन हुआ तथा इसका प्रथम अध्यक्ष हसन इमाम को बनाया गया। इसके कोषाध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा थे।

⇒ बाबू दीपनारायण सिंह के प्रयत्नों से बिहार कांग्रेस कमेंटी का दूसरा सम्मेलन भागलपुर में सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में 1909 में सम्पन्न हुआ।

⇒ 1912 ई. में पटना में कांग्रेस का 27वां सम्मेलन आयोजित हुआ। इसके अध्यक्ष आर.एन.मुधोलकर थे, जबकि महामंत्री सच्चिदानंद सिन्हा और स्वागत समिति के अध्यक्ष मजहरूल हक थे।

⇒ बिहार से मजहरूल हक और सच्चिदानंद सिन्हा 1914 में कांग्रेस द्वारा ब्रिटेन भेजे जाने वाले शिष्टमंडल के सदस्य चुने गए थे।

⇒ सर शंकरण नायर द्वारा केन्द्रीय विधायिका परिषद में पटना विश्वविद्यालय विधेयक 1916 में प्रस्तुत किया गया था।

⇒ 1916 ई. में पटना उच्च न्यायालय तथा 1917 ई. में पटना विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।

⇒ 1918 में अंग्रेज सरकार ने मुजफ्फरपुर के रत्नाकर प्रेस से मुद्रित पुस्तक ‘मां की पुकार’ तथा 12 जुलाई, 1919 को प्रकाशित कविता ‘खूनी कफन’ जब्त कर ली थी।

⇒ 16 दिसम्बर, 1916 ई. को बांकीपुर (पटना) की सभा में बिहार में पहली होमरूल लीग की स्थापना हुई थी, इसके अध्यक्ष मजहरूल हक, उपाध्यक्ष सरफराज हुसैन तथा मंत्री चंद्रवंशी सहाय थे।

⇒ श्रीमती एनी बेसेंट ने होमरूल लीग के कार्यकलापों के सिलसिले में दो बार (18 अप्रैल, 1918 तथा 25 जुलाई, 1918) पटना का दौरा किया।

आधुनिक बिहार का इतिहास: बिहार में चंपारण आन्दोलन

⇒ कर्नल हिक्की ने बारा में 1813 में नील की कोठी खोली थी जो बाद में अन्य जगहों पर भी खोली गई।

⇒ यूरोपीय निलहे उत्तर बिहार में दो प्रकार से नील की खेती करते थे- जीरात एवं आसामीबार

⇒ जीरात के अंतर्गत अंग्रेज अपनी देख-रेख में हल-बैल की सहायता से नील की खेती कराते थे।

⇒ नील की आसामीवार खेती के तीन तरीके थे- कुरतौली, खुश्की और तीनकठिया। कुरतौली में आसामी का खेत व घर दीर्घकाल के लिए बंधक रखा जाता था। खुश्की में कोटी की रैयत न होने वालों के साथ पट्टा किया जाता था। तीनकठिया में आसामी अपने खेत में प्रति बीघा तीन कठ्ठे के हिसाब से नील की खेती करता था।

⇒ कुरतौली पद्धति में किसानों का सबसे अधिक शोषण होता था।

⇒ हिन्दु पैट्रियाट के संपादक हरीशचंद्र मुकर्जी ने किसानों का पक्ष लिया जिसका बिहार, बंगाल के किसानों पर व्यापक प्रभाव पड़ा।

⇒ दीन बंधु मित्र ने अपने बंगला नाटक नील दर्पण में नील उत्पादन की शोषणकारी व्यवस्था का 1860 में सजीव चित्रण किया।

⇒ 1916 में लखनऊ में  आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 31वें अधिवेशन में बिहार से संबंधित दो प्रस्तावों को प्रस्तुत किया गया- (1) पटना विश्वविद्यालय विधेयक (2) चम्पारण के किसानों से संबंधित प्रस्ताव।

⇒ दिसम्बर, 1916 ई. के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में बिहार के राजकुमार शुक्ल ने महात्मा गांधी को चम्पारण आने का निमंत्रण दिया।

⇒ 1916 ई. के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में ब्रज किशोर प्रसाद ने एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसमें इन समस्याओं के निदान के लिए एक समिति के गठन की बात कही गई थी।

⇒ अप्रैल, 1917 ई. में महात्मा गांधी पटना और मुजफ्फरपुर होते हुए चम्पारण पहुंचे।

⇒ गांधीजी चम्पारण आए और 1917 में उन्होंने सत्याग्रह का प्रथम प्रयोग किया। चम्पारण सत्याग्रह तीन कठिया नील व्यवस्था के विरूद्ध था।

⇒ चम्पारण के जिला मजिस्ट्रेट डब्ल्यू.बी. हाडकाक ने 16 अप्रैल, 1917 को गांधी को चम्पारण छोड़ देने का आदेश दिया था।

⇒ बिहार के उपराज्यपाल एडवर्ड गेट ने गांधीजी को वार्ता के लिए बुलाया और किसानों की समस्या की जांच के लिए एक समिति के गठन का प्रस्ताव रखा जो ‘चम्पारण एग्रेरेरियन समिति’ कहलाई। महात्मा गाँधी भी इस समिति के सदस्य थे। इस समिति के अध्यक्ष एफ.जी. स्लाई थे।

⇒ चम्पारण आंदोलन में महात्मा गांधी के अन्य सहयोगी थे- राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, धरणीधर, अनुग्रह नारायण सिंह, महादेव देसाई, नरहरि पारिख, जे. बी. कृपलानी आदि थे।

⇒ जून, 1919 ई. में मधुबनी जिले के किसानों को स्वामी विद्यानंद (विशुभरण) ने दरभंगा राज के विरूद्ध संगठित किया। लगान गुमाश्तों के अत्याचार का विरोध तथा जंगल से फल एवं लकड़ी प्राप्त करने के अधिकार की प्रस्तुति इस आंदोलन की विशेषता थी।

