Jaankari Rakho & : History https://m.jaankarirakho.com/rss/category/history Jaankari Rakho & : History hin Copyright 2022 & 24. Jaankari Rakho& All Rights Reserved. परवर्ती उत्तर वैदिक काल के समाज, अर्थव्यवस्था, धर्म तथा राजनैतिक व्यवस्था का मूल्यांकन कीजिए. उत्तर वैदिक काल किस प्रकार से प्रारम्भिक वैदिक काल से भिन्न था ? https://m.jaankarirakho.com/448 https://m.jaankarirakho.com/448 प्रश्न - परवर्ती उत्तर वैदिक काल के समाज, अर्थव्यवस्था, धर्म तथा राजनैतिक व्यवस्था का मूल्यांकन कीजिए. उत्तर वैदिक काल किस प्रकार से प्रारम्भिक वैदिक काल से भिन्न था ?
उत्तर - 1000 ई. पू. से 600 ई. पू. के मध्य में वैदिक कबीले 'सप्त सैन्धव' क्षेत्र में गंगा की ऊपरी घाटी तथा उसके आसपास के क्षेत्र में फैल गए थे. क्षेत्रीय परिवर्तन के इस काल में आर्यों की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक व्यवस्था में कई परिवर्तन आये.
समाज
समाज की रचना असमानता पर आधारित थी. हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चार वर्णों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड के रचयिता प्रजापिता ब्रह्मा के शरीर से हुई.
इन स्रोतों में प्रतीकात्मक रूप से यह दिखाया गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र समाज के अंग हैं. हालांकि यह अंग समान स्तर के नहीं हैं. ब्राह्मण की तुलना सिर या मुख से की गई है, जबकि शूद्र की तुलना पाँव से. ब्राह्मण सर्वोच्च समझे गये, क्योंकि ऐसा माना गया कि समाज देवताओं से सम्पर्क केवल उनके द्वारा ही स्थापित कर सकता था, जबकि शूद्र निम्न कार्य करता था और इस श्रेणी में वह दास भी रखे गये जो युद्ध में पकड़े जाते थे.
वर्ण की अवधारणा
वर्ण की अवधारणा की निम्नलिखित विशेषताएं हैं – 
(1) जन्म के आधार पर सामाजिक स्तर.
(2) वर्गों का श्रेणीबद्ध तरीके से गठन (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) जिसमें ब्राह्मण समाज में सबसे उच्च और शूद्र सबसे निम्न स्थान पर थे.
(3) सगोत्र विवाह एवं अनुष्ठानों की पवित्रता के नियम.
वर्ण व्यवस्था को आगे धर्म से या सार्वभौमिक नियम की अवधारणा से प्रतिबद्ध किया गया है और वर्ण धर्म की स्थापना सामाजिक नियम रूप में इसलिए की गई, जिससे कि समाज को व्यवस्थित ढंग से चलाया जा सके, लेकिन उत्तर वैदिक समाज में वर्ण धर्म का पूर्णतः विकास नहीं हो पाया था.
वैदिक काल के बाद के काल में भी वर्ण धर्म प्रत्येक समूह के आनुष्ठानिक महत्व मात्र की ओर संकेत करता था. वर्ण व्यवस्था में गैर क्षत्रिय लोग भी क्षत्रिय हो सकते थे.
इस प्रकार वर्ण व्यवस्था के सिद्धांत को व्यावहारिक स्तर पर वैदिक काल के बाद भी कठोरता के साथ कभी भी लागू नहीं किया जा सका.
ऐसा समझा जाता था कि उत्तर वैदिक काल में भौगोलिक केन्द्र परिवर्तन के साथ वैदिक लोगों का सामना बहुत से गैर वैदिक कबीलों के साथ हुआ. इनके साथ लम्बे आदान-प्रदान के बाद एक मिला-जुला समाज अस्तित्व में आया. कम-से-कम अथर्ववेद में कई गैर वैदिक धार्मिक परम्पराओं का चित्रण है, जिसे पुरोहितों द्वारा स्वीकार किया गया था. यहाँ पर विवाह के कठोर नियमों को लागू करने का उद्देश्य सगोत्र विवाह के द्वारा कबीले की पवित्रता को बनाये रखना था. क्षत्रियों तथा ब्राह्मणों का महत्व समाज में बढ़ जाने के कारण उनके लिए यह अनिवार्य हो गया कि अन्य लोगों की तुलना में वे स्पष्टतः अपनी सर्वोच्चता कायम रखें. उत्तर वैदिक काल में फिर भी वर्णों की अवधारणा अपनी प्रकृति में बनावटी थी. उदाहरणतः अस्पृश्यता की अवधारणा अनुपस्थित थी.
गोत्र
इस समय में गोत्र संस्था का भी उदय हुआ. कबीलाई सगोत्र विवाह (कबीले के अन्दर विवाह) के विरुद्ध लोग असगोत्रीय विवाह (कबीले के बाहर विवाह) करते थे. गोत्र ने एक समान पूर्वज के वंशक्रम को महत्व दिया और इसी कारण एक ही गोत्र के लड़के-लड़कियों का आपस में विवाह नहीं होता था.
परिवार
इस काल में पितृसत्तात्मक परिवार अच्छी प्रकार से स्थापित था और गृहपति को एक विशेष स्थान प्राप्त था. घरेलू अर्थव्यवस्था के विशिष्टता प्राप्त कर लेने से गृहपति की स्थिति महत्वपूर्ण हो गयी. भूमि पर स्वामित्व का अधिकार परम्परागत प्रयोग के आधार पर था तथा भूमि के सामुदायिक स्वामित्व को भी सुरक्षित रखा गया. गृहपंति धनी थे और अनुष्ठान में उनका मुख्य कार्य यजमान का था. उन्होंने धन उपहारों के द्वारा प्राप्त नहीं किया था, परन्तु इन्होंने इसको अपने विशेष प्रयासों से उत्पादित किया. यज्ञों का सम्पन्न कराना उनका कार्य था जिससे कि उनको विशेष दर्जा मिलता और उनके धन में से कुछ भाग ब्राह्मणों को भी जाता था. कुछ महिलाओं को दार्शनिक का दर्जा प्राप्त हुआ था तथा रानियाँ राजतिलक के अनुष्ठानों के अवसर पर पुरुषों के साथ उपस्थित रहती थीं फिर भी महिलाओं को पुरुषों का सहायक ही समझा जाता और नीति निर्धारण में उनका कोई योगदान नहीं होता था.
जीवन के तीन आधार
तीन आश्रम, अर्थात् जीवन को तीन भागों में विभाजित किया गया. यह निम्न प्रकार थे – 
ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी जीवन), गृहस्थाश्रम ( घरेलू जीवन), वानप्रस्थाश्रम (घरेलू जीवन का परित्याग करके वन में निवास करना), संभवतः चतुर्थ, संन्यास आश्रम ( अनिवार्य रूप से सांसारिक जीवन को छोड़ देना) था, जिसके विषय में उपनिषदों के समय तक कोई जानकारी नहीं मिलती. उत्तर वैदिक काल में संन्यासी या तपस्वी व्यक्तिगत स्तर पर होते थे, परन्तु इन्होंने वैदिक काल के बाद की सामाजिक व्यवस्था का सक्रिय या निष्क्रिय तरीके से विरोध किया था.
अर्थव्यवस्था
गंगा, यमुना, दोआब एवं मध्य गंगा घाटी में उर्वरक भूमि के विशाल मैदानों की उपलब्धता से उत्तर वैदिक काल में कृषि का विकास सम्भव हुआ तथा इस क्षेत्र में प्रथम शताब्दी ई. में, धीरे-धीरे स्थायित्व कायम हो सका. उत्तरपू. वैदिक साहित्य में ऐसे संकेत मिलते हैं कि पशुपालन का महत्व बना रहा. इसी के साथ-साथ कृषि पर आधारित स्थायी जीवन प्रणाली का भी प्रारम्भ हो चुका था. दोनों तरह के साहित्यिक व पुरातात्विक स्रोत यह बताते हैं कि लोग खाने में चावल का प्रयोग करने लगे थे. चित्रित मृद्भाण्ड तथा बांस संस्कृति के खुदाई किये गये स्थलों से चावल के काले पड़े हुए दाने मिले हैं. वैदिक साहित्य में चावल के लिए ब्रीही, तन्दूल तथा सलि जैसे शब्दों का प्रयोग हुआ है, यह लगता है कि इस समय फसल चक्र का प्रयोग होने लगा था तथा जौ व चावल की खेती की जाने लगी थी. इस काल में खेती की अच्छी पैदावार तथा आर्थिक सम्पन्नता के लिए राजसूय यज्ञ में दूध, घी व पशुओं के साथ-साथ अनाज भी चढ़ाया जाने लगा. अथर्ववेद में ऐसी 12 बलियों का वर्णन है, जिससे कि भौतिक लाभ की प्राप्ति होती थी तथा इसी के साथ ब्राह्मणों को गाय, बछड़े, साँड़, सोना, पके चावल, छप्पर वाले घर तथा अच्छी पैदावार देने वाले खेतों को उपहार के रूप में दिया जाने लगा था. उपहार में दी जाने वाली ये वस्तुएं इस तथ्य का स्पष्ट प्रमाण है कि कृषि तथा कृषि पर आधारित स्थायी जीवन का महत्व बढ़ रहा था. उत्तर वैदिक काल के साहित्य में वर्णन है कि 8, 12 व 20 बैल तक हल को जोतते थे. यहाँ पर बैलों की संख्या का वर्णन प्रतीक के रूप में हुआ है, परन्तु इस सन्दर्भ से यह स्पष्ट है कि खेती करने के लिए हल बैल का प्रयोग खूब होने लगा था.
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Mon, 09 Oct 2023 04:50:37 +0530 Jaankari Rakho
भारतीय इतिहास में क्षेत्रों के उद्भव की प्रक्रिया की विवेचना कीजिए तथा उनकी प्रमुख विशिष्टताओं का उल्लेख कीजिए. https://m.jaankarirakho.com/447 https://m.jaankarirakho.com/447 प्रश्न – भारतीय इतिहास में क्षेत्रों के उद्भव की प्रक्रिया की विवेचना कीजिए तथा उनकी प्रमुख विशिष्टताओं का उल्लेख कीजिए.
उत्तर - भारतीय उपमहाद्वीप कई क्षेत्रों से मिलकर बना है और प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशेषताएँ हैं. देश के ऐतिहासिक उद्भव की प्रक्रिया में क्षेत्रों ने विशेष सांस्कृतिक विशिष्टताएं ग्रहण की तथा कई आधारों पर, जैसे- समान ऐतिहासिक म्परा, भाषा, सामाजिक संगठन, कलाएं आदि. हम एक क्षेत्र से दूसरे की भिन्नताओं को इंगित कर सकते हैं. इस प्रकार भारतीय इतिहास में समान सामाजिक तथा सांस्कृतिक रीतियों एवं संस्थाओं तथा साथ ही क्षेत्रीय विशिष्टताओं की संरचना के स्थायित्व की दोहरी प्रक्रिया देखने को मिलती है.
यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इतिहास में क्षेत्रों के उदय की प्रक्रिया का स्वरूप असमान रहा है, अतः वर्तमान की भाँति भूत में भी विभिन्न क्षेत्रों में ऐतिहासिक परिवर्तन की प्रक्रिया में काफी असमानताएं रही हैं. यद्यपि कोई भी क्षेत्र कभी भी पूरी तरह से कटा हुआ नहीं रहा है. स्थान एवं काल के आधार पर भारतीय समाज के उद्भव के विभिन्न चरणों में भिन्नता को समझने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप का गठन करने वाले क्षेत्रों के स्वरूप की जानकारी अत्यावश्यक है.
क्षेत्रों के उद्भव की प्रक्रिया तथा उनकी प्रमुख विशिष्टताएं
क्षेत्रीय परिवर्तन के कारण–क्षेत्रों तथा क्षेत्रीय संस्कृतियों के बीच विभिन्नताओं के चिह्न सम्भवतः खाद्य उत्पादन के रूप में जीवनयापन के नए साधन की शुरूआत के साथ ढूँढ़े जा सकते हैं. उपमहाद्वीप की मुख्य नदियों के क्षेत्रों में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की शुरूआत मात्र एक घटनाएँ नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया थी, जो कई सहस्राब्दियों में फैली हुई थी. कच्ची मैदान (जोकि अब पाकिस्तान में है) के अन्तर्गत मेहरगढ़ में कृषिगत गतिविधियाँ जल्दी अपेक्षाकृत लगभग 6000 ईसा पूर्व से पहले ही आरम्भ हो गयी थीं तथा सिन्धु घाटी में तीसरी-चौथी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में, गंगा की घाटी में कोलडीहवा ( उत्तर प्रदेश) में 5000 ईसा पूर्व में, चिराँद (बिहार) में तीसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्द्ध तथा अतरंजीखेड़ा (दोआब) में दूसरी सहस्राब्दि ईसा पूर्व के पूर्वार्द्ध में कृषि की शुरूआत हुई, तथापि गंगा घाटी में पूर्ण रूप से नियोजित कृषि, खेतिहर गाँव तथा अन्य सम्बद्ध लक्षण, जैसे-नगर का उदय, व्यापार तथा राज्य प्रणाली आदि प्रथम सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व के मध्य में ही दिखायी देते हैं. मध्य एवं प्रायद्वीपीय भारत में ऐसे कई स्थान थे, जहाँ बदलाव की प्रक्रिया प्रथम सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व की अंतिम शताब्दी में ही आरम्भ हो सकी. इसी प्रकार गंगा, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी के क्षेत्रों में कृषक समुदाय तेजी से फैलता रहा और सभ्यता के चरणों की विभिन्न प्रक्रियाओं को तेजी से तय करता रहा, जबकि असम, बंगाल, गुजरात, उड़ीसा तथा मध्य भारत के काफी क्षेत्र जोकि बाकी क्षेत्रों से अपेक्षाकृत अथवा पूर्णतया कटे हुए थे. काफी लम्बे समय तक इन विकासों से अछूते रहे तथा आदिम अर्थव्यवस्था के चरण से आगे नहीं बढ़ पाए थे. अन्ततः जब कुछ अपेक्षाकृत कटे हुए क्षेत्रों में बदलाव की प्रक्रिया का ऐतिहासिक दौर शुरू हुआ, तो अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा इन विकासों के बीच न केवल समय का लम्बा अन्तराल था, बल्कि क्षेत्रों के गठन के स्वरूप में भी स्पष्ट अन्तर था. पूर्व विकसित क्षेत्रों के मुख्य केन्द्रों का सांस्कृतिक प्रभाव इन कटे हुए क्षेत्रों के विकास की प्रक्रिया पर प्रारम्भ से ही पड़ा. अतः आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कुछ क्षेत्र अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक तेजी से विकसित हुए तथा अभी भी कुछ क्षेत्र हैं, जो अन्य की अपेक्षा पिछड़े हुए हैं.
ऐतिहासिक क्षेत्रों के उदय की असमान प्रक्रियाएं
अनेक क्षेत्रों में सांस्कृतिक विकास की असमान प्रक्रिया तथा ऐतिहासिक शक्तियों का असमान विन्यास भूगोल से अत्यधिक प्रभावित रहा. क्षेत्रों के असामान्य विकास को ऐतिहासिक स्थितियों द्वारा दर्शाया जा सकता है, उदाहरण के लिए, तीसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्द्ध में गुजरात में में मध्य पाषाणयुगीन संस्कृति मौजूद थी. ध्यान देने योग्य तथ्य जैसी विकसित सभ्यता विद्यमान थी. फलतः विकास के यह है कि अन्य क्षेत्रों के इन संस्कृतियों के युग में ही हड़प्पा विभिन्न चरणों में क्षेत्रों एवं संस्कृतियों के एक-दूसरे से प्रभावित होने के प्रमाण मिलते हैं. यह प्रक्रिया भारतीय इतिहास के हर दौर में दिखायी देती है. दूसरे शब्दों में, जहाँ तीसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में बसने लगे थे वहीं दूसरी ओर एक ओर सिन्धु एवं सरस्वती के क्षेत्रों में घुमक्कड़ लोग दक्कन, आंध्र, तमिलनाडु, उड़ीसा एवं गुजरात में बड़े पैमाने जोकि प्रथम सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व का उत्तरार्द्ध अनुमानित पर खेतिहर समुदाय बुनियादी रूप में लौह युग में गठित हुए, किया जा सकता है.
लोहे के प्रादुर्भाव के साथ ही स्थायी कृषिगत गतिविधि पर आधारित भौतिक संस्कृति का प्रसार आरम्भ हुआ. तीसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व में आरम्भ से गांगेय उत्तरी भारत तथा मध्य भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों की भौतिक संस्कृति में काफी कुछ समानता दिखायी देती है. यद्यपि अशोक के शिलालेखों के भौगोलिक वितरण जोकि उत्तर से दक्षिण तक मिलते हैं, के कारण पूरे उपमहाद्वीप में कुछ हद तक सांस्कृतिक समानता स्वीकार की जाती है. विंध्याचल के दक्षिण के क्षेत्रों में जटिल सामाजिक संरचना वाले आरम्भिक ऐतिहासिक युग के उदय की प्रक्रिया मौर्य युग में तथा उसके उपरान्त तेज हुई.
वास्तव में उत्तर मौर्य युग दक्षिण भारत तथा दक्कन के अधिकतर क्षेत्रों की संस्कृति के विकास का आरम्भिक चरण था. इन क्षेत्रों की ऐतिहासिक बस्तियों की खुदाई से प्राप्त पुरातात्विक आँकड़ों से इस तर्क को बल मिलता है. यहाँ यह बताना आवश्यक है कि बीच के काफी क्षेत्र अथवा मध्य भारत की जंगली पहाड़ियाँ कभी भी पूरी तरह नहीं बसीं और आदिमयुगीन अर्थव्यवस्था के विभिन्न चरणों में आदिवासियों को शेष मानव समाज से अलग रहने का अवसर देती रहीं. इस उपमहाद्वीप में सभ्यता तथा पारम्परिक सामाजिक संगठन के रूप में अधिक जटिल संस्कृति विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न कालों में पहुँची तथा अपेक्षाकृत अधिक विकसित भौतिक संस्कृति का क्षेत्रीय प्रसार काफी असमान रहा.
अपने अनश्वर गुण के कारण मृद्भाण्ड किसी संस्कृति की पहचान का विश्वसनीय चिह्न होते हैं तथा पुरातात्विक श्रेणीबद्धता का महत्वपूर्ण साधन होते हैं. विभिन्न संस्कृतियाँ अपने विशिष्ट मृद्भाण्ड के आधार पर पहचानी जाती हैं. गेरू चित्रित मृद्भाण्ड जोकि 1000 ईसा पूर्व से पहले के हैं, चित्रित भूरे मृद्भाण्ड जो 800-400 ईसा पूर्व के बीच के हैं, काले एवं लाल मृद्भाण्ड जोकि 500-100 ईसा पूर्व के हैं. मृद्भाण्ड की प्रथम तीन श्रेणियाँ मुख्यतः भारत-गांगेय विभाजन तथा दोआब सहित ऊपरी गंगा घाटी में मिलते हैं. काली पॉलिश वाले मृद्भाण्ड उत्तरी मैदान से आरम्भ होकर मौर्यकाल के दौरान मध्य भारत तथा दक्कन तक फैल गए.
विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्डों के वितरण से हमें संस्कृतियों की सीमाओं तथा उनके विस्तार के चरण के विषय में जानकारी प्राप्त होती है - भारत-गांगेय विभाजन तथा ऊपरी गंगा क्षेत्र में एक नई संस्कृति का उदय सर्वप्रथम दूसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व के उत्तरार्द्ध में हुआ, जोकि धीरे-धीरे पूर्व की ओर फैली, जो मौर्यकाल में सम्भवतः मुख्य गांगेय क्षेत्र से भी आगे बढ़ गई.
प्राचीन भारतीय साहित्य से हमें सांस्कृतिक स्वरूप के भौगोलिक प्रसार के प्रमाण भी मिलते हैं. ऋग्वैदिक काल का भौगोलिक केन्द्र बिन्दु सप्तसिन्धु (सिन्धु तथा इसकी सहायक नदियों की भूमि) तथा भारत-गांगेय विभाजन था. उत्तरवैदिक काल में दोआब ने यह स्थान ले लिया तथा बुद्ध के युग में मध्य गांगेय घाटी (कौशल एवं मगध) को यह गौरव प्राप्त रहा. यहाँ यह कह देना उपयुक्त होगा कि भौतिक संस्कृति के विकास के साथ ही भौगोलिक विस्तार के चरणों का विकास होता रहा. राज्य सीमा के अर्थों में राष्ट्र शब्द का प्रयोग उत्तर - वैदिक काल में आरम्भ हुआ और इसी काल में कुरू और पांचाल जैसे क्षेत्रों में छोटे-छोटे राजवंशों एवं राज्यों का उदय हुआ. बुद्ध के युग में (छठवीं शती ईसा पूर्व ) सोलह महाजनपदों (बड़े क्षेत्रीय राज्य) का उदय हुआ. यहाँ रुचिकर तथ्य यह है कि उत्तर-पश्चिम में गांधार, मालवा में अवन्ति तथा दक्कन में अस्सक को छोड़कर अधिकतर महाजनपद ऊपरी एवं मध्य गांगेय घाटी में स्थित थे. कलिंग ( प्राचीन तटवर्ती उड़ीसा) आन्ध्र, बंग (प्राचीन बंगाल), राजस्थान एवं गुजरात जैसे क्षेत्रों को इस युग पर प्रकाश डालने वाले साहित्य में स्थान नहीं मिला, जिसका अर्थ यह है कि इन राज्यों का तब तक ऐतिहासिक रंग मंच पर प्रादुर्भाव नहीं हुआ था.
विन्ध्याचल के दक्षिणी राज्यों, जैसे- कलिंग का उल्लेख सर्वप्रथम पाणिनि ने पाँचवीं शती ईसा पूर्व में किया, सुदूर दक्षिण में तमिल भू-भाग का ऐतिहासिक काल में प्रवेश तक नहीं हुआ था. अतः विभिन्न क्षेत्रों का उदय और गठन एक दीर्घकालीन प्रक्रिया थी, अतः आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि विभिन्न क्षेत्रों की तकनीकी एवं सामाजिक-आर्थिक विकास का यह अन्तर बाद में पनपने वाली सांस्कृतिक विभिन्नता के मूल में रहा.
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Mon, 09 Oct 2023 04:48:55 +0530 Jaankari Rakho
मानव की उत्पत्ति एवं मानव सभ्यता के विकास के चरणों की विवेचना कीजिए. https://m.jaankarirakho.com/446 https://m.jaankarirakho.com/446 प्रश्न - मानव की उत्पत्ति एवं मानव सभ्यता के विकास के चरणों की विवेचना कीजिए.
उत्तर - सबसे पहले मानव की उत्पत्ति पृथ्वी पर कब हुई, इसके लिए कोई पुख्ता प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जिससे सुनिश्चित किया जा सके कि मानव कब, कहाँ और कैसे पैदा हुआ? आज भी यह एक अबूझ पहेली बना हुआ है. अतएव मानव की उत्पत्ति के सिद्धान्तों को प्रतिपादित करने वाले विद्वानों का भी विषयगत वर्गीकरण हो गया है- (i) धार्मिक विद्वान्, (ii) मानव विज्ञानी, (iii) भू-विज्ञानी, (iv) जीव विज्ञानी. इसमें धार्मिक विद्वान् एवं प्रचलित जनश्रुतियों का मत है कि सम्पूर्ण दुनिया का निर्माता ब्रह्मा है और सबसे पहले सृष्टि में मनु का जन्म हुआ. विश्व के सभी लोग मनु की संतान हैं और मनु के नाम से ही 'मानव' शब्द का आविर्भाव हुआ है. यह दैवीय उत्पत्ति का सिद्धान्त भारतवर्ष द्वारा प्रतिपादित किया गया. इसके अतिरिक्त अनेक मत प्रचलन में रहे. ओल्ड टेस्टामेंट (Old testament) के अनुसार मानव की उत्पत्ति 'नोआ' से हुई. अरबों वर्ष पूर्व इस पृथ्वी पर भीषण जलप्लावन हुआ, उससे पृथ्वी को नष्ट होने से बचाकर 'नोआ' ने मानव की रचना की, जिससे सृष्टि की संरचना का क्रम विकसित हुआ. उपर्युक्त तथ्य धर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं.
धीरे-धीरे वैज्ञानिक विचारधारा प्रबल हुई और पौराणिक काल के उपर्युक्त दैवीय सिद्धान्तों को मात्र कपोल कल्पना माना जाने लगा. 18वीं शताब्दी के पदार्पण होते ही सृष्टि एवं मानव के आविर्भाव के सम्बन्ध में डार्विन के जीव विकास के सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ, जिसके अनुसार जीवों के क्रमिक विकास की प्रक्रिया के द्वारा मानव का जन्म हुआ. इसमें वे निर्धारण करते हैं—मछली कसरीसृपमानव अर्थात् जैविक उत्पत्ति में पहले जलचर, उभयचर, रेप्टाइल्स एवं अन्त में स्थलचर, स्तनधारी जन्तुओं एवं मानव का जन्म हुआ. मानव उत्पत्ति के इस सिद्धान्त के बाद भू-वैज्ञानिकों ने इस दिशा में अपने तर्क प्रस्तुत किए. उनके अनुसार इस पृथ्वी का उद्भव काल 48 अरब वर्ष पूर्व का है. मानव की उत्पत्ति लगभग 35 अरब वर्ष पूर्व हुई. मानव एवं पृथ्वी के उद्भव काल को निश्चित करने के लिए इन्होंने भू-वैज्ञानिक समय-सारणी का निर्माण किया. इस समय सारणी को महाकल्पों में विभाजित किया गया है. प्रत्येक महाकल्प (Eras) को कल्प में और कल्प को युग में विभाजित किया गया है. भू-वैज्ञानिकों ने महाकल्पों को पाँच भागों में वर्गीकृत किया है - (i) प्राचीन महाकल्प, (ii) प्रारम्भिक महाकल्प, (iii) पुरातन जीव महाकल्प, (iv) मध्य महाकल्प, (v) नूतन जीव महाकल्प. इनमें से नूतन जीव महाकल्प को तृतीय एवं चतुर्थ कल्पों में विभक्त किया है. तृतीय कल्प को भू-वैज्ञानिकों के अनुसार चार भागों में विभाजित किया है- पुरानूतन युग, आदिनूतन युग, अल्प नूतन युग और मध्यनूतन युग. नूतन जीव महाकल्प के द्वितीय वर्गीकरण के चतुर्थ को भू-वैज्ञानिकों ने निम्नलिखित तीन युगों में वर्गीकृत किया है- न्यूननूतन युग, अत्यन्त नूतन युग एवं अति नूतन युग.
भू-वैज्ञानिकों के अनुसार मानव जीवन का उद्भव एवं विकास क्रमशः इन्हीं महाकल्पों, कल्पों और युगों में हुआ है. ये क्रमिक विकास की परिकल्पना को डार्विन के जैव विकासक्रम के अनुरूप मानते हैं. उनके अनुसार सरीसृपों के बाद स्तनपायी प्राणियों का आविर्भाव हुआ और इन स्तनपायी सेनोजोइक प्राणियों में 'नर-वानर' या 'प्राइमेट' भी एक था. ( नवजीवनयुग) मानव विकास का सबसे महत्वपूर्ण काल रहा है. इस काल में मानव सम प्राणी (Homo-Sapiens) का जन्म हुआ. धीरे-धीरे प्रगति हुई और ज्ञानी मानव आज के मानव के पूर्वज के रूप में पैदा हुआ. इस प्रकार मानव सम प्राणी का उद्भव काल 1 करोड़ 20 लाख से 90 लाख वर्ष पुराना है.
स्तरक्रम विज्ञान पद्धति के आधार पर आधुनिक काल में प्राप्त अवशेष जिसमें - बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान), सराय नाहरराय (इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश), बागाइखोर, लेखानियाँ (मिर्जापुर ) - मानव सम प्राणी या होमोलिड के कालक्रम के उपर्युक्त निर्धारण की पुष्टि करते हैं. मानव के विकास-क्रम में आदिमानव से आधुनिक मानव तक बनने में मानव की निम्न प्रजातियों का जन्म हुआ- प्राइमेट, रामापिथेकस, आस्ट्रेलोपिथेकस, अफ्रीकेनस, होमोइरेक्टस, निग्रण्डरथल एवं होमोसेपियन्स इन प्रजातियों के सबसे अन्त में पैदा होने वाली मानव प्रजाति ज्ञानी मानव या होमोसेपियन्स थी, जो पृथ्वी पर लगभग आज से पचास हजार वर्ष पूर्व पैदा हुई. ज्ञानी मानव या होमोसेपियन्स प्रजाति आधुनिक मानव की प्रजाति का ही स्वरूप था.
> मानव सभ्यता के विकास के चरण
आदि मानव का विकास आधुनिक मानव के रूप में हुआ. इसमें कई महाकल्प लग गये. प्रागैतिहासिक मानव पशु से मिलता-जुलता, पूर्णतया प्रकृति पर आश्रित था. शारीरिक संरचना में न्यूनतम अन्तर था. उस मानव के पूँछ भी विद्यमान थी. धीरे-धीरे मानव सभ्यता का विकास हुआ और उसमें महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. मानव ने पशुवत् आचरण समाप्त किए. प्रकृति पर आश्रित न होकर स्वयं के परिश्रम के बल पर हथियारों एवं उपकरणों का निर्माण किया. इसके बाद भी निरन्तर मानव सभ्यता प्रखरता से परिवर्तित होती रही और शनैः-शनैः उपकरण और हथियार बदलते गये.
उपकरण–प्रारूप के आधार पर प्रागैतिहासकारों ने मानव सभ्यता के इतिहास को चार भागों में विभाजित किया है - (1) पाषाण काल (2) ताम्र काल (3) कांस्य काल (4) लौह काल. मानव सभ्यता के विकास का यह विभाजन हथियारों के निर्माण के लिए प्रयुक्त होने वाली धातु पर आधारित था, अतः इस विभाजन को समुचित नहीं माना गया. इसके बाद प्रागैतिहास अध्ययन की दूसरी पद्धति स्तरक्रम विज्ञान के आधार पर मानव के क्रमिक विकास को आधार बनाकर मानव सभ्यता को दो भागों में वर्गीकृत किया गया–(1) पाषाण काल एवं (2) धातु काल. मानव सभ्यता का प्रारम्भ पाषाण काल से हुआ. पाषाण काल एवं धातु काल के लम्बे को अध्ययन की दृष्टि से सुगम बनाने के लिए इन्हें क्रमशः तीन-तीन भागों में वर्गीकृत किया गया- (1) पुरा पाषाण काल, (2) मध्य पाषाणकाल और (3) नव पाषाण काल तथा (1) ताम्र युग, (2) कांस्य युग (3) लौह युग. इन्हीं कालों में मानव सभ्यता के विकास के विभिन्न चरणों का आविर्भाव हुआ और वानर की किस्म का पशुवत् आचरण करने वाला मानव पूरी तरह विकसित एवं आधुनिक सभ्य मानव बन गया. मानव सभ्यता के विकास के इन विभिन्न कालों का वर्णन इस प्रकार है
> पाषाण काल
पुरा पाषाण काल—मानव सभ्यता का प्रारम्भिक काल पुरा पाषाण काल है. मानव ने अपना सर्वाधिक लम्बा जीवन इसी काल में व्यतीत किया. विभिन्न प्रकार के उपकरणों, हथियारों को आविष्कृत कर जटिल जीवन पद्धति को आसान बनाया उपकरण–प्रारूप के सिद्धान्त पर पुरा पाषाण काल को तीन भागों में विभाजित किया - (i) पूर्व पुरा पाषाण काल (ii) मध्य पुरा पाषाण काल और (iii) उत्तर पाषाण काल पुरा पाषाण काल के इन तीन चरणों में मानव की कई प्रजातियाँ पैदा हुईं. सभ्यता में परिवर्तन आया और मानव उपकरण - हथियारों का प्रयोग करने लगा. 
(i) पूर्व पुरा पाषाण काल यह मानव सभ्यता का सर्वाधिक प्रारम्भिक काल था, जिसमें मानव को अपने होने का भी अहसास नहीं था. इस काल में मानव के रहने की भी कोई जगह निश्चित नहीं थी. वह वर्षा, धूप, सर्दी से बचने के लिए सघन वृक्षों का सहारा लेता था अथवा अपना सारा समय अनिश्चित भ्रमण में व्यतीत करता था. इस काल का मानव पूरी तरह पशुओं से मेल खाता था. वह भोजन का उत्पादन नहीं, अपितु संग्रह करता था. लकड़ी के टुकड़े और पत्थरों से हथियार बनाने की प्रवृत्ति उसमें आ गई थी. इस काल में वस्त्र की कल्पना नहीं थी. इस काल का मानव आगे चलकर अपने गुप्तांगों को छाल-पत्तियों से ढकने लगा था, की रक्षा करना था. शिकार करने की परम्परा इसी काल के इसका कारण लज्जा भाव नहीं, अपितु अपने नाजुक अंगों मानव द्वारा प्रारम्भ की गई, फलस्वरूप उपकरण व हथियारों का आविष्कार हुआ. इस काल के हथियारों में कोर, फलक, खण्डक, हाथ की कुल्हाड़ी आदि प्रमुख थे. ये हथियार पूरी तरह बेडौल, भद्दे एवं पाषाण खण्ड होते थे. पूर्व पुरा पाषाण नदी, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, काल के हथियार भारत में महाराष्ट्र की प्रबरा नदी, नर्मदा उड़ीसा, असम, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि की नदी-घाटियों पर पाए गए हैं. इस काल के अन्त में मानव गुफाओं में रहने लगा था. उत्तर प्रदेश के बेलन घाटी एवं मध्य प्रदेश के भीम बेटका की गुफाओं से प्राप्त तत्कालीन उपकरणों के आधार नदी-घाटियों में विकसित हुई. तत्कालीन संस्कृति के प्रमुख पर इसकी पुष्टि की जाती है. पूर्व पाषाण काल की संस्कृति केन्द्र दक्षिण भारत की मद्रासियन संस्कृति एवं उत्तर-पश्चिम की सोन संस्कृति (पाकिस्तान में) भी नदी-घाटियों में ही विकसित हुई थी. इससे पुष्टि होती है कि पूर्व पुरा पाषाण कालीन मानव नदी घाटियों पर स्थायी या अस्थायी रूप से जीवन निर्वाह करता था.
(ii) मध्य पुरा पाषाण काल - इस काल के मानव ने अग्नि को खोज निकाला था. पत्थरों के घर्षण से उत्पन्न होने वाली आग से वह शिकार को पकाकर खाता था. कुछ दिनों का मुख्य भोजन संग्रह कर उसे काम में लेना उसकी प्रवृत्ति बन चुकी थी. वह गुफा-कंदराओं में निवास करने लगा था. सभ्यता एवं संस्कृति के विकसित होने के साथ ही इस काल के मानव में मृतक संस्कार करने की प्रवृत्ति पैदा हो चुकी थी. उसका हथियार एवं उपकरण चिकने, सुडौल, सुन्दर, छोटे, पैने और भोजन शिकार होता था. इस काल के मानव ने अपने अधिक कारगर बना लिए थे. इस काल में फलक हथियार बनाये गये. इसलिए मध्य पुरा पाषाण काल को फलक संस्कृति भी कहा जाता है. मध्य पुरा पाषाण काल की संस्कृति के प्रमुख स्थल- कृष्णा घाटी (कर्नाटक), धसान तथा बेतवा घाटी (मध्य प्रदेश), बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश), आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा, नेवासा घाटी (महाराष्ट्र) हैं, जो अधिकांशतः प्रायद्वीपीय क्षेत्र हैं, साकार करने लगा था. इस काल में विशिष्ट उपकरणों, जैसे–हल, बैल, जुए, नाव, इत्यादि का आविर्भाव हो गया था. इस काल में मकान बनाने की परम्परा सुदृढ़ हो चुकी थी. मिट्टी और पत्थर के साथ ईंट (पकी हुई) का प्रयोग किया जाने लगा था. मकान, वृत्ताकार, आयताकार एवं बड़े बनाए जाते थे तथा घेराबन्दी करने की प्रथा भी प्रचलित थी. मकानों के अन्दर ही चूल्हा एवं तन्दूर की व्यवस्था भी विद्यमान थी. इससे सम्बन्धित साक्ष्य राजस्थान की बनास घाटी के दो स्थल - आहड़ और गिलुंद में प्राप्त हुए हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं. मिट्टी के बर्तन लाल एवं काले रंग के बनाये जाते थे, जिन्हें सफेद रंग से सजाया जाता था. चाक निर्मित मृद्भाण्ड प्रमुख था. नेवासा से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर बेर, मटर, पटसन, चावल, गेहूँ, जौ, मसूर की खेती होने के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं. बाजरा-मक्का की खेती भी होने लगी थी. पशुपालन इस काल के मानव का प्रमुख एवं आवश्यक अंग हो गया था. घोड़ा, भैंस, बैल, गाय, सुअर, कुत्ता, बकरी, भेड़ विशेष रूप से पाले जाने लगे थे. इस काल में ताँबा खानों से लाया जाता था, जिसे गरम कर गलाने के बाद आभूषण बनाये जाते थे, जिनमें चूड़ियाँ, अँगूठी, गले का हार प्रमुख थे. मानव स्वनिर्मित वस्त्रों का उपयोग करने लगा था. धार्मिक आस्थाएँ एवं पुनर्जन्म में विश्वास की धारणा अत्यन्त प्रबल हो चुकी थी. मातृदेवी के पूजा इस काल में भी की जाती थी. मृतकों का शवाधान फर्श के नीचे रखकर उसके साथ मृतक की इच्छित वस्तुओं को रखने की प्रथा विद्यमान थी. नेवासा - चंदोली में इसी सभ्यता एवं संस्कृति के प्रमाण मिले हैं. अन्य स्थलों में प्रमुख हैं-पूर्वी भारत, पश्चिमी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान राजस्थान की बनास घाटी में आहड़ और गिलुंद नामक स्थानों पर पकाई गई ईंटों एवं भव्य भवनों, कबीलों की परम्परा के साक्ष्य मिले हैं. मध्य प्रदेश के नवदाटोली, कायथ और एरन नामक स्थानों पर मनके, मुहरें, मृण्मूर्तियाँ, कृषि एवं पशुपालन के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं. इन्हीं स्थानों पर रंगबिरंगे मृद्भाण्ड, बस्तियाँ, चूड़ियाँ, ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, मनके एवं मटर, खैसारी उत्खनन से प्राप्त हुए हैं जो मध्य पुरापाषाण काल की प्रायद्वीपीय संस्कृति को उद्घाटित करते हैं.
(iii) उत्तर पाषाण काल - इस काल में पारिवारिक परम्परा का जन्म हुआ. लोग सामुदायिक रूप से कुल या अनेक व्यक्तियों के साथ रहते थे. मानव गुफाओं के अलावा झोंपड़ियों में रहने लगा था. पुरुष एवं महिलाओं का श्रम विभाजन हो चुका था. पुरुष शिकार करता था, भोजन का संग्रह करता था और महिलाएँ अपने घर की देखभाल करती थीं. वस्त्र का आविष्कार हो चुका था. मानव जानवरों के चमड़े को हड्डी द्वारा निर्मित सुई से सींकर अधोवस्त्र का निर्माण करता था. सम्भवतः इस काल की संस्कृति का उदय हिमयुग के अन्तिम चरण में हुआ था. आधुनिक मानव से मिलती-जुलती प्रजाति ज्ञानी मानव या होमोसेपियन्स का आविर्भाव इसी काल में हुआ. इस काल के हथियार एवं उपकरण तीक्ष्ण एवं संरचना की दृष्टि से सुन्दर होते थे. इनमें चाकू, ब्यूरिन, छिद्रक, शर, सुई, स्क्रेपर, हड्डी की छड़ एवं भाला प्रमुखतः ब्लेडों द्वारा निर्मित हथियार थे. इस काल से -विसादी (गुजरात), सम्बन्धित प्रमुख सांस्कृतिक स्थलमुच्छलता, सिंहभूम (झारखण्ड) पटने, इनाम गाँव (महाराष्ट्र), चिन्तामनु, गावी, रेनीगुंटा (आन्ध्र प्रदेश), सोनघाटी (मध्यप्रदेश), बीजापुर (कर्नाटक) शोरीपुर, दोआब (उत्तर प्रदेश) आदि में पाए गए हैं. इन तथ्यों से सिद्ध हुआ है कि इस काल में चित्रकारी और नक्काशी प्रचलित हो चुकी थी, जिन्हें भीमबेटका की गुफाओं में देखा जा सकता है. धार्मिक आस्थाएँ प्रकट होने लगी थीं. मूर्तिपूजा, मन्दिर एवं पुरोहित अस्तित्व में आ गए थे. उत्तर प्रदेश के बेलन घाटी में प्राप्त मातृदेवी की मूर्ति तत्कालीन सभ्यता में धार्मिक प्रभाव एवं कला के समन्वित स्वरूप को प्रदर्शित करती है. सभ्यता के विकास-क्रम की तीव्रगति के कारण ही इन्हें होमोसेपियन्स या ज्ञानी मानव कहा जाता है. इस काल में एक विशिष्ट वर्ग अपने अंधविश्वास एवं जादूगरी के प्रभाव से अपनी आजीविका चलाता था, इनका आधार धार्मिक होने के कारण कालान्तर में इन्हें ही 'पुरोहित' कहा गया है. इस काल की अवधि भू-वैज्ञानिक 4 लाख वर्ष पूर्व से 10,000 वर्ष तक मानते हैं.
मध्य पाषाण काल - मध्य पाषाण काल के मानव में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से परिवर्तन हो चुका था. इस काल का मानव स्थायी निवास बनाकर छोटी-छोटी टोलियों में रहने लगा था. पशुपालन एवं कृषि कार्य होने लगा था. इस काल का मानव अपने निजी स्वार्थों की तरफ केन्द्रित हो गया था, जिसके प्रमाण 'सराय नाहरराय' में युद्ध सम्बन्धी अवशेषों से मिलते हैं. व्यक्तिगत सम्पत्ति या भोजन, शिकार के किन्हीं कारणों को लेकर इस तरह के छोटे-छोटे युद्ध या आक्रमण होते होंगे. मानव ने इस काल में मिट्टी के बर्तन बनाना प्रारम्भ कर दिया था, जिसके लिए चक्र (चाक) का निर्माण इसी काल की देन है. बर्तन बनाने की इस कला का प्रसार सम्पूर्ण विश्व में मध्य पाषाण काल से ही हुआ था. भोजन बनाने के लिए चूल्हे भी इस काल में बनाये जाने लगे थे 'संघनाज' नामक स्थान पर प्राप्त मिट्टी के बर्तनों एवं उपकरणों के आधार पर इस बात की पुष्टि होती है. इस काल में सामाजिक जीवन एवं ग्राम सभ्यता का प्रारम्भ हो चुका था. इस काल में मानव समतल क्षेत्र में पत्थरों एवं मिट्टी के ढेलों से दीवार बनाकर, पेड़ों की शाखाओं, जानवरों की हड्डियों एवं घास-फूस से छत का निर्माण कर मकान बनाते थे. इस काल के हथियार पूर्वकालीन हथियारों की अपेक्षा छोटे, सुन्दर एवं प्रयोग में श्रेष्ठतम होते थे. इन हथियारों के पीछे लकड़ी के हत्थे लगाये जाते थे. तीर-बाण का आविष्कार इसी काल में हुआ था. इस काल के हथियारों को संरचना के आधार पर दो भागों - (i) अज्यामितिक लघु हथियार एवं (ii) ज्यामितिक लघु हथियार में विभाजित किया गया है.
मध्य पाषाणकालीन संस्कृति के साक्ष्य उपकरण प्रारूप जिन स्थानों पर मिले हैं, वे हैं- बागोर ( राजस्थान), आजमगढ़ (मध्य प्रदेश), संघनाज (गुजरात), बीर भानपुर ( पश्चिमी बंगाल), टेरी समूह (तमिलनाडु), सराय नाहर राय, महाराहा, मोरहना पहाड़ (उत्तर प्रदेश). इसी काल में जलवायु पूरी तरह परिवर्तित हो चुकी थी. ठण्ड एवं बर्फ से आक्रान्त लोगों को इस काल में राहत मिली थी. घास, वन, लताओं एवं अन्य वनस्पतियों का आविर्भाव हुआ था. कभी ठण्डी प्रकृति में पैदा होने वाले विशाल जानवरों - रेनडियर, मैमथ के स्थान पर हिरण, बकरी, भेड़, खरगोश पैदा हो चुके थे. चित्रकारी, नक्काशी एवं नृत्य, गायन का प्रचलन प्रारम्भ हो चुका था. इस तरह के साक्ष्य विन्ध्याचल की गुफाओं से प्राप्त हुए हैं. मध्यकालीन मानव की आस्था धर्म के प्रति प्रबल थी. इस काल का मानव प्रस्तरखण्डों एवं लिंग की पूजा करता था. इस काल में भक्ति भावना से अविभूत होकर लोग माँस, दूध, अन्नादि अर्पित करता था. मध्य पाषाण काल में प्रचलित उपकरण एवं हथियारों में- बेधनी, समलम्ब, इकधार फलक एवं अर्द्धचन्द्राकार प्रमुख थे. विभिन्न तथ्यों के आधार पर इस काल का अस्तित्व आधुनिक काल से 8000 वर्ष पूर्व तक था. यह लगभग 4000 वर्ष तक अस्तित्व में रहा. इस काल का मानव जाति एवं वर्गों में विभाजित हो गया था. उनके रीति-रिवाज, रहन-सहन भी भिन्न थे. इनमें आपस में वर्जनाएं भी होती थीं. इन्हीं आधारों पर आगे चलकर वर्ण - व्यवस्था एवं जाति -प्रथा का स्वरूप प्रस्फुटित हुआ पारिवारिक सम्बन्ध इसी काल में दृढ़ हुए थे. कृषि कार्य एवं पशुपालन के कारण मानव झुण्ड के रूप में रहने लगा, जिससे संयुक्त परिवार का रूप विकसित हुआ एवं माता पिता, भाई-बंहिन, पिता-पुत्र के रिश्ते बनने लगे एवं ममत्व के भावों का आविर्भाव हुआ.
नवपाषाण काल - मध्य पाषाण काल के अन्त होते ही नवपाषाण काल की सभ्यता एवं संस्कृति का प्रारम्भ हुआ, जिसकी प्रागैतिहासिक काल में स्थिति विश्वभर में 7000 वर्ष पूर्व की मानी जाती है. कालक्रम की दृष्टि से यह सबसे छोटा काल था. इस काल का उद्भव भारत में नहीं माना जाता प्रसिद्ध भू-वैज्ञानी गॉर्डन चाइल्ड (Gorden Child) इस संस्कृति का उद्भव क्षेत्र पश्चिमी एशिया के 'धन्वाकर' क्षेत्र में मानते हैं और इसका प्रसार वहीं से सम्पूर्ण विश्व में हुआ है. स्तरक्रम पद्धति के आधार पर 7000 ई. पू. के कृषि उत्पादन के प्रमाण स्पष्ट रूप से मेहरगढ़ (पाकिस्तान) में मिलते हैं. अन्य खोजों के बाद लगभग 5000 ई. पू. यहाँ पर जौ एवं गेहूँ की खेती होने के प्रमाण मिलते हैं. इन साक्ष्यों के आधार पर नवपाषाण काल की संस्कृति को 7000 ई. पू. मानना तर्कसंगत है. नवपाषाण काल का मानव अब पूरी तरह सभ्य मानव बन चुका था. वह भोजन का संग्रह करने की अपेक्षा भोजन उत्पादन करने लगा था. इस काल के हथियार पैने, छोटे, सुडौल एवं पॉलिश द्वारा चमकदार होते थे. इस काल का प्रमुख उपकरण कुल्हाड़ी था, जिसे कृषिकार्य के प्रयोग में लिया जाता था. इस काल के प्रमुख उपकरणों में हँसिया, ओखली, मूसल, सींग एवं हड्डी निर्मित बरमा, सुई, छैनी, छुरी रुखानी, काँटेदार बर्धी, कंघे, सुआ इत्यादि थे. हथियारों के अवशेष सरायखोला (रावलपिण्डीपाकिस्तान), राना घुण्डई ( बलूचिस्तान - पाकिस्तान), किली गुल मोहम्मद ( क्वेटा घाटी- पाकिस्तान ), बुर्जहोम (कश्मीर), आसाम, मेघालय, कोलड़ीहवा ( उत्तर प्रदेश), पैयामपल्ली (तमिलनाडु), मास्की, संगनकल्लू, ब्रह्मगिरि (कर्नाटक), चिरांद (बिहार), पिकलीहल, उटनूर (आन्ध्र प्रदेश) में प्राप्त हुए हैं.
नवपाषाण काल में मिट्टी के बर्तनों को कलात्मक ढंग से बनाया जाने लगा था. बर्तनों को पकाने, रंगने एवं चित्रों द्वारा सज्जित किया जाने लगा था. मूर्तियाँ, खिलौने एवं आभूषण इस काल में ही बनाये जाने लगे थे.
नवपाषाण काल प्रागैतिहास में एकमात्र ऐसा काल था, जिसमें श्रम विभाजन एवं व्यावसायियों का वर्गीकरण हुआ. इन्हें कुम्हार, बढ़ई, कृषक आदि कहा जाता था. इस काल में एक संगठित वर्ग तैयार हो गया था, जो पूर्णतः कबीलापरम्परा का द्योतक था. नवपाषाण काल की धार्मिक आस्था एवं भावना प्रबल थी. इस काल में प्राकृतिक शक्तियों को पूजा जाता था. विभिन्न प्राप्त अवशेषों के आधार पर इस काल में मातृदेवी की पूजा की जाती थी, जिसे प्रसन्न करने के लिए वे नानाविधि से पूंजा अर्चना करते थे. कर्म और पुनर्जन्म पर विश्वास था. अपने कबीले या परिवार के सदस्य को मरने के बाद दफनाने की प्रथा प्रचलित हो गई थी तथा उसकी रुचि की सभी चीजें रख दी जाती थीं. इसके पीछे उनकी अवधारणा थी कि मृतक पुनर्जीवित होकर दूसरे शरीर में जन्म लेगा. अतः उसको इनकी आवश्यकता हो सकती है. मृतक की मृत्यु के कई दिनों बाद तक उसको पितर मानकर पूजा जाता था. यहाँ तक पाया गया है कि मृतक व्यक्ति के परिवार के लोग उसकी हड्डियाँ इकट्ठी कर, उसे संरक्षित करते थे. कई स्थानों पर कब्र के पास बड़े-बड़े पत्थर गाड़ने का प्रावधान था, जिसे वे सम्मान एवं आत्मा की शान्ति का प्रतीक मानते थे. इन पत्थरों को 'महापाषाण' (Megaliths) कहते थे. ‘महापाषाण’ (Megaliths) लगाने की प्रथा के अवशेष दक्षिण भारत एवं यूरोप में प्राप्त हुए हैं. इस काल के मानव का परिवेश पूर्णतः सभ्य एवं उत्कृष्ट बन चुका था. रीति-रिवाज, मर्यादा, स्नेहिल सम्पर्क शासन प्रणाली, व्यवसाय, धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक विचार, परिवार, कबीले आदि इस काल के मानव के जीवन में पूरी तरह समाहित हो चुके थे.
भारत में नवपाषाणकालीन संस्कृति के अनेक साक्ष्य कश्मीर, सिन्ध, बलूचिस्तान, उड़ीसा, बिहार, असम, मेघालय, पिकलीहल, संगनकल्लू, दंब सादात, अमरी, कोटदीजी इत्यादि से प्राप्त हुए हैं. कश्मीर के बुर्जहोम नामक स्थान पर तत्कालीन संस्कृति के सर्वाधिक अवशेष यथा हड्डी के उपकरण जिसमें बर्फी, आरी, काँटा एवं मिट्टी के अलंकृत बर्तन प्राप्त हुए हैं. बुर्जहोम में गर्तगृहों में रहने के साक्ष्य भी प्राप्त होते हैं, जिसके अनुसार गर्तगृहों में बड़े-बड़े पत्थरों से सीढ़ी बनाकर नीचे उतरा जाता था एवं वहीं अपना जीवन व्यतीत करना पड़ता था. प्रवेश द्वार के पास चूल्हे एवं आलों के निर्माण के प्रारूप भी यहाँ प्राप्त हुए हैं, जो इस विकसित काल में अर्द्धविकसित स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं. नवपाषाणकालीन संस्कृति को यदि विकास की पराकाष्ठा कहा जाए, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी.
धातुकाल
पाषाण काल के अन्तिम समय में तत्कालीन मानव को धातुओं के बारे में जानकारी हो गई थी. धातुओं की खोज किस तरह हुई या मानव इसको कैसे समझ पाया. इसके लिए तत्कालीन भू-वैज्ञानिकों एवं समाजशास्त्रियों का मत है कि पाषाण काल में ही अपने भोजन की व्यवस्था के लिए मानव चूल्हे एवं भट्टियों का प्रयोग करता था, जिनका निर्माण मिट्टी पत्थरों से होता था, लेकिन इसके बाद इनका निर्माण धातु मिश्रित पत्थरों से होने लगा था. तीव्र ऊष्मा के कारण से धातुएँ पिघलकर बहती होंगी, जिससे उन्हें इसके अस्तित्व का पता चला और कूट-पीटकर इनका मनोवांछित उपकरण के निर्माण में प्रयोग करने लगा. इनके उपयोग से धातुकाल के मानव की शक्ति बढ़ गई और अनेक उपकरण एवं हथियारों का आविष्कार हुआ. धातु काल के उपकरणों में मुठिये बनाए जाते थे, जिस पर क्रॉस एवं स्वास्तिक का चिह्न बना होता था. धातुकाल में सर्वप्रथम मानव को सोने की जानकारी हुई. यह न्यूनतम मात्रा में कठिन परिश्रम एवं भ्रमण के बाद प्राप्त होता था. इसलिए सोने का प्रयोग सीमित दायरे में आभूषणों के लिए होने लगा. लगातार परिश्रम के बाद दूसरी धातुओं की खोज सफल हुई और उत्तर भारत में ताँबे एवं दक्षिण भारत में लोहा पाया गया. काँस्य की खोज अपूर्व थी. इस तरह नानव के धातुओं से परिचित हो जाने के कारण नवपाषाण काल के अन्त में आने वाले काल को धातु युग या धातु काल कहा गया, जिसे तीन भागों में विभाजित किया गया-(अ) ताम्र युग (ब) काँस्य युग (स) लौह युग.
धातु युग का प्रारम्भिक काल
ताम्र पाषाण काल-ताम्र युग में सभी सभ्यताएँ नवपाषाणकालीन थीं. इस काल का मानव पूर्ववत् व्यवहार करता था. एकमात्र ताँबे की पहचान नयी खोज थी. उपकरण एवं हथियारों में कुछ नये ताँबे के हथियारों को छोड़कर शेष पत्थर के ही प्रयोग में लाये जाते थे. अतः यह काल ताम्र पाषाण काल कहा जाता है. इस काल की सभ्यता का प्रारम्भ 5000 से 4000 ई. पू. तक हुआ. इस काल की संस्कृति एवं सभ्यता पूर्णरूप से विकसित थी. इस काल का मानव समाज एवं राज्य की कल्पनाएँ चावल, मसूर, गेहूँ, चना इत्यादि की फसलें पैदा होने के प्रमाण मिले हैं. इसी तरह के अवशेष महाराष्ट्र के नासिक, दयमाबाद, इनामगाँव, सोनेगाँव, नेवासा, जोर्वे तथा दक्षिण भारत में ब्रह्मगिरि, मास्की, उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद ; पश्चिमी बंगाल में पांडुराजार ढिढबी में भी मिले. हैं. बिहार में चिराँद नामक स्थान पर ताम्रपाषाणकालीन सभ्यता एवं संस्कृति के साक्ष्य मिले हैं. इस काल के मानव में व्यक्तिगत स्वामित्व की भावना विकसित हो चुकी थी, जिससे यदा-कदा कबीले में वैचारिक मतभेद से युद्ध पनपने लगे थे.
ताम्र युग
धातु युग का सबसे न्यूनावधि वाला काल ताम्र युग रहा. ताम्र पाषाण काल में पत्थर और ताँबे दोनों का प्रचलन था, लेकिन इस काल में यह सिर्फ ताँबे तक ही सिमट कर रह गया था. इसका कालक्रम 2000-1800 ई. पू. के मध्य मान लेना तर्कसंगत होगा, क्योंकि इस काल की संस्कृति सिन्धु सभ्यता की समाप्ति के बाद अस्तित्व में आई तथा इसका क्षेत्र भी बहुत कम था. ताम्र युग की सभ्यता के अवशेष मात्र गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्रों में मिलते हैं. इस काल का मानव पूर्णतः सभ्य, कृषक, शिल्पी एवं व्यवसायी बन चुका था. शिकार, खेती एवं अन्य उद्योगों को संचालित करने के लिए ताँबे के उपकरण - हथियार प्रचलित थे. इस काल के उपकरण प्रमुख रूप से गंगा-यमुना का दोआब, राजस्थान एवं बिहार से प्राप्त होते हैं. प्राप्त उपकरणों में शृंगिकायुक्त तलवार, भाले, हाथ की कुल्हाड़ियाँ, मत्स्य-भाले एवं सभ्यता के अन्य साक्ष्यों के रूप में मातृदेवी की मूर्तियाँ, मिट्टी के आवास, गेरुवर्णी मृद्भाण्ड एवं शिल्प व्यवसाय के प्रमाण दृष्टिगत होते हैं, जो तत्कालीन सभ्यता के स्वरूप को प्रकट करती हैं. विद्वान् इस संस्कृति का सम्बन्ध हड़प्पा संस्कृति से मानते हैं. ऐसा माना जाता है कि सिन्धु सभ्यतां की समाप्ति के बाद यहाँ के निवासी गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र में बस गये.
कांस्य युग 
ताम्र काल के बाद काँस्य युग की सभ्यता एवं संस्कृति का सूत्रपात हुआ. सम्पूर्ण विश्व में इसके आविर्भाव का काल विद्वान् 3000 ई. पू. के आसपास मानते हैं. इस काल में ताँबे के स्थान पर काँस्य काम में लिया जाने लगा था. कांसा ताँबे की अपेक्षा टिकाऊ एवं कठोर था; अतः उपकरण एवं हथियारों से लेकर बर्तनों में इसका उपयोग होने लगा था. कांसे के अधिकतम प्रयोग होने के कारण इस काल को काँस्य युग कहा गया. इसी युग में भारत में हड़प्पा या सिन्धु घाटी सभ्यता का प्रारम्भ हुआ. काँस्य युग में गाँवों के स्थान पर शहरी सभ्यता एवं संस्कृति का विकास हो चुका था. काँस्य युग में मानव की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो चुकी थी एवं वह एक सफल व्यवसायी बन गया था. चित्रकारी-शिल्पकारी का विकास हो चुका था. काँस्य युग में राज्य एवं नगरों की स्थापना से मानव जीवन पूर्णतः व्यवस्थित हो चुका था. मेसोपोटामिया, मिस्र, यूनान एवं सिन्धु घाटी में पूरी तरह काँसा ही प्रयुक्त होता था. खुदाई के बाद प्राप्त साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि लगभग 2000-1700 ई. पू. के बीच के काल में सिन्धु घाटी एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा में काँस्ययुगीन सभ्यता का आविर्भाव हुआ. लोथल, कालीबंगा, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, बनवाली काँस्ययुगीन संस्कृति के निर्मित शहर थे. काँस्य युग में मानव को लेखन-कला का ज्ञान हो चुका था. इस काल के दौरान पश्चिमी और मध्य एशिया में भारत के व्यापारिक सम्बन्ध थे. धार्मिक स्तर भी अत्यन्त उच्चस्तरीय था. पीपल, मातृदेवी एवं पशुदेव की पूजा होने लगी थी. चाक से बर्तन की प्रथा अब भी प्रचलित थी. मानव काँस्य के अलावा सोना, चाँदी, टिन की धातुओं से परिचित हो चुका था. इस काल में मृतक - संस्कार अत्यन्त रोचक था. विधि-विधान के साथ गाड़ना, दाह संस्कार करना एवं आभूषण का प्रयोग करते थे. दर्पण का प्रयोग होने लगा था. आभूषणों में अँगूठी, कुण्डल, बाजूबंद, हार, कड़े का प्रयोग स्त्री-पुरुष दोनों करते थे एवं कान की बालियाँ, पायल, कड़े, करधनी स्त्रियाँ पहनती थीं. स्त्रियाँ केशों का प्रसाधन करती थीं एवं पुरुष मूँछ एवं दाढ़ी रखते थे. सोने, चाँदी, गोमेद, स्फटिक एवं हाथीदाँत के आभूषणों का प्रयोग मात्र धनी लोगों तक सीमित था, जबकि निर्धन एवं सामान्य लोग ताँबे, सामान्य पत्थर, हड्डी एवं पकी मिट्टी के आभूषण पहनते थे. संगीत और नृत्य कला का भी इस युग में बोलबाला था.
लौह युग
काँस्ययुगीन सभ्यता के अन्त होते ही लौह युग प्रारम्भ हो गया. भू-वैज्ञानिकों ने लगभग 1400 ई. पू. के काल को लौह युग माना है. लौह युग स्थायी रूप से अस्तित्व में रहा और इसने क्रान्तिकारी परिवर्तनों को जन्म दिया. अब तक की सभ्यता नदियों-घाटियों में ही सीमित थी, लेकिन लौह युग के आगमन के साथ ही मैदानों में भी शहरीकरण हुआ. लोहा अपेक्षाकृत सस्ता, सुलभ, टिकाऊ एवं अन्य धातुओं से अधिक मजबूत था. इसीलिए लोहे के व्यापक प्रयोग से कृषि एवं व्यवसाय में प्रगति हुई. फलस्वरूप लौहयुगीन सभ्यता कभी भी समाप्त नहीं हो सकी. भारत में मगध जैसे साम्राज्य का उद्भव इसी सभ्यता के दौरान हुआ. लौह युग का प्रारम्भ उत्तर वैदिक काल से माना जाता है, जिसके साक्ष्य पुरातात्विक एवं साहित्यिक सामग्रियाँ हैं. गांधार, पूर्वी पंजाब, ब्लूचिस्तान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान में लगभग 1000 ई. पू. लौहयुगीन सभ्यता के प्रमाण मिलते हैं. इस दौरान काँटे, भाले, कुदाल, चाकू, दरांती इत्यादि उपकरणों एवं हथियारों के अधिकतम उपयोग होने के साक्ष्य उत्खनन के दौरान प्राप्त हुए हैं. चाक से निर्मित विभिन्न रंगीन बर्तनों के अवशेष प्राप्त हुए हैं, अतः इस संस्कृति को 'चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति' भी कहा जाता है. इनके अवशेषसोनुपुरा, चिंराँद, मथुरा, हस्तिनापुर, रोपड़, जखेड़ा, नागदा, अंतरजीखेड़ा, आलमगीरपुर, अहिच्छत्र, राजारढिढबी, नोह, एरण, पांडु और महिसदल में मिले हैं. इसी तरह इस काल में स्थायी निवास, कृषि, शिल्प, व्यवसाय, कला, लेखन एवं पारिवारिक सम्बन्धों के स्नेहिल वातावरण के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं.
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Mon, 09 Oct 2023 04:39:08 +0530 Jaankari Rakho
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> महापाषाण (Megalith)
दक्षिण भारत के कुछ लोग मृत व्यक्ति के शव के साथ कुछ चीजें भी कब्र में रख देते थे और इसके ऊपर घेरे में बड़े-बड़े पत्थर रख दिये जाते थे. ऐसे स्मारकों को 'महापाषाण' कहते हैं. इस समय लोग काले व लाल मृदभाण्डों के साथ-साथ लौह उपकरणों का प्रयोग करते थे.
> बुर्जाहोम
इसका शाब्दिक अर्थ है- 'जन्म स्थान'. यह नवपाषाणकालीन स्थल है जो कश्मीर में स्थित है. यहाँ के लोग गर्तावासों में निवास करते थे और मालिकों के साथ कुत्तों को भी दफनाते थे. यहाँ के लोग 'रुदवड़े धूसर मृदभाण्डों' का प्रयोग करते थे.
> वृहत्तर भारत
वृहत्तर भारत का अभिप्राय उन देशों से है, जहाँ प्राचीनकाल में भारतीय सभ्यता व संस्कृति का प्रसार हुआ था. इसमें भारत का प्रभाव अन्य देशों के जीवन व संस्कृति पर पड़ा था, जिससे वहाँ पर भारतीय संस्कृति पल्लवित हुई थी और वह एक प्रकार से वृहत्तर भारत बन गया था.
भारत को बाहर ले जाने वाले कारण
1. भारतीय व्यापार करने के लिए दूसरे देशों में गये, यहाँ की संस्कृति भी उनके साथ गई. जिससे
2. हिन्दू-धर्म व बौद्ध धर्म के प्रचार के द्वारा भारतीय संस्कृति का विदेशों में प्रचार.
3. विजय और भारतीय राजाओं के पराक्रम प्रवृत्ति से भी भारतीय संस्कृति का प्रसार हुआ.
> दासों की विशेषताएँ (ऋग्वेवद)
ऋग्वेद में दासों की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई गई है -
(i) अकर्मन वैदिक क्रियाओं का सम्पादन नहीं करते थे. 
(ii) अदेव्यु – वैदिक देवताओं की उपासना नहीं करते थे. 
(iii) अयज्वन–वे यज्ञ करने वाले नहीं थे. 
(iv) अवह्मान—वे श्रद्धा और धार्मिक विश्वासों से हीन थे. 
(v) अन्यव्रत-वे वैदिक व्रतों का अनुसरण करने वाले थे. 
(vi) मृद्धवाकू वे अपरिचित भाषा बोलते थे. 
(vii) दण्ड प्रणीत दास-राज्य द्वारा लगाये गये आर्थिक दण्ड को न चुका सकने वाले दास.
(viii) ध्वाजाहत-युद्ध में बन्दी बनाये गये दास.
अर्थशास्त्र में 5 प्रकार के दासों का, मनुस्मृति में 7 प्रकार के दासों का तथा विज्ञानेश्वर में 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया है .
> ग्राम सभा
प्राचीनकाल में गाँव का शासन ग्राम सभा द्वारा चलाया जाता था, जिसका प्रमुख 'ग्राम भोजक' कहलाता था. ग्राम सभा का कार्य ग्राम की जनता से कर वसूलना, ग्रामीण विवादों का निपटारा करना, ग्राम में शान्ति व व्यवस्था बनाये रखना तथा सार्वजनिक कल्याण के कार्य को सम्पादित करना.
> मन्त्रिण
मौर्यकाल में यह छोटी उप-समिति थी, जिसमें कुल तीन या चार मन्त्री होते थे. जब किसी प्रश्न पर तुरन्त निर्णय लेना हो, तो उस समय मन्त्रिण से परामर्श लिया जाता था. इसमें युवराज, प्रधानमन्त्री, सेनापति, सन्निधाता आदि सम्मिलित होते थे. इनको 48000 हजार पण वार्षिक वेतन मिलता था.
> ग्रामवृद्ध परिषद्
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इसका उल्लेख मिलता है. इसमें ग्राम के प्रमुख व्यक्ति होते थे. जो 'ग्रामणी' की सहायता करते थे. ग्रामणी को ग्राम की भूमि का प्रबन्ध करने तथा सिंचाई के साधनों की व्यवस्था करने का अधिकार था. यह परिषद् न्याय करने का कार्य भी करती थी. ग्रामणी भूमिकर वसूल करके राजकोष में जमा करवाता था.
> परिषा
अशोक के अभिलेखों में मन्त्रिपरिषद् को परिषा कहा गया है. इसके अभिलेखों में तीन प्रकार के अधिकारियों के नाम मिलते हैं – 
(A) युक्त – ये जिले के अधिकारी होते थे, जो राजस्व वसूल करते थे तथा उसका लेखा-जोखा रखते थे और सम्राट् की सम्पत्ति का प्रबन्ध करते थे.
(B) रज्जुक – ये भूमि की पैमाइश करने वाले अधिकारी थे, जिन्हें पुरस्कार और दण्ड देने का भी अधिकार था. ये ग्रामीण प्रशासन की रीढ़ थे. भूमि व कृषि सम्बन्धी सभी विवादों का निर्णय उन्हें ही करना पड़ता था. ये आधुनिक कलेक्टर की भाँति होते थे, जिसे राजस्व व न्याय दोनों के कार्य देखने पड़ते थे.
(C) प्रादेशिक – यह मण्डल का प्रधान अधिकारी होता था, जो अर्थशास्त्र में उल्लिखित 'प्रदेष्ठा' नामक पदाधिकारी था. उसे विभिन्न विभागों के अध्यक्षों के कार्यों की देख-रेख करनी पड़ती थी.
> अनुसंधान
युक्त राजुक और प्रादेशिक तीनों ही पंचवर्षीय दौरे करते थे, जिसे अनुसंधान कहा गया है. इनमें वे प्रशासनिक कार्यों के साथसाथ धर्म प्रचार का कार्य भी करते थे.
> दक्षिणापथ
इसके अन्तर्गत उत्तर में नर्मदा नदी से लेकर दक्षिण में तुंगभद्रा नदी का सम्पूर्ण प्रदेश सम्मिलित था. विस्तृत अर्थ में इस शब्द का प्रयोग विन्ध्य पर्वत तथा हिन्द महासागर के मध्य स्थित विशाल भू-प्रदेश के लिए किया गया है.
> सुदूर दक्षिण
इस भाग के अन्तर्गत तुंगभद्रा नदी के दक्षिण का समस्त भाग सम्मिलित था. इस भाग को द्रविड़ अथवा तमिल देश कहा जाता था. यहाँ चोल, चेर, पाण्ड्य राज्यों के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है. पेरीप्लस ऑफ इरिथ्रियन सी में इस भाग को 'दगरिका' कहा गया है.
> रामायण एवं महाभारत से सम्बन्धित पुराण साक्ष्य
यद्यपि पुरातात्विक दृष्टि से इनका कोई स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है, जो रामायण एवं महाभारत की ऐतिहासिकता को पुष्ट करते हों. लेकिन धूसर चित्रित मृदभाण्ड (P.G.W.) एवं उत्तर-कृष्ण चमकीले मृदभाण्ड उन क्षेत्रों एवं युग से भी सम्बन्धित है, जो रामायण एवं महाभारत से सम्बद्ध है. अयोध्या, मथुरा, काशी, कौशाम्बी, हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ आदि महत्त्वपूर्ण नगरों के साक्ष्य पुरातात्विक अवशेषों के रूप में मिले हैं.
इन विभिन्न क्षेत्रों से रामायण और महाभारत के कथानकों से सम्बन्धित मृणमूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं. उत्तर - वैदिक काल के पश्चात् से प्राप्त लौह अवशेषों की बहुलता, रामायण एवं महाभारत में प्रयुक्त आयुद्धों को प्रमाणित करती है.
> हूण आक्रमण
‘हूण’ जिसका उल्लेख चीनी इतिहास में (हूग-नू) के रूप में हुआ है, मध्य एशिया की एक संचरणशील और बर्बर जाति थी. जिन्होंने अपने ही पड़ोस में बसी हुई यू-ची जाति को अपना प्रदेश छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया, लेकिन बाद में स्वयं पश्चिम की ओर चल पड़े और दो शाखाओं में विभक्त हो गई. एक शाखा यूरोप की ओर पहुँची, जहाँ उन्होंने दक्षिणी-पूर्वी यूरोप को रक्तरंजित कर दिया, दूसरी शाखा वक्षु (ऑक्सस) नदी के तट पर कुछ समय रहने के बाद अफगानिस्तान और उत्तर-पश्चिमी दर्रों को पार कर भारत पहुँची. चीनी यात्री शुंगयुन के विवरण से ज्ञात होता है कि ‘तिगिन’ इनका पहला शासक था, जिसने गान्धार में अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित की. इस प्रारम्भिक शासक के सिक्के केवल मात्र उत्तरी-पश्चिमी भागों में मिले हैं.
भारत में हूणों के आक्रमण का उल्लेख स्कन्दगुप्त के भीतरी स्तम्भ लेख में मिले हैं. इसके अनुसार स्कन्दगुप्त ने उन्हें पराजित कर यहाँ से पश्चिमोत्तर क्षेत्रों में प्रयाण करने को विवश कर दिया, जहाँ वे फारस के 'ससानी साम्राज्य' से जूझते रहे. इन्हीं का उल्लेख स्कन्दगुप्त के जूनागढ़ अभिलेख में मलेच्छ के रूप में हुआ है.
तोरमाण हूणों का प्रथम महत्वपूर्ण शासक था, जो भारत के मध्य भागों तक बढ़ आया था. 'धन्यविष्णु के 'एरण अभिलेख' में इसकी प्रभुता और साम्राज्य स्थापित करने का उल्लेख मिलता है. पंजाब तथा उत्तर प्रदेश से प्राप्त उसके ताँबे के छोटे-छोटे सिक्के भी इन क्षेत्रों में इस अधिकार को पुष्ट करते हैं. उद्योतन सूरी द्वारा विरचित जैन ग्रन्थ 'कुवलय माला' में भी तोरमाण द्वारा भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने का उल्लेख मिलता है. 500A.D. के आसपास मालवा हूणों के अधिकार में था.
तोरमाण के उपरान्त उसके पुत्र मिहिरकुल ने गुप्त साम्राज्य की दुर्बलता और विच्छिन्नता का लाभ उठाकर देश के आन्तरिक भागों पर आक्रमण किया और उस तथ्य की पुष्टि उसके ग्वालियर प्रशस्ति और ह्वेनसांग के विवरण से होती है, वह शैव समर्थक था और क्रूर तथा नृशंस शासक के रूप में विदित है. गुप्त शासक 'नरसिंहगुप्त बालादित्य' द्वारा उसे पराजित किया गया, तो मंदसौर स्तम्भ अभिलेख में भी यशोधर्मन द्वारा उसे पराजित किया गया, का उल्लेख हुआ है तथा राज्यवर्धन के साथ युद्ध के बाद हूर्गों से सम्बन्धित कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. ऐसा प्रतीत होता है कि हम अन्तोगत्वा भारतीय संस्कृति के महासमुद्र में विलीन हो गये.
इस प्रकार यद्यपि हूणों का दीर्घकालीन साम्राज्य स्थापित नहीं हुआ, लेकिन भारत के राजनीतिक जीवन में न केवल उथल-पुथल मचा दी, बल्कि गुप्त साम्राज्य के पतन में भी उनके आक्रमणों की अहम भूमिका रही.
> गान्धार कला
भारत के पश्चिमोत्तर स्थित गान्धार क्षेत्र में यूनानी एवं भारतीय सम्मिश्रण से जिस मूर्तिकला का उद्गम एवं विकास हुआ उसे ही गान्धार कला के नाम से अभिहित किया गया है.
इसके अन्तर्गत काले स्लेटी पत्थर से बुद्ध अथवा बोधिसत्वों की असंख्य मूर्तियों का निर्माण हुआ यूनानी तकनीक एवं शैली तथा भारतीय विषय को आधार मानकर विकसित इस कला में आध्यात्मिकता के स्थान पर शारीरिक सौन्दर्य एवं अंगों के संतुलित अनुपात पर अधिक बल दिया है. इसे 'Greeko-Buddhist An' भी कहा गया है.
> मथुरा कला
मूर्तिकला की जिस शैली का विकास मथुरा से हुआ, वह मथुरा कला के नाम से सुविज्ञ है, जिसे प्रथम शताब्दी ई. के अन्तिम वर्षों जैन अनुयायियों द्वारा विशेष प्रश्रय दिया गया. इस क्षेत्र से जैन मूर्तियों के अवशेष अधिक मिले हैं. यद्यपि कुषाण संरक्षण में बौद्ध मूर्तिकला का विकास भी दृष्टव्य है, साथ ही कई नारी मूर्तियाँ भी यहाँ विनिर्मित की गईं.
गान्धार शैली की तुलना में यह भारतीयकरण के अधिक निकट है, जिसमें यथार्थ शारीरिक अभिव्यक्ति के स्थान पर आध्यात्मिक शान्ति मुखाकृति में स्पष्ट परिलक्षित है. यहाँ लाल पत्थर का प्रयोग मूर्तियों के निर्माण में बहुतायात से किया गया है. 
> अमरावती कला
कृष्णा एवं गोदावरी के मुहानों पर अमरावती व गुण्टूर जिलों में जिस मूर्तिकला की शैली का विकास हुआ वह अमरावती कला के नाम से विख्यात है.
इस कला के प्रतीक स्तूपों की चार दीवारों पर बनी मूर्तियों या कुछ बौद्ध प्रतिमाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके अन्तर्गत स्त्री-पुरुषों की श्रेष्ठ मूर्तियों का निर्माण किया गया है. श्वेत संगमरमर से बनी इन मूर्तियों में धर्म, त्याग आदि की प्रमुखता के स्थान पर शारीरिक सौन्दर्य अंगों में अनुपात और भाव मुद्रा का अंकन दृष्टव्य है. स्त्री-पुरुषों की मूर्तियों को इस प्रकार बनाया गया है कि जिनसे उनका पारस्परिक सम्बन्ध का ज्ञान होता है.
> आदिग्रन्थ
यह सिक्खों की धार्मिक पुस्तक थी जिसका संकलन गुरु अर्जुनदेव ने किया था. उन्होंने सारी पुस्तक को पद्य रूप में लिखवाया था. इसमें सिखों के पाँच गुरुओं और 18 हिन्दू भक्तों तथा कबीर, बाबा फरीद, नामदेव और रैदास इत्यादि के उपदेशों का संकलन था. यह एक परमेश्वरीय ज्ञान की पुस्तक है तथा सिक्खों की पूजा की मुख्य वस्तु है. गुरु नानक के उपदेश भी आदि ग्रन्थों में संकलित हैं.
> मसन्द प्रथा
गुरु अर्जुन ने मसन्द प्रथा चलाई, जिसके अनुसार सिखों को अपनी आय का दसवाँ भाग गुरु को देना पड़ता था. गुरु इस धन को एकत्रित करने के लिए अपने प्रतिनिधि नियुक्त करता था और वैशाखी के दिन यह अमृतसर भेज दिया जाता था.
> मिस्ल (MISL)
मिस्ल अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'बराबर' या 'एक जैसा'. एक जत्थे के सभी सदस्यों को राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक एकाधिकार प्राप्त था. उनके संगठन को मिस्ल के नाम से पुकारा जाता था. मिस्लें पूर्णरूप से धार्मिक एवं प्रजातन्त्रात्मक थीं, क्योंकि इसमें प्रत्येक सैनिक तथा मिस्ल के साधारण सदस्य को सामाजिक और राजनैतिक रूप से समान अधिकार था. मिस्लों का संगठन गुरुमत्ता संस्था द्वारा होता था. मिस्लों के सदस्य सामन्त सामुद्रिक रूप से जीते हुए प्रदेशों को बाँट लेते थे. मिस्ल वास्तव में एक संघ था, जो आधार रूप से पूर्ण प्रजातान्त्रिक और धार्मिक एकसूत्रता की डोर से मजबूती से बँधा था. मिस्लों की संख्या 12 थी, जिसमें 'भंगी मिस्ल' सबसे शक्तिशाली थी. एक अन्य मिस्ल सुकरचकिया भी महत्त्वपूर्ण थी, जिसका संस्थापक चतरसिंह था. महाराजा रणजीतसिंह भी इसी मिस्ल से सम्बन्धित थे. प्रत्येक मिस्ल का एक प्रमुख सरदार होता था जिसे अपने मिस्ल के बारे में पूर्ण अधिकार होता था. मिस्लों का शासन ग्राम्य शासन था. गाँवों में पंचायतें शासन कार्य करती थीं.
> गुरुमत्ता
मिस्लों की केन्द्रीय संस्था गुरुमत्ता थी, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘धर्मगुरु का आदेश'. सिख दीपावली, दशहरा व वैशाखी के दिन अमृतसर में आदिग्रन्थ के सम्मुख एकत्रित होते थे और अकाल तख्त पर सामूहिक कार्यवाही के अपने कार्यक्रम पर विचार करते थे. उनके निर्णय जो प्रस्तावों के रूप में लिख लिए जाते 'गुरुमत्ता' कहलाते थे. गुरुमत्ता राजनैतिक, न्याय, विचार आदि के सारे कार्य पूरे करता था.
> वहदत-अल-वजूद
विचार रखता था. इन्होंने कट्टरपन्थी मुस्लिमों को चुनौती दी और यह सूफियों का एक सिद्धान्त था जिसका प्रतिपादन 'इब्बअल-अरबी' ने किया था. यह सिद्धान्त 'सर्व धर्म समभाव' का शरियत की अवहेलना की. यह एक ईश्वर में विश्वास रखता था. सूफियों के इस सिद्धान्त ने धार्मिक सहिष्णुता का वातावरण उत्पन्न किया तथा सभी धर्मों व व्यक्तियों की समानता पर जोर दिया.
> वहदत - उश-शुहूद
यह सूफी सिद्धान्त का शरियत का कट्टरता से पालन करता है तथा हिन्दुओं और गैर-सुन्नी मुसलमानों के प्रति असहिष्णुता का दृष्टिकोण अपनाते हैं.
> खानकाह
सूफी सन्तों का निवास स्थान तथा उनके कामकाज का केन्द्र खानकाह कहलाता था. ये मिट्टी के बने होते थे. दूर-दूर से लोग अध्यात्मिक उन्नति के लिए वहाँ जाते थे. कई खानकाहों में यात्रियों और अनुयायियों के रहने-खाने का भी बन्दोबस्त था.
> लंगर प्रथा
गुरु अंगद ने लंगर प्रथा प्रचलित की. लंगर का अर्थ होता है – 'सभी का मिलकर एक स्थान पर भोजन करना'. यह प्रथा सिखों के उत्कर्ष में बड़ी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई है. इस प्रथा के माध्यम से गुरु नानक के अनुयायी जात-पात के विचारों का त्याग कर एक साथ खाना खाने लगे. इससे उनमें ऊँच-नीच की भावना समाप्त हो गई और उनमें बन्धुत्व की भावना प्रबल हो गई.
> उदासी मत
गुरु नानक ने जब अपने पुत्रों को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया, तो उनके पुत्र श्रीचन्द ने 'उदासी मत' का प्रचलन किया. नानक ने अपने विचारों का प्रचार करने के लिए जो भ्रमण एवं धर्मयात्राएँ की, वह 'उदासिया' कही जाती हैं.
> मंझियाँ
वह केन्द्र जहाँ पर नानक की शिक्षाओं पर चर्चा या सत्संग होते थे. गुरु अंगद ने इस मंझियों को स्थापित किया. 'मंझ' उन धार्मिक केन्द्रों का व्यवस्थापक होता था, जो चारपाई पर बैठकर उपदेश देता था.
> अकाल तख्त
इस तख्त की स्थापना गुरु हरगोविन्द ने 1609 ई. में की. इस तख्त पर बैठकर गुरु केवल राजनीतिक समस्याओं पर ही विचार करते थे. यहाँ से वे अपने सैनिकों की परेड व कुश्तियाँ देखा करते थे. इस जगह संगीत होता था, जिसमें वीर रस की कविता सुनाने वाले ही भाग लेते थे.
> खुदकाश्त
खुदकाश्त किसान वे खेतीहर थे, जो उसी गाँव की भूमि में खेती-बाड़ी करते थे, जिसके वे निवासी थे. ये किसान अपनी भूमि के स्वयं मालिक थे और इन्हें स्थाई अधिकार प्राप्त था. इनको अपनी भूमि व सम्पत्ति बेचने का अधिकार था. ये किसान अपनी खेती-बाड़ी में श्रमिकों का उपयोग करते थे.
> पाहीकाश्त
ये वे कृषक थे जो दूसरे गाँवों में जाकर कृषि कार्य करते थे तथा वहाँ उनकी अस्थाई झोपड़ियाँ होती थीं. पाहीकाश्त किसानों के पास केवल उतनी जमीन होती थी, जितनी वह केवल अपने ही परिवार के श्रम का उपयोग करके उस पर खेती कर सकते थे. 
> मुजारियन
ये वे किसान थे जिनके अधिकार में इतनी कम भूमि होती थी कि भूमि उनके परिवार के सम्पूर्ण श्रम को काम में लाने के लिए अपर्याप्त थी. अतः वह अपनी भूमि पर खेती के अतिरिक्त खुदकाश्त किसानों से किराये पर लेकर (जमीन) उस पर खेती करते थे.
> राजगामिता कानून
इस कानून के अनुसार जागीरदार की मृत्यु हो जाने पर उसकी सारी सम्पत्ति राजगामी हो जाती थी, उसकी जो देनदारी होती थी, उसका पूरा विवरण तैयार किया जाता था और राजगामी चल सम्पत्ति में से उसकी कटौती कर ली जाती थी. इसके बाद शेष चल सम्पत्ति का मृत व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में वितरण कर दिया जाता था. इस कानून की वजह से जागीरदार के वारिस इस जागीर पर पुश्तैनी हक का दावा नहीं कर सकते थे.
> सावानिह निगार
यह जागीरदारों पर नियन्त्रण रखने के लिए अधिकारियों के महत्त्वपूर्ण अधिकरण थे. ये अधिकारी जागीरदारों की कार्यवाहियों और जागीरों की तत्कालीन स्थिति का पूरा विवरण लिखित रखते और उसे आगे भेजते थे.
हुकूक-ए-दीवानी— राजकोषीय माँगे
जमा = निर्धारित राजस्व
हाल-ए-हासिल - वास्तविक राजस्व.
> मदरसा
मदरसे इस्लामिक शिक्षा केन्द्र थे, जिनमें उच्च शिक्षा दी जाती थी. इसमें तर्कशास्त्र, संस्कृत, व्याकरण आदि की शिक्षा दी जाती थी. अकबर ने आगरा, फतेहपुर सीकरी व दिल्ली में मदरसों की स्थापना की.
> मकतब
यह मुगलकालीन प्राथमिक पाठशालाएँ थीं जिसमें प्राथमिक शिक्षा दी जाती थी. इसमें कुरान के अतिरिक्त गणित की शिक्षा दी जाती थी.
 चिश्ती सन्त और कार्यस्थल
>  ख्वाजा अब्दुल चिश्ती - हेरात.
> मुईनुद्दीन चिश्ती – अजमेर.
> बाबा फरीद – मुल्तान.
> निजामुद्दीन औलिया - दिल्ली.
> हमीदुद्दीन नागौरी – नागौर.
> नासिरुद्दीन महमूद – दिल्ली.
> सिराजुद्दीन अली - गौर (बंगाल). 
> अली अहमद–लखनऊ.
> मुहम्मद गेसुदराज – गुलबर्गा. 
> सलीम चिश्ती – फतेहपुर सीकरी. 
> बख्तियार काफी – दिल्ली.
> सुहरावर्दी – पंजाब, सिंध व बंगाल तीन महत्वपूर्ण केन्द्र थे.
> बहाउद्दीन जकारिया – मुल्तान. 
> ललितादित्य
यह कश्मीर के 'कर्कोट वंश का शासक था, जिसने 'मार्तण्ड का सूर्य मन्दिर' का निर्माण करवाया था. परिहासपुर में उसने बुद्ध की एक विशाल मूर्ति स्थापित की. ललितादित्य सभी धर्मों का आदर करता था. 1760 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
> रानी दिद्दा
यह कश्मीर के 'उत्पल वंश' की रानी थी, जिसने अपने पति क्षेमगुप्त के मरने के बाद पुत्र अभिमन्यु की संरक्षिका के रूप में शासन किया. उसके समय में देश में शान्ति बनी रही और कई मन्दिरों का निर्माण हुआ. उसने नीच कुलीन व्यक्ति की सहायता से अपनी शक्ति कायम रखी. रानी दिद्दा चरित्रहीन स्त्री थी. 1003 ई में इसकी मृत्यु हो गई.
शब्दावली
> अफाकी
ईरान, ईराक तथा केन्द्रीय एशिया से आया दक्षिण में नव नियुक्त अमीर वर्ग. ये विदेशी अमीर बहमनी युग में दक्षिण में अपना प्रभुत्व जमा बैठे थे. अफाकी (विदेशी) व दक्खिनी (देशी) अमीरों के मध्य तनातनी के कारण ही बहमनी साम्राज्य छोटे-छोटे उत्तराधिकारी राज्यों में बँटकर छिन्न-भिन्न हो गया.
> अलतमगा
मोहरबन्द या शाही सील युक्त भूमि अनुदान, जिसे जहाँगीर द्वारा प्रारम्भ किया गया एक विशिष्ट भू-धृति अथवा भूमि अनुदान. इन अनुदानों को अलतमगा इसलिए कहते थे कि क्योंकि इसी नाम की सम्राट की मोहर इन अनुदानों पर लगाई जाती थी. ये भूमि अनुदान, जागीर-ए-वतन अथवा गृह जागीरों के रूप में कुछ मुसलमान सरदारों को दिए जाते थे. यह भूमि अनुदान या जागीरें निश्चित अवधि के लिए दी जाती थी.
> अमलगुजार
सरकार अथवा जिला स्तर का दूसरे नम्बर का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भू-राजस्व अधिकारी था. उसे ही नहीं, अपितु अन्य वरिष्ठ राजस्व समाहर्ताओं को करोड़ी कहा जाता था. ये अमलगुजार प्रान्तीय दीवान को सम्बन्धित जिले की आवधिक आय व्यय रिपोर्ट प्रस्तुत करते थे. अकाल एवं सूखे की स्थिति में वह किसानों को तकावी ऋण देता था.
> अमीन
राज्य के कर्मचारी का नाम शेरशाह के शासन में वह परगना के दो महत्त्वपूर्ण कर्मचारियों में से एक था. अकबर के शासन काल में वह ‘सूबेदार’ का अधीनस्थ कर्मचारी होता था, परन्तु उसका काम-काज क्या होता था, यह बहुत स्पष्ट नहीं है. सत्रहवीं सदी में वह प्रान्तीय दीवान के एक अधीनस्थ के रूप में काम करता था और भू-राजस्व निर्धारण के लिए जिम्मेदार होता था.
> इजारा
रूप भू-राजस्व के आधार पर खेती करने की पद्धति, औपचारिक से मुगल शासक इस प्रणालीको अनुमोदन नहीं देते थे. फिर भी कुछ गाँवों को कभी-कभी भू-राजस्व लेकर खेती करने के लिए दे दी जाती थी.
> इक्ता
सल्तनत काल में नकद वेतन अथवा पेंशन इनाम, वक्फ या भरण-पोषण के लिए नकद धनराशि देने के स्थान पर किसी भूखण्ड या कृषि योग्य भूमि का सम्बन्धित व्यक्ति को लगान हस्तांतरित कर देना इस प्रकार नकद भुगतान के बदले लगान वाली आवंटित भूमि को 'इक्ता' कहा जाता था. मुगल सम्राट् भी नकद वेतन के बदले भू-राजस्व आवंटन करते थे, परन्तु भू-राजस्व आवंटित भूमि को जागीर कहा जाता था, तथापि कभी-कभी जागीर आवंटन पत्रों में जागीर को इक्ता कहा गया है. ऐतिहासिक दृष्टि से मुगल जागीर तथा सल्तनतकालीन इक्ता के स्वरूप में बहुत अधिक भिन्नता थी.
> कानकूत
इसका शाब्दिक अर्थ है – कृषि उत्पादन या फसल का अनुमान लगाना. इसका प्रयोग भू-राजस्व निर्धारण की एक विधि के रूप में किया जाता था जिसमें जोत के क्षेत्रफल का मापन किया जाता था और वसूले गए भू-राजस्व का निर्धारण अन्न अथवा उपज में किया जाता था.
> गज - ए - सिकन्दरी
भूमि की माप की इकाई जो 41 अंक ( उंगली) या 33 इंच लम्बी होती थी. बाँस से बनी यह नई जरीब या माप जिसकी पतली-पतली खपच्चियों को लोहे की कड़ियों द्वारा मजबूती से जोड़ा गया होता था. जरीब अकबर के शासन काल में प्रयोग में आना शुरू की गई थी. यह भूमि की पैमाइश की मानक इकाई होती थी. एक बीघे में 3,600 वर्ग गज होते थे.
> जागीर -ए- वतन
गृह जागीरें. जब कोई राजपूत राजा शाही सेवा में शामिल हो जाता था, तो उसकी एक रैंक (मनसब) और एक जागीर दी जाती थी. यह जागीर उसकी अपनी रियासत के निकट या उसकी अपनी रियासत ही होती थी और विद्रोह आदि की स्थिति को छोड़कर अहस्तावरणीय होती थी. इन जागीरों को वतन जागीर कहा जाने लगा, तथापि इस शब्द का उल्लेख न तो अबुल फजल ने और न किसी अन्य समकालीन इतिहासकार ने किया है। इस शब्द का प्रथम उल्लेख अकबर द्वारा बीकानेर के राजा रायसिंह को बाद में भेजे गए एक फरमान में है. 
> जब्ती
भू-राजस्व निर्धारण की एक प्रणाली जिसे आइन-ए-दहशाला, टोडरमल बंदोबस्त, रैयतवाड़ी प्रणाली आदि नामों से पुकारते हैं और तकनीकी रूप से इसे 'जब्ती प्रणाली' के नाम से जानते थे. यह प्रणाली 1582 ई. में प्रारम्भ की गई. प्रारम्भ में यह प्रणाली मुगल साम्राज्य के आठ प्रान्तों में प्रारम्भ की गई. इस भू-राजस्व बंदोबस्त के पाँच चरण होते थे— भूमि का मापन, अच्छी, मध्यम और खराब भूमि का निर्धारण, उपज के एक-तिहाई हिस्से का राजस्व के रूप में निर्धारण, उपज के रूप में निर्धारित भू-राजस्व को नकदी में परिवर्तित करना और अन्त में भू-राजस्व के संग्रहण का तरीका तय करना.
> दहशाला
राजस्व-निर्धारण की 'जब्ती प्रणाली' का एक संशोधित रूप अकबर द्वारा 1580 ई. में शुरू की गई. इस प्रणाली से लगान निर्धारण के लिए किसी विशिष्ट कृषि परिक्षेत्र में पिछले 10 वर्षों में विभिन्न फसलों का औसत उत्पादन तथा लगान वसूली के लिए इसी अवधि में इनकी कीमतों का औसत निकाला जाता था. पिछले 10 वर्षों के औसत उत्पादन का तीसरा हिस्सा लगान होता था, तथापि भू-राजस्व नकद राशि में लिया जाता था. फसल या उपज के रूप में निर्धारित लगान को नकदी में वसूल करने के लिए विभिन्न कृषि क्षेत्रों में उगाए गए कृषि उत्पादों का मूल्य उक्त क्षेत्र में उन कृषि उत्पादों के पिछले दस वर्षों के प्रचलित मूल्यों के आधार पर किया जाता था.
> दस्तूर / दस्तूर-उल-अमल
लगान निर्धारण की जब्ती व्यवस्था में उपज के रूप में निर्धारित लगान या भू-राजस्व को नकदी के रूप में वसूल करने के लिए क्षेत्रीय आधार पर उत्पाद मूल्य तालिका तैयार की जाती थी. उपज के रूप में निर्धारित भू-राजस्व को नकदी में परिवर्तित करने के लिए विभिन्न कृषि उत्पादों की क्षेत्रीय मूल्य सूची को 'दस्तूरउल-अमल' कहते थे. इस उद्देश्य हेतु सम्पूर्ण साम्राज्य को अनेक समरूप कृषि क्षेत्रों या दस्तूरों में विभाजित कर दिया जाता था. दस्तूरों के विभाजन का आधार यह था कि उक्त कृषि क्षेत्र में एक सी फसलें और समान कृषि उत्पाद मूल्य हों. प्रत्येक दस्तूर में पिछले 10 वर्षों में विभिन्न खाद्यान्नों के प्रचलित मूल्य के आधार पर प्रति मन औसत खाद्यान्न मूल्य सूची तैयार की जाती थी जैसे कि अकबर के शासन काल में 1570-71 से 1580-81 के मध्य कृषि उत्पादों के प्रचलित कीमतों के आधार पर दस्तूर-उल-अमल निर्धारित किए गए. सामान्य तौर पर दस्तूर के अन्तर्गत अनेक तहसीलें आती थीं, परन्तु यदि एक ही तहसील में खाद्यान्नों की कीमतों में व्यापक उतार-चढ़ाव होता था, तो अपवाद स्वरूप एक ही तहसील में एक से अधिक दस्तूर भी हो सकते थे.
> नस्क
भू-राजस्व निर्धारण का एक अधीनस्थ तरीका जिसका प्रयोग राजस्व निर्धारण की किसी मुख्य व्यवस्था अधीन किया जा सकता था. इस विधि में राजस्व निर्धारण पिछले आँकड़ों के आधार पर किया जाता था.
> पेशकश
स्थानीय रियासतदारों अधीनस्थ शासकों द्वारा मुगल सम्राट् को दिया जाने वाला नियमित नजराना पेशकश कहलाता था. यद्यपि पेशकश का सही स्वरूप निश्चित करना कठिन है फिर भी कभी तो यह नकद राशि में होता था और कभी हीरों, बहुमूल्य धातुओं अथवा हाथियों के रूप में होता था. नजराना अदा करने का मतलब होता था उस रियासतदार का मुगल सम्राट् के अधीन होना.
> फौजदार 
सरकार के स्तर पर तैनात प्रमुख कार्यकारी अधिकारी. एक सरकार के अन्तर्गत एक या अधिक फौजदार नियुक्त किए जा सकते थे. साथ ही एक फौजदार दो अलग-अलग सरकारों का भी काम देख सकता था. मुख्य रूप से विद्रोह और कानून एवं व्यवस्था से जुड़ी समस्याएँ देखनी होती थी. फौजदार किसी किले का प्रभारी अधिकारी भी होता था.
> मीरबक्शी
सैन्य विभाग का मुखिया. सैन्य मामलों से सम्बन्धित सभी कार्य उसी के मार्फत होते थे, जैसे कि मनसबदारों की नियुक्ति, पदोन्नति आदि. घोड़ों का चिन्हांकन, सैनिकों की सूचना तैयार करना आदि मीरबक्शी इन सभी मामलों की ताइद करके इन्हें सम्राट् के समक्ष रखता था. वह प्रान्तीय बक्सियों तथा वाकियानवीसों के कामकाजों पर भी नजर रखता था. दिल्ली सल्तनत में इसके समकक्ष अधिकारी को ‘मीर अर्ज' कहते थे. वह यह भी सुनिश्चित करता था कि अदालत में दरबारी शिष्टाचार, खासतौर से मनसबदारों के बैठने की व्यवस्था उनके रैंक के अनुसार बनी रहे.
> मुहतसिब
एक धर्माधिकारी या सार्वजनिक नैतिकता की देखरेख करने वाला अधिकारी जिसका काम यह सुनिश्चित करना होता था कि जनता में नैतिकता बनी रहे. उसे निषिद्ध प्रथाओं जैसे सभी प्रकार के नशीले पदार्थों का प्रयोग, जुआ आदि को सीमा में रखना होता था.
> मुतसद्दी
बन्दरगाह का प्रशासक (पौतवाध्यक्ष) व बन्दरगाह का प्रशासन प्रान्तीय प्राधिकार से स्वतन्त्र था. मुतसद्दी सीमा शुल्क चौकी के माध्यम से बन्दरगाह पर बाहर से आई व्यापारिक वस्तुओं पर कर वसूल करता था, ऐसी भी जानकारी मिलती है. मुतसद्दी का पद नीलाम होता था और जो सबसे ऊँची बोली लगाता था उसे ही यह पद दिया जाता था.
> राय
राज्य की भू-राजस्व माँग का सटीक संख्या में उल्लेख करते हुए अग्रिम रूप जारी की जाने वाली अनुसूची का नाम. शेरशाह द्वारा प्रारम्भ की गई व अकबर द्वारा अपनाई गई एवं संशोधित की गई भू-राजस्व निर्धारण की जब्त प्रणाली में 'राय' एक अनिवार्य अंश होती थी.
> हासिल
वास्तविक राजस्व संग्रहण या वास्तविक वसूला गया लगान. मुगलकाल में आकलित या निर्धारित भू-राजस्व (जमा) हमेशा वसूले गए राजस्व से अधिक होता था और ऐसा राजस्व के अधिक निर्धारण के कारण होता था. हुक्म-ए-हासिल शब्द का अर्थ होता – भूमि की वास्तविक उपज के अनुसार राजस्व का निर्धारण. था
> अष्ट प्रधान मण्डल
शिवाजी के समय मराठा मंत्रिपरिषद् का नाम था जिसमें आठ मंत्री थे— पेशवा अथवा मुख्य प्रधान (राज्य के सामान्य प्रशासन का प्रभारी), अमात्य अथवा मजमूआदार (वित्त मंत्री), सचिव (शाही पत्राचार प्रभारी), मंत्री ( गृह मंत्री या फारसी काकनीस), सेनापति (प्रमुख सेनानायक), पाण्डित राव (दान कार्यों एवं धार्मिक समस्याओं को देखने वाला), सुमंत (विदेश मंत्री), न्यायाधीश (मुख्य न्याय अधिकारी ).
> कुलकर्णी
गाँव का लिपिक तथा रिकार्ड कीपर, वह हमेशा ब्राह्मण जाति से ही चुना जाता था और पटेल के बाद दूसरा सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति होता था.
> घरखदार
केन्द्र सरकार द्वारा विभिन्न प्रान्तों अथवा बड़े मण्डलों में नियुक्त आठ आनुवांशिक अधिकारी. वे सीधे पेशवा के अधीन कार्य करते थे. ये अधिकारी थे— दीवान अथवा मामलतदार ( तहसीलदार) का सहायक, मजमूआदार, फड़नवीस, दफ्तरदार, पोटनीश, चिटनिस तथा सभासद.
> पटेल
गाँव का मुखिया, जिसके पास भू-राजस्व अधिकारी, दण्डाधिकारी तथा न्यायाधीश की समेकित शक्तियाँ होती थीं और जो गाँव तथा सरकारी कर्मचारियों के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाता था. उसे यह पद वंशानुगत प्राप्त होता था. उसकी परिलब्धियों में शामिल होता था – किराया रहित भूमि और प्रत्येक गाँव की उपज की एक निश्चित अंश की प्राप्ति.
> सरे अंजाम
सैन्य टुकड़ियों की देखरेख के लिए तथा सैन्य सेवा के लिए आनुवंशिक भू-अनुदान. राजाराम ने मराठों के पक्षधर व्यक्तियों को प्रसन्न करने के लिए सर अंजाम प्रणाली अपनाई थी. सरंजाम, मूल रूप से सिविल अथवा सैनिक सेवा के लिए भूमि अनुदान का ही नाम था. पेशवाओं के शासन काल में सरअंजाम प्रणाली ने आनुवंशिक रूप ले लिया. मराठा सरदार सरंजाम को पैतृक सम्पत्ति अथवा जागीर जैसी समझते थे जैसे कि वंशानुगत रूप से प्राप्त किया जाए और यहाँ तक कि उसका विभाजन भी हो सके.
> हुजूर दफ्तर
पूना में पेशवा का सचिवालय जो कि अनेक विभागों में विभाजित था, जिसके मुखिया होते थे-चलते दफ्तर (फड़नीश की देख-रेख में जो कि बजट अनुमान तैयार करता था तथा सभी लेखे जाँचता था) व एक वेरिज दफ्तर (जोकि सभी विभागों का वर्गीकृत लेखा रखता था) पेशवा बाजीराव द्वितीय के प्रशासन में हुजूर दफ्तर प्रभावहीन हो गया क्योंकि पेशवा ने सभी राज्यों के भूराजस्व निश्चित कर दिए थे.
● खिलजीवंशीय आर्थिक नीति : (अलाउद्दीन खिलजी)
• इसने एक आदेश निकालकर उस सारी भूमि को छीन लिया जो उससे पहले मिल्क, इनाम तथा वक्फ व पेंशन के रूप में दी गई थी.
• उसने राजपूत, चौधरी, मुकद्दमों की लगान सम्बन्धी सुविधाओं को रद्द कर दिया.
• इसने पैदावार का 50% वसूल किया और लगान नकद न लेकर उपज के रूप में ही वसूल किया.
• उसने पहली बार भू-राजस्व के क्षेत्र में पैमाइश के आधार पर राजस्व निर्धारित करने की नीति लागू की.
• उसने बकाया राजस्व वसूल करने के लिए 'मुस्तखराज' नामक अधिकारी की नियुक्ति की.
• उसने राजस्व विभाग में घूस व बेईमानी रोकने के लिए निम्न स्तर के अधिकारियों के वेतन में बढ़ोत्तरी की और कठोरतम दण्ड भी दिए.
• उसने पटवारियों के लेखों का निरीक्षण करना भी आरम्भ करवाया. 
• अलाउद्दीन ने आवास कर (घरई) व चराई कर (चरई) भी लागू किए.
● गयासुद्दीन तुगलक ( आर्थिक नीति)
• अलाउद्दीन ने जिन व्यक्तियों की जागीरें छीन ली थीं उन जागीरों को वापस लौटा दिया गया तथा उसने उदारता व कठोरता का समन्वय किया. 
• उसने अलाउद्दीन की 'पैमाइश' की पद्धति को त्याग दिया तथा 'बंटाई' के आधार पर ही लगान का निर्धारण किया.
• उसने खुशरव शाह द्वारा अनावश्यक रूप से वितरण किए गए दान को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया
• उसने अकाल के समय भूमि कर को माफ करने की भी व्यवस्था की. लगान अधिकारियों को कर मुक्त जागीरें दी गईं तथा हिन्दू लगान अधिकारियों को उनके पुराने अधिकार लौटा दिए गए.
• उसने अधिकारियों को आदेश दिए कि वे किसानों के साथ भलाई का व्यवहार करें.
• उसने सिंचाई कर के लिए नहरों का निर्माण करवाया. उसने लगान अधिकारियों की ईमानदारी पर बहुत बल दिया.
● मुहम्मद बिन तुगलक (आर्थिक नीति)
• इसने सर्वप्रथम सूबों की आय व्यय का एक रजिस्ट और सूबेदारों को नियमित रूप से अपने अधीन प्रदेश की आय व्यय का हिसाब भेजने का आदेश दिया.
• इसने 'आवास कर' व 'चरई कर' लागू किए जिसके लिए मकानों को रेखांकित किया गया तथा पशुओं को दागा गया.
• उसने दोआब में कर वृद्धि की तथा अकाल के समय किसानों को राजकोष से 'तकावी ऋण' दिए.
• उसने कृषि भूमि में वृद्धि करने के लिए 'दीवाने कोही' नामक विभाग की स्थापना की.
• उसने अलाउद्दीन की 'पैमाइश पद्धति' को ही अपनाया. 
● फिरोज तुगलक ( आर्थिक नीति)
• उसने जनसाधारण को दिए गए ऋण को माफ कर दिया जो लगभग दो करोड़ था.
• उसने समस्त भेंटों को फिर से वसूल करने की अस्वीकृति दे दी.
• उसने अधिकारी वर्ग का वेतन बढ़ा दिया तथा उनको दी जाने वाली यातनाओं को समाप्त कर दिया. उनकी जानकारी रखने वाले गुप्तचरों को भी हटा दिया.
• उसने उलेमा वर्ग को पुनः अनुदान दिए.
• उसने आय का निर्धारण करने के लिए 'हिसामुद्दीन जुनैद' को नियुक्त किया, जिसने राजस्व 6 करोड़ 75 लाख टका निर्धारित किया, उसने जमा निर्धारित करने में पैमाइश के स्थान पर अनुमान कर आधार बनाया.
• उसने सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण करवाया व सिंचाई कर (हाब-ए-शर्ब) लगाया.
• उसने भूमि को ठेके पर देने की प्रथा को विकसित किया तथा दिल्ली के आसपास 1200 फलों के बाग लगाए, जिससे राज्य को कर मिलता था.
● सल्तनतकाल का आर्थिक जीवन
सल्तनत काल में शहरों की संख्या और आकार में वृद्धि हुई. उद्योग उत्पादन में बढ़ोत्तरी और व्यापार का विकास हुआ. रहट का प्रयोग पानी सींचने के लिए किया जाता था तथा वस्त्र उद्योग में चरखे का प्रयोग होने लग गया था. रेशम के कीड़े पालने की प्रथा उस समय प्रचलित थी. बंगाल, बिहार, दोआब, मालवा, पंजाब तथा गुजरात में शहरों का विकास हुआ. सैनिक सामान, हथियार, वस्त्र आदि का निर्माण बड़े पैमाने पर होने लगा. इस समय में मुल्तान, लाहौर, देवल, समाना, थट्टा, दिपालपुर आदि व्यापारिक नगर थे. देवल सल्तनत काल का अन्तर्राष्ट्रीय बन्दरगाह था. अहमदाबाद में रेशमी कपड़ा बनाया जाता था, जिसे हालैण्ड भेजा जाता था. अहमदाबाद का 'पटोला' नामक कपड़ा फिलीपींस, बोर्नियो, जावा, सुमात्रा आदि देशों को भेजा जाता था. देवगिरि के व्यापारी रत्नों का व्यापार करते थे. बनारस में सोने-चाँदी तथा जरी का काम होता था, जल मार्ग के लिए सिन्धु नदी का मुख्यतः उपयोग होता था.
> आयात वस्तुएँ
घोड़े, अस्त्र-शस्त्र, दास, मेवे, फल, सोना, ऊँट, गुलाब जल, खजूर, सीसा आदि.
> निर्यात वस्तुएँ
लोहा व हथियार, सूती वस्त्र, अनाज, नील, जड़ी बूटियॉ व मसाले, फल, मोटी केसर, अफीम आदि.
विदेशी व्यापार ईरान, अरब, यूरोप, अफ्रीका, चीन, मलाया, अफगानिस्तान से होता था. चोल, गोआ, कालीकट, कोचीन उस समय के प्रसिद्ध बन्दरगाह थे. बारबोसा ने लिखा है कि उस समय बहमनी राज्य में कृषि, पशुपालन और फलों के बाग बहुत अच्छी स्थिति में थे. उस समय कृषि की अच्छी स्थिति थी. 
> आजीवक सम्प्रदाय
6 शताब्दी ई. पू. में आविर्भूत चिन्तन परम्परा थी जिसके संस्थापक मक्खलि गोशाल थे. इनकी शिक्षा का मूलाधार नियतिवाद है. मक्खलि गोशाल के अनुसार समस्त प्राणी नियति एवं भाग्य के अधीन है और उसी के अनुरूप सुख-दुःख भोगते हैं. न उनमें बल है और न ही पराक्रम तथा अपने प्रयासों से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं. मौर्य युग में इसके प्रचलन से स्पष्ट संकेत मिलते हैं. जहाँ अशोक ने आजीवन भिक्षुओं के लिए बराबर की पर्वत शृंखलाओं में गुहाओं का निर्माण करवाया. मौर्य शासक दशरथ स्वयं इसका अनुयायी था.
> मलिक अम्बर की भूमिका भू-राजस्व व्यवस्था
मुगलकाल में दक्षिण भारत और मुगलों में साम्राज्य विस्तार के लिए लम्बे समय तक संघर्ष चलता रहा. इस कारण दक्षिण के किसानों की दशा बहुत बिगड़ गई. उनकी दशा सुधारने का प्रथम उल्लेखनीय प्रयास अहमदनगर राज्य के सर्वेसर्वा तथा जहाँगीर के समकालीन मलिक अम्बर ने किया. उसे दक्षिण भारत का टोडरमल के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि जिस प्रकार उत्तर भारत में टोडरमल की व्यवस्था 'दहशाला' लोकप्रिय हुई. उसी भाँति दक्षिण में मलिक अम्बर की प्रणाली.
मलिक अम्बर की राजस्व व्यवस्था के दो मूल आधार थे ‘तनखा’ और ‘रकबा’ उसने अपने राज्य की समस्त भूमि की पैमाइश करवाई. हालांकि भूमि की नाप के लिए सभी जगह एक ही मापदण्ड का प्रयोग नहीं किया गया. भूमि की नाप के बाद भूमि को उपज के आधार पर वर्गीकृत किया गया तथा प्रत्येक वर्ग की भूमि की उपज का एक मोटा अनुमान लगा लिया गया और इसी आधार पर राजस्व का निर्धारण किया गया. मलिक अम्बर ने किसानों को नकद लगान देने हेतु प्रोत्साहित किया, लेकिन इसके लिए उसने किसानों को बाध्य नहीं किया, उसने अपने लगान को 2/5 (उपज का भाग) निश्चित किया परन्तु यदि कोई व्यक्ति नकद लगाम का भुगतान करना चाहे, तो उसे 1/3 ही देना पड़ता थो नकद लगान को मलिक अम्बर ने स्थायी कर दिया और यही लगान खेत का राज्य की दृष्टि से मूल्य स्वीकार कर लिया गया. लगान स्थिर करते समय पिछले वर्षों की उपज एवं बाजार भाव को भी ध्यान में रखा गया. क्षेत्रफल को भूमिकर स्थिर करने का आधार बनाने के कारण इसे 'रकबा प्रथा' कहते थे तथा नकद लगान को स्थिर करने के कारण इसे 'तनखा प्रथा' कहते थे.
मलिक अम्बर ने किसानों को सन्तुष्ट करने के लिए उन्हें भूमि का स्वामी मान लिया तथा उन्हें अपनी सम्पत्ति को अधिकाधिक लाभकारी बनाने के लिए पूरी छूट दी. यदि किसान अपने खेत की उपज को बढ़ाता तो सरकार उससे अतिरिक्त लगान वसूल नहीं करती थी, परन्तु यदि उसकी उपज कम होती तो सरकार छूट देकर उसके संकट को कम करने में सहायता देती थी.
किसानों को स्थानीय कर्मचारियों द्वारा होने वाले उत्पीड़न से निजात दिलाने के लिए मलिक अम्बर ने प्रयास किये. उसने वंशानुगत अधिकार सम्पन्न देशमुखों, पटेलों आदि को हटा दिया और उनके स्थान पर प्रत्येक गाँव से कर वसूलने का अधिकार स्थानीय ब्राह्मणों में से किसी एक को दे दिया. वह समझता था कि श्रेष्ठ चरित्र और सामाजिक सम्मान के कारण वे स्थानीय जनता का सम्मान प्राप्त कर सकेंगे और साथ ही राज्य के धन को भी समय से देते रहेंगे. इन ब्राह्मणों के साथ एक सुविचारित आधार पर समझौता किया गया. उनको गाँव के किसानों के नाम, उनकी भूमि का क्षेत्रफल तथा उनके लगान का विवरण दिया गया तथा इनको यह वायदा करना पड़ा कि वे उसी 'तनखा' के हिसाब से कर वसूल कर राजकोष में जमा कराएंगे. सारी वसूली का भार इन्हीं पर छोड़ दिया गया और इन्होंने पूरे गाँव के प्रतिनिधि की तरह सम्पूर्ण लगान देने का वचन दिया. इसके बदले में उन्हें वंशानुगत अधिकार दे दिया गया और उनको गाँव की भूमि का कुछ भाग इस शर्त पर दे दिया गया कि वे उसे किसी किसान द्वारा बटाई प्रथा के आधार पर जुतवाएँ. गाँव की गोचर भूमि की रक्षा और व्यवस्था का भार भी इन्हीं मुखियों के ऊपर छोड़ दिया गया और उनको आदेश दिया गया कि वे उस भूमि का उपयोग सभी किसानों को समान रूप से करने दें. यह व्यवस्था बहुत सफल सिद्ध हुई और अहमदनगर राज्य की आय में काफी वृद्धि हुई .
इस प्रकार उपर्युक्त विवेधन से स्पष्ट है कि मलिक अम्बर ने दक्षिण भारत में सर्वप्रथम एक व्यवस्थित लगान व्यवस्था की शुरूआत की तथा इससे किसानों को अत्यधिक लाभ हुआ और उनकी स्थिति में सुधार हुआ.
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Sun, 08 Oct 2023 10:51:17 +0530 Jaankari Rakho
इतिहास का क्षेत्र https://m.jaankarirakho.com/444 https://m.jaankarirakho.com/444 इतिहास का क्षेत्र