आधुनिक बिहार का इतिहास: खिलाफत आन्दोलन

⇒ प्रथम विश्व युद्ध आरंभ होने पर कुछ भारतीय मुसलमानों ने तुर्की की ओर से अंग्रेजों विरूद्ध युद्ध में भाग लेने की योजना भी बनाई थी। इस योजना में बिहार के कुछ मुस्लिम भी शामिल थे, जिसमें वहाबी नेता मौलवी अब्दुल रहीम प्रमुख थे।

⇒ प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर 16 फरवरी, 1919 को पटना में हसन इमाम की अध्यक्षता में एक सभा हुई, जिसमें खलीफा के प्रति मित्र देशों द्वारा उचित व्यवहार के लिए लोकमत बनाने की बात कही गई।

⇒ अप्रैल, 1919 में खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता मौलाना शौकत अली पटना आए।

⇒ खिलाफत दिवस 1 अगस्त 1920 के अवसर पर बिहार में नुरूल हसन ने प्रांतीय विधान परिषद की सदस्यता से त्याग पत्र दे दिया। मुंगेर के वकील मोहम्मद जुबैर ने अपनी वकालत छोड़ दी।

आधुनिक बिहार का इतिहास: असहयोग आन्दोलन

⇒ बिहार प्रातीय सम्मेलन के 12वें अधिवेशन की अध्यक्षता राजेन्द्र प्रसाद ने की तथा असहयोग पर बल दिया।

⇒ असहयोग संबंधी प्रस्ताव दरभंगा के धरणीधर ने प्रस्तुत किया।

⇒ बिहार में असहयोग आंदोलन के नेता डा0 राजेन्द्र प्रसाद थे।

⇒ 15-16 मई, 1919 को फुलवारी शरीफ (पटना) में मुस्लिम उलेमाओं का सम्मेलन हुआ, जिसमें सरकार से असहयोग का प्रस्ताव पारित हुआ।

⇒ बिहार राष्ट्रीय महाविद्यालय की स्थापना 5 जनवरी, 1921 ई. को हुई, जबकि इसका उद्घाटन महात्मा गांधी ने 6 फरवरी, 1921 ई. को किया। इसी दिन ही बिहार विद्यापीठ का भी उद्घाटन हुआ।

⇒ राष्ट्रीय महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ राजेन्द्र प्रसाद थे, जबकि विद्यापीठ के कुलाधिपति मजहरूल हक और कुलपति ब्रजकिशोर प्रसाद बने।

⇒ असहयोग आंदोलन के क्रम में मजहरूल हक, राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, मोहम्मद शफी आदि नेताओं ने विधायिका के चुनाव से अपनी उम्मीदवारी वापस ली थी।

⇒ 1920 के मध्य में शाहाबाद के डुमरांव में नशाबंदी आंदोलन चलाया गया।

⇒ भागलपुर में शराबबंदी आंदोलन शुरू किया गया था।

⇒ मजहरूल हक ने दीघा (पटना) के पास अपने मित्र खैरू मियां की जमीन पर सदाकत आश्रम का निर्माण किया। यह स्थान बिहार में राष्ट्रीय आंदोलन का मुख्यालय बना तथा कालांतर में बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी का कार्यालय बना।

⇒ 30 सितम्बर, 1921 को मजहरूल हक ने सदाकत आश्रम से ‘दि मदरलैंड’ नामक एक अखबार प्रकाशित करना आरंभ किया जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय भावना का प्रसार, असहयोग कार्यक्रम का प्रचार और हिंदू-मुस्लिम एकता का उपदेश देना था।

⇒ 1919 के एक्ट के प्रावधानों के अनुरूप सत्येद्र प्रसाद सिन्हा बिहार के गवर्नर बने। इस पद पर वह पहले भारतीय थे।

⇒ 1922 ई. में देशबन्धु चितरंजन दास की अध्यक्षता में कांग्रेस का 37वां अधिवेशन बिहार के गया में हुआ।

⇒ फरवरी, 1923 में बिहार में स्वराज्य दल का गठन हुआ। बिहार में इसके नेता अनुग्रह नारायण सिंह थे।

⇒ बिहार में स्वराज पार्टी को 12 में से 8 सीटें मिली।

⇒ 27 नवम्बर, 1921 को बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा बिहार कौमी सेवक दल का गठन किया गया। इसका मुख्यालय मुजफ्फरपुर में था।

⇒ भागलपुर झंडा कांड- फरवरी 1922

⇒ गांधी जी की एक बार पुनः बिहार यात्रा 1925 में हुई। इस दौरान उन्होंने जीरादेई को तीर्थ स्थान की संज्ञा दी। दरभंगा को आधुनिक तीर्थ स्थान कहा।

आधुनिक बिहार का इतिहास: कृषक आन्दोलन

⇒ मुंगेर में 1922-23 में किसान सभा का गठन शाह मोहम्मद जुबैर और श्री कृष्ण सिंह द्वारा किया गया।

⇒ स्वामी सहजानंद सरस्वती ने भूमिहार ब्राह्मणों को संगठित करने हेतु पटना के समीप बिहटा में आश्रम की स्थापना की थी।

⇒ 1929 ई. में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बिहार प्रांतीय किसान सभा की स्थापना सोनपुर में की थी। इसके सचिव श्री कृष्ण सिंह थे।

⇒ इसे बिहार के गांवों में फैलाने में उन्हें कार्यानंद शर्मा, राहुल सांकृत्यान, पंचानन शर्मा, यदुनंदन शर्मा आदि वामपंथी नेताओं का सहयोग मिला।

⇒ दरभंगा में किसान आंदोलन के नेता कार्यानंद थे।

⇒ बिहार प्रांतीय किसान सभा का दूसरा सम्मेलन गया में  आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता पुरूषोत्तम दास टंडन ने किया।

⇒ 1933 ई. में स्वामी सहजानंद द्वारा बिहार प्रांतीय किसान सभा के आंदोलन को पुनः सक्रिय किया गया। अपने तीसरे हाजीपुर सम्मेलन में इस सभा ने एक जुझारू कार्यक्रम स्वीकार किया था तथा जमींदारी प्रथा हटाने का प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।

⇒ मुंगेर जिला के बड़हिया में कार्यानन्द शर्मा ने किसान आंदोलन चलाया।

⇒ 1936 ई. में अखिल भारतीय किसान सभा का गठन हुआ। इसके अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती और महासचिव प्रोफेसर एन.जी. रंगा थे।

⇒ 1935 ई. में बिहार प्रांतीय किसान सभा ने जमींदारी उन्मूलन का प्रस्ताव पारित किया था।

⇒ नवम्बर, 1936 में कार्यानंद शर्मा के नेतृत्व में मुंगेर जिले के ‘बड़हिया ताल’ में बिहार प्रांतीय किसान सभा ने जमींदारी उत्पीड़न के विरूद्ध संघर्ष किया था।

⇒ दरभंगा के क्षेत्रों में व सारण के किसानों का नेतृत्व यमुना काय्र्यी ने किया था, जबकि अन्नवारी क्षेत्र में किसानों के नेता राहुल सांकृत्यान थे।

आधुनिक बिहार का इतिहास: साइमन कमीशन का विरोध

⇒ बिहार में साइमन कमीशन के आगमन का विरोध करने वालों में सर अली इमाम एवं सच्चिदानंद प्रमुख नेता थे।

⇒ बिहार में वर्ष 1929 में  विदेशी वस्त्र बहिष्कार आंदोलन के प्रमुख नेता डा0 राजेन्द्र प्रसाद थे।

⇒ 10 अगस्त, 1929 को बिहार में राजनैतिक पीड़ित दिवस मनाया गया।

⇒ 28वां बिहार प्रांतीय सम्मेलन 1929 में मुंगेर में  आयोजित किया गया जिसमें बल्लभ भाई पटेल सम्मिलित हुए।

⇒ बिहार युवक संघ की स्थापना 1928 में की गई। इसकी स्थापना बिहारी छात्र सम्मेलन (मोतिहारी) में की गई। इस सम्मेलन की अध्यक्षता प्रजापति मिश्र ने की तथा 14 अप्रैल को प्रथम नौजवान दिवस मनाने की घोषणा की गई।

आधुनिक बिहार का इतिहास: सविनय अवज्ञा आंदोलन

⇒ बिहार में 6 अप्रैल, 1930 ई. को नमक सत्याग्रह शुरू करने की तिथि निश्चित की गई तथा राजेंद्र प्रसाद ने आंदोलन की रूपरेखा तैयार की। सर्वप्रथम चम्पारण एवं सारण में नमक सत्याग्रह की शुरूआत हुई।

⇒ आधुनिक बिहार के सारण जिले के बेरजा, गोरिया कोठी एवं हाजीपुर में क्रमशः 6,7 एवं 8 अप्रैल को नमक सत्याग्रह आरम्भ हुआ।

⇒ मुजफ्फरपुर में 7 अप्रैल को तथा चम्पारण जिले के कई स्थानों पर 15 अप्रैल को नमक कानून भंग हुआ। मुजफ्फरपुर में नमक सत्याग्रह के नेता थे रामदयालु सिंह थे।

⇒ पटना में 16 अप्रैल, 1930 ई. को नमक सत्याग्रह शुरू हुआ तथा नखसपिंड नामक स्थान नमक कानून भंग करने के लिए चुना गया।

⇒ पटना में अंबिका कांत सिंह ने सत्याग्रहियों के जत्थे का नेतृत्व किया। इस आंदोलन में रामवृक्ष बेनीपुरी को भी गिरफ्तार किया गया था।

⇒ दरभंगा में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व सत्य नारायण सिंह ने किया।

⇒ मुंगेर में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व श्री कृष्ण सिंह ने किया।

⇒ सविनय अवज्ञा आंदोलन के कार्यक्रमों के तहत मई, 1930 ई. में पटना में एक स्वदेशी संघ की स्थापना हुई जिसके अध्यक्ष सर अली ईमाम थे।

⇒ इस आंदोलन के प्रभाव में छपरा जेल के कैदियों ने स्वदेशी वस्त्र की मांग की एवं उसके उपलब्ध न कराए जाने पर नंगे रहने का निश्चय किया। इसे ‘नंगी हड़ताल’ के नाम से जाना जाता है।

⇒ बिहार में पटना में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन का आयोजन 1929 में किया गया

⇒ पटना में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का नेतृत्व श्रीमति हसन इमाम तथा विन्ध्यवासिनी देवी ने किया।

⇒ बिहार में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान भागलपुर जिला में वीहपुर सत्याग्रह का आयोजन किया गया जिसके नेता डा0 राजेन्द्र प्रसाद थे।

⇒ सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान बिहार में चैकीदारी कर का भुगतान करने से किसानों ने मना कर दिया। चैकीदारी कर के विरूद्ध अभियान चलाया गया जिसमें चम्पारण जिला अग्रणी था।

⇒ बिहार में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान बिहार सत्याग्रह समाचार के विरूद्ध कार्रवाई की गयी।

⇒ युवक, सर्चलाइट प्रेस, पटना द्वारा प्रकाशित होता था जिसके सम्पादक रामवृक्ष बेनीपुरी थे।

⇒ 30 जून 1930 को राजेन्द्र प्रसाद की गिरफ्तारी हुई और उन्हें हजारीबाग जेल में रखा गया। इसके पश्चात डा0 राजेन्द्र प्रसाद ने दीपनारायण सिंह को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

⇒ 1931 ई. में गंगाशरण सिन्हा, रामवृक्ष बेनीपुरी और रामानंद मिश्रा आदि ने बिहार सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया।

⇒ बिहार में अष्पृश्यता निवारण हेतु 1932 में बिहार प्रांतीय बोर्ड की स्थापना की गई।

⇒ 1934 ई. में पटना के अंजुमन इस्लामिया हॉल में बिहार सोशलिस्ट पार्टी की औपचारिक स्थापना हुई। इसके अध्यक्ष आचार्य नरेन्द्र देव और सचिव जयप्रकाश नारायण थे।