आदिकाल से आधुनिककाल तक इतिहास क्षेत्र का स्वरूप निरन्तर परिवर्तनशील रहा है. उसके विकसित स्वरूप का एकमात्र आधार विभिन्न युगों के सामाजिक मूल्य तथा उनकी सामाजिक आवश्यकताएँ रही हैं. इतिहास के क्षेत्र के अन्तर्गत जब इतिहासकार किसी घटना का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करता है तो उसके समक्ष तीन प्रमुख प्रश्न होते हैं—घटना क्या है, वह कैसी घटी तथा क्यों घटी ? इतिहास के क्षेत्र के अन्तर्गत मनुष्य के एक साधारण कार्य से लेकर उसकी विविध उपलब्धियों का वर्णन होता है.
यद्यपि प्रकृति का अध्ययन इतिहास - क्षेत्र के बाहर है, फिर भी इतिहास में प्रकृति की पूर्ण उपेक्षा नहीं है, क्योंकि वाल्श के अनुसार मनुष्य के कार्यों तथा उपलब्धियों पर प्रकृति अथवा प्राकृतिक घटनाओं का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है. अतः प्रकृति तथा भौगोलिक परिस्थितियों के परिवेश में ही मानवीय कार्यों एवं उपलब्धियों का अध्ययन इतिहास क्षेत्र के अन्तर्गत होना चाहिए.
आज का इतिहासकार इतिहास के किसी विशिष्ट विषय का विशिष्ट ज्ञान रखता है. वह अपने ज्ञान से सम्बन्धित सामाजिक-आर्थिक विषय का उत्तर देता है. इतिहास - क्षेत्र का यह वर्गीकरण वैज्ञानिक युग की ही देन है, परिणामस्वरूप इतिहास का विभाजन केवल प्राचीन मध्ययुगीन तथा आधुनिक काल में किया जाता है. इसके अन्तर्गत अनेक छोटी-से-छोटी शाखाओं पर शोध करके इतिहासकारों ने विशिष्ट ज्ञान प्राप्त किया है. इस प्रकार इतिहास का क्षेत्र निरन्तर विकसित होता जा रहा है.
> राजनीतिक इतिहास
राजनीतिक संस्थाएँ समाज का रंगमंच हैं, जहाँ महापुरुष अपने कार्यों को प्रदर्शित करते हैं. अशोक, अकबर, महात्मा गांधी, नेहरू आदि के कार्यों एवं उपलब्धियों का प्रदर्शन राजनीतिक रंगमंच पर ही हुआ है. इसमें प्रायः युद्ध, सन्धियों तथा क्रान्ति के नेतृत्व का विवरण मिलता है. इनमें तत्कालीन मानवीय समाज की इच्छा निहित रहती हैं तथा मानवीय कार्यों पर इसका व्यापक प्रभाव देखा गया है. अतीत सम्बन्धी महापुरुषों के कार्यों, उपलब्धियों, सफलताओं तथा असफलताओं से युगपुरुष शिक्षा ग्रहण करते हैं. प्रारम्भिक इतिहासकारों ने भी राजनीतिक इतिहास को ही महत्वपूर्ण समझकर इतिहास लेखन किया है. यह इतिहास की एक महत्वपूर्ण शाखा है.
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में इतिहासकारों ने अनुभव किया कि महापुरुषों की जीवनी के साथ सर्वसाधारण मानव समाज के योगदान का अध्ययन भी आवश्यक है, क्योंकि उनके सहयोग से ही महान् विभूतियों ने सफलता प्राप्त की है. अतः राजनैतिक इतिहास में उनके कार्यों का अध्ययन आवश्यक प्रतीत होता है. आधुनिक इतिहास में इसको सूक्ष्म इतिहास (Micro History) की संज्ञा दी गयी है.
> संवैधानिक इतिहास
इतिहासकारों (हैलम, कार्निवाल, लेविस, अर्सकीन, मैटलैण्ड) ने संवैधानिक इतिहास लिखकर इतिहास - क्षेत्र को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. इन विद्वानों ने इसके अध्ययन की आवश्यकता अनुभव की, क्योंकि इसने जनसामान्य को प्रभावित किया है. मनुस्मृति, हम्बुरावी कोड, ऑफ नेपोलियन, मैकाले आदि का इण्डियन पेनल कोड का प्रभाव जनसामान्य पर पड़ा है.
> आर्थिक इतिहास
इस इतिहास के क्षेत्र को महत्वपूर्ण बनाने में कोंदर से, कॉम्टे, बर्कले तथा कार्ल मार्क्स का सर्वाधिक योगदान रहा है. समाज के प्रारम्भ के साथ ही आर्थिक इतिहास का उदय होता है. समाज ने अपनी आजीविका के साधनों को किस प्रकार उत्पन्न किया, इसका ज्ञान आर्थिक इतिहास प्रदान करता है. इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति के बाद इसका महत्व अधिक बढ़ गया है. जी. एन. क्लार्क के अनुसार, “वर्तमान युग में आर्थिक इतिहास ने इतिहास के क्षेत्र के अन्तर्गत एक उच्च स्थान प्राप्त कर लिया है."
सर विलियम ऐश्ले के अनुसार, आर्थिक विचार स्वयंमेव ऐतिहासिक तथ्य होते हैं. आर्थिक इतिहास के क्षेत्र में मनुष्य के कार्यों को प्रभावित करने वाले विचार, समाज का उद्देश्य, विभिन्न सामाजिक वर्गों का पारस्परिक सम्बन्ध इतिहास का विषय होता है. इतिहासकारों का प्रयास यह देखना होता है कि आर्थिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप किस प्रकार सामाजिक सम्बन्धों तथा मानवीय व्यवहार में परिवर्तन होते रहे हैं. आजकल व्यावसायिक इतिहास का भी प्रचलन बढ़ता जा रहा है. पूँजीपतियों के विकास का भी इतिहास होता है. बैंकों का विकास भी इतिहास क्षेत्र के अन्तर्गत आता है.
इस प्रकार आर्थिक इतिहास के क्षेत्र के अन्तर्गत आजीविका के साधन, कृषि, यातायात के साधन, उद्योग, व्यापार, भू-राजस्व आदि विषयों का अध्ययन होता है.
इतिहास को अर्थपूर्ण बनाने के लिए यह आवश्यक है कि गणित तथा संख्यिकीय सिद्धान्तों का कम-से-कम प्रयोग किया जाये, वरना ये इतिहास को अरुचिकर बना देंगे.
> सामाजिक इतिहास
इतिहास का विकास व्यक्तियों तथा राष्ट्रों से नहीं, बल्कि विभिन्न युगीन समाजों से हुआ है. अतः इतिहास की आधारशिला समाज है. सामाजिक इतिहास को सर्वाधिक लोकप्रिय बनाने का श्रेय एकमात्र ट्रेवेलियन को है. उनका विचार इस सन्दर्भ में सर्वाधिक ग्राह्य है.
बीसवीं सदी के अधिकांश इतिहासकारों का ध्यान सामाजिक इतिहास ने आकृष्ट किया है. सामाजिक समस्याओं के प्रति चेतना ने इतिहास के क्षेत्र में क्रान्तिकारी रुचि पैदा कर दी है.
यद्यपि इसका अध्ययन रोचक है परन्तु इसकी निरन्तरता, मन्द गति तथा परिवर्तन का अध्ययन अत्यन्त ज़टिल है. भारतीय समाज का मूल स्वरूप आज भी वही है, जैसा कि गौतम बुद्ध तथा महावीर स्वामी के समय में था. समाज-सुधारकों ने इसके परिवर्तन (समाज-सुधार) के लिए अथक् प्रयास किये लेकिन फिर भी समाज में कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन नहीं आ पाया. अगर कुछ परिवर्तन आया भी है तो भूमिगत जलस्रोत की भाँति इसकी गति इतनी मन्द और अगोचर रही है कि इसका सूक्ष्म निरूपण कठिन प्रतीत होता है फिर भी इस इतिहास क्षेत्र के अन्तर्गत इसके निरूपण का प्रयास किया गया है.
> राजनयिक इतिहास
19वीं सदी के प्रारम्भ में इतिहासकारों ने इस क्षेत्र के अन्तर्गत इतिहास लेखन की आवश्यकता अनुभव की. इसमें राष्ट्रों के पारस्परिक सम्बन्धों का विवरण रहता है. इस क्षेत्र का अध्ययन आलोचनात्मक विधि से किया जाना चाहिए.
> सांस्कृतिक इतिहास
ये सामाजिक इतिहास का अभिन्न अंग है. इसके अन्त र्गत रीति-रिवाज, संस्कार, आमोद-प्रमोद, शिक्षण- साहित्य, वास्तुकला, चित्रकला, संगीत साधन आदि का विवरण रहता है. इसके अध्ययन को सरल बानने के लिए इतिहासकारों ने इसे प्राचीन, मध्ययुगीन तथा आधुनिक काल में विभक्त किया है.
> धार्मिक इतिहास
इतिहास का यह अत्यन्त रोचक विषय है जिसकी इतिहासकारों ने धार्मिक भावनाओं से प्रेरित होकर अधिकाधिक चर्चा की है. ये इतिहास विभिन्न युगों में लिखा गया है.
> औपनिवेशिक इतिहास
औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् यूरोप के राष्ट्रों ने कच्चे माल की प्राप्ति के लिए एशिया, अफ्रीका, दक्षिणी व उत्तरी अमेरिका में अपने उपनिवेश स्थापित किये. इनमें प्रतिस्पर्धा भी हुई जिससे अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति तनावपूर्ण हो गई और कई बार युद्ध की स्थिति भी उत्पन्न हो गई. इन समस्याओं ने इतिहासकारों का ध्यान आकृष्ट किया और औपनिवेशिक इतिहास लेखन ने इतिहास - क्षेत्र के अन्तर्गत एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया.
> संसदीय इतिहास
फासीवाद तथा साम्यवाद के प्रतिरोध में अनेक इतिहासकारों ने संसदीय व्यवस्था की उपादेयता को सिद्ध करने के लिए संसदीय इतिहास लिखना प्रारम्भ किया. इन्होंने विश्वव्यापी मानवीय समाज के कल्याण के लिए संसदीयव्यवस्था की उपादेयता को सिद्ध किया है.
> सैनिक इतिहास
अनेक राज्यों के उत्थान तथा पतन के पीछे सैनिक कारण निर्णायक रहे हैं. इसके अन्तर्गत वायुसेना, स्थलसेना व जलसेना के लिए अस्त्र-शस्त्र का निर्माण और उसके प्रयोग का अध्ययन किया जाता है.
> विचारों का इतिहास
डेवी व कालिंगवुड ने समस्त इतिहास को विचार का इतिहास स्वीकार किया है, क्योंकि मानवीय कार्यों का यह उद्गम स्थल है और मनुष्य को कार्य करने के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित तथा बाध्य करता है, परिणामस्वरूप समस्त इतिहास विचार - प्रधान होता है.
> इतिहास - दर्शन
इतिहास-दर्शन के दो स्वरूप हैं— आलोचनात्मक इतिहास-दर्शन एवं चिन्तन-शक्ति इतिहास-दर्शन. आलोचनात्मक इतिहास-दर्शन विश्लेषणात्मक चिन्तन-शक्ति इतिहास दर्शन औपचारिक तथा अर्थवादी है. पहले का उद्देश्य इतिहास विज्ञान का विश्लेषण तथा तार्किक खोज है. दूसरे चिन्तन शक्ति इतिहास - दर्शन की दिशा इतिहास की घटनाओं में विशेष महत्त्वपूर्ण अर्थ का अन्वेषण होता है.
निष्कर्ष – इन विभाजनों का कोई अन्तिम स्वरूप नहीं है, इतिहास का कालिक विभाजन यद्यपि महत्वपूर्ण है, परन्तु इतिहासकारों को विशिष्ट दक्षता के परिवेश में अपने को बन्दी नहीं बनाना चाहिए. रेनियर ने स्पष्ट लिखा है कि "किसी क्षेत्र की ऐतिहासिक दक्षता इतिहास का शत्रु है."
इतिहास की विशिष्ट दक्षता के साथ-साथ सामान्य इतिहास का अध्ययन तथा लेखन करना चाहिए. वर्तमान समाज इतिहासकारों से यही अपेक्षा करता है.
> विषयवस्तु
प्रारम्भिक इतिहासकारों ने घटना मात्र को ही इतिहास की विषयवस्तु माना है. पुनर्जागरण आन्दोलन के पश्चात् इतिहास की विषयवस्तु का स्वरूप विस्तृत होता गया. निरन्तर परिवर्तित स्वरूप का एकमात्र कारण सामाजिक मान्यताओं तथा मूल्यों में परिवर्तन रहा है लेकिन जब इतिहासकारों ने घटना का सम्बन्ध मानवीय मस्तिष्क के साथ किया तो इतिहास दर्शन का गूढ़ विषय बन गया.
प्रमुख रूप से इतिहास विषयवस्तु के सम्बन्ध में दार्शनिक तथा व्यावसायिक अवधारणाएँ हैं.
> इतिहास विषयवस्तु की दार्शनिक अवधारणा
कालिगवुड ने इतिहस की विषयवस्तु उसे (विचार प्रक्रिया) माना है. जिसकी पुनरानुभूति इतिहासकार के मस्तिष्क में हो सके. इनका मानना है कि ऐतिहासिक चिन्तन अनुभव तथा चेतना नहीं, बल्कि प्रतिबिम्बित विचार होता है. इस प्रकार प्रतिबिम्बित विचार ही इतिहस का विषयवस्तु होता है. इसके अलावा प्रत्येक परावर्तित क्रिया उद्देश्यपूर्ण होती है. इसी को इतिहास का विषयवस्तु कह सकते हैं..
हीगल के अनुसार इतिहास का विषयवस्तु समाज तथा राज्य है.
इस प्रकार इतिहासकार विषयवस्तु की गवेषणा में प्रत्येक घटना के बाह्य तथा आन्तरिक स्वरूप की विवेचना करता है. बाह्य स्वरूप के अन्तर्गत शारीरिक गतिविधियों का व आन्तरिक स्वरूप में विचार का अध्ययन होता है. इतिहासकार कार्यों के परिवेश में विचार को समझता है, क्योंकि सभी इतिहास विचारों का इतिहास होते हैं.
> इतिहास विषयवस्तु सम्बन्धी इतिहासकारों का दृष्टिकोण
इनसे भिन्न इतिहासकार प्रत्येक युग की सामाजिक आवश्यकतानुसार विषयवस्तु का निश्चय करता है. रेनियर ने इसकी विषयवस्तु को अतीत सम्बन्धी कहानी का प्रस्तुतीकरण माना है तो पिरेन ने इसे समाज में रहने वाले मनुष्यों के कार्यों व उपलब्धियों की कहानी, रोड्स ने इसे समाज के सभी पक्षों का वर्णन माना है.
उन्नीसवीं सदी के इतिहासकारों ने इसे मनोविनोद का साधन माना तो बीसवीं सदी के इतिहासकारों ने इसके आलोचनात्मक व वैज्ञानिक विधाओं के अनुसार प्रस्तुतीकरण पर जोर दिया.
यही कारण है कि इतिहास की विषयवस्तु के स्वरूप में निरन्तर परिवर्तन होता रहा है. इसका स्वरूप सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार निरन्तर विस्तृत होता जा रहा है.
अन्त में हम कह सकते हैं कि इतिहास की विषयवस्तु युग तथा सामाजिक आवश्यकताओं की देन होती है. इसका स्वरूप युग रुचि तथा समसामयिक सामाजिक आवश्यकता के. अनुसार परिवर्तित होता रहेगा.
> इतिहास का उपयोग व अनुप्रयोग
किसी भी विषय का उपयोग तथा दुरुपयोग उसके कार्यान्वयन पर निर्भर करता है. इतिहास मानव समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी है मगर जब महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों ने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए इसका दुरुपयोग किया तो यह अनुपयोगी सिद्ध हुआ.
> उपयोग
प्रो. शेक अली ने कहा है – इतिहास की उपेक्षा करने वाले राष्ट्र का कोई भविष्य नहीं होता. अतः एक राष्ट्र के उत्थान व विकास के लिए इतिहास का अध्ययन आवश्यक है.
(1) शिक्षाप्रद – सामान्यीकरण के आधार पर इतिहास शिक्षाप्रद होता है. यही कारण है, इतिहास में अशोक, अकबर, गांधी तथा नेहरू का अध्ययन किया जाता है. इसीलिए बेकन ने कहा है कि इतिहास मनुष्य को विवेकपूर्ण बनाता है. इस प्रकार इतिहास इस दृष्टि से हमारे लिए शिक्षाप्रद है कि हम अतीत के उदाहरणों द्वारा विवेक प्राप्त कर वर्तमान में हमारी इच्छाओं व कार्यों का मार्गदर्शन कर सकें.
(2) मानवीय समाज में उपयोगिता – इतिहास हमें मानवीय क्रमिक समाज का ज्ञान प्रदान करता है. समाज के स्वरूप, विकास, विचारधाराओं का पारस्परिक संघर्ष, मानवीय स्वभाव तथा मानव प्रगति का विवरण इतिहास में मिलता है.
(3) व्यावसायिक उपयोगिता – इस दृष्टिकोण से भी इतिहास की अपनी उपादेयता है क्योंकि इसके माध्यम ही प्रशासक व अन्य सामाजिक तथा मानवीय समस्याओं को समझने में सहायता मिलती है.
(4) परराष्ट्रीय सेवायें – परराष्ट्र (विदेश) मन्त्रालय के सचिवों, उच्चाधिकारियों एवं परराष्ट्र मन्त्री के लिए इतिहास का ज्ञान आवश्यक है. अनेक ऐसे मन्त्रियों या राजदूतों का नाम गिनाया जा सकता है जिनको ऐतिहासिक ज्ञान के अभाव के कारण कूटनीतिक विफलता का सामना करना पड़ा.
(5) मनोरंजन की उपयोगिता — डेविड ह्यूम के अनुसार यह उपन्यास से भी अधिक रोचक है. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के पूर्व इतिहास साहित्य की शाखा रहा है. पाठक इसके द्वारा आनन्द प्राप्त करता है. अतः
(6) शैक्षणिक उपयोगिता - इतिहास सभी विषयों में एकता स्थापित करने का एक सारांशयुक्त विषय है, यह मनुष्य को बुद्धिमान, परिपक्व तथा अनुभवी बनाने वाला अत्यन्त उपयोगी विषय है.
> इतिहास का दुरुपयोग ( अनुपयोग )
कोई वस्तु स्वयंमेव अनुपयोगी नहीं होती. सब कुछ मनुष्य के कार्यान्वयन पर निर्भर करता है. इतिहास की उपयोगिता सर्वमान्य है लेकिन जब महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों ने इसका अपने स्वार्थ के लिए दुरुपयोग किया यह अनुपयोगी हो गया. इतिहास की अनेक घटनाएँ इसको प्रमाणित भी करती हैं. उदाहरणार्थ – भारत व पाकिस्तान की शत्रुता को सदैव जीवित रखने का कारण इतिहास का दुरुपयोग ही रहा है.
हम कह सकते हैं कि इतिहास की उपयोगिता असंदिग्ध है, लेकिन महत्त्वाकांक्षी व्यक्तियों ने उसका दुरुपयोग कर इसे मानव समाज के लिए अनुपयोगी बना दिया है, परन्तु अपने इतिहास को भुलाने वाले राष्ट्र का कोई भविष्य नहीं होता.
इतिहास में वस्तुनिष्ठता (Objectivity in History)
विज्ञान ने मानव जाति के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में परिवर्तन कर शिक्षित समाज के धार्मिक एवं अन्तरिक्ष सम्बन्धी दृष्टिकोण में क्रान्तिकारी परिवर्तन किया है. भौतिक विज्ञान की आश्चर्यजनक उपलब्धियों ने अर्द्ध-शताब्दी पूर्व अनेक इतिहासकारों को विचार-विमर्श के लिए बाध्य किया है. अन्य विधियों का परित्याग कर इतिहास को वैज्ञानिक उपादानों से बहिष्कृत किया जाये और उसके अध्ययन में वैज्ञानिक विधियों तथा आदर्शों का प्रयोग किया जाय, जिससे निश्चय ही इतिहास की उपयोगिता एवं महत्त्व में वृद्धि होगी.
इस प्रकार आधुनिक विज्ञान की आश्चर्यजनक उपलब्धियों ने इतिहासकारों को विवश कर दिया कि वे इतिहास को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने के विषय में सोचें. बीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों के बीच इस गम्भीर समस्या पर तर्क-वितर्क प्रारम्भ हुआ. यूरोप के अधिकांश देशों विशेषकर जर्मनी के इतिहासकारों का ध्यान इस समस्या की ओर आकृष्ट हुआ. इंग्लैण्ड के सर्वप्रथम प्रोफेसर जे. वी. व्यूरी ने 1903 ई में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सत्रारम्भ के अवसर पर अपने अभिभाषण में कहा था कि “इतिहास विज्ञान है न कम और न अधिक. इसका कारण बताते हुए उन्होंने पुनः कहा था कि “जब तक इतिहास को कला स्वीकार किया जायेगा तब तक इसमें यथार्थता तथा सूक्ष्मता का समावेश गम्भीरतापूर्वक नहीं हो सकेगा.” 
> वस्तुनिष्ठता का स्वरूप
वस्तुनिष्ठता किसी भी घटना - पूर्व इतिहास का वास्तविक एवं सत्य वर्णन है. इसका इतिहास की व्याख्या में प्रमुख स्थान माना जाता है क्योंकि वस्तुनिष्ठा के अभाव में कोई भी ऐतिहासिक घटना विश्वसनीय नहीं कही जा सकती है. घटना का वस्तुनिष्ठ वर्णन अनिवार्य है.
इतिहासकार प्रथम प्रकार के तथ्यों का आकलन करें, फिर स्वयं उसका शोध द्वारा वास्तविक अर्थ व स्वरूप ज्ञात करें तो वे अपने तथ्यों के ऐतिहासिक वर्णन में वस्तुनिष्ठता ला सकते हैं.
> ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता में बाधक तत्व
व्यक्तिगत ईर्ष्या, द्वेष वस्तुनिष्ठता का प्रथम बाधक तत्व होता है. अतीतकालीन घटनाओं का वर्णन एक इतिहासकार द्वेष, ईर्ष्या आदि दृष्टि विशेष से लिखता है. उसे सत्य मान लिया जाये तो उसका निष्कर्ष कदापि वस्तुनिष्ठता नहीं हो सकता. कार्ल मार्क्स, ए. जे. टॉयनबी व स्वेगलर आदि विद्वानों ने व्यक्तिगत दृष्टिकोण के आधार पर इतिहास की घटनाओं की व्याख्या की है.
आर्थिक विचारक कार्ल मार्क्स लिखते हैं कि “इतिहासकार एक सामाजिक प्राणी है, जिस पर धार्मिक वातावरण और समाज के संस्कार प्रभाव डालते हैं जिनसे वह पृथक् नहीं रह सकता है. इसलिए इतिहास को विज्ञान मानने वाले इतिहासकारों को समाज से बाहर रहकर ही ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता ढूँढ़नी चाहिए." मार्क्स के इस दृष्टिकोण से यह स्पष्ट होता है कि ईसाई, मुसलमान, हिन्दू, पारसी, फ्रांसीसी तथा अमरीकन आदि इतिहासकार इसी कारण ऐतिहासिक घटनाओं पर परस्पर तीव्र मतभेद रखते हैं. ब्रिटिश इतिहासकार विश्व में आधुनिक युग का प्रारम्भ 1688 ई. की गौरवपूर्ण क्रान्ति को मानते हैं, जो अमेरिकन स्वतन्त्रता संघर्ष के बाद यानि कि 1784 ई. से प्रारम्भ होना मानते हैं. इसी प्रकार फ्रांसीसी इतिहासकार 1789 ई. की फ्रांसीसी राजक्रान्ति से मानते हैं.
इसी प्रकार इन इतिहासकारों के अलग-अलग विचार होने के कारण ही इतिहास में ऐतिहासिक एकनिष्ठा तथा वस्तुनिष्ठता में बाधा उत्पन्न होती है, जबकि इतिहासकारों का तथ्यात्मक साम्यहीन ऐतिहासिक विवरण वास्तविक और तथ्यों के आधार पर समान वर्णन नहीं कहा जा सकता.
इस दृष्टि से ऐतिहासिक व्याख्या में वस्तुनिष्ठता का सामान्यतः अभाव रहता है, क्योंकि जो भी इतिहास लिखा गया है अथवा लिखा जाता है, उसमें केवल तथ्यों के आधार पर ही व्याख्या नहीं होती, बल्कि इतिहासकार की व्यक्तिगत धारणा उसको शोधपूर्ण विचार और ज्ञान के आधार पर भी वर्णन तथ्यों के अलावा लिखा जाता है. इतिहास में इस प्रकार का ऐतिहासिक वर्णन एवं ऐतिहासिक व्याख्या वस्तुपूरक नहीं मानी जाती.
वस्तुनिष्ठता किसी भी ज्ञान का वह स्वरूप है जो केवल तथ्यों में दी गई जानकारी और विषय सामग्री के आधार पर इतिहासकार के द्वारा उस सम्बन्धित घटना का वर्णन किया जाये जिसमें कि इतिहासकारों की व्यक्तिगत विचारधारा का अभाव हो, ऐसी विचारधारा ही वस्तुनिष्ठ विचारधारा मानी जाती है.
> वस्तुनिष्ठता का अर्थ
वस्तुनिष्ठता का साधारण शब्दों में यह अर्थ माना जाता है कि किसी भी घटना और विषय का उससे सम्बन्धित तथ्यों का जिससे इतिहास सम्बन्धी जानकारी प्रदान की गई है और उसका इतिहासकार के द्वारा यथास्थिति और यथार्थपूर्ण वर्णन किया जाता है, वस्तुनिष्ठता कहलाता है. इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने मत व्यक्त किये हैं.
ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता के बारे में प्रो. गैरो ने लिखा है कि "वस्तुनिष्ठता का अर्थ बिना व्यक्तिगत पक्षपातपूर्ण पूर्वाग्रह के ऐतिहासिक तथ्यों का प्रयोग करना है." अर्थात् इतिहासकार का मानना है कि जिस घटना का वर्णन तथ्यों के आधार पर किया जाय वह वर्णन इतिहासकार के व्यक्तिगत विचार और अनुमान रहित होना चाहिए.
इतिहास का स्वरूप प्रत्येक युग में बदलता रहता है और वह परिवर्तन ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता में बाधक हो जाता है. अतीत की घटनाओं पर प्रत्येक इतिहासकार समान रूप से समान मत प्रकट नहीं कर पाते हैं.
इतिहासकार अपने युग की आवश्यकतानुसार सोचता है व लिखता है; जैसे— दास प्रथा और साम्राज्यवाद इसका प्राचीन और मध्यकाल में समय की आवश्यकता माना जाता था, किन्तु वर्तमान काल के बदलते परिवेश में इसे समाज का अभिशाप माना जाता है. इस सामाजिक वातावरण में आई जागृति भी इतिहास-लेखन में ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता के लिए अवरोध बन गयी है. 
जनश्रुतियों अथवा किंवदन्तियों को भी प्राचीनकाल के समाज व इतिहास में एक ऐतिहासिक तथ्य स्वीकार किया गया था, किन्तु आज उन्हें अनैतिहासिक कहकर उपेक्षित किया जाता है. इसी प्रकार वर्तमान ऐतिहासिक तथ्य एवं प्रमाण भविष्य में अमान्य हो सकते हैं; जैसे–सिंहासन बत्तीसी, बेताल की कथाएँ आदि प्राचीन समय में ऐतिहासिक सत्य मानी जाती थीं, किन्तु धीरे-धीरे इनका महत्त्व घटने के कारण वर्तमान में इन्हें एक कपोल कल्पित शिक्षाप्रद कहानियाँ माना जाता है. ऐसी परिस्थितियों में इतिहास में वस्तुनिष्ठता लाना सम्भव नहीं हो पाता है.
मैडल धाम और कार्ल मार्क्स आदि इतिहासकारों के अनुसार वर्तमान में सामाजिक आवश्यकता, व्यक्तिगत रुचि और आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर ही इतिहासकार ऐतिहासिक तथ्यों का चुनाव करते हैं, ऐसी परिस्थिति में उनसे वस्तुनिष्ठता की अपेक्षा नहीं की जा सकती. जैसे कि इतिहासकार फारुकी ने सम्राट् औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीति की प्रशंसा की है तो सर जदुनाथ सरकार ने नहीं.
तथ्यों के चयन हेतु प्राप्त इस प्रकार का अधिकार भी वस्तुनिष्ठता में बाधक होता है और इतिहास में व्यक्तिगत भावनाओं को प्रधानता देने का तात्पर्य ऐतिहासिक तथ्यों की उपेक्षा करना है. इससे इतिहासकार अपनी भावनाओं के अनुकूल इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने का प्रयास करता है.
जैसा कि इतिहास पुनर्रचना प्रत्येक युग की सामाजिक आवश्यकता होती है और इतिहास की निरन्तर पुनर्रचना इस आवश्यकता का परिणाम है. प्रो. पी. गार्डनर लिखते हैं कि सामाजिक आवश्यकता का कोई मापदण्ड नहीं होता है. इसलिए एक ही ऐतिहासिक तथ्य की उपयोगिता तथा अनुपयोगिता विभिन्न युगों में बदलती रहती है. मानव-जीवन की रुचियाँ तथा निहित स्वार्थ का स्वरूप भी प्रत्येक युग में बदलता रहता है. ऐसी स्थिति में उसमें समता तथा एकता की आशा करना एक महान् भूल है. इस प्रकार एक युग का इतिहास दूसरे युग से भिन्न होता है क्योंकि युग के समाज की आवश्यकताएँ इतिहासकार के लेखन पर प्रभाव डालती है, जिससे इतिहास में विभिन्नता होना अवश्यम्भावी है.
नेपोलियन बोनापार्ट की साम्राज्यवादी नीति का विरोध यूरोप के विकसित होते राष्ट्रवाद ने किया.
इटली और जर्मनी का एकीकरण राष्ट्रवाद का ही परिणाम है परन्तु 20वीं शताब्दी में उग्र राष्ट्रवाद प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध का कारण बना. अतः इटली के प्रमुख इतिहासकार क्रोचे और ब्रिटेन के प्रोफेसर ई. एच. कार ने भी इतिहास लेखन में समसामयिक समाज की आवश्यकताओं के प्रभाव को प्रमुख माना है, जो ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता को ही बाधा देती है.
प्रोफेसर सीलर 'Our human truth' में ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता को एक परिकल्पना और एक जटिल समस्या मानते हैं क्योंकि इतिहास लेखन एक अन्तर्चेतना का विषय है, जिस पर व्यक्तिगत भावनाओं का प्रभाव अवश्य पड़ता है.
इस प्रकार इतिहास के लेखन को समसामयिक समाज, संस्कृति और वातावरण प्रभावित करते हैं. उसकी रचना में युग की अभिव्यक्ति स्वतः ही हो जाती है, उस समाज की संस्कृति ही उसके दृष्टिकोण को निर्धारित कर उसके लेखन में उसकी सहायता करती है.
टेवलियन जैसे विद्वान् इतिहासकार प्रेम और सहानुभूति जैसी मानवीय प्रवृत्तियों को स्वाभाविक मानते हैं, क्योंकि वह अपनी तथा अपने समाज की रुचियों के सन्दर्भ में अतीत के कार्यों व उपलब्धियों का दर्शन करता है. इसलिए इसका प्रस्तुतीकरण विषयनिष्ठ होता है, वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकता है.
इतिहास का स्वरूप रचनात्मक होता है, जो ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता की समस्या है. एक इतिहासकार अतीत की सम्पूर्ण व्याख्या नहीं कर सकता. वह अतीत के किसी एक पक्ष का चयन कर उसकी व्याख्या करता है. चयन का यह अधिकार ही उसे पूर्वाग्रही बना देता है. इसी कारण से इतिहासकार एक ही घटना का अलग-अलग ढंग से वर्णन करते हैं.
पूर्वाग्रह के कारण ही इतिहासकार अपने मत को पुष्ट करने के लिए अधिक-से-अधिक तथ्यों को जुटाते हैं, जो ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता के लिए बाधा है.
ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता में धर्म और जाति जैसे तत्व भी कठिनाई उत्पन्न करते हैं. इतिहासकार धार्मिक तथा जातीय आग्रहों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता तथा वह तथ्यों को तोड़-मरोड़ देता है. यह मतभेद हमें प्रोटेस्टेंट व कैथोलिक, अरब तथा यहूदी इतिहासकारों में स्पष्ट दिखाई देता है.
ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता में विभिन्न राजनैतिक दलों के सिद्धान्त भी अड़चन उत्पन्न करते हैं. इतिहासकार मार्क्सवाद, उदारवाद, पूँजीवाद, प्रजाजन्त्रवाद, राजतन्त्रवाद आदि सिद्धान्तों से प्रभावित होता है.
> ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता में सहायक तत्व
यद्यपि, वस्तुनिष्ठता इतिहास में एक जटिल प्रश्न है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि इतिहास का स्वरूप वस्तुनिष्ठ हो ही नहीं सकता. इतिहास सम्बन्धी आचार और अनुशासन आदि इतिहास में वस्तुनिष्ठता को सम्भव बना सकते हैं.
प्रो. बटर फिल्ड का कहना है कि इतिहास में वस्तुनिष्ठता के समावेश के लिए पहले सामान्य इतिहास आदि शोधपूर्ण इतिहास के अन्तर को समझना चाहिए, सामान्य इतिहास साश्रित होता है, जिसे वह पक्षपातपूर्ण भावना से नहीं लिखता. अतः सामान्य इतिहास वस्तुनिष्ठ हो सकता है.
ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता के लिए यह आवश्यक है कि उन इतिहासकारों की निन्दा की जाये, जो तथ्यों को तोड़मरोड़कर इतिहास को अपने विचारों का प्रचार-प्रसार बनाना चाहते हैं.
ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता के लिए यह आवश्यक है कि इतिहासकार धार्मिक प्रभावों से दूर रहें क्योंकि वह समाज का प्रतिनिधि होता है. इसलिए उसे किसी समुदाय अथवा धर्म से प्रभावित समाज के छोटे वर्ग की संकीर्णताओं में नहीं पड़ना चाहिए.
> इतिहास में पक्षपात
1941 ई. में Historical Association के समक्ष भाषण देते हुए डॉ. क्रिटसन क्लार्क ने कहा था कि वे सदैव पक्षपात तथा निष्पक्षता के बीच मध्यम मार्ग का अनुसरण करते हैं. उनका प्रयास विवादग्रस्त विषयों से अपने को दूर रखना है.
वर्तमान इतिहास लेखन में पक्षपात सर्वव्यापी है. बटरफील्ड के अनुसार सत्य है कि इतिहास में निष्पक्षता असम्भव है और इसकी प्राप्ति का दावा करना एक महानतम् भ्रान्ति है. किसी भी इतिहासकार द्वारा निष्पक्षता का दावा करना भूल है. इतिहास लेखन का प्रथम चरण विषय का चयन होता है. इतिहासकार का पक्षपात तो उसी समय स्पष्ट हो जाता है, जब वह अपनी रुचि तथा दृष्टिकोण के अनुसार विषय का चयन करता है. विषय के चयन के पश्चात् वह अपनी रुचि के अनुसार तथ्यों का चयन प्रारम्भ करता है. इस परिस्थिति में इतिहासकार से निष्पक्षता की आशा करना व्यर्थ है.
तथ्यों के चयन के सम्बन्ध में ई. एच. कार ने स्पष्ट लिखा है कि “ऐतिहासिक तथ्य मछली वाले की शिलापट्टी पर विभिन्न मछलियों की तरह होते हैं. इतिहासकार मछली रूपी ऐतिहासिक तथ्य अपनी रुचि के अनुसार खरीदता है. उसे घर लाकर अपनी इच्छा के अनुसार व्याख्या के मसाले में पकाकर उसका रसास्वादन करता है."
इस प्रकार व्यक्तिगत रुचि को इतिहास लेखन में प्रधानता देने का अभिप्राय पक्षपात का प्रतिरोपण करना है. ब्रिटिश तथा अमरीकन इतिहासकारों में समानता होते हुए भी अमेरिका के स्वतन्त्रता संग्राम सम्बन्धी तथ्यों के संकलन में दोनों देशों के इतिहासकारों ने अपने-अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण तथा व्यक्तिगत रुचि को प्रधानता दी है.
> इतिहास में पक्षपात के प्रमुख कारण
1. प्रत्येक इतिहासकार अपने समाज की उपज होता है. सामाजिक वातावरण का प्रभाव उसके मस्तिष्क पर जाता है. उसी के अनुरूप वह सोचता है तथा कार्य करता है. रेनियर का अभिमत है कि इतिहासकार अपने युग के व्यक्तियों को सम्बोधित करता है, जिसका वह स्वयं सदस्य होता है. यही नहीं उसकी कृतियों में समय तथा समाज की अभिव्यक्ति स्वयं होती है.
2. धर्म इतिहासकार की निष्पक्षता में बाधक होता है. हिन्दूमुस्लिम इतिहासकार, अरब-यहूदी इतिहासकार के लिए मतैक्य होना कठिन है क्योंकि धार्मिक दृष्टिकोण से वे एक-दूसरे को अपना शत्रु मानते हैं. अरब तथा यहूदी इतिहासकार किसी भी अप्रिय घटना के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं. इसका प्रमुख कारण उनमें द्वेषभाव है.
3. प्रो. ओकशाट के अनुसार, इतिहास लेखन इतिहासकार के पूर्वाग्रही विचारों का परिणाम होता है. प्रो. वाल्स ने भी स्पष्ट कहा है कि ऐतिहासिक तथ्यों का स्वरूप चयनात्मक होता है. इस प्रकार के चयन में इतिहासकार की व्यक्तिगत अभिरुचि निर्णायक होती है.
4. हाल्फेन ने पक्षपात की उपादेयता को सिद्ध किया है. यह इतिहासकार की सीमाओं का ज्ञान प्रदान करता है. बदायूँनी द्वारा अकबर की आलोचना पक्षपातपूर्ण है. इस प्रकार विद्यार्थियों को अवगत कराने के लिए इतिहासकार के पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से भी एक लाभ है. यह इतिहासकार की सीमाओं का ज्ञान प्रदान करता है.
5. मनुष्य सामाजिक प्राणी है इतिहासकार का सम्बन्ध विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं से रहता है, जैसेमार्क्सवादी, लिबरल, कैथोलिक, प्रोटेस्टेण्ट, पूँजीवादी, साम्यवादी, प्रजातन्त्रवादी, राजतन्त्रवादी इत्यादि.
6. जी. आर. एल्टन के अनुसार इतिहास मात्र घटना नहीं है, अपितु इतिहासकार जिसे लिखता है, उसी को इतिहास कहते हैं. मात्र तथ्यों का संकलन इतिहास को विश्वकोष बना देगा, इसलिए सर सी. पी. स्कॉट ने कहा है कि इतिहास में तथ्य प्रधान नहीं होता, बल्कि व्याख्या प्रधान होती है.
7. कुछ ऐतिहासिक घटनाएँ इतिहासकारों को पक्षपातपूर्ण ॐ दृष्टिकोण अपनाने के लिए विवश करती हैं. इनसे पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण को प्रोत्साहन मिलता है.
8. अन्त में द्वेष तथा निष्पक्षता के विषय में कहा जा सकता है कि इतिहास लेखन में निष्पक्षता का प्रतिरोपण एक कठिन समस्या है. बटरफील्ड का कथन यथार्थ
प्रतीत होता है कि "यह सत्य है कि इतिहास में निष्पक्षता असम्भव है और इसकी प्राप्ति का दावा करना तो एक महानतम् भ्रान्ति है."
> इतिहास में निष्पक्षता की अपेक्षा
1. इतिहासकार अतीत की घटनाओं का निष्पक्ष निर्णय देने वाला व्यक्ति होता है. यदि उसका निर्णय पक्षपातपूर्ण अथवा द्वेषपूर्ण होता है, तो ऐसे इतिहासकारों की •सार्वभौमिक निन्दा होनी चाहिए. इतिहासकार में द्वेष तथा पक्षपात की भावना उस समय आती है, जब वह भ्रमवश अपने को न्यायाधीश समझ लेता है.
2. सर सी. पी. स्कॉट ने लिखा है कि इतिहास में तथ्य कुछ नहीं होते, बल्कि व्याख्या ही सब कुछ होती है. इतिहास को व्याख्या प्रधान बनाने का अभिप्राय तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना है. तथ्यों को स्वयं बोलने का अवसर देना चाहिये. उसे व्याख्या में गलत बोलने के लिए विवश नहीं करना चाहिए.
3. जी. पी. गूच का कथन है कि इतिहास के मुद्रित पृष्ठों में इतिहासकारों के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होती है. इतिहास लेखन में व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति उचित नहीं है, क्योंकि इतिहास काल्पनिक उपन्यास नहीं, अपितु तथ्य तथा साक्ष्यों पर आधारित रचना है.
4. इतिहास का अपना अनुशासन, नियम तथा सिद्धान्त होता है. इन नियमों, सिद्धान्तों तथा अनुशासन में आस्थागत इतिहासकार को ही इतिहास लेखन का चयन करना चाहिये. इतिहास लेखन की आचार संहिता इतिहास में निहित रहती है, इतिहासकार में नहीं.
5. दर्शन तथा आचारशास्त्र इतिहास लेखन का अंग नहीं है. प्रत्येक इतिहासकार स्वतन्त्र रूप से पैदा हुआ है. उसके माता-पिता एवं संस्कारों का प्रभाव उसके ऊपर पड़ता है. शिक्षा सम्बन्धी नियम उसे एक सीमा के अन्तर्गत कार्य करने के लिए विवश तथा बाध्य करते हैं.
6. आधुनिक इतिहास कोलम्बस रॉके ने भी इतिहास को व्यक्तिगत दृष्टिकोण से अलग रखने का प्रबल समर्थन किया है. इसीलिए उन्होंने अपनी कृतियों में कल्पना तथा अन्वेषण का परित्याग कर तथ्यों को अत्यधिक महत्व दिया.
7. द्वेष रहित तथा निष्पक्षता का सर्वोच्च आदर्श नेबूर ने प्रस्तुत किया है. गूच ने लिखा है कि उनकी आत्मा मधुमक्खी की भाँति है, क्योंकि उन्होंने हमारे समृद्धशाली युग के मधुत्व मात्र का ही संकलन किया है, विषत्व का कभी स्पर्श तक नहीं किया.
अन्य विषयों के साथ इतिहास का सम्बन्ध (Relation with other Subjects)
"History is the Central Social Science of which all others must feed. It is basic to the way that maths is basic to the natural sciences." – H. C. Darby
> भूगोल (Geography)
भूगोल ने हर देश के इतिहास को बनाया है.
किसी देश का लिखित इतिहास न होने पर उसके भूगोल से इतिहास का ज्ञान प्राप्त हो सकता है; जैसे— उत्तरी भारत में हिमालय पर्वतमाला होने के कारण सभी आक्रमण उत्तर-पश्चिम से हुए.
भारत के आन्तरिक भूगोल ने भी जनजीवन को प्रभावित किया.
बड़े-बड़े राजवंश भी गंगा-यमुना, दोआब, कृष्णा, गोदावरी का क्षेत्र सिन्ध के उपजाऊ क्षेत्रों में ही स्थापित हुए.
> अर्थशास्त्र (Economics)
मार्क्स व वेबर ने अर्थशास्त्र को प्रभावित किया. मार्क्स के अनुसार इतिहास का निर्माण पूँजीपति व श्रमिकों के संघर्ष के कारण होता है. रूसी क्रान्तियों से स्पष्ट हो गया कि अर्थशास्त्र, इतिहास को बनाने - बिगाड़ने में सहायक है.
यूरोपीय देशों ने अपने माल के विक्रय हेतु बाजार की खोज की, जिसके कारण एशिया व अफ्रीका के देश उनके उपनिवेश बन गये.
आधुनिक युग में भी सभी आन्दोलनों की जड़ अर्थशास्त्र है.
> समाजशास्त्र (Sociology)
मानव समाज का अध्ययन किये बिना इतिहास का अध्ययन अधूरा है.
आजकल समाजशास्त्र को Social Dynamic कहते हैं. जाति-प्रथा, विवाह, परम्पराएँ आदि की जानकारी Sociology से होती है.
इतिहास व समाजशास्त्र दोनों में मानव विकास का अध्ययन है.
अमीर खुसरो ने भी भारत के सामाजिक इतिहास की झलक प्रस्तुत की है.
अमीर खुसरो ने नूहे सिपेह में कश्मीर के बारे में लिखा है.
'तारीख-ए-फिरोजशाही में अफीफ कहता है कि जिस प्रकार खोटे सिक्के को कोई स्वीकार नहीं करता, वैसे ही नारी पर यदि कोई गलत लांछन भी लग जाए तो उसे कोई स्वीकार नहीं करता.
अबुल फजल ने 'आइने अकबरी' घर सामाजिक इतिहास लिखा है, इसके प्रथम अध्याय में रसोईघर के बारे में
> साहित्य (Literature)
जब इतिहासकार ऐतिहासिक तथ्यों को संजोकर व्यक्त करता है, तो साहित्य की सहायता लेता है. इतिहास के तथ्यों को साहित्य द्वारा रोचक बनाया जा सकता है. अन्य ऐतिहासिक स्रोतों के अभाव में साहित्य ही इतिहास निर्माण में सहायता करता है. यदि इतिहास कला है, तो इसका साहित्य से गहरा सम्बन्ध है. उदाहरणार्थ- बरनी व्यंग्य में लिखता है कि, “अलाउद्दीन के समय तक एक ऊँट एक दाम में मिल जाता था, परन्तु समस्या यह थी कि दाम कहाँ से 
मिले. "
साहित्य का सर्वाधिक महत्व निम्नलिखित दो इतिहासकारों ने दिया है – 
1. Gibboon - "Decline & Fall of the Roman Empire".
2. Rnanke (German) का कहना था कि बिस्मार्क के दस्तावेजों पर विश्वास न करें, बल्कि इंग्लैण्ड के दूत ने जो दस्तावेज भेजे वे विश्वसनीय हैं. वह पहला व्यक्ति है जिसने पुरातत्व दस्तावेजों का महत्व बताया. थ्यूसिडाइडिस ने स्पार्टा एथेंस युद्ध की तिथि जानने हेतु दोनों पक्षों के सैनिकों से सम्पर्क किया.
> स्वतन्त्र विषय (Ordinary Subjects)
ऐसे विषय जिन्होंने स्वतन्त्र रूप से निष्कर्ष निकाले और उन निष्कर्षों को इतिहास में काम में लिया जाता है.
Etigraphy — संस्कृत-फारसी.
1. Philosophy. 
2. Chronology.
3. Poleography ( पुराने लेखन का अध्ययन ).
4. Crrophalogy (मानव के हस्तलेखन के अध्ययन से चरित्र की जानकारी प्राप्त होती है).
5. Sigilography - चिह्न (देशभक्ति का प्रतीक). 
6. Diplomatic
7. Epigraphy (Inscription का अध्ययन ). 
8. Numismatics (सिक्कों का अध्ययन).
9. Archaeology.
> अपने विशेष अध्ययन में भारतीय इतिहास लेखन की आधुनिक धाराओं का परीक्षण कीजिए.
यह सत्य है कि समय के साथ-साथ इतिहास की रूपरेखा भी बदलती रहती है. यह परिवर्तनशीलता दोहरी है द्वारा एक ओर समय के साथ-साथ नई धाराएँ घटती हैं और वे इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं तो दूसरी ओर पुरानी घटनाओं की भी नई-नई व्याख्याएँ, नए इतिहासकारों नए स्रोतों के आधार पर नई रुचियों एवं बदलते अनुभव के आधार पर की जा सकती है नित्य नए प्रयोग की बदलती सोच की वजह से इतिहास में अनेक आधुनिक धाराओं का समावेश हुआ, जो निम्नलिखित है—
(1) वर्तमान से जोड़ना—अब इतिहास लेखन करते समय अतीत का वर्णन वर्तमान समस्याओं एवं परिप्रेक्ष्य को आधार बनाकर किया जाता है, जबकि परम्परागत ऐतिहासिक लेखन में अतीत पर ही जोर दिया जाता था. इस प्रकार के अध्ययन से एक लाभ यह होता है कि हम इतिहास को अतीत, वर्तमान व भविष्य तीनों से जोड़कर किसी घटना का निष्कर्षात्मक व विश्लेषणात्मक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं.
(2) राजनीतिक इतिहास के स्थान पर सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक इतिहास लेखन पर जोर देना — इतिहास लेखन की आधुनिक धाराओं में यह प्रमुख है, क्योंकि परम्परागत इतिहास लेखन में रणनीति को इतना प्रमुख व महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है कि सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक पक्ष बिलकुल अनछुए रह जाते हैं. फलतः हमारा अध्ययन सम्पूर्णतया नहीं ले पाता. अब राजनैतिक इतिहास के स्थान पर इतिहास के अन्य पक्षों पर भी जोर दिया जा रहा है. इतिहास के सभी पक्षों पर प्रकाश पड़ने से अब इसे ज्यादा रुचिकर बनाया जा सकता है.
(3) उपाश्रित इतिहास लेखन (सब-एल्टर्न थ्योरी) - परम्परागत इतिहास लेखन में सदैव उच्च वर्ग एवं इतिहास को ऊपर से ही देखने की कोशिश की गई हैं. उन्होंने शासक वर्ग, अमीर उलेमा वर्ग का या फिर राष्ट्रीय आन्दोलनों के महानायकों के जीवन व उनके ही कार्यों को ज्यादा प्रमुखता देते हुए उनके महत्व को रेखांकित किया है और सूक्ष्म अध्ययन से अपना मुँह मोड़ रखा है, किन्तु वर्तमान समय में प्रचलित उपाश्रित लेखन में इतिहास को नीचे से देखने पर जोर दिया जाता है.
(4) नारीवादी इतिहास लेखन- परम्परागत इतिहास लेखन में पुरुष प्रधानता की वजह से महिलाओं की भूमिका को नजरअन्दाज किया जाता रहा है, किन्तु वर्तमान में नारीवादी आधुनिक धारा का प्रचलन होने से इतिहास के विभिन्न क्षेत्रों में स्त्रियों की भूमिका का विश्लेषण किया जाता है. अभी तक स्वतन्त्रता संग्राम में नारी भूमिका पर इतना ज्यादा जोर नहीं दिया गया था, परन्तु वर्तमान में हो रहे अधिकांश शोध कार्यों व इतिहास लेखन में इस बिन्दु पर जोर दिया जा रहा है.
(5) श्रमिक इतिहास लेखन- आधुनिक धाराओं में यह भी है कि, वर्तमान इतिहास लेखन में पूँजीपति व धनाढ्य वर्ग के साथ-साथ श्रमिक वर्ग को भी महत्ता प्रदान की है. अब रचे जाने वाले इतिहास में यह माना जाने लगा है कि अर्थव्यवस्था के सफल संचालन हेतु पूँजीपतियों के साथ-साथ श्रमिकों का भी इतना ही योगदान रहता है.
(6) साम्राज्यवादी या राष्ट्रवादी इतिहास की बजाय मार्क्सवादी इतिहास लेखन- आधुनिक धाराओं से पूर्व के लेखन में मार्क्सवादी अर्थात् व्यक्तिवादी धारणा को इतना महत्व न था, जितना कि अब के इतिहास लेखन में.
(7) कृषक इतिहास लेखन – भारतीय इतिहास लेखन की आधुनिक धाराओं में यह देखने को मिलता है कि अब कृषकों पर भी बराबर का इतिहास रचा जाता है. पहले कृषकों को एक निम्न या गौण तत्व मानते हुए उन्हें केवल गौण महत्त्व का व्यक्ति माना जाता था और उनके द्वारा किए गए विद्रोहों एवं आन्दोलनों को इतना महत्त्व नहीं दिया गया, किन्तु अब आधुनिक इतिहास लेखन में उनकी महत्ता को स्वीकार किया गया है.
(8) अन्तर्विषयक उपागम – पूर्व के इतिहास लेखन की रचना में केवल ऐतिहासिक तथ्यों का वर्णन किया जाता और इतिहास की रचना कर दी जाती, किन्तु अब एक नई धारा का जन्म हुआ है, वह है – विषयों के मध्य अन्तर्सम्बन्ध यानि अब इतिहास को विदित समय उसका अन्य विषयों से तादात्म्य स्थापित किया जाता है. यही कारण है कि अब इतिहास में न केवल राजनीतिक घटनाओं का अपितु आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नागरिक, भौगोलिक आदि प्रश्नों का भी अध्ययन किया जाता है.
(9) शहरी इतिहास – आधुनिक धारा के इस बिन्दु के तहत इतिहास लेखन करते समय सभ्यता के विकास, नगरीकरण, शहरी उद्योग-धन्धे एवं जनसाधारण पर उसके प्रभाव आदि का अध्ययन किया जाता है, जबकि पूर्व के ऐतिहासिक लेखनों में इनकी महत्ता न थी.
(10) मौखिक इतिहास - वर्तमान इतिहास लेखन में इस प्रवृत्ति का बोलबाला है कि इतिहास में मौखिक तथ्यों तथा दृष्टान्तों का ज्यादा-से-ज्यादा उपयोग हो. ऐसा करने से पूर्व वर्तमान में लिखित इतिहास पूर्व के ऐतिहासिक लेखन से कहीं ज्यादा सार्थक व रुचिकर है.
> क्षेत्रीय इतिहास की प्रासंगिकता व सार्थकता की समीक्षा कीजिए. 
क्षेत्रीय इतिहास को अभी तक परम्परागत इतिहास लेखन में महत्ता न दिए जाने से इसका विकास अवरुद्ध था किन्तु अब इतिहास की आधुनिक धाराओं में क्षेत्रीय इतिहास को प्रमुखता दिए जाने पर ऐसे ऐतिहासिक लेखन में धीरेधीरे अभिवृद्धि हो रही है, जो इतिहास के समझने में ही लाभप्रद है. परम्परागत दृष्टिकोण में इतिहास लेखन राष्ट्रवादी स्वरूप में किया जाता था, जबकि अब क्षेत्रीयता का भी यानि विभिन्न क्षेत्रों का; जैसे— राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि का अलग-अलग वर्णन करने के - बाद सम्पूर्ण राष्ट्र का लेखन किया जाता है, जो निश्चित ही पूर्व की राष्ट्रवादी लेखन की अपेक्षाकृत कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है. परम्परावादियों के राष्ट्रीय इतिहास में क्षेत्रीय इतिहासों की अवहेलना कर देने से उनका महत्व गौण रूप से ही रह गया है और उनसे सम्बन्धित हमारा ज्ञान काफी सीमित रह गया है.
किन्तु जैसे-जैसे इतिहास लेखन को भी अवधान दिया गया और अब इतिहास को निम्न से उच्च स्तर की ओर लिखे जाने की शुरूआत की गई; जैसे— स्थानीय इतिहास, प्रान्तीय इतिहास, राष्ट्रीय इतिहास एवं विश्व इतिहास . इस प्रकार के इतिहास का क्रमिक इतिहासों के लेखन से उस राष्ट्रीय आधार मजबूत एवं सुदृढ़ होता है. इतिहास लेखन में क्षेत्रीय इतिहास लेखन की महत्ता को एक उदाहरण से अच्छी तरह स्पष्ट किया जा सकता है, जैसे- – उत्तर-पश्चिम सीमा नीति, जब हम भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित इस सीमा के क्षेत्रीय स्वरूप का विस्तृत अध्ययन नहीं कर लेंगे तब तक हम दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों व मुगल सम्राटों द्वारा उत्तर पश्चिम सीमा के प्रति अपनाई गई नीति को सही ढंग से समझ पाने में असमर्थ रहेंगे.
इसी प्रकार क्षेत्रीय इतिहास लेखन कितना महत्त्वपूर्ण होता है, इस बात को अकबर की नीतियों से समझा जा सकता है. अकबर द्वारा अपनाई गई राजपूत नीति व धार्मिक नीति को तब तक हम भली-भाँति नहीं समझ सकते, जब तक कि हम राजस्थान के राजपूतों का इतिहास नहीं पढ़ लेते.
क्षेत्रीय इतिहास के अध्ययन के बाद ही हम यह जान सकते हैं कि अकबर द्वारा राजपूत नीति के अवलम्बन के अलावा क्या कारण था कि राजपूतों ने उसकी अधीनता स्वीकार की.
किन्तु क्षेत्रीय इतिहास लेखन करते समय सतर्कता बरतना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि ऐसा करते समय कई बार चूक व संकीर्णता के भाव उभर सकते हैं. चूँकि यदि क्षेत्रीय इतिहास की ज्यादा अभिवृद्धि होगी तो धीरे-धीरे संकीर्णता व क्षेत्रवाद का विकास होगा जो राष्ट्रवादी हितों के खिलाफ है.
प्रत्येक इतिहासकार अपने क्षेत्र के इतिहास को अन्य की बजाय महत्ता देते हुए उसे अन्य क्षेत्रों की अपेक्षाकृत विशिष्ट मानेगी, जिससे संकीर्णता के भावों का उदय होगा, जो राष्ट्रवादी इतिहास लेखन के लिए उचित नहीं है.
> सभी इतिहास समकालीन इतिहास है
वस्तुतः इतिहास में दो विचारधाराएँ हैं— एक वस्तुवादी और दूसरा आदर्शवादी वस्तुवादी विचारधारा में तथ्यों को प्रधानता दी जाती है, जबकि दूसरी विचारधारा में तथ्यों की अपेक्षा इतिहासकार को महत्ता दी जाती है. उनका मानना है कि इतिहासकार ही अपनी बुद्धि-कौशल से इतिहास का निर्माण करता है. ऐतिहासिक तथ्य वे तथ्य होते हैं जिनको इतिहास चुनता है या जिनका ऐतिहासिक महत्त्व होता है. कुछ तथ्य तो सभी इतिहासकारों के लिए समान होते हैं. बाकी तथ्यों को ऐतिहासिक होना या न होना इतिहासकार के दृष्टिकोण व प्रभाव के आधार पर होता है. 19वीं सदी तक 'तथ्य सम्प्रदाय' की महत्ता थी और उस पर हमला बोलने वालों पर ध्यान नहीं दिया जाता था, किन्तु 20वीं सदी में इसमें परिवर्तन आया. इस समय क्रोसे ने घोषणा की कि इतिहास समकालीन इतिहास होते हैं. इसका अर्थ यह है कि इतिहास लेखन आवश्यक रूप से वर्तमान की आँखों से और वर्तमान समस्याओं के प्रकाश में अतीत को देखना है और इतिहासकार का मुख्य कार्य विवरण देना नहीं, अपितु मूल्यांकन करना है क्योंकि वह मूल्यांकन नहीं करेगा तो उसे कैसे पता चलेगा कि क्या लिखना है.
यह निर्विवाद सत्य है कि इतिहासकार वर्तमान की समस्याओं को ध्यातव्य रखते हुए ही अतीत में घटित घटनाओं का वर्णन करता है. वर्तमान में जिन समस्याओं का बोलबाला होता है, वही उस इतिहासकार की दृष्टि में प्रमुखता लेता है और वही उसी चीज को ध्यान में रखते हुए अपनी कृति का निर्माण करता है या इसे यूँ कहें कि इतिहासकार वर्तमान की समस्याओं का चश्मा पहनकर अतीत को पीछे मुड़कर देखता है. चूँकि इसमें वर्तमान को ज्यादा सार्थक बनाया जाता है. अतः क्रोसे का यह मत है कि सभी इतिहास समकालीन इतिहास होते हैं, काफी हद तक यह सत्य प्रतीत होता है. उदाहरण के तौर पर यदि कोई इतिहासकार अकबर की धार्मिक नीति पर लेखन कार्य कर रहा है तो निश्चय ही वर्तमान में घटित धार्मिक असहिष्णुता, कट्टरता एवं मजहबी समस्याओं पर अपना विशेष ध्यान केन्द्रित करते हुए अकबर की धार्मिक सहिष्णुता के लिए उठाए गए कदमों, जैसे- सुलह-ए-कुल नीति, दीन-ए-इलाही नीति, धार्मिक सहिष्णुता आदि का अवलोकन करेगा.
वास्तव में यह बात सत्य है कि इतिहासकार द्वारा लिखे जाने वाले लेखन में उसके आसपास व उसके समय की समस्याओं का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है. इतिहासकार का दृष्टिकोण उसी के अनुरूप ढल जाता है, जिस प्रकार की समस्याओं से वह ग्रसित होता है.
उपर्युक्त मत के विश्लेषण करने पर निष्कर्षात्मक रूप से कहा जा सकता है कि इतिहास समकालीन इतिहास है. अर्थात् वर्तमान को ध्यान में रखते हुए अतीत का अध्ययन किया जाता है. इस प्रकार इतिहास लेखन से निम्नलिखित लाभ हैं
1. वर्तमान की समस्याओं से हम अच्छी तरह से निपट सकते हैं क्योंकि अतीत में घटित घटनाएँ वर्तमान की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए पढ़ी व लिखी जाएँगी. अतः हम उन समस्याओं को ज्यादा अच्छे ढंग से हल कर सकते हैं.
2. हम अतीत की घटनाओं का वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में अध्ययन कर सकते हैं.
3. इस प्रकार के इतिहास लेखन करने में हम जब अतीत की घटनाओं का वर्तमान से सम्बन्ध व तादात्म्य स्थापित करते हैं तो हम अतीत की उन बातों को सीख लेते हैं व सबक लेते हैं जिनसे कि वर्तमान समस्याओं का निराकरण सम्भव है.
किन्तु समकालीन इतिहास के लाभ के साथ-साथ कुछ हानियाँ भी हैं; जैसे—
1. समकालीन इतिहास केवल मात्र एक उपदेशात्मक/ निर्देशात्मक बनकर रह जाता है अर्थात् इतिहास में इन बातों की ही प्रमुखता रह जाती है कि अतीत की घटनाओं से कैसे वर्तमान की समस्याएँ हल की जाती हैं.
2. क्षुद्र स्वार्थों की वजह से इतिहास की दिशा को मोड़ा जा सकता है व उसके तथ्यों को अपने अनुसार, तोड़मोड़ कर पेश किया जा सकता है.
3. समकालीन इतिहास का जो भाग वर्तमान समस्याओं से सम्बन्धित नहीं होता है वह दबकर रह जाता है क्योंकि इतिहासकार उस पर अपनी दृष्टि नहीं डाल पाता.
> इतिहास लेखन के स्रोत के रूप में साहित्य की प्रासंगिकता व प्रमाणिकता
इतिहास लेखन के स्रोत के रूप में दो चीजें महत्त्वपूर्ण हैं—प्रथम तो अभिलेखन व दूसरे साहित्यिक स्रोत. अभिलेखीय स्रोतों में जहाँ स्मारक, स्तम्भ, स्तूप, सिक्के व मुद्राएँ आदि वास्तविक उत्खनित व पुरातात्विक पुरासाक्ष्यों को शामिल किया जाता है. वहीं साहित्यिक स्रोतों में विद्वानों द्वारा रचित लेखन सामग्री चाहे वह धार्मिक हो या धर्मेत्तर विदेशियों के विवरण शामिल किए जाते हैं.
इतिहास लेखन करते समय हमें प्रामाणिक जानकारी की आवश्यकता होती है. जिसके लिए हमें प्रमाणों की आवश्यकता होती है. इस प्रकार प्रमाणों को हम समकालीन साहित्य में पाते हैं और उन साहित्यिक रचनाओं के आधार पर इतिहास लेखन किया जाता है. इतिहास लेखन करते समय साहित्य को प्रमाणों के रूप में प्रयुक्त किया जाता है. साहित्यिक साक्ष्यों से हम अभिलेखीय स्रोतों से प्राप्त सामग्री को जाँच सकते हैं तथा उन्हें और भी ज्यादा प्रामाणिक व सत्य किया जा सकता है.
साहित्य की इतिहास लेखन में प्रासंगिकता को हड़प्पा सभ्यता के सन्दर्भ में बहुत अच्छे ढंग से समझा जा सकता है.
हड़प्पा सभ्यता की खुदाई से हमें बड़ी तादाद में पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं और उनसे अनेक निष्कर्ष भी निकाले जाते हैं, किन्तु वे इतने स्पष्ट नहीं हैं जितने कि वैदिककालीन. इन सभी के पीछे मूल कारण है हड़प्पा सभ्यता की अपठित लिपि के अभाव में उसकी साहित्यिक सामग्री का उपयोग न हो पाना.
अतः यह बात स्पष्ट हो जाती है कि साहित्यिक साक्ष्य अभिलेखी साक्ष्य को कहाँ तक प्रामाणिक व सत्य ठहराते हैं व उसका इतिहास लेखन में क्या योगदान है. साहित्यिक सामग्री के अभाव में ही हम हड़प्पा सभ्यता की धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि परम्पराओं व व्यवस्थाओं के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकते.
अतएव साहित्यिक स्रोतों से इतिहास लेखन में निश्चितता की स्थिति को बल मिलता है. साहित्यिक स्रोतों की तुलना में अभिलेखीय स्रोतों को ज्यादा अच्छे ढंग से पेश किया जा सकता है और उसके सन्दर्भ में ज्यादा जानकारी रखी जा सकती है, किन्तु इतिहास लेखन में साहित्यिक स्रोतों के प्रयोग से कई हानियाँ भी हैं; जैसे—
1. आसानी से मनोनुकूल परिवर्तन — ऋग्वेद के 2 से 7वें मण्डल को परिवार मण्डल तथा शेष को क्षेपक या परिशिष्ट मण्डल माना जाता है. अब इतिहासकार इतिहास रचते समय हो सकता है केवल परिवार मण्डल का ही प्रयोग करे या फिर दूसरा इतिहासकार क्षेपक मण्डली के आधार पर ऋग्वेद का वर्णन करे. ऐसा करने से ऋग्वेद की मूल थीम (Theme) में परिवर्तन सम्भव है और हमारे निष्कर्षों में भिन्नता आना स्वाभाविक है.
2. अभिलेखीय सामग्री को हम परिवर्तित नहीं कर सकते. वह जैसी पहले थी आज भी उसी अवस्था में मिलेगी, किन्तु साहित्यिक सामग्री में तीव्र गति से परिवर्तन सम्भव हैं, क्योंकि प्रत्येक इतिहासकार का दृष्टिकोण भिन्न होता है. अतः वह साहित्यिक स्रोतों को बदलता रहता है, जिससे इसकी महत्ता कम हो जाती है.
3. साहित्यिक स्रोत की एक सीमा यह भी है कि साहित्यिक सामग्री में निष्पक्षता का अभाव होता है; जैसेबाबरनामा, अकबरनामा, आलमगीरनामा व खजाइ-नुलफतुह आदि. इन सभी में अपने शासकों का प्रशंसात्मक वर्णन किया गया है और उनकी किसी भी बुराई की ओर इंगित नहीं किया है, उनकी सभी कमियों को दबा दिया गया है.
4. विदेशियों के वृतान्तों में प्रमाणिकता की कमी – चूँकि विदेशी यात्री एक भिन्न राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व रीति-रिवाजों वाले क्षेत्रों से आए. फलतः उनकी सोच यहाँ की सोच से भिन्न थी. उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों का वर्णन अपने ढंग से किया जिनमें अनेक खामियाँ रह गईं. उदाहरणस्वरूप – हम मैगस्थनीज की इण्डिका जिसमें उसने भारतीय समाजव्यवस्था को पूरी तरह समझे बगैर अनेक गलत तथ्य प्रस्तुत कर दिए हैं, जैसे- भारत में जनजातियाँ निवास करती हैं आदि.
अत्तः कुछ कमियों के बावजूद भी साहित्य की प्रामाणिकता को कम नहीं आँका जा सकता.
> अपने शोध विषय के चयन को प्रमाणित करते हुए शोध रीति का अनुसरण
> शोध विषय
मुस्लिम समाज में सुधार सर सैयद अहमद खाँ के योगदान का मूल्यांकन : वर्तमान समय में जब पूरे विश्व में मुस्लिम समुदाय हिंसा के दावानल में जल रहा है. धार्मिक कट्टरता, अशिक्षा, उलेमाओं का अतार्किक दृष्टिकोण आदि ने एक काले परदे के रूप में आधुनिकता व उदारवाद के प्रकाश को उनके मस्तिष्क के भीतर जाने से रोक रखा है. कोसोवो संकट, इराक बनाम अमरीका संघर्ष, सोमालिया, अफगानिस्तान, फिलीस्तीन आदि. इस समस्या से भारत भी अछूता नहीं है.
उपर्युक्त परिस्थितियों में हम सर सैयद अहमद खाँ की भूमिका का अध्ययन व उससे प्रेरणा प्राप्त करना उपयुक्त मानते हैं. 19वीं सदी में 1857 ई. के विद्रोह की असफलता के बाद भारतीयों की समस्त आशाओं पर पानी फिर गया. पराजय, दमन, निराशा आदि ने उनको चारों ओर से घेर लिया, किन्तु सभी सम्प्रदायों में सर्वाधिक दुर्दशा मुसलमानों की हुई. उनकी आर्थिक स्थिति तेजी से गिर रही थी. बेरोजगारी का मुख्य कारण पश्चिमी शिक्षा का अभाव था. अँग्रेजों ने उनकी राजनीतिक सत्ता पहले ही छीन ली थी. 1857 ई. विद्रोह का उत्तरदायित्व भी उन पर डाला गया.
मुसलमानों की इस दशा को सुधारने के लिए सर सैयद अहमद खाँ आगे आए. उन्होंने अथक प्रयासों से मुस्लिम समाज में सुधार के प्रयास किए.
यद्यपि उनके प्रयासों में मुसलमानों को राष्ट्रीय आन्दोलन से पृथक् रहने की सलाह भी दी गई और अँग्रेजों पर अतिविश्वास रखा, जिससे मुसलमान राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा से दूर चले गए.
मैंने इसे अपने शोध का विषय इसलिए चुना है, क्योंकि मेरे विचार में इस विषय पर अनुसन्धान कार्य कम हुआ है. इसको चुनने का एक अन्य कारण सर सैयद अहमद खाँ की भूमिका के लिए उस पक्ष को उजागर करने का प्रयास है, जो पक्ष कट्टरपन्थी मुसलमानों व हिन्दुओं की नजरों से दूर रहा.
> साहित्य व पुस्तकों का अध्ययन
(1) मौलाना अल्ताफ हुसैन अली द्वारा रचित – 'हयाते जावेद' यह पुस्तक प्रस्तावित शोध के लिए काफी उपयोगी है. यह सर सैयद की जीवन-चरित है, जिसके एक भाग में उनके जीवन व व्यक्तित्व से सम्बन्धित समस्त बातें हैं और दूसरे भाग में सर सैयद की सामाजिक, शैक्षणिक एवं साहित्यिक सेवाओं का सविस्तार उल्लेख किया गया है.
(2) शान मोहम्मद द्वारा रचित – “सर सैयद अहमद खाँ – एक राजनीतिक जीवन ".
इस पुस्तक में 1857 ई. से पहले मुसलमानों की दशा और फिर उसमें सर सैयद द्वारा किए गए सुधारों का उल्लेख है.
(3) प्रो. असग़र अब्बास द्वारा रचित – 'सर सैयद की शहादत' इसमें उन्होंने विज्ञान की उन्नति व उसका मुसलमानों में प्रचार करने के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन है. इसमें 'अलीगढ़ इन्स्टीट्यूट' और 'तहजीव-उल-अखलाक' के प्रभावों का वर्णन है.
(4) इफ्तिखार आलम द्वारा रचित – 'तारीख मदर-सलुलउलूम अलीगढ़' इस पुस्तक में अलीगढ़ कॉलेज की बुनियाद व उसका इतिहास बताया गया है.
> शोध उद्देश्य
उपलब्ध साहित्य के अध्ययन के बाद मेरे मस्तिष्क में कुछ नवीन विचारों ने जन्म लिया और प्रस्तावित शोध में उनको दृष्टिगत रखते हुए निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति का. प्रयास किया जाए.
1. 19वीं सदी में वास्तविक मुस्लिम ढाँचा कैसा था ?
2. इस दशा को सुधारने में सर सैयद के विचारों व प्रयासों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करना.
3. इन सुधारों का राष्ट्रीय आन्दोलन पर क्या प्रभाव पड़ा ?
4. क्या ये प्रयास भारत विभाजन के कारण बने ? 
> शोध प्रविधि
प्रस्तावित शोध में स्थापित शोध प्रविधि को ध्यान में रखते हुए पहले प्राथमिक स्रोतों का अध्ययन किया जाएगा; यथा— सर सैयद अहमद द्वारा रचित पुस्तकें एवं आलेखों का अध्ययन किया जाएगा, तत्पश्चात् उनके बारे में अन्य लेखकों द्वारा रचित पुस्तकों व आलेखों का अध्ययन किया जाएगा. इसके अतिरिक्त अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जाकर मौलिक साहित्य व विद्वानों के साक्षात्कार लिए जायेंगे.
> अध्याय विभाजन 
प्रथम अध्याय — भूमिका.
द्वितीय अध्याय – 19वीं सदी का मुस्लिम समाज
I. मुस्लिम समाज का शैक्षणिक स्तर.
II. मुसलमानों की राजनैतिक व आर्थिक स्थिति.
III. मुस्लिम समाज में व्याप्त निराशा व उसके कारण. 
तृतीय अध्याय—मुस्लिम व सर सैयद
I. मुस्लिम समाज के प्रति उनका दृष्टिकोण
II. उनके सुधारों की प्रेरणा व सुधार. 
III. सुधारों का मूल्यांकन.
चतुर्थ अध्याय – सर सैयद व राष्ट्रीय आन्दोलन
I. अँग्रेजी सरकार के प्रति दृष्टिकोण.
II. कांग्रेस के प्रति दृष्टिकोण.
III. सर सैयद को राष्ट्रवाद बनाम स्वधर्म कल्याण की आकांक्षा.
पंचम अध्याय – सर सैयद व सामाजिक समाज
I. वर्तमान सामाजिक स्थिति.
II. सर सैयद का वैज्ञानिक दृष्टिकोण.
III. सर सैयद का प्रेरणा स्रोत.
षष्ठम अध्याय – निष्कर्ष.
> सब - अल्टर्न ( Sub-Altern) इतिहास
> सब - अल्टर्न अध्ययन
अधीनस्थ अध्ययन के विषय में छात्रों के जानने योग्य एक आरम्भिक बात यह है कि इस विचारधारा के सभी इतिहासकारों में पूर्ण मतैक्य नहीं है, परन्तु परम्परागत इतिहास लेखन से इन सभी का असन्तोष काफी स्पष्ट है. यहाँ बहुत संक्षेप में हम पहले से इस नजरिए मूल अवधारणाओं को प्रस्तुत करेंगे और फिर इनके विरोध में सामूहिक रूप से उठाए गए कुछ तर्कों की समीक्षा करेंगे.
इस विषय में पहला तर्क यह है कि परम्परागत इतिहास लेखकों ने दलित जनता का वास्तविक इतिहास आज तक नहीं लिखा यहाँ तक कि बड़े विद्रोहों और क्रान्तिकारी परिवर्तनों की चर्चा इतिहासकारों ने जब कभी ही की है, तो इन घटनाओं के वास्तविक 'कर्त्ता' अर्थात् आम आदमी का सच्चा इतिहास उसी के नजरिए से लिखने की कोशिश शायद ही हुई हो. इस बात को तो कोई नकार नहीं सकता कि, इतिहास के सभी बड़े परिवर्तनों में जनसाधारण ने सक्रिय भूमिका निभाई है, परन्तु परम्परागत इतिहास लेखन में आम जनता को या तो उच्चवर्गीय संगठनों और नेताओं के इशारे पर चलने वाली कठपुतली मान लिया गया है, या फिर बड़ी आर्थिक सामाजिक विपत्तियों के कारण कभी-कभार यान्त्रिक रूप से विद्रोह करने वाले ढोर - ढंगर के रूप में देखा गया है. जिनका अपना कोई विवेक नहीं होता. अतः इतिहास में इनकी चेतना, इनकी समझ को अलग से अध्ययन करने की कोई विशेष आवश्यकता भी नहीं. जन-विद्रोहों की चर्चा जब भी इतिहास में उठी है, तो कुलीन इतिहासकारों ने अपनेअपने राजनीतिक रुझानों के अनुसार इन्हें कभी समाजवादी, कभी आजादी के संघर्ष का मोहरा मानकर ही अधिकतर इतिहास लिखा है. सब- अल्टर्न व्याख्याकारों ने इस तरह के इतिहास की शिखर दृष्टि को न केवल अधूरा माना है, बल्कि ऐतिहासिक विश्लेषण के नजरिए से काफी हद तक भ्रामक भी पाया है.
इतिहास लेखन की स्थापित परम्पराओं की कमियों से बचने के लिए सब- अल्टर्न अध्ययन के प्रतिपादक रणजीत गुहा ने मुख्यतः दो प्रकार के नए प्रयोगों पर जोर दिया है. एक तो यह है कि भारतीय समाज को एक समरूप समाज या प्रतियोगी संगठनों के जनमत या बने बनाए सामाजिक वर्गों एवं उत्पादन सम्बन्धों के माध्यम से देखने के बजाय कुलीनों एवं दलितों के विभाजन पर आधारित समाज के रूप में देखने का सुझाव दिया है. इसका कारण यह दर्शाया गया है कि पूँजीवादी परिणति से पहले तथा परिपक्व वर्ग चेतना के उद्भव से पूर्व किसानों, मजदूरों तथा कबीलों इत्यादि को बिल्कुल अलग-अलग एवं अनन्य वगों के रूप में देखने के स्थान पर घनिष्ठ पारिवारिक सम्बन्धों, स्थानीय परस्परता एवं मिली-जुली लोक चेतना तथा एक जैसे शोषण अनुभव के आधार पर गहराई से जुड़े हुए दलित समुदायों के रूप में देखना कहीं अधिक उपयोगी है. वास्तव में इसी नजरिए के कारण इस तरह इतिहास लेखन को सामूहिक रूप से सबअल्टर्न या अधीनस्थों या दलितों के अध्ययन का नाम भी मिला है. यद्यपि इस नाम विशेष से इस परम्परा के सभी इतिहासकार स्वयं पूर्णतया सन्तुष्ट नहीं हैं. यह सच है कि आधुनिक भारत के इतिहास में दलितों के अध्ययन को यूरोप के तरह आम आदमी का इतिहास या निम्न-वर्ग के इतिहास भी कहा जा सकता था, परन्तु मोटे तौर पर ये सभी इतिहासकार मानते हैं कि ऐतिहासिक विश्लेषण में शोषण एवं प्रभुत्व में यह कार्य जनता को कृत्रिम रूप से अलग-थलग वर्गों में विभाजित करके देखने की बजाय दलित समाज के समुचित अध्ययन के माध्यम से अधिक सार्थकता से किया जा सकता है.
दलित-समाज के विशिष्ट ऐतिहासिक अध्ययन की आवश्यकता के अलावा सब- अल्टर्न इतिहास के प्रतिपादकों ने इस बात पर भी जोर दिया है कि दलितों को 'पेट से सोचने वाले' निर्विवेक जाहिल लोगों के रूप में देखने के बजाय उनकी चेतना एवं मानसिकता को समझने पर इतिहासकारों के द्वारा विशेष ध्यान दिया जाए. वह चाहे इनके अपने विद्रोहों का इतिहास हो या कुलीनों द्वारा नियन्त्रित आन्दोलनों में इनकी भागीदारी एवं बलिदानों की दास्तान अथवा रोजमर्रा के जीवन में दलितों पर निरन्तर घटित होने वाले शोषण के अनुभव. ये सभी गहराई से तभी समझे जा सकते हैं जब आम आदमी के नजरिए, उसकी सोच और उसकी आहों की गूँज इतिहास समझ सकें. प्राथमिक स्रोतों के रचनात्मक अध्ययन द्वारा इतिहास के पृष्ठों में उसे उतार सकें. सबअल्टर्न इतिहासकारों के अनुसार, बड़े-बड़े विद्रोहों में भाग लेने वाले लोगों की सोच हमेशा उनके तथाकथित कुलीन और पढ़े-लिखे नेताओं से पूरी तरह मेल नहीं खाती, बल्कि उनके अपने अनुभवों और जरूरतों पर आधारित होती है तथा उनकी अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़ी होती है. उनका अपना एक अस्तित्व और अपनी सापेक्ष स्वायत्तता है, जिसका विशिष्ट अध्ययन आवश्यक है. लेकिन दलित समाज की चेतना अथवा मानसिकता का वास्तविक स्वरूप क्या है ? उसकी बुनियादी समानताएँ तथा समय एवं स्थान के अनुरूप आने वाली विविधताएँ क्या हैं? इन प्रश्नों का सब- अल्टर्न अध्ययन में मतैक्य नहीं है, परन्तु इस बात पर काफी सहमति है कि दलित चेतना में शोषण के प्रति विरोध तथा कुलीनों के प्रभुत्व का आम हालातों में विषय मिश्रण उपस्थित रहता है. यह चेतना-व्यवस्था अथवा सत्ता के टूटने या चरमराने पर स्वतः प्रवर्तित विद्रोहों को अक्सर जन्म दे सकती है. राजनीतिक संगठन के अभाव में भी अफवाहों इत्यादि के माध्यम से ही व्यापक आन्दोलनों के रूप में परिवर्तित कर सकती है, परन्तु विद्रोह की दिशा क्या होगी, बाहरी नेतृत्व से दलित वर्गों का क्या सम्बन्ध बनेगा. रणजीत गुहा के शब्दों में 'प्रतिवाद' तथा 'क्षेत्रीयता' जैसी असमान प्रवृत्तियाँ किस स्थिति में क्या रूप लेंगी यह अत्यन्त विवादास्पद विषय है. 
एक अन्य समस्या दलितों के चेतना के अध्ययन की विधि या शोध-पद्धति की है, स्पष्ट है कि दलित समुदाय की चेतना के अध्ययन को व्यावहारिक रूप देने के लिए इतिहास के प्राथमिक स्रोतों नए नजरिए से देखना अत्यन्त आवश्यक है, फिर अतीत के समाजों की मानसिकता की कल्पना करना और वह भी उन शोषित अनपढ़ लोगों की मानसिकता की जो खुद कुछ लिखकर न छोड़ सके और जिसके बारे में अक्सर सहानुभूति कुलीनों द्वारा रचे गए स्रोतों से ही हमें यदा-कदा जानकारी मिलती है— ऐसे वर्गों की सोच आज भी कल्पना कर पाना तो शायद और भी दुर्लभ होगा, परन्तु सब- अल्टर्न इतिहासकारों ने इस चुनौती को अपने शोध का केन्द्र बिन्दु बनाया है, लेकिन इस महान् उद्देश्य के लिए इन इतिहासकारों द्वारा अपनाई गई शोध-पद्धति एवं शैली विवादास्पद रही है, जो इतिहास शोषण और दमन अनुभूति को अपना केन्द्र बिन्दु' बनाना चाहता है, तो उसके पन्नों में शायद शब्दाडम्बर, अतिशयोक्ति और क्लिष्टता की नहीं, बल्कि इन्सानों के पसीने, उसकी मिट्टी की गन्ध एवं सीधी और सच्ची छवि झलकना ही अधिक स्वाभाविक होगा, परन्तु भारतीय इतिहास लेखन के तथाकथित 'कुलीन' दृष्टिकोणों का परिहास करने वाले सब- अल्टर्न इतिहासकारों ने शायद इस सरल से सत्य को आत्मसात् नहीं किया है. यही कारण है कि सहायक स्रोतों के आधार पर विदेशों से ही भारतीय दलितों को समझने का उनका अपना दावा कुछ कम 'कुलीन' प्रतीत नहीं होता.
परन्तु शोध-पद्धति तथा शैली के अलावा सब-अल्टर्न अध्ययन की अन्य मूल अवधारणाओं की भी कई इतिहासकारों ने जोरदार आलोचना की है. इस सिलसिले में एक रोचक बात यह है कि, 'सब-अल्टर्न अध्ययन से जुड़े हुए ज्यादातर इतिहासकार मार्क्सवादी विचारधाराओं से ही निकल कर आए हैं. स्वभावतः इनकी आलोचना में भी मार्क्सवादी इतिहासकारों का स्वर ही सबसे अधिक मुखरित रहा है. इस आलोचना के मुख्य आयामों का संक्षिप्त उल्लेख यहाँ आवश्यक होगा. यह आलोचना वास्तव में चार अलगअलग मुद्दों पर केन्द्रित रही है. यह मुद्दे हैं— दलित, चेतना, स्वायत्तता तथा संगठन.
> अतीत के पुनर्निर्माण में अभिलेखिक साक्ष्यों की उपयोगिता का उल्लेख कीजिए
इस साक्ष्य के अन्तर्गत वह सामग्री आती है, जो हमें साहित्यिक ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य किसी रूप में लिखी हुई प्राप्त होती है. इस साक्ष्य के मोटे तौर पर ये उपभेद किए जा सकते हैं – (1) गुहालेख (2) शिलालेख (3) स्तम्भलेख, ( 4 ) ताम्रपत्रों पर अंकित लेख.
इन लेखों में कुछ राज-शासन अथवा राजाज्ञाएँ हैं, कुछ दान लेख हैं तथा कुछ प्रशस्तियाँ हैं. इस प्रकार के लेखों के विषय में बड़ी विविधता मिलती है. इतिहास के साक्ष्य के रूप में इनका महत्त्व इसलिए और अधिक है, क्योंकि यह समसामयिक साक्ष्य होते हैं, प्राचीन भारत के कई लेखों से न केवल विधि राजनीतिक महत्त्व की समस्याओं पर प्रकाश पड़ता है. अपितु तत्कालीन साहित्य, संस्कृति एवं जनजीवन के अन्य पक्षों पर भी इनसे महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ मिलती हैं. इन लेखों में शासकों के नाम, शासन वंश, तिथि और समसामयिक घटनाओं का विवरण मिला है. कभी-कभी इन लेखों से साहित्यिक ग्रन्थों द्वारा पहले से प्रदान सूचनाओं का समर्थन होता है, जिससे इतिहासकार उस विषय पर और अधिक निश्चित मत बना सकता है. उदाहरण के लिए मौर्यकालीन प्रशासन अथवा जन-जीवन के विषय में कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा मैगस्थनीज के इण्डिका से जो जानकारी मिलती है, अशोक के अभिलेखों में प्रायः उसका समर्थन मिलता है और इस प्रकार ऐतिहासिक सूचना और अधिक प्रामाणिक बन जाती है. हर्ष के विषय में बाणभट्ट के हर्षचरित से जो सूचनाएँ मिलती हैं, हर्ष के लेखों में उसका समर्थन मिलता है. इसी प्रकार हेलियोडोरस के बेसनगर अभिलेख से यह महत्त्वपूर्ण सूचना मिलती है कि इस लेख के समय तक भागवत् धर्म इतना लोकप्रिय हो चला था कि विदेशी लोग भी इसे स्वीकार करने लगे. अशोक के लेख संख्या में इतने अधिक हैं तथा उनसे मिलने वाली सूचना इतनी विशद् एवं महत्व की हैं कि उन्हें स्वयं में एक साहित्य का नाम दिया जा सकता है. भारतीय इतिहास के इस महत्त्वपूर्ण शासक और मौर्य वंश के विषय में सामान्य रूप से जो सूचनाएँ इनके द्वारा मिलती हैं उनके बिना इस सम्बन्ध में हमारी जानकारी सर्वथा अधूरी है. इसी प्रकार समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति के बिना हम उस महत्त्वपूर्ण शासक के विषय में कुछ भी नहीं जान पाते. यही बात हम कलिंग के शासक खारवेल के विषय में कह सकते हैं, जिसके बारे में सूचना का आधार हाथीगुम्फा अभिलेख है. कभी-कभी लेखों में लेख जारी करने वाले शासक के नाम के अतिरिक्त उसकी वंशावली भी दी गई रहती है. उदाहरण के लिए रुद्रदामन के लेख से यह ज्ञात होता है कि वह जयदामन का पुत्र एवं चष्टन का पौत्र था. वंशावली की यह परम्परा गुप्त लेखों में अपनी चरम पर दिखाई देती है. वंशावली की सहायता से इतिहासकारों को उत्तराधिकार क्रम समझने में बड़ी सहायता मिलती है कि वे प्रभुतासम्पन्न और स्वतन्त्र शासक थे अथवा अन्य किसी शक्तिशाली शासक के सामन्त अथवा अधीनस्थ के रूप में राज्य करते थे. इन लेखों में शासन व्यवस्था के ऊपर भी महत्वपूर्ण प्रकाश पड़ता है. इनमें पदाधिकारियों के नाम और उनके कार्य-व्यापारों का विवरण भी प्राप्त होता है. साम्राज्य की विविध प्रशासनिक इकाइयों के सम्बन्ध में भी इनसे सूचना मिलती है. प्राचीन भारत के कुछ लेख साहित्यिक महत्व के भी मिलते हैं. रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख का उपयोग विद्वानों ने संस्कृत भाषा के विकास क्रम को समझने में किया है. धार तथा अजमेर के चट्टानों पर नाटक लिखे हुए मिले हैं. पदुकोट्टा के अन्तर्गत 'कुदुमियामलै' नामक स्थान से प्राप्त लेख में संगीत के नियम बताए गए हैं.
साक्ष्यों के बिना अतीत का पुनर्निर्माण पूर्णतया शुद्ध रूप से इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अभिलेखीय करना अत्यन्त कठिन है.
> "इतिहास महान् पुरुषों के आत्मचरित्र के अलावा कुछ भी नहीं है." टिप्पणी कीजिए. 
इतिहास एक दृष्टि से व्यक्ति द्वारा व्यक्ति के कार्यों का मूल्यांकन है. उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इतिहास में महापुरुषों के कार्यों का ही प्रमुखतः अध्ययन किया जाता है, सभी मनुष्यों का अध्ययन गौण रूप से ही किया जाता है.
व्यक्ति होता है, जो इस युग की आकांक्षाओं को शब्द दे हीगल के शब्दों में, "किसी युग का महापुरुष वह सके, युग को बता सके कि उसकी आकांक्षा क्या है? उसे क्रियान्वित कर सके. वह जो करता है वह उसके युग का दृश्य सारतत्त्व होता है, वह अपने युग को रूप देता है. "
इतिहास अपने स्वरूप में गतिशीलता धारण किए हुए है. इतिहास की इस प्रक्रिया में वृद्धि हेतु महापुरुषों ने विशिष्ट व महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसके कारण इतिहास में महापुरुष सिद्धान्त का उद्भव हुआ. 20वीं सदी के आरम्भ में इतिहास लेखन का अभिप्राय महापुरुषों की जीवन-कथाओं पर प्रकाश डालना था. इससे पहले व्यक्ति स्वयं को समाज का अभिन्न अंग मानता था, किन्तु पुनर्जागरण काल में व्यक्तिवाद के उदय से उसने स्वयं को आध्यात्मिक व्यक्ति के रूप में पहचाना. औद्योगिक क्रान्ति ने भी व्यक्तिवादी सिद्धान्त की पुष्टि की, क्योंकि व्यक्तिवादी योग्यता तथा क्षमता के आधार पर ही पूँजीवाद का विकास हुआ. इस युग में ग्रोत द्वारा लिखित 'हिस्ट्री ऑफ ग्रीक' तथा मानसेन द्वारा रचित 'हिस्ट्री ऑफ रोम' भी व्यक्तिवाद के सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं. इस कथन में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि इतिहास की गतिशीलता में महापुरुषों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. कार्ल मार्क्स के शब्दों में, “इतिहास कुछ नहीं करता, उसके पास कारू का खजाना नहीं होता, यह कोई युद्ध नहीं करता, दरअसल वास्तविक मनुष्य और जीवित मनुष्य ही कुछ करता है.”
गिबन – "महान् व्यक्तियों की जीवनियाँ ही इतिहास है." इसलिए यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि महापुरुष अनुकूल परिस्थितियों का इन्तजार करता है तथा उपर्युक्त समय पर राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुकूल परिस्थितियों एवं मानवीय शक्तियों को नवीन दिशा प्रदान करता है. परिणामतः मानवीय शक्ति का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति महापुरुष एवं युग-पुरुष बन जाता है, जैसे— नेपोलियन, बिस्मार्क, लेनिन आदि.
इतिहास में महापुरुषों की भूमिका के बारे में दो परस्पर विरोधी अवधारणाएँ हैं
1. एक वर्ग उसकी भूमिका को मानते हैं.
2. दूसरा वर्ग इसे स्वीकार नहीं करता.
प्रथम वर्ग का मानना है कि महापुरुषों की भूमिका इतिहास में निर्णायक होती है अर्थात् उन शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनके द्वारा उन्होंने वर्तमान व्यवस्था को चुनौती देकर इतिहास की गति को मोड़ दिया अर्थात् व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन किए.
मैकाले – युगपुरुष मनुष्य शिखर पर आसीन वह व्यक्ति होता है, जो जनसामान्य से पहले सूर्य के प्रकाश का पूर्वाभ्यास पाता है और उनके द्वारा समाज की भावी घटनाओं को प्रतिबिम्बित किया जाता है. यूरोपीय पुनर्जागरण में मार्टिन लूथर तथा साम्यवादी आन्दोलन कार्ल मार्क्स के नेतृत्व में उभरा व पल्लवित हुआ. आध्यात्मिक आन्दोलन का नेतृत्व ईसा मसीह, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, पैगम्बर मोहम्मद आदि ने किया. स्पष्ट है कि इतिहास प्रवाह में महापुरुषों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.
प्लेन वानोव ने महापुरुष की भूमिका का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि “यदि महापुरुष जनमानस को प्रभावित कर सकता है तो इसका तात्पर्य है कि वह ऐतिहासिक घटनाओं को प्रभावित करने में सक्षम होता है. इस प्रकार वह इतिहास का निर्माता होता है."
> मोनेड़
ऐतिहासिक घटना तथा महापुरुष एक-दूसरे के पूरक होते हैं तथा उन दोनों का घनिष्ठ अन्योन्याश्रित सम्बन्ध होता है. महापुरुषों के अभाव में ऐतिहासिक घटना का कोई महत्त्व नहीं होता. ऐतिहासिक घटना के बिना महापुरुष व्यर्थ एवं अस्तित्वहीन होता है.
जबकि दूसरे वर्ग के समर्थक विद्वानों का मानना है कि ऐतिहासिक परिस्थितियाँ शक्तिशाली व सत्ता- सम्पन्न महापुरुष की अपेक्षा शक्तिशाली होती हैं. स्वयं बिस्मार्क ने माना है कि हम लोग महान् ऐतिहासिक घटना को निर्मित नहीं कर सकते. इससे इस बात की पुष्टि होती है कि इतिहास की गति पूर्व नियोजित एवं पूर्वोक्ति है तथा मनुष्य इतिहास की गति को विपरीत दिशा या प्रवाह नहीं दे सकता, बल्कि इतिहास के प्रवाह में मनुष्य उसी लक्ष्य को प्राप्त करता है जो उसे ऐतिहासिक घटनाएँ प्रदान करती हैं. इस प्रकार व्यक्ति इतिहास में कभी शक्तिशाली न होकर ऐतिहासिक घटना के सामने सदैव नतमस्तक हुआ है. 
निष्कर्षतः इस कथन में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि महापुरुषों ने इतिहास प्रवाह को महत्त्वपूर्ण मोड़ दिए हैं पर साथ ही हमें यह भी मानना चाहिए कि घटनाओं व महापुरुषों में से किसी एक को अपेक्षाकृत अधिक महत्ता नहीं दी जा सकती. इसलिए हमें दोनों विचारों के बीच सन्तुलित विचार को अपनाना चाहिए जो उचित हो और सहज भी.
> ऐतिहासिक लेखन के स्वरूप में पूर्वाग्रह अन्तर्निहित में है. चर्चा कीजिए.
प्रस्तुत प्रश्न में इस बात हेतु कि क्या इतिहास रचते समय लेखक पूर्वाग्रह से ग्रसित होता है या नहीं. इस सम्बन्ध में इसके विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला जा सकता है. पूर्वाग्रह से तात्पर्य है पहले से ही किसी विचारधारा को मान लेना और उसी स्वीकारोक्ति के आधार पर अनुसन्धान करना अर्थात् कहने का तात्पर्य यह है कि किसी विषय विशेष पर इतिहासकार ने अपनी जिस धारणा का निर्माण पूर्व में कर रखा है. वह उसी के अनुरूप लेखन कार्य करता है और उसी मत को प्रबल करता है. इसके अतिरिक्त अपने मत के पक्ष में तर्कों का अपने तरीके से प्रयोग करता है.
इतिहासकार परिस्थितियों की उपज होता है और उस पर राष्ट्रीयता, धर्म, संस्कार, रीति-रिवाज, भाषा एवं अन्योन्य बातों का प्रभाव पड़ता है या फिर दूसरे शब्दों में हम इस तरह कह सकते हैं कि इतिहासकार उपर्युक्त चीजों का चश्मा पहनकर ही अपनी अध्ययन सामग्री को देखता है. उसे फिर वे चीजें ही दिखाई देती हैं जिनमें इतिहासकार स्वयं प्रभावित होता है. इस बात को हम एक उदाहरण से अच्छी तरह से समझ सकते हैं— 1857 ई. की क्रान्ति एक महान् घटना थी और एक सर्वमान्य तथ्य था कि यह घटना काफी प्रभावशाली ढंग से घटी, किन्तु इस क्रान्ति के बारे में लेखन कार्य करने वाले इतिहासकारों की धारणाएँ एवं मनोवृत्तियाँ भिन्न होने के कारण उन्होंने इसका अलग-अलग वर्णन किया. घटना एक थी, किन्तु उसका वर्णन अनेक प्रकार से किया गया. इसका मूल कारण है प्रत्येक इतिहासकार की पूर्व निर्मित विचारधारा जैसे इस घटना को अंग्रेजी, भारतीय, मार्क्सवादी, समाजवादी, साम्प्रदायिक विचार वाले लोगों ने अपने-अपने ढंग से विवेचित सम्बन्धित होती है, वहीं साम्प्रदायिक लोगों की धर्म से. यही किया है. जहाँ कम्युनिस्टों की विचारधारा आर्थिक तत्व से कारण है कि 1857 ई. की क्रान्ति में कम्युनिस्टों ने आर्थिक तत्व को अधिक महत्त्व दिया.
इसी तरह अंग्रेजों की विचारधारा सदैव से ही भारतीयों के प्रति हीनता की रही है. अतः उन्होंने 1857 ई. की क्रान्ति के कारणों व स्वरूपों को अपने ढंग से विवेचित किया है और इसे सैन्य - विद्रोह, मुस्लिम - षड्यन्त्र, गोरे-काले का विद्रोह आदि बताया है, वहीं भारतीयों की अंग्रेजों के प्रति एक अलग भावना रही है. अतः उन्होंने इस क्रान्ति के कारणों के पीछे अंग्रेजों की कुटिलता एवं उनकी अनीतियों को जिम्मेदार ठहराया है.
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ऐतिहासिक लेख करते समय इतिहासकार की पूर्व निर्धारित धारणाओं का अत्यधिक योगदान रहता है. प्रत्येक इतिहासकार अपनी रचना का निर्माण उन्हीं विचारों को ध्यान में रखते हुए करता है, जो इस तथ्य को भली-भाँति समझने में सहायक है कि पूर्वाग्रह ऐतिहासिक लेखन को प्रभावित करते हैं.
'औरंगजेब की धार्मिक नीति' इस विषय पर जिस किसी भी इतिहासकार ने लेखन कार्य किया है, उसने उसकी धार्मिक कट्टरता को ही उभारा है. यही कारण है कि लेखक के मस्तिष्क में औरंगजेब की छवि पूर्व में ही एक कट्टर एवं धर्मान्ध शासक की रही है. यही कारण है कि आज तक औरंगजेब के दूसरे पहलू को अध्ययन में शामिल ही नहीं किया गया है. इस प्रकार इतिहास में हमें अनेक ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं, जो कि यह स्पष्ट करने में सहायक हैं कि अमुक ऐतिहासिक लेखन में इतिहासकार की पूर्वाग्रह की धारणा प्रबल है. इस प्रकार इतिहास लेखन में पूर्वाग्रह की धारणा को स्वीकार नहीं करना चाहिए.
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Sun, 08 Oct 2023 10:43:46 +0530 Jaankari Rakho
विश्व इतिहास https://m.jaankarirakho.com/443 https://m.jaankarirakho.com/443 विश्व इतिहास

> लिपि
लेखन की कला का आविष्कार प्राचीन मिस्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि है. मिस्रियों की लिपि चित्रलिपि ही थी, जिसमें किसी वस्तु का बोध कराने के लिए उसका चित्र बना दिया जाता था. मिस्रवासी पेपीरस नामक पेड़ के पत्तों सरकण्डे की कलम से लिखते थे. मिस्र की लिपि हैरोग्लिफिक कहलाती है, जिसको पढ़ने का श्रेय शैम्पोल्यां को है. सुमेरिया के वासियों ने जिस लिपि का आविष्कार किया उसे 'कौलाक्षर पर लिपि' कहा जाता है. प्राचीनतम लिपि चित्रलिपि थी, जो बाद में ध्वनि-लेखन के रूप में परिवर्तित हो गई.
> मृत्यु के उपरान्त जीवन
मृत्यु के उपरान्त जीवन का विश्वास मिस्र के लोगों का ही था. उनका विश्वास था कि मृत्यु के बाद शरीर और आत्मा दोनों जीवित रहते हैं. इसलिए वे मृत व्यक्ति के शव को सुरक्षित रखते थे. मृत व्यक्ति के शव पर एक प्रकार के रसायन का प्रलेप कर उसे बढ़िया कपड़े में लपेटा जाता था. इस प्रकार के शव को 'ममी' कहा जाता है. ममी को मकबरे में दफना दिया जाता था. मकबरे के अन्दर वे सभी वस्तुएँ रखी जाती थीं, जो मृत व्यक्ति को पसन्द थीं और जिनका वह जीवित अवस्था में प्रयोग करता था.
> विधि संहिता
बेबीलोन के सम्राट तम्मुराबी ने अपनी प्रजा के लिए एक विधि संहिता बनाई थी, जो सबसे प्राचीन विधि संहिता है. इसमें जीवन के सभी पक्षों पर ध्यान दिया गया है और अनाथों, विधवाओं और गरीबों के प्रति सहानुभूति दर्शायी गई है. इसमें दण्ड-विधान बहुत कठोर है. यह संहिता, 'खून का बदला खून' के सिद्धान्त पर आधारित है. इस विधि संहिता की त्रुटि यह है कि इसमें सभी के लिए समान दण्ड की व्यवस्था नहीं थी.
> एथेन्सी लोकतन्त्र
एथेन्स यूनान का एक महान् नगर था, जहाँ पर विश्व में प्रथम बार लोकतन्त्र स्थापित हुआ था. एथेन्स में 20 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक पुरुष नागरिक वहाँ की सभा का सदस्य होता था. सभा कानून बनाने का अधिकार रखती थी जो कि असेम्बली कहलाती थी. वर्ष में 40 बार लगभग 5000 नागरिक कानून बनाने के लिए खुली सभा में उपस्थित हुआ करते थे. यहाँ पर 500 सदस्यों की एक राजनीतिक परिषद् होती थी, जो पचास-पचास व्यक्तियों की समितियों में बँटकर शासन् की समस्याओं का निपटारा करती थी. एथेन्स के लोकतन्त्र के प्रत्येक नागरिक को कभी-न-कभी सरकारी पद सँभालने का अवसर मिलता था और वह जूरी का सदस्य भी बनता था. सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी ‘आर्कन' कहलाते थे, जो नागरिकों के द्वारा सीधे चुने जाते थे.
एथेन्स के लोकतन्त्र की कुछ दुर्बलताएँ भी थीं. वहाँ के अधिकांश निवासियों को वहाँ की नागरिकता प्राप्त नहीं थी. एथेन्स का कानून दासता को मान्यता देता था. लोकतन्त्र के लाभ केवल पुरुषों तक ही सीमित थे. वहाँ की स्त्रियाँ इनसे पूर्णतया वंचित थीं.
> रोम में गणराज्य
रोम में गणराज्य की स्थापना 600 ई. पू. हुई थी. रोम गणराज्य का विधान जनतन्त्रात्मक था और उसे 'रेस पब्लिका' कहा जाता था. गणराज्य के विधान में सीनेट, सभा तथा दो कौंसिल महत्वपूर्ण थे. कौंसिल सभा द्वारा दो वर्षों की अवधि के लिए चुने जाते थे, कानून लागू करना तथा न्यायव्यवस्था की देखभाल करना इन कौंसिलों का ही कार्य था. गणराज्य में सबसे शक्तिशाली संस्था सीनेट थी, जो सभा के निर्णय को भी रद्द कर सकती थी. सीनेट ही युद्ध का संचालन करती थी और विजित प्रान्तों के लिए नियम बनाती थी.
> कन्फ्यूसियसवाद
उसके मतानुसार शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण करना यह चीन के विचारक कन्फ्यूसियस की विचारधारा है. अर्थात् शिक्षा द्वारा सदाचार, देशभक्ति, ईमानदारी, न्याय, दयालुता आदि गुणों का विकास करना है. उसने राजनीति को नैतिक आधार प्रदान करने का प्रयास किया. उसने शिक्षा द्वारा शासकों को चरित्रवान तथा न्यायप्रिय बनाने का भरसक प्रयास किया. उसने जीवन के प्रत्येक अवसर के लिए उत्तम नियम बनाये तथा मनुष्य को शिष्ट पुरुष बनाने के उपदेश दिये.
> अभिजात्य वर्ग
यह वर्ग विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग था, जिसमें ज्यादातर भू-स्वामी सम्मिलित थे. ये लोग शासन के ऊँचे-ऊँचे पदों पर नियुक्त होते थे. इस वर्ग के लोगों का सरकारी पदों पर अधिकार था. प्राचीन रोम में अभिजात्य वर्ग को 'पेट्रिशियन' कहा जाता था.
> प्राचीन विश्व में दास प्रथा
प्राचीन विश्व में दासों की स्थिति बहुत शोचनीय थी. दिन के समय दास खेतों में काम करते, उन्हें जंजीर से एकदूसरे के साथ बाँधा जाता था. रात को उन्हें भूमि के नीचे बनी कोठरियों में जानवरों की तरह हाँक दिया जाता था. पहचान के लिए उन्हें गर्म लोहे से दागा जाता था. जानवरों की तरह उनका क्रय-विक्रय किया जाता था. प्राचीन विश्व में कृषक दासों का जीवन भी अत्यन्त दुःखमय था, उन्हें बेगार करनी पड़ती थी.
> मातृदेवी
प्राचीन सभ्यताओं में मातृदेवी की उपासना की जाती थी तथा मातृदेवी की उपासना स्त्रियों के महत्व को दर्शाती है.
> सामन्त शाही
सामन्तशाही ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें राजा सर्वोपरि था लेकिन शक्तिशाली नहीं था. उसके 'अधीश्वर' भी अपने क्षेत्रों में प्रभावी शक्ति का प्रयोग करते थे. अधीश्वर शक्तिशाली भूपति थे, जिन्हें सामन्त कहा जाता था. सामन्तों के दो प्रधान कर्त्तव्य थे
1. शान्तिकाल में अनुशासन बनाए रखना तथा लगान वसूलना.
2. युद्धकाल में राजा को सैनिक सहायता प्रदान करना.
मध्ययुग में सामन्तशाही व्यवस्था ने समाज को व्यवस्थित होने में सहयोग दिया. इस व्यवस्था के जरिए भूमि के मामले में उल्लेखनीय प्रगति हुई तथा राजा की शक्ति और भोगविलास पर नियन्त्रण रखा गया. सामन्ती प्रणाली ने शान्ति बनाये रखी, न्याय प्रदान किया व निर्बलों व स्त्रियों की रक्षा के आदर्श को विस्तृत किया.
सामन्तों के विलासमय जीवन, शोषण व करों के बोझ के बढ़ जाने से तथा कृषक दासों की दयनीय स्थिति के परिणामस्वरूप सामन्तशाही का अन्त हो गया.
> मानवतावाद
यह लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'उन्नत ज्ञान' से है. जिसमें मानवता, माधुर्य और जीवन की वास्तविकता निहित है. इसके सामने आध्यात्मिक एवं धर्मशास्त्र का महत्व गौण है. मानवतावादी जन-साधारण को सभ्य बनाने के लिए प्राचीन साहित्य पर जोर देते हैं.. मानववादियों की धारणा है कि इस जीवन को आनन्द से बिताना चाहिए और दूसरे जन्म के लिए चिन्तित नहीं होना चाहिए. पेट्रोक उसके शिष्य बुक़ैशियों ने मानवतावाद का खूब प्रचार किया. उन्होंने व्यक्ति के पूर्ण विकास को मानवजीवन का लक्ष्य माना तथा मानव समाज का लौकिक जीवन की ओर अधिक ध्यान आकर्षित किया.
> पुनर्जागरण
बौद्धिक आन्दोलन था जो इटली से 14वीं शदी में प्रारम्भ पुनर्जागरण का अर्थ है – 'फिर से जागना'. यह एक होकर 1600 ई. में सम्पूर्ण यूरोप में फैल गया. यह एक उदार सांस्कृतिक आन्दोलन था जो मानसिक स्थिति का द्योतक पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप कला, साहित्य, विज्ञान आदि में अभूतपूर्व उन्नति हुई तथा इसी से मानव-जीवन में व्यक्ति की था. सोच में भी परिवर्तन आया.
> धर्म-सुधार
धर्माधिका की चारित्रिक बुराइयों को दूर करने के लिए कुछ प्रतिभावान एवं आध्यात्मिक पुरुषों के नेतृत्व में यूरोप के जनसमाज ने जो सामूहिक आन्दोलन किया वही आन्दोलन इतिहास में 'धर्म सुधार' कहलाता है. इसका मुख्य उदेश्य चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करना तथा पोप के जीवन में नैतिक सुधार लाना था. बाइक्लिफ, वालडेन्सेन्स, जॉन हस, सेवोनारोला, इरासमस, मार्टिन लूथर आदि का इसमें महत्वपूर्ण योगदान रहा.
> चर्च की सर्वोच्चता
मध्य-युग में चर्च की सर्वोच्चता स्थापित हो गई. इसे न्याय का अधिकार मिल गया और वे अपने मामलों में अपने ही न्यायालयों में निर्णय करने लगे. धर्म-विरोधियों और नास्तिकों को दण्डित करने का अधिकार मिला. वह जन्म से मृत्यु तक अनेक संस्कारों के लिए उत्तरदायी था. इसने अपने कानून और बन्दीगृह बनाये. यह चर्च - विवाह, तलाक, वसीयत आदि विषयों में निर्णय देने लगा. उसने अनेक समाजोपयोगी कार्यों को भी अपने हाथों में लिया तथा रोगी, अनाथ व निर्धनों की सेवा की.
> दैवी अधिकार
मध्यकालीन विश्व में राजा का दैवी अधिकार प्रचलित था. उनका मानना था कि राजा का पद ईश्वर द्वारा प्रदान किया हुआ है और उसके अधिकार भी ईश्वर द्वारा ही प्रदत्त होते हैं. राजा के पास दैवी शक्ति होती है, जिससे वह दूसरों पर शासन कर सके.
> प्रबुद्ध स्वेच्छाचारी शासन
यह निरंकुश तन्त्र का रूप था, जिसमें राजा ही सर्वोच्च था. वह बड़े अफसरों की सहायता से शासन करता था किन्तु सामान्यतः उस पर कोई अंकुश नहीं था. शासक अन्तिम कानून निर्माता था. इसमें शासक पर कोई कानून लागू नहीं होता था. इसके विरोध का किसी को भी अधिकार नहीं था. इसमें कई बार जनता के अधिकारों की खुलेआम उपेक्षा की जाती थी.
> राष्ट्र राज्य
राष्ट्र राज्य वे राज्य थे जिन्होंने मध्ययुगीन सामन्तवाद का अन्त करके अव्यवस्था व अराजकता को समाप्त कर दिया तथा आर्थिक विकास में बड़ा योगदान दिया. इन्होंने प्रति एक संस्कृति के व्यक्तियों को संगठित करके राष्ट्र के निष्ठा का विकास किया. इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस, स्पेन और प्रशा का राष्ट्रीय राज्यों के रूप में उदय हुआ, जिन्होंने अपने देश के लोगों में राष्ट्रीयता तथा देशभक्ति पैदा की.
> पवित्र रोमन साम्राज्य
पवित्र रोमन साम्राज्य की राजधानी रोम नगर था. रोम ईसाई जगत का मुख्य धर्माधिकारी था. यही पोप कहलाया जो दुनिया के ईसाइयों का सर्वोच्च धर्मगुरू बन गया. पोप का वाक्य ब्रह्म वाक्य समझा जाने लगा तथा उसकी आज्ञाओं का पालन करना अनिवार्य हो गया. पवित्र रोमन साम्राज्य ईसाई धर्म का केन्द्र था जो विश्व में ईसाइयों का प्रतिनिधित्व करता था.
> सामाजिक संविदा तथा जनइच्छा
सामाजिक संविदा रूसो का ग्रन्थ था, जिसमें उसने इस बात पर जोर दिया कि सभी व्यक्ति स्वतन्त्र एवं समान हैं तथा सरकार का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना है. उसने इस बात पर जोर दिया कि शासन सभाओं की उत्पत्ति एक संविदा द्वारा हुई है.
> गुटनिरपेक्षता
में यूगोस्लाविया की स्वतन्त्र राजधानी बेलग्रेड में 1961 ई. स्थापना, विश्व के गुटों की राजनीति से अलग रहना और किसी गुट में शामिल नहीं होना गुटनिरपेक्षता कहलाती है. यह एक सुविचारित अवधारणा थी, जिसका उद्देश्य नवोदित राष्ट्रों की स्वाधीनता की रक्षा करना एवं युद्ध की सम्भावनाओं को रोकना था. इस अवधारणा के उदय के पीछे मूल धारणा यह थी कि साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने वाले देशों को शक्तिशाली गुटों से अलग रखकर उनकी स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखा जाये. इस आन्दोलन के संस्थापकों में नेहरू, मार्शल टीटो, अब्दुल नासिर आदि का महत्वपूर्ण योगदान है.
> राष्ट्रमण्डल
राष्ट्रमण्डल उन देशों का संगठन है, जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन थे और जिन्होंने स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद ब्रिटेन के साथ लगभग बराबरी के सम्बन्ध स्थापित रखते हुए ब्रिटिश परम्परा से एक परिवार जैसा सम्बन्ध रखने का निश्चय किया है. राष्ट्रमण्डल का उदेश्य–अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और सदस्य राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाना, अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक और मानव कल्याण सम्बन्धी समस्याओं को हल करना है.
> गोरों पर बोझ
यह सिद्धान्त मुख्यतः इंगलैण्ड ने दिया. उसके अनुसार उपनिवेशों की जनता असभ्य है और हमें उनको सभ्य बनाना है और यह भार हमने अपने कन्धों पर लिया है. अर्द्ध-नग्न तथा असभ्य लोगों को ईसाई धर्म में दीक्षित कर उन्हें सभ्य बनाना ही ‘गोरों' पर 'बोझ' या 'श्वेत जाति का भार' है. इटली ने इस कार्य को 'पुनीति कर्त्तव्य' माना है.
> समाजवाद
व्यक्तिवाद तथा पूँजीवाद के विपरीत व्यवस्था समाजवाद है. इसके अन्तर्गत व्यक्ति की अपेक्षा समाज पर जोर दिया जाता है. इसका उद्देश्य समाज में समानता उत्पन्न करना है परन्तु फिर भी यह वर्गों के अस्तित्व पर विश्वास करता है. इस व्यवस्था में कोई किसी का शोषण नहीं कर सकेगा, समाज का उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व होगा. आर्थिक समानता होगी तथा सभी को सामाजिक न्याय प्राप्त होगा.
> सर्वसत्तावाद
जिस राज्य में मानव जीवन की समस्त क्रियाएँ राज्य द्वारा संचालित एवं नियन्त्रित होती हैं, वह 'सर्वसत्तावाद' कहलाता है. ऐसे राज्य में एक व्यक्ति या एक दल की तानाशाही होती है तथा लोकतन्त्र और मौलिक अधिकारों का कोई महत्व नहीं होता. इसमें लोगों की स्वतन्त्रता का भी कोई महत्व नहीं रहता. मुसोलिनी के नेतृत्व में इटली में तथा हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी में 'सर्वसत्तावाद' का उदय हुआ.
> मानव अधिकार
मानव द्वारा जो नैतिक, मौलिक एवं असंक्राम्य अधिकार धारण किये जाते हैं. उन्हें मानव अधिकार कहा जाता है. यह सभी समाजों में अन्तर्निहित वह व्यवस्था है, जिसमें जाति, धर्म, लिंग, वर्ण तथा राष्ट्रीयता के आधार पर प्रभेद नहीं किया जाता है. मानव अधिकारों को चार्टर का रूप देने का श्रेय रेन कासिम को जाता है. मानव अधिकारों का पहला सम्मेलन तेहरान में हुआ. एशिया वॉच, एमनेस्टी इण्टरनेशनल आदि अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन हैं. भारत ने भी 1993 ई. में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया. मानव अधिकारों का हनन वर्तमान विश्व की प्रमुख समस्या है.
> संसदीय लोकतन्त्र
संसदीय लोकतन्त्र ऐसा लोकतन्त्र है, जिसमें संसद सर्वोच्च होती है और वही कानून बनाने की सर्वोच्च संस्था होती है. का निर्माण जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा होता है. संसदीय लोकतन्त्र में जनता की प्रत्यक्ष भागदारी होती है तथा उनका प्रतिनिधि प्रधानमन्त्री होता है, जो शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता है. संसदीय लोकतन्त्र ब्रिटेन की देन है.
>  प्रभाव क्षेत्र
साम्राज्यवादी देशों ने (जिनमें ब्रिटेन, रूस, जर्मनी अमेरिका तथा फ्रांस मुख्य थे) एशिया और अफ्रीका महाद्वीप में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित किये और उन्हें अपने नियन्त्रण में रखा. ये क्षेत्र ही प्रभाव क्षेत्र कहलाते थे. इन क्षेत्रों का इन देशों ने आर्थिक शोषण किया तथा इन पर अपना राजनीतिक व प्रशासनिक नियन्त्रण स्थापित किया.
> राष्ट्रवाद
किसी भी राष्ट्र की स्वतन्त्रता, सम्प्रभुता व समानता का विचार राष्ट्रवाद कहलाता है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गुलाम व परतन्त्र देशों में राष्ट्रवाद का बहुत प्रचार हुआ और उन्होंने स्वतन्त्रता प्राप्त की राष्ट्र के प्रति देशभक्ति भी राष्ट्रवादी विचारधारा का एक महत्वपूर्ण अंग है. 
> अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति
विश्व में सैनिकवाद, शस्त्रीकरण व युद्धों की सम्भावनाओं व प्रयासों पर प्रतिबन्ध लगाने तथा उनको रोकने का प्रयास करना अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित करना है. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति वर्तमान विश्व की महत्वपूर्ण समस्या है, जिसको प्रथम विश्व-युद्ध के बाद 'राष्ट्रसंघ' व द्वितीय विश्व - युद्ध के बाद 'संयुक्त राष्ट्रसंघ' की स्थापना अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित करने के लिए की गई.
> प्रजातिवाद
किसी विशेष जाति या प्रजाति के हितों का संरक्षण करना प्रजातिवाद है. इसमें किसी भी देश द्वारा अपनी प्रजाति का अन्य देशों में भी संरक्षण किया जाता है. इसमें अपने राजनीतिक हितों की भी पूर्ति की जाती है. 19वीं सदी अखिल स्लाव आन्दोलन प्रजातिवाद का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें रूस ने स्लाव जाति का बहाना लेकर अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति की थी.
> विश्वव्यापी मन्दी (1929) (Great Depression 1929)
प्रथम विश्व युद्ध के बाद बर्बाद राष्ट्रों ने तेजी से अपने विकास के प्रयास किये, जिसके कारण उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि हो गयी और व्यापारियों का मुनाफा बढ़ता गया, लेकिन दूसरी ओर अधिकांश लोग गरीबी और अभाव में पिसते रहे. प्रौद्योगिकी प्रगति तथा बढ़ते मुनाफों के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी कि जो कुछ भी उत्पादित किया जाता था, उसे खरीद सकने वाले लोग बहुत कम थे. इससे शेयरों की कीमतों में गिरावट आयी और लोग शेयर धड़ाधड़ बेचने लगे, जिससे बैंकों का दिवाला निकल गया. विश्वव्यापी आर्थिक मन्दी का दौर शुरू हो गया. वस्तुओं की कीमतें गिर गईं, अनेक व्यवसाय बन्द हो गए, लोगों की नौकरियाँ छूट गईं और बेरोजगारी काफी बढ़ गई. केवल सोवियत संघ को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व आर्थिक मन्दी के दौर से गुजर रहा था. यह दौर 1933 ई. तक रहा.
> रंगभेद (Apartheid)
गोरे एवं काले रंग के दोनों लोगों के मध्य असमानता को ही रंगभेद की संज्ञा दी जाती है. 1930 ई. के दशक में अमरीका में रंगभेद ने बहुत अधिक जोर पकड़ा तथा काले रंग के लोगों को नीग्रो तथा हब्सी कहकर पुकारा गया. उनके ऊपर तरह-तरह की निर्योग्यताएँ लाद दी गयीं. ठीक इसी प्रकार अंग्रेजों ने दक्षिण अफ्रीका रंगभेद नीति का अनुसरण किया, जिससे यहाँ के मूल निवासी सभी प्रकार के नागरिक अधिकारों से वंचित रहे.
> शीतयुद्ध (Cold War)
शीतयुद्ध का जन्म मुख्य रूप से रूस में साम्यवादी सरकार की स्थापना के बाद विश्व के अन्य पूँजीवादी देशों अमरीका, ब्रिटेन आदि के द्वारा इसका विरोध करने के कारण हुआ. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व स्पष्टतः दो खेमों में बँट गया. एक खेमे का नेतृत्वकर्ता सोवियत संघ था, जबकि दूसरे का अमरीका. दोनों देश अपने को विश्व में सर्वश्रेष्ठ बनाये रखने तथा राजनैतिक वर्चस्व बनाने के लिए हथियारों की होड़ में लगे रहे. इस काल को शान्तिपूर्ण शस्त्र सज्जीकरण का काल भी कहा जाता है. 
> शक्ति सन्तुलन (Balance of Power)
अमरीका व सोवियत संघ के मध्य शीतयुद्ध के कारण विश्व स्पष्टतः दो खेमों में विभाजित था, जिसके कारण विश्व में यह व्यवस्था द्वितीय महायुद्ध के बाद अब तक बनी रही है, परन्तु सोवियत संघ में विघटन के बाद तथा रूस में 'लोकतन्त्र के आ जाने से अमरीकी संगठन की भूमिका अब विश्व में प्रभावशाली हो गयी है. इससे अब यह कहा जाता है कि दोनों शक्तियाँ जो एक-दूसरे के प्रभाव को कम करती थीं. समाप्त हो गयी हैं और शक्ति सन्तुलन अमेरिका की ओर झुक गया है.
> नाजीवाद (Nazism)
नाजीवाद अधिनायकतन्त्र का एक रूप है, जो जर्मनी में प्रथम विश्व युद्ध के हिटलर के नेतृत्व में उदित हुआ. यह राजनैतिक लोकतन्त्र एवं नागरिक स्वतन्त्रता को हीनता की नजर से देखता था. युद्ध की महिमा का गुणगान करना इसकी एक अन्य प्रमुख विशेषता थी. इसका उद्देश्य प्राचीन जर्मनी के ट्योतनी साम्राज्य की महानता को जर्मनी में पुनः स्थापित करना था. इसके साथ ही जर्मन नस्ल को विश्व की अन्य नस्लों से श्रेष्ठ मानता था तथा महान् जर्मनी के निर्माण का पोषक था.
> नारी अधिकारवाद (Feminism)
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–45) के मध्य जान-माल एवं घायल सैनिकों की सेवा करने के लिए बहुत अधिक चिकित्सकों, नर्सों आदि की आवश्यकता पड़ी, जिसे इस युद्ध के दौरान नारियों द्वारा पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर सेवा कार्य किया गया. इससे नारियों के सम्मान में अत्यधिक वृद्धि हुई और इनके महत्व को समझा गया. इस कारण से अनेक नारी संगठनों का जन्म हुआ और इन्होंने पुरुषों के समान ही नारियों के अधिकारों की माँग की. इसे ही नारी अधिकारवाद कहा जाता है.
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Sun, 08 Oct 2023 10:37:09 +0530 Jaankari Rakho
भारत की विदेश नीति https://m.jaankarirakho.com/442 https://m.jaankarirakho.com/442 भारत की विदेश नीति

> भारतीय विदेश नीति को निर्धारित करने वाले तत्व
विश्व शान्ति, गुटनिरपेक्षता, निःशस्त्रीकरण का समर्थन, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व नस्लवाद का विरोध अफ्रोएशियाई एकता का आह्वान और संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों में आस्था भारतीय विदेश नीति की नींव के पत्थर समझे जा सकते हैं. ये सभी सिद्धान्त आपस में गुँथे हुए थे और दूरदर्शी थे. विदेशी-नीति निर्धारण सम्बन्धी उत्तरदायी प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
(1) विश्व शान्ति – विश्व शान्ति में नेहरू की आस्था इसलिए थी कि वे अत्यन्त साहसी व्यक्ति थे. विश्व-शान्ति के प्रति उनका आकर्षण व्यक्तिगत अनुभव था, जिसमें उन्होंने यूरोप के देशों को युद्ध की आग में बर्बाद होते देखा था. इसलिए भारत के आजाद होते ही उन्होंने विश्व शान्ति के सम्बन्ध में अपना दृष्टिकोण रखा. नेहरू यूरोप में महायुद्ध तथा एफ्रो-एशियाई देशों में गृहयुद्ध के अपने निजी अनुभव से यह बात भली-भाँति समझते थे कि युद्ध का दबाव अन्य सभी सामाजिक प्राथमिकताओं को पीछे ढकेल देता है. इसीलिए नेहरूजी ने अपनी विदेश नीति नियोजन में विश्वशान्ति को प्राथमिकता दी.
(2) गुटनिरपेक्षता – विश्व शान्ति के लिये गुटनिरपेक्षता की अवधारणा महत्त्वपूर्ण पहल थी. द्वितीय महायुद्ध के बाद युद्ध - विराम के हो जाने के पश्चात् भी शान्ति नहीं लौट पायी थी. अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति तनावपूर्ण एवं जोखिम भरी हो गयी थी. नेहरूजी ने नवोदित राष्ट्रों को गुटनिरपेक्ष नीति अपनाने का सुझाव रखा. इस नीति का अर्थ निष्क्रिय उदासीनता, तटस्थता या अवसरवादिता नहीं था, वरन् राष्ट्रीय हित के अनुकूल विकल्प चुनना ही असली गुटनिरपेक्षता थी. नेहरूजी का इरादा भारत को महाशक्तियों के दंगल से बचाकर रखने का था.
(3) निःशस्त्रीकरण – जिस तरह गुटनिरपेक्षता विश्वशान्ति से जुड़ी हुई थी, उसी तरह निःशस्त्रीकरण का मुद्दा गुट-निरेपेक्षता से गुँथा हुआ था, जब तक शस्त्रों की दौड़ जारी रहेगी, विश्व-शान्ति की कल्पना नहीं की जा सकती. नेहरूजी ने अन्तर्राष्ट्रीय मंच से निःशस्त्रीकरण का संदेश प्रसारित किया. इसके लिए वे आत्मीय मित्रों से भी टकरा गये, जिसका उदाहरण बेलग्रेड शिखर सम्मेलन (1961) में उनकी सुकार्तो के साथ मुठभेड़ थी.
(4) साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व रंगभेद का विरोधविश्व शान्ति, गुटनिरपेक्षता व निःशस्त्रीकरण की पक्षधरता के बावजूद नेहरूजी द्वारा निर्धारित भारतीय विदेश नीति के सिद्धान्तों में साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद व नस्ल भेद का कट्टर विरोध सम्मिलित था. सतही दृष्टि से इसमें विरोधाभास जान पड़ता है परन्तु ऐसा नहीं था. नेहरूजी के अनुसार विश्व शान्ति में ये सबसे बड़े बाधक कारण हैं.
(5) एफ्रो-एशियाई एकता— नेहरूजी ने यह बात अच्छी तरह गाँठ बाँध ली थी कि सभी विपन्न और वंचित राष्ट्रों व समाजों के हित एकसमान हैं. इस प्रकार नेहरूजी द्वारा एफ्रोएशियाई भाई-चारे की बात उठाना कोरा भावावेश नहीं, बल्कि एक तर्कसंगत कदम था.
(6) संयुक्त राष्ट्र संघ में आस्था – नेहरूजी का इस संस्था के प्रति आकर्षण आदर्शवाद नादानी से प्रेरित न होकर, बल्कि उपर्युक्त अन्तर्सम्बंधित सिद्धान्तों के व्यवहार में रूपान्तरण की सम्भावना के कारण उपजा था. उनके अनुसार इस संस्था का उपयोग विश्व शान्ति की स्थापना निःशस्त्रीकरण के प्रसार व साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद तथा नस्लवाद के विरुद्ध संघर्ष के लिए पर्याप्त रूप से किया जा सकता है.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता के बाद भारतीय प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने विश्वशान्ति बनाये रखने के आधार पर अपनी विदेश-नीति सम्बन्धी प्राथमिकता कायम की. उनकी वही नीतियाँ कमोवेश आज भी राष्ट्र का पथ-प्रदर्शक बनी हुई हैं.
> भारत की विदेश नीति (1947–64) का मूल्यांकन
अथवा
नेहरूजी की विदेश नीति का मूल्यांकन
नेहरूजी की विदेश नीति के प्रमुख सिद्धान्त स्वाधीनता संग्राम के दिनों में ही सुनिश्चित हो गये थे. व्यावहारिक रूप में इनको औपचारिक रूप से पंचशील के नाम से परिभाषित किया गया. भले ही भारत व चीन के मध्य पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर अप्रैल 1954 ई. में किये गये, परन्तु 1947 ई. से लेकर 1954 ई. तक भारत के अन्तर्राष्ट्रीय क्रियाकलाप इसी आधार पर संचालित एवं समायोजित होते रहे.
पंचशील के सिद्धान्त निम्नलिखित हैं – 
1. सभी राष्ट्र एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता व सम्प्रभुता का सम्मान करेंगे.
2. एक राज्य दूसरे राज्य पर आक्रमण न करे और दूसरों की राष्ट्रीय सीमाओं का अतिक्रमण न करे.
3. कोई राज्य किसी दूसरे राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करे.
4. प्रत्येक राज्य एक-दूसरे के साथ समानता का व्यवहार करे तथा पारस्परिक हित में सहयोग प्रदान करे.
5. सभी राष्ट्र शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धान्त में विश्वास करें तथा इसी सिद्धान्त के आधार पर एक दूसरे के साथ शान्तिपूर्वक रहें तथा अपनी पृथक् सत्ता व स्वतन्त्रता बनाये रखें.
आलोचकों के अनुसार पंचशील योजना नेहरूजी की आदर्शवादी सोच थी. इसके अतिरिक्त कुछ नहीं, परन्तु इस बात की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि पंचशील की राजनयिक रणनीति राष्ट्रीय हितों की यथार्थवादी कसौटी पर खरी उतरती है.
आजादी के बाद पाकिस्तानी शासकों ने कश्मीर को हथियाने के लालच में भारतीय सीमा का अतिक्रमण किया चीन ने 1950 ई. में तिब्बत को मुक्त कराने का प्रयास प्रारम्भ किया. हिमालयी सीमान्त प्रदेश विवादास्पद बन गया. ऐसी स्थिति में यदि नेहरूजी ने राष्ट्रों को सम्प्रभुता की रक्षा व भौगोलिक सीमाओं के सम्मान से बचने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय जनमत तैयार करने का प्रयास किया तो इसे आदर्शवादी कैसे कहा जा सकता है ?
लोर्ड काविक और नेविल मैक्सवेल जैसे लेखकों ने इसे धूर्ततापूर्ण पाखण्ड कहा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत को सैनिक ताकत बनाने के लिए कुछ मोहलत जुटाना था. इन बातों में कोई बुनियादी अन्तर्विरोध नहीं है. आर्थिक व सैनिक उपकरणों के अभाव में यदि बाण्डुग सम्मेलन के अवसर पर यदि नेहरूजी ने भारत को प्रतिष्ठा दिलाई थी तो इसके पीछे पंचशील की ही प्रमुख भूमिका थी.
बाण्डुग सम्मेलन की प्रमुख बात यह थी कि एफ्रोएशियाई देशों के इस सम्मेलन का आयोजन भारत के सुझाव पर नहीं किया गया था. कोलम्बो परियोजना में सम्मिलित पश्चिमी देशों के पक्षधर राष्ट्रों ने इसकी पहल की थी परन्तु नेहरू व मेनन ने इसे नवोदित राष्ट्रों की स्वतन्त्रता और गुटनिरपेक्षता का प्रतीक बना दिया.
नेहरूजी ने शीत युद्ध के संकट में जिस तरह सैनिक संगठनों को असफल करने का प्रयास किया वह प्रशंसनीय था. बाण्डुग सम्मेलन से पहले कोरिया में अपनी निष्पक्ष मध्यस्थता और हिन्द-चीन युद्ध में युद्ध विराम के लिए भारत ने अपनी पात्रता सिद्ध कर दी थी.
नेहरूजी की कमजोरी यह थी कि वे अपनी पसन्द और नापसन्द को छिपाकर नहीं रख पाते थे. वे समाजवादी जनतन्त्रवादी थे तथा सैनिक शासन व सामन्तवाद को प्रतिक्रियावादी समझते थे. इसी कारण नेपाल तथा पाकिस्तान के साथ उनका व्यवहार कभी सहज नहीं हो सका.
नेहरूजी की कथनी एवं करनी में कई जगह स्पष्टतया अन्तर देखने को मिलता है; जैसे— गोआ की मुक्ति के लिए बल प्रयोग शान्तिपूर्ण निपटारे की बात करके जनमत संग्रह के अपने आश्वासन को कश्मीर में निरन्तर टालते रहे. 
महाशक्ति और पड़ोसियों के साथ 1947-64 तक भारत के राजनयिक सम्बन्धों के उतार-चढ़ाव में उनका तनाव स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित होता है.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि नेहरूजी एक सिद्धान्तवादी एवं आदर्शवादी व्यक्ति थे परन्तु उनके व्यवहार में हमें कई जगह अन्तर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है अतः यह कहना उचित होगा कि नेहरूजी ने नवोदित भारत को जिस विदेश नीति का स्पष्ट दिशा-निर्देश दिया, उसी के आधार पर देश के भविष्य की नीतियाँ निर्धारित होती रहीं.
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Sun, 08 Oct 2023 10:27:45 +0530 Jaankari Rakho
स्वातंत्र्योत्तर काल में आर्थिक नीतियाँ एवं योजना प्रक्रिया एवं राज्यों का पुनर्गठन https://m.jaankarirakho.com/441 https://m.jaankarirakho.com/441 स्वातंत्र्योत्तर काल में आर्थिक नीतियाँ एवं योजना प्रक्रिया एवं राज्यों का पुनर्गठन

> आर्थिक नीतियाँ तथा योजना प्रक्रिया
भारत में स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद देश के चहुँमुखी विकास के लिए जिस आर्थिक नीति को अपनाया उसे ‘नियोजित आर्थिक’ विकास कहा जाता है. इसके अन्तर्गत पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश में आर्थिक समृद्धि और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने का प्रयास देश के द्वारा किया जा रहा है. यद्यपि मूल रूप से नियोजन समाजवादी अर्थ - व्यवस्था का साधन रहा है, परन्तु वर्तमान में पूँजीवादी देश भी इस व्यवस्था को अपनाकर अपने देश के विकास के लिए प्रयासरत् हैं. देश के आर्थिक विकास के लिए योजना निर्माण का कार्य योजना आयोग करता है, परन्तु इससे पूर्व की व्यवस्था के लिए हमें आजादी से पूर्व के परिप्रेक्ष्य को जानना आवश्यक होगा.
आजादी से पूर्व ही अनेक विद्वानों, उद्योगपतियों और नेताओं ने देश के आर्थिक विकास हेतु 1930 ई. के दशक में कई योजनाएँ प्रस्तुत की जो निम्नलिखित 
हैं—
(1) विश्वेश्वरैया योजना — 1934 ई. में प्रसिद्ध इंजीनियर विश्वेश्वरैया ने अपने शोध ग्रन्थ 'The Planed Economy of India' में देश के आर्थिक विकास के लिए एक योजना प्रस्तुत की, जिससे कि 10 वर्षों में ही देश की राष्ट्रीय आय दोगुनी हो जाती. इस योजना में कृषि से अतिरिक्त श्रम को स्थानान्तरित कर उसे उद्योगों में लगाने की बात प्रमुखता से थी.
(2) कांग्रेस योजना – 1938 ई. में कांग्रेस शासित राज्यों के उद्योगमन्त्रियों की एक बैठक में देश की गरीबी एवं बेरोजगारी, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं आर्थिक विकास हेतु औद्योगीकरण को अनिवार्य मानते हुए इसके लिए एक व्यापक योजना बनाने का प्रस्ताव रखा गया, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष बोस ने नेहरूजी की अध्यक्षता में राष्ट्रीय समिति (National Planning Committee) की स्थापना की.
(3) गांधी योजना – यह योजना का प्रतिपादन प्रसिद्ध गांधीवादी अर्थशास्त्री एस. एन. अग्रवाल द्वारा प्रतिपादित की गयी. इसमें 3000 करोड़ रुपये के विनियोग का प्रावधान किया गया था. इसकी एक अन्य विशेषता यह थी कि इसमें उद्योगों के स्थान पर कृषि को अधिक महत्त्व दिया गया था. साथ ही आत्मनिर्भर गाँवों पर आधारित विकेन्द्रित आर्थिक संरचना तैयार करने पर बल दिया गया था.
(4) अर्थशास्त्रियों की मुदालियर समिति – 1941 ई. में विभिन्न अर्थशास्त्रियों की एक समिति ने रामास्वामी मुदालियर के नेतृत्व में ट्रान्सपोर्ट, बैंकिंग उद्योग, वाणिज्य, मुद्रा एवं विदेशी मुद्रा के विकास से सम्बन्धित सैद्धान्तिक नीतियों के निर्धारण हेतु सुझाव प्रस्तुत किये.
(5) बोम्बे प्लान – आठ उद्योगपतियों ने देश के आर्थिक विकास हेतु 1944 ई. में एक योजना प्रस्तुत की, जो बोम्बे प्लान (A Plan of Economic Development) के नाम से जानी जाती है. 10,000 करोड़ रुपये की यह योजना कृषि की तुलना में उद्योगों को अधिक महत्त्व देती थी.
(6) पीपुल्स प्लान – एम. एन. रॉय ने 15,000 करोड़ रुपये की एक विस्तृत 10 वर्षीय योजना प्रस्तुत की, जो कृषि एवं उद्योगों का तीव्र विकास करके लोगों के जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति कराने पर बल देता था.
ऊपर वर्णित सभी योजनाएँ केवल ऐतिहासिक महत्व की हैं, क्योंकि इनका कभी भी क्रियान्वयन नहीं हो सका, फिर भी इनका महत्त्व इसलिए है कि इन्होंने नियोजन के महत्त्व को स्पष्टतया रेखांकित किया.
राष्ट्र के विकास के लिए स्वतन्त्रता के बाद सरकार ने मार्च 1950 ई. में प्रधानमन्त्री की अध्यक्षता में 'योजना आयोग' (Planning Commission) का गठन किया गया, जिसे देश के विकास की रणनीति निर्धारित करने का दायित्व दिया गया. इसकी सिफारिश के आधार पर ही देश में प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) लागू की गयी.
> आर्थिक नियोजन के उद्देश्य
भारत में आर्थिक नियोजन के उद्देश्यों का निर्धारण योजना आयोग द्वारा निम्नलिखित बिन्दुओं में किया गया है
1. उत्पादन को अधिकतम करना, ताकि राष्ट्रीय और प्रति
2. व्यक्ति आय के उच्च स्तरों को प्राप्त किया जा सके. पूर्ण रोजगार की प्राप्ति. 
3. आय और सम्पत्ति की असमानता को घटाना.
4. समानता और न्याय पर आधारित एक समाजवादी समाज की स्थापना और शोषण का अन्त.
ऊपर वर्णित आदर्श उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है परन्तु अभी भी हम लक्ष्य से बहुत दूर हैं. देश में गरीबी निरन्तर बढ़ती जा रही है तथा धनी वर्ग और अधिक धनी होता जा रहा है.
देश के विकास के लिए बनाई गयी योजनाओं में राष्ट्रीय आय और आर्थिक संवृद्धि पर अधिक जोर दिये जाने से रोजगार के अवसर कम हुए हैं तथा सम्पत्ति का अत्यधिक केन्द्रीयकरण हुआ है, जिसके कारण हम अपने वास्तविक आदर्श उद्देश्यों को प्राप्त करने में असफल रहे हैं.
> भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति
जे. एम. कीन्स ने पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और समाज - वादी अर्थव्यवस्था को मिलाकर एक नवीन मिश्रित अर्थव्यवस्था का प्रतिपादन किया, जिसमें कि इन दोनों व्यवस्थाओं का समावेश था.
भारत ने भी इसी व्यवस्था को अपनाया. निजी क्षेत्र की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका के साथ-साथ सरकार ने भी भारी मात्रा में देश में निवेश किया है. वास्तव में भारतीय नीति-नियन्ताओं ने देश के तीव्र आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के माध्यम से ही आर्थिक अधःसंरचना (Inter structure) की स्थापना का समर्थन किया है. इसी उद्देश्य से नियोजन को अपनाया गया. इस निवेश में सार्वजनिक क्षेत्र का हिस्सा आधे से भी अधिक रहा. देश में आर्थिक विकास में सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की स्पष्ट भागीदारी रही है. कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जहाँ ये दोनों क्षेत्र संयुक्त रूप से कार्यरत् हैं.
मिश्रित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए नियोजन एक आवश्यक तत्व बन जाता है, क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र जिन महान् आदर्श उद्देश्यों को सामने रखकर क्रियाशील होता है, उनकी आपूर्ति के लिए आवश्यक है कि उसे नियोजित रूप से सही दिशा में क्रियाशील किया जाये. सरकार ने इस हेतु विशालकाय उद्योगों की स्थापना की, गरीबी के निवारण हेतु अनेक कार्यक्रम चलाये, बैंकिंग, बीमा आदि सेवाओं का क्रियान्वयन एवं नियन्त्रण अपने हाथों में रखा. कृषि के विकास हेतु आर्थिक अनुदान प्रदान किया.
सार्वजनिक क्षेत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका के साथ-साथ भारत में निजी क्षेत्र का महत्व भी अधिकतम है क्योंकि योजनागत व्यय का आधा हिस्सा निजी क्षेत्र के द्वारा ही खर्च होता है. भारी रसायन, ओटोमोबाइल, सीमेण्ट, उर्वरक, वस्त्र आदि उद्योगों में निजी क्षेत्र की अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका है.
> योजना प्रक्रिया
योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत विकास के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु सरकार ने कुछ ऐसी नीतियों का निर्धारण किया, जिससे कि कृषि के विकास के साथ-साथ औद्योगिक आधार को भी मजबूती प्रदान की जा सके और देश को आत्मनिर्भर बनाया जा सके.
देश के सम्मुख प्रथम पंचवर्षीय योजना में यह उद्देश्य रखा गया था कि समाजवादी समाज की स्थापना के साथसाथ उत्पादन को भी उच्चतम रखा जाये. अतः इस महत्त्वपूर्ण उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही समस्त नीतियों का निर्धारण किया गया.
देश के विकास के लिए जिस व्यवस्था को अपनाया गया है, वह पंचवर्षीय योजना प्रणाली ही थी, जो कि निम्नलिखित प्रकार से है—
प्रथम पंचवर्षीय योजना (1950-51-1955-56)
इस योजना के समय देश में खाद्यान्न की समस्या सर्वप्रमुख थी तथा द्वितीय विश्व युद्ध के कारण देश की अर्थव्यवस्था डगमगाई हुई थी. अतः अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के उद्देश्य से सिंचाई, परिवहन, संचार आदि पर विशेष ध्यान दिया गया. इसके साथ ही कृषि के विकास के लिए प्रयास किए गए.
द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1955-56-1960-61)
यह योजना प्रो. पी. सी. महालनोबिस की 'ऑपरेशनल अनुसन्धान पद्धति' पर आधारित थी. इसमें औद्योगीकरण को तीव्र करने के लिए आधारभूत उद्योगों के विकास पर अधिक बल दिया गया. अतः भारी उद्योगों की स्थापना की गयी; जैसे – लोहा, इस्पात, रसायन आदि.
तृतीय पंचवर्षीय योजना (1961-62-1965-66)
यह योजना जॉन सैण्डी तथा प्रो. चक्रवर्ती द्वारा निर्मित संवृद्धि के आधार पर बनाई गयी थी. इस योजना में कृषि और उद्योग का विकास, आर्थिक एवं सामाजिक विकास, राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक विकास, घरेलू एवं विदेशी साधनों की उपलब्धता आदि के लिए सन्तुलित रूप से प्रयास करने पर बल दिया गया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि देश के विकास के लिए स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद योजना आयोग के माध्यम से नीतियों का निर्माण कर पंचवर्षीय योजना के रूप में सरकार निरन्तर प्रयास कर रही है. हालांकि अभी तक हम अपनी समस्याओं पर पूर्ण रूप से विजय प्राप्त नहीं कर सके हैं, फिर भी हमें काफी उत्साहजनक सफलता मिली है.
राज्यों का भाषा वैज्ञानिक पुनर्गठन
> भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की समीक्षा
देश के स्वतन्त्र हो जाने के बाद ब्रिटिश भारत एवं देशी राज्यों को मिलाकर सरदार पटेल ने संघीय भारत के निर्माण का महान् कार्य किया, परन्तु नवगठित राज्यों द्वारा यह माँग बार-बार उठायी जाती थी कि अंग्रेजों ने जैसे-जैसे भारत को जीता वैसे-वैसे ही नये राज्यों का गठन किया. इसके लिए उन्होंने किसी सिद्धान्त या नियम को नहीं अपनाया. अतः राज्यों का नये सिरे से पुनर्गठन आवश्यक है.
> भाषा के आधार पर प्रान्तों के गठन की माँग 
आजादी से बहुत पूर्व 1920 ई. में कांग्रेस ने किसी एक आधार पर राज्यों के गठन की माँग को स्वीकार कर लिया था. परन्तु स्वतन्त्रता के बाद जब कांग्रेस सरकार ने इस तरफ ध्यान न देकर अंग्रेजों की भाँति नई इकाइयों का गठन करना जारी रखा तो लोगों में भाषा व संस्कृति के आधार पर प्रान्तों के पुनर्गठन की माँग उठने लगी. प्रारम्भिक तीन-चार वर्षों में कांग्रेस ने इस माँग की तरफ विशेष ध्यान नहीं दिया. उसे यह आशंका उत्पन्न हो गयी थी कि भाषा व संस्कृति के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन करने से विघटनकारी प्रवृत्तियों को बल मिलेगा, जिससे देश की राजनैतिक व सांस्कृतिक एकता के लिए खतरा उत्पन्न हो जायेगा परन्तु इस समस्या ने व्यापक आन्दोलन का रूप धारण कर लिया. आन्ध्र में भाषा के आधार पर राज्य की स्थापना को लेकर उग्र आन्दोलन हुए तथा साथ में मद्रास प्रान्त दंगों की लपेट में आ गया. जब स्थिति अनियन्त्रित हो गयी तब विवश होकर भारत सरकार को अक्टूबर 1953 ई. में मद्रास प्रान्त के 'तेलुगू भाषी' लोगों को अलग-अलग कर एक नये आन्ध्र राज्य की स्थापना करनी पड़ी. इस प्रकार भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की माँग को लेकर जन-आन्दोलन को यह पहली सफलता मिली.
> राज्य पुनर्गठन आयोग की नियुक्ति
आन्ध्र राज्य की स्थापना ने इस आन्दोलन को शक्ति एवं गति प्रदान की, जिससे अन्य राज्यों में भी भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की माँग जोर पकड़ने लगी. सरकार दंगे-फसाद का दृश्य दोहराना नहीं चाहती थी. अतः दिसम्बर 1953 ई. में प्रधानमन्त्री नेहरूजी ने घोषणा की कि भारत सरकार राज्यों के पुनर्गठन के विषय में शीघ्र ही एक आयोग नियुक्त करेगी सरकार ने तीन सदस्यों वाला एक आयोग गठित कर दिया, जो 'राज्य पुनर्गठन आयोग' कहलाया. फजल अली को इसका अध्यक्ष तथा पं. हृदयनाथ कुंजरू और सरदार पाणिक्कर को इसका सदस्य नियुक्त किया गया. आयोग ने देशभर का दौरा कर प्रत्येक क्षेत्र के नेताओं, अधिकारियों, गणराज्य के नागरिकों आदि से व्यापक विचार-विमर्श करने के बाद अक्टूबर 1955 ई. में अपना एक विस्तृत प्रतिवेदन (Report) प्रस्तुत किया.
राज्य पुनर्गठन आयोग ने निम्नलिखित 16 राज्यों की सिफारिश की – 
(1) पंजाब (हिमाचल प्रदेश और पंजाब)
(2) उत्तर प्रदेश 
(3) बिहार 
(4) बंगाल
(5) असम
(6) उड़ीसा
(7) आन्ध्र 
(8) तमिलनाडु 
(9) कर्नाटक 
(10) केरल 
(11) हैदराबाद 
(12) बम्बई 
(13) विदर्भ 
(14) मध्य प्रदेश 
(15) राजस्थान 
(16) जम्मू-कश्मीर
इन राज्यों के अतिरिक्त आयोग ने तीन केन्द्रीय क्षेत्रों की सिफारिश की
(1) दिल्ली
(2) मणिपुर
(3) अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह. 
> राज्य पुनर्गठन अधिनियम (1956 जुलाई)
इस समय आयोग ने अलग महाराष्ट्र और अलग गुजरात राज्य की माँग को अस्वीकार कर लिया तथा उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, असम आदि राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया, जिसके कारण इन क्षेत्रों में व्यापक आगजनी तथा दंगे हुए. तत्कालीन केन्द्रीय वित्तमन्त्री देशमुख जब पृथक् महाराष्ट्र की स्थापना के लिए नेहरूजी को नहीं मना पाये तो इस प्रश्न पर मन्त्रिपद से त्यागपत्र दे दिया. संसद के दोनों सदनों में इस विषय पर जोरदार बहस होती रही और अन्त में जुलाई 1956 ई. में संसद ने इस अधिनियम को पारित कर दिया. आयोग की रिपार्ट में कुछ परिवर्तन किये गये पंजाब व पेप्सु को मिलाकर एक राज्य बना दिया गया, परन्तु हिमाचल को केन्द्रीय क्षेत्र बना दिया गया. बम्बई राज्य का आकार बढ़ा दिया गया. हैदराबाद के कुछ भागों को मैसूर में मिला दिया गया बदले में तेलंगाना क्षेत्र को आन्ध्र में मिलाया गया. मध्य प्रदेश व केरल दो राज्य बना दिये गये.
इस अधिनिमय के द्वारा राजप्रमुखों के पद को समाप्त कर दिया गया. राज्यों में राज्यपाल के पद का सृजन किया गया. इस अधिनियम द्वारा राज्यों की 'क, ख, ग, घ' श्रेणी को समाप्त कर दिया गया तथा केवल दो इकाइयाँ राज्य तथा केन्द्रीय क्षेत्र रखी गयीं.
1956 ई. के इस अधिनियम के अनुसार कुल राज्यों की संख्या 14 निर्धारित की गयी थी तथा 6 केन्द्रीय प्रदेश थे.
इस अधिनियम द्वारा नई व्यवस्था करने के बाद भी महाराष्ट्र एवं गुजरात में आन्दोलन जारी रहे. फलतः मई 1960 ई. में बम्बई राज्य के दो टुकड़े महाराष्ट्र (राजधानी बम्बई), (2) गुजरात ( राजधानी अहमदाबाद) कर दिये गये,
असम राज्य में अब भाषा के आधार पर नागा जातियों ने पृथक् राज्य के निर्माण के लिए आन्दोलन किया, जिसके कारण इन राज्यों का गठन अगस्त 1962 ई. में एक संशोधन विधेयक पारित कर नगालैण्ड का निर्माण किया गया.
नगालैण्ड के निर्माण के बाद हरियाणा, पंजाब से अलग होने के लिए आन्दोलनरत् हो गया, परिणामस्वरूप नवम्बर 1966 को पंजाब से हरियाणा पृथक् हो गया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत में स्वतन्त्रता के बाद से विभिन्न कारणों; जैसे- भाषा, भौगोलिक क्षेत्र आदि के कारण पृथक् राज्यों के निर्माण की माँग समय-समय पर उठती रही है और नये राज्यों का निर्माण अभी भी जारी है. अभी हाल ही में तीन नये राज्य झारखण्ड, छत्तीसगढ़ एवं उत्तरांचल प्रकाश में आये हैं तथा इसके अतिरिक्त भी अन्य राज्यों के गठन की माँग को लेकर लोग आन्दोलनरत् हैं.
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Sun, 08 Oct 2023 10:26:18 +0530 Jaankari Rakho
स्वतन्त्रता के बाद भारत में नौकरशाही तथा पुलिस संगठन एवं जनांकिकीय प्रवृत्तियाँ https://m.jaankarirakho.com/440 https://m.jaankarirakho.com/440 स्वतन्त्रता के बाद भारत में नौकरशाही तथा पुलिस संगठन एवं जनांकिकीय प्रवृत्तियाँ

> नौकरशाही तथा पुलिस संगठन
‘नौकरशाही’ का अंग्रेजी भाषा का पर्यायवाची शब्द ‘ब्यूरोक्रेसी' फ्रांसीसी भाषा के 'ब्यूरो' शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ एक विभागीय उप-सम्भाग अथवा विभाग से है. यह प्रायः सरकारी विभागों का परिचायक है. फ्रांस में इस शब्द का प्रयोग ‘ड्रॉअर वाली मेज' अथवा 'लिखने की डेस्क' के लिए हुआ करता था. इसी के आधार पर निर्मित 'ब्यूरो' शब्द सरकारी कार्यों का प्रतीक समझा जाने लगा.
आधुनिक परिवेश में नौकरशाही का अर्थ शासन की उस पद्धति से लिया जाता है, जिसमें नियन्त्रण पूर्णतः अधिकारियों के हाथ में इतना अधिक होता है कि उनकी शक्ति सामान्य नागरिकों की स्वतन्त्रता के लिए बाधक हो जाती है.
भारतीय सन्दर्भ में नौकरशाही हमें स्वतन्त्रता के समय अंग्रेजों द्वारा विरासत में मिली. अंग्रेजों ने I.C.S. अफसरों की एक संगठित ऐसी फौज तैयार की जो प्रशासन के प्रत्येक भाग में पूर्णतया हावी रही. आजादी के बाद भारत के लोककल्याणकारी राज्य बन जाने के बाद भी भारतीय प्रशासक वर्ग अपनी पुरानी भावना से छुटकारा नहीं पा सका है, उसमें अभी भी अपनी पुरानी विशेषताएँ; जैसे- पद-सोपान, राजनीति से संलग्नता, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, शासन करने की अहं की प्रकृति, विशेषज्ञों की उपेक्षा आदि पायी जाती हैं.
ऊपर वर्णित सभी विशेषताएँ आज के भारतीय पुलिस संगठन में हमें आसानी से देखने को मिल सकती हैं. भारतीय पुलिस-व्यवस्था अपनी उत्पत्ति के समय से ही नौकरशाही के दोषों से ग्रसित रही है, क्योंकि 1861 ई. के एक्ट में ही इसने जिला कलेक्टर को दण्ड सीमा में बाँध दिया था. उपनिवेश-वादी इतिहास में पुलिस का जो महास्तरीय संगठन बनाया गया उसका ध्येय 'नागरिक पुलिस' बनने के बजाय ‘विधि एवं व्यवस्था पुलिस' बनाना ज्यादा रहा है.
भारतीय पुलिस का वर्तमान में बहुत अधिक राजनीतिही सम्मानित क्यों न हों, पुलिस उनका अपमान करने से नहीं करण हो चुका है. सरकार के आलोचकों को चाहे वे कितने हिचकती है. शासकों द्वारा पुलिस का प्रयोग कानून व व्यवस्था की बजाय कई बार अपने विरोधियों पर अंकुश लगाने, नेताओं द्वारा सम्बोधित की जाने वाली जनसभाओं में लोगों की भीड़ जुटाने और यहाँ तक कि धन-संग्रह करने के लिए भी किया जाता है.
पुलिस अपराधियों की रोकथाम के बजाय आधुनिक समय में उनके संरक्षण का कार्य करने लगी है. पुलिस की नाक के नीचे बड़े-बड़े अपराध होते हैं. आम जनता को पुलिस के नाम से ही घबराहट होती है, क्योंकि पुलिसव्यवस्था का स्वरूप अब न्याय दिलाने वाले संगठन के रूप में नहीं रह गया है.
आज के युग में पुलिस संगठनों में निरन्तर अनुशासनहीनता बढ़ती जा रही है. देश में वर्तमान में कुल 49 पुलिस एसोसिएशन्स कार्यरत् हैं, जिनमें 26 को मान्यता प्राप्त है. इन एसोसिएशनों का निर्माण पुलिसकर्मियों की माँगों एवं दिक्कतों को दूर करने के लिए किया गया है, परन्तु वास्तविकता यह है कि ये एसोसिएशन पुलिसकर्मियों के दुष्कृत्यों को संरक्षण प्रदान करते हैं तथा उन्हें बगावत के लिए उकसाते हैं. इसी कारण से महाराष्ट्र एवं गुजरात में इन एसोसिएशन्स की मान्यताएँ रद्द कर दी गयी हैं.
उपर्युक्त विवचेन पुलिस संगठन के दोषों को स्पष्ट करता है. अतः इसमें सुधार लाने के लिए सर्वप्रथम निचली सीढ़ी से कर्मचारियों की सेवा स्थिति में सुधार की महती आवश्यकता है क्योंकि पुलिस संगठन में सिपाहियों का ही जनता से सीधा सम्पर्क होता है. इनके लिए आवास व्यवस्था बेहतर वेतन, भत्ते तथा अच्छे हथियारों के आवंटन के साथ इनका कुशल प्रशिक्षण भी आवश्यक है.
बेहतर सेवा स्थिति पुलिस दल की कार्यक्षमता में सुधार कर सकती है और अधिक अच्छे लोग इसमें आने के इच्छुक हो सकते हैं.
इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में पुलिस सेवाओं में बेहतर सुविधाएँ एवं कुशल प्रशिक्षण देकर पुलिस संगठन को नौकरशाही के दोषों को दूर किया जा सकता है.
> पुलिस का ढाँचा
ऑक्सफोर्ड शब्दकोष के अनुसार, “ पुलिस शब्द से अभिप्राय है कानून और व्यवस्था को बनाये रखने एवं नियन्त्रित करने वाला संगठन – राज्य की अन्तरंग सरकार. " इस दृष्टि से पुलिस में वह व्यक्ति है, जिसे कानून एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए सरकारी कोष से वेतन दिया जाता है.
लैटिन भाषा में पुलिस का अर्थ है 'पुलिसिया' जिसका अर्थ होता है 'पोलिस' या 'राज्य' वस्तुतः पुलिस से अभिप्राय है, प्रशासन की व्यवस्था अथवा प्रशासन का नियन्त्रण. आधुनिक समय में पुलिस संगठित नागरिक अधिकारियों का वह समूह है, जिनका प्रमुख कार्य सुव्यवस्था स्थापित करना, अपराधों की रोकथाम करना तथा कानूनों को लागू करना है.
> भारत में पुलिस-व्यवस्था
भारतीय राज्य में विद्यमान पुलिस संगठनों का निर्देशन प्राथमिक रूप में 1861 ई. में बनाए गए उस पुलिस ऐक्ट से होता है, जिसका सृजनहार 1860 ई. का पुलिस कमीशन था. राज्य-स्तर पर कोई भी पुलिस संगठन स्टॉफ तथा लाइन दोनों ही प्रकार की भूमिकाओं का निर्वाह करता है. पुलिस को भारत में तीन स्तरों पर कार्य करना पड़ता है—
(1) केन्द्रीय सरकार तथा उसकी इकाइयाँ.
(2) राज्य सरकार का गृह मन्त्रालय.
(3) जिला पुलिस अधिकारियों से सम्बद्ध अन्य निम्न स्तरीय इकाइयाँ.
राज्य पुलिस डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (D.G.P.) के निर्देशन एवं अधीक्षण में कार्य करती है. इनके कार्य में सहायता एवं सलाह देने हेतु अनेक विशेष सहायक तथा अतिरिक्त इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (I.G.P.) होते हैं, जो कि मुख्यालय पर स्थित होते हैं.
आई. जी. को दो प्रकार के उत्तरदायित्वों का वहन करना होता है—
(1) नीति-निर्माण.
(2) नीतियों का क्रियान्वयन
इसे अपने विभाग का प्रमुख कार्मिक अधिकारी होने के कारण वित्तीय प्रबन्ध एवं अनुशासन बनाये रखने के लिए व्यापक अधिकार मिले हुए हैं.
डी. आई. जी. अपनी रेंज का प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होता है. डी. आई. जी. 4 से लेकर 6 तक प्रशासनिक जिलों में पुलिस कार्यों का अधीक्षण करता है.
डी. आई. जी. एक ऐसे नए स्तर का निर्माण करता है, जो कि प्रशासन की पद-सोपान व्यवस्था में राज्य स्तर से निम्न तथा जिला स्तर से उच्च होता है. राज्य स्तर पर कार्यात्मक भूमि का नायक डी. आई. जी. अनेक आनुषांगिक कार्यों का सम्पादन करता है. उदाहरणार्थ – सी. आई. डी., विशिष्ट जानकारी, पुलिस मुख्यालयों की देखभाल तथा राज्यस्तरीय सैनिक टुकड़ियों का व्यवस्थापन इत्यादि.
> जिला पुलिस संगठन
हमारे देश में राज्य पुलिस संगठनों में जिला स्तर के पुलिस थानों का नियन्त्रण एवं नियमन करता है. इस स्तर पर सर्वोच्च अधिकारी पुलिस अधीक्षक होता है. पुलिस अधीक्षक के माध्यम से ही राज्य सरकार अपनी भूमिकाका सभी निर्वहन करती है तथा थाने इससे आदेश प्राप्त करते हैं.
उपखण्ड में पुलिस विभाग का सर्वोच्च अधिकारी डिप्टी सुपरिन्टेण्डेट (Dy. S.P.) होता है, जिसका कार्य एक सर्किल में पड़ने वाले सभी थानों का अधीक्षण एवं नियन्त्रण होता है.
जिला पुलिस का कार्य क्षेत्र लगभग 3,600 वर्ग मील भूमि अथवा 12,50,000 व्यक्तियों का विस्तीर्ण होता है. इसके अलावा उसके पास एक जेल, हथियार के लिए आगार तथा कपड़े रखने का एक अन्य निवास होता है.
'पुलिस स्टेशन' अथवा 'पुलिस थाना' पुलिस संगठन की भारत में आधारभूत इकाई है. यह सभी प्रकार के अपराधों की जाँच-पड़ताल एवं प्रारम्भिक सूचनाएँ अंकित करते हैं. यह सब-इंस्पेक्टर, असिस्टेण्ट सब इंस्पेक्टर, हैड काँस्टेबल तथा काँस्टेबल के जरिये कार्य करता है. वर्तमान में देश में 5 प्रकार के पुलिस स्टेशन प्रचलन में हैं—
(1) ग्रामीण, (2) शहरी, (3) अर्द्ध-नगरीय, (4) मेट्रोपोलिटन, तथा (5) रेलवे पुलिस स्टेशन.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि स्वतन्त्रता के बाद भारत में जो पुलिस संगठन का स्वरूप हमारे सामने आया है, वह शीर्ष स्तर पर डी. जी. से प्रारम्भ होकर थाने के सिपाही तक क्रमबद्ध रूप से चलता है.
> जनांकिकीय प्रवृत्तियाँ
भारत की जनांकिकीय प्रवृत्तियों का यदि इस सदी के प्रारम्भ से अध्ययन करें, तो उसमें अनेक मोड़ दिखाई पड़ते हैं. 19वीं तथा 20वीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में देश अनेक अकालों एवं महामारियों से ग्रस्त रहा, परन्तु धीरे-धीरे स्वास्थ्य सुविधाओं एवं खाद्यान्न आपूर्ति में वृद्धि हुई, जिससे जनांकिकीय बढ़ोत्तरी हुई.
1891 से 1991 ई. तक के जनगणना के आँकड़ों का अध्ययन करने पर भारत की जनसंख्या वृद्धि की प्रवृत्तियों में तीन अवस्थाएँ दृष्टिगत होती हैं – 
1891 से 1921 तक के 30 वर्षों की प्रथम अवस्था. 
1921 से 1951 तक के 30 वर्षों की द्वितीय अवस्था. 
1951 से 2001 तक
1891 से 1921 तक की प्रथम अवस्था में भारत की जनसंख्या लगभग स्थिर थी. 
1891 ई. में देश की कुल जनसंख्या 23.6 करोड़ थी, जो 1921 ई. में 25.1 करोड़ के स्तर तक पहुँची. जनसंख्या में केवल 1.5 करोड़ अर्थात् 0.19% प्रति वर्ष की वृद्धि हुई. इसका कारण जन्म-दर एवं मृत्यु दर दोनों का उच्च होना है.
द्वितीय अवस्था अर्थात् 1981-51 ई. की अवधि का विश्लेषण किया जाये, तो देश की कुल जनसंख्या 25-1 करोड़, से बढ़कर 36.1 करोड़ हो गयी, अर्थात् इसमें 11 करोड़ की या 1.22% प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई. इस अवधि में मृत्यु दर में तीव्र दर से गिरावट आयी, जिसका कारण अकाल तथा महामारियों पर व्यापक नियन्त्रण लगाने में सफलता थी.
तृतीय अवस्था में 1951 ई. से वर्तमान काल तक जनसंख्या का सर्वाधिक कष्टदायक काल रहा, क्योंकि इस अवधि में जनसंख्या वृद्धि दर विस्फोटक थी, जिसमें जनसंख्या 36-1 करोड़ से उछलकर लगभग 1-2 अरब हो गयी है. इस काल में जनसंख्या वृद्धि दर सर्वाधिक (लगभग 2.13% ) रही है, क्योंकि इस काल में मृत्यु दर में अत्यधिक गिरावट तथा जन्म-दर की वृद्धि रही है. इसका कारण सरकार द्वारा नियोजित विकास की रणनीति के तहत् परिवार कल्याण कार्यक्रम को चलाना था, जिसके अन्तर्गत सीमित परिवार के साथ-साथ जनता के स्वास्थ्य सुधार पर भी ध्यान दिया गया. यद्यपि सीमित परिवार की अवधारणा को अच्छी सफलता नहीं मिली, परन्तु स्वास्थ्य सुधारों पर बल देने के कारण लोगों की जीवन - प्रत्याशा बढ़ी और मृत्यु दर में कमी आयी.
> भारत की जनसंख्या नीति (Population Policy) 1952
देश की तीव्रगति से बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने 1952 में एक जनसंख्या नीति निर्धारित की, जिसका उद्देश्य जनसंख्या पर रोक लगाने के विभिन्न उपायों को अपनाकर उसे निर्धारित स्तर पर रोकना है. इसी उद्देश्य से सरकार ने जनसंख्या नियन्त्रण के उपायों के क्रियान्वयन हेतु पंचवर्षीय योजना में धन की विशेष व्यवस्था की और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से अनेक कार्यक्रम चलाये गये, जिनमें से अग्रलिखित प्रमुख हैं –
1. लोगों को परिवार नियोजन के तरीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करना. इसके लिए सभी प्रसार माध्यमों अखबार, रेडियो, टी. वी. आदि का सहारा लेना.
2. ग्रामीण तथा नागरिक क्षेत्र के सभी वर्गों को गर्भनिरोधक सामग्रियों की आपूर्ति. 
3. नसबन्दी कराने हेतु नकद प्रोत्साहन.
4. पुरुष तथा महिला नसबन्दी हेतु व्यापक प्रयास.
वास्तव में भारत में जिस परिवार नियोजन तकनीक को अपनाया गया है, वह किसी एक उपाय पर आधारित न होकर अनेक उपायों का समूह रहा है. इसीलिए इस कार्यक्रम को 'कैकेटेरिया उपागम' भी कहा गया.
इन उपायों के अतिरिक्त सरकार ने शिक्षा का प्रसार तथा आर्थिक समृद्धि लाने के प्रयास किये, ताकि लोग छोटे परिवार के महत्व को समझ सकें.
इस महत्त्वपूर्ण नीति के बाद 1976-77 ई. में आपातकाल के दौरान एक नई जनसंख्या नीति लागू की गयी, परन्तु सरकार के गिर जाने के बाद तुरन्त एक और नई नीति बनाई गयी. अलग-अलग पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से भी नीतियाँ बनती रही हैं, परन्तु अभी तक भारतीय जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए कोई कारगर नीति नहीं बन सकी है तथा तीव्रगति से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है, जिसके कारण देश के संसाधन मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपर्याप्त सिद्ध हो रहे हैं. गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, भुखमरी, भ्रष्टाचार एवं अल्पविकास जैसी समस्याएँ देश के सम्मुख बढ़ती ही जा रही हैं.
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Sun, 08 Oct 2023 10:24:12 +0530 Jaankari Rakho
भारत का संविधान https://m.jaankarirakho.com/439 https://m.jaankarirakho.com/439 भारत का संविधान

> भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ
भूमिका – केबिनेट मिशन (मार्च 1946 ई.) के प्रावधानों के तहत भारत में अन्तरिम सरकार का गठन तथा देश के लिए भावी संविधान को तैयार करने के लिए संविधान सभा के गठन का निर्णय लिया गया. इस निर्णय के तहत् जुलाई 1946 ई. में संविधान सभा के निर्माण के लिए चुनाव करवाए गए व 9 दिसम्बर, 1946 ई. को सच्चिदानन्द सिन्हा की अध्यक्षता में इसकी प्रथम बैठक हुई. बाद में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद इस सभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए. गांधीजी इसके सदस्य नहीं बने तथा पं. नेहरू व पटेल अन्तरिम सरकार के प्रधानमन्त्री व गृहमन्त्री की हैसियत से इसमें सम्मिलित हुए. तीन वर्षों की अवधि में इस 'संविधान सभा' ने संविधान का निर्माण कर दिया. 21 फरवरी, 1948 ई. संविधान का प्रारूप तैयार हुआ और इस पर अध्यक्ष के रूप में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 26 नवम्बर, 1949 ई. को हस्ताक्षर कर दिए. मूल रूप से इस संविधान में 395 धाराएँ, जो कि 22 भागों में विभक्त थीं और 8 अनुसूचियाँ थीं. 26 जनवरी, 1950 ई. को यह संविधान स्वतन्त्र भारत में लागू हुआ.
विशेषताएँ – भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
(1) प्रस्तावना – संविधान की प्रस्तावना द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि भारत का संविधान भारत की जनता द्वारा व जनता के लिए निर्मित किया गया है. इस संविधान के लागू होने से भारत एक सर्वप्रभुत्व सम्पन्न देश बन गया तथा इस संविधान का प्रमुख उद्देश्य भारत में धर्म-निरपेक्ष समाजवादी,.लोकतन्त्रात्मक गणराज्य स्थापित करना व सभी को न्याय, स्वतन्त्रता एवं समानता प्रदान कर बन्धुत्व की भावना का विकास करना है.
(2) लिखित एवं निर्मित संविधान – भारतीय संविधान के प्रत्येक भाग को स्पष्ट रूप से लिखा गया है. संविधान सभा के अधिवेशनों में इसका प्रारूप तैयार कर, इस पर विचार विमर्श कर इसे अन्तिम तौर पर स्वीकार किया गया.
इस संविधान में स्पष्ट रूप से प्रशासनिक व्यवस्था, मूल अधिकारों व राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का उल्लेख है. संविधान के संशोधन की व्यवस्था, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका के अधिकार की भी चर्चा है. अतः कोई भी सरकार इसके रहते मनमाने ढंग से शासन को नहीं चला सकती.
(3) संविधान का अत्यधिक बड़ा होना—भारतीय संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है. इसके विशाल होने का प्रमुख कारण यह है कि इसमें केन्द्र व राज्य सरकारों की कार्य-प्रणालियाँ, नागरिकों के अधिकार, नीति-निर्देशक तत्वों, संशोधन की व्यवस्था आदि की बहुत अधिक चर्चा की गई है.
(4) संसदात्मक शासन प्रणाली – संविधान के अनुसार, भारत में 'संसदात्मक शासन प्रणाली' की व्यवस्था की गई है. केन्द्र व राज्य दोनों जगहों पर यह व्यवस्था लागू की गई है. इस व्यवस्था के अनुसार केन्द्र व राज्यों में जनता द्वारा चुने गए बहुमत दल के प्रधान ( प्रधानमन्त्री व मुख्यमन्त्री) ही वास्तविक शासन के प्रधान होते हैं, जबकि राष्ट्रपति एवं राज्यपाल नाममात्र के संवैधानिक प्रधान होते हैं. यह मन्त्रिपरिषद् की सलाह से कार्य करते हैं. संसद तथा विधानमण्डल अपने कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी होती है.
(5) संघात्मकता एवं एकात्मकता का मिश्रण (Fedral cum Unitary Constitution ) – भारतीय संविधान में संघात्मक एवं एकात्मक दोनों तरह के गुण पाए जाते हैं. संविधानों के प्रावधानों के अनुरूप इसमें संघात्मक व्यवस्था है और केन्द्र सरकार को मजबूत बनाने के लिए उसे पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं, जो इसकी एकात्मक व्यवस्था को प्रदर्शित करते हैं, परन्तु इसके साथ ही राज्य सरकारों को आन्तरिक प्रशासन, विधि-निर्माण एवं न्यायपालिका के क्षेत्र में स्वायत्तता इस संविधान को संघात्मक बना देते हैं.
(6) मूल अधिकारों का उल्लेख – सरकार की तानाशाही प्रवृत्ति से देश के नागरिकों को बचाने के उद्देश्य से संविधान में मूलभूत अधिकारों की व्यवस्था की गई है. इन अधिकारों का उल्लेख संविधान के तीसरे भाग में धारा 12 से 35 तक में किया गया है. केवल आपातकाल में ही इन अधिकारों को निलम्बित किया जा सकता है.
(7) नागरिकों के कर्त्तव्यों का उल्लेख – अधिकारों के साथ-साथ देश के नागरिकों के लिए भी देश के प्रति कुछ कर्त्तव्यों का निर्धारण भारतीय संविधान में किया गया है, जो निम्नलिखित हैं – 
1. संविधान का पालन.
2. राष्ट्रीय आदर्शों का पालन.
3. भारत की एकता व अखण्डता के प्रति आस्थावान होना तथा इसकी रक्षा करना.
4. देश में भाई-चारे की भावना का विकास.
5. देश की संस्कृति का सम्मान व सुरक्षा.
6. देश के प्राकृतिक वातावरण की समृद्धि में योगदान तथा प्राणिमात्र के प्रति दया की भावना रखना.
7. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद, ज्ञान एवं सुधार की भावना विकसित करना.
8. सार्वजनिक सम्पत्ति की सुरक्षा.
9. देश की सेवा एवं रक्षा के लिए तत्पर रहना.
10. राष्ट्र के निरन्तर विकास के लिए प्रयत्न करना.
(8) नीति-निर्देशक तत्व ( The Directive Principles of State Policy) — संविधान के चौथे भाग में इनका वर्णन किया गया है, जिसका उद्देश्य राज्य को 'कल्याणकारी' (Welfare) बनाना है. इनके द्वारा राज्य में ऐसी सामाजिक व्यवस्था की है, जो सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, भरसक कार्य साधक के रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोक-कल्याण की उन्नति का प्रयास करे. ये तत्व मुख्यतः राज्य के आर्थिक, सामाजिक, प्रशासनिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक तथा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा व्यवस्था से सम्बन्धित हैं.
(9) इकहरी नागरिकता की व्यवस्था (Provision of Single Citizenship ) – भारतीय संविधान संघात्मक होते हुए भी इसमें इकहरी नागरिकता की व्यवस्था की गई है. भारत की नागरिकता जन्म, निवास या स्वेच्छा से ग्रहण करने से प्राप्त हो सकती है. ऐसी व्यवस्था करने का उद्देश्य देश में बसने वाली विभिन्न जातियों, धर्मों के व्यक्तियों के मध्य समानता एवं एकता की भावना को बढ़ाकर देश की एकता व अखण्डता को बनाए रखना है.
(10) संविधान में संशोधन की व्यवस्था – भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है. यह संशोधन संसद में बहुमत द्वारा, विशिष्ट बहुमत द्वारा यह राज्य की विधानमण्डलों की सहमति से किया जा सकता है. साथ ही आपातकाल की स्थिति में संविधान का स्वरूप अपने आप संघात्मक से एकात्मक हो जाता है. इस प्रकार संविधान पर्याप्त रूप से लचीला बनाया गया है, परन्तु साथ ही यह अत्यधिक कठोर है, क्योंकि व्यावहारिक रूप से संशोधन की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है.
इस प्रकार स्पष्ट है कि भारतीय संविधान अत्यधिक विस्तृत है तथा इसमें उस प्रत्येक बात पर विचार किया गया है, जिससे कि प्रशासन सुचारू रूप से चलाया जा सके.
अनेक इतिहासकारों ने इसे 'भानुमति का पिटारा' और 'गोंद और कैंची' के खिलवाड़ का परिणाम बताया है, फिर भी इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि जिन परिस्थितियों में इस संविधान का निर्माण किया गया था. इससे बेहतर संविधान का निर्माण नहीं किया जा सकता था. एम. वी. पायली ने लिखा है, "भारतीय संविधान कार्य करने लायक दस्तावेज है, यह आदर्शों एवं वास्तविकताओं का मिश्रण है, इसने सभी लोगों को एक साथ रहने एवं एक नए व स्वतन्त्र भारत के निर्माण का आधार प्रदान किया है."
> कश्मीर समस्या अथक कश्मीर का प्रश्न
भारत के धुर उत्तर में स्थित अद्भुत सुन्दर प्रदेश कश्मीर रियासत की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम है, लेकिन यहाँ शासन करने वाला राजवंश सदियों से हिन्दू रहा. इसके अलावा वहाँ अनेक आदिवासी जनजातियाँ, बौद्ध धर्मानुयायी हैं. पूरी रियासत को बहुत आसानी से तीन स्पष्ट क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है-
(1) जम्मू का हिन्दू बहुल मैदानी क्षेत्र, 
(2) इस्लामी प्रभाव क्षेत्र कश्मीर घाटी, तथा 
(3) लद्दाख का बौद्ध क्षेत्र.
आजादी के समय कश्मीर घाटी का वह क्षेत्र जो यातायात के साधनों से जुड़ा था, पाकिस्तान में चला गया परन्तु इस क्षेत्र की मुस्लिम जनसंख्या पाकिस्तान में मिलना चाहती थी, ऐसा सोचना सही नहीं था, क्योंकि शेख ने आजादी के संघर्ष के दौरान व्यापक जन-आन्दोलन किया था.
कश्मीर के हिन्दू शासक हरि सिंह ने भारत में विलय की कोई इच्छा प्रकट नहीं की. वे स्वतन्त्र रहना चाहते थे तथा कश्मीर को एशिया का स्विट्जरलैण्ड बनाना चाहते थे.
इस पर पाकिस्तान ने कश्मीर में मुस्लिम जनसंख्या को देखते हुए कबायलियों आक्रमणों के द्वारा इसे पाकिस्तान में मिलाने का प्रयास किया. फलतः हरि सिंह ने कश्मीर को भारत में विलय के सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये. भारत सरकार ने तुरन्त सैनिक कार्यवाही कर कबायलियों को खदेड़ दिया तथा जम्मू-कश्मीर को भारत में सम्मिलित कर लिया गया, परन्तु समस्या का अन्त नहीं हो पाया और इस प्रश्न पर भारत व पाकिस्तान के मध्य अमेक युद्ध लड़े गये.
हरिसिंह के साथ हुई भारत सरकार की सन्धि में जम्मूकश्मीर के प्रतिरक्षा, विदेशी मामले तथा संचार के सम्बन्ध में भारत सरकार को अधिकार मिले.
26 जनवरी, 1950 ई. को जब देश का संविधान लागू हुआ तब कश्मीर को संविधान के पृथक् अनुसूची के 'ख' राज्यों के वर्ग में रखा गया और संविधान के अनुच्छेद 370 के अधीन उसे विशेष दर्जा दिया गया, लेकिन यह व्यवस्था अस्थायी थी, लेकिन आज 50 वर्षों बाद भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हो सका है. संविधान के 370वें अनुच्छेद में कश्मीर के लिए निम्नलिखित प्रावधान हैं—
1. जम्मू-कश्मीर भारत के राज्य क्षेत्र का भाग है.
2. भारतीय संविधान का कौन सा भाग जम्मू-कश्मीर को लागू होगा? इसका निर्णय भारत के राष्ट्रपति राज्य के परामर्श से करेंगे.
3. राज्य पर संसद का विधायी प्राधिकार संघ और समवर्ती सूची के उन्हीं पदों तक सीमित रहेगा, जो विलय-पत्र में निर्दिष्ट हैं.
4. राष्ट्रपति राज्य के संविधान सभा की सिफारिश पर अनुच्छेद 370 को समाप्त कर सकता है या इसमें संशोधन कर सकता है.
कश्मीर को विशेष दर्जा दिये जाने के बाद भी पं. जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रश्न को संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाया तथा जनमत संग्रह कराने का वायदा किया क्योंकि वे ऐसी कोई बात नहीं होने देना चाहते थे, जिससे कि मुसलमान भारतीय धर्म-निरपेक्षता में सन्देह व्यक्त कर सकें.
परन्तु नेहरूजी की यह आदर्शवादिता भारत के लिए भारी पड़ने लगी, क्योंकि इस समय संयुक्त राष्ट्र संघ शीतयुद्ध से ग्रसित था. अतः अमरीका तुरन्त ही पाकिस्तान का पक्षधर हो गया. बाद में नेहरूजी यह कहते रहे कि कश्मीर की जनता ने बार-बार होने वाले चुनावों में भाग लेकर अपना मत भारत के समर्थन में प्रकट किया है, परन्तु पाकिस्तान भारत पर वचन देकर भी मुकरने का आरोप लगाता रहा है.
इसके साथ ही पाकिस्तान के नेताओं ने हमेशा से प्रत्येक अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर कश्मीर के प्रश्न को उठाने का प्रयास किया है और कश्मीर की जनता को भड़काने के लिए उग्रवादी कार्यवाहियाँ करता रहता है, जिससे यह समस्या और अधिक जटिल हो गयी है.
> संविधान सभा
साधारण शब्दों में संविधान वह सभा है, जो किसी देश के संविधान का निर्माण करती है. यह किसी देश के संविधान का ढाँचा तैयार करने के लिए विशेष रूप से गठित नागरिकों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों का एक संगठन है.
1922 ई. में गांधीजी ने कहा था कि "भारतीय संविधान भारतीयों की इच्छानुसार ही होगा.” 1924 ई. में मोतीलाल नेहरू ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष संविधान सभा के निर्माण की माँग प्रस्तुत की थी. इसके बाद एम. एन. राय ने औपचारिक रूप से संविधान सभा के विचार का प्रतिपादन किया यह विचार देश में लोकप्रिय होने लगा. अतः वायसराय की अगस्त 1940 की घोषणा में कहा गया कि भारत का संविधान स्वयं भारतीय ही तैयार करेंगे. इसके बाद 1942 ई. में क्रिप्स प्रस्तावों में भी यह माँग स्पष्ट रूप से स्वीकार कर ली गई थी, किन्तु भारतीयों ने कुछ अन्य कारणों से इसे अस्वीकार कर दिया. अन्त में 1946 ई. में केबिनेट मिशन योजना में इस माँग को स्वीकार कर इसे व्यावहारिक रूप दिया गया.
केबिनेट मिशन योजना के आधार पर 1946 ई. में संविधान सभा का चुनाव प्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं के द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर हुआ. विभाजन के पूर्व संविधान सभा में 389 सदस्य थे, किन्तु बाद में पाकिस्तान के निर्माण के बाद इसमें केवल 310 सदस्य ही रह गये. जिन देशी रियासतों के शासकों ने भारतीय संघ में शामिल होना स्वीकार कर लिया था, उनके द्वारा नामजद प्रतिनिधियों ने भी संविधान सभा की सदस्यता ग्रहण कर ली.
यह संविधान सभा भारत के बहुमत की वास्तविक प्रतिनिधि संस्था थी. इसमें अत्यन्त ही अनुभवी एवं योग्य व्यक्ति थे. कुछ विख्यात महिलाएँ भी इसकी सदस्य थीं.
प्रारम्भ में भारत में यह संविधान सभा सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न संस्था नहीं थी. यह केबिनेट मिशन योजना में उल्लिखित संविधान की मूल रूपरेखा में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती थी तथा यह ब्रिटिश संसद की सर्वोच्च सत्ता के अधीन थी, लेकिन 3 जून, 1947 को वायसराय माउण्टबेटन द्वारा की गयी घोषणा से व भारत स्वतन्त्रता अधिनियम द्वारा यह पूर्ण प्रभुत्व - सम्पन्न संस्था बना गयी.
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Sun, 08 Oct 2023 10:22:09 +0530 Jaankari Rakho
गांधी काल (1920&47 ई.) https://m.jaankarirakho.com/438 https://m.jaankarirakho.com/438 गांधी काल (1920-47 ई.)