⇒ बिहार सोशलिस्ट पार्टी के अन्य सदस्य थे- रामवृक्ष बेनीपुरी, गंगाशरण सिन्हा, योगेन्द्र शुक्ल, अब्दुल बारी, कर्पूरी ठाकुर, बसावन सिंह आदि। इस संगठन का तालमेल कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से था।

⇒ भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत 1937 ई. के चुनावों में कांग्रेस को बिहार में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ। कुल 152 स्थानों में 107 पर कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और 98 स्थानों पर उसे विजय प्राप्त हुई।

⇒ 24 मार्च, 1937 को बिहार के तात्कालिक राज्यपाल एम.जी. हैलेट ने कांग्रेस विधायिका दल के नेता श्रीकृष्ण सिंह को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया, लेकिन राज्यपाल यह आश्वासन देने को तैयार नहीं थे कि मंत्रियों के वैधानिक कार्यों में वे हस्तक्षेप नहीं करेंगे। अतः श्रीकृष्ण सिंह ने सरकार बनाने से इंकार कर दिया।

⇒ 1 अप्रैल, 1937 को इंडिपेंडेंट पार्टी के सदस्य मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में पहला भारतीय अंतरिम मंत्रिमंडल बिहार में संगठित हुआ। इस प्रकार मोहम्मद यूनुस बिहार के प्रथम भारतीय प्रधानमंत्री (उस समय प्रांतीय सरकार के प्रधान को प्रधानमंत्री कहा जाता था) बने।

⇒ 7 जुलाई, 1937 ई. को कांग्रेस कार्यकारिणी ने सरकारों के गठन का फैसला किया।

⇒ अतः मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने त्यागपत्र दिया और 20 जुलाई, 1937 ई. को श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में बिहार में प्रथम कांग्रेस का मंत्रिमंडल संगठित हुआ।

⇒ श्री रामदयालु सिंह एवं प्रोफेसर अब्दुल बारी बिहार विधानसभा के क्रमशः अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए।

⇒ अक्टूबर, 1937 ई. में मोहम्मद अली जिन्ना ने बिहार की यात्रा की थी।

⇒ 15 फरवरी, 1938 ई. को राजनीतिक कैदियों की रिहाई के मामले पर श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल ने त्यागपत्र दे दिया।

⇒ 26 दिसम्बर, 1938 ई. को पटना में मुस्लिम लीग का 26वां अधिवेशन सम्पन्न हुआ था। जबकि 29 दिसम्बर, 1938 ई. को अखिल भारतीय मुसलमान छात्र सम्मेलन भी आयोजित हुआ।

आधुनिक बिहार का इतिहास: भारत छोड़ो आंदोलन

⇒ भारत छोड़ो आंदोलन के समय बिहार में बिहार प्रांतीय युद्ध समिति का गठन किया गया।

⇒ भारत छोड़ो आंदोलन के समय श्री बलदेव सहाय ने सरकार के विरोध में महाधिवक्ता पद से त्याग पत्र दे दिया।

⇒ बिहार में भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व डा0 राजेन्द्र प्रसाद, फूलन प्रसाद वर्मा, अनुग्रह नारायण सिंह तथा मथुरा बाबु थे।

⇒ पटना में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पटना में महिलाओं का नेतृत्व डा. राजेन्द्र प्रसाद की बहन श्रीमति भगवती देवी ने किया।

⇒ 11 अगस्त, 1942 को विद्यार्थियों के एक जुलूस ने सचिवालय भवन के सामने पूर्वी गेट पर राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया तथा आगे बढ़ने की कोशिश की(सचिवालय गोलीकांड) ।

⇒ पटना के जिलाधीश डब्लू.जी. आर्चर के आदेश पर पुलिस ने गोली चलाई, जिसमें सात छात्र मारे गए। ये सात छात्र थे- उमाकान्त प्रसाद सिंह, रामानंद सिंह, राजेंद्र सिंह, रामगोविंद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जगपति कुमार और देवीपद चैधरी।

⇒ स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् सचिवालय गोलीकांड के स्थान पर स्वतंत्रता दिवस के दिन बिहार के प्रथम राज्यपाल जयरामदास दौलतराम ने एक शहीद स्मारक का शिलान्यास किया।

⇒ इसका अनौपचारिक अनावरण देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने 1956 में किया।

⇒ 1942 ई. में भागलपुर में एक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना की गई।

⇒ 1942 ई. के भारत छोड़ो आंदोलन में सारण को अपराधी जिला घोषित किया गया था।

⇒ 18 अगस्त एवं 30 अगस्त, 1942 को मुंगेर जिले के पसराहा एवं रूइहार में दुर्घटनाग्रस्त होकर गिरने वाले शाही वायुसेना के विमान के कर्मचारियों की हत्या कर दी गई।

⇒ पटना के समीपवर्ती क्षेत्र मुंगेर व भागलपुर में भारत छोड़ो आंदोलन के दमन हेतु वायुयानों का प्रयोग किया गया था।

⇒ 1942 ई. के किसान आंदोलनों में सोशलिस्ट पार्टी के जयप्रकाश नारायण एवं रामवृक्ष बेनीपुरी की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

⇒ 9 नवम्बर, 1942 ई. में दीपावली की रात्रि में जयप्रकाश नारायण, रामानंद मिश्र, योगेन्द्र शुक्ल, सूरज नारायण सिंह आदि ने हजारीबाग जेल की दीवार फांदकर भागलने में सफलता प्राप्त की।

⇒ 1942 ई. में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में नेपाल में युवकों को छापामार युद्ध की शिक्षा देने हेतु एक केंद्र ‘आजाद दस्ता’ को संगठित किया गया। नेपाल में ही ‘आजाद दस्ता’ का अखिल भारतीय केंद्र स्थापित किया गया, जबकि बिहार में प्रांतीय कार्यालय संगठित हुआ।

⇒ मार्च-अप्रैल, 1943 ई. में नेपाल में राजविलास जंगल में ‘आजाद दस्ता’ का पहला प्रशिक्षण शिविर गठित हुआ, जिसमें बिहार के 25 युवकों को अग्नि-अस्त्रों को चलाने की शिक्षा दी गई। इसके निर्देशक सरदार नित्यानंद सिंह थे।