> भारतीय राजनीति में गांधी का प्रवेश
अफ्रीका से भारत लौटने के बाद गांधीजी ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों का अत्यधिक सहयोग किया तथा इसी युद्ध के दौरान गांधीजी ने पूरे देश का भ्रमण कर देश की वास्तविक स्थिति का पता लगाया.
इस समय गांधीजी उदारवादी थे और अंग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास करते थे. 1917 ई. में बिहार प्रान्त के चम्पारण जिले में निलहों के अत्याचार से किसानों को बचाने के लिए गांधीजी ने ‘कर नहीं दो आन्दोलन' चलाया और वे इसमें सफल रहे. अहमदाबाद में मजदूरों की वेतन वृद्धि के लिए आमरण अनशन किया तथा इसमें भी वे सफल रहे. इससे गांधीजी के 'सत्याग्रह' के विचार को काफी जनसमर्थन मिला और यह असहाय तथा निरीह भारतीयों के लिए एक सबल और कारगर अस्त्र बन गया. इस प्रकार गांधीजी की लोकप्रियता दिन-रात बढ़ने लगी. इसका लाभ उठाकर गांधीजी ने 1919 ई. के अमृतसर के कांग्रेस अधिवेशन में मोण्ट फोर्ड योजना को पास करवा दिया.
1919 ई. में देश में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई, जिससे अंग्रेजों के सहयोगी गांधीजी उनके सबसे बड़े शत्रु बन गए, जिसके निम्नलिखित कारण थे—
(1) रोलेट ऐक्ट – 1918 ई. में सर सिडनी रोलेट की अध्यक्षता में एक समिति का गठन कर यह जाँच का कार्य सौंपा गया कि भारत में किस प्रकार से क्रान्तिकारी षड्यन्त्र फैले हुए हैं तथा उनका दमन किस प्रकार से किया जाए. सर सिडनी रोलेट की सिफारिश पर 6 फरवरी, 1919 ई. को बिल पारित करके 'रोलेट एक्ट' बना और यह तीन वर्षों के लिए लागू किया गया.
इस कानून के अनुसार, किसी भी व्यक्ति पर सरकार बिना मुकदमा चलाए नजरबन्द करके उसके मुकदमे का फैसला कर सकती है. इसे 'काला कानून' की संज्ञा दी गई गैर इसके विरोध में सर्वत्र प्रदर्शन हुए.
इस पर गांधीजी ने इस कानून का विरोध करने का निश्चय किया और जनता को सत्य और अहिंसा के आधार पर इसका विरोध करने को कहा. अंग्रेजी सरकार ने गांधीजी को दिल्ली एवं पंजाब में हो रहे प्रदर्शनों के कारण उनके वहाँ प्रवेश पर रोक लगा दी, फिर भी गांधीजी दिल्ली गए जिस पर उन्हें पलवल स्टेशन पर गिरफ्तार कर बम्बई भेज दिया गया. इससे जनता में उत्तेजना फैल गई तथा कई स्थानों पर दंगे हो गए. इस कानून के तहत पंजाब में डॉ. सैफुद्दीन किचलू तथा डॉ. सत्यपाल मलिक को गिरफ्तार कर कहीं अन्यत्र भेज दिया गया. इससे समूचे पंजाब में प्रदर्शन हुआ.
(2) जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड-13 अप्रैल, 1919 ई. के दिन पंजाब के अमृतसर नगर में जलियाँवाला बाग में रोलेट एक्ट के तहत् गिरफ्तार किचलू व डॉ. सत्यपाल की रिहाई के लिए जनता एकत्र होकर सभा कर रही थी. जनरल डायर ने लगभग 100 भारतीय सिपाहियों के साथ इस सभास्थल में प्रवेश किया तथा सिपाहियों को बिना किसी पूर्व चेतावनी के सभा पर गोली चलाने का आदेश दे दिया. इससे अनेक स्त्री, बच्चे व पुरुष मारे गए. सरकारी आँकड़ों के अनुसार, लगभग 1,650 फायर किए गए और 379 लोग मारे गए. जनरल डायर के अनुसार, यह कार्य समूचे पंजाब में खौफ फैलाने के लिए किया गया था. पंजाब के इस भीषण हत्याकाण्ड की प्रत्येक जगह प्रतिक्रिया हुई. महात्मा गांधी ने इस हत्याकाण्ड पर अंग्रेजी सरकार के शासन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि “अंग्रेज का शासन शैतान का शासन है, अब इससे किसी भी प्रकार का सहयोग सम्भव नहीं.” उन्होंने अपनी ‘केसर-ए-हिन्द' की उपाधि अंग्रेजी सरकार को वापस लौटा दी. उनकी ही राह पर चलते हुए रबीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी 'सर' की उपाधि वापस कर दी.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि गांधीजी जो अंग्रेजी सरकार के प्रबल समर्थक थे, परिस्थितियों के कारण अंग्रेजी सरकार के सबसे बड़े शत्रु बन गए.
> असहयोग आन्दोलन गांधीजी द्वारा क्यों प्रारम्भ किया गया ? आन्दोलन के स्वरूप व उसके परिणामों की व्याख्या कीजिए.
कारण – असहयोग आन्दोलन की पृष्ठभूमि प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद से ही बननी प्रारम्भ हो गई थी, क्योंकि इस युद्ध में आत्म-निर्णय के सिद्धान्त (Principal of self determination) का प्रतिपादन हुआ था. इस आधार पर कांग्रेस ने जो इस युद्ध में अंग्रेज सरकार की सहायक रही थी, ने भी आत्म निर्णय के अधिकार की माँग की जिसे सरकार द्वारा ठुकरा दिया जाने पर कांग्रेस के पास आन्दोलन के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं रहा. इस आन्दोलन को प्रारम्भ करने के पीछे विश्व युद्ध के दौरान उपजा आर्थिक असन्तोष भी एक उल्लेखनीय कारण था. अनेक उपयोगी और आवश्यक वस्तुओं का अभाव हो गया तथा चोरबाजारी बढ़ गई. सरकार ने उसे रोकने के कोई उपाय नहीं किए. इसके साथ ही हैजा, प्लेग जैसी महामारियों के फैलने से जनता की दशा और अधिक दयनीय हो गई.
इन कारणों के अतिरिक्त मोण्ट फोर्ड सुधार की अपर्याप्तता, रोलेट एक्ट एवं जलियाँवाला बाग जैसे कारण असहयोग आन्दोलन के लिए उत्तरदायी थे.
कार्यक्रम – असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम में तीन प्रमुख बातें थीं – 
(1) कौंसिलों का बहिष्कार,
(2) न्यायालयों का बहिष्कार,
(3) विद्यालयों का बहिष्कार.
इन प्रमुख तथ्यों को ध्यान में रखते हुए इस आन्दोलन में निम्नलिखित बातों पर जोर दिया गया -
1. सरकारी उपाधियों का त्याग एवं अवैतनिक पदों का बहिष्कार.
2. स्थानीय संस्थाओं के मनोनीत सदस्यों द्वारा त्यागपत्र. 
3. सरकारी मीटिगों व उत्सवों का बहिष्कार.
4. वकीलों एवं बैरिस्टरों द्वारा अदालतों का बहिष्कार.
5. भारतीय मजदूरों एवं सैनिकों द्वारा इराक तथा अन्य स्थानों पर काम करने की अस्वीकृति.
6. सुधार के बाद सीमित व्यवस्थापिका सभाओं का बहिष्कार.
7. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार.
इस कार्यक्रम के अतिरिक्त इसमें निम्नलिखित रचनात्मक कार्यक्रम भी सम्मिलित थे – 
1. स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग एवं उनका प्रचार.
2. राष्ट्रीय स्कूलों एवं कॉलेजों की स्थापना एवं उनमें शिक्षा प्राप्ति.
पंचायतों की स्थापना और पारस्परिक मुकदमों को सरकारी अदालतों में न ले जाकर पंचायतों में ले जाना.
4. हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा अस्पृश्यता के निवारण का प्रयास.
सितम्बर 1920 ई. में इलाहाबाद की बैठक में खिला फत कमेटी व कांग्रेस ने मिलकर इस आन्दोलन को करने का निश्चय किया गया. एनी बेसेण्ट ने इसका विरोध किया, फिर भी दिसम्बर 1920 ई. के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने इसे स्वीकृति प्रदान कर दी.
असहयोग आन्दोलन के प्रस्ताव की स्वीकृति मिलते ही गांधीजी ने इसे प्रारम्भ कर दिया. यह आन्दोलन अत्यन्त ही संगठित रूप से सत्य एवं अहिंसा के आधार पर चला. गांधीजी ने अपनी उपाधि 'केसर-ए-हिन्द' वायसराय को लौटा दी तथा सारे देश का दौरा कर असहयोग के कार्यक्रम का जनता में प्रचार किया.
स्वरूप - आन्दोलन के प्रारम्भ होते ही बहुत से विद्यार्थियों ने विद्यालयों का बहिष्कार कर दिया तथा राष्ट्रीय संस्थानों में प्रवेश ले लिया हजारों की संख्या में वकीलों एवं बैरिस्टरों ने वकालत छोड़ दी. इस आन्दोलन को मुसलमानों द्वारा भी भरपूर सहयोग मिला. इस आन्दोलन के दौरान इलाहाबाद में राष्ट्रीय महाविद्यालय, काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ, तिलक महाविद्यापीठ जैसे संस्थानों की स्थापना हुई. विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर स्वदेशी सूती वस्त्र के लिए गाँवों में लोगों ने चरखा चलाना प्रारम्भ कर दिया. शराब की दुकानों पर स्त्रियों के द्वारा धरना दिया गया. व्यवस्थापिका सभाओं का बहिष्कार किया गया. 1921 ई. का कांग्रेस अधिवेशन अहमदाबाद में हुआ, जिसमें महात्मा गांधी को इस आन्दोलन का एकमांत्र संचालक नियुक्त किया गया. इस आन्दोलन के फलस्वरूप आसाम में चाय बागान मजदूरों ने हड़ताल की तथा मिदनापुर के किसानों ने यूनियन बोर्ड को टैक्स देना बन्द कर दिया.
दमन – सरकार ने इस आन्दोलन की देखरेख कर इसे कुचलने के लिए हजारों की संख्या में राजनीतिक बन्दी बना लिए और मान्य एवं बड़े नेताओं को कारागार में डाल दिया. सार्वजनिक सभाओं पर कड़ी पाबन्दी लगा दी गई. राष्ट्रीय संस्थाओं को अवैध घोषित कर दिया गया.
इसी बीच 5 फरवरी, 1922 ई. को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरा-चौरी नामक स्थान पर उग्र भीड़ ने थानेदार व कई सिपाहियों की हत्या कर थाने में आग लगा दी. जब गांधीजी ने यह समाचार सुना, तो उन्हें बहुत अधिक दुःख हुआ और उन्हें यह लगा कि आन्दोलन अपना अहिंसक रूप खोता जा रहा है तथा हिंसात्मक होता जा रहा है, क्योंकि बम्बई तथा मालाबार में हिंसात्मक दंगे हो चुके थे. इस घटना से क्षुब्ध होकर गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन को 12 फरवरी, 1922 ई. को स्थगित करने की घोषणा कर दी तथा प्रायश्चित के रूप में 5 दिनों का उपवास रखा.
गांधीजी के इस आन्दोलन के स्थगित कर देने से बहुत से नेता उनसे क्षुब्ध हो गए. सुभाष चन्द्र बोस ने कहा कि "जिस समय जनता का जोश सबसे ऊँचे शिखर पर था, उस समय पीछे लौट आना राष्ट्रीय दुर्घटना से किसी भी प्रकार से कम नहीं. " सरकार द्वारा गांधीजी को 10 मार्च, 1922 ई. को गिरफ्तार कर उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया तथा 6 वर्ष की सजा देकर उन्हें 'यरवदा' जेल भेज दिया गया.
असहयोग आन्दोलन का महत्त्व या मूल्यांकन – असहयोग आन्दोलन जब अपने चरम को प्राप्त करने वाला था, ठीक उससे पहले ही इसे स्थगित कर दिया गया जिससे लोगों में अत्यधिक निराशा की भावना पैदा हुई और उसे एक असफल आन्दोलन कहा गया, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं था. इस आन्दोलन के जरिए कांग्रेस, जो एक वैधानिक एवं बातचीत करने वाला दल था, अब एक क्रान्तिकारी संगठन में बदल गया था. इस आन्दोलन ने कांग्रेस को एक सम्पूर्ण राष्ट्रीय छवि प्रदान की. उसके नेतृत्व का असर समूचे राष्ट्र में दिखाई देने लगा. कांग्रेस की पहचान इसी समय में खादी बनी तथा देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी बने, इसका प्रस्ताव पास कर दिया गया.
वास्तविकता यह थी कि कांग्रेस के अनेक बड़े नेता गिरफ्तार हो चुके थे तथा योग्य नेतृत्व के अभाव में यह आन्दोलन अपनी राह से हट रहा था तथा जनता में प्रतिशोध की भावना बढ़ रही थी, इसलिए आन्दोलन का स्थगन उचित था.
इस आन्दोलन का महत्त्व इसलिए भी अधिक है कि राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रथम एवं सम्पूर्ण जन-आन्दोलन था, जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों सम्मिलित हुए. इसी आन्दोलन ने अनेक राष्ट्रीय विद्यापीठों की स्थापना की.
> सविनय अवज्ञा आन्दोलन
कारण – सविनय अवज्ञा आन्दोलन के निम्नलिखित कारण थे—
1. अंग्रेज सरकार ने नेहरू रिपोर्ट जिसमें औपनिवेशिक स्वराज्य की माँग की गई, को अस्वीकार कर दिया था. इस कारण से भारतीयों या कांग्रेस के पास संघर्ष या आन्दोलन के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय शेष नहीं बचा था.
2. इस समय विश्व में आर्थिक मन्दी का दौर चल रहा था, इससे भारत भी प्रभावित हुआ और देश की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई.
3. औद्योगिक तथा व्यावसायिक वर्ग के लोग सरकार की नीति से असन्तुष्ट थे. कल कारखानों में हड़तालों का ताँता लग गया था. मजदूरों में इससे बड़ी उत्तेजना फैली हुई थी.
4. देश में चारों ओर असन्तोष की लहर फैली हुई थी और हिंसात्मक गतिविधियाँ तेज हो गई थीं. अतः 1930 ई. में फरवरी माह में कांग्रेस की कार्यकारिणी ने महात्मा गांधी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने का अधिकार प्रदान कर दिया.
आन्दोलन का सूत्रपात - 12 मार्च, 1930 ई. की गांधीजी ने 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन को प्रारम्भ करने की घोषणा की तथा समुद्र तट पर स्थित दाण्डी नामक स्थान पर जाकर बमकू कानून को तोड़ने का निश्चय किया तथा अपने 78 साथियों के साथ दाण्डी के लिए रवाना हो गए. 6 अप्रैल, 1930 ई. को गांधीजी ने दाण्डी पहुँचकर नमक बनाया और नमक कानून को तोड़ दिया और इसी के साथ ही पूरे देश में सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ हो गया तथा देश के प्रत्येक भाग में नमक कानून भंग करने का आन्दोलन चल पड़ा.
इसका दूसरा पक्ष यह था कि किसानों ने सरकार को कर देना बन्द कर दिया. इसमें हजारों की संख्या में स्त्रियों ने भाग लेकर स्थान-स्थान पर धरना दिया. बम्बई, कलकत्ता एवं दिल्ली में हड़तालें हुईं, व्यवसाइयों ने भी छः दिनों तक हड़ताल रखी.
सरकार ने इस आन्दोलन को दबाने के लिए हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया, जगह-जगह पर लाठी चार्ज, गोली चलाने का आदेश दिया गया तथा घोड़े दौड़ाए गए. 6 मई, 1930 ई. को गांधीजी को गिरफ्तार कर लिए जाने से आन्दोलन में और अधिक उग्रता आ गई और पूरे राष्ट्र में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई.
इस आन्दोलन के समय में ही 1930 ई. में इंगलैण्ड के प्रधानमन्त्री मैक्डोनाल्ड की अध्यक्षता में लन्दन में प्रथम गोलमेज सम्मेलन हुआ, जिसमें इस आन्दोलन के कारण कांग्रेस ने भाग नहीं लिया और यह सम्मेलन असफल हो गया.
गांधी-इरविन समझौता – सर तेज बहादुर सप्रू, डॉ. जयकर और श्रीनिवास शास्त्री के प्रयासों से गांधीजी व वायसराय लॉर्ड इरविन के मध्य एक समझौता हुआ, जिसमें निम्नलिखित बातें तय की गई—
1. कांग्रेस गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी.
2. सविनय अवज्ञा आन्दोलन बन्द कर दिया जाएगा.
3. सभी राजनैतिक कैदी मुक्त कर दिए जाएँगे.
गांधीजी के प्रभाव के कारण इस समझौते को कांग्रेस ने अपने कराची अधिवेशन में स्वीकार कर लिया. हालांकि कांग्रेस के अनेक लोग इस समझौते से सन्तुष्ट नहीं थे और इससे कांग्रेस को कोई लाभ नहीं हुआ, बल्कि उसने अपना आन्दोलन, जो कि दिनों-दिन बढ़ रहा था, वापस लेना पड़ा.
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए गांधीजी इंगलैण्ड गए तथा इस सम्मेलन में गांधीजी ने पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की, जिसे सरकार ने ठुकरा दिया.
इसके साथ ही सरकार ने मुसलमानों, सिखों एवं दलितों के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व की व्यवस्था कर साम्प्रदायिक समस्या को अत्यन्त जटिल बना दिया गया. इससे गांधीजी असफल होकर भारत वापस लौट आए.
भारत आकर गांधीजी ने 1 जनवरी, 1932 ई. को सविनय अवज्ञा आन्दोलन पुनः चालू कर दिया. इस पर 4 जनवरी, 1932 ई. को गांधीजी को कैद कर लिया गया.
1932 ई. में लन्दन में तृतीय गोलमेज सम्मेलन हुआ, जिसमें कांग्रेस ने भाग नहीं लिया, इसके बावजूद भी इसमें भारत में शासन-सम्बन्धी परिवर्तन पर विचार हुआ और 1933 ई. में सरकार ने एक 'श्वेत-पत्र' जारी किया. इसका देश में विरोध हुआ. मई 1934 तक आते-आते यह आन्दोलन अत्यधिक कमजोर हो गया, अतः कांग्रेस कार्यकारिणी ने आन्दोलन को बन्द कर दिया.
परिणाम एवं महत्त्व – इस आन्दोलन का सर्वाधिक महत्त्व इस बात में है कि सवज्ञा आन्दोलन ने जनता में आत्मविश्वास पैदा किया और स्वतन्त्रता के लिए लोगों को मर मिटने के लिए तैयार कर दिया. इस प्रकार इस आन्दोलन ने भारत में राष्ट्रीयता की भावना को अत्यन्त बलवती बना दिया.
> 1942 ई. का भारत छोड़ो आन्दोलन 
कारण – 1942 ई. की क्रान्ति या भारत छोड़ो आन्दोलन के निम्नलिखित कारण थे
1. भारत की उस समय की समस्या के समाधान के लिए जो क्रिप्स मिशन इंगलैण्ड से यहाँ भेजा गया था, उसकी पूरी तरह से असफलता ने यह सिद्ध कर दिया कि ब्रिटिश सरकार भारतीय समस्या का समाधान नहीं करना चाहती है.
2. प्रारम्भ में 1942 ई. के आसपास ब्रिटिश सरकार जापान के विरुद्ध द्वितीय महायुद्ध में पूरी तरह से असफल रही तथा जापान द्वारा भारत पर आक्रमण का खतरा मँडराने लगा, तब भारतीयों को लगा कि अंग्रेज उनकी रक्षा नहीं कर सकते.
3. इस महायुद्ध के दौरान चोरबाजारी एवं लूट का बाजार देश में गर्म था. इसके साथ ही ब्रिटिश सरकार ने यह घोषणा की थी कि भारत को युद्ध का अड्डा बनाया जाएगा. इससे भारतीय जनता बहुत ज्यादा क्षुब्ध थी तथा अंग्रेजों को अब भारत से निकालने के लिए पूरी तैयारी हो चुकी थी.
4. 14 जुलाई, 1942 को कांग्रेस ने वर्धा में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसके अनुसार अंग्रेजों को भारत छोड़ देना था तथा इसमें यह भी कहा गया कि अब ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई हैं, जिसका समाधान केवल ब्रिटिश शासन का अन्त है और इसके लिए शीघ्र ही एक आन्दोलन छेड़ा जाएगा. इस पर इलाहाबाद अधिवेशन में पं. नेहरू ने कहा कि “हम आग से खेलने जा रहे हैं, हम दुधारी तलवार प्रयुक्त करने जा रहे हैं, जिसकी चोट उल्टे हमारे ऊपर भी पड़ सकती है, लेकिन हम विवश हैं."
5. 7 व 8 अगस्त, 1942 ई. को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित कर दिया गया तथा 8 अगस्त, 1942 ई. को बम्बई के अगस्त क्रान्ति मैदान में गांधीजी ने 70 मिनट तक भाषण दिया और उन्होंने कहा कि “भारत में ब्रिटिश शासकों का रहना जापान को भारत पर आक्रमण के लिए आमन्त्रण देना है, उनके भारत छोड़ने पर यह आक्रमण हट जाएगा. भारत को ईश्वर के हाथों में छोड़ दो अथवा प्रचलित भाषा में अराजकता पर भारत को छोड़ दो. तदन्तर सभी दल आपस में या तो कुत्तों की तरह लड़ेंगे या वास्तविक दायित्व आने पर तब कोई न्यायोचित समझौता कर लेंगे. मैं जिन्ना के हृदय परिवर्तन या स्वतन्त्रता की बात नहीं जोड़ सकता. यह मेरे जीवन का अन्तिम संघर्ष है." इस प्रकार गांधीजी ने लोगों को ‘करो या मरो' का नारा देकर आन्दोलन के लिए आह्वान किया.
9 अगस्त को अंग्रेज सरकार ने गांधीजी के साथ-साथ अनेक बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया तथा कांग्रेस को अवैध घोषित कर दिया गया. उसके कार्यालयों पर पुलिस का पहरा लगा दिया गया.
आन्दोलन का विस्तार – अनेक नेताओं के गिरफ्तार हो जाने से आन्दोलन अनियन्त्रित हो गया तथा सरकार विरोधी प्रदर्शन, हड़तालें, सभाएँ और जुलूस आदि बड़े पैमाने पर होने लगे. सारे देश में आतंक छा गया. सरकार के प्रति घृणा और रोष का वातावरण बन गया और जनता हिंसक हो उठी. अग्निकाण्ड, हत्या, तोड़फोड़ के कारण रेल, डाक, तार आदि व्यवस्थाएँ धराशायी हो गईं. स्कूल, कॉलेज बन्द हो गए. देश के बलिया, बंगाल में मिदनापुर, महाराष्ट्र में सतारा आदि जगहों पर ब्रिटिश शासन का अन्त करके समानान्तर सरकारें बैठा दी गईं. जेलों पर आक्रमण करके कैदियों को जनता ने भगा दिया.
दमन – आन्दोलन की भयंकरता को देखकर ब्रिटिश सरकार ने उतनी ही अधिक पाशविक नीति का सहारा इस आन्दोलन को दबाने में लिया. सारे देश में फौजी दस्तों द्वारा जनता पर गोलियों की बौछार की गई. धूप में खड़ा कर लोगों पर गोली चलाना, नंगा कर पेड़ों पर उल्टे लटका देना, कोड़े मारना, औरतों को नंगा कर उनके गुप्तांगों में लाल मिर्च भर देना आदि अनेक अमानुषिक तरीके जनता को आतंकित करने के लिए अपनाए गए.
सरकार के इस व्यवहार से गांधीजी अत्यन्त दुःखी हो गए तथा इस पर उन्होंने 10 फरवरी, 1943 ई. से 21 दिनों का उपवास प्रारम्भ कर दिया. वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् के सदस्यों ने गांधीजी से प्रभावित होकर इस्तीफा दे दिया तथा सरकार से अपील की कि वह गांधीजी को रिहा कर दें. 2 मार्च, 1943 को गांधीजी का अनशन समाप्त हो गया तथा 1944 ई. में बीमार हो जाने पर गांधीजी को 6 मई, 1944 ई. को रिहा कर दिया गया और आन्दोलन समाप्त हो गया.
परिणाम–1942 ई. का वर्ष 'भारत छोड़ो आन्दोलन' या 'अगस्त क्रान्ति' के कारण भारतीय इतिहास में यह अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखतां है. यह आन्दोलन यद्यपि सफल नहीं हो सका, तथापि इसका महत्व कम नहीं है. इस आन्दोलन ने यह प्रमाणित कर दिया कि भारत अब और अधिक दिनों तक अंग्रेजों की गुलामी सहन नहीं कर सकता. सरकार को यह पता चल गया कि जनता में उसके विरुद्ध व्यापक असन्तोष है तथा अब यहाँ शासन बनाए रखने के लिए ब्रिटिश फौज के अतिरिक्त अन्य किसी पर विश्वास नहीं किया जा सकता है.
इस प्रकार स्पष्ट है कि इस आन्दोलन ने भारतीय स्वतन्त्रता की सम्पूर्ण पृष्ठभूमि का निर्माण कर दिया.
> भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में गांधीजी की भूमिका पर एक लेख लिखिए.
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में महात्मा गांधी का स्थान सबसे ऊपर है, क्योंकि भारतीय स्वतन्त्रता उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का ही परिणाम है. उन्होंने स्वतन्त्रता आन्दोलन में एक नए वंश और युग का निर्माण किया. वे अपने जीवन की अन्तिम श्वास तक देश सेवा में लगे रहे और अन्त में भारत को स्वतन्त्र कराने में सफल हुए. उनके इसी योगदान के कारण आज हम उन्हें श्रद्धा से 'राष्ट्रपिता' के नाम से पुकारते हैं.
गांधीजी का जन्म 2 अक्टूबर, 1869 ई. को गुजरात के पोरबन्दर नामक स्थान पर एक वैश्य परिवार में हुआ था. उनके पिता करमचन्द गांधी राजकोट रियासत के दीवान थे. गांधीजी का नाम इसी से, मोहनदास करमचन्द गांधी था. उनका विवाह 13 वर्ष की अवस्था में कस्तूरबा से हुआ तथा प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा राजकोट में हुई.
मैट्रिक पास करने के बाद गांधीजी ने इंगलैण्ड से बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा स्वदेश लौटकर वकालत प्रारम्भ की. अब्दुल्ला एण्ड कम्पनी के एक मुकदमे के सिलसिले में गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा, जहाँ उन्होंने भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध सत्याग्रह किया. उनका यह प्रयोग वहाँ सफल रहा. वे 1914 ई. में वापस स्वदेश लौट आए.
स्वदेश लौटने के बाद गांधीजी ने साबरमती नदी के किनारे अहमदाबाद में एक आश्रम की स्थापना की. 191718 ई. में बिहार के ‘चम्पारण' व गुजरात के 'खेड़ा' के किसानों के लिए सत्याग्रह कर उन्हें हक दिलवाया,
इसके बाद गांधीजी पूरे देश में लोकप्रिय हो गए और कांग्रेस के कर्णधार हो गए. 1919 ई. में रोलेट एक्ट तथा जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड के कारण गांधीजी का अंग्रेजों से विश्वास उठ गया और अब वे उनके शत्रु बन गए. 1920 ई. में गांधीजी ने 'असहयोग आन्दोलन' चलाकर कांग्रेस को राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रतीक बना दिया तथा देश में प्रबल राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न कर दी. महात्मा गांधी का अटूट विश्वास था कि जनता की शक्ति संसार की प्रबल शक्ति है, जो बड़े-बड़े राज्यों की नींव हिला सकती है. भारतीय जनता ने उनके प्रत्येक कार्य में सत्य एवं अहिंसा के प्रयोग को देखते हुए ‘महात्मा' की उपाधि दी.
गांधीजी हिंसा एवं हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिकता के विरोधी थे तथा सदा दोनों पक्षों में एकता पर बल देते थे. गांधीजी एक व्यावहारिक एवं आदर्शवादी व्यक्ति थे, इसी कारण से वह आतंकवादी एवं क्रान्तिकारी आन्दोलन के राष्ट्रहित में होते हुए भी उसके विरोधी थे. 1930 में 'सविनय अवज्ञा' आन्दोलन व 1942 ई. में 'भारत छोड़ो आन्दोलन' चलाकर गांधीजी ने विदेशी अंग्रेज सरकार के विरुद्ध जबर्दस्त आन्दोलन किया. इन आन्दोलनों के कारण उन्हें अनेक बार जेल भी जाना पड़ा.
1946 ई. में जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की माँग को दोहराते हुए 'सीधी कार्यवाही' कर बंगाल में लूटमार एवं साम्प्रदायिक हिंसा फैला दी, तब गांधीजी उपद्रवग्रस्त स्थान नौआखाली गए तथा हिन्दुओं को ढाँढ़स बँधाया. 1947 ई. में माउण्टबेटेन योजना के अनुसार भारत व पाकिस्तान दो स्वतन्त्र राष्ट्रों का निर्माण किया गया, जिससे पूरे राष्ट्र में साम्प्रदायिक दंगे फैल गए. अतः इन दंगों को समाप्त करने के लिए गांधीजी ने पैदल घूम-घूमकर इसे समाप्त करने की कोशिश की, परन्तु 30 जनवरी, 1948 के दिन नाथूराम गोडसे नामक एक सिरफिरे व्यक्ति ने बिड़ला भवन (नई दिल्ली) में प्रार्थना सभा में जाते समय इनकी गोली मारकर हत्या कर दी.
महात्मा गांधी विश्वकल्याणकारी एवं मानवतावादी राजनीतिक नेता थे. ऊँच-नीच, गरीब-अमीर के भेदभाव को मिटाकर देश में 'सर्वोदय समाज' की स्थापना करना चाहते थे. उन्होंने अछूतोद्धार के लिए हरिजन सुधार आन्दोलन चलाया.
देश की आर्थिक स्थिति को व्यवस्थित एवं सुदृढ़ बनाने के लिए उन्होंने गृह उद्योग, लघु उद्योग, सरकारी-पद्धति तथा ग्राम पंचायत, ग्राम स्वावलम्बी आदि का समर्थन किया तथा विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आन्दोलन चलाया. शिक्षा के लिए उन्होंने 'बेसिक शिक्षा योजना प्रस्तुत की, ताकि देश में स्वावलम्बी नागरिक तैयार हो सकें व उनका सम्पूर्ण विकास हो सके.
इस प्रकार महात्मा गांधी का न केवल भारत को स्वतन्त्र कराने में ही योगदान है, अपितु उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को मानवता और सत्य तथा अहिंसा का संदेश दिया. इसके साथ ही उन्होंने नवीन विचारधारा प्रस्तुत कर राष्ट्र को एक नई दिशा प्रदान की.
> जस्टिस पार्टी (न्याय दल) की विचारधारा तथा कार्यक्रम
1917 ई. में श्री पी. त्यागराज तथा डॉ. टी. एम. नैयर ने प्रथम इत्तर ब्राह्मण संस्था गठित की, जिसका नाम दक्षिण भारतीय उदारवादी संघ था, जिसे कालान्तर में प्रायः न्याय दल (जस्टिस पार्टी) कहने लगे. 1937 ई. में रामास्वामी नैयर इस दल के अध्यक्ष चुने गए. नैयर सामाजिक समानता के लिए एक बड़े नेता थे. इन्होंने अस्पृश्यता जैसे अन्याय के विरुद्ध अभियान चलाया तथा हिन्दू धर्म की आलोचना की. इन्होंने कहा कि यह ब्राह्मणों के नियन्त्रणों का एक साधन है. इन्होंने मनु के विधान को अमानुषी, पुराणों को परियों की कथाओं की संज्ञा दी. इसके साथ ही उन्होंने हिन्दू देवीदेवताओं की आलोचना की और यह कहा कि “कुछ ऐसे तत्व होते हैं जिनका सुधार नहीं हो सकता, उनका केवल अन्त करना होता है. ब्राह्मणीय हिन्दू धर्म एक ऐसा ही तत्त्व है." नैयर ने धर्म को केवल अन्धविश्वास माना और हिन्दू भाषा को द्रविड़ों पर थोपने का विरोध किया. नैयर ने होटलों के नामपट्टों पर जातिवाचक शब्दों को तारकोल से मिटाने का प्रयत्न किया. ब्राह्मणों के यज्ञोपवीत को तोड़ा तथा देवी देवताओं की मूर्तियों को चप्पल से पीटकर तोड़ दिया. इसके अनुयायी इसे तनते (पिता) तथा पेरियार (महान् आत्मा) के नाम से पुकारते थे.
नैयर के अनुयायी तथा मित्र श्री. सी. एन. अन्नादुरई ने इस दल के आन्दोलन को आगे बढ़ाया. अन्ना काँचीपुरम के एक जुलाहा जाति से थे. 1944 ई. में न्याय दल का नाम बदलकर द्रविड़ कणगम कर दिया गया. सितम्बर 1949 ई. में इस दल में विभाजन हो गया और अन्ना ने अपने दल का नाम 'द्रविड़ मुनेत्र कणगम' रख दिया. 1962 ई. में अन्ना राज्य सभा के लिए चुने गए.
अन्ना भारतीय एकता के विरोधी नहीं थे, परन्तु वे राज्यों के लिए अधिक स्वायत्तता के पक्षधर थे. अन्ना का नाम तमिलनाडु के बनाने वाले के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगा.
> वामपंथी राजनीति
दक्षिण और वाम शब्दों का प्रयोग प्रथम बार फ्रांसीसी क्रान्ति के समय किया गया. राजा के समर्थकों को दक्षिणपंथी और विरोधियों को वामपंथी कहा गया. कालान्तर में समाजवाद और साम्यवाद के उत्थान के बाद वामपंथी शब्द का प्रयोग इनके लिए होने लगा.
> भारत में वामपंथी आन्दोलन
भारत में मार्क्सवाद के विषय में जानकारी तथा उसका फैलना रूसी क्रान्ति के कुछ समय बाद ही आरम्भ हो गया. 1918-22 ई. से कामगार असन्तोष ने साम्यवाद के विचारों को पनपने का अवसर दिया. बम्बई, कलकत्ता, कानपुर आदि स्थानों में साम्यवाद सभाएँ बननी आरम्भ हो गईं.
1920 ई. में एम. एन. रॉय तथा कुछ अन्य लोगों ने ताशकंद में भारतीय साम्यवादी दल बनाने की घोषणा की. 1924 ई. कानपुर षड्यन्त्र मुकदमे का अन्त होते ही सत्य भक्त ने साम्यवादी दल बनाने की घोषणा कर दी तथा स्वयं इसका सचिव बन गया. भारतीय साम्यवादी आन्दोलन को पाँच भागों में बाँटा जा सकता है –
(1) 1920 से 1928 ई. तक – इस काल में साम्यवादी दल ने तीन षड्यन्त्रों में सम्बन्धित होने के कारण विशेष ध्यान आकर्षित किया. यह थे - पेशावर, कानपुर, मेरठ मुकदमा कांग्रेस कार्यकारिणी ने इनके मुकदमों के लिए एक केन्द्रीय सुरक्षा समिति का गठन किया इनकी ओर से जवाहरलाल नेहरू, कैलाशनाथ काटजू तथा डॉ. एफ. एच. अंसारी जैसे लोग पेश हुए. गांधीजी अपराधियों से मिलने जेल गए.
साम्यवादियों को केन्द्रीय विधान सभा में कांग्रेसी सदस्यों का समर्थन मिला और सरकार द्वारा प्रस्तुत सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक जो साम्यवादियों के विरुद्ध था, पारित नहीं होने दिया गया.
(2) 1928-1936 ई. तक - कांग्रेस ने जब साइमन कमीशन (1928) का विरोध किया, पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया तथा द्वितीय सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया, उस समय साम्यवादियों को अपनी विचारधारा एवं संगठन के कारण बहुत हानि उठानी पड़ी, क्योंकि इन लोगों ने अन्तर्राष्ट्रीय संगठन से संकेत प्राप्त कर राष्ट्रीय कांग्रेस के वामपंथी अंगों पर प्रहार करना प्रारम्भ कर दिया और कांग्रेस को साम्राज्यवादी अंग्रेजों के समान ही शोषक बताया. इससे साम्यवादी दल राष्ट्र की मुख्य धारा (राजनैतिक) से अलगथलग पड़ गया.
(3) 1935 से 1939 ई. तक – इस काल में साम्यवादी संगठन का मुख्य ध्येय यह था कि वे कांग्रेस में सम्मिलित होकर उसके संगठन का प्रयोग अपने आधार को विस्तृत बनाने में करें. साम्यवादियों, कांग्रेस समाजवादियों और व्यापार संघों ने मिलकर एक संयुक्त मोर्चा बनाने की सोची, परन्तु इसमें साम्यवादियों को सफलता नहीं मिल सकी.
(4) विश्व युद्ध द्वितीय के दौरान - जब विश्व युद्ध प्रारम्भ हुआ, तो कांग्रेस की अस्पष्ट नीति के कारण साम्यवादी संगठन ने तुरन्त इस युद्ध को साम्राज्यवादी युद्ध कहना प्रारम्भ कर दिया, परन्तु जब जर्मनी ने 1942 ई. में साम्यवादी रू पर आक्रमण किया तब साम्यवादियों ने अपने विचारों के विपरीत इस युद्ध को लोक युद्ध (People War) की संज्ञा दी तथा अंग्रेज सरकार का साथ देने लगे. इससे सरकार ने इनके दल को वैध घोषित कर दिया.
कांग्रेस ने जब 1942 ई. में भारत छोड़ो आन्दोलन चलाया, तब साम्यवादियों ने इसका विरोध किया और अंग्रेजों की ओर से भेदियों की भूमिका निभाई. उनकी इस नीति के कारण इन्हें राष्ट्रवादियों की कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा.
(5) 1942-1947 ई. तक – इस समय साम्यवादियों ने कांग्रेस व मुस्लिम लीग के मध्य मतभेदों को और अधिक हवा देने के लिए मुसलमानों का समर्थन करना प्रारम्भ कर दिया तथा पृथकतावादी भावनाओं को बढ़ावा देना प्रारम्भ किया. इनका प्रयास था कि देश को आजादी तो मिले, परन्तु वह अनेक छोटे-छोटे राज्यों में बँट जाए. इसके बाद इन राज्यों पर साम्यवाद का प्रभाव बढ़ाया जाए. मुस्लिम लीग ने साम्यवादी कार्यक्रम पर विश्वास न कर इनसे हाथ मिलाने से इन्कार कर दिया. फलतः यह दल एक कलंकित संस्था बन गया.
इन्होंने भारत को केबिनेट मिशन के सम्मुख देश के 17 स्वतन्त्र भागों में बाँटने का प्रस्ताव 1942 ई. में रखा. इससे लोगों में इस दल के प्रति घृणा फैल गई और 1947 ई. तक यह छिन्न-भिन्न हो गया.
> दलित वर्ग का आन्दोलन
आधुनिक भारत में दलित वर्ग के उत्थान एवं निम्न जातीय लोगों के लिए किए गए आन्दोलनों की संक्षिप्त रूपरेखा
मध्ययुगीन भारतीय धार्मिक सुधारकों के अनुयायी प्रायः निम्न जातियों से थे, परन्तु आधुनिक युग में अस्पृश्यता जैसी बुराई को दूर करने के लिए उच्चवर्णीय हिन्दुओं ने भी प्रयास किए, परन्तु उन्हें पूर्णरूप से सफलता नहीं मिल सकी. इसी समय कुछ घटनाएँ ऐसी घटी कि निम्न जातीय लोगों ने अपने उत्थान का भार स्वयं अपने कन्धों पर ले लिया और निम्न जातियों में ऐसे नेता उभरे, जिन्होंने समानता के आन्दोलनों को चलाया. इनमें निम्नलिखित प्रमुख नेता थे -
1. नारायण गुरु.
2. ज्योतिबा फुले.
3. डॉ. भीमराव अम्बेडकर.
उपर्युक्त नेताओं द्वारा चलाए गए आन्दोलनों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है –
(1) नारायण गुरु– नारायण गुरु केरल के प्रमुख एझवा जाति के नेता थे. इन्होंने केरल तथा केरल से बाहर के कई स्थानों पर एस. एन. डी. पी. (श्री नारायण धर्म परिपालन योगम) नाम की एक संस्था स्थापित की. इन्होंने एझवा वर्ग के उत्थान के लिए दो बिन्दु का कार्यक्रम बनाया – 
1. अपने से नीची जातियों के प्रति अस्पृश्यता की प्रथा को समाप्त करना.
2. सभी वर्गों के लिए मन्दिरों का निर्माण.
इन्होंने विवाह-संस्कार, धार्मिक पूजा तथा अंत्येष्टि आदि के कर्मकाण्डों को सरल बना दिया. नारायण गुरु को अस्पृश्य जातियों को पिछड़ी जातियों में परिवर्तित करने में विशेष सफलता मिली. इन्होंने महात्मा गांधी की इस आधार पर आलोचना की कि वह निम्न जातियों के प्रति मौखिक सहानुभूति रखते हैं. उन्होंने गांधीजी की चतुवर्णीय व्यवस्था में विश्वास की भावना की आलोचना की. नारायण गुरु ने एक नया नारा 'मानव के लिए एक धर्म, एक जाति तथा एक ईश्वर' दिया.
(2) ज्योतिबा फुले तथा सत्यशोधक समाज– पश्चिमी भारत में ज्योतिराव, गोविन्दराव फुले ने निम्न जाति के लिए संघर्ष किया. इनका जन्म पुणे में एक माली के घर में हुआ था.
ज्योतिराव को ब्राह्मण के डर की कुछ घटनाओं ने इनके जीवन का सारा दृष्टिकोण ही बदल दिया. एक ब्राह्मण ने इनका अपमान इसलिए किया, क्योंकि इन्होंने एक ब्राह्मण मित्र की बारात में सम्मिलित होने की धृष्टता की थी. ब्राह्मणों ने इनका विरोध इस कारण से भी किया, क्योंकि यह स्त्रियों तथा निम्न जातियों के लिए एक पाठशाला चला रहे थे. ब्राह्मणों के दबाव के कारण इन्हें अपनी पाठशाला बन्द करनी पड़ी.
1873 ई. में ज्योतिराव ने 'सत्यशोधक सभा' बनाई जिसका उद्देश्य था कि यह सभा समाज के कमजोर वर्ग को सामाजिक न्याय दिला सके. इन्होंने सभी वर्णों के अनाथों तथा स्त्रियों के लिए अनेक पाठशालाएँ एवं अनाथालय खोले. इन्हें 1876 ई. पुणे नगरपालिका का सदस्य चुना गया.
ज्योतिबा के प्रकाशनों में 'धर्म तृतीय रत्न' (पुराणों का भण्डाफोड़), इशारा (एक चेतावनी), शिवाजी की जवानी इत्यादि सम्मिलित है. 1888 ई. में ज्योतिबा को महात्मा कहने लगे.
(3) डॉ. भीमराव अम्बेडकर – भीमराव अम्बेडकर निम्न जातियों के उत्थान के लिए एक अन्य अग्रणी नेता थे. इनका जन्म 14 अप्रैल, 1891 ई. को 'महार कुल' में 'महु' में हुआ था.
अम्बेडकर ने बम्बई के एल्फिन्सन कॉलेज से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की, फिर एम. ए. तथा पी-एच. डी. की परीक्षाएँ कोलम्बिया विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण कीं. 1923 ई. में वे बैरिस्टर बन गए. जुलाई 1924 में अम्बेडकर ने बम्बई में एक संस्था 'बहिष्कृत हितकारिणी सभा' बनाई जिसका उद्देश्य अस्पृश्य लोगों को नैतिक तथा भौतिक उन्नति करना था. इन्होंने आन्दोलन की नीति अपनाई तथा अछूतों के लिए मन्दिरों में प्रवेश तथा जनसाधारण के लिए कुओं से पानी भरने के नागरिक अधिकारों को प्राप्त करने का प्रयास किया.
1930 ई. में अम्बेडकर ने राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया तथा अछूतों के लिए मताधिकार की माँग की. अम्बेडकर ने लन्दन में हुई तीनों गोलमेज सम्मेलनों में अछूतों के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया.
17 अगस्त, 1932 को ब्रिटिश प्रधानमन्त्री ने साम्प्रदायिक निर्णय दिया तो उसमें दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचन-मण्डलों का प्रावधान किया गया, जिससे गांधीजी बहुत दुःखी हुए और इसे हटाने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए. अन्त में अम्बेडकर और गांधीजी के मध्य पूना समझौता (24 सितम्बर, 1932) हुआ. जिसमें दलित वर्गों के लिए साधारण वर्ग में ही सीटों का आरक्षण किया गया.
हताश होकर अम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्वतन्त्रता की माँग का विरोध किया और कहा कि अंग्रेजी साम्राज्य बना रहे, ताकि दलित वर्ग के हितों की रक्षा हो सके. अप्रैल 1942 ई. में अनुसूचित जातीय संघ का एक अखिल भारतीय दल के रूप में गठन किया और घोषणा की कि अनुसूचित जातियाँ हिन्दू धर्म को पूर्णरूप से त्याग देगी और वे स्वयं अपने बहुत से साथियों के साथ बौद्ध बन गए.
स्वतन्त्रता की पूर्व संध्या पर कांग्रेस ने अम्बेडकर को संविधान सभा का सदस्य मनोनीत किया. उनका योगदान भारतीय संविधान के बनाने तथा उसका संविधान सभा में मार्गदर्शन के लिए तथा हिन्दू कोड विधेयक को पारित करने में अविस्मरणीय है. आज अम्बेडकर को निम्न जातियों के उद्धारक के रूप में याद किया जाता है.
पाकिस्तान की उत्पत्ति
> पाकिस्तान की माँग के कारणों की समीक्षा 
कांग्रेस व मुस्लिम लीग के मध्य 1916 ई. में लखनऊ समझौता हुआ, जिसके तहत् कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की पृथक् निर्वाचन क्षेत्र की माँग को स्वीकार कर लिया. इससे कांग्रेस व लीग मिलकर काम करने लगी तथा खिलाफत आन्दोलन के समय दोनों दलों के मध्य चरम सीमा तक एकता कायम रही, लेकिन यह शीघ्र ही समाप्त हो गई तथा देश में साम्प्रदायिकता का विकास अत्यन्त तीव्रगति से हुआ. 1936 ई. में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र 'रहमतुल्ला' ने पाकिस्तान शब्द का निर्माण पंजाब, कश्मीर, सिन्ध, ब्लूचिस्तान आदि राज्यों के अक्षरों को मिलाकर किया तथा 1938 ई. में लीग में एक नया सिद्धान्त 'द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त प्रस्तुत कर पाकिस्तान की माँग की, जिसके पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण थे—
1. मुस्लिम लीग के पास जितनी भी माँगें जैसे—पृथक् निर्वाचन क्षेत्र आदि थीं, वे सभी 1937 ई. से पूर्व तक पूरी हो जाने के कारण उनके पास अब ऐसा कोई कार्यक्रम शेष नहीं बचा था, जिससे कि वह मुसलमानों को अपने प्रभाव में रख सके.
2. मुस्लिम लीग ने अपने आपको मुसलमानों का हितैषी साबित करने के लिए 'मुसलमानों पर हिन्दुओं द्वारा अत्याचार' का दुष्प्रभाव प्रारम्भ कर दिया. इससे मुसलमानों की धार्मिक भावनाएँ भड़कने लगीं.
3. भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का बीज अंग्रेजों ने ही बोया था तथा समय-समय पर वह उसे भड़काते रहते थे. उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों के मध्य मतभेद की खाई को उतना चौड़ा कर दिया कि उसे पाटना असम्भव हो गया. अंग्रेजों ने पाकिस्तान की माँग के प्रति काफी उत्साह दिखाया. भारत सचिव एमरी ने कहा था कि “भारतीय स्वतन्त्रता के भावी कगार पर कई भवनों के स्थान हैं."
4. अंग्रेजों की भेदभावपूर्ण नीति एवं मुस्लिम साम्प्रदायिकता के विकास के कारण कुछ कट्टर हिन्दू नेताओं ने एक प्रबल हिन्दू संगठन की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे 1922 ई. में 'हिन्दू महासभा' की स्थापना की गई. इस दल के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से हिन्दू राष्ट्र का प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया. इन्होंने कहा कि भारत में हिन्दू और मुसलमान दो अलग-अलग सम्प्रदाय हैं. इस कारण से जिन्ना ने इसी को आधार बनाकर अपना प्रसिद्ध 'द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त' रखा.
5. पाकिस्तान की माँग का सबसे बड़ा एवं उल्लेखनीय आधार 1937 ई. के चुनावों ने तैयार किया. इन चुनावों में मुस्लिम लीग को भारी असफलता का सामना करना पड़ा. मुस्लिम बहुसंख्यक राज्यों जैसे असम एवं सिन्ध में भी लीग के मन्त्रिमण्डल का गठन नहीं हो सका और इससे लीग को लगा कि, यदि भारत संयुक्त रहा तो इसमें मुसलमानों के हितों का संरक्षण नहीं हो सकता. अतः अब वे जोर-शोर से पाकिस्तान की माँग करने लगे तथा कांग्रेस को लीग की तरफ से हिन्दू संगठन घोषित कर दिया गया.
6. मुस्लिम लीग के अध्यक्ष मोहम्मद अली जिन्ना ने 1940 ई. के लाहौर अधिवेशन में कहा कि "राष्ट्र की किसी भी परिभाषा के अनुसार, मुसलमान एक राष्ट्र है. अतः उनकी अपनी निवास भूमि, अपना प्रदेश और अपना राज्य होना चाहिए." इस आधार पर धीरे-धीरे पाकिस्तान की माँग अत्यन्त बलवती होती गई. इसी अधिवेशन के बाद मुस्लिम लीग अपने प्रत्येक अधिवेशन में पाकिस्तान के गठन पर जोर देती थी.
इस प्रकार स्पष्ट है कि पाकिस्तान के निर्माण में मुस्लिम लीग के पास कार्यक्रमों का अभाव, हिन्दू साम्प्रदायिकता, अंग्रेजों को फूट डालने की नीति तथा 1937 ई. के चुनावों के बाद से लीग में फैली निराशा आदि प्रमुख कारण थे.
> क्रिप्स प्रस्ताव क्या थे? इसे कांग्रेस व मुस्लिम लीग ने स्वीकार करने से क्यों मना कर दिया था ?
द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ हो जाने के बाद भारत के राजनीतिक घटनाक्रम में तेजी से बदलाव आए. कांग्रेस की ओर से गांधीजी 'व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन' चला रहे थे, उधर मुस्लिम लीग अपने पाकिस्तान की माँग पर अड़ी हुई थी. 1942 ई. का वर्ष आते-आते जापान ने ब्रिटेन व अमरीका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर बर्मा तक अधिकार कर लिया था. इस -पुरस्थिति में ब्रिटिश सरकार गम्भीर स्थिति में फँस गई थी. अतः अब उसका भारतीयों से सहयोग लेना अनिवार्य हो गया था.
भारतीयों से सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल का प्रस्ताव लेकर क्रिप्स मिशन मार्च 1942 ई. में भारत आया और उसने दो योजनाएँ कांग्रेस व लीग के सम्मुख रखीं – (i) सुदूरकालीन योजना, जो युद्ध के बाद क्रियान्वित की जाती. (ii) तत्कालीन योजना, जिसके अनुसार केन्द्र में अस्थायी सरकार का गठन करना था. प्रथम योजना के अनुसार एक संविधान सभा बनती, जिसके अधिकांश सदस्य प्रान्तों के विधानमण्डल द्वारा चुने जाते तथा कुछ सदस्य देशी नरेशों द्वारा यह सभा भारत के संविधान का निर्माण करती किन्तु इस संविधान को मानना या न मानना प्रान्तों की मर्जी पर निर्भर करता. दूसरी योजना के अनुसार, केन्द्रीय शासन के सभी विभागों पर ब्रिटिश सरकार का ही नियन्त्रण रहता क्योंकि युद्ध के समय भारत की सुरक्षा का दायित्व ब्रिटिश सरकार पर ही था.
11 अप्रैल, 1942 ई. को कांग्रेस ने इसे निम्नलिखित कारणों से अस्वीकार कर दिया -
1. सुरक्षा विभाग ब्रिटिश सरकार के पास था, जबकि कांग्रेस यह विभाग स्वयं अपने पास रखना चाहती थी.
2. प्रान्तों को संविधान के मानने या न मानने का अधिकार दे देना, इससे भारत के कई टुकड़े हो जाने की सम्भावना थी.
3. देशी राज्यों के प्रतिनिधियों को देशी नरेशों द्वारा चुनना, गांधीजी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि "क्रिप्स प्रस्ताव एक दिवालिया बैंक का पोस्ट डेटेड चेक है." लीग ने भी इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया क्योंकि इसमें कहीं भी स्पष्ट रूप से पाकिस्तान के निर्माण की बात नहीं कही गई थी.
> क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद भारतपाकिस्तान के निर्माण के लिए बनी योजनाएँ
(1) 1944 ई. में अंग्रेज सरकार द्वारा गांधीजी के रिहा कर दिए जाने के बाद गांधीजी ने कांग्रेस व मुस्लिम लीग के मध्य समझौता कराने के उदेश्य से ‘राजगोपालाचारी योजना’ को स्वीकृति प्रदान कर दी. इस योजना में निम्नलिखित बातें सम्मिलित थीं – 
1. मुस्लिम लीग द्वारा भारत की स्वतन्त्रता की माँग का समर्थन करना.
2. अन्तरिम सरकार में लीग द्वारा कांग्रेस को सहयोग देना.
3. युद्ध के समाप्त होने के बाद भारत के उत्तर-पश्चिम एवं उत्तर-पूर्व के उन क्षेत्रों में जहाँ मुसलमान बहुसंख्यक हैं, एक आयोग द्वारा इस क्षेत्र को स्पष्ट करना.
4. इस क्षेत्र में जनमत संग्रह द्वारा यह तय करना कि इस क्षेत्र की जनता भारत में रहना चाहती है अथवा पाकिस्तान में.
5. बँटवारे के बाद प्रतिरक्षा, संचार, आवागमन एवं जनसंख्या का आदान-प्रदान एक समझौते द्वारा तय किया जाएगा.
ये सभी शर्तें तभी लागू होनी थीं, जब अंग्रेजों द्वारा भारत को सत्ता सौंप दी जाती.
जिन्ना इस बँटवारे को सत्ता के हस्तान्तरण से पहले चाहते थे, जबकि गांधीजी उसके बाद, फलतः यह योजना असफल हो गई.
(2) वेबल योजना – 1945 ई. में द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद इंगलैण्ड में चुनाव होने वाले थे. अतः अंग्रेज सरकार ने भारत में संवैधानिक सुधारों के नाम पर लिनलिथगो के स्थान पर लॉर्ड वेबल को भारत का वायसराय नियुक्त कर भेजा.
वेवेल ने 25 जून, 1945 ई. को सभी राजनैतिक दलों के 'प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन शिमला में बुलाया' इस सम्मेलन का उद्देश्य साम्प्रदायिक समस्या का निराकरण कर संवैधानिक गतिरोध दूर करना एवं वायसराय की कार्यकारिणी परिषद् का नए सिरे से गठन करना था.
लेकिन इस योजना को जिन्ना की हठधर्मी एवं वेबल की अदूरदर्शिता के कारण सफलता नहीं मिली और 14 जुलाई, 1945 ई. को यह सम्मेलन असफल हो गया.
(3) केबिनेट मिशन योजना – 24 मार्च, 1946 ई. को केबिनेट मिशन भारतीय समस्या का निराकरण करने के उद्देश्य से भारत आया. इसके सदस्य लोरेंस, स्टेफोर्ड क्रिप्स एवं बी. एलेक्जेण्डर थे. इस मिशन का उद्देश्य था भारतीय नेताओं से मिलकर भारत में पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति को जल्दी सम्भव बनाना. इसके लिए ये लोग राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों से तीन सप्ताहों तक मिलते रहे और 16 मई, 1946 ई. को इन्होंने अपनी योजना प्रस्तुत की. इस योजना में निम्नलिखित प्रमुख तथ्य सम्मिलित थे – 
1. भारत के भावी संविधान के सम्बन्ध में प्रस्ताव.
2. संविधान सभा का निर्माण करना.
3. देशी रियासतों में अंग्रेजी प्रभुसत्ता का भारतीय संविधान के लागू हो जाने के बाद समाप्त हो जाना.
4. ब्रिटेन के साथ संविधान सभा द्वारा सन्धि.
5. अन्तरिम सरकार का गठन.
6. पाकिस्तान की माँग को व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते ठुकरा दिया जाना.
इस योजना को पहले कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया. इस पर मुस्लिम लीग ने यह दावा किया कि वह कांग्रेस की सहायता के बिना ही अन्तरिम सरकार का गठन कर लेगी, जिसे वायसराय ने ठुकरा दिया. इससे जिन्ना ने पाकिस्तान की माँग को खटाई में पड़ते देखा और 16 अगस्त, 1946 ई. को 'प्रत्यक्ष कार्यवाही की घोषणा कर दी. 
अब कांग्रेस ने अन्तरिम सरकार के गठन का फैसला करके 24 अगस्त, 1946 को अन्तरिम सरकार का गठन कर लिया और 2 सितम्बर को कार्यभार ग्रहण कर लिया. पं. जवाहरलाल नेहरू इस सरकार के प्रधानमन्त्री बनाए गए. बाद में लीग भी अक्टूबर 1946 ई. में इस सरकार में शामिल हो गई.
मुस्लिम लीग ने सरकार में घुसकर कांग्रेस की नीतियों का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया, इससे दोनों दलों का साथ-साथ काम करना कठिन हो गया.
(4) लन्दन कान्फ्रेंस – मुस्लिम लीग एवं कांग्रेस के मध्य अन्तरिम सरकार के गतिरोध को दूर करने के लिए 3 से 6 दिसम्बर, 1946 ई. को लन्दन में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें नेहरू, जिन्ना, एटली एवं वेबल ने भाग लिया, परन्तु संविधान सभा के प्रश्न पर दोनों में मतभेद बना रहा और यह कॉन्फ्रेंस असफल हो गई.
(5) एटली की घोषणा – 20 फरवरी, 1947 को इंगलैण्ड के प्रधानमन्त्री एटली ने यह घोषणा की कि जून 1948 ई. के पूर्व अंग्रेज सरकार भारतीयों को सत्ता का हस्तान्तरण कर देगी. सत्ता के हस्तान्तरण के लिए लॉर्ड वेबल के स्थान पर लॉर्ड माउण्टबेटन को वायसराय बनाकर भारत भेजा गया.
(6) माउण्टबेटन योजना – 24 मार्च, 1947 ई. को माउण्टबेटन ने वायसराय का पद ग्रहण कर विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श कर 3 जून, 1947 ई. को अपनी योजना प्रकाशित की, जिसमें निम्नलिखित बातें सम्मिलित थीं—
1. भारत का विभाजन भारतीय संघ एवं पाकिस्तान संघ में कर दिया जाए.
2. राज्यों की सीमा निश्चित करने से पूर्व पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रदेश और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराया जाए और सिन्ध विधान सभा में वोट द्वारा यह निश्चित किया जाए कि वे किसके साथ रहना चाहते हैं.
3. बंगाल एवं पंजाब में हिन्दू तथा मुसलमान बहुसंख्यक जिलों के प्रान्तीय विधान सभा के सदस्यों की अलगअलग बैठक बुलाई जाए. उनमें से यदि कोई भी पक्ष प्रान्त का विभाजन चाहेगा, तो विभाजन कर दिया जाएगा.
4. संविधान सभा को दो भागों में बाँट दिया जाएगा और वे स्वतन्त्र रूप से अपने-अपने देश के लिए संविधान का निर्माण करेंगी.
5. देशी राज्यों को स्वतन्त्र रहने या संघों में से किसी एक संघ में मिलने की स्वतन्त्रता होगी.
इस योजना को ब्रिटिश संसद ने 16 जुलाई, 1947 ई. को पास कर दिया. इसके बाद लीग व कांग्रेस ने भी इसे पास कर दिया. इस अधिनियम के पास हो जाने के बाद 14 अगस्त, 1947 ई. को पाकिस्तान का निर्णय हो गया और मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के गवर्नर जनरल एवं लियाकत अली प्रधानमन्त्री बने.
इस प्रकार स्पष्ट है कि अनेक चरणों से गुजरने के बाद पाकिस्तान का निर्माण सम्भव हो सका.
> भारत के विभाजन का उत्तरदायित्व
भारत के विभाजन के लिए उत्तरदायित्व का निर्धारण करना अत्यन्त विवादास्पद है. इतिहासकारों ने अपने-अपने तर्कों के माध्यम से कांग्रेस, मुस्लिम लीग एवं अंग्रेज सरकार तीनों को ही उत्तरदायी ठहराया है, परन्तु यह निश्चित है कि भारत के विभाजन की प्रक्रिया का प्रारम्भ अंग्रेजों ने ही किया था.
1909 ई. के मिण्टो-मार्ले सुधारों ने प्रथम बार देश की राजनीति में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने तथा मुसलमानों को राजनैतिक बढ़ावा देने का प्रयास किया. उन्होंने मुसलमानों को पृथक् निर्वाचन क्षेत्र प्रदान किए, फिर भी 1921 ई. तक असहयोग और खिलाफत आन्दोलन के समय तक दोनों ही दलों में अत्यन्त मधुर सम्बन्ध बने रहे. 1921 ई. में जिन्ना कांग्रेस से अलग हो गए तथा उसकी कार्यवाही को सन्देह की दृष्टि से देखने लगे.
द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद से ही भारत के विभाजन की माँग बढ़ने लगी तथा गांधीजी ने मुसलमानों को सन्तुष्ट कर भारत की अखण्डता को बचाए रखने के प्रयास में 1940 ई. के रामगढ़ के कांग्रेस अधिवेशन में बँटवारे के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया, परन्तु उनके अनुसार विभाजन ठीक उसी प्रकार से होना चाहिए जिस प्रकार से संयुक्त परिवार में विभाजन होता है. गांधीजी यह चाहते थे कि मुसलमानों को यह अधिकार मिले कि वह स्वयं यह निश्चित कर सकें कि वे संयुक्त परिवार के सदस्य के रूप में रहना चाहते हैं अथवा अलग.
अंग्रेज वायसराय लिनलिथगो ने जिन्ना को इस बात का आश्वासन दिया कि अल्पसंख्यकों की स्वीकृति के बिना सरकार किसी भी संवैधानिक परिवर्तन को लागू नहीं करेगी और न ही शक्ति के द्वारा उन अल्पसंख्यकों को दबाएगी. इससे जिन्ना के हाथों में 'वीटो' (Veto) का अधिकार आ गया.
भारत के विभाजन में 1941 ई. में राजगोपालाचारी ने भी योगदान इस रूप में दिया कि सर्वप्रथम भारत के विभाजन की योजना को कांग्रेस द्वारा स्वीकार करवा लिया.
इसी प्रकार नेहरूजी ने भी अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान की माँग को स्वीकार कर लिया था. इधर गांधीजी ने जिन्ना से बात कर उन्हें राजगोपालाचारी योजना स्वीकार करने को कहा, लेकिन जिन्ना ने इसे स्वीकार नहीं किया. वस्तुतः गांधीजी द्वारा जिन्ना से बात किए जाने से उसका राजनैतिक कद बहुत अधिक बढ़ गया और पाकिस्तान के निर्माण में वह एकदम और आगे बढ़ गया.
भारत के विभाजन के लिए पटेल, नेहरू और राजेन्द्र प्रसाद भी किसी हद तक जिम्मेदार थे. गांधीजी की सहमति के बिना ही तीनों ने मार्च 1947 ई. में जिन्ना के ‘दो राष्ट्र के सिद्धान्त' (Two Nation Theory) को स्वीकृति देकर पंजाब के हिन्दू एवं मुस्लिम बहुल इलाकों में विभाजन करने का प्रस्ताव कांग्रेस कार्यसमिति में रखा. कांग्रेस के इन महत्त्वपूर्ण नेताओं के मनोभावों का अन्दाज लगाकर ही लॉर्ड माउण्टबेटन ने भारत के विभाजन की पूरी योजना तैयार की इस योजना को पटेल ने स्वीकार कर लिया, और माउण्टबेटन को अपना पूरा समर्थन दिया. नेहरू ने भी इसे स्वीकार कर लिया. अबुल कलाम आजाद और गांधीजी इसका विरोध करते रहे, परन्तु नेहरू व पटेल के लिए गांधीजी का अब कोई उपयोग नहीं था और वे लोग अब तुरन्त स्वतन्त्रता के आकांक्षी थे. इन्होंने गांधीजी को भी समझाया कि भारत का विभाजन अवश्यम्भावी है. अतः 3 जून को माउण्टबेटन योजना पर विचार किया गया तथा गांधीजी के द्वारा इसे स्वीकार कर लिया गया. 4 जून, 1947 ई. को गोविन्द बल्लभ पन्त ने इस स्वीकृति प्रस्ताव को प्रस्तुत किया. नेहरू और पटेल ने भी प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि आजाद और अन्य सदस्यों के विरोध के कारण मत-विभाजन हो गया. प्रस्ताव के पक्ष में 29 तथा विपक्ष में 15 मत पड़े. इस प्रकार केवल 14 मतों के अन्तर से कांग्रेस ने भारत के विभाजन के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.
इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि भारत के विभाजन में कांग्रेस, मुस्लिम लीग व अंग्रेजों की संयुक्त भूमिका उत्तरदायी थी. इसमें किसी एक पर दोषारोपण नहीं किया जा सकता है. 
भारतीय राज्यों का एकीकरण (Integration of Indian States)
> स्वतन्त्रता के बाद भारतीय राज्यों का एकीकरण
15 अगस्त, 1947 ई. को भारत के अंग्रेजी दासता से स्वतन्त्र होते ही उसके सम्मुख देशी राज्यों के एकीकरण समस्या आ खड़ी हुई, क्योंकि अंग्रेजों ने उन्हें भारत में या पाकिस्तान में अथवा स्वतन्त्र रहने की छूट दे रखी थी. इस समय देश में कुल 562 देशी रियासतें थीं जिनके कारण गृहयुद्ध भड़क उठने का अंदेशा था. ऐसे में सरदार बल्लभभाई पटेल ने असाधारण धैर्य व साहस का परिचय दिया.
पटेल ने देशी राज्यों की भौगोलिक परिस्थितियाँ, उनकी आर्थिक स्थिति तथा जनता की इच्छा को ध्यान में रखकर राजाओं को यह आश्वासन दिया कि कांग्रेस उनकी दुश्मन नहीं है और यह प्रजा के हितों की रक्षक है. इसका देशी नरेशों पर अच्छा प्रभाव पड़ा और 15 अगस्त, 1947 ई. से पूर्व जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर के अतिरिक्त सभी रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित होने के लिए तैयार | कर लिया. इन राज्यों ने 'इन्स्ट्रूमेण्ट ऑफ एक्सेसन' (Instrument of Accession) और 'स्टेण्ड स्टिल एग्रीमेण्ट' (Stand Still Agreement) पर हस्ताक्षर कर भारतीय संघ में प्रवेश किया.
जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान में मिलने का इच्छुक था, परन्तु जन असन्तोष के कारण उसे पाकिस्तान भाग जाना पड़ा. इसी प्रकार हैदराबाद का शासक स्वतन्त्र रहना चाहता था, परन्तु वहाँ की जनता भारतीय संघ में मिलता चाहती थी. फलतः भारत ने बल प्रयोग किया और 1948 ई. में निजाम ने भारतीय विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए.
स्वतन्त्रता के तुरन्त बाद कश्मीर जो स्वतन्त्र रहना चाहता था, पर पाकिस्तान ने आक्रमण कर दिया जिससे वहाँ के राजा हरि सिंह ने भारत में मिलने की इच्छा प्रकट कर सहायता की माँग की. फलतः भारत ने सैन्य कार्यवाही की और कश्मीर भारत का अंग बन गया. 
अनेक छोटी रियासतों को बड़ी-बड़ी रियासतों में मिलाकर प्रान्तों का गठन किया गया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि सरदार पटेल की सूझ-बूझ से बिना किसी विशेष झंझट और सैनिक कार्यवाही के भारत का एकीकरण सम्पन्न हो गया.
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Sun, 08 Oct 2023 10:20:22 +0530 Jaankari Rakho
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, विचारधाराएँ तथा कार्यक्रम https://m.jaankarirakho.com/437 https://m.jaankarirakho.com/437 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, विचारधाराएँ तथा कार्यक्रम

> भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्य 
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है. श्री अयोध्यासिंह ने लिखा है कि “कांग्रेस का जन्म इसलिए हुआ कि ब्रिटिश शासक और उसके पैरोकार इसकी जरूरत अनुभव करते थे. यह राष्ट्रवादी आन्दोलन के स्वाभाविक विकास का परिणाम नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी आन्दोलन में साम्राज्यवादियों और उपनिवेशवादियों के हस्तक्षेप का परिणाम था." यह सत्य है कि कांग्रेस की स्थापना एक अंग्रेज सेवानिवृत्त अधिकारी ए. ओ. ह्यूम द्वारा की गई और इन्हें रिपन व डफरिन का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त था.
ह्यूम भारत में बढ़ते आन्दोलन एवं अशान्ति से चिन्तित थे. उनके सामने यह प्रमुख प्रश्न था कि ब्रिटिश सरकार के विरोधी आन्दोलनों को कैसे टाला जाए. इसके लिए ह्यूम ने एक ऐसी व्यवस्था के लिए प्रयास किया जो अंग्रेजों के लिए सुरक्षा वाल्व की तरह कार्य करे और भारतीय राष्ट्रवादियों को संघर्ष के मार्ग से जाने से रोक सके.
कुछ विद्वानों के अनुसार रूसी आक्रमण के भय से ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना की योजना बनाई. इस मत के समर्थक डॉ. नन्दलाल चटर्जी हैं, परन्तु उनका यह मत इस कारण से सही प्रतीत नहीं होता है कि 1885 ई. में भारत पर रूस के आक्रमण का खतरा था.
वास्तव कांग्रेस की स्थापना के पीछे राजनैतिक कारण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण थे. शासक वर्ग से सम्बन्ध रखते हुए भी ह्यूम भारतवासियों का सच्चा हमदर्द था और इनकी दयनीय दशा में वह सुधार लाना चाहता था. यही कारण था कि भारतीय नेताओं ने भी, जो राष्ट्रीयता की भावना और अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हो रहे थे, ह्यूम के कार्यों में सहयोग दिया.
ह्यूम को नेताओं द्वारा सहयोग दिए जाने का एक कारण यह भी था कि ये लोग नहीं चाहते थे कि कोई संगठन बनने से पूर्व ही समाप्त हो जाए. ह्यूम या अन्य कोई भी अंग्रेज यदि इस संगठन की स्थापना करता है, तो अंग्रेजी सरकार को उस पर सन्देह नहीं होता. इसलिए ह्यूम कांग्रेस की स्थापना करने में सफल रहा.
28 दिसम्बर, 1885 ई. को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत विद्यालय में कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता व्योमेशचन्द्र बनर्जी ने की तथा उसमें भारत के विभिन्न भागों के लगभग 72 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए.
इस सम्मेलन में कांग्रेस के उद्देश्यों की घोषणा की गई जो निम्नलिखित हैं – 
1. देश के हित तथा उन्नति में लगे सभी व्यक्तियों के बीच व्यक्तिगत घनिष्ठता और मैत्री स्थापित करना.
2. जातिगत, प्रान्तगत या धर्मगत विभेदों को मिटाकर राष्ट्रीयता की भावना को विकसित करना.
3. राजनीतिक एवं सामाजिक प्रश्नों पर शिक्षित वर्गों के मतों को व्यक्त करना. 
4. आगामी राजनैतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत करना.
इसमें कहीं भी सरकारी नीतियों की आलोचना या विरोध की बात नहीं कही गई तथा महारानी विक्टोरिया की खूब प्रशंसा की गई.
कूपलैण्ड ने इसी कारण से लिखा है कि “कांग्रेस की स्थापना दुश्मन के रूप में नहीं, अपितु मित्र के रूप में हुई थी. "
> 1885 से 1905 ई. तक के बीच कांग्रेस के कार्यों का मूल्यांकन
अथवा
कांग्रेस के उदारवादी युग की समीक्षा कीजिए.
यह कांग्रेस का शैशवकाल था. अतः उसके द्वारा उस समय तुरन्त किसी बड़े राजनैतिक आन्दोलन की शुरूआत करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी.
इस काल में कांग्रेस का मुख्य कार्य राजनैतिक जागरण उत्पन्न करना था, क्योंकि प्रारम्भ में यह क्रान्तिकारी संगठन नहीं था. इस समय में इसकी बागडोर नरम राष्ट्रवादियों के हाथ में थी, जो अंग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास करते थे तथा राजनीतिक जागरण के लिए वे अंग्रेजों का आभार मानते थे. इसलिए वैधानिक आन्दोलन द्वारा उन्होंने अपनी माँगों को मनवाने का प्रयास किया. इसके लिए उन्होंने प्रार्थना-पत्रों, स्मरण-पत्रों तथा प्रतिनिधिमण्डलों द्वारा ब्रिटिश सरकार से अपनी न्याययुक्त माँगों को मानने का आग्रह किया. इस काल की कांग्रेस की प्रमुख माँगें निम्नलिखित थीं—
1. धारा सभा का विस्तार हो तथा उसके सदस्य जनता द्वारा चुने जाएँ.
2. केन्द्रीय एवं प्रान्तीय धारा संभाओं में भारतीय सदस्यों की संख्या में वृद्धि हो.
3. न्याय व्यवस्था में ज्यूरी का प्रयोग हो.
4. परिषदों एवं उच्च नौकरियों में भारतीयों को स्थान मिले तथा इन्हें भी उच्च सैनिक शिक्षा दी जाए.
5. 1905 ई. में गोपालकृष्ण गोखले के द्वारा ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत स्वायत्त शासन की माँग की गई, जिसे 1906 ई. में कलकत्ता में दादाभाई नौरोजी ने दोहराया.
6. भूमि-कर को कम किया जाए.
7. सिंचाई की उचित व्यवस्था हो.
8. भारत से बाहर भेजे जाने वाले अनाज पर प्रतिबन्ध लगे एवं देशी उद्योग-धन्धों को प्रोत्साहन प्रदान किया जाए.
9. शासन के व्यय में कमी की जाए.
10. नमक कर को समाप्त कर दिया जाए.
कांग्रेस की इन माँगों पर अत्यधिक जोर था, लेकिन उन्हें इन पर विशेष सफलता नहीं मिली. उदारवादी लोग खुलकर अंग्रेजों का सामना नहीं कर सके, क्योंकि वे तत्कालीन परिस्थितियों में विवश थे, फिर भी इतना अवश्य ही कहा जा सकता है कि उदारवादियों के प्रयासों से ही भारत में राष्ट्रीयता की लहर का विकास हुआ तथा औपनिवेशिक स्वशासन एवं प्रशासनिक सुधार की माँग उठी. भारत को राजनैतिक प्रशिक्षण दिलाने का उन्होंने महान् कार्य किया.
कांग्रेस के उदारवादियों के प्रयासों से ही 1892 ई. का ‘भारत परिषद् अधिनियम’ पारित हो सका, जिसने स्वायत्त - शासी संस्थाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त किया.
उदारवादी कांग्रेस के प्रभाव से ही राष्ट्रवादियों के हृदय में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की भावना जागृत हुई.
उदारवादियों के कार्यों की समीक्षा करते हुए पट्टाभिसीतारमैया ने लिखा है कि "प्रारम्भिक राष्ट्रवादियों ने ही आधुनिक स्वतन्त्रता की इमारत की नींव डाली. उनके प्रयत्नों से ही इस नींव पर एक-एक मंजिल करके इमारत बनती चली गई. पहले उपनिवेशों के ढंग का स्वशासन फिर साम्राज्य के अन्तर्गत होमरूल इसके ऊपर स्वराज्य और सबसे ऊपर पूर्ण स्वाधीनता की मंजिलें बन सकी हैं."
> कांग्रेस में उग्रवादी आन्दोलन के उदय के कारण लिखिए. 
1892 से 1906 ई. तक इंग्लैण्ड में प्रतिक्रियावादी टोरी दल की सरकार के कारण किसी भी प्रकार के सुधार कार्य की आशा नहीं की जा सकती थी. 1892 ई. के सुधार कार्य अपर्याप्त एवं असन्तोषजनक थे. इसमें केन्द्रीय विधान-सभा की सदस्य संख्या की वृद्धि के बावजूद भी गैर-सरकारी सदस्य जनता द्वारा नहीं चुने जाते थे.
कांग्रेस अपनी माँगें निरन्तर माँगती रहती थी, जबकि सरकार उस पर कोई ध्यान नहीं देती थी. इसके कारण कांग्रेस को अपनी नीति बदलने के लिए विवश होना पड़ा. तिलक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि माँगने से कोई चीज नहीं मिलती, उसके लिए तो कठोर दबाव ही डालने पड़ते हैं "
इस काल में अनेक बार भयंकर सूखे एवं अकाल पड़े, जिसमें लाखों लोग भूख से मारे गए. इससे भारतीय जनता का क्षुब्ध होना स्वाभाविक था. ठीक इसी समय पूना तथा बम्बई में प्लेग फैल गया. प्लेग कमिश्नर रैण्ड ने अधिक बहुत अत्याचार किए, जिस पर चापेकर बन्धुओं ने उसकी हत्या कर दी. तिलक षड्यन्त्र करने के आरोप में जेल में डाल दिये गये, जिससे सारा राष्ट्र उत्तेजित हो गया.
इस समय देश में भयंकर गरीबी थी तथा जनता में आर्थिक असन्तोष व्याप्त था. अंग्रेजों ने देशी उद्योगों को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यहाँ के धन को लूटकर वे इंगलैण्ड लेकर चले जाते. अतः युवकों द्वारा व कांग्रेस की नई पीढ़ी द्वारा इसका विरोध करना स्वाभाविक था.
भारत में उग्रवादी आन्दोलन के उदय के लिए हिन्दू-धर्म का पुनरुत्थान भी उत्तरदायी है. तिलक, विवेकानन्द, दयानन्द आदि नेताओं ने भारतीय हिन्दू धर्म की प्राचीनता और उसके गौरव को स्थापित कर देश के युवकों में जागृति ला दी, जिससे सारा राष्ट्र शोषण के विरुद्ध उठकर खड़ा हो गया.
1905 ई. में अंग्रेजों ने साम्प्रदायिकता के आधार पर बंगाल का विभाजन कर आग में घी का काम किया. इससे समूचा राष्ट्र असन्तोष के तूफान में घिर गया और लोग आन्दोलन पर उतारू हो गए.
उग्रवाद को उभारने में इस समय के अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रम ने भी योगदान दिया. अफ्रीका के देश अबीसीनिया ने 1896 ई. में इटली को हरा दिया तथा 1905 ई. में छोटे से एशियाई देश जापान ने रूस जैसी शक्ति को पराजित कर यूरोपीय अजेयता का मिथक तोड़ दिया. इससे अब को भी विश्वास हो गया कि यूरोपीय अंग्रेज अजेय नहीं हैं.
इस प्रकार स्पष्ट है कि उपर्युक्त कारणों से भारतीय राजनीति में उग्रवाद का जन्म हुआ तथा कांग्रेस में एक नए दल का गठन हुआ जो गरम दल कहलाया. इस दल की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती चली गई.
> स्वदेशी आन्दोलन क्या था ? स्पष्ट कीजिए.
1905 ई. में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन कर दिए जाने पर भारत में चारों तरफ इसके विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई. इस विभाजन के लिए प्रशासनिक सुविधा के नाम पर कर्जन द्वारा बहाना बनाया गया था, परन्तु उसका वास्तविक उद्देश्य हिन्दू एवं मुसलमानों को आपस में लड़ाना था व मुसलमानों के लिए एक पृथक् राज्य का निर्माण करना था.
इसके विरोध के लिए 7 अगस्त, 1905 ई. को कलकत्ता के टाउन हाल में एक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें लोगों ने एक प्रस्ताव पास करके विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की शपथ ली. उसके बाद इस बहिष्कार में प्रत्येक वर्ग के लोग सम्मिलित हो गए व विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाने लगी. विदेशी जूते, कागज, दवाइयाँ, चीनी, सिगरेट और यहाँ तक कि नमक को भी लोगों ने छूने से इनकार कर दिया. विद्यार्थियों ने विदेशी माल की दुकानों पर धरना दिया. श्रमिकों ने बहिष्कार के समर्थन में हड़ताल की बंगाल में रेल-कर्मचारियों तथा मजदूरों (पट्सन उद्योग ) और सरकारी प्रेस के कर्मचारियों ने भी हड़ताल की. 1906 ई. तक यह आन्दोलन पूरे बंगाल में फैल चुका था.
इस आन्दोलन का दूसरा पक्ष यह था कि उसमें बहिष्कार के साथ-साथ स्वदेशी का भी प्रचार किया गया. इसके प्रमुख नेता अरविन्द घोष, रबीन्द्रनाथ टैगोर, विपिनचन्द्र पाल आदि थे. कपड़ा उद्योग को इस आन्दोलन द्वारा विशेष गति मिली. हथकरघा उद्योग एवं वस्त्रों के कारखानों में वृद्धि हुई. 1905 ई. में प्रथम औद्योगिक सम्मेलन रमेशचंद्र दत्त के नेतृत्व में बनारस में हुआ. पी. सी. राय ने प्रसिद्ध 'बंगाल केमिकल स्वदेशी स्टोर' खोला. अनेक बीमा कम्पनियाँ व बैंक स्थानीय जमींदारों व जागीरदारों के सहयोग से खोले गए. इससे देशी अर्थव्यवस्था की प्रगति हुई तथा विदेशी वस्तुओं के आयात में भारी गिरावट आई.
इस आन्दोलन ने सामाजिक उत्थान के लिए गाँवों के पुनरुद्धार का आह्वान किया. अश्विनी कुमार दत्त ने अपनी संस्था 'स्वदेश-बान्धव समिति द्वारा बारीसाल में गाँवों में विकास का कार्यक्रम चलाया तथा मुकदमों का निपटारा पंचायत के द्वारा करवाया गया. समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को भी दूर करने का प्रयास किया गया.
स्वदेशी आन्दोलन ने राष्ट्रीय शिक्षा के विकास को भी बढ़ावा दिया. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय स्कूल व कॉलेज खोले गए तथा पहला राष्ट्रीय स्कूल रंगपुर में 1905 ई. में खोला गया. छात्रों पर की जा रही दमनात्मक कार्यवाही के विरुद्ध शचीन्द्रनाथ बसु ने एण्टी-सेक्यूलर सोसाइटी की स्थापना की. इसी प्रकार डॉन सोसायटी बनी. 1906 ई. में बंगाल नेशनल स्कूल खोला गया. देशी भाषाओं में अनेक समाचार पत्र प्रकाशित किए गए.
यह आन्दोलन बंगाल के अलावा महाराष्ट्र में भी बड़ी उग्रता के साथ चला. उसके अलावा बर्मा एवं रावलपिण्डी में भी इसका असर हुआ. आर्य समाज ने पंजाब में इस आन्दोलन को चलाया.
सरकार ने जिस आन्दोलन को पहले गम्भीरता से नहीं लिया था, उसने अब विद्रोहियों के खिलाफ दमनात्मक कार्यवाही प्रारम्भ की. छात्रों को इस आन्दोलन से पृथक् रखने के लिए कार्लाइल-सरक्यूलर निकाला गया. सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों को चेतावनी दी गई कि वे अपने छात्रों को आन्दोलन से दूर रखें, अन्यथा उनकी सहायता बन्द कर दी जाएगी.
सरकार ने राजद्रोहात्मक बहिष्कार सभाओं को रोकने, विस्फोटक पदार्थों के उपयोग को बन्द करने, अखबारों पर प्रतिबन्ध लगाने तथा अभियुक्तों की जमानत न होने देने के लिए कानून बनाए. इसके अलावा सरकार ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को उभारने का प्रयत्न किया और 1906 ई. में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना करवा दी. धीरे-धीरे मुसलमान इस आन्दोलन से पृथक् होने लगे और अंग्रेज सरकार ने सुधार कार्यों को करने का नाटक किया.
अंग्रेजों की इस कार्यवाही से कांग्रेस में स्पष्टतया दो दल बन गए –(i) नरम दल, (ii) गरम दल.
इन दोनों दलों में स्पष्टतया विभाजन सूरत अधिवेशन (1907 ई.) में हो गया.
> गरम दल व नरम दल के मध्य हुए संघर्ष को निरूपित कीजिए : टिप्पणी
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के 1905-06 ई. के समय में कांग्रेस के युवा वर्ग का कांग्रेस की हाथ पसारने व उसकी भिक्षावृत्ति की नीति एवं अंग्रेजों की न्याय-निष्ठा में थोड़ा-सा भी विश्वास नहीं रहा. अतः उसने कांग्रेस के लिए उग्र कार्यक्रम जैसे स्वदेशी, बहिष्कार आदि रखे. इस दल के प्रमुख नेता बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं विपिनचन्द्र पाल थे.
1905 ई. के बनारस अधिवेशन में गरम दल के नेताओं ने विद्रोह का झण्डा उठा दिया. 1906 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस में विभाजन लगभग तय हो गया, परन्तु दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता के कारण तथा उनके द्वारा कांग्रेस का लक्ष्य स्वराज्य घोषित कर देने से गरम दल के लोग शान्त हो गए.
1907 ई. के सूरत के कांग्रेस अधिवेशन में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक अध्यक्ष बनना चाहते थे, परन्तु उदारवादियों ने अपने बहुमत में होने के कारण रासबिहारी बोस को अध्यक्ष बना दिया. बोस के भाषण देने से पूर्व ही कांग्रेस के इस अधिवेशन में जूते-चप्पल चलने लगे तथा मारपीट हो गई, जिसके कारण यह अधिवेशन स्थगित हो गया व उग्रवादी लोग कांग्रेस से पृथक् हो गए. दोनों दलों में यह पृथक्ता 1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन तक चलती रही.
> क्रान्तिकारी आन्दोलन क्या था ? स्पष्ट कीजिए.
कांग्रेस के उग्रवादी एवं उदारवादी लोगों से पृथकू एक अन्य विचारधारा का उदय बंगाल विभाजन व अंग्रेजों की दमनात्मक नीति के विरुद्ध हुआ, जिसे हम आतंकवादी विचारधारा कह सकते हैं, जिनका विश्वास था कि तलवार हाथ में लो और सरकार को मिटा दो, ये लोग बम व गोली की राजनीति में विश्वास करते थे.
आन्दोलन का प्रारम्भ एवं विस्तार – इस क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रमुख क्षेत्र पंजाब, बंगाल एवं महाराष्ट्र थे. बंगाल में इसके नेता बारीन्द्र कुमार घोष व विवेकानन्द के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त थे. इन लोगों ने 'युगान्तर' एवं 'संध्या' नामक पत्रिका द्वारा उग्रवाद का प्रचार किया और इससे कई और गुप्त क्रान्तिकारी संस्थाएँ स्थापित होने लगीं. ऐसी ही एक संस्था अनुशीलन समिति बनी, जिसकी शाखाएँ पूरे बंगाल में फैल गई. श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा लाला हरदयाल ने लन्दन में भी क्रान्तिकारी संस्थाएँ स्थापित की.
इसी प्रकार 'साधना-समाज' नाम से पुलिन बिहारी दास ने एक गुप्त संस्था स्थापित की.
इन आतंकवादी लोगों का प्रमुख कार्य बदनाम एवं दमनकारी अंग्रेज अफसरों की हत्या करना था तथा इसके साथ ही धन के लिए सरकारी खजाने को लूटना भी था.
क्रान्तिकारियों ने 1907 ई. के दिसम्बर माह में मिदनापुर के उप-गवर्नर की रेलगाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयास किया. इसी वर्ष फरीदपुर के मजिस्ट्रेट को गोली मारकर घायल कर दिया गया. मुजफ्फरपुर के मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड की हत्या करने का कार्य खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ल चाको को सौंपा गया. इन लोगों ने 30 अप्रैल, 1908 ई. को किंग्सफोर्ड के बंगले की ओर से आती हुई एक बग्गी पर बम फेंका, परन्तु दुर्भाग्य से उसमें किंग्सफोर्ड नहीं था. उसमें मिस्टर एवं मिसेज केनेडी थे, जिनकी मृत्यु हो गई. इस घटना के दो माह बाद ही अरविन्द घोष, बारीन्द्र कुमार घोष और कई अन्य लोग गिरफ्तार कर लिए गए और उन पर अलीपुर षड्यन्त्र केस का मुकदमा चलाकर कन्हाई लाल एवं सत्येन्द्र को फाँसी दे दी गई तथा बारीन्द्र को काले पानी की सजा, अरविन्द घोष को छोड़ दिया गया. इसके कुछ दिनों बाद इस मुकदमे की पैरवी करने वाले वकील आशुतोष विश्वास को गोली मार दी गई. नन्दलाल नामक पुलिस दरोगा और शमशुल आलम नामक डिप्टी- पुलिस सुपरिटेण्डेट को भी क्रान्तिकारियों ने सजा के तौर पर गोली मार दी.
पंजाब में 1907 ई. में सरदार अजीतसिंह, भाई परमानन्द, बालमुकुन्द और लाला हरदयाल ने क्रान्तिकारियों को संगठित किया, 1912 ई. में रासबिहारी बोस ने वायसराय लॉर्ड हार्डिग्स पर बम फेंका, जिससे वह घायल हो गया. इसी प्रकार महाराष्ट्र में श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर और गणेश सावरकर ने संगठन बनाया. बिनायक सावरकर ने 'अभिनव भारत' की स्थापना कर उसके माध्यम से क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन किया. 1909 ई. में गणेश सावरकर को आजीवन कारावास की सजा मिली तथा इसी वर्ष इस मुकदमे के जज को गोली मारकर हत्या कर दी गई.
दमन कार्य – सरकार ने आतंकवाद से घबराकर जबरदस्त दमनकारी उपायों का सहारा लिया. लाला लाजपतराय तथा सरदार अजीत को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. तिलक को बर्मा में मॉडले जेल में डाल दिया गया. सभी प्रकार की सभाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. इसी प्रकार समाचार पत्र अधिनियम बनाया गया. इन कानूनों की कठोरता को लॉर्ड मार्ले ने वीभत्स, अत्यन्त उग्र और अनुचित बताया. सरकार की दमनकारी नीति का परिणाम उल्टा हुआ और क्रान्तिकारी गतिविधियाँ बढ़ती ही गईं.
अंग्रेजी सरकार ने दमन नीति के अलावा सुधार कार्य भी किए और 1909 ई. का मिण्टो-मार्ले सुधार लाया गया, जिसका नरम दलीय राजनीतिज्ञों ने हृदय से स्वागत किया, परन्तु जब यह क्रियान्वित किया गया तब चारों ओर निराशा व्याप्त हो गई तथा क्रान्तिकारी आन्दोलन बढ़ता गया. राजनैतिक हत्या, डकैतियाँ आम हो गईं. 1913 ई. में जब जर्मन-बंगाली षड्यन्त्र का पता चला, तो गरम दल के कुछ नेता गिरफ्तार कर लिए गए तथा कुछ लोग विदेश चले गए. इस प्रकार क्रान्तिकारी आन्दोलन कुछ समय के लिए निस्तेज हो गया.
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Sun, 08 Oct 2023 10:09:32 +0530 Jaankari Rakho
जनजाति आन्दोलन एवं किसान आन्दोलन https://m.jaankarirakho.com/436 https://m.jaankarirakho.com/436 जनजाति आन्दोलन एवं किसान आन्दोलन

जनजाति आन्दोलन
> सरदार आन्दोलन (1858-95) को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए.
1857 ई. के बाद छोटा नागपुर क्षेत्र में संरदार आन्दोलन बड़े व्यापक पैमाने पर मुण्डा, ऊराँव एवं ईसाइयों द्वारा किया गया. 'सरदार' वे लोग थे, जो आदिवासियों के परम्परागत अधिकारों को दिलाने के लिए प्रयासरत् थे.
कारण — इस आन्दोलन का सबसे प्रमुख कारण ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म प्रचार के कारण ईसाई बनने वाली मुण्डा एवं ऊराँवं जनजातियाँ थीं. इन लोगों ने मिशनरियों की सहायता से अपनी छीनी गयी जमीनें जमीदारों से वापस ले लीं. इससे जागीरदारों एवं जनजाति समुदायों के सम्बन्ध कटुता से भर गये. इसके अलावा ब्रिटिश कम्पनी ने 1860 ई. में जमीन का सर्वेक्षण कराकर आदिवासियों को 'भूइनहारी' जमीनें उन्हें वापस कर दी गयीं.
1867 ई. में असन्तुष्ट मुण्डा लोगों ने विरोध-प्रदर्शन कर लगभग 14,000 मुण्डाओं ने हस्ताक्षर युक्त एक आवेदन बंगाल सरकार के पास भेजा, जिसमें इस क्षेत्र के राजा पर उन्होंने उन्हें जमीन से बेदखल करने का आरोप लगाया. अतः ब्रिटिश सरकार ने 1869 ई. में छोटा नागपुर कास्तकारी अधिनियम पारित कर सर्वेक्षण की व्यवस्था पुनः लागू कर दी. यह कार्य 1880 ई. तक चला तथा बहुत से विवादास्पद मामले मुलझा लिये गये, परन्तु आदिवासी अब इसका लाभ उठाकर बहुत-सी जमीन भूइनहारी में परिवर्तित कराने लगे, क्योंकि इस जमीन का कर बहुत कम था.
इसी बीच लगान की राशि एवं जमींदारों को दिये जाने वाले करों को लेकर विवाद उठ खड़ा हो गया. ईसाई मिशनरियों ने अब आद्विवासियों के जमीन-सम्बन्धी मामलों में अधिक रुचि लेना प्रारम्भ कर दिया, जिससे सरदार अब उनकी सहायता से अधिक सुविधाओं की माँग करने लगे. फलतः जमींदारों और आदिवासियों में संघर्ष प्रारम्भ हो गया.
आन्दोलन का प्रारम्भ -- आन्दोलन के प्रारम्भ होते ही सरदारों ने नारा दिया 'आधा काम, आधा दाम' अर्थात् आदिवासी अपनी जमीन के आधे भाग के लिए 'बेगार' एवं आधे भाग के लिए 'लगान' (कर) देना चाहते थे. वे जंगल पर भी अपना अधिकार समझते थे. वे ब्रिटिश सरकार को कर देने को तैयार थे, परन्तु स्थानीय जमींदारों एवं राजा को कर देने को तैयार नहीं थे. वास्तव में यह आन्दोलन अहिंसात्मक था तथा सरदारों ने गवर्नर तथा अन्य ब्रिटिश अधिकारियों को अनेक आवेदन पत्र दिये. बाद में सरदारों के प्रभाव में आकर मुण्डा एवं ऊराँव के लोगों ने संघर्ष के रास्ते को अपनाकर जमीनों पर कब्जा किया और हिंसक संघर्ष भी. लेकिन इन्होंने कभी-भी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती नहीं दी, स्थानीय जमींदारों को इन्होंने लगान देना भी बन्द कर दिया. ईसाई आदिवासियों ने मिशन, चर्च एवं स्कूलों का बहिष्कार किया.
सरकार ने पुलिस द्वारा इनका दमन किया तथा अनेक आदिवासियों को कैद कर लिया. 1890 ई. में लेफ्टिनेंट गवर्नर ने इस क्षेत्र की यात्रा की तथा अनेक प्रकार की सहूलियत देने का वादा किया, लेकिन उनको पूरा न करने पर बाद में मुण्डा आन्दोलन इस क्षेत्र में चला.
> मुण्डा आन्दोलन
आन्दोलन का उद्देश्य — यह आन्दोलन मुख्य रूप से तीन बातों को एक साथ लेकर चला था. यह आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन तथा धार्मिक पुनरुत्थान चाहता था. आर्थिक रूप से यह जमींदारों से अपनी करमुक्त भूमि वापस लेना चाहता था. राजनीतिक परिवर्तन के रूप में यह अंग्रेजी राज्य को समाप्त कर 'मुण्डाराज' स्थापित करना चाहता था तथा एक नये धर्म की स्थापना भी करना चाहता था. इस आन्दोलन का सूत्रपात 1899 ई. में बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में हुआ.
बिरसा मुण्डा द्वारा आन्दोलन का संगठन
बिरसा मुण्डा (1874-1900) एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति था, जिसे अपने आदिवासी भाइयों की जमींदारों द्वारा शोषण के कारण उनकी दयनीय दशा ने आन्दोलन करने की प्रेरणा दी. इस हेतु उसने नवयुवकों को संगठित कर स्वयं को भगवान् घोषित कर दिया तथा अपने को उसने अलौकिक शक्तियों का स्वामी भी बताया.
बिरसा मुण्डा अब मुण्डा आदिवासियों के लिए भगवान् बन गया तथा उसका प्रत्येक वाक्य उनके लिए ब्रह्म वाक्य बन गया. उसने यह घोषणा की कि शीघ्र ही प्रलय होने वाली है. शीघ्र ही विक्टोरिया राज्य समाप्त हो जायेगा तथा मुण्डाराज स्थापित होगा. अतः मुण्डा लोग अब किसी को भी किसी प्रकार का कर न दें. अब मुण्डाओं ने कर देना बन्द कर दिया.
सरकार ने बिरसा पर विद्रोह फैलाने तथा राजद्रोह करने का आरोप लगाकर 1895 ई. में जेल में बन्द कर दिया तथा 1897 ई. में यह पुनः रिहा कर दिया गया. इसके बाद बिरसा घूम-घूमकर गुप्त सभाएँ करता तथा मुण्डाओं को संगठित करने का प्रयास करता. उसने तीरंदाजों की एक फौज भी तैयार कर ली. इसके बाद 1899 ई. में क्रिसमस के दिन मुण्डा लोगों ने विद्रोह कर दिया.
चर्च पर मुण्डा हमले किये. अनेक अधिकारियों की हत्या कर दी. लोगों ने राँची एवं सिंहभूमि जिलों में थानों एवं अंग्रेज सरकार समर्थक एवं ईसाई बने मुण्डाओं को भी समाप्त करने का प्रयास किया गया. इस प्रकार मुण्डा आन्दोलन ने पूरे छोटा नागपुर क्षेत्र में आतंक का राज्य स्थापित कर दिया.
अब अंग्रेज सरकार ने पुलिस एवं सेना की सहायता से विद्रोह का दमन करना प्रारम्भ कर दिया. 1900 ई. में बिरसा की गिरफ्तार कर लिया गया तथा मुकदमे के दौरान ही हैजा हो जाने के कारण उसकी 9 जून, 1908 ई. में मृत्यु हो गयी. इससे यह आन्दोलन लगभग समाप्त हो गया. बिरसा के तीन प्रमुख सहयोगियों को फाँसी व अन्य अनेक लोगों को काले पानी की सजा दी गयी.
इस आन्दोलन के कुछ समय बाद ही सरकार ने आदिवासियों की जमीनों का सर्वेक्षण करवाकर 1908 ई. में 'छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम' पारित किया, जिससे मुण्डा लोगों को जमीन सम्बन्धी अधिकार मिले तथा उन्हें बेगार से भी मुक्त कर दिया गया. मुण्डा लोगों में बिरसा भगवान् की तरह ही लोकप्रिय हो गया.
> भील आन्दोलन
भील जनजाति पश्चिमी तट के खानदेश जिले के निवासी थे. 1812-19 ई. तक इन भीलों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. अंग्रेज अधिकारियों के अनुसार इस विद्रोह को पेशवा बाजीराव द्वितीय तथा उनके प्रतिनिधि त्रियम्बक जी दांगलिया ने उकसाया था. वास्तविकता यह थी कि भील लोग बढ़े हुए कृषि कर तथा नई अंग्रेज सरकार के भय से विद्रोह करने पर उतारू हुए थे.
अंग्रेज सेना की अनेक टुकड़ियों को इस विद्रोह को दबाने के लिए भेजा गया, जिससे भीलों में बहुत अधिक उत्तेजना फैल गयी और 1825 ई. में इन्होंने 'सेवरम' के नेतृत्व में पुनः विद्रोह कर दिया. यह आन्दोलन छिप-पुट रूप से 1846 ई. तक चलता रहा.
> संथाल विद्रोह पर प्रकाश डालिए.
संथाल लोग बिहार तथा बंगाल के सीमावर्ती इलाकों के निवासी थे. इस क्षेत्र में स्थाई बन्दोबस्त के कारण इनकी अधिकांश जमीन इनके हाथों से निकल गयी. अतः अब इन्हें अपनी आजीविका के लिए राजमहल की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी तथा यहाँ के जंगलों को काटकर इन्होंने भूमि को कृषि योग्य बनाया तथा इस क्षेत्र का नाम इन्होंने 'दमनीकोह' रखा.
ब्रिटिश सरकार ने इनके इस नये क्षेत्र दमनीकोह से भी लगान वसूलने के लिए व्यवस्था आरम्भ कर दी. इससे इस क्षेत्र में सरकारी कर्मचारियों, महाजनों आदि का प्रभाव बढ़ने लगा. ये लोग इन पर तरह-तरह के अत्याचार करते थे. इन लोगों के शोषण के कारण इनकी दशा अत्यन्त दयनीय हो गयी तथा अब इनका जीवन गुलामों के समान बन गया. इस क्षेत्र में जब रेलवे लाइन का विस्तार किया गया तब सरकारी कर्मचारी, पुलिस, थानेदार, जमींदार एवं महाजन सभी ने इनका शोषण प्रारम्भ कर दिया. फलस्वरूप विद्रोह अवश्यम्भावी हो गया.
1855 ई. में सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव इन चार संथालों ने युवकों को संगठित कर उनकी धार्मिक भावनाओं को जगाया. सिद्धू ने स्वयं को सिद्ध पुरुष बताया और संथालों के भगवान् का अवतार घोषित कर दिया.
30 जून, 1855 ई. को 'भगताडीह' ग्राम में संथाल लोगों की एक सभा हुई तथा इस सभा में जमींदारों, महाजनों व अत्याचारों का विरोध करने को कहा गया व अंग्रेजी राज्य को समाप्त करने का संकल्प लिया गया.
जुलाई 1855 ई. में विद्रोह प्रारम्भ हो गया तथा अत्याचारी दरोगा 'महेशलाल' की हत्या संथालों द्वारा कर दी गयी. बाजार, दुकान आदि लूट लिये गये तथा थानों में आग लगा दी गयी. जगह-जगह सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों एवं महाजनों पर आक्रमण किये गये. भागलपुर एवं राजमहल के मध्य रेल, डाक और तार सेवा भंग कर दी गयी. संथालों ने अब अंग्रेजी राज की समाप्ति की घोषणा कर दी तथा अपना स्वतन्त्र शासन स्थापित कर लिया.
अब अंग्रेज सरकार ने विद्रोह को दबाने के लिए मेजर बरो के अधीन एक बड़ी सेना भेजी, जिसने क्रूरतापूर्वक संथालों का दमन करना प्रारम्भ कर दिया. संथाल लोग प्रशिक्षित अंग्रेज सेना के सम्मुख टिक नहीं सके और उनके नेता मारे गये, जिससे संथाल विद्रोह कमजोर पड़ गया और 1856 ई. तक समाप्त हो गया.
> किसान आन्दोलन
19वीं शदी के अन्तिम दशकों व 20वीं शदी के प्रारम्भिक दशकों में अपनी दयनीय दशा से क्षुब्ध होकर किसानों ने अनेक बार आन्दोलन किए. इनमें प्रमुख आन्दोलन निम्नलिखित हैं – 
(1) नील आन्दोलन
(2) मराठा विद्रोह
(3) पबना व मोपला विद्रोह
(4) चम्पारण व खेड़ा विद्रोह
> नील आन्दोलन क्यों प्रारम्भ हुआ ? तथा इसके स्वरूप व परिणामों की समीक्षा कीजिए.
कारण— नील ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापार का प्रमुख माल था. अतः अंग्रेजों ने प्रारम्भ में इसकी खेती को बढ़ावा यूरोपियन दिया, परन्तु धीरे-धीरे इसकी खेती का जिम्मा बागान मालिकों के हाथों में चला गया और इन्होंने शोषण के नए-नए उपायों को अपनाकर कृषकों की दशा को दयनीय बना दिया.
अंग्रेज बागान मालिकों ने किसानों को 2 रुपए प्रति बीघा की दर से अग्रिम राशि का भुगतान कर उन्हें नील की खेती करने को बाध्य किया. यह प्रथा उस समय ददनी प्रथा कहलाती थी. इस व्यवस्था में जमीन की माप तथा नील की कीमत का उल्लेख रहता था. इस व्यवस्था में किसानों द्वारा अग्रिम धन ले लेने से उन्हें नील की खेती से छुटकारा कभी भी नहीं मिल पाता था और उन्हें पुश्त-दर- पुश्त नील की खेती करनी पड़ती थी.
इस नील की खेती का एक अन्य महत्त्वपूर्ण हानिकर पक्ष यह था कि किसी खेत में यदि एक बार नील पैदा की जाती थी, तो उसमें कोई दूसरी खेती (फसल) नहीं की जा सकती थी. इस प्रकार किसानों की जमीनें नील की खेती से बर्बाद होने लगीं.
नील विद्रोह का अन्य उल्लेखनीय कारण यह भी था कि सरकार द्वारा निलहे साहबों को संरक्षण प्रदान किया गया था. 1830 ई. के एक कानून के अनुसार नील की खेती न करने वाले किसानों को गिरफ्तार कर लिया जाता था. नीलहे अफसर किसानों पर चाहे कितना भी अत्याचार करते उसकी अदालत में सुनवाई नहीं होती थी. अतः किसानों को भयंकर शोषण व अत्याचारों का सामना करना पड़ा, जिसके कारण नील किसानों ने विद्रोह कर दिया.
नील विद्रोह का स्वरूप – 1859-60 ई. में नील उगाने वाले किसानों का असन्तोष बहुत अधिक बढ़ गया और उन्होंने अग्रिम धन व नील की खेती करने से मना कर दिया. गाँव-गाँव में किसानों को संगठित कर उन्हें विद्रोह के लिए उकसाया. बागान मालिकों के नौकरों को नौकरी छोड़ने के लिए उकसाया गया. इसके साथ ही किसानों ने नीलामी में विरुद्ध मुकदमे में गवाही नहीं देता था. इससे किसानों में भाग लेना बन्द कर दिया. एक किसान, दूसरे किसान के एकता स्थापित हो गई और इससे किसानों को अपार जनसमर्थन मिलने लगा. दीनबन्धु मित्र ने 'नील दर्पण' नामक नाटक लिखा, जिसमें किसानों की दुर्दशा का वर्णन किया गया, इसी प्रकार 'हिन्दू पेट्रियाट' ने नीलहों के अत्याचारों की अनेक कहानियाँ प्रकाशित कीं.
इस विद्रोह का नेतृत्व भी किसानों द्वारा ही किया गया. दिगम्बर विश्वास और उनके भाई विष्णुचरण विश्वास तथा मालदा के रफीक मण्डल ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया.
नील विद्रोह का परिणाम – नील विद्रोह की उग्रता एवं उसकी व्यापकता के कारण सरकार ने समाधान निकालने के लिए 1860 ई. में नील आयोग का गठन किया गया, जिसके सम्मुख किसानों ने कहा कि “वे प्राण देकर भी नील की खेती नहीं करेंगे." इसने नीलहों के अत्याचारों का पर्दाफाश कर दिया. 'एकादश कानून बनाया गया जिसमें नील की खेती को जबरदस्ती नहीं करवाया जा सकता था. इस प्रकार यह किसानों की एक बहुत बड़ी विजय थी.
> मराठा विद्रोह : कारण, स्वरूप व परिणाम
कारण - महाराष्ट्र में रैयतवाड़ी भू-व्यवस्था के लागू होने से सरकार का जमीन के मालिकों से लगान के लिए सीधा सम्पर्क बनाया गया था तथा लगान न देने की स्थिति में किसान को अपनी जमीन छोड़ देनी पड़ती थी अथवा वह स्वयं इस जमीन को गिरवीं रखकर या बेचकर टैक्स (Tax) चुकाता था, चूँकि इस व्यवस्था में 'कर' की मात्रा बहुत अधिक होने के कारण वह इसे चुका नहीं पाता था. अतः किसान अक्सर सूदखोरों एवं महाजनों से ऋण लेते थे, जो बढ़ता ही चला जाता था. अतः सूदखोरों एवं महाजनों के अत्याचारों से बचने के लिए मराठों द्वारा यह विद्रोह किया गया.
1875 ई. तक इस व्यवस्था के चलते किसानों की दशा बहुत खराब हो गई थी तथा इसी समय इस इलाके में भयंकर अकाल पड़ गया और कपास तथा अन्य वस्तुओं की कीमतों में अधिक कमी आ जाने के कारण किसान उधार लिया गया, ऋण चुकाने की स्थिति में नहीं रहे. अब महाजनों ने उनकी जमीनें तथा घर तक बेचना प्रारम्भ कर दिया, जिससे उनके लिए अब विद्रोह के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं बचा.
विद्रोह का स्वरूप– महाजनों के अत्याचारों के विरुद्ध किसान 1874 ई. से ही संगठित होना प्रारम्भ हो गए थे तथा उनका सामाजिक बहिष्कार कर उन्हें गाँवों से बाहर खदेड़ने लगे थे. 1875 ई. में पूना जिले के सूपा नामक स्थान पर किसानों ने बड़ी संख्या में एकत्र होकर महाजनों को केवल भय दिखाकर उनसे अपने जमीन सम्बन्धी कागजात पर अधिकार करने का संकल्प लिया तथा अब किसानों ने महाजनों से अपने कागजात छीनकर उन्हें नष्ट करना प्रारम्भ कर दिया. उनके गोदामों व पशुओं के चारे में आग लगा दी. महाजन ऐसी स्थिति का सामना नहीं कर सके और वे गाँवों से पलायन कर गए.
ऐसी परिस्थिति में सरकार ने किसानों के विरुद्ध पुलिस बल का प्रयोग महाजनों के समर्थन में करना प्रारम्भ किया, लेकिन जन-आन्दोलन के सम्मुख पुलिस विफल रही. अतः सरकार ने सेना द्वारा किसानों का दमन करना शुरू किया. गाँवों पर सामूहिक जुर्माना किया गया और सैकड़ों किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया.
> परिणाम
किसानों के इस विद्रोह के कारण सरकार को उनकी स्थिति पर ध्यान देने के लिए बाध्य कर दिया, जिससे 1878 ई. में 'दक्कन-उपद्रव आयोग का गठन किया गया, जिसने किसानों की दशा सुधारने एवं महाजनों के अत्याचारों को रोकने का सुझाव दिया और इस सुझाव पर 1879 ई. में ‘कृषक राहत अधिनियम’ बना, जिसमें किसानों की जमीनों को छीनने पर प्रतिबन्ध तथा कर्ज नहीं लौटाने पर गिरफ्तारी व्यवस्था की समाप्ति की.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, कृषकों ने अपने संगठित प्रयासों के द्वारा अपने लिए कुछ राहत पाने में सफलता पाई और यह उनकी विजय थी.
> पबना किसान आन्दोलन
यह आन्दोलन पबना क्षेत्र ( आधुनिक बांग्ला देश) में 1870-80 ई. में मुख्य रूप से स्थानीय जमींदारों एवं महाजनों के विरुद्ध हुआ.
पबना के इलाके में जमींदारों ने मनमाने ढंग से करों में वृद्धि की, जिससे किसानों की दशा निरन्तर दयनीय होती गई. इसके अतिरिक्त अन्य उपायों से भी इस क्षेत्र के किसानों का शोषण होता था. 1873 ई. में इस शोषण के विरुद्ध पबना के किसानों ने एक संघ का निर्माण किया तथा किसानों को संगठित करने के लिए किसानों ने गाँव-गाँव में सभाएँ कीं. जमींदारों से मुकदमे लड़ने के लिए उन्होंने धनराशि एकत्र की तथा कुछ समय के लिए किसानों ने जमींदारों को लगान देना बन्द कर दिया.
कुछ ही समय में पबना के किसानों के आन्दोलन से प्रेरित होकर ढाका, मैमनसिंह, फरीदपुर, राजशाही एवं त्रिपुरा के किसान भी संगठित होने लगे. जागीरदारों ने भी किसानों का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया, लेकिन उल्लेखनीय बात इस आन्दोलन में यह रही कि इससे कभी भी शांति भंग नहीं हुई तथा दोनों ही पक्षों से कोई हिंसात्मक कार्यवाही नहीं हुई
इस आन्दोलन की एक अन्य प्रमुख बात यह थी कि यह सरकार विरोधी न होने के कारण इसे सरकार का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त था. 1873 ई. में बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने किसान संगठनों को जायज ठहराया.
इस आन्दोलन को हिन्दू एवं मुसलमान दोनों वर्गों के मल्लाह एवं इशानचन्द्र राय थे. इस आन्दोलन के परिणामकिसानों का नेतृत्व मिला. इसके प्रमुख नेता शम्भू पाल, खुदी स्वरूप कृषकों को राहत देने के उद्देश्य से 1885 ई. में 'बंगाल कास्तकारी कानून' बना.
> मोपला विद्रोह
मद्रास के मालाबार तट पर बसे अधिकांश कृषक मुसलमान थे जिन्हें मोपला कहा जाता था. ये लोग अधिकतर मजदूर-वर्ग से थे व चाय-कॉफी के बागानों में काम करते थे.
मोपला लोग हिन्दू शासकों, जमींदारों एवं विदेशी अंग्रेजी सरकार तीनों से शोषित होते थे. 1857 ई. से पूर्व इन्होंने 22 बार आन्दोलन किया था. इसी प्रकार 1882-85, 1896, 1921 ई. में भी इन लोगों ने विद्रोह किया. बार-बार इस क्षेत्र में विद्रोह होने के कारणों का पता लगाने के लिए सरकार ने 1870 ई. में एक जाँच समिति गठित की, जिसने बताया कि 1862-80 ई. के मध्य इस क्षेत्र के किसानों पर जमींदारों द्वारा अतः जमीन बेदखली के मुकदमों एवं करों में वृद्धि हुई है. इसी शोषण के विरुद्ध मोपला लोगों का विद्रोह करना स्वभाविक था.
मोपला विद्रोह जब प्रारम्भ हुआ तब इसने बड़ा उग्र रूप धारण कर लिया. इन विद्रोहियों ने जमींदारों की सम्पत्ति लूट ली एवं जमींदारों की महिलाओं, बच्चों आदि तक की हत्या कर दी. इन लोगों में धार्मिक उन्माद भी व्याप्त हो गया तथा उन्हें उनके नेताओं ने भड़काया कि, इस आन्दोलन में मरने पर उन्हें सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होगी. मोपला पुलिस से भी नहीं डरते थे और मरने के लिए तैयार हो गए. उन्होंने छोटेछोटे गुटों में बँटकर इस क्षेत्र में भयंकर उत्पात एवं मारकाट मचा दी.
मोपला विद्रोहियों की उग्रता को देखते हुए सरकार ने भी क्रूरता का परिचय देकर इस विद्रोह को दबा दिया. इस आन्दोलन में संगठन सम्बन्धी कमजोरियों के कारण इसे बड़े किसानों का सहयोग एवं जन समर्थन प्राप्त नहीं हो सका, लेकिन कुछ समय बाद 1921 ई. में मोपलाओं ने पहले से भी अधिक भयंकर तरीके से विद्रोह किया, परन्तु सरकार ने सेना की सहायता से उनके विद्रोह को कुचल दिया.
यह मोपला विद्रोह की खास बात यह रही कि, आन्दोलन अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सका.
> चम्पारण किसान आन्दोलन
चम्पारण किसान आन्दोलन अंग्रेज निलहों के अत्याचारों एवं शोषण के विरुद्ध आन्दोलन था. अंग्रेज निलहों को इस क्षेत्र में जमीन ठेकेदारी पर दी गई थी, जिससे उन्होंने इस क्षेत्र के किसानों पर 'तीन कठिया' व्यवस्था लागू कर रखी थी. 'तीन कठिया' व्यवस्था में किसान को अपनी भूमि के 15% भाग पर नील की खेती करनी आवश्यक थी. इसके साथ ही वे अपनी उत्पादित नील निलहों के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं बेच सकते थे. अगर कोई इस व्यवस्था से मुक्त होना चाहता था, तो निलहों को एक बहुत बड़ी राशि 'तवान' के रूप में देनी पड़ती थी और उन्हें निलहों के यहाँ बेगार भी करनी पड़ती थी.
चम्पारण के किसानों ने 1905-08 ई. के मध्य पहली बार व्यापक तौर पर हिंसात्मक आन्दोलन का सहारा लिया, लेकिन सरकार के दमन के आगे उनकी चल न सकी और उनका यह प्रथम आन्दोलन कमजोर हो गया, परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी और उनका संघर्ष धीरे-धीरे चलता रहा.
इस क्षेत्र के कुछ सम्पन्न किसानों जैसे राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी को चम्पारण आने का निमन्त्रण भेजा. इस पर गांधीजी 1917 ई. में चम्पारण आए. उनके साथ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व अन्य कांग्रेसी कार्यकर्त्ता भी थे. गांधीजी ने किसानों की दुर्दशा को देखकर अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन चलाने का निश्चय किया. इससे उस क्षेत्र के किसानों में जोश एवं एकता की भावना उत्पन्न हो गई.
गांधीजी को अंग्रेजी सरकार ने तुरन्त गिरफ्तार कर लिया, परन्तु कुछ समय बाद उनकी लोकप्रियता को देखकर उन्हें रिहा करना पड़ा तथा किसानों की शिकायतों की जाँच करने के लिए सरकार ने जून 1917 ई. में एक समिति गठित कर गांधीजी को उसका सदस्य बनाया और इस समिति के सुझावों पर 'चम्पारण कृषि अधिनियम' बना, जिससे इस क्षेत्र की 'तीन कठिया' प्रणाली समाप्त कर दी गई. यह किसानों की बहुत बड़ी विजय थी और इसी विजय ने इस क्षेत्र के किसानों को राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने की प्रेरणा दी.
इस आन्दोलन का बहुत अधिक महत्त्व इसलिए हो जाता है कि इस आन्दोलन के माध्यम से गांधीजी ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया था तथा इस आन्दोलन की सफलता ने गांधीजी की लोकप्रियता में बहुत अधिक वृद्धि कर दी.
> खेड़ा किसान आन्दोलन 
खेड़ा का किसान आन्दोलन मुख्यतः बढ़ी हुई लगान ( राजस्व कर) के विरुद्ध था. इस क्षेत्र के किसान लगान रोककर अपने आक्रोश को व्यक्त करते थे, परन्तु 1918 ई. में जिससे उस क्षेत्र में भयंकर सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गई, किसानों ने करों में छूट की माँग की, लेकिन अंग्रेज राजस्व अधिकारी किसानों की इस माँग को मानने के लिए तैयार नहीं थे और कर देने के लिए उन्होंने किसानों को विवश करना प्रारम्भ कर दिया.
इस आन्दोलन में गांधीजी ने 1918 ई. में प्रवेश कर किसानों को संगठित कर सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह करने को कहा. इस पर गांधीजी के प्रभाव के कारण किसानों ने सरकार को लगान देना बन्द कर दिया. किसी भी प्रकार की दमनात्मक कार्यवाही से यहाँ के किसान नहीं डरे. इससे सरकार को किसानों के समक्ष झुकना पड़ा और किसानों को करों में छूट दे दी गई. इस आन्दोलन का महत्त्व यह है कि गांधीजी के 'सत्याग्रह' का प्रयोग चम्पारण के बाद यहाँ भी सफल रहा.
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Sun, 08 Oct 2023 10:07:06 +0530 Jaankari Rakho
राष्ट्रवाद का उदय एवं 1857 ई. का विद्रोह https://m.jaankarirakho.com/435 https://m.jaankarirakho.com/435 राष्ट्रवाद का उदय एवं 1857 ई. का विद्रोह

भारतीय राष्ट्रवाद का उद्भव : राष्ट्रवाद के सामाजिक तथा आर्थिक आधार
> भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के लिए सामाजिक कारणों की समीक्षा कीजिए. 
भारत में राष्ट्रीय जागरण में अनेक तत्वों ने प्रमुख भूमिका का निर्वाह किया, जिनमें सामाजिक कारण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण था. राष्ट्रवाद के उदय में इस तत्त्व ने किस प्रकार की भूमिका का निर्वाह किया, इसका विवरण निम्नलिखित बिन्दुओं में किया गया है—
(1) अंग्रेजी जातिगत भेद नीति- अंग्रेजों को अपने श्वेत जाति होने का बड़ा ही घमण्ड था. फलतः उन्होंने प्रारम्भ से ही भारतीयों के साथ जातिगत विभेद की नीति का अनुसरण किया. 1857 ई. के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने इस नीति को और अधिक बढ़ावा दिया. अंग्रेज लोग भारतीयों से केवल कार्यालयों में मिलते थे. अंग्रेजों के साथ भारतीय रेलगाड़ी में यात्रा नहीं कर सकते थे. वे भारतीयों के साथ प्रत्येक स्थान पर; जैसे—क्लबों में, रेल में, होटल में दुर्व्यवहार करते थे. वे भारतीयों को अर्द्ध-नीग्रो, अर्द्ध-गुरिल्ला और अर्द्ध-काला कहा करते थे. इस कारण से भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति घृणा की भावना जाग्रत हो गयी और उनके हृदय विद्रोह की भावना से भर उठे, गैरेट ने भी लिखा है कि "अंग्रेजों व भारतीयों के मध्य जातीय क्रूरता ने भारतीय राष्ट्रवाद को जन्म दिया."
(2) सरकारी नौकरियों में पक्षपात – 1858 ई. में महारानी विक्टोरिया की घोषणा के बावजूद भी शिक्षित भारतीयों को उच्च पदों से यथासम्भव दूर रखने का प्रयास किया गया. यदि कोई भारतीय परीक्षा में सफल हो भी जाता था, तो उसे किसी-न-किसी प्रकार से नौकरी से दूर रखने का प्रयास किया जाता था. सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के साथ ऐसा ही किया गया था. I.C.S. की परीक्षा इंग्लैण्ड में होती थी तथा इस परीक्षा में बैठने की उम्र 21 वर्ष कर दिये जाने से भारतीयों का इसमें बैठना अत्यन्त दुष्कर हो गया. इन सभी कारणों से भारतीय जनमानस अंग्रेजों के प्रति क्षुब्ध हो गया.
(3) प्राचीन संस्कृति का ज्ञान – अनेक यूरोपीय व भारतीय विद्वानों ने भारतीय प्राचीन संस्कृति के तत्त्वों को जनता के सम्मुख रखा, जिससे भारतीयों में अपने अतीत के प्रति गौरव का अनुभव हुआ और उनमें देशप्रेम की भावना का विकास हुआ.
(4) सामाजिक सुधार आन्दोलनों की भूमिका – इस समय राष्ट्र में अनेक सामाजिक और धार्मिक सुधार आन्दोलन उठ खड़े हुए, जिन्होंने लोगों में राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत की. ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन आदि ने बढ़ते ईसाइयत के प्रभाव को कम कर हिन्दू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया. हिन्दू समाज में प्रचलित अनेक कुरीतियों को दूर कर उसमें आत्मविश्वास भर दिया. परिणामस्वरूप सुधार आन्दोलनों के माध्यम से राष्ट्रीयता की भावना जनमानस में कूट-कूटकर भर गयी.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत में राष्ट्रवाद के उदय में सामाजिक कारणों का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय था.
> भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में आर्थिक तत्त्वों की भूमिका को स्पष्ट कीजिए
भारतीय राष्ट्रवाद के उदय में आर्थिक तत्त्वों की प्रमुख भूमिका रही है. अंग्रेजों ने भारत में अपनी जड़ों को जमाते ही यहाँ आर्थिक शोषण करना प्रारम्भ कर दिया. अंग्रेजों ने किसानों के विरुद्ध जमींदारों व महाजनों को संरक्षण देना प्रारम्भ कर दिया. इसलिए किसानों में अंग्रेजों के प्रति गहरा आक्रोश उत्पन्न हुआ और वे स्थान-स्थान पर विद्रोह करने लगे.
अंग्रेजों की आर्थिक एवं व्यापारिक नीति ने भारतीय उद्योग-धन्धों को नष्ट कर दिया, जिसके कारण लाखों बुनकरों को अपने काम से हाथ धोना पड़ा. अंग्रेजों ने देशी राज्यों को हड़प-नीति द्वारा अपने राज्य में मिलाकर उनकी सेनाएँ भंग कर दीं, जिसके कारण देश में बेरोजगारों युवा की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि हो गयी और उनमें असन्तोष की भावना फैलने लगी. इसके कारण राष्ट्रीय जागरण की भावना उत्पन्न हुई.
भारत की आर्थिक दुर्दशा के विषय में दीनेशा इदुलची वाचा ने लिखा है कि “भारतीयों की आर्थिक व्यवस्था ब्रिटिश शासन के समय में बिगड़ चुकी थी. चार करोड़ भारतीयों को केवल एक समय ख़ाकर ही सन्तुष्ट होना पड़ता था. इसका एकमात्र कारण यह था कि इंगलैण्ड किसानों से बलपूर्वक कर प्राप्त करता था तथा भारत में अपना माल भेजकर लाभ कमाता था." लॉर्ड सैलिसबरी ने 1875 ई. में यह स्वीकार किया था कि “ब्रिटिश शासन भारत के रक्त का शोषण कर उसे रक्तहीन एवं दुर्बल बना रहा है."
अंग्रेजों से भारतीयों के रुष्ट होने का एक अन्य उल्लेखनीय कारण यह भी था कि भारतीय पूँजीपति वर्ग देश के आर्थिक संसाधनों का पूर्ण विकास करना चाह रहा था, परन्तु शासक-वर्ग की नीतियों के कारण ऐसा करना सम्भव नहीं था. व्यापार वृद्धि और औद्योगीकरण के फलस्वरूप आर्थिक समृद्धि तो आयी थी, परन्तु इसका लाभ सामान्य जनता, कारीगर, मजदूर आदि को नहीं मिला. इसके विपरीत देशी उद्योग के पतन, धन के निष्कासन, मूल्य वृद्धि अकाल, महामारी का घातक प्रभाव भी इसी वर्ग को झेलना पड़ता था. मजदूरी में वृद्धि के स्थान पर अनाज के भाव बढ़ गये, जनता करों के बोझ तले पिसने लगी, परन्तु राष्ट्रीय आय में कोई वृद्धि नहीं हुई. समस्त भारतीय जनता ने देखा कि वे सभी एकसमान शत्रु ब्रिटिश सरकार द्वारा पीड़ित हैं. अतः इस शासन को सभी ने मिलकर उखाड़ फेंकने का संकल्प कर लिया.
देश के आर्थिक शोषण के कारण शिक्षित वर्ग क्षुब्ध था. भारतीय प्रशासन में ब्रिटिश अधिकारी वर्ग भारतीय राजस्व पर भार स्वरूप था. ब्लण्ट के अनुसार, "भारतीय अर्थव्यवस्था की बुराई यह थी कि भारत के हितों की अपेक्षा इंगलैण्ड के हितों का अधिक ध्यान रखता था." मिल में काम करने वाले मजदूरों में भी असन्तोष था. 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ब्रिटिश मिल-मालिकों को तथा चाय बागान आदि के मालिकों को मजदूरों के हितों के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार संरक्षण दे रही थी.
इस प्रकार उपर्युक्त विवचेन के बाद स्पष्ट होता है कि भारत में अंग्रेजों की आर्थिक शोषण नीति की तीव्र प्रक्रिया के फलस्वरूप राष्ट्रवाद का तेजी से उदय हुआ.
1857 ई. का विद्रोह
> 1857 के विद्रोह के कारणों पर प्रकाश डालिए.
1857 ई. के विद्रोह के कारणों को निम्नलिखित शीर्षकों में विभाजित करके इनका विवरण दिया गया है
(1) राजनीतिक कारण- इस विद्रोह के राजनीतिक कारणों में सर्वप्रमुख कारण लॉर्ड डलहौजी की नीतियाँ थीं. उसने अपनी गोद निषेध नीति से सतारा, नागपुर, झाँसी आदि राज्यों को अनुचित तरीके से अपने अंग्रेजी राज्य में मिला लिया. अवध के नवाब के साथ जो व्यवहार किया गया उससे तो सभी देशी राज्य चिन्तित हो गये. नाना साहब की पेंशन को अंग्रेजों द्वारा बन्द कर दिये जाने से मराठे अंग्रेजों से नाराज हो गये.
1835 ई. से पूर्व तक अंग्रेजों का मुगल बादशाहों के प्रति जो सम्मानपूर्ण व्यवहार था, वह अब नहीं रहा था. बहादुरशाह के बाद मुगलों की बादशाहत को समाप्त करने की घोषणा कर दी गयी तथा लालकिले को उनसे खाली करने को कहा गया. उनकी पेंशन 15 लाख 75 हजार रुपये मासिक तय कर दी गयी. इससे भारतीय मुसलमान जो मुगल बादशाहों को अब भी भारत का बादशाह मानते थे, नाराज हो गये.
अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति तिरस्कारपूर्ण व्यवहार विद्रोह का एक अन्य प्रमुख कारण था. अंग्रेज भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्त नहीं करते थे.
अंग्रेजों ने देशी राज्यों को हड़पकर अथवा अपने संरक्षण में लेकर उनकी सेना को भंग कर दिया, जिसके कारण सैनिकों का रोजगार छिन जाने से उनमें असन्तोष फैल गया.
अंग्रेजों की न्याय व्यवस्था एवं शासन प्रणाली की जटिलता ने भी इस विद्रोह को उकसाया प्रशासन के निचले स्तर पर व्यापक स्तर का भ्रष्टाचार था. अंग्रेजों का भारतीय भाषा, परम्परा एवं कानून आदि से परिचय न होना भी विद्रोह का कारण बना.
अंग्रेज प्रजा पर एक विजयी शासक की भाँति व्यवहार करते थे. उनमें भारतीयों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी तथा वे भारतीय रीति-रिवाजों से घृणा करते थे.
इसके साथ ही एक ज्योतिष ने भी यह भविष्यवाणी की थी कि अंग्रेजों का राज्य जो 100 वर्ष पूरे कर चुका है, अब समाप्त होने वाला है. इस कारण लोग उत्साह से अंग्रेजी राज्य को समाप्त करने के लिए विद्रोह पर उतारू हो गये.
(2) सामाजिक कारण – अंग्रेजों ने समाज सुधार के नाम पर भारतीय समाज की अनेक कुरीतियाँ; जैसे— सती प्रथा, विधवा-विवाह को समर्थन, बाल-हत्या, नरबलि जैसी कुप्रथाओं को बन्द करने के प्रयास किये.
अंग्रेजों के इन प्रयासों का भारतीयों ने अपनी सभ्यता के नष्ट हो जाने के डर से विरोध किया. इसके साथ ही अंग्रेजों ने रेल, सड़क, डाक-तार एवं अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार किया, जिससे लोगों में और अधिक भय व्याप्त हो गया और वे विद्रोह पर उतारू हो गये.
अंग्रेजों ने विद्यालयों में लड़कियों के पढ़ने के लिए जोर दिया, इसे लोगों ने अंग्रेजों की चाल समझा. इसके साथ ही अंग्रेजों ने 1856 ई. में यह कानून बनाया कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई हो जाता है, तो उसे उसकी पैतृक चल और अचल सम्पत्ति में से वंचित नहीं किया जा सकेगा.
(3) धार्मिक कारण — ईसाई पादरियों व अंग्रेजों ने भारत में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना प्रारम्भ किया. सरकार ने पादरियों को अत्यधिक सहायता दी. ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों को नौकरी दे दी जाती थी. इसे भारतीय धर्म सुधारकों ने अपने धर्म के लिए खतरा समझा. इसके अतिरिक्त ईसाई पादरी हिन्दू तथा इस्लाम दोनों धर्मों की खुलकर आलोचना करते थे.
डलहौजी ने गोद लेने की प्रथा को समाप्त कर दिया. इससे हिन्दू समाज में असन्तोष फैल गया. मन्दिर एवं मस्जिदों की भूमि पर कर लगा दिया गया. सरकारी व मिशनरी विद्यालयों में बाइबिल का पाठ अनिवार्य कर दिया गया. इस प्रकार भारतीय लोगों को यह विश्वास हो गया कि अंग्रेज उनके धर्म को नष्ट करके ही रहेंगे.
(4) आर्थिक कारण - अंग्रेजों के आने से पहले भारत विश्व का एक समृद्ध देश था, परन्तु अंग्रेजों के भारत में सत्ता प्रसार के साथ ही भारत विश्व के निर्धनतम देशों में सम्मिलित हो गया. इसके साथ ही लोगों के सम्मुख आर्थिक संकट बढ़ता गया. अंग्रेजों ने भारत में भयंकर लूट मचाई. यहाँ के उद्योग-धन्धों को अपनी नीतियों से नष्ट कर दिया. देश में भयंकर अकाल पड़ने लगे, जिसमें लाखों लोगों की मौत हो गयी. सामान्य जनता की कोई देखभाल करने वाला नहीं था. इस कारण से देश में भयंकर असन्तोष ने जन्म लिया.
विलियम बैंटिक ने भूमि सुधार के नाम पर मिल्क, इनाम एवं उपहार में दी गयी भूमि भी छीन ली इससे लगभग 20 हजार छोटे जागीरदार लोग भिखारी बन गये. देशी राज्यों के विलय के कारण उनके दरबार में रहने वाले कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, साहित्यकार आदि बेकार हो गये.
(5) सैनिक कारण - अंग्रेजी ईस्ट इण्डिया कम्पनी में लगभग 2 लाख 33 हजार भारतीय सैनिक थे जो विभिन्न कारणों से अंग्रेज सरकार से रुष्ट थे. भारतीय सैनिकों को अंग्रेज सैनिकों के समान वेतन एवं भत्ते नहीं दिये जाते थे. उनको दूर देशों में लड़ने के लिए लम्बे समय तक भेजा जाता था तथा बदले में कोई अतिरिक्त लाभ नहीं दिया जाता था. अंग्रेज सैनिक जो संख्या में केवल मात्र 35 हजार थे, उनको भारतीयों की अपेक्षा बहुत अधिक सुविधाएँ प्राप्त थीं.
1856 ई. में लॉर्ड डलहौजी द्वारा बनाया गया यह नियम कि भारतीय सैनिकों को सर्वत्र तथा समुद्र पार किसी भी देश में युद्ध के लिए भेजा जा सकता है, विद्रोह का एक बहुत बड़ा कारण बना, क्योंकि हिन्दू सैनिक समुद्र पार यात्रा करना धर्म सम्मत नहीं समझते थे.
अंग्रेज हिन्दू तथा मुसलमान दोनों धर्मों के सैनिक रिवाजों की खिल्ली उड़ाते थे. हिन्दुओं में तिलक लगाना, टोपी पहनना, चोटी रखना आदि धार्मिक कर्त्तव्य समझे जाते थे. इसी तरह से सिखों एवं मुसलमानों में दाढ़ी-मूँछें रखने की परम्परा थी. अंग्रेजों द्वारा इन सभी पर प्रतिबन्ध लगा दिये जाने के कारण भारतीय सैनिकों में रोष उत्पन्न हो गया.
(6) तात्कालिक कारण – चर्बी वाले कारतूस इस महान् विद्रोह के कारण बने. घटना यह थी कि सरकार ने एक नई 'एनफील्ड' राइफल को सेना के लिए लागू किया, जिसके कारतूसों को भरने के पूर्व दाँत से छीलना पड़ता था. अफवाह यह फैली कि इसमें गाय एवं सुअर की चर्बी मिली हुई है, जिससे हिन्दू और मुसलमान दोनों का धर्म भ्रष्ट हो जायेगा. इस पर सैनिकों के सहन की सीमा समाप्त हो गयी और मेरठ छावनी के सैनिकों ने विद्रोह कर अंग्रेज सैनिकों एवं अधिकारियों को मार डाला और विद्रोह की शुरूआत कर दी.
> 1857 ई. के विद्रोह का स्वरूप निर्धारित कीजिए. 
1857 ई. के विद्रोह के स्वरूप का निर्धारण एक अत्यन्त ही विवादास्पद विषय है, क्योंकि इसके स्वरूप को लेकर इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है. इसके विषय में चार मत प्रमुखता से गिनाये जा सकते हैं. जिनके विवरण निम्नलिखित प्रकार से हैं—
(1) सैनिक विद्रोह के रूप में— अंग्रेज इतिहासकार सर जॉन लारेंस, सर जॉन शैली आदि लोग इसे सैनिक विद्रोह के रूप में देखते हैं, उनके मत के आधार पर यह विद्रोह अपने अर्थ एवं उत्पत्ति के आधार पर सैनिक विद्रोह था, क्योंकि इसमें अधिकांशतया सिपाहियों ने ही भाग लिया था और इसे जनमत का कोई समर्थन प्राप्त नहीं था.
वास्तव में देखा जाये तो यह मत भ्रान्तिमूलक है, क्योंकि विद्रोह के प्रारम्भ होते ही लोगों ने इसे अपना समर्थन देना प्रारम्भ कर दिया था. उत्पत्ति की दृष्टि से यह भले ही सिपाही विद्रोह था, किन्तु इसकी वास्तविकता यह है कि यह समय के साथ-साथ व्यापक होता चला गया और इसमें विभिन्न तत्त्व जुड़ते चले गये.
(2) सामन्ती क्रान्ति के रूप में— अनेक इतिहासकारों ने इसे सामन्ती प्रतिक्रिया कहा है. इसका प्रमुख कारण यह है कि इस विद्रोह में अनेक सामन्त एवं राजा-महाराजाओं ने भी अपने राज्य के खो जाने के कारण भाग लिया था. उनके विशेषाधिकारों के समाप्त कर दिये जाने के कारण उन्होंने विद्रोह किया. मुसलमान लोग बहादुरशाह की स्वाधीनता वापस दिलाने के लिए लड़े, नाना साहब के साथ मराठे उनकी पेंशन दिलाने के लिए. इसी प्रकार से झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई अपना राज्य वापस पाने के लिए संघर्ष में उतरीं. अतः यह विद्रोह स्वरूप की दृष्टि से सामन्तवादी दिखाई पड़ता है, परन्तु यह तथ्य पूर्णतः सत्य नहीं है, क्योंकि प्रारम्भ में विद्रोह सैनिक विद्रोह के रूप में ही था.
(3) मुस्लिम षड्यन्त्र के रूप में— सर जेम्स आउट्रम और डब्ल्यू. टेलर के अनुसार यह विद्रोह भारतीय मुसलमानों का अंग्रेजों के विरुद्ध षड्यन्त्र था. अंग्रेजों के कारण उनका महान् मुगल साम्राज्य नष्ट हो गया था और अब वे बहादुरशाह को उनका राज्य दिलाने तथा राजनैतिक सत्ता प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे थे.
इस विद्रोह को मुस्लिम षड्यन्त्र इसलिए नहीं कहा जा सकता है कि इसमें सभी मुसलमानों ने भाग नहीं लिया था, क्योंकि अंग्रेजों को अधिकांश मुस्लिमों का सहयोग प्राप्त था. इसके अतिरिक्त विद्रोह करने वाले तात्या टोपे, लक्ष्मीबाई, नाना साहेब, कुँवरसिंह आदि हिन्दू थे. इस प्रकार इसे किसी सम्प्रदाय विशेष का षड्यन्त्र नहीं ठहराया जा सकता है.
(4) बर्बरता एवं सभ्यता के मध्य युद्ध - टी. आर. होम्स जैसे अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे सभ्यता व बबर्रता के मध्य युद्ध कहा है, परन्तु इसमें पक्षपात की गन्ध अधिक है, वस्तुतः इस ब्रिदोह के लिए दोनों ही पक्ष दोषी थे. अंग्रेजों ने जब विद्रोह का दमन किया, तब उन्होंने अमानवीय अत्याचार की सारी सीमाएँ तोड़ दीं. इसी प्रकार दिल्ली, लखनऊ एवं कानपुर में कुछ भारतीय अंग्रेज स्त्रियों एवं बालकों की हत्या के दोषी थे.
इन स्वरूपों के अतिरिक्त कुछ इतिहासकारों जैसे सावरकर ने इसे 'प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम' की संज्ञा दी है, जबकि कुछ ने इसे ईसाइयों के विरुद्ध धार्मिक युद्ध कहा है अथवा काले और श्वेत लोगों के मध्य सर्वश्रेष्ठता के लिए युद्ध कहा है. कुछ अन्य लोग इसे पाश्चात्य एवं पूर्वी सभ्यता के मध्य संघर्ष के रूप में देखते हैं. राष्ट्रवादी भारतीय इसे 'सुनियोजित राष्ट्रीय आन्दोलन' की संज्ञा देते हैं, परन्तु वास्तव में इसका स्वरूप क्या था, अभी भी इस पर प्रकाश नहीं डाला गया.
> 1857 ई. के विद्रोह की असफलता के कारण
1857 ई. के विद्रोह की असफलता के लिए अनेक कारण जिम्मेदार थे. नाना साहब, कुँवरसिंह, लक्ष्मीबाई, बहादुरशाह आदि नेता मिलकर कार्य नहीं कर सके. ये सभी लोग कुशल योद्धा तो थे, परन्तु उनमें नेतृत्व करने की क्षमता का अभाव था. इसके साथ ही विद्रोह का अनियोजित तरीके से प्रारम्भ होना इसकी असफलता का प्रमुख कारण बना. विद्रोहियों के पास कोई सुनिश्चित कार्यक्रम नहीं था. अतः इसके अभाव में वे जनता को विद्रोह के लिए नहीं उकसा सकें.
इसके अतिरिक्त आउट्रम, जॉन लारेंस, हैवलॉक नील, केम्पबेल आदि योग्य एवं बहादुर सेनापति थे, जिन्होंने विद्रोहियों को पराजित कर आसानी से नष्ट कर दिया.
1857 ई. के विद्रोहियों की असफलता का एक अन्य उल्लेखनीय कारण यह था कि उनके पास पर्याप्त सैनिक साजो-सामान नहीं थे, जबकि अंग्रेजों के पास नये अस्त्र-शस्त्र थे. आवागमन के साधनों पर अंग्रेजों का नियन्त्रण होने के कारण उन्हें अपने सैनिक विद्रोही स्थलों पर तुरन्त भेजने में सफलता मिली तथा संचार साधनों ने विद्रोहों के विषय में तुरन्त नई जानकारी प्रदान की.
इन सभी कारणों से यह विद्रोह पूरे भारत में नहीं फैल सका. इसका स्वरूप स्थानीय ही रहा. पंजाब, राजस्थान, सिन्ध, कश्मीर, पूर्वी बंगाल एवं पूरा दक्षिण भारत इस विद्रोह से अछूता ही रहा. इसके साथ ही भारतीय शासकों द्वारा अंग्रेजों की मदद करना विद्रोह की असफलता का मुख्य कारण बना.
विद्रोहियों में संगठन शक्ति का अभाव, क्रान्ति का समय से पूर्व प्रारम्भ होना तथा उस समय देश में राष्ट्रीयता की भावना का अभाव आदि के कारण विद्रोहियों को इस संघर्ष में असफलता का मुँह देखना पड़ा.
> 1857 ई. के विद्रोह के परिणाम
> 1857 ई. के विद्रोह के निम्नलिखित परिणाम थे
(1) सेना का पुनर्गठन – इस विद्रोह के बाद ही सेना का पुनर्गठन कर अंग्रेज व भारतीय सिपाहियों की संख्या का अनुपात 1: 2 कर दिया गया तथा सभी महत्त्वपूर्ण स्थान अब भारतीयों के लिए बन्द कर दिये गये.
(2) कम्पनी के शासन का अन्त – 1858 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बार-बार अनुरोध के बावजूद भी 'भारत शासन अधिनियम' पारित करके इसके शासन का अन्त कर सीधे ब्रिटिश सम्राट् के हाथ में भारत का शासन चला गया तथा अब गवर्नर जनरल के स्थान पर भारत में वायसराय व इंगलैण्ड में भारत मन्त्री का पद सृजित किया गया. उसके लिए 15 सदस्यीय एक परिषद् का गठन किया गया.
(3) नई शासन प्रणाली – 1858 ई. में गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने इलाहाबाद में एक दरबार आयोजित कर महारानी विक्टोरिया की एक घोषणा पढ़ी, जिसके अनुसार भारत में अब और विजय कार्य नहीं किये जायेंगे तथा सरकार का प्रबन्ध जनता के हित के लिए किया जायेगा तथा जनता के सामाजिक एवं धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा. इसमें देशी नरेशों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा का भी आश्वासन दिया गया.
(4) साम्राज्यवादी नीति में परिवर्तन – इस विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि अंग्रेज़ अब पहले से अधिक सतर्क हो गये थे तथा उनका गर्व भी कुछ कम हो गया. भारतीय राजाओं को गोद लेने का अधिकार बहाल कर दिया गया. इसके साथ ही जागीरदारों, तालुकेदारों आदि की सम्पत्ति छीनने के प्रयास बन्द कर दिये गये. अंग्रेजों ने अब समाजसुधार में रुचि लेना बन्द कर दिया.
(5) उग्रवाद का उदय – इस विद्रोह का अप्रत्यक्ष परिणाम यह पड़ा कि भारतीय राजनीति में उग्रवाद का जन्म हो गया. क्रान्ति एवं दमन के समय दोनों पक्षों द्वारा अपनाई गयी बर्बरता के कारण दोनों पक्ष एक-दूसरे को घृणा की दृष्टि से देखने लगे. आगे चलकर देश में अंग्रेजों के विरुद्ध आतंकवाद पनपा.
(6) मुसलमानों पर घातक प्रभाव - क्रान्ति के समय मुसलमानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. अंग्रेज भी इसे मुस्लिम षड्यन्त्र के रूप में देखते थे. फलतः अंग्रेजों का अब सारा दमन कार्य मुसलमानों के प्रति केन्द्रित हो गया, जिससे मुसलमानों के सांस्कृतिक जागरण पर घातक प्रभाव पड़ा और वे हिन्दुओं से काफी पिछड़ गये.
(7) हिन्दू-मुसलमान वैमनस्य का उदय – इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलमानों के मध्य वैमनस्य की खाई को चौड़ा करने का भरसक प्रयास किया. अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति का अनुशरण किया और उनकी इसी नीति के कारण आगे चलकर भारत का विभाजन हुआ.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इस विद्रोह के अनेक महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले, इस विद्रोह ने भारतीयों को राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाया और भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के नेताओं के लिए यह विद्रोह प्रेरणा स्रोत बना.
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Sun, 08 Oct 2023 10:04:50 +0530 Jaankari Rakho
समाचार & पत्रों का इतिहास https://m.jaankarirakho.com/434 https://m.jaankarirakho.com/434 समाचार - पत्रों का इतिहास

> भारत में आरम्भिक समाचार पत्रों के इतिहास पर प्रकाश डालिए.
भारत में समाचार-पत्रों का प्रकाशन यूरोपीय कम्पनियों के आगमन के बाद ही प्रारम्भ हुआ. पुर्तगाली लोगों ने गोवा में सर्वप्रथम मुद्रणालय (Printing Press) की स्थापना 1557 ई. में की. इसके बाद अंग्रेजों ने 1684 ई. में बम्बई में प्रेस की स्थापना की, लेकिन इसके बाद भी 100 वर्षों तक प्रेस द्वारा कोई समाचार पत्र नहीं निकाला जा सका.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के असन्तुष्ट बोल्ट्जमैन और उसके साथियों ने कम्पनी के दुष्कृत्यों का पर्दाफाश करने के लिए एक समाचार पत्र निकालने का प्रयास किया, परन्तु उन्हें असफलता ही हाथ लगी.
बोल्ट्जमैन के बाद ऑगस्ट हिक्की ने 1780 ई. में देश का प्रथम अखबार 'बंगाल गजट' या द कलकत्ता जनरल एडवर्टाइजर (The Calcutta General Advertiser ) निकाला. इसने अपने इस अखबार में गवर्नर जनरल, कम्पनी के अधिकारियों एवं न्यायाधीशों की कटु आलोचना की. इसके चलते इनका प्रेस जब्त कर लिया गया.
हिक्की के बाद 1784 ई. में 'कलकत्ता गजट' के नाम से, 1785 ई. में ‘बंगाल जनरल' तथा इसी वर्ष 'दी ओरिएण्टल मैग्जीन ऑफ कलकत्ता' का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया.
प्रारम्भिक वर्षों में इन समाचार पत्रों का प्रचलन कभी भी दो सौ प्रतियों से अधिक नहीं रहा तथा इनका उद्देश्य केवल एंग्लो-इण्डियन लोगों का मनोरंजन करना मात्र रह गया. क्योंकि उस समय यह अपनी शैशव अवस्था में थे. अखबार उन्हें जनमत को बहुत अधिक प्रभावित नहीं कर सकते थे. केवल इस बात का डर था कि अंग्रेजों के बड़े अधिकारी नाराज होकर उनकी प्रेस को जब्त न कर दें.
जबकि कम्पनी के अधिकारी इस बात से भयभीत रहते थे कि ये अखबार कहीं लन्दन न पहुँच जाएँ और उनके दुष्कर्मों का भण्डाफोड़ न कर दें.
इस समय समाचार पत्रों के विषय में कानून नहीं बने थे तथा ये अखबार कम्पनी की दया पर ही निर्भर थे. इस कारण ये प्रारम्भिक अखबार स्वस्थ जनमत का विकास नहीं कर सके, परन्तु फिर भी इन अखबारों ने भविष्य के लिए भूमिका की तैयारी कर दी थी.
> भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास में प्रेस की भूमिका का उल्लेख कीजिए.
राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास में भारतीय समाचार पत्रों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था. प्रारम्भ में यूरोपीय लोगों ने ही प्रेस की स्थापना की थी, परन्तु धीरे-धीरे भारतीयों द्वारा भी भारतीय भाषाओं में समाचार पत्र प्रकाशित किए जाने लगे. ये सभी भारतीय अखबार पाश्चात्य नमूने पर ही विकसित हुए थे. उन्नीसवीं सदी के अन्त में भारतीयों द्वारा अंग्रेजी व अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक समाचार पत्र प्रकाशित होने लगे.
भारतीय समाचार पत्रों ने जनमत एवं राष्ट्रीयता के प्रसार में मुख्य भूमिका का निर्वहन किया. अमृत बाजार पत्रिका, इण्डियन मिरर, बंगाली आदि अखबारों ने अंग्रेजों के कृत्यों का भण्डाफोड़ किया.
केसरी व मराठा जैसे अखबारों ने महाराष्ट्र में चेतना की नई लहर पैदा की. इनके सम्पादक बाल गंगाधर तिलक ने अपने राष्ट्रीयता के विचारों का प्रसार इनके माध्यम से किया, जिससे पूरे महाराष्ट्र में एक नवीन जागृति आ गई.
इन अखबारों ने सामाजिक कुरीतियों एवं अन्धविश्वासों का भी भण्डाफोड़ किया. अनेक प्रतिबन्धों के बावजूद भी कई अखबार गुप्त रूप से निकले तथा उन्होंने देश के नवयुवकों में क्रान्तिकारी विचारों का प्रसार किया. 'गदर' ऐसा ही एक अखबार था.
भारतीय अखबारों ने प्रतिनिधि सरकार, स्वतन्त्रता तथा प्रजातन्त्रीय संस्थाओं को जनता में लोकप्रिय बनाया. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारतीय समाचार पत्र भारतीय राष्ट्रवाद का दर्पण बन गए तथा जनता को शिक्षित करने का माध्यम बन गए.
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Sun, 08 Oct 2023 10:02:22 +0530 Jaankari Rakho
भारत में सामाजिक & धार्मिक सुधार आन्दोलन https://m.jaankarirakho.com/433 https://m.jaankarirakho.com/433 भारत में सामाजिक - धार्मिक सुधार आन्दोलन

> भारत में सुधार आन्दोलन के उदय के क्या कारण थे ? समीक्षा कीजिए.
उन्नीसवीं सदी में भारत में जो सुधार आन्दोलन चले उसके निम्नलिखित प्रमुख कारण थे -
1. भारत में अंग्रेजों के आने के बाद यहाँ के निवासियों का सम्पर्क पश्चिमी सभ्यता से प्रत्यक्ष रूप से हुआ, जिसके कारण यहाँ भी पाश्चात्य संस्कृति के तत्व प्रवेश कर गए. भारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से मध्यम वर्ग के लोग यूरोप की उदारवादी विचारधारा से परिचित हुए और अब उनके विश्वास तर्कों में बदल गए, जिससे अनेक सुधारवादी आन्दोलन प्रारम्भ हुए.
2. भारत में अंग्रेजों के साथ-साथ ईसाई पादरियों का भी आगमन हुआ, जिन्होंने यहाँ ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार का कार्य प्रारम्भ किया. इसके साथ ही उन्होंने भारत में प्रचलित धर्मों की आलोचना करनी भी प्रारम्भ की. फलतः भारतीय धर्म-सुधारकों ने उनके विरोध में सुधार कार्य करना प्रारम्भ किया.
3. भारत में इस काल में अनेक धर्म-सुधारकों; जैसेदयानन्द सरस्वती, विवेकानन्द, राजा राममोहन राय आदि का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने भारत के प्राचीन विचारों की नए युग के सन्दर्भ में विवेचना कर उनके औचित्य को सिद्ध कर दिया. इससे लोगों में उत्साह एवं नवीन जागृति का संचार हुआ.
4. 1784 ई. में बंगाल में विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की, जिसमें भारत के प्राचीन ग्रन्थों पर काम कर उसे यूरोपीय विद्वानों द्वारा मान्यता दिलवाई. विलकिन्सन ने अभिलेखों को पढ़कर उसे यूरोपियों के समक्ष रखकर उन्हें भारतीय विचारों से अवगत कराया.
5. अंग्रेजों के आगमन से भारत में समाचार पत्रों का विकास हुआ, जिससे लोग एक-दूसरे के विचारों के सम्पर्क में आए. इसके साथ ही यातायात के साधन; जैसे – रेल, डाक, तार आदि के विकास में भी इससे अत्यधिक मदद मिली.
6. यह काल नवजागरण का काल था, जिसके कारण भारत के सामाजिक एवं धार्मिक जीवन पर प्रभाव पड़ा. इस जागरण से भारत की रूढ़ियों, परम्पराओं एवं अन्धविश्वासों पर गहरा प्रभाव पड़ा. ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसायटी आदि ने धर्म-सुधार एवं समाज-सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया जाति व्यवस्था, छुआछूत का विरोध प्रारम्भ हो गया. सती प्रथा, बाल-विवाह, बाल-हत्या, मूर्ति-पूजा तथा हिंसात्मक यज्ञों की कटु आलोचना होने लगी.
इन सभी कारणों ने मिलकर इस प्रकार के सुधार आन्दोलन का सूत्रपात किया.
> समाज सुधारक, धर्म-सुधारक तथा शिक्षाशास्त्री के रूप में राजा राममोहन राय का मूल्यांकन कीजिए? 
राजा राममोहन राय भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत और धार्मिक सुधार आन्दोलन के प्रवर्तक थे. उनका जन्म 1774 ई. में बंगाल के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. इन्होंने 1805 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी में नौकरी कर ली. 1814 ई. में नौकरी छोड़ने के बाद इसी वर्ष इन्होंने आत्मीय सभा का गठन किया और 1828 ई. में ब्रह्म समाज की स्थापना की. 1831 ई. में ये इंगलैण्ड गए और वहीं 1833 ई. में इनका देहान्त हो गया.
राजा राममोहन राय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. उन्होंने जीवन के प्रत्येक पहलू को सूक्ष्म दृष्टि से देखा और वे समाज तथा धर्म रक के रूप में अत्यधिक प्रसिद्ध हुए. उनकी उपलब्धियों का मूल्यांकन निम्नलिखित है –
समाज-सुधारक – समाज सुधारक के रूप में राजाजी ने अनेक उल्लेखनीय कार्य किए. उन्होंने 1829 ई. में अपने प्रयासों से गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक से मिलकर कानून बनवाकर सती प्रथा को गैर-कानूनी घोषित करवा दिया. इस प्रथा को मिटाने के कारण ही उन्हें 'भारतीय समाज-सुधार का अग्रदूत' माना जाता है. इसके अतिरिक्त उन्होंने जाति प्रथा, वर्ग-भेद, मूर्ति पूजा, पशुबलि आदि की भी निन्दा की तथा स्त्री तथा स्त्री शिक्षा एवं विधवा-विवाह का समर्थन किया.
धर्म-सुधारक— राजा राममोहन राय समाज-सुधारक के साथ-साथ धर्म-सुधारक भी थे. उन्होंने सभी धर्मों का अध्ययन किया और इसके बाद वह इस परिणाम पर पहुँचे कि, सभी धर्मों में अद्वैतवादी सिद्धान्तों का ही प्रचलन है. वे ईश्वर के एकत्व में विश्वास करते थे और मूर्ति-पूजा का विरोध करते थे. उन्होंने फारसी में 'एकेश्वरवाद के प्रति देन' नामक एक पुस्तक लिखी तथा एक ब्रह्म की उपासना पर जोर दिया.
शिक्षाशास्त्री – शिक्षा के क्षेत्र में भी राजाजी क्रान्तिकारी विचारों वाले व्यक्ति थे. प्राचीन भाषाओं के ज्ञाता होने के कारण वे इसके समर्थक होने के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा - प्रणाली तथा अंग्रेजी भाषा के समर्थक थे. जो लोग भारत में अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाना चाहते थे, उन्हें उन्होंने अपना पूरा समर्थन दिया. उन्होंने कलकत्ता में एक हिन्दू कॉलेज की स्थापना में सहयोग दिया, जो अपने समय की सर्वाधिक आधुनिक संस्था थी.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि राजा राममोहन राय वास्तव में एक महान् सुधारक थे. इनके विषय में डॉ. नन्दलाल चटर्जी ने लिखा है कि वे "प्रतिक्रिया एवं प्रगति के बीच के बिन्दु" थे. राजाजी ने अपने समय के भारत के सभी पहलुओं पर अत्यधिक प्रभाव डाला.
> ब्रह्म समाज के प्रमुख सिद्धान्त
ब्रह्म-समाज के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –
1. ईश्वर एक है, वह सर्वशक्तिमान है, अजर और अमर है.
2. ईश्वर की सृष्टि में नस्ल, वर्ण, जाति आदि का कोई भेद-भाव नहीं है. ईश्वर की कृपा से मोक्ष सम्भव है. अतः सभी को ईश्वर की आराधना करनी चाहिए.
3. कर्म प्रधान है. मनुष्य कर्म के अनुसार ही फल पाता है.
4. बाल-विवाह, बहु-विवाह आदि प्रथाएँ गलत हैं और विधवा-विवाह उचित है.
5. मूर्ति पूजा एवं कर्मकाण्ड का त्याग कर देना चाहिए और परम ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए.
राजा राममोहन राय के इस ब्रह्म समाज के सिद्धान्तों का प्रारम्भ में बंगाल में अत्यधिक विरोध हुआ, लेकिन लोगों में शिक्षा के प्रसार के कारण इन सिद्धान्तों की सत्यता का पता चला, जिससे अन्य लोग भी इस संगठन से जुड़ने लगे तथा कुरीतियों एवं अन्धविश्वासों का विरोध करने लगे.
> स्वामी दयानन्द और आर्य समाज
स्वामी दयानन्द का नाम भारत के समाज-सुधारकों में अग्रणी हैं. उन्हें ‘हिन्दू समाज का रक्षक' कहा जाता है. इन्होंने देशवासियों को स्वदेशी, स्वभाषा तथा स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ाया. इस हेतु इन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'सत्यार्थ प्रकाश' की रचना हिन्दी भाषा में की दयानन्द ने जाति-भेद, छुआ-छूत, सती प्रथा, बहु-विवाह एवं हिंसायुक्त जीवन का घोर विरोध किया. उन्होंने 1875 ई. में बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की तथा अपना प्रसिद्ध नारा 'वेदों की ओर लौटो' दिया.
> आर्य समाज के कार्य
आर्य समाज ने धार्मिक, सामाजिक, शिक्षा सम्बन्धी, राजनीतिक आदि अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किए.
आर्य समाज ने हिन्दू धर्म को एक नया स्वरूप प्रदान किया तथा इसने केवल वेदों को ही हिन्दू धर्म का आधारग्रन्थ माना. इन्होंने इस धर्म की उन समस्त बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया, जिसके कारण इस धर्म का पतन हो रहा था. वह पुराणों द्वारा प्रतिपादित धर्म में विश्वास नहीं करते थे. मूर्ति-पूजा के कट्टर विरोधी एवं चरित्र एवं नैतिकता पर इनका अत्यधिक बल था.
आर्य समाज ने अस्पृश्यता, बाल-विवाह, जाति प्रथा का कड़ा विरोध किया. इसके लिए दयानन्द के नेतृत्व में 1908 ई. में दलित जातियों द्वारा एक आन्दोलन चलाया गया. आर्य समाज ने भारत में अनेक विधवा आश्रम तथा अनाथालयों की स्थापना की. इन्होंने 'शुद्धि आन्दोलन' के द्वारा अपना धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को स्वीकार करने वाले लोगों को पुनः हिन्दू बनाया. इस प्रकार इस संस्था द्वारा हिन्दू धर्म को पतन के मार्ग से वापस लाया गया.
आर्य समाज ने शिक्षा में उल्लेखनीय योगदान किया है. इस संस्था के स्कूलों तथा कॉलेजों का आज पूरे देश में जाल फैला हुआ है. उस समय में लाला हंसराज ने लाहौर में 1886 ई. में डी. ए. वी. कॉलेज की स्थापना की. इसी प्रकार शिक्षा एवं अनुशासन के लिए हरिद्वार में स्थापित गुरुकुल काँगड़ी संस्थान अपने आप में अद्वितीय है.
इसके अतिरिक्त स्वामीजी ने देशवासियों के स्वाभिमान को जगाने के लिए यह नारा लगाया कि, भारत भारतीयों के परन्तु विदेशी लिए है, स्वदेशी शासन चाहे जैसा भी हो, शासन से सदैव ही अच्छा होता है. इस प्रकार स्वामीजी ने देशवासियों में आत्मसम्मान, देशप्रेम, स्वतन्त्रता आदि की भावनाएँ जाग्रत की तथा हिन्दू धर्म को कट्टर बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया.
> स्वामी विवेकानन्द और रामकृष्ण मिशन
भारतीय सामाजिक एवं धार्मिक पुनर्जागरण में स्वामी विवेकानन्द का स्थान अग्रणी है. इनके बचपन का नाम नरेन्द्र था तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय से इन्होंने स्नातक तक शिक्षा ग्रहण की. उनके गुरु का नाम रामकृष्ण परमहंस था. उन्हीं के कहने पर विवेकानन्द ने 1892 ई. में विश्व धर्म सम्मेलन न्यूयॉर्क में भाग लेने के लिए गए तथा वहाँ से वापस आकर उन्होंने कलकत्ता के निकट बेल्लौर में 1896 ई. में 'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना की.
स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन के माध्यम से मानवता की सेवा का लक्ष्य बनाया. उनका विश्वास था कि वह धर्म बेकार है, जो अपने अनुयायियों को सक्षम और प्रगतिशील न बना सके. इस हेतु उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त उस समय की जड़ता को दूर करने का प्रयास किया. इसके लिए उन्होंने सुझाव दिया कि उपनिषदों के श्रेष्ठ तत्वों और वेदान्त के विचारों और आदर्शों को प्रतिदिन के जीवन के व्यवहार में लाया जाए.
विवेकानन्द ने लोगों से राष्ट्र सेवा में जुटने का आह्वान किया. उन्हीं के शब्दों में, “तुम ईश्वर की खोज में कहाँ जाओगे? क्या सभी निर्धन, दुःखी और कमजोर इन्सान, ईश्वर नहीं हैं? पहले उन्हीं की पूजा क्यों नहीं करते? उन्हीं लोगों को ईश्वर मानो, उन्हीं के बारे में सोचो, उन्हीं के लिए काम करो. ईश्वर तुम्हें मार्ग दिखाएगा."
उन्होंने रामकृष्ण मिशन का प्रमुख लक्ष्य पश्चिम के स्वातन्त्र्य एवं जनतन्त्र के साथ पूरब के अध्यात्मवाद का संयोग करना बताया. उसने सर्व धर्म एकता पर विशेष बल दिया तथा दुःख से पीड़ित मानवता को सहायता देने के लिए इस संस्था द्वारा अब भी अनेक कार्य किए जा रहे हैं.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारत के धार्मिक एवं सामाजिक पुनजागरण में रामकृष्ण मिशन और इसके संस्थापक स्वामी विवेकानन्द का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. इन्होंने देशवासियों को आत्मविश्वास, आत्मशक्ति और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाया.
> सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आन्दोलनों का महत्त्व
भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति में पृष्ठभूमि का निर्माण सामाजिक एवं धार्मिक पुनर्जागरण ने किया. सर्वप्रथम सुधारकों द्वारा धार्मिक क्षेत्र में सुधार कार्य किए गए. ब्रह्म समाज, आर्य समाज, थियोसोफिकल सोसायटी, प्रार्थना समाज, रामकृष्ण मिशन आदि संगठनों ने हिन्दू धर्म को नई दिशा प्रदान की हिन्दू धर्म की प्राचीन महत्ता को लोगों के सामने रखा और इसमें जो दोष आ गए थे, उन्हें दूर करने की कोशिश की. मैक्समूलर, सर विलियम जोन्स आदि महान् विद्वानों ने प्राचीन हिन्दू धर्म ग्रन्थों का अध्ययन और अंग्रेजी में अनुवाद किया तथा यूरोप के निवासियों का प्राचीन भारतीय संस्कृति से परिचय करवाया.
आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, थियोसोफिकल सोसायटी, प्रार्थना समाज आदि ने समाज-सुधार के क्षेत्र में अनेक उल्लेखनीय कार्य किया जाति प्रथा, छुआछूत, बाल-विवाह, पर्दा - प्रथा आदि दुर्गुणों के विरुद्ध आवाज उठाई तथा विधवाविवाह, स्त्री शिक्षा तथा अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को अपनाने पर बल दिया. 
बंगाल की एशियाटिक सोसायटी आदि संस्थाओं ने भारतीय इतिहास को सर्वथा नवीन रूप दिया और अज्ञात तथ्यों का शोध करके लोगों के सम्मुख प्रस्तुत किया. इसका परिणाम यह हुआ कि धर्म, दर्शन तथा संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोध कार्य प्रारम्भ हुआ.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि 19वीं सदी के सामाजिक एवं धार्मिक पुनर्जागरण ने भारत में लोगों को भारतीयता का आभास कराकर उन्हें एक राष्ट्र का नागरिक बना दिया, जिससे कि भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन संगठित रूप से चल सका.
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Sun, 08 Oct 2023 10:01:29 +0530 Jaankari Rakho
अंग्रेजी काल में शिक्षा का विकास https://m.jaankarirakho.com/432 https://m.jaankarirakho.com/432 अंग्रेजी काल में शिक्षा का विकास

> भारत में अंग्रेजी शासनकाल में प्रारम्भ से लेकर 1854 ई. तक हुए शिक्षा के विकास को समझाइए.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा प्रारम्भ में शिक्षा के प्रयास में कोई रुचि नहीं ली गई. इस समय में नीति शिक्षण संस्थाएँ ही अधिक थीं, जोकि अनुदानों के माध्यम से चलती थी. इनमें पण्डित एवं मौलवी ही अध्यापक थे और परम्परागत धार्मिक एवं व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करते थे.
इस समय में कुछ अंग्रेज मिशनरियाँ एवं विवेकशील तथा उदार अंग्रेज अधिकारियों ने भी शिक्षा के प्रसार में लिए स्कूल खोले. वारेन हेस्टिंग्स ने सर्वप्रथम 'कलकत्ता मदरसा' 1781 ई. में खोला, जिसमें अरबी एवं फारसी भाषा में शिक्षा की व्यवस्था थी. बाद में उसी के सहयोग से 1785 ई. में विलियम जोन्स ने प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए 'एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल' की स्थापना की. इस समय 1791 ई. में बनारस में हिन्दू कानून एवं दर्शन के अध्ययन के लिए संस्कृत कॉलेज की स्थापना यहाँ के रेजिडेण्ट जोनाथन डंकन ने की और इसी तरह लॉर्ड वेलेजली ने 1800 ई. में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की.
अंग्रेजी मिशनरियों; जैसे— कैरी, टाम्स, मार्समैन और वार्ड आदि ने कलकत्ता के निकट श्रीरामपुर में अंग्रेजी भाषा एवं शिक्षा के प्रचार का कार्य प्रारम्भ किया. 26 देशी भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद किया गया. 1820 ई. में डेविड हेयर ने कलकत्ता में विशप कॉलेज की स्थापना की.
अंग्रेजों के समान ही कुछ उत्साही भारतीयों; जैसे— राजा राममोहन राय, राजा राधाकान्त देव, महाराजा तेजस चन्द्र रायबहादुर, जयनारायण घोषाल आदि ने भी शिक्षा की प्रगति के प्रयास किए. राजा राममोहन राय, डेविड हेयर और सर हाइड इस्ट ने मिलकर कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज खोला, जो आगे चलकर प्रेसीडेन्सी कॉलेज बन गया.
> कम्पनी द्वारा शिक्षा के लिए किए गए प्रयास
व्यक्तिगत तथा संस्थाओं के द्वारा शिक्षा-प्रसार का प्रयास किए जाने से अंग्रेज अधिकारी भी शिक्षा के महत्व को समझने लगे तथा उन्हें अब अंग्रेज समर्थक एक पढ़े-लिखे वर्ग की आवश्यकता अनुभव होने लगी. अतः इंगलैण्ड में ग्राण्ट और विलवर फोर्स ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार पर बल दिया और 1811 ई. में लॉर्ड मिण्टो, लैंसडाउन तथा हैवेड आदि ने मिलकर भारतीय शिक्षा की बुरी दशा पर एक घोषणा पत्र निकाला तथा शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए उपाय सुझाए, जिसके कारण 1813 ई. के एक्ट में शिक्षा पर व्यय के लिए एक लाख रुपए निर्धारित किए गए. 
1813 ई. के एक्ट से कम्पनी को मिले शिक्षा के विकास के लिए एक लाख रुपयों को साहित्य के पुनरुद्धार और उन्नति के लिए और भारत के स्थानीय विद्वानों को प्रोत्साहन देने के लिए, अंग्रेजी प्रदेशों में विज्ञान के आरम्भ और उन्नति के लिए खर्च किया जाना था. इस राशि के खर्च करने से पूर्व ही भाषा के माध्यम को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया. पाश्चात्य शिक्षा के समर्थक शिक्षा प्रदान करने का माध्यम 'अँग्रेजी' रखना चाहते थे, जबकि अन्य विद्वान् प्राचीन भाषा एवं साहित्य को ही विकसित करना चाहते थे. अतः लॉर्ड मैकाले को विलियम बैंटिक के समय में इस पर सुझाव देने के लिए नियुक्त किया गया.
लॉर्ड मैकाले अंग्रेजी भाषा एवं शिक्षा का कट्टर समर्थक था. उसके अनुसार, “यूरोप के एक अच्छे पुस्तकालय की अलमारी का एक शैल्फ समस्त भारतीय और अरब के साहित्य से अधिक मूल्यवान हैं.” अतः उसने एक ऐसे वर्ग के बनाने पर बल दिया कि जो रक्त और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, परन्तु रुचि, विचार, आचरण आदि से अंग्रेज हों और इस उद्देश्य की पूर्ति केवल अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से ही हो सकती थी. वह जनसाधारण को शिक्षित करने के पक्ष में नहीं था. वह निस्पन्दन के सिद्धान्त (Theory of Filtration) में विश्वास करता था, जिसमें शिक्षा उच्च वर्ग से छन-छन करके निम्न वर्ग में पहुँचेगी. उसने अपनी यह रिपोर्ट 2 फरवरी, 1835 को गवर्नर जनरल विलियम बैंटिंक को सौंपी तथा इसे 7 मार्च, 1835 ई. को स्वीकार कर लिया गया.
इसके अनुसार, कम्पनी सरकार के भारत में यूरोपीय साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के लिए अंग्रेजी भाषा को माध्यम बनाया और स्कूलों और कॉलेजों में अंग्रेजी भाषा में शिक्षा दी जाने लगी और 1844 ई. में यह घोषणा कर दी गई कि, सरकारी नौकरी अंग्रेजी जानने वाले लोगों को ही दी जाएगी. इससे अंग्रेजी भाषा का तेजी से प्रसार होने लगा.
> 1854 ई. के शिक्षा के विकास के लिए वुड डिस्पैच पर टिप्पणी
1854 ई. में चार्ल्स वुड ने भारत में शिक्षा के लिए एक वृहत् योजना प्रस्तुत की, जिसे 'वुड डिस्पैच' या 'भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा' कहा जाता है. इसमें निम्नलिखित सुझाव दिए गए थे – 
1. कम्पनी सरकार शिक्षा, साहित्य, कला, दर्शन एवं विज्ञान का प्रसार करे.
2. ग्रामों में देशी भाषा का विकास हो, इसके लिए प्राथमिक विद्यालय और उनके ऊपर एंग्लो बर्नाक्यूलर हाईस्कूल और कॉलेज खोले जाएँ.
3. अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए अध्यापक प्रशिक्षण संस्थाएँ खोली जाएँ.
4. उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो, परन्तु देशी भाषाओं को भी प्रोत्साहन दिया जाए.
5. व्यावसायिक एवं प्राविधिक शिक्षा पर बल दिया जाए.
6. नीति शैक्षणिक संस्थाओं को बिना किसी भेदभाव के अनुदान प्रदान किए जाएँ.
7. तीनों प्रेसीडेंसी नगरों में लन्दन के समान विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएँ.
8. शिक्षा के प्रशासन के लिए एक अलग से विभाग की स्थापना की जाए.
कम्पनी की सरकार ने 'वुड डिस्पैच' के सुझावों को अमल में लाने का प्रयास किया तथा उसने प्रान्तों में शिक्षा निदेशक एवं इनकी सहायता के लिए इंस्पेक्टर नियुक्त किए तथा इन्हें लोक-शिक्षा विभाग के अधीन रखा गया. कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई. प्राथमिक विद्यालय, हाईस्कूल तथा कॉलेजों की संख्या में वृद्धि की गई तथा नीति-शिक्षण संस्थाओं को अनुदान भी दिया गया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में शिक्षा के प्रसार में वुड डिस्पैच का अत्यधिक महत्त्व है तथा इसी के सुझावों से भारत में वास्तविक अर्थों में आधुनिक शिक्षा की शुरूआत हुई.
> हण्टर आयोग ( The Hunter Comission ) पर टिप्पणी लिखिए.
गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड रिपन ने 1882 ई. में डब्ल्यू डब्ल्यू. हण्टर की अध्यक्षता में एक कमीशन नियुक्त किया, जिसका उद्देश्य 1854 ई. के बाद शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति का मूल्यांकन करना था. इस 20 सदस्यीय आयोग में 8 भारतीय सदस्य थे. इस आयोग ने निम्नलिखित सुझाव शिक्षा के क्षेत्र के लिए सरकार को दिए –
1. सरकार को धीरे-धीरे उच्च शिक्षा के संचालन के क्षेत्र से हट जाना चाहिए तथा कॉलेजों के संचालन के लिए सरकार को वित्तीय सहायता देनी चाहिए.
2. कॉलेजों में अनेक ऐच्छिक पाठ्यक्रमों का समावेश करना चाहिए.
3. सभी स्तर की शिक्षा पर नैतिक शिक्षा को अनिवार्य कर देना चाहिए.
4. छात्रों से ली जाने वाली फीस तथा छात्रवृत्ति सम्बन्धी नियम बना देने चाहिए.
5. फर्नीचर तथा पुस्तकालय की व्यवस्था स्कूलों में की जानी चाहिए.
6. सरकार को प्राथमिक शिक्षा के सुधार एवं विकास पर विशेष ध्यान देकर उसे स्थानीय भाषा और उपयोगी विषयों में पढ़ाने की व्यवस्था करनी चाहिए.
7. निजी क्षेत्र को शिक्षा के विकास के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.
8. महिला शिक्षा के विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए.
हण्टर कमीशन द्वारा सुझाए गए इन प्रस्तावों से 20वीं सदी के प्रारम्भ में शिक्षा की पर्याप्त दिशा में प्रगति हुई तथा पहले की अपेक्षा उच्च शिक्षा ग्रहण करने वालों की संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई. व्यावसायिक एवं प्राविधिक शिक्षा के क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई, लेकिन प्राथमिक शिक्षा में कोई विशेष बढ़ोत्तरी नहीं हुई.
> बुनियादी या बेसिक शिक्षा योजना : टिप्पणी
महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था से असन्तुष्ट होकर जिस शिक्षा योजना का प्रारूप राष्ट्र के समक्ष 1937 ई. में प्रस्तुत किया, उसे 'बुनियादी शिक्षा योजना' के नाम से जाना जाता है. इसमें निम्नलिखित तथ्यों का समावेश किया गया था—
1. 7 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए.
2. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिए, जिससे विद्याथी स्वावलम्बी बन सकें.
3. विद्यार्थियों की रुचि के अनुसार, व्यावसायिक शिक्षा दी जानी चाहिए.
गांधीजी की यह योजना वास्तव में बहुत ही उपयोगी थी, परन्तु इसी समय द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ हो जाने के कारण इसे अमल में नहीं लाया जा सका.
> शिक्षा की सार्जेण्ट योजना : टिप्पणी
1944 ई. में सरकार के शिक्षा सलाहकार सर जॉन सार्जेण्ट ने भारत में शिक्षा के विकास के लिए जो योजना प्रस्तुत की, उसे 'शिक्षा की सार्जेण्ट योजना' के नाम से जाना जाता है, इसमें निम्नलिखित सुझाव दिए गए -
1. प्राथमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय स्थापित किए जाएँ.
2. 6 से 11 वर्ष के बालकों के लिए अनिवार्य, निःशुल्क और व्यापक शिक्षा प्रदान की जाए.
3. इण्टरमीडिएट कक्षाओं तक की पढ़ाई हाईस्कूलों में हो और स्नातक स्तर पर तीन वर्षों का पाठ्यक्रम हो.
4. कॉलेजों में प्रवेश-सम्बन्धी नियम निर्धारित किए जाएँ और राष्ट्रीय नवयुवक मण्डल की योजना प्रारम्भ की जाए.
अंग्रेज सरकार इस योजना को क्रियान्वित नहीं कर सकी, क्योंकि इसके पूर्व ही भारत स्वतन्त्र हो गया तथा उसके बाद भारत सरकार ने नवम्बर 1948 ई. में देश में शिक्षा के विकास के लिए राधाकृष्णन आयोग का गठन किया गया.
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Sun, 08 Oct 2023 09:59:59 +0530 Jaankari Rakho
राजस्व प्रशासन, अकाल नीति एवं श्रमिक आन्दोलन https://m.jaankarirakho.com/431 https://m.jaankarirakho.com/431 राजस्व प्रशासन, अकाल नीति एवं श्रमिक आन्दोलन

> भूमि राजस्व प्रशासन
अंग्रेजों ने भारत में अपने अधिकार वाले अलग-अलग क्षेत्रों के लिए अलग-अलग व्यवस्था भू-राजस्व वसूलने के लिए की. मुख्य रूप से उन्होंने भारत में तीन प्रकार की प्रणाली का गठन किया – 
(1) जमींदारी,
(2) महालवाड़ी,
(3) रैयतवाड़ी.
इन उपरोक्त तीनों व्यवस्थाओं का अलग-अलग विवरण इस प्रकार है
(i) स्थाई जमींदारी व्यवस्था (The Permanent Jamidari Settlement )
स्थाई जमींदारी व्यवस्था को जागीरदारी, मालगुजारी आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है. इसके अन्तर्गत राज्यों की माँग सदैव के लिए निश्चित कर दी जाती थी.
इस पद्धति के अनुसार जमींदार को प्रायः भूमि का स्वामी स्वीकार कर लिया जाता था. जमींदार भूमि को बेच, रहन या दान दे सकता था. राज्य भूमि-कर देने के लिए केवल जमींदार को ही उत्तरदायी समझता था. तथा कर न देने की स्थिति में उसकी भूमि राज्य द्वारा जब्त कर ली जाती थी.
इस व्यवस्था में भूमि-कर का निर्धारण बहुत ऊँची दर पर किया गया. उदाहरणस्वरूप यह कर बंगाल में उपज का 89% था.
इस व्यवस्था का सबसे हानिकर पक्ष यह था कि इसमें सरकार की माँग को तो स्थायी कर दिया गया था, लेकिन जो कर जमींदार कृषक से वसूलता था, वह स्थायी नहीं था, जिसके कारण जमींदार कृषक से मनचाहा कर वसूलता था और कर न देने की स्थिति में उसे जमीन से बेदखल कर देता था
(ii) महालवाड़ी व्यवस्था (The Mahalwari System )
इस व्यवस्था में भू-राजस्व प्राप्त करने के लिए भूमि कर की इकाई कृषक के खेत को न बनाकर एक पूरे ग्राम अथवा महाल, जोकि जागीर का एक भाग ही होता था को बनाया गया. यह भूमि समस्त ग्राम सभा का सम्मिलित रूप होती थी, जिसको भागीदारों का समूह कहते थे और यही लोग सम्मिलित रूप से कर देने के लिए उत्तरदायी थे. यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम-समाज इस भूमि को सम्हाल लेता था. यह ग्राम-समाज ही सम्मिलित भूमि तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था. इस व्यवस्था के प्रवर्त्तक मार्टिन बर्ड थे.
इस व्यवस्था के एक भाग की भूमि का सर्वेक्षण किया जाता था, जिसमें खेती की परिधियाँ निश्चित की जाती थीं और बंजर तथा उपजाऊ भूमि स्पष्ट की जाती थी. इसके निश्चित किया जाता था. प्रत्येक ग्राम अथवा महाल के पश्चात् समस्त भाग का और फिर समस्त ग्राम का भूमि कर अधिकारियों को स्थानीय आवश्यकता के अनुसार समायोजन करने का अधिकार होता था तथा कर का निर्धारण उपज का 66% किया गया तथा यह व्यवस्था 1833 ई. से लेकर 1853 ई. तक चलती रही. 1855 ई. में लॉर्ड डलहौजी ने इस कर को घटाकर 50% करने का सुझाव दिया, परन्तु अधिकारियों ने इस नियम को स्थगित करने का सुझाव दिया और 50% कर के स्थान पर 'सम्भावित तथा शम्य' (Prospecticve and Potential) कर लिया जिसके कारण किसानों की और अधिक दयनीय स्थिति हो गयी, जिसके कारण इस व्यवस्था के क्षेत्र के लोगों ने 1857 ई. के विद्रोह में भाग लिया.
(iii) रैयतवाड़ी पद्धति (The Ryatwari System)
इस व्यवस्था में प्रत्येक पंजीकृत किसान को भूमि कर देने के लिए उत्तरदायी बनाया गया तथा उसे अपनी जमीन गिरवीं एवं बेचने का अधिकार दिया गया. इस व्यवस्था का मद्रास तथा बम्बई प्रान्तों में अलग-अलग समय पर अलगअलग तरीके से लागू किया गया, जिसका विवरण निम्नलिखित है-
(1) मद्रास की भू-व्यवस्था—मद्रास में रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू करने का श्रेय टामस मुनरो को है. इस व्यवस्था को 1825 ई. में लागू किया गया जिसमें उपज का 30% कर को निर्धारण किया गया. यह कर धन के रूप में देना पड़ता था जिसका कि वास्तविक उपज और मण्डी में प्रचलित भावों में कोई सम्बन्ध नहीं था. इस कारण से किसानों का जमकर आर्थिक शोषण हुआ और कृषक शाहूकारों (चेट्टियों) के चंगुल में फँस गये.
(2) बम्बई में भू-व्यवस्था— इस व्यवस्था में मुख्य रूप से जिले के भूमि-कर की माँग उस जिले के इतिहास तथा उस जिले के लोगों की अवस्था अर्थात् जनता के देने की शक्ति पर निर्भर थी. इसके बाद समस्त जिले की माँग को व्यक्तिगत खेतों पर बाँटा गया. प्राचीन समानता पर आधारित पद्धति के स्थान पर माँग भूमि की भू-गर्भ (Geological) अवस्था पर निर्धारित की गयी. इसके अतिरिक्त कर भू-खण्डों पर निश्चित किया गया, न कि उस कृषक की समस्त भूमि पर जिससे कोई भी कृषक जिस खेत को चाहे छोड़ सकता था और चाहे जोत सकता था. यह व्यवस्था 50 वर्षों के लिए की गयी.
इस व्यवस्था का पुनः निर्धारण 30 वर्षों बाद 1868 ई. में किया गया तथा कर को बढ़कार 90% तक कर दिया गया तथा कठोरता से वसूलने का कार्य किया गया. इससे 1875 ई. में कृषक उपद्रव हुए.
> अंग्रेजी भू-राजस्व व्यवस्था के प्रभाव
अंग्रेजी भू-राजस्व व्यवस्था में अत्यधिक कर तथा नवीन प्रशासनिक एवं न्यायिक प्रणाली के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गयी. ग्राम पंचायतों के मुख्य कार्य, भूमि व्यवस्था तथा न्यायिक कार्य समाप्त हो चुके थे तथा इस समय में पाटिल सरकार की ओर से केवल राजस्व संग्रहकर्ता ही रह गया था. इस प्रकार ग्रामों में प्राचीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गयी थी. भारतीय कुटीर-उद्योग लगभग समाप्त हो गये. इस प्रकार की भू-व्यवस्था से भूमि तथा कृषक दोनों ही गतिशील (Mobile) हो गये थे, जिसके कारण ग्रामों में साहूकार तथा अन्यत्र भूमिपति (Absente Land holders) उत्पन्न हो गये.
समाज में जमींदार तथा साहूकार जिनकी ग्राम निवासियों को अब अधिक आवश्यकता होने लगी थी, महत्वपूर्ण व्यक्ति हो गये. अब ग्रामीण श्रमिक वर्ग जिसमें छोटे छोटे किसान, मुजारे तथा भूमिहीन किसान सम्मिलित थे. उनकी संख्या बढ़ गयी. सहकारिता के स्थान पर आपसी प्रतिद्वन्द्विता तथा व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिला तथा पूँजीवाद के पूर्वाकांक्षित तत्व उत्पन्न हो गये. अब उत्पादन के नये साधनों जिनमें धन की आवश्यकता होती थी, मुद्रा अर्थव्यवस्था, कृषि का वाणिज्यीकरण, संचार अवस्था में सुधार तथा विश्व मण्डियों के साथ सम्पर्क इन सभी तत्वों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तथा भारतीय कृषि को एक नया रूप दे दिया.
> अंग्रेजों की नीति भारतीय उद्योगों के पतन के लिए किस प्रकार से उत्तरदायी थी 
भारत का आर्थिक शोषण जितना अंग्रेजों ने किया उतना अन्य किसी काल में नहीं हुआ. ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपनी प्रमुख नीति यह अपनाई कि किसी भी तरह से भारतीय उद्योग-धन्धों को चौपट कर दिया जाये तथा भारत में अंग्रेजी माल की बिक्री को बढ़ाया जाये. इसके लिए अंग्रेजों ने भारत में मुक्त व्यापार की नीति का अनुसरण किया.
इस नीति के तहत बाहर से भारत आने वाली वस्तुओं पर किसी भी प्रकार प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया. बिना चुंगी दिये ही ब्रिटिश माल भारत आता था और यहाँ के बाजारों में बेचा जाता था, लेकिन यह छूट किसी अन्य देश को नहीं थी. यूरोपीय तथा अन्य देशों में अपने देशी माल की सुरक्षा के लिए बाहर से आने वाली वस्तुओं के विरुद्ध चुंगी की दीवार खड़ी कर दी जाती थी, जिससे आयात में बाधा पहुँचती थी. बाहर से आयी हुई वस्तुएँ इससे मँहगी हो जाती थीं, परन्तु कम्पनी ने ऐसी कोई नीति नहीं अपनाई. इसका परिणाम यह हुआ कि लोहा, शीशा, कागज, वस्त्र आदि से भारतीय उद्योगों को घाटा होने लगा और धीरे-धीरे इन्हें बन्द करना पड़ा. वस्त्र उधोग पर तो 18वीं सदी के प्रारम्भ में ही कम्पनी द्वारा कुठाराघात प्रारम्भ कर दिया गया था.
1700-1820 ई. के मध्य ब्रिटेन में लोगों से अपील की गयी कि वे लोग भारतीय सूती वस्त्रों का उपयोग न करें, इसका मुख्य कारण यह था कि भारतीय सूती वस्त्र ने ब्रिटेन के मार्केट पर अपना आधिपत्य स्थापित कर रखा था, जिससे वहाँ के वस्त्र उद्योग को काफी घाटा हो रहा था. भारत से जो सूती वस्त्र इंग्लैण्ड जाता था उसे यूरोप के अन्य देशों में भेज दिया जाता था, लेकिन जब यूरोप में नेपोलियन युद्ध छिड़ा तब यह भी बन्द हो गया. इससे भारतीय वस्त्र उद्योग को काफी धक्का लगा.
औद्योगिक क्रान्ति ने इंग्लैण्ड के वस्त्र उद्योग को उन्नत बना दिया. 1783 ई के बाद इंग्लिश मशीनों द्वारा निर्मित माल बंगाल भेजा जाने लगा, इसके बाद गाँठ-के-गाँठ सूती कपड़े इंगलैण्ड से भारत आने लगे. इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में सूती वस्त्र का निर्माण बन्द हो गया तथा इसके अलावा पोत-निर्माण उद्योग को भी धक्का लगा, क्योंकि जब भारत का विदेशी व्यापार लगभग समाप्त कर दिया गया तब पोत- निर्माण की आवश्यकता ही नहीं रही.
ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेज प्रशासकों की यही नीति रही कि भारत से निर्मित वस्तुओं का निर्यात कम-से-कम हो तथा कच्चे माल जैसे रेशम, रुई, नील आदि का अधिक-सेअधिक निर्यात हो. इस प्रकार अंग्रेजों की नीति ने भारतीय उद्योगों को चौपट कर दिया.
> भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रशासन के समय पड़े अकाल एवं राहत कार्य : टिप्पणी
भारत में कम्पनी के शासनकाल के अन्तर्गत भारत के भिन्न-भिन्न भागों में कम-से-कम 12 अकाल और 4 भीषण सूखे पड़े. सबसे पहले 1769-70 ई. में बंगाल में एक भीषण अकाल पड़ा, जिसमें प्रान्त की लगभग 1/3 जनसंख्या नष्ट हो गयी तथा इस अकाल से निबटने के लिए कम्पनी द्वारा कोई भी राहत कार्य नहीं किये गये. इसके बाद 1781-82 ई. में मद्रास क्षेत्र में सूखा पड़ा. 1784 ई. में उत्तरी भारत में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गयी. 1792 ई. के दुर्भिक्ष में मद्रास में कम्पनी ने अकाल पीड़ितों की सहायता के लिए कार्य आरम्भ किये.
जब 1803 ई. में आधुनिक उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में अकाल पड़ा. इस अकाल से निपटने के लिए सरकार ने अनेक कार्य किये; जैसे—किसानों को ऋण देना, करों में छूट आदि. बनारस, इलाहाबाद, तथा फतेहगढ़ में समस्त आयातित अन्न पर सरकार की ओर से विशेष पुरस्कार तथा पैसा दिया गया. 1803 ई. जैसा ही अकाल 1837 ई. में पड़ा इसमें कम्पनी द्वारा अकालग्रस्त लोगों से सार्वजनिक कार्य करवाये गये परन्तु अधिकांश जनता को राहत पहुँचाने का कार्य धर्मार्थ संस्थाओं का ही रहा.
कम्पनी के शासनकाल में अकाल से निपटने के लिए किसी विशेष योजना का निर्माण नहीं किया गया. प्रत्येक सरकार और जिला प्रशासन भिन्न-भिन्न योजनाएँ; जैसे— अन्न का सुरक्षित भण्डार जमाखोरी पर दण्ड, अन्य आयात पुरस्कार, कुएँ इत्यादि के लिए कर्ज देना इत्यादि चलाई गयी. परन्तु ये सभी कार्य अत्यन्त ही अल्प मात्रा में किये गये.
> स्ट्रेची आयोग की सिफारिशें
बार पड़ने वाले अकालों एवं सूखे से निपटने के लिए सुझाव 1880 ई. में भारत के वायसराय लॉर्ड लिटन ने बारदेने हेतु एक आयोग का गठन सर स्ट्रेची की अध्यक्षता में किया, जिसने निम्नलिखित सिफारिशें इस सन्दर्भ में प्रस्तुत की —
1. भूख से प्रभावित होने से पूर्व ही लोगों को काम मिले और उनकी मजदूरी समय-समय पर पुनः निश्चित की जाये, ताकि लोगों को खाना मिल सके.
2. निस्सहाय और निर्धनों को भोजन देना सरकार का कर्त्तव्य है और इसके लिए भिन्न-भिन्न वर्गों की सूची तैयार की जाये. यह सहायता पके हुए भोजन, खाद्यान्न एवं पैसे के रूप में हो सकती है.
3. अकालग्रस्त क्षेत्रों में अन्न भण्डारण पर नजर रखनी चाहिए तथा निजी व्यापारियों पर विश्वास रखना चाहिए. अन्न का निर्यात् तभी रोकना चाहिए जब यह निश्चित हो जाये कि ऐसा करना समस्त देश की अन्न स्थिति ठीक रहेगी.
4. भूमि- कर तथा अल्प किरायों में कमी एवं छूट की नीति निर्धारित की गयी.
5. अकाल सहायता का व्यय प्रान्तीय सरकारों को सहना होगा. यद्यपि आवश्यकता होने पर केन्द्र सहायता भी दी जा सकेगी.
6. अत्यधिक गम्भीर सूखे की स्थिति में दुधारू पशुओं को हरे प्रदेशों में स्थानान्तरित करने की व्यवस्था होनी चाहिए.
सरकार ने इस आयोग की सिफारिशों को साधारणतया स्वीकार कर लिया तथा अकाल कोष की स्थापना के लिए राजस्व के अन्य स्रोतों का पता लगाने का प्रयत्न किया. 1883 ई. में अकाल संहिता (Famine Code) भी निश्चित की गयी और यही प्रान्तीय अकाल संहिता का आधार बनी. इस संहिता में साधारण अवस्था में अकाल से बचने एवं राहत कार्यों के आरम्भ करने सम्बन्धी सुझाव दिये गये थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि अकाल से निपटने के लिए प्रथम गम्भीर प्रयास लॉर्ड लिंटन के काल में किया गया.
> मैकडोनाल्ड आयोग की सिफारिशें
अकाल से निपटने के लिए लार्ड कर्जन ने सर एण्टोनी मैकडोनाल्ड की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया. जिसने 1901 ई में अपनी रिपोर्ट दी. इस रिपोर्ट में सहायता के स्वीकृत नियमों का संक्षिप्त में वर्णन किया गया था. इसमें नैतिक नीति के लाभों, पशु तथा बीजों के लिए शीघ्रता से धन बाँटने तथा अस्थाई कुएँ खोदने की व्यवस्था के लाभों पर बल दिया गया. इसने अकाल प्रभावित क्षेत्रों में एक दुर्भिक्ष आयुक्त की नियुक्ति का सुझाव दिया. इसने गैरसरकारी सहायता का अधिक मात्रा में उपयोग करने और बड़े-बड़े कार्यों के स्थान पर ग्राम स्तर के कार्यों को आरम्भ करने का सुझाव दिया. आयोग ने अधिक अच्छी परिवहन सुविधाओं, कृषक बैंकों, सिंचाई व्यवस्था तथा उत्तम कृषि साधनों की आवश्यकता पर भी बल दिया.
इस आयोग की मुख्य सिफारिशें स्वीकार कर ली गयीं और इसके आधार पर अकाल से निपटने के लिए कई कार्य किये गये.
> भारत के औद्योगिक विकास के लिए अंग्रेजों की नीति
अंग्रेजों ने भारत के औद्योगिक विकास में कोई भी रुचि नहीं ली, अपितु उनका प्रयास तो पहले से भारत में प्रचलित शिल्प एवं कुटीर उद्योग-धन्धों को समाप्त करने का ही रहा. उनका प्रयास यह रहा कि भारत इंग्लैण्ड के लिए एक बड़े कृषि-क्षेत्र की तरह कार्य करे.
अंग्रेजों की साम्राज्यवाद की व्यवस्था तथा शोषण की भावना के कारण उन्हें यहाँ सड़कें, रेलवे, डाक-तार, बन्दरगाहों का विकास, सिंचाई योजनाएँ, बैंक, विनिमय तथा बीमा कम्पनियाँ बनानी पड़ीं, जो अन्ततोगत्वा भारत के औद्योगिक विकास का साधन बनीं.
1846 ई. में लॉर्ड हार्डिंग ने रेलवे की योजना भारत में इसलिए बनाई कि यदि कहीं पर विद्रोह हो, तो उसे आसानी से दबाया जा सके. इसी तरह 1853 ई. में लार्ड डलहौजी ने कपास की इंग्लैण्ड में अत्यधिक आवश्यकता को देखते हुए भारत में संचार-व्यवस्था को तीव्र करने का सुझाव दिया. उसने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि व्यापारिक बढ़ोत्तरी हुई है तो इंग्लैण्ड भारत का व्यापार भी बढ़ा है. फिर भी रेलवे के बनने से भारत में बहुत से उद्योगों को बढ़ावा मिला
इस प्रकार अंग्रेजों ने बेमन से और न चाहते हुए भी भारत के औद्योगिकीकरण की शुरूआत कर दी.
अंग्रेजी पूँजीवाद ने भारतीय उद्योगों को अपना मुकाबला करने की कभी-भी अनुमति प्रदान नहीं की और जब भी आवश्यक हुआ इसके प्राकृतिक विकास को रोका. इस स्वतन्त्र एवं साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा से भारत में औद्योगिक विकास बहुत ही धीमी गति से प्रारम्भ हुआ.
भारतीय उद्योगों को कई प्रकार के अवरोधों; जैसे— ब्रिटेन द्वारा लगाये गये पक्षपाती कर और उत्पादन कर, विदेशी माल को बिना चुंगी दिये भारत आने की अनुमति और तैयार भारतीय माल पर अत्यधिक -कर.
इसके बावजूद भारतीय व्यापारी और उद्योगपति वर्ग ने अपनी दक्षता का परिचय दिया और विदेशी आन्दोलन (1905 ई.) कारण उनके उत्पादन की खपत देश में अधिक होने से उन्हें अत्यधिक सहारा मिला और वे साम्राज्यवाद के विरुद्ध अपना अस्तित्व कायम रख सके.
> भारत में श्रमिक वर्ग का उदय
प्रारम्भ में कुटीर एवं हस्तशिल्प उद्योगों का ही बोलबाला था, परन्तु अंग्रेजों के आगमन के बाद उनके संगठित शोषण के कारण भारतीय उद्योग-धन्धों का पतन हो गया. उसके बाद अंग्रेजों ने भारत में अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए उद्योगों की शुरूआत रेलवे के द्वारा जिसके लिए प्रचुर मात्रा में कोयले के उत्पादन की आवश्यकता थी, की. फलतः कोयला खान के लिए हजारों श्रमिकों को खान में लगाया गया और यही भारत का श्रमिक वर्ग का प्रारम्भिक उदय था.
1854 ई. में बम्बई में वस्त्र उद्योग को प्रारम्भ किया गया और इसी वर्ष कलकत्ता में पटसन उद्योग स्थापित किया गया. इन उद्योगों में कुछ ही वर्षों में हजारों की संख्या में श्रमिक कार्य करने लगे.
भारतीय श्रमिक वर्ग को कम मजदूरी, लम्बे कार्य के घण्टे, मिलों का अस्वस्थ वातावरण, बालकों से काम लेना तथा किसी भी प्रकार की सुविधाओं का न होना. इत्यादि सभी के शोषणों से निपटना था. इसके अलावा उपनिवेशक राज्य का दुर्व्यवहार को भी सहन करना था.
इस सारी व्यवस्थाओं के कारण भारतीय श्रमिक वर्ग भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का एक अंग बन गया और विभिन्न संगठनों के माध्यम से स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए संघर्षशील हो गया.
> भारत में श्रमिक आन्दोलन का विस्तार
लंकाशायर के कपड़ा मिल मालिकों की माँग पर भारत में एक आयोग श्रमिकों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए गठित किया गया, जिसकी सिफारिश पर 1881 ई. में प्रथम कारखाना अधिनियम पारित किया गया, जिसमें 7 से 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए काम के घण्टों का निर्धारण किया गया. इसी प्रकार अनेक अधिनियम 1891, 1909, 1911 ई. आदि में पारित किये गये, जिससे मजदूरों की दशा में कुछ सुधार हुआ. इसी बीच तिलक के जेल जाने पर भारतीय मजदूरों ने प्रथम बार राजनीतिक हड़ताल भी की. इन सभी से भारत का श्रमिक वर्ग जागरूक एवं संघर्षशील हो गया.
गांधीजी के भारतीय राजनीति में रंग-मंच पर आ जाने के बाद उन्होंने मजदूर आन्दोलन को विस्तृत आधार देने का प्रयास किया और अनुभव किया कि श्रमिकों को राष्ट्रीय व्यापार संघ में संगठित किया जाये और उन्हें भी राष्ट्रीय आन्दोलन में लाया जाये. इसी समय रूस में अक्टूबर क्रान्ति हुई और अन्तर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी दल का गठन हुआ, जिन्होंने सारे संसार के श्रमिकों का आह्वान किया कि उद्योगपतियों को उनके उद्योगों से वंचित कर दो.
प्रथम विश्व युद्ध के बाद राष्ट्र संघ (League of Nations) का अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का गठन हुआ, जिससे श्रमिकों की समस्या को अन्तर्राष्ट्रीय भूमिका मिल गयी. अतः भारत में भी इसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप 31 अक्टूबर, 1920 ई. को A.I.T.U.C. ( एटक - All India Trade Union Congress ) का गठन किया गया और लाला लाजपत राय इसके प्रथम अध्यक्ष बने. 1927 ई. तक इसमें 57 श्रमिक संघ और सम्मिलित हो गये.
1926-27 में एटक में दो गुट – 'सुधारवादी' और 'क्रान्तिकारी' बन गये. इसमें सुधारवादी चाहते थे कि वे अन्तर्राष्ट्रीय फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन से अपने आपको संलग्न कराये, जिसका मुख्य कार्यालय एम्सटर्डम में था और दूसरे दल की इच्छा थी कि वह अपने आपको लाल अन्तर्राष्ट्रीय श्रमिक संघ संलग्न कराये; जिसका संचालन मास्को से होता था.
इसके परिणामस्वरूप 1928 ई. के वर्ष में देश में अनेक श्रमिक हड़तालें आयोजित की गयीं. इनमें साम्यवादी लोगों का बहुमत स्थापित हो गया. जिसके कारण संलग्नता के प्रश्न पर एटक में 1929 ई. में विभाजन हो गया और सुधारवादियों ने एक अलग संगठन 'अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन फेडरेशन' की स्थापना की.
1929 ई. में श्रमिक विवाद अधिनियम बना, जिसमें आवश्यक सेवाओं; जैसे— डाक, तार, पानी, बिजली आदि से जुड़े श्रमिक हड़ताल नहीं कर सकते थे. इसी वर्ष 'एटक' में एक और विभाजन हुआ, जिसमें साम्यवादी लोगों ने पृथक् होकर 'लाल ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन कर लिया.
1929-33 ई. के मध्य मेरठ षड्यन्त्र केस में चले 33 श्रमिक नेताओं पर मुकदमे ने भारत के श्रमिक आन्दोलन को एक नया जीवन प्रदान किया तथा इन नेताओं के समर्थन में एक लाख से अधिक मजदूरों ने राष्ट्रव्यापी हड़ताल की.
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के समय 1930-31 में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस, लाल ट्रेड यूनियन, राष्ट्रीय फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियनिज्म मिलकर एक बने और उनकी यह एकता 1938 ई. तक कायम रही.
1937 ई. के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की जीत ने श्रमिक आन्दोलन को अत्यधिक बढ़ावा दिया और कांग्रेस सरकारों ने श्रमिकों के प्रति उदार नीति का अनुसरण किया, जिसके परिणामस्वरूप अनेक अधिनियम उनके कल्याण के लिए पारित किये गये.
इसी बीच द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ हो जाने के बाद कीमतों में वृद्धि होने लगी एवं श्रमिकों की मजदूरी यथावत् रहने के कारण श्रमिकों ने भारत में अंग्रेजों का समर्थन नहीं करने का प्रस्ताव 1940 ई. में वापस किया और अनेक आम हड़तालों का अयोजन किया.
एम. एन. राय ने एटक से अलग होकर 'इण्डियन फेडरेशन ऑफ लेबर पार्टी की स्थापना की तथा अंग्रेज सरकार के समर्थक बन गये. इसी प्रकार एटक का साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित वर्ग रूस पर आक्रमण होते ही विरोध सरकार समर्थक बन गया. राष्ट्रवादी लोग सरकार करते रहे और अनेक कष्टों को झेलते रहे.
अन्त में सरदार बल्लभभाई पटेल ने राष्ट्रवादी नेताओं के साथ मिलकर 'राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की. इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय तक श्रमिक आन्दोलन विभिन्न विचारधाराओं में बँट गया.
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Sun, 08 Oct 2023 09:58:33 +0530 Jaankari Rakho
स्थानीय प्रशासन का विकास https://m.jaankarirakho.com/430 https://m.jaankarirakho.com/430 स्थानीय प्रशासन का विकास

> भारत में स्थानीय स्वायत्त शासन का विकास
भारत में पंचायतों के माध्यम से स्थानीय स्वायत्त शासन का इतिहास अत्यन्त प्राचीनकाल से प्रारम्भ होता है अर्थात् मौर्यकाल में इसके स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं, परन्तु वर्तमान प्रणाली का स्थानीय शासन अँग्रेजों की ही देन है.
भारत में अँग्रेजों के आगमन के बाद सर्वप्रथम स्थानीय संस्थाओं का विकास प्रेसीडेन्सी नगरों; जैसे—कलकत्ता, मद्रास, बम्बई आदि में हुआ. 1687 ई. में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने मद्रास में एक नगर निगम बनाने की अनुमति दी, जिसमें अँग्रेज व भारतीय दोनों सम्मिलित थे और इन्हें एक श्रेणी मण्डल (Guildhall), एक जेल, एक विद्यालय बनाने व नगरपालिका के कर्मचारियों आदि के वेतन व नगर में अन्य सुविधाओं का विकास करने के लिए कर लगाने की अनुमति दी गयी. इस पर मेयर ने चुंगी लगाने की डायरेक्टर्स से अनुमति माँगी, ताकि नगर में सफाई व्यवस्था का प्रबन्ध समुचित ढंग से किया जा सके. 1726 ई. में मेयर के लिए एक न्यायालय की स्थापना की गयी. इसी प्रकार के न्यायालय बम्बई तथा कलकत्ता में भी खोले गये.
1793 ई. में चार्टर एक्ट में स्थानीय संस्थाओं को वैधानिक आधार प्रदान किया गया तथा प्रेसीडेंसी नगरों में गवर्नर जनरल को एक शान्ति अधिकारी (Justices of Peace) को नियुक्त करने का अधिकार मिला. यह शान्ति अधिकारी पुलिस, सफाई, सड़कों की मरम्मत आदि कार्यों के लिए 5% गृहकर के रूप में किराये अथवा भाटक (Rental Value) पर लगाता था. नगरपालिका में स्थानीय करदाताओं को ही केवल सदस्य चुनने का अधिकार दिया गया.
> 1842 ई. का बंगाल अधिनियम
इस अधिनियम द्वारा प्रेसीडेंसी नगरों के अतिरिक्त, अन्य स्थानों पर स्थानीय निकायों के विस्तार का प्रावधान किया गया तथा इसका उद्देश्य भी प्रेसीडेंसी निगमों के समान ही था. इस अधिनियम द्वारा किसी भी नगर के 2/3 लोगों द्वारा प्रार्थना करने पर संस्था या निगम का गठन किया जा सकता था. 1850 ई. में यही नियम पूरे ब्रिटिश भारत में लागू किया गया. नगरपालिकाओं को अप्रत्यक्ष कर लगाने की आज्ञा प्रदान कर दी गयी. इससे बहुत-से नगरों में नागरिक संस्थाओं का गठन कर दिया गया.
> मेयों का प्रस्ताव (1870 ई.)
1861 ई. के भारत परिषद् अधिनियम के अन्तर्गत वैधानिक विकेन्द्रीयकरण की नीति के आधार पर लॉर्ड मेयों ने 1870 ई. में वित्तीय विकेन्द्रीयकरण का प्रावधान किया, जिसके अन्तर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सड़कों आदि का प्रबन्ध प्रान्तों को दिया गया तथा इनके लिए स्थानीय कर लगाने की अनुमति प्रदान की गई, जिससे स्थानीय वित्त का जन्म हुआ. इस प्रस्ताव में यह भी सुझाव दिया गया था. स्थानीय स्वायत्त शासन को सुदृढ़ बनाया जाये और अँग्रेजों तथा भारतीयों के सहयोग से नगरपालिकाओं का विकास किया जाये.
> रिपन का प्रस्ताव (1882 ई.)
लॉर्ड रिपन के समय में उसके द्वारा लाया गया 1882 ई. का प्रस्ताव स्वायत्त शासन के विकास में उल्लेखनीय प्रस्ताव था. इस प्रस्ताव में स्थानीय बोर्डों को कुछ निश्चित कार्य एवं निश्चित आय के साधन दिये गये. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए तालुका बोर्ड एवं जिला बोर्ड का गठन किया गया. इनके अन्दर जनता द्वारा निर्वाचित सदस्यों का बहुमत होता था तथा सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम होता था. नीति निर्धारण के क्षेत्र में इन संस्थाओं को पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान करने का प्रयास इसमें किया गया. ऋण लेने, नागरिक सम्पत्ति के हस्तान्तरण, नये कर तथा एक निश्चित राशि से अधिक व्यय करने के लिए सरकार की अनुमति लेनी आवश्यक होती थी.
इस प्रस्ताव को क्रियान्वित करने के लिए 1883 ई. व 1884 ई. में कई अधिनियम पारित कर नागरिक संस्थाओं का संविधान एवं उनके कार्य क्षेत्र को परिवर्तित कर दिया गया.
> विकेन्द्रीयकरण आयोग की रिपोर्ट (1908 ई.)
स्थानीय स्वायत्त शासन के विकास के इतिहास में इस रिपोर्ट का अत्यधिक महत्व है. इसने अपनी रिपोर्ट में 'धन के अभाव' को स्थानीय संस्थाओं के प्रभावशाली कार्य न कर पाने को प्रमुख बाधा माना.
इसने जिला बोर्डों, उपजिला बोर्डों तथा ग्राम पंचायतों के विकास पर विशेष बल देते हुए उनके अधिक शक्तियाँ सौंपने की अनुशंसा की. इस हेतु दीवानी व फौजदारी मामलों के छोटे विवाद, ग्राम सफाई व शिक्षा, ईंधन, चारे आदि के लिए ग्राम पंचायतों को विशेष अधिकार देने को कहा. इस रिपोर्ट में नगरपालिकाओं पर किसी प्रकार से उनकी कर लगाने की शक्तियों पर नियन्त्रण न लगाने का सुझाव दिया तथा इनको अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किसी भी प्रकार से प्रान्तीय सरकार द्वारा वित्तीय सहायता न देने की भी सिफारिश की.
> मई 1918 का प्रस्ताव
इस प्रस्ताव में यह कहा गया था कि स्थानीय संस्थाओं और नगरपालिकाओं तथा जिला बोर्डों एवं उप-जिला बोर्डों आदि प्रतिनिधि संस्थानों में बदल दिया जाये तथा नगरपालिकाओं को और अधिक स्वतन्त्रता कर लगाने के मामले में दी जाये. ग्राम-पंचायतों का उद्देश्य ग्राम्य-जीवन का सम्पूर्ण रूप से तथा सहयोग से विकास करना चाहिए.
> द्वैध शासन के अन्तर्गत विकास
1919 ई. के भारत परिषद् अधिनियम के अनुसार स्थानीय स्वायत्त शासन का विषय हस्तान्तरित विषय हो गया, जिसका नियन्त्रण प्रान्तों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की सभा के अधीन कर दिया गया तथा अब प्रत्येक प्रान्त अपनी आव श्यकतानुसार अब स्थानीय संस्थाओं का विकास कर सकता था. अनुसूचित करों के नियमों (Scheduled Taxes Rules) के अनुसार स्थानीय करों और प्रान्तीय करों की सूची को पृथक् कर दिया गया. चूँकि इस समय वित्त आरक्षित विषय था. अतः भारतमन्त्री इस विषय में कुछ भी नहीं कर सके. साइमन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में द्वैध शासन के समय में स्थानीय स्वायत्त शासन पर विशेष उल्लेख करते हुए सुझाव दिया कि इनके ऊपर सरकार का नियन्त्रण बढ़ा देना चाहिए, क्योंकि इनको कोई विशेष उन्नति अभी तक नहीं मिली है. और द्वैध शासन के दौरान इन संस्थाओं की दशा और अधिक बिगड़ गयी है.
> 1935 ई. का भारत सरकार अधिनियम
इस अधिनियम से स्थानीय संस्थाओं के विकास को बहुत अधिक प्रोत्साहन मिला. वित्त पर प्रान्तों का नियन्त्रण होने के कारण इन संस्थाओं को अधिक धन मिलने लगा तथा इन संस्थाओं को पहले से अधिक कार्यभार दे दिया गया, परन्तु उनकी कर लगाने की शक्ति में कोई परिवर्तन विशेष रूप से नहीं किया गया तथा उनकी चुंगी, व्यापार, व्यवसाय एवं सम्पत्ति आदि पर कर लगाने की शक्ति को कम कर दिया गया. स्वतन्त्रता के समय तक यही व्यवस्था चलती रही तथा नये करों को लगाने के लिए इन संस्थाओं को प्रान्तीय सरकार की अनुमति पर निर्भर रहना पड़ता था.
स्वतन्त्रता के बाद देश के अन्दर पंचायती राज्य व्यवस्था लागू करने की बात देश के संविधान की धारा 40 में कही गयी. जिससे आज हमें हमारी नवीन पंचायती राज्य व्यवस्था देखने को मिलती है.
> कम्पनी के प्रशासन के अन्तर्गत 1773 ई. से भारत का संवैधानिक विकास
भारत में कम्पनी प्रशासन के अन्तर्गत संवैधानिक विकास का प्रारम्भ रेग्यूलेटिंग एक्ट (1773) से प्रारम्भ हुआ जिसके तथा यह एक्ट कम्पनी के कार्यों में प्रथम हस्तक्षेप था, प्रावधान निम्नलिखित थे—
1. बंगाल के गवर्नर को गवर्नर जनरल बनाकर मद्रास तथा बम्बई की प्रेसीडेन्सियों को इसके अधीन कर दिया गया. 
2. गवर्नर-जनरल की सहायता के लिए चार सदस्यों की एक समिति का गठन किया गया.
3. गवर्नर जनरल को एक निर्णायक वोट देने का अधिकार दिया गया तथा सभी निर्णय बहुमत के आधार पर लेने की व्यवस्था की गयी. इस प्रकार एक केन्द्रीय कार्यकारिणी का विकास हुआ जिसका आगे क्रमागत विकास होता गया.
4. इस एक्ट के द्वारा कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित करने की व्यवस्था की गई जिसमें एक प्रधान न्यायाधीश तथा तीन सहायक न्यायाधीश थे.
5. इस एक्ट में ब्रिटिश भारत के लिए गवर्नर जनरल तथा उसकी कौंसिल (परिषद्) को कानून बनाने का अधिकार दे दिया गया. इस प्रकार केन्द्रीय व्यवस्थापिका का भी प्रादुर्भाव यहीं से होता है.
6. इस एक्ट से कम्पनी के संगठन में भी न्यूनाधिक परिवर्तन किया गया. अभी तक कम्पनी के उन सभी हिस्सेदारों को कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के चुनाव में भाग लेने का अधिकार था, जिनका कम-से-कम 500 पौण्ड का हिस्सा था, परन्तु अब केवल उन्हीं को मत देने का अधिकार रह गया, जिनका हिस्सा कम-से-कम 1000 पौण्ड का था.
7. इस एक्ट से पूर्व डायरेक्टरों का चुनाव प्रतिवर्ष होता था, परन्तु अब उनका कार्यकाल 4 वर्ष के लिए कर दिया गया.
8. इस एक्ट के द्वारा कम्पनी के डायरेक्टरों को यह आदेश दिया गया कि वे प्रतिवर्ष भारतीय राजस्व सम्बन्धी सभी पत्र-व्यवहार इंग्लैण्ड के राजस्व विभाग के सम्मुख उपस्थित करें तथा सैनिक और शासन सम्बन्धी विषयों की सूचना एक सरकारी मन्त्री को दिया करें.
इस प्रकार इंग्लैण्ड की सरकार के कम्पनी के संवैधानिक विकास में 1773 ई. के रेग्यूलेटिंग एक्ट का विशेष महत्व है, क्योंकि इससे इंग्लैण्ड की सरकार ने कम्पनी के राजस्व सेना तथा शासन सभी पर अपना नियन्त्रण स्थापित कर लिया.
> पिट्स इण्डिया ऐक्ट (1784 ई.)
कम्पनी के संवैधानिक विकास के क्रम में दूसरे कदम के रूप में सन् 1784 ई. में पिट्स इण्डिया एक्ट को पारित किया गया, जिसके प्रावधान निम्नलिखित थे –
1. इस एक्ट के द्वारा कम्पनी के शासन पर नियन्त्रण रखने के लिए इंग्लैण्ड में 6 सदस्यों की एक समिति बनाई गई, जिसका नाम ‘बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल' रखा गया तथा इसके सदस्यों की नियुक्ति सम्राट द्वारा किये जाने का प्रावधान बनाया गया. इन सदस्यों का पद अवैतनिक था. बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल की आज्ञा का पालन बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के लिए अनिवार्य कर दिया गया.
2. इस ऐक्ट के द्वारा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के तीन सदस्यों की एक गुप्त समिति बना दी गयी, जिसके द्वारा भारत में गोपनीय आज्ञाओं के भेजने की व्यवस्था की गयी.
3. इस ऐक्ट के द्वारा गवर्नर-जनरल की परिषद् के सदस्यों की संख्या को घटाकर चार से तीन कर दिया गया, जिसमें एक सदस्य प्रधान सेनापति को बनाया गया.
4. बम्बई तथा मद्रास की प्रत्येक प्रेसीडेंसी के लिए गवर्नर 'को मिलाकर तीन सदस्यों की एक कौसिल बना दी गयी, जिनमें से एक प्रधान सेनापति होगा. सन्धि, युद्ध तथा राजस्व के मामलों में बम्बई तथा मद्रास के गवर्नर, भारत के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिये गये.
5. इस ऐक्ट के द्वारा यह भी निश्चित किया गया कि बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की स्वीकृति के बिना गवर्नर जनरल किसी के साथ सन्धि या युद्ध नहीं कर सकेगा.
पिट्स इण्डिया ऐक्ट का कम्पनी के संवैधानिक विकास में बहुत बड़ा महत्व है. इसके द्वारा रेग्यूलेटिंग ऐक्ट के अधिकांश दोषों को दूर कर दिया गया है, जो शासनव्यवस्था इस ऐक्ट द्वारा लागू की गयी, वह न्यूनाधिक रूप से कम्पनी के जीवनकाल के अन्त तक अर्थात् 1857 ई. तक चलती रही.
> विभिन्न चार्टर ऐक्टों द्वारा किये गये संशोधन
ईस्ट इण्डिया कम्पनी को भारत में व्यापार करने के लिए इंग्लैण्ड की सरकार से आज्ञा पत्र लेना पड़ता था, जो चार्टर कहलाता था. 1773 ई. के उपरान्त प्रत्येक 20वें वर्ष यह चार्टर तब तक जारी होता रहा, जब तक कि भारत में कम्पनी का शासन समाप्त न हो गया. जब ये चार्टर पारित किये जाते थे, तब कुछ संवैधानिक परिवर्तन भी कर दिये जाते थे. जिनका विवरण निम्नलिखित है-
> (I) 1793 ई. का प्रथम चार्टर ऐक्ट
इसके द्वारा किये गये प्रावधान निम्नलिखित थे-
1. इस ऐक्ट द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को अगले 20 वर्षों तक भारत में और व्यापार करने का अधिकार दिया गया.
2. ‘बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल' के सदस्यों का पद अभी तक अवैतनिक था, परन्तु इस एक्ट से उनका पद वैतनिक बना दिया गया तथा उनका वेतन भारत के कोष से देना तय किया गया.
3. इस ऐक्ट के द्वारा 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' को यह आदेश दिया गया कि कम्पनी की आय और व्यय का विवरण वह प्रति वर्ष पार्लियामेण्ट के सम्मुख उपस्थित करे.
4. इस ऐक्ट के द्वारा 'बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल' को यह अधिकार दिया गया कि वह सम्राट की सेना को भारत में भेज सके तथा उसका व्यय भारतीय खजाने से करने की व्यवस्था कर सके.
5. भारत के गवर्नर जनरल की तरह ही बम्बई तथा मद्रास के गवर्नरों को इस ऐक्ट द्वारा यह अधिकार मिला कि वे भी अब अपनी कौंसिल के बहुमत के निर्णय को रद्द कर सकते थे.
> (II) 1813 ई. का चार्टर एक्ट
इस ऐक्ट के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित थे—
1. इस ऐक्ट के द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को एक बार फिर बीस वर्षों के लिए व्यापार का अधिकार दिया गया, परन्तु उसके एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया तथा समस्त ब्रिटिश व्यापारिक कम्पनियों को भारत से व्यापार करने की अनुमति प्रदान की गई.
2. अब कम्पनी अपने 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' के सदस्यों की नियुक्ति सम्राट तथा बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल के सदस्यों की अनुमति से ही कर सकती थी.
3. भारत में शिक्षा का प्रसार करने के लिए एक लाख रुपया मंजूर किया गया.
4. कम्पनी में नौकरी में प्रवेश करने से पूर्व कर्मचारियों के लिए ट्रेनिंग एवं शिक्षा की व्यवस्था की गयी.
5. ईसाई पादरियों को भारत में आकर अपने धर्म का प्रचार करने की छूट दी गई और कलकत्ता में एक विशप की नियुक्ति करने का प्रावधान इसमें किया गया था.
> (III) 1833 ई. का चार्टर एक्ट
इसमें निम्नलिखित तथ्यों को सम्मिलित किया गया है-
1. इस ऐक्ट के द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी को एक बार पुनः 20 वर्षों के लिए भारत से व्यापार की अनुमति दी गयी, परन्तु भारत व चीन के साथ उसके चाय के व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया.
2. इस एक्ट के द्वारा गवर्नर जनरल की परिषद् में एक ॐ चौथा सदस्य विधि सदस्य जोड़ दिया गया.
3. कानून बनाने के इस ऐक्ट के द्वारा प्रान्तों के गवर्नरों के अधिकार को समाप्त कर दिया गया.
4. इसके द्वारा आगरा को एक नया प्रान्त बनाया गया.
5. इस ऐक्ट की सर्वाधिक उल्लेखनीय बात यह थी कि रूप-रंग, वंश, जाति-भेद के बिना भारतीयों के लिए भी ऊँची नौकरियों का प्रावधान किया गया था.
> (IV) 1853 ई. का चार्टर ऐक्ट
यह कम्पनी का अन्तिम चार्टर एक्ट था, क्योंकि 1857 ई. के बाद कम्पनी का अस्तित्व समाप्त हो गया. इसके प्रावधान निम्नलिखित थे – 
1. इस ऐक्ट के द्वारा ‘कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' की सदस्य संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गयी तथा इसमें से 6 की नियुक्ति सम्राट द्वारा होनी थी.
2. कम्पनी में नौकरी प्राप्त करने हेतु प्रतियोगिता परीक्षा की गयी.
3. कम्पनी के लिए एक लेफ्टिनेण्ट गवर्नर की व्यवस्था की गयी तथा गवर्नर-जनरल की परिषद् के विधि सदस्य को स्थायी कर दिया गया. इसके साथ ही उसकी परिषद् में कानून बनाने के लिए 6 अतिरिक्त सदस्य जोड़ दिये गये.
1858 ई. में जब कम्पनी का अस्तित्व समाप्त हो गया, तब भारत में ब्रिटेन के सम्राट और उसकी पार्लियामेण्ट ही विधि-निर्माण की सर्वोच्च संस्था हो गयी तथा उसके द्वारा पारित नियम भारत-परिषद् अधिनियम के अन्तर्गत आने लगे.
> 1909 ई. का अधिनियम अथवा मार्ले-मिण्टो सुधारों का आलोचनात्मक मूल्यांकन
> 1909 ई. के भारत परिषद् अधिनियम के पारित होने की पृष्ठभूमि
1909 ई. से पूर्व भारत में ऐसी राजनीतिक स्थितियाँ उत्पन्न हो गयी थीं कि अँग्रेजों को यह अधिनियम पारित करना पड़ा. लॉर्ड कर्जन की स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश नीति ने बंगाल, पंजाब आदि राज्यों में आतंकवादी आन्दोलन को तीव्र कर दिया. साथ ही तिलक गोखले एवं लाला लाजपतराय जैसे नेताओं को इस बात का दुःख था कि व्यवस्थापिका सभा और प्रान्तीय सभाओं में गैर-सरकारी सदस्यों की संख्या बहुत ही सीमित है. अतः अँग्रेजों को यह विश्वास हुआ कि इस प्रकार के विरोध को केवल दमन-चक्र से समाप्त नहीं किया जा सकता है, इसके लिए कुछ संवैधानिक सुधारों का होना आवश्यक है.
अतः इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए 1909 ई. का अधिनियम ब्रिटिश संसद द्वारा पास किया गया.
> 1909 ई. के अधिनियम की प्रमुख धाराएँ -
इस अधिनियम के द्वारा व्यवस्थापिका सभा एवं प्रान्तीय परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या में वृद्धि की गयी. इनमें से अधिकांश सदस्यों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता था. केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रान्तीय परिषदों, जमींदारों एवं चैम्बर ऑफ कॉमर्स द्वारा होता था. उदाहरणस्वरूप——केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में कुल 68 सदस्य थे; जिनमें से 36 सरकारी सदस्य थे व 5 मनोनीत सदस्य होते थे, मनोनीत सदस्य सरकारी सदस्य नहीं होते थे. शेष 27 सदस्यों का निर्वाचन किया जाता था. इनमें से भी 6 सदस्य जमींदारों के तथा 2 सदस्य चैम्बर ऑफ कॉमर्स के होते थे. निर्वाचन का अधिकार प्रान्तीय परिषदों के लिए यूनिवर्सिटी, नगरपालिकाओं तथा जिला परिषदों के सदस्यों को दिया गया. इन प्रान्तीय परिषदों में निर्वाचित और गैरसरकारी सदस्यों का बहुमत था तथा कुछ गैर-सरकारी सदस्यों को गवर्नर द्वारा मनोनीत किया जाता था.
इस अधिनियम में केन्द्रीय व्यवस्थापिका तथा प्रान्तीय परिषदों में सभी मुसलमानों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्रों का गठन किया गया था. इस कार्य को अँग्रेजों ने मुसलमानों की सुरक्षा बताया, क्योंकि वे देश में अल्पसंख्यक थे. इस व्यवस्था ने देश की साम्प्रदायिकता की भावना को बढ़ाने में अत्यधिक योगदान किया.
मुसलमानों को इस अधिनियम द्वारा पृथक् से निर्वाचित क्षेत्र देने के कारण अन्य समुदायों के सदस्य; जैसे— सिख, ईसाई आदि भी अपने लिए ऐसे पृथक् निर्वाचन क्षेत्रों की माँग करने लगे.
> सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि
इस अधिनियम के द्वारा केन्द्रीय एवं प्रान्तीय परिषदों के सदस्यों के अधिकारों में वृद्धि की गयी केन्द्रीय व्यवस्थापिका परिषद् में राजस्व विधेयक पर अब सदस्य वाद-विवाद कर सकते थे, परन्तु अभी उन्हें मत देने का अधिकार नहीं था. भारतीय सेना, विदेश नीति एवं देशी राज्यों के मामलों में सदस्यों को प्रस्ताव लाने, वाद-विवाद एवं प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया था, परन्तु साथ में गवर्नर को यह भी अधिकार दिया गया कि वह किसी प्रस्ताव को अथवा उसके किसी अंश को बिना किसी कारण बताये रद्द कर सकता था.
> मूल्यांकन
इस अधिनियम के द्वारा राष्ट्रवादियों की आकांक्षाएँ पूरी नहीं हो सकीं, क्योंकि उनकी माँग उत्तरदायी सरकार की थी, जबकि 1892 ई. में परिषद् अधिनियम को दूसरे रूप में अँग्रेजों ने इसे 1909 ई. में प्रस्तुत कर दिया था. इस अधिनियम द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से निर्वाचन की व्यवस्था होने के कारण सदस्यों का आम जनता से कोई सम्पर्क नहीं था.
इस अधिनियम की सर्वाधिक उल्लेखनीय बात पृथक् से साम्प्रदायिक आधार पर मुसलमानों के लिए निर्वाचन की व्यवस्था थी, जिससे भारत में साम्प्रदायिकता का विकास हुआ. अन्य वर्गों ने भी इस व्यवस्था की अपने लिए की. केन्द्रीय व्यवस्थापिका परिषद् में सरकारी सदस्यों के बहुमत को बनाये रखा गया था, इससे भारतीय शिक्षित वर्ग में अत्यधिक असन्तोष था. इसी तरह से प्रान्तीय परिषदों में मनोनीत एवं सरकारी सदस्य तथा कुछ अन्य सदस्य मिलकर बहुमत प्राप्त कर लेते थे.
इस अधिनियम की एक प्रमुख कमी यह थी कि इसमें स्त्रियों के लिए कोई स्थान नहीं था. इस अधिनियम का स्वरूप संसदात्मक होने के उपरान्त भी इसमें उत्तरदायित्व का अभाव था. इस अधिनियम द्वारा जनता को केवल 'छाया मात्र' ही सुधार प्राप्त हुए वास्तविकता में कुछ भी नहीं मिला. इस अधिनियम द्वारा विधानमण्डल तथा कार्यकारिणी के मध्य कटुता बढ़ी तथा अँग्रेजी सरकार एवं भारतीयों के मध्य और अधिक वैमनस्य उत्पन्न हो गया.
> मोण्टेस्क्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों (1919 ई.) की प्रमुख विशेषताएँ
1909 ई. में भारत परिषद् अधिनियम ने भारत के राष्ट्रवादी तत्वों की आकांक्षाओं को जब पूरा न कर सका तथा मुसलमानों ने अँग्रेजों की कूटनीति को समझ लिया तब काँग्रेस एवं मुस्लिम लीग दोनों एक-दूसरे के अधिक निकट आ गये और 1916 ई. के लखनऊ के समझौते के तहत दोनों संगठनों ने संवैधानिक सुधारों की माँग की. ऐसी परिस्थिति में भारतीय नेताओं को सन्तुष्ट करने के लिए 20 अगस्त, 1917 को मोण्टेस्क्यू ने यह घोषणा की कि, “भारतवासियों को देश के शासन में भाग लेने का अधिकाधिक अवसर प्रदान किया जायेगा और स्वायत्तशासी संस्थाओं को और अधिक शक्तिशाली बनाया जायेगा."
अपनी घोषणा को क्रियान्वित करने के उद्देश्य से भारत सचिव मोण्टेस्क्यू 10 नवम्बर, 1917 ई. को भारत आये तथा लार्ड चेम्सफोर्ड, काँग्रेस, मुस्लिम लीग व कुछ अन्य नेताओं से विचार-विमर्श कर उन्होंने मोण्टेस्क्यू-चेम्सफोर्ड योजना बनाई, जो 1919 ई. के अधिनियम का प्रमुख आधार बनी.
1919 के भारत सरकार अधिनियम या मोण्टेस्क्यूचेम्सफोर्ड सुधारों की प्रमुख विशेषताएँ –
1. गृह सरकार में परिवर्तन – इंग्लैण्ड में भारत सचिव के अधिकारों में परिवर्तन कर दिया गया तथा अब हस्तान्तरित विषयों पर से उसका नियन्त्रण हटा दिया गया. केन्द्रीय तथा रक्षित विषयों पर उसका नियन्त्रण बना रहा.
2. भारत के हितों को इंग्लैण्ड तथा अन्य स्थानों पर रक्षा करने के लिए हाई कमिश्नर के पद का सृजन किया गया. इसकी नियुक्ति गवर्नर अपनी परिषद् से राय लेकर करता था.
3. गवर्नर जनरल की केन्द्रीय कार्यकारिणी परिषद् में कोई भी भारतीय वकील जिसने 10 वर्ष तक वकालत की हो, अब कानून सदस्य बन सकता था तथा अन्य सदस्यों के लिए कोई योग्यता का निर्धारण नहीं किया गया. इस परिषद् में. भारतीय सदस्यों की संख्या एक से बढ़ाकर तीन कर दी गयी.
4. केन्द्र सरकार का इस अधिनियम द्वारा प्रान्तों पर नियन्त्रण कम कर दिया गया तथा सभी विषयों को केन्द्रीय सूची तथा प्रान्तीय सूची नामक दो भागों में बाँट दिया गया तथा प्रान्तों को पर्याप्त स्वतन्त्रता दे दी गयी. उसके राजस्व के साधन तय कर दिये गये.
5. इस अधिनियम के अनुसार केंन्द्रीय व्यवस्थापिक सभा को दो भागों में बाँट दिया गया – (i) राज्य परिषद्, (ii) केन्द्रीय लेजिस्लेटिव असेम्बली.
6. केन्द्रीय धारा सभी के सदस्यों को प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुनने की व्यवस्था की गयी.
7. इस अधिनियम के द्वारा प्रान्तों में द्वैध शासन की स्थापना की गई, जिसमें कुछ विषय रक्षित तथा कुछ हस्तान्तरित थे. हस्तान्तरित विषयों का प्रबन्ध गवर्नर अपने मन्त्रियों की सहायता से करता था, जबकि रक्षित विषयों का प्रबन्ध गवर्नर अपनी परिषद् की सहायता से करता था.
8. इस अधिनियम के अनुसार प्रान्तीय विधानसभा का गठन कर उसमें अनके सुधार किये गये प्रान्तीय विधानसभा प्रान्त की सुव्यवस्था तथा सुशासन के लिए प्रान्तीय सूची के सभी विषयों पर कानून बना सकती थी, किन्तु कुछ विषयों पर गवर्नर जनरल की अनुमति प्राप्त होने पर ही विधेयक विधानसभा में उपस्थित कर सकती थी तथा ग्रह कानून तभी बन सकता था, जब उसे गवर्नर जनरल द्वारा स्वीकृत कर दिया जाता.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि यह प्रथम अधिनियम था, जिसमें उत्तरदायी शासन की व्यवस्था की गयी, परन्तु साथ ही इसमें गवर्नर जनरल को अधिक अधिकार देकर उत्तरदायित्व को सीमित कर दिया गया. यही कारण था कि यह अधिनियम अपने उद्देश्यों में असफल रहा. 
> 1935 ई. के भारत सरकार अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ
इस अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—
1. इस अधिनियम में ब्रिटिश पार्लियामेण्ट ही सर्वोपरि संस्था रही तथा इस अधिनियम में केन्द्रीय या प्रान्तीय विधानसभा कोई परिवर्तन नहीं कर सकती थी.
2. इस अधिनियम के अनुसार इण्डिया कौंसिल को समाप्त कर भारत सचिव की सहायता के लिए कुछ परामर्शदाता नियुक्त कर दिये गये, जिनकी संख्या 3 से 6 थी.
3. इस अधिनियम के अनुसार ब्रिटिश प्रान्तों तथा देशी राज्यों के लिए संघ शासन स्थापित करने की व्यवस्था की गई. देशी राज्य इस संघ में सम्मिलित होने के लिए बाध्य नहीं थे. वे अपनी स्वेच्छा से इसमें शामिल हो सकते थे.
4. इस अधिनियम के अनुसार संघ तथा प्रान्तों के मध्य विषयों का बँटवारा कर दिया गया तथा विषयों की तीन सूचियाँ बनाई गईं —
(1) संघ सूची–59 विषय,
(2) प्रान्तीय सूची – 54 विषय, 
(3) समवर्ती सूची 23 विषय रखे गये. केन्द्रीय विषयों को दो भागों में बाँटा गया —
(1) रक्षित तथा (2) हस्तान्तरित.
इसके साथ ही केन्द्र में दो सदन बनाये गये – 
(1) केन्द्रीय विधानसभा, (2) राज्य परिषद्.
5. इस अधिनियम के अनुसार एक संघीय न्यायालय की स्थापना की गई, जो मुकदमों की सुनवाई, अपील पर निर्णय तथा परामर्श देने का कार्य करता था. इसके साथ ही 1935 ई. के अधिनियम की व्याख्या करने वाला अन्तिम प्राधिकारी था. 
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को उत्तरदायी शासन सौंपने का गम्भीर प्रयास किया, परन्तु गवर्नर-जनरल को विशेषाधिकार देकर अपनी निरंकुशता का प्रतिरूप भी कायम रखा था.
इस अधिनियम में संघीय विधानसभा तथा प्रान्तीय विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों को इस संविधान में संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं दिया गया, इसलिए इसे हम अनैतिक और अलोकतान्त्रिक कह सकते हैं. इसके साथ ही देशी राज्यों को संघ में न रहने की छूट के कारण संघीय विधानसभा का गठन ही न हो सका था.
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Sun, 08 Oct 2023 09:51:47 +0530 Jaankari Rakho
अंग्रेजों के विदेशी सम्बन्ध तथा सीमान्त नीति https://m.jaankarirakho.com/429 https://m.jaankarirakho.com/429 अंग्रेजों के विदेशी सम्बन्ध तथा सीमान्त नीति

आंग्ल-अफगान सम्बन्ध
> प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध के कारण तथा परिणाम 
अँग्रेजों ने अफगानिस्तान में अपना प्रभाव व नियन्त्रण स्थापित करने के उद्देश्य से उसके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप कर युद्ध को निमन्त्रण दिया, जिसके परिणामस्वरूप दोनों पक्षों में हुए प्रथम युद्ध में अँग्रेजों को भारी पराजय का मुँह देखना पड़ा. इस युद्ध के प्रारम्भ होने के निम्नलिखित कारण थे – 
1. अफगानिस्तान की आन्तरिक स्थिति ने अंग्रेजों को अफगानिस्तान में हस्तक्षेप करने का अवसर प्रदान किया. 1793 ई. में तैमूर की मृत्यु के कारण वहाँ गद्दी पर अधिकार के प्रश्न को लेकर उसके दावेदारों के कारण गृहयुद्ध प्रारम्भ हो गया. अन्त में जमानशाह ने सफलता पायी और उसने भारत विजय करने के प्रयास में अवध और मैसूर के साथ पत्र व्यवहार किया, लेकिन वेलेजली ने उसे ईरान के साथ संघर्ष में उलझा दिया. इसी बीच उसे अपदस्थ कर महमूदशाह ने सत्ता हथिया ली. उसके बाद शाहशुजा वहाँ का शासक बना, जिसे हटाकर दोस्त मुहम्मद शासक बन गया. अब शाहशुजा ने दोस्त मुहम्मद से सत्ता प्राप्ति के लिए प्रयास करना प्रारम्भ कर दिया, जिसके चलते अँग्रेजों ने अफगानिस्तान में हस्तक्षेप किया.
2. रूस निरन्तर मध्य एशियाई क्षेत्रों व अफगानिस्तान की ओर अपना प्रभाव बढ़ाता जा रहा था. अतः रूस और ब्रिटिश साम्राज्य के मध्य अँग्रेज अफगानिस्तान को सुरक्षित राज्य बनाना चाहते थे, इसके साथ ही उनका उद्देश्य अफगानिस्तान के रास्ते मध्य एशियाई व्यापार पर नियन्त्रण भी स्थापित करना था.
3. रूस ने ईरान से 'गुलिस्तां की सन्धि' (1813 ई.) कर उस पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था. अब वह अफगानिस्तान की ओर बढ़ना चाहता था, क्योंकि ईरान की सीमाएँ अफगानिस्तान से सटी हुई थीं. अतः अँग्रेजों ने रूस के प्रभाव को अफगानिस्तान में न पड़ने देने के लिए युद्ध किया.
4. अफगानिस्तान के प्रति अँग्रेज गवर्नर लॉर्ड ऑकलैण्ड ने ‘अग्रगामी नीति' का अनुसरण किया, जिसका उद्देश्य अफगानिस्तान को हमेशा-हमेशा के लिए असंगठित एवं कमजोर कर देना था. इस सन्दर्भ में उसने अफगान शासक से अपने सम्बन्ध प्रगाढ़ करने के लिए 'बर्न्स' को अपना दूत बनाकर भेजा, जिसे असफलता मिलने पर ऑकलैण्ड ने अपदस्थ शासक शाहशुजा को अफगानिस्तान में ब्रिटिश सेना की मदद से शासक बनाने फैसला किया. शाहशुजा ने अँग्रेजों से यह वादा कर रखा था कि वह अँग्रेजों की अनुमति के बगैर किसी विदेशी शक्ति से सम्बन्ध स्थापित नहीं करेगा.
अब ऑकलैण्ड ने शाहशुजा को अँग्रेज सेना के साथ अफगानिस्तान भेजा, जिसने दोस्त मुहम्मद को परास्त कर काबुल पर अधिकार कर लिया, परन्तु अँग्रेज अधिकारियों के दुर्व्यव्यवहार से अफगान नाराज हो गए तथा उन्होंने 1841 ई. में बर्न्स और उसके भाई की हत्या कर दी तथा दोस्त मुहम्मद के बेटे अकबर को विद्रोहियों ने अपना नेता बना लिया, जिसने अँग्रेजों को हराकर उन्हें अपमानजनक सन्धि करने पर विवश कर दिया. इस सन्धि के अनुसार, दोस्त मुहम्मद को वापस लाकर शासक बनाना था और अँग्रेजों को अफगानिस्तान से अपनी सेना हटा लेनी थी. जनवरी, 1842 ई. में सन्धि के अनुसार जब अँग्रेज सेना वापस लौट रही थी, तब उस पर विद्रोहियों ने आक्रमण कर लगभग 16,000 फौज के सदस्यों को मार दिया तथा केवल एक व्यक्ति ब्राइडन ही जीवित लौट सका. अब ऑकलैण्ड ने इस घोर पराजय का बदला लेने के लिए एक बड़ी सेना भेजी, परन्तु उसे शीघ्र ही वापस बुला लिया गया, जिसके कारण यह सेना कोई कार्यवाही न कर सकी.
ऑकलैण्ड के बाद एलनबरो गवर्नर बनकर भारत आया और उसने 1842 ई. में जनरल पोलक और नॉट के नेतृत्व में अफगानिस्तान में सेना भेजी, जिसने विद्रोहियों का बड़ी ही कठोरता से दमन किया और काबुल पर अधिकार कर लिया, लेकिन इसी के बीच शाहशुजा की हत्या किए जाने के कारण दोस्त मुहम्मद को पुनः गद्दी पर बैठा दिया और अँग्रेज सेना वापस लौट गई. इसके बाद गवर्नर जनरल ने यह घोषणा की कि, अफगानिस्तान में वह ऐसे शासन की स्वीकृति देगा, जैसाकि अफगानी चाहेंगे. उसकी इस घोषणा से यह युद्ध समाप्त हो गया.
परिणाम — इस युद्ध के परिणाम अँग्रेजों के लिए बड़े ही निराशाजनक थे, क्योंकि उनकी एक बड़ी फौज का इस संसार से नामोनिशान तक मिट गया. इसके साथ ही इस युद्ध में अँग्रेजों को बहुत बड़ी आर्थिक क्षति हुई. इस युद्ध में अँग्रेजों द्वारा डेढ़ करोड़ रुपया फूँक देने के बाद भी कोई परिणाम हासिल न हो सका. अन्त में अँग्रेजों को दोस्त मुहम्मद को ही शासक स्वीकार करना पड़ा तथा साथ में यह भी कि जैसा अफगानी शासक चाहेंगे, वैसा शासन उन्हें स्वीकार होगा. इस युद्ध को अनेक इतिहासकारों ने इसे 'मूर्खतापूर्ण युद्ध' की संज्ञा दी है. रॉबर्ट्स के मतानुसार, “यह युद्ध भारत में अँग्रेजों द्वारा लड़े गए युद्धों में राजनीतिक दृष्टि से सर्वाधिक विनाशकारी था तथा नैतिक आधार पर भारत में अँग्रेजों द्वारा लड़े गए युद्धों में सबसे कम न्यायोचित था. " इस प्रकार प्रथम अँग्रेज अफगान युद्ध में अँग्रेजों को सम्भवतः सबसे बड़ी पराजय दी जिसका कोई परिणाम नहीं निकला.
> अफगानिस्तान के सन्दर्भ में कुशल अकर्मण्यता की नीति
प्रथम अँग्रेज-अफगान युद्ध के बाद जब दोस्त मुहम्मद अफगानिस्तान का शासक बना, तब से लेकर 1876 ई. तक लॉर्ड लिंटन के वायसराय बनने से पूर्व अफगानिस्तान के प्रति अँग्रेजों द्वारा जिस नीति अनुसरण किया गया उसे 'कुशल अकर्मण्यता की नीति' (Policy of Masterly Inactivity) कहा जाता है. इस नीति की प्रमुख बात यह थी कि, बिना किसी विशेष बात के अँग्रेज अफगानिस्तान के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे तथा इससे मित्रवत् सम्बन्ध बनाने के प्रयास करेंगे.
कुशल अकर्मण्यता की नीति को लॉर्ड एलनबरो ने प्रारम्भ किया था, जिसका पालन लोरेंस, मेयो और नार्थ ब्रुक के समय तक होता रहा.
लोरेंस की नीति – इसने अफगानिस्तान के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने का निर्णय किया, परन्तु उसने यह भी कहा कि, यदि कोई अफगान शासक अपनी स्थिति को सुदृढ़ एवं मजबूत बनाने के लिए अँग्रेजों से सहायता की माँग करेगा तो वह उसे पूरी सहायता भी देगा. 1863 ई. में दोस्त मुहम्मद की मृत्यु के बाद उठ खड़े उत्तराधिकार के संघर्ष में शेरअली ने अपने विद्रोहियों को परास्त कर जब सत्ता प्राप्त कर ली, तब 1864 ई. में लोरेंस ने उसे मान्यता प्रदान कर दी, परन्तु इससे अफगानों के संघर्ष का अन्त नहीं हुआ और 1866 ई. में अफजल को काबुल का एवं शेरअली को हेरात का शासक स्वीकार कर लिया गया, फिर इसी समय शेरअली ने अफगानिस्तान पर पूरा अधिकार कर लिया. लोरेंस ने इसे भी अपनी मान्यता प्रदान कर दी. उसने सभी शासकों को इसी प्रकार अपनी मान्यता देकर ब्रिटिश सेना को अनावश्यक युद्धों में फँसने से बचाया तथा रूस को अफगानिस्तान में प्रभाव जमाने का अवसर नहीं दिया.
ठीक इसी नीति का अनुसरण मेयो और नार्थ बुक ने भी किया, जिसके कारण अफगानों व अँग्रेजों के मध्य शान्ति बनी रही. वास्तव में इस नीति का अनुसरण करना उचित ही था, क्योंकि अफगान लोग स्वतन्त्रता प्रेमी थे तथा वे किसी का दबाव स्वीकार नहीं कर सकते थे. इस कारण से उनसे व्यर्थ में उलझना इन गवर्नरों ने उचित नहीं समझा.
> द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध के कारण व परिणाम
1876 ई. में लॉर्ड लिंटन भारत में वायसराय बनकर आया तथा आते ही उसने अफगानिस्तान के प्रति जिस नीति का अनुसरण किया उसे 'अग्रगामी नीति' कहा जाता है. उसकी इस नीति के कारण द्वितीय आंग्ल-अफगान युद्ध लड़ा गया. इस युद्ध के कारण निम्नलिखित थे - 
1. लिंटन ने अफगानिस्तान के शासक के पास अपना एक सन्धि- प्रस्ताव दूत बेली के नेतृत्व में भेजा, जिसके अनुसार, अफगानिस्तान को रूस के विरुद्ध संरक्षण देने, एक नियमित राशि बतौर सहायता देने, काबुल में एक अँग्रेज रेजीडेण्ट रखने तथा शेरअली के पुत्र अबदुल्ला जान को उसका उत्तराधिकारी स्वीकार करने की बात कही गई थी, परन्तु शेरअली ने इस दूत से बिना मिले ही इसे वापस लौटा दिया, जिससे शेरअली और अंग्रेजों के सम्बन्ध बिगड़ गए.
2. 1876 ई. में अफगानिस्तान के निकट अत्यधिक सामरिक महत्व के केन्द्र क्वेटा को क्लाट के खान से प्राप्त कर अफगानों के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया.
3. लिटन ने कश्मीर के शासक से भी सन्धि कर गिलगिट में एक ब्रिटिश रेजीडेण्ट की स्थापना कर दी. अब शेरअली ने समझा कि, अँग्रेज उसे घेरकर युद्ध की तैयारी कर रहे हैं.
4. यूरोपीय राजनीति में तुर्की की पराजय के बाद रूस ने जनरल स्टोलीटॉक को दूत बनाकर काबुल भेजा, जिसका उद्देश्य ब्रिटेन पर दबाव डालकर पर्लिन काँग्रेस में और अधिक रियायत प्राप्त करना था.
5. लिटन ने हेरात में शेरअली से एक अँग्रेज रेजीडेण्ट रखने की माँग उसे रूसी आक्रमण का भय दिखाकर की तथा उससे यह भी कहा कि वह बिना अँग्रेजों की अनुमति के किसी विदेशी शक्ति से सम्बन्ध स्थापित नहीं करें, तो अली ने लिंटन की इन शर्तों को जब ठुकरा दिया. तब दोनों पक्षों में युद्ध होना अनिवार्य हो गया.
युद्ध — लिंटन ने अब सैनिक कार्यवाही को प्रारम्भ करते हुए अफगानिस्तान के विरुद्ध नवम्बर, 1878 ई. को खैबर, पीवर और बोलन दर्रों के मार्ग से आक्रमण कर दिया तथा अँग्रेजी सेना का शीघ्र ही काबुल पर अधिकार हो गया. शेरअली भागकर रूसी तुर्किस्तान चला गया. जहाँ कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई.
शेरअली के पुत्र याकूब खाँ ने 26 मई, 1879 ई. गंडमक की सन्धि कर ली, जिसके अनुसार, अँगेजों को काबुल तथा हेरात में स्थायी रेजीडेण्ट रखने की आज्ञा मिल गई और साथ-ही-साथ अँग्रेजों को कुर्रम और मिशनी दर्रों का नियन्त्रण व कुर्रम, पिशनी और शिबी जिलों के प्रशासन को चलाने का अधिकार भी मिल गया. यहाँ अनेक अँग्रेज अधिकारियों की नियुक्ति कर दी गई. इससे अफगानिस्तान की विदेश नीति पर अँग्रेजों का नियन्त्रण स्थापित हो गया.
इन सभी के बदले याकूब को सुरक्षा का आश्वासन एवं 6 लाख रुपए वार्षिक मिलना तय हुआ.
परन्तु कुछ समय बाद अफगानिस्तानी जो इस व्यवस्था से अत्यन्त क्षुब्ध थे, ने विद्रोह कर दिया तथा 3 दिसम्बर, 1879 ई. को अँग्रेज रेजीडेण्ट केवेग्नेरी तथा कई अन्य अँग्रेजों की हत्या कर दी. इसके प्रतिरोधस्वरूप लिटन ने अफगानिस्तान में एक सेना भेजी जिसने कान्धार एवं काबुल पर अधिकार कर लिया तथा याकूब को गिरफ्तार करके देहरादून भेज दिया. अफगानिस्तान को लिटन ने दो भागों में बाँट देने का निश्चय कर लिया, लेकिन 1880 ई. में उसे वापस जाना पड़ा.
वास्तव में द्वितीय अफगान युद्ध जिन उद्देश्यों को लेकर लड़ा गया था, वे इस युद्ध के बाद पूरे नहीं हो सके. हालांकि इससे अंग्रेजों को लाभ ही हुआ. उनकी शर्तों का अक्षरशः पालन याकूब द्वारा किया गया था तथा रूस समर्थक शेरअली को अफगानिस्तान से बाहर खदेड़ दिया गया, फिर भी नैतिक दृष्टि से यह युद्ध एक थोपा गया युद्ध था.
> तृतीय आंग्ल-अफगान युद्ध : टिप्पणी
तृतीय अफगान का मुख्य कारण रूस का इस क्षेत्र की ओर बढ़ता प्रभाव था. उसने 1884-85 ई. में मर्प और पंजदेह पर अधिकार कर लिया तथा पेशद से लेकर तेहरान तक की संचार व्यवस्था को नष्ट कर दिया. इससे रूस और ब्रिटेन के सम्बन्ध बिगड़ गए. विश्व युद्ध (1905) के समय रूस ने अफगान सीमा पर रेलवे लाइन बिछा दी, परन्तु 1907 ई. के आंग्ल-रूसी समझौते में जिसमें रूस ने अफगानिस्तान को अपने प्रभाव क्षेत्र से बाहर माना था, स्थिति को बेहतर कर दिया और रूस-अफगानिस्तान के सन्दर्भ में अलग हट गया.
अफगानिस्तान के शासक हबीबुल्लाह ने जोकि पश्चिमीकरण का समर्थक था, अफगानिस्तान का पश्चिमीकरण प्रारम्भ कर दिया. इससे अंग्रेजों में उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया होनी प्रारम्भ हो गई, परन्तु इसी बीच उसकी हत्या कर अमानुल्ला 20 फरवरी, 1919 ई. को अफगानिस्तान का शासक बन गया.
अमानुल्ला एक स्वतन्त्र विचारधारा वाला व्यक्ति होने के कारण वह अफगानिस्तान में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करता था. उसकी आन्तरिक परिस्थिति भी इस समय सन्तोषजनक नहीं थी. अतः उसने जनता का ध्यान हटाने के लिए अंग्रेजों से संघर्ष प्रारम्भ कर दिया और ब्रिटिश क्षेत्रों में लूट-पाट मचाने लगा, परन्तु अँग्रेजी सेना ने उसे बुरी तरह परास्त कर दिया. इसी के साथ इस युद्ध का अन्त हो गया और अमानुल्ला ने वायसराय चेम्सफोर्ड से सन्धि कर ली.
> रावलपिण्डी की सन्धि (8 अगस्त, 1921 ई.)
इस सन्धि से अफगानिस्तान को अँग्रेजों द्वारा सहायता मिलनी बन्द हो गई तथा उसकी विदेश नीति पर पूर्ण रूप से अँग्रेजों ने नियन्त्रण स्थापित कर लिया. लन्दन में एक अफगान-मन्त्री की नियुक्ति की गई और अफगानों को अपना माल भारतीय बन्दरगाहों को बिना चुंगी दिए देश से बाहर ले जाने का अधिकार मिल गया. दोनों पक्षों में इसके द्वारा मित्रता स्थापित हो गई और अँग्रेजों ने अब अफगानिस्तान के मामलों में हस्तक्षेप करना बन्द कर दिया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इस युद्ध के द्वारा अँग्रेजों ने अफगानिस्तान को रूस से पृथक् कर दिया.
अँग्रेज- ईरान सम्बन्ध (The Anglo-Persian Relation)
> भारतीय सन्दर्भ में आंग्लपर्शिया सम्बन्ध
ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य की सुरक्षा की दृष्टि से ईरान का स्थान बहुत अधिक महत्वपूर्ण था, क्योंकि मध्य एशियाई व्यापार पर यदि नियन्त्रण करना था, तो ईरान का अँग्रेजों के लिए उनका मित्र होना आवश्यक था. अँग्रेज मध्य एशिया में रूसी विस्तार को भी रोकना आवश्यक समझते थे. अतः अँग्रेजों द्वारा पर्शिया या ईरान के प्रति एक निश्चित नीति को अपनाना आवश्यक हो गया.
पार्शिया को केन्द्रित कर सर्वप्रथम गवर्नर जनरल वेलेजली ने ईरान से सम्बन्धों की शुरूआत की. इस हेतु उसने एक ईरानी व्यक्ति 'मेहदी अलीखाँ' को अपना दूत बनाकर फारस के शाह के पास भेजा, जिसने अफगानिस्तान के शासक जमानशाह को ईरान के साथ संघर्ष में उलझा दिया, परन्तु इससे अधिक सफलता नहीं मिल सकी तथा इस क्षेत्र में रूसी प्रभाव में वृद्धि होती रही. अतः वेलेजली ने अपने दूत मैलकम द्वारा 1801 ई. में व्यापारिक और राजनीतिक सन्धियाँ की, जिसके अनुसार अँग्रेज व भारतीय व्यापारियों को फारस में बसने और व्यापार करने की आज्ञा शाह द्वारा प्रदान की गयी.
लॉर्ड मिण्टो के समय ईरान के शाह ने फ्रांसीसियों की तरफ अपना झुकाव बढ़ा लिया. इस समय नेपोलियन पूर्व की ओर अपना प्रसार करना चाहता था. अतः मिण्टो ने मैलकम को पुनः दूत बनाकर ईरान भेजा और ब्रिटिश मन्त्रिमण्डल का एक दूत ईरान भी गया, परन्तु दोनों को ही निराश लौटना पड़ा. बाद में मिण्टो ने हरफोर्ड जोंस को दूत बनाकर ईरान भेजा, जिसने शाह के साथ एक प्रारम्भिक सन्धि करने में सफलता प्राप्त की.
लॉर्ड हेस्टिंग्स और तेहरान की सन्धि - लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1809 ई. की सन्धि को आधार बनाकर 24 नवम्बर, 1824 ई. को 'तेहरान की सन्धि' की, जिसके अनुसार शाह ने इंग्लैण्ड के शत्रुओं से की गयी सभी सन्धियों को भंग कर दिया तथा अँग्रेज विरोधी सभी सेनाओं का ईरान में प्रवेश बन्द हो गया. यह भी तय किया गया कि अफगानिस्तान और ईरान के मध्य होने वाले संघर्ष में अँग्रेज अलग रहेंगे और यदि अफगानिस्तान का अंग्रेजों से संघर्ष हुआ तो ईरान अँग्रेजों को सहायता देगा. इसी प्रकार अँग्रेजों ने भी यह आश्वासन दिया कि यदि किसी यूरोपीय शक्ति में ईरान पर आक्रमण किया तो अँग्रेज ईरान की सहायता करेंगे.
आंग्ल- ईरान सम्बन्धों में कटुता — 1827 ई. में रूस ने जब फारस पर आक्रमण किया तब शाह ने तेहरान की सन्धि के अनुसार फारस ने अँग्रेजों से सहायता माँगी, जिसे अंग्रेजों ने ठुकरा दिया फलस्वरूप शाह की पराजय हो गयी. इससे अँग्रेज व ईरान के सम्बन्ध बिगड़ गये. अब ईरान ने अफगानिस्तान की ओर ध्यान देना प्रारम्भ कर दिया तथा हेरात पर अधिकार कर लिया. इसे अँग्रेजों ने अपने लिए खतरा मानकर फारस की खाड़ी में युद्धपोत भेज दिया, जिससे ईरान को हेरात खाली करना पड़ा और अँग्रेजों से समझौता करना पड़ा. इस समय गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैण्ड था. इसके बाद भी दोनों पक्षों में सम्बन्ध सन्तोषजनकं बने रहे .
लॉर्ड कर्जन और ईरान- ईरान में अपने-अपने स्वार्थों से प्रेरित होकर फ्रांस, रूस, तुर्की, इंटली, जर्मनी आदि देश अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते थे तथा अँग्रेज इस क्षेत्र में किसी अन्य शक्ति की उपस्थिति को पसन्द नहीं करते थे. इसी बीच 1898 ई. में फ्रांसीसियों ने ओमान के सुल्तान से 'जिस्साह' नामक स्थान कोयला स्टेशन के रूप में ले लिया, जिससे अँग्रेजों को अत्यधिक चिन्ता हुई. इस पर लॉर्ड कर्जन स्वयं 1903 ई. में ईरान गया और खाड़ी क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित करने के उद्देश्य से बन्दरगाहों और व्यापारिक केन्द्रों पर अपने दूतावास स्थापित किये, सीमा चौकियों को बताया गया व रेलवे का विस्तार किया गया. ओमान पर दबाव डाला गया कि वह फ्रांसीसियों को सहायता और व्यापारिक सुविधा देना बन्द करे, इसके लिए उसने एक युद्धपोत भी भेजा, जिससे डरकर ओमान की सरकार ने फ्रांस को दी गयी सारी सुविधाएँ वापस ले लीं.
इस प्रकार कर्जन ने फारस में अन्य किसी यूरोपीय शक्ति को अपना प्रभाव जमाने का अवसर नहीं दिया.
फारस का विभाजन – 1907 ई. में इंग्लैण्ड व रूस ने आपस में समझौता कर फारस को तीन क्षेत्रों में बाँट दिया. प्रथम क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी भाग पर इंग्लैण्ड तथा द्वितीय क्षेत्र उत्तरी भाग पर रूस का प्रभाव क्षेत्र माना गया तथा तीसरा क्षेत्र दक्षिणी फारस और खाड़ी के किनारे वाले प्रदेश को तटस्थ क्षेत्र स्वीकार कर लिया गया और यह व्यवस्था प्रथम विश्व युद्ध के आरम्भ होने तक चलती रही.
प्रथम विश्व युद्ध के बाद इंग्लैण्ड ने फारस से एक समझौता 1919 ई. में कर उसकी एकता और अखण्डता का आश्वासन दिया और उसकी सैनिक और आर्थिक मामलों पर नियन्त्रण कायम कर लिया. इस सन्धि के विरुद्ध ईरान में प्रतिक्रिया हुई, जिसके कारण इसे समाप्त कर रूस के साथ फारस ने रक्षात्मक सन्धि कर ली.
1942 ई. में विश्व युद्ध के दौरान रूस, इंग्लैण्ड और ईरान के मध्य एक सन्धि हुई, जिसमें ईरान की स्वतन्त्रता व अखण्डता को बनाये रखने की बात स्वीकार की गई. 1943 ई. में ब्रिटेन, अमरीका और रूस का शिखर सम्मेलन तेहरान में हुआ, जिसमें 1942 ई. की बातों को पुनः दोहराया गया. इंग्लैण्ड ने अपनी फौजों को युद्ध की समाप्ति पर 1945 ई. में हटा लिया, उसके बाद अमरीका तथा रूस ने भी अपनी फौजें हटा लीं. इस प्रकार से ईरान पूर्ण रूप से पश्चिमी राष्ट्रों के चंगुल से मुक्त हो गया. कि इंग्लैण्ड ने अपने
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है भारतीय साम्राज्य की रक्षा करने एवं मध्य एशिया के व्यापार पर नियन्त्रण स्थापित करने के उद्देश्य से ईरान से सम्बन्धों को प्रारम्भ कर वहाँ किसी भी अन्य यूरोपीय शक्ति को जमने नहीं दिया, परन्तु अन्य यूरोपीय शक्तियों के कारण ही ईरान की स्वतन्त्रता और अखण्डता बची रही.
आंग्ल-नेपाल सम्बन्ध (The Anglo-Nepalease Relation)
1768 ई. में नेपाल में पृथ्वीनारायण नामक व्यक्ति ने सत्ता सँभाली तभी से नेपाल में गोरखों की शक्ति बढ़ने लगी तथा उनके राज्य का विस्तार होने लगा. 1792 ई. में अँग्रेजों तथा गोरखों के मध्य एक व्यापारिक सन्धि हुई, परन्तु इसी समय नेपाल में विद्रोह हो जाने के कारण यह क्रियान्वित न हो सकी. गोरखों ने अपने राज्य का विस्तार जारी रखा और कम्पनी ने भी इसी नीति के तहत गोरखपुर पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया, जिससे नेपाल और कम्पनी की सीमाएँ एक-दूसरे से टकराने लगीं. 1802 ई. में कप्तान नॉक्स के नेतृत्व में अँग्रेजों ने गोरखों से एक अन्य व्यापारिक सन्धि की, परन्तु दोनों पक्षों के सम्बन्धों में कोई विशेष सुधार न आने के कारण इसे कम्पनी द्वारा भंग कर दिया गया. इससे दोनों पक्षों के सम्बन्ध और अधिक बिगड़ गये. हेस्टिंग्स (1813–23 ई.) ने गोरखों की शक्ति को कुचल देने का निश्चय किया तथा इस हेतु उसने गोरखों के विरुद्ध आक्रमण की घोषणा कर दी तथा एक बड़ी सेना 1814 ई. में कर्नल निकोलस तथा गार्डनर के नेतृत्व में नेपाली क्षेत्रों पर अधिकार करने के लिए भेजी. गोरखों ने अनेक स्थानों पर अँग्रेजों को परास्त कर दिया, किन्तु बाद में अँग्रेजों ने कुमायूँ' लॉर्ड कर पर अधिकार कर लिया. गोरखों के सेनापति अमरसिंह थापा को मलाऊ के किले में आत्मसमर्पण करने के लिए दिया. अँग्रेजों ने गोरखों को अपनी सेना में भर्ती कर नेपाली शक्ति को कमजोर करने का प्रयास किया, जिसके कारण दोनों पक्षों में संघर्ष वार्ता प्रारम्भ हुई.
हेस्टिंग्स ने नेपाल के सम्मुख कड़ी शर्तें प्रस्तुत कीं, परन्तु नेपालियों ने उन्हें अस्वीकार कर पुनः संघर्ष प्रारम्भ कर दिया, परन्तु पुनः अँग्रेजों ने उनके अनेक केन्द्रों पर अधिकार कर सन्धि करने के लिए विवश कर दिया. अतः अँग्रेजों और गोरखों के मध्य सुगौली की सन्धि के साथ ही शान्ति स्थापित हो गयी.
> सुगौली की सन्धि (1816 ई.)
इस सन्धि के अनुसार नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में गोरखों ने एक अँग्रेज रेजीडेण्ट का रहना स्वीकार कर लिया तथा गढ़वाल व कुमायूँ के जिले अँग्रेजों को मिल गए. इसके साथ सिक्किम व तराई के क्षेत्रों से गोरखों ने अपना दावा हटा लिया. गोरखों ने यह भी वचन दिया कि वे बिना अँग्रेजों की आज्ञा के किसी भी अन्य यूरोपीय को नेपाल में बसने नहीं देंगे.
यह सन्धि नेपाल के लिए अत्यन्त अपमानजनक एवं हानिकारक थी तथा नेपाल की स्वतन्त्रता का हनन इस सन्धि द्वारा कर लिया गया, परन्तु अँग्रेजों के लिए यह सन्धि अत्यन्त लाभदायक थी. उन्हें अनेक ऐसे पहाड़ी स्थान मिले जिसे उन्होंने अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया; जैसेनैनीताल, शिमला आदि. इसके साथ ही अँग्रेजों ने गोरखा जैसी बहादुर जाति को अपनी सेना में भर्ती किया, जिन्होंने राज्य के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया. इस सन्धि से दोनों पक्षों के सम्बन्ध भारत की स्वतन्त्रता तक मैत्रीपूर्ण ही रहे.
आंग्ल-बर्मा सम्बन्ध (The Anglo-Burmese Relation)
> प्रथम आंग्ल - बर्मा युद्ध के कारण एवं स्वरूप
देशों की साम्राज्यवादी नीतियाँ और स्वार्थ प्रमुख रूप से अँग्रेजों व बर्मा के मध्य युद्ध का प्रमुख कारण दोनों उत्तरदायी थे. फिर भी निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत संघर्ष के कारणों को विभाजित किया जा सकता है-
(1) बर्मा की विस्तारवादी नीति — बर्मा ने अपनी साम्राज्यवादी नीति के कारण अपने राज्य का बहुत अधिक विस्तार कर दिया था तथा 1813 ई. तक उनके राज्य में मणिपुर, अराकान आदि प्रदेशों को शामिल कर लिया गया था. 1821-22 व 1823 ई. में उन्होंने आसाम के अहोम राज्य पर तथा चटगाँव के निकट शाहपुरी द्वीप पर अधिकार कर अँग्रेजों से चटगाँव, कासिम बाजार तथा मुर्शिदाबाद की माँग की जिससे दोनों पक्षों में तनाव उत्पन्न होना स्वाभाविक था.
(2) बर्मी अपराधियों का अँग्रेजों द्वारा शरण देना — अंग्रेजों ने चटगाँव में अराकान के भगोड़े अपराधियों को शरण दे रखी थी, जो सदैव अराकान पर आक्रमण करते रहते थे. अतः बर्मा की सरकार ने इन्हें सौंप देने के लिए अँग्रेजों से कहा जिसे अँग्रेजों ने ठुकरा दिया, इससे दोनों पक्षों में तनाव उत्पन्न हो गया.
(3) बर्मी एवं अँग्रेज दोनों ही युद्ध के लिए अवसर की तलाश में थे. अँग्रेज अपनी सीमा पर शक्तिशाली राज्य को सहन नहीं कर सकते थे तथा उन्होंने इसे नष्ट करने का अब निश्चय कर लिया था. इधर बर्मी सरकार को अपनी ताकत का अत्यधिक घमण्ड था. साथ ही बर्मी सरकार यह भी सोचती थी कि यदि उनका अंग्रेजों से संघर्ष हुआ, तो भारतीय शक्तियों को अँग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने का अवसर मिलेगा.
(4) मणिपुर एवं असम की विजय के बाद बर्मियों का साहस बढ़ गया था. अतः इसे रोकने के लिए अँग्रेजों ने कचार पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया जिसने बर्मा के लोगों को अँग्रेजों से युद्ध करना अनिवार्य कर दिया.
युद्ध का स्वरूप - 24 फरवरी, 1824 ई. को अँग्रेज गवर्नर जनरल लॉर्ड एमहर्स्ट ने बर्मा के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर जल एवं थल मार्ग से बर्मा के विरुद्ध सेना भेज दी. अँग्रेजी सेना ने बर्मियों को मणिपुर, असम, कचार और अराकान से बाहर निकाल दिया और 1824 ई. में जल सेना ने रंगून पर अधिकार कर लिया. इधर बर्मी सेनापति महाबुन्देला ने अँग्रेजों को चटगाँव की सीमा पर बुरी तरह से पराजित कर दिया. अब बर्मी सेना ने छापामार युद्ध द्वारा अँग्रेजों को खूब परेशान करना प्रारम्भ कर दिया, परन्तु सेनापति निचले बर्मा की राजधानी प्रोम के लिए हुए युद्ध में 1825 ई. में मारा गया और अँग्रेजों ने उस पर अधिकार कर लिया. इससे बर्मी सेना सन्धि के लिए तैयार हो गई और यांडबू की सन्धि के साथ ही युद्ध को समाप्त कर दिया गया.
यांडबू की सन्धि (24 फरवरी, 1826 ई.) – इस सन्धि के अनुसार बर्मा ने अंग्रेजों को तीनासरीम व अराकान प्रदेश देना स्वीकार कर लिया, इसके अलावा उन्होंने असम, कचार तथा जयंशिया पर अपना दावा छोड़ दिया. मणिपुर को स्वतन्त्र राज्य घोषित कर दिया गया. बर्मा में एक अँग्रेज रेजीडेण्ट तथा कलकत्ता में एक बर्मी दूत रखने पर दोनों पक्षों में सहमति हो गयी. युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में बर्मा ने कम्पनी को एक करोड़ रुपये देना स्वीकार कर लिया. दोनों पक्षों में व्यापारिक समझौता भी हुआ.
> द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध के कारण एवं स्वरूप
द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध अँग्रेजों की व्यापारिक नीतियों एवं गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति का स्वाभाविक परिणाम था, फिर भी उसके कारणों को निम्नलिखित शीर्षकों में बाँटा जा सकता है-
(1) 1826 ई. की यांडबू सन्धि को बर्मा द्वारा अस्वीकार करना—बर्मा के नये शासक थेरावदी (1837-45 ई.) ने यह कहकर कि 'याडबू की सन्धि' उनके भाई द्वारा की गई है जिसे वह मानने के लिए बाध्य नहीं हैं, दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ा दिया.
(2) व्यापारिक प्रतिद्वन्द्विता – यांडबू की सन्धि के बाद अँग्रेजों ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों को बर्मा में बहुत अधिक बढ़ा दिया था. बर्मा में अंग्रेजों ने लकड़ी के व्यापार पर अपना नियन्त्रण स्थापित करने के लिए पूरे बर्मा में इसका व्यापार करने की अनुमति माँगी. जिसे बर्मा की सरकार ने ठुकरा दिया. इसलिए अँग्रेज व्यापारियों ने यह शिकायत की कि रंगून का गवर्नर उन्हें पेरशान करता है. उन्होंने कलकत्ता कौंसिल में यह सूचना भिजवाई कि यदि शीघ्र ही बर्मा के अधिकारियों पर नियन्त्रण नहीं लगाया गया, तो उन्हें बर्मा खाली करना पड़ेगा.
(3) डलहौजी की नीति — लॉर्ड डलहौजी ने अपनी विस्तारवादी नीति के अनुसार इस घटना का लाभ उठाने के लिए अँग्रेज व्यापारियों की शिकायत के आधार पर नवम्बर, 1851 ई. में अपने जंगी जहाजों को एक दूत के साथ रंगून रवाना कर दिया. अँग्रेजी दूत लैवर्ट ने अभद्रतापूर्ण व्यवहार के साथ रंगून के गवर्नर को हटाने की माँग की. उसकी यह माँग स्वीकार कर ली गई, परन्तु उसने 150 को नष्ट कर दिया. बर्मी सरकार ने क्षतिपूर्ति तथा बर्मा में एक अँग्रेज रेजीडेण्ट रखने का आश्वासन दिया, परन्तु डलहौजी जो युद्ध पर उतारू था, ने हर्जाने की रकम को एक हजार से बढ़ाकर एक लाख पौण्ड कर दिया और गवर्नर (रंगून) को हराने के साथ-साथ क्षमा माँगने का एक नया प्रस्ताव भेज दिया, जिसे बर्मा के शासक ने स्वीकार नहीं किया. अतः अब युद्ध होना आवश्यक हो गया.
युद्ध का स्वरूप अँग्रेजी सेना ने अप्रैल 1852 ई. में रंगून पर अधिकार कर लिया तथा नवम्बर 1852 ई. के आते-आते अँग्रेजों ने इरावदी नदी के उत्तर-पश्चिम में स्थित बेसिन, प्रोम, पेगु आदि पर अधिकार कर लिया. बर्मा का राजा मिंडन अपनी आन्तरिक परिस्थितियों के कारण युद्ध करने की स्थिति में नहीं था. अतः बिना किसी सन्धि के ही यह युद्ध समाप्त हो गया पेगू ower irma) को अँग्रेजी साम्राज्य के अन्तर्गत सम्मिलित कर लिया गया.
> तृतीय आंग्ल - बर्मा युद्ध के कारण, स्वरूप एवं महत्व की विवेचना
वायसराय लॉर्ड डफरिन के कार्यकाल में 1885 ई. में तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध लड़ा गया, जिसके कारण निम्नलिखित थे - 
(1) फ्रांस का बर्मा की ओर आकर्षित होना – बर्मा के राजा मिंडन के बाद 1878 ई. में थिबू बर्मा का राजा बना. उसके समय में अंग्रेजों ने उसके विरोधियों को अपने यहाँ शरण देना प्रारम्भ कर दिया और बर्मा के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने लगे. इससे नाराज होकर थिबू ने इटली, फ्रांस और जर्मनी से अपने सम्बन्ध बढ़ाने प्रारम्भ कर दिये. थिबू ने बर्मी मिशन फ्रांस भेजे. इस समय फ्रांस भी बर्मी मामलों में दिलचस्पी लेने लगा और उसने बर्मा से एक व्यापारिक सन्धि भी कर ली. मांडले में एक फ्रांसीसी बैंक की स्थापना हुई तथा मांडले से लेकर ब्रिटिश बर्मा तक एक रेलवे लाइन बिछाने की योजना भी बनी. इससे अँग्रेज आशंकित हो गये तथा उन्होंने अब पूरे बर्मा पर अपना अधिकार करके फ्रांसीसी प्रभाव को समाप्त करना आवश्यक समझा.
(2) अँग्रेजों के व्यापारिक एवं आर्थिक हित — अँग्रेज व्यापारियों के आर्थिक हित बर्मा के हितों से निरन्तर टकरा रहे थे. अँग्रेज व्यापारी बर्मा के द्वारा चीन से अपने व्यापारिक सम्बन्ध बढ़ाना चाहते थे. इस हेतु उन्होंने रंगून और इंग्लैण्ड में आन्दोलन किये, जिसके फलस्वरूप 1862 ई. की सन्धि हुई, जिसके अनुसार अँग्रेजों को बर्मा में कहीं भी बसने और इरावदी नदी तक जहाज ले जाने की सुविधा मिली. अँग्रेज अब बर्मा सरकार के गेहूँ, कपास और हाथीदाँत के व्यापार के एकाधिकार को समाप्त करने के लिए माँग करने लगे जिसे थिबू ने 1882 ई. में स्वीकार कर लिया. अँग्रेज व्यापारी भारत सरकार पर यह दबाव भी बना रहे थे कि उनके हितों की रक्षा के लिए पूरे बर्मा पर अधिकार कर लिया जाये. 
(3) बम्बई बर्मा व्यापारिक कम्पनी का मामला – बम्बई बर्मा व्यापरिक कम्पनी को बर्मा में सागवान की लकड़ी काटने का ठेका (Contract) मिला हुआ था, लेकिन जब थिबू सरकार को यह पता चला कि फ्रांसीसी भी इस तरह का ठेका लेने को तैयार हैं, तब उसने इस कम्पनी पर यह आरोप लगाया कि उसने निर्धारित मात्रा से अधिक लकड़ी बर्मी अधिकारियों को रिश्वत देकर काट ली है, इसलिए उस पर 10 लाख रुपये जुर्माना कर दिया.
डफरिन ने थिबू से अनुरोध किया कि मामले की सत्यता की जाँच करके ही वह जुर्माना ले, लेकिन थिबू ने इससे इन्कार कर दिया. इस पर डफरिन ने थिबू को यह आदेश भेजा कि वह मांडले में एक ब्रिटिश राजदूत रखे तथा राजदूत के मांडले पहुँचने तक कम्पनी के विरुद्ध सारी कार्यवाही स्थगित रखे. बर्मा की विदेश नीति अँग्रेजों की सहमति से निर्धारित हो और बर्मा से होकर चीन से व्यापार करने की अनुमति प्रदान की जाये. थिबू अनुमति प्रदान की जाये. थिबू ने जब इसे मानने से इनकार कर दिया, तब दोनों पक्षों में युद्ध प्रारम्भ हो गया.
युद्ध का स्वरूप – 13 नवम्बर, 1885 ई. को रंगून में पहले से ही उपलब्ध सेना ने आगे बढ़ना प्रारम्भ कर दिया तथा शीघ्र ही इसने मांडले पर अपना अधिकार जमा लिया. इस समय थिबू के लिए बर्मा की आन्तरिक परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थीं. अतः थिबू अँग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष आगे जारी नहीं रख सका और उसने अँग्रेजों के समक्ष 28 नवम्बर, 1885 ई. को आत्मसमर्पण कर दिया. अब लॉर्ड डफरिन ने बर्मा को अँग्रेजी राज्य में मिलाने की घोषणा कर दी.
> युद्ध का महत्व
इस युद्ध के परिणामस्वरूप बर्मा ब्रिटिश साम्राज्य का एक अंग बन गया, हालांकि यह कार्य सर्वथा अनुचित था, परन्तु अँग्रेजों ने अपने राज्य का विस्तार एवं सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह कार्य किया. बर्मा पर अधिकार हो जाने से अँग्रेजों को चीन के साथ व्यापार करने में सुविधा हो गयी.
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Sun, 08 Oct 2023 09:47:52 +0530 Jaankari Rakho
अंग्रेजों का अवध, मराठों, सिखों व मैसूर से सम्बन्ध https://m.jaankarirakho.com/428 https://m.jaankarirakho.com/428 अंग्रेजों का अवध, मराठों, सिखों व मैसूर से सम्बन्ध