⇒ सीवान थाने पर राष्ट्रीय झंडा लहराने की कोशिश में फुलेना प्रसाद श्रीवास्तव पुलिस की गोलियों का शिकार हुए। जबकि गया के कुर्था थाने पर झंडा लहराने की कोशिश में श्याम बिहारी लाल मारे गए।

⇒ इसी प्रयास में कटिहार थाने और डुमरांव में पुलिस ने क्रमशः ध्रुव कुमार और कपिल मुनी को गोली मार दी।

⇒ भारत छोड़ो आंदोलन के क्रम में दरभंगा में कुलानंद वैदिक और सिधवारा में कर्पूरी ठाकुर ने संचार व्यवस्था को ठप करने का कार्य किया।

⇒ बिहार में क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सियाराम सिंह के नेतृत्व में ‘सियाराम दल’ ने उल्लेखनीय योगदान दिया। इस दल का प्रभाव भागलपुर, मुंगेर, किशनगंज, बलिया, सुल्तानगंज आदि में था।

⇒ सरकार द्वारा प्रचारित पटना डेली न्यूज नामक समाचार पत्र बिहार में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान प्रकाशित होता रहा।

आधुनिक बिहार का इतिहास: भारत छोड़ो आंदोलन के समय गुप्त गतिविधियां

⇒ गुप्त गतिविधियों के संचालन में बिहार में जयप्रकाश नारायण अग्रणी थे। इन्हें हजारीबाग जेल में रखा गया था।

⇒ जयप्रकाश नारायण ने इस दौरान एक शिविर स्थापित किया जो बाद में आजाद दस्ता कहलाया। इसका कार्य था छापामार युद्ध का प्रशिक्षण देना।

⇒ इस संगठन के अंतर्गत राम मनोहर लोहिया संचार एवं प्रचार विभाग का निर्देशन करते थे।

⇒ आजाद दस्ता के मुख्य प्रशिक्षक थे-सरदार नित्यानंद सिंह थे।

⇒ 1943 में नेपाल सरकार ने जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया आदि को गिरफ्तार कर हनुमान नगर जेल में रखा। जिन्हें उनके सहयोगियों सुरज नारायण सिंह और सरदार नित्यानंद सिंह ने छुड़ा लिया।

⇒ बिहार में सिंयाराम सिंह के नेतृत्व में सियाराम दल का गठन किया गया।

⇒ इस दल ने बीहपुर में समांतर सरकार की स्थापना की।

⇒ भागलपुर इलाके में इस दौरान परशुराम दल और महेन्द्र गोप दल का भी गठन किया गया था। स्वराज ट्रेन भी इसी दौरान प्रसिद्ध हुआ।

⇒ पटना के सरस्वती प्रेस को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बंद करवा दिया गया।

⇒ 15 जून, 1944 को बिहार में गांधी दिवस के रूप में मनाया गया।

⇒ 9 दिसम्बर, 1946 को स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का सत्र बिहार के डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा की अध्यक्षता में आरंभ हुआ। बाद में संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष के रूप में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को नियुक्त किया गया।                 

⇒ बिहार के प्रथम राज्यपाल जयरामदास दौलतराम और प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने 15 अगस्त, 1947 को पदभार ग्रहण किया।

⇒ 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ बिहार भारतीय संघ के एक राज्य में परिवर्तित हो गया और उसकी शासनविधि भी निर्धारित हो गई।

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Thu, 20 Mar 2025 11:06:55 +0530 Jaankari Rakho
मध्यकालीन बिहार का इतिहास : महत्वपूर्ण तथ्य / History of Medieval Bihar : Important Facts https://m.jaankarirakho.com/80 https://m.jaankarirakho.com/80 पाल वंश के पतन के बाद बिहार में जनजातीय राज्यों का उदय हुआ, जिनमे चेरों राज प्रमुख था। चेरो राज ने शाहाबाद, सारण, चंपारण, मुजफ्फरपुर एवं पलामू जिलों में राज किया। यह लगभग ३०० वर्षों तक शासन करते रहे।

⇒        बारहवीं शताब्दी के अंत और तेरहवीं शताब्दी के आरंभ में बनारस और अवध क्षेत्र के सेनापति मलिक हुसामुद्दीन के सहायक इख्तियारूद्दीन मोहम्मद इब्ने बख्तियार खिलजी ने बिहार के कर्मनासा नदी के पूर्वी और सफल सैनिक अभियान किए।

⇒        बख्तियार खिलजी के सफल अभियानों के साथ ही बिहार में तुर्क शासन का युग आरंभ हुआ। इस समय सेन वंश का शासक लक्ष्मण सेन और पालवंश का शासक इन्द्रद्युम्मन पाल था।

⇒        बख्तियार खिलजी की पहली महत्त्वपूर्ण सफलता ओदंतपुरी बिहार (बिहार शरीफ) की विजय थी, जो 1198 ई. में सम्पन्न हुई।

⇒        बख्तियार खिलजी ने सम्भवतः ओदंतपुरी विश्वविद्यालय को लूटा था।

⇒        लामा तारनाथ के अनुसार उसने नालंदा विश्वविद्यालय को तहस नहस किया।

⇒        बख्तियार खिलजी ने आधुनिक बख्तियारपुर नगर की स्थापना की थी.

⇒        बख्तियार खिलजी ने 1203-04 में उसने नदिया (बंगाल) पर चढ़ाई की जो लक्ष्मणसेन की राजधानी थी।

⇒        बख्तियार खिलजी ने उत्तर बिहार के मैदान एवं बंगाल के अधिकांश हिस्सों पर कब्ज़ा कर अपनी राजधानी लखनौती में बनाया।

⇒        बख्तियार खिलजी की हत्या उसके एक अधिकारी अलीमर्दान खिलजी ने कर दी. उसका शव सम्भवतः बिहारशरीफ के इमादपुर मोहल्ला में दफनाया गया।

सल्तनत काल में मध्यकालीन बिहार

⇒        इल्तुतमिश ने लगभग 1225 बिहार शरीफ एवं उसके आस पास अधिकार किया।

⇒        इल्तुतमिश ने राजमहल की पहाड़ियों में तेलियागढ़ी के पास हिसामुद्दीन इवाज को पराजित किया तथा अपने प्रतिनिधि के रूप में मलिक अलाउद्दीन जानी को नियुक्त किया, वह बिहार में दिल्ली का प्रथम प्रतिनिधि था।

⇒        शीघ्र ही इवाज ने मलिक अलाउद्दीन जानी को हटाकर नियंत्रण कर लिया बदले में इल्तुतमिश के पुत्र नसीरुद्दीन महमूद जो उस समय अवध का गवर्नर था, ने इवाज को मारकर सम्पूर्ण क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया.

⇒        इल्तुतमिश ने बिहार का शासन इख्तयारूद्दीन चुस्तकबा ‘यागानतुन’ तथा कुछ समय बाद इज्जुद्दीन तुगरिल तुगान खां को प्रदान किया था।

⇒        नसीरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद इख्तियारुद्दीन बल्ख खिलजी ने विद्रोह किया जिसे इल्तुतमिश ने दबाया तथा बिहार एवं बंगाल को अलग कर दिया।

⇒        इल्तुतमिश ने मलिक अलाउद्दीन जानी को बंगाल का गवर्नर तथा सैफुद्दीन ऐबक को बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया। बाद में फिर तुगान खां बिहार का राज्यपाल बना।

⇒        गया प्रशस्ति के अनुसार बलबन के शासन काल में गया का क्षेत्र दिल्ली के अधीन था।

⇒        लखनौती के शासक तुगरिल खान ने आरम्भ में बलबन की अधीनता स्वीकार की किन्तु 1279 -80 में उसने विद्रोह कर दिया जिसे बलबन ने दबाया एवं उसे मार डाला।

⇒        अलाउद्दीन खिलजी 1297 में शेख मोहम्मद इस्माइल के नेतृत्व में सेना को दरभंगा के शासक राजा सक्र सिंह के खिलाफ भेजा जिसे सक्र सिंह ने हरा दिया किन्तु आगे इस्माइल ने सक्र सिंह को बंदी बनाकर अलाउद्दीन के पास ले गया।

⇒        सक्र सिंह एवं अलाउद्दीन में समझौता हो गया तथा सक्र सिंह ने अलाउद्दीन की ओर से रणथम्भौर अभियान में हिस्सा लिया था।

⇒        तुगलक काल में बिहार पर दिल्ली के शासकों का निर्णायक वर्चस्व स्थापित हुआ था।

⇒        तुगलक काल में बिहार की राजधानी बिहार शरीफ थी। इस काल में बिहार का सबसे प्रसिद्ध प्रशासक मलिक इब्राहिम था, जो सामान्यतः मलिक बया कहलाता था। बिहार शरीफ में पहाड़ी पर स्थित मलिक बया का मकबरा तुगलककालीन स्थापत्य का एक सुंदर नमूना है, जिसका आकर्षण इसका गुम्बद है।

⇒        तुगलक सुल्तान नासिरूद्दीन महमूद ने 1394 ई. में बिहार का शासन ख्वाजा जहां को सौंप दिया था। इसे सुल्तान उस शर्क की उपाधि प्राप्त थी।

⇒        1398-99 में तैमूर के आक्रमण के फलस्वरूप तुगलक साम्राज्य का विघटन हुआ तथा बिहार का आंशिक क्षेत्र (बक्सर और दरभंगा तक) जौनपुर राज्य का अंग बन गया।

⇒        बिहार शरीफ अभिलेख के अनुसार सिकंदर लोदी ने 1495-96 में हुसैन शाह शर्की को पराजित कर दरिया खां नूहानी को बिहार में नियुक्त किया।

⇒        सिकंदर लोदी ने 16वीं शताब्दी के प्रारम्भ में बंगाल के शासकों के साथ संधि करके मुंगेर के क्षेत्र को बिहार और बंगाल के बीच सीमा रेखा निर्धारित कर दिया।

⇒        पानीपत की प्रथम लड़ाई (1526 ई.) के बाद अफगान सुल्तान मोहम्मद शाह नूहानी ने बिहार में स्वतंत्र सत्ता की स्थापना की।

⇒        मुगल शासक हुमायूं ने 1532 में दौरा के युद्ध में नूहानी शासकों को पराजित कर बिहार के कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

⇒        नूहानी शक्ति के पतन से अफगानों के बीच एक नए नेता फरीद खां या शेरशाह सूरी का उदय हुआ।

⇒        शेरशाह, सहसराम के जागीरदार हसन खां सूर का पुत्र था। बिहार के सुल्तान बहार खां की शेर से रक्षा करने के कारण  उसे ‘शेर खां’ की उपाधि प्रदान की गई थी।

⇒        सुरजगढ़ा की लड़ाई (1536 ई.) में शेरशाह ने बंगाल की सेना को पराजित किया और पूर्वी भारत में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली। 1537 ई. में उसने बंगाल पर भी अधिकार कर लिया।

⇒        1539 ई. में चैसा तथा 1540 ई. में बिलग्राम अथवा कन्नौज की लड़ाई में हुमायूं को पराजित कर शेरशाह ने स्वयं को दिल्ली का सुल्तान घोषित कर लिया।

⇒        अब्दुल्लाह द्वारा रचित ‘तारीखे दाअनुसार शेरशाह ने अपने शासनकाल में पटना में एक दुर्ग का निर्माण कराया था तथा इस नगर को पुनः बिहार की राजधानी बनाया। तब से पटना नगर लगातार विकास करता रहा है।

⇒        सहसराम स्थित स्थापत्य कला के सुंदरतम नमूने ‘शेरशाह काऊदी’ के  मकबरा’ का निर्माण स्वयं शेरशाह सूरी ने अपने जीवनकाल में कराया था।

मुग़ल काल में मध्यकालीन बिहार

⇒        1574 ई. में अफगान सरदार दाऊद खां करारानी को पराजित करके मुगल सम्राट अकबर ने पटना का नगर जीता।