अवध - आंग्ल सम्बन्ध
> वारेन हेस्टिंग्स की अवध के प्रति अपनाई गई नीति का मूल्यांकन
वारेन हेस्टिंग्स ने प्रारम्भ में जिस नीति का अवध के प्रति अनुसरण किया, उसका मुख्य उद्देश्य अवध को शक्तिशाली राज्य बनाना था, क्योंकि इस समय मुगल सम्राट जो कि, पहले अंग्रेजों का पेंशनर था, मराठों के संरक्षण में मराठों को सौंप दिए थे. अतः अब कम्पनी की सीमाएँ असुरक्षित हो गई थीं तथा अंग्रेजों को अब मराठा आक्रमण का भय बना रहता था. अतः कम्पनी की सीमा रक्षा के लिए कम्पनी एवं मराठा राज्य के मध्य अवध राज्य का चला गया था और उसने इलाहाबाद तथा कड़ा के जिले शक्तिशाली होना आवश्यक था. अवध के प्रति मित्रता रखने का एक अन्य कारण यह भी था कि कम्पनी के राज्य की रक्षा वह अफगानों से भी करना चाहता था. अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हेस्टिंग्स ने अवध के नवाब से 'बनारस की सन्धि' (1773 ई.) की, जिसके तहत् उसे इलाहाबाद और कड़ा के जिले लौटा दिए गए तथा बदले में नवाब ने अंग्रेजों को 25 लाख रुपया देना तय किया. इसके साथ ही यह भी तय किया गया कि कम्पनी अवध की सुरक्षा के लिए एक सेना अवध में रखेगी जिसका खर्चा नवाब वहन करेगा.
रुहेला युद्ध
रुहेलखण्ड हिमालय की तलहटी का एक छोटा-सा राज्य था तथा यहाँ का शासक हाफिज रहमत खाँ था. इस राज्य को व अवध को मराठा आक्रमण का भय होने के कारण 1772 ई. में दोनों राज्यों में यह सन्धि हुई थी कि मराठा आक्रमण के समय अवध रुहेलों को सैनिक सहायता देगा और बदले में उसे 40 लाख रुपए मिलेंगे. 1773 ई. में मराठों ने रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर दिया, परन्तु अवध की सेनाएँ देखकर मराठे बगैर युद्ध लड़े ही वापस लौट गए, अतः रुहेलों ने रुपया देने से अवध को मना कर दिया. इस पर अवध के नवाब ने अंग्रेजों की सहायता से रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर दिया तथा रुहेल सरदार को मार डाला गया तथा उनका राज्य अवध में मिला लिया गया. केवल एक छोटा-सा हिस्सा रुहेला संस्थापक अली मुहम्मद के पुत्र फनुल्ला खाँ को दे दिया गया और उसके साथ यह सन्धि की गई कि आवश्यकता पड़ने पर वह अवध को सैनिक सहायता देगा तथा अन्य किसी शक्ति से सम्बन्ध नहीं रखेगा.
हेस्टिंग्स की नीति का मूल्यांकन
हेस्टिंग्स ने अवध के प्रति जो नीति अपनाई उसकी अनेक विद्वानों ने आलोचना की है. कानूनी या नैतिक दोनों ही दृष्टि से अवध की रुहेलों के विरुद्ध सहायता देना गलत था, क्योंकि रुहेलों ने कभी कोई कार्य अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं किया था. अल्फ्रेड लॉयल ने लिखा है कि "रुहेलों पर आक्रमण सिद्धान्ततः गलत था. धन-लोलुपता के कारण हेस्टिंग्स ने ब्रिटिश सेना को किराए पर लगाया था.” वास्तव में उसने अपनी सेना के वेतन और खर्च से बचने के लिए अवध का साथ दिया तथा अवध को इस समय कम्पनी का मित्र बनाए रखना आवश्यक था. अतः इसे देखते उसे सही भी कहा जा सकता है.
> वारेन हेस्टिंग्स की अवध की बेगमों के प्रति अपनाई गई नीति : टिप्पणी
अवध के भूतपूर्व नवाब शुजाउद्दौला की पत्नी तथा आसफुद्दौला की माता के पास अपार सम्पत्ति थी. आसफुद्दौला के अपनी माता की इस सम्पत्ति पर अधिकार करना चाहता था. उसका कहना था कि उसकी माता और अन्य बेगमों ने अनुचित तरीके से सम्पत्ति एकत्र कर रखी थी.
अवध के बेगमों का धन आसफुद्दौला इसलिए भी प्राप्त करना चाहता था कि उसे कम्पनी के बढ़ते हुए ऋण भार से मुक्ति मिले. अतः नवाब के आर्थिक संकट को देखते हुए बेगमों ने उसे पहले 25 लाख रुपए दिए और बाद में अंग्रेजों की मध्यस्थता से बेगमों ने 30 लाख रुपए और दे दिए. इस पर भी आसफुद्दौला को संतोष नहीं हुआ तथा उसने बेगमों का धन प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों से आक्रमण करने की आज्ञा माँगी, जिसे हेस्टिंग्स ने अनुमति दे दी फिर भी उसका बेगमों पर आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ. इस पर अंग्रेज रेजिडेण्ट ने बेगमों पर यह अभियोग लगाया कि उन्होंने चैतसिंह की युद्ध में सहायता की थी. अतः अंग्रेज सेना ने उनके महल पर अधिकार कर उनकी सारी सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया.
अनेक इतिहासकारों द्वारा बेगमों के प्रति हेस्टिंग्स द्वारा अपनाए गए इस व्यवहार की कड़े शब्दों में निन्दा की है. वास्तव में उसका यह व्यवहार पूर्णतः बर्बर और असभ्य था तथा किसी भी सभ्य कहे जाने वाले राष्ट्र या व्यक्ति के लिए यह काले धब्बे के समान है.
> लॉर्ड वेलेजली द्वारा अवध के प्रति अपनाई गई नीति
मई 1798 ई. में घोर साम्राज्यवादी वेलेजली गवर्नर जनरल बनकर भारत आया तथा आते ही उसने अवध को कम्पनी के शिकंजे में कसने की कोशिश की. उसकी नीति का मुख्य उद्देश्य मराठों के विरुद्ध अवध को एक महत्त्वपूर्ण अवरोध बनाना था. इसलिए वह अंग्रेजी सेना की संख्या को अवध में बढ़ाना चाहता था और दोआब की उपजाऊ भूमि पर नियन्त्रण स्थापित करना चाहता था. इससे उसके मराठों के विरुद्ध युद्ध अभियानों में रसद आदि की नियमित सहायता मिलती रहती. अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वेलेजली ने अवध के नवाब सआदत अली पर लगातार दवाब बढ़ाता गया और अन्ततः 1801 ई. में दोनों पक्षों में सन्धि हो गई. जिसके अनुसार अवध का आधा राज्य एवं दोआब का उपजाऊ क्षेत्र अंग्रेजों को प्राप्त हो गया. अवध की सेना को भंग कर दिया गया तथा अंग्रेजी फौज की संख्या बढ़ा दी गई और ब्रिटिश रेजिडेण्ट को अवध के आन्तरिक शासन में हस्तक्षेप का अधिकार प्रदान किया गया. वास्तविक शासन सत्ता के अधिकारी अब नवाब की जगह कम्पनी हो गई तथा अवध का राज्य चारों ओर से कम्पनी के राज्य से घिर गया. अब अंग्रेजों को मराठों के आक्रमण का भय भी समाप्त हो गया तथा बिना किसी परेशानी के अंग्रेज कम्पनी के राज्य की सीमाओं की रक्षा होने लगी, क्योंकि उनकी सेना के खर्च का भार नवाब के ऊपर था.
> अवध का कम्पनी के राज्य में विलीनीकरण
वेलेजली के समय में अवध के आधे राज्य पर कम्पनी का नियन्त्रण स्थापित हो चुका था और उसके दोआब के उपजाऊ क्षेत्र को भी कम्पनी ने हस्तगत कर लिया था. इसके साथ ही अवध में नवाब के खर्चे पर एक बड़ी अंग्रेजी सेना को अवध में रख दिया गया. फलस्वरूप अवध का अंग्रेजों द्वारा भरपूर आर्थिक शोषण प्रारम्भ हो गया, उससे अवध में आर्थिक विपन्नता एवं प्रशासनिक अव्यवस्था फैल गई. नवाब को अपनी व्यवस्था सुधारने का कोई अवसर नहीं मिला. अंग्रेजों का उस पर इतना दवाब बना रहता था कि वह सदैव उनके लिए पैसे की व्यवस्था करने में ही लगा रहता था. 
लॉर्ड हेस्टिंग्स ने नेपाल के युद्ध का बहाना बनाकर नवाब से लगभग 2 करोड़ रुपए प्राप्त कर लिए तथा इसके बदले में अवध के नवाब को अंग्रेजों ने बादशाह की उपाधि ग्रहण करने को कहा. इसी प्रकार लॉर्ड एमहर्स्ट ने भी नवाब से लगभग 50 लाख रुपए प्राप्त कर लिए.
नवाब की सोचनीय आर्थिक स्थिति के कारण जब वह अंग्रेजों की ओर अधिक आर्थिक सहायता देने में अक्षम हो गया, तब उसे विलियम बैंटिक ने सर्वप्रथम अपने प्रशासन में सुधार करने की चेतावनी दी, अन्यथा उसके राज्य को कम्पनी के राज्य में मिला लेने की धमकी. इसके उपरान्त भी अवध की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया.
इस पर लॉर्ड हार्डिंग्ज ने भी अवध के नवाब वाजिद अली शाह को 1847 में अवध की स्थिति को सुधारने के लिए धमकी परन्तु अवध की स्थिति यथावत् रही.
लॉर्ड डलहौजी ने अवध को कम्पनी के राज्य में मिलाने के लिए 'हड़प नीति' (Doctrine of laps) की नीति का अनुसरण किया. इसके तहत उसने अवध के शासन पर भ्रष्टाचार एवं कुशासन का आरोप लगाया और कर्नल स्लीमन को अवध के प्रशासन की जाँच के लिए भेजा, जिसने अवध में विद्रोह की संभावना को देखते हुए उसका कम्पनी के राज्य में विलय का विरोध किया. इस पर वेलेजली ने स्वयं अवध की यात्रा की तथा स्लीमन की जगह आउट्रम को अवध का नया रेजिडेण्ट नियुक्त कर दिया. आउट्रम ने एक सेना के साथ अवध की राजधानी लखनऊ में प्रवेश किया तथा नवाब वाजिद अली शाह के सम्मुख एक सन्धि-पत्र, जिसमें कहा गया था कि नवाब स्वेच्छा से गद्दी त्याग रहा है, प्रस्तुत कर उस पर हस्ताक्षर करने को कहा. नवाब के इनकार कर देने पर उसे बन्दी बना लिया गया और उसे कलकत्ता भेज दिया गया. 13 फरवरी, 1856 ई. को औपचारिक रूप से अवध को अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर देने की घोषणा डलहौजी द्वारा कर दी गई.
अवध के नवाब हमेशा ही कम्पनी के लिए मित्र की भूमिका का निर्वाह करते रहे थे. वे सदैव कम्पनी के वफादार रहे. उनके ऊपर प्रशासनिक भ्रष्टाचार एवं कुशासन का आरोप लगाकर, अवध को कम्पनी के राज्य में मिलाना सर्वथा अनुचित था, क्योंकि यह व्यवस्था अंग्रेजों की ही देन थी.
> 1775-82 ई. तक अंग्रेजों व मराठों के सम्बन्धों का निरूपण 
पृष्टभूमि
पेशवा माधवराव की 1772 ई. में अचानक मृत्यु हो जाने के बाद उसका छोटा भाई नारायणराव पेशवा बना जो अत्यन्त दुर्बल व्यक्ति था. अतः उसके चाचा रघुनाथराव उर्फ राघोबा ने 30 अगस्त, 1773 ई. को उसकी हत्या करवा दी और स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया. इसी बीच नारायणराव की पत्नी गंगाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसको लेकर नाना फड़नवीस एवं अन्य महत्त्वपूर्ण मराठा सरदारों ने राघोबा का विरोध किया तथा नन्हे शिशु को पेशवा घोषित कर दिया.
इससे राघोबा की महत्वाकांक्षाओं पर पानी फिर गया तथा वह अंग्रेजों की शरण में बम्बई चला गया. यहीं से मराठा राजनीति में अंग्रेजों को हस्तक्षेप करने का अवसर मिला, जिसका परिणाम प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध के रूप में आया.
> प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-82 ई.)
अंग्रेजों ने बम्बई के आसपास के प्रदेशों को मराठों से प्राप्त करने के उद्देश्य से रघुनाथराव से 7 मार्च, 1775 ई. को ‘सूरत की संधि’ की, जिसमें यह तय था कि अंग्रेज राघोबा को सैनिक सहायता देंगे और राघोबा उनको खर्च के लिए सालसेट, बेसिन तथा भड़ौंच के राजस्व का कुछ अंश देगा. अब अंग्रेज सेना ने 1775 ई. में पूना की सेना को हरा दिया, लेकिन सूरत की सन्धि को कलकत्ता कौंसिल जिसके अधीन अंग्रेजों की बम्बई कौसिल थी, ने इस सन्धि को अस्वीकार कर दिया और पूना सरकार के साथ 1 मार्च, 1776 ई. को ‘पुरन्दर की सन्धि' की जिसके अनुसार अंग्रेजों ने राघोबा का साथ छोड़ दिया और बदले में सालसेट एवं भड़ौंच से राजस्व वसूलने का अधिकार मराठों से लिया तथा युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 12 लाख रुपए मराठों ने अंग्रेजों को दिया व राघोबा को पेंशन प्रदान कर दी गई.
‘पुरन्दर की सन्धि' को बम्बई कौंसिल ने स्वीकार न कर राघोबा का पक्ष लेकर मराठों से 1778 ई. में युद्ध प्रारम्भ कर दिया, जिसमें तेलगाँव के युद्ध में मराठों द्वारा बुरी तरह से पराजित कर दिया गया और उन्हें 'तेलगाँव की सन्धि' विवश होकर करनी पड़ी. जिसमें एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश लौटा दिए गए. इस सन्धि को कलकत्ता कौंसिल ने अपना राष्ट्रीय अपमान मानते हुए एक विशाल फौज मराठों के विरुद्ध भेजी, जिसने अनेक स्थानों पर अपना अधिकार जमा लिया और पूना की ओर बढ़ने लगी, जिसके फलस्वरूप सिन्धिया ने मध्यस्थता कर अंग्रेजों व मराठों के मध्य सन्धि करवा दी, जो सालबाई की सन्धि (17 मई, 1782) के नाम से जानी जाती है. इसके अनुसार, सालबाई पर अंग्रेजों का अधिकार स्वीकार कर लिया गया तथा अंग्रेजों ने शिशु पेशवा ( माधव नारायणराव) को पेशवा स्वीकार कर लिया और मराठों के प्रदेशों को अंग्रेजों ने लौटा दिया. 
इस सालबाई की सन्धि से अंग्रेजों एवं मराठों का आपसी संघर्ष समाप्त हो गया, परन्तु इससे अंग्रेजों को लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक हुई और उनकी आर्थिक स्थिति डाँवाडोल हो गई. अंग्रेजों को लाभ यह हुआ कि मराठों से सन्धि हो जाने पर वे निश्चिन्त होकर अपने शत्रुओं हैदरअली और टीपू तथा निजाम के विरुद्ध कार्यवाही कर सके और इसके साथ ही उन्हें मराठा संघ की फूट का पता चल गया, जिसका उन्होंने आगे चलकर लाभ उठाया.
> बेसीन की सन्धि की शर्तें व महत्व
इस सन्धि के अनुसार पूना में पेशवा ने अंग्रेज सेना का रहना स्वीकारा तथा उसके खर्चे के लिए 26 लाख रुपए आय वाले प्रदेश अंग्रेजों को दे दिए. अब अंग्रेज जनरल आर्थर वेलेजली ने सेना सहित पूना में प्रवेश कर बाजीराव द्वितीय को पुनः पेशवा बनवा दिया.
इस सन्धि से अंग्रेजों को पूना में अपनी सेना रखने का अवसर मिला तथा उन्होंने महाराष्ट्र में अपने पाँव जमाने प्रारम्भ कर दिए. इस सन्धि को मराठा सरदार पसन्द नहीं करते थे. फलतः अंग्रेजों व मराठों के मध्य द्वितीय युद्ध प्रारम्भ हो गया.
> द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-06 ई.)
इस युद्ध की प्रमुख बात यह थी कि इसमें मराठा सरदारों अंग्रेजों से एक साथ न लड़कर अलग-अलग लड़े तथा सभी पराजित हो गए.
(1) सिन्धिया और भोंसले ने एक संयुक्त मोर्चा कायम कर अंग्रेजों से युद्ध प्रारम्भ किया, लेकिन यशवन्तराव होल्कर ने इसमें उनका साथ नहीं दिया, जिससे 4-5 महीने में अंग्रेज जनरल आर्थर वेलेजली ने मराठों को कई स्थानों पर पराजित कर उनकी शक्ति को नष्ट कर दिया. अब होल्कर सिंधिया और भोंसले का साथ देने के लिए युद्ध में कूद पड़ा, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और अब वह भी पराजित हो गया और अन्त में 17 दिसम्बर, 1803 ई. को सन्धि हुई जो देवगाँव की सन्धि के नाम से जानी जाती है.
देवगाँव की संधि (17 दिसम्बर, 1803 ई.) के अनुसार, भोंसले ने अंग्रेजों को कटक तथा वर्धा नदी के पश्चिम के सभी क्षेत्र दे दिए तथा यह वादा किया कि पेशवा और निजाम के मध्य के संघर्ष में अंग्रेज मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे और साथ में अपनी राजधानी नागपुर में उसने एक अंग्रेजी रेजीडेण्ट रखना स्वीकार कर लिया.
इस युद्ध के दूसरे पक्ष सिन्धिया से अंग्रेजों ने 30 दिसम्बर, 1803 ई. को 'सुर्जी अर्जुनगाँव' की सन्धि की. जिसके अनुसार, सिन्धिया ने गंगा और यमुना के मध्य का क्षेत्र, जयपुर, जोधपुर और गोहर के उत्तर के सभी क्षेत्र एवं दक्षिण में अहमदनगर, भड़ौंच और अजन्ता की पहाड़ियों के दक्षिण के क्षेत्र अंग्रेजों को सौंप दिए. मुगल सम्राट् शाहआलम, पेशवा एवं निजाम पर से उसका नियन्त्रण समाप्त कर दिया गया और उसकी राजधानी में अंग्रेजी रेजीडेण्ट रहने लगा. इसके बाद उसने वेलेजली की सहायक सन्धि को स्वीकार कर लिया.
(2) होल्कर ने सिन्धिया और भोंसले के साथ अंग्रेजों की सन्धि हो जाने के बाद 1804 ई. में अंग्रेजों पर अकेले आक्रमण कर दिया. उसने छापामार प्रणाली के अनुसार, लड़ते हुए राजपूताने में कर्नल मोन्स को पराजित कर दिया. होल्कर ने भरतपुर के राजा को अपनी ओर मिलाकर दिल्ली पर असफल आक्रमण किया. इसी बीच वेलेजली को वापस बुला लिया गया तथा कर्नल लेक ने भारत के राजा से सन्धि कर ली.
वेलेजली के बाद कार्नवालिस को गवर्नर जनरल बनाकर भारत भेजा गया, जिसकी अचानक मृत्यु (8 अक्टूबर, 1805 ई.) हो गई. अब उसके स्थान पर कौशल के योग्य एवं अनुभवी सदस्य बार्लो को नियुक्त किया गया, जिसने होल्कर से सन्धि कर ली. यह सन्धि राजपुर घाट (7 जनवरी, 1806 ई.) की सन्धि के नाम से जानी जाती है. इसके अनुसार, होल्कर ने टोंक, रामपुर, बूँदी, कूँच बुन्देलखण्ड आदि क्षेत्रों से अपने दावे हटा लिए तथा अंग्रेजों ने उसके राज्य का अधिकांश भाग लौटा दिया.
इन सन्धियों के बाद भी अंग्रेजों व मराठों में स्थायी शान्ति स्थापित नहीं हो सकी. अंग्रेजों ने सिन्धिया तथा अप्पा साहब से अलग-अलग सन्धि कर उनकी स्वतन्त्रता को समाप्त कर दिया तथा 13 जून, 1817 ई. को पेशवा से सन्धि कर अंग्रेजों ने पेशवा को मराठा संघ के प्रमुख का पद छोड़ देने के लिए बाध्य कर दिया. इस पर पेशवा ने पूना की ब्रिटिश रेजीडेन्सी में आग लगा दी. नागपुर के अप्पा साहब और होल्कर ने भी युद्ध करना प्रारम्भ कर दिया, परन्तु अँग्रेजों ने सीतावल्दी में भोंसले को, मेंहदीपुर में होल्कर को तथा कोर्की को कोरेगाँव में व अश्ती में पेशवा को पराजित कर मराठा राज्य पर अपना पूर्ण आधिपत्य कायम कर लिया. 1817 व 1818 ई. में लड़े गए इस युद्ध को तृतीय आंग्लमराठा युद्ध के नाम से जाना जाता है.
इस युद्ध के बाद पेशवा के पद को समाप्त कर दिया गया तथा उसे पेंशन देकर कानपुर के पास बिठूर में जागीर दे दी गई. उसके राज्य का छोटा हिस्सा सतारा का राज्य शिवाजी के वंशज प्रतापसिंह को दे दिया गया और शेष भाग कम्पनी के राज्य के अधीन कर दिया गया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शिवाजी के द्वारा स्थापित राज्य जिसे पेशवा बाजीराव एवं माधवराव ने साम्राज्य में बदला था, उसका अन्त सदा के लिए अंग्रेजों ने अपने तीसरे युद्ध में कर दिया तथा वे अब भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गए.
> अंग्रेजों के विरुद्ध मराठों के पराजय के कारण 
अंग्रेजों के विरुद्ध मराठों की असफलता के निम्नलिखित कारण थे—
1. प्रारम्भ में मराठा सरदारों में एकता थी उन पर पेशवा का प्रभावशाली नियन्त्रण था, लेकिन बाद में नारायणराव एवं बाजीराव द्वितीय के समय में मराठा सरदारों पर पेशवा का कोई नियन्त्रण नहीं रहा और वे स्वतन्त्र शासक की तरह व्यवहार करने लगे और उनके अन्दर आपसी ईर्ष्या-द्वेष ने कभी भी अंग्रेजों के विरुद्ध एक नहीं होने दिया, जो उनके पतन का एक निश्चित कारण बनी.
2. मराठा राज्य के पतन में मराठों की आर्थिक नीति ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. उनकी कोई भी ठोस आर्थिक नीति नहीं थी. वे अक्सर लूट-मार किया करते थे, जिसके कारण उनके चारों ओर शत्रु पैदा हो गए. इसके साथ ही महाराष्ट्र की बंजर भूमि को उन्होंने सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया.
3. शिवाजी ने जागीर प्रथा को प्रोत्साहन नहीं दिया था, किन्तु उनकी मृत्यु के बाद मराठा राज्य विभिन्न जागीरों में बँट गया और विभिन्न क्षेत्रों के मराठा प्रमुखों में एकता एवं सामंजस्य का भारी अभाव था.
4. मराठों का सैन्य-संगठन भी अंग्रेजों की तुलना में दोषपूर्ण था. वे अपनी प्राचीन छापामार युद्ध-नीति को छोड़ चुके थे तथा मैदानी लड़ाई के अभ्यस्त नहीं थे, ऐसी स्थिति में उनकी पराजय स्वभाविक थी.
5. उस समय अंग्रेजों की तुलना में राष्ट्रीयता की भावना का देश में अभाव था. प्रत्येक मराठा सरदार अपने राज्य के लिए लड़ा न कि, अपने सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए, जबकि अंग्रेज सदैव अपने राष्ट्र के लिए लड़ते थे.
6. मराठा सरदार अधिकांशतः फ्रांसीसी सैन्य अधिकारियों द्वारा अपनी सेना को प्रशिक्षित कराते थे एवं अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करते थे, परन्तु समय आने पर फ्रांसीसी मराठों को कोई सहायता न पहुँचा सके.
7. मराठा साम्राज्य अत्यन्त विशाल था, लेकिन जिन प्रदेशों को मराठों ने जीता और कभी भी उनकी शासनव्यवस्था की ओर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने जनहित के कल्याण के कार्य नहीं किए, जिससे उन्होंने आम जनता की सहानुभूति खो दी.
8. मराठा अपनी नीतियों के कारण से हैदराबाद के निजाम व मैसूर के टीपू को अपने साथ रखने में सफल नहीं हो सके. यदि वे इनको लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा कायम करते, तो निश्चित रूप से सफल होते.
9. अंग्रेजों से जब मराठों का संघर्ष हुआ उस समय तक मराठों के अनेक योग्य नेता; जैसे—महादजी सिन्धिया, अहिल्याबाई, तुकोजी होल्कर, नाना फड़नवीश आदि की मृत्यु हो चुकी थी. अतः योग्य नेतृत्व के अभाव में मराठों की हार निश्चित थी.
10. अंग्रेज अपनी कूटनीतिक योग्यता, कुशल सैन्य-प्रबन्ध, श्रेष्ठ गुप्तचर व्यवस्था में मराठों से अधिक श्रेष्ठ थे, वे मराठों की प्रत्येक गतिविधि की जानकारी आसानी से प्राप्त कर लेते थे. इसके विपरीत अंग्रेजों की किसी भी गतिविधि की जानकारी मराठों को नहीं रहती थी.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, मराठों की पराजय के लिए उनकी आपसी फूट एवं कलह, दोषपूर्ण सैन्य संगठन, आर्थिक नीतियों का अभाव, राजपूत शासकों का असहयोग, योग्य नेतृत्व का अभाव आदि ने मिलकर ऐसा संयोग रचा कि मराठा राज्य जिसकी धाक कन्याकुमारी से लेकर पंजाब तक थी, उसका अस्तित्व अँग्रेजों द्वारा सदा-सदा के लिए समाप्त कर दिया गया.
> अंग्रेज-सिख सम्बन्ध
> रणजीतसिंह व अंग्रेजों के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए. क्या रणजीत ने अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन उस ढंग से किया जिससे कि, उनके उत्तराधिकारियों को निष्कंटक राज्य प्राप्त हो सके ?
उन्होंने अपनी विजयों द्वारा सिखों के छोटे से राज्य को एक महाराजा रणजीतसिंह बड़े वीर एवं साहसी व्यक्ति थे हुई विशाल एवं संगठित राज्य में बदल दिया. उनकी बढ़ती शक्ति ने अंग्रेजों का ध्यान उनकी तरफ देने को विवश कर दिया. रणजीत ने इस समय सतलज नदी के पूर्व के प्रदेश लुधियाना और पटियाला को जीतकर अपने राज्य का हिस्सा बना लिया था. अतः इस ओर रणजीतसिंह के प्रसार को रोकना अंग्रेजों के लिए आवश्यक हो गया था. अतः अंग्रेज गवर्नर जनरल ने रणजीतसिंह से अनाक्रमण समझौता करने के लिए 'चार्ल्स मेटकॉफ' को भेजा. इस समय उन्होंने यह माँग की कि, उन्हें सिखों का 'सार्वभौम राजा' स्वीकार कर लिया जाए. कम्पनी ने इसे स्वीकार न कर रणजीतसिंह को बल प्रयोग द्वारा बाध्य करने के लिए 1809 ई. के फरवरी माह में एक अंग्रेज सेना भेजी. रणजीतसिंह ने अब अंग्रेजों से संघर्ष करने की अपेक्षा उन्होंने उनसे सन्धि करना उचित समझा. इधर अंग्रेज भी उनसे संघर्ष करने की स्थिति में नहीं थे. फलतः दोनों पक्षों में अमृतसर की सन्धि (25 अप्रैल, 1809) हुई, जिसकी शर्तें निम्नलिखित थीं – 
1. सतलज नदी को रणजीतसिंह के राज्य की दक्षिणी सीमा तय किया गया.
2. सतलज नदी के दक्षिण-पूर्व के सारे राज्य अंग्रेजी संरक्षण में स्वीकार किए गए.
3. लुधियाना में अंग्रेज सेना तैनात कर दी गई.
4. अंग्रेजों ने सतलज नदी के उत्तर में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया.
रणजीतसिंह की अंग्रेजों से की गई इस सन्धि से उनकी महत्वाकांक्षाओं पर पानी फिर गया. उनके राज्यं का पूर्व की ओर विस्तार रुक गया तथा कोई उपाय न देखते हुए उन्होंने उत्तर-पश्चिम तथा पश्चिम की ओर अपने राज्य का विस्तार जारी रखा, लेकिन उनका अंग्रेजों से संघर्ष करने का साहस न हुआ.
महाराजा रणजीतसिंह व कम्पनी 18 1828 से लेकर 1839 ई. तक सिन्ध को लेकर तनातनी चलती रही. रणजीतसिंह पर अधिकार करना चाहते थे और अंग्रेज भी इस उपजाऊ और व्यापारिक महत्व वाले प्रदेश को अपने नियन्त्रण में लेने के इच्छुक थे. फलतः लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1831 ई. में रणजीतसिंह से रोपड़ में भेंट की व पुरानी सन्धि की शर्तों को दोहराया. 1832 ई. में अंग्रेजों ने सिन्ध के अमीर से व्यापारिक सन्धि कर ली, इससे उन्हें बहुत अधिक दुःख हुआ. 1834 ई. में उनको शिकारपुर से अंग्रेजी फौजों के कारण विवश हो हटना पड़ा. 1835 ई. में अंग्रेजों ने फिरोजपुर पर भी अधिकार कर लिया, परन्तु वे कुछ नहीं कर सके. अंग्रेजों ने अफगान युद्ध के समय हुई सन्धि में रणजीतसिंह को भी सम्मिलित कर लिया, परन्तु रणजीतसिंह ने अपनी बुद्धिमानी से अंग्रेजों को अपने राज्य में हस्तक्षेप करने का अवसर नहीं दिया.
> प्रथम अंग्रेज- सिख युद्ध के कारण एवं परिणाम की समीक्षा
कारण- प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध का प्रमुख कारण सिख सेना का पंजाब में आतंक था. इस सेना की शक्ति को कम करने के उद्देश्य से और अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए रानी झिंडन सिख सेना को अंग्रेजों पर आक्रमण करने के लिए उकसा रही थी. उसका यह विचार था कि, यदि सिख सेना इस युद्ध में विजयी हुई तो उनके राज्य का विस्तार और होगा और यदि हार गई तो उसका प्रभाव पंजाब पर कम हो जाएगा.
अंग्रेजों ने भी सिखों की कमजोर राजनीतिक स्थिति को भुनाने का उपयुक्त अवसर माना. इस हेतु उन्होंने सतलज नदी के उस पार के कुछ सिख राज्य के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया. इस कारण से सिख सेना को युद्ध के लिए बाध्य होना पड़ा.
युद्ध-सिखों की खालसा सेना 13 दिसम्बर, 1845 ई. को सतलज नदी पार कर अंग्रेजों के विरुद्ध फिरोजपुर पहुँच गई. अब लॉर्ड हार्डिग्स ने सिखों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. सिख सेना ने बहुत ही बहादुरी से युद्ध किया, परन्तु लालसिंह तथा तेजसिंह जैसे देशद्रोहियों के कारण उन्हें पराजय का मुँह देखना पड़ा. मुदकी, फिरोजपुर, अलीवाल, सुबराव आदि के युद्धों में सिख सेना लगातार हारती गई और अंग्रेजों ने सतलज नदी को पार कर 20 फरवरी, 1846 को सिखों की राजधानी लाहौर पर अधिकार कर लिया. इससे सिखों को अंग्रेजों से सन्धि करने को विवश होना पड़ा और दोनों पक्षों में लाहौर की सन्धि हुई.
लाहौर की सन्धि (8 मार्च, 1845 ई.)
इस सन्धि की निम्नलिखित शर्तें थीं—
1. पंजाब का राज्य पुनः महाराजा रणजीतसिंह के अल्पव्यस्क पुत्र दिलीप को दे दिया तथा अंग्रेजों के इस युद्ध में सहायक रहे लालसिंह को मन्त्रि पद पर नियुक्ति दे दी गई.
2. दिलीपसिंह को रानी झिंडल के संरक्षण में रख दिया गया.
3. अंग्रेजों को युद्ध की क्षतिपूर्ति के लिए 1½ करोड़ रुपया देना स्वीकार करना पड़ा. इस हेतु उन्होंने कश्मीर का प्रदेश एक करोड़ में गुलाबसिंह डोंगरा को बेच दिया.
4. जालन्धर व दोआब के क्षेत्र पर अंग्रेजों का अधिकार स्वीकार कर लिया गया.
5. सिख सेना की संख्या कम कर दी गई. उसकी संख्या 20,000 हजार पैदल, 12,000 घुड़सवार तक सीमित कर दी गई. इसके अलावा इस युद्ध में काम आई सभी तोपें अंग्रेजों को देनी पड़ीं.
6. अंग्रेजों ने सिख राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने तथा राजा दिलीपसिंह की रक्षा का वचन दिया तथा उसकी सुरक्षा के लिए एक सेना बहाल कर दी गई.
लाहौर की सन्धि के बाद अंग्रेजों ने 16 दिसम्बर, 1846 ई. को भैरोंवाल की सन्धि सिखों से की, जिसमें लाहौर के अंग्रेज रेजीडेण्ट को पंजाब के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल गया तथा सम्पूर्ण पंजाब में कहीं भी अंग्रेज सेना रखी जा सकती थी.
सिखों के इस युद्ध में पराजय हो जाने के बाद भी उनका मनोबल नहीं टूटा, के अपनी हार का कारण विद्रोहियों का विश्वासघात मानते हुए अगले युद्ध की तैयारी करने लगे.
> द्वितीय अंग्रेज-सिख युद्ध के कारण तथा परिणाम
कारण- प्रथम अंग्रेज-सिख युद्ध के बाद हुई लाहौर की सन्धि को सिख अत्यन्त ही अपमानजनक मानते थे. इस सन्धि ने पंजाब में अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित कर दिया था तथा अनेक महत्वपूर्ण पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति की जाने लगी. सिखों ने प्रथम युद्ध में अपनी पराजय का कारण अपनी वीरता की कमी को न मानकर विद्रोहियों के विश्वासघात को माना. इसी प्रकार रानी झिंडन को अपने अधिकारों के छिन जाने का बड़ा दुःख था और सिख जाति के लोग रानी के अपमान से बुरी तरह क्षुब्ध थे. अतः युद्ध होना स्वाभाविक ही था.
युद्ध का तात्कालिक कारण मूलराज का विद्रोह था. वह मुल्तान का गवर्नर था तथा उसने अपने क्षेत्र में अनेक सुधार किए, लेकिन मालगुजारी का पूरा रुपया लाहौर दरबार में नहीं भेज सका. अतः अंग्रेज रेजीडेण्ट के दबाव के कारण उसे हटाकर उसके स्थान पर काहनसिंह को मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया गया. जब काहनसिंह अंग्रेजों के साथ पद ग्रहण करने मुल्तान गया, तब मुल्तान की सम्पूर्ण जनता ने मूलराज के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. पर अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड डलहौजी ने अपनी साम्राज्यवादी नीति के तहत पंजाब को अंग्रेजी राज्य में मिलाने का फैसला कर लिया. 
युद्ध — लॉर्ड डलहौजी ने मुल्तान का बहाना बनाकर सिखों के विरुद्ध अक्टूबर, 1848 में युद्ध की घोषणा करते हुए जनरल गॉफ को मुल्तान भेजा, जिसने 1849 में विद्रोहियों को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया. लेकिन चिलियांवाला का युद्ध अनिर्णायक रहा और इसमें अंग्रेजों को भारी क्षति उठानी पड़ी. इस पर अंग्रेजों द्वारा चार्ल्स नेपियर को भेजा गया तथा गुजरात के निकट उसने प्रसिद्ध ‘तोपों के युद्ध' में सिखों को बुरी तरह से पराजित कर दिया और यही युद्ध सिखों के लिए निर्णायक रहा. इस पर लॉर्ड डलहौजी ने कहा कि, “इसे भारतवर्ष में ब्रिटिश युद्ध के इतिहास में सबसे अधिक स्मरणीय युद्धों में से समझना चाहिए."
परिणाम - इस युद्ध का सीधा और सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि, पंजाब को लॉर्ड डलहौजी की 29 मार्च, 1848 की घोषणा द्वारा अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया. महाराजा दिलीपसिंह को पेंशन देकर रानी झिंडन के साथ इंग्लैण्ड भेज दिया गया. सिख सेना को भंग कर दिया गया और पंजाब का प्रशासन कमिश्नरों को सौंप दिया गया तथा विद्रोहियों को दण्ड देकर उनकी जागीरों को छीन लिया गया.
समीक्षा – पंजाब का अंग्रेजी राज्य में विलय के लिए सिख सेना की अतिशय महत्वाकांक्षा तथा विद्रोही सरदारों का विश्वासघात प्रमुख रूप से जिम्मेदार थे. इसके बावजूद पंजांब की, प्रथम अंग्रेज सिख युद्ध के बाद, दुर्दशा का कारण अंग्रेज. रेजीडेण्ट एवं अंग्रेजों की नीतियाँ थीं. भैरोंवाल की सन्धि से सही प्रशासन के संचालन के लिए अंग्रेज रेजीडेण्ट उत्तरदायी था न कि, महाराजा दिलीपसिंह सिखों ने पूर्ण रूप से प्रारम्भ में विद्रोह नहीं किया तथा महाराजा ने अन्त तक किसी भी प्रकार के विद्रोह में भाग नहीं लिया. इस दृष्टिकोण से डलहौजी का यह कार्य एकदम से अनुचित था. इतिहासकार इवांस बेल ने ठीक ही लिखा है कि, “पंजाब का विलय कोई विलय नहीं था, यह तो विश्वासघात था” परन्तु अंग्रेजों ने भारत में अपने राज्य का विस्तार ही नैतिकता को ताक में रख कर किया था. इस विजय से अंग्रेजी राज्य की सीमाएँ अफगानिस्तान तक पहुँच गईं और अंग्रेजों का विजय का कार्य भारत में लगभग पूरा हो गया.
अंग्रेज व मैसूर सम्बन्ध
> हैदरअली के समय में अंग्रेजों व मैसूर के सम्बन्ध 
हैदरअली ने एक साधारण परिवार में जन्म लेकर भी अपनी प्रतिभा एवं सैनिक योग्यता के बल पर मैसूर राज्य का सेनापति बना. सेनापति के रूप में उसने मैसूर की सेना का पुनर्गठन कर उसे यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित किया तथा अन्त में वह मैसूर के शासक कृष्णराज की 1766 ई. में मृत्यु हो जाने पर शासक बन गया.
शासक बनने के बाद हैदरअली ने वेदनूर, कनारा, सुण्ड, सिरा आदि प्रदेशों को जीतकर मैसूर राज्य में मिला लिया. इससे अंग्रेज, मराठे एवं निजाम ने चिन्तित होकर उसके विरुद्ध एक संगठन कायम कर लिया और हैदरअली को दक्षिण की राजनीति में अकेला कर दिया. अब मराठों ने हैदरअली पर आक्रमण किया जिसे उसने रिश्वत देकर लौटा दिया. इसी तरह उसने निजाम को भी अपनी ओर मिलाकर अँग्रेजों को अकेला कर दिया. अँग्रेजों ने अकेले ही हैदरअली पर आक्रमण किया. जब अँग्रेजों ने हैदरअली को 1768 ई. में त्रिनोमाली और चंगमा के युद्ध में पराजित कर दिया, तब निजाम पुनः पाला बदलकर अँग्रेजों के साथ चला गया. 
अब हैदरअली ने अकेले ही अपनी पूरी ताकत से अँग्रेजों के दक्षिण के प्रमुख केन्द्र मद्रास पर आक्रमण कर दिया. उसने अँग्रेजों को हराकर मंगलौर पर अधिकार कर लिया. इससे अँग्रेजों में घबराहट फैल गई और उन्होंने हैदरअली से मद्रास की सन्धि (अप्रैल 1769 ई.) कर ली और युद्ध को बन्द कर दिया गया. हैदरअली और अंग्रेजों के मध्य (1766 से 69 ई.) चले इस संघर्ष को 'प्रथम अँग्रेज - मैसूर युद्ध' के नाम से जाना जाता है.
मद्रास की सन्धि के अनुसार, दोनों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश लौटा दिए तथा दोनों ने एक-दूसरे को किसी तीसरे पक्ष के आक्रमण के समय सहायता देने का आश्वासन दिया. हैदरअली ने अंग्रेजों से एक बड़ी राशि युद्ध हर्जाने के रूप में भी वसूली. इससे हैदरअली की प्रतिष्ठा में बहुत अधिक वृद्धि हो गई तथा अँग्रेजों को इससे एक बड़ा आघात लगा. 
प्रथम अँग्रेज मैसूर युद्ध में मद्रास की सन्धि अंग्रेजों के लिए बहुत अधिक अपमानजनक थी तथा उस समय वारेन हेस्टिंग्स गवर्नर जनरल था. मराठों ने जब हैदरअली पर आक्रमण किया तब अँग्रेजों ने उसे कोई सहायता नहीं दी. अतः उसने अँग्रेजों को सबक सिखाने का निश्चय किया और 1779 ई. में अँग्रेजों के विरुद्ध मराठों और निजाम को मिलाकर एक संयुक्त मोर्चा कायम किया. इधर अंग्रेजों ने हैदरअली के मित्र फ्रांसीसियों के केन्द्र माही जो उसके राज्य में था, पर अधिकार कर लिया. इस पर हैदरअली ने बड़ी ही तीव्रता से अंग्रेजी सेना को हराकर अर्काट पर अधिकार कर लिया. इससे अंग्रेजों की स्थिति अत्यन्त ही दयनीय हो गई तब कलकत्ता से वारेन हेस्टिंग्स ने आयरकूट को एक बड़ी सेना के साथ भेजा व मराठों तथा निजाम को हैदरअली से कूटनीति द्वारा पृथक् कर दिया. आयरकूट ने हैदरअली को पोर्टोनोवा के युद्ध में (1783 ई.) बुरी तरह से पराजित कर दिया, लेकिन छिट-पुट संघर्ष दोनों में ही चलते रहे. इसी बीच हैदरअली की 1782 ई. में और आयरकूट की 1783 ई. में मृत्यु हो गई. अब हैदरअली के पुत्र टीपू सुल्तान ने युद्ध को जारी रखा. अन्त में 1784 ई. में 'मंगलौर की सन्धि' से शान्ति स्थापित हो गई. यह युद्ध 'द्वितीय अंग्रेज-मैसूर युद्ध' के नाम से जाना जाता है. मंगलौर की सन्धि के अनुसार, दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश तथा युद्धबन्दियों को लौटा दिया तथा अँग्रेजों ने यह वादा किया कि वे अब मैसूर के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. इससे टीपू की प्रतिष्ठा में बहुत अधिक वृद्धि हो गई. यद्यपि यह शान्ति स्थायी नहीं थी. 
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, हैदरअली ने मैसूर को एक संगठित राज्य में बदलकर अंग्रेजों को प्रथम युद्ध में पराजित कर उनसे अपमानजनक सन्धि स्वीकार करने पर विवश कर दिया. उसने अपनी कूटनीति का परिचय देते हुए अंग्रेजों को मराठों व निजाम से पृथक् कर दक्षिण की राजनीति में उन्हें अकेला कर दिया. हालांकि वह अंग्रेजों को अपने राज्य से पूर्ण रूप से बाहर निकालने के उद्देश्य में सफल नहीं हो सका, परन्तु वह एकमात्र अपने समय का ऐसा व्यक्ति था जिसने अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का बीड़ा उठाया था.
> टीपू सुल्तान और अंग्रेज सम्बन्ध या आंग्ल-मैसूर सम्बन्ध का द्वितीय चरण
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद हुई 'मंगलौर की सन्धि' द्वारा स्थापित शान्ति व्यवस्था को टीपू और अंग्रेज दोनों ही अस्थायी मानते थे तथा दोनों ही भावी युद्ध को आवश्यक समझते थे. टीपू के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने टीपू की विरोधी शक्तियों, मराठे व निजाम को अपनी तरफ मिला लिया, इससे टीपू दक्षिण में अकेला पड़ गया.
कार्नवालिस ने निजाम को अपनी एक सेना सहित पत्र भेजा जिसमें उसकी मित्र शक्तियों का नाम था, लेकिन उसमें टीपू का नाम नहीं था. इधर टीपू ने फ्रांस के नेपोलियन और तुर्की के सुल्तान से सहायता प्राप्त करने का प्रयास करने में लग गया. इससे टीपू और कम्पनी में ठन गई और टीपू ने 1787 ई. को जुलाई माह में त्रावणकोर के राजा जोकि अंग्रेजों के संरक्षण में था, पर हमला कर दिया. इससे कार्नवालिस ने भी टीपू के विरुद्ध आक्रमण की घोषणा कर दी तथा जनरल मीडोज को टीपू के विरुद्ध भेजा, परन्तु टीपू ने उसे हराकर कर्नाटक के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया. इसी बीच कार्नवालिस ने निजाम और मराठों से सन्धि कर ली तथा आपस में तीनों पक्ष टीपू की हार के बाद उसका राज्य बाँट लेने पर सहमत हो गए. 
अब टीपू के विरुद्ध युद्ध संचालन का नेतृत्व स्वयं कार्नवालिस ने करना प्रारम्भ किया तथा बंगलौर पर अधिकार कर लिया. इधर टीपू ने भी कोयम्बटूर पर अपना अधिकार जमा लिया, परन्तु दोनों पक्षों में श्रीरंगपट्टम में अन्तिम और निर्णायक युद्ध लड़ा गया जिसमें टीपू की हार हो गई और उसकी राजधानी पर अंग्रेजों का अधिकार हो जाने से दोनों पक्षों में सन्धि वार्ता हुई जिसे श्रीरंगपट्टम की सन्धि कहा जाता है. इससे मैसूर-आंग्ल तृतीय युद्ध समाप्त हो गया.
श्रीरंगपट्टम की सन्धि (मार्च 1792 ई.) के अनुसार टीपू का आधा राज्य उससे लेकर कम्पनी, मराठों तथा निजाम के मध्य बाँट लिया गया. इसके साथ ही टीपू ने लगभग 30 लाख पौण्ड युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में देना स्वीकार किया और अपने दो पुत्रों को जमानत के तौर पर कार्नवालिस को सौंप दिया. इससे दक्षिण में टीपू का प्रभाव कम हो गया तथा अंग्रेजों के पाँव दक्षिण में जम गए.
> चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)
टीपू ने तीसरे युद्ध में हार जाने के बाद भी अपना धैर्य नहीं खोया तथा सन्धि की शर्तों का ईमानदारी से पालन किया और इसके साथ ही उसने अपने राज्य की व्यवस्था को मजबूत कर अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार कर लिया. टीपू ने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टम को पहले से अधिक मजबूत किलेबन्दी द्वारा सुरक्षित कर लिया. उसने अरब, काबुल, कुंस्तुनतुनिया एवं मारीशस में अपने दूत भेजे तथा वहाँ के शासकों से मदद का आश्वासन प्राप्त किया. इससे अंग्रेज चिन्तित हो गए.
ऐसी स्थिति में 1790 ई. में लाई वेलेजली गवर्नर जनरल बनकर भारत आया और आते ही उसने टीपू व फ्रांसीसियों को भारत में समाप्त करने का निश्चय कर लिया तथा टीपू पर विदेशी शक्तियों से साठ-गाँठ का आरोप लगाकर 20 फरवरी, 1799 ई. को श्रीरंगपट्टम को घेर लिया. टीपू किले की रक्षा करता हुआ 4 मई, 1799 ई. को मारा गया तथा उसके पुत्रों ने आत्मसमर्पण कर दिया. 
टीपू की मृत्यु के साथ ही अंग्रेजों ने मैसूर के राज्य को निजाम और अंग्रेजों ने आपस में बाँट लिया. मराठों ने इस बँटवारे में भाग लेने से मना कर दिया. मैसूर के छोटे-से भाग पर पुराने राजवंश के अवयस्क राजकुमार को गद्दी पर बैठाकर राजा घोषित कर उसके साथ सहायक सन्धि कर ली और अब मैसूर में अंग्रेजी नियन्त्रण स्थापित हो गया.
> टीपू सुल्तान के मरने के बाद मैसूर राज्य का बँटवारा
चतुर्थ मैसूर युद्ध में टीपू के मारे जाने के बाद अंग्रेजों को मैसूर की ओर से खतरा जो तीस वर्षों से निरन्तर चला आ रहा था, समाप्त हो गया. अंग्रेजों ने निजाम के साथ मैसूर का बँटवारा कर लिया, क्योंकि मराठों ने बँटवारे में भाग लेने से स्पष्ट मना कर दिया था.
(i) निजाम – गुटी, गुरमकोड और चुत्तल दुर्ग के प्रदेश. 
(ii) अंग्रेज – कनारा, विनाद, कोयम्बटूर, दारापुरम, श्रीरंगपट्टम और दो अन्य जिले.
(iii) मराठे – उत्तर-पश्चिम के कुछ प्रदेश मिले थे, जिसे उसने लेना अस्वीकार कर दिया.
इस प्रकार दोनों शक्तियों ने मैसूर के राज्य को आपस में बाँट लिया तथा शेष मैसूर राज्य को वाड्यार वंश के अवयस्क राजकुमार को देकर उसे राजा घोषित कर उसके साथ सहायक सन्धि कर ली, जिसके अनुसार-
1. मैसूर की रक्षा के लिए एक सेना वहाँ रहेगी, जिसका खर्चा 7 लाख पौण्ड मैसूर राज्य देगा.
2. युद्ध के समय मैसूर राज्य के साधनों का प्रयोग अंग्रेज अपनी इच्छानुसार कर सकेंगे.
3. आन्तरिक कुशासन के समय अंग्रेज मैसूर राज्य का शासन-प्रबन्ध अपने हाथ में ले लेंगे और बाद में विलियम बैंटिक ने मैसूर पर कुशासन का आरोप लगाकर मैसूर को अँग्रेजों ने अपने अधिकार में ले लिया.
मैसूर राज्य के इस बँटवारे ने उसके आकार एवं साधनों को सीमित कर दिया तथा बाद में उसकी अंग्रेजों से प्रतिरोध करने की शक्ति भी समाप्त हो गई.
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Sun, 08 Oct 2023 09:44:22 +0530 Jaankari Rakho
यूरोपीय शक्तियों का उदय – ब्रिटिश सत्ता का विस्तार एवं संगठन https://m.jaankarirakho.com/427 https://m.jaankarirakho.com/427 यूरोपीय शक्तियों का उदय – ब्रिटिश सत्ता का विस्तार एवं संगठन

> भारत में यूरोपीय कम्पनियों का आगमन
> भारत में पुर्तगालियों का आगमन, शक्ति विस्तार एवं पतन के कारण
अरबों ने मुगलों की पतनावस्था का लाभ उठाकर यूरोप जाने वाले स्थलीय व्यापारिक मार्गों पर अधिकार कर लिया तब भारत व यूरोप के मध्य सीधा व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए नये मार्गों के खोज की आवश्यकता पड़ी. पुर्तगाली व्यापारियों ने अन्य यूरोपीय कम्पनियों से बाजी मार ली और 17 मई, 1498 ई. को वास्कोडिगामा ने उत्तम आशा अंतरिप (Cape of the good hope) होते हुए कालीकट नामक बन्दरगाह पर पुर्तगाल से समुद्री मार्ग द्वारा भारत पहुँचा, जहाँ उसका कालीकट के शासक जेमोरिन द्वारा स्वागत किया गया. इस प्रकार भारत व यूरोप के मध्य वास्कोडिगामा ने सीधा समुद्री व्यापारिक मार्ग की खोज की.
वास्कोडिगामा के अनुरोध पर कालोकट के जेमोरिन ने पुर्तगालियों को कालीकट में बसने और व्यापार करने की सुविधा प्रदान की, जिसका अरबों ने विरोध किया इसके बावजूद भी पुर्तगाली शक्ति का निरन्तर विस्तार होता रहा.
भारत में पुर्तगाली शक्ति का विस्तार निम्नलिखित चरणों में हुआ—
> प्रथम चरण (1498–1505 ई.)
इस काल में पुर्तगाली व्यापारियों की प्रमुख नीति सशस्त्र व्यापार की नीति थी. इसके अनुसार प्रत्येक वर्ष एक सशस्त्र पुर्तगाली जहाज भारत आता और यहाँ से माल लेकर पुर्तगाल चला जाता था और भारत में अपनी शक्ति का विस्तार करने का प्रयास करता. उन्होंने कालीकट, कोचीन, कन्नौर में इस अवधि में अपनी व्यापारिक किलेबन्द कोठियाँ स्थापित कर लीं तथा कोचीन के जेमोरिन से अपनी घनिष्ठता स्थापित कर पुर्तगालियों ने कालीकट के जेमोरिन और अरबों के हितों को नुकसान पहुँचाना प्रारम्भ कर दिया.
> द्वितीय चरण (1505–1509 ई.)
1505 ई. में पुर्तगाल ने डी-अल्मेडा को भारतीय पुर्तगाली क्षेत्रों का गवर्नर नियुक्त किया. अल्मेडा ने भारत आकर 'नीले पानी की नीति' (Blue Water Policy) का अनुसरण किया. उसकी इस नीति का उद्देश्य हिन्द महासागर में पुर्तगाली शक्ति को सर्वश्रेष्ठ बनाना था. उसने अपनी इस नीति के तहत मालाबार तट व अफ्रीका के पूर्वी तट पर अपना अधिकार जमा लिया और अरबों की ताकत को नष्ट करने का प्रयास किया. 1509 ई. में वह वापस पुर्तगाल चला गया.
> तृतीय चरण (1509 ई-1515 ई.)
अल्मेडा के बाद भारत में पुर्तगाली गवर्नर अल्फांसो-डीअल्बुकर्क आया और इसने पुर्तगाली शक्ति का विस्तार करने के लिए साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया. इस हेतु उसने 1510 ई में बीजापुर से गोआ छीन लिया. इसके अलावा उसने मलक्का और फारस की खाड़ी में होरमुज द्वीप अधिकार कर कोचीन में एक मजबूत किले का निर्माण करवाया. गोआ में उसने पुर्तगालियों की संख्या बढ़ाने के लिए भारतीय स्त्रियों से पुर्तगालियों के विवाह को प्रोत्साहित किया. उसके इन सब प्रयासों से भारत में पुर्तगालियों की स्थिति मजबूत हो गई.
> चतुर्थ चरण
1515 ई. अल्बुकर्क की मृत्यु हो जाने के कारण लोपासारस गवर्नर बना. उसके समय में श्रीलंका, चटगाँव, बम्बई, मद्रास, हुगली आदि स्थानों पर पुर्तगाली आधिपत्य कायम हुआ. इसके अतिरिक्त दमन, दिव, सालसिट, बेसिन आदि स्थानों पर भी उनका अधिकार जम गया.
पुर्तगालियों का यह अधिकार 17वीं सदी से पूर्व तक बना रहा, परन्तु धीरे-धीरे परिस्थितियाँ उनके विरुद्ध होने लगीं और भारत में गोआ को छोड़कर उनके सभी केन्द्र अंग्रेजों के अधीन हो गये.
> भारत में पुर्तगालियों के पतन के निम्नलिखित कारण थे-
1. पुर्तगालियों के पतन का सर्वाधिक उल्लेखनीय कारण 1580 ई. में स्पेन द्वारा पुर्तगाल पर अधिकार कर लिया था. स्पेन के शासकों ने भारतीय व्यापार और उपनिवेश की स्थापना में कोई रुचि नहीं प्रकट की. इससे उनके भारतीय व्यापारिक केन्द्रों को कोई आवश्यक सहायता न मिल सकी, जिसके कारण उनके केन्द्रों में अव्यवस्था उत्पन्न हो गई. डचों तथा मराठों उनके केन्द्रों पर अधिकार कर लिया.
2. विजयनगर साम्राज्य के शासक पुर्तगालियों को अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्रदान करते थे, परन्तु 1565 ई. के राक्षसी तंगड़ी युद्ध के बाद विजयनगर साम्राज्य का अस्तित्व समाप्त हो गया. इससे पुर्तगालियों को अब कोई सुविधा स्थानापन्न शासकों द्वारा नहीं मिली.
3. अल्बुकर्क के बाद भारत में आने वाले पुर्तगाली अधिकारियों में योग्यता का अभाव था. फलतः वे साम्राज्य के हितों की रक्षा नहीं कर सके.
4. पुर्तगालियों के अधिकारी भ्रष्ट, रिश्वतखोर एवं लालची थे. उनके केन्द्रों में समुचित न्याय और शान्ति व्यवस्था के उपाय नहीं किये गये. इस कारण से उन्हें कोई भी जनसमर्थन नहीं मिला.
5. पुर्तगाल एक छोटा-सा देश होने के कारण उसके साधन भी अत्यन्त सीमित थे. यूरोप से भारत की इतनी अधिक दूरी थी कि सीमित साधनों से इस पर नियन्त्रण रखना अत्यन्त कठिन था.
6. नये देशों की खोज के क्रम में पुर्तगालियों ने ब्राजील को खोज लिया, इससे उनका ध्यान भारत की तरफ से हटकर ब्राजील की ओर हो गया.
7. भारत में पुर्तगालियों को पहले मुगलों की संगठित शक्ति और बाद में मराठों का सामना करना पड़ा. इन दोनों ताकतों के सम्मुख उनको भारत में पाँव जमाने का अवसर नहीं मिल सका.
8. पुर्तगालियों के पतन में उसके यूरोपीय प्रतिद्वन्द्वियों ने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं, अंग्रेज, डच, फ्रांसीसी आदि पुर्तगालियों से अधिक शक्तिशाली थे. अंग्रेजों ने सभी यूरोपीय कम्पनियों को भारत में दिया.
9. पुर्तगालियों के पतन में उनकी धार्मिक नीति भी उत्तरदायी थी. उन्होंने भारतीयों को जबरदस्ती ईसाई बनाना प्रारम्भ कर दिया. इससे उनके प्रति जनता में घृणा फैल गयी. वे भारतीयों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते एवं लूट-खसोट कर सम्पत्ति अर्जित करते थे.
इस प्रकार उपर्युक्त विवचेन से स्पष्ट है कि पुर्तगालियों की चारित्रिक और प्रशासनिक दुर्बलताएँ उनकी धर्मान्धता तथा भारतीय शक्तियों और उसके यूरोपीय प्रतिद्वन्द्वियों आदि ने मिलकर उनका भारत में पतन कर दिया.
> भारत में डच शक्ति की स्थापना तथा पतन
भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से 1592 ई. में हॉलैण्ड के एमस्टरडम के व्यापारियों ने एक व्यापारिक कम्पनी की स्थापना की और 1595 ई. में पहला डच जहाजी बेड़ा कोरनिलियन हाउतमैन के नेतृत्व में हॉलैण्ड से भारत के लिए चला और पूर्वी द्वीपसमूहों से व्यापार कर 1597 ई. वापस लौट गया. उसकी इस यात्रा से उनको काफी लाभ हुआ. इससे उत्साहित होकर 20 मार्च, 1602 ई. को राजकीय घोषणा के आधार पर 'यूनाइटेड ईस्ट इण्डिया कम्पनी ऑफ दी नीदरलैण्ड' की स्थापना की गई. और इसे युद्ध चलाने, सन्धि करने, प्रदेशों पर अधिकार करने, और किलेबन्दी करने का अधिकार दिया गया.
डच कम्पनी का प्रारम्भ में उद्देश्य भारत के साथ व्यापार करना था. अतः उन्होंने कोरोमण्डल तट, गुजरात, बंगाल आदि स्थानों पर अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कीं. कुछ समय बाद पुलीकत, सूरत, चिनसुरा, कासिम बाजार, पटना, बालासोर, बारानगर, नागापट्टम और कोचीन आदि पर भी उनकी कोठियाँ स्थापित कर दीं. इन बस्तियों की स्थापना से पूर्वी द्वीपसमूहों के मसाले के व्यापार पर उनका एकाधिकार स्थापित हो गया.
डच - पुर्तगाल संघर्ष - डचों के आगमन से पूर्व भारत में व्यापार पर पुर्तगालियों का एकाधिकार था. इससे उनका व्यापार पुर्तगालियों के कारण सुरक्षित नहीं रख सकता था. अतः उन्होंने स्थानीय शासकों से मित्रता की और जनता को उनके विरुद्ध भड़काकर पुर्तगाली क्षेत्रों पर अधिकार प्रारम्भ कर दिया. 1605 ई. में डचों ने पुर्तगालियों से आम्बियाना ले लिया तथा मसाले के द्वीपों से उन्हें बाहर कर दिया. 1619 ई. में उन्होंने जकार्ता पर अधिकार कर लिया और वहाँ बाटाविया नामक नगर बसाकर उसे अपनी सत्ता का प्रमुख केन्द्र बना दिया. गोआ पर आक्रमण किया (1639 ई.), 1641 ई. में उन्होंने मलक्का पर अपना अधिकार जमा लिया, 1658 ई. में लंका पर भी अधिकार कर पुर्तगाली शक्ति को नष्ट कर दिया. 1664 ई. तक मालाबार तट पर पुर्तगालियों के अधिकांश क्षेत्र डचों के अधीन हो गये और इससे डचों की शक्ति का विस्तार हो गया.
अंग्रेज व डच - डचों की निरन्तर विस्तारवादी नीति के कारण उनका अंग्रेजों से भी संघर्ष प्रारम्भ हो गया. अतः डचों ने अंग्रेजों को मसाले के द्वीपों से दूर रखने के लिए डचों के गवर्नर रेण्टा ने वहाँ के सरदारों को दण्डित किया, क्योंकि वे अंग्रेजों से व्यापार करते थे और अंग्रेजों को ओम्बियाना से खदेड़ दिया. 1618 ई. के युद्ध में अंग्रेजों को डचों ने थल व जल दोनों युद्धों में परास्त कर दिया. अतः 1619 ई. में अंग्रेजों को डचों से सन्धि करनी पड़ी, लेकिन कुछ समय बाद डचों ने लंतोर व नुलोरेन से अंग्रेजों को खदेड़ दिया. ओम्बिना के डच गवर्नर बेंसपेल्ट ने अठारह अंग्रेजों पर डच किले पर हमला करने का झूठा आरोप लगाया और उनसे अपराध कबुलवाने के लिए अत्याचार किये गये और अन्त में उन्हें मृत्युदण्ड दे दिया गया. इस घटना से अंग्रेजों ने अपना ध्यान धीरे-धीरे मसाले के द्वीपों से हटाकर भारत की तरफ कर दिया. और यहाँ भी उनका डचों से संघर्ष चलता रहा, लेकिन 1760 के बेदारा के युद्ध में डचों को अंग्रेजों ने निर्णायक रूप से परास्त कर भारत से खदेड़ दिया. 
> डचों की असफलता के कारण 
डचों की असफलता के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे. सर्वप्रथम डच कम्पनी के स्वरूप ने उसके लिए पतन निश्चित कर दिया. यह एक सरकारी कम्पनी थी और उस समय हालैण्ड की सरकार यूरोप की राजनीति में बुरी तरह से फँसी हुई थीं. उसे हमेशा इंग्लैण्ड और फ्रांस के साथ युद्ध रत में रहना पड़ रहा था. फलतः सरकार डच कम्पनी के आर्थिक हितों की रक्षा करने में असमर्थ हो गयी और न ही उसकी आवश्यकता के समय उसकी कोई सहायता ही कर पायी.
डच कम्पनी के पतन में उसके भ्रष्ट एवं अयोग्य उत्तराधिकारियों का भी महत्वपूर्ण योगदान था. उनमें देश - भक्ति की भावना का सर्वथा अभाव था वे लोग सदैव अपनी स्वार्थ पूर्ति में लगे रहते थे.
डच कम्पनी के पतन में अंग्रेजों से उनके हुए संघर्ष का भी उल्लेखनीय योगदान था. अंग्रेज डचों की अपेक्षा अधिक दूरदर्शी एवं व्यावहारिक थे. उनके पास योग्य कूटनीतिज्ञों की सेवाएँ विस्तृत साधन थे, जलशक्ति में उनका सामना विश्व का उस समय कोई भी देश नहीं कर सकता था. अंग्रेजों ने भारत में ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी जिससे कि डचों को भारत में अपना राज्य स्थापित करने का स्वप्न त्यागकर मसाले के द्वीपों पर निर्भर रहने के लिए बाध्य हो जाना पड़ा.
> भारत में अंग्रेजों के आगमन को विस्तार से समझाइये.
भारत से व्यापार के कारण पुर्तगालियों एवं डचों की बढ़ती हुई समृद्धि ने अंग्रेजों को भारत से व्यापार करने को प्रेरित किया. अतः 31 दिसम्बर, 1600 ई. में भारत एवं पूर्वी- द्वीपसमूहों से व्यापार करने के उद्देश्य से इंग्लैण्ड के कुछ व्यापारियों ने मिलकर एक कम्पनी 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी' या 'दी गवर्नर एण्ड कम्पनी ऑफ मर्चेण्ट्स ट्रेडिंग इन टू ईस्ट इण्डीज' बनाई. जिसे रानी एलिजाबेथ ने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी.
1608 ई. में हॉकिन्स के नेतृत्व में अंग्रेजी जहाज 'हेक्टर' सूरत पहुँचा और उसने मुगल सम्राट जहाँगीर से भेंट कर अपने सम्राट जेम्स प्रथम का पत्र दिया और व्यापार करने की अनुमति माँगी. 6 फरवरी, 1613 ई. को जहाँगीर ने अंग्रेजों को सूरत में फैक्टरी खोलने एवं मुगल दरबार में अपना राजदूत रखने की अनुमति प्रदान कर दी, किन्तु इसे पुर्तगालियों के कहने पर रद्द कर दिया गया. 1615 ई. में सर टामस रो ब्रिटेन के सम्राट के राजदूत की हैसियत से जहाँगीर से मिला, यह एक चालाक, व्यवहार कुशल और धूर्त कोठियाँ खोलने की अनुमति प्राप्त कर ली तथा अंग्रेजों की व्यक्ति था. उसने अपनी बुद्धिमानी से जहाँगीर से भारत में सुरक्षा का दायित्व भी अपने ऊपरी ले लिया. इससे अंग्रेजों को व्यापारिक लाभ मिला और टामस रो के वापस जाने (1619 ई.) तक सूरत के अलावा आगरा, भड़ौंच अहमदाबाद आदि स्थानों पर अंग्रेजों के व्यापारिक केन्द्र स्थापित हो चुके थे. धीरे-धीरे अंग्रेजों ने व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना का कार्य जारी रखा और 1631 में मछलीपट्टम्, 1633 में हरिपुर और बालासोर तथा 1640 ई.. में चन्द्रगिरि के राजा से मद्रास खरीदकर अपनी कोठियाँ स्थापित की. उन्होंने मद्रास में ही सेंट जार्ज नामक किले का निर्माण भी करवाया. अंग्रेजों ने 1651 ई. में हुगली, पटना, कासिम बाजार में भी अपनी कोठियाँ स्थापित कीं. हुगली में ही आज कोलकाता नगर बसा हुआ है. 1661 ई. में इंग्लैण्ड के राजा चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन से होने पर उसे बम्बई का द्वीप दहेज में मिला जिसे कम्पनी ने 10 पौण्ड वार्षिक किराये की दर से ले लिया. 1661 ई. में ही कम्पनी ने सम्राट चार्ल्स द्वितीय से सिक्के ढालने, किलेबन्दी करने, पूर्व में बसने वाली अंग्रेजी प्रजा पर भी न्याय का शासन चलाने और अक्रिस्तान राष्ट्रों के साथ युद्ध एवं सन्धि करने का अधिकार प्राप्त कर लिया.
इन सभी से कम्पनी की स्थिति मजबूत हो गई और अब वह व्यापारिक कम्पनी के साथ एक राजनीतिक शक्ति बन गई और अपनी सुरक्षा के लिए उसने अन्य किसी पर निर्भर न रहने के स्थान पर स्वयं तैयार होने लगी. इस उद्देश्य से जब मुगलों ने चटगाँव ओर पुर्तगालियों ने सालसेट अंग्रेजों से लेने का प्रयास किया तब अंग्रेजों ने उनके विरुद्ध कार्यवाही की और बालासोर में मुगल किलेबन्दी को 1688 ई. में केप्टन हीथ के नेतृत्व में नष्ट कर दिया. इसी वर्ष अंग्रेजों ने सूरत में मुगल जहाजों को लूट लिया. इससे 1690 ई. में औरंगजेब ने अंग्रेजों द्वारा क्षमा माँगे जाने पर और हर्जाना चुकाने पर उन्हें निर्बाध रूप से व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी. इसी प्रकार से 3000 रुपये सालाना चुंगी के बदले बंगाल में भी अंग्रेजों को व्यापार करने की अनुमति मिल गई. 1699 ई. में अजीम-उस-शान ने 1300 रुपये में सुतानुती, गोविन्दपुर और कालीकाता के गाँवों की जमींदारी खरीदने की आज्ञा प्रदान कर दी और अंग्रेजों ने 1700 ई. में यहाँ फोर्ट विलियम दुर्ग का निर्माण करा दिया, जो बंगाल प्रेसीडेन्सी का प्रमुख केन्द्र बन गया.
इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि अंग्रेजों के इन प्रारम्भिक कार्यों से उनकी स्थिति भारत में अत्यन्त सुदृढ़ हो गई और वे अब देशी और विदेशी दोनों शक्तियों का मुकाबला करने में अपने स्वयं के साधनों से सक्षम हो गये.
> भारत में फ्रांसीसी कम्पनी की स्थापना
भारत में यूरोपीय कम्पनियों के आगमन के क्रम में फ्रांसीसी सबसे बाद में आये. उन्होंने अन्य यूरोपीय कम्पनियों को भारतीय व्यापार से लाभ कमाते देखकर 1611 ई. में मेडागास्कर में उपनिवेश स्थापित करने एवं भारत से व्यापार करने के लिए एक कम्पनी खोली, जो शीघ्र ही असफल हो गई. 1642 ई. में फ्रांस के मन्त्री रिशालू ने पुनः व्यापार के उद्देश्य से तीन कम्पनियों की स्थापना की, जोकि अपने उदेश्यों में सफल नहीं हो सकी.
अन्त में 1664 ई. में फ्रांस के सम्राट लुई 14वें के शासन काल में उसके मन्त्री कालबर्ट ने फ्रांसीसी ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की, जिसके निम्नलिखित तीन प्रमुख उद्देश्य थे—
(1) राजनीतिक शक्ति की स्थापना,
(2) राजा की शक्ति को और सबल बनाना, व 
(3) ईसाई धर्म का प्रचार और प्रसार करना.
1667 ई. में फ्रांसीसी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के डायरेक्टर -जनरल फ्रांसिस कैरन ने भारत के लिए प्रस्थान किया और 1668 ई. में उसने सूरत में एक फ्रांसीसी कोठी की स्थापना की. उसके प्रयासों से फ्रांसीसियों को भी वे सभी सुविधाएँ प्राप्त हो गईं जो मुगलों की ओर से डच व अंग्रेज व्यापारियों को प्रदान की गई थीं. फ्रांसीसियों ने सूरत के अंतिरिक्त मछलीपट्टम (1669) में अपनी दूसरी कोठी की स्थापना की. 1673 ई. में घालिकोंडपुरम के शासक से एक छोटा-सा गाँव प्राप्त किया जिसमें पाण्डिचेरी की स्थापना हुई. इसके बाद फ्रांसीसियों ने चन्दन नगर, माही, कालीकट, मारीशस आदि स्थानों पर 1739 ई. तक अपने सुदृढ़ व्यापारिक केन्द्र स्थापित कर लिये. 1740 ई. के बाद कम्पनी ने भारत की राजनीतिक अव्यवस्था का लाभ उठाकर भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप की योजना बनाई, जिसके कारण अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के मध्य अनेक भीषण युद्धों का सूत्रपात हुआ और अन्ततः फ्रांसीसियों की भारत में पराजय हो गयी और भारत में अंग्रेजों की शक्ति सर्वोच्च हो गई.
> दक्षिण - भारत में प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अंग्रेजों व फ्रांसीसियों में संघर्ष
दक्षिण भारत में प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अंग्रेजो व फ्रांसीसियों के मध्य तीन बार युद्ध हुए जिन्हें ‘कर्नाटक के युद्धों' के नाम से जाना जाता है. इस युद्ध में अन्ततः अंग्रेजों को सफलता मिली, जिसके कारण भारत में फ्रांसीसियों का प्रभुत्व स्थापना का स्वप्न समाप्त हो गया और अंग्रेजों ने भारतीय साम्राज्य की व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त किया.
प्रथम कर्नाटक युद्ध के कारण, घटनाएँ व परिणाम 
प्रथम कर्नाटक युद्ध के निम्नलिखित कारण थे
1. 1740 ई. में इंग्लैण्ड और फ्रांस में आस्ट्रिया के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर युद्ध आरम्भ हो गया. अतः उसकी प्रतिध्वनि भारत में भी सुनाई दे यह स्वाभाविक ही था.
2. इस समय तक मुगलों का पतन हो चुका था और दक्षिणभारत में इस समय तक अनेक छोटे-छोटे राज्यों का उदय हो चुका था और वे आपस में संघर्षरत थे. अतः अंग्रेजों और फ्रांसीसियों दोनों ने ही उनकी कमजोरी का लाभ उठाकर साम्राज्य निर्माण का स्वप्न सँजोया.
3. युद्ध का तात्कालिक कारण यह था कि अंग्रेजी नौसेना ने कुछ फ्रांसीसी जलयानों को अपने अधिकार में ले लिया था.
घटनाएँ— फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने अंग्रेजों से अपने जहाजों को छुड़ाने तथा बदला लेने के लिए मारीशस के फ्रांसीसी गवर्नर से सहायता माँगी और मद्रास पर आक्रमण करने की योजना बनाई. डूप्ले और ला-बुर्डाने ने मिलकर मद्रास को जीत लिया और क्लाइव सहित अनेक अंग्रेजों को बन्दी बना लिया. अब बुर्डाने ने 4 लाख पौंड का हर्जाना वसूल कर मद्रास अंग्रेजों को लौटाकर वापस चला गया. डूप्ले ने अकेले ही मद्रास पर पुनः अधिकार कर लिया और इसके बाद उसने फोर्ट सेन्ट डेविड पर अधिकार करने का प्रयास किया जिसमें वह असफल रहा.
अब अंग्रेजों ने पाण्डिचेरी पर आक्रमण कर दिया, परन्तु उन्हें भीषण हानि उठाकर वापस लौटना पड़ा, इस पर अंग्रेजों ने कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन से सहायता की याचना की. नवाब ने युद्ध बन्द करने को दोनों कम्पनियों को आदेश दिया. इस पर डूप्ले ने नवाब को यह आश्वासन दिया कि वह मद्रास को जीतकर नवाब को सौंप देगा, परन्तु उसने अपना अधिकार बनाये रखा तथा लूट का सारा माल भी स्वयं रख लिया. इस पर क्रुद्ध होकर नवाब ने डूप्ले पर आक्रमण कर दिया. सेंट थोमें नामक स्थान पर नवाब की एक बड़ी सेना को डूप्ले के सेनापति पेराडाइज ने अपनी छोटी-सी सेना से परास्त कर दिया. लेकिन इसी समय 1748 ई. में यूरोप में इंग्लैण्ड व फ्रांस के मध्य 'एक्सलाशेपेल की सन्धि' हो गई, जिससे वहाँ दोनों में युद्ध बन्द हो गया. परिणामस्वरूप भारत में भी दोनों कम्पनियों में समझौता हो गया तथा संघर्ष समाप्त हो गया.
परिणाम—इस युद्ध ने भारतीयों की सैनिक दुर्बलता को स्पष्ट कर दिया तथा यह सिद्ध कर दिया कि यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित सेना की एक टुकड़ी एक बड़ी भारतीय फौज को हटाने के लिए पर्याप्त है.
इस युद्ध ने भारतीय राजनीति के खोखलेपन को साबित कर दिया. इससे कम्पनियों की महत्वाकांक्षा का अधिक विस्तार हो गया और वे अब भारतीय राज्यों की राजनीति में खुलकर हस्तक्षेप करने के लिए स्वतन्त्र हो गईं.
> द्वितीय कर्नाटक युद्ध के कारण, घटनाएँ एवं परिणाम
कारण–प्रथम कर्नाटक युद्ध के बाद हुई एक्सलाशेपेल की सन्धि से स्थापित हुई सन्धि अस्थायी सिद्ध हुई तथा अंग्रेज और फ्रांसीसी दोनों ही इस अवसर की तलाश में लग गये कि अपने आधिपत्य का और अधिक विस्तार कैसे किया जाये.
1. शीघ्र ही दोनों शक्तियों को हैदराबाद और कर्नाटक के उत्तराधिकार के युद्ध के समय यह सुअवसर प्राप्त हो गया 21 मई, 1748 ई. के दिन हैदराबाद के निजाम आसफशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र नासिर जंग गद्दी पर बैठा, परन्तु निजाम के पौत्र ने इसका विरोध किया, फलतः हैदराबाद में गृह युद्ध प्रारम्भ हो गया.
2. हैदराबाद के समान ही कर्नाटक में भी अशान्ति थी. कर्नाटक में अनवरुद्दीन के विरोधी स्वर्गीय नवाब दोस्तअली के दामाद चाँदा साहब को नवाब बनाने के लिए प्रयासरत थे. अतः इन परिस्थितियों का लाभ उठाकर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने का फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले को सुअवसर हाथ लगा.
इस परिस्थिति में डूप्ले ने हैदराबाद में मुजफ्फरजंग और कर्नाटक में चाँदा साहब को समर्थन देने का निश्चय कर उन्हें सैनिक सहायता देने का आश्वासन दे दिया. उसने इस कार्य का क्रियान्वयन करने के लिए सेना की एक-एक टुकड़ी दोनों स्थानों पर भेज दी.
घटनाएँ — डूप्ले, चाँदा साहब एवं मुजफ्फरजंग की संयुक्त सेना ने 1749 ई. को बेल्लोर के निकट 'अम्बर के युद्ध में नवाब अनवरुद्दीन को परास्त कर मार डाला और चाँदा साहब ने कर्नाटक की नवाबी सम्हाल ली तथा फ्रांसीसियों को बदले में 80 गाँव प्रदान कर दिये. इसी प्रकार से डूप्ले ने नासिरजंग को हराकर मुजफ्फरजंग को हैदराबाद का निजाम बना दिया तथा उसकी सुरक्षा के लिए वहाँ एक सेना रख दी, जिसके खर्च के लिए डूप्ले ने नवाव से 4 जिले प्राप्त कर लिये. इसी बीच 1751 ई. में मुजफ्फरजंग की किसी ने हत्या कर दी. इस पर जनरल बुसी ने निजामुल्मुल्क के तीसरे पुत्र सलावतजंग को नवाब बना दिया, जिससे उत्तरी सरकार का प्रदेश फ्रांसीसियों के कब्जे में आ गया.
ऐसी परिस्थिति में अंग्रेजों की चिन्ता स्वाभाविक थी और नासिरजंग का पुत्र मोहम्मद अली उनकी शरण में था. अतः अंग्रेजों ने उसकी सहायता हेतु तैयारी प्रारम्भ कर दी. इसी समय त्रिचनापल्ली में चाँदा साहब ने अंग्रेजों को घेर लिया, लेकिन क्लाइव के साहस के सम्मुख चाँदा साहब मुश्किल में फँस गये. क्लाइव ने मद्रास के गवर्नर से आज्ञा लेकर चाँदा साहब की राजधानी आर्काट पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया. चाँदा साहब ने अपनी आधी सेना आर्काट भेज दी, परन्तु वह असफल रही. अब क्लाइव ने त्रिचनापल्ली पर आक्रमण कर चाँदा साहब को भागने पर विवश कर दिया और अब चाँदा साहब ने तंजौर के सेनापति के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया, परन्तु उसके साथ विश्वासघात कर उसे मार डाला गया. अब मोहम्मद अली अंग्रेजों की सहायता से कर्नाटक का नवाब बन गया और फ्रांसीसी योजनाएँ धरी रह गयीं. विजयी अंग्रेजी सेना ने फ्रांसीसियों को अनेक स्थानों पर हराकर 1752 ई. तक पाण्डिचेरी एवं जिंजी को छोड़कर उनके सभी स्थानों पर अधिकार कर लिया. इस पर फ्रांसीसी सरकार ने डुप्ले को वापस बुला लिया और गोडेहू को भारत भेजा. उसने आते ही 1755 ई. में अंग्रेजों से सन्धि कर ली और इस सन्धि के साथ ही दोनों पक्षों में शान्ति स्थापित हो गई.
परिणाम- - इस युद्ध के अनेक महत्वपूर्ण परिणाम निकले. इस युद्ध ने फ्रांसीसियों के प्रभुत्व को कर्नाटक में पूरी तरह समाप्त कर दिया तथा साथ ही यह भी कि फ्रांसीसियों की अपेक्षा अंग्रेज अधिक शक्तिशाली हैं. गोडेहू ने जो अंग्रेजों से सन्धि की थी यह फ्रांसीसी प्रतिष्ठा को धूल में मिलाने वाली साबित हुई और अब अंग्रेजों को देशी नरेशों के मामले में हस्तक्षेप करने की और अधिक स्वतन्त्रता मिल गई.
> कर्नाटक के तृतीय युद्ध के कारण, घटनाएँ तथा परिणाम
कारण – 1756 ई. में यूरोप में अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के मध्य सप्तवर्षीय युद्ध के प्रारम्भ हो जाने के कारण भारत में भी अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के मध्य युद्ध छिड़ गया. इस समय तक प्लासी की लड़ाई जीत लेने से अंग्रेजों का मनोबल बहुत बढ़ा हुआ था. फलतः वे फ्रांसीसियों को भारत से बाहर करने के लिए कटिबद्ध हो गये.
फ्रांसीसी सरकार ने भारत में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा तथा शक्ति पुनः प्राप्त करने के लिए एक वीर और कुशल सेनापति काउण्ट लैली को भारत भेजा. 
घटनाएँ— लैली ने भारत आते ही अंग्रेजों के दुर्ग सेंट डेविड पर गोलाबारी कर अपना अधिकार जमा लिया और अब उसने अपना बकाया 70 लाख रुपया वसूलने के लिए तंजौर पर आक्रमण किया, जिसमें अंग्रेजों के हस्तक्षेप के कारण उसे सफलता न मिल सकी.
अपनी सहायता के लिए लैली ने जनरल बुसी को हैदराबाद से वापस बुला लिया तथा अंग्रेजों के प्रमुख केन्द्र मद्रास पर आक्रमण की योजना बनाने लगा जिसका उसके अफसरों ने पहले विरोध किया, परन्तु 1758 ई. में लैली ने मद्रास को घेर लिया. इस पर क्लाइव ने फोर्ड फ्रांसीसी बस्ती मछलीपट्टम पर अधिकार करने के लिए भेजा और अब तक एक अन्य जहाजी बेड़ा अंग्रेजों की सहायता के लिए आ गया था, इस पर लैली को अपना मद्रास का घेरा उठाना पड़ा.
इसके बाद छिट-पुट संघर्ष होते रहे और अन्त में 1760 ई. में वांडीवास के निर्णायक युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को पराजित कर बुसी को कैद कर लिया और अब अंग्रेजों ने पाण्डिचेरी को घेर लिया. लैली ने हैदरअली से सहायता की याचना की जिसे उसने ठुकरा दिया. अन्त में 1761 ई. में लैली ने अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. अब पाण्डिचेरी पर अंग्रेजों का अधिकार स्थापित हो गया. इसके साथ ही अंग्रेजों ने जिंजी और माही पर भी अधिकार कर लिया.
1763 ई में यूरोप में दोनों पक्षों के मध्य सन्धि हो गई. अतः भारत में भी अंग्रेजों व फ्रांसीसियों के मध्य युद्ध समाप्त हो गया और पेरिस की सन्धि के अनुसार पाण्डिचेरी फ्रांसीसियों को पुनः लौटा दिया गया.
परिणाम – कर्नाटक के इस तृतीय युद्ध ने भारत में फ्रांसीसी सत्ता को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया. फ्रांस की सरकार ने लैली की असफलता से क्रोधित होकर उसे फ्रांस बुलाकर मृत्युदण्ड दे दिया. हालांकि पाण्डिचेरी फ्रांसीसियों को वापस मिल गया, परन्तु उसकी किलेबन्दी का अधिकार नहीं दिया गया. इस युद्ध की समाप्ति के साथ ही बंगाल में फ्रांसीसी प्रभाव को समाप्त कर दिया गया. अब भारत में फ्रांसीसी अधिकार में केवल चन्द्रनगर, पाण्डिचेरी, माही, मछलीपट्टम रह गये और अब वे केवल व्यापारी मात्र रह गये. डॉ. आर. सी. मजूमदार ने लिखा है कि, “अब अंग्रेज भारत के स्वामी होंगे न कि फ्रांसीसी" वास्तव में इस युद्ध के बाद ऐसा ही हुआ.
> भारत में फ्रांसीसियों की असफलता के कारण
फ्रांसीसियों की असफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे - 
(1) फ्रांसीसी कम्पनी के संगठन का दोषपूर्ण होना फ्रांसीसी कम्पनी एक सरकारी कम्पनी होने के कारण उसके प्रत्येक कार्य में सरकार का हस्तक्षेप रहता था, जिससे उसके कर्मचारियों एवं पदाधिकारियों में आत्मविश्वास का अभाव रहता था. दूसरी तरफ ब्रिटिश कम्पनी गैर-सरकारी थी तथा उसके कर्मचारी अधिक परिश्रमी और उद्यमशील थे. गैरसरकारी कम्पनी होने के कारण उसकी भारतीय स्थिति में इंग्लैण्ड की राजनीति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था.
(2) अंग्रेजों की समुद्री शक्ति का श्रेष्ठ होना–अंग्रेजी नौसेना उस समय पूरे विश्व में सर्वश्रेष्ठ थी. अंग्रेज व्यापारियों को इससे बड़ी सुविधा थी, उनका माल कहीं भी बिना रोक-टोक के जा सकता था. फ्रांसीसी जहाजी अंग्रेजों के बेड़े के आगे टिक नहीं सके.
(3) शक्ति के केन्द्र – भारत में अंग्रेजों की शक्ति के तीन प्रमुख केन्द्र बम्बई, मद्रास तथा कलकत्ता थे, जो एकदूसरे से पर्याप्त दूरी पर होने के कारण उन पर एक साथ आक्रमण नहीं किया जा सकता था, परन्तु फ्रांस की शक्ति का प्रमुख केन्द्र पाण्डिचेरी था, जिस पर अधिकार हो जाने के बाद फ्रांस की भारतीय सत्ता का अन्त होना निश्चित-सा था.
(4) अधिकारियों में योग्यता की कमी – अंग्रेजों की अपेक्षा फ्रांसीसी अधिकारी कम दूरदर्शी एवं योग्य थे. उनमें राजनीतिज्ञता के गुण का अभाव था, वहीं दूसरी ओर ईस्ट इण्डिया कम्पनी ऐसे अधिकारियों से भरी पड़ी थी. फ्रांसीसी अधिकारी आपस में स्वार्थ एवं द्वेष भावना से सदैव ग्रसित रहते थे.
(5) अंग्रेज सेना का सैनिक संगठन – फ्रांसीसियों की अपेक्षा अंग्रेजी सेना का संगठन अधिक कुशल और अनुशासित था. अंग्रेजों के पास अस्त्र-शस्त्र भी फ्रांसीसियों की अपेक्षा उच्च-स्तर के थे.
(6) कमजोर आर्थिक स्थिति— फ्रांसीसी कम्पनी डूप्ले की योजनाओं के कारण आर्थिक संकट में फँस गई. फ्रांस की सरकार भी डूप्ले की नीति से अप्रसन्न हो गई. इससे सरकार द्वारा फ्रांसीसी कम्पनी को कोई सहायता न दिये जाने के कारण उसकी अंग्रेजों के समक्ष पराजय निश्चित हो गई.
अंग्रेजों की सफलता व फ्रांस की भारत में असफलता पर टिप्पणी करते हुए अल्फ्रेड लॉयल ने लिखा है कि, "भारत में व्यापारिक या सैनिक सफलता के लिए दो मुख्य शर्ते थीं - तटीय प्रदेशों में सुदृढ़ मोर्चाबन्दी तथा कुशल नौ-सेना अंग्रेजे समुद्र पर अपना प्रभुत्व बढ़ा चुके थे और फ्रांसीसी स्थल पर अपनी शक्ति खो रहे थे. फ्रांसीसियों की अयोग्यता का मुख्य कारण दुर्भाग्य और व्यक्तिगत अयोग्यता नहीं थे, अपितु परिस्थितियों का सामूहिक संयोग है, जिसके कारण उस समय फ्रांसीसियों को अंग्रेजों से कड़ा संघर्ष करना पड़ा. "
इस प्रकार स्पष्ट है कि फ्रांसीसियों को अनेक कारणों से भारत में अंग्रेजों के समक्ष पराजय का सामना करना पड़ा. इनके अतिरिक्त डुप्ले की दोषपूर्ण योजनाएँ, फ्रांस का यूरोपीय राजनीति में अधिक उलझना तथा उपनिवेशों की ओर कम ध्यान देना और उनकी अनुदार धार्मिक नीति आदि ने भी उनके पतन में अपना महत्वपूर्ण योगदान किया.
भारत में ब्रिटिश शासन की स्थापना, विस्तार तथा समेकन
> अंग्रेजों की दृष्टि में बंगाल का महत्व : कारण
भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना और उसके विस्तार का क्रम बंगाल से प्रारम्भ हुआ, क्योंकि अंग्रेजों की दृष्टि में बंगाल का महत्व बहुत अधिक था. इसके सूती वस्त्रों की पूरे यूरोप के बाजारों में माँग थी. बंगाल की जमीन बहुत अधिक उपजाऊ थी. यहाँ चीनी, कपड़े, रेशम आदि व्यापारिक महत्व की वस्तुओं का उत्पादन किया जाता था, बंगाल के बन्दरगाह बहुत अच्छे थे और हुगली से दक्षिण-पूर्वी द्वीपों के साथ व्यापार होता था. अतः इन सभी ने मिलकर अंग्रेजों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया.
> सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के मध्य संघर्ष के कारण
1. सिराजुद्दौला के विरोधियों को अंग्रेजों द्वारा अपने यहाँ शरण देना सिराज व अंग्रेजों के मध्य संघर्ष का प्रमुख कारण था. घसीटी बेगम की सहायता से ढाका के दीवान राजबल्लभ ने अपार सम्पत्ति एकत्र कर ली जिसे कि सिराज वापस प्राप्त करना चाहता था. इस पर राजबल्लभ ने अपने पुत्र किशनदास को अपनी सारी सम्पत्ति देकर अंग्रेजों की शरण में कलकत्ता भेज दिया और जब सिराज ने किशनदास को वापस भेजने का अंग्रेजों को आदेश दिया, तब अंग्रेजों ने उसे मानने से इनकार कर दिया. इससे दोनों के मध्य संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई.
2. अंग्रेजों का व्यवहार सिराजुद्दौला के प्रति उपेक्षा पूर्ण था सिराजुद्दौला के गद्दी पर बैठने के समय की परम्परा का अंग्रेजों ने पालन न कर उसे कोई उपहार यां भेंट प्रस्तुत नहीं किया और ही उनका कोई प्रतिनिधि उसके दरबार में उपस्थित हुआ. अंग्रेज सिराज से कोई पत्रव्यवहार भी नहीं करते थे और जब उसने अंग्रेजों की कासिम बाजार की कोठी को देखना चाहा तो अंग्रेजों ने उसे दिखाने से स्पष्ट मना कर दिया.
3. अंग्रेज व्यापारी अपनी व्यापारिक सुविधा 'दस्तक' का दुरुपयोग करने लगे थे. वे लोग कम्पनी के माल के अलावा अपने निजी व्यापार में भी अधिकाधिक इसका प्रयोग करते थे और साथ ही रिश्वत लेकर भारतीय व्यापारियों के माल को भी दस्तक से चुंगी मुक्त करा देते थे. इससे नवाब को निरन्तर आर्थिक हानि हो रही थी.
4. अंग्रेज फ्रांसीसियों से भावी युद्ध के भय से अपने व्यापारिक केन्द्र कलकत्ता की निरन्तर किलेबन्दी कर रहे थे. उन्होंने कलकत्ता नगर के चारों ओर एक बड़ी खाई खोद डाली. अतः सिराज ने किलेबन्दी को तत्काल रोकने का आदेश दिया गया, जिस पर अंग्रेजों ने कोई ध्यान न देकर किलेबन्दी जारी रखी. इससे सिराजुद्दौला का क्रोध अंग्रेजों के प्रति भड़कना स्वभाविक ही था. 
अतः इन परिस्थितियों ने मिलकर सिराजुद्दौला को अंग्रेजों के प्रति युद्ध करने को प्रेरित कर दिया.
> कलकत्ता पर सिराजुद्दौला का आक्रमण
अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए सिराज शौकतजंग से निपटते हुए कलकत्ता पहुँचा और 4 जून, 1756 ई. को उसने अंग्रेजों की कासिम बाज़ार कोठी पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में ले लिया. उसके बाद उसने कलकत्ता पर आक्रमण कर उनके दुर्ग फोर्ट विलियम को भी अपने कब्जे में ले लिया. इस पर अंग्रेज गवर्नर ड्रेक और अधिकांश अंग्रेज भागकर फुल्टा टापू पर चले गये और 20 जून, 1756 ई. को पूरे कलकत्ता पर नवाब का अधिकार हो गया. नवाब सिराजुद्दौल्ला ने कलकत्ता का नाम बदलकर 'अलीनगर' रख दिया तथा किले के प्रबन्ध का कार्य राजा मानिकचन्द के हाथों में सौंपकर अपनी राजधानी वापस लौट गया.
बंगाल में अंग्रेजों की पराजय तथा उनके फुल्टा में शरण लेने की सूचना से मद्रास के अंग्रेज काफी चिन्तित हो उठे. अतः मट्ठास से क्लाइव के नेतृत्व में स्थलसेना और वाटसन के नेतृत्व में एक जल-सेना तुरन्त भेजी गई. अतः क्लाइव और वाटसन ने राजा मानिकचन्द को अपनी ओर मिला लिया और 1757 ई. की 2 जनवरी को कलकत्ता और हुगली पर अंग्रेजों का अधिकार शीघ्रता से स्थापित हो गया और नवाब को मजबूर होकर अंग्रेजों से 'अलीनगर' की सन्धि करनी पड़ी.
> काल-कोठरी की घटना पर टिप्पणी : (The Black Hole Tragedy)
20 जून, 1756 ई. को सिराजुद्दौला ने जब अंग्रेजों के कलकत्ता स्थित दुर्ग फोर्ट विलियम पर अधिकार कर लिया तब बहुतसे अंग्रेजों को बन्दी बना लिया गया. नवाब के अधिकारियों ने 146 अंग्रेज बन्दियों को जिनमें स्त्रियाँ और बच्चे भी थे. एक छोटे-अन्धेरे कमरे में, जो 18 फुट लम्बा और 14 फुट, 10 इंच चौड़ा था, बन्द कर दिया. जून के महीने की असह्य गर्मी में और यातनाओं के चलते, अगली सुबह जब कमरा खोला गया तो उसमें से केवल 23 व्यक्ति ही जीवित निकले. बचने वालों में हालवेल नामक एक लेखक भी था, जिसने इस घटना को प्रचारित किया और इतिहास में यह घटना 'काल-कोठरी की घटना' के नाम से प्रसिद्ध हो गई.
काल-कोठरी की घटना की सत्यता अत्यन्त विवादास्पद है. डॉ. सरकार एवं दत्त के अनुसार इस घटना का उल्लेख समकालीन अंग्रेजी, फ्रांसीसी, डच और आर्मेनियम रिकार्डों में मिलता है, परन्तु इनके विवरण एक-दूसरे से भिन्न-भिन्न हैं, जबकि फारसी में उस समय लिखे भारतीय इतिहास और कलकत्ता कौंसिल के इतिहास में इसका विवरण नहीं मिलता है. अतः आधुनिक इतिहासकारों ने इस घटना को केवल कल्पना माना है, जबकि अनेक अंग्रेज इतिहासकारों ने इस घटना की सत्यता में विश्वास प्रकट किया है.
इस घटना का एक अन्य पक्ष यह है कि जिस आकार का कमरा इस घटना के सम्बन्ध में वर्णित किया गया है, उसमें 146 व्यक्तियों को एक साथ उसके अन्दर बन्द नहीं किया जा सकता है. हो सकता है कि यह घटना हालवेल के मस्तिष्क की उपज हो. डॉ. ईश्वरीप्रसाद के अनुसार, इस घटना में सत्य कुछ भी नहीं है. यह केवल अंग्रेजों की मनगढ़न्त और कपोल-कल्पित कथा का प्रचार अंग्रेजों के प्रति हिंसात्मक मनोवृत्ति को उभारने के लिए किया गया था.
> अलीनगर की सन्धि पर टिप्पणी
2 जनवरी, 1757 ई. को राबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला के विरुद्ध कलकत्ता के फोर्ट विलियम के किलेदार को घूस देकर, अपने पक्ष में कर दुर्ग को जब अपने अधिकार में कर लिया, तब परिस्थितियों से विवश होकर सिराजुद्दौला को 9 फरवरी, 1757 ई. को अंग्रेजों से सन्धि करनी पड़ी, जिसकी शर्तें निम्नलिखित थीं
1. बंगाल में अंग्रेजों को जो सुविधाएँ मुगल बादशाह फर्रुखशियर द्वारा प्रदान की गईं थीं, उन्हें यथावत् रखा जायेगा.
2. 2 फरवरी, 1757 ई. से बंगाल, बिहार और उड़ीसा में अंग्रेज बिना किसी प्रकार की चुंगी दिये, व्यापार कर सकेंगे.
3. अंग्रेजों की फैक्टरियों और उन सभी सामानों को जिन्हें कि नवाब ने छीन लिया था. अंग्रेजों को लौटा दिया जायेगा और अंग्रेजी पक्ष की क्षतिपूर्ति नवाब द्वारा की जायेगी.
4. अंग्रेजों को अपनी इच्छानुसार किलेबन्दी करने का अधिकार होगा.
5. अंग्रेजों को सिक्का ढालने का अधिकार भी प्राप्त हुआ.
इस सन्धि से जहाँ एक ओर सिराजुद्दौला को हानि हुई वहीं दूसरी ओर इससे अंग्रेजों को अनेक लाभ हुए. इस सन्धि से अंग्रेजों को अपनी व्यापारिक सुविधाएँ तथा किलेबन्दी का अधिकार मिल गया. इससे वे नवाब के विरुद्ध अपने षड्यन्त्रों को अब आसानी से क्रियान्वित कर सकते थे. इस अलावा अंग्रेजों का पलड़ा बंगाल में फ्रांसीसियों की अपेक्षा अधिक भारी हो गया और उन्होंने शीघ्र ही फ्रांसीसी बस्ती चन्द्रनगर पर आक्रमण कर दिया और उस पर अधिकार कर लिया. नवाब चाहकर भी उनकी सहायता न कर सका. फलतः फ्रांसीसियों द्वारा नवाब की सहायता का द्वार बन्द हो गया और अब अंग्रेजों के लिए खुलकर सामने आने का रास्ता साफ हो गया.
> प्लासी के युद्ध और उसके परिणामों की व्याख्या
युद्ध से पूर्व स्थिति — अलीनगर की सन्धि हो जाने के बाद भी बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के मध्य स्थायी शान्ति कायम न हो सकी. क्लाइव ने अब बंगाल में सिराज को हटाकर उसके स्थान पर कठपुतली शासक बनाने का विचार किया. इस हेतु उसने उसके दामाद मीर जाफर को जो सिराज का सेनापति भी था, को उपयुक्त पात्र समझा. उसने अपने षड्यन्त्र में सेठ अमीचन्द और लतीफ खाँ को भी सम्मिलित किया और इनसे उसने एक गुप्त सन्धि की. जिसकी शर्तें इस प्रकार थीं—
1. मीर जाफर को अंग्रेजों की सहायता से बंगाल का नवाब बना दिया जायेगा.
2. मीर जाफर अंग्रेजों को एक करोड़ रुपये बदले में देगा.
3. अंग्रेजों को कालपी तक की जमींदारी, फ्रांसीसियों को बाहर निकालने तथा अंग्रेजी सेना का खर्च आदि भी मीर जाफर को देना होगा.
सन्धि की सभी शर्तों को स्वीकार करते हुए मीर जाफर एवं कलकत्ता कौंसिल के सभी सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिये.
षड्यन्त्रकारियों में अमीचन्द एक लालची एवं महत्वाकांक्षी व्यक्ति था. अतः उसने अंग्रेजों से कहा कि यदि उसे 30 लाख रुपया और नवाब के खजाने में से 5% की राशि नहीं दी गई तो वह सारे षड्यन्त्र का भण्डाफोड़ कर देगा. ऐसी स्थिति में क्लाइव ने अमीचन्द की शर्तों को भी स्वीकार करते हुए एक जाली सन्धि-पत्र तैयार करवाकर उस पर एक अन्य अंग्रेज से वाटसन के फर्जी हस्ताक्षर करवा लिये. इस प्रकार क्लाइव ने दुरंगी नीति का इसमें अनुसरण किया.
अब क्लाइव ने नवाब के विरुद्ध षड्यन्त्रकारियों का गुट तैयार कर उससे शिकायत की कि उसने अलीनगर की सन्धि की शर्तों का ईमानदारी से पालन नहीं किया है. अतः अब उसे नवाब के पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है. इसी बीच सिराज के दरबार का अंग्रेज रेजीडेण्ट भी चुपचाप . कलकत्ता भाग गया और क्लाइव ने सेना सहित प्लासी की ओर प्रस्थान किया.
युद्ध – क्लाइव के प्लासी की ओर प्रस्थान करने के बाद नवाब अपनी शक्ति को एकत्र कर आगे बढ़ा और 23 जून, 1757 ई. को क्लाइव और नवाब सिराजुद्दौला के मध्य युद्ध हुआ. इस युद्ध में नवाब के सेनापति मीर जाफर, यार लुत्फ और राय दुर्लभ जो कि प्रमुख षड्यन्त्रकारी थे, की विशाल सेनाएँ चुपचाप खड़ी रहीं. नवाब के साथ मोहनलाल और मीर मदन की छोटी सेनाएँ ही अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ीं, फिर भी नवाब की विजय लगभग निश्चित थी, परन्तु मीर जाफर, यार लुत्फ और राय दुर्लभ अपनी सेना सहित अंग्रेजों से मिल गये. परिणामस्वरूप नवाब हार गया और किसी प्रकार बचकर युद्ध क्षेत्र से भाग निकला और मुर्शिदाबाद पहुँचा. उसके साथ उसकी बेगम लुत्फुनिशा भी थी, परन्तु वह पकड़ा गया और मीर जाफर के पुत्र मीरन के इशारे पर मुहम्मद जंग द्वारा उसकी हत्या कर दी गई. इसके साथ ही अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हो गया.
प्लासी युद्ध के परिणाम – प्लासी का युद्ध वास्तविक युद्ध नहीं था, इसका निर्णय पूर्व में ही हो चुका था तथा इसमें एक छोटी-सी टुकड़ी ने ही भाग लिया था, फिर भी यह युद्ध भारत के निर्णायक युद्धों, में परिणाम की दृष्टि से एक है. इस युद्ध के राजनीतिक, आर्थिक और नैतिक दृष्टि से अनेक महत्वपूर्ण परिणाम निकले.
इस युद्ध के बाद भारतीय राजनीति में अंग्रेजों की प्रधानता कायम हो गई. बंगाल के वे वास्तविक शासक बन गये. मीर जाफर जैसा एक कठपुतली शासक, एक करोड़ रुपया तथा 24 परगने की जमींदारी भी कम्पनी को प्राप्त हो गई. इससे कम्पनी की बंगाल में नींव जम गई और बंगाल से प्राप्त इस धन से उसे कर्नाटक के तीसरे युद्ध में सफलता मिली.
इस युद्ध से मुगल सम्राट् की स्थिति पर बुरा असर पड़ा. बंगाल से उसके लिए एक निश्चित राशि कर के रूप में आती थी, लेकिन एक विदेशी कम्पनी ने उसे नवाब को गद्दी से हटा दिया और वह कुछ भी नहीं कर सका. उसकी आय का एक प्रमुख स्रोत बन्द हो गया.
बंगाल एवं बिहार पर कम्पनी का प्रभुत्व कायम हो जाने से कम्पनी की आर्थिक स्थिति मजबूत हो गई. कम्पनी के सभी अधिकार सुरक्षित हो गये तथा उसने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में नई-नई फैक्टरियों की स्थापना की. इससे उनके व्यापार में वृद्धि हुई. अंग्रेजों ने अब बंगाल में लूट प्रारम्भ कर दी और अब वे भारतीय माल खरीदने के लिए इंगलैण्ड से सोना-चाँदी न मँगाकर अपने भारतीय साधनों द्वारा ही माल खरीदने में सक्षम हो गये.
नैतिक दृष्टि से प्लासी के युद्ध का परिणाम बड़ा ही अहितकर निकला. बंगाल के धन को पाकर अंग्रेज अधिकारी बहुत लालची हो गये और बार-बार धन प्राप्त करने के लिए उन्होंने बड़े अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिये. उन्होंने नवाब और जनता को, दोनों को लूटना प्रारम्भ कर दिया.
वास्तव में प्लासी का युद्ध सैनिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण न होकर अपने परिणामों की दृष्टि से ही अधिक महत्त्वपूर्ण था. वाटसन ने ठीक ही लिखा है कि, “प्लासी का युद्ध केवल कम्पनी के लिए ही नहीं, अपितु सामान्य रूप से समस्त ब्रिटिश राज्य के लिए असाधारण महत्व का था."
> बंगाल के नवाब मीर कासिम के कार्यों का मूल्यांकन
मीर कासिम ने अंग्रेजों की सहायता से 5 अक्टूबर, 1760 ई. को बंगाल का नवाब बना तथा नवाब बनने के बाद उसने निम्नलिखित कार्य किए
(1) प्रशासनिक सुधार – मीर कासिम ने अपने प्रशासन में सुधार करते हुए बंगाल और बिहार के उपद्रवी और विद्रोही जमींदारों को परास्त किया तथा राजस्व की वसूली के लिए योग्य एवं विश्वसनीय कर्मचारियों की नियुक्ति की. उसने अपने राज्य से भ्रष्टाचार को समाप्त कर राज्य की आय को सुनिश्चित करने का प्रयास किया तथा मीर जाफर के समय किए गए धन के गबन को उसने अधिकारियों से कठोरतापूर्वक वसूल किया. इससे उसकी आर्थिक स्थिति ठीक हो गई.
(2) आर्थिक सुधार मीर कासिम ने अपने राजकोष को भरने के लिए अनेक बेईमान लोगों की सम्पत्ति को छीन लिया तथा कृषि क्षेत्र में सुधार कर 'कर' ( Tax ) वसूलने की निश्चित व्यवस्था की.
(3) सेना में सुधार — मीर कासिम यह भली-भाँति जानता था कि कम्पनी की सेना द्वारा बंगाल में किसी प्रकार का सुधार कार्य सम्भव नहीं है. अतः उसने अपनी स्वयं की सेना में सुधार लाने के लिए तथा उसे यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित करने के लिए समरू नामक एक जर्मन को अपनी सेना में नियुक्त किया अपनी सेना को उसने नवीनतम अस्त्र-शस्त्रों से लैस किया.
(4) राजधानी परिवर्तन – मीर कासिम की राजधानी मुर्शिदाबाद अंग्रेजी केन्द्र कलकत्ता के अधिक निकट होने के कारण यहाँ अंग्रेजों के निरन्तर हस्तक्षेप की सम्भावना बनी रहती थी. अतः उसने अपनी राजधानी मुंगेर में हस्तान्तरित कर दी तथा यहाँ उसने बन्दूकें व गोले बनाने के कारखाने स्थापित किए.
(5) अंग्रेज 1717 ई. से ही बिना चुंगी दिए 'दस्तक' के प्रयोग द्वारा कम्पनी का व्यापार करते थे. इसके साथ ही अब वे इस दस्तक का अत्यधिक दुरुपयोग करने लगे तथा भारतीय व्यापारियों के माल को भी अपना बताकर उन्हें भी चुंगी मुक्त करा देते थे. इससे उसे निरन्तर नुकसान हो रहा था. मीर कासिम ने इसे रोकने का भरसक प्रयास किया, परन्तु इसे अंग्रेजों ने स्वीकार नहीं किया और वे मनमानी करते रहे. अतः मीर कासिम ने क्षुब्ध होकर भारतीय व्यापारियों को भी बिना शुल्क के व्यापार करने की अनुमति प्रदान कर दी. इससे अँग्रेज व्यापारी भी भारतीयों के समकक्ष आ गए और अब उन्हें अपने व्यापार में घाटा होने लगा. अतः अब अंग्रेजों और नवाब के मध्य युद्ध होना आवश्यक हो गया और इसी के परिणामस्वरूप बक्सर का युद्ध (1764 ई.) हुआ.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मीर कासिम भले ही अंग्रेजों की सहायता से बंगाल का शासक बना था, परन्तु वह स्वतन्त्र विचारों वाला व्यक्ति था. उसे यह कतई बर्दाश्त नहीं था कि कम्पनी के अधिकारी उसके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करें. अतः बंगाल में वास्तविक शासक कौन था नवाब या कम्पनी, इसी प्रश्न को लेकर ही दोनों में संघर्ष हुआ.
> बक्सर का युद्ध : विवेचना
पृष्ठभूमि – बक्सर के युद्ध की पृष्ठभूमि मीर कासिम के नवाब बनने के बाद उसके कार्यों एवं कम्पनी के स्वतन्त्र और शासक की तरह व्यवहार करने के कारण पहले ही तैयार हो चुकी थी. अतः दोनों पक्ष युद्ध की तैयारी करने लगे. कलकत्ता कौंसिल ने पटना में हथियार भेजना प्रारम्भ कर दिया जिसे नवाब ने मुंगेर में रोक लिया. इस पर एलिस ने पटना पर अधिकार कर लिया. नवाब ने एक सेना भेजकर पटना को अंग्रेजों से मुक्त कर लिया. फलतः कलकत्ता की कौंसिल ने मीर कासिम के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर उसे अनेक स्थानों पर हरा दिया. इस पर उसने अपनी राजधानी की सुरक्षा की व्यवस्था कर पटना पर पुनः आक्रमण कर दिया, जिसमें उसने 148 अंग्रेज कैदियों को मौत के घाट उतार दिया. इसी के मध्य एडम्स ने नवाब को बुरी तरह से पराजित कर उसे भागने पर विवश कर दिया. मीर कासिम ने भाग कर अवध के नवाब शुजाउद्दौला के यहाँ शरण ली. मीर कासिम के अवध चले जाने के बाद अंग्रेजों ने दिसम्बर 1763 ई. में मीर जाफर को पुनः बंगाल का नवाब बना दिया,
अवध में मीर कासिम ने पहुँचकर वहाँ के नवाब शुजाउद्दौला को अपनी ओर मिला लिया. इस समय मुगल सम्राट शाह आलम भी यहाँ था. अतः उसने भी मीर कासिम को सहायता देने का आश्वासन दिया. अब इन तीन शासकों का एक गठबन्धन तैयार हो गया. इन तीनों की संयुक्त सेना से अंग्रेज सेना का बक्सर के मैदान में 22 अक्टूबर, 1764 ई. को युद्ध हुआ, जिसमें गठबन्धन की सेना पराजित हो गई. मीर कासिम युद्ध-क्षेत्र से भाग गया और इधर-उधर भटकता रहा. अवध का नवाब शुजाउद्दौला रुहेलखण्ड भाग गया. इस प्रकार इस महत्त्वपूर्ण युद्ध का अन्त हो गया.
बक्सर के युद्ध के परिणाम-बक्सर के युद्ध के अनेक महत्वपूर्ण व स्थायी परिणाम निकले. इस युद्ध ने अंग्रेजों के प्लासी के युद्ध के अधूरे कार्यों को पूरा कर दिया. बंगाल की गद्दी पर अंग्रेजों के कठपुतली नवाब का शासन स्थापित हो गया. इस युद्ध ने अंग्रेजों को उत्तरी भारत की सर्वश्रेष्ठ शक्ति बना दिया तथा भारतीय सेना की कमजोरी उनके सम्मुख प्रकट हो गई. मुगल सम्राट् अंग्रेजों का पेंशन याफ्ता बन गया तथा उसने बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अंग्रेजों को सौंप दी.
मैलीसन नामक इतिहासकार के अनुसार, “बक्सर के युद्ध में विजय से न केवल बंगाल मिला, अपितु अवध के शासक भी इस विजयी शक्ति से कृतज्ञतापूर्ण निर्भरता एवं विश्वास के बन्धनों से बँध गए, जिसने आने वाले 94 वर्षों तक उनको मित्रों का मित्र और शत्रुओं का शत्रु बनाए रखा." ताराचन्द ने लिखा है कि "प्लासी ने सत्ता का हस्तान्तरण किया, परन्तु 1764 ई. के बक्सर के युद्ध ने अधिकारों का सृजन किया और कम्पनी में वैधानिक आर्थिक व्यापार का युग समाप्त हो गया तथा राजनीतिक सत्ता के अन्तर्गत राजकीय राजस्व के साथ व्यापार का युग आरम्भ हुआ.”
> इलाहाबाद की सन्धि (1765 ई.) पर टिप्पणी
बक्सर के युद्ध में अवध के पराजित नवाब और मुगल सम्राट् शाह आलम के मध्य जो सन्धि हुई थी, उसे इलाहाबाद की सन्धि के नाम से जाना जाता था. इसकी शर्तें निम्नलिखित थीं – 
1. अवध के नवाब शुजाउद्दौला को उसका राज्य लौटा दिया गया तथा कड़ा और इलाहाबाद के जिले उससे छीनकर शाह आलम को दे दिए गए.
2. नवाब ने कम्पनी को बक्सर के युद्ध की क्षतिपूर्ति के लिए पचास लाख रुपए दिए.
3. अवध की सीमा रक्षा के लिए कम्पनी ने उसे सैनिक सहायता देना स्वीकार कर लिया.
4. अवध के राज्य में बिना किसी तरह की चुंगी दिए अंग्रेजों को व्यापार करने की अनुमति दे दी गई.
इस सन्धि से अवध का नवाब सैनिक सहायता के लिए अंग्रेजों पर आश्रित हो गया तथा अवध में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ गया.
इस सन्धि के साथ ही अंग्रेजों की ओर से क्लाइव ने मुगल सम्राट् शाह आलम से पृथक् सन्धि की. जिसके अनुसार, उसने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार, उड़ीसा की दीवानी दे दी गयी और बदले में अंग्रेजों ने उसे कड़ा व इलाहाबाद के जिलों के साथ 26 लाख रुपए वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया.
इस सन्धि का अंग्रेजों के लिए अत्यधिक महत्व था. उन्होंने अवध के साथ-साथ शाह आलम को भी अपना आश्रित एवं पेंशनर बना लिया तथा अब उत्तर भारत में उनकी सत्ता को चुनौती देने वाला कोई नहीं रह गया.
> प्लासी व बक्सर के युद्धों का तुलनात्मक मूल्यांकन (टिप्पणी)
प्लासी एवं बक्सर के युद्धों का भारतीय इतिहास में अंग्रेजों के शासन स्थापना की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान है. इन युद्धों के परिणामस्वरूप सम्पूर्ण बंगाल पर अंग्रेजी राज्य कायम हो गया और धीरे-धीरे इन्हें अपने साम्राज्य के विस्तार करने का आधार तैयार हो गया और एक दिन सम्पूर्ण भारत अंग्रेजों के अधीन हो गया.
प्लासी का युद्ध एक नाटक मात्र था और सिराजुद्दौला बक्सर के एक व्यापक षड्यन्त्र का शिकार बना, जब कि युद्ध में दोनों पक्षों में भीषण संघर्ष हुआ था. यदि प्लासी के युद्ध में मीर जाफर अपने स्वामी के साथ विश्वास घात नहीं करता, तो अवश्य ही इस युद्ध में अंग्रेजों की हार हुई होती. सैनिक दृष्टि से हालांकि प्लासी के युद्ध का कोई महत्व नहीं था, परन्तु इसके परिणाम व्यापक थे. बक्सर का युद्ध एक भयंकर युद्ध था जिसमें अंग्रेजों की रणकुशलता भारतीयों से अधिक श्रेष्ठ सिद्ध हुई.
प्लासी का युद्ध छल-कपट का उदाहरण था, जब कि बक्सर में ऐसा नहीं था. बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों ने तीनतीन शक्तियों की सम्मिलित सेना को पराजित कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की थी. इस कारण से इस युद्ध के परिणाम भी प्लासी के से ज्यादा महत्त्वपूर्ण रहे थे. युद्ध
> बंगाल के द्वैध शासन की प्रमुख विशेषताएँ एवं दोष
1765 ई. की इलाहाबाद की सन्धि से ईस्ट इण्डिया कम्पनी को दीवानी का अधिकार बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा में मिल गया था. अतः अब कम्पनी ने यहाँ जो शासन व्यवस्था लागू की उसे 'द्वैध शासन' कहा जाता है.
द्वैध शासन के अन्तर्गत प्रशासनिक दायित्व तो नवाब के ऊपर था, परन्तु कर की वसूली का समस्त कार्य कम्पनी के पास था. इसके लिए बंगाल में प्रशासन के लिए दो अलगअलग अधिकारी नियुक्त किए गए. एक, दीवान जो अंग्रेजों का विश्वासपात्र था, नवाब के प्रशासन के लिए तथा दूसरे, नायब नाजिम जो कर (राजस्व) वसूली के लिए उत्तरदायी था. इस प्रकार बंगाल में दोहरी व स्वतन्त्र व्यवस्थाएँ कायम हो गईं. कम्पनी एवं नवाब की इस व्यवस्था में बंगाल के धन पर पूरा अधिकार कम्पनी का हो गया तथा प्रजा के प्रति उसका कोई कर्त्तव्य नहीं रहा. दूसरी तरफ, नवाब के पास न धन था और न ही सेना, परन्तु प्रजा की समस्त जिम्मेदारी उसी के पास थी.
दीवानी अधिकारों के प्राप्त हो जाने से कम्पनी का प्रमुख कार्य मालगुजारी वसूल करना तथा कुछ हद तक न्याय करने का कार्य भी मिल गया. कम्पनी ने इन दोनों कार्यों का दायित्व 'मुहम्मद रजा खाँ' तथा 'राजा सिताबराय' नामक दो भारतीय अधिकारियों को सौंपा गया. इस कार्य के लिए प्रमुख कार्यालय मुर्शिदाबाद एवं पटना में स्थापित कर दिए गए तथा कम्पनी ने निजामत अर्थात् प्रशासन के लिए नवाब को 53 लाख रुपए वार्षिक देना निश्चित किया. इस प्रकार इस नई योजना के अन्तर्गत कम्पनी के नियन्त्रण में तलवार एवं धन दोनों आ गए.
लाभ - इस व्यवस्था से कम्पनी को अत्यधिक लाभ हुआ तथा वास्तविक शक्ति अंग्रेजों के नियन्त्रण में आ गई तथा अंग्रेज अब शासक बन गए. इस व्यवस्था से कम्पनी को सबसे बड़ा लाभ यह था कि उसने बिना जनमत को उद्वेलित किए सारी शक्तियों की आसानी से अपने नियन्त्रण में ले लिया. कम्पनी के पास इस समय ऐसे योग्य और अनुभवी अधिकारियों की कमी थी, जो बंगाल की लगान व्यवस्था को सँभाल पाते. अतः कम्पनी ने भारतीय अधिकारियों के उपयोग द्वारा ही अपना हित साधा.
दोष – 1767 ई. में क्लाइव के भारत से वापस लौटते ही इस व्यवस्था के अनेक दोष उजागर होने लगे और पूरी व्यवस्था एकदम से लड़खड़ाने लगी. शासन का पूरा-पूरा उत्तरदायित्व वहन करने की क्षमता नवाब में नहीं थी और न ही नवाब कम्पनी पर अपना किसी प्रकार का नियन्त्रण स्थापित कर सकता था, जबकि अंग्रेज कम्पनी के पास सारी वित्तीय शक्तियाँ थीं. इसका परिणाम यह निकला कि जनता नवाब एवं कम्पनी के मध्य पिसने लगी उसकी सुनवाई करने वाला बंगाल में कोई नहीं रह गया. कम्पनी के अधिकारियों ने जनता का बुरी तरह शोषण करना आरम्भ कर दिया. कम्पनी के बनिए एवं गुमास्ते लोगों पर घोर अत्याचार करने को स्वतन्त्र हो गए. लघु एवं कुटीर उद्योग-धन्धे बंगाल में प्रायः नष्ट हो गए. शिल्पी एवं कारीगर माल तैयार करते, परन्तु अंग्रेज उनसे सस्ती दरों पर जबरदस्ती माल खरीद लेते थे तथा मना करने पर उन्हें सरेआम कोड़े लगाए जाते थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि द्वैध शासन व्यवस्था नवाब एवं जनता के लिए बड़ी ही हानिकारक सिद्ध हुई.
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Sun, 08 Oct 2023 09:39:00 +0530 Jaankari Rakho
मराठों का उत्थान https://m.jaankarirakho.com/426 https://m.jaankarirakho.com/426 मराठों का उत्थान

> 17वीं सदी में मराठों के राजनीतिक शक्ति के रूप में उदय के कारण
1. मराठों के उत्थान में सर्वप्रथम महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति का महत्वपूर्ण स्थान महाराष्ट्र का सम्पूर्ण क्षेत्र पर्वतों से घिरा हुआ है, इसलिए यह क्षेत्र बांह्य आक्रमणों से अधिक सुरक्षित था. इस क्षेत्र में जीवन गुजारने के लिए कठिन श्रम करना पड़ता था. खेती करने में असुविधा तथा कम वर्षा के कारण मराठे साहसी एवं वीर बने तथा इनमें लूटमार की दक्षता उत्पन्न हो गई. पहाड़ी इलाकों में रहने के कारण वे छापामार युद्ध-पद्धति में प्रवीण हो गए.
2. इन्हीं सैनिक गुणों के कारण मराठों को प्रशासनिक एवं राजनीतिक अनुभव प्राप्त हुए. अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा आदि दक्षिण की रियासतों में मराठों को अनेक महत्वपूर्ण पद एवं जागीरें प्राप्त हुईं. इस प्रकार मराठों ने राजनीतिक स्थिति को समझने का अवसर पाया तथा इसका उपयोग मराठों को संगठित करने में किया.
3. महाराष्ट्र में 17वीं सदी में अनेक धर्म-सुधारकों का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें तुकाराम एवं रामदास का नाम अग्रणी है. इन्होंने मराठों में राष्ट्रीयता एवं स्वदेश-प्रेम की भावनाओं को जागृत किया. शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास ने अनेक मठों की स्थापना की. 'दसबोध' नामक ग्रन्थ की रचना कर उन्होंने मराठों में चेतना का प्रसार किया.
4. मराठा सन्तों ने बोलचाल की भाषा के माध्यम से अपना प्रचार-प्रसार किया. इस कारण उनके विचार मराठा समाज के प्रत्येक वर्ग तक आसानी से पहुँच गए.
5. मराठा-क्षेत्र की उस समय की सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक अवस्था ने मराठों के उत्थान में उल्लेखनीय योगदान दिया. छुआ-छूत, जाति व्यवस्था एवं ऊँच-नीच की भावना को महाराष्ट्र में धर्म-सुधारकों ने कमजोर कर दिया. उनकी आर्थिक स्थिति ने मराठों को आत्मनिर्भर एवं साहसी बनने के लिए विवश कर दिया. सामाजिक-आर्थिक एकता ने मराठों को संगठित करने में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया.
6. दक्षिण की शिया रियासतों का अधिकांश समय मुगलों से अपनी रक्षा करने में ही बीता था. अतः वे दक्षिण में इस्लाम का तेज गति से प्रसार करने एवं मराठों को संगठित होने से रोकने के लिए संगठित रूप से प्रयास नहीं कर सके.
7. ऐसी परिस्थितियों में मराठों को लखजी जाधव के दामाद और मालोजी के पुत्र शाहजी भौंसले जैसा वीर सेनानायक मिल गया. इन्होंने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर मराठों को नेतृत्व प्रदान किया. उन्होंने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में प्रारम्भ किया था, किन्तु वे आगे बढ़ते-बढ़ते बंगलौर में एक अर्द्ध- स्वतन्त्र राज्य की स्थापना तक पहुँच गए. इस प्रकार उन्होंने शिवाजी के लिए एक स्वतन्त्र मराठा राज्य स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया.
> मराठा स्वराज के संस्थापक शिवाजी
शिवाजी का जन्म 20 अप्रैल, 1627 ई. को शिवनेर के दुर्ग में पूना के निकट हुआ था. उनकी माता का नाम जीजाबाई एवं पिता शाहजी भोंसले थे. जीजाबाई शाहजी की परित्यक्ता पत्नी थी, अतः उनमें स्वाभिमान एवं धार्मिकता बहुत अधिक थी. जीजाबाई के चरित्र का असर शिवाजी पर प्रशासनिक शिक्षा ग्रहण की. धर्म सुधारक रामदास से बहुत गहरा पड़ा था. गुरु कोण्डदेव से शिवाजी ने सैनिक एवं शिवाजी को राष्ट्र प्रेम एवं स्वाभिमान की शिक्षा प्राप्त हुई.
शिवाजी के कुछ बड़े होने पर उनके पिता द्वारा उन्हें पूना की जागीर सौंप दी गई. इस समय शिवाजी ने अपनी जागीर - प्रबन्धन के साथ-साथ मावल प्रदेश के युवकों को संगठित करना प्रारम्भ कर दिया. क्योंकि शिवाजी का आरम्भ से ही उद्देश्य स्वतन्त्र मराठा राज्य की स्थापना करना था. शिवाजी समर्थ गुरु रामदास से प्रेरणा लेकर महाराष्ट्र को मुसलमान शासकों एवं मुगलों से स्वतन्त्र कराना चाहते थे. वे हिन्दू धर्म, सभ्यता एवं संस्कृति की स्थापना करना चाहते थे.
अतः अपने इस कार्य हेतु उन्होंने अपने प्रारम्भिक मावली युवकों की सहायता से 1643 ई. में सिंहगढ़ के दुर्ग पर अधिकार कर लिया. इस दुर्ग पर बीजापुर के सुल्तान का अधिकार था. इसके अतिरिक्त उन्होंने तोरण, चाकन, पुरन्दर, सूपां, जावली आदि दुर्गों को 1647 ई. तक जीत लिया. 1647 ई. से लेकर 1656 ई. तक शिवाजी ने अपनी आन्तरिक स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया, क्योंकि शिवाजी की लूटमार से तंग आकर बीजापुर के सुल्तान ने 1648-49 ई. तक शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले को गिरफ्तार कर लिया था.
1656 ई. में शिवाजी ने अपना विजय अभियान पुनः प्रारम्भ किया तथा चन्द्रराव मोरे से जावली का प्रसिद्ध किला धोखे से जीत लिया. इससे उनका पूरे मावल प्रदेश पर अधिकार हो गया. उन्होंने इसी दौरान रायगढ़ के दुर्ग को जीतकर अपनी सत्ता का इसे प्रमुख केन्द्र बनाया. 1657 ई. को शिवाजी ने बीजापुर के जुन्नार नगर को जीत लिया.
इस प्रकार शिवाजी की प्रारम्भिक विजयों ने उनके राज्य' स्थापना के कार्य को सरल बना दिया, क्योंकि इस समय बीजापुर अपनी कमजोरी के कारण शिवाजी पर अधिक ध्यान नहीं दे सका.
1657 ई. में बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने अफजल खाँ को शिवाजी को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के लिए भेजा जिसका शिवाजी ने पूर्व में इरादा भाँप लिया और उसकी अपने बघनखे से हत्या कर दी. इससे उसकी सेना में आतंक फैल गया और इसका लाभ उठाकर शिवाजी ने उसकी पूरी सेना नष्ट कर दी और शिवाजी ने पन्हाला के मजबूत दुर्ग पर अधिकार कर लिया.
अब मुगलों के बढ़ते दबाव के कारण तथा अपने पिताजी के समझाने के कारण शिवाजी ने बीजापुर से सन्धि कर ली और मुगलों से संघर्ष की तैयारी करने लगे.
नोट - शिवाजी और मुगल संघर्ष का विस्तृत विवेचन औरंगजेब एवं मराठा संघर्ष नामक शीर्षक में किया गया है.
इस प्रकार स्पष्ट है कि, शिवाजी ने अपने साहस और पराक्रम के बल पर एक शक्तिशाली मराठा राज्य की स्थापना कर ली. उनके राज्य में सम्पूर्ण महाराष्ट्र, कोंकण एवं कर्नाटक के कुछ भाग सम्मिलित थे, जिसे मराठा इतिहास में 'मराठा स्वराज्य' के नाम से जाना जाता है. शिवाजी की दक्षिण की रियासतों एवं मुगल साम्राज्य के विरुद्ध यह एक बहुत बड़ी सफलता थी.
> मराठा शासन-व्यवस्था शिवाजी की शासन-व्यवस्था
शिवाजी ने दक्षिण भारत में मुगल सम्राट औरंगजेब के समय कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए एक विस्तृत राज्य की स्थापना की, इसके साथ ही उन्होंने एक सुदृढ़ शासन व्यवस्था को अपने राज्य में लागू किया और उनकी ही प्रशासनिक व्यवस्था पूरे मराठा शासनकाल में लगभग 100 वर्षों तक चलती रही, उनके शासन-प्रबन्ध की रूपरेखा निम्नलिखित है
> केन्द्रीय शासन
केन्द्रीय शासन में शिवाजी व उनके मन्त्रीगण सम्मिलित थे, जिसमें सम्पूर्ण शक्तियों के स्रोत शिवाजी ही थे. वे शासन के प्रधान थे जिन्हें राज्य के समस्त पदाधिकारियों की नियुक्ति और पदच्युति का पूर्ण अधिकार था. निरंकुश शक्ति नहीं किया. उन्होंने अपनी शान स्वामी होते हुए भी शिवाजी ने अपनी सत्ता का दुरुपयोग सिद्धान्तों पर आधारित किया और प्रजा हित को सदैव के प्रधानता दी. उन्होंने हिन्दू जाति के उत्थान की हर सम्भव चेष्टा की.
शिवाजी के राज कार्य में सहायता देने के लिए मन्त्रिपरिषद् थी, जिसके 8 सदस्य थे. इसका नाम 'अष्टप्रधान' था. मन्त्रियों का पूर्ण उत्तरदायित्व शिवाजी के प्रति था तथा वे शिवाजी को परामर्श दे सकते थे, जिसे मानना शिवाजी के लिए बाध्यकारी नहीं था. शिवाजी के केन्द्रीय प्रशासन में 18 विभाग थे और प्रत्येक मन्त्री को एक से अधिक विभाग सौंपे गये थे, ये मन्त्री इस प्रकार थे -
(1) पेशवा ( प्रधानमन्त्री ) – राज्य के प्रधानमन्त्री को पेशवा कहा जाता था. शासन व्यवस्था की कार्यकुशलता, राज्य के विभिन्न अधिकारियों के कार्यों में सन्तुलन आदि का ध्यान रखना उसका मुख्य कर्त्तव्य था. सभी महत्वपूर्ण लेखों पर शिवाजी की मुहर लगती थी. शिवाजी की अनुपस्थिति में वही उनका प्रतिनिधित्व करता था.
(2) अमात्य (वित्तमन्त्री)— अमात्य अर्थात् वित्तमन्त्री का कार्य आय-व्यय का विवरण रखना और राज्य के विभिन्न क्षेत्रों (प्रान्तों) का हिसाब रखना था और उनकी जाँच करना था.
(3) मन्त्री – यह मन्त्री शिवाजी के गृह-प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी था. राजा के दैनिक कार्यों और दरबार की महत्वपूर्ण घटनाओं का विवरण रखना भी उसी का काम था. वही राजा के भोजन आदि का प्रबन्ध करता था तथा यह भी देखता था कि राजा के जीवन की सुरक्षा का पूरा प्रबन्ध है या नहीं. उसे प्रायः राजा के साथ ही रहना पड़ता था.
(4) सामन्त या विदेश मन्त्री – यह मन्त्री विदेशी राज्यों और शक्तियों के विषय में राजा को परामर्श देता था. विदेशी राजदूतों व प्रतिनिधियों के स्वागत, निवास तथा वापस लौटने के प्रबन्ध का भार इसी को करना था. वह अपने गुप्तचरों द्वारा शान्तिकाल और युद्धकाल में विदेशी राज्यों की गतिविधियों का पता लगाता रहता था.
(5) सचिव – यह राजा के पत्र व्यवहार का उत्तरदायित्व वहन करता था. परगनों आदि की आमदनी का भी यही हिसाब रखता था. केन्द्रीय शासन में इसकी स्थिति एक प्रकार से सुपरिन्टेण्डेण्ट. (आधुनिक अधीक्षक) के समान थी.
(6) सेनापति – सेनापति का दायित्व सेना की भर्ती, अनुशासन और संगठन का था. शान्ति और युद्ध के समय आवश्यकतानुसार सैन्य टुकड़ियों को नियत करना उसी का कार्य था. रण-क्षेत्र में युद्ध-योजना के लिए यही उत्तरदायी था.
(7) पण्डितराव — यह धार्मिक मामलों का अध्यक्ष था. राजा द्वारा दान में दी गई धनराशि को गरीब ब्राह्मणों में बाँटना और राज्य की ओर से दीन-दुःखियों की सहायता करना इसका प्रमुख कार्य था. यह लोगों के नैतिक आचरण पर भी ध्यान रखता था. धार्मिक रीति-रिवाजों के लिए नियम बनाना तथा जाति-पाँति के झगड़ों को दूर करना उसका कर्त्तव्य था.
(8) न्यायाधीश – इसके अधीन राज्य का न्याय विभाग था. दीवानी और फौजदारी दोनों ही प्रकार के मुकदमों का यह निर्णय करता था.
मन्त्रि-परिषद् के सदस्यों में से ‘पण्डितराव’ एवं ‘न्यायाधीश’ को छोड़कर शेष सभी सैनिक अभियानों में जाते थे और उनका संचालन करते थे. सेनापति व मन्त्री के अतिरिक्त अष्ट प्रधान के सदस्य प्रायः ब्राह्मण ही होते थे.
प्रत्येक प्रधान की सहायता के लिए और उसके अधीन विभाग को सुव्यवस्थित करने के लिए आठ व्यक्ति रहते थे, जिनका दर्जा लेखकों के तुल्य था. वे थे -
(i) दीवान.
(ii) मजूमदार – आय-व्यय निरीक्षक.
(iii) फड़नवीस – सहायक आय-व्यय निरीक्षक.
(iv) सबनीश –कागज-पत्र रखने वाला.
(v) कारखानिस — विभागीय आवश्यकता की वस्तुओं का प्रबन्ध करने वाला.
(vi) चिटनिस– पत्र व्यवहार करने वाला.
(vii) जमादार— कोषाध्यक्ष.
(viii) पोतनिस– सपोतनिस - दिन-प्रतिदिन के साधारण कार्यों के लिए पैसा रखने वाला.
> स्थानीय शासन प्रबन्ध
प्रशासन की सुविधा के लिए शिवाजी का राज्य प्रान्तों, परगनों और जिलों में विभक्त था. प्रान्त निम्नलिखित चार प्रकार के थे—
(1) उत्तरी प्रान्त – इसमें उत्तरी बम्बई, कोंकण, दक्षिणी सूरत, बगलान, पूना का दक्षिणी पठार, डाग तथा कोली के प्रदेश शामिल थे.
(2) दक्षिण प्रान्त – इसमें दक्षिण बम्बई, कोंकण, सावन्तबाड़ी तथा उत्तरी कनारा का समुद्र तटीय प्रदेश सम्मिलित थे.
(3) दक्षिण-पूर्वी प्रान्त — इसमें सतारा व कोल्हापुर के जिले, बेलगाँव, धरवार व कोपल के जिले सम्मिलित थे.
(4) चौथा प्रान्त सैनिक अधिकार में था, जिसमें आधुनिक मैसूर राज्य के उत्तरी, केन्द्रीय व पूर्वी भाग तथा मद्रास के कुछ भाग सम्मिलित थे. अपने शासन के अन्तिम वर्षों में जीत पाने के कारण इस प्रदेश को कुछ समय के लिए सैनिक नियन्त्रण में रखा गया था, जबकि शेष तीनों प्रान्तों को नागरिक अधिकारियों (प्रान्तपतियों) के हाथों में रखा गया था.
प्रान्तपतियों की नियुक्ति शिवाजी द्वारा होती थी, प्रत्येक प्रान्त में सेना रहती थी जिसका सेनापति ही प्रान्तपति होता इनके मुख्य कार्य प्रान्त में शान्ति व्यवस्था बनाये रखना, प्रान्तों की रक्षा करना, लगान तथा अन्य करों की वसूली कर केन्द्र सरकार को भेजना, प्रान्त परगनों में बँटे होते थे और परगने गाँवों में विभक्त थे. परगने का अधिकारी आधुनिक जिलाधीश की तरह का था, उसके अधीन एक सैनिक टुकड़ी रहती थी तथा राजस्व वसूली उसका प्रमुख कार्य था. शिवाजी ने ग्राम-प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं किया तथा उसका परम्परागत स्वरूप ही बनाये रखा.
> पेशवा के रूप में बालाजी विश्वनाथ (1713-1720 ई.)
साहू ने 1713 ई. में बालाजी विश्वनाथ को पेशवा के पद पर नियुक्त किया. पेशवा के रूप में कार्य करते हुए बालाजी विश्वनाथ ने मराठा राज्य एवं छत्रपति साहू के हितों की रक्षा की और उन्होंने अपनी सैनिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक प्रतिभा का परिचय दिया. उनके कार्यों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है—
(i) बालाजी विश्वनाथ ने पेशवा बनते ही शाहू के विरोधी मराठा सरदारों कान्होजी अंग्रिया, कृष्णाराव, धन्नाजी जाधव, जैसे अनेक प्रभावशाली सरदारों को साहू के पक्ष में मिला लिया. इससे छत्रपति के रूप में शाहू की स्थिति सुदृढ़ हो गई. बालाजी विश्वनाथ ने राजपूतों से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित किए. इनमें प्रमुख आमेर के कछवाहा नरेश जयसिंह व जोधपुर नरेश अजीतसिंह थे. इन मैत्री सम्बन्धों से उत्तरभारत में मराठों की स्थिति मजबूत हो गई. इसके बाद बालाजी ने पूना एवं कोल्हापुर पर अधिकार कर लिया तथा पूरे राज्य में शान्ति व्यवस्था कायम की. राज्य की आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए उन्होंने लगान का पुननिर्धारण करवाया.
(ii) मुगलों से सम्बन्ध – बालाजी विश्वनाथ ने मुगल बादशाहों बहादुरशाह एवं जहाँदारशाह से शाहू को छत्रपति के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया, लेकिन निजाम के प्रभाव के कारण शाहू को मान्यता नहीं मिली. 
इसी बीच सैयद बन्धु शक्तिशाली हो गए और उन्होंने फर्रुखसियर को बादशाह बनाया. अतः वह अब अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए सैयद बन्धुओं के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगा. इस पर सैयद हुसैनअली ने 1718 ई. में दक्षिण के सूबेदार की हैसियत से विश्वनाथ से सन्धि कर ली. इस सन्धि के अनुसार, शिवाजी का स्वराज वाला प्रदेश शाहू के अधिकार में स्वीकार कर लिया गया तथा दक्षिण के राज्यों से मराठों को ‘चौथ’ एवं 'सरदेशमुखी' वसूल करने का 6 अधिकार दिया गया तथा बदले में यह तय किया गया कि 15000 मराठा सवार शाहू मुगल सेवा में रखेगा. इसके साथसाथ शाहू को 10 लाख रुपया वार्षिक कर देने का तथा ताराबाई के राज्य कोल्हापुर को परेशान नहीं करने का वादा करना पड़ा.
इस मराठा-मुगल सन्धि ने शाहू को छत्रपति के रूप में स्वीकार कर लिया तथा दक्षिण के सभी राज्यों पर मराठों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया गया. इस सन्धि को मुगल बादशाह फर्रूखशियर से मान्यता प्राप्त कराने के लिए बालाजी विश्वनाथ स्वयं दिल्ली गए हुसैन अली ने मराठा सरदारों की मदद से फर्रूखशियर को गद्दी से उतार दिया तथा रफी-उद्दाराजत को बादशाह बनाया जिसने इस सन्धि को स्वीकार कर लिया. इससे शाहू को वैधानिक रूप से छत्रपति की मान्यता प्राप्त हो गई.
इस सन्धि के बाद बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु अप्रैल, 1720 ई. में हो गई, लेकिन उन्होंने अल्पकाल में ही अपनी प्रशासनिक क्षमता एवं कूटनीतिज्ञता का परिचय देकर मराठा राज्य को एक शक्तिशाली राज्य बना दिया तथा पूरे दक्षिणभारत में उसको चुनौती देने वाला कोई नहीं रहा तथा उन्होंने मराठा साम्राज्यवाद के विकास का नया मार्ग खोल दिया.
> पेशवा बाजीराव के काल में मराठा राज्य का विकास 
पेशवा बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उनके पुत्र बाजीराव पेशवा बने, जिन्होंने अपने अदम्य साहस और धर्म के बल पर पूरा मराठा साम्राज्य का निर्माण किया. अपनी आन्तरिक स्थिति को सुदृढ़ कर उन्होंने सर्वप्रथम निजाम से निपटने का कार्य अपने हाथ में लिया.
(1) हैदराबाद का निजाम- हैदराबाद के निजाम-उलमुल्क ने मुगल मराठा सन्धि (1719) को अस्वीकार कर ‘चौथ' एवं 'सरदेशमुखी' की वसूली पर रोक लगा दी. अतः शाहू ने वार्ता द्वारा इस गतिरोध को दूर करने का प्रयास किया, लेकिन वह विफल रहा. इसी बीच निजाम वजीर बनकर दो वर्ष के लिए दिल्ली चला गया. इसके जाने के बाद मुबारिज खाँ को दक्षिण का सूबेदार बनाया गया, जो निजाम का विरोधी था. अतः निजाम एवं मुबारिज में संघर्ष प्रारम्भ हो गया. इसका लाभ उठाकर पेशवा बाजीराव ने 'बुरहानपुर’ पर अधिकार कर लिया.
दिल्ली से निजाम ने लौटकर मुबारिज खाँ को पराजित कर हैदराबाद में स्वतन्त्र निजाम राज्य की स्थापना की और दक्षिण के मुगल क्षेत्रों पर अपना अधिकार जमा लिया और अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उसने मराठों को चौथ एवं सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दे दिया.
मराठों ने अब कर्नाटक पर अधिकार करने के लिए आक्रमण किया, तो निजाम ने उनमें फूट डालने के लिए 1727 ई. में शिवाजी द्वितीय से शाहू के विरुद्ध सन्धि कर ली तथा शाहू के क्षेत्रों पर आक्रमण प्रारम्भ कर दिए.
इस पर बाजीराव ने कर्नाटक से तुरन्त वापस लौटकर 1728 ई. में 'पालखेद' में निजाम को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया और 1719 ई. की सन्धि की सभी शर्तों को मानने पर विवश कर दिया.
लेकिन निजाम ने हार न मानते हुए 1731 ई. में मालवा के शासक मुहम्मदशाह बंगेश को साथ लेकर मराठों पर आक्रमण कर दिया. इस संघर्ष में भी उसे पराजित होना पड़ा और उसे पुनः सन्धि करनी पड़ी तथा यह वायदा करना पड़ा कि वह मराठों के उत्तर के अभियानों के समय तटस्थ रहेगा. इस प्रकार दोनों शक्तियों में मित्रता हो गई.
(2) मालवा और बुन्देलखण्ड–मालवा का प्रान्त अत्यन्त समृद्ध था और यह मराठा राज्य की सीमा से सटा हुआ था. अतः इसका लाभ उठाने के लिए मालवा के प्रान्तपति गिरधर बहादुर को 1728 ई. में अमझेरा के युद्ध में बुरी तरह से पराजित कर दिया और आमेर के राजा को यहाँ का प्रान्तपति नियुक्त किया. जयसिंह ने मराठों से गुप्त सन्धि कर ली.
मालवा से सटा हुआ प्रदेश बुन्देलखण्ड था. अतः बाजीराव ने यहाँ भी अपना प्रभाव जमाने के उद्देश्य से छत्रशाल की सहायता से मुहम्मद खाँ बंगेश को परास्त कर दिया, इसके बदले में छत्रशाल ने पेशवा को झाँसी, कालपी, सागर व भाटा के प्रदेश दिए.
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए मुगल बादशाह मुहम्मद शाह 'रंगीला' ने जयसिंह को हटाकर मुहम्मद खाँ बंगेश को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया, जिसे बाजीराव ने 1736 ई. में निर्णायक रूप से हरा दिया. अब मुगल बादशाह ने स्वयं बाजीराव को मालवा का सूबेदार बना दिया तथा शाहू के खर्च के लिए 12 लाख रुपए वार्षिक निश्चित कर दिए गए तथा बाजीराव के भाई चिमनाजी अप्पा को क्रमशः 7 हजारी एवं 5 हजारी का मनसब भी दिया गया. उससे मालवा और बुन्देलखण्ड मराठों के प्रभावशाली नियन्त्रण में आ गए.
(3) गुजरात - गुजरात में मराठा चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करने का कार्य त्रियम्बक राव दामेड़ के पास था, जो बाजीराव का विरोधी था, इस पर बाजीराव ने शाहू को बिना बताए मारवाड़ के शासक एवं गुजरात के सूबेदार अभयसिंह से मित्रता कर दामेड़ के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की, जिसमें त्रियम्बक राव मार डाला गया और पेशवा समर्थक गायकवाड़ को गुजरात में स्थापित कर दिया गया, लेकिन अभयसिंह ने इसकी हत्या करवा दी. अंतः 1738 ई. में पेशवा ने गुजरात पर आक्रमण कर उसे मराठा राज्य में मिला लिया.
> दिल्ली पर आक्रमण
पेशवा ने अब अपने प्रभाव को और अधिक विस्तार देने के उद्देश्य से अवध पर आक्रमण कर उसे लूट लिया और दिल्ली पर आक्रमण कर दिया. उसने बादशाह को खुली चुनौती दी तथा वह कुछ नहीं कर सका. बाजीराव आगे बढ़ा और राजपूताने को लूटता हुआ वापस पूना लौट गया.
बादशाह ने मराठों को दबाने के लिए निजाम का एक बार पुनः सहारा लिया जिसे बाजीराव ने भोपाल के निकट 1737 ई. में पराजित कर उसे 'दोराहा सराय की सन्धि' (1738 ई.) करने पर विवश कर दिया. जिसके अनुसार, शाहू को मालवा एवं नर्मदा के साथ चम्बल नदी के मध्यवर्ती इलाके व 50 लाख रुपए हर्जाने के रूप में निजाम को देना स्वीकार करना पड़ा जिसे बाद में मुगल बादशाह ने भी स्वीकार कर लिया.
> कोंकण क्षेत्र व मराठा
कोंकण क्षेत्र में मराठों के तीन प्रमुख विरोधी शक्तियाँ थीं – (1) कोलाबा के आंग्रे, (2) जंजीरा के सीदी व (3) गोआ के पुर्तगाली.
1737 ई. में बाजीराव ने पुर्तगालियों के विरुद्ध कार्यवाही करते हुए उनके क्षेत्र थाना, सालसेट व बेसीन पर अधिकार कर लिया. इस पर अंग्रेजों ने भी भयभीत होकर मराठों से बम्बई में सन्धि कर ली. बाजीराव ने मध्यस्थता कर कान्होजी आंग्रे के दो पौत्रों के मध्य कोंकण का राज्य बाँट दिया. 1733 ई. में जंजीरा के सीदियों के विरुद्ध अभियान कर उन्हें सन्धि करने पर विवश कर दिया तथा उनका आधा राज्य हड़प लिया. इस प्रकार बाजीराव ने अपने पश्चिमी समुद्र तट को भी अपने अधिकार में कर लिया.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि 1720 से 1740 ई. के मध्य अपने 20 वर्षों के शासनकाल में बाजीराव ने मराठों का प्रभाव क्षेत्र लगभग पूरे भारत में स्थापित कर दिया और दिल्ली पर आक्रमण कर मुगल सत्ता को मराठों के सम्मुख निस्तेज कर दिया तथा मराठों का गौरव एवं सम्मान चहुँ ओर फैला दिया.
> पेशवा बालाजी बाजीराव के समय में हुए मराठा राज्य का विस्तार
पेशवा बाजीराव (1720-40 ई.) की मृत्यु के बाद शाहू का नया पेशवा बालाजी बाजीराव बना जो पेशवा बाजीराव का ज्येष्ठ पुत्र था. इसने अपने कार्यकाल में मराठा शक्ति को पूरे भारत में सर्वोच्च बना दिया, लेकिन मराठों का पतन भी इसी के कार्यकाल में प्रारम्भ हुआ. पानीपत के तृतीय युद्ध ने मराठा शक्ति को नष्ट कर दिया फिर भी बालाजी बाजीराव के कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, जो निम्नलिखित प्रकार से 
हैं—
मालवा – मराठों एवं मुगलों के मध्य 1736 ई. की सन्धि ढंग से स्थापित नहीं हो पाया था. अतः बालाजी बाजीराव ने के बावजूद भी मालवा पर मराठों का आधिपत्य प्रभावशाली जयसिंह से सम्पर्क स्थापित कर मुगल बादशाह मुहम्मदशाह लिया और 400 मराठा सैनिक मुगल दरबार की सेवा में से मालवा का नायब सूबेदार का पद अपने लिए प्राप्त कर रखने का आश्वासन दिया तथा आवश्यकता होने पर 4000 सिपाहियों द्वारा बादशाह की सहायता करने को तैयार हो गया. इससे मराठों का मुगल दरबार में प्रभाव बढ़ा.
कर्नाटक – मराठा सरदार रघुजी भोंसले ने कर्नाटक के नवाब दोस्तअली की आक्रमण कर हत्या कर दी तथा उसके दामाद चाँदा साहब को गिरफ्तार कर पूना भेज दिया, इससे बालाजी बाजीराव का अधिकार कर्नाटक पर भी हो गया.
भौंसले से सम्बन्ध – रघुजी ने कर्नाटक पर अधिकार जमाने के बाद 1744-51 ई. के मध्य बंगाल पर अनेक आक्रमण किए तथा अलीवर्दी खाँ से उसका प्रान्त उड़ीसा छीन लिया तथा बंगाल एवं बिहार के बदले 12 लाख रघुजी को देना स्वीकार कर लिया. इससे रघुजी एवं पेशवा में प्रतिद्वन्द्विता उत्पन्न हो गई, जिसे छत्रपति ने मध्यस्थता कर समाप्त किया, लेकिन इसका बुरा प्रभाव यह पड़ा कि मराठों की एकता समाप्त हो गई.
गुजरात पर अधिकार - बालाजी बाजीराव ने ताराबाई के समर्थक दामाजी गायकवाड़ को पराजित कर दिया तथा 25 लाख रुपए हर्जाने के रूप में वसूले, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने दामाजी को पुत्र सहित गिरफ्तार कर लिया तथा पूरे गुजरात पर अपना अधिकार जमा किया. इस घटना से ताराबाई ने सबक सीखा और बालाजी से सन्धि कर ली.
निजाम और बालाजी – निजाम ने 1743 ई. में रघुजी को हराकर कर्नाटक पर अपना अधिकार जमा लिया और बादशाह की सहायता से मालवा पर भी वह अधिकार करना चाहता था, लेकिन 1748 ई. में उसकी मृत्यु हो जाने से गद्दी के लिए हैदराबाद में संघर्ष हो गया. इस स्थिति में बालाजी ने मौके का लाभ उठाकर सलावतजंग को समर्थन देने के बदले उससे बगलाना एवं खानदेश का इलाका प्राप्त कर लिया.
थोड़े समय बाद हैदराबाद में पुनः गृहयुद्ध प्रारम्भ हो गया. अतः बालाजी ने हैदराबाद पर आक्रमण कर 'उदगीर के युद्ध' में 1759 ई. में निजाम को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया और बीजापुर, बीदर, औरंगाबाद, असीरगढ़, बुरहानपुर, अहमदनगर, बीजापुर तथा दौलताबाद के दुर्ग उससे हथिया लिए. इससे दक्षिण में बालाजी की धाक जम गई.
बुन्देलखण्ड पर आक्रमण – बालाजी ने बुन्देलखण्ड पर 1741-47 ई. के मध्य आक्रमण कर सारे बुन्देलखण्ड को मराठा राज्य में मिला लिया तथा झाँसी को मराठों की शक्ति का केन्द्र बना दिया.
राजपूताना में हस्तक्षेप — आमेर के राजा जयसिंह की मृत्यु के बाद ईश्वरसिंह व माधोसिंह के बीच चले उत्तराधिकार के संघर्ष में सिन्धिया और होल्कर में प्रतिद्वन्द्विता उत्पन्न हो जाने के कारण पेशवा को हस्तक्षेप करना पड़ा और माधवसिंह के पक्ष में समझौता करवा दिया, लेकिन शीघ्र ही माधवसिंह मराठों का विरोधी बन गया तथा उसने मल्हार राव होल्कर की हत्या का षड्यन्त्र रचा और हजारों मराठा सैनिकों की हत्या करवा दी. इसी प्रकार मारवाड़ की गद्दी के लिए संघर्ष में मराठों ने भाग लिया, जिसमें सिन्धिया की हत्या हो गई. इससे मराठा राजपूत सम्बन्धों में कटुता आ गई.
जाटों से सम्बन्ध – पेशवा बालाजी बाजीराव आगरा और अजमेर पर अधिकार करने का प्रयास करने लगा. इस पर जाट राजा सूरजमल ने मुगल बादशाह की अनुमति पाकर मराठों पर आक्रमण कर उन्हें पराजित कर दिया, जिससे मराठों को सन्धि करनी पड़ी एवं हर्जाना भी देना पड़ा. इससे उनकी प्रतिष्ठा को आघात लगा और उन्होंने जाटों से अपनी पुरानी मित्रता खो दी.
पंजाब और दिल्ली की राजनीति में हस्तक्षेप – बालाजी बाजीराव ने पंजाब व दिल्ली की राजनीति में भी हस्तक्षेप किया. उन्होंने अहमदशाह अब्दाली द्वारा बनाए गए मुगलों के मीरबख्शी को उसके पद से हटा दिया तथा पंजाब पर अधिकार कर लिया. इससे अब्दाली ने मराठों को नष्ट करने के लिए भारत की ओर प्रस्थान किया और 14 जनवरी, 1761 ई. को मराठों एवं अब्दाली के मध्य घमासान पानीपत के तृतीय युद्ध के रूप में हुआ, जिसमें मराठे बुरी तरह परास्त हो गए तथा उनके सभी प्रमुख सेनानायक मारे गए. बालाजी बाजीराव इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर सके और थोड़े ही दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, बालाजी बाजीराव ने मराठों की शक्ति को उनके चरम पर पहुँचा दिया तथा उत्तर एवं दक्षिण भारत पर अपना पूर्ण नियन्त्रण स्थापित कर लिया. वे इससे आगे पश्चिमोत्तर के प्रदेशों पर अधिकार करने के लिए भी प्रयासरत् थे, परन्तु वे इसे पूरा नहीं कर सके. उन्होंने जन कल्याण के लिए भी अनेक कार्य किए, परन्तु अतिशय महात्वाकांक्षा के कारण उन्होंने मराठों की शक्ति को नष्ट कर दिया.
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Sun, 08 Oct 2023 09:31:05 +0530 Jaankari Rakho
मुगलकालीन स्थापत्य कला https://m.jaankarirakho.com/425 https://m.jaankarirakho.com/425 मुगलकालीन स्थापत्य कला

> बाबर के समय में मुगल वास्तुकला : टिप्पणी
बाबर स्थापत्य कला कारखी व्यक्ति था. उसे पूर्व मुगलकाल (सल्तनतकाल) में बनी इमारतें पसन्द नहीं आयीं. इसलिए जैसाकि अपनी आत्मकथा में उसने लिखा है कि, “मैंने आगरा, धौलपुर, बयाना, सीकरी, कोल और ग्वालियर में महल बनवाने के लिए 1491 मजदूर लगवाए.” परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि, उसने इन स्थानों पर केवल मण्डप, कुएँ, तालाब एवं फव्वारे ही लगवाए थे, महल या सार्वजनिक भवन नहीं बनवाए. यदि बनवाए भी तो वे इतने कमजोर बने थे कि समय के कारण होने वाली जर्जरता को वे सहन नहीं कर सके.
बाबर द्वारा बनवाई गई इमारतों में केवल दो ही इमारतें शेष बची हैं तथा यह दोनों ही मस्जिदें हैं. इनका निर्माण 1526 ई. में करवाया गया था. ये हैं – ( 1 ) पानीपत की काबुली बाग मस्जिद एवं ( 2 ) सम्भल की जामा मस्जिद. उसकी आज्ञा द्वारा बनवाई गई एक अन्य मस्जिद जो अयोध्या में थी, वर्तमान में नष्ट कर दी गई है.
ऊपर वर्णित तीनों ही इमारतों में कला का कोई लक्षण नहीं है. ये सभी साधारण इमारतें हैं. बाबर का इरादा या कुंस्तुनतुनिया के प्रसिद्ध कारीगर 'सिनान' को अपनी इमारतों का नक्शा बनाने के लिए बुलाया, परन्तु वह इसे मूर्त रूप न दे सका और इसी बीच 1530 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
> हुमायूँ के समय का स्थापत्य : टिप्पणी
हुमायूँ का जीवन निरन्तर संघर्षों में व्यतीत होने के कारण उसे भवन-निर्माण का समय नहीं मिल सका, फिर भी उसने कुछ इमारतों का निर्माण करवाया, जिसमें प्रथम नाम दीन-पनाह महल (दिल्ली) का आता है. यह महल अत्यन्त शीघ्रता में बनवाया गया था. अतः इसमें न तो सुन्दरता का ध्यान रखा गया और न हीं टिकाऊपन का.
इसके अतिरिक्त हुमायूँ ने आगरा तथा फतेहाबाद में मस्जिदों का निर्माण करवाया. वर्तमान में इनके खण्डहर हमें प्राप्त होते हैं. इन दोनों का निर्माण फारसी शैली के आधार पर किया गया है तथा इनमें मौलिकता एवं कला का पूर्णतः अभाव था.
स्थापत्य के क्षेत्र में बाबर और हुमायूँ का केवल मात्र परम्परा को प्रारम्भ कर दिया जिस पर कि आगे चलकर अनेक भव्य भवनों का निर्माण सम्भव हो सका. इतना ही योगदान है कि, इन्होंने इमारत बनवाने की उस
> अकबर के समय की वास्तुकला 
मुगलकाल की वास्तुकला का वास्तविक रूप से प्रारम्भ अकबर के समय में ही हुआ था. उसके द्वारा बनवाए गए भवनों में ईरानी तथा भारतीय तत्व दोनों का मिश्रण हुआ और एक नई शैली को जन्म मिला. इसी कारण से इस शैली को हम राष्ट्रीय शैली भी कह सकते हैं. देश में उसके समय में जितनी भी स्थापत्य निर्माण की शैलियाँ देश में प्रचलित थीं अकबर उन्हें बहुत बारीकी से समझता था और उनको कार्य रूप में परिणत करने के लिए कारीगरों की नई-नई बातें बताता रहता था.
अकबर के स्थापत्य को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है—
(1) किलों का निर्माण, (2) महलों का निर्माण व (3) मकबरों का निर्माण.
(1) किलों का निर्माण – अकबर ने अपने समय में तीन किलों का निर्माण करवाया, यथा - आगरा, लाहौर और इलाहाबाद.
इन किलों में आगरा का किला लाल पत्थर द्वारा निर्मित बड़ा भव्य है. इसका घेरा डेढ़ मील लम्बा है. इसमें दो द्वार हैं तथा इसमें 500 से अधिक इमारतें अकबर द्वारा बनवाई गई थीं जिनमें से कुछ को शाहजहाँ ने तुड़वा दिया था. अकबरकालीन बनी इमारतों में अकबरी महल और जहाँगीरी महल सर्वश्रेष्ठ हैं. जहाँगीरी महल हिन्दू स्थापत्य से प्रभावित है. इसकी बनावट एवं सजावट हिन्दू रीति से की गई है.
लाहौर के किले की इमारतें आगरा के जहाँगीरी महल के समान हो हैं और उनमें थोड़ा-सा अन्तर है एवं यह आगरा के किले से अधिक सघन सजावट वाला है. इस किले में जो चित्रकारी की गई है, वह हिन्दू रीति के अनुसार ही है.
इलाहाबाद का किला प्रायः नष्ट-सा हो चुका है. इसका केवल जनाना भाग शेष है. 
(2) महलों का निर्माण – अकबर ने अपनी नई राजधानी फतेहपुर सीकरी को बनाया तथा इसको अनेक सुन्दर इमारतों द्वारा उसने सजाया. यहाँ निम्नलिखित सुन्दर भवन बने हुए हैं - 
(i) जोधाबाई का महल – स्मिथ के अनुसार, अकबर के समय यहाँ बनी इमारतों में यह सर्वाधिक प्राचीन है. इस इमारत की स्थापत्य शैली न हिन्दू है और न ही मुस्लिम, बल्कि यह उस समय की सभी शैलियों का मिला-जुला रूप है. इसमें तराशे हुए पत्थर का प्रयोग किया गया है तथा इसकी बनावट जहाँगीर महल के समान है.
(ii) मरियम उस्जमानी का महल — इसका वास्तविक नाम सुनहरी कोठी है, क्योंकि इसके भीतरी एवं आन्तरिक भागों में सुनहरे रंग के पत्थर जुड़े हुए थे, इसमें संगतराशी का कार्य बहुत ही अच्छा हुआ है. इसकी दीवारों के भीतरी भागों पर सुन्दर चित्रों को उकेरा गया था.
(iii) तुर्की सुल्ताना का महल – सीकरी के महलों में इस महल को सर्वाधिक सुन्दर माना जाता है. इसकी निर्माण शैली तथा पत्थरों की बनावट सुन्दर व सजीव है तथा यह छोटी इमारत उससे बहुत ही सुन्दर बन गई है. सम्भवतः यह किसी राजकुमारी के रहने का महल रहा होगा.
(iv) बीरबल का महल – यह महल पत्थर की काफी ऊँची कुर्सी पर बना है तथा इसका गुम्बद अत्यन्त भव्य है. इस महल में भीतरी दीवारों पर अत्यन्त सुन्दर चित्रकारी की गई है, जिसमें एक ब्राह्मण को सोता हुए दिखाया गया है.
(v) पंच महल — यह फतेहपुर सीकरी की भव्यतम इमारतों में से एक है. यह पाँच मंजिली इमारत है, जिसमें यह क्रमशः ऊपर की ओर छोटी होती गई है. सबसे ऊपर एक सुन्दर छतरी है. इस इमारत का प्रयोग सम्राट अकबर सुबह- शाम सूर्योदय तथा सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए करता था. इसमें हिन्दू, मुस्लिम एवं जैन शैलियों के आधार पर नक्काशी की गई है.
(vi) दीवान-ए-खास – सीकरी में अकबर का दीवान-एखास एकदम सादा है, फिर भी यह अत्यन्त प्रभावशाली है. यह दो मंजिला होने का आभास देता है. इसका मध्य का सतून अत्यन्त सुन्दर ढंग से बना है, जिसकी नक्काशी देखने योग्य है. इसी सतून के ऊपर शाही सिंहासन रखा जाता था, जिसको रोकने के लिए बहुत-सी नक्काशीदार छतरियाँ बनी हैं. सिंहासन तक पहुँचने के लिए चारों कोनों से छज्जों के रूप में चार मार्ग बनाए गए हैं. इन छतरियों और सतून के मिलाने के बाद देखने से ऐसा लगता है जैसे सूर्य की किरणें फूट रही हैं और यह सतून न होकर सूरजमुखी का फूल हो.
(vii) जामा मस्जिद - अकबर ने दीन-ए-इलाही के अनुयायियों के लिए सीकरी में जामा मस्जिद का निर्माण करवाया था.
(viii) शेख सलीम चिश्ती की दरगाह-इस दरगाह का मध्य भाग अकबर ने बनवाया था. इसमें अनेक सुन्दर जालियों का निर्माण करवाया गया था. जहाँगीर ने इसे संगमरमर का बनवा दिया था.
(ix) बुलन्द दरवाजा—इस दरवाजे का निर्माण 1602 ई. में अकबर ने अपनी गुजरात विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था. यह भारतवर्ष का सबसे ऊँचा दरवाजा है. यह हिन्दू और मुस्लिम स्थापत्य कला का सुन्दर नमूना है. यह लाल पत्थर से निर्मित है जिस पर कोई रंग नहीं चढ़ाया गया है. इस पर बहुत ही सुन्दर नक्काशी का काम हुआ है तथा पच्चीकारी संगमरमर की है, जो बहुत ही सुन्दर व सजीव है.
(3) मकबरों का निर्माण– अकबर के समय में प्रमुख रूप से दो मकबरों का निर्माण किया गया यथा
(i) हुमायूँ का मकबरा, (ii) अकबर का मकबरा.
(i) हुमायूँ का मकबरा — अकबर के समय में हुमायूँ की विधवा पत्नी हाजी बेगम ने इस इमारत को बनवाया था. इसका निर्माण ईरानी कारीगरों व भारतीय मजदूरों द्वारा करवाया गया था. इसीलिए इमारत का नीचे का भाग हिन्दू शैली में बना है तथा ऊपरी भाग पूर्ण रूप से ईरानी शैली में बना है. इस मकबरे में समरूपता का विशेष ध्यान रखा गया है.
(ii) अकबर का मकबरा - अकबर का मकबरा सिकन्दरा में स्थित है, जो आगरा के समीप है. यह लगभग पूर्ण रूप से हिन्दू शैली का बना हुआ है. यह देखने में बौद्ध विहार जैसा है, जिसे अकबर ने स्वयं बनवाया था, लेकिन उसे जहाँगीर ने पूरा किया था.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, अकबर ने अपने समय में व्यापक निर्माण कार्य करवाये. उसके समय के भवन अपनी सादगी और विशालता के लिए प्रसिद्ध हैं.
> जहाँगीर के समय की वास्तुकला
जहाँगीर को स्थापत्य की अपेक्षा चित्रकला में अधिक रुचि थी. अतः उसके समय में इमारतों का निर्माण रुक-सा गया, लेकिन इसके बावजूद भी इस काल में कुछ विशेष सुन्दर इमारतों का निर्माण किया गया, जो निम्नलिखित हैं—
(i) ऐतमाद-उद्-दौला का मकबरा - नूरजहाँ द्वारा अपने पिता का बनवाया गया मकबरा जहाँगीर के समय की सर्वश्रेष्ठ इमारत है. यह श्वेत संगमरमर से बनाया गया है तथा इसमें पिट्रा-ड्यूरा का प्रयोग किया गया है. यह इस शैली की प्रथम मुगल इमारत है.
(ii) अकबर का मकबरा - हालांकि इस मकबरे का नक्शा जहाँगीर द्वारा बनाया गया था, परन्तु इसका निर्माण जहाँगीर ने करवाया. (देखें अकबर स्थापत्य कला).
(iii) जहाँगीर का मकबरा - लाहौर के समीप शाहदरा में जहाँगीर का मकबरा स्थित है. इस मकबरे के ऊपर सफेद संगमरमर का एक मण्डप था, जिसे सिखों ने उतार लिया था. मकबरे का भीतरी भाग संगमरमर की पच्चीकारी से सुशोभित है. चिकने और रंगीन खपरैल उसकी शोभा को बढ़ाते हैं. इस मकबरे को नूरजहाँ ने पूर्ण करवाया था.
इन इमारतों के अलावा जहाँगीर ने अनारकली का मकबरा (लाहौर) ख्वाबगाह तथा मोती मस्जिद का निर्माण करवाया.
> शाहजहाँ और वास्तुकला
शाहजहाँ का राज्यकाल मुगल स्थापत्य कला का स्वर्णयुग था और उसके समय में स्थापत्य कला अपने सौन्दर्य की चरम सीमा पर पहुँच गई थी. उसके द्वारा निर्मित भवनों में शान्ति, गौरव, सुषमा तथा सौन्दर्य मूर्तिमान होते दिखाई पड़ता है. उसके स्थापत्य के विषय में पर्सी ब्राउन ने लिखा है, “जिस प्रकार आगस्तस की यह दम्भपूर्ण उक्ति है कि, उसने रोम को ईंटों का बना हुआ पाया था और संगमरमर का बनाकर छोड़ दिया था, उसी प्रकार शाहजहाँ ने मुगल शहरों को पत्थर का बना हुआ पाया था और संगमरमर का बनाकर छोड़ गया.” शाहजहाँ के समय बने कुछ उत्कृष्ट भवनों का विवरण निम्नलिखित है—
> ताजमहल
शाहजहाँ के समय में निर्मित भवनों में सर्वोत्तम भवन ताजमहल है, जिसे उसने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था. इसके निर्माण के लिए एशिया एवं यूरोप के कारीगर बुलाए गए इसके मुख्य वास्तुकार 'ईसा खाँ' थे. ताजमहल 22 फुट ऊँचे चबूतरे पर स्थित है. इसमें अनेक इमारतें सम्मिलित हैं. दोनों ओर मस्जिदें हैं. मध्य में संगमरमर की समाधि बनी है, जो उद्यानों और तालाबों के बीच कमल के समान गौरवशाली दृष्टिगोचर होती है. इसके मुख्य गुम्बद की आकृति तैमूरी गुम्बद की आकृति से मिलती-जुलती है. इसके निर्माण में 22 वर्ष का समय और साढ़े चार करोड़ रुपए लगे थे. संगमरमर का इतना बढ़िया संयोजन इसमें है कि, कहीं कोई त्रुटि ही नहीं मिलती. इस पर टिप्पणी करते हुए मजूमदार ने लिखा है कि, "ताजमहल कविता, संगीत, चित्र, मूर्ति और स्थापत्य कला का पंचामृत जान पड़ता है. सोम, चारुतम, भव्यता, अपार्थिव दिव्यता उनकी सन्तुलन योजना और मूर्ति की पूर्णता का वचन अगोचर है."
ताजमहल के अतिरिक्त शाहजहाँ ने आगरा, दिल्ली, लाहौर, काबुल, कश्मीर, अजमेर, कान्धार, अहमदाबाद आदि स्थानों पर श्वेत संगमरमर द्वारा मस्जिद, मकबरे, महल और मण्डप आदि का निर्माण करवाया.
अकबर की बहुत-सी इमारतों को, जो लाल पत्थर द्वारा निर्मित थीं, को शाहजहाँ ने तुड़वा कर संगमरमर का बनवा दिया. आगरे के किले में शाहजहाँ ने जहाँगीर महल के उत्तर में अनेक भवनों का निर्माण किया जिनमें दीवाने-आम, दीवाने-खास, मच्छी भवन, मुसम्मम बुर्ज, मोती मस्जिद आदि हैं.
इन इमारतों में दीवान-ए-खास एक अत्यन्त सुन्दर इमारत है, इसमें दोहरे खम्बे लगे हुए हैं. मुसम्मम बुर्ज किले की लम्बी चौड़ी दीवार पर अप्सरा कुंज के समान शोभायमान है. मोती मस्जिद में सभी सामग्री बहुत ही उत्तम रूप से लगी होने के कारण यह अपने नाम को चरितार्थ करती है.
आगरा के किले के समान ही जहाँगीर ने लाहौर के किले में भी अनेक निर्माण कार्य करवाए. इस किले के उत्तरीपश्चिमी भाग में चालीस खम्भे का दीवान-ए-आम, मुसम्मम बुर्ज, शीश महल, नौलक्खा महल और ख्वाबगाह जैसी इमारतें हैं.
1638 ई. में शाहजहाँ ने दिल्ली के पास शाहजहाँनाबाद नामक नगर को बसाया तथा यहाँ किला बनवाया. आज यह किला 'लाल किले' के नाम से प्रसिद्ध है. किले के अन्दर श्वेत संगमरमर से निर्मित अनेक भव्य एवं सुन्दर इमारतें हैं. इन इमारतों में मोती महल, हीरा महल और रंग महल विशेष उल्लेखनीय हैं. दीवाने आम और दीवाने खास इत्यादि इमारतों के अतिरिक्त उसने संगीत भवन और अनेक दफ्तर तथा बाजार भी बनवाए. प्रत्येक महल के सम्मुख पुष्पों की क्यारियाँ, फुब्वारे तथा सुन्दर बाग थे. इमारतों के कंगूरों की कतारें, चमकते हुए गुम्बदों और हवाई गोखरों से सुसज्जित थीं और जाली के कटावों, खम्भों पर बने हुए मेहराबों और दीवारों पर बनी हुई चित्रकारी से इनकी सुन्दरता और भी बढ़ गई थी. महलों और अन्य इमारतों में संगमरमर का फर्श तथा नहरें बहिस्त (स्वर्ग गंगा) शाह बुर्ज से महल में आती थी और भवनों को जल देती हुई फुब्वारे का रूप धारण कर लेती थी. इन फुब्वारे में सर्वश्रेष्ठ फुब्वारा रंगमहल के मध्य के भवन में है. इसी महल की दीवार पर खुदा है : 
अगर फिरदौस वर रुए जमीं अस्त ।
हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्त ॥ 
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि, शाहजहाँ के शासनकाल में लाल पत्थर के स्थान पर ऐश्वर्य और गौरव के प्रतीक संगमरमर की अनेक भव्य एवं सुन्दरतम इमारतों का निर्माण किया गया था. उसके समय के स्थापत्य को देखकर आज भी आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहा जा सकता है.
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Sun, 08 Oct 2023 09:28:23 +0530 Jaankari Rakho
मुगलकालीन सामाजिक जीवन, शिक्षा, साहित्य एवं कला के सन्दर्भ में https://m.jaankarirakho.com/424 https://m.jaankarirakho.com/424 मुगलकालीन सामाजिक जीवन, शिक्षा, साहित्य एवं कला के सन्दर्भ में

> मुगलकालीन समाज
मुगलकालीन समाज को स्पष्ट रूप से दो भागों में बाँटा जा सकता है – 
(i) हिन्दू और (ii) मुसलमान.
देश में हिन्दू जनता बहुसंख्यक थी, परन्तु मुसलमानों की संख्या भी कम नहीं थी. मुसलमान स्पष्ट रूप से दो भागों में बँटे थे—
(i) जन्मजात मुसलमान व (ii) वंशगत मुसलमान.
इन मुसलमानों में विदेशी जैसे- तुर्क, अफगान, मंगोल तथा उज्बेक आदि भी शामिल थे. विदेशी मुसलमान रक्त की शुद्धता पर बहुत अधिक बल देते थे और जातीय श्रेष्ठता का दावा करते थे. प्रशासन और समाज में इन लोगों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान था.
मुसलमानों का दूसरा महत्वपूर्ण वर्ग भारतीय मुसलमानों का था. यह ऐसे मुसलमान थे, जिन्होंने हिन्दू धर्म छोड़कर मुस्लिम धर्म को स्वीकार कर लिया था. इसमें से अधिकांश लोग पिछड़ी जाति के हिन्दू थे. इन्हें मुस्लिम समाज में भी उचित स्थान नहीं मिला था.
मुसलमानों में अनेक धार्मिक वर्ग भी थे; जैसे—शिया, सुन्नी, शेख, सैयदं और सूफी. इसी प्रकार हिन्दू समाज भी अनेक भागों व वर्णों, जातियों एवं उप-जातियों में बँटा हुआ था. ब्राह्मण और राजपूत समाज के अग्रणी वर्ण थे. हिन्दू समाज अभी भी अपने परम्परागत स्वरूप को बनाये हुए था. छुआछूत की भावना प्रत्येक जाति के नियम तथा संस्कारों का पालन बड़ी कड़ाई से होता था. इस काल में हिन्दू और मुसलमानों के अतिरिक्त सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन आदि भी बड़ी संख्या में थे. विदेशी जातियों में पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी आदि भी यहाँ आकर बस गये थे. प्रत्येक सामाजिक वर्ग अपने रीति-रिवाजों का पालन करने में स्वतन्त्र था. उन पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया था और मुगल सम्राटों ने सामान्यतः सभी वर्गों के प्रति उदार नीति का अनुसरण किया और सभी वर्गों के लोग कमोबेश आपस में प्रेमपूर्ण व्यवहार के साथ रहते थे.
> सामाजिक वर्गीकरण
मुगलकाल में समाज का विभाजन स्पष्ट रूप में तीन भागों में किया जा सकता है -
(1) शासक वर्ग, (2) मध्यम वर्ग, (3) निम्न वर्ग.
(1) शासक वर्ग – इस वर्ग में मुगल सम्राट, हिन्दू शासक, सूबेदार, बड़े-बड़े सामन्त, जागीरदार, धार्मिक नेता, प्रशासनिक अधिकारी आदि आते थे. ये सभी व्यक्ति चाहे हिन्दू हों या मुसलमान मुगल दरबार से जुड़े हुए थे. में केवल उच्च घराने वाले हिन्दुओं, मुसलमानों व राजपरिवार के सदस्यों को ही स्थान दिया जाता था. इन लोगों के पास अनेक सुविधाएँ एवं विशेषाधिकार प्राप्त थे. ये लोग शान-शौकत की जिन्दगी बसर करते थे. इस वर्ग के लोगों के पास अनेक महल, सुन्दर बाग-बगीचे, नौकर, दास-दासियाँ आदि होते थे. बहु-विवाह इनमें आम बात थी. इनके हरम में अनेक सुन्दरियाँ होती थीं. ये लोग नाच-गाना, जुआ, मद्यपान आदि के शौकीन थे. इनके अन्दर सामन्ती दुर्गुणों के होने के बावजूद भी इन लोगों ने बागवानी, शिल्प, वास्तुकला, शिक्षा, साहित्य एवं संगीत-कला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया.
(2) मध्यम वर्ग – मुगल समाज में मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व राजकर्मचारी, व्यापारी, व्यवसायी, भूमिपति, बुद्धिजीवी आदि करते थे. इन लोगों के पास भी काफी सुविधाएँ थीं और आर्थिक सम्पन्ता की स्थिति में इन लोगों का जीवन व्यतीत होता था. राजकीय कर्मचारियों को इतना वेतन मिलता था कि उनका जीवन सुख-चैन से बीत सके. जमींदारों की स्थिति भी काफी ठीक थी. भूमि पर एक प्रकार से इन्हीं का अधिकार था. यह लोग अपनी जमींदारी में छोटा किला या गढ़ी बनाकर रहते थे. उनकी सहायता के लिए इनके पास एक छोटी सेना भी होती थी. बड़े जमींदारों की स्थिति एक छोटे राजा के समान होती थी.
मुगलकाल में व्यापारियों का एक बड़ा वर्ग था. इनकी अनेक श्रेणियाँ थीं; जैसे- 'बोहरा' अथवा 'सेठ' 'वणिक' 'चेट्टी', 'सर्राफ', 'बंजारे' इत्यादि इनकी आर्थिक स्थिति अत्यन्त सुदृढ़ थी. इस कारण ये लोग शान-शौकत की जिन्दगी व्यतीत करते थे, किन्तु अनेक व्यापारियों को यह डर रहता था कि कोई उनका धन न छीन ले. इस कारण वह सामान्यजन की तरह अपना जीवन व्यतीत करते थे.
(3) निम्न वर्ग – इस वर्ग की मुगलकाल में अत्यन्त दयनीय स्थिति थी. इसमें किसान, छोटे व्यापारी, उद्यमी, सेवक, दस्तकार, गुलाम और सामान्य जनता आती थी. इन लोगों का आर्थिक एवं सामाजिक दोनों प्रकार से शोषण होता था. किसानों के पास अपनी स्वयं की भूमि नहीं होती थी. इन पर लगान का भार अत्यधिक होता था. अकाल एवं महामारी के समय इस वर्ग की सुध लेने वाला कोई नहीं होता था. किसानों की तरह ही दस्तकारों एवं श्रमिकों की स्थिति थी. अतः अनेक विद्वान् शहरों में जाकर सेना में कुली के रूप में भर्ती हो जाते थे अथवा अपना छोटा-मोटा कारोबार चलाते अथवा सम्पन्न घरानों में नौकर बन जाते थे. इस वर्ग के सदस्यों को कम पारिश्रमिक पर कार्य करना पड़ता था. इनके रहने के मकान, भोजन एवं वस्त्र अति साधारण किस्म के होते थे.
इस प्रकार उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मुगलकाल में समाज के विभिन्न वर्ग आर्थिक रूप से एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न थे, परन्तु उनमें वैमनस्य नहीं था. समाज के सभी वर्गों के लोग अपने निर्धारित नियमों का पालन करते हुए एक-दूसरे के प्रति सद्भावना रखते हुए प्रेम से जीवन व्यतीत करते थे और यही मुगलकालीन समाज की एक प्रमुख विशेषता भी है.
> मुगलकाल में स्त्रियों की दशा
मुगलकाल में भी स्त्रियों की स्थिति सल्तनतकाल के समान ही थी. उनकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया था तथा उनकी स्वतन्त्रता पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध लगे हुए थे. पर्दा- प्रथा के कारण हिन्दू और मुसलमान दोनों वर्गों की स्त्रियों की दशा बड़ी ही दयनीय थी. अकबर ने स्वयं यह आदेश निकाला था कि, “यदि कोई नवयुवती सड़कों या बाजारों में दौड़ती पाई गई और इस अवस्था में वह पर्दे में न हुई या उसने जान-बूझकर बटन खोल दिया, तो उसे वेश्याओं के डेरों की ओर जाना पड़ेगा और उन्हीं का रोजगार करना पड़ेगा."
अमीरों के घरों में बड़ी संख्या में हिजड़े भी रहते थे, जो जनाने एवं मर्दाने क्षेत्रों में बेरोक-टोक आ जा सकते थे मुसलमानों में बड़े घर की स्त्रियाँ तो घर के बाहर ही नहीं निकलती थीं और उन्हें यदि किसी कारणवश निकलना भी पड़ता, तो वे पालकी में बैठकर बाहर जाया करती थीं.
इस काल में लड़की का जन्म अशुभ माना जाता था, जिस स्त्री के सदैव लड़कियाँ होती थीं, सभी उसे घृणा की नजर से देखते थे और कभी-कभी उसे तलाक दे दिया जाता था.
इस युग में बड़े घरानों एवं मुसलमानों में बहुविवाह बड़ी आम बात थी. कुरान में एक मुसलमान को एक समय में चार स्त्रियाँ रखने की छूट दी गई है. शाही हरमों और राजाओं के रनिवासों में सैंकड़ों की संख्या में स्त्रियाँ रखी गई थीं. इससे इस क्षेत्र में भी व्यभिचार खूब था. अकबर ने यह नियम बनाने की शुरूआत की कि एक व्यक्ति को एक ही स्त्री रखनी चाहिए.
इस युग में स्त्रियों की हीन दशा के लिए बाल-विवाह भी उत्तरदायी था. प्रायः 8 से 10 वर्ष की उम्र में लड़कियों का विवाह हो जाता था. इस कारण उन्हें शिक्षा के लिए समय नहीं मिल पाता था. उच्च राजपूत कुलों में स्त्रियों को वर चुनाव में कुछ स्वतन्त्रता थी. कर्नल टॉड ने इस प्रकार के कुछ विवाहों का वर्णन किया है, जिसमें राजकुमारियों ने अपने पतियों का चुनाव किया था.
मुगलकाल में हिन्दू समाज में विधवा विवाह की इजाजत नहीं होती थी. स्त्रियाँ प्रायः अपने पति की चिता पर जलकर सती हो जाती थीं. मुसलमान स्त्रियाँ इस मामले में स्वतन्त्र थीं. उनमें खूब विधवा विवाह होते थे. मुस्लिम स्त्रियों की आर्थिक स्थिति हिन्दू स्त्री से अधिक अच्छी थी. उन्हें अपने पति की सम्पत्ति पर कुछ अधिकार होता था.
मुगलकाल में उच्च घराने की स्त्रियाँ शिक्षा, साहित्य, नृत्य, संगीत आदि में पर्याप्त निपुण होती थीं. गुलबदन बेगम ने ‘हुमायूँनामा’ और जहाँआरा ने 'शिष्याह' और 'मुनसिल अबी' की रचना की. इस काल में कुछ स्त्रियाँ कुशल प्रशासक भी थीं; जैसे कि नूरजहाँ, अकबर की धाय माँ महाम अनगा, रानी दुर्गावती, ताराबाई आदि. मीरा, रामभद्रा बाई, मधुरवाणी जैसी महिलाएँ उच्चकोटि की कवयित्रियाँ थीं.
हिन्दू महिलाओं का चरित्र, मुस्लिम महिला के चरित्र से अच्छा था. विदेशी यात्रियों ने उनके चरित्र की भूरि-भूरिं प्रशंसा की है.
> मुगलकाल में शिक्षा
सल्तनतकाल की अपेक्षा मुगलकाल में भी शिक्षा का अत्यधिक विकास हुआ. बाबर स्वयं एक बड़ा विद्वान् एवं कवि था. उसके समय में 'सुहरतेआम' नामक एक विभाग शिक्षा संस्थाओं की उन्नति की व्यवस्था करता था. वह विद्वानों को अपने दरबार में आश्रय देता था. उसके दरबार के प्रसिद्ध विद्वानों में शेख ख्वाफी एवं बन्दामीर था.
हुमायूँ का अधिकांश समय युद्धों में व्यतीत होने के कारण वह सार्वजनिक शिक्षा पर ध्यान नहीं दे सका, लेकिन वह अपने व्यक्तिगत जीवन में पुस्तकों का बड़ा प्रेमी था. उसके पास स्वयं का पुस्तकालय था. उसे ज्योतिष एवं भूगोल का बड़ा ज्ञान था.
अकबर स्वयं पढ़ा-लिखा न होने के बावजूद भी उसे शिक्षा से गहरा लगाव था. उसने एक अनुवाद विभाग की स्थापना की. अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का अन्य भाषाओं में अनुवाद करवाया. उसकी धाय माँ माहम अनगा ने आगरा में एक स्कूल की स्थापना की थी. अकबर ने स्वयं फतेहपुर सीकरी में अनेक मदरसों की स्थापना की उसने एक चित्रकला का भी विद्यालय खोला जहाँ सभी वर्गों के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे. अकबर ने अपने विद्यालयों में गणित, ज्यामिति, मेन्सुरेशन, ज्योतिष, एकाउण्टेन्सी, लोक-प्रशासन और कृषि को पढ़ाने की व्यवस्था करवाई.
जहाँगीर धनी व्यक्तियों की मृत्यु की सम्पत्ति, मठों तथा दान की सम्पत्ति शिक्षा पर लगाता था. शाहजहाँ ने भी दिल्ली में एक विशाल मकबरे की स्थापना की. उसने 'दारुलसका ' नामक उजड़े हुए मदरसे का जीर्णोद्धार करवाया शाहजहाँ का पुत्र दाराशिकोह अरबी, फारसी और संस्कृत का एक बड़ा विद्वान् था. उसने स्वयं गीता, योगवशिष्ठ, रामायण तथा उपनिषदों का अनुवाद फारसी में किया.
> मुगलकाल में शिक्षा के मुख्य रूप से दो स्तर थे - 
(1) प्रारम्भिक शिक्षा, एवं (2) उच्च शिक्षा.
(1) प्रारम्भिक शिक्षा— मुगलकाल में जनता स्वयं अपने बच्चों की शिक्षा का ध्यान रखती थी तथा इनके लिए नीति शिक्षण संस्थाएँ थीं. प्रत्येक ग्राम में मस्जिद एवं मन्दिर में शिक्षा की व्यवस्था थी. हिन्दू लोग अपने बच्चों की शिक्षा का प्रारम्भ 5 वर्ष में तथा मुसलमान लोग अपने बच्चों की शिक्षा उनके 4 वर्ष 4 माह और 4 दिन के हो जाने के बाद प्रारम्भ करते थे. मुसलमान लोग अपने बालकों की शिक्षा के प्रति अधिक ध्यान नहीं देते थे. हालांकि प्रत्येक मस्जिद में एक मकतब होता था. इस काल में तख्ती पर लिखा जाता था. मुसलमानों के बच्चे कुरान की आयतें पढ़ते थे, जबकि हिन्दू बच्चे रामायण, महाभारत तथा प्रारम्भिक गणित पढ़ते थे. पहाड़े रटा करते थे. सुलेख लिखते थे. कक्षाएँ सुबह और शाम को लगती थीं. बीच में मध्याह्न अवकाश होता था. इस काल में बच्चों से फीस नहीं ली जाती थी तथा विद्यादान महादान समझा जाता था. धनी व्यक्ति शिक्षा के लिए धन की सहायता देते थे.
अकबर के समय प्राथमिक शिक्षा का संगठन किया गया. इस समय पाठ्य-पुस्तकों का निश्चित प्रबन्ध किया गया. उसके आदेशानुसार प्रत्येक बालक पहले वर्णमाला पढ़ें. उसका उच्चारण और आकार सीखें, पुनः संयुक्त अक्षर लिखें. एक हफ्ते के अभ्यास के बाद वह कुछ गद्य और पद्य सीखें. पुनः ईश्वर की प्रशंसा में कुछ पंक्तियाँ याद करें. कुछ नैतिक वाक्य याद करें. बालक को चाहिए कि वह स्वतन्त्र रूप से प्रयास करे तथा अध्यापक उसकी केवल सहायता करे.
इसके बाद बालक को अक्षर ज्ञान, शब्दार्थ, पद्य रचना, कविता, गणित, इतिहास, कृषि, ज्यामितीय, शरीर-विज्ञान, गृह-विज्ञान आदि विषयों की शिक्षा दी जाती थी.
(2) उच्च शिक्षा – मुगलकाल में उच्च शिक्षा पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाता था. काशी और नदिया उच्च शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे. इस काल में संस्कृत, व्याकरण, साहित्य, दर्शन, धर्मशास्त्र इत्यादि विषयों की शिक्षा दी जाती थी. शिक्षा के अन्य केन्द्रों में आगरा, दिल्ली, जौनपुर, फतेहपुर सीकरी, लाहौर, स्यालकोट आदि थे. इनके अतिरिक्त मिथिला, तिरहुत, प्रयाग, हरिद्वार, अयोध्या आदि थे.
विद्यार्थियों को उनकी योग्यता के अनुसार शिक्षा दी जाती थी. 'लॉ' ने लिखा है, जो विद्यार्थी 'मोजान’ पढ़ते थे उन्हें एक आना रोज, जो 'मुंशाब' पढ़ते थे उन्हें दो आना रोज और जो 'शरहेवाकया' पढ़ते थे उन्हें आठ आना रोज मिलता था. प्रान्तीय दीवानों को आदेश था कि वे छात्रों को वजीफा दें.
मुगलकाल में आज की तरह परीक्षा पद्धति नहीं थी और न ही किसी प्रकार के प्रमाण पत्र दिये जाते थे. डॉ. यूसुफ हुसैन ने लिखा है—
विद्यार्थी निम्न कक्षा से उच्च कक्षा में केवल अध्यापक की इच्छा से ही जाते थे और अध्यापक उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व की परख करते थे. 'फाजिल' की डिग्री उन विद्यार्थियों को दी जाती थी, जो दर्शन और तर्क विद्या में पारंगत हो जाते थे. जो लोग Theology में विद्वान् थे, उन्हें 'आलिम' की डिग्री दी जाती थी और साहित्य में पारंगत विद्यार्थियों को 'काबिल' कहा जाता था.
> मुगलकाल में साहित्य
मुगलकाल में फारसी, हिन्दी, तुर्की, पंजाबी आदि सभी भाषाओं में साहित्य लिखा गया. मुगल सम्राटों ने सभी प्रकार के विद्वानों को अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया. समय के विद्वानों ने ऐतिहासिक ग्रन्थों, अनुवाद एवं सुन्दर काव्य की अनेक रचनाएँ रचीं. इस
(1) फारसी साहित्य का विकास – मुगलकाल में फारसी साहित्य का सर्वाधिक विकास हुआ. मुगल सम्राट बाबर स्वयं तुर्की एवं फारसी का प्रकाण्ड विद्वान् था, उसने अपनी आत्मकथा 'तजुक-ए-बाबरी' तुर्की भाषा में लिखी जो इस भाषा का उच्चकोटि का साहित्यिक ग्रन्थ माना जाता था. उसने तुर्की भाषा में कविता की नई शैली 'मुबाइयाँ' लिखीं.
मुगल सम्राट हुमायूँ भी साहित्य और विद्या का बड़ा प्रेमी था, लेकिन उसके समय की परिस्थितियों ने उसे साहित्य सृजन के लिए समय ही नहीं दिया. उसके पुत्र अकबर के समय में फारसी भाषा में अनेक ग्रन्थों की रचना के साथसाथ अनेक दूसरी भाषाओं के महत्वपूर्ण ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद किया गया.
अकबर के समय में लिखे ग्रन्थों में मुल्ला दाऊद ने ‘तारीख-ए-अल्फी', अबुल फजल ने 'अकबर-नामा', व ‘आइन-ए-अकबरी’, निजामुद्दीन अहमद ने 'तबकात-एअकबरी’ फैजी का ‘अकबरनामा', अब्दुल बकी का 'असीर ए-रहीमी' और बदायूँनी का 'मुन्तखब- उत्-तवारीख' विशेष प्रसिद्ध है.
इस काल में अब्दुल कादिर बदायूँनी ने रामायण का, फैजी ने लीलावती का, सरहिन्द ने अथर्ववेद का अनुवाद फारसी में किया. इस समय कई विद्वानों ने मिलकर महाभारत का अनुवाद 'रज्जनामा' के नाम से किया. अब्दुर्रहीम खानखाना ने तजुके बाबरी का अनुवाद तुर्की से फारसी में बाबरनामा के नाम से किया. इस प्रकार के अनुवाद के पीछे अकबर का मुख्य उद्देश्य यह था कि देश के विद्वानों को सर्वमान्य साहित्य उपलब्ध हो सके.
जहाँगीर के समय में भी फारसी साहित्य की उन्नति जारी रही और उसने स्वयं अपनी आत्मकथा 'तजुकेजहाँगीरी’ लिखी, जो भावों की स्वच्छता, गति और स्पष्टता के लिए प्रसिद्ध है. इसके समय के अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘इकबालनामा-ए-जहाँगीरी', 'मअस्सिरे जहाँगीरी’, ‘जब्बदुत तवारीख' आदि हैं, इसके समय में अनुवाद का कार्य लगभग बन्द-सा हो गया.
शाहजहाँ के समय में फारसी भाषा में उच्चकोटि के ग्रन्थ लिखे गये, जिनमें अब्दुल हमीद लाहौरी ने ‘पादशाहनामा’, अमीन काजवीनी ने दूसरा 'पादशाहनामा' और इनायत खाँ ने 'शाहजहाँनामा' लिखे. शाहजहाँ के पुत्र दारा ने ‘उपनिषदों, गीता एवं योगवशिष्ठ' का फारसी भाषा में अनुवाद करवाया.
औरंगजेब ने साहित्यकारों को संरक्षण प्रदान नहीं किया. इसके बावजूद भी उसके समय में मिर्जा मुहम्मद काजिम ने ‘आलमगीरनामा’, मुहम्मद खाफी ने 'मअस्सिरे आलमगीरी', भीमसेन ने ‘नुश्का-ए-दिलकुशा', ईश्वरदास नागर ने 'फतुहाते आलमगीरी' तथा सुजानराय ने 'खुलासा- उत- तवारीख' नामक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की. खाफी खाँ हासिम खाँ ने 'मुन्तखब-उल-लुबाब' नामक ऐतिहासिक ग्रन्थ की गुप्त रूप से रचना की. औरंगजेब के समय में मुस्लिम कानून की पुस्तक 'फतवा-ए-आलमगीरी' नामक ग्रन्थ की रचना उसकी देख-रेख में की गई.
मुगलकाल में स्त्रियों ने भी अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की, जिसमें हुमायूँ की बहन गुनबदन बेगम ने ‘हुमायूँनामा’ लिखा व औरंगजेब की पुत्री जेबुन्निशा ने 'दीवान-ए-मखफी' लिखा.
औरंगजेब के बाद मुहम्मदशाह (1719-48) के समय तक फारसी भाषा को संरक्षण मिलता रहा, लेकिन बाद में उर्दू को संरक्षण दिया जाने लगा.
(2) हिन्दी साहित्य – हिन्दी साहित्य का विकास मुगलकाल में मुख्य रूप से अकबर के समय से ही प्रारम्भ हुआ. अकबर से पूर्व मलिक मुहम्मद जायसी ने 'पद्मावत' और 'मृगावत' की रचना की. अकबर के समय में सूर, तुलसी, रसखान, अब्दुर्रहीम आदि ने उच्चकोटि के हिन्दी साहित्य की रचना की. इस समय में लिखे गये ग्रन्थों में रामचरितमानस, सूरसागर, रहीम सतसई, प्रेमवाटिका आदि विशेष उल्लेखनीय हैं. बीरबल, भगवानदास, नरहरि, हरिदास आदि ने भी अनेक सुन्दर रचनाएँ लिखीं.
जहाँगीर व शाहजहाँ के समय में भी हिन्दी साहित्य का खूब विकास हुआ. इस समय में सुन्दर कविराज ने 'सुन्दर शृंगार' और सेनापति ने 'कवित्त रत्नाकर' नामक सुन्दर हिन्दी काव्य ग्रन्थों की रचना की. शिरोमणि मिश्र, बनारसीदास, भूषण, देव, मतिराम आदि प्रसिद्ध कवियों ने भी हिन्दी साहित्य को अपनी रचनाओं द्वारा समृद्ध किया.
औरंगजेब ने हिन्दी साहित्य को तनिक भी संरक्षण प्रदान नहीं किया. अतः हिन्दी कवि मुगल दरबार को छोड़कर इधरउधर हिन्दू राजाओं की शरण में चले गये. 
(3) उर्दू साहित्य – मुगलकाल में फारसी और हिन्दी के मेल से उर्दू का विकास हुआ. अमीर खुसरो इस भाषा का प्रथम कवि था, लेकिन इस भाषा को शाही संरक्षण 18वीं सदी के प्रारम्भ तक नहीं मिला, लेकिन मुगल बादशाह मुहम्मदशाह (1719–48) ने इस भाषा को अपना संरक्षण प्रदान किया. इस हेतु उसने दक्षिण के कवि 'वली' को उत्तर भारत में बुलाया. इसके बाद से उर्दू की लोकप्रियता में निरन्तर वृद्धि हुई और वह मुस्लिम विद्वानों और मुस्लिम कवियों की भाषा बन गई.
(4) संस्कृत, पंजाबी व अन्य क्षेत्रीय साहित्य का विकास – मुगलकाल में अकबर ऐसा प्रथम सुल्तान था, जिसने संस्कृत भाषा को राजकीय संरक्षण प्रदान किया. इस समय में संस्कृत-फारसी कोष 'फारसी प्रकाश' की रचना की गई. जहाँगीर ने अकबर की परम्परा को आगे बढ़ाया तथा शाहजहाँ के समय जगन्नाथ पण्डित ने 'रसगंगाधर' और 'गंगालहरी' नामक उत्तम संस्कृत काव्य-ग्रन्थों की रचना की. इसके समय में ज्योतिष एवं खगोल विद्या पर भी अनेक ग्रन्थ लिखे गये.
औरंगजेब और उसके उत्तराधिकारियों के समय में संस्कृत भाषा के विद्वानों के लिए मुगल दरबार में कोई स्थान नहीं रहा.
हिन्दी व संस्कृत के अतिरिक्त पंजाबी एवं अन्य देशी भाषाओं का विकास भी इस काल में हुआ. गुरु अर्जुनदेव ने 'आदिग्रन्थ' का संग्रह मुगल सम्राट जहाँगीर के समय में किया. भाई गुरुदास ने कुछ उच्चकोटि के पंजाबी लेख लिखे. मुस्लिम कवियों और सूफी सन्तों द्वारा भी पंजाबी में साहित्य लिखकर इस भाषा को समृद्ध बनाने का प्रयास किया गया.
इस काल में चारण एवं अन्य कवियों ने राजस्थानी भाषा में उच्चकोटि के साहित्य की रचना की. इनके द्वारा अनेक वीरगाथाएँ लिखी गईं, जिनमें 'खुमाण रासो', 'हम्मीर रासो’, राणा रासो’, ‘मुहणोत नैणसी री ख्यात' व 'बीसलदेव रासो', आदि प्रसिद्ध हैं.
इस काल में बंगला साहित्य व वैष्णव सम्प्रदाय के धार्मिक साहित्य का भी विकास हुआ. महाभारत एवं रामायण का बंगला भाषा में अनुवाद मुगलकाल में ही हुआ.
> मुगलकाल : संगीत
मुगलकाल में औरंगजेब को छोड़कर सभी बादशाहों ने संगीत एवं नृत्य को अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया. बाबर स्वयं संगीत का संरक्षक और जानकार था. उसने अनेक गीतों की रचना की. इसी प्रकार उसका पुत्र हुमायूँ भी संगीत में अत्यधिक रुचि लेता था. उसके समय में उसके दरबार में बच्चू नामक संगीतकार रहता था.
अकबर संगीत कला का प्रसिद्ध संरक्षक था. उसके दरबार में ईरानी, कश्मीरी व हिन्दू सभी धर्मों के संगीतज्ञ रहते थे. उसके दरबार के प्रसिद्ध गायक तानसेन एवं बैजू बाबरा थे. तानसेन के विषय में अबुल फजल ने लिखा है कि उसके जैसा गायक हजार वर्षों से नहीं हुआ.
अकबर के काल में एक अन्य प्रसिद्ध गायक बाज बहादुर था तथा वह अपनी संगीत कला का अकेला उदाहरण था. उसके दरबार में 36 उच्चकोटि के संगीतज्ञ थे. उसके संगीतज्ञ टोलियों में बँटे हुए थे और अलग-अलग टोली प्रतिदिन अपना गाना सुनाकर बादशाह को प्रसन्न करने का काम करते थे. अकबर स्वयं संगीत का जानकार था और नक्कारा बजाने में अत्यधिक प्रवीण था. उसके समय में संगीत के संस्कृत ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद किया गया और नवीन रागों का सृजन किया गया.
अकबर की देखा-देखी उसके दरबारी संगीतज्ञों को संरक्षण प्रदान करते थे, इनमें अबुल फलज, रहीम, मानसिंह, भगवानदास आदि प्रमुख थे. बैरम खाँ ने रामदास और हरिदास को संरक्षण प्रदान किया.
जहाँगीर भी संगीत में रुचि लेता था. उसके शासनकाल के प्रसिद्ध संगीतज्ञों में मीरदाद, खुर्रम दाद मखान और छतर खाँ सुविख्यात संगीतज्ञ थे.
शाहजहाँ भी संगीत का महान् संरक्षक था. उसके दरबार में रामदास, महापात्र, लाल खाँ, गुण समुद्र और जगन्नाथ जैसे सुविख्यात गायक रहते थे. इसके दरबार में सुखदेव सितार वादक और सूरसेन प्रसिद्ध बीन वादक थे. शाहजहाँ नित्य स्त्रियों से भी गाना सुनता था. उसने स्वयं कुछ हिन्दी गीतों की रचना की. शाहजहाँ की मृत्यु के बाद संगीत कला का विकास रुक गया. औरंगजेब स्वयं संगीत का जानकार होते हुए भी वह संगीत से घृणा करता था और उसने संगीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया.
औरंगजेब के बाद मुहम्मदशाह रंगीला ने संगीत को प्रोत्साहित किया और इसने संगीत को नया जीवनदान दिया. उसके समय में अदारंग और सदारंग प्रसिद्ध खयाल गायक थे. शौरी मियाँ ने टप्पा गायन का प्रचार किया और इस समय हिन्दू और ईरानी शैलियों और ध्वनियों का निर्माण हुआ. इसी समय में संगीत का प्रसिद्ध ग्रन्थ 'रागत्व नवबोध' श्रीनिवास ने लिखा. धीरे-धीरे मध्यम शिक्षित वर्ग में संगीत की लोकप्रियता कम हो गई और इसे भोगविलास की वस्तु समझा जाने लगा.
> मुगल चित्रकला : सामग्री व तकनीकी : टिप्पणी
निर्मित होती थी. इस काल में अनेकों प्रकार के कागज मुगल कला के चित्रों की अधिकांश सामग्री हाथ से जैसे— रेशमी, दौलताबादी, कार्डी, हिन्दी, स्यालकोटी और मुगली आदि प्रचलित थे. 'मुगली' कागज इस काल में सर्वश्रेष्ठ समझा जाता था. इनके अतिरिक्त 'ईरानी' और 'इस्पहानी' नामक दो विदेशी कागज भी खूब प्रसिद्ध थे. कागज बनाने के लिए बाँस, जूट, कपास और सन का प्रयोग किया जाता था. कागजों का रंग बिलकुल सफेद न होकर कुछ मटमैला-सा होता था.
इस काल में कूँची या ब्रुश, बकरी, गिलहरी तथा ऊँट इत्यादि पशुओं के बालों के बनाये जाते थे. रंग चित्रकार स्वयं अपनी विधियों से तैयार करते थे. रंग फूल, पत्तियों और खनिज पदार्थों से बनते थे. पीला रंग मुल्तानी मिट्टी या ढाक के फूलों से बनता था. काला रंग सरसों के तेल में कपूर की बत्ती को जलाकर बनाया जाता था. बैंगनी रंग हरभुजी और काले रंग को मिलाकर बनाया जाता था. इस काल के मुगल चित्रों में 14 रंगों का प्रयोग किया गया है.
दो या दो से अधिक कागजों को चिपकाकर मोटा कर लिया जाता था तथा उसका धरातल घोंटकर चिकना बना लिया जाता था और इस पर चित्र बनाने के लिए सीमा रेखा गेरू से और अन्तिम काले रंग से बनाई जाती थी. चित्रांकन ट्रेसिंग द्वारा होता था. इस काल में तैल चित्रों का भी प्रचलन था, लेकिन वह कम पसन्द किये जाते थे.
> हुमायूँ के समय चित्रकला
बाबर का पुत्र हुमायूँ भी चित्रकला का प्रेमी था और उसे इस कला का ज्ञान अपने पूर्वजों से हुआ था.
हुमायूँ जब फारस में था तब उसे शिराज के निवासी, शीरी कलम अब्बदुस्समद, जोकि प्रख्यात चित्रकार था, से परिचय हुआ और जब हुमायूँ ने काबुल पर 1546–47 ई. में अधिकार कर लिया तब अब्बदुस्समद और उसका पुत्र मीर सैयद अली हुमायूँ के संरक्षण में आ गये.
हुमायूँ का चित्रकला के प्रति प्रेम उसका युद्ध के समय भी सचित्र पुस्तकों को अपने साथ रखने से भी पता चलता है, लेकिन उसके समय तक मुगल दरबार की अपनी कोई अलग चित्रकला शैली नहीं थी. उसके समय में हुमायूँ द्वारा ‘दास्ताने-अमीरे-हम्जा' को चित्रित करने का कार्य चित्रकारों को सौंपा गया था.
अब्बदुस्समद और मीर सैयद अली के हुमायूँ के साथ भारत आने पर इन चित्रकारों का सम्पर्क भारतीय चित्रकारों से होने पर एक नई शैली ने जन्म लिया जो मुगल शैली के नाम से प्रसिद्ध हुई.
> अकबर के काल में चित्रकला का विकास
मुगल सम्राट अकबर के काल में चित्रकला की अभूतपूर्व उन्नति हुई. उसके शासक बनने के कुछ ही समय बाद चित्रकला के प्रेम से प्रेरित होकर चित्र बनवाने प्रारम्भ कर दिये और यह क्रम उसके पूरे जीवन-भर चालू रहा. उसके समय में भारतीय और ईरानी चित्रकार एक-दूसरे के सम्पर्क में आने लगे, जिससे दोनों शैलियाँ मिलकर आपस में एक हो गईं और इसका विदेशीपन समाप्त हो गया और अब यह कला पूर्णतया भारतीय हो गई. अकबर के समय में अब्दुस्समद, मीर सैयद अली, दसवंत, बसावन, जमशेद, फर्रूख बेग, कैशो, लाल, मुकन्द, माधो, खेमकरन, जगन एवं महेश आदि प्रख्यात चित्रकार थे. इस प्रकार अकबर के समय में हिन्दू और मुसलमान दोनों ही सम्प्रदायों के चित्रकार थे. हिन्दू चित्रकारों के विषय में अबुल फजल लिखता है कि, “हिन्दू चित्रकारों के चित्र हम लोगों की भावनाओं से कहीं ऊँचे होते हैं और सारे संसार में ऐसे बहुत कम चित्रकार हैं, जो उनके समकक्ष हों.' 
अकबर के समय में चित्रकला को प्रोत्साहन देने के कारण अनेक उत्कृष्ट कृतियों को तैयार किया गया. फारसी की गद्य एवं पद्य रचनाओं को चित्रित किया गया और इससे चित्रों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गई. अतः अकबर के समय के चित्रों को हम चार निम्नलिखित भागों में विभक्त कर सकते हैं –
(i) फारसी कथाओं के चित्र.
(ii) भारतीय कथाओं के चित्र.
(iii) ऐतिहासिक चित्र.
(iv) व्यक्ति चित्र.
उपर्युक्त चारों प्रकार के चित्रों में व्यापक स्तर पर समानता है. अकबर के समय में निम्नलिखित ग्रन्थ प्रमुखता से चित्रित किये गये -
(1) दास्तान-ए-अमीर-हम्जा—यह ग्रन्थ हुमायूँ के समय चित्रित होना प्रारम्भ हुआ था, जोकि अकबर के समय में पूर्ण हुआ. इसमें कुल 1400 चित्रों को बनाया गया था, जिसमें से अब हमें केवल 100 चित्र ही प्राप्त होते हैं.
(2) तारीखे - खानदाने-तैमूरिया - इसमें तैमूरिया वंश के आरम्भ से अकबर के शासनकाल के 22वें वर्ष तक का इतिहास है. इसको दसवंत ने तैयार किया था.
(3) रज्मनामा ( महाभारत ).
(4) रामायण.
(5) बाकयात-ए-बाबरी.
(6) अकबरनामा 
(7) अनवार-ए-सुहैली.
इन प्रमुख ग्रन्थों के अतिरिक्त इस काल में पंचतन्त्र, तारीख - ए - रशीदी, दरबनामा, खमसा निजामी, बहिरस्तान जामी आदि को चित्रित करवाया गया.
> अकबर शैली की विशेषताएँ
अकबर के शासनकाल में मुगल शैली ईरानी, कश्मीरी, राजस्थानी आदि की विशेषताओं को मिलाकर बड़े ही सुन्दर रूप में प्रकट होती है. इस शैली में कुछ ईरानीपन होने के बावजूद भी यह पूर्णतः भारतीय बन गई है. इस शैली में चुहचुहाते व चमकते रंग, बुते हुए रंग एवं सफेद रंग का अधिकतर प्रयोग किया गया है. इसमें एक चश्म चेहरों को प्रधानता से बनाया गया है.
अकबर ने चित्रकारों को प्रोत्साहन देने हेतु एक अलग से स्कूल भी खोला, जिसका प्रधान अब्दुस्समद को बनाया गया. उसे 'शीरी कलम' (मधुर लेखनी) की उपाधि भी प्रदान की गई. बादशाह स्वयं इस विभाग का निरीक्षण करता था और प्रोत्साहन देता था. वास्तव में उसका यह प्रयास 'सुलहकुल' के सिद्धान्त के अनुरूप था, तभी तो इसमें सभी वर्गों के विद्यार्थी सीखने आते थे.
> 'जहाँगीर के समय में मुगल चित्रकला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई थी " : विवेचना
जहाँगीर का शासनकाल मुगल चित्रकला के स्वर्णकाल के रूप में जाना जाता है. उसके समय में चित्रकला की विशेष उन्नति हुई.
जहाँगीर को बचपन से ही चित्रकला के प्रति प्रेम था. उसकी कुमारावस्था में 'अकारिजा' नामक एक ईरानी चित्रकार था और उसी का पुत्र अबुल हसन जहाँगीर का प्रिय चित्रकार था. जहाँगीर के द्वारा अपनी आत्मकथा में भी सर्वत्र चित्रों की प्रशंसा की गई है. उसकी आत्मकथा के जिल्द पर अबुल हसन द्वारा उसके राज्याभिषेक का चित्र बहुत ही मोहक बना है. इस उपलक्ष्य में जहाँगीर ने अबुल हसन को 'नादिर उज-जमन' की उपाधि प्रदान की.
जहाँगीर के समय बिशनदास नामक प्रख्यात चित्रकार उसके दरबार में रहता था. उसके विषय में जहाँगीर ने लिखा है कि, “शबीह लगाने में उसका कोई सानी नहीं रखता. जहाँगीर ने विशनदास को फारस के शाह के चित्र को बनाने के लिए उसे फारस भेजा.
जहाँगीर के समय बने एक प्रसिद्ध चित्र में एक साधु अपनी कुटी के आगे धुन में मस्त है, जनता उनके सामने दर्शन के लिए एकत्र है. उनके ऊपर नीम का एक हरा-भरा पेड़ है तथा छतों पर कौआ का एक जोड़ा बैठा है. यह चित्र बड़ा ही सजीव है तथा वर्तमान में बोस्तम संग्रहालय में है.
जहाँगीर के समय में स्त्रियाँ भी चित्र बनाती थीं. भारत कला भवन में जहाँगीर के समय का एक ऐसा चित्र है, जिसमें एक महिला चित्रकार शबीह लगा रही है.
जहाँगीर के समय में आगारजा, मुहम्मद नादिर, मुहम्मद मुराद, मनोहर, माधव, तुलसी, गोवर्धन आदि प्रसिद्ध चित्रकार थे.
> जहाँगीर शैली की विशेषताएँ
जहाँगीर के समय में मुगल शैली ने एक नवीन रूप धारण किया और उसमें नवीनता आ गई. बारीकी और तैयारी में वह अकबर के समय से आगे निकल गई. इस काल में शिकार के दृश्यों का चित्रांकन भव्य रूप से किया गया है. इस काल में बने चित्रों में पशु-पक्षियों के चित्रों में कमाल का स्वभाव दिखाया गया है.
जहाँगीर को फूल-पत्ती के चित्र बनवाने में विशेष रुचि रही. प्रकृति के विभिन्न रूपों का इतना सफल और स्वाभाविक चित्रण इस शैली के अतिरिक्त अन्य कहीं नहीं मिलता है. रेखांकन और रंग समायोजन की दृष्टि से उस्ताद मंसूर द्वारा बनाए गए चित्र अपूर्व हैं.
हाशियों के निर्माण का अधिक विकसित रूप जहाँगीर के समय में देखने को मिलता है. हाशियों में फलों, लताओं, बेलों और पौधों आदि का अलंकारिक प्रयोग किया गया है. उनके बीच-बीच में कहीं-कहीं तितलियाँ, चिड़ियाँ और अन्य प्रकार के पशु-पक्षी डाल दिए गए हैं. इन हाशियों की विशेषता यह है कि ये चित्रों से मेल खाते हुए बनाये गए हैं तथा प्रायः इनमें सोने की राख का छिड़काव किया गया है. इन चित्रों में घनत्व एवं उभार का समावेश बड़ी मात्रा में किया गया है. प्रकाश तथा छाया का प्रभाव भी इनमें देखा जा सकता है. इन सभी कारणों की वजह से जहाँगीरकालीन चित्रकला को मुगल चित्रकला का चरम रूप कहा जाता है. उसने स्वयं अपनी आत्मकथा में अपने चित्रकला के प्रेम को प्रकट करते हुए लिखा है कि, “यदि एक चित्र को कई चेहरों और प्रत्येक चेहरा अलग-अलग चित्रकार का बनाया हुआ हो, तो मैं यह जान सकता हूँ कि, कौनसा चेहरा किसने बनाया है और यदि चेहरे में आँखें किसी ने एवं भौहें किसी और की बनाई हुई हों, तो भी मैं पहचान लूँगा कि बनाने वाले कौन हैं."
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, जहाँगीर स्वयं चित्रकला का एक बड़ा पारखी व्यक्ति था और उसके दरबार में अनेकों प्रख्यात चित्रकारों को संरक्षण मिला जिन्होंने अपने समय की परम्परा के अनुसार, उत्कृष्ट कोटि के चित्र बनाए.
> शाहजहाँ के समय की चित्रकला
शाहजहाँ अकबर एवं जहाँगीर की तरह चित्रकला का प्रेमी नहीं था, फिर भी उसके समय में चित्रकला को दरबारी संरक्षण मिलता रहा.
जहाँगीर के समय के मनोहर और बिशनदास के अतिरिक्त अनूप, चतुरमणि, होनहार, बालचन्द, विचित्र, मीर हासिम आदि उल्लेखनीय चित्रकार थे. शाहजहाँ का पुत्र दारा भी चित्रकला का बड़ा संरक्षक था.
शाहजहाँ के समय 'बादशाहनामा' को चित्रित करवाया गया. इसके कई सौ चित्रों में से अब केवल एक चित्र ही प्राप्य है, जिसमें शाहजहाँ डल झील को पार कर रहा है. इसमें झील का चित्रांकन बड़ा ही मनोहारी बन पड़ा है.
इस काल में अनेक यवन सुन्दरियों के चित्र भी मिलते हैं. रंगमहल और विलासिता के चित्र भी मिलते हैं. नायिकाभेद के चित्रों के प्रमुख चित्रकार बिहारी और केशव थे.
दरबारी जीवन के चित्रों में भी अनेक उल्लेखनीय चित्र हैं. एक चित्र में कांधार के सूबेदार अली मर्दान के आगमन का दृश्य है. चित्र की अग्रभूमि में शाही घोड़ों की पंक्तियाँ खड़ी हैं. मध्य में सूबेदार, जिनके पीछे अनेक अमीर और सहायक खड़े हैं, मुगल ढंग का 'मुजरा' अदा कर रहे हैं. सबसे ऊपर शाही नौबतखाने का दृश्य है, इसमें 30 व्यक्ति भाग ले रहे हैं.
जहाँगीर के काल के दरबारी अदब-कायदे का प्रयोग शाहजहाँ के काल में और भी बढ़ गया था, इससे चित्रों में कृत्रिमता और जड़ता आ गई है, यद्यपि इस काल में हस्तमुद्राओं का यथार्थ अंकन हुआ पर उनमें जीवन का अभाव है. चित्रों में ऐसा कुछ नहीं जिससे कि वे बोल उठें.
शाहजहाँ के समय में हाशिये की चित्रण कला में भी उन्नति होती रही और ये हाशिये मूल चित्र में इतने उभरकर आए हैं कि, इनसे चित्र की कलाहीनता और भी स्पष्ट हो जाती है. रंग-संयोजन अधिक अच्छा नहीं है, अक्सर चटकीले रंगों का प्रयोग अधिक किया गया है.
> औरंगजेब के समय की चित्रकला
औरंगजेब को चित्रकला से घृणा थी. अतः उसने चित्रकारों को कोई प्रश्रय नहीं दिया फिर भी उसके समय में कुछ चित्र बने जिसमें ‘शाहजहाँ का जनाजा' और ग्वालियर के किले में बन्द उसके कुटुम्बियों के चित्र सर्वात्रिक प्रसिद्ध हैं, औरंगजेब के स्वयं के भी चित्र बड़ी संख्या में उसके समय में बने, फिर भी कहा जा सकता है कि उसके शासनकाल में चित्रकला पर प्रतिबन्ध होने से उसका पतन हो गया.
> मुगल और राजपूत चित्रकला की शैली में अन्तर
मुगल युग में चित्रकला, यद्यपि मूलतः ईरानी थी, वस्तुतः ईरानी तथा हिन्दू विचारों का संयुक्त परिणाम थी तथा मुगल और राजपूत दो विचारधाराओं के रूप में विकसित हुई. राजपूत तथा मुगल शैली में निम्नलिखित मुख्य अन्तर हैं—
1. मुगल चित्रकला वस्तुतः दरबारी चित्रकला है, जबकि राजपूत कला में सामान्यजन का चित्रण किया गया है. इस शैली में चित्रकार जनता एवं हिन्दू राजाओं के चित्र बनाते थे.
2. मुगल शैली के चित्रकार बादशाह की इच्छानुसार उनसे इनाम पाने के लालच में चित्र बनाते थे अर्थात् इनकी तूलिका स्वतन्त्र नहीं थी, जबकि राजपूत शैली के चित्र स्वतन्त्र रूप से बनाए जाते थे. उनके चित्रों में स्वच्छन्दता और स्वतन्त्र कल्पना की अभिव्यक्ति अधिक है.
3. मुगल शैली में भड़कीले एवं चटकदार रंगों का प्रयोग अधिकतर किया जाता था. ये रंग दरबारी वैभव के प्रतीक थे, किन्तु राजपूत शैली में ऐसे रंगों का प्रयोग अत्यन्त सीमित है. ये प्राचीन भारत की कलाशैलियों अजन्ता, एलोरा आदि पर आधारित हैं.
4. राजपूत शैली के चित्रों में दृश्यों के चित्रण में विविधता का प्रयोग अधिक किया गया है. इनमें अनेक प्रकार के प्राकृतिक एवं जीवन-सम्बन्धी अनेक विभिन्न दृश्य अंकित हैं, जबकि मुगल शैली में केवल बादशाह और उनके दरबार से सम्बन्धित चित्रों का अंकन किया गया है.
5. धार्मिक ते-रिवाजों की दृष्टि से भी इन दोनों शैलियों में पर्याप्त अन्तर है.
6. राजपूत शैली की कला में हमें अनेक विषयों के दर्शन होते हैं; जैसे— ग्रामीण जीवन, सामाजिक रीति-रिवाज, धार्मिक और पौराणिक कथाओं का अंकन आदि है, जबकि मुगल शैली में युद्ध, विजय एवं दरबार से जुड़े हुए चित्रों की ही प्रधानता है.
7. विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि, मुगल शैली एवं राजपूत शैली के चित्र अकबर एवं जहाँगीर के समय आपस में इतने घुल-मिल गए थे कि उनकी स्वतन्त्र पहचान करना कठिन है. राजपूत नायक-नायिकाएँ फारसी बालाओं की भाँति ही हरे पेड़ों के नीचे बैठे दिखाए गए हैं. इसका प्रमुख कारण यह है कि, जब मुगल शैली के चित्रकारों को शाही संरक्षण नहीं मिला तब वे हिन्दू राजाओं के दरबारों में चले गए और उनके द्वारा बनाए गए चित्रों पर मुगल शैली का ही स्पष्ट प्रभाव पड़ा.
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Sun, 08 Oct 2023 09:26:27 +0530 Jaankari Rakho
मुगलकालीन अर्थव्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/423 https://m.jaankarirakho.com/423 मुगलकालीन अर्थव्यवस्था

> मुगलकाल में कृषि : टिप्पणी 
मुगलकाल में जनता की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था. इस काल में भू-स्वामित्व, भू-राजस्व व्यवस्था में मुगल शासकों ने आवश्यकतानुसार अनेक परिवर्तन किये. परिणामस्वरूप सल्तनतकाल की अपेक्षा मुगलकाल में कृषि उपज में अधिक वृद्धि हुई तथा कृषि का विस्तार क्षेत्र भी बढ़ा.
मुगलकाल में विभिन्न प्रकार के अनाज व नकदी फसलें बोई जाती थीं; जैसे—गेहूँ, धान, चना, दलहन, बाजरा, सागसब्जी व गन्ना आदि. मुगल शासकों को बाग लगवाने का बहुत अधिक शौक था. अतः इनके आर्थिक महत्व के कारण भी अनेक बागों को लगवाया गया. मुगल साम्राज्य के कुछ इलाके विशेष प्रकार की फसलों के लिए प्रसिद्ध थे. उदाहरणस्वरूप गन्ना - बंगाल एवं बिहार में; गेहूँ – पंजाब तथा उत्तर प्रदेश और बिहार में; नील – यमुना घाटी में; कपास, तम्बाकू, चावल इत्यादि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उगाए जाते थे.
मुगलकाल का उल्लेखनीय पक्ष कृषि का विकास था, लेकिन इसके बावजूद भी उसके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं आया. इस समय कृषि का तरीका परम्परागत ही था तथा सिंचाई की पूर्ण व्यवस्था के अभाव में अधिकांश कृषि वर्षा के सहारे ही होती थी. वर्षा के अभाव में अनेकों बार अकाल पड़ता रहता था. बदायूँनी 1556-57 ई. के अकाल के विषय में लिखता है, जो आगरा व बयाना में पड़ा था. "मैंने स्वयं अपनी आँखों से अपने सगे-सम्बन्धियों को खाते हुए देखा." इस काल में गुजरात एवं दक्षिण भारत भी भयंकर अकाल पड़े. अकालों के बार-बार पड़ने के कारण कृषि एवं एवं सामान्य जनता पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता था. यद्यपि राज्य की ओर से जनता को राहत पहुँचाने की व्यवस्था की जाती थी, परन्तु मुगल शासकों द्वारा बार-बार पड़ने वाले अकालों से निपटने के लिए कोई स्थायी रणनीति का निर्माण नहीं किया गया था.
इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि मुगलकाल में कृषि की दशा उन्नत थी तथा किसानों एवं आम जनता को अपने जीवनयापन के लिए पर्याप्त अनाज मिल जाता था, फिर भी अकाल के समय लोगों का जीवन नारकीय बन जाता था.
> मुगलकाल के उद्योग-धन्धों पर लेख लिखो.
मुगलकाल उद्योग-धन्धों की दृष्टि से काफी समृद्ध था. तथा इस समय बड़े एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना बड़े पैमाने पर हुई. इस समय के उद्योगों को निम्नलिखित प्रमुख श्रेणियों में बाँटा जा सकता है—
(i) कृषि आधारित उद्योग - इस वर्ग के उद्योगों में प्रमुख रूप से चीनी एवं मिश्री, अफीम, नील, लकड़ी के कारीगर आदि आते थे. चीनी एवं मिश्री उद्योग पर इस काल में बंगाल, बिहार एवं पंजाब के क्षेत्रों में अधिक विकसित था. मिश्री का प्रयोग अधिकांश धनी वर्ग के लोग ही करते थे, क्योंकि उसका भाव बहुत अधिक था.
बिहार तथा मालवा का क्षेत्र अफीम का उत्पादन करता जिसका प्रयोग औषधियों के निर्माण में किया जाता था. अफीम की बड़ी मात्रा सामान्यतया विदेशों को निर्यात कर दी जाती थी. बयाना के पास नील का उत्पादन होता था, इसका उपयोग देश के अन्दर होने के साथ-साथ इसका विदेशों को निर्यात भी होता था. इस काल में बढ़ई उद्योग विकसित अवस्था में था. ये लोग कृषि पर आधारित यन्त्र; जैसेबैलगाड़ी, हल आदि के निर्माण के साथ-साथ नाव, चारपाई, सन्दूक, तख्त एवं इमारतों में काम करने वाली सामग्री का निर्माण करते थे. इस काल के शाही कारखानों में उच्च कोटि के कारीगर थे. वे सुन्दर मंजुषाएँ, काम की हुई चारपाइयाँ, सुन्दर बहलियाँ, नौकाएँ आदि तैयार करते थे.
(ii) लौह उद्योग (धातु आधारित उद्योग) - इस समय धातु आधारित उद्योगों में लोहे के उद्योग पर लुहारों का नियन्त्रण था. वे तीर, तलवार, कटार, बर्छे, भाले, बन्दूकें, तोप आदि का निर्माण करते थे.
मुगलकाल में पीतल, ताँबे, काँसे एवं कस्कुट आदि के बर्तन बड़े पैमाने पर बनाये जाते थे. दिल्ली ताँबे के कारीगरों का प्रमुख केन्द्र था. काशी पीतल के बर्तन और बंगाल काँसे के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध स्थल थे.
(iii) विलासिता की सामग्री — विलासिता की वस्तुएँ धनी लोगों में काफी प्रचलित थीं. अतः कुछ कारीगर उस काम में लगे थे. इससे उनकी आय अधिक होती थी. इसमें रत्न एवं आभूषण उद्योग, मोती, हाथीदाँत, मूँगा, सींग और चन्दन आदि द्वारा कई प्रकार की वस्तुओं का निर्माण होता था.
इस काल में मादक द्रव्यों का प्रचलन बहुत अधिक था. इसलिए अनेक लोग मदिरा एवं ताड़ी तैयार करने में लगे हुए थे. भारत में साधारणतया महुआ एवं शीरे से शराब बनाई जाती थी. अंगूरी शराब ईरान एवं यूरोप से मँगाई जाती थी.
(iv) चर्म उद्योग – इस काल में चर्म उद्योग के अन्तर्गत जूते, पानी के लिए मशक एवं कुओं से सिंचाई के लिए पुर ‘डोले’ तैयार किये जाते थे. इस युग में यह व्यवसाय बहुत अधिक उन्नत अवस्था में नहीं था.
(v) वस्त्र उद्योग– मुगलकाल में सर्वाधिक विकसित वस्त्र उद्योग था. इस समय रेशमी, सूती एवं ऊनी वस्त्रों का निर्माण किया जाता था.
(क) रेशमी वस्त्र उद्योग – रेशम का उत्पादन बंगाल व कश्मीर में होता था, चूँकि इसकी खपत बहुत अधिक थी. अतः चीन से इसका आयात भी किया जाता था. इस काल में अधिकांश कच्चा माल बंगाल में तैयार कर उसे गुजरात भेज दिया जाता था, जहाँ उत्कृष्ट कोटि के रेशमी वस्त्रों का उत्पादन किया जाता था. सम्राट ने स्वयं अपने कारखानों में विदेशी कारीगरों द्वारा रेशमी वस्त्र तैयार करवाये थे. कश्मीर में सुन्दर बूटेदार एवं भड़कीले रंगों वाले कपड़े बनते थे. रेशमी कपड़ों को सोने एवं चाँदी की दरदोजी एवं कढ़ाई से अलंकृत भी किया जाता था. यह सामान सामान्यतः उच्च वर्ग के लिए था.
(ख) ऊनी वस्त्र उद्योग– मुगलकाल में ऊनी वस्त्र उद्योग कश्मीर, पंजाब एवं पहाड़ी क्षेत्रों में मुख्य रूप से केन्द्रित था. सुन्दर शॉल लाहौर एवं कश्मीर में बनते थे. अबुल फजल लिखता है कि लाहौर में सम्राट ने एक हजार कारखाने स्थापित किये थे. इस काल में ऊनी कपड़ों के अतिरिक्त गलीचों का भी निर्माण किया जाता था तथा इसका व्यवसाय मुख्य रूप आगरा में केन्द्रित था. फिर भी भारतीय गलीचे फारस के गलीचों की अपेक्षा अधिक अच्छे नहीं थे.
(ग) सूती वस्त्र उद्योग - मुगलकाल में सूती कपड़े का उद्योग बहुत अधिक उन्नत अवस्था में था. बंगाल में सोनार गाँव; उत्तर प्रदेश में मऊ, काशी एवं आगरा; सिन्ध-पंजाब में लाहौर, मुल्तान, भक्खर और थट्टा; गुजरात में अहमदाबाद, पाटन, बड़ोदरा, भड़ौंच एवं सूरत, खानदेश में बुरहानपुर एवं दक्षिण में गोलकुण्डा इस उद्योग के प्रसिद्ध केन्द्र थे.
बंगाल की मलमल उस समय सारे विश्व में प्रसिद्ध थी. इसके साथ ही भारतीय सूती छींट और मोटे कपड़े की माँग भी सर्वाधिक थी. विदेशी व्यापारी भारतीय कपड़े के व्यापार के लिए सदा लालायित रहते थे. यूरोप की व्यापारिक कम्पनियों ने भारतीय कपड़े को यूरोप की मण्डियों में पहुँचाया.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मुगलकाल में उद्योगधन्धों में बहुत अधिक उन्नति हुई जिसके कारण भारतीय वस्तुओं की माँग विदेशों में बढ़ी, जिससे विदेशी धन भारत में आया तथा भारतीय समृद्धि के विकास में काम आया.
> मुगलकाल में विदेशी व्यापार : टिप्पणी
मुगलकाल में विदेशी व्यापार जल एवं थल दोनों मार्गों से होता था तथा स्वयं मुगल बादशाह विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित करते थे, क्योंकि जो सामान विदेशी व्यापारी भारत में लाते थे उनकी यहाँ पर बहुत अधिक आवश्यकता होती थी.
विदेशों से मुख्य रूप से सोना, चाँदी, ताँबा और शीशा तथा इस्पात मँगाया जाता था. इसमें सोना और चाँदी की देश में विशेष माँग थी, क्योंकि देश में इनका उत्पादन नहीं के बराबर होता था. अच्छी किस्म के ऊनी कपड़े फ्रांस से मँगवाये जाते थे. रेशम के कपड़े इटली, ईरान और तूरान से आते थे. ईरानी कॉलीनों की माँग बाजार में सदैव बनी रहती थी. सेना के लिए अच्छे घोड़े बाजार से ही प्राप्त किये जाते थे. घोड़ों का व्यापार जल एवं थल दोनों मार्गों से होता था. घोड़ों के साथ-साथ खच्चर की भी माँग बनी रहती थी.
इनके साथ-साथ विदेशों से फल, मेवे, शराब, दासदासियाँ, कस्तूरी, चीनी मिट्टी के बर्तन, लड़ाई का सामान, शृंगार की वस्तुएँ, विचित्र एवं कलापूर्ण सामग्री आदि आते थे.
यहाँ से निर्यात होने वाली वस्तुओं में वस्त्र (सूती) की मात्रा सर्वाधिक थी. गुजरात में निर्मित रेशमी वस्त्र भी निर्यात किया जाता था. इसके साथ काली मिर्च, मसाले, मोती, सुन्दर आभूषण एवं दर्शनीय वस्तुएँ, नील, अफीम, चीनी तथा मिश्री आदि थे.
फिर भी देश की जनसंख्या को देखते हुए विदेशी व्यापार की मात्रा काफी कम थी.
> मुगलकाल में शिल्प तथा व्यवसाय 
हालांकि मुगलकाल में आम जनता का प्रधान व्यवसाय कृषि था, परन्तु इस समय में अनेक व्यवसायों एवं शिल्पों का भी विकास हुआ.
गुजरात के सूबे में कारीगर खुदाई का कार्य करते थे. वे सड़कों पर चित्र तथा नक्कासी का कार्य प्रमुखता से करते थे. बिहार के सूबे में अच्छा कागज तैयार होता था. बंगाल में नाव बनाने का कार्य उन्नति पर था.
अहमदाबाद मुगलकाल का हस्तकौशल का सबसे बड़ा केन्द्र था. यहाँ पर चित्रकार और भाँति-भाँति के कारीगर काम में लगे रहते थे. हाथी दाँत, आबनूस की लकड़ी, सोनेचाँदी इत्यादि की वस्तुएँ भी बनती थीं. नाना प्रकार की अलंकृत तश्तरियाँ, पेटियाँ, ट्रंक, कलमदान तथा छोटी सन्दूकचियाँ भी बनाई जाती थीं. लाहौर, आगरा, फतेहपुर और अहमदाबाद जैसे नगरों में सभी प्रकार के शिल्पी कार्य करते थे.
टैरी का कथन है कि, "मैंने बहुत से अनोखे सन्दूक, ट्रंक कलमदान तथा बड़े-बड़े चित्रों से परिपूर्ण कालीनों को बाजार में देखा था.” इस काल में कला चित्र तथा आभूषित डेस्कों, लिखे हुए केस तथा हाथी दाँत का कार्य बड़े पैमाने पर होता था.
मुगलकाल में देश में लकड़ी के कारखाने, पिटारियों, सन्दूकों, स्टूलों और अलमारियों तथा चमड़े का सामान बनाने, बर्तन बनाने तथा ईंटें बनाने के व्यवसाय थे. अकबर के दरबार में नाना प्रकार की सुगन्धित वस्तुएँ सुलगती रहती थीं. महलों में भी यह सोने तथा चाँदी के पात्रों में प्रत्येक कमरे में सुलगती रहती थीं.
जहाँगीर के समय में नूरजहाँ की माता, 'अस्मत बेगम' द्वारा गुलाब के इत्र का आविष्कार किया गया, जिसकी दरबार में अत्यधिक माँग रहती थी.
> राज्य की शिल्प एवं व्यवसायों के प्रति नीति ( मुगलकाल )
मुगल सरकार बहुत-सी वस्तुओं का उत्पादन स्वयं करती थी, क्योंकि बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन जनता द्वारा सम्भव नहीं था. इसलिए राज्य की ओर से बड़े-बड़े शिल्प केन्द्र स्थापित किये गये थे जिन्हें इस काल में 'कारखाना' कहा जाता था.
राज्य की ओर से खोले गये कारखाने गुजरात, लाहौर आगरा, फतेहपुर सीकरी एवं अहमदाबाद में मुख्य रूप से स्थित थे. अबुल फजल 'आइने अकबरी' में 36 प्रकार के कारखानों की सूचना हमें देता है. वह लिखता है कि, 'बादशाह बढ़िया से बढ़िया कारीगरों को प्रोत्साहित करता है कि वे नये एवं बढ़िया कारीगर शिक्षित करें. लाहौर, आगरा, फतेहपुर, गुजरात और अहमदाबाद में सहस्त्रों व्यक्ति काम करते हैं” मछलीपट्टम में भी हजारों व्यक्ति कैलिकों की छपाई में लगे हुए थे.
मुगल सम्राट अकबर एवं रेशम तथा ऊनी उद्योगों को प्रोत्साहन दिया. जहाँगीर ने अमृतसर में ऊनी शाल तथा ऊनी कालीन का उद्योग स्थापित किया था. जहाँगीर इत्र तथा सुगन्धित वस्तुओं का अत्यधिक प्रेमी था. अम्बर, सन्दल, गुलाब का इत्र, गुलाब जल इत्यादि खींचे जाते थे. शाहजहाँ ने सोने की कढ़ाई का काम रेशमी वस्त्रों पर करने को प्रोत्साहित किया. उसके समय में हीरे-जवाहरातों का बाजार जोरों पर था.
प्रान्तीय गवर्नरों (सूबेदारों) का स्थानान्तरण होता रहा था. अतः वे कारखाने स्थापित नहीं करते थे, परन्तु वे अपने सूत्रों के अध्ययन से उनकी देखभाल किया करते थे.
मुगलकाल में अधिकतर छोटी-छोटी वस्तुएँ भारतीय ग्रामीण अपने-अपने घरों में बनाते थे. उनके पास धन की कमी होने के कारण वस्तुओं का उत्पादन कम होता था, जो अच्छे कारीगर होते थे, उनको सरकार अपने केन्द्रों तथा दरबार में नौकर रख लेती थी. जो वस्तुएँ कारीगर बनाते थे उनको सबसे पहले खरीदने का अधिकार सम्राट को था. इसके बाद दरबारियों का, दरबारी लोग सम्राट के नाम से बाजार से वस्तुएँ खरीद लेते थे.
मुगलकाल में शिल्प व्यवसायियों और उपभोक्ताओं के मध्य आर्थिक रूप से चौड़ी खाईं थी. यह खाईं अकबर के समय से प्रारम्भ हुई और धीरे-धीरे बढ़ती गई. किसान, कारीगर, व्यवसायी, मजदूर, चपरासी एवं छोटे दुकानदारों की स्थिति अच्छी नहीं थी. उस समय आज की भाँति ट्रेड यूनियन नहीं थीं और न ही उनकी माँगें कोई सुनने वाला था.
मौरलैण्ड ने लिखा है कि, “जुलाहे स्वयं नंगे रहकर दूसरों के लिए शरीर को ढकने के लिए प्रबन्ध करते थे. किसान स्वयं भूखे रहकर नगरों एवं गाँवों का पोषण करने के लिए परिश्रम करते थे." वास्तव में कारीगरों तथा मजदूरों की दशा गुलामों से कुछ ही अच्छी थी.
टामस रो ने लिखा है कि, “भारतीय उसी प्रकार रहते हैं जैसे समुद्र में मछलियाँ, बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, उसी प्रकार बड़े छोटे को लूटते हैं और सम्राट सभी को.”
इस प्रकार उपर्युक्त विवचेन से स्पष्ट है कि मुगलकाल में विभिन्न प्रकार के शिल्पों को प्रोत्साहन दिया गया, किन्तु ये शिल्प धनी वर्गों की पहुँच में ही थे तथा इसका हानिकर पक्ष यह था कि शिल्पियों की दशा की ओर ध्यान न देकर उनका बुरी तरह शोषण किया गया.
> विदेशी व्यापार (यूरोपीय कम्पनियों के विशेष सन्दर्भ में)
मुगलकाल में यूरोपीय देशों से व्यापार प्रारम्भ हुआ. हालांकि उससे पूर्व ही भारत का माल सल्तनतकाल में अरबों के माध्यम से यूरोप पहुँचता था, जिसकी माँग यूरोप में अत्यधिक थी. इस कारण यूरोपीय व्यापारी भारत से अब सीधे माल मँगाने तथा अरबों से अधिक महँगा माल खरीदने की अपेक्षा उन्होंने भारत से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित करने के लिए नये भारत व यूरोप के मध्य समुद्री मार्ग की खोज की. इस काल में पुर्तगालियों ने सबसे पहले बाजी मारी, उसके बाद धीरे-धीरे डचों एवं अंग्रेजों ने अपना व्यापार भारत में जमा लिया. डच लोग भारत के पूर्वी तट पर डटे हुए थे, उनकी फैक्टरियाँ पुलीकट, मसुलीपट्टम तथा अन्य स्थानों पर बसी हुई थीं. अंग्रेजों ने सूरत को अपना अड्डा बनाया तथा पुर्तगालियों के प्रमुख केन्द्र गोआ और बम्बई थे.
(i) पुर्तगालियों का व्यापार – डचों व अंग्रेजों के समक्ष पुर्तगाली व्यापार धीमा पड़ गया था. वे नील, बहुमूल्य पत्थर, लोहा, ताँबा, गेहूँ, तरकारी, दवाइयाँ, मक्खन, तेल, साबुनं, शक्कर, कागज, मोम, रेशम, अफीम, सूती वस्त्र, दरियाँ, हाथी दाँत, सोना-चाँदी और सन्दूकें गोआ में ले जाते थे.
चाँदी, ऊनी वस्त्र, तलवारें, शीशा, लोहा, शराबें, फल, पनीर, छपी हुई पुस्तकें आदि गोआ कैम्बे को पुर्तगाल से लाकर देता था.
गोआ लिस्बन को काली मिर्च, शराब, नील, हीरेजवाहरात भेजता था.
(ii) डचों का व्यापार – डच मसाले के द्वीपों से मसाला लाकर उसे उत्तरी भारत में बेचते थे और बदले में जापान और श्याम को भारत से रेशम एवं खालें भेजते थे. अन्त में वे सोना-चाँदी खरीदने लगे. डच लोग अपने देश हॉलैण्ड से मसुलीपट्टम को ऊनी वस्त्र, हाथी दाँत, टीन, तलवारें और चाकू भेजते थे.
(iii) अंग्रेजी व्यापार - अंग्रेजों के दो राजदूत टामस रो एवं हॉकिन्स इंगलैण्ड से भारत व्यापार की अनुमति प्राप्त करने के उद्देश्य से जहाँगीर के समय भारत में आये, जिसमें से टामस रो को सफलता प्राप्त हुई और उन्हें स्वतन्त्र व्यापार करने की अनुमति प्राप्त हो गई.
1620 ई. तक अंग्रेज नील के व्यापार में लगे रहे. 1620–1630 ई. के मध्य कैलिको में व्यापारिक विकास हुआ तथा जहाँगीर की मृत्यु तक अंग्रेजों का पश्चिम तट पर लगभग आधिपत्य स्थापित हो गया तथा धीरे-धीरे उनका व्यापार बढ़ता चला गया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि मुगलकाल में यूरोपीय देशों से प्रत्यक्ष व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुआ जिसका प्रारम्भ, तो भारतीयों के लिए लाभकारी रहा, लेकिन धीरे-धीरे अंग्रेजों ने भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना प्रारम्भ कर अन्त में उस पर पूर्ण रूप से अधिकार कर लिया.
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Sun, 08 Oct 2023 09:22:23 +0530 Jaankari Rakho
मुगल प्रशासन https://m.jaankarirakho.com/422 https://m.jaankarirakho.com/422 मुगल प्रशासन

> मुगल प्रशासन ( Mughal Administration) 
> केन्द्रीय शासन (Central Administration)
मुगल शासन व्यवस्था की उत्पत्ति का आधार सैन्य व्यवस्था थी और अपने आधार की इस विशेषता ने उसे अन्त तक स्थिर रखा, किन्तु इस सैनिक आधार में प्रजा की भलाई एवं उन्नति को भी शामिल किया गया था. बाबर ने ‘बादशाह’ की उपाधि धारण कर मुगलों को खलीफा के नाममात्र के आधिपत्य से भी मुफ्त कर दिया. अकबर ने स्वयं को इस्लाम के कानूनों के विषय में अन्तिम निर्णायक घोषित करके बादशाह की स्थिति को और भी श्रेष्ठ बना दिया. मुगल बादशाहों ने अपनी प्रजा के दैनिक जीवन में कोई हस्तक्षेप नहीं किया.
मुगल बादशाहों ने निःसन्देह बादशाह के दो कर्त्तव्य स्वीकार किए थे, (1) जहाँ बानी – राज्य की रक्षा व (2) जहाँगीरी—अन्य राज्यों पर अधिकार. मुगल बादशाह अपने राज्य का सर्वेसर्वा था. वह राज्य का अन्तिम कानून निर्माता, शासन-व्यवस्थापक, न्यायाधीश एवं सेनापति था. बादशाह के मन्त्री, सरदार, सलाहकार आदि केवल उसे सलाह दे सकते थे, किन्तु उनकी सलाह उसके लिए बाध्यकारी नहीं थी. अकबर के समय में बादशाह को ईश्वर का प्रतिनिधि स्वीकार किया जाने लगा. इस प्रकार मुगल बादशाह सम्पूर्ण शक्तियों को अपने में केन्द्रित कर और देवत्व के अंश को अपने में मानकर वह पूर्णतया निरंकुश हो गया, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से मुगल बादशाहों के अधिकार कुछ सीमित थे. डॉ. ताराचन्द मुगल शासन को 'कुलीनों का शासन' (Rule of Aristocracy) कहते हैं. प्रशासन में अपनी सहायता के लिए बादशाह विभिन्न मन्त्रियों की नियुक्ति करता था, वे अपनेअपने विभागों के प्रधान होते थे तथा विस्तृत शासन की देखभाल करते थे. इस कार्य को पूर्णतया सम्पादित करने के लिए प्रत्येक मन्त्री के अपने विभाग होते थे और अनेक कर्मचारी उसकी सहायता करते थे. अकबर के समय में दीवान, वकील, बजीर, मीरबख्शी और सद्र-उल-सुदूर यह चार मन्त्री पद होते थे. बाद में वकील एवं वजीर का पद एक ही व्यक्ति को दिया जाने लगा तथा वह राज्य का प्रधानमन्त्री 'वकील-ए--मुतलक' कहलाया. बाद में खान-ए-समा, मुख्य काजी और मुहतसिब के पदों को भी मन्त्री पद प्रदान किया गया. इसके अतिरिक्त मीर-ए-आतिश, दरोगा-ए-डाक चौकी माने जाने लगे थे. के पद मन्त्री पद न होते हुए भी शासन के महत्वपूर्ण पद
(1) प्रधानमन्त्री या ( वकील-ए-मुतलक, वजीर, दीवान) —  अकबर के समय यह पद बैरम खाँ को दिया गया था. इस दृष्टि से वह राज्य का संरक्षक, सभी मन्त्रियों का प्रधान तथा उन्हें हटाने व नियुक्त करने का अधिकारी था, किन्तु बैरम खाँ के बाद पूरे मुगल राज्य में ऐसे अधिकार किसी भी अन्य व्यक्ति को नहीं दिए गए. प्रधानमन्त्री को दीवान के कार्य दे दिए गए तथा बाद में दीवान ही राज्य का वजीर एवं प्रधानमन्त्री होने लगा.
दीवान होने की दृष्टि से उसका मुख्य कार्य आय एवं व्यय की देखभाल करना था. वह बादशाह एवं अन्य अधिकारियों के बीच की कड़ी था. इस प्रकार शासन में बादशाह के बाद प्रधानमन्त्री का द्वितीय स्थान था. वह सभी विभागों पर नियन्त्रण रखता था, सूबे से सूचनाएँ प्राप्त करता था, बादशाह के आदेशों को सूबों में भेजता था. उसकी सहायता के लिए अनेक अधिकारी थे जिनमें निम्नलिखित 5 प्रमुख थे - 
(i) दीवान-ए-खालसा — शाही भूमि की देखभाल करने वाला अधिकारी.
(ii) दीवान-ए-तन – वेतन एवं जागीरों के देखभाल करने वाला.
(iii) मुस्तौफी – आय-व्यय का निरीक्षण करने वाला. 
(iv) वाकिया-ए-नवीस – पत्र व्यवहार एवं घटनाओं का रिकॉर्ड रखने वाला. 
(v) मुशरिफ – दफ्तर की देखभाल करने वाला.
(2) मीर बख्शी – यह सैन्य विभाग का प्रधान था तथा अवसर पड़ने पर यह सेनापति भी बनाया जा सकता था. इसका मुख्य कार्य सेना की भर्ती, उसका हुलिया रखना, घोड़ों एवं हाथियों को दागना, सैनिकों के शस्त्रों, वस्त्रों, शिक्षा एवं रसद आदि की व्यवस्था करना था.
(3) सद्र उस तुदूर – यह धार्मिक विभाग का प्रमुख था. दान-पुण्य की व्यवस्था, धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था, विद्वानों को जागीरें प्रदान करना और इस्लाम के कानूनों की समुचित व्यवस्था को देखना आदि उसके प्रमुख कार्य थे. कभी-कभी इसे मुख्य काजी द्वारा भी नियुक्त किया जाता था. वह सूबों के सद्रों की नियुक्ति में बादशाह को सलाह भी दिया करता था.
(4) मुख्य काजी—मुगल बादशाह स्वयं राज्य का सबसे बड़ा न्यायाधीश था तथा प्रत्येक बुधवार को स्वयं न्याय के लिए बैठता था, परन्तु बादशाह सभी मुकदमों का निर्णय नहीं कर सकता था. इसी कारण से उसकी सहायता के लिए राजधानी में एक मुख्य काजी हुआ करता था, जो मुस्लिम कानून के अनुसार न्याय का कार्य करता था. उसकी सहायता के लिए मुफ्ती होते थे, जो कानून की व्याख्या करते थे, जिनके आधार पर काजी निर्णय सुनता था. वह प्रान्त, जिले तथा नगरों में अन्य काजियों की नियुक्ति करता था तथा उनके कार्यों की देखभाल करता था.
(5) मुहतरिष—प्रजा के नैतिक चरित्र की देखभाल करने के लिए और मुख्यतया यह देखने के लिए कि प्रजा इस्लाम के कानूनों के अनुसार आचरण करती है अथवा नहीं, एक मुहतसिद हुआ करता था. मादक द्रव्यों के प्रयोग, जुआ खेलने से रोकना और स्त्री-पुरुषों के अनैतिक सम्बन्धों को रोकना उसका कार्य था.
कभी-कभी उसे नाप-तौल के पैमानों की देखभाल और वस्तुओं के मूल्यों को निश्चित करने का उत्तरदायित्व भी उसे दिया जाता था. औरंगजेब के समय उसे हिन्दू मन्दिरों और पाठशालाओं को नष्ट कराने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था. उसकी सहायता के लिए प्रान्तों में भी मुहतसिदों की नियुक्ति की गई थी.
(6) खान-ए- समा – अकबर के समय यह पद मन्त्री स्तर का नहीं था, परन्तु बाद के बादशाहों ने इसे मन्त्री पद का दर्जा दे दिया था. यह बादशाह के परिवार, उसके महल और उसकी व्यक्तिगत तथा दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति की देखभाल करता था. वह शाही भोजन, भण्डार, खजाना, उपहार, नजराने आदि की भी देखभाल करता था. उसका मुख्य उत्तरदायित्व शाही कारखानों की देखभाल करना था, जहाँ विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन होता था तथा ये राज्य की आय के एक बड़े साधन थे.
(7) मीर-ए-आतिश– 'मीर-ए-आतिश' या 'दरोगा-एतोपंखाना' का पद मन्त्री स्तर का न होते हुए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण था. शाही तोपखाना उसके अधीन था. तोपों को बनवाना, किलों में उनकी व्यवस्था करना और बन्दूकों का निर्माण आदि उसकी देख-रेख में था. अधिकांशतः यह पद किसी तुर्क अथवा ईरानी को दिया जाता था.
(8) दारोगा-ए-डाक-चौकी– इसके अधीन अन्य राज्य के गुप्तचर और संवादवाहक थे. प्रान्तों से सूचनाएँ प्राप्त करना तथा 'वाकिया-ए-नवीस' और 'मुफिया-ए-नवीस' की नियुक्ति तथा उनसे प्राप्त सूचनाओं को बादशाह तक पहुँचाना उसका प्रमुख कर्त्तव्य था. गुप्तचर विभाग का प्रधान होने के कारण शासन में उसका बहुत अधिक महत्व था.
उपर्युक्त विभागों और उनके अन्तर्गत विभिन्न अधिकारियों के अतिरिक्त राज्य का अपना एक बड़ा सचिवालय था, जहाँ वजीर की अधीनता में अनेक अधिकारी कार्य करते थे और वहाँ सभी प्रान्तों की सूचनाएँ आती थीं.
> प्रान्तीय शासन (Provincial Administration)
सम्पूर्ण मुगल साम्राज्य प्रान्तों अथवा सूबों में बँटा हुआ था. अकबर के समय मुगल सूबों की संख्या 15 थी और औरंगजेब के समय तक बढ़कर उनकी संख्या 21 हो गई थी. प्रत्येक सूबे की पृथक् राजधानी थी, जहाँ सूबे का शासक सूबेदार होता था. सूबेदार को निजाम, सिपाहसालार आदि नामों से भी जाना जाता था. प्रान्तीय शासन व्यवस्था का ढाँचा केन्द्रीय प्रशासन के समान था. प्रत्येक सूबे में प्रधान अधिकारी सूबेदार, दीवान, बक्शी सद्र, कोतवाल तथा वाकिंया नवीस होते थे.
किसी-किसी प्रान्त में दारोगा-ए-तोपखाना और मीर - बहर नामक अधिकारियों को भी नियुक्ति की जाती थी. अकबर ने अपने दीवान को विस्तृत अधिकार दिए थे और सूबों के सभी दीवान बजीर की प्रत्यक्ष अधीनता में थे. उसका उद्देश्य सूबेदार की शक्तियों को दीवान की शक्तियों से सन्तुलित कर सूबों में विद्रोह की आशंकाओं को समाप्त करना था, किन्तु बाद के बादशाह इस व्यवस्था को कायम न रख सके.
प्रत्येक सूबा जिलों में बँटा था जिसमें, 'फौजदार', ‘अमलगुजार', 'काजी', 'कोतवाल', 'वितिक्ची' एवं 'खजानदार' होते थे.
(1) फौजदार – यह एक सैनिक अधिकारी होता था, जिसका प्रमुख कार्य जिले में शान्ति व्यवस्था की स्थापना, लुटेरों एवं चोरों से प्रजा की रक्षा करना और राज्य की आज्ञाओं को प्रजा से मनवाना उसका मुख्य कर्त्तव्य था. उसकी नियुक्ति बादशाह द्वारा की जाती थी और उसे सूबेदार के अधीन कार्य करना होता था.
(2) अमलगुजार – जिले में लगान वसूल करना, कृषि की देखभाल करना व किसानों की सुरक्षा का मुख्य उत्तरदायित्व इसी पर था. यह जिले का वित्त अधिकारी था तथा खजाने की देखभाल करता था.
(3) बितिची - यह अमलगुजार के अधीन अधिकारी था. भूमि एवं लगान सम्बन्धी सभी कागज इसे ही तैयार करने होते थे. भूमि की किस्म, उसकी पैदावार और किस किसान के पास कितनी भूमि है, यह हिसाब भी कानूनगो की सहायता से वही रखता था.
(4) खजानदार – यह जिले का खजांची था तथा अमलगुजार की अधीनता में कार्य करता था. सरकारी खजाने की सुरक्षा का मुख्य उत्तरदायित्व इसी के पास था.
प्रत्येक जिला कई परगनों में बँटा होता था. शिकदार, आमिल, फौतदार, कानूनगो और कारकून परगने के प्रमुख अधिकारी होते थे.
(1) शिकदार – शिकदार परगने का प्रमुख अधिकारी था. इसका मुख्य कार्य परगने में शान्ति-व्यवस्था को स्थापित करना और लगान वसूल करने में सहायता देना था.
(2) आमिल – यह परगने का वित्त अधिकारी था. प्रमुख कार्य किसानों से लगान वसूल करना था. इसके लिए यह किसानों से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित करता था.
(3) फौतदार – यह परगने का खजांची था और ख की सुरक्षा का कार्य करता था.
(4) कानूनगो – यह परगने के पटवारियों का प्रधान था. यह लगान, भूमि और कृषि सम्बन्धी सभी कागजों को देखता एवं तैयार करता था.
(5) कारकून — यह परगने का क्लर्क होता था, जो लिखा-पढ़ी का कार्य करता था.
> नगर का शासन
नगर का प्रधान कोतवाल होता था और वह उन सभी कार्यों को करता था, जो आधुनिक समय में नगरपालिकाएँ और पुलिस अधिकारी मिलकर करते हैं. अपनी सहायता के लिए कोतवाल अनेक अधिकारियों की नियुक्ति करता था तथा नगर की सुरक्षा, स्वच्छता, बाजार और वस्तुओं के मूल्य पर नियन्त्रण आदि के साथ-साथ बाहर से आने वाले यात्रियों पर निगरानी और स्थानीय करों की वसूली का कार्य करता था.
> गाँव का शासन
मुगल शासकों ने ग्राम-शासन को अपने हाथ में नहीं लिया, अपितु परम्परागत ग्राम पंचायतें ही गाँव की सुरक्षा, सफाई, शिक्षा आदि की व्यवस्था करती थीं. गाँवों के अधिकांश झगड़ों का निपटारा भी ग्राम पंचायतें ही करती थीं. गाँव का पैतृक चौकीदार गाँव की सुरक्षा का उत्तरदायित्व सँम्भालता था. गाँव में पटवारियों का पद भी पैतृक था. साधारणतया सरकारी कर्मचारी ग्राम-जीवन और शासन में हस्तक्षेप नहीं करते थे और न ही गाँव में किसी सरकारी कर्मचारी की नियुक्ति की जाती थी, परन्तु आवश्यकता पड़ने पर सरकारी कर्मचारी ग्रामवासियों की सहायता करते थे. गाँव के चौकीदार एवं पटवारियों पर जो सुरक्षा और लगान सम्बन्धी जिम्मेदारियाँ थीं, उनकी पूर्ति के लिए सरकारी कर्मचारी उनको बाध्य कर सकते थे. इस प्रकार सरकारी कर्मचारियों की अधीनता में ग्रामीण-शासन राज्य की स्वतन्त्र इकाई थी.
> मुगल काल में भू-राजस्व व्यवस्था (Land Revenue System)
मुगलकाल में राज्य की आय का सबसे बड़ा साधन भूमिकर था. बाबर के समय में सम्पूर्ण राज्य को अनेक जागीरों में बाँट दिया गया था. हुमायूँ ने अपने समय में कोई भी भूमि सम्बन्धी सुधार नहीं किए. शेरशाह के समय में भूराजस्व के लिए एक व्यवस्थित लगान-व्यवस्था को प्रारम्भ किया गया, लेकिन उसके पुत्र इस्लामशाह के समय उसकी व्यवस्था समाप्त हो गई और जब हुमायूँ ने पुनः दिल्ली की सत्ता सँभाली तब उसने पुनः परम्परागत व्यवस्था (जागीरदारी व्यवस्था) को लागू कर दिया.
मुगलकाल में अकबर एक ऐसा प्रथम बादशाह था, जिसने लगान-व्यवस्था को सुचारू रूप से स्थापित किया तथा मध्य-युग की श्रेष्ठतम लगान पद्धति का निर्माण किया. अकबर के समय विभिन्न लगान अधिकारियों तथा अर्थमन्त्रियों की नियुक्ति कर विभिन्न प्रकार के अन्वेषण किए गए. अन्त में टोडरमल की सहायता से अकबर ने जिस लगान-व्यवस्था को लागू किया उसे 'दहशाला पद्धति' के नाम से पुकारा गया और यही दहशाला पद्धति आगे भी मुगल राजस्व व्यवस्था का आधार स्तम्भ बनी. इसे 1580 ई. में लागू किया गया. इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं - 
1. इस व्यवस्था में भूमि की नाप के लिए जरीब का प्रयोग किया गया, जो बाँस के टुकड़ों को लोहे की कड़ियों द्वारा जोड़कर बनाई जाती थी. इससे पूर्व रस्सी का प्रयोग किया जाता था, जो मौसम के प्रभाव के कारण बढ़ या घट जाती थी.
2. भूमि की नाप के लिए इकाई 'बीघा' निर्धारित किया गया जो 60 x 60 गज का होता था.
3. प्रारम्भ में भूमि की नाप के लिए 'गज-ए-सिकन्दरी' का प्रयोग होता था, परन्तु अब उसके स्थान पर नया पैमाना 'गज-ए-इलाही' अपनाया गया.
4. राज्य की समस्त भूमि को चार श्रेणियों में विभाजित कर दिया गया -
(i) पोलज भूमि – इस प्रकार की भूमि में वर्ष भर खेती होती थी तथा यह सर्वाधिक उपजाऊ होती थी.
(ii) परोती भूमि – यह वह भूमि थी जिस पर एक वर्ष छोड़कर दूसरे वर्ष खेती की जाती थी.
(iii) चच्छर भूमि – इस प्रकार की भूमि पर तीन या चार वर्ष तक खेती नहीं की जाती थी.
(iv) बंजर भूमि – इस प्रकार की भूमि पर 5 वर्ष या इससे अधिक वर्षों तक खेती नहीं की जा सकती थी.
5. प्रत्येक प्रकार की भूमि की पिछले 10 वर्षों की पैदावार का पता लगाकर उस भूमि की औसत पैदावार (Average yield) का पता लगाया जाता था और इस औसत पैदावार को लगान निश्चित करने का आधार मानकर अगले 10 वर्षों तक के लिए किसानों पर लगान निश्चित किया जाता था.
6. लगान की दर कुल औसत उपज का 1/3 निर्धारित थी.
7. किसानों से राजस्व वसूली नकद की जाती थी और इसके लिए अलग-अलग क्षेत्रों में गल्ले की अलग-अलग कीमतें निर्धारित की जाती थीं.
8. सरकारी कर्मचारी भूमि की किस्म, उसका क्षेत्रफल, पैदावार, गल्ले की कीमत आदि का हिसाब प्रत्येक वर्ष तैयार करते थे, क्योंकि उसी के आधार पर भविष्य का प्रबन्ध निर्भर करता था, परन्तु किसानों को प्रत्येक वर्ष लगान निश्चित करने की और प्रत्येक वर्ष गल्ले की कीमतें निश्चित करने की आवश्यकता नहीं रही.
9. जो भूमि जागीरों के रूप में दी गई थी उसकी लगानव्यवस्था का प्रबन्ध भी केन्द्रीय अधिकारी किया करते थे.
10. दान आदि में दी गई 500 बीघा या उससे अधिक भूमि के मालिकों को बादशाह के सम्मुख उपस्थित होने की आज्ञा दी गई थी, जो बादशाह के सम्मुख उपस्थिति नहीं हुए अथवा जिनके अधिकारों को वैध नहीं माना गया उनसे उनकी भूमि छीन ली गई.
11. अकबर ने किसानों को भूमि का स्वामी माना तथा उनसे सीधा सम्पर्क स्थापित करने का प्रयास किया.
12. लगान के लिए किसानों को पट्टे दिए जाते थे, जिस पर उनकी भूमि का विवरण तथा लगान लिखा रहता था. किसानों से उनकी स्वीकृति (कबूलियत पत्र ) भी ली जाती थी.
13. किसानों को भूमि सुधार हेतु प्रोत्साहन देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और समय-समय पर उनको सहायता दी जाती थी. आपत्तिकाल में लगान कम या माफ कर दिया जाता था.
14. 'दहशाला प्रबन्ध' पूरे राज्य में लागू नहीं किया गया था, बल्कि लगान को निश्चित करने के लिए अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग प्रणालियों का प्रयोग किया जाता था. गल्ला बक्सी अथवा बँटाई का तरीका सिन्ध तथा काबुल के क्षेत्रों में लागू किया गया था. ‘नस्क' एवं 'कनकूत' का तरीका बंगाल, गुजरात एवं काठियावाड़ के क्षेत्रों में लागू किया गया था. 'जाब्ती' अथवा 'नकदी' का तरीका बिहार, इलाहाबाद, मालवा, अवध, दिल्ली और लाहौर में लागू था. ये वह सूबे थे जहाँ दहशाला-व्यवस्था लागू थी.
जहाँगीर के समय लगान-व्यवस्था का मूल स्वरूप अकबर की राजस्व व्यवस्था के ही समान था, परन्तु उसका प्रबन्ध शिथिल हो गया था. जहाँगीर ने बंगाल एवं गुजरात में भी दहशाला-पद्धति को लागू करने का प्रयत्न किया. उसके शासनकाल में जागीरदारों के अधिकारों में वृद्धि हुई. इससे किसानों के साथ ही राजकोष की भी हानि हुई. शाहजहाँ के समय इस व्यवस्था में और गिरावट आई और उसने किसानों के करों में वृद्धि कर 33% से बढ़ाकर 50% कर दिया. उसके समय में लगान वसूलने के लिए भूमि को ठेकेदारों को दिया जाना भी प्रारम्भ हो गया. औरंगजेब के समय में लगान व्यवस्था में केवल वे सम्पूर्ण दोष रहे जो शाहजहाँ के समय में उत्पन्न हुए थे, बल्कि राज्य की आर्थिक कठिनाइयों के कारण अधिक दबाव डाला गया.
> मुगलकाल में मनसबदारी व्यवस्था (Mansabdari System in Mughal Period) 
मुगलकाल की सैन्य विशेषता उसकी 'मनसबदारी' व्यवस्था थी, इसे अकबर के शासनकाल में लागू किया गया था तथा अन्य मुगल बादशाहों ने इसमें थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ इसे यथावत् रखा. यद्यपि यह व्यवस्था उत्तरकालीन मुगलों के समय निष्प्राण हो गई थी. इस व्यवस्था का मुख्य आधार 'दशमलव प्रणाली' थी. इसी आधार पर अधिकारियों के पदों का विभाजन किया था. यह व्यवस्था भारत के लिए पूर्णतया नई नहीं थी. बलबन तथा इस्लामशाह के समय में ऐसी ही व्यवस्था लागू की गई थी.
साधारणतया मनसब का अर्थ पद से था. विभिन्न अंकों की संख्या, जो ( 10 से विभाजित हो सकती थी) अधिकारियों के पदों को निश्चित करने के लिए प्रयोग में लाई गई थी. इसका प्रयोग अधिकारियों के वेतन एवं भत्तों को निश्चित करने के लिए भी किया जाता था. अकबर ने अपने समय में 10 से लेकर 10,000 और बाद में 12,000 की संख्या के मनसब रखे थे. जब अकबर के समय में 10,000 का मनसब सबसे बड़ा था. उस समय 5,000 की ऊपर की संख्या का मनसब केवल शहजादों को दिया जाता था, किन्तु जब से बड़ा मनसब 12,000 हो गया तब 7,000 से ऊपर के मनसब को शहजादों के लिए सुरक्षित कर दिया गया. अकबर ने अपने समय में सम्पूर्ण मनसब को विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया था.
जहाँगीर एवं शाहजहाँ ने अपने सरदारों को 8,000 तक के मनसब एवं ‘शहजादों को 40,000 तक के मनसब प्रदान किये. 500 से नीचे के मनसबदार 'मनसबदार' ही कहलाते थे. 500 से 2500 के मनसबदारों को 'अमीर' पुकारा जाता था. 2500 से ऊपर के मनसबदारों को 'अमीर-ए-आजम' कहा जाता था. सैनिक अधिकारियों में प्रतिष्ठा का पद ‘खान-ए-जमान’ का और उसके बाद 'खान-ए-खाना' का था. काजियों एवं सद्रों को इस व्यवस्था में शामिल नहीं किया गया था.
मनसबदारों को अपने मनसब की संख्या के बराबर सैनिक रखने के लिए बाध्य नहीं किया जाता था और सामान्यतया मनसब से कम संख्या में ही सैनिक रखे जाते थे. मनसबदारों की पदोन्नति एवं नियुक्ति का कोई नियम नहीं था. मनसबदारों को नकद वेतन दिया जाता था. उन्हें जागीरें भी दी गई थीं, लेकिन लगान वसूलने का कार्य केन्द्रीय कर्मचारी ही करते थे. मनसबदारों को अपनी जागीर से प्राप्त आय मिल जाती थी. अतः उनका वेतन कम कर दिया गया.
अकबर ने अपने अन्तिम वर्षों में 'जात एवं सवार' के नये पदों का प्रारम्भ मनसबदारी व्यवस्था में किया. प्रत्येक मनसबदार को एक जात एवं सवार के पद उसने प्रदान किये. जात एवं सवार पद को आरम्भ करने के साथ ही अकबर ने अपने 5000 और उससे कम संख्या के मनसबदारों की श्रेणियों में से प्रत्येक श्रेणी को तीन भागों में बाँटा.
यदि एक मनसबदार को जात एवं सवार का पद समान संख्या को दिया जाता था तो वह अपनी श्रेणी के मनसबदारों में प्रथम श्रेणी का मनसबदार कहलाता था. यदि किसी मनसबदार की उसके जात पद से कम संख्या का परन्तु आधे से अधिक होने पर वह द्वितीय श्रेणी का और इसी प्रकार यदि सवार पद जात संख्या के आधे से कम होता, तो वह तृतीय श्रेणी का मनसबदार कहलाता था.
मनसबदारों को अपने वेतन और पद के अनुसार ही हाथी, घोड़े, ऊँट और सैनिक रखने पड़ते थे तथा उनकी संख्या सम्राट द्वारा निश्चित कर दी जाती थी, लेकिन धीरेधीरे यह नियम शिथिल पड़ गया. मनसबदारों के सैनिकों तथा घोड़ों का क्रमशः 'हुलिया' रखना और 'दागना' अनिवार्य हो गया.
जहाँगीर के शासनकाल में अकबर द्वारा चलाई गई मनसबदारी-व्यवस्था अपने मूल रूप में चलती रही. उसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया गया. जहाँगीर ने केवल मनसबदारी-व्यवस्था में सवार पद के साथ 'सिह अस्पा दुअस्पा' को जोड़ा. इसका तात्पर्य यह था कि मनसबदारों के वेतन में वृद्धि किये बिना ही उनके सवारों में वृद्धि की जाये. ‘सिह अस्पा दुअस्पा' पाने वाले मनसबदार को अपनी सवार संख्या से दोगुने को कोतल घुड़सवार रखने पड़ते थे.
शाहजहाँ के समय में मनसबदारी व्यवस्था – मुगल साम्राज्य की समस्त सैनिक और असैनिक व्यवस्था का मूल आधार मनसबदारी व्यवस्था थी, लेकिन नियमों- उपनियमों का अनुशासन एकदम उसके काल तक ढीला पड़ चुका था. शाहजहाँ के समय में पदाधिकारियों को लाभान्वित करने के लिए प्रारम्भ में अनुचित उदारता बरती. अतः इस व्यवस्था में पेचीदगी उत्पन्न हो गई और सरकारी व्यय बढ़ गया. इसके अतिरिक्त मनसबदार द्वारा पोषित वास्तविक सैनिकों एवं हो गई. शाहजहाँ को यह व्यवस्था असह्य हो गई. अतः उसे पदानुसार घोषित सैनिकों के अनुपात में भी गड़बड़ी उत्पन्न अपनी साम्राज्यवादी लालसा की पूर्ति के लिए उसे सुसंगठित और सुसज्जित सेना की आवश्यकता थी और वह राजकोष पर भार और व्यय भी कम करना चाहता था. अतः अपने उसने अनुपात पर बल दिया और यह आज्ञा जारी की कि शासनकाल के 20वें वर्ष में उसने कुछ नियम बनाये. सर्वप्रथम उस मनसबदार को जिसकी जागीर भारत में होगी, अपनी जात और सवार पद की एक-तिहाई संख्या में सवार रखने पड़ेंगे. जैसे कि 3000 जात और 300 सवार वाले मनसबदार को दाग के लिए 1,000 (एक हजार ) सवार लाना होगा. यदि उसकी नियुक्ति भारत से बाहर किसी अन्य क्षेत्र में होगी, तो उसका एक-चौथाई लाना होगा. बल्ख के अभियान के समय यह भाग 5वाँ कर दिया गया था. इसके अतिरिक्त शाहजहाँ ने जात के पद के वेतन में भी भारी कटौती की. इस प्रकार शाहजहाँ ने सैन्य व्यवस्था में कुछ सुधार कर अपने सैनिक अभियानों को संचालित किया.
औरंगजेब के समय मनसबदारी व्यवस्था — सर जदुनाथ सरकार के अनुसार औरंगजेब के समय मुगल साम्राज्य का शासन-प्रबन्ध तथा सारी सैनिक व्यवस्था ऐसे अधिकारियों द्वारा होती थी, जिनके नाम मुगल सेना के मनसबदारों की सूची में उनके मनसब के अनुसार लिखे रहते थे, इस सूची में नाममात्र के बीस हजार घुड़सवारों के मनसब से लेकर केवल बीस घुड़सवारों तक के मनसब वालों के नाम थे. इनमें से 3 हजारी से अधिक के मनसब वालों को 'उमरा-इ-आजम' के नाम से जाना जाता था तथा इससे कम वाले केवल 'मनसबदार' कहलाते थे. जहाँ 1556 ई. में उमरा एवं मनसबदार सब मिलाकर 1803 थे, वही 1690 ई. में यह संख्या 14449 हो गई. इस प्रकार औरंगजेब के समय में मनसबदारों की सूची बहुत अधिक लम्बी हो गई. इससे उसकी सम्पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था में शिथिलता आ गई.
मनसबदारी-व्यवस्था के दोष—मनसबदारी-व्यवस्था में कुछ मौलिक दोष निहित थे. अतः कालान्तर में यह प्रथा मुगल साम्राज्य के पतन का एक प्रमुख कारण बनी और अन्त में नष्ट हो गई. वैसे भी अकबर के शासनकाल में ही मनसबदार अधिक धन-सम्पन्नता के कारण विलासी हो गये थे और जाति-प्रथा ने उनकी विलासिता में और वृद्धि की
मनसबदारों में यह विचार बल पकड़ता गया कि राज्य के लिए सम्पत्ति छोड़ देने की अपेक्षा तो यह अच्छा है कि उस सम्पत्ति का उपभोग वे अपने जीवनकाल में ही कर लें. अकबर के उत्तराधिकारियों के समय मनसबदार अधिकाधिक विलासी, इन्द्रिय-लोलुप और व्यसनी हो गये. इसके अतिरिक्त मनसबदारी प्रथा के नियमों की भी उपेक्षा होने लगी. जाँचपड़ताल, हुलिया और दाग-प्रणाली की अवहेलना की गई और सम्राट मनसबदारों कीं गतिविधियों की ओर से उदासीनता बरतने लगे. इन सभी कारणों से मनसबदारी प्रथा में अनेका नेक दोष उत्पन्न हो गये और कालान्तर में यह असफल हो गई.
> अकबर के काल में जागीर-प्रथा
अकबर के काल में राजस्व वसूली का कार्य करने वाले चार वर्ग थे, इनमें से जागीरदार भी एक थे. सरकारी कर्म चारियों द्वारा कर वसूलने के बाद का स्थान मुगल-व्यवस्था में इन्हीं का था.
बाबर के समय में सैनिक नेताओं को अविजित एवं अर्द्ध-विजित क्षेत्र जागीर के रूप दिये जाते थे और वहाँ पर ये लोग प्रायः उपशासकों की तरह व्यवहार करते थे. उनके आन्तरिक शासन में सम्राट का कोई विशेष हस्तक्षेप नहीं रहता था. हुमायूँ के समय में भी प्रायः यही दशा रही. शेरशाह तथा इस्लामशाह ने जागीरों को कम करने का प्रयास किया, लेकिन उनके उत्तराधिकारियों के काल में यह व्यवस्था पुनः जोर पकड़ने लगी.
अकबर ने अपने शासन के प्रारम्भ में ही जागीरों पर नियन्त्रण बढ़ाने का प्रयास किया और 1564 ई. में उसने खालसा ( राजकीय भूमि) का विस्तार करने और उस पर अनाधिकृत अधिकार रोकने का आदेश दिया और इसी समय से उसने वेतन के बदले जागीर देनी प्रारम्भ की तथा प्रत्येक व्यक्ति को जगीर का सही हिसाब रखने को कहा और उसको सैनिकों के व्यय के लिए भी जब जागीरें दी जाने लगीं, तब सैनिकों पर बख्शी का नियन्त्रण बढ़ा दिया गया. यदि उसकी आय उसके खर्च से अधिक होती, तो उसे उस आय को राजकोष में जमा करना पड़ता था.
अकबर के प्रारम्भिक वर्षों में जागीर माँगने वालों की संख्या बहुत अधिक थी तथा उस बड़ी संख्या के अनुसार राज्य का विस्तार नहीं हुआ था. इसलिए सन्तुलन बनाने के लिए वित्त विभाग ने जागीरों की आय को बढ़ा-चढ़ाकर लिख दिया. इस प्रकार कम जागीरों से अधिक लोगों को सन्तुष्ट करने का प्रयास किया, परन्तु जब वे वहाँ जाते तो उतनी उनकी आय न होती और उनका अर्थ-विभाग से झगड़ा हो जाता. इस पर अकबर ने कानूनगो के खातों की दुबारा जाँच करवाई और नये सिरे से जागीरों की आय को 1566 ई. में लिखा गया इससे बहुत-सा असन्तोष मिट गया. चूँकि पुनः निर्धारण में भी पूरी सतर्कता का प्रयोग न होने के कारण 1573 ई. में पुनः अव्यवस्था उत्पन्न हो गई. इस पर अकबर ने सभी जगीरदारों को नकद वेतन देना प्रारम्भ कर दिया और उनकी जागीरों को खालसा करके राजस्व वसूली के लिए सभी जगह 'करोड़ी' की नियुक्ति कर दी गई. 1579–80 ई. में आय के पिछले 10 वर्षों के आधार पर नवीन विवरण तैयार किये गये, जिससे एक बार पुनः जागीर-व्यवस्था का प्रचलन बढ़ गया. सम्भवतः इसका कारण राजस्व वसूली में करोड़ी लोगों की असफलता तथा सैनिक अधिकारियों द्वारा जागीर को अधिक पसन्द करना था.
जागीरदार अपनी जागीर के मालिक नहीं होते थे. वे केवल सम्राट की आज्ञानुसार कर वसूल करते हुए अपने प्रयोग में लाने के अधिकारी थे. इस आय-व्यय का हिसाब उन्हें दीवान के कार्यालय को देना पड़ता था. सम्राट ने जब 'दहशाला पद्धति' को लागू किया तब जागीरदारों को भी इस व्यवस्था के अनुसार कर उगाहने का आदेश दिया गया और जिस-जिस प्रान्तों में इस प्रथा को लागू किया गया था, उनउन प्रान्तों में इसका चलन हो गया.
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Sun, 08 Oct 2023 09:14:47 +0530 Jaankari Rakho
मुगलकाल में विदेशी आक्रमण – नादिरशाह एवं अहमदशाह अब्दाली https://m.jaankarirakho.com/421 https://m.jaankarirakho.com/421 मुगलकाल में विदेशी आक्रमण – नादिरशाह एवं अहमदशाह अब्दाली

> नादिरशाह के आक्रमण के कारण, परिणाम तथा उसके स्वरूप
मुगल साम्राज्य औरंगजेब की मृत्यु के बाद पतनोन्मुख हो चला था. अतः इसका लाभ उठाकर विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत पर हमले करने प्रारम्भ कर दिए. इनका प्रमुख उद्देश्य भारत से धन की लूट था. इन आक्रमणकारियों में नादिरशाह का आक्रमण अत्यन्त महत्वपूर्ण था, इस आक्रमण के निम्नलिखित कारण थे
1. नादिरशाह एक महात्वाकांक्षी व्यक्ति था. अतः वह अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था और भारत की राजनैतिक स्थिति उसके आक्रमण के लिए अनुकूल थी, क्योंकि इस समय भारत के विभिन्न भागों जैसे— पंजाब, राजपूताना, महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में क्षेत्रीय स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष चल रहा था.
2. नादिरशाह ने भारत में अपार धन होने की बात सुन रखी थी. अतः यह स्वाभाविक था कि, वह भारत की दुर्बल राजनैतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर धन प्राप्ति के लिए भारत पर आक्रमण किए.
3. नादिरशाह के आक्रमण को सीमान्त प्रदेशों की असुरक्षा ने भी प्रेरित किया, क्योंकि इस क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया था.
4. मुगलों एवं ईरानियों के मध्य कान्धार को लेकर लम्बे समय तक संघर्ष हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद दोनों में कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित हो गए थे. जब नादिरशाह ने ईरान पर अधिकार कर लिया तब मुगलों ने उससे सम्बन्ध तोड़ लिए. इससे नादिरशाह क्रोधित हो गया और उसने मुगलों को एक सबक सिखाने की तैयारी प्रारम्भ कर दी.
5. मुगल नादिरशाह के विरुद्ध गानों की सहायता कर रहे थे, इस पर नादिरशाह ने मुगल बादशाह मुहम्मदशाह के पास अपना दूत भेजकर उसे अफगानों की सहायता बन्द करने को कहा जिसे मुहम्मदशाह ने ठुकरा दिया. इस पर क्रोधवश नादिरशाह ने मुगल राज्य पर आक्रमण कर दिया.
> नादिरशाह के आक्रमण का स्वरूप
नादिरशाह ने 1738 ई. में भारत पर आक्रमण करने के लिए ईरान से रवाना हुआ और तेजी से आगे बढ़कर काबुल पर अधिकार कर लिया और काबुल से उसने पुनः अपना दूत दिल्ली भेजा जिसकी हत्या कर दी गई. इस पर वह जलालाबाद होता हुआ लाहौर आया और उस पर बिना किसी विशेष प्रतिरोध का सामना किए अधिकार कर लिया. अब उसका अधिकार पूरे पंजाब पर हो गया और इसके बाद वह दिल्ली की ओर आगे बढ़ा.
मुहम्मदशाह ( मुगल बादशाह) स्वयं नादिरशाह का सामना करने के लिए सेना सहित आगे बढ़ा और करनाल के निकट (पंजाब में) फरवरी 1739 ई. में दोनों सेनाओं में संघर्ष हुआ, जिसमें मुहम्मदशाह पराजित हो गया तथा उसे गिरफ्तार कर दिल्ली लाया गया.
नादिरशाह के दिल्ली आने के बाद उसका भव्य स्वागत किया गया तथा बादशाह स्वयं उसकी सेवा में रहा. इसी बीच दिल्ली निवासियों ने नादिरशाह के कुछ सैनिकों की हत्या कर दी, जिस पर नादिरशाह ने कत्लेआम का आदेश दे दिया. इस पर ईरानी सिपाहियों ने दिल्ली में भयंकर लूटपाट एवं नागरिक मारे गए. नादिरशाह को दिल्ली की इस लूट में मारकाट मचा दी और हजारों की संख्या में दिल्ली के निर्दोष लगभग 3 करोड़ रुपए हाथ लगे. नादिरशाह लगभग एक माह तक दिल्ली में रुका रहा और वही इस समय वास्तविक मई, 1739 ई. को वह अफगानिस्तान के लिए रवाना हो गया शासक था. उसने अपने नाम से खुतबा पढ़वाया. अन्त में 5 तथा जाने से पूर्व उसने मुहम्मदशाह को पुनः मुगल ताज सौंप दिया तथा बदले में उसे मुहम्मदशाह ने कश्मीर, सिन्ध, थट्टा तथा सिन्धु नदी के पश्चिम का इलाका उसे सौंप दिया.
> नादिरशाह के आक्रमण का प्रभाव
नादिरशाह के आक्रमण के निम्नलिखित प्रभाव पड़े–
1. नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य के विघटन को तय कर दिया.
2. मुगलों की विदेशियों में प्रतिष्ठा गिर गई.
3. मुगलों के इस आक्रमण से उनकी राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सामाजिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा.
4. ट्रांस सिन्धु क्षेत्र पर नादिरशाह का प्रभाव स्थापित हो गया, इसके साथ ही लाहौर पर से मुगलों का अधिकार समाप्त हो गया.
5. नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया. वह अपने साथ कोहिनूर, मयूर सिंहासन, 15 करोड़ रुपये नकद, हीरे, जवाहरात, हाथी, घोड़े, ऊँट और अन्य सामान भी ले गया.
6. नादिरशाह के आक्रमण ने दिल्ली को लाशों एवं राख के ढेर में बदल दिया तथा जनता की नजरों में मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा समाप्त हो गई और इसी आक्रमण से प्रेरणा लेकर अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया.
> अहमदशाह अब्दाली के भारत पर आक्रमण के कारण या पानीपत के तृतीय युद्ध के कारण
पानीपत का तृतीय युद्ध भारत के निर्णायक युद्धों में से एक है. इसने भारतीय इतिहास की दिशा को बदल दिया. इस महत्वपूर्ण युद्ध के लिए उत्तरदायी कारण निम्नलिखित थे—
1. मुगलों की पतनोन्मुख स्थिति का लाभ उठाकर मराठों में अपनी शक्ति का विस्तार उत्तर की ओर कर लिया. उनकी सीमाएँ दिल्ली एवं पंजाब को छूने लगीं तथा वे इस समय तक मुगल राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे और अब उनका प्रयास दिल्ली में मुगलों की सत्ता को समाप्त कर उस पर अपना अधिकार जमाना था.
2. नांदिरशाह के बाद अहमदशाह अब्दाली ने अफगानिस्तान पर अपना अधिकार जमा लिया और अब वह मुगलों की दुर्बलता का लाभ उठाकर भारत पर आक्रमण कर इसके धन को लूटना चाहता था.
3. इसके अतिरिक्त अब्दाली बंगेश के पठानों की सहायता करना चाहता था, क्योंकि उन्होंने हिन्दुस्तानी मुसलमानों  के विरुद्ध उससे सहायता की माँग की थी.
4. अहमदशाह अब्दाली ने 1756 ई. में भारत पर एक बड़ा आक्रमण किया और वह कश्मीर, पंजाब होता हुआ दिल्ली पहुँच गया तथा उसे जी भर कर लूटा तथा मुगल बादशाह से पंजाब, कश्मीर, सिन्ध और सरहिन्द के क्षेत्रों को ले लिया. उसने जाट राजा सूरजमल पर भी आक्रमण किया तथा उसने दिल्ली में अपना प्रतिनिधि मीरवख्शी नजीबुद्दौला को नियुक्त कर वापस चला गया.
5. 1757 ई. में मराठा सरदार रघुनाथ राव ने मराठा सेना सहित दिल्ली में प्रवेश किया तथा दादशाह ने मराठों से सन्धि कर ली और मीरवख्शी नजीबुद्दौला को उसके पद से हटा दिया गया. नजीदुद्दौला ने दिल्ली छोड़कर शुकरताल में शरण ली तथा इस घटना की सूचना उसने अब्दाली को भेज दी. मराठों ने नजीवुद्दौला के स्थान पर अहमद वंगेश को मीरवख्शी नियुक्त करवा दिया.
6. मराठों ने अब दिल्ली से आगे बढ़कर पंजाब के सरहिन्द और लाहौर पर अधिकार कर लिया तथा अब्दाली के पुत्र तैमूर को भागने पर मजबूर कर दिया. मराठों ने अदिनाबेग को पंजाब का सूबेदार नियुक्त कर दिया और 1758 ई. को मराठे वापस लौट गए.
7. 1759 ई. को अहमदशाह अब्दाली ने मराठों को नष्ट करने तथा मुगल बजीर को सबक सिखाने के उद्देश्य से दोआब और दिल्ली की ओर आगे बढ़ा, जिसे रोकने के लिए मराठों को आगे आना पड़ा और इसी का परिणाम था— पानीपत का तृतीय युद्ध.
> युद्ध का स्वरूप
अब्दाली पंजाव पर अधिकार करके जव दोआब की ओर आगे बढ़ा तब उसका मार्ग मराठा सेनापति दत्ताजी सिन्धिया ने रोका, लेकिन वे बरारी घाट के निकट हुए युद्ध में 1760 ई. में मारे गए. अव्दाली का मार्ग रोकने में मल्हारराव होल्कर एवं जानकोजी सिन्धिया भी असफल रहे तथा अब्दाली दिल्ली की ओर बढ़ता रहा.
ऐसी स्थिति में पेशवा ने सदाशिवराव भाऊ के नेतृतव में अब्दाली का मुकाबला करने के लिए एक बड़ी सेना भेजी जिसने दिल्ली पर अधिकार कर लिया. इस समय तक अब्दाली पानीपत तक पहुँच गया था. अतः मराठों ने दिल्ली छोड़कर उसका मुकाबला पानीपत के मैदान में करना उचित समझा.
लगभग एक माह तक दोनों सेनाएँ आमने-सामने डटी रहीं तथा छोटी-मोटी झड़पें होती रहीं, लेकिन 14 जनवरी, 1761 के दिन दोनों सेनाओं में भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें मराठे बुरी तरह पराजित हो गए उनके सभी महत्वपूर्ण सेनानायक मारे गए तथा हजारों सैनिकों को जान से हाथ धोना पड़ा. इस युद्ध में मराठों की शक्ति एवं देश में मराठा राज्य स्थापित करने का स्वप्न भंग कर दिया. सरदेसाई ने इस युद्ध के विषय में लिखा है कि, "मराठा देश में ऐसा कोई घर नहीं था, जिसमें किसी-न-किसी का शोक न मनाया गया हो. वास्तव में मराठों के लिए यह युद्ध राष्ट्रीय विपत्ति के समान था. "
> युद्ध का परिणाम एवं महत्व
पानीपत का तृतीय युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धों में से एक है. इस युद्ध के अनेक दूरगामी परिणाम निकले. इस युद्ध ने मराठा शक्ति को नष्ट कर दिया. उनके सभी योग्य सेनापति इस युद्ध में मारे गए. पेशवा बालाजी इस पराजय को बरदाश्त नहीं कर सके और सदमे के कारण उनकी मृत्यु हो गई. इसका एक परिणाम यह रहा कि, मराठा संघ छिन्न-भिन्न हो गया तथा पेशवा की प्रतिष्ठा कम हो गई. बचे हुए मराठा सरदारों ने अपनी स्वतन्त्र सत्ता की स्थापना कर ली.
मराठों की इस स्थिति का लाभ उठाकर सिख, जाट एवं राजपूताना के राज्य स्वतन्त्र हो गए. दक्षिण में हैदराबाद के निजाम एवं मैसूर में हैदरअली ने अपनी शक्ति का विस्तार किया.
पंजाब एवं सिन्ध से मुगलों का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो गया. स्वयं मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय की हालत इतनी खराब हो गई कि, वह 12 वर्षों तक निर्वासित जीवन व्यतीत करने पर विवश हो गया. दिल्ली में बजीर ही बादशाह की तरह शासन करता रहा.
इसी बीच अंग्रेजों ने मुगलों एवं मराठों की कमजोरियों का लाभ उठाकर बंगाल एवं कर्नाटक में अपनी सत्ता स्थापित कर ली और उत्तर भारत की ओर अपना प्रभाव बढ़ाने लगे. इस युद्ध ने यह भी प्रमाणित कर दिया कि, मुगल राज्य के पतन के बाद कम-से-कम मराठे उनका स्थान नहीं लेंगे. इस प्रकार मुसलमानों एवं मराठों की प्रतिद्वन्द्विता ने अंग्रेजों को भारत पर अधिकार जमाने का सुनहरा अवसर प्रदान कर दिया.
> मराठों के पराजय के कारण पानीपत का तृतीय युद्ध
पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) में मराठों की पराजय के निम्नलिखित कारण थे
(1) मराठा साम्राज्य विस्तार ने मराठों को अहंकारी बना दिया तथा उनमें आपसी विद्वेष की भावना घर करने लग गई. पेशवा अपने स्वार्थों की पूर्ति में ही लगा रहता था. फलतः उनके आपसी मतभेदी ने मराठों की शक्ति को कमजोर कर दिया.
(2) मराठों ने इस युद्ध से पूर्व अनेक सैनिक भूलें की. उन्होंने अब्दाली की सेना पर तुरन्त आक्रमण नहीं किया इससे अब्दाली को अपनी व्यूह रचना बनाने का अवसर मिल गया. मराठा सेना छापामार युद्ध-प्रणाली में प्रवीण थी, जबकि उन्होंने इस नीति का सहारा न लेकर अब्दाली के विरुद्ध मैदानी युद्ध लड़ा.
(3) मराठा सेना संख्या बल की दृष्टि में भी अब्दाली की सेना से कम थी. उनके पास तोपची एवं कुशल घुड़सवारों की संख्या भी अब्दाली की संख्या से कम थी. मराठा सैनिक, विभिन्न सरदारों के अधीन कार्य करते थे. अतः उनमें सामंजस्य का अभाव सदैव बना रहता था.
(4) अफगानों ने मराठा सेना के रसद पहुँचाने के मार्ग को बन्द कर दिया, जिससे उनकी स्थिति दुर्बल हो गई. इसके साथ ही उन्हें किसी भी शक्ति का समर्थन प्राप्त नहीं हो सका. मुगल बादशाह इस समय बिहार में था तथा रुहेले अवध के सूबेदार अब्दाली के समर्थक बन गए थे. राजपूत मराठों से नाराज थे. मराठों की लूटमार की नीति के कारण उन्होंने अपना जन-समर्थन भी खो दिया था.
(5) अहमदशाह अब्दाली इस सभी के विपरीत अपनी कुशल सेना और सेनापतित्व, उचित रणनीति एवं व्यूह रचना तथा अपने मित्रों के सहयोग से मराठों जैसी दुर्जेय शक्ति को कुचलने में सफल हो सका.
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Sun, 08 Oct 2023 09:12:06 +0530 Jaankari Rakho
मुगलों के पतन के कारण & राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक https://m.jaankarirakho.com/420 https://m.jaankarirakho.com/420 मुगलों के पतन के कारण - राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक

> मुगलों के पतन के कारण
मुगल साम्राज्य के पतन के लिए किसी एक कारण को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता. वरन् इसके पतन में राजनैतिक, सैनिक, आर्थिक एवं धार्मिक कारणों ने मिलकर ऐसा योग बनाया कि मुगल राज्य का पतन हो गया. मुगलों के पतन के निम्नलिखित कारण थे—
> राजनीतिक कारण
(i) उत्तराधिकार के नियम का अभाव – मुगलों ने भारत में अपना शासन शक्ति के आधार पर स्थापित किया था. अतः बाबर के बाद जितने भी मुगल शासक भारत में बने सभी ने शक्ति के बल पर राज्य प्राप्त किया था. अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब तथा उसके बाद के सभी शासकों ने अपने भाइयों, सगे-सम्बन्धियों और यहाँ तक कि अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह एवं मार-काट कर सिंहासन प्राप्त किया था. उनके दावेदारी के संघर्ष में मुगल राज्य के दरबारी, सूबेदार, मनसबदार आदि भी भाग लेते थे, जिससे दरबार में एक गुटबन्दी का निर्माण होता था. इस प्रकार के संघर्ष से मुगलों की प्रतिष्ठा, शान-शौकत एवं जन-धन की अपार क्षति हुई और विघटनकारी शक्तियों ने अवसर का लाभ उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
(ii) औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारी – औरंगजेब के बाद बनने वाले शासक बहादुरशाह - प्रथम से लेकर बहादुरशाह जफर तक सभी के सभी अयोग्य थे, उनमें दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव था तथा वे सदैव भोग-विलास में डूबे रहते थे, जिसके कारण बजीर एवं अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारी लोगों ने सत्ता को अपने अधीन कर लिया और वे शासन-निर्माता बन गए, जहाँ दाराशाह की हत्या कर दी गई, फर्रुखशियर की आँखें फोड़ दी गईं. इसी प्रकार आगे के अन्य शासकों के साथ भी दुर्व्यवहार हुआ.
(iii) प्रान्तीय सूबेदारों की महत्वाकांक्षा - औरंगजेब की मृत्यु के बाद केन्द्रीय शक्ति के कमजोर पड़ जाने के कारण महात्वाकांक्षी मुगल सूबेदारों ने अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना करने लगे तथा कमजोर बादशाहों में इतनी शक्ति नहीं थी कि ये इन्हें रोक सकें. हैदराबाद, अवध, बंगाल, मालवा, बुन्देलखड आदि राज्य स्वतन्त्र हो गए. इस प्रकार मुगल सत्ता केवल दिल्ली और उसके आस-पास ही रह गई.
(iv) दरबारी षड्यन्त्र एवं गुटबाजी – मुगल दरबार औरंगजेब की मृत्यु के बाद गुटबाजी एवं षड्यन्त्रों का महान् केन्द्र बन गया. इस समग्र दरबार में दो प्रमुख गुट हिन्दुस्तानी और मुगल में बँटा हुआ था. मुगल भी दो गुटों ईरानी और तुर्रानी में बँटे हुए थे. इन गुटों ने आपसी वैमनस्य के कारण बादशाहों को इस प्रकार भ्रमित कर दिया कि, वे समस्याओं पर ध्यान ही न दे सके और मनसबदारों ने अपनी शक्ति का विस्तार करना जारी रखा.
(v) प्रशासनिक भ्रष्टाचार – औरंगजेब के समय तक अधिकांश नियुक्तियाँ मुगल-प्रशासन में योग्यता के आधार पर होती थीं, परन्तु बाद में बादशाह की स्वयं की इच्छा एवं दबाव में नियुक्तियाँ होने लगीं. इसके कारण प्रशासनिक व्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ा और स्थानीय प्रशासन में इन अधिकारियों का हस्तक्षेप बहुत अधिक बढ़ गया, जिससे मनसबदारों एवं जागीरदारों का प्रभाव तो बढ़ा, परन्तु बादशाह का प्रभाव कम होता गया.
(vi) मुगलों का विदेशी होना – मुगल मध्य एशिया से भारत में आकर बसे थे. अतः उन्होंने मध्य एशियाई नीति के आधार पर भारत में शासन किया. प्रशासन में उन्होंने भारतीयों की उपेक्षा की. इस कारण कभी भी भारतीयों ने मुगलों को अपना नहीं समझा और जब मुगल सत्ता कमजोर पड़ी तब सिखों और मराठों ने उनके विदेशी होने का जनता में खूब प्रचार किया.
(vii) विदेशी आक्रमण – मुगलों की दुर्बल स्थिति का लाभ उठाने के लिए नादिरशाह एवं अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किए तथा भयंकर लूटपाट मचाई जिससे मुगल सत्ता का अन्त होना निश्चित हो गया, क्योंकि इन आक्रमणों ने उसकी स्थिति जर्जर बना दी थी.
(viii) भारत में यूरोपीय शक्तियों का विकास – व्यापार के बहाने यूरोपीय शक्तियों ने भारत में अपना राजनैतिक विकास करना प्रारम्भ कर दिया था. प्लासी और बक्सर के युद्धों के बाद अंग्रेजों ने अपनी पकड़ बंगाल पर मजबूत कर ली और अन्त में अंग्रेजों ने मुगल बादशाह को पेंशन भोक्ता बनाकर 1857 ई. में उसकी सत्ता सदा के लिए समाप्त कर दी.
> सैनिक कारण
भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना ही सैनिक शक्ति के बल पर हुई थी. अतः उनकी जब तक भारत में सैनिक श्रेष्ठता बनी रही उनका शासन बना रहा. सम्पूर्ण मुगल सत्ता का स्वरूप सैन्य संगठन पर आधारित था. इस व्यवस्था में केन्द्रीय सत्ता का सुदृढ़ होना आवश्यक था. अतः केन्द्रीय सत्ता के दुर्बल पड़ते ही मुगल साम्राजय बिखरने लगा. 
मुगल सैन्य संगठन में मनसबदारी व्यवस्था थी, जिसमें सेना की स्वामिभक्ति साम्राज्य पर नहीं, बल्कि उसके मनसबदार से जुड़ी होती थी. मुगल सेना में विभिन्न प्रदेशों जातियों एवं अलग राष्ट्रीयता वाले सिपाही एवं अधिकारी थे, जोकि संकट के समय में भी कभी एकजुट नहीं रह सकते थे. 
मुगल सेना में विलासिता ने भी प्रवेश कर लिया था. सेनापति अपने साथ महिलाओं को लेकर चलते थे. इसके साथ मुगल सेना की अन्य अनेक कमजोरियाँ भी थीं, जैसे— नौसेना का अभाव, केवल मैदानी युद्धों में ही सेना का पारंगत होना तथा पुराने जमाने के अस्त्र-शस्त्रों की प्रधानता ने मुगल सेना को कमजोर बना दिया था.
> धार्मिक कारण
बाबर, हुमायूँ और अकबर ने धर्मनिरपेक्षता की नीति का ही अनुसरण किया, लेकिन धीरे-धीरे यह नीति संकीर्ण होती रही और औरंगजेब के समय यह अपने चरम पर पहुँच गई. इससे अधिकांश हिन्दू जनता मुगल विरोधी बन गई. फलतः जाट, सतनामी, मराठा एवं सिख विद्रोह धार्मिक कारणों से ही हुए.
> आर्थिक कारण
औरंगजेब द्वारा लगातार लड़े गए युद्धों एवं विद्रोहों को दबाने के कारण उसका राजकोष रिक्त हो गया, जिसे भरने का प्रयास सही ढंग से नहीं हो सका. मुगलों की आमदनी का मुख्य स्रोत कृषि राजस्व था, किन्तु केन्द्रीय सत्ता के कमजोर पड़ते ही उसे वसूलना कठिन हो गया और क्षेत्रीय शक्तियों के उदय के कारण मुगल राज्य की आय भी कम होने लगी. ऐसी स्थिति में सैन्य खर्च एवं मनसबदारों के बड़े-बड़े वेतन का भुगतान सम्भव नहीं रहा और राज्य का विघटन निश्चित हो गया.
इन कारणों के अतिरिक्त मुगल साम्राज्य की विशालता, आवागमन के साधनों का अभाव, दोषपूर्ण सामाजिक संरचना एवं व्यवस्था, शान्ति एवं सुरक्षा का अभाव तथा औरंगजेब की दोषपूर्ण नीतियाँ भी मुगलों के पतन का प्रमुख कारण रहीं.
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Sun, 08 Oct 2023 09:10:28 +0530 Jaankari Rakho
विस्तार एवं संगठन — अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब https://m.jaankarirakho.com/419 https://m.jaankarirakho.com/419 विस्तार एवं संगठन — अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगजेब

> बैरमखाँ के पतन के कारण
बैरमखाँ के पतन के निम्नलिखित कारण थे - 
1. बैरमखाँ स्वभाव से अत्यन्त क्रोधी, दम्भी, ईर्ष्यालु एवं क्रूर था. असीम सत्ता का मालिंक होने के कारण वह किसी की परवाह नहीं करता था. हालांकि उसमें अनेक चरित्रिक गुण भी थे, परन्तु धीरे-धीरे उसके कार्यों से मुगल अमीर वर्ग नाराज हो गया.
2. मुगल दरबारियों ने अकबर बैरमखाँ के सम्बन्ध में कड़वाहट घोलं दी. इससे अकबर स्वयं बैरमखाँ से मुक्त होने के लिए उतारू हो गया. इससे षड्यन्त्र -कारियों में अतका खेल के सदस्यों; जैसे—माहम अनगा, जीजी अनगा, हमीदाबानू बेगम आदि का प्रमुख हाथ था.
3. बैरमखाँ शिया-सम्प्रदाय से सम्बन्धित था, जबकि मुगल कट्टर सुन्नी थे. अतः दोनों में मतभेद होना स्वाभाविक था. सुन्नी मुगल जिनकी संख्या अधिक थी, बैरमखाँ द्वारा शिया मत के लोगों को ऊँचे-ऊँचे पदों पर बैठातें देख नहीं सकते थे.
4. मुगल दरबार में ईरानी और तुर्रानी वैमनस्य काफी अधिक था, बैरमखाँ स्वयं ईरानी था. अतः उसने महत्वपूर्ण पदों पर ईरानी लोगों को नियुक्त किया था, इससे मुगलों का तुर्रानी वर्ग बैरम खाँ से नाराज हो गया.
5. अपने जीवन के प्रारम्भ में बैरमखाँ ने असाधारण सैनिक प्रतिभा का परिचय दिया था. पानीपत के युद्ध में मुगलों को विजय प्रत्यक्षतः बैरमखाँ के कारण ही मिली, परन्तु उसके चुनार और रणथम्भौर अभियान पूर्ण रूप से असफल रहे. इससे मुगलों की प्रतिष्ठा को आधात लगा अतः अकबर ने बैरम खाँ को हटाना ही उचित समझा.
6. धीरे-धीरे अकबर बड़ा होता जा रहा था और उसे अब किसी संरक्षक के अधीन कार्य करना पसन्द नहीं था. अब वह समस्त कार्यों को अपने हाथ में लेना चाहता था. अकबर को अपने खर्च के लिए बैरमखाँ से पर्याप्त धन नहीं मिल पाता था. बैरमखाँ ने अकबर के महावत की हत्या कर दी थी, कभी- कभी बैरमखाँ अत्यन्त ही महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं अकेले ही ले लेता था तथा केवल मात्र स्वीकृति के लिए उसे अकबर के पास भेज देता था. सदर के पद पर शेख गदाई की नियुक्ति को भी अकबर पसन्द नहीं करता था.
इसी के मध्य अकबर को यह आशंका उत्पन्न हो गई कि बैरम खाँ कामरान के पुत्र मिर्जा अबुल कासिम जोकि शया मतावलम्बी था, को बैरम खाँ गद्दी पर बिठाकर अकबर को गिरफ्तार करना चाहता है. इन सब कारणों से प्रेरित होकर अकबर ने बैरम खाँ को हटाकर सम्पूर्ण सत्ता अपने हाथ में लेने का निर्णय किया.
> पेटीकोट सरकार : टिप्पणी
1560 ई. से लेकर 1564 ई. तक अकबर जिन लोगों के संरक्षण में था उसमें हरम की स्त्रियों का प्रमुख स्थान था. अतः इतिहासकार उसके शासन के इस काल को पेटीकोट सरकार या पर्दा शासन की संज्ञा देते हैं. पेटीकोट सरकार के सदस्यों में माहम अनगा जो अकबर की धाय माँ थी, का प्रमुख स्थान था.
उसने महत्वपूर्ण पदों पर अपने समर्थकों की नियुक्तियाँ कीं तथा नागरिक एवं सैनिक प्रशासन में अनेक परिवर्तन किये. वह सदैव अपने स्वार्थों की पूर्ति में ही लगी रही तथा उसने राज्य के हितों को कभी ध्यान नहीं दिया.
इस सरकार के अन्य सदस्यों में माहम अनगा का पुत्र आधम खाँ, जीजी अनगा एवं उसका पति शमसुद्दीन प्रमुख थे. इन लोगों को हमीदाबानू बेगम, दिल्ली के गवर्नर शिहाबुद्दीन तथा मुल्ला पीर मोहम्मद का समर्थन एवं सहयोग प्राप्त था. आधम खाँ ने शमसुद्दीन अनगा की हत्या करवा दी.
इस घटना से अकबर अत्यन्त दुःखी एवं क्रोधित हो गया तथा उसने आधम खाँ की हत्या करवा दी तथा उसके कुछ दिनों बाद ही माहम अनगा की मृत्यु हो गई. माहम अनगा की मृत्यु के साथ ही अतका खैल या पर्दा शासन का प्रभाव अकबर के ऊपर से समाप्त हो गया और अब वह सही अर्थों में शासक बन गया.
> अकबर के शासनकाल के प्रारम्भिक विद्रोह :  टिप्पणी
अकबर को अपने शासनकाल में तीन प्रमुख विद्रोहों का सामना करना पड़ा –
(1) अब्दुल्ला खाँ उज्बेग का विद्रोह – अब्दुल्ला खाँ को 1562 ई. में पीर मुहम्मद के स्थान पर अकबर ने मालवा का सूबेदार नियुक्त किया था, परन्तु उसने यहाँ आकर अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने का प्रयास किया. अतः 1564 ई. में अकबर ने स्वयं मालवा पर आक्रमण किया. अतः अब्दुल्ला खाँ भागकर पहले गुजरात और उसके बाद जौनपुर चला गया. जौनपुर में ही अब्दुल्ला खाँ की 1565 ई. में मृत्यु हो गई. अब मालवा में बहादुर खाँ को सूबेदार बनाया गया.
(2) खानज़माँ का विद्रोह-जौनपुर में 1565 ई. में खान जमाँ जोकि उज्वेगों का नेता था ने विद्रोह कर दिया. उसके बंगाल के शासक सुलेमान कर्रानी से भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे. अतः अकबर ने जौनपुर पर आक्रमण कर दिया और उसका उस पर अधिकार हो गया तथा खान जमाँ पटना की तरफ भागने को विवश हो गया, लेकिन मुनीम खाँ के प्रयासों से अक़बर ने खान जमाँ और उसके साथियों को क्षमा कर दिया.
(3) मिर्जा हकीम का विद्रोह–मिर्जा हकीम अकबर का भाई एवं काबुल का स्वतन्त्र शासक था. जब उस पर बदख्सां के शासक सुलेमान मिर्जा ने आक्रमण किया. तब उसने अकबर से सहायता माँगी और अकबर ने उसे सहायता देने का आश्वासन भी दिया, लेकिन इसी बीच उज्बेगों ( खान जमाँ ) के विद्रोह का लाभ उठाकर उसने पंजाब पर आक्रमण कर दिया और उसे अपने अधिकार में कर स्वयं को बादशाह घोषित कर दिया तथा खुतबा पढ़वाया. उसे विद्रोही खान जमाँ ने भी अपना समर्थन प्रदान किया.
अतः अकबर 1566 ई. को विद्रोह का दमन करने के उद्देश्य से लाहौर जाना पड़ा मिर्जा हकीम काबुल भाग गया इसी के बीच सम्भल के उज्बेगों ने भी विद्रोह कर दिया. अकबर के लिए यह कठिन समय था, परन्तु उसने परिस्थितियों का धैर्यपूर्वक मुकाबला किया और 1567 ई. में उसने फतेहपुर परसोकी नामक स्थान पर विद्रोहियों को बुरी तरह पराजित कर दिया खान जमाँ मारा गया. खान बहादुर की हत्या कर दी गई. इस प्रकार स्पष्ट है कि अकबर ने अपने आन्तरिक विद्रोहियों का दमन कर सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली.
> अकबर के सैनिक अभियानों का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए. : टिप्पणी
अकबर के सैनिक उद्देश्य निम्नलिखित थे –
अकबर के समकालीन इतिहासकार अबुल फजल के अनुसार, “अकबर की विजय-नीति का मुख्य उद्देश्य स्थानीय भारतीय राजाओं और शासकों के अत्याचारों से उत्पीड़ित जनता को अपने संरक्षण में लेकर उन्हें अत्याचारों और उत्पीड़नों से सुरक्षा प्रदान कर सुख एवं शान्ति का जीवन व्यतीत करने का अवसर प्रदान करना था." आधुनिक इतिहासकार अबुल फजल के इस विचार को सत्यता से परे मानते हैं.
जबकि कुछ इतिहासकारों ने अकबर के साम्राज्यवादी दृष्टिकोण को धार्मिक नजरिये से देखा है, जो वस्तुतः असंगत प्रतीत होता है. उसके साम्राज्यवाद का दृष्टिकोण पूरे भारत को अपने अधीन करना था.
जिस समय अकबर ने सत्ता सँभाली उस समय मुगलों के भारत में अनेक प्रतिद्वन्द्वी थे. यदि उस समय सभी प्रभावशाली राज्यों पर अपना नियन्त्रण यदि नहीं रखता, तो उसे अपने राज्य से हाथ धोना पड़ सकता था. अतः अकबर को अपने राज्य की रक्षा एवं राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों से भारत की सत्ता को बचाये रखने के लिए उसे साम्राज्यवादी नीति का सहारा लेना पड़ा.
हुमायूँ की मृत्यु के बाद से राजकोष रिक्त पड़ा था, प्रशासनिक व्यवस्था नष्ट हो चुकी थी और सैनिक संगठन भी अत्यन्त दुर्बल हो गया था. अतः अकबर को इन सबके लिए बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता थी. अपने इस उद्देश्य की पूर्ति वह बड़ी आसानी से राज्य विस्तार नीति का अनुसरण करके कर सकता था. फलतः अकबर ने साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण किया.
> अकबर की विजयों और उसके सैनिक अभियानों का विस्तार से विवेचन 
अकबर के साम्राज्य विस्तार को हम तीन भागों में बाँटकर अध्ययन कर सकते हैं।
> प्रथम चरण (1556 ई. से 1560 ई. तक 56 ई. से 1560 ई. तक) 
पानीपत के द्वितीय युद्ध (1556 ई.) में विजय प्राप्त करने के बाद अकबर का दिल्ली एवं आगरा पर अधिकार हो गया, परन्तु इस समय मुगलों को सर्वाधिक खतरा अफगानों से था. अतः बैरम खाँ, जोकि इस काल में अकबर का संरक्षक था, ने अफगानों के विरुद्ध अभियान प्रारम्भ किये. उसने सिकन्दर सूर को पराजित कर मानकोट का किला एवं इब्राहीम सूर से जौनपुर छीन लिया. इसी तरह बैरम खाँ ने अभियान कर सम्भल, लखनऊ और बनारस पर अधिकार कर वहाँ अकबर का शासन स्थापित किया. मेवात, ग्वालियर, अजमेर भी बैरम खाँ ने जीत लिए. इस प्रकार कहा जा सकता है कि अकबर ने अपने शासन के प्रारम्भ में जो विजयें प्राप्त कीं वास्तव में वे समस्त विजयें उसके संरक्षक बैरम खाँ ने उसके लिए जीतीं थीं. इन विजयों के फलस्वरूप अकबर का राज्य पूर्व में बिहार तथा पश्चिम में मालवा तक विस्तृत ही गया.
> द्वितीय चरण (1560 ई. से 1579 ई. तक)
अकबर ने बैरम खाँ से मुक्ति पाकर इस काल में उसने मालवा, जौनपुर, चुनार, जयपुर, मेड़ता, गोंडवाना, मेवाड़, रणथम्भौर, कालिंजर, गुजरात, बंगाल एवं बिहार पर विजय प्राप्त की जिनका विवरण निम्नलिखित है - 
> मालवा
अकबर का समकालीन यहाँ का शासक बाज बहादुर था. यहाँ का शासक अपनी प्रेमिका रूपमती एवं संगीत में निरन्तर खोया रहता था. उसे राज-कार्य की ओर ध्यान देने का कोई लगाव नहीं था. ऐसे में इस पर अकबर ने 1560 में आधम खाँ को मालवा विजित करने का कार्य सौंपा जिसने उसकी राजधानी माण्डु पर अधिकार कर लिया, लेकिन कुछ समय बाद बाज बहादुर ने पुनः इस पर कब्जा जमा लिया. इस पर 1562 ई. में अकबर ने अब्दुल्ला खाँ उज्बेग को को पूर्ण रूप से अब्दुल्ला द्वारा पराजित कर दिया गया. कुछ मालवा पर अधिकार करने के लिए भेजा, अब बाज बहादुर समय तक बाज बहादुर इधर-उधर शरण लेता रहा और अन्त में 1570 ई. में उसने नागौर में अकबर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया तथा अकबर ने बाज बहादुर को अपना मनसबदार नियुक्त कर दिया.
> जौनपुर
तब अकबर जब अपने मालवा अभियान में व्यस्त था, मुहम्मद आदिलशाह सूर के पुत्र शेर खाँ ने जौनपुर पर चढ़ाई कर दी. इसलिए, अकबर ने जौनपुर के सूबेदार खान जमाँ को तुरन्त सैनिक सहायता भेजी और खान जमाँ ने अफगानों को भगा दिया, लेकिन इससे खान जमाँ का साहस बढ़ गया और वह स्वतन्त्र शासक की तरह व्यवहार करने लगा. अतः 1562 ई. में अकबर ने स्वयं जौनपुर पर अधिकार कर लिया.
> चुनार
बिहार और उत्तर प्रदेश की बीच सीमा पर स्थित सामरिक महत्व के इस दुर्ग पर अकबर के सेनानायक आसफ खाँ ने 1561 ई. में अधिकार कर लिया.
> जयपुर
1563 ई. में जब अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के दर्शन के लिए अजमेर जा रहा था, तब आमेर के राजा भारमल ने स्वेच्छा से उसकी अधीनता स्वीकार कर ली और अपनी पुत्री का विवाह अकबर से कर दिया. बदले में अकबर ने उसे अपना मनसबदार नियुक्त कर दिया. उसके पुत्र भगवानदास एवं पौत्र मानसिंह को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किये, इससे अकबर को आगे चलकर अनेक लाभ प्राप्त हुए.
> मेड़ता
उदयपुर राज्य के अन्तर्गत मेड़ता का राज्य था. अतः 1562 ई. में अकबर ने इसे अपने राज्य में मिला लिया. 
> गोंडवाना
गोंडवाना मध्य प्रदेश का एक शक्तिशाली राज्य था तथा यहाँ की शांसिका रानी दुर्गावती थी, जो अपने अल्पवयस्क पुत्र वीर नारायण की संरक्षिका थी. 1564 ई. में धन प्राप्ति की आशा में मुगल सेना ने आसफ खाँ के नेतृत्व में आक्रमण किया. रानी दुर्गावती ने मुगलों का कड़ा प्रतिरोध किया, लेकिन घायल हो गईं और उसने आत्महत्या कर ली. उसका पुत्र वीर नारायण युद्ध में ही मारा गया और गोंडवाना पर मुगलों का अधिकार हो गया.
> रणथम्भौर
इस समय यहाँ का शासक सुर्जन राय था. पहले इसने मुगल सेना का कड़ा प्रतिरोध किया, लेकिन आमेर के राज्य भगवानदास एवं मानसिंह के कहने पर उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली. 
> चित्तौड़
अकबर के समकालीन चित्तौड़ का शासक सिसोदिया वंशी राणा उदयसिंह था, जो राजपूतों का सबसे शक्तिशाली राज्य था. इसने जब अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की तब 1567 ई. में अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया. उदयसिंह मुगलों से वीरतापूर्वक लड़ा और अन्त में वह जंगलों में जाकर छिप गया. उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र महाराणा प्रताप ने भी मुगलों से लोहा लिया और 1576 ई. में हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध लड़ा जिसमें राणा ने पराजित होने के बाद भी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और अपने पूरे जीवन तक मुगलों से संघर्ष करता रहा.  
> कालिंजर
1569 ई. में ही अकबर ने रामचन्द्र को पराजित कर इसके अभेध दुर्ग पर अधिकार कर लिया.
> मारवाड़
1570 ई. में जब अकबर अपनी अजमेर यात्रा के दौरान नागौर रुका, तो वहाँ जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर के शासकों ने उपस्थित होकर अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा बीकानेर और जैसलमेर के राज्यों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये. इस प्रकार मारवाड़ अकबर के अधीन हो गया.
> गुजरात
अकबर ने गुजरात पर आक्रमण वहाँ के बजीर एतमाद खाँ के निमन्त्रण पर नवम्बर 1571 ई. में किया और उसने अहमदाबाद पर अधिकार कर लिया और मिर्जा अजीज कोका को उत्तरी गुजरात का एवं एतमाद खाँ को दक्षिणी गुजरात का प्रशासक नियुक्त कर दिया. इसके बाद अकबर खम्भात की ओर बढ़ा जहाँ पुर्तगाली एवं अन्य व्यापारियों ने अकबर के सुमक्ष उपस्थित होकर अकबर की अधीनता को स्वीकार कर लिया.
लेकिन इसी समय मिर्जा इब्राहीम हुसैन ने विद्रोह कर दिया और भड़ौंच पर अधिकार कर लिया, लेकिन अकबर ने बड़ी ही वीरता से उनको 1572 ई. में करनाल के युद्ध में पराजित कर दिया और भड़ौंच एवं सूरत पर अधिकार कर लिया तथा गुजरात की व्यवस्था कर वह राजधानी लौट गया. 
अकबर के राजधानी लौटते ही अबीसीनियों, अफगानों और मिर्जाओं ने विद्रोह कर दिया. मुहम्मद मिर्जा ने खम्भात और भड़ौंच पर अधिकार कर लिया तथा अहमदाबाद को घेर लिया. इस समय अकबर सीकरी में था तथा विद्रोह की सूचना पाते ही वह तुरन्त अहमदाबाद तेजी से रवाना हुआ और ग्यारह दिनों में साबरमती नदी पार कर उन पर आक्रमण कर दिया. विद्रोही संगठित नहीं हो पाये तथा पराजित हो गये तथा हुसैन मिर्जा और इख्तियार उल-मुल्क युद्ध-क्षेत्र में ही मारे गये. अहमदाबाद पर पुनः अकबर का अधिकार हो गया.
> बंगाल तथा बिहार
अकबर का समकालीन बंगाल एवं बिहार का अफगान शासक सुलेमान करमानी था, लेकिन 1572 ई. में उसकी मृत्यु के बाद नये शासक दाऊद ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और शाह की उपाधि धारण की तथा खुतबा पढ़वाया. अतः अकबर ने मुनीम खाँ को दाऊद पर आक्रमण करने का आदेश दिया.
मुनीम खाँ ने पटना एवं हाजीपुर पर अधिकार कर लिया तथा मुजफ्फर खाँ तुरबाती को इस क्षेत्र का प्रशासक नियुक्त किया. अब मुनीम खाँ अपनी राजधानी ताण्डा की तरफ भाग गया. मुनीम खाँ ने उसका पीछा जारी रखा तथा उसके समस्त क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया. अतः अब दाऊद ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली तथा उसे उड़ीसा का गवर्नर नियुक्त कर दिया.
इसी बीच मुनीम खाँ की मृत्यु गई. अतः दाऊद ने इसका लाभ उठाकर विद्रोह कर दिया और टाँडा पर पुनः अधिकार कर लिया.
अतः बंगाल के नये गवर्नर हुसैन कुली खान-ए-जहाँ ने दाऊद खाँ को 1576 ई. में राजमहल के युद्ध में दाऊद को पराजित कर उसकी हत्या कर दी गई. इसके साथ ही अफगानों के स्वतन्त्र राज्य का अन्त हो गया.
> तृतीय चरण (1579 ई. से 1605 ई. तक)
> उड़ीसा के अफगानों का दमन
उड़ीसा पर मानसिंह के नेतृत्व में अनेक आक्रमण किये गये, लेकिन 1592 ई. में मानसिंह ने अफगान नेता निसार खाँ को पराजित कर उसे उड़ीसा से बाहर खदेड़ दिया तथा खुर्दा के शासक राजा रामचन्द्र देव को 'गजपति’ एवं ‘उड़ीसा के राजा' ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली.
> काबुल
अकबर का भाई हकीम मिर्जा उसके विरुद्ध काबुल में निरन्तर षड्यन्त्र कर रहा था तथा अनेक मुगल पदाधिकारी उसे अकबर के स्थान पर भारत का शासक बनाना चाहते थे. 1581 ई. में मिर्जा ने पंजाब पर आक्रमण कर दिया, लेकिन पराजित होकर वह वापस काबुल भागा. इस पर स्वयं अकबर और मानसिंह ने उसका पीछा किया तथा अनेक विद्रोहियों की हत्या करवा दी गई. 1585 ई. में हकीम मिर्जा की मृत्यु हो गई. अतः काबुल को मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया.
> कश्मीर 
कश्मीर में शाह चक की मृत्यु के बाद बने नये शासक युसुफ ने अकबर के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. इस पर अकबर ने भगवानदास को कश्मीर विजय के लिए भेजा. भगवानदास ने युसुफ को पराजित कर बन्दी बना लिया तथा कश्मीर पर इससे मुगलों का अधिकार हो गया. 
> सिन्ध
अब्दुर्रहीम खानखाना के नेतृत्व में मुगल सेना ने 1591 ई. में, सिन्ध के शासक मिर्जा जानी को पराजित कर उसे अकबर की अधीनता स्वीकार करने को बाध्य कर दिया. सिन्ध को मुगल राज्य में मिला लिया गया तथा मिर्जा जानी को मुगल मनसबदार बना दिया गया.
> खानदेश
खानदेश को उस समय दक्षिण का प्रवेश द्वार कहा जाता था. इस राज्य पर 1577 ई. में अकबर ने अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारम्भ किया और एक बड़ी फौज भेजी. इस पर यहाँ के शासक अली खाँ ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली अकबर ने खानदेश का नाम बदलकर धनदेश कर दिया.
> अहमदनगर
अकबर ने जिस समय अहमदनगर पर आक्रमण किया उस समय यहाँ उत्तराधिकार के लिए संघर्ष हो रहा था तथा चाँदबीबी यहाँ की वास्तविक शासिका थी. 1593 ई. में शाहजादा मुराद ने अहमदनगर पर 1593 ई. में आक्रमण किया, किन्तु विफल रहा. अतः दोनों पक्षों में सन्धि हो गई ओर बुरहान-उल-मुल्क को सुल्तान स्वीकार कर लिया गया तथा बुरहान ने मुगलों को धन एवं बरार का क्षेत्र सौंप दिया.
अहमदनगर के सरदारों ने इस सन्धि को जब मानने से इन्कार कर दिया तब मुराद की मृत्यु के बाद शाहजादे दानियाल ने आक्रमण जारी रखा तथा 1600 ई. में उसने अहमदनगर पर अधिकार कर लिया तथा चाँदबीबी की हत्या उसी के आदमियों ने कर दी व अहमदनगर के अल्पवयस्क सुल्तान को ग्वालियर दुर्ग में कैद कर लिया गया.
> असीरगढ़ विजय
अकबर ने खानदेश के नये शासक अली खाँ के पुत्र मीरनशाह के अधीनता स्वीकार न करने पर, खानदेश पर आक्रमण कर दिया तथा उसके शक्तिशाली दुर्ग असीरगढ़ पर अपना अधिकार कर लिया मीरन को गिरफ्तार कर, उसे पेंशन देकर ग्वालियर भेज दिया गया. यह अकबर की अन्तिम विजय थी.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अकबर ने अपने जीवनकाल में एक विशाल साम्राज्य का अपनी विजयों द्वारा निर्माण किया. उसके साम्राज्य की सीमा उत्तर-पश्चिम में काबुल से लेकर पूर्व में बंगाल तक एवं उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में अहमदनगर तक विस्तृत हो गयी और इस निर्माण कार्य में अकबर ने दृढ़ इच्छा शक्ति, धैर्य तथा सैनिक प्रतिभा और कूटनीतिज्ञता का अद्भुत परिचय अकबर ने दिया और इन्हीं कारणों से वह एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर सका.
> राजपूत नीति को प्रभावित करने वाले 
अकबर की राजपूत नीति को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित तत्व थेअकबर की कारक
अकबर के स्वयं का राजपूतों के प्रति दृष्टिकोण — अकबर स्वयं राजपूतों की वीरता और स्वामिभक्ति से अत्यन्त प्रभावित था. उसका जन्म विषम परिस्थितियों में हुआ था तथा राजपूत शासक राणा वीरशाल ने अकबर और हुमायूँ की, जो सहायता की थी उसे अकबर भूल नहीं सकता था. उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार वह करना चाहता था इसके साथ ही अकबर में धार्मिक उदारता की भावना भी थी. अकबर यह भी जानता था कि लालची व स्वार्थी मुगल अमीरों की तुलना में वीर, साहसी, स्वामिभक्त और वचन के पक्के राजपूतों से मैत्री करना अधिक अच्छा है.
राजपूताना की भौगोलिक स्थिति - राजपूताना की सीमाएँ दिल्ली और आगरा से सटी हुई थीं तथा यहाँ के शासकों द्वारा राजधानी पर आक्रमण की सम्भावनाएँ सदैव बनी रहती थीं. अतः अपनी राजधानी और पूरे साम्राज्य की सुरक्षा के लिए राजपूतों से मित्रता करनी आवश्यक थी.
सैनिकों की प्राप्ति का स्थल राजपूताना-अकबर की सेना में मुख्य रूप से मध्य एशियाई क्षेत्रों के सैनिकों की संख्या अधिक थी. ये लोग विदेशी होने के कारण यहाँ के निवासियों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रखते थे तथा अक्सर क्रूरता का व्यवहार किया करते थे. विदेशी सैनिकों का यह भी दम्भ रहता था कि शासन उन्हीं के दम पर टिका हुआ है. अतः अकबर से भी उनका व्यवहार मर्यादोचित नहीं रहता था ऐसी स्थिति में अकबर अपनी सेना में राजपूतों को लेकर उन पर प्रभावी नियन्त्रण स्थापित कर सकता था. 
अकबर के साम्राज्य विस्तार में सहायक – अकबर यह जानता था कि राजपूत हिन्दू जाति के स्वाभाविक नेता थे तथा यदि अपने राज्य को इस देश में बचाये रखना है, तो राज्य विस्तार में उनका सहयोग आवश्यक था, क्योंकि वह राजपूतों को राजपूतों की सहायता से ही अधिकार में लेना चाहता था.
मुगल अमीरों की शक्ति पर अंकुश रखने में सहायकमुगल अमीर स्वभाव से ही स्वार्थी प्रकृति के थे उन्होंने अकबर के विरुद्ध कई बार षड्यन्त्र किया और यहाँ तक कि उसे गद्दी से हटाने का भी प्रयास किया. अतः अकबर उनका एक प्रतिद्वन्द्वी गुट तैयार करना चाहता था, जो राजपूतों के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं हो सकता था.
भारतीयों का विश्वास प्राप्त करना – भारतीय अभी भी मुगलों को विदेशी एवं लुटेरा समझते थे अर्थात् भारतीय जनता की सहानुभूति मुगलों के साथ नहीं थी. अतः अकबर राजपूतों का सहयोग प्राप्त कर अधिकांश हिन्दुओं का समर्थन प्राप्त करना चाहता था.
इस प्रकार स्पष्ट है कि अकबर राजपूतों के प्रति उदार नीति अपनाने को विवश था तथा उसने सभी सम्भव उपायों द्वारा राजपूतों से मित्रता करने का प्रयास किया.
> अकबर की राजपूत-नीति का स्वरूप निर्धारित कीजिए
अकबर की राजपूत नीति के स्वरूप को निम्नलिखित तीन भागों में बाँटा जा सकता है –
(1) ऐसे राज्य जिन्होंने स्वतः ही अधीनता को स्वीकार कर लिया था.
(2) ऐसे राज्य जिन्होंने आरम्भ में विरोध किया, परन्तु बाद में उसकी शक्ति देखकर अधीनता स्वीकार कर ली.
(3) ऐसे राज्य जिन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की.
प्रथम श्रेणी के ऐसे राज्यों में जयपुर, जैसलमेर एवं बीकानेर को रखा जा सकता है, इन राज्यों ने अकबर की स्वतः ही अधीनता स्वीकार की तथा अपनी पुत्रियों का विवाह उससे कर दिया. प्रतिकार के बदले अकबर ने इन राज्यों के राजाओं को अपने साम्राज्य में अनेक अच्छे-अच्छे पद उनकी योग्यता के आधार पर दिये. डॉ. वेणीप्रसाद ने इस प्रकार के विवाह के महत्व के विषय में लिखते हैं, "यह भारतीय राजनीति में एक नये उद्घाटन का प्रतीक है. इसने देश को विलक्षण सम्राटों की परम्परा प्रदान की. इसने मुगल सम्राटों की चार पीढ़ियों को कुछ महानतम् सेनापति और राजनीतिज्ञ भी दिये.”
राजपूतों को अपनी ओर मिलाने के लिए उन्हें दरबार मुगल प्रशासन एवं सेना में महत्वपूर्ण पद प्रदान किये तथा सेना में भी बड़ी संख्या में राजपूतों को भर्ती किया गया. भारमल, भगवानदास, मानसिंह, टोडरमल, बीरबल आदि को अकबर ने अपने नवरत्नों में शामिल किया.
अकबर ने राजपूतों के लिए उदार नीति का अनुसरण किया उसने हिन्दुओं पर लगाये जाने वाले जजिया एवं तीर्थ यात्रा कर को हटा दिया तथा जबरदस्ती मुसलमान बनाने पर मनाही कर दी.
इन सब कार्यों के अतिरिक्त अकबर ने अनेक हिन्दू त्यौहारों; जैसे—दशहरा, होली, दीपावली आदि को दरबार में मनाना प्रारम्भ कर दिया तथा स्वयं हिन्दुओं के समान तिलक लगाने लगा.
अकबर ने बाल-विवाह, सती प्रथा आदि पर प्रतिबन्ध लगाने के साथ-साथ पशुबलि रोकने, अन्तरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने तथा छुआछूत को समाप्त करने का भी प्रयास किया. यद्यपि ये अकबर के सुधार कार्य हिन्दू समाज पर स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ सके.
ऐसे राजपूत राज्य जिन्होंने अकबर की अधीनता सीधे स्वीकार नहीं की उनके विरुद्ध अकबर ने सैनिक कार्यवाही की तथा उनके राज्य मुगल साम्राज्य में मिला लिए गए, जैसे 1562 ई. में मेड़ता को ठीक इसी प्रकार रणथम्भौर, कालिंजर एवं गढ़ कटंगा पर भी सैनिक अभियान किये गये.
अकबर का विरोध करने वाले राजपूत राज्यों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली राज्य चित्तौड़ था. यह राज्य उन सभी राज्यों से घृणा करता था, जिन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार की थी. अतः अकबर ने चित्तौड़ पर अपना अधिकार करने के लिए 1567 ई. में एक बड़ा अभियान कर उस पर अधिकार कर लिया, लेकिन यहाँ के शासक उदयसिंह को अपने अधीन नहीं कर सका.
उदयसिंह की मृत्यु के बाद राणाप्रताप ने मुगलों से संघर्ष जारी रखा और 1576 ई. का प्रसिद्ध हल्दीघाटी युद्ध लड़ा जिसमें राणा के पराजित होने पर भी मृत्यु पर्यन्त मेवाड़-मुगल संघर्ष चलता रहा. राणाप्रताप की मृत्यु के बाद भी उनके पुत्र अमरसिंह ने इस संघर्ष को जारी रखा.
इस प्रकार स्पष्ट है कि अकबर ने अपनी दूरदर्शिता का प्रयोग कर राजपूतों को अपना प्रबल समर्थक एवं मित्र बना लिया तथा जब तक उसके उत्तराधिकारियों ने उसकी नीतियों रहा. का अनुसरण किया उन्हें राजपूतों का सहयोग बराबर मिलता
> अकबर की राजपूत नीति: महत्व (टिप्पणी)
बनाने की दृष्टि से अकबर की राजपूत नीति महत्वपूर्ण स्थान मुगल राज्य के विस्तार एवं उसको भारत में स्थायी रखती है तथा उसकी इस नीति के परिणाम बड़े ही दूरगामी निकले. भारतीय समाज, राजनीति, धर्म एवं संस्कृति के सभी क्षेत्रों पर इस नीति का प्रभाव पड़ा.
अकबर की इस नीति के कारण ही अफगान जोकि मुगलों के प्रतिद्वन्द्वी थे, को भारत की सत्ता से स्थायी रूप से वंचित हो जाना पड़ा और मुगल भारत में स्थायी रूप से जम गये. उनकी सत्ता को भारत में चुनौती देने वाला कोई नहीं रहा.
अकबर की राजपूत नीति ने हिन्दुओं और मुसलमानों के मध्य एकता, निकटता तथा सद्भावना का विकास किया और परिणाम यह निकला कि धार्मिक तनाव का वातावरण दूर हो हिन्दू और मुसलमान दोनों ने मिलकर राज्य की सेवा की तथा अकबर को सम्पूर्ण राष्ट्र का सम्राट कहा जाने लगा.
इस नीति के परिणामस्वरूप सांस्कृतिक समन्वय का युग प्रारम्भ हुआ. मुगलों ने हिन्दुओं के और हिन्दुओं ने मुगलों के तौर-तरीकों, रीति-रिवाजों, वस्त्र-आभूषणों, खान-पान एवं भाषा आदि को स्वेच्छा से अपना लिया. फारसी के साथ-साथ संस्कृत भाषा का का प्रयोग बढ़ने लगा. दरबार में हिन्दू त्यौहार उसी तरह मनाये जाते थे जिस तरह से मुस्लिम पर्व. अकबर ने स्वयं तिलक लगाना प्रारम्भ कर दिया.
अकबर की राजपूत नीति ने शान्ति व्यवस्था, सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था और आर्थिक विकास में मदद की. अकबर ने टोडरमल की मदद से अनेक भूमि सुधार करवाये. कृषि के साथ-साथ व्यापार-वाणिज्य और उद्योग-धन्धों में बहुत अधिक उन्नति हुई. इससे आर्थिक समृद्धि बढ़ी तथा इससे कला-कौशल एवं शिक्षा - साहित्य आदि के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ.
अकबर की राजपूत नीति ने राजपूतों को भी अनेक लाभ प्रदान किये. राजपूत राज्य विनाश एवं बर्बादी से बच गए, परन्तु राजपूतों ने स्वेच्छा से अपने राजनैतिक दावे छोड़ दिये. उन्होंने देश में हिन्दू राज्य स्थापित करने का प्रयास कर मुगल राज्य की रक्षा एवं अपने व्यक्तिगत हितों एवं स्वार्थों की पूर्ति की. 
इस नीति का सर्वाधिक बुरा परिणाम यह निकला कि अकबर की सुरक्षा का आश्वासन पाकर राजपूत राजे भोगविलास में पड़ गये जिससे उनकी सैनिक शक्ति कमजोर पड़ गई. मुगल अमीरों के अनेक दुर्गुणों के वे शिकार हो गये और विश्वासघात करने लगे. इन सबके बावजूद भी अकबर की राजपूत नीति के महत्व पर डॉ. ईश्वरीप्रसाद ने लिखा है कि, “राजपूतों ने सम्राट के लिए हिन्दुओं का समर्थन प्राप्त किया एवं उनके कारण धर्म एवं संस्कृति का एकीकरण हुआ. वस्तुतः मुगल साम्राज्य मुगल-राजपूत भागीदारी थी, जिसके लिए राजपूतों ने अपना रक्त बहाया और सर्वोच्च का त्याग किया."
> अकबर की धार्मिक नीति को प्रभावित करने वाले कारक :
> अकबर की धार्मिक नीति को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं –
सम्राट अकबर की माता एक सुसंस्कृत सूफी परिवार की शिया मतावलम्बी थीं. उसका पिता हुमायूँ शियाओं से प्रभावित था, किन्तु अकबर का व्यक्तिगत धर्म सूफी प्रभावित सुन्नी धर्म था. अंतः वंश के प्रभाव से उसमें कट्टरता लेशमात्र भी नहीं थी.
अकबर की धार्मिक नीति को उदार बनाने में उसके शिक्षकों जो शिया और सुन्नी दोनों वर्गों के थे, की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही. वजायद, मुनीम खाँ और अब्दुल लतीफ जैसे उदार गुरुओं के संरक्षण में उसने शिक्षा पाई. उसकी माता हमीदाबानू बेगम, बैरम खाँ, माहम अनगा आदि के विचार भी अकबर को प्रभावित करने वाले सिद्ध हुए.
उसके समय का वातावरण भी अकबर को उदार बनाने में सहायक बना. अकबर को भारत आने से पहले पंजाब में रहना पड़ा, जहाँ गुरु नानक के प्रभाव से हिन्दू और मुस्लिम सद्भाव बढ़ रहा था. उनके शिष्य हिन्दू और मुस्लिम दोनों थे. इसी वातावरण में अकबर का बचपन बीता. अकबर बहुत ही कुशाग्र बुद्धि का था. उसने बचपन से ही धर्म के क्षेत्र में बहुरूपता का अनुभव किया था. इससे उसकी धर्म के क्षेत्र में अधिक जानकारी प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हो गई और वह विभिन्न सम्प्रदायों के साधु-सन्तों, सूफियों, मौलवियों आदि से विचार-विमर्श करने लगा.
अकबर पर भक्ति आन्दोलन के सन्तों का भी प्रमुखता से प्रभाव पड़ा. कबीर, नानक, रैदास, चैतन्य आदि ने धार्मिक कट्टरता, अन्धविश्वास एवं रूढ़ियों पर जमकर प्रहार किया तथा सभी धर्मों की एकता पर बल दिया. सूफी सन्तों ने भी प्रेम और भक्ति का सन्देश दिया. अतः इन सभी ने मिलकर अवश्य ही अकबर के विचारों को प्रभावित किया होगा.
भारत में हिन्दुओं की संख्या बहुत अधिक थी. अतः इन लोगों को अकबर के प्रभाव में होना उसके साम्राज्य की रक्षा के लिए आवश्यक था. अतः अकबर के लिए यह आवश्यक हो गया कि सभी धर्मों के प्रति वह एक जैसी नीति का अनुसरण करे, अन्यथा उसका राज्य स्थायी नहीं रह सकता था.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अकबर ने उदार धार्मिक नीति का अनुसरण वंशानुगत प्रभाव, वातावरण, धार्मिक आन्दोलन तथा तत्कालीन परिस्थितियों की आव श्यकतानुसार किया. इससे उसके साम्राज्य को सदियों तक स्थायित्व मिला.
> अकबर की धार्मिक नीति का विकास 
अकबर की धार्मिक नीति का विकास तीन चरणों में हुआ—
(1) प्रथम चरण (1556–75 ई.), (2) द्वितीय चरण (1575–82 ई.), (3) तृतीय चरण (1582-1605 ई.). 
1. प्रथम चरण (1556-75 ई.)
इस काल में अकबर की धार्मिक नीति का विकास अपने शैशवकाल में था. वह एक सुन्नी मुसलमान की तरह रहता था और इस्लाम के नियमों का पालन करता था. इस काल में अकबर ने हिन्दुओं से जजिया कर लिया, लेकिन उनके मन्दिर नहीं तोड़े गये और न ही उन्हें धर्म-परिवर्तन को विवश किया गया. यह उसका धार्मिक उदारता की नीति का प्रथम परिचायक था.
1562 ई. में अकबर ने आमेर की राजकुमारी अपना विवाह कर लिया और अब वह उससे प्रत्यक्ष रूप से हिन्दुओं के सम्पर्क में आ गया, इससे उसके विचारों में बड़ा परिवर्तन हुआ. फलतः हिन्दुओं को अपने पक्ष में मिलाने के लिए 1563 ई. में तीर्थयात्रा की व 1564 ई. में अकबर ने जजिया कर समाप्त कर दिया. अपने इन कार्यों से उसने बहुसंख्यक हिन्दू जनता का समर्थन हासिल कर लिया.
अकबर ने अब हिन्दुओं को मन्दिर बनवाने की अनुमति दे दी तथा उसने स्वयं अमृतसर में मन्दिर बनवाने के लिए सिखों को जमीन दी व ज्वालामुखी मन्दिर में छत्र भेंट किया. 
अकबर ने हिन्दू त्यौहारों जैसे—होली, दीपावली, दशहरा आदि को अपने दरबार में मनाना ठीक उसी तरह प्रारम्भ किया जिस प्रकार मुस्लिम त्यौहार मनाये जाते थे. उसने अपने माथे पर चन्दन का टीका लगाना प्रारम्भ कर दिया. अकबर ने हिन्दुओं में व्याप्त सामाजिक बुराइयों जैसे—सती प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत आदि को दूर करने का प्रयास भी किया.
2. द्वितीय चरण (1575-82 ई.)
अकबर की धार्मिक विकास की नीति के अन्तर्गत 1575 से 1582 ई. तक के काल में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीन प्रमुख घटनाएँ हुईं. जैसे— इबादतखाना की स्थापना, महजर की घोषणा और दीन-ए-इलाही की स्थापना.
(i) इबादतखाना की स्थापना – अकबर धार्मिक मामलों में अत्यन्त जिज्ञासु था. अतः वह सभी धर्मों का सार जानना चाहता था. इस हेतु उसने फतेहपुरसीकरी में 1575 ई. में एक विशाल भवन बनवाया तथा इसे इबादतखाना नाम दिया.
इस भवन के चारों ओर विभिन्न धर्मों के लोग बैठते थे और मध्य में एक ऊँचे सिंहासन पर अकबर बैठकर उनके विचार सुनता था और अन्त में अपना निर्णय देता था. आरम्भ में इसमें केवल सुन्नी मुसलमानों को ही आमन्त्रित किया गया, किन्तु उनमें आपसी मतभेद और बैमनस्य को देखते हुए अकबर ने अन्य धर्मावलम्बियों को भी इसमें आमन्त्रित किया तथा इससे अकबर को ब्राह्मण, जैन, बौद्ध, ईसाई आदि सभी धर्मों के विचार जानने को मिले तथा वह इतना जान गया कि सभी धर्मों का सार एक ही है और उनमें केवल बाहरी अन्तर है. 
(ii) महजर की घोषणा – यह अकबर को धार्मिक मामलों में सर्वोच्च घोषित करने का एक घोषणा-पत्र था, जिसमें इस्लाम धर्म की व्याख्या का अन्तिम अधिकार अकबर को मिला. इस घोषणा-पत्र को फैजी के पिता शेख मुबारक ने 1579 ई. में तैयार किया तथा यह प्रावधान किया कि धार्मिक मामलों में विवाद होने पर अकबर उन मतों में से एक को चुन सकता था, जो उसकी दृष्टि में श्रेष्ठ था. बिन्सेट स्मिथ इसे अधिकार पत्र की संज्ञा देते हैं, जिसके अनुसार अकबर को धार्मिक मामलों में असीमित अधिकार प्राप्त हो गये. इस घोषणा पत्र से अकबर इमाम-ए-आदिल बन गया. यह अकबर की शक्ति तथा प्रतिष्ठा में वृद्धि और उलेमा वर्ग पर कठोर आघात था.
(iii) दीन-ए-इलाही की स्थापना – अकबर ने विभिन्न धर्मों के विषय में, जो जानकारी प्राप्त की थी, उस आधार पर उसे धर्मों में कुछ बातें समान लगीं. उसने इन सब बातों को अबुल फजल द्वारा लिपिबद्ध करवा लिया और 1582 ई. में अकबर ने तौहीद-ए-इलाही के नाम से एक नए धर्म की घोषणा की. इसमें अकबर ने एक ऐसा मार्ग निकालने का प्रयास किया, जो सभी को स्वीकार्य हो तथा सभी व्यक्ति साम्प्रदायिक भेदभाव भूलकर सभी व्यक्ति शाश्वत धर्म के सार्वभौम एवं सर्वमान्य आचरण से युक्त सिद्धान्तों के अनुयायी बन सकें.
अकबर ने इस धर्म के लिए किसी धर्मग्रन्थ, देवालय या कोई विशेष पूजागृह नियत नहीं किया, बल्कि उसने इस नये धर्म को एक सैद्धान्तिक रूप प्रदान किया. 'सुलहकुल' की नीति को ध्यान में रखते हुए उसने सभी धर्मों की अच्छी बातों का समावेश अपने धर्म-दर्शन में किया.
अकबर दीन-ए-इलाही द्वारा राष्ट्रीयता एवं धार्मिक सहिष्णुता का वातावरण बनाने में सफल रहा तथा इसके चलते धार्मिक विद्वेष की भावना पर वह बहुत अधिक नियन्त्रण पा सका.
3. तृतीय चरण (1582-1605 ई.)
अकबर ने इस काल में अनेक सुधार किये उसने हिज्री सन् के स्थान पर सौर वर्ष को लागू कर दिया. गौ मांस भक्षण पर प्रतिबन्ध लगा दिया. लोगों को केवल आवश्यकतानुसार ही शराब पीने की इजाजत दी गई. मुसलमानों द्वारा दाढ़ी रखने पर प्रतिबन्ध लगाया गया. गहने, रेशमी वस्त्र आदि पहनने पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया.
इसके साथ ही अकबर ने सार्वजनिक प्रार्थनाओं, अजान एवं रमजान पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया. 12 वर्ष से कम उम्र के लड़कों का खतना, हजयात्रा तथा अरबी भाषा की पढ़ाई बन्द कर दी गई तथा अनेक फकीरों एवं शेखों को देश निकाला दे दिया.
अकबर के इन सभी कार्यों के कारण उसे 'काफिर' कहा गया तथा इस्लाम धर्म त्यागने का आरोप लगाया गया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अकबर की धार्मिक नीति का उद्देश्य किसी भी धर्म की उपेक्षा एवं दूसरे धर्म को अनावश्यक रूप से प्रश्रय देने का नहीं था, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता का विकास करना था. उसने अपनी धार्मिक नीति द्वारा साम्राज्य के सभी लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया और यही उसकी महानतम् उपलब्धि थी.
> “अकबर द्वारा दीन-ए-इलाही उसकी मूर्खता का प्रतीक था उसकी बुद्धिमत्ता का नहीं." विवेचना.
धार्मिक क्षेत्र में अकबर द्वारा किये गये कार्यों में सर्वाधिक चर्चित कार्य उसके द्वारा स्थापित ‘दीन-ए-इलाही ' मत जिसका प्रारम्भिक नाम 'तौहीद-ए-इलाही' था.
इसकी स्थापना हेतु अकबर ने धार्मिक नेताओं, महत्वपूर्ण सरदारों एवं अन्य गणमान्य व्यक्तियों की एक सभा बुलाकर उनसे अनुरोध किया कि वे कोई ऐसा मार्ग निकाल लें जिसमें राज्य के सभी लोग आपसी मतभेदों को भुलाकर एक साथ प्रेम से रह सकें. इस सभा ने अकबर से ही ऐसा मार्ग निकालने का अनुरोध किया. फलतः अकबर ने 'दीन-एP इलाही' की स्थापना की. इस नये मत के प्रचार-प्रसार के लिए अकबर ने कोई व्यवस्था नहीं की तथा न ही कोई देवालय या विशिष्ट पूजा पद्धति का निर्माण किया. अकबर का स्थान इसमें एक शेख या सन्त की तरह था, जो इसमें शामिल होते थे वे अकबर को अपना गुरु मानते थे, जो जितना आत्म समर्पण कर सकता था उसी के आधार पर शिष्यों में वर्गभेद था तथा सम्राट का इसको स्थापित करने का उद्देश्य लोगों को सदाचरण, संयम तथा सहिष्णुता का आदर्श उपस्थित करना था ताकि लोगों को इसका अनुकरण करने की प्रेरणा मिल सके.
> दीन-ए-इलाही के निम्नलिखित सिद्धान्त हैं –
1. बादशाह अकबर से दीक्षा लेनी पड़ती थी तथा उसे अपना गुरु स्वीकार करना पड़ता था. रविवार के दिन दीक्षा लेने वाला व्यक्ति बादशाह के समक्ष उपस्थित होकर अपनी पगड़ी बादशाह उसके पैरों में रख देता था, जो इस बात का प्रतीक था कि उसने अपने अहंकार एवं स्वार्थ का त्याग कर दिया है.
2. सम्राट उसे उठाकर उसकी पगड़ी उसके सिर पर रख देता था और उसे अपना शिष्य मान लेता था. उसी समय उसे एक शस्त दिया जाता था, जिस पर 'अल्लाहो-अकबर' खुदा रहता था.
3. शिष्य से यह आशा की जाती थी कि वह सम्राट के अनुकरण द्वारा अपना सुधार करेगा तथा सम्राट से आवश्यकतानुसार मौखिक शिक्षा ग्रहण करेगा.
4. एक शिष्य दूसरे से मिलने पर अभिवादन के समय ‘अल्ला-हो-अकबर' कहेगा तथा दूसरा इसका जवाब ‘जल्ला जलाल-हू' कहकर करेगा.
5. मृत्यु से पूर्व ही व्यक्ति को मृत्युभोज देना होगा. 
6. अपने जन्मदिन पर प्रीतिभोज देना होगा.
7. इसे मानने वालों को मांस भक्षण पर प्रतिबन्ध था.
8. केवल सन्तान उत्पन्न करने के लिए ही स्त्री से सहवास करें.
9. सांसारिक इच्छाओं का त्याग करें तथा सबके साथ मृदुता का व्यवहार करें.
10. कर्म के प्रभाव पर विचार करें तथा भक्ति और में वृद्धि करें.
दीन-ए-इलाही के सिद्धान्तों को देखने से स्पष्ट होता है कि इसमें आचरण के नियमों पर अधिक जोर दिया गया है न कि एक नये पृथक् धर्म के निर्माण पर, लेकिन अकबर का समकालीन 'दंबिस्तान महाजब' का लेखक मोहसिन फानी इसे ‘मजहब' कहता है. वही बदायूँनी ने लिखा है कि, “जो व्यक्ति इसे स्वीकार करते थे उन्हें इस्लाम का त्याग करना पड़ता था" वस्तुतः यह एक गलत तथ्य है. अकबर ने इस नये धर्म के प्रचार के लिए कोई दबाव नहीं डाला. इसी कारण उसके जीवनकाल में इसके सदस्यों की संख्या बहुत ही कम रही और उसकी मृत्यु के बाद यह समाप्त हो गया. ब्लेकमेन के अनुसार इसके सदस्यों की संख्या 18 से अधिक नहीं थी.
दीन-ए-इलाही की अत्यन्त तीखी आलोचना करने वालों की कमी नहीं है. सर बूल्जले हेग के अनुसार अपने परामर्शदाताओं की सहायता लेकर अकबर ने ऐसे धार्मिक सम्प्रदायों का प्रचार किया, क्योंकि उसके थोथे घमण्ड ने उसे ऐसा करने पर विवश किया, दीन-ए-इलाही वास्तव में एक लज्जाजनक असफलता थी जो हिन्दू, मुसलमान, ईसाई किसी को भी अच्छी नहीं लगी. इतिहासकार बिन्सेट स्मिथ इसे उसकी मूर्खता का प्रतीक मानते हैं तथा आगे लिखते हैं, "यह उसका हास्यास्पद दम्भ तथा अनियन्त्रित अधिनायक तन्त्र के दानवीय विकास का फल था.
परन्तु यदि हम निष्पक्ष रूप से विचार करें, तो हम पाएँगे कि उपर्युक्त आलोचनाएँ सही नहीं हैं. अकबर वास्तव में अपने नये धर्म द्वारा अपने राज्य में बसने वाली सभी जातियों एवं धार्मिक सम्प्रदाय के लोगों को एकसूत्र में बाँधकर अपने साम्राज्य का स्थायित्व चाहता था तथा उसका दूसरा उद्देश्य राष्ट्रीय सम्राट के रूप में अपने को प्रतिष्ठित करवाना तथा सम्राट के पद एवं गौरव को बढ़वाना था. इस नये धर्म का उद्देश्य सभी धर्मों में समन्वय एवं एकता स्थापित करना भी
था.
अकबर को अपने इस लक्ष्य में 'दीन-ए-इलाही' के माध्यम से पर्याप्त सफलता मिली तथा उसकी गणना राष्ट्रीय सम्राट के रूप में की जाने लगी. अतः उसके द्वारा स्थापित 'दीन-एइलाही' को उसकी मूर्खता का प्रतीक कहना वस्तुतः गलत होगा. CE 1600 था.
> राष्ट्रीय सम्राट के रूप में अकबर का मूल्यांकन
मध्यकालीन विश्व के सम्राटों में अकबर अपना एक विशेष स्थान रखता है. वह महान् साम्राज्य निर्माता, कुशल प्रशासक, धर्म सहिष्णु शासक, समाज सुधारक, कला और संस्कृति के संरक्षक के रूप में उसका स्थान महत्वपूर्ण है. अकबर की ख्याति विशेष रूप से इसलिए है कि उसने सम्पूर्ण भारत को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया. उसने अपने कार्यों से अपने राज्य की नींव को इतना सुदृढ़ कर दिया कि उसके मरने के बाद भी उसका राज्य सदियों तक चलता रहा. अतः उसके द्वारा किये गये कार्यों को देखते हुए इतिहासकारों ने उसे 'राष्ट्रीय सम्राट' की संज्ञा दी है. 
अकबर ने भारत को राजनैतिक एकता के सूत्र में बाँधकर उनमें यह अहसास उत्पन्न किया कि वे एक राष्ट्र के निवासी हैं. इसी कार्य को सिद्ध करने के लिए उसने अपनी साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाई.
पानीपत के मैदान से लेकर असीरगढ़ विजय तक अकबर ने सम्पूर्ण उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के एक बड़े भ-भाग पर अपना अधिकार कर लिया. मुगलों के दो प्रबल प्रतिद्वन्द्वियों राजपूतों एवं अफगानों को अकबर के सामने नतमस्तक होना पड़ा. अकबर ने अपने राज्य विस्तार के लिए सैनिक शक्ति के साथ-साथ कूटनीति का भी सहारा लिया और यहाँ तक विदेशी पुर्तगालियों को भी यहाँ अपने पाँव जमाने का मौका नहीं दिया.
अकबर ने न केवल भारत का राजनैतिक एकीकरण किया, अपितु उसने पूरे साम्राज्य के लिए एक समान प्रशासन व्यवस्था भी लागू की. उसके प्रशासन का मुख्य उद्देश्य जनता का कल्याण करना था. इस प्रकार स्पष्ट है कि राजनीतिक और प्रशासनिक एकता स्थापित कर उसने सम्पूर्ण भारत को एकसूत्र में पिरो दिया.
अकबर की उल्लेखनीय उपलब्धि भारत में धार्मिक एकता को स्थापित करना था. अकबर से पूर्व के सभी शासक इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना अपना प्रमुख कर्त्तव्य समझते थे, लेकिन अकबर ने धार्मिक कट्टरता की नीति को त्यागकर उदार नीति का अनुसरण किया. अकबर ने हिन्दुओं पर से जजिया और तीर्थयात्रा कर हटाकर तथा उन्हें धार्मिक स्वतन्त्रता देकर उनकी सद्भावना को अपने लिए प्राप्त कर लिया. अकबर ने अपने प्रयासों से धार्मिक विद्वेष, बैमनस्य एवं कटुता की भावना को समाप्त कर आपसी सद्भाव सहयोग का वातावरण तैयार कर, उसने लोगों में एक राष्ट्र के निवासी होने का भाव जगाया.
अकबर ने हिन्दू और मुसलमान दोनों के धर्मों के उत्थान के लिए समान रूप से प्रयास किये तथा उनमें व्याप्त सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया. वह समाज के सामने एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत करना चाहता था जिससे कि सभी लोग आपस में मिल-जुलकर प्रेम से रह सकें. इस कार्य के लिए उसने हिन्दुओं के त्यौहारों को उसी तरह मनाना प्रारम्भ किया, जिस तरह वह अपने दरबार में मुस्लिम त्यौहार मनाता था. अतः उसकी इस सुलहकुल की नीति ने आपसी विभेद मिटाने एवं सुसंगठित राज्य, समाज और राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया. 
अकबर ने देश में सांस्कृतिक उत्थान की दिशा में भी अनेक उल्लेखनीय कार्य किये. उसने फारसी के साथ-साथ संस्कृत भाषा और साहित्य के विकास के लिए अनुवाद विभाग की स्थापना की. महाभारत, गीता, रामायण, कुरान, अथर्ववेद आदि ग्रन्थों का उसने फारसी में अनुवाद बाइबिल, कराया.
इतिहास, काव्य, गज़ल एवं कविता आदि साहित्य की सभी विधाओं को संस्कृत, उर्दू एवं फारसी में लिखा गया. शैक्षणिक विकास के लिए अकबर ने अनेक मदरसे खुलवाये तथा संस्कृत पाठशालाओं को अनुदान दिये.
अकबर ने कलाकारों, कवियों, चित्रकारों एवं संगीतकारों को संरक्षण प्रदान किया. उसके द्वारा स्थापत्य के क्षेत्र में अनेक सुन्दर भवनों का निर्माण करवाया गया जिसमें हिन्दू और इस्लामी दोनों शैलियों का मिश्रण पाया जाता है. अकबर ने धार्मिक प्रतिबन्ध के बावजूद भी चित्रकला को प्रोत्साहन दिया. अकबर के प्रयासों से विभिन्न कला-शैलियों में समन्वय स्थापित किया गया. इसने मुगल कला को एक विशेष स्वरूप प्रदान किया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अकबर को भारत की राजनीतिक एकता प्रदान करने का प्रयत्न, एक शासन-व्यवस्था, एक अर्थ एवं लगान-व्यवस्था, एक करव्यवस्था, सभी को योग्यता के आधार पर राज्य की सेवाओं में उच्चतम स्थान प्राप्त करने की सुविधा, राजपूतों से विवाह सम्बन्ध और सम्मान की नीति, सभी धर्मों को समान सुविधा और दृष्टि से एकता लाने का प्रयत्न, फारसी भाषा का राज्य भाषा और सभी भाषाओं की प्रगति में सहयोग, विभिन्न ललित कलाओं की उन्नति और उनकी कलाविधियों के समन्वय का प्रयत्न, सांस्कृतिक एकता का प्रयत्न आदि ऐसे कार्य थे, जो राष्ट्रीय हित एवं प्रगति के आधार पर किये गये थे. अतः इन्हीं सब कारणों को देखते हुए अकबर को 'राष्ट्रीय सम्राट' की संज्ञा दी जाती है.
> जहाँगीर और अर्जुनदेव के सम्बन्धों पर टिप्पणी
गुरु अर्जुनदेव (1582-1607 ई.) सिक्खों के पाँचवें गुरु थे. इनके गुरु बनने से पूर्व सिक्ख मुख्य रूप से एक धर्मिक सम्प्रदाय के रूप में थे, लेकिन इन्होंने सिखों को संगठित कर गुरुपद के महत्व को बढ़ा दिया तथा अब गुरु के लिए राजदरबार, राजमहल, राजकोष एवं घुड़सवार सेना की स्थापना की गई. अभी तक सिख मुगलों की राजनीति में कोई हस्तक्षेप नहीं करते थे. अतः अकबर इनके समय में अत्यधिक उदार रहा तथा उसने सिखों को अमृतसर के लिए जमीन दी.
परन्तु 1606 ई. में जब शाहजादा खुसरो ने विद्रोह किया तब गुरु अर्जुनदेव ने उसे आशीर्वाद के साथ-साथ आर्थिक सहायता भी दी, इससे जहाँगीर उनसे नाराज हो गया तथा 2 लाख रुपया जुर्माना एवं गुरु ग्रन्थ साहिब से कुछ गीतों को निकालने का आदेश दिया जिसे गुरु ने मानने से स्पष्ट मना कर दिया, फलस्वरूप जहाँगीर ने उनकी सारी सम्पत्ति जब्त करने एवं मृत्युदण्ड की आज्ञा दे दी. लाहौर के नाजिम चन्दूशाह ने व्यक्तिगत कारणों तथा जहाँगीर के आदेश के बाद उन्हें गिरफ्तार करके अमानवीय कष्ट देकर उनकी हत्या कर दी. 
इससे सिख जाति में मुगलों के प्रति रोष उत्पन्न हो गया वे अपने गुरु की हत्या का बदला लेने के लिए अपने आपको सैनिक शक्ति के रूप में संगठित करने का प्रयास करने लगे. अनेक इतिहासकारों ने जहाँगीर के इस कार्य को धार्मिक भावनाओं से प्रेरित माना है, लेकिन यह सही नहीं लगता. वस्तुतः उसने राजनीतिक कारणों से ही गुरु की हत्या का आदेश दिया था, क्योंकि उसने केवल गुरु को ही दण्ड दिया अन्य सिखों को नहीं, लेकिन फिर भी यह कहा सकता है कि जहाँगीर ने अर्जुनदेव को दण्ड देकर एक महान् राजनीतिक भूल की जिसका परिणाम उसके उत्तराधिकारियों को आगे चलकर भुगतना पड़ा.
> जहाँगीर के शासनकाल में नूरजहाँ का महत्व
मिर्जा ग्यास बेग की पुत्री एवं अलीकुली बेग या शेर अफगान की विधवा मेहरुनिसा पर जब 1611 ई. में नौरोज त्यौहार के अवसर पर जहाँगीर की नजर पड़ी तब वह उस पर मोहित हो गया और उससे इसने विवाह कर लिया. विवाह के बाद जहाँगीर ने मेहरुनिसा को नूरजहाँ और नूरमहल की उपाधि प्रदान की जहाँगीर और नूरजहाँ का विवाह जहाँगीर के शासनकाल की एक प्रमुख घटना है, क्योंकि इस एकमात्र महिला ने मुगल शासन को अगले 15 वर्षों तक पूर्ण रूप से अपने प्रभाव में रखा और वह शक्तिशाली ताकत बनी रही.
नूरजहाँ ने जहाँगीर से विवाह होने के बाद मुगल राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया. इस कार्य को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए एक गुट का निर्माण किया जिसे ‘नूरजहाँ जुनता' कहा गया, इस गुट में उसका पिता एत्माउद्दौला, उसकी माता अस्मत बेगम, उसका भाई आसफ खाँ और शाहजादा खुर्रम सम्मिलित थे. आरम्भ में नूरजहाँ ने अपने प्रभाव से अपने सगे-सम्बन्धियों को ऊँचे पदों पर नियुक्त कर दिया. उसका पिता प्रमुख दीवान और भाई खानसामा नियुक्त कर दिये गये. नूरजहाँ ने स्वयं अपना नाम सिक्कों पर छपवाया जिससे उसका शासन और जहाँगीर पर प्रभाव स्पष्टतया परिलक्षित होता है.
नूरजहाँ एक सुसंस्कृत विचारों, कलात्मक गुणों से परिपूर्ण एक सुन्दर महिला थी. उसे नये-नये फैशन के वस्त्र, इत्र, आभूषण एवं शृंगार आदि के आविष्कार का शौक था. वह अपने प्रभाव से दरबार में फारसी कला एवं संस्कृति को प्रश्रय देने लगी. उसने अनाथों गरीबों की व का विवाह अपने खर्च से करवाया.
नूरजहाँ बराबर जहाँगीर के साथ रहती थी, इससे जहाँगीर उस पर पूरी तरह आश्रित रहने लगा.
इस प्रकार स्पष्ट है कि नूरजहाँ के शासनकाल में जहाँगीर उस पर अत्यधिक आश्रित रहा तथा इसी कारण जहाँगीर को खुर्रम व महावत ख़ाँ के विद्रोहों का सामना करना पड़ा और अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा.
> शाहजहाँ की मध्य एशियाई (Central Asian) नीति
शाहजहाँ की मध्य एशियाई नीति का मुख्य उद्देश्य काबुल की सुरक्षा के लिए बल्ख पर अधिकार करना तथा खोये हुए कन्धार को प्राप्त करना था. इस हेतु उसके द्वारा किये गये प्रयास निम्नलिखित हैं
(1) कन्धार पर अभियान – ईरान के शाह अब्बास प्रथम की मृत्यु के कारण कन्धार में इस समय अराजकता की स्थिति थी. अतः शाहजहाँ ने कन्धार के किलेदार अलीमर्दान को अपने संरक्षण में लेकर कन्धार का किला अपने अधिकार में कर लिया. (1638 ई.) और दौलत खाँ को वहीं का प्रशासक नियुक्त कर दिया.
थोड़े समय बाद शाह अब्बास द्वितीय ने कन्धार पर चढ़ाई कर दी. शाहजहाँ को इसकी सूचना मिलते ही उसने औरंगजेब तथा सादुल्ला खाँ के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी, परन्तु यह सेना कई महीने देर से पहुँच पाई ऐसे में कन्धार पर एक बार पुनः ईरान का अधिकार हो गया.
औरंगजेब के नेतृत्व में कन्धार गई मुगल सेना ने पुनः कन्धार लेने का प्रयास किया, किन्तु वह असफल रही और कन्धार सदैव के लिए मुगलों के हाथ से निकल गया. शाहजहाँ ने इसके बाद औरंगजेब (1652 ई.) और दारा (1653 ई.) के नेतृत्व में कन्धार को जीतने का प्रयास किया, किन्तु वह सफल नहीं हो सका.
(2) बल्ख अभियान—मध्य एशियाई क्षेत्र में उज्बेक लोग भी काफी शक्तिशाली थे तथा वे मुगलों के प्रतिद्वन्द्वी थे. वह काबुल पर अपना अधिकार करना चाहते थे. उन्होंने मुगलों की पैतृक भूमि 'समरकन्द' पर भी अधिकार कर लिया था. इनका नेता नजर मुहम्मद था, लेकिन उसके कार्यों से जनता नाराज थी. अतः उसके पुत्र अजीज ने सत्ता हथिया ली. नजर मुहम्मद ने शाहजहाँ से सहायता माँगी. इसे शाहजहाँ ने सुनहरा मौका देखकर नजर मुहम्मद की सहायता के लिए एक बड़ी सेना भेजी.
शाहजादा मुराद के अधीन मुगल सेना ने नजर मोहम्मद की सहायता के स्थान पर बल्ख पर अभियान कर दिया, इससे नजर मुहम्मद फारस की ओर भाग गया. मुराद ने बल्ख को लूटा तथा उस पर अधिकार कर लिया. इस पर शाहजहाँ ने उसे बल्ख और बदख्सां का सूबेदार नियुक्त कर दिया, परन्तु वह आगरा लौट आया.
अतः शाहजहाँ ने औरंगजेब को इस क्षेत्र का प्रशासक नियुक्त किया तथा ट्राम्स-ऑक्सियाना में उज्बेकों के विद्रोह को शान्त कर दिया और कूटनीति का प्रयोग करते हुए नजर मुहम्मद को कहा कि मुराद का कार्य अनुचित था. अतः शाहजहाँ ने उसे सहायता तथा बल्ख वापस देने का आश्वासन दिया, परन्तु शर्त यह रखी कि वह औरंगजेब से क्षमा माँगे, परन्तु वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ. इसी बीच वहाँ रसद सामग्री की कमी हो गई तथा कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगी जिससे मुगल सेना के हजारों सैनिक मारे गये और उनकी वापसी अत्यन्त ही कठिन हो गई, केवल थोड़े से ही सैनिक वापस जीवित लौट सके.
अतः उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शाहजहाँ को मध्य एशियाई क्षेत्र में सफलता तो मिली, लेकिन उससे नुकसान कहीं ज्यादा हुआ. इस अभियान से मुगलों की सेना की प्रतिष्ठा मात्र बढ़ी, परन्तु विशेष राजनैतिक लाभ नहीं हुए.
> शाहजहाँ की दक्षिण नीति
दक्षिण की रियासतें अहमदनगर, बीजापुर एवं गोलकुण्डा मुगलों के विरुद्ध सदैव षड्यन्त्र करती रहती थीं. अहमदनगर राज्य जोकि दक्षिण भारत में मुगलों के विरोध का प्रमुख केन्द्र था, को नष्ट करने के उद्देश्य से शाहजहाँ ने अपनी दक्षिण की नीति अपनाई. इस नीति के प्रमुख बिन्दु निम्नलिखित थे
(1) अहमदनगर – शाहजहाँ ने अहमदनगर को पहले अलग-थलग करने के लिए बीजापुर राज्य को अपनी ओर मिलाने का प्रयास किया तथा शाहजी भोंसले को पूना की जागीर देकर उसे मुगल मनसबदार बना दिया.
1629 ई. में शाहजहाँ ने अहमदनगर के शासक मलिक अम्बर के पुत्र फतेह खाँ पर आक्रमण किया शाहजहाँ के नेतृत्व में किये गये इस अभियान में अहमदनगर राज्य के एक बड़े भाग पर अधिकार कर लिया. अतः फतेह खाँ ने बीजापुर से सहायता की प्रार्थना की, जो बीजापुर द्वारा स्वीकार कर ली गई और बीजापुर के सुल्तान ने मुगलों से सम्बन्ध तोड़ लिया.
इसी बीच फतेह खाँ ने निजामशाह की हत्या करवा दी और उसके अल्पव्यस्क पुत्र को शासक नियुक्त कर स्वयं उसका संरक्षक बन गया तथा शाहजहाँ से समझौता कर लिया.
अहमदनगर में शाहजहाँ के नाम से खुतबा पढ़ा गया तथा सिक्के जारी किये गये. इन कार्यों के बदले फतेह खाँ को मुगल सेवा में ले लिया गया तथा शाहजी से पूना की जागीर लेकर उसे दे दी. इस अभियान से अहमदनगर का राज्य नष्ट प्रायः हो गया.
(2) बीजापुर – 1635 ई. के बाद शाहजहाँ ने बीजापुर पर ध्यान देना प्रारम्भ कर दिया, क्योंकि अहमदनगर में निजामशाही को जीवित करने के प्रयास बीजापुर द्वारा किये जा रहे थे. अतः शाहजहाँ ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया और इसके साथ ही उसने बीजापुर के सुल्तान के पास एक दूत भेजा कि अहमदनगर राज्य को आपस में बाँट लिया जाये. मुगल सेना के उत्पात से बीजापुर का सुल्तान आदिलशाह भयग्रस्त हो गया तथा उसने शाहजहाँ से सन्धि कर ली. इस सन्धि के अन्तर्गत 20 लाख रुपये युद्ध का हर्जाना मुगलों को दिया गया तथा गोलकुण्डा के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा व शाहजी भोंसले के दमन में मुगलों की सहायता करेगा. इस पर शाहजहाँ ने उसे अहमदनगर रियासत का एक बड़ा भाग दिया, जिसकी आय 20 लाख हूण थी.
(3) गोलकुण्डा — शाहजहाँ ने गोलकुण्डा से सन्धि करने के लिए एक दूत भेजा. सुल्तान कुतुबुल मुल्क ने उसका भव्य स्वागत किया तथा शाहजहाँ से सन्धि कर ली तथा उसने शाहजहाँ के नाम से खुतबा पढ़ा एवं सिक्के जारी किये तथा शाहजहाँ के प्रति बफादार रहने का आश्वासन दिया. इस पर शाहजहाँ ने गोलकुण्डा को, जो वह 4 लाख हूण का वार्षिक कर बीजापुर को देता था उससे मुक्त कर दिया तथा 2 लाख हूण वार्षिक गोलकुण्डा ने मुगलों को देना स्वीकार कर लिया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शाहजहाँ ने अहमदनगर के निजामशाही को समाप्त कर तथा बीजापुर एवं गोलकुण्डा से सन्धि कर दक्षिण में अपनी प्रभावशाली नीति को स्थापित कर लिया. इस प्रकार शाहजहाँ की दक्षिण नीति सफल रही.
> शाहजहाँ के समय हुए उत्तराधिकार के युद्ध का विवरण
शाहजहाँ के चार पुत्रों दारा, शुजा, औरंगजेब एवं मुराद के मध्य सत्ता प्राप्ति के लिए, जो संघर्ष हुआ वह शाहजहाँ के शासनकाल के अन्तिम वर्षों की सर्वाधिक प्रमुख घटना है. 
शाहजहाँ का सबसे बड़ा पुत्र दारा एक विद्वान्, उदार एवं दयालु व्यक्ति था. उसे शाहजहाँ सर्वाधिक चाहता था तथा उसे 'शाह इकबाल' की उपाधि दे रखी थी, वह पंजाब एवं दिल्ली का प्रशासक था. शाहजहाँ का दूसरा पुत्र शुजा बंगाल का प्रशासक था वह साहसी, वीर किन्तु आलसी एवं अकर्मण्य था. वह राजनीति एवं शासन-सम्बन्धी कार्यों के लिए सर्वथा अयोग्य था. औरंगजेब शाहजहाँ का तीसरा पुत्र था जो चालाकी, कूटनीतिज्ञता एवं महत्वाकांक्षा में सबसे आगे था. वह एक बड़ा संगठनकर्ता तथा कुशल सेनापति था. चौथा पुत्र मुराद भी अत्यन्त बहादुर था, लेकिन वह भावुक, जल्दबाज एवं आराम तलब था. इस समय वह गुजरात का सूबेदार था. इन चारों के साथ शाहजहाँ की तीन पुत्रियों जहाँआरा, रोशनआरा, गौहरआरा ने भी अप्रत्यक्ष रूप से इस संघर्ष में भाग लिया.
सितम्बर 1657 ई. में जब शाहजहाँ अचानक बीमार पड़ गया तथा उसके जीवित बचने की कोई आशा नहीं रही, तो उसकी बीमारी का समाचार पूरे राज्य में फैल गया. इस समय द्वारा राजधानी आगरा में ही था तथा शेष तीनों पुत्र राजधानी से बाहर दूर थे. अतः उन्हें अपने अधिकार की चिन्ता हुई और वे धीरे-धीरे राजधानी की ओर अपनी सेना सहित बढ़ने लगे.
अब शाहजहाँ ने दारा को अपना 'वलीअहद' नियुक्त कर दिया तथा मुगल सरदारों को दारा को भावी सम्राट मानने को कहा. इसने आग में घी का काम किया तथा शुजा और मुराद ने अपने आपको सम्राट घोषित कर दिया तथा अपने नाम से ‘खुतबा’ पढ़वाया. औरंगजेब ने चालाकी से काम लेते हुए कहा कि उसका आगरा जाने का उद्देश्य दारा जैसे धर्मभ्रष्ट व्यक्ति से सम्राट की रक्षा करना है. ऐसा उसने कट्टर मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करने के उद्देश्य से कहा तथा आगरा की ओर बढ़ता रहा. औरंगजेब ने इसी बीच मुराद से सन्धि कर ली और वह अपनी सेना सहित उज्जैन के निकट दीपालपुर में औरंगजेब से आकर मिल गया और औरंगजेब गुप्त रूप से तैयारियाँ करता रहा. उसने बीजापुर, गोलकुण्डा, शिवाजी तथा ईरान के शाह से भी गुप्त समझौता कर लिया. अब वह धरमत की ओर से आगे बढ़ा.
> धरमत का युद्ध
अप्रैल 1658 ई. में यह निर्णायक युद्ध शाहजहाँ और दारा की ओर से जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंह द्वारा औरंगजेब एवं मुराद के विरुद्ध लड़ा गया, जिसमें जसवन्तसिंह पराजित होकर जोधपुर भाग गये. इस युद्ध से औरंगजेब का हौंसला और अधिक बढ़ गया और अब वह मुराद के साथ तेजी से राजधानी की ओर बढ़ा और चम्बल पार कर सामूगढ़ के समीप पहुँच गया.
> सामूगढ़ का युद्ध
29 मई, 1658 ई. को दारा और उसके साथी हाड़ा राजपूत एवं बाढ़ा के सैयदों ने औरंगजेब और मुराद की संयुक्त सेना पर आक्रमण किया, परन्तु औरंगजेब ने अपने कुशल सेनापतित्व के बल पर दारा को हरा दिया. इस युद्ध हारने के बाद दारा दिल्ली होते हुए लाहौर भाग गया. में
अब विजयी औरंगजेब एवं मुराद ने राजधानी आगरा में प्रवेश किया. शाहजहाँ द्वारा मिलने के लिए बुलाये जाने पर भी उन्होंने मिलने से मना कर दिया तथा शक्ति के बल पर दुर्ग में प्रवेश किया तथा शाहजहाँ को नजरबन्द कर दिया.
> मुराद का अन्त
आगरा पर अधिकार करने के बाद औरंगजेब मुराद के साथ दिल्ली की ओर दारा का पीछा करने के बहाने से आगे बढ़ा. इसी बीच दोनों में साम्राज्य के विभाजन को लेकर वैमनस्य पैदा हो गया तब औरंगजेब ने मुराद को धोखे से गिरफ्तार करवा लिया और ग्वालियर दुर्ग में कैद कर लिया और वहीं 1661 ई. में उसकी हत्या करवा दी. इसी बीच औरंगजेब ने दिल्ली पहुँचकर 21 जुलाई, 1658 ई. को दिल्ली में सम्राट बनने की घोषणा कर दी.
> दारा का अन्त
दारा सामूगढ़ की लड़ाई में हारने के बाद लाहौर चला गया और अपनी शक्ति को संगठित करने का प्रयास करने लगा. इसी बीच औरंगजेब ने उसका पीछा करना जारी रखा. अतः दारा लाहौर से सिन्ध, गुजरात होता हुआ अजमेर पहुँचा और जोधपुर के जसवन्तसिंह से सहायता का प्रयास किया, किन्तु वह सफल न हो सका. अतः देवराई के मैदान में 1659 ई. को दारा और औरंगजेब के मध्य लड़ाई हुई, जिसमें दारा पुनः पराजित हुआ और भागकर अफगानिस्तान में शरण लेने चला गया जहाँ अफगान सरदार मलिक जीवन ने उसे गिरफ्तार कर दिल्ली भेज दिया. अब दारा पर मुकदमा चलाकर उसे धर्म विरोधी सिद्ध किया गया और अपमानित कर उसकी हत्या कर दी गई.
> शुजा का दुःखद अन्त
1658 ई. में दारा के पुत्र सुलेमान शिकोह से बहादुरपुर के युद्ध में पराजित होने के बाद शुजा ने मुंगेर में शरण ली और अपनी शक्ति संगठित कर राजधानी की ओर बढ़ने लगा और औरंगजेब की सेना के साथ दिसम्बर 1658 को खजुआ नामक स्थान पर युद्ध किया, लेकिन परास्त होकर बंगाल चला गया जहाँ औरंगजेब के समर्थक मीर जुमला ने उसका पीछा करना प्रारम्भ कर दिया. अतः शुजा ध्य होकर आराकान चला गया जहाँ बर्मा के राजा के विरुद्ध षड्यन्त्र करने के आरोप में उसकी समस्त परिवार सहित हत्या कर दी गई और इसी के साथ ही औरंगजेब के सभी प्रतिद्वन्द्वी समाप्त हो गये तथा इसके बाद औरंगजेब ने जून 1659 में विधिवत् अपना राज्याभिषेक कराया.
> क्या शाहजहाँ का शासनकाल 'स्वर्ण युग' था? इसके पक्ष में तर्क दीजिए.
अनेक इतिहासकारों एवं विदेशी यात्रियों तथा समकालीन लेखकों ने शाहजहाँ के शासनकाल में अत्यधिक उन्नति का वर्णन किया है. खाफी खाँ ने लिखा है कि, फिर “यद्यपि अकबर एक विजेता और संविधान निर्माता था, भी शासन व्यवस्था, साम्राज्य तथा राजस्व के प्रबन्ध और राज्य के प्रत्येक विभाग के सुव्यवस्थित प्रशासन के लिए भारत में ऐसा कोई भी राजकुमार शासक नहीं हुआ जिसकी शाहजहाँ से तुलना की जा सके.” इन सभी को देखते हुए शाहजहाँ के शासनकाल को 'स्वर्णकाल' कहने के निम्नलिखित कारण थे
साम्राज्य का विस्तार — अपने पूर्वजों की भाँति शाहजहाँ भी साम्राज्यवादी प्रकृति का था. अतः उसने भी अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए अनेक अभियान किए. उसने बल्ख अभियान में मुगलों की प्रतिष्ठा को मध्य एशिया में पुनः स्थापित किया तथा दक्षिण में प्रभावशाली ढंग से मुगलों का आधिपत्य जमा दिया. उसके समय में प्रान्तों की संख्या बढ़कर 15 से 21 हो गई हालांकि उसका कान्धार अभियान सफल नहीं रहा.
प्रशासनिक सुव्यवस्था — शाहजहाँ के समय में प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त बनी रही. उसने अकबर के समय लागू की गई व्यवस्था को ही अपनाया, परन्तु आवश्यकतानुसार उसमें अनेक संशोधन भी किए और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर अपना नियन्त्रण बनाए रखा.
शाहजहाँ ने मनसबदारी, राजस्व एवं न्याय व्यवस्था में अनेक परिवर्तन किए. मनसबदारों के वेतन तथा उनके द्वारा रखे जाने वाले सवारों की संख्या में कमी कर दी. सामान्यतः मनसबदारों के जात एवं सवार की संख्या 9 हजार कर दी. यद्यपि राजकुमारों की मनसब बहुत अधिक थी.
राजस्व व्यवस्था में शाहजहाँ द्वारा अनेक परिवर्तन किए गए. उसने लगान की दर को 1/3 से 1/2 कर दिया, लेकिन इसके साथ ही उसने नहरों का निर्माण करवाया तथा किसानों को अनेक सुविधाएँ दीं. इससे राजकोष को लाभ हुआ.
शाहजहाँ के समय में व्यापार एवं उद्योग-धन्धों की अत्यधिक उन्नति हुई. भारतीय वस्तुओं की माँग इस समय यूरोप एवं पश्चिम एशिया में सर्वाधिक थी. आगरा, दिल्ली एवं बंगाल में हजारों निजी एवं राजकीय कारखाने थे, जहाँ पर अनेक प्रकार की वस्तुओं का निर्माण होता था. वस्त्र उद्योग इस समय बहुत अधिक उन्नत दशा में था. उसके समय के यूरोपीय यात्रियों ने उसके शासनकाल की अत्यधिक प्रशंसा की है. उल्लेखनीय है कि, शाहजहाँ का शासनकाल न्याय के लिए भी प्रसिद्ध है. न्याय की नजर में सभी व्यक्ति समान थे तथा अपराधियों को कठोर दण्ड दिए जाते थे.
जनहित के कार्य—शाहजहाँ की जनहित में कार्य करने की अत्यधिक रुचि थी. उसने अनेक प्रमुख व्यापारिक मार्गों एवं राजमार्गों पर सरायों का निर्माण करवाया. शिक्षा के विकास के लिए मदरसे एवं मकतब खोले गए तथा अनेक चिकित्सालयों का निर्माण भी उसके द्वारा करवाया गया.
शाहजहाँ ने अपने समय में दक्षिण में पड़ने वाले अकाल में स्वयं उसने राहत कार्यों की देख-रेख की.
साहित्य की प्रगति — शाहजहाँ के समय में साहित्य की भी अत्यधिक उन्नति हुई. उसका पुत्र दारा स्वयं एक बड़ा विद्वान् था. उसने अथर्ववेद एवं उपनिषदों का फारसी में अनुवाद करवाया. अब्दुल हमीद लाहौरी ने 'पादशाहनामा' एवं खाफी खाँ ने 'मुन्तखाब-उल-लुबाब' की रचना उसी के दरबार में रहते हुए की. मुंशी बनवारीदास ने 'प्रबोध चन्द्रोदय' का फारसी में अनुवाद किया.
इन सभी के अतिरिक्त शाहजहाँ ने हिन्दी के विकास के लिए उसके प्रमुख कवियों को संरक्षण प्रदान किया. सुन्दरदास ने 'सुन्दर शृंगार', 'सिंहासन बत्तीसी' एवं 'बारहमासा' की रचना की तथा संस्कृत के विद्वान् जगन्नाथ पण्डित ने उसी के दरबार में रहते हुए 'गंगा लहरी' की रचना की और 'महाकवि' की उपाधि प्राप्त की.
स्थापत्य का विकास – स्थापत्य की दृष्टि से शाहजहाँ का शासनकाल निःसन्देह स्वर्णकाल था. उसने अनेक सुन्दर नगरों एवं भव्य भवनों का निर्माण करवाया. शाहजहाँ ने दिल्ली में 'शाह जहानाबाद' का नगर एवं ऐतिहासिक 'लाल किला' का निर्माण करवाया. इसमें 'दिवान-ए-आम' एवं 'दिवान-ए-खास ' दो अत्यन्त ही भव्य भवन हैं. दिवान-ए-खास को पृथ्वी पर स्वर्ग के समान माना गया है. 
इसके अतिरिक्त शाहजहाँ ने जामा मस्जिद (दिल्ली), मोती मस्जिद (आगरा) तथा जहाँगीर के मकबरे (लाहौर) का निर्माण भी करवाया. शाहजहाँ के शासनकाल की सर्वाधिक उल्लेखनीय इमारत आगरा का 'ताजमहल' है, जो आज पूरे विश्व के लिए आश्चर्य का विषय है.
शाहजहाँ ने अपने बैठने के लिए रत्नों से सुसज्जित मयूर सिंहासन का निर्माण करवाया था, जिसमें विश्व का प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी जड़ा था.
अन्य कलाओं को प्रश्रय – शाहजहाँ ने संगीत को अपने दरबार में संरक्षण दिया तथा वह स्वयं संगीत का अच्छा जानकार था. उसके समय में जगन्नाथ ध्रुपद के प्रसिद्ध गायक थे. इसके अतिरिक्त चित्रकला की भी उसके समय में अत्यधिक उन्नति हुई.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, शाहजहाँ कौशल, शिक्षा एवं साहित्य के साथ-साथ व्यापार एवं का शासनकाल शान्ति व्यवस्था, आर्थिक सम्पन्नता, कलावाणिज्य के विकास का काल होने के कारण उसे हम ‘स्वर्ण युग' मान सकते हैं.
> शाहजहाँ का शासनकाल 'स्वर्ण-युग' नहीं था
शाहजहाँ के शासनकाल को स्वर्ण युग मानने वाले इतिहासकारों के विरुद्ध एडवर्ड एवं गैरट ने लिखा है कि, 'शाहजहाँ के शासनकाल में केवल ऊपरी चमक-दमक दिखाई देती है, वास्तविक स्थिति इससे भिन्न थी. अनेक उपलब्धियों के बावजूद भी शाहजहाँ का शासनकाल मुगल साम्राज्य और उसकी अर्थव्यवस्था के पतन की ओर इंगित करती है."
शाहजहाँ ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर, अपने भाइयों की हत्या करवा कर राजगद्दी को प्राप्त किया था. इसी का अनुसरण उसके पुत्रों ने किया जो मुगलों के पतन का प्रमुख कारण बना.
शाहजहाँ एक आराम तलब एवं अनुदार व्यक्ति था. उसकी मध्य एशियाई और दक्षिण नीति अधिक सफल नहीं रही. इस युद्ध में उसकी केवल प्रतिष्ठा ही बढ़ी तथा धन-जन की महान् हानि हुई, कोई राजनैतिक लाभ नहीं.
शाहजहाँ के शासनकाल में विद्रोह एवं षड्यन्त्र लगातार होते रहे. अतः उस काल को शान्ति एवं व्यवस्था का काल कहना उचित नहीं. उसके समय में हुआ उत्तराधिकार का युद्ध नरसंहार का और विश्वासघात का घिनौना रूप था.
व्यवस्था में शिथिलता आ शाहजहाँ ने प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ परिवर्तन अवश्य किए, लेकिन वे मौलिक नहीं थे. इससे प्रशासनिक और प्रान्तीय शासक शक्तिशाली बने. उसकी सैनिक शक्ति में उतनी धार नहीं रही, तभी तो तीन बार सैनिक अभियान करने के बावजूद भी कान्धार को अपने अधीन नहीं कर सका.
शाहजहाँ ने अपने शासनकाल में अनेक युद्ध लड़े तथा अनेक भवनों का निर्माण करवाया जिससे उसका राजकोष रिक्त हो गया तथा उसकी पूर्ति के लिए उसने राजस्व दर को बढ़ाकर 1/3 से 1/2 कर दिया इससे आम जनता की परेशानी बढ़ गई. इसी से स्पष्ट है कि एक ओर तो उसने अपनी शान और शौकत को लगातार बढ़ाता रहा, लेकिन उसके बदले जनता को अपार कष्ट सहना पड़ा.
शाहजहाँ के समय में सामाजिक विषमता में भी वृद्धि हुई और समाज सुविधा भोगी तथा सुविधाहीन दो वर्गों में बँट गया. फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने जनसाधारण की हीन दशा का वर्णन किया है..
शाहजहाँ ने अकबर की धार्मिक उदारता की नीति का परित्याग कर दिया तथा उसने हिन्दुओं पर तीर्थयात्रा कर लगा दिया, उनके मन्दिर नष्ट कर दिए गए. राजपूतों से सम्बन्धों में भी कटुता आ गई थी.
शाहजहाँ का काल मुख्य रूप से कलात्मक प्रगति के लिए विख्यात है, लेकिन प्रगति केवल ऊपरी थी. उसके द्वारा निर्मित भवनों में सौन्दर्य अवश्य है, लेकिन मौलिकता नहीं इसी तरह जो प्रगति कला एवं संगीत के क्षेत्र में अकबर एवं जहाँगीर के समय में हुई थी, वैसी प्रगति उसके शासनकाल में नहीं हुई. अबुल फजल, तुलसी, सूरदास जैसी साहित्य की महान् विभूतियाँ उसके शासनकाल में नहीं हुईं.
अतः उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, शाहजहाँ का शासनकाल किसी तरह से स्वर्ण युग नहीं था, बल्कि उसका युग राजकीय शान-शौकत का था.
> औरंगजेब की धार्मिक नीति पर प्रकाश
औरंगजेब की धार्मिक नीति अत्यन्त विवाद का विषय है. अनेक भारतीय और विदेशी इतिहासकारों ने उसे धर्मान्ध तथा कट्टर सुन्नी मुसलमान सिद्ध करने का प्रयास किया है, जबकि आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार, औरंगजेब धर्मान्ध नहीं था, बल्कि उसके कार्य राजनीति से प्रेरित थे. उसने न केवल मन्दिरों को तोड़ा, बल्कि उन्हें अनुदान भी दिया. उसने इस्लाम की कुरीतियों को दूर करने का भी प्रयास किया फिर भी उसे निम्नलिखित कारणों से धर्मान्ध घोषित करने का प्रयास किया है.
औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था तथा इस्लाम के नियमों का बड़ी कठोरता से पालन करता था. उसे कोई भी धर्म-विरोधी कार्य सहन नहीं होता था. उसने अपनी राजगद्दी भी कट्टर मुसलमानों के समर्थन से प्राप्त की थी. अतः शासक बनते ही उसने घोषित किया कि, इस देश को जो 'दारुल हर्ब' है, को 'दारुल इस्लाम में बदलना है. उसने सिक्कों पर 'कलमा' खुदवाना बन्द कर दिया. नौरोज का त्यौहार तुलादान, झरोखा दर्शन आदि को भी इस्लाम विरोधी मानकर प्रतिबन्धित कर दिया.
अपने शासनकाल के ग्यारहवें वर्ष में उसने दरबार में संगीत एवं गवैयों पर रोक लगा दी. शराब के निर्माण एवं बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया. इसी तरह औरंगजेब ने होली, मुहर्रम, बसन्तोत्सव जैसे त्यौहार, जुआ खेलने, तिलक लगाने स्त्रियों को मजारों पर जाने पर रोक लगा दी एवं दाढ़ी और एवं मूर्तियाँ रखने पर रोक के साथ कब्रों को छत से ढकने, पाजामे की लम्बाई तक निश्चित कर दी. उसने इतिहासलेखन विभाग बन्द कर दिया तथा कुरान के अनुसार उसने अपना जीवन व्यतीत करना प्रारम्भ कर दिया, जिससे वह 'दरवेश' अथवा 'जिन्दापीर' के नाम से जाना जाने लगा.
औरंगजेब ने इस्लाम धर्म को संरक्षण देने के लिए अनेक कार्य किए. पुराने मस्जिदों का पुनर्निर्माण तथा उनके लिए धन की व्यवस्था की. मुसलमान व्यापारियों के व्यापार को कर मुक्त कर दिया. वहीं हिन्दुओं पर उसने 5% टैक्स लगा दिया. राज्य के कुछ पद जैसे—करोड़ी, पेशकार आदि केवल मुसलमानों के लिए ही सुरक्षित कर दिए. उसने शरियत के नियमों का जनता से पालन करवाने के लिए 'मुहतसिब' नामक अधिकारियों की नियुक्ति की.
उसने हिन्दुओं को मुसलमान बनने को प्रेरित करने के लिए उन्हें नौकरियाँ, सम्मान और धन का लालच दिया. उनके धार्मिक उत्सवों पर प्रतिबन्ध लगा दिया. 1665 ई. में गुजरात के सोमनाथ मन्दिर सहित अनेक मन्दिरों को तुड़वा दिया. उसने बनारस, मथुरा, उड़ीसा, राजपूताना और अन्य अनेक मन्दिरों को तोड़ दिया. औरंगजेब ने 1679 ई. में अकबर द्वारा हटाए गए 'जजिया कर' को पुनः लागू कर दिया. उसके साथ ही धर्मयात्रा पर भी कर लगाया गया.
उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर औरंगजेब को एक धर्मान्ध व्यक्ति भी माना जा सकता है. इसलिए लेनपूल ने लिखा है कि, “अपने इतिहास में मुगलों ने पहली बार एक कट्टर मुसलमान को देखा – एक ऐसा मुसलमान जो अपना भी दमन उतना ही करता था, जितना कि अपनी प्रजा का और एक ऐसा बादशाह जो अपने धर्म के लिए अपना राज्य सिंहासन भी छोड़ने को तैयार था." लेकिन उसके शासनकाल की घटनाओं का गहराई से विश्लेषण करें, तो उसकी नीति के प्रति ठोस राजनैतिक कारण नजर आते हैं. उसने मन्दिरों को राजनैतिक कारणों से ही तोड़ा, क्योंकि उत्तर भारत के प्रमुख मन्दिर शिक्षा के केन्द्र थे, जहाँ हिन्दू और मुसलमान दोनों आते थे. उसने अपने लम्बे अभियान के बावजूद भी दक्षिण के मन्दिरों को नहीं तोड़ा. उसके समय में बंगाल में नए मन्दिरों का निर्माण भी हुआ. इसके अतिरिक्त औरंगजेब ने अनेक मन्दिरों को अनुदान भी दिया. चित्रकूट, गुवाहाटी, उज्जैन, गया इत्यादि के मन्दिरों को दान दिए जाने के प्रमाण भी मिलते हैं. उसका जजिया कर लगाने का उद्देश्य मराठे एवं राजपूतों के विरुद्ध जो इस समय युद्ध पर उतारू थे, के विरुद्ध मुसलमानों को संगठित करना था तथा अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार लाना था. उसके समय में हिन्दू सरदारों की संख्या शाहजहाँ के शासनकाल की संख्या से बहुत अधिक थी. अतः यह कहना कि उसने 'इस्लाम को राष्ट्र धर्म' घोषित कर दिया था, वस्तुतः गलत है.
फिर भी उसने अपने कार्यों को इस तरह से सम्पादित किया कि, हिन्दू जनता में उसके प्रति रोष उत्पन्न हुआ और मुगल राज्य के पतन में उसकी नीति एक प्रमुख कारण बन गई.
> औरंगजेब और जाट विद्रोह : टिप्पणी
औरंगजेब के शासनकाल का प्रथम विद्रोह जाट लोगों का था, जो पेशे से किसान थे और मथुरा, मेरठ आदि के आस-पास बसे थे. इन लोगों की लगान सम्बन्धी अनेक समस्याएँ थीं, जिसके विरुद्ध एवं मुगल अधिकारियों के व्यवहार के विरुद्ध आवाज उठाते रहते थे.
औरंगजेब के समय मथुरा के जाटों ने स्थानीय जमींदार गोकला जाट के नेतृत्व में 1669 ई. में मुगल फौजदार अब्दुल नवी के अत्याचारों से तंग आकर विद्रोह कर दिया और उसकी हत्या कर दी. सरकारी खजाने एवं गोदाम लूट लिए, अनेक मुल्ला-मौलवियों को मार दिया व मस्जिदें तोड़ डालीं. इस पर औरंगजेब स्वयं मथुरा गया और मथुरा के नए फौजदार हसन अली खाँ के नेतृत्व में जाटों एवं मुगल सेना के मध्य युद्ध हुआ जिसमें गोकला पराजित हुआ और मार डाला गया.
इसके बाद जाटों ने अपनी पराजय का बदला लेने के लिए राजाराम के नेतृत्व में अपने आपको सैनिक ढंग से संगठित किया तथा मार-काट एवं लूट-खसोट प्रारम्भ कर दी और यहाँ तक कि आगरा के पास सिकन्दरा में अकबर के मकबरे को भी लूटा. अतः इनका दमन करने के लिए आमेर के शासक विशन सिंह को मथुरा का फौजदार बनाकर भेजा जिसने जाटों को पराजित कर दिया और संघर्ष के दौरान 1688 ई. में राजाराम की हत्या कर दी गई, परन्तु शीघ्र ही जाट चूड़ामन के नेतृत्व में संगठित हो गए. इस समय औरंगजेब को दक्षिण में जाना पड़ा. अतः जाटों ने अपनी शक्ति का विस्तार किया और औरंगजेब की मृत्यु के बाद भरतपुर में स्वतन्त्र जाट राज्य की स्थापना चूड़ामन ने की.
> औरंगजेब एवं सिख सम्बन्ध
जहाँगीर द्वारा सिखों के 5वें गुरु अर्जुनदेव की हत्या करवाए जाने के बाद से ही सिखों और मुगलों के सम्बन्धों में कटुता आनी प्रारम्भ हो गई थी तथा यह कटुता शाहजहाँ के समय और बढ़ी तथा औरंगजेब के समय तक यह अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई.
औरंगजेब की सिखों से दुश्मनी उसके उत्तराधिकार के युद्ध के समय ही प्रारम्भ हो गई थी, जब उनके गुरु हरराय ने औरंगजेब के विरोधी दारा की मदद की. इस पर गुरु को अपने पुत्र रामराय को बन्धक के रूप में औरंगजेब के पास रखना पड़ा. इसी बीच 1661 ई. को गुरु हरराय की मृत्यु हो गई.
गुरु हरकिशन और तेगबहादुर गुरु हरराय की मृत्यु के बाद गुरु हरकिशन को गद्दी पर बैठाया गया. इस पर रामराय ने विरोध किया. अतः सिखों में उत्तराधिकारी का प्रश्न पैदा हो गया और रामराय ने औरंगजेब से सहायता की माँग की. इसी समय 1664 ई. में गुरु हरकिशन की मृत्यु हो गई तब तेगबहादुर अधिकांश सिखों का समर्थन प्राप्त कर गद्दी पर बैठ गए. अतः रामराय ने फिर से औरंगजेब से सहायता की माँग की. अतः औरंगजेब ने गुरु तेगबहादुर को दिल्ली बुलवाया, लेकिन उसके विरुद्ध आमेर के राजा जयसिंह के कारण कोई कार्यवाही नहीं कर सका और जयसिंह के साथ गुरु असम चले गए और वहाँ से आने के बाद गुरु ने अपना निवास आनन्दपुर में बना लिया तथा कश्मीर के प्रान्तीय शासक के धार्मिक अत्याचारों के विरुद्ध ब्राह्मणों को भड़काना प्रारम्भ कर दिया. इसके साथ ही उन्होंने कुछ मुसलमानों को सिख भी बना लिया. इस पर औरंगजेब क्रुद्ध हो गया तथा उन्हें पकड़कर दिल्ली लाया गया और इस्लाम न स्वीकार करने पर 1675 ई. में उनकी हत्या करवा दी गई. इस कारण औरंगजेब एवं सिखों के सम्बन्ध अत्यन्त ही खराब हो गए तथा इसके कारण राज्य को घातक परिणाम भुगतने पड़े और सिख अब सैनिक तैयारी करने लगे.
गोविन्द सिंह और औरंगजेब – तेगबहादुर की मृत्यु के बाद सिखों के 10वें गुरु गोविन्द सिंह (1675-1708) बने. इन्होंने सिखों को संगठित कर एक सैनिक जाति के रूप में बदल दिया और खालसा पंथ की स्थापना की.
गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की सहायता से आस-पास (पंजाब) के पहाड़ी प्रदेश के स्थानीय शासकों को पराजित कर अपनी स्थिति मजबूत कर ली. अतः औरंगजेब ने लाहौर तथा सरहिन्द के प्रशासकों को सहायता दी. मुगल सेना ने आनन्दपुर पर आक्रमण कर दिया और गुरु को भागने पर मजबूर कर दिया. उनके दो पुत्र इस युद्ध में पकड़ लिए गए और इस्लाम स्वीकार न करने के कारण उन्हें जिन्दा दीवार में चुनवा दिया गया.
गोविन्द सिंह ने हार न मानते हुए चमकौर नामक स्थान से अपना संघर्ष जारी रखा और यहाँ उनके दो अन्य पुत्र भी युद्ध में मारे गए. अब गुरु तलबण्डी चले गए. इस समय औरंगजेब अपने दक्षिण अभियान में अत्यधिक व्यस्त था, अतः उसने लाहौर के सूबेदार से सन्धि करने का आदेश दे दिया. 1706 ई. में गुरु गोविन्द सिंह औरंगजेब से मिलने दक्षिण गए और 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हो गई तथा नए मुगल बादशाह बहादुरशाह ने गुरु से सन्धि कर ली. गुरु जब दक्षिण से उत्तर की ओर लौट रहे थे, तो मार्ग में 1708 ई. में एक अफगान हत्या कर दी. इस प्रकार स्पष्ट है कि, औरंगजेब ने सिखों के प्रति अदूरदर्शी नीति अपनाई जिससे सिख अपने को सैनिक शक्ति के रूप में संगठित करके मुगलों के लिए सिरदर्द बन गए.
> औरंगजेब और मारवाड़ सम्बन्ध : राजपूत नीति
मारवाड़ के शासक जसवन्त सिंह जब अपना कोई उत्तराधिकारी छोड़े बिना ही 1678 ई. जमरूद नामक स्थान पर अफगानों से संघर्ष करते हुए मारे गए तब औरंगजेब ने मारवाड़ को मुगल राज्य में मिलाने का निश्चय कर लिया इससे मारवाड़-मुगल सम्बन्ध बिगड़ गए.
औरंगजेब ने जोधपुर, जो मारवाड़ की राजधानी था, को एक बड़ी सेना भेजकर अपने अधिकार में कर लिया तथा सारे मारवाड़ में की नियुक्ति कर दी मुगल तथा अनेक मन्दिरों को नष्ट कर दिया. अब औरंगजेब ने जसवन्तसिंह के भतीजे इन्द्र सिंह को 36 लाख रुपए के बदले अपना करद राजा बनाकर जोधपुर में नियुक्त कर दिया और मारवाड़ पर जजिया कर लगा दिया.
इसी बीच लाहौर में महाराजा जसवन्त सिंह की रानियों ने दो पुत्रों को जन्म दिया जिसमें से एक पुत्र अजीत सिंह जीवित बच गया. अब जसवन्त सिंह का वीर सेनापति अजीत सिंह को अपने साथ लेकर दिल्ली आया तथा उसे वास्तविक उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता देने को कहा.
इस पर औरंगजेब ने अजीत सिंह को मुगल हरम में रखने तथा उसकी परवरिश करने के बाद उसका राज्य उसे सौंपने का आश्वासन दिया. इसके बाद उसने राज्य के विभाजन की भी चाल चली तथा औरंगजेब ने उसे इस्लाम स्वीकार करने को भी बाध्य किया. इससे राठौर सरदार भड़क उठे. इस पर औरंगजेब ने अजीत सिंह सहित जसवन्त सिंह की रानियों को नूरगढ़ के किले में कैद करने का आदेश दिया.
इस पर दुर्गादास राठौर ने राजपूत सरदारों को एकत्र किया तथा मुगलों को छकाते हुए रानियों और अजीत सिंह को लेकर जोधपुर चला गया और जोधपुर के राठौरों ने अजीत सिंह को अपना राजा स्वीकार कर लिया.
1679 ई. में औरंगजेब ने अब शाहजादा अकबर के नेतृत्व में एक बड़ी सेना जोधपुर भेजी जिससे दुर्गादास और उसके सरदार पराजित हो गए, तब दुर्गादास ने अजीत सिंह के साथ मेवाड़ में शरण ली. इस पर औरंगजेब ने मेवाड़ पर भी जजिया कर लगा दिया और मेवाड़ पर चढ़ाई कर दी. मेवाड़ के राणा ने उदयपुर को छोड़ जंगलों में शरण ली और छापामार युद्ध नीति से मुगलों को परेशान करना प्रारम्भ कर दिया.
शाहजादा अकबर की मेवाड़ के विरुद्ध असफलता को देखकर औरंगजेब ने उसे वापस मारवाड़ जाने का आदेश दे दिया, इससे उसने विद्रोह कर दिया (1681 ई.) और राजपूतों के साथ मिल गया तथा दुर्गादास के साथ मिलकर अजमेर पर आक्रमण कर दिया. इससे मुगलों की स्थिति और खराब हो गई. अतः औरंगजेब ने कूटनीति का सहारा लेकर मारवाड़ से अकबर (शाहजादा) और मेवाड़ को पृथक् कर दिया. इससे मारवाड़ ने अब अपना संघर्ष अकेले ही जारी रखा और छापामार युद्धों से मुगलों को परेशान करना प्रारम्भ कर दिया. अब औरंगजेब ने अपना दक्षिण अभियान प्रारम्भ कर दिया था, जिससे उसके पास मारवाड़ की तरफ ध्यान समय ही नहीं था. राठौर भी कभी मुगलों से समझौता करते और युद्ध करते और यही स्थिति उसकी मृत्यु (1707 ई.) तक बनी रही. उसके बाद 1709 ई. में अगले मुगल शासक बहादुरशाह ने अजीत सिंह को मारवाड़ का वास्तविक शासक स्वीकार कर लिया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि, औरंगजेब की मारवाड़ के प्रति अपनाई गई नीति पूर्णतया अदूरदर्शितापूर्ण थी तथा इस नीति ने मुगलों और राजपूतों के मध्य खाईं खोद दी, जो कभी भी भरी नहीं जा सकी.
> औरंगजेब और मराठा सम्बन्ध
दक्षिण भारत में औरंगजेब के समय में मुगलों के सबसे प्रबल प्रतिद्वन्द्वी मराठे थे. मराठों ने बीजापुर और अहमद नगर राज्यों की दुर्बलता का लाभ उठाकर अपनी शक्ति को संगठित कर लिया तथा उन्होंने शिवाजी के नेतृत्व में अनेक किलों को जीतकर ‘स्वतन्त्र हिन्दू राज्य' की स्थापना कर दी. शिवाजी की बढ़ती शक्ति औरंगजेब के लिए असहनीय थी. अतः उसने शिवाजी को दबाने का भरसक प्रयास किया. इसके लिए जब वह दक्षिण का सूबेदार था तब उसने बीजापुर के शासक आदिलशाह को शिवाजी को दबाने का आदेश देकर स्वयं उत्तराधिकार के संघर्ष में भाग लेने उत्तर की ओर रवाना हो गया.
बीजापुर के सुल्तान ने अफजल खाँ को शिवाजी को पकड़ने के लिए भेजा, जिसकी शिवाजी ने बघनखा से 1659 ई. में हत्या कर दी और बीजापुर के अनेक इलाकों पर अधिकार कर लिया. अतः औरंगजेब ने शासक बनने के बाद ‘शाइस्ता खाँ' को दक्षिण का सूबेदार बनाकर भेजा. इस पर 1663 ई. में रात्रि में शिवाजी ने शाइस्ता खाँ के शिविर पर आक्रमण कर दिया तथा शाइस्ता खाँ को भागने पर विवश होना पड़ा इससे दक्षिण में शिवाजी की प्रतिष्ठा बढ़ गई.
जब 1664 ई. में शिवाजी ने सूरत के प्रसिद्ध मुगल बन्दरगाह को लूट लिया तब औरंगजेब ने अपने सबसे योग्य सेनानायक आमेर के कछवाहा राजा जयसिंह को शिवाजी के विरुद्ध भेजा.
मिर्जा राजा जयसिंह ने कूटनीति एवं सैनिक शक्ति के बल पर शिवाजी के अनेक किलों को जीत लिया तथा अन्त में शिवाजी को पुरन्दर के किले में चारों ओर से सन्धि करने पर विवश कर दिया. शिवाजी और जयसिंह के मध्य जून 1665 ई. में ‘पुरन्दर की सन्धि' हुई जिसके अनुसार, शिवाजी 4 लाख हूण वार्षिक आय वाले किले मुगलों को देना स्वीकार कर लिया तथा बालाघाट इलाके के बदले 40 लाख हूण देना भी स्वीकार कर लिया. इसके साथ ही शिवाजी ने अपने पुत्र शम्भाजी के साथ आगरा जाना भी स्वीकार कर लिया.
शिवाजी ने 1666 ई. में आगरा की यात्रा की जहाँ दरबार में शिवाजी के साथ औरंगजेब का व्यवहार संतोषजनक नहीं रहा. इस पर शिवाजी ने अपना रोष व्यक्त तब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, परन्तु शिवाजी कैद से भाग कर दक्षिण लौट गए और मुगलों के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखा. उन्होंने अपने सभी किले मुगलों से छीन लिए तथा रायगढ़ में 1674 ई. में अपना राज्याभिषेक करवाया तथा औरंगजेब चाहकर भी उनका दमन नहीं कर सका और 1680 ई. में उनकी मृत्यु हो गई.
शिवाजी की मृत्यु के बाद उनका पुत्र 'शम्भाजी' 1680 ई. में शासक बना वह शिवाजी जितना योग्य नहीं था. मराठों का दमन करने के लिए औरंगजेब अब स्वयं दक्षिण आ गया था. 1689 ई. में औरंगजेब ने संगमेश्वर नामक स्थान पर अचानक धावा बोलकर शम्भाजी को उनके मन्त्रियों सहित गिरफ्तार कर लिया और उन्हें अपमानित कर उनकी हत्या कर दी. शम्भाजी की हत्या के बाद मुगलों का अधिकार महाराष्ट्र पर हो गया तथा इसी के साथ मराठा इतिहास में 'स्वराज के लिए संघर्ष' का प्रादुर्भाव हुआ. अब मराठों ने राजाराम के नेतृत्व में मुगलों से छापामार लड़ाई प्रारम्भ कर दी तथा जिंजी, सतारा आदि स्थानों को अपना केन्द्र बनाकर वे मुगलों से लड़ते रहे.
1700 ई. में राजाराम की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ताराबाई ने मुगलों का प्रतिरोध जारी रखा और अनेक स्थानों पर अधिकार कर लिया तथा औरंगजेब अपनी सम्पूर्ण शक्ति का प्रयोग करने के बाद भी मराठों के विरुद्ध सफल नहीं हो सका. अतः औरंगजेब उनसे सन्धि करने को विवश हो गया. मराठों ने शाहू को राजा बनाने एवं दक्षिण के छः क्षेत्रों से 'चौथ' एवं 'सरदेशमुखी' वसूल करने की माँग की जिसे औरंगजेब के द्वारा ठुकरा दिया गया.
1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हो गई तब नए शासक बहादुरशाह ने शाहू को मराठों का नेता स्वीकार कर लिया और मुगल-मराठा संघर्ष समाप्त हो गया.
मुगलों एवं मराठों के मध्य चलने वाले इस लम्बे संघर्ष ने दक्षिण की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया, मुगल राज्य की नींव को खोखली बना दिया और मराठा स्वतन्त्रता संग्राम ने औरंगजेब की कमर तोड़ दी और बहीं उसकी कब्रगाह भी बन गई.
> क्या औरंगजेब की नीतियाँ मुगल साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी थीं
इतिहासकार लेनपूल के अनुसार, “मुगल साम्राज्य के पतन के लिए औरंगजेब ही मुख्य रूप से उत्तरदायी था. उसकी नीतियों ने मुगल साम्राज्य में विद्रोहों का ताँता लगा दिया तथा प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था नष्ट कर दी. एक शासक रूप में वह पूर्णतया विफल रहा और उसका पूरा जीवनकाल संघर्षों से भरा रहा."
उपर्युक्त कथन के अनुसार, औरंगजेब मुगल साम्राज्य के पतन के लिए पूर्णतया उत्तरदायी ठहरता है, लेकिन यह एकपक्षीय दृष्टिकोण प्रतीत होता है. मुगल साम्राज्य के पतन के लिए वह पूर्णतया उत्तरदायी नहीं था.
औरंगजेब एक प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति था, लेकिन उसकी कुछ नीतियों ने अवश्य ही मुगल साम्राज्य के पतन की प्रक्रिया को आरम्भ किया. उसकी धार्मिक नीति ने बहुसंख्यक हिन्दुओं को, जो मुगल राज्य का आधार स्तम्भ थे, नाराज कर दिया. वे औरंगजेब को केवल मुसलमानों का ही सम्राट मानने लगे. धर्म के आधार पर ही सिखों, जाटों सतनामियों, मराठों और दक्षिण की शिया रियासतों ने भी औरंगजेब का विरोध किया. उसकी मृत्यु के समय तक अनेक स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना के प्रयास हुए. अकबर की 'सुलह-ए-कुल' की नीति का अनुसरण न कर तथा हिन्दुओं पर जजिया कर लगाकर उसने बड़ी भारी भूल की तथा राजपूतों को विरोधी बनाकर उसने महत्वपूर्ण सेनानायकों को खो दिया.
औरंगजेब अनावश्यक रूप से लम्बे-लम्बे युद्धों में उलझा रहा इससे उसे बड़ी आर्थिक हानि उठानी पड़ी जिससे प्रशासनिक-तन्त्र की शिथिलता बढ़ी और राजकोष को पूरा करने के लिए जनता पर भारी कर लगाने पड़े. उसने जनहित के कार्य नहीं किए इससे उसने सामान्य जनता का भी समर्थन खो दिया.
मुगल साम्राज्य के पतन के लिए औरंगजेब की नीतियों के साथ ही उसका चरित्र भी कम उत्तरदायी नहीं है. वह एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था और कुरान के नियमों का पालन सभी लोगों से करवाना चाहता था जो सम्भव नहीं था. वह अत्यधिक शंकालु प्रकृति का था. अतः सारी शक्ति को उसने अपने हाथों में केन्द्रित कर लिया. वह अपने सलाहकारों की बात भी नहीं सुनता था. फलतः उसके शहजादे अकबर ने विरोध कर दिया, जिसका दमन करने के प्रयास में उसने राजपूतों, सिखों एवं मराठों को अपना शत्रु बना लिया और जीवन भर उनसे जूझता रहा.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, औरंगजेब की नीतियों ने एक ऐसी प्रक्रिया को जन्म दिया जिससे कि मुगल साम्राज्य का संगठित रहना संदिग्ध हो गया. इसलिए उसकी मृत्यु के तुरन्त बाद नए स्वतन्त्र राज्यों की नींव पड़ी. हालांकि मुगलों के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे, परन्तु उसमें प्रमुख भूमिका का निर्वाह औरंगजेब की नीतियों ने किया.
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Sun, 08 Oct 2023 09:09:06 +0530 Jaankari Rakho
विस्तार एवं संगठन–शेरशाह सूर एवं उसका प्रशासन https://m.jaankarirakho.com/418 https://m.jaankarirakho.com/418 विस्तार एवं संगठन–शेरशाह सूर एवं उसका प्रशासन

> द्वितीय अफगान साम्राज्य शेरशाह सूर
> शेरशाह के प्रारम्भिक जीवन का परिचय या फरीद से शेरशाह बनने तक
तारीख-ए-शेरशाही में शेरशाह के जीवन एवं कार्यों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है. शेरशाह के बचपन का नाम फरीद था. उसके पिता हसन खाँ गंगू थे तथा पितामह इब्राहिम खाँ सूर थे, जो मूलतः अफगानिस्तान के शेरगढ़ी इलाके के रहने वाले थे. लगभग 1452-53 ई. में सुल्तान बहलोल लोदी ने अफगानों को भारत आकर बसने को प्रेरित किया. अतः आने वाले अफगानियों के साथ इब्राहिम सूर भी रोजगार की तलाश में भारत गया.
सुल्तान सिकन्दर लोदी के समय जौनपुर के सूबेदार जमाल खाँ ने हसन खाँ के कार्यों से प्रसन्न होकर उसे सहसाराम, ख्वासपुर एवं हांड़ा की जागीरें दे दीं.
फरीद भी अपने पिता के साथ सहसाराम आ गया जहाँ उसके साथ उसकी सौतेली माता का व्यवहार ठीक नहीं रहा. इस पर वह पुनः जौनपुर आ गया और यहाँ उसने अरबी व फारसी का अध्ययन किया. उसकी प्रतिभा से सभी लोग प्रभावित थे. जौनपुर के सूबेदार जमाल ख़ाँ ने फरीद के पिता हसन को इस बात के लिए राजी कर लिया कि फरीद उसके प्रबन्ध का कार्य करे. अतः फरीद सहसाराम आ गया.
> जागीरदार फरीद
फरीद ने लगभग 21 वर्ष तक अपनी जागीर का प्रबन्ध किया. इस कारण उसे पर्याप्त रूप से प्रशासनिक शिक्षा एवं अनुभव प्राप्त हो गये. इस अवधि के दौरान उसने कृषकों, जमींदारों एवं मुकद्दमों से सीधा सम्पर्क साधा. विद्रोही जमींदारों पर नियन्त्रण स्थापित किया, कृषि एवं भू-राजस्व व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त कर दिया. फरीद ने मुकद्दम एवं अन्य हिन्दू पदाधिकारियों को जो समय पर कर नहीं चुकाते थे, राजकीय आज्ञा का पालन नहीं करते थे, उन्हें उसने कठोर दण्ड दिया. अतः उसकी जागीर की व्यवस्था बहुत अच्छी हो गई.
> फरीद और इब्राहीम लोदी
फरीद अपनी सौतेली माता के व्यवहार से दुःखी होकर 1518 ई. में सुल्तान इब्राहीम लोदी के पास चला गया और उसके विश्वासपात्र दौलत खाँ की सहायता से उसने अपनी जागीर पुनः पाने का प्रयास किया, परन्तु उसे इब्राहीम लोदी द्वारा कोई सहायता नहीं मिली, लेकिन 1523 ई. में उसके पिता हसन खाँ की मृत्यु के बाद इब्राहीम लोदी ने फरीद को उसकी पूरी जागीर सौंप दी तथा फरीद ने वापस आकर जागीर के बँटवारे का प्रस्ताव रखा जिसे मानने से फरीद ने अपनी जागीर सँभाल ली. इस पर उसके सौतेले भाई ने इनकार कर दिया और वह दक्षिण बिहार के शासक बहार खाँ की सेवा में चला गया.
> बहार खाँ और फरीद
फरीद को बहार खाँ के साथ रहकर अपनी प्रतिभा को दिखाने का अवसर मिला. अपनी बुद्धिमानी एवं दूरदर्शिता के कारण उसने बहार खाँ पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया तथा बहार खाँ ने अपने छोटे पुत्र जलाल का उसे शिक्षक (अतालिक) नियुक्त कर दिया. एक दिन शिकार खेलते समय फरीद ने तलवार के एक वार से एक शेर को मार दिया. इससे प्रसन्न होकर बहार खाँ ने फरीद को ‘शेरखाँ' की उपाधि प्रदान कर दी, अब फरीद शेरखाँ कहा जाने लगा. 
> बाबर और शेरखाँ
शेरखाँ ने एक बार पुनः भाग्य आजमाने के चक्कर में आगरा में जुनैद बरलास की सहायता से मुगल बादशाह बाबर के दरबार में प्रवेश किया तथा उसे मुगल सेना में भर्ती कर लिया गया. शेरखाँ ने मुगल सेना में रहते हुए मुगल सैनिकों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया तथा इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यदि भाग्य ने साथ दिया तो मुगलों को आसानी से हराकर भारत से बाहर किया जा सकता है. बाबर भी शेरखाँ से शंकित था तथा वह शेरखाँ पर नजर रखे हुए था. शेरखाँ ने बाबर के अनेक सैनिक अभियानों में सहायता दी. फलतः शेरखाँ को बाबर ने उसकी जागीर वापस कर दी. 
> बिहार में शेरखाँ पुनः
शेरखाँ को जब यह अहसास हो गया कि उसका मुग़लों के साथ अधिक दिनों तक निर्वाह नहीं हो सकता तो वह 1528 ई. में पुनः बहार खाँ ( पूर्व संरक्षक) के पास चला. आया और फिर से जलाल खाँ का संरक्षक बन गया. बहार खाँ की मृत्यु के बाद वह जलाल खाँ की माता जो अल्पायु जलाल की संरक्षिका भी थी, का वकील (सलाहकार) नियुक्त हुआ. अब उसने अपनी शक्ति का विस्तार करना आरम्भ किया और सेना व प्रशासन में अपने आदमियों की नियुक्ति प्रारम्भ की. फलतः दक्षिण बिहार में उसका प्रभुत्व स्थापित हो गया और वह शासक बन बैठा.
इसी के बीच सुल्तान इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी ने बिहार पहुँचकर उसे बिहार के अफगानों का नेता मानकर बाबर से अन्तिम संघर्ष करने को आमन्त्रित किया. महमूद ने जलाल खाँ को अपने संरक्षण में लेकर दक्षिण बिहार का शासन प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया. अतः शेरखाँ पुनः सहसाराम चला गया. अब महमूद खाँ ने बाबर पर आक्रमण की योजना बनाई और अफगानों को मिलाकर चुनार के किले का घेरा डाल दिया, लेकिन बाबर ने तेजी से अफगानों, पर आक्रमण किया, इससे अफगानों की हार हो गई. महमूद भागकर बंगाल चला गया. शेरखाँ इस युद्ध में भाग लेते हुए भी अलग रहा तथा बाबर से इसने क्षमा माँग ली. इस पर बाबर ने जलाल खाँ को दक्षिणी बिहार का शासक एवं शेरखाँ को उसका सहायक मान लिया. इससे शेरखाँ की शक्ति और प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि हुई और उसे दक्षिणी बिहार में अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिल गया. 1530 ई. में शेरखाँ ने चुनार के किले पर अपना अधिकार जमा लिया और चुनार के भूतपूर्व गवर्नर ताजखाँ की विधवा लाड मलिका से अपना विवाह कर लिया इससे उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा की ख्याति फैल गई और अब वह अफगानों का वास्तविक नेता बन गया.
> मुगल-अफगान संघर्ष : शेरखाँ से शेरशाह
जून, 1539 ई. को चौसा नामक स्थान पर हुमायूँ और शेरखाँ के मध्य हुए युद्ध में शेरखाँ ने हुमायूँ को पराजित कर दिया था. इस विजय के उपरान्त शेरखाँ ने अपनी उपाधि शेरखाँ से 'शेरशाह' रख ली और उसने कन्नौज या बिलग्राम के युद्ध (मई, 1540) के युद्ध के बाद 10 जून, 1540 को उसने-आगरा में हिन्दुस्तान की सत्ता सम्हाल ली तथा द्वितीय अफगान साम्राज्य की नींव रखी.
नोट–मुगल-अफगान संघर्ष का विस्तृत विवरण हुमायूँ और शेरखाँ नामक शीर्षक के अन्तर्गत किया गया है.
> शेरशाह द्वारा पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा कैसे की गई?  
शेरशाह ने हुमायूँ को बाहर खदेड़ देने के बाद एक दूरदर्शी शासक के रूप में अपनी बाहरी पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा के लिए ऐसा प्रबन्ध किया कि उसके जीवित रहते हुमायूँ, कामरान या मिर्जा हैदर आदि अफगान राज्य पर आक्रमण न कर सकें अपने इस उद्देश्य को सफल बनाने के लिए शेरशाह ने अग्रलिखित कार्य किये -
1. शेरशाह ने सर्वप्रथम भारत में प्रवेश के मार्ग पेशावर व बोलन पर अपना अधिकार जमाये रखने का प्रयास किया.
2. सीमा प्रान्त के उत्तरी भागों में धक्कड़ शासक सारंग मुगलों का मित्र था. अतः शेरशाह ने इनके गाँवों आदि को आक्रमण कर जला दिया तथा जिसको पाया, मार दिया की नीति अपनाई. इससे धक्कड़ दब गये.
3. शेरशाह ने इस क्षेत्र पर अपना स्थायी नियन्त्रण रखने के उद्देश्य से एक नया दुर्ग 'रोहतासगढ़' बनवाया.
4. दक्षिणी भारत में बिलौची, अफगान तथा जाटों का बाहुल्य था तथा ये किसी के नियन्त्रण में रहना पसन्द नहीं करते थे, लेकिन जब शेरशाहं हुमायूँ का पीछा करता हुआ खुशआब पहुँचा तब बिलौची एवं अफगानों ने शेरशाह की अधीनता स्वीकार कर ली. इस प्रकार शेरशाह का सिन्ध पर अधिकार हो गया.
5. शेरशाह ने इस क्षेत्र की सुरक्षा हेतु अपने योग्यतम सेना नायकों हैबत खाँ नियाजी, ख्वास खाँ, राय हुसैन जावाजी आदि की नियुक्ति की, लेकिन बाद में देखा कि लोग एक-साथ नहीं रह सकते, तब उसने अकेले हैबत खाँ नियाजी को रख दिया और उसे 'लाल छत्र' एवं ‘मसनद-ए-आला- आजम हुमायूँ' की पदवी दी तथा उसे 30,000 सैनिक रखने की अनुमति प्रदान की. हालांकि किसी अन्य प्रान्तीय शासक को इतनी बड़ी सेना रखने की अनुमति नहीं दी.
6. इसके साथ ही शेरशाह ने मुगल शत्रुओं के आन्तरिक • मामलों में हस्तक्षेप की भी चेष्टा की. इस प्रकार स्पष्ट है कि शेरशाह द्वारा इस क्षेत्र को चाक-चौबन्द कर देने के कारण मुगल भारत में प्रवेश न कर सके.
> शेरशाह और मालदेव के सम्बन्धों की समीक्षा
राणा सांगा की मृत्यु के बाद चित्तौड़ का प्रभाव राजपूताने में घट गया, तब मारवाड़ के मालदेव ने अपनी शक्ति एवं प्रभाव क्षेत्र का अत्यधिक विस्तार कर लिया और वह दिल्ली व आगरा के शासक शेरशाह को चुनौती देने की स्थिति में आ गया. अतः दोनों में युद्ध होना स्वाभाविक हो गया. दोनों के मध्य युद्ध होने के निम्नलिखित कारण थे  – 
1. मालदेव का राज्य बहुत अधिक विस्तृत था. उसके राज्य में आज के बीकानेर, जोधपुर और जयपुर के प्रदेश शामिल थे, साथ ही अजमेर एवं उत्तर का अरावली का पहाड़ी प्रदेश भी शामिल था. यदि शेरशाह अपना राज्य विस्तार राजपूताने में करना चाहता था तो उसे मालदेव से टक्कर लिए बिना पूरा नहीं कर सकता था.
2. मालदेव के विजय अभियान से बहुत से राजपूत सामन्त एवं राजे उसके शत्रु हो गये. इनमें दो प्रमुख व्यक्ति थे – (i) बीकानेर के मन्त्री नगराज, एवं (ii) मेड़ता के शासक वीरमदेव. ये दोनों मालदेव से नाराज होकर शेरशाह से सहायता लेने आगरा गये.
3. मालदेव से शेरशाह स्वयं नाराज था, क्योंकि मालदेव ने हुमायूँ को अपने यहाँ शरण देने के लिए आमन्त्रित किया था और यदि हुमायूँ मालदेव की शरण लेता तो मालदेव हुमायूँ की ओर से शेरशाह से टक्कर लेता.
स्पष्ट है कि इन परिस्थितियों में मालदेव एवं शेरशाह के मध्य युद्ध होना अनिवार्य हो गया.
> सामेल का युद्ध (1544 ई.)
शेरशाह ने लगभग 80,000 घुड़सवार, हाथी और तोपखाने के साथ मालदेव के विरुद्ध लेकर चला. और सामेल तक वह निर्विरोध पहुँच गया. उसकी सहायता के लिए वीरमदेव और नगराज भी आ मिले, लेकिन फिर भी शेरशाह की मालदेव पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं पड़ी, क्योंकि शेरशाह को इस युद्ध में अपनी पराजय का खतरा था. इस पर शेरशाह ने कूटनीति से काम लिया और उसने अपने आदमियों द्वारा मालदेव के खेमे में गुमनाम पत्र डलवा दिये जिसमें लिखा था कि, “वे लोग शेरशाह के आने से बहुत प्रसन्न हैं तथा युद्ध के समय मालदेव को पकड़कर शेरशाह के हवाले कर देंगे." ये पत्र जब पकड़े गये तो मालदेव को अपने साथ विश्वास घात होने की आशंका उत्पन्न हो गई. इस पर वह पीछे लौटने की तैयारी करने लगा. राठौर सामन्तों के विरोध के बावजूद भी मालदेव का अब लड़ने का साहस नहीं रहा और वह सामेल से भाग गया.
मालदेव के भागने के बाद उसके दो सामन्तों कूँपा और जैता ने लगभग 20,000 हजार सिपाहियों के साथ अन्धेरी पर आक्रमण कर दिया. उनका आक्रमण इतना तीव्र था कि शेरशाह बड़ी कठिनाई से उन्हें पराजित कर सका और विजय के बाद शेरशाह ने कहा कि, “अरे मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत खो बैठता."
अब शेरशाह ने मालदेव का पीछा किया और अजमेर, जोधपुर, नागौर, मेड़ता आदि स्थानों पर शेरशाह का अधिकार हो गया तथा मालदेव को भागने व पछताने के अतिरिक्त कुछ भी हाथ नहीं लगा.
> सूरवंश के पतन के कारण 
सूरवंश का शासनकाल मात्र सन् 1540 से 1545 ई. तक, अर्थात् 15 वर्षों तक रहा. शेरशाह ने अपने शासन के 5 वर्षों के दौरान राज्य की स्थिति को सुदृढ़ करने के अनेक प्रयास किये, इसके बावजूद भी भारत में इस वंश का शीघ्रता से पतन हो गया, जिसके निम्नलिखित कारण थे—
1. अफगान लोग स्वभाव से ही स्वतन्त्रता प्रिय होते हैं. इसके साथ ही इनमें अहंकार, उत्तराधिकार के नियमों का अभाव था. शेरशाह ने अपने योग्यतम पुत्र को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर बहुत बड़ी गलती की. परिणाम यह हुआ कि सूर साम्राज्य में गृह युद्ध उत्पन्न हो गया.
2. सूर साम्राज्य के गृह युद्ध से पंजाब, मालवा, राजपूताना आदि क्षेत्रों में विद्रोह होने लगे तथा ये क्षेत्र स्वतन्त्र होने का प्रयास करने लगे.
3. सूर साम्राज्य के आन्तरिक विद्रोहों के कारण ही हुमायूँ को पुनः भारत पर आक्रमण करने का अवसर मिला.
4. इस्लामाबाद ने योग्यतम अधिकारियों के स्थान पर अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्ति की जिससे प्रशासन-तन्त्र ढीला पड़ गया.
5. इस्लामशाह के उत्तराधिकारी अत्यन्त दुर्बल एवं बुद्धिहीन थे. अतः इससे उनमें आन्तरिक कलह उत्पन्न हो गया और हुमायूँ ने पुनः अपनी सत्ता परिस्थितियों का लाभ उठाकर प्राप्त कर ली.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सूर साम्राज्य के पतन में एक से अधिक कारणों ने मिलकर अपना योगदान किया जिससे उसका अत्यन्त कम समय में पतन हो गया.
> शेरशाह के केन्द्रीय प्रशासन का विवरण (Central Administrations)
भारतीय इतिहास में शेरशाह न केवल एक विजेता एवं कुशल सेनानायक के रूप ही विख्यात है, बल्कि उसकी गणना एक सक्षम प्रशासक के रूप में की जाती है. उसने अपने लिए न केवल एक बड़े राज्य की स्थापना की, बल्कि उसने अपने राज्य में सशक्त प्रशासनिक व्यवस्था भी लागू की. 'तारीख-ए-शेरशाही' के लेखक अब्बास खाँ सखनी ने शेरशाह की प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तृत विवरण दिया है. 
> शेरशाह की प्रशासनिक व्यवस्था में स्वयं की स्थिति
राज्य की समस्त शक्तियाँ शेरशाह के हाथों में ही केन्द्रित थीं. वह शासन का सर्वोच्च पदाधिकारी था. वह कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं सैनिक मामलों का प्रधान था. राज्य के समस्त कर्मचारी अपने कार्यों के लिए शेरशाह के प्रति उत्तरदायी थे. शेरशाह ने अपनी असीमित और अनियन्त्रित शक्ति के होते हुए भी उसने ‘उदार तानाशाह' (Benevolent Despot) के समान अपना आदर्श रखा था. उसने अपने कार्य प्रजा की भलाई के लिए किया. प्रो. अवधबिहारी पाण्डेय के अनुसार, “शेरशाह ने प्रजातांत्रिक आधार पर निरंकुशता स्थापित की. उसकी निरंकुशता को अफगान सरदारों का समर्थन प्राप्त था." शेरशाह ने अपनी योग्यता और क्षमता के बल एक प्रभावशाली शासन व्यवस्था का गठन किया उसके समय में प्रशासन निम्नलिखित भागों में बँटा हुआ था, जिनका विवरण निम्नलिखित है-
(i) दीवान-ए-विजारत—यह शेरशाह का सबसे महत्वपूर्ण विभाग था, जो तुर्ककालीन वजीर से मिलता-जुलता था. यह राज्य की आय-व्यय का हिसाब रखता था तथा अन्य विभागों के कार्यों का निरीक्षण करता था. शेरशाह स्वयं इस विभाग के कार्यों में रुचि लेता था.
(ii) दीवान-ए - आरिज — इस विभाग के प्रधान को ‘आरिज-ए-ममालिक' कहा जाता था, जो सैन्य-विभाग का प्रमुख होता था. सैन्य संगठन, सैनिकों की नियुक्ति, उनका वेतन, रसद इत्यादि की व्यवस्था करना इसका प्रमुख कार्य था, शेरशाह इस विभाग पर नियन्त्रण रखने के लिए स्वयं इसकी समय-समय पर जाँच किया करता था.
(iii) दीवान-ए-रसालात — यह विभाग 'दीवान-ए-मोहतासिब' कहलाता था. यह विदेशी दूतों का स्वागत करना, उनके ठहरने की व्यवस्था करना एवं आवश्यकतानुसार दूतों को विदेशों में भेजने के लिए उत्तरदायी था. अन्य राज्यों से कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित करने, पत्र-व्यवहार करने आदि का कार्य भी यह विभाग करता था.
(iv) दीवान-ए-ईन्सा– इस विभाग का कार्य राजकीय घोषणाओं को तैयार करना, उन्हें प्रसारित करने, प्रान्तीय गवर्नरों एवं स्थानीय पदाधिकारियों से पत्र-व्यवहार करने की जिम्मेदारी थी. यह विभाग राज्य के अभिलेखागार के रूप में भी कार्य करता था. राज्य में होने वाली घटनाओं की सूचना सुल्तान तक पहुँचाने का कार्य भी इसी विभाग के पास था.
(v) दीवान-ए-कजा – यह न्याय का विभाग था तथा मुख्य काजी इस विभाग का प्रधान था तथा मुख्य न्यायाधीश की हैसियत से यह राज्य में न्याय की व्यवस्था करने के प्रति उत्तरदायी था.
(vi) दीवान-ए-बरीद—यह गुप्तचर विभाग था तथा इसका प्रधान 'बरीद-ए-ममालिक' था. राज्य में घटने वाली प्रत्येक घटना के बारे में यह विभाग सुल्तान को सूचना देता था. इस विभाग के अधीन अनेक गुप्तचर थे, जो राज्य में विभिन्न स्थानों पर नियुक्त थे.
इन महत्वपूर्ण विभागों के अतिरिक्त केन्द्रीय प्रशासन से सम्बद्ध अन्य किसी पदाधिकारी का नाम नहीं मिलता. परन्तु अवश्य ही इसके अतिरिक्त सुल्तान के महल, उसकी व्यक्ति गत सम्पत्ति, सुरक्षा एवं निजी सेवा के लिए पदाधिकारी रहे होंगे.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, शेरशाह किसी सुदृढ़ केन्द्रीय शासन व्यवस्था की स्थापना नहीं कर सका, बल्कि उसने तुर्की सल्तनत के समय से चली आ रही व्यवस्था में ही आवश्यक संशोधनों एवं परिवर्तनों के साथ लागू किया. उसने नए विभागों का सृजन नहीं किया, उसके प्रबन्धक विभाग और उप-विभाग प्राचीन व्यवस्था पर ही आधारित थे. उसकी सैनिक व्यवस्था अलाउद्दीन खिलजी की सैनिक-व्यवस्था से प्रभावित थी. उसकी भू-राजस्व नीति भी मौलिक नहीं कही जा सकती.
वास्तव में शेरशाह के प्रशासन का महत्व इस बात में निहित है कि, उसने प्राचीन संस्थाओं एवं व्यवस्था को बनाए रखते हुए अपनी मौलिक प्रशासकीय नीतियों द्वारा नवीन स्वरूप प्रदान किया और ज्यादा प्रभावशाली बनाया. इस प्रकार शेरशाह एक व्यवस्था निर्माता नहीं, बल्कि एक व्यवस्था सुधारक था.
> शेरशाह : प्रान्तीय शासन (Provincial Administration)
शेरशाह के प्रान्तीय शासन व्यवस्था के विषय में हमें अधिक जानकारी प्राप्त नहीं होती है. अतः विभिन्न विद्वानों ने उसकी प्रान्तीय शासन-व्यवस्था के विषय में अलग-अलग विचार प्रस्तुत किए हैं. डॉ. कानूनगो के अनुसार, “शेरशाह प्रान्तीय शासन-व्यवस्था रखना ही नहीं चाहता था. वह केन्द्र व परगना के बीच सरकार के अतिरिक्त अन्य किसी प्रशासनिक इकाई को नहीं रखना चाहता था. हालांकि उसने सैनिक आवश्यकताओं के अनुरूप कुछ अस्थायी प्रान्तों जैसे—बंगाल, मालवा, राजपूताना एवं पंजाब आदि राज्यों का गठन किया. इसके बावजूद सभी राज्यों में शेरशाह एक जैसी शासन-व्यवस्था का गठन शेरशाह नहीं कर पाया.” लेकिन ठीक इसके विपरीत डॉ. परमात्माशरण लिखते हैं कि, शेरशाह का राज्य विभिन्न प्रान्तों में विभक्त था और उनका प्रशासन सैनिक अधिकारी प्रान्तपति की हैसियत से चलाते थे, सरकार वस्तुतः प्रान्तीय इकाई ही थे. उदाहरणस्वरूप— बंगाल की विजय के बाद खिज्र खाँ को उसका गवर्नर नियुक्त किया गया, किन्तु बाद में उसे शिकों में विभाजित कर शिकदारों की नियुक्ति की गई और इन सभी शिकदारों को 'अमीन-एबंगाल' के अधीन कर दिया गया, जो बंगाल का गवर्नर था." डॉ. आशीर्वादीलाल दिल्ली सल्तनत के अनुसार, शेरशाह के साम्राज्य को 'इक्ताओं में बँटा हुआ स्वीकार करते हैं, जिनमें सैनिक अधिकारी शासन करते थे." इस प्रकार कहा जा सकता है कि, शेरशाह ने अपने राज्य को क्षेत्रफल के आधार पर अनेक भागों में बाँटा और उस पर अपना कड़ा नियन्त्रण बनाए रखा.
> प्रान्तीय पदाधिकारी
हाकिम, अमीन, फौजदार आदि भिन्न-भिन्न नामों से प्रान्तों के अधिकारी जाने जाते थे तथा इन सभी की स्थिति एकसमान नहीं थी. पंजाब के प्रान्तपति को 'मसनद - ए - आली' की उपाधि दी गई तथा वह 30,000 सैनिक रख सकता था. इसी प्रकार बंगाल के गवर्नर ख्वास खाँ और शुजात खाँ को, जो राजपूताना एवं बंगाल के गवर्नर थे, उन्हें 20000 व 12,000 सैनिक रखने की अनुमति दी गई थी. इस व्यवस्था के कारण कुछ प्रान्तों के गवर्नर अधिक शक्तिशाली हो गए और शेरशाह की मृत्यु के बाद उन्होंने अपनी स्वतन्त्रता के प्रयास प्रारम्भ कर दिए. कहीं-कहीं पर शेरशाह ने नायब गवर्नर की भी नियुक्ति की, जो गवर्नर के कार्यों में सहायता दिया करते थे. ये सभी सैनिक अधिकारी थे, जो अपने अधीनस्थ प्रशासकीय कर्मचारियों की सहायता से प्रशासन संचालित किया करते थे.
> शेरशाह : स्थानीय प्रशासन (Local Administration)
शेरशाह के स्थानीय प्रशासन की मुख्य विशेषता पूरे राज्य में एकरूपता का होना था. उसके समय में प्रान्तों को सरकार, परगना एवं ग्राम में विभाजित किया गया था तथा विभिन्न पदाधिकारियों द्वारा इनका प्रशासन चलाया जाता था, जिनका विवरण निम्नलिखित है— 
(i) सरकार का प्रशासन– शेरशाह का सम्पूर्ण राज्य सरकारों (जिले) में बँटा हुआ था जिनकी संख्या प्रान्त के क्षेत्रफल के अनुसार घटती-बढ़ती रहती थी. सरकार के प्रशासन के लिए दो प्रमुख अधिकारी थे – (i) शिकदार-एशिकदारान एवं (ii) मुसिफ-ए-मुंसिफान.
‘शिकदार-ए-शिकदारान' अपने अधीन शिकदारों के कार्यों का निरीक्षण एवं शिक के अन्दर शान्ति व्यवस्था बनाए रखने का कार्य करता था.. इसके अतिरिक्त वह सरकारी कानूनों का पालन करवाने, शिकदारों के अनुचित कार्यों की शिकायत सूबेदारों के पास करने व फौजदारी मामले निपटाने का कार्य भी करता था. वास्तव में उसका पद एक सैनिक अधिकारी के समान था तथा उसे 5,000 तक सैनिक रखने की छूट होती थी.
'मुंसिफ-ए-मुसिफान' प्रमुख न्यायाधीश की तरह शिक में कार्य करता था, इसके अतिरिक्त वह अमीनों के कार्यों की देखभाल तथा उनके निर्णयों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करता था.
शेरशाह की यह एक बड़ी चतुराई थी कि, उसने शिक के अन्दर दो एकसमान अधिकारियों की नियुक्ति कर दोनों को एक-दूसरे पर नियन्त्रण रखने का अवसर प्रदान किया.
इन अधिकारियों के अतिरिक्त एक शिक में 'फौजदार' होता था, जो 'शिकदार-ए-शिकदारांन' के अधीन कार्य करता था. इसके अतिरिक्त एक शिक में अनेक लिपिक व अन्य छोटे पदाधिकारी रहते थे. जो प्रशासन को सुचारू रूप से संचालित करने में मदद करते थे.
(ii) परगना का शासन — शेरशाह के राज्य में 'शिक' से छोटी इकाई ‘परगना’ थी जिसके प्रशासन के लिए शिकदार, फोतदार, कारकून एवं अमीन की नियुक्ति की जाती थी. परगने का सर्वोच्च अधिकारी 'शिकदार' होता था, जिसका प्रमुख कार्य परगने में शान्ति व्यवस्था को बनाए रखने एवं राजस्व वसूलने का था. वह न्याय सम्बन्धी कार्यों को भी करता था तथा उसके पास सैनिक भी होते थे.
परगने में शिक़दार के समकक्ष ही 'मुंसिफ' नामक अधिकारी होता था वह परगने की समस्त भू-व्यवस्था का नियन्त्रक था. इस हैसियत से वह भूमि सम्बन्धी सभी विवादों को सुनता था. 'फोतेदार' परगने का कोषाध्यक्ष तथा परगने का राजस्व उसी के पास जमा होता था. यह परगने की आय-व्यय का भी ब्यौरा रखता था. प्रत्येक परगने में एक फारसी तथा एक हिन्दी भाषा के कारकून (क्लर्क) होते थे, जो भूमि सम्बन्धी व आय-व्यय सम्बन्धी सभी प्रकार के दस्तावेज तैयार करते थे. शेरशाह विद्रोहों को न पनपने देने के लिए प्रति दो वर्ष बाद शिकदारों एवं अमीनों का स्थानान्तरण कर देता था तथा स्वयं परगने के कार्यों पर नियन्त्रण रखता था.
> ग्राम प्रशासन
के शेरशाह के प्रशासन की सबसे छोटी इकाई 'ग्राम' थे, जिसमें स्थानीय तत्वों को विशेष महत्व दिया गया था. ग्राम प्रशासन का प्रधान 'मुखिया' था, जोकि सरकारी पदाधिकारी नहीं था, परन्तु उसे प्रशासन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. मुखिया, पटवारी, मुकद्दम एवं चौकीदार की सहायता से अपने गाँव में शान्ति स्थापित करने, लगान वसूलने, अपराधों की रोकथाम करने और अपराधियों को दण्डित आदि करने का कार्य करता था. शेरशाह की यह व्यवस्था थी कि, अगर गाँव में कोई अपराध करता और पकड़ में नहीं आता, तो मुखिया को दण्डित किया जाता था. शेरशाह की इस व्यवस्था से ग्रामों में पूर्णरूपेण शान्ति व्यवस्था की स्थापना हो गई.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, शेरशाह ने केन्द्रीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक एक सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना की, जिससे उसके काल में निरन्तर शान्ति व्यवस्था बनी रही.
> शेरशाह द्वारा राजस्व व्यवस्था में किए गए सुधार  (Revenue Reforms) 
शेरशाह द्वारा भू-राजस्व व्यवस्था एवं कृषि में सुधार के अनेक उपाय किए गए. उसके इन सुधारों को लागू करने का उद्देश्य यह था कि, इससे न तो राज्य को हानि हो और न ही किसानों का शोषण हो अर्थात् किसान व राज्य लिए दोनों को लाभ पहुँचाने के लिए शेरशाह ने अपने सुधार लागू किए.
शेरशाह ने अपने लगान की राशि तय करने के लिए समस्त राज्य की भूमि की पैमाइश करवाकर उसे उत्तम, मध्य और निम्न श्रेणियों में विभाजित किया तथा प्रति बीघा औसत पैदावार निश्चित की तथा उपज का 1/3 भाग लगान के रूप में निश्चित किया.
शेरशाह ने उपज की दरों को निश्चित करने के लिए एक अलग प्रणाली 'टाय' निकाली. जिसके अनुसार अलगअलग फसलों की अलग-अलग दर निश्चित की गई. इस प्रकार उसकी लगान-व्यवस्था ‘बीघेवार एवं जिसवार' पद्धति पर आधारित हो गई. किसानों को अपना राजस्व नकद या अनाज के रूप में जमा करवाने की छूट थी, लेकिन सरकार लगान नकद रूप में ही वसूल करना ज्यादातर पसन्द करती थी तथा वर्ष में दो बार लगान वसूल करती थी. किसानों को लगान के अतिरिक्त दो अन्य कर (i) जरीबाना (भूमि की नाप के लिए) एवं (2) महसीलाना ( लगान के कर्मचारियों के वेतन के लिए) भी देना पड़ता था. यह कुल उपज की 22% से 5% तक होती थी.
शेरशाह ने प्राकृतिक विपदा के समय किसानों को मदद देने के लिए सुरक्षित सहायता कोष की स्थापना की थी, जिसमें प्रति बीघा 200 बहतोली टका के हिसाब से किसानों को प्रति वर्ष जमा करना पड़ता था.
शेरशाह के समय में पैमाइश और रायं निर्धारित करने के अतिरिक़्त लगान निर्धारण की पुरानी पद्धतियाँ जैसे—लंक बटाई, रास बटाई, खेत बटाई एवं जब्ती प्रणाली भी उसके राज्य के अलग-अलग भागों में प्रचलित थी. इस व्यवस्था के अतिरिक्त शेरशाह ने किसानों की सुरक्षा के लिए अनेक उपाय किए. उसने अपने लगान वसूलने वाले अधिकारियों को किसानों को परेशान नहीं करने के आदेश दिए. उसका स्पष्ट आदेश था. कि लगान वसूलते समय कर्मचारी उदारता का व्यवहार करें. सैनिकों को भी यह आदेश दिया गया था कि, वे मार्ग में पड़ने वाली फसलों को नुकसान नहीं पहुँचाए.
शेरशाह ने अपने राज्य के प्रत्येक किसान को पट्टा जारी किया जिसमें निर्धारित लगान का विवरण लिखा रहता था. किसानों से इसकी ‘कबूलियत' लिखवाई जाती थी. प्रत्येक गाँव का पटवारी राजस्व से सम्बन्धित दस्तावेज अपने पास रखता था. 'खालसा भूमि से लगान वसूली का कार्य राजकीय कर्मचारी पटवारी एवं मुकद्दम की सहायता से करते थे. अन्य जगहों पर इसके लिए स्थानीय जमींदार उत्तरदायी थे.
इन सारे सुधारों के बावजूद शेरशाह की लगान-व्यवस्था में अनेक त्रुटियाँ थीं. इस व्यवस्था में उत्तम श्रेणी की भूमि वाले को सबसे कम तथा निम्न श्रेणी की भूमि वाले को सबसे अधिक लगान देना पड़ता था. इसके अतिरिक्त भी किसानों पर अन्य बहुत से करों का बोझ लाद दिया गया. पूरे राज्य में किसानों दोनों को परेशानी होती थी. उसकी लगान-व्यवस्था एकसमान लगान-व्यवस्था लागू न होने से कर्मचारियों एवं की सबसे बड़ी कमजोरी उसके द्वारा सिंचाई की समुचित व्यवस्था न करना था.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, शेरशाह की भू-राजस्व व्यवस्था अपने समय में प्रचलित व्यवस्था से काफी भिन्न थी, इसमें किसानों के हितों की रक्षा के लिए अनेक उपाय किए गए थे. उसकी लगान-व्यवस्था का महत्व इस बात में है कि, उसने लगान की दरों को निश्चित किया, किसानों और राज्य के अधिकारों के साथ उनके कर्त्तव्यों के साथ उनके कर्त्तव्यों को निश्चित किया तथा दोनों के मध्य ताल-मेल की स्थापना की.
> शेरशाह द्वारा किये गए आर्थिक सुधारों का मूल्यांकन (Economic Reforms)
शेरशाह ने अपने आर्थिक सुधारों के अन्तर्गत दो महत्वपूर्ण कार्य किए; यथा (1) मुद्रा-व्यवस्था में सुधार, व (2) व्यापार को प्रोत्साहन.
(1) मुद्रा-व्यवस्था में सुधार – शेरशाह द्वारा राज्य की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए व पूरे राज्य मुद्राव्यवस्था में एकरूपता लाने के लिए प्राचीन सिक्कों को बन्द कर उनके स्थान पर नए सिक्के निश्चित अनुपात में विभिन्न धातुओं के ढलवाए. उसने शुद्ध चाँदी का 'रुपया' तथा ताँबे का 'दाम' चलवाया.
शेरशाह का चाँदी का सिक्का जो रुपया कहलाता था. यह '180 ग्रेन' का होता था. इसमें 175 ग्रेन शुद्ध चाँदी की मात्रा होती थी. उसने 167 ग्रेन सोने की 'अशर्फी' का भी प्रचलन करवाया. इन मुख्य सिक्कों के अतिरिक्त शेरशाह ने चाँदी एवं ताँबे के सिक्कों के मूल्य के आधे, चौथाई, आठवें एवं 16वें भाग के छोटे सिक्के भी जारी किए. इन सिक्कों पर शेरशाह का नाम व प्रथम चार खलीफाओं के नामों का उल्लेख रहता था.
शेरशाह के इन मुद्रा सुधारों ने उसके पूरे साम्राज्य में मुद्रा-व्यवस्था में एकरूपता ला दी, जिससे व्यापार वाणिज्य को बल मिला.
(2) व्यापार को प्रोत्साहन–शेरशाह ने व्यापार वाणिज्य को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक कदम उठाए. इस हेतु उसने सर्वप्रथम सड़कों एवं सरायों की मरम्मत करवाई, जिससे कि राज्य के दूरस्थ हिस्सों में भी आवागमन सरलता से हो सके. उसने 'प्राचीन राजमार्ग' (ग्राण्ड ट्रंक रोड) की मरम्मत कराकर उसे आवागमन के योग्य बना दिया. इसके अतिरिक्त उसने आगरा, माण्डु, जोधपुर, चित्तौड़ होकर गुजरात जाने वाली सड़कों का भी निर्माण करवाया. इससे उसके पूरे राज्य में सड़कों का जाल फैल गग्रा और आवागमन में अत्यधिक सुगमता हो गई और व्यापार का विकास हुआ.
शेरशाह ने व्यापार पर लगाई जाने वाली चुंगियों को हटा दिया तथा केवल दो स्थानों पर चुंगी वसूलने की व्यवस्था कराई. व्यापारियों से राज्य में प्रवेश करते समय और बाजार में सामान बेचते समय ही चुंगी वसूल की जाती थी. इससे व्यापारियों के लाभ की मात्रा बढ़ गई. शेरशाह ने वस्तुओं के मूल्य निश्चित किए तथा व्यापारियों को निश्चित दरों पर माल बेचने को कहा. निश्चित माप-तौल के बाट - बटखरों का प्रयोग करने को कहा गया तथा सामान में मिलावट करने वालों और कम तौलने वाले व्यापारियों के लिए कठोर दण्ड का प्रावधान किया गया. व्यापारियों के
इस प्रकार स्पष्ट है कि, जहाँ शेरशाह ने हितों की रक्षा के लिए उपाय किए वहीं वह उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने में भी सफल रहा.
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Sun, 08 Oct 2023 09:01:36 +0530 Jaankari Rakho
विस्तार एवं संगठन– बाबर और हुमायूँ https://m.jaankarirakho.com/417 https://m.jaankarirakho.com/417 विस्तार एवं संगठन– बाबर और हुमायूँ