⇒        1580 के लगभग मुगल सम्राट अकबर ने बिहार को मुगल साम्राज्य का सूबा/प्रांत बना दिया तथा मुनीम खां को बिहार का गवर्नर नियुक्त किया। यह स्थिति औरंगजेब के शासन तक बनी रही।

⇒        अकबर के काल में राजा मान सिंह ने बिहार में मुगल सत्ता को सुदृढ़ बनाया। मान सिंह ने रोहतास को अपनी राजधानी बनाई। मानसिंह ने 1587 से 1594 के बीच बिहार में मुग़ल साम्राज्य को मजबूती प्रदान की। 

⇒        मध्यकालीन बिहार अकबर के 12 सूबों (प्रांतो) में से एक था।

⇒        मुगल सम्राट अकबर ने महेश ठाकुर को पुरस्कार स्वरूप मिथिला राज्य दे दिया।

⇒        महेश ठाकुर का वंश दरभंगा राजवंश के नाम से जाना जाता है।

⇒        अकबर के अंतिम समय में बिहार का क्षेत्र जहाँगीर के विद्रोह से प्रभावित रहा जिसके कारण असद खान को बिहार के गवर्नर के पद से हटाकर आसफ खान को इस पद पर नियुक्त किया गया।

⇒        जहाँगीर के काल में लालबेग उर्फ बाज बहादुर को बिहार का सूबेदार (प्रांत पति) नियुक्त किया।

⇒        बाज बहादुर ने खडगपुर के राजा संग्राम सिंह के विद्रोह को सफलतापूर्वक दबाया तथा दरभंगा में एक मस्जिद एवं नूरजहां के बंगाल से दिल्ली जाने के क्रम में रूकने के लिए नूरसराय नामक सराय का निर्माण कराया।

⇒        अफजल खान 1608 में बिहार का सूबेदार बना जिसने क़ुतुब नामक फ़क़ीर के विद्रोह को दबाया।

⇒        1615 में नूरजहाँ के भाई इब्राहिम खान काकर को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया गया।

⇒        1616 में इब्राहिम खान बिहार का सूबेदार बना जिसने मनेर में मखदूम शाह दौलत का मकबरा बनवाया जो बिहार में मुग़ल स्थापत्य का सर्वोत्कृष्ट उदहारण है।

⇒        1621 ई. में जहांगीर ने राजकुमार परवेज को बिहार का सुबेदार या प्रांतपति नियुक्त किया। इसके बाद यह पद केवल राजकुमारों को ही प्रदान किया जाने लगा।

⇒        परवेज बिहार का सूबेदार/प्रांतपति बनने वाला पहला मुगल राजकुमार था।

⇒        शहजादा खुर्रम / शाहजहाँ ने जहाँगीर के खिलाफ विद्रोह कर के पटना और आसपास का क्षेत्र  परवेज से छीन लिया तथा खानेदुर्रान (बैरम बेग) को बिहार का सूबेदार नियुक्त कर दिया। 

⇒        आगे परवेज की सेना ने बहादुरपुर के समीप खुर्रम की सेना को पराजित किया। पराजित खुर्रम रोहतास में अपनी पत्नी मुमताज़ महल के पास गया और उसके बाद बुरहानपुर चला गया। इसके बाद सम्पूर्ण बिहार पर परवेज का अधिकार हो गया।

⇒        जहाँगीर के शासनकाल में बिहार का अंतिम सूबेदार मिर्जा रुस्तम सफावी था।

⇒        शाहजहाँ ने 1632 में अब्दुल्ला खां को बिहार का प्रांतपति/सुबेदार नियुक्त किया उसने उज्जैनी शासक को मुग़ल साम्राज्य में मिलाया।

⇒        अब्दुल्ला खां के बाद मुमताज़ महल का भाई शाइस्ता खान बिहार का सूबेदार बना।

⇒        दिल्ली में मुगल बादशाह बनने के बाद औरंगजेब ने दाउद  खां कुरैशी  को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया

⇒        औरंगजेब के समय ब्रिटिश यात्री बर्नीयर बिहार आया था

⇒        बिहार के भयंकर अकाल का जिक्र ब्रिटिश यात्री जान मार्शल तथा डच यात्री डी ग्रैफी ने किया है

⇒        1702 ई. में औरंगजेब ने अपने प्रिय पौत्र राजकुमार अजीम को बिहार का सुबेदार नियुक्त किया। राजकुमार अजीम ने पटना को अजीमाबाद नया नाम दिया और उसका पुनर्निर्माण भी कराया।

⇒        फर्रूखसीयर, पहला मुगल बादशाह था जिसका 1713 ई. में राज्याभिषेक बिहार की राजधानी पटना में हुआ।

⇒        बंगाल के नवाब अलीवर्दी खां के समय सिराजुदौला बिहार का उपनवाब था

मध्यकालीन बिहार का सांस्कृतिक इतिहास

⇒        पटना के समीप मनेर में मखदुम शाह दौलत का 1616 ई. में निर्मित मकबरा, बिहार में मुगल स्थापत्य का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।

⇒        1597 ई. में निर्मित रोहतासगढ़ के महल का निर्माण फतेहपुर सीकरी के भवनों के अनुरूप किया गया था।

⇒        1734-40 ई. तक अलीवर्दी खां अजीमाबाद अर्थात पटना का नवाब रहा।

⇒        मध्यकालीन बिहार में सांस्कृतिक प्रगति का क्रम बना रहा और एक समन्वित परम्परा विकसित हुई जिसमें सूफी संतों की देन महत्त्वपूर्ण रही। बिहार में आरंभिक सूफियों में बारहवीं शताब्दी में मनेर में बसने वाले संत इमाम ताज फकीह प्रमुख थे।

⇒        तेरहवीं शताब्दी में चिश्ती, कादिरी, सुहराबर्दी, मदारी और फिरदौसी सूफी सिलसिले बिहार में सक्रिय थे। इनमें सबसे अधिक लोकप्रियता फिरदौसी सिलसिले को प्राप्त हुई।

⇒        फिरदौसी सिलसिले के सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि चैदहवीं शताब्दी के संत मखदुम शर्फुद्दीन याह्मा मनेरी थे। इनकी दरगाह बिहार शरीफ में स्थित है।

⇒        बिहार में समन्वयवादी संस्कृत के विकास में संत दरिया साहेब तथा उनके अनुयायियों, जो दरियापंथी कहलाए, की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

⇒        परवर्ती मुगल शैली पर आधारित पटना सिटी में स्थित हैबत जंग का मकबरा अपनी सुंदर जालियों के लिए प्रसिद्ध है। इसका निर्माण 1748 ई. में हुआ था।

⇒        सिक्खों के गुरू तेगबहादुर ने बिहार में सहसराम पटन  तथा बोधगया की यात्रा की थी।

⇒        सिक्खों के दसवें गुरू गोविंद सिंह का जन्म पटना में 26 दिसम्बर, 1666 को हुआ था। वर्तमान में इस स्थान पर 109 फीट ऊंचा सात मंजिला भवन निर्मित है, जो सिक्खों के लिए पवित्रतम स्थानों में से एक है। इस गुरूद्वारे को तख्त श्री हरमंदिर जी कहते हैं।

⇒        पटना शहर के पूर्वी छोर पर कटरा मुहल्ले के निकट गुरूद्वारा ‘गुरू का बाग’ है, जहां गुरू तेगबहादुर असम यात्रा से लौटते समय रूके थे।

भोजपुर के उज्जैन वंशीय शासक

⇒        1305 में मालवा पर अधिकार अलाउद्दीन खिलजी के अधिकार हो जाने के बाद भोजराज ने अपने पुत्र देवराज एवं अन्य  सहयोगियों के साथ चेरों राज मुकुंद के यहाँ शरण ली।

⇒        उज्जैन से सम्बन्धित होने के कारन ये उज्जैनी राजपूत कहलाए। चेरों राज्य ने गंगा घाटी का क्षेत्र इन्हें जागीर में दिया।

⇒        मुकुंद के बाद सह्सबल शासक बना जिसने भोजराज की हत्या  कर दी, इसके प्रत्युत्तर में देवराज ने सह्स्बल को मारकर चेरो राज पर अधिकार कर लिया एवं भोजपुर नमक नगर की स्थापना की।

⇒        चेरों और उज्जैनी शासकों के बीच संघर्ष चलता रहा जिसमें दिल्ली के सहयोग से उज्जयिनी सफ़ल  रहे तथा इनका शासन अंग्रेजों के समय तक चलता रहा।

नुहानी वंश

⇒        सिकंदर लोदी ने मुंगेर के क्षेत्र तो बिहार और बंगाल के बीच सीमा निर्धारित कर दिया। सिकंदर लोदी ने 1495-96 में हुसैन शाह शर्की को पराजित कर दरिया खां नूहानी को प्रशासक बना।

⇒        बहार खां ने सुल्तान मोहम्मद शाह नूहानी नाम से बिहार में स्वतंत्र सत्ता की स्थापना की।

⇒        सुल्तान मोहम्मद ने कनकपुरा के युद्ध में इब्राहीम लोदी की सेना को पराजित किया था।

⇒        आगे जलाल खां शासक नियुक्त हुआ जिसका संरक्षक फरीद खां उर्फ़ शेर खां नियुक्त हुआ।

⇒        मुग़ल शासक हुमायूँ ने १५३२ में दौरा के युद्ध में अफगानों को पराजित कर बिहार के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

⇒        आगे बिहार का शासक शेर खां बना जिसने हजरत-ए-आला की उपाधि धारण की।

बिहार में अफगान

शेरशाह (1472-1545)

⇒        शेरशाह का जन्म 1472 में हुआ।

⇒        शेरशाह के पिता हसन खां जौनपुर राज्य के अंतर्गत सासाराम के जागीरदार थे।

⇒        बिहार के अफगान शासक बहार खां लोहानी ने शेरशाह को शेर खां की उपाधि प्रदान की।

⇒        इब्राहीम लोदी ने शेरशाह को ख्वासपुर टांड और सासाराम की जागीर सौंप दी।

⇒        सुल्तान मुहम्मद शाह ने शेरशाह को अपने पुत्र जलाल खां का शिक्षक व संरक्षक नियुक्त किया था।

⇒        शेरशाह ने 1534 में  सुरजगढ़ की लड़ाई में बंगाल की सेना को पराजित किया।

⇒        1539 में शेरशाह ने बक्सर के समीप चौसा की लड़ाई में हुमायु को पराजित किया।

⇒        चौसा की लड़ाई में विजयी होने के पश्चात शेर खां ने शेरशाह की उपाधि धारण की।

⇒        शेरशाह ने बिलग्राम के युद्ध में हुमायूं को (17 मई, 1540) में पराजित किया।

⇒        10 जून, 1540 को आगरा में  शेरशाह का राज्याभिषेक हुआ।

⇒        1540 में ही शेरशाह ने लाहौर पर अधिकार कर लिया।

⇒        शेरशाह ने देश में डाक-प्रथा की शुरूआत की।

⇒        शेरशाह ने पटना का दूर्ग बनवाया और पुनः इसे बिहार की राजधानी बनाया। इसका उल्लेख तारीखे दाउदी में  मिलता है जिसकी रचना अब्दुल्लाह ने की है।

⇒        शेरशाह ने 1543 में मालवा एवं रणथंभौर पर अधिकार कर लिया।

⇒        शेरशाह ने 1543 में रायसीन और चंदेरी पर अधिकार कर लिया।

⇒        शेरशाह की मृत्यु 22 मई 1545 को हुई।

⇒        सिंहासन पर बैठते समय शेरशाह की उम्र थी 68 वर्ष।

⇒        शेरशाह ने कबुलियत एवं पट्टा प्रथा की शुरूआत की जो किसानों के साथ किया जाता था।

⇒        शेरशाह के समय लगान की दर थी पैदावार का 1/3 भाग।

⇒        शेरशाह ने 178 ग्रेन चांदी का रूपया तथा 380 ग्रेन तांबे के दाम का प्रचलन शुरू किया।

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Thu, 20 Mar 2025 11:06:50 +0530 Jaankari Rakho