> 1526 ई. के भारत की राजनीतिक स्थिति का विवरण
1526 ई. या सोलहवीं सदी के आरम्भ में भारत की जो राजनीतिक दशा थी, उसे निम्नलिखित शीर्षकों में बाँटा जा सकता है—
(i) केन्द्रीय सत्ता का दुर्बल होना.
(ii) उत्तरी भारत के राज्य.
(iii) दक्षिणी भारत के राज्य.
(i) केन्द्रीय सत्ता का दुर्बल होना — इस समय तक दिल्ली सल्तनत अपनी सत्ता की चमक खो चुकी थी तथा इसका एक बड़ा भाग अशान्त था तथा क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने को स्वतन्त्र करने के लिए प्रयासरत थीं. अतः इस समय विद्रोहों और छिट-पुट संघर्षों का दौर चल रहा था. दिल्ली का राजसिंहासन निस्सन्देह प्रतिद्वन्द्वी गुटों के बीच उछाला जा रहा था.
इस समय प्रान्तों में कुछ संगठित राज्य भी थे, जोकि पर्याप्त रूप से सैनिक साधन सम्पन्न थे और व्यवस्थित रूप से प्रशासित थे. बंगाल, जौनपुर, मालवा, गुजरात आदि को हम ऐसे राज्यों में रख सकते हैं.
(ii) उत्तरी भारत के राज्य– बाबर के आक्रमण के समय उत्तरी भारत छोटे-छोटे अनेक राज्यों में विभक्त हो गया था और केन्द्रीय शक्ति इस समय क्षीण हो गई थी और इस समय उत्तरी भारत में निम्नलिखित प्रमुख राज्य थे-
(A) दिल्ली - इस समय दिल्ली उत्तरी भारत का सर्वप्रमुख राज्य था तथा दिल्ली का सुल्तान इब्राहीम लोदी एक विशाल साम्राज्य का स्वामी था, किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से उसका प्रभाव दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों तक ही था. उसके कठोर एवं मनमाने व्यवहार से उसके दरबारी एवं सैनिक अधिकारी तंग आ चुके थे तथा सभी उसके पतन के आकांक्षी थे. लाहौर के सूबेदार दौलत खाँ लोदी ने अपने आपको स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया था.
(B) मेवाड़ – मेवाड़ उत्तरी भारत का सर्वप्रमुख हिन्दू राज्य था. यहाँ का शासक राणा सांगा था, जोकि स्वयं दिल्ली सल्तनत पर अपना अधिकार करना चाहता था. इसका प्रभाव सम्पूर्ण राजपूताने पर था. बाबर ने स्वयं अपनी आत्मकथा में इस शासक का उल्लेख किया है.
(C) अन्य राज्य– बाबर के आक्रमण के समय पंजाब, खानदेश, उड़ीसा, कश्मीर एवं सिन्ध आदि अन्य स्वतन्त्र राज्य थे. इसमें पंजाब का शासक इब्राहीम लोदी का भाई दौलतखाँ लोदी था. उसने आपसी वैमनस्य के कारण बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमन्त्रण दिया था.
> पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर की विजय के कारण (21 अप्रैल, 1526)
पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी की पराजय और बाबर की विजय के निम्नलिखित कारण थे –
1. बाबर एक अनुभवी और महान् सेनानायक था. उसने रण-क्षेत्र में वह प्रत्येक चाल अपनाई जिससे शत्रु घबरा गया. लेनपूल के अनुसार "पानीपत के रणक्षेत्र में, मुगल सेनाओं ने घबराकर युद्ध आरम्भ किया, लेकिन उनके सम्राट की वैज्ञानिक योजना और अनोखी चालों ने उन्हें आत्मविश्वास और विजय प्रदान की."
2. बाबर की विजय में सर्वाधिक योगदान उसके शक्तिशाली तोपखाने ने दिया. इस युद्ध में लोंदी के पास कोई तोपखाना नहीं था और न ही उनके पास गोलाबारी की कोई विशेष सामग्री ही ऐसी स्थिति में बाबर के तोपखाने ने अफगान सेनाओं पर कहर बरपा दिया.
3. लोदी की पराजय का मुख्य कारण उसके सरदारों एवं सूबेदारों का उससे रुष्ट होना था. कुछ सरदारों ने केवल ऊपर से लोदी का साथ दिया तथा वे भीतर ही भीतर बाबर के सहयोगी बने रहे. स्वयं इब्राहीम के भाई व पंजाब के सूबेदार दौलतखाँ लोदी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने का निमन्त्रण भेजा था.
4. अफगानों का सैनिक संगठन मुगलों के सैनिक संगठन की तुलना में. बहुत अकुशल और दुर्बल था. लोदी के अधिकांश सैनिक किराये के थे तथा पहले उन्हें अपनी जान-माल की चिन्ता अधिक थी, जबकि मुगल सैनिक संख्या में कम होते भी हुए बहुत अच्छी तरह संगठित और व्यवस्थित थे तथा उनमें अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए जान देने की लगन थी.
5. बाबर की विजय में उसके द्वारा अपनाई गई 'तुलगमा नीति' (रिजर्व सेना) ने भी उल्लेखनीय योगदान दिया. जब युद्ध अपनी चरमसीमा पर था और दोनों ओर के सैनिक युद्ध करते हुए थक गये थे, तब बाबर की सुरक्षित सेना ने पूरे जोश और स्फूर्ति के साथ युद्ध स्थल में प्रवेश किया और बाबर को विजयश्री दिलवा दी.
इस प्रकार स्पष्ट है कि पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर के कुशल नेतृत्व, उसकी सेना का अनुशासन एवं संगठन तथा तोपखाने आदि ने मिलकर बाबर को विजयी बनाया तथा दिल्ली सल्तनत का सदा के लिए अन्त हो गया.
> पानीपत के प्रथम युद्ध का परिणाम एवं महत्व
इस युद्ध के परिणाम एवं महत्व के विषय में डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है कि, “इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक युद्ध के बाद लोदी वंश की सत्ता टूटकर नष्ट हो गई और हिन्दुस्तान का प्रभुत्व चुगताई वंश के तुर्कों के हाथों में चला गया.” इस युद्ध के महत्वपूर्ण परिणाम निम्नलिखित थे
1. इस युद्ध ने सल्तनतकाल के अन्तिम वंश लोदी वंश का नाश कर भारत में एक नये मुगल अध्याय का सूत्रपात किया.
2. इस युद्ध के बाद बाबर की एक नई मंजिल तय हो गई और उसे उत्तरी भारत पर बहुमूल्य अधिकार मिल गया. दिल्ली तथा आगरा पर अधिकार करने के बाद उसे अब भविष्य में राज्य विस्तार के लिए युद्धों की योजनाएँ ही बनानी थीं.
3. बाबर को दिल्ली, आगरा और अन्य स्थानों पर अपार धन-दौलत प्राप्त हुई. विख्यात कोहिनूर हीरा भी उसे आगरा के खजाने से प्राप्त हुआ.
4. मुगल साम्राज्य की स्थापना से राजपूतों द्वारा दिल्ली को जीतकर सारे भारत में हिन्दू शासन की स्थापना के स्वप्न मिट्टी में मिल गये. बाबर की इस विजय से मुसलमानों का डगमगाता साम्राज्य दुबारा से जम गया.
5. बाबर की युद्ध नीति और मुगल शासन की स्थापना से भारत में एक नई युद्ध-प्रणाली विकसित हुई और तोपखाने का रिवाज प्रारम्भ हो गया.
> पानीपत के युद्ध के बाद बाबर की कठिनाइयाँ
पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर की विजय ने उसे 
दिल्ली और आगरा का शासक बना दिया, लेकिन उसके सामने शासक बनते ही अनेक कठिनाइयाँ उपस्थित हो गईं. जिनका विवरण निम्नलिखित है
1. बाबर ने जब आगरा में सत्ता सम्हाली, तब उसका अधिकार क्षेत्र बहुत सीमित था. अभी उसे उत्तरी भारत का राजा तक नहीं माना जा सकता था. अतः उसे अपने अधीन क्षेत्र को विस्तारित करना था.
2. भारतीय जनता में पूर्ववर्ती अन्य लुटेरों की भाँति मुगलों के प्रति भी भय और अविश्वास की भावना घर कर गई थी. लोगों ने नगरों को छोड़ दिया था तथा नगर के फाटकों को बन्द करके लोग सुरक्षा व्यवस्था में लगे हुए थे. लोगों में मुगलों के प्रति घृणा थी. अतः बाबर को अपने भारतीय साम्राज्य में स्थायित्व लाने के लिए इन परिस्थितियों को बदलना आवश्यक था.
3. दिल्ली का राज्य सिंहासन बाबर के लिए अभी पूर्णतया असुरक्षित था. मध्यवर्ती भारत के विद्रोही सरदार बाबर की शक्ति को चुनौती दिये हुए थे. शक्तिशाली और वीर राजपूत राणा सांगा के नेतृत्व में बाबर के प्रबल शत्रु थे.
4. इब्राहीम लोदी की मृत्यु के बाद अफगान सरदार इधरउधर स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने में लगे थे. कासिम खाँ ने सम्भल, हसन खाँ ने मेवात तथा निजाम खाँ ने बयाना पर अधिकार कर लिया था. इसी तरह बंगाल व बिहार में भी अफगानों ने अपनी स्वतन्त्र सत्ता स्थापित कर ली थी. बाबर भारत में तब तक सुरक्षित नहीं था, जब तक कि वह अफगानों को समाप्त न कर देता.
5. बाबर के स्वयं के सैनिक एवं सरदार बाबर के लिए परेशानी का एक बड़ा कारण बने हुए थे, क्योंकि वे सभी भारत से वापिस अपने देश लौटना चाह रहे थे. बाबर को अपने सैनिकों को इस बात के लिए तैयार करना था कि वे भारत में रहकर उसके मुगल साम्राज्य की स्थापना के उद्देश्य को सफल बनायें. 
बाबर ने अपनी युद्ध-नीति, कूटनीति, धैर्य और से उपर्युक्त सभी समस्याओं पर धीरे-धीरे नियन्त्रण पा लिया.
> खानवा का युद्ध (16 मार्च, 1527)
पानीपत के युद्ध के बाद बाबर द्वारा भारत में लड़े गये युद्धों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण खानवा का युद्ध था. जहाँ पानीपत के युद्ध में विजय के बाद बाबर को दिल्ली एवं आगरा का शासक बना दिया. मुगल राज्य की नींव भारत में रख दी. वहीं खानवा के युद्ध ने बाबर के प्रबलतम शत्रु राणा सांगा का अन्त कर बाबर की विजयों को स्थायित्व प्रदान किया. बाबर व राणा के मध्य युद्ध के निम्नलिखित कारण थे –
1. राणा सांगा के पास एक बहुत बड़ी सेना एवं युद्ध सामग्री थी. कर्नल टॉड के अनुसार, अस्सी हजार घुड़सवार, 7 बड़े-बड़े नरेश, 9 राव और 104 रावल तथा रावल हर समय उसके इशारे पर चलने के लिए तैयार रहते थे. उसकी यही शक्ति बाबर के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बनी.
2. राणा सांगा यह समझता था कि बाबर भी अन्य मुस्लिम आक्रमणकारियों की तरह ही लूटपाट कर भारत से चला जायेगा, लेकिन जब उसने देखा कि बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया है, तब उसका बाबर से टकराना निश्चित हो गया था.
3. राणा सांगा ने बाबर को उखाड़ फेंकने के लिए इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी, हसनखाँ मेवाती से गठजोड़ कर लिया. यह स्थिति बाबर के लिए और भी खतरनाक थी.
4. यह भी कहा जाता है कि बाबर और सांगा में पहले यह सन्धि हुई थी कि बाबर एक ओर से और सांगा दूसरी ओर से इब्राहीम लोदी पर आक्रमण करेंगे, लेकिन जब बाबर ने भारत में रहने का निश्चय कर लिया तब राणा ने बाबर का साथ न देने का निश्चय कर लिया.
5. बाबर और राणा सांगा के मध्य युद्ध का तात्कालिक कारण यह था कि बाबर ने बयाना के दुर्ग पर अधिकार कर लिया. बयाना का दुर्ग सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था और राणा सांगा उसे अपने अधीन समझता था. अतः दोनों में टक्कर होना अवश्यंभावी हो गया.
> युद्ध
राणा सांगा ने बाबर पर आक्रमण करने के पूर्व अपनी स्थिति सुदृढ़ की. उसकी सहायता के लिए हसन खाँ मेवाती, महमूद लोदी तथा अनेक राजपूत सरदार उसकी सहायता के लिए अपनी-अपनी सेना के साथ पहुँचे, इससे राणा का हौसला बढ़ गया तथा वह आगरा पर अधिकार करने के लिए आगे बढ़ा और बयाना में मुगल ख्वाजा मेंहदी को हराकर उस पर अधिकार कर लिया. सीकरी के पास आरम्भिक मुठभेड़ में भी मुगलों को पराजित होना पड़ा. इन आरम्भिक विफलताओं से मुगल सैनिक आतंकित हो गये और उनका मनोबल गिर गया, यह एक कठिन परिस्थिति थी. बाबर ने धैर्यपूर्वक स्थिति का मुकाबला किया और अपनी सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए उसने 'जिहाद' की घोषणा की. उसने शराब नहीं पीने की कसम खाई तथा मुसलमानों पर से 'तमगा' कर हटा दिया. उसने अपनी सेना को यह आश्वासन दिया कि युद्ध के बाद जो सैनिक अपने घर जाना चाहेंगे उन्हें वापस अपने घर लौटने दिया जायेगा. इससे बाबर के सैनिकों का उत्साह बढ़ गया.
बाबर ने राणा सांगा का मुकाबला करने के लिए सीकरी के निकट खानवा नामक स्थान पर डेरा लगाया तथा उसने जिस तरह पानीपत के मैदान में युद्ध के लिए रणनीति बनाई थी. यहाँ भी बनाई. गाड़ियाँ खड़ी कर तथा खाइयाँ खुदवाकर रक्षा पंक्ति को सुदृढ़ कर दिया गया. बाबर के अनुसार सांगा. की सेना में 2 लाख से अधिक सैनिक थे. 18 मार्च, 1527 को खानवा के मैदान में दोनों सेनाओं में भयंकर संघर्ष हुआ. राजपूत अत्यन्त वीरता से लड़े, लेकिन बाबर के 'तोपखाने' और उसकी युद्ध की 'तुलगमा नीति' ने राजपूतों को पराजित कर दिया. राणा सांगा स्वयं गम्भीर रूप से घायल हो गया तथा युद्ध क्षेत्र से भाग गया, ताकि वह पुनः बाबर से युद्ध कर सके, परन्तु उसके सामन्तों ने उसे विष देकर मार डाला. इस युद्ध के बाद बाबर ने 'गाजी' की उपाधि ग्रहण की. यह उसकी महान् विजय थी. 
> खानवा के युद्ध का महत्व
> खानवा के युद्ध के परिणाम पानीपत के युद्ध से भी अधिक महत्वपूर्ण एवं निर्णायक सिद्ध हुए. पानीपत के पश्चात् भी बाबर की स्थिति निरापद नहीं थी, परन्तु खानवा के युद्ध के बाद उसे राज्य खोने का भय नहीं रहा और उसकी स्थिति सुदृढ़ हो गई तथा राजपूतों का भारत में हिन्दू राज्य स्थापित करने का स्वप्न समाप्त हो गया और बाबर की स्थिति अधिक सुरक्षित हो गई. रशब्रुक विलियम ने ठीक ही लिखा है कि, “यद्यपि बाबर को अभी अनेक युद्ध करने थे, परन्तु ये युद्ध राज्य विस्तार के लिए थे न कि गद्दी के लिए.  
राजनीतिक क्षेत्र से राजपूतों का स्वतन्त्र प्रभुत्व हमेशा के लिए समाप्त हो गया, किन्तु मुगल सम्राटों के संरक्षण में उन्हें महत्वपूर्ण स्थान मिला और भारत में भविष्य के लिए मुगल साम्राज्य के लिए आधार स्तम्भ बन गये.
> राजपूतों के हार के कारण
महि खानवा के युद्ध में राजपूतों के शक्तिशाली होते हुए भी उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा. इसके निम्नलिखित कारण रहे थे-
1. बाबर के पास एक विशाल तोपखाना था जिसका सामना करने में राजपूत असफल रहे. वे केवल तलवार और भाले के बल पर लड़ना जानते थे.
2. बाबर का सैन्य संचालन और व्यूह रचना राजपूत सैन्य संगठन से उत्तम था. हालांकि राणा सांगा भी एक महान् योद्धा था और उसकी रणनीति भी श्रेष्ठ थी, लेकिन मुगल रणनीति उसके लिए एकदम नई थी.
3. बाबर की सेना संख्या में राजपूतों से कम होते हुए भी बहुत अधिक प्रशिक्षित एवं अनुशासित थी.
4. राणा सांगा ने बाबर द्वारा बयाना पर कब्जा करने के बाद तुरन्त आगे बढ़कर बाबर पर हमला न करके बड़ी भारी भूल की. इससे बाबर को काफी अधिक समय मिल गया और उसने अपनी सेना को पानीपत के मैदान की तरह व्यवस्थित कर लिया.
इन्हीं सब कारणों का अन्तिम परिणाम यह रहा कि राजपूतों की सैनिक संख्या के अधिक होते हुए भी वह उसकी तोपों और तुलगमा नीति का मुकाबला न कर सके.
> बाबर के कार्यों का मूल्यांकन कीजिए ?
जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर अपने समय का एक महत्वाकांक्षी शासक था. वह अपने बाल्यकाल से लेकर जीवनपर्यन्त तक निरन्तर युद्धों में संलग्न रहा तथा उसने भारत में अपने सैन्य कौशल का अद्भुत परिचय दिया तथा उसने भारत में एक ऐसे साम्राज्य का निर्माण किया, जो उसके बाद भी सदियों तक चलता रहा.
बाबर की भारत विजय ने कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद पहली बार भारतीय साम्राज्य में काबुल और कांधार को सम्मिलित किया. इससे भारतीय विदेशी व्यापार को म मिली. अनेक विद्वान् बाबर को एक वीर विजेता मानते हैं, लेकिन साम्राज्य निर्माता नहीं लेनपूल के अनुसार, “बाबर केवल एक सैनिक था, साम्राज्य निर्माता नहीं." यह सच है, कि उसने भारत में मुगल वंश की नींव रखी. भारत में सिन्धु . से बिहार और हिमालय से लेकर ग्वालियर एवं चन्देरी तक विस्तृत राज्य की स्थापना की, परन्तु बाबर की यह विजय स्थायी न रही, बाबर अफगानों की शक्ति को पूरी तरह नहीं कुचल सका और उसकी मृत्यु के साथ अफगानों ने उसके पुत्र हुमायूँ को भारत से बाहर खदेड़ दिया.
बाबर अपने राज्य को स्थायित्व नहीं प्रदान कर सका. वह वीर विजेता था, प्रशासक नहीं, वह सदैव युद्धों में ही लगा रहा. रिस्कन लिखते हैं, बाबर ने जो कार्य किये उनसे अधिक महत्वपूर्ण कार्यों को वह नहीं कर सका. उसके राज्य में प्रशासनिक एकरूपता का अभाव था. प्रत्येक राज्य जिले, नगर एवं ग्राम के अपने-अपने कानून थे. राजकुमारों की उच्छृंखल प्रवृत्ति पर रोक लगाने, न्याय व्यवस्था सुदृढ़ करने, अधिकारियों को मनमानी करने एवं राज्य की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने का प्रयास बाबर ने नहीं किया. इसके विपरीत लगातार युद्धों एवं अपने सहयोगियों को उदारतापूर्वक दान देने से बाबर का कोष रिक्त हो गया. बाबर ने एक गलती और की उसने अपने राज्य को विभिन्न जागीरों में बाँटकर जागीरें विभिन्न जागीरदारों को सौंप दीं. ये जागीरदार बराबर अपनी शक्ति बढ़ाते रहते थे और विद्रोह करने के अवसर ढूँढ़ते रहते थे. इस प्रकार बाबर ने अपने पुत्र के लिए एक ऐसा स्वतन्त्र राज्य छोड़ा जो केवल युद्ध कालीन परिस्थितियों में ही सुसंगठित रह सकता था. शान्तिकाल के लिए तो यह निर्बल, अव्यवस्थित और बिना रीढ़ वाला था. इन सबके बावजूद भी बाबर के कार्यों का महत्व कम नहीं हो जाता. इसके लिए उसे अवसर ही नहीं मिल सका. वह भारत में 4 वर्षों तक रहा और इस दौरान उसने चार बड़े-बड़े युद्ध लड़े. इसके अतिरिक्त उसने सबसे बड़ा कार्य यह किया कि तुर्क व अफगानों द्वारा धारण की जाने वाली 'सुल्तान' उपाधि के स्थान पर 'पादशाही’ का विकास किया. उसने दैवीशक्ति के सिद्धान्त पर आधारित बादशाहत की स्थापना की. अब राजा का आधार प्रजा की इच्छा नहीं, बल्कि दैवीय इच्छा मानी जाने लगी.
यद्यपि बाबर ने राजनीतिक कारणों से प्रेरित होकर राणा सांगा के विरुद्ध हुए ‘खानवा' के युद्ध को 'जिहाद' की संज्ञा दी, तथापि उसे धर्मान्ध नहीं कहा जा सकता. कट्टर सुन्नी मुसलमान होते हुए. भी उसने शियाओं पर अत्याचार नहीं किये. इस प्रकार भारत विजय के बाद भी उसके द्वारा मन्दिर तोड़ने के उदाहरण बहुत कम मिलते हैं.
बाबर में साहित्यिक एवं कलात्मक प्रतिभा भी थी. वह अरबी एवं फारसी भाषाओं का अच्छा ज्ञाता था. वह तुर्की भाषा के प्रसिद्ध लेखकों में से गिना जाता है. उसने अपनी आत्मकथा 'तुजुक-ए-बाबरी' तुर्की भाषा में ही लिखी. उसे फारसी में कविता की 'मुवाइयाँ' नामक एक नई शैली प्रचलित करने का श्रेय मिलता है.
अन्त में बाबर के विषय में हम कह सकते हैं कि उसका चरित्र और व्यक्तित्व महान् था. वह एक महान् योद्धा, कलाप्रेमी और साहित्यानुरागी था, परन्तु उसमें शेरशाह और अकबर जैसे प्रशासकीय गुणों का अभाव था.
> हुमायूँ की कठिनाइयाँ
हुमायूँ ने बाबर की मृत्यु के बाद जो राज्य प्राप्त किया. वास्तव में उसके लिए वह काँटों का ताज था. उसके समय की राजनीतिक और आन्तरिक परिस्थितियाँ उसके प्रतिकूल थीं, लेकिन अपनी समस्याओं के लिए वह स्वयं भी कम जिम्मेदार नहीं है. लेनपूल ने कहा है, "हुमायूँ जीवन भर ठोकर खाता रहा और ठोकर खा-खाकर ही उसके जीवन का अन्त हुआ." उसकी कठिनाइयों को दो भागों में बाँटा जा सकता है—(1) विरासत में प्राप्त कठिनाइयाँ व ( 2 ) हुमायूँ द्वारा स्वयं पैदा की गई समस्याएँ.
(1) विरासत में प्राप्त कठिनाइयाँ- बाबर ने भारत में अपने राज्य विस्तार के लिए अनेक युद्ध लड़े थे. इस कारण उसके अनेक शत्रु थे. अतः बाबर की मृत्यु के बाद वे सभी हुमायूँ के स्वभाविक दुश्मन थे. इसके अतिरिक्त मुगलों में उत्तराधिकार के कोई निश्चित नियम नहीं थे. यही कारण था कि बाबर द्वारा हुमायूँ को मनोनीत करने के बाद भी उसके प्रधानमन्त्री ने ख्वाजा मेंहदी को शासक बनाने का षड्यन्त्र रचा, जो विफल हो गया.
हुमायूँ की एक बड़ी समस्या धन की कमी थी. बाबर ने अपना सम्पूर्ण खजाना सैनिक अभियानों एवं अपने सैनिकों और अमीरों को प्रसन्न करने में खर्च कर डाला था. हुमायूँ का प्रशासनिक संगठन अभी नवजात अवस्था में था. इस कारण राजस्व की वसूली भी ठीक से नहीं हो पा रही थी.
बाबर ने अपने अमीरों को जागीरें प्रदान कर रखी थीं. उसकी मृत्यु के बाद ये अमीर अपने क्षेत्रों में अपनी शक्ति बढ़ाने के प्रयास में लगे थे. हुमायूँ के सम्बन्धी जिन्हें मिर्जा कहा जाता था और भी अधिक शक्तिशाली थे और ये लोग राज्य पर अपना अधिकार समझते थे तथा हुमायूँ को विशेष महत्व देने को तैयार नहीं थे. इनमें मुहम्मद जमाल मिर्जा, मुहम्मद सुल्तान एवं मेंहदी ख्वाजा आदि प्रमुख थे.
बाबर की मृत्यु से पूर्व उसकी सेना बड़ी ही अनुशासित एवं संगठित थी, परन्तु युद्ध में लूट के माल का अधिकांश हिस्सा बाबर ने अपने अमीरों में बाँट दिया था, जिससे सैनिकों में असन्तोष उभरने लगा और उसकी मृत्यु के बाद यह असन्तोष और अधिक बढ़ गया. हुमायूँ में इतनी अधिक कूटनीतिज्ञता नहीं थी कि वह सेना के सभी वर्गों को प्रसन्न रख सके.
बाबर ने मरते समय हुमायूँ से कहा था कि वह अपने भाइयों के प्रति उदारता का व्यवहार करे. अतः बाबर की मृत्यु के बाद उसने अपने राज्य का विभाजन अपने भाइयों में कर दिया, लेकिन उसके भाइयों ने सदा ही हुमायूँ के साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार किया और विपत्ति के समय हुमायूँ की कोई सहायता नहीं की.
इसी प्रकार बाबर द्वारा अफगानों की शक्ति को पूर्णतया न कुचल पाने के कारण वे उसके लिए जीवन भर सरदर्द बने रहे और उन्होंने हुमायूँ को भारत से बाहर निर्वासित कर में सफलता प्राप्त की.
इन सबके अतिरिक्त हुमायूँ में अनेक चारित्रिक दुर्बलताएँ भी थीं. उसमें दृढ़ इच्छा शक्ति, राजनीतिक दूरदर्शिता एवं सैन्य रण कौशल का अत्यन्त अभाव था. वह शीघ्र ही निर्णय नहीं ले पाता था तथा एक कार्य को पूरा किये बिना ही उसे छोड़कर दूसरा करना प्रारम्भ कर देता था. इन सबके परिणामस्वरूप उसने अपने जीवन में भयंकर भूलें कीं, जिसके कारण उसे 15 वर्षों तक निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा.
(2) हुमायूँ द्वारा स्वयं पैदा की गई समस्याएँ—यद्यपि बाबर ने हुमायूँ के लिए विरासत में काँटों का ताज छोड़ा था, तथापि यदि हुमायूँ राजनीतिक सूझ-बूझ, दृढ़ संकल्प एवं इच्छा शक्ति का प्रयोग करता तो आसानी से अपनी समस्याओं पर विजय प्राप्त कर सकता था. उसने अपने जीवन के प्रत्येक कदम पर भूलें कीं जिसके कारण उसे भारत से बाहर निर्वासन की अवधि से गुजरना पड़ा. वास्तव में वह स्वयं ही अपना शत्रु साबित हुआ. उसके द्वारा स्वयं उत्पन्न की गई समस्याएँ निम्नलिखित हैं - 
उसने शासन सत्ता सम्हालते ही अपने भाइयों कामरान, हिन्दाल और अस्करी के मध्य राज्य का विभाजन कर बहुत बड़ी राजनीतिक भूल की. चाहिए तो यह था कि हुमायूँ पूरे राज्य पर नियन्त्रण कायम कर उसे संगठित करता, लेकिन उसने महत्वपूर्ण प्रदेश अपने भाइयों को सौंप दिया, कामरान के पास काबुल और पंजाब चले जाने से उसे इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण सामरिक स्थल नहीं मिल सके.
अपनी अदूरदर्शिता एवं सही समय पर आक्रमण न करना हुमायूँ के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए. राज्यारोहण के बाद हुमायूँ द्वारा अपने विरोधियों का तुरन्त ध्यान न करना तथा उनको अपनी शक्ति संगठित करने का अवसर देना हुमायूँ की एक बड़ी गलती थी तथा यही गलती उसके लिए आगे चलकर बड़ी समस्या बनी. 
चुनार के प्रथम घेरे के समय यदि वह शेरशाह की बातों में न आता और समझौते के स्थान पर उसका पूर्णतया दमन कर देता तो शेरखाँ कभी भी शेरशाह न बन पाता. बंगाल में भी उसने अपना समय अनावश्यक रूप से गँवाया तथा चौसा और कन्नौज में लड़ी गई लड़ाइयों में तुरन्त आक्रमण न कर शत्रु को पर्याप्त समय देकर बड़ी भारी भूल की. ठीक इसी प्रकार मालवा एवं गुजरात विजय करने के बाद तुरन्त यदि बहादुरशाह के विरुद्ध कार्यवाही कर देता तो यह काँटा उसके लिए सदा के लिए निकल जाता, परन्तु वह माण्डू में भोगविलास में डूबा रहा.
हुमायूँ को उत्सव मनाने, इनाम देने तथा भोग-विलास करने का बहुत अधिक शौक था. इसके लिए उसने अपना बहुत-सा धन बर्बाद कर दिया. उसका खजाना पहले से ही खाली था. अतः इन शौकों ने उसकी आर्थिक स्थिति को और अधिक लचर बना दिया.
हुमायूँ के कोई भी सैनिक अभियान योजनाबद्ध नहीं थे. एक तरफ तो वह बहादुरशाह पर आक्रमण करता और उसे पूरी तरह नष्ट किये वगैर ही वह दूसरी तरफ बढ़कर शेरखाँ पर आक्रमण कर देता था. वह यह भी नहीं समझ पाया कि शेरखाँ से बंगाल अथवा बिहार में कहाँ निबटा जाये.
इस प्रकार स्पष्ट है कि हुमायूँ वीर एवं साहसी होते हुए भी असफल रहा, क्योंकि वह एक उदार, क्षमाशील व्यक्ति होने के कारण तथा समय पर सही निर्णय न लेने की वजह से उसे असफल होना पड़ा तथा यह भी कि उसे एक समय में दो प्रबल प्रतिद्वन्द्वियों, जोकि विपरीत दिशा में थे, उलझना पड़ा और आवागमन के साधनों की कमी व भौगोलिक कठिनाइयों ने उसके कार्य को और अधिक कठिन बना दिया.
> हुमायूँ और शेरखाँ
हुमायूँ का सबसे बड़ा शत्रु शेरखाँ था, जो बंगाल और बिहार का शासक था. अतः हुमायूँ ने शासन सत्ता सम्हालते ही शेरखाँ और अफगानों की शक्ति को दमन करने के उद्देश्य से चुनार के किले को घेर लिया. इस पर शेरखाँ ने ने हुमायूँ को अपनी बातों में फँसाकर उसकी अधीनता स्वीकार करने का नाटक किया. इस पर हुमायूँ चुनार का किला उसे ही सौंपकर वापस लौट गया और जब हुमायूँ 1533-36 ई. तक मालवा एवं गुजरात को जीतने तथा अपने आन्तरिक विद्रोहों का दमन करने में व्यस्त था, तब शेरखाँ ने अपनी शक्ति बढ़ा ली तथा उसने अपने लिए एक विशाल एवंं मजबूत सेना एकत्र कर ली. वह अब भारत में अफगानों का सर्वमान्य नेता माना जाने लगा तथा 'हजरत-ए-आला' की उपाधि धारण की. गुप्त रूप से गुजरात के शासक बहादुरशाह की मदद करने लगा तथा हुमायूँ को कर देना बन्द कर दिया. अब शेरखाँ ने बंगाल पर आक्रमण करके तेलियागढ़ी पर अधिकार कर लिया और वहाँ से काफी मात्रा में धन वसूला.    
इन सबसे हुमायूँ ने हिन्दूबेग को शेरखाँ के विरुद्ध भेजा, लेकिन शेरखाँ ने हिन्दूबेग को अपनी ओर मिला लिया तथा हिन्दूबेग ने हुमायूँ को यह खबर भेजी कि शेरखाँ मुंगलों के विरुद्ध कोई कार्य नहीं कर रहा है. इस पर हुमायूँ शीघ्र कोई कार्यवाही न कर सका और शेरखाँ को अधिक शक्तिशाली होने का अवसर मिल गया. अब शेरखाँ ने दूसरी बार बंगाल पर आक्रमण कर दिया और उसे जीत लिया. तब हुमायूँ ने शेरखाँ के विरुद्ध कार्यवाही करने का फैसला कर लिया. 
जुलाई 1937 में हुमायूँ ने चुनार के किले को घेर लिया, लेकिन शेरशाह ने इस किले से रसद एवं सैनिक साजो - सामान पहले ही हटा चुका था तथा 6 माह के घेरे के बाद हुमायूँ इस पर कब्जा करने में सफल रहा, लेकिन इससे हुमायूँ को कोई लाभ नहीं हुआ.
जिस समय हुमायूँ ने चुनार का घेरा डाला उसी समय शेरखाँ ने रोहतासगढ़ के दुर्ग तथा बंगाल की राजधानी गौड़ पर अधिकार कर लिया. शेरखाँ को बंगाल में बहुत बड़ी मात्रा में सम्पत्ति हाथ लगी. अब हुमायूँ बंगाल की तरफ आगे बढ़ने लगा और निर्विरोध गौड़ पहुँच गया, बंगाल में उसने प्रशासनिक व्यवस्था को स्थापित करने का प्रयास किया तथा गौड़ का नाम हुमायूँ ने 'जन्नताबाद' रख दिया. इस समय बंगाल में बरसात बरसात आरम्भ हो चुकी थी. अतः वह बंगाल में ही रुक गया.
शेरखाँ ने हुमायूँ को बंगाल में रुका देखकर चुनार, बनारस, जौनपुर, कन्नौज, पटना, इत्यादि स्थानों पर अधिकार कर लिया. इसी बीच उसके भाई हिन्दाल व कामरान ने विद्रोह कर दिया तथा हिन्दाल ने अपने को बादशाह घोषित कर आगरा पर अधिकार कर लिया. इससे हुमायूँ बड़ा चिन्तित हुआ और अब उसने आगरा लौटने का निश्चय कर लिया.
> चौसा का युद्ध
बंगाल से वापस लौटते हुए हुमायूँ ने अनेक गलतियाँ कीं. हुमायूँ को उसके सैन्य सलाहकरों ने सुझाव दिया था कि वह गंगा के उत्तरी किनारे से चलता हुआ जौनपुर पहुँचे और गंगा पार कर शेरखाँ पर आक्रमण करे, परन्तु वह उनकी बात न मानकर गंगा पार कर दक्षिणी मार्ग से चला. यह मार्ग शेरखाँ के नियन्त्रण में था. चौसा नामक स्थान पर उसे शेरखाँ की उपस्थिति का पता चला और अब यहीं वह नदी पार कर शेरखाँ पर आक्रमण करने के लिए तैयार हो गया, लेकिन शेरखाँ ने उसे शान्ति वार्ता में उलझाये रखा और स्वयं युद्ध की तैयारी करता रहा. हुमायूँ उसकी चाल को न समझ सका और तीन माह का समय उसने बातचीत में ही बर्बाद कर दिया.
वर्षा के प्रारम्भ होते ही शेरखाँ ने आक्रमण की योजना बनाई और 26 जून, 1539 की रात्रि में शेरखाँ ने मुगल शिविर पर अचानक आक्रमण कर दिया. इस अचानक आक्रमण के कारण मुगल सैनिक घबरा गये और प्राण बचाने की खातिर गंगा नदी कूद पड़े. हुमायूँ स्वयं गंगा में कूद पड़ा तथा निजाम नामक भिस्ती की सहायता से वह अपने जीवन की रक्षा कर सका तथा अपने कुछ विश्वस्त लोगों की सहायता से वह आगरा पहुँचा. इस समय तक उसकी पूरी सेना नष्ट हो चुकी थी तथा अब उसका पतन निश्चित हो गया था. शेरखाँ ने अब शेरशाह की उपाधि ग्रहण कर ली तथा अपने नाम से उसने खुतबा पढ़वाया और सिक्के ढलवाये. उसने जलाल खाँ को बंगाल पर अधिकार करने के लिए भेज दिया तथा स्वयं बनारस, जौनपुर तथा लखनऊ होता हुआ कन्नौज जा पहुँचा.
> कन्नौज तथा बिलग्राम का युद्ध
हुमायूँ ने आगरा पहुँचकर अपने विद्रोही भाइयों कामरान व हिन्दाल को क्षमा कर दिया, लेकिन उसके भाइयों ने उसकी कोई सहायता नहीं की. कामरान अपनी सेना सहित लाहौर चला गया तथा अन्य भाइयों ने अपने को तटस्थ रखा. अतः हुमायूँ ने अकेले अपने दम पर सेना एकत्र की और अप्रैल 1540 ई. में कन्नौज आकर गंगा किनारे अपना पड़ाव डाल दिया. यहाँ भी हुमायूँ ने शेरशाह पर तुरन्त आक्रमण नहीं कर पहले वाली भूल दोहराई तथा वार्ता में संलग्न हो गया तथा शेरशाह की अनुमति लेकर हुमायूँ ने गंगा पार की और बिलग्राम के निकट एक नीची जगह पर अपना शिविर लगा दिया और इसी बीच मुगल सेना में हताशा व्याप्त हो गई, क्योंकि हुमायूँ शेरशाह पर आक्रमण करने में आवश्यकता से अधिक विलम्ब कर रहा था. ऐसी स्थिति में मुगल सरदार और सैनिक हुमायूँ का साथ छोड़कर चले गये और भीषण वर्षा के कारण मुगल शिविर में पानी भर गया.
शेरशाह ने परिस्थितियों का लाभ उठाया और 17 मई, 1540 को हुमायूँ पर अचानक आक्रमण कर दिया. हुमायूँ अपने दो भाइयों अस्करी और हिन्दाल के साथ वीरता से लड़ा, लेकिन वह पराजित हो गया और आगरा भाग गया. शेरशाह ने हुमायूँ का पीछा किया, लेकिन हुमायूँ अपने भाई कामरान के पास लाहौर चला गया. यहाँ कामरान ने हुमायूँ की हत्या का षड्यन्त्र रचा तथा उसके बदख्शाँ जाने के मार्ग में रोड़े अटकाये. इस बीच शेरशाह का पंजाब पर अधिकार हो गया, अतः कामरान, हिन्दाल और अस्करी ने हुमायूँ का साथ छोड़कर काबुल-कान्धार के लिए रवाना हो गये. हुमायूँ ने 1543 ई. तक भारत में ही रहकर सत्ता प्राप्ति का प्रयास जारी रखा, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली और अन्त में वह ईरान चला गया. इस समय फरीद से शेरखाँ होते हुए शेरशाह ने सूर साम्राज्य की भारत में नींव रखी. 
>  हुमायूँ द्वारा पुनः सत्ता प्राप्ति 
शेरशाह के हाथों चौसा और कन्नौज के युद्धों में पराजय के बाद हुमायूँ का मुगल साम्राज्य भारत में समाप्त हो गया. तब हुमायूँ ने पुनः सत्ता प्राप्ति के लिए 1543 ई. तक भारत में रहकर प्रयास किया, परन्तु उसे सफलता नहीं मिली. इस पर वह दिसम्बर 1543 ई. में ईरान के शाह के पास सहायता के लिए रवाना हुआ और फरवरी 1544 ई. में ईरान के शाह से मिला. ईरान के शाह ने हुमायूँ को शिया मत स्वीकार करने तथा कान्धार को शाह को सौंपने के बदले 14,000 सैनिकों की सहायता तथा अपने भाइयों के प्रति सावधान रहने की सलाह दी.
ईरान के शाह से सैनिक सहायता पाकर हुमायूँ ने सर्वप्रथम कान्धार पर आक्रमण कर अपने भाई अस्करी जोकि कामरान का प्रतिनिधि था को हराकर, 1545 ई. सितम्बर माह में अधिकार कर लिया और इसे ईरान के शाह को सौंप दिया.
इस समय काबुल पर कामरान का अधिकार था. अतः हुमायूँ ने काबुल पर आक्रमण कर उसे पराजित कर दिया तथा कामरान गजनी भाग गया. हुमायूँ ने 15 नवम्बर, 1545 को काबुल पर अपना पूर्ण रूप से अधिकार कर लिया और इसके बाद उसने बदख्शाँ पर भी अपना अधिकार जमा लिया, लेकिन कामरान ने बार-बार 1545 ई. से लेकर 1549-50 ई. तक हुमायूँ पर आक्रमण किया तथा उसे प्रत्येक बार हुमायूँ के द्वारा पराजित होना पड़ा. अन्त में कामरान ने दिल्ली के सूर शासक इस्लामशाह की सहायता से हुमायूँ को हराने का प्रयास किया, लेकिन उसकी कोई सहायता नहीं की और वापस काबुल लौटते हुए उसे पकड़कर हुमायूँ के पास भेज दिया गया जहाँ हुमायूँ ने इसे अन्धा करके मक्का भेज दिया. इसी बीच अस्करी भी मक्का भाग गया तथा हिन्दाल भी एक युद्ध में मारा गया. आन्तरिक इस प्रकार हुमायूँ ने 1553 ई. तक अपने समस्त विरोधियों पर विजय प्राप्त कर ली तथा इस समय वह काबुल, कान्धार, गजनी, बदख्शाँ आदि पर अपनी सत्ता स्थापित कर चुका था और अब वह भारत विजय के लिए आगे बढ़ा.
> पंजाब पर अधिकार
1553 ई. में सूर शासक इस्लामशाह की मृत्यु हो गई इससे सूर साम्राज्य में अनेक उत्तराधिकारी उठ खड़े हुए. हुमायूँ के लिए भारत पर आक्रमण करने का यह सर्वाधिक उपयुक्त अवसर था, अतः हुमायूँ ने 1554 ई. में लाहौर पर बिना किसी प्रतिरोध के अधिकार कर लिया और लाहौर पर अधिकार करने के बाद हुमायूँ ने सरहिन्द, हिसार और दीपालपुर पर भी अधिकार कर लिया. इस प्रकार पूरे पंजाब पर हुमायूँ का बिना किसी विशेष संघर्ष के अधिकार हो गया.
> मच्छीवाड़ा का युद्ध और अफगानों की पराजय 
हुमायूँ द्वारा पंजाब पर अधिकार करने की सूचना मिलते ही सिकन्दर सूर ने अपने योग्यतम सेनापतियों तातार खाँ और हैबत खाँ को एक बड़ी सेना के साथ मुगलों के विरुद्ध भेजा. लुधियाना के निकट 'मच्छीवाड़ा' नामक स्थान पर मुगलों एवं अफगानों के मध्य संघर्ष हुआ जिसमें हुमायूँ को विजय मिली और इस विजय के साथ ही हुमायूँ ने पूरे पंजाब, सरहिन्द, हिसार, फिरोजा और दिल्ली के कुछ समीपवर्ती भागों पर अधिकार कर लिया.
> सरहिन्द का युद्ध
मच्छीवाड़ा में पराजय के बाद सिकन्दर सूर ने स्वयं एक बड़ी सेना के साथ सरहिन्द पर अधिकार करने के लिए रवाना हुआ. 22 जून, 1555 को सरहिन्द के निकट मुगलों एवं अफगानों के मध्य हुए इस संघर्ष में अफगान बुरी तरह पराजित हो गये. सिकन्दर सूर भाग गया तथा इस युद्ध के बाद अफगानों की सत्ता समाप्त हो गई. उल्लेखनीय है कि इस युद्ध में हुमायूँ के साथ बैरमखाँ और उसके अल्पायु पुत्र अकबर ने भी भाग लिया था.
23 जुलाई, 1555 ई. को हुमायूँ ने एक विजेता की तरह दिल्ली में प्रवेश किया जहाँ उसका पुनः अभिषेक कराया गया, खुतबा पढ़ा गया और सिक्के ढलवाये गये व मुगल अमीरों में पुरस्कार वितरित किए गए.
हुमायूँ ने बहुत कठिन परिस्थितियों और विपत्तियों से संघर्ष करते हुए पुनः सत्ता प्राप्त की और भारत में मुगलों के शासन का मार्ग प्रशस्त कर दिया, लेकिन उसके दुर्भाग्य का अन्त यहीं नहीं हुआ. 24 जनवरी 1556 ई. को हुमायूँ अपने पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिर पड़ा तथा घायल हो गया और 26 जनवरी, 1556 ई. को उसकी मृत्यु हो गई. इस पर इतिहासकार लेनपूल ने लिखा है कि, “हुमायूँ जीवन भर ठोकरें खाता रहा और ठोकर खाकर ही मर गया. "
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Sun, 08 Oct 2023 08:56:05 +0530 Jaankari Rakho
सूफी एवं भक्ति आन्दोलन https://m.jaankarirakho.com/416 https://m.jaankarirakho.com/416 सूफी एवं भक्ति आन्दोलन

> सूफी सम्प्रदाय (The Sufism)
> परिचय
सल्तनतकाल में धर्म क्षेत्र में सबसे प्रमुख घटना ‘सूफीवाद’ या ‘सूफी सम्प्रदाय' का उदय थी. 'सूफी' शब्द की उत्पत्ति अत्यन्त विवाद का विषय है. प्रारम्भ में 'सूफी' उन लोगों को कहा जाता था जो ऊनी ( सफ) वस्त्र पहनते थे. बाद में शुद्ध आचरण (सफा) करने वालों को सूफी कहा गया. कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार सूफी अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है 'चटाई'. अतः सूफी उन लोगों को कहा गया जो चटाई पर बैठकर ईश्वर की उपासना किया करते थे. एक अन्य विचारधारा के अनुसार, मदीना में मुहम्मद साहब द्वारा बनवाई गई मस्जिद के बाहर 'सफा', जो मक्का में एक पहाड़ी थी, जिस पर लोगों ने शरणं ली और ईश्वर की आराधना में मगन रहे. उन्हें सूफी कहा गया. सूफीवाद का विकास ईरान में 10वीं सदी में हुआ और 13-14वीं सदी में भारत में इसका इस्लाम के साथ-साथ व्यापक रूप से प्रचलन हो गया था.
> सूफी दर्शन की व्याख्या (Philosophy or Theory of Sufism)
सूफीवाद दार्शनिक सिद्धान्त पर आधारित था, जिसे हम इस्लाम का रहस्यवाद कह सकते हैं. ये लोग इस्लाम के कट्टरवाद तथा कर्मकाण्डों के विरोधी थे, लेकिन फिर भी इसके मूल में मुहम्मद साहब के ही विचार थे, सूफियों का मानना था कि ईश्वर एक है और सभी कुछ ईश्वर में है तथा उसके बाहर कुछ भी नहीं. सभी कुछ त्यागकर ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है और प्रत्येक सूफी का उद्देश्य अपनी आत्मा का परमेश्वर में विलीनीकरण करना है. इसके लिए सूफी दर्शन में पाँच सोपान माने गये हैं—
1. ईश्वर की आराधना जो उसकी आज्ञानुसार हो.
2. भक्ति अर्थात् ईश्वर के प्रति आत्मा का समर्पण. 
3. एकान्त में ईश्वर का ध्यान.
4. ज्ञान अथवा ईश्वर के गुणादि का दार्शनिक विचार.
5. भावोद्रेक अर्थात् ईश्वरीय शक्ति और प्रेम के पूर्ण ज्ञान के प्राप्त हो जाने पर शरीर का भान न रह जाना.
सूफियों का यह विश्वास था कि ईश्वर अपने समस्त पुत्रों को उससे मिल जाने की क्षमता दी है तथा यह क्षमता मानव शरीर के अन्दर छिपी हुई है. इस क्षमता को एक पथप्रदर्शक, जो ईश्वरीय स्पर्श एवं ज्योति के द्वारा प्रबुद्ध हो गया हो और जिसमें ईश्वरीय रहस्यों को लोगों के सन्मुख प्रकट करने की योग्यता हो, की सहायता से विकसित किया जा सकता है.
सूफी सन्तों ने ईश्वर से मिलने के लिए निम्नलिखित चरणों को बताया
(i) नासूत – इस अवस्था में इस्लाम के नियम पथप्रदर्शक रहते हैं.
(ii) मलाकूत – इस अवस्था में मनुष्य फरिश्ता का रूप धारण कर लेता है तथा पवित्र हो जाता है.
(iii) जबारूत – इस अवस्था में मनुष्य में ईश्वरीय शक्तियों का अवतरण होता है.
(iv) लाहत – इस अवस्था में मनुष्य को पूर्ण सत्य का ज्ञान हो जाता है तथा अन्त में वह देवत्व में मिल जाता है.
इन चारों अवस्थाओं को पार करने के लिए ‘शिष्य’ या ‘मुरीद' को 'धिक्र' की अवस्था से गुजरना पड़ता है. धिक्र एक ऐसा कर्मकाण्ड है, जिसमें मुरीद को अपनी प्रत्येक श्वास के साथ अल्लाह के नाम को स्मरण करना पड़ता है और हमेशा करते रहने से कभी-कभी वह संज्ञाहीन होकर अपनी सुध-बुध खो बैठता है और उसे 'आहक' अर्थात् ईश्वर का दर्शन या मिलन हो जाता है.
सूफियों के लिए सभी धर्म समान थे तथा गृहस्थ लोग भी इस मार्ग पर चल सकते थे. इसी कारण यह भारत में अधिक लोकप्रिय हो सका.
सूफी सन्तों का मूल निवास स्थान 'खानकाह' कहलाता था, जहाँ साधारणजन और मौलवी लोग दोनों ही इसके सदस्य होते थे. खानकाह प्रायः प्रवर्तक की कब्र पर बनवाये जाते थे; जैसे—निजामुद्दीन औलिया की (खानकाही ) दिल्ली.
भारतवर्ष के सूफियों में धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवादिता का अभाव था तथा उन्होंने अपने मत में भारतीय कर्मकाण्डों एवं सिद्धान्तों को अपने मत में सम्मिलित किया. वे सादगी, प्रेम, दयालुता के साथ आडम्बर रहित होकर अपने मत का प्रचार करते थे.
> प्रमुख सूफी सन्त : परिचय एवं शिक्षाएँ
(1) ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती – सूफी सन्तों में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का नाम विशेष प्रसिद्ध है. ये मध्य एशिया के निवासी थे. इनका ध्यान ईश्वर की ओर बाल्यकाल से ही आकृष्ट हो गया था. इन्होंने मध्य एशिया के पवित्र स्थानों का भ्रमण किया था तथा अपनी प्रतिभा के बल पर ये चिश्ती सम्प्रदाय के अध्यक्ष बन गये. 1160 ई. में आप भारत आये तथा 1166 ई. से स्थायी रूप से अजमेर में बस गये.
ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का मुख्य सिद्धान्त और उपदेश यह था कि संसार के समस्त धर्मों का मूल स्रोत एक है, भगवान् एक है और विभिन्न धर्म उसकी प्राप्ति के केवल साधन मात्र हैं. 1236 ई. में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की मृत्यु हो गई. उनके नाम पर अजमेर में एक दरगाह है, जहाँ प्रतिवर्ष लाखों हिन्दू एवं मुसलमान आते हैं. यही कारण है कि यहाँ अजमेर में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती उर्स लगता है.
(2) ख्वाजा कुतुबुद्दीन – इस सूफी सन्त ने मध्य एशिया से भारत आकर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को अपना गुरु बनाया. दिल्ली का सुल्तान इल्तुतमिश इनका बहुत आदर करता था और इनकी दैवी शक्ति में विश्वास करता था. 1235 ई. में इनकी मृत्यु हो गई. इन्होंने सदा यही उपदेश दिया था कि ईश्वर के लिए संयम की बहुत अधिक आवश्यकता है. मनुष्य को थोड़ा खाना, थोड़ा सोना, थोड़ा बोलना और सांसारिक धन्धों में थोड़ा फँसना चाहिए. जो व्यक्ति इन चार सिद्धान्तों को अपना लेगा, वह ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग पर चलने के योग्य बन सकेगा.
(3) शेख निजामुद्दीन औलिया — शेख निजामुद्दीन औलिया ग्यासुद्दीन और उसके पुत्र मुहम्मद तुगलक के समकालीन थे. इनके उपदेशों का जनता पर बहुत अधिक प्रभाव था. मुहम्मद बिन तुगलक पर इनकी विशेष कृपा थी. औलिया हिन्दू-मुसलमानों में किसी प्रकार का भेद नहीं करते थे. इनका निवास स्थान दिल्ली में था और यहीं इनकी मृत्यु हुई.
(4) बाबा फरीद — इनका जन्म काबुल के शाही घराने में हुआ था, परन्तु किसी कारणवश बाबा को काबुल छोड़कर मुल्तान में निवास करना पड़ा. सामाजिक दुःखों का अनुभव करके आपने संन्यास ले लिया तथा इसके साथ ही इन्होंने भ्रमण करना आरम्भ कर दिया. इन्होंने अपने उपदेशों में मानव प्रेम की शिक्षा दी है, जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों बड़े प्रभावित हुए. इस प्रकार इन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए बड़ा कार्य किया. इनकी मृत्यु 1265 ई. में हुई.
(5) शेख नूरुद्दीन – सन् 1375 ई. में जन्मे कश्मीर के इस प्रसिद्ध सूफी सन्त को बचपन से ही सांसारिक धन्धों में कोई रुचि न थी. अतः युवावस्था में घरबार छोड़कर ईश्वर की खोज में लग गये. अपने सरल, उच्च और पवित्र जीवन तथा आचरण के कारण वे जनता में लोकप्रिय हो गये. उनकी शिक्षाओं का सार यही है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए मनुष्य को अहंकार को त्याग देना चाहिए. लगभग 63 वर्ष की आयु में इस संत का देहान्त हो गया. उनकी समाधि उनके भक्तों के लिए कश्मीर में आज भी एक तीर्थस्थान के रूप में प्रसिद्ध है.
(6) महात्मा गैसूदराज — इनका जन्म 1321 ई में हुआ. इनका वास्तविक नाम ख्वाजा बन्देनवाजं था. जब गैसूदराज का ध्यान ईश्वर प्रेम की ओर आकर्षित हुआ तो वे दक्षिण में चले गये फिर उन्होंने उत्तरी तथा दक्षिणी भारत की मजारों का दौरा किया. अन्त में ये गुलबर्गा में रहने लगे जहाँ उनका देहान्त 1442 ई. में हो गया. इन्होंने 105 पुस्तकों की रचना की. इन्होंने भी हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयास किये.
> सूफी आन्दोलन / सम्प्रदाय का प्रभाव
मध्यकाल में हिन्दू धर्म में जिस प्रकार का महत्त्व भक्ति आन्दोलन का है ठीक उसी प्रकार इस्लाम में सूफी सम्प्रदाय का है. सूफियों ने इस्लाम को गतिशील एवं उदार बनाकर हिन्दू-मुस्लिम एकता को प्रोत्साहित किया.
जनसाधारण से सम्पर्क रखने, उनके कष्टों को समझने एवं दूर करने की प्रवृत्ति से सूफी सन्त हिन्दुओं और मुसलमानों में समान रूप से लोकप्रिय बन गये. उन्होंने अपने विचारों एवं आचरण से समाज के अन्दर व्याप्त अनेक बुराइयों को दूर करने का प्रयास किया. इन लोगों ने साहित्य, भाषा, दर्शन, और नृत्य संगीत के विकास को भी प्रभावित किया. प्रो. गिब ने लिखा है कि "सूफीवाद ने अपनी ओर उन तत्वों को आकृष्ट किया जो सामाजिक और सांस्कृतिक क्रान्ति के वाहक के रूप में उभरकर सामने आये. तुर्की आधिपत्य के काल में जब देश का जन-जीवन घुटन अनुभव कर रहा था, तब सूफी खानकाह ने सामाजिक संदेश फैलाने एवं सुधारवादी राजनीति का उन्माद पैदा करने का काम किया."
धार्मिक उदारता की भावना को बढ़ाने में सूफियों ने अपना उल्लेखनीय योगदान दिया था, इससे हिन्दू परम्परा के अनेक रीति-रिवाजों को इस्लाम में स्थान मिला. हिन्दू धर्म और दर्शन भी सूफीवाद से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. इसने सामाजिक मेल-मिलाप को बढ़ावा दिया.
अधिकतर सूफी सन्तों में अपने को शासक वर्ग से पृथक् रखते हुए, आम जनता से सहानुभूति रखते थे. इन सन्तों ने आम लोगों के बीच समानता एवं बन्धुत्व का प्रसार किया और इसी नीति को आगे चलकर उदार शासकों द्वारा अपनाया गया.
सूफी सन्तों ने समाज सुधार के अनेक कार्य किये, इन्होंने जमाखोरी, कालाबाजारी, शराब-खोरी, वेश्यावृत्ति, दास प्रथा आदि की कड़ी आलोचना की तथा लोगों को इनसे दूर रहने की सलाह दी.
सूफी सन्तों ने अरबी, फारसी व हिन्दी भाषा के सम्मि श्रण से एक नई पर्क भाषा उर्दू का विकास किया और उर्दू में अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की. इसके अलावा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी इन्होंने अपने साहित्य की रचना की, जैसे – पंजाबी, अवधी, ब्रजभाषा आदि.
सूफी सन्तों के प्रभाव से गीत-संगीत के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. उनके खानकाहों में नियमित से गीत, संगीत की संध्या का आयोजन होता था. इनके माध्यम से ईरान की राग-रागनियाँ भारत आयीं और भारतीय संगीत पर उनका प्रभाव पड़ा, सूफियों के द्वारा ही कव्वाली गायन की परम्परा का विकास हुआ.
भारत में इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार में सूफी सन्तों की उल्लेखनीय भूमिका रही. इन्होंने इस्लाम को एक नया रूप दिया जिसमें उनकी कट्टरता का नामोनिशान तक नहीं था. इससे उसे एक व्यापक आधार प्राप्त हुआ.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सूफी सन्तों ने धार्मिक उदारता के साथ-साथ साहित्य एवं बन्धुत्व की भावना का विकास करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया.
> भक्ति आन्दोलन (The Bhakti Movement)
सल्तनतकाल में भारत के सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता है— 'भक्ति आन्दोलन का उदय'. इस काल में अनेक ऐसे सन्त एवं सूफी हुए जिन्होंने ईश्वर के प्रति प्रेम, भक्ति और आडम्बरविहीन धर्म का प्रचार किया. इन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता प्रयास किए तथा सामाजिक-धार्मिक तनाव को कम करने की चेष्टा की.
भारत में भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख 'गीता' में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया और उसके बाद दक्षिण में 7वीं सदी से 13वीं सदी तक भक्ति का प्रचार अलवार व नयनार सन्तों ने किया. वास्तव में यहीं से भारत में भक्ति आन्दोलन का सूत्रपात हुआ. इसके बाद रामानुजाचार्य द्वारा उत्तर भारत में भक्ति का प्रचार किया जो 13वीं सदी से 16वीं सदी तक विकसित होता रहा. इसका मुख्य सम्बन्ध हिन्दू धर्म से था, जिसका स्वरूप उस समय इस्लाम द्वारा हिन्दू धर्म के समाप्त हो जाने के आसन्न खतरे से उत्तेजित, आन्दोलित और प्रभावित था.
> भक्ति आन्दोलन के उदय के कारण
भक्ति आन्दोलन के उदय के निम्नलिखित कारण थे
1. सल्तनतकाल में हिन्दू अपनी राजनीतिक स्वतन्त्रता खो चुके थे और उनके चारों ओर इस्लाम का शिकंजा कसा जा चुका था और इससे छुटकारा पाने का उन्हें कोई स्पष्ट मार्ग नहीं दिखाई दे रहा था. अतः लोगों को इस अन्धकारपूर्ण स्थिति ने ईश्वर की ओर बढ़ने के लिए तेजी से प्रेरित कर दिया.
2. सल्तनतकाल के मुस्लिम आक्रान्ताओं ने हिन्दुओं पर भीषण अत्याचार किये. उन्होंने हिन्दुओं के मन्दिरों, मूर्तियों एवं तीर्थस्थानों को तोड़ा एवं भ्रष्ट कर दिया. इससे हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को भारी ठेस पहुँची. अतः हिन्दू जनता ने इस्लाम के आतंक से छायी उदासी को दूर करने के लिए अपने आपको ईश्वर के मार्ग पर डाल दिया.
3. सल्तनतकाल में भारतीय हिन्दू समाज में अत्यधिक जटिलता थी. इनमें ऊँच-नीच की भावना–छुआछूत आदि का व्यापक चलन था साथ ही निम्न वर्गों के साथ ब्राह्मण वर्ग का व्यवहार सतोषजनक नहीं था. इसलिए लोगों ने भक्ति मार्ग को चुना, क्योंकि इसमें इन बुराइयों का कोई स्थान नहीं था.
4. भक्ति मार्ग साधना के ज्ञान एवं कर्म मार्ग की अपेक्षा अधिक सरल होने के कारण लोगों में अधिक लोकप्रिय हो गया.
5. सल्तनतकाल में इस्लामी प्रभुत्व ने हिन्दुओं की उन्नति का मार्ग बन्द कर दिया. फलतः लोगों ने एक नये मार्ग की खोज में भगवत भजन और आत्मचिन्तन का मार्ग ढूँढ़ लिया और इस प्रकार भारी संख्या में हिन्दू इस मार्ग पर चल पड़े.
6. इस्लाम का प्रभाव – - इतिहासकारों का मानना है कि भक्ति आन्दोलन इस्लाम की सहजता एवं रचनात्मकता से अधिक प्रभावित हुआ. उसके एकेश्वरवादी स्वरूप, समानता एवं बन्धुत्व की भावना से हिन्दू धर्म सुधारक भी प्रभावित हुए और उन लोगों ने भी बाह्य आडम्बरों; जैसे – मन्दिर, मूर्ति पूजा एवं यज्ञ आदि को त्यागकर ईश्वर की भक्ति पर बल दिया.
> भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सिद्धान्त (Main Theories of Bhakti Movement)
भक्ति मार्ग के प्रमुख प्रणेताओं के उपदेशों एवं विचारों में पूर्ण समानता देखने को नहीं मिलती, फिर भी उनकी शिक्षाओं के मौलिक सिद्धान्त बहुत कुछ मिलते-जुलते थे. इस आन्दोलन के कुछ प्रमुख सिद्धान्त अग्रलिखित हैं -
1. भक्ति मार्ग के अनुयायियों का विश्वास था कि ईश्वर एक है जिसे लोग राम, रहीम या अल्लाह आदि विभिन्न नामों से पुकारते हैं. नानक, कबीर आदि सन्तों ने यही उपदेश दिया कि हिन्दुओं के ईश्वर और मुसलमानों के ख़ुदा को अलग-अलग विभाजित करना मूर्खता है, वे दोनों एक ही हैं.
2. भक्तिकाल के सन्तों ने ईश्वर की एकता के साथ-साथ उसकी भक्ति करने को कहा. उन्होंने लोगों में यह विश्वास उत्पन्न करने का प्रयास किया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए उन्हें ईश्वर की भक्ति में लग जाना चाहिए.
3. इन सन्तों ने समर्पण का सिद्धान्त सामने रखा तथा भक्ति मार्ग के सभी सन्तों ने बताया कि ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपने आपको उसके चरणों में पूर्ण रूप से समर्पित कर देना चाहिए अर्थात् मनुष्य को अपने काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि पर विजय प्राप्त कर ईश्वर की भक्ति में रम जाना चाहिए.
4. भक्ति मार्ग के सन्तों ने गुरु की महिमा का बखान किया तथा यह कहा कि गुरु के बिना ईश्वरीय ज्ञान को प्राप्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि गुरु ही ऐसा माध्यम है जो मनुष्य की सोई हुई आत्मा को जगा सकता है.
5. भक्ति मार्ग के सन्तों ने सभी प्रकार के भेदभावों को भुलाकर प्राणी मात्र की एकता पर बल दिया और कहा कि भेदभाव, जाति-पाँति की भावना ईश्वर भक्ति के सिद्धान्तों के प्रतिकूल है.
6. इन सन्तों ने शुभ कर्म और पवित्र आचरण पर बहुत अधिक जोर दिया और कहा कि तीर्थयात्राओं और कोरी प्रार्थनाओं से मनुष्य महान् नहीं बनता. यदि ईश्वर को प्राप्त करना है तो अपने कर्म, मन, वचन की पवित्रता श्यक है.
7. इस काल के आन्दोलन के नेताओं में कुछ ने सगुण ईश्वर भक्ति तथा कुछ सन्तों ने निर्गुण भक्ति पर बल दिया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भक्ति मार्ग के सन्तों में विचारों में भिन्नता होते हुए भी सभी के मौलिक उपदेश एक ही थे.
> भक्ति आन्दोलन की शाखाएँ (Branches of Bhakti Movement)
भक्ति आन्दोलन की दो प्रमुख शाखाएँ थीं – (1) निर्गुण व (2) सगुण.
(1) निर्गुण – इस सर्वोच्चता में विश्वास शाखा के सन्त निराकार ईश्वर की करते थे. ये लोग हिन्दू धर्म ग्रन्थ 'उपनिषद्' से अधिक प्रभावित थे तथा इन्होंने बाह्य साधना पर अधिक बल दिया. निर्गुण सन्त अपने विचारों में अधिक प्रगतिशील थे तथा इन्होंने ईश्वर की एकता के आधार पर हिन्दुओं और मुसलमानों में एकता व समानता स्थापित करने का प्रयास किया. इस निर्गुण परम्परा का उदय ब्राह्मणों की जातिगत एवं कर्मकाण्डी आधिपत्य तथा ज्ञानमार्गियों की शुष्क एवं नीरस तार्किकता के विरुद्ध 'विद्रोह की भावना' से हुआ. निर्गुण विचारधारा वाले सन्तों का आम जनता में व्यापक असर हुआ. निर्गुण सन्तों में कबीर, नानक एवं रैदास के नाम उल्लेखनीय हैं.
(2) सगुण – इस शाखा के अनुयायी ईश्वर के साकार रूप की आराधना करते थे तथा ईश्वर को राम या कृष्ण के नाम से पुकारते थे. सगुण सन्त अवतारवाद से प्रेरित थे तथा से भगवान् विष्णु के 10 अवतारों में विश्वास करते थे. इन्होंने ब्रह्म साधना; जैसे – मूर्तिपूजा, अवतारवाद, कीर्तन उपासना आदि पर बल दिया. इस सम्प्रदाय के प्रमुख सन्त रामानुज, चैतन्य, माधवाचार्य, मीरा आदि थे.
> भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सन्त
भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सन्त निम्नलिखित हैं
> रामानुज
इनका जन्म दक्षिण में चेन्नई के पास तिरुपति में 12वीं सदी के प्रारम्भ में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. ये भक्ति आन्दोलन के प्रारम्भिक सन्त थे तथा दक्षिण भारत से उत्तर भारत में आकर इन्होंने भक्ति का प्रचार-प्रसार किया.
रामानुज सगुण भक्ति के उपासक थे तथा ईश्वर के समक्ष सभी को समान मानते थे. इन्होंने आचरण की शुद्धता पर अत्यधिक बल दिया. रामानुज ने सगुण वैष्णव के नाम उन्होंने कहा कि आत्मा पर एकेश्वरवाद का उपदेश दिया था. और परमात्मा परस्पर भिन्न हैं. यद्यपि आत्मा का उदय परमात्मा से ही होता है. इनका कहना था कि ईश्वर के समक्ष सब कुछ समर्पित कर देने से व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बन जाता है, चाहे वह शूद्र ही क्यों न हो. उनका यह संदेश सामाजिक असमानता के उस युग में बहुत बड़ा महत्व रखता है. इसमें लाखों शूद्रों ने उनके द्वारा बताए मार्ग को अपनाया.
> रामानन्द
रामानन्द का जन्म प्रयाग में एक ब्राह्मण परिवार में 14वीं सदी में हुआ था तथा उत्तर भारत में भक्ति आन्दोलन को आगे इन्होंने ही बढ़ाया. रामानन्द राम और सीता की उपासना पर बल देते थे और लोगों को नैतिक और सामाजिक मर्यादा का आदर्श राम और सीता को बताते थे.
रामानन्द ने अपने उपदेशों का प्रचार हिन्दी भाषा में किया जिससे उनके उपदेशों को सेर्वसाधारण ने बड़ी आसानी से समझकर स्वीकारा. इससे हिन्दी साहित्य के विकास को भी प्रोत्साहन मिला.
रामानन्द ने जाति प्रथा का जोरदार खण्डन किया. सभी वर्गों तथा जातियों को अपना शिष्य बनाया. इनके शिष्यों में नाई, मोची और मुसलमान भी थे. इन्होंने ईश्वर के समक्ष सबको समान मानते हुए कहा कि “जाति-पाँति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई. ' 
रामानन्द ने स्त्रियों की दशा पर भी दुःख व्यक्त किया तथा अपने शिष्यों को नारी जाति का जीवन स्तर उठाने के लिए प्रेरित किया.
रामानन्द ने दोहरे व्यक्तित्व को प्रश्रय दिया था. एक ओर वे वर्णाश्रम धर्म के बन्धन को स्वीकार करते थे वहीं वे दूसरी ओर साधु-सन्तों के प्रति चाहे वे किसी भी जाति-धर्म के हों, समानता का भाव रखते थे. इसी कारण उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्य दो वर्गों में विभाजित हो गये. प्रथम वर्ग में वे थे जो वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थक थे, जैसेतुलसीदास एवं नाभादास, जबकि दूसरा वर्ग जो वर्णव्यवस्था एवं वेद आदि को नहीं मानता था इनमें कबीर का नाम उल्लेखनीय है.
> मधवाचार्य
मधवाचार्य 12वीं सदी के सन्त थे तथा भागवत् दर्शन से विशेष लगाव रखते थे. इन्होंने कहा कि दुःख और सुख चक्रानुसार जीवन में आते रहते हैं. अतः इनका अनुभव सभी के लिए आवश्यक है. व्यक्ति को चाहिए कि चाहे वह सुख में हो या दुःख में उसे ईश्वर को सदैव याद करते रहना चाहिए और निरन्तर कर्म करते रहना चाहिए तथा उसी को स्मरण करते हुए अपने समस्त कर्म अर्पित कर देने चाहिए.
> वल्लभाचार्य
वल्लभाचार्य 15वीं सदी के कृष्णमार्गी शाखा के एक प्रमुख सन्त थे. इन्होंने शारीरिक यातना, वैराग्य और संसार त्याग का उपदेश दिया और परमात्मा के साथ अपनी आत्मा और विश्व के एकीकरण पर बल दिया और मानव जीवन का उद्देश्य ज्ञान और भक्ति के द्वारा ईश्वर को प्राप्त कर मोक्ष पाना है.
> चैतन्य महाप्रभु : टिप्पणी
में चैतन्य महाप्रभु का जन्म बंगाल में 1485 ई में बंगाल महान् इनका एक अन्य नाम 'गौरांग थ था जो इनके गौर वर्ण होने के 1485 में ." ये भक्ति आन्दोलन के . हुआ था. कारण पड़ा था.
चैतन्य ने जाति-पाँति के बन्धनों को ठुकराते हुए यह उपदेश दिया कि भक्ति का मार्ग सभी के लिए खुला है, भक्ति के मार्ग में ऊँच-नीच और भेदभाव का कोई स्थान नहीं. इन्हीं के प्रभाव के कारण आज भी जगन्नाथपुरी में सभी धर्मों के लोग एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं.
चैतन्य ने भक्ति को सरल, आडम्बर रहित तथा प्रेम भाव से परिपूर्ण किया. उन्होंने कृष्ण भक्ति का उपदेश दिया तथा कहा कि कृष्ण की भक्ति ही भक्ति है और यह भक्ति ज्ञान, कर्म, वैराग्य और अभिलाषा से शून्य होनी चाहिए.
चैतन्य ने गुरु को अत्यधिक महत्व दिया और लोगों को बताया कि के मार्गदर्शन और कृपा से ईश्वर को कोई भी व्यक्ति प्राप्त कर सकता है. इसके बावजूद भी उन्होंने नये सम्प्रदाय की स्थापना अपने जीवन में नहीं की.
चैतन्य के विचार सरल और हृदयग्राही होने के कारण जनता में शीघ्रता से लोकप्रिय हो गये. उनके प्रयास यह थे कि हिन्दू जनता रूढ़ियों एवं अन्धविश्वासों से मुक्त हो तथा जाति-पाँति के बन्धन समाप्त हों और जीवन में समानता एवं समरसता का संचार हो.
> कबीर
कबीर के जन्म के विषय में विवाद है. कहा जाता है कि 1440 ई. में एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए, जिसने लज्जावश इन्हें बनारस के एक तालाब के पास डाल दिया, जिसे नीरू नामक जुलाहे ने घर ले जाकर लालन-पालन किया. बड़े होने पर कबीर रामानन्द के शिष्य हो गये.
कबीर भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सन्तों में से एक थे तथा इन्होंने राम और रहीम को एक बताते हुए हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए उल्लेखनीय प्रयास किये. इन्होंने बड़ी ही कड़ी वाणी में हिन्दू और मुसलमानों के बाह्य आडम्बरों पर प्रहार किया. इन्होंने प्रेम का उपदेश दिया, जिसका उद्देश्य सभी सम्प्रदायों में एकता का विकास करना था.
सन्त कबीर ने मूर्ति पूजा और कर्मकाण्ड का घोर विरोध किया तथा जाति प्रथा को व्यर्थ बताया. इन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि ईश्वर के सामने छोटे-बड़े, ऊँचे-नीचे, हिन्दू-मुसलमान आदि सभी एकसमान हैं तथा विभिन्न धर्मों का मार्ग एक ही लक्ष्य की ओर ले जाता है. कबीर अगाध भक्ति और ईश्वर के भजन को ही मोक्ष का साधन मानते थे. इन्होंने ब्रह्म के निराकार स्वरूप में अपना विश्वास प्रकट किया तथा एकेश्वरवाद पर जोर दिया.
कबीर अपने समय के महान् क्रान्तिकारी सन्त थे, जिन्हें हिन्दू और मुसलमान दोनों समान रूप से मानते थे. इसी कारण उनकी मृत्यु के समय मुसलमानों ने उनके शव को दफनाना चाहा तथा हिन्दुओं ने जलाना, लेकिन उनका शव विलीन हो गया और कफन के नीचे थोड़े से फूल शेष रह गये, जिसे दोनों ने आपस में बाँटकर अपने-अपने धर्मों के अनुसार उनका अन्तिम संस्कार किया.
कबीर के बाद नानक, दादूदयाल, रज्जब, रैदास, धन्ना आदि ने उनकी परम्परा को और आगे बढ़ाया.
> दादूदयाल
भक्ति आन्दोलन के सन्तों में दादूदयाल का नाम अग्रणी है. इन्होंने भी अन्य सन्तों की भाँति मूर्ति-पूजा, जाति-बन्धन तीर्थ, व्रत, अवतार आदि के विरुद्ध अपनी आवाज बुलन्द की. विभिन्न विरोधी सम्प्रदायों को भ्रातृत्व और प्रेम में बाँधकर एक करने का इन्होंने महती प्रयास किया और 'दादू पंथ' नामक एक नवीन सम्प्रदाय चलाया. इन्होंने धार्मिक ग्रन्थों की प्रभुता और प्रामाणिकता की अपेक्षा ईश्वर के साक्षात्कार पर अधिक बल दिया. इसलिए दादू ने सन्देश दिया कि मनुष्य को पूर्णतया अपने आपको ईश्वर के प्रति समर्पित कर देना चाहिए.
> भक्ति आन्दोलन का प्रभाव (Impact of Bhakti Movement)
भक्ति आन्दोलन एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन था. जिसने जनसाधारण को अत्यधिक प्रभावित किया. भक्ति आन्दोलन के सन्तों एवं सुधारकों ने भारत में चेतना की एक नई लहर पैदा कर दी और सम्पूर्ण देश में एक नये वातावरण का सृजन हुआ.
जब भारत में भक्ति आन्दोलन चला, उस समय भारत की जनता अपने राजनीतिक अधिकार खोकर मुस्लिम आक्रमणकारियों से भयाक्रान्त थी. उनके द्वारा यहाँ की जनता का मान-सम्मान लूटा जा रहा था, ऐसे में भक्ति आन्दोलन ने जनता को सहारा दिया.
भक्ति आन्दोलन ने देश में एकता को बढ़ावा दिया क्योंकि इस आन्दोलन से सद्भावना की एक ऐसी लहर उठी जो सम्पूर्ण देश में छा गई. नानक और कबीर जैसे सन्तों ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए सराहनीय प्रयास किये.
भक्ति आन्दोलन से निम्न जातियों के उत्थान का मार्ग खुला, क्योंकि इसके सन्तों ने सभी जातियों एवं धर्मों के लोगों के लिए भक्ति का मार्ग खोल दिया तथा ईश्वर के समक्ष सभी प्राणियों को समान बताकर प्राणी मात्र की समानता पर बल दिया.
भक्ति आन्दोलन के कारण मूर्ति पूजा, अन्धविश्वास, बाल हत्या, सती प्रथा, दासता, धार्मिक कर्मकाण्ड आदि का प्रमुखता से खण्डन हुआ जिससे समाज को एक नया बल मिला.
भक्ति आन्दोलन के प्रभाव के कारण ही मराठा और सिख जैसी सैनिक जातियों का उदय हुआ, जिन्होंने मुगलों का सामना किया. इसी भक्ति आन्दोलन के सन्तों का सहारा पाकर विजयनगर जैसे हिन्दू साम्राज्य का उदय हुआ.
भक्ति आन्दोलन ने क्षेत्रीय भाषा और साहित्य को समृद्ध किया बंगला, गुजराती, मराठी, हिन्दी, राजस्थानी, आदि क्षेत्रीय भाषाओं में खूब साहित्य का सृजन हुआ.
भक्ति आन्दोलन का सर्वाधिक उल्लेखनीय योगदान हिन्दू जाति को मध्यकाल में हताशा से बाहर निकालने का है.. इसने सामाजिक कुरीतियों का नाश कर, समाज को संगठित और दृढ़ बनाया. इस प्रकार कहा जा सकता है कि भक्ति आन्दोलन ने तुर्की आधिपत्य के काल में उत्तरी भारत की घायल हिन्दू जनता के हृदय पर मरहम लगाने का कार्य किया.
> सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक 
पंजाब के तलबण्डी (वर्तमान ननकाना ) ग्राम में सन् 1469 ई में खत्री परिवार में गुरु नानक का जन्म हुआ था. इन्होंने उपनिषद् के विशुद्ध एकेश्वरवाद के सिद्धान्त को पुनः जाग्रत करने का प्रयास किया. कबीर के समान ही इन्होंने मूर्ति पूजा, बहुदेववाद का विरोध किया तथा हिन्दू और मुसलमानों के कर्मकाण्डों का प्रतिरोध किया. वास्तव में गुरु नानक एक समन्वयकारी सन्त थे जिनका उद्देश्य विभिन्न धर्मों के आपसी संघर्ष का अन्त करना था. 
नानक कबीर की तरह ही जाति -प्रथा के विरोधी थे. उनका कहना था कि ईश्वर का प्रकाश सभी व्यक्तियों में है और उसके यहाँ कोई जाति भेद नहीं है. 
नानक ने ईमानदारी, विश्वासपात्रता, सत्यनिष्ठा, दान, दया, मद्यनिषेध आदि श्रेष्ठ आदर्शों का पालन करके जीवन को उच्च बनाने पर बल दिया. उन्होंने 'मरदाना' नामक एक शिष्य को साथ लेकर मक्का एवं मदीना के अलावा कुछ अन्य मुस्लिम देशों का भ्रमण किया और अपने अनेक अनुयायी बनाये. ईश्वर की सर्वव्यापकता का उपदेश इन्होंने दिया और ईश्वर के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण की भावना को इन्होंने मोक्ष का साधन बताया. नानक ने कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्तों को स्वीकार किया.
नानक के शिष्यों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे और ये अनुयायी बाद में 'सिख' कहलाये और उन्होंने नानक के सिद्धान्तों को गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित किया.
> गुरु नानक के उत्तराधिकारी :
> सिखों का उत्थान एक सैनिक शक्ति के रूप में  कैसे ? 
नानक के बाद अंगद, अमरदास और रामदास का जीवन साधुओं की तरह ही था. यद्यपि ये सभी लोग गृहस्थ थे और सांसारिक ऐश्वर्य की ओर ध्यान न देकर अपनी आत्म उन्नति की साधना में लीन रहे, लेकिन रामदास के समय तक इनके पास धन आने लगा था. रामदास को मुगल सम्राट् अकबर ने 500 बीघा जमीन दान की जिस पर इन्होंने अमृतसर नामक एक तालाब और मन्दिर का निर्माण करवाया. यही मन्दिर आगे चलकर स्वर्ण मन्दिर कहलाने लगा. रामदास ने अपने पुत्र अर्जुनदेव को अपना उत्तराधिकारी बनाकर सिखों के गुरु पद को वंशानुगत बना दिया.
गुरु अर्जुनदेव अपने व्यक्तित्व और धार्मिकता के कारण बहुत प्रसिद्ध हो गये और उनके अनुयायियों की संख्या बहुत अधिक हो गई. अपने शिष्यों को गुरु ने सही रास्ते पर चलने के लिए एक ग्रन्थ 'आदिग्रन्थ' तैयार किया जिसमें उन्होंने सभी गुरुओं तथा कुछ अन्य महात्माओं की वाणियाँ संकलित कीं और इसी ग्रन्थ में उन्होंने अपनी स्वयं की रचनाएँ भी सम्मिलित कीं.
गुरु अर्जुन ने साधुता का वेश त्याग दिया तथा राजसी वस्त्र धारण करने लगे तथा उन्होंने अपने अनुयायी सिखों से एक प्रकार का धार्मिक कर वसूलना प्रारम्भ कर दिया, उन्होंने व्यापार द्वारा भी बहुत-सा धन एकत्र कर लिया. 1606 ई. में खुसरो ने जब विद्रोह किया तब अर्जुनदेव ने उसकी सहायता की. इस पर मुगल सम्राट् जहाँगीर ने रुष्ट होकर उनकी हत्या करवा दी. इससे सिखों और मुगलों में वैमनस्य उत्पन्न हो गया और सिख अब बदला लेने के लिए संगठित होने लगे.
गुरु अर्जुनदेव के बाद सिखों ने उनके पुत्र हरगोविन्द को अपना गुरु चुना. इनकी प्रकृति राजसी भाव की थी. अतः इन्होंने सिखों को सैनिक शिक्षा देना प्रारम्भ कर दिया. इनका भी मुगलों से छुट-पुट संघर्ष चलता रहा, लेकिन अन्त में लेनी की
हरगोविन्द ने अपने पुत्र हर राय को अपना उत्तरा- थे. धिकारी बनाया, जो कि एक शान्त स्वभाव के व्यक्ति इनकी मृत्यु के बाद इनका भाई हरकिशन गुरु स्वीकार कर लिया गया, लेकिन इनकी शीघ्र ही मृत्यु हो जाने पर तेग बहादुर को इनकी गद्दी का वारिस माना गया.
गुरु तेग बहादुर (1664-76 ई.) ने अपने को 'सच्चा पादशाह' की उपाधि से विभूषित किया और शाही अन्दाज में जीवन व्यतीत करना प्रारम्भ कर दिया. इस पर मुगल सम्राट् ने उन्हें बन्दी बना लिया और इस्लाम धर्म स्वीकार न करने के कारण उनकी हत्या करवा दी. इससे सिखों में स्वाभावतः अत्यन्त रोष उत्पन्न हो गया और इस रोष को मुगलों के गोविन्दसिंह ने अपना विरुद्ध अगले 10वें और अन्तिम नेतृत्व प्रदान किया.
> गुरु गोविन्दसिंह (1676-1708 ई.) 
गुरु तेगबहादुर की मृत्यु के बाद बाद उनके एकमात्र पुत्र गोविन्दसिंह को सिखों ने अपना गुरु माना और मुगल सम्राट्  के भय से कि कहीं वह इनकी भी हत्या न करवा दे, छिपा दिया. गुरु गोविन्दसिंह ने इस अवधि का उपयोग तैयारी में किया और फारसी, संस्कृत भाषा के अध्ययन के साथ-साथ देवी दुर्गा की उपासना की और सिखों के पुनर्गठन की रूपरेखा तैयार की तथा उन्होंने सिखों के लिए कुछ नियम बनाये, जो इस प्रकार हैं
1. पाँच 'क' कार को धारण करना अर्थात् केश, कंघा,. कच्छा, कृपाण और कड़ा.
2. जाति-पाँति के भेद को भुलाकर आपस में सबके साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध स्थापित करने को उद्यत रहना.
3. हिन्दू-मुसलमानों के संस्कारों को न मानकर केवल गुरु के आदेश को मानना.
4. अपने नाम के अन्त में 'सिंह' शब्द जोड़ना और धर्म की रक्षा में 'सिंहवत' निर्भीक रहना.
5. तम्बाकू न पीना और केवल झटके वाला मांस खाना.
गुरु गोविन्दसिंह ने अपने सिख अनुयायियों को सैनिक रूप में इसलिए गठित किया कि जब संगठित राजसत्ता द्वारा धर्म के ऊपर अत्याचार किये जा रहे हों, तब उसका मुकाबला करने के लिए संगठित सैनिक शक्ति का होना आवश्यक है और राजनीतिक सत्ता प्राप्ति करने पर ही धर्म की रक्षा सम्भव है. M
इस कार्य हेतु गुरु गोविन्दसिंह ने आनन्दपुर साहब को अपना निवास स्थान बनाया और पहाड़ी क्षेत्र तथा कश्मीर के छोटे-छोटे सामंतों को मुगल सम्राट् के विरुद्ध भड़काना प्रारम्भ कर दिया. उनकी इस आज्ञा को जिसने भी स्वीकार नहीं उन्होंने लिया. राजनीतिक शक्ति में वृद्धि हुई. इससे उनकी सैनिक और
मुगलों ने गुरु गोविन्दसिंह के प्रति विरोध करना प्रारम्भ किया और सम्राट् औरंगजेब ने उन्हें कई जगह शिकस्त दी, लेकिन वह उन्हें अन्तिम रूप से दबा न सका.
नोट— औरंगजेब और सिख सम्बन्ध की विवेचना औरंगजेब और सिख विद्रोह के अन्तर्गत की गई है.
> वैष्णव धर्म की उत्पत्ति तथा विकास को समझाइये ? 
भागवत धर्म से ही वैष्णव धर्म का विकास हुआ. इसके प्रवर्तक वृष्णि (सात्वत) वंशी कृष्ण थे. जिन्हें वासुदेव का पुत्र होने के कारण वासुदेव कृष्ण कहा जाता है. छान्दोग्य उपनिषद् में उन्हें देवकी पुत्र और अंगिरस ऋषि का शिष्य कहा गया है. कृष्ण के अनुयायी उन्हें पूज्य (भगवत्) कहते थे. इसी कारण उनके द्वारा प्रवर्तित धर्म को 'भागवत्' कहा गया है, महाभारत काल में कृष्ण का समीकरण विष्णु से किया गया है, जिससे भागवत धर्म 'वैष्णव धर्म' बन गया. विष्णु ऋग्वैदिककालीन देवता हैं तथा वे सूर्य के क्रियाशील रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनका महत्त्व इसलिए है कि उन्होंने तीन पगों में ही सम्पूर्ण त्रिलोक को नाप दिया था. शतपथ ब्राह्मण के अनुसार वे यज्ञों के प्रतिनिधि हैं. ऐतरेय ब्राह्मण में इन्हें ‘सर्वोच्च देवता' माना गया है. पतंजलि ने भी वासुदेव को विष्णु का रूप बताया है. विष्णु पुराण में वासुदेव विष्णु का एक नाम बताया गया है.
इस प्रकार स्पष्ट है कि प्राचीन भागवत धर्म ही वैष्णव धर्म बन गया.
वैष्णव धर्म या भागवत धर्म का प्रधान केन्द्र मथुरा था और यह यहीं से धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में फैला. मौर्यकाल में यह धर्म पश्चिम भारत में बहुत अधिक लोकप्रिय था. उसके बाद में यह धीरे-धीरे मध्यदेश में फैला. इस धर्म से सम्बन्धित प्रथम स्मारक हेलियोडोरस का बेसनगर विदिशा का गरुड़ स्तम्भ है. राजस्थान के घोसुण्डी से भी वैष्णव धर्म से सम्बन्धित अति प्राचीन पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं. वैष्णव धर्म ने धीरे-धीरे विकास करते हुए गुप्तकाल आतेआते भारत में अपनी प्रधानता स्थापित कर ली और अब उसकी स्थिति सर्वोच्च हो गई. अधिकांश गुप्त सम्राट् इस धर्म के उपासक थे. गुप्तों के बाद हर्ष के समय में भी इस धर्म की प्रधानता रही, लेकिन इसका और अधिक प्रचार राजपूत काल में हुआ. राजपूतों के अभिलेख विष्णु स्तुति से अक्सर प्रारम्भ होते थे तथा उन्होंने इस काल में अनेक विष्णु मन्दिरों का निर्माण कराकर विष्णु के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की.
उत्तरी भारत के समान ही दक्षिण में 'आलवार' सन्तों ने विष्णु के प्रति भक्ति का प्रचार किया, आलवार सन्तों की संख्या बारह बताई जाती है तथा इनमें से एकमात्र महिला साध्वी 'आण्डाल' है जो दक्षिण की 'मीरा' के नाम से प्रसिद्ध है.
आलवार सन्त सच्चे विष्णु भक्त थे. उन्होंने भजनकीर्तन, नामोच्चारण, मूर्ति दर्शन आदि के माध्यम से वैष्णव धर्म का प्रचार किया. इनके उपदेशों में धार्मिक जटिलता नहीं थी. इनका कहना था कि मोक्ष के लिए ज्ञान की नहीं अपितु विष्णु की भक्ति की आवश्यकता है. दक्षिण के पल्लव, चालुक्य आदि वंशों के राजाओं ने इन्हीं आलवार सन्तों के प्रभाव में आकर वैष्णव धर्म को अपना राजधर्म बना लिया जबकि चोल शासकों के शासनकाल में शैव धर्म की प्रमुखता रही, परन्तु उनकी सहिष्णुता की नीति के कारण वैष्णव धर्म का भी विकास हुआ. इस काल में आलवार सन्तों के स्थान पर आचार्यों ने वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार किया प्रसिद्ध वैष्णव धर्म आचार्य इसी समय में हुए और उन्होंने इस धर्म का खूब प्रचार दक्षिण में किया.
> वैष्णव धर्म के सिद्धान्त
इस धर्म के अनुसार, ईश्वर की भक्ति द्वारा मोक्ष को होकर भक्त को अपनी शरण में ले लेते हैं. गीता में स्वयं प्राप्त किया जा सकता है. भक्ति से विष्णु भगवान् प्रसन्न भगवान कृष्ण कहते हैं कि “सभी धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त करूँगा."
इस धर्म में अवतारवाद का सिद्धान्त अत्यन्त महत्वपूर्ण है. इसमें कहा गया है कि समय-समय पर ईश्वर पृथ्वी पर धरती के लोगों का उद्धार करने के लिए अवतार लेते हैं. पुराणों के अनुसार विष्णु के अभी तक 10 अवतार हैं, जिसमें 9 प्रकट हो चुके हैं तथा 10 होना अभी शेष हैं. ये हैं - 
(1) मत्स्य, (2) कूर्म, (3) वराह, (4) नृसिंह, (5) वामन, (6) परशुराम, (7) रामावतार, (8) कृष्णावतार, ( 9 ) बुद्ध, (10) कल्कि, अभी होना शेष है.
इस धर्म में मूर्ति-पूजा तथा मन्दिरों आदि का महत्वपूर्ण स्थान है. मूर्ति को प्रत्यक्ष ईश्वर का रूप माना गया है तथा भक्त मन्दिर में जाकर पूजा करते हैं. दशहरा, दीपावली, जन्माष्टमी, आदि इनके प्रमुख पर्व हैं. रामानुज, बल्लभ, चैतन्य आदि दे का नाम इस धर्म के प्रचारकों में विशेष उल्लेखनीय है. बाद में विष्णु के रामावतार का प्रचार अधिक हो गया और मध्यकाल में तुलसी ने ‘रामचरितमानस' को लिखकर देश में राम के करोड़ों की संख्या में भक्त बना दिये. ama F10
> शैव धर्म
भगवान शिव के उपासक 'शैव' कहलाते हैं. इस धर्म की प्राचीनता प्रागैतिहासिक काल से मानी जाती है. सैंधव सभ्यता से ही इस धर्म के अवशेष ‘पशुपति शिव’ के रूप में मिले हैं.
ऋग्वेद में भी शिव के विषय में विवरण है, जिन्हें इसमें रुद्र कहा गया है तथा इसमें कहा गया है कि क्रुद्ध होने पर मानव तथा पशु जाति का संहार करते थे और महामारी फैला देते थे. अतः इस काल में लोग रुद्र की उपासना उनके क्रोध से बचने के लिए करते थे. वस्तुतः रुद्र में विनाशकारी और मंगलकारी दोनों ही प्रकार की शक्तियाँ निहित थीं. शिव पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति उन्हें नहीं मानते हैं वे उनको छिन्न-भिन्न कर डालते हैं तथा उनकी उपसना करने वाले भक्तों के प्रति वे अत्यन्त मंगलकारी हैं, इसलिए उन्हें ‘शिव' कहा गया है. भक्ति द्वारा वे आसानी से प्रसन्न किये जा सकते हैं. वे प्राणियों के रक्षक तथा संसार के स्वामी हैं.
ऋग्वेद के बाद वाजसनेयी में शिव को समस्त लोकों का स्वामी कहा गया है. अथर्ववेद में उन्हें भव, पशुपति, भूपति आदि कहा गया है, उन्हें ब्रह्माण्ड का भी life स्वामी कहा गया है. ब्राह्मण ग्रन्थों में रुद्र की गणना सर्वप्रमुख देवता के रूप में की गई है. उपनिषद्काल में रुद्र की प्रतिष्ठा में और अधिक वृद्धि हुई तथा महाभारत काल में शैव धर्म को व्यापक जनाधार प्राप्त हो गया. शिव की उपासना उत्तर भारत के साथ-साथ इस समय दक्षिण भारत में और यहाँ तक कि श्रीलंका में भी होती थी. महाभारत में कहा गया है कि स्वयं भगवान् कृष्ण और अर्जुन शिव से उनका अस्त्र पाशुपत प्राप्त करने के लिए हिमालय जाकर तपस्या की थी. यूनानी राजदूत मैगस्थनीज भी मौर्यकाल में शिव पूजा का उल्लेख 'डायनोसस' नाम से करता है. अर्थशास्त्र भी शिव पूजा का उल्लेख है.
गुप्तकाल में वैष्णव धर्म के साथ-साथ शैव धर्म की भी लोकप्रियता में वृद्धि हुई तथा शिव की आराधना हेतु इस काल में अनेक मन्दिरों का निर्माण किया गया. उदयगिरि का गुहालेख शिव स्तुति से ही प्रारम्भ होता है. कालिदास स्वयं शिव के एक बहुत बड़े भक्त थे.
हर्ष के समय में भी शैव धर्म की उन्नति हुई. बाणभट्ट, एवं ह्वेनसांग इस धर्म का उल्लेख करते हैं. हर्ष का समकालीन शासक शशांक कट्टर शैव था.
राजपूतकाल तक आते-आते धर्म काफी लोकप्रिय हो चुका था. इसी काल में चन्देल शासकों ने खजुराहो का विश्व प्रसिद्ध कन्दरिया महादेव मन्दिर का निर्माण करवाया.
उत्तरी भारत की तरह ही दक्षिण में पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट एवं चोल शासकों ने शैव धर्म को प्रश्रय दिया. राष्ट्रकूट शासकों ने शिव के प्रति शृद्धा प्रकट कर कैलाश नाथ (एलोरा) का विश्व प्रसिद्ध मन्दिर बनवाया. चोलों के समय शैव धर्म राज धर्म हो गया था तथा उन्होंने शिव के प्रति अपनी श्रद्धा अनेकों, भव्य एवं विशाल मन्दिरों का निर्माण करके प्रकट की. 200
दक्षिण में शैव धर्म का प्रचार 'नयनार' सन्तों ने किया जिनकी संख्या 63 बताई गई है.
 इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में शिव आराधना कि तक प्रागैतिहासिक काल से प्रारम्भ होकर प्राचीनकाल के निरन्तर विकसित होती रही तथा इसको हिन्दू धर्म में एक प्रमुख स्थान मिला.
> शैव धर्म : प्रमुख सम्प्रदाय
शैव धर्म से सम्बन्धित निम्नलिखित सम्प्रदाय हैं
(1) पाशुपत - यह शैव धर्म का सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है, जिसकी स्थापना 'लकुलीश' ने की थी. इन्हें स्वयं शिव का अवतार माना जाता है. इस सम्प्रदाय के अनुयायी अपने हाथ में एक 'लगुड' (दण्ड ) धारण करते हैं, जो शिव का प्रतीक समझा जाता है. इसके अनुयायी अपने मस्तक पर भस्म लगाते हैं तथा रुद्राक्ष की माला धारण करते हैं.
महेश्वर कृत 'पाशुपत सूत्र' में इस सम्प्रदाय के सिद्धान्तों का विवरण मिलता है.
(2) कापालिक – इस मत के उपासक भैरव को शिव का अवतार मानकर उनकी उपासना करते हैं तथा सुरा व सुन्दरी का पान करते हैं. जटा-जूट रखते हैं, मांस खाते हैं, की भस्म अपने शरीर पर लगाते हैं तथा हाथ में नरमुण्ड धारण करते हैं. श्मसान
(3) लिंगायत सम्प्रदाय – इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभ प्रभु तथा उनके शिष्य वीर बासव हैं. इसका प्रचार दक्षिण शिवलिंग को चाँदी के सम्पुट में बन्द कर उसे गले में धारण भारत में मुख्य रूप से हुआ. इस सम्प्रदाय के अनुयायी करते हैं.
(4) कश्मीरी शैव मत – यह शुद्ध ज्ञानमार्गी शैव मत है तथा ज्ञान को ही परमात्मा की प्राप्ति का इसमें साधना माना गया है. इस मत में शिव के अद्वैत रूप को स्वीकार किया गया है, शिव सर्वव्यापी हैं तथा संसार इन्हीं का रूप है. शक्ति के साथ मिलकर शिव सृष्टि की रचना करते हैं. इसके अनुसार व्यक्ति के अज्ञान का आवरण हटते ही उसे वास्तविकता का बोध होता है और यही मोक्ष है.
(5) इन चार सम्प्रदायों के अतिरिक्त मत्स्येन्द्रनाथ ने 'नाथ सम्प्रदाय' का प्रवर्तन किया, जिनकी क्रियाएँ और आचार बौद्धों से मिलती-जुलती हैं. इनकी साधना में नारी का प्रमुख स्थान है, बाद में 10-11वीं सदी में बाबा गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय का प्रचार-प्रसार किया.
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Sun, 08 Oct 2023 08:50:25 +0530 Jaankari Rakho
सल्तनतकाल [कृषि, उद्योग, समाज, स्त्रियों की दशा, शिक्षा एवं साहित्य एवं कला – संगीत तथा स्थापत्य] https://m.jaankarirakho.com/415 https://m.jaankarirakho.com/415 सल्तनतकाल [कृषि, उद्योग, समाज, स्त्रियों की दशा, शिक्षा एवं साहित्य एवं कला – संगीत तथा स्थापत्य]

> सल्तनतकाल में कृषि : टिप्पणी (Agriculture)
प्राचीनकाल से ही भारतीयों की जीविका का मुख्य आधार कृषि था. अतः स्वाभाविक रूप से सल्तनतकाल में भी कृषि ही लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन थी, इसलिए देश की अधिकांश जनता कृषक थी. इस काल में भूमि को उपजाऊ बनाने तथा सिचाई के साधनों की व्यवस्था सुल्तानों द्वारा करने के कारण उपज बहुत अधिक होती थी. देश के अलग-अलग क्षेत्र भिन्न-भिन्न फसलों के लिए विख्यात थे. इब्नबतूता के अनुसार, वर्ष में कृषक दो या तीन फसलें काटते थे.. कृषि में मुख्य फसलें धान, गेहूँ, गन्ना, कपास आदि की खेती व्यापक क्षेत्रों में होती थी. दक्षिण भारत विभिन्न प्रकार के मसालों के लिए प्रसिद्ध था. इस काल में कृषि-क्षेत्र का अत्यधिक विस्तार हुआ. अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक एवं फिरोज तुगलक ने कृषि के विकास के लिए बहुत से प्रयास किये. फिरोज ने सिंचाई व्यवस्था को सुधारने के लिए बहुत-सी नहरों का निर्माण करवाया, वहीं मुहम्मद बिन तुगलक ने कम उपजाऊ क्षेत्र के विकास के लिए कृषि विभाग (दीवान-ए-कोही) की स्थापना की किसानों को उनकी आवश्यकता के हिसाब से इस काल में सुल्तानों द्वारा आर्थिक सहायता भी दी गई. अनाज के अतिरिक्त सल्तनतकाल में बड़े पैमाने पर फल-फूल भी उगाये जाते थे. फिरोज तुगलक ने अपने राज्य के विभिन्न भागों में 400 से भी अधिक फलों के बाग लगवाये. इस काल में बागवानी का भी खूब प्रचलन था.
इस प्रकार स्पष्ट है कि सल्तनतकाल में कृषि की दशा सन्तोषजनक थी तथा किसानों पास पर्याप्त उत्पादन कर जमा करने के बाद शेष रह जाता था.
> सल्तनतकाल : उद्योग (Industry)
सल्तनकाल में विभिन्न प्रकार के उद्योग-धन्धों का विकास हुआ जिसके कारण कुशल कारीगरों का एक वर्ग उत्पन्न हुआ. इस वर्ग ने नगरों एवं औद्योगिक केन्द्रों का विकास करने में बड़ी भूमिका का निर्वाह किया.
सल्तनतकाल में वस्त्र उद्योग, धातु उद्योग और चर्मउद्योग के साथ-साथ कागज, चीनी, शीशा, काष्ठ उद्योग आदि का विकास हुआ. इस काल में हाथी दाँत से विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ तैयार की जाती थीं. ऊनी, सूती और रेशमी वस्त्र इस काल में अनेक स्थानों पर कुशल श्रमिकों द्वारा तैयार किये जाते थे. सूरत, बनारस, पटना, दिल्ली, एवं बंगाल वस्त्र उद्योग के प्रमुख केन्द्र थे. कपड़ों को रंगने, उन पर कसीदाकारी का कार्य भी होता था, कपड़ों के अतिरिक्त दरी एवं कालीनों का भी निर्माण स्थान-स्थान पर किया जाता था. इस समय इस्पात से विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बनाने का उद्योग भी बड़े पैमाने पर विकसित था. दिल्ली, पटना, अवध एवं लाहौर इसके प्रमुख केन्द्र थे. बहुमूल्य पत्थरों को तराश कर उनसे रत्न आभूषण बनाये जाते थे. चीनी उद्योग के केन्द्र लाहौर, दिल्ली, बयाना, बरार एवं आगरा थे. चमड़े से इस काल में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ तैयार की जाती थीं. सुगन्धित तेल, इत्र एवं मदिरा का निर्माण भी बड़ी मात्रा में अनेक स्थलों पर किया जाता था. जहाज बनाने का काम प्रगति पर था तथा इसके लिए राज्य की ओर से कई कारखाने स्थापित किये गये थे.
इब्नबतूता के अनुसार, इस काल में दिल्ली संसार की सबसे बड़ी मण्डी थी. भारत का चीन, ईरान, अरब, मध्य एशिया, यूरोप एवं अफ्रीका से व्यापारिक सम्बन्ध था. भारत विदेशों को इस्पात के बने अस्त्र-शस्त्र, सूती वस्त्र, अनाज, शक्कर, नील, विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियाँ एवं मसाले, नीबू, सन्तरे, कागज, हीरा, मोती, चन्दन, केसर, कस्तूरी, हाथी दाँत, मोर इत्यादि का निर्यात करता था. इसके बदले में विदेशों से घोड़ा, अस्त्र, शस्त्र, खस, मेवे, फल, सोना, खजूर, शीशा इत्यादि का आयात करता था.
दिल्ली के सुल्तानों ने उद्योग एवं व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए आवागमन की सुचारु व्यवस्था को ; मुद्रा के प्रचलन एवं बैंक, हुण्डी, ऋण, ब्याज तथा बीमा व्यवस्था ने उद्योग-धन्धों एवं व्यापार के विकास को बढ़ावा दिया.
सल्तनतकाल में ही दो वर्ग थे— अत्यन्त अमीर वर्ग और गरीब वर्ग. गरीबों की दशा अत्यन्त दयनीय थी, जबकि धनवान ऐश-आराम का जीवन व्यतीत कर रहे थे.
> सल्तनतकालीन समाज
सल्तनतकाल के समाज को हम प्रमुख रूप से दो वर्गों में बाँट सकते हैं—
(1) मुस्लिम समाज,
(2) हिन्दू समाज.
भारत में तत्कालीन मुस्लिम समाज को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है— सुल्तान, अमीर, उलेमा और जनसाधारण.
(1) सुल्तान – सुल्तान और राज्य दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची थे. सुल्तान समाज का आदर्श था. वह शक्ति का सर्वप्रमुख केन्द्र था और उसकी महात्वाकांक्षा थी कि, सारा संसार उसके सम्मुख नतमस्तक हो. उसका नाम सिक्कों पर, खुतबे में लिखा व पढ़ा जाता था.
उसके दरबार में आम जन एवं दरबारी पंक्तियों में खड़े रहते थे. उसके पास अनेक महल, दास-दासियाँ तथा नौकर थे. उसके महलों में भी कर्मचारियों की विशाल संख्या रहती थी.
इस प्रकार सुल्तान के शान-शौकत और ठाठ-बाठ बड़े ही निराले थे.
(2) अमीर वर्ग – सुल्तान के बाद अमीरों का स्थान था. सल्तनतकाल में अमीरों की तीन प्रमुख श्रेणियाँ थीं
(i) खान, (ii) मलिक, तथा (iii) अमीर.
(i) खान—अमीरों में सबसे प्रमुख खान लोग थे. कुछ खानों को खान-ए-आजम की उपाधि प्रदान की जाती थी. बलबन और मुहम्मद तुगलक को ये पद प्राप्त थे.
(ii) मलिक– खान के बाद मलिक का स्थान था. सामान्यतः इनके पास बड़ी सेना रहती थी. इन्हें राज्य की ओर से जागीरें मिली हुईं थीं तथा इनका जीवन भी शानशौकत से बीतता था.
(iii) अमीर – इस शब्द का प्रयोग सामान्यतः राज्य के सभी सैनिक एवं असैनिक पदाधिकारियों के लिए होता था. इस वर्ग में विभिन्न जातियों के मुस्लिम तुर्क अफगान आदि होते थे.
इसके अलावा सल्तनतकाल में एक 'नव मुस्लिम' वर्ग भी था जिसमें मुसलमान बने मंगोल सम्मिलित थे.
> मुस्लिम वर्ग में उलेमा
इस वर्ग में धर्मशास्त्री, सैयद, पीर इत्यादि सम्मिलित थे. इन लोगों का इस्लाम से विशेष सम्बन्ध था. ये धर्मशास्त्री न्याय सम्बन्धी तथा धार्मिक पदों पर नियुक्त होते थे. ये दस्तार वंधा भी कहलाते थे. सैयद लोग 'कुलह दारान' कहलाते थे, क्योंकि ये लोग सिर पर कुलाह (टोपी) लगाते थे. इन लोगों का कार्य इस्लाम और कुरान की व्याख्या करना था तथा मुस्लिम विधि का निरूपण एवं प्रकाशन का कार्य इनका था.
> मुस्लिम वर्ग में जनसाधारण
इस वर्ग में मुख्य रूप से वे लोग सम्मिलित थे जो पहले हिन्दू थे और उन्होंने इस्लाम को स्वीकार कर लिया था. सामान्यतः सुल्तान इनकी ओर दया की दृष्टि रखता था. इन लोगों ने इस्लाम को धारण करके भी अपने अनेक संस्कारों को छोड़ा नहीं था. इस वर्ग में कारीगर, दुकानदार, छोटे व्यापारी एवं अन्य व्यवसायी आते थे. इनका जीवन अन्य वर्गों की अपेक्षा सादा था और ये अभाव ग्रस्त बने रहते थे.
> गुलाम
मुसलमानों द्वारा इस काल में युद्ध में लोगों को पकड़कर गुलाम बना लिया जाता था. वह अपने मालिक पर आश्रित रहता था तथा मालिक उसे अपनी इच्छानुसार बेच सकता था. यदि कोई गुलाम हिन्दू था और गुलाम बनने के बाद दि वह इस्लाम को स्वीकार कर लेता तो उसे गुलामी से मुक्ति मिल जाती थी और उसकी स्थिति पहले से बेहतर हो जाती थी. यदि कोई गुलाम थोड़ा योग्य होता और वह सुल्तान की सेवा में चला जाता तो उसके लिए किसी चीज की कमी नहीं रहती थी.
इस युग में लूट द्वारा प्राप्त धन के कारण अनेक दोष उत्पन्न हो गए थे. बड़े-बड़े सैनिक व नेता भोग-विलास में बुरी तरह फँस गए थे. इन धनी व्यक्तियों को धन की कोई कमी नहीं थी और सर्वसाधारण मुसलमानों के लिए ‘खानकाह' खुले हुए थे, जिसमें ये लोग बिना किसी मूल्य के भोजन एवं आवश्यकता की वस्तुएँ प्राप्त कर सकते थे. अतः इस स्थिति में मुसलमानों को न खेती करने की आवश्यकता थी और न ही कोई धन्धा करने की. इसका परिणाम यह हुआ कि मुसलमानों में एक प्रकार का निकम्मापन विकसित होने लगा. वे मदिरापान, द्यूत क्रीड़ा, इत्यादि में फँसकर अपना समय नष्ट करने लगे और धीरे-धीरे मुस्लिम वर्ग की शक्ति क्षीण हो गई.
> सल्तनतकाल में हिन्दू समाज
सल्तनतकाल में हिन्दू समाज से तात्पर्य गैर-इस्लामिक वर्ग से है और इस काल में अधिकांश जनसंख्या हिन्दू थी और इस सम्पूर्ण सल्तनतकाल में हिन्दू समाज के पारम्परिक ढाँचे में कोई परिवर्तन नहीं आया. हालांकि इस्लामी सम्पर्क के कारण इसमें कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं.
जाति-व्यवस्था पर आधारित हिन्दू समाज — हिन्दू समाज की प्राचीनकाल से ही जाति-प्रथा इसकी प्रमुख विशेषता रही है और वर्ण-व्यवस्था का प्रारम्भिक रूप इस काल में अत्यन्त जटिल हो गया था. हिन्दू धर्मशास्त्रकारों एवं शासकों ने इस व्यवस्था को और अधिक जटिल बनाने में योगदान दिया वंश एवं जाति के अनुसार, व्यवसाय, रीति-रिवाज, खानपान, धार्मिक विश्वास, आचरण, सामाजिक नियम, संस्कार आदि निश्चित किए गए. इनको तोड़ने का अधिकार किसी को नहीं था. जातियाँ उपजातियों में विभक्त थीं, इस काल में अनेक वर्णसंकर और अस्पृश्य जातियाँ भी उदित हुईं. जातिव्यवस्था के बन्धन इतने कठोर थे कि, दयनीय स्थिति वाली अनेक जातियों के लोगों ने इस काल में इस्लाम को स्वीकार कर लिया.
> हिन्दुओं का सामाजिक विभाजन
मुसलमानों की दृष्टि में सभी हिन्दू जिन्होंने इस्लाम को स्वीकार नहीं किया था, 'जिम्मी' थे, परन्तु हिन्दू समाज अनेक वर्गों में विभाजित होने के कारण एकसमान नहीं था. इस काल में भी ब्राह्मणों की स्थिति सर्वोच्च थी और उन्हें जजिया नहीं देने का विशेषाधिकार प्राप्त था. वे अपने प्रमुख व्यवसाय को छोड़कर शिल्प या अन्य व्यवसाय को भी अपना सकते थे.
क्षत्रिय होने का दावा राजपूत शासक करते थे और हिन्दू समाज की रक्षा का कार्य उनका प्रमुख दायित्व था. वैश्य लोग विभिन्न व्यवसायों में लगे थे, परन्तु शूद्र वर्ण और वर्णशंकर जातियों के लोगों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी. उन पर अनेक प्रकार के सामाजिक प्रतिबन्ध लगे थे. 
इस काल में अनेक सुल्तानों ने अपने आपको केवल मुसलमानों का शासक माना और धार्मिक संकीर्णता का परिचय देते हुए हिन्दुओं के मन्दिरों एवं मूर्तियों को नष्ट किया. उनकी हत्याएँ करवाई. धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया गया. इस प्रकार स्पष्ट है कि, 'जिम्मी' हिन्दू प्रजा की दशा मुसलमान वर्ग से निम्न थी.
> सल्तनतकाल में स्त्रियों की दशा
सल्तनतकाल में स्त्रियों की दशा प्राचीनकालीन स्त्रियों के समान तो नहीं थी, फिर भी उसका समाज में आदरपूर्ण स्थान था. हिन्दू परिवारों में उसे गृहस्वामिनी का स्थान प्राप्त था और कोई भी धार्मिक कार्य उसके बिना सम्पन्न नहीं होता था. इस काल में स्त्रियों की शिक्षा पर भी ध्यान दिया जाता था. अतः कई विदुषी महिलाएँ भी इस समय में हुईं जैसे कि अवन्ति सुन्दरी तथा उभय भारती आदि.
इस काल में धनी वर्गों एवं राजघरानों में बहुविवाह का अधिक चलन हो गया था और इस कारण से उसे अब भोग की वस्तु भी समझा जाने लगा था. एक ही पति की अनेक पत्नियाँ एक-दूसरे से ईर्ष्या करती थीं. तुर्की के आने के बाद उनके रनिवासों का आकार बढ़ने लगा और स्त्रियों का सामाजिक मान-सम्मान और भी कम होने लगा. अपने पति की मृत्यु के बाद उनको अपने सतीत्व की रक्षा के लिए उसकी चिता के साथ ही जलकर मर जाना होता था, क्योंकि हिन्दू समाज में इस काल में विधवा का जीवन नारकीय था और उसे पुनर्विवाह की अनुमति नहीं थी.
इसी काल में मुस्लिमों के अत्याचारों से बचने के लिए बाल विवाह का प्रचलन हिन्दू समाज में बढ़ा तथा उनके रूप लावण्य को कोई अन्य न देख सके, इसके लिए पर्दा प्रथा का प्रचलन बढ़ गया. कन्या का जन्म परिवार में दुःख आने का कारण माना जाने लगा. हिन्दुओं में निम्न वर्ण की जातियों में स्त्रियों को प्रायः सभी प्रकार के अधिकार प्राप्त थे, उनमें विधवा विवाह, तलाक, स्वेच्छा से विवाह आदि का चलन था और पर्दा प्रथा का उनमें अभाव था.
मुस्लिम परिवारों में हिन्दू परिवारों की तुलना में स्त्री का सम्मान बहुत कम था. यहाँ सामान्य लोग भी एक से अधिक विवाह करते थे. दासियों के साथ उनके अवैध सम्बन्धों ने परिवारों की शान्ति को भंग कर दिया था. दासियों को रखना उनके सम्मान में वृद्धि का सूचक माना जाता था.
मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा अधिक कड़ी थी. दिल्ली सुल्तानों जैसे फिरोज और सिकन्दर लोदी ने उनकी स्वतन्त्रता पर और कड़े प्रतिबन्ध लगाते हुए उन्हें मजारों पर जाने से मना कर दिया दलील यह दी कि वहाँ पर अनेक पथभ्रष्ट लोग भी जाते हैं.
मुस्लिम समाज की स्त्रियों को कुछ स्वतन्त्रता भी थी जैसे कि, उन्हें सती नहीं होना पड़ा था. वे विशेष परिस्थितियों में अपने पति को तलाक भी दे सकती थीं.
सामान्यतः पारिवारिक जीवन अशान्त नहीं था और पति-पत्नी में सद्भावना, स्नेह और सम्मान बना रहता था. मुस्लिम समाज में भी उच्च वर्गों में तलाक एवं विधवा विवाह की घटनाएँ कम होती थीं और स्त्रियों की सच्चरित्रता के कारण कुल परम्परा की रक्षा होती थी जिससे समाज में स्थायित्वं और शान्ति बनी हुई थी.
> शिक्षा एवं साहित्य
> सल्तनतकाल में शिक्षा
भारत में प्राचीनकालीन शिक्षा का जो स्वरूप था वह मध्यकाल तक आते-आते परिवर्तित हो गया था. गुरुकुल का स्थान अब मदरसे एवं मकतब ले चुके थे. मदरसों की स्थापना राज्य की ओर से की जाती थी, जहाँ पर उच्च शिक्षा की व्यवस्था थी वहीं मकतब प्राइमरी शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे.
12वीं सदी में मुहम्मद गोरी के भारत विजय के बाद तथा दिल्ली में सल्तनत के स्थापित होने के उपरान्त मुस्लिम संस्कृति भारत में प्रवेश कर गई तथा दिल्ली उसकी प्रमुख केन्द्र बनी. इसी समय ऐबक व गोरी ने अजमेर में अनेक मदरसों की स्थापना की.
सुल्तान इल्तुतमिश विद्वानों का सम्मान करता था तथा उसके दरबार में अनेक विद्वान् रहते थे. उसने दिल्ली में सबसे पहले एक मदरसे की स्थापना करवाई और उसका नाम गोरी के नाम पर ‘मदरसा - ए - मुइजी' रखा. ठीक इसी प्रकार का उसने एक अन्य मदरसा बदायूँ में खोला. इस मदरसे के कारण बदायूँ उत्तरी भारत में इस्लामी संस्कृति का केन्द्र बन गया.
नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल में उसके प्रधानमन्त्री बलबन ने एक मदरसे की स्थापना करवाई जिसका नाम उसने नासिरिया (Nasirya) रखा. मिनहज-उस- शिराज इस मदरसे के प्रधान बनाये गये थे. बलबन ने सुल्तान बनने के बाद विद्वानों को बहुत अधिक प्रश्रय देना प्रारम्भ कर दिया. उसके दरबार में अमीर हसन और अमीर खुसरो जैसे लोग निवास करते थे. जियाउद्दीन बरनी ने उन सभी लोगों की एक बड़ी सूची दी है जो इन मदरसों में शिक्षा देते थे.
मंगोलों के आक्रमण के समय अनेक विद्वान् कलाकार मध्य एशिया से आकर भारत में (दिल्ली) बस गये. इनमें शमसुद्दीन ख्वारिज्मी, बुरहानुद्दीन बजाज, कलीमुद्दीन जाहिद, निजामुद्दीन दमिश्की आदि थे. इन सभी लोगों को दिल्ली के मदरसों में शिक्षा प्रदान करने के लिए इस समय नियुक्त किया गया था.
सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने हौजखास के निकट एक भव्य मदरसे की स्थापना की जिसकी मरम्मत आगे चलकर फिरोज तुगलक ने करवाई थी. अलाउद्दीन के प्रधानमन्त्री शमसुद्दीन का प्रारम्भिक जीवन एक शिक्षक के रूप में गुजरा था और इसने शेख निजामुद्दीन औलिया को शिक्षा प्रदान, की थी.
मुहम्मद बिन तुगलक स्वयं एक बड़ा विद्वान् था. उसने 1334 ई. में दिल्ली में एक मदरसे की स्थापना की तथा प्रसिद्ध कवि बद्र-ए-चाच को इसका अध्यक्ष नियुक्त किया था. 
सल्तनतकाल में फिरोज तुगलक ने उच्च शिक्षा के विकास के लिए सराहनीय प्रयास किये, उसने अपने साम्राज्य में लगभग 30 मदरसों की स्थापना की. उसके द्वारा बनवाये गये मदरसों में सर्वाधिक प्रसिद्ध मदरसा दिल्ली में बना ‘मदरसा-ए-फिरोजशाही' था. बरनी के अनुसार, यह एक सुन्दर बगीचे में स्थित था तथा उसमें शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के रहने की पर्याप्त सुविधाएँ थीं. इसका प्रधानाचार्य 'मौलाना जलालुद्दीन रुमी था. फिरोजशाह ने एक अन्य सुन्दर मदरसा 'सीरी' में बनवाया था. फिरोजशाह ने विद्वान् अध्यापकों को अनेक जागीरें प्रदान की विद्यार्थियों को वजीफे प्रदान किये.
लोदी काल में सिकन्दर लोदी ने आगरे में मदरसों की स्थापना करवाई. उसने अनिवार्य शिक्षा पर बल दिया. उसने अरब, फारस एवं मध्य एशिया के अनेक विद्वानों को यहाँ बुलाकर शिक्षक नियुक्त किया. सिकन्दर लोदी के समय के 'मथुरा' तथा 'नरवार' के मदरसों में कोई भी बिना किसी जाति एवं रंगभेद के शिक्षा ग्रहण कर सकता था.
दिल्ली सल्तनत के अतिरिक्त इस काल में अनेक प्रान्तीय राज्यों ने भी शिक्षा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसमें जौनपुर का नाम विशेष उल्लेखनीय है. इसे ‘पूर्व का सिराज' या 'शिराज - ए - हिन्द' की संज्ञा दी गई थी. बहमनी सुल्तानों के समय महमूद गँवा ने बीदर के प्रसिद्ध मदरसे की स्थापना की थी.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सल्तनतकाल में शिक्षा पर वह भी उच्च शिक्षा पर सुल्तानों द्वारा विशेष ध्यान दिया गया था.
> सल्तनतकाल में साहित्य का विकास
सल्तनतकाल में हिन्दू-मुस्लिम सम्पर्क के कारण भाषाओं तथा साहित्य के ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा. तुर्क सुल्तान साहित्य के प्रेमी थे. उनके समय में प्रादेशिक भाषाओं के साथ-साथ संस्कृत, हिन्दी तथा फारसी साहित्य की बहुत अधिक उन्नति हुई. सुल्तानों ने फारसी साहित्य के विद्वानों को प्रमुखता से अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया.
डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव के अनुसार "एक आधुनिक लेखक ने लिखा है कि यह समय सांस्कृतिक सम्पन्न राज्य का था. इसके विपरीत अन्य इतिहासकारों का मत है कि, सल्तनतकाल सांस्कृतिक एवं साहित्यिक दृष्टि से पूर्णतया निष्फल था. दोनों ही मत अतिवादी विचारों के प्रतीक हैं और सत्य से दूर हैं, जो राज्य विदेशी और साम्प्रदायिक आधार पर गठित था. इसकी भाषा, संस्कृतिआदर्श और यहाँ तक कि प्रेरणा भी विदेशी थी. तुर्क अफगान शासक मूलतः सैनिक लोग थे, फिर भी उन्होंने इस्लामी विद्या और कला को प्रोत्साहन दिया." उनके समय में लिखित भाषाओं के साहित्य में अधिक उन्नति हुई—
(1) फारसी साहित्य – कुतुबुद्दीन ऐबक से लेकर सिकन्दर लोदी के समय तक प्रत्येक सुल्तान के दरबार में फारसी लेखकों, कवियों, दार्शनिकों, इतिहासकारों आदि का जमाव रहता था. इस काल के विद्वानों जिनको कि सल्तनत दरबार का संरक्षण मिला उनमें हसन निजामी, रहानी, नसीरी जादुद्दीनदबीर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं. इसी काल में अमीर खुसरो जैसे महान् साहित्यकार, कवि एवं संगीतकार हुए जिन्हें सल्तनतकाल के 5 सुल्तानों का संरक्षण मिला. इन्होंने लगभग 92 रचनाएँ लिखीं जिनमें लैला-मजनूँ. देवलरानी-खिज्रखाँ, हस्त-बहिस्त, नूह-ए-सिपहर, खजाइन-उलफूतूह आदि विशेष उल्लेखनीय हैं. इन्हें 'तूती - ए - हिन्द' कहा गया है.
अलाउद्दीन के समय में खुसरो के अतिरिक्त मीर हसन देहलवी, नुरूलहक जैसे विद्वान् भी थे. तुगलक काल में जियाउद्दीन बरनी, फरिश्ता तथा शम्स-ए-शिराज अफीफ जैसे विद्वानों को संरक्षण मिला और उन्होंने अनेक प्रसिद्ध रचनाएँ लिखीं.
(2) संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य — इस काल में संस्कृत एवं हिन्दी साहित्य को सुल्तानों द्वारा संरक्षण प्रदान नहीं किया गया, परन्तु इस समय के हिन्दू राजाओं ने इस भाषा के साहित्यकारों को अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया. इस काल में रामानुज के ब्रह्मसूत्र पर टीका, पार्थसारथी द्वारा कर्ममीमांसा पर लिखे गये ग्रन्थ, जयदेव द्वारा गीत - गोविन्द, हरिकेलि नाटक, हम्मीर-मद-मर्दन (जयसिंह सूरि), प्रतापरुद्र कल्याण, पार्वती-परिणय (वामन भट्ट) आदि अनेक उल्लेखनीय रचनाएँ लिखी गयीं.
'मिताक्षरा' (मनुस्मृति पर टीका) की रचना करने वाले प्रसिद्ध विद्वान् इसी काल में हुए. जीमूतवाहन द्वारा 'दायभाग' की रचना की गई. विजयनगर साम्राज्य में कृष्णदेव राय द्वारा लिखा गया ग्रन्थ 'अमुक्त माल्यद' विशेष प्रसिद्ध है.
सल्तनतकाल में हिन्दी साहित्य का भी खूब विकास हुआ. इस समय में पृथ्वीराज रासो (चन्दबरदायी कृत) नामक महाकाव्य, हम्मीर रासो, आल्हाखण्ड, आदि प्रसिद्ध रचनाएँ लिखी गईं.
> उर्दू साहित्य
इस काल में 'जबान-ए-हिन्दवी' अर्थात् उर्दू भाषा की उत्पत्ति हुई. यह भाषा संस्कृत तथा उससे निकली भाषाओं तथा फारसी व तुर्की भाषा के सम्पर्क के कारण उत्पन्न हुई और इनके शब्दों के आपस में मिलते रहने से इस भाषा का विकास होता चला गया. आगे चलकर सुल्तानों ने राजदरबार के कवियों तथा लेखकों ने इस भाषा को और अधिक परिष्कृत किया और इस भाषा का एक निश्चित रूप दिया. अमीर खुसरो इस भाषा का प्रथम कवि माना जाता है.
> सल्तनतकाल में क्षेत्रीय भाषाओं का विकास / साहित्य
सल्तनतकाल में क्षेत्रीय भाषाओं का विकास अत्यधिक हुआ तथा उनमें अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे गये. इसका विवरण निम्नलिखित है
(1) मराठी साहित्य – मराठी साहित्य का विकास 13वीं सदी में ज्ञानेश्वर (मराठी के प्रसिद्ध विद्वान् एवं संत) से माना जाता है. इनकी पुस्तक 'ज्ञानेश्वरी' मराठी भाषा की प्रसिद्ध पुस्तक है. यह मूल रूप से 'गीता' पर टीका है. इसी काल में एकनाथ नामक एक अन्य मराठी सन्त हुए, इन्होंने भागवत का मराठी में अनुवाद किया. इनके अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थ 'रुक्मणी स्वयंवर' और 'भावार्थ रामायण' है. मराठी में दशोपन्त ने 'गीतार्णव', 'पदार्णव' लिखा. तुकाराम ने मराठी में अनेक अभंगों की रचना की.
(2) गुजराती साहित्य - मारवाड़ी, ब्रज और अन्य भाषाओं के मिश्रण से गुजराती भाषा की उत्पत्ति सल्तनतकाल में हुई. इस भाषा के विद्वानों में सर्वप्रथम जयानन्द सूरि, गुणरत्न सूरि का नाम विशेष उल्लेखनीय है जिन्होंने 'क्षेम प्रकाश' व 'भरत बाहुबली रास' की रचना की. इस काल में अन्य ग्रन्थों में 'हंसरास, बछरास और शीलरास' की रचना विजय सूरि द्वारा की गई. 'शान्त रस' की रचना 1399 ई. में श्रीमुनि सुन्दर सूरि ने की.
नरसिंह मेहता गुजरात में अपनी कृष्ण भक्ति के कारण अत्यन्त प्रसिद्ध हो गये. उन्होंने हरिमाल, सुदामा चरित, चातुरी शोषण, सामदास नौविवाह आदि ग्रन्थों की रचना की. भालन नामक कवि बाणभट्ट की कादम्बरी का गुजराती भाषा में अनुवाद किया. 16वीं शदी तक गुजराती में गद्य का विकास होने लगा तथा पंचतन्त्र, योगवशिष्ठ और गीता का अनुवाद गुजराती भाषा में किया गया.
(3) बंगला साहित्य – सल्तनतकाल में बंगला साहित्य के विकास का श्रीगणेश विद्यापति और चण्डीदास ने किया. इन लोगों ने कृष्ण को समर्पित अनेक गीतों की रचना की जिसमें शृंगार व भक्तिभाव स्पष्टतया झलकते हैं. इस काल के बंगाल के मुस्लिम शासकों ने भी बंगला को प्रोत्साहित किया. इस समय में नुसरतशाह ने रामायण एवं महाभारत का अनुवाद बंगला भाषा में करवाया. कृतवासी द्वारा रामायण का अनुवाद किया गया. सुल्तान हुसैनशाह ने गीता का अनुवाद बंगाली भाषा में मालाधर बसु द्वारा करवाया.
मध्यकाल में भक्ति आन्दोलन के प्रमुख सन्त चैतन्य महाप्रभु ने अपने गीतों और भजनों के माध्यम से बंगाली भाषा को सुदृढ़ किया. इसके बाद शिव- दुर्गा सम्बन्धी साहित्य ने भी बंगला को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
(4) दक्षिणी भाषाएँ – 13वीं शदी में शैव-सम्प्रदाय के सन्तों ने स्थानीय भाषा में शिव स्तुति में अनेक गीतों की रचना की. इसी समय के विजयनगर के हिन्दू साम्राज्य के शासकों द्वारा तेलुगू भाषा के अनेक कवियों को संरक्षण प्रदान किया गया.
कृष्णदेव राय विजयनगर राज्य का एक विद्वान् और विद्वानों का संरक्षक शासक हुआ. इसने स्वयं ने राजनीति सिद्धान्त पर 'अमुक्त माल्यद' नामक महान् ग्रन्थ की रचना की. उसके दरबार में तेलुगू के महाकवि 'अलसानी बेदन्ना' थे, जिन्होंने ‘मनुचरित' की रचना की. उसी के दरबार के एक अन्य लेखक तिम्मण थे जिन्होंने 'पारिजात अपहरण' नामक ग्रन्थ लिखा.
इस काल में कन्नड़ भाषा में दिगम्बर जैन सम्प्रदाय के लेखकों ने धार्मिक और ऐहिक साहित्य की रचना की.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सल्तनतकाल में सुल्तानों के संरक्षण प्रायः न देने के बावजूद भी स्थानीय शासकों के संरक्षण में क्षेत्रीय भाषा साहित्य की खूब उन्नति हुई.
> सल्तनतकाल में चित्रकला : टिप्पणी
सल्तनतकाल धर्म पर आधारित राज्य का काल था, जिसमें प्रशासन का संचालन क़ुरान के नियमों के आधार पर होता था. कुरान में प्राणी के चित्र बनाने की मनाही होने के कारण इस काल में चित्रकला का पर्याप्त विकास नहीं हो सका, फिर भी हमें इस काल में चित्रकला के अनेक उदाहरण मिलते हैं.
सल्तनतकाल में मुख्य रूप से भित्ति चित्र एवं पाण्डुलिपियों की चित्रकारी के अनेक साक्ष्य हैं. ताजुद्दीन रजा और इसामी के लेखों से ज्ञात होता है कि इल्तुतमिश के समय चित्रकला प्रचलित थी. उसके समय में उसने बंगाल विजय के उपलक्ष्य में एक चाँदी का सिक्का जारी किया तथा उस सिक्के पर उसका घोड़े पर सवार शानदार चित्र अंकित है. सल्तनतकाल में महल में निजी कक्षों को, दीवारों को सुन्दर भित्ति चित्रों से सजाया जाता था. कपड़े पर भी कसीदे की सहायता से चित्र बनते थे. सल्तनतकालीन भित्ति चित्रों के कुछ प्रमाण चम्पानेर एवं सरहिन्द के स्मारकों तथा मखदूमवली मस्जिद में मिलते हैं. इन भवनों की दीवारों को सुन्दर बेल-बूटों से अलंकृत किया गया है.
सल्तनतकाल में भित्ति चित्रों की अपेक्षा पाण्डुलिपियाँ अधिक तैयार की गईं. इस काल में अनेक लघु चित्र भी बने. यह कला माण्डू, जौनपुर और बंगाल में अधिक प्रचलित थी. गुजरात के धनी व्यापारियों ने भी इस कला के विकास में योगदान दिया. ताड़ के पत्रों एवं कागज पर सुन्दर चित्र बनाये गये. पुस्तकों के किनारों को सुन्दर तरीके से सजाया गया. इस कॉल में खम्सा, शाहनामा, मिफताह-उल पुजाला और लौर-चन्दा, भागवत पुराण, गीत गोविन्द आदि को चित्रित किया गया. इनकी विषय-वस्तु लोकप्रिय कथानकों पर आधारित थीं.
इस प्रकार स्पष्ट है कि सल्तनतकाल में हालांकि राजकीय संरक्षण नहीं मिला, इसके बावजूद भी इस काल में चित्रकला का विकास पाण्डुलिपि व भित्ति चित्र के रूप में हुआ.
> सल्तनतकालीन संगीत
सल्तनतकाल में संगीत का विकास बहुत अधिक हुआ तथा इस समय के संगीत में कुछ नवीन तत्वों का सम्मिश्रण हुआ. ईरानी संगीत की विशेषताओं को इसमें ग्रहण किया, कुछ नये रागों और नई पद्धतियों का आविष्कार हुआ.
इस काल के प्रथम महान् संगीतकार अमीर खुसरो हुए, जिन्होंने अनेक नये रागों को जन्म दिया कब्बाली का प्रारम्भ भी इनके द्वारा ही किया गया. उन्होंने सितार और तबले का आविष्कार किया. इन सबसे भारतीय संगीत को एक नई दिशा मिली. ख्याल और तराने का आविष्कार इसी काल में किया गया.
सुल्तान मुहम्मद तुगलक को संगीत का बहुत अधिक शौक था तथा उसके यहाँ लगभग 1200 संगीतज्ञ नियुक्त थे. सुल्तानों की तरह ही स्थानीय सामन्तों एवं राजाओं ने भी संगीत को अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया.
मेवाड़ के महाराजा कुम्भा स्वयं संगीत के एक बड़े जानकार व्यक्ति थे, उन्होंने 'संगीतराज' और 'संगीत मीमांसा' जैसे ग्रन्थ लिखे. इसी प्रकार ग्वालियर के राजा मानसिंह ने संगीतकारों का एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया जिसमें रागों का विधिवत् वर्गीकरण किया गया. विजय नगर के कृष्ण देवराय और रामराय दोनों ही कुशल गायक थे, वे अपने दरबार में बड़े-बड़े संगीतकारों को अपने दरबार में संरक्षण देते थे. सिकन्दर लोदी भी संगीत का बहुत बड़ा प्रेमी था. उसके दरबारी उमर याहिया द्वारा संगीत पर ग्रन्थ 'लहजत-ए-सिकन्दरशाही' लिखा गया. 15वीं शदी में पण्डित दामोदर मिश्र ने संगीत का महान् ग्रन्थ ‘संगीत दर्पण’ की रचना की. इसी समय पण्डित लोचन ने 'रागतरंगिणी' नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमें राग-रागनियों की एक नवीन पद्धति का उल्लेख है.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सल्तनतकाल में संगीत के क्षेत्र में अभूतपूर्व वृद्धि हुई और अनेक रागों और वाद्य यन्त्रों के साथ-साथ अनेक महत्वपूर्ण संगीत ग्रन्थों की रचना हुई.
> सल्तनतकाल की वास्तुकला पर एक लेख लिखिए.
सल्तनतकाल वास्तुकला के विकास की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है. गुलाम वंश से लेकर लोदी वंश की समाप्ति तक इस काल में अनेक भव्य एवं सुन्दर इमारतों का निर्माण करवाया गया. इस काल में मुस्लिम स्थापत्य कला का प्रमुख केन्द्र दिल्ली था, क्योंकि सुल्तानों ने यहाँ अनेक इमारतों का निर्माण करवाया.
कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी प्रसिद्ध मस्जिद कुव्वत-उलइस्लाम का निर्माण दिल्ली में करवाया और इसी के एक अंग के रूप में अजान देने के लिए कुतुबमीनार का निर्माण प्रारम्भ करवाया, जिसे आगे चलकर इल्तुतमिश ने पूरा करवाया.
बलबन के समय में बनी इमारतों में उसका मकबरा एवं उसके पुत्र मुहम्मद का मकबरा विशेष उल्लेखनीय हैं. इसके बाद खिलजी काल में अलाउद्दीन द्वारा बनवाया गया सीरी का किला, अलाइ दरवाजा और हौजखास आदि कुछ महत्त्वपूर्ण इमारतें हैं.
तुगलक काल में फिरोज तुगलक स्थापत्य का अत्यन्त प्रेमी था. उसने अनेक नगरों, महलों एवं किलों का निर्माण करवाया जिसमें दिल्ली के निकट फिरोजशाह कोटला सर्वाधिक प्रसिद्ध है. इसके अलावा फिरोजाबाद में किलेनुमा महल और इसमें बनी जामा मस्जिद भी उसी के समय में निर्मित हैं.
सैयद और लोदी वंश के स्थापत्य प्रभावशाली नहीं थे. इनके द्वारा साधारण इमारतें ही बनवाई गयीं.
तुर्की सुल्तानों के निर्माण के अतिरिक्त प्रान्तीय राजधानियों में इस काल में अनेक भव्य भवनों का निर्माण हुआ जिसमें बंगाल में पाण्डुआ और गौड़ की इमारतें बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं. सिकन्दरशाह द्वारा बनावाई गई अदीना मस्जिद जो कि पाण्डुआ में स्थित है, एक प्रसिद्ध इमारत है. यह मस्जिद 375 स्तम्भों के बरामदे को अपने में समेटे है. इस मस्जिद की लम्बाई इसकी चौड़ाई से दोगुनी है. इसमें विशाल चतुष्कोणीय आँगन है.
जलालुद्दीन मुहम्मदशाह (1414-1421 ई.) द्वारा निर्मित ‘लाखी मकबरा' पाण्डुआ का एक अन्य आकर्षक स्मारक है. गौड़ में पक्की ईंटों और मिट्टी से निर्मित अनेक भव्य इमारतें हैं जिनमें तान्तीपाड़ा मस्जिद और दाखिल दरवाजे का नाम विशेष उल्लेखनीय है.
बंगाल की तरह ही सल्तनतकाल में गुजरात में भी अनेक भव्य इमारतों का निर्माण किया गया. अहमदशाह ने अहमदाबाद नगर बसाया तथा उसमें जामा मस्जिद तथा तीन दरवाजा जैसे भव्य स्मारकों का निर्माण करवाया. तीन दरवाजा महल के बाहरी आँगन में प्रविष्ट होने के लिए द्वार था. यह दरवाजा अपनी कलापूर्ण सजावट और सुन्दर काम के लिए दर्शनीय था.
गुजरात में मुहम्मदशाह द्वितीय (1442-57 ई.) के बनवाये गये स्मारकों में गुजरात की सबसे बड़ी इमारत अहमदशाह का मकबरा है जो सरखेज में स्थित है. उसने नये किलों, महलों और बागों का निर्माण करवाकर अहमदाबाद को और भी अधिक सुन्दर बना दिया. चम्पानेर की जामा मस्जिद और शिप्री रानी की मस्जिद गुजरात की अन्य सुन्दरतम इमारतों के उदाहरण हैं. 
बनारस के निकट जौनपुर में सल्तनतकाल में शर्की राजाओं के बनवाये हुए कुछ सुन्दर स्मारक हैं. यहाँ की 1338 ई. में बनी अटाला मस्जिद सर्वश्रेष्ठ इमारत है और इसकी शिल्पकला पर तुगलक कला का स्पष्ट प्रभाव है. इसके फाटक सिंहद्वार के समान बने हैं.
उत्तर भारत के समान ही सल्तनतकाल में दक्षिण के बहमनी सुल्तानों ने अनेक भव्य भवनों का निर्माण करवाया. 1367 ई. में गुलबर्गा में बनी जामा मस्जिद यहाँ की शैली की भव्यतम इमारत है. इसकी प्रमुख विशेषता बरामदों की चौड़ी और मोटी मेहराबें तथा छोटे मेहराबों से युक्त आँगन हैं.
बीदर में अहमदवलीशाह का मकबरा और महमूद गँवा द्वारा निर्मित एक मदरसा उल्लेखनीय इमारतें हैं.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि दिल्ली सल्तनत के काल में अनेक भव्य भवनों, किलों, मकबरों आदि का निर्माण करवाया गया तथा ये भवन स्मारक उस काल की समृद्धि के सूचक हैं.
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Sun, 08 Oct 2023 08:45:34 +0530 Jaankari Rakho
दिल्ली सल्तनत का स्वरूप एवं प्रशासन https://m.jaankarirakho.com/414 https://m.jaankarirakho.com/414 दिल्ली सल्तनत का स्वरूप एवं प्रशासन

> दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था (Administrative System of Delhi Sultnat)

दिल्ली सल्तनत के स्वरूप की विवेचना कीजिए. क्या दिल्ली सल्तनत एक साम्प्रदायिक राज्य था ?
दिल्ली सल्तनत का स्वरूप वास्तव में क्या था, अत्यन्त विवाद का विषय है. इस पर कुछ विद्वानों ने इसे धर्मनिरपेक्ष तथा कुछ ने इसे धर्म-आधारित राज्य सिद्ध करने का प्रयास किया है.
आधुनिक लेखक डॉ. आई. एच. कुरैशी के अनुसार “ दिल्ली सल्तनत धर्म पर केन्द्रित अवश्य थी, किन्तु यह पूर्णतया धर्म पर आधारित नहीं थी, क्योंकि धर्म आधारित राज्य की प्रथम महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसमें निर्दिष्ट पुरोहित वर्ग का शासन होना चाहिए और दिल्ली सल्तनत में यह विशेषता विद्यमान नहीं थी.”
यदि ग़हराई से देखा जाए तो यह तथ्य खोखला प्रतीत होता है और वास्तविकता की उपेक्षा करता है. गुलाम वंश से लेकर लोदी वंश तक के काल में मुस्लिम कानून ही सर्वोच्च होते थे, व्यवहार विधि भी उसी के अधीन थी और वास्तव में उसी में लीन हो जाती थी.
यद्यपि मुस्लिम उलेमा निर्दिष्ट एवं वंशानुगत नहीं होते थे, किन्तु ये उतने ही धर्मान्ध एवं पक्षपातपूर्ण थे, जितने कि पुरोहित हो सकते थे और वे सदैव कुरान के कानूनों को कार्यान्वित करने एवं मूर्तिपूजा तथा इस्लामद्रोह का मूलोच्छेदन करने पर जोर दिया करते थे.
दिल्ली सल्तनत के शासकों का आचरण भी कुरान के नियमों द्वारा नियन्त्रित होता था. वह अपने निजी जीवन में ही नहीं, बल्कि शासन के सम्बन्ध में भी इन नियमों का में पालन करता था. यदि वह कुरान के नियमों के अनुसार अपना शासन नहीं चलाता तो वह अपनी प्रजा द्वारा अनुमोदित सुल्तान नहीं रहता था इसलिए भारत में दिल्ली सुल्तानों का आदर्श इस्लामी राज्य कहा जा सकता है. देश की समस्त जनता को मुसलमान बनाना, देशी धर्मों का मूलोच्छेदन करना व जनता को मुहम्मद का धर्म स्वीकार करने के लिए बाध्य करके 'दार-उल-हर्ब' को 'दार-उल-इस्लाम' में परिवर्तन करना ही दिल्ली के अधिकांश सुल्तानों का लक्ष्य था. अतः स्पष्ट रूप से दिल्ली सल्तनत को एक साम्प्रदायिक राज्य की संज्ञा दी जा सकती है.
> तुर्की सल्तनत में सुल्तान और खलीफा के सम्बन्ध
इस्लामी प्रभुत्व के सिद्धान्त के अनुसार संसार के सभी मुसलमानों का चाहे वे कहीं भी हो एक शासक होता है और उसे 'खलीफा' कहते हैं. उन दिनों जबकि खलीफा की शक्ति अपनी चरम सीमा पर थी, वह खिलाफत के विभिन्न प्रान्तों के लिए सूबेदारों की नियुक्ति करता था. जब कोई सूबेदार स्वतन्त्र शासक बन जाता जब भी वह अपने आपको स्थायित्व देने के लिए वह खलीफा के नाम का सहारा लेकर अपने को खलीफा का अधीनस्थ सहायक या सामन्त घोषित करता, परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से एक स्वतन्त्र शासक के समान ही व्यवहार करता था.
1558 ई. में मंगोल नेता हलाकू ने अन्तिम अब्बासी खलीफा मुस्तसीम की हत्या कर खिलाफत का अन्त कर दिया, परन्तु फिर भी उसका आडम्बर कायम रहा. उस युग में प्रचलित प्रथा के अनुसार गुलाम वंश से लेकर तुगलक वंश के सभी शासकों ने, (कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी को छोड़कर) अपने को- खलीफा का नाइब माना तथा उसके नाम खुतबा पढ़ा और उसके नाम से सिक्के ढलवाए.
इस प्रकार कहा जा सकता है कि, तुर्क सुल्तानों ने खलीफा के अधीन अपने आपको दर्शाया, लेकिन यह मात्र जनता का विश्वास अपने में बनाए रखने के लिए दिखावा मात्र था.
आधुनिक मुसलमान लेखकों ने इस्लामी जगत की एकता को सिद्ध करने के लिए इसे आवश्यकता से अधिक महत्व दिया है, जबकि तथ्य यह है कि दिल्ली के सुल्तानों ने कभी भी खलीफा को अपना सम्प्रभु स्वीकार नहीं किया.
> दिल्ली सल्तनत : केन्द्रीय प्रशासन (Central Administration)
दिल्ली सल्तनत की प्रशासनिक व्यवस्था भारतीय एवं अरबी-फारसी व्यवस्थाओं का सम्मिश्रण थी जिसमें खलीफा को वैधानिक रूप से सर्वोच्च अधिकार प्राप्त थे और सुल्तान उसके प्रतिनिधि के रूप में शासन करता था, परन्तु व्यावहारिक रूप से सुल्तान और उसकी सल्तनत का खलीफा से कोई लेना-देना नहीं था. सुल्तान केवल औपचारिकतावश खलीफा के प्रति सम्मान प्रदर्शित करता था.
> प्रशासन में सुल्तान की स्थिति
प्रशासन में सुल्तान सर्वोच्च कार्यपालिका, सर्वोच्च सेनाध्यक्ष, सर्वोच्च विधिनिर्माता और सर्वोच्च न्यायाधिकारी होता था. उसकी शक्तियाँ व्यापक थीं और वह निरंकुश था. उसकी शक्ति का आधार उसकी सेना थी जिसके द्वारा उसकी स्वयं की रक्षा और उसकी इच्छाओं का क्रियान्वयन होता था.
यद्यपि सुल्तान सर्वोच्च एवं पूर्णतया निरंकुश था, परन्तु फिर भी उस पर व्यक्तिगत नियमों, प्रभावशाली मन्त्रियों, सेना, उलेमा तथा इस्लाम का नियन्त्रण था. उसका प्रमुख कर्त्तव्य राज्य एवं प्रजा की सुरक्षा करना, प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखना, धर्मानुकूल आचरण करना एवं इन्साफ करना था. वास्तव में सुल्तान केन्द्रीय प्रशासन में धुरी के समान था जिसके द्वारा समस्त प्रशासनिक गतिविधियाँ नियन्त्रित एवं संचालित होती थीं.
> मजलिस-ए-खलवत
सुल्तान की सहायता के लिए यह एक मन्त्रियों की परिषद् थी जिसमें प्रमुख रूप से वजीर, सैन्य विभाग का प्रधान, राजकीय आदेशों को पालन करवाने वाला तथा विदेशी राज्यों से सम्पर्क रखने वाले पदाधिकारी होते थे. ये सभीं सुल्तान को परामर्श देते थे. जिसे मानना या न मानना सुल्तान की इच्छा पर निर्भर करता था.
> केन्द्रीय प्रशासन के मुख्य पदाधिकारी
(1) वजीर – यह सुल्तान का प्रमुख सहयोगी एवं परामर्शदाता था, जिसे ख्वाजा जहाँ की उपाधि मिलती थी. वह वित्तीय विभाग जिसमें दीवान-ए-इसराफ (लेखा परीक्षा) दीवान-ए-विजारत (राजस्व विभाग), दीवान-ए-इमारत (लोक निर्माण विभाग), दीवान-ए-कोही (कृषि विभाग) के मन्त्रियों का प्रभारी था. इसके साथ ही वह सरकार की सम्पूर्ण मशीनरी का भी अध्यक्ष होता था.
वजीर का मुख्य कार्य नागरिक सेवकों की नियुक्ति और उनके कार्यों का निरीक्षण करना था. वह राजस्व एकत्र करने के लिए उत्तरदायी था. वह व्यय के विभिन्न विभागों द्वारा प्रस्तुत हिसाबों की जाँच करता था. वह किसी भी समय सुल्तान से मिल सकता था. संक्षेप में सुल्तान के बाद सल्तनत में. का सर्वोच्च अधिकारी वजीर ही था.
(2) आरिज-ए-मुमालिक - यह सैन्य विभाग का प्रधान अधिकारी था एवं इसका कार्यालय दीवान-ए-आरिज कहलाता था. यह सेना में सैनिकों की भर्ती करने, सैनिकों एवं घोड़ों का निरीक्षण करने, उनका हुलिया रखने का कार्य प्रमुख रूप से यही करता था. सल्तनत चूँकि सैनिक सरकार थी. अतः इसका पद बहुत अधिक महत्वपूर्ण था.
(3) दीवान-ए-रसालत – इसके विषय में विद्वानों ने भिन्नभिन्न विचार प्रस्तुत किए हैं, किन्तु डॉ. ए. एल श्रीवास्तव एवं हबीबउल्लाह ने इसे विदेश मन्त्रालय माना है, जिसमें कूटनीतिक पत्र-व्यवहार और विदेशों से आने वाले और भेजे जाने वाले राजदूतों से सम्बन्धित कार्य होता था.
(4) दबीर - ए - मुमालिक – इसके विभाग को 'दीवान-एइंशा' कहा जाता था. यह विभाग स्थानीय शासन की देखभाल के अतिरिक्त शाही पत्र व्यवहार का प्रबन्ध करता था. शाही घोषणाओं और पत्रों के मसविदे तैयार करना, सुल्तान के फरमानों को जारी करना तथा सुल्तान के कार्यों का विवरण लिखना इसका प्रमुख कार्य होता था. इसका कार्य गुप्त प्रकृति के होने के कारण इस विभाग का पदाधिकारी सुल्तान का अत्यधिक विश्वासपात्र होता था.
(5) सद्र- उस - सुदूर – यह धर्म विभाग एवं दान - विभाग का अध्यक्ष होता था. मस्जिदों, मजारों, मकबरों, खानकाहों, मदरसों, मकतबों आदि के निर्माण एवं उनकी रक्षा के लिए यही उत्तरदायी होता था.
(6) काजी-उल-कुजात — यह न्याय विभाग का अध्यक्ष उसे होता था और प्रायः जो व्यक्ति सद्र-उस-सुदूर होता था, ही यह विभाग भी सौंप दिया जाता था. यह साम्राज्य की समस्त न्यायिक व्यवस्था पर नियन्त्रण रखता था तथा न्यायिक मामलों को निबटाने में सुल्तान की सहायता करता था.
(7) अन्य विभाग एवं पदाधिकारी – इन प्रमुख विभागों के अतिरिक्त सुल्तान के अधीन अन्य पदाधिकारी भी थे उसके विभिन्न कार्यों के लिए उत्तरदायी थे. इनमें 'वकील-एदर' शाही महल की देखभाल के अतिरिक्त सुल्तान की व्यक्तिगत सेवा की देखभाल किया करता था. 'अमीर-एहाजिब' (बारबक) राजदरबार में अनुशासन बनाए रखता था. 'सरजांदार', सुल्तान के व्यक्तिगत अंगरक्षकों का मुखिया था. अमीर-ए-अखुर शाही अश्वशाला का प्रधान एवं शाहना-एपील-हस्तिशाला का प्रधान होते थे.
इन सबके अतिरिक्त सुल्तान बड़ी संख्या में गुलामों को भी रखता था, जो उसकी व्यक्तिगत सेवा करते थे.
सल्तनतकालीन शासन व्यवस्था की मुख्य विशेषता यह रही कि, इसने थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ प्राचीन व्यवस्था को ही लागू किया. इसी कारण समूचे भारत में आसानी से तुर्की शासन व्यवस्था लागू हो गई हालांकि उसमें विघटन के अनेक गुण मौजूद थे.
> सल्तनतकालीन प्रान्तीय व स्थानीय प्रशासन
प्रशासन की सुविधा के लिए दिल्ली सल्तनत को अनेक विभागों में बाँटा गया था. इन प्रान्तों का शासन संचालन सुल्तान द्वारा नियुक्त सूबेदार या गर्वनर किया करते थे, लेकिन प्रान्तों के विभाजन में एकरूपता का अभाव था. डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव ने लिखा है कि, " सल्तनत कभी भी एक से प्रान्तों में विभक्त नहीं थी और नहीं उन सबकी शासन व्यवस्था एकसमान थी. "
दिल्ली सल्तनत में प्रान्तों अथवा सूबों की संख्या 20 से 25 तक होती थी. 13वीं सदी में दिल्ली सल्तनत को अनेक सैनिकक्षेत्रों में विभाजित किया गया था, जिसे उस समय ‘इक्ता' कहा जाता था. इक्ता का प्रधान अधिकारी 'मुक्ता' या 'वली' कहलाता था, लेकिन जब बाद में सल्तनत का विस्तार हुआ तब प्रान्त बनाए गए. सूबेदारों तथा इक्तादारों या मुक्ताओं की नियुक्ति उनकी योग्यता के आधार पर सुल्तान द्वारा की जाती थी.
इनका प्रमुख कार्य अपने प्रान्तों में शासन व्यवस्था के साथ शान्ति बनाए रखना, विद्रोहों का दमन करना, करों की वसूली करना तथा न्यायिक प्रशासन करना था. केन्द्र में सुल्तान की सहायता के लिए इन्हें सदैव सैनिक सेवा के लिए तैयार रहना पड़ता था.
सूबेदार या मुक्ता अपने कार्यों में सहायता के लिए अनेक अधिकारियों की नियुक्ति करता था, जिसने मुख्य रूप से ‘नाजिर’ एवं ‘वकूफ' प्रमुख थे. ये राजस्व वसूल करते थे. इनके अतिरिक्त प्रान्तीय शासन में साहिब-ए-दीवान का एक महत्वपूर्ण पद होता था जिसकी नियुक्ति केन्द्रीय वजीर की सिफारिश पर सुल्तान करता था. यह राज्य की आय का ब्यौरा रखता था तथा उसके सम्बन्ध में सुल्तान के पास विस्तृत ब्यौरा भेजा करता था. डॉ. आई. एच. कुरैशी के अनुसार, वह सुल्तान के प्रति उत्तरदायी था. प्रान्तों में केन्द्रीय प्रशासन की तरह ही काजी एवं कुछ अन्य पदाधिकारी होते थे.
> स्थानीय प्रशासन
14वीं सदी में दिल्ली सल्तनत का विस्तार अधिक हो जाने के कारण इक्ते से छोटी प्रशासनिक इकाई 'शिक' (जिला) का निर्माण किया गया जिसका अध्यक्ष 'शिकदार' कहलाता था. यह एक सैनिक पदाधिकारी था जिसका कार्य अपने अधिकार क्षेत्र में शांन्ति व्यवस्था को बनाए रखना था.
कुछ समय बाद शिक से भी छोटी इकाई 'परगना' का गठन किया गया जो कई गाँवों को मिलाकर बनाया जाता इब्नबतूता सौ गाँवों के मण्डल को 'सादी' कहता है. प्रत्येक परगने में एक चौधरी एवं एक राजस्व वसूल करने वाला अधिकारी होता था.
शासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी जिसकी शासनव्यवस्था देशी थी. इसमें आपसी झगड़ों का निपटारा करने के लिए पंचायतों का गठन किया गया था. गाँव के लोग प्रजा की तरह एकत्र होते, अपने मामलों की देखभाल करते और सुरक्षा, चौकीदारी, प्राथमिक शिक्षा तथा सफाई का प्रबन्ध करते थे. प्रत्येक गाँव में आज की ही तरह एक चौकीदार, एक लगान वसूल करने वाला तथा एक पटवारी होता था.
इस प्रकार उपर्युक्त विघ्नेचन से स्पष्ट है कि, तुर्की सल्तनत के कारण ग्रामीण प्रशासन अपने पूर्व रूप में चलता रहा और उसमें कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया.
> दिल्ली सल्तनत : न्याय व्यवस्था
दिल्ली सल्तनत का स्वरूप यद्यपि सैनिक था, परन्तु न्याय प्रशासन को अत्यधिक महत्व दिया गया था. न्यायव्यवस्था की रूपरेखा इस समय बड़ी सरल थी. धार्मिक मामलों को दीवानी और फौजदारी मामलों से अलग रखा जाता था. दीवानी और फौजदारी के मामलों में सुल्तान अकेला या अपीलीय न्यायधीश के रूप में सुनवाई कर सकता था. वह न्याय विभाग का सर्वोच्च न्यायधीश था तथा प्रायः न्याय करने में मुफ्तियों का सहयोग लिया करता था.
सुल्तान के बाद 'काजी-उल-कुजात' का पद न्यायव्यवस्था में सर्वोच्च था. इसका कार्यालय ही साम्राज्य का प्रमुख न्यायालय होता था, लेकिन 1248 ई. में सद्र-ए-जहाँ के पद के निर्माण के साथ ही काजी-उल-कुजात अपनी उच्च स्थिति को खो बैठा और सद्र-ए-जहाँ न्यायपालिका का अध्यक्ष बन गया.
सद्र-ए-जहाँ काजियों का चयन करता था. इसका मुख्य कार्य धार्मिक मामलों का निरीक्षण था, इसलिए काजी-उलकुजात न्याय का कार्य करता था. काजी-उल-कुजात की सहायता के लिए एक या दो काजी होते थे. यह दीवानी और फौजदारी सभी मामलों का निपटारा करता था और प्रान्तीय काजीयों एवं सूबेदारों के न्यायालयों की अपीलें सुनता था. काजी-उल-कुजात अपने न्यायिक कार्यों के अतिरिक्त सुल्तान के 'राज्यारोहण के समय उसे शपथ दिलाता था तथा साम्राज्य के नियमों तथा उपनियमों के निर्माण में उसकी सहायता करता था.
मुकदमों की सुनवाई और विचार-विमर्श में मुफ्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण थी. वे कानून की जो व्याख्या करते थे उसे न्यायधीश को स्वीकार करना पड़ता था तथा मतभेद होने की स्थिति में मामला सुल्तान को सौंपा जाता था.
न्याय-प्रशासन से जुड़ा ‘मुहतसिब' का कार्यालय होता था, जो एक तरह से पुलिस के मुखिया के समान था. यह लोगों के सार्वजनिक रूप से नैतिक आचरण को देखता था.
प्रान्तों की न्याय व्यवस्था में 4 प्रकार के न्यायालय थे - 
(1) सूबेदार या गर्वनर का न्यायालय, 
(2) काजी - ए- सूबा का न्यायालय, 
(3) दीवान-ए-सूबा का न्यायालय एवं 
(4) सद्र-ए-सूबा का न्यायालय.
प्रान्त में सूबेदार का न्याय व्यवस्था में सर्वोच्च स्थान था, क्योंकि वह सूबे में सुल्तान का प्रतिनिधि होता था. वह अपने प्रारम्भिक मुकदमों में अकेले बैठता था, लेकिन अपीलीय मुकदमों में काजी-ए-सूबा की मदद लेता था.
गर्वनर के बाद प्रान्त में 'काजी - ए-सूबा' का न्यायालय द्वितीय स्थान पर था जो न्याय करने का अधिकांश भार वहन करता था. इसकी नियुक्ति सुल्तान द्वारा ‘काजी-उल-कुजात' की सिफारिश पर की जाती थी. यह दीवानी और फौजदारी दोनों प्रकार के मुकदमे सुनता था.
भू-राजस्व सम्बन्धी मामलों में न्याय व्यवस्था का प्रधान अधिकारी 'दीवान-ए-सूबा' था, जिसके निर्णयों के विरुद्ध सूबेदार या सुल्तान के पास अपील की जा सकती थी. स्थानीय स्तर पर काजी, फौजदार, आमिल, कोतवाल आदि न्याय का कार्य करते थे.
> दिल्ली सल्तनत : सैन्य व्यवस्था
दिल्ली सल्तनत सैनिक शक्ति पर आधारित थी अतः बलबन और अलाउद्दीन खिलजी जैसे योग्य सुल्तानों ने सल्तनत को मजबूती प्रदान करने के लिए एक कुशल सैन्य संगठन की स्थापना की.
सल्तनत युग में अधिकांशतः सेना के चार भाग होते थे; यथा-
1. नियमबद्ध सैनिक जो स्थायी रूप से सुल्तान की सेना के लिए भर्ती किए जाते थे.
2. वे सैनिक जो प्रान्तीय सूबेदारों और अमीरों की सेवा के लिए स्थानीय रूप से भर्ती किए जाते थे.
3. वे सैनिक जो केवल युद्ध के समय ही भर्ती होते थे.
4. मुसलमान स्वयंसेवक जो जिहाद अथवा धर्म युद्ध करने के लिए सेना में भर्ती होते थे.
राजधानी में स्थित सुल्तान की सेना 'हश्म-ए-कल्ब' कहलाती थी, इसमें दो प्रकार के सैनिक होते थे— (1) स्वयं सुल्तान व (2) दिल्ली में रहने वाले दरबारियों, मन्त्रियों एवं अन्य पदाधिकारियों के ये सैनिक सदैव राजधानी में रहते थे, परन्तु इन्हें स्थायी सेना नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि इनकी संख्या बहुत कम थी.
दिल्ली सल्तनत के इतिहास में अलाउद्दीन खिलजी ही ऐसा प्रथम सुल्तान था जिसने एक विशाल स्थायी सेना का गठन किया था जिसकी भर्ती सीधे केन्द्रीय सरकार करती थी.
फिरोज तुगलक ने सेना के संगठन को सामन्ती रूप दिया तथा लोदियों की सेना कबीले के रूप में विभाजित थी. उसमें लोदी, करमाली, लोहानी, सूर आदि कबीलों के लोग थे.
युद्ध के समय प्रान्तों के सूबेदारों एवं अमीरों की सेनाएँ दीवान-ए-आरिज के अधीन होती थीं. प्रान्तीय सेना के वेतन, अनुशासन व उसके संगठन का भार सूबेदार के ऊपर ही उसमें तुर्क, होता था. सल्तनत सेना का रूप राष्ट्रीय नहीं था. अफगान, ताजिम, ईरानी, मंगोल, हिन्दू आदि सभी वर्गों के लोग थे, जो धन के लोभ में लड़ते थे. उनमें एकता बनाए रखने का एकमात्र सूत्र सुल्तान का व्यक्तित्व ही था.
सेना के मुख्य रूप से 3 प्रमुख अंग थे; यथा— 
(1) पैदल, जिसमें अधिकांश धनुर्धर थे 
(2) घुड़सवार तथा 
(3) हाथी.
सबसे अधिक महत्व घुड़सवार सेना का था. प्रत्येक सवार के पास दो तलवारें एक भाला और धुनषबाण होता था. सैनिक कवच पहनते थे और घोड़ों को भी फौलादी बखतर पहनाये जाते थे. अश्वारोही मूलरूप से 3 भागों में बाँटे जाते थे.
(1) मुरतव – दो घोड़ों वाला सैनिक.
(2) सवार – एक घोड़े वाला सैनिक.
(3) दो अस्पा – जिसके पास एक घोड़ा फालतू होता था. सुल्तान हाथियों पर बहुत अधिक विश्वास करते थे तथा हाथी रखना सुल्तान का विशेषाधिकार माना जाता था.
सेना में तोपखाना भी होता था, लेकिन यह आधुनिक ढंग से संगठित नहीं था केवल बारूद की सहायता से गोले फैंकने की व्यवस्था थी. युद्ध के समय सेना के साथ एक विशिष्ट विभाग होता था जो राजधानी में सूचनाएँ भेजता था.
सैन्य विभाग का प्रधान 'आरिज-ए-मुमालिक' कहलाता था तथा प्रान्तों में भी इसी के समान 'आरिज' होते थे. इनका कार्य सेना का संगठन, संचालन, अनुशासन, नियन्त्रण आदि करना होता था.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, सल्तनत काल में सैन्य संगठन पर पर्याप्त ध्यान दिया गया था, परन्तु उसमें अनेक अवगुण भी थे जो आगे चलकर दिल्ली सल्तनत के विघटन के कारण बने.
> राजस्व व्यवस्था : दिल्ली सल्तनत
दिल्ली सल्तनत में राज्य के विस्तार के साथ ही आमदनी बढ़ाने के उपाय किए गए. इस काल में राज्य की आय के दो मुख्य स्रोत थे - 
(1) धार्मिक कर, व (2) सामान्य कर.
(1) धार्मिक कर – धार्मिक करों में प्रमुख कर 'जकात' एवं ‘जजिया’ थे. ‘जकात’ केवल धनी मुसलमानों से लिया जाता था जो उनकी आय का 2½ % होता था. इससे प्राप्त होने वाली आमदनी से गरीब मुसलमानों के कल्याण के लिए कार्य किए जाते थे. 'जजिया' गैर-मुसलमानों से लिया जाने वाला कर था. सामान्यतः ब्राह्मणों, साधु-संन्यासियों, अपाहिजों, बच्चों और स्त्रियों से यह कर नहीं लिया जाता था, परन्तु फिरोज तुगलक ने ब्राह्मणों को भी यह कर देने के लिए बाध्य कर दिया.
(2) सामान्य कर — इस प्रकार के करों में सबसे प्रमुख कर ‘भूमि कर’ था. राज्य के पदाधिकारियों की जमीन, दान में दी गई जमीन, खालसा भूमि तथा अधीनस्थ हिन्दू राजाओं की भूमि, ये कुल चार प्रकार की राज्य की भूमि होती थी.
गैर-मुसलमानों के पास जो भूमि होती थी उनसे 'खराज' नामक कर वसूला जाता था. यह उपज का 1/2 भाग या 1/3 भाग होता है. मुसलमान भूमि कर के रूप में 'उश्र' देते थे. यह उपजे का 1/5 या 1 / 10 भाग होता था. सामान्यतः दान में दी गई भूमि पर कर नहीं लगाया जाता था, परन्तु अलाउद्दीन ने सभी प्रकार के दान में दी गई भूमि को खालसा ( राजकीय भूमि) में परिवर्तित कर दिया. लगान नकद या अनाज के रूप में वसूला जाता था. सल्तनत काल में लगान की राशि तय करने के लिए मुख्य रूप से दो प्रथाएँ थीं. यथा—(1) बटाई, व (2) मसाअत.
बटाई में राज्य किसानों से फसल का बँटवारा कर लेता था. बटाई के अनेक प्रकार थे; जैसे-
(1) खेत बटाई – खड़ी फसल का बँटवारा.
(2) लंक बटाई – खलिहान में लाए गए अनाज का बँटवारा.
(3) रास बटाई — खलिहान में तैयार अनाज का बँटवारा ‘मसाअत’ के अनुसार, जमीन की पैमाइश के आधार पर उपज का अन्दाज लगाकर लगान की राशि तय की जाती थी. गयासुद्दीन तुगलक ने किसानों से सीधा लगान वसूलने के स्थान पर ‘अक्ता' तथा 'विलायत' के आधार पर लगान की राशि तय की.
राज्य की आय का एक अन्य साधन 'खुम्स' था, जोकि युद्ध में लूट का माल था. राज्य लूट के माल में से केवल 1 / 5 भाग ही लेता था तथा शेष 4/5 भाग सैनिकों को बाँट दिया जाता था.
राज्य को अन्य साधनों; जैसे – लावारिंस सम्पत्ति, नजराना और भेंट तथा आर्थिक जुर्मानों से भी राज्य की अच्छी आमदनी होती थी.
राजस्व विभाग का प्रधान 'दीवान-ए-वजारत' होता था खूत, तथा लगान वसूली का कार्य आमिल, पटवारी, चौधरी, मुकद्दम, कानूनगो आदि के जिम्में था. सरकार उपज को बढ़ाने एवं उपज के अनुसार कर लगाने के लिए प्रयास करती थी. दिल्ली के अनेक सुल्तानों ने कृषि व्यवस्था में सुधार लाने के लिए प्रयास किए जमीन की नाप कराई गई, सिंचाई की व्यवस्था की गई और किसानों की सहायता की गई. फलतः राज्य को पर्याप्त मात्रा में भू-राजस्व प्राप्त होता था, किन्तु इसका बड़ा भाग राजस्व अधिकारी ले लेते थे. भूमिकर के अतिरिक्त राज्य अन्य विभिन्न प्रकार के कर लगाता था; जैसे – सिंचाई कर, गृहकर, चरागाह कर, व्यापार एवं उद्योग कर आदि.
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Sun, 08 Oct 2023 08:42:05 +0530 Jaankari Rakho
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> दक्षिण भारत के राज्य
उत्तरी भारत के समान ही दक्षिण भारत में भी इस समय स्थिति सन्तोषजनक नहीं थी. इस समय दक्षिण भारत में दो प्रमुख राज्य थे—–(i) विजयनगर व (ii) बहमनी राज्य. इन दोनों के शासक एक-दूसरे के घोर शत्रु थे तथा आपसी युद्धों में वे अपनी शक्ति व्यय कर रहे थे.
विजयनगर राज्य हिन्दू राज्य था और सुदूर दक्षिण में स्थित था. बाबर के आक्रमण के समय यहाँ का शासक कृष्णदेव राय था. बाबर के अनुसार, यह दक्षिण भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था.
बहमनी राज्य अपना प्रारम्भिक वैभव खोकर 5 विभिन्न स्वतन्त्र राज्यों में विभक्त हो गया था तथा इन राज्यों के शासक आपस में सदैव संघर्षरत रहा करते थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि, 1526 ई. के लगभग भारत की राजनीतिक स्थिति बहुत ही सोचनीय थी. ऐसी स्थिति में एक दृढ़ निश्चयी और बलशाली व्यक्ति के लिए भारत को विजित करना कोई कठिन कार्य नहीं था.
> विजयनगर साम्राज्य
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल के दौरान हुई. उसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक मत प्रचलित हैं और वर्तमान में भी विवाद बना हुआ है, परन्तु डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव के अनुसार, संगम के पाँच पुत्रों में से दो हरिहर और बुक्का ने 1336 ई. में इस साम्राज्य की स्थापना की थी, जो प्रारम्भ में होयसल शासक वीर बल्लाल तृतीय के सामन्त के रूप में कार्यरत् थे और उन्होंने दिल्ली सल्तनत के दक्षिण में विस्तार का विरोध किया था.
वीर बल्लाल तृतीय ने तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर अनुगुन्दी नगर की स्थापना की थी, जो आगे चलकर विजय नगर बना और नवस्थापित साम्राज्य का केन्द्र बिन्दु भी.
1346 ई. में बल्लाल के उत्तराधिकारी विरुपाक्ष की मृत्यु हो जाने पर होयसल राज्य की सत्ता हरिहर एवं बुक्का के हाथों में केन्द्रित हो गई और इन्होंने अनुगुन्दी नगर (विजयनगर) को अपनी राजधानी बनाया. हरिहर व बुक्का को साम्राज्य की स्थापना के लिए प्रसिद्ध सन्त एवं विद्वान् माधव विद्यारण्य ने तथा उनके अनुज व वेदों के प्रसिद्ध टीकाकार सायणाचार्य द्वारा प्रेरणा दी गई थी. इस विजयनगर राज्य पर संगम, सलुव, तुलुव एवं आरविंदु नामक चार या जिसमें तुलुव वंश में इस साम्राज्य राजवंशों ने शासन किया का सर्वाधिक का सर्वाधिक प्रतापी राजा कृष्णदेव राय हुआ था.
> संगम वंश का इतिहास (1336 से 1485 ई.)  
संगम वंश में निम्नलिखित महत्वपूर्ण शासक हुए - 
(1) हरिहर प्रथम – यह विजयनगर राज्य का संस्थापक व संगम का पुत्र था. इसने 1336 ई. से 1356 ई. तक शासन किया.
(2) बुक्का (1356-1377 ई.) – हरिहर प्रथम के उत्तराधिकारी के रूप में उसका भाई विजयनगर सिंहासन पर बैठा. इसने 'वेद मार्ग प्रतिष्ठापक' की उपाधि ग्रहण की.
(3) हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई.) – इसने महाराज की उपाधि ग्रहण की तथा कनारा, मैसूर, त्रिचनापल्ली, काँञ्ची आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की.
(4) देवराय प्रथम (1406-1422 ई.) – इसने तुंगभद्रा नदी पर बाँध बनाकर सिंचाई के लिए नहरें निकालीं एवं बहमनी सुल्तान फिरोजशाह के आक्रमण और आन्तरिक विद्रोहों का भी सामना करना पड़ा.
> संगम वंश के शासक देवराय द्वितीय पर टिप्पणी लिखो ?
वीर विजय का पुत्र देवराय द्वितीय (1426-1446 ई.) संगम वंश का सबसे महान् शासक माना जाता है. इसकी उपाधि 'इमाडीदेव राय' थी. इसने आन्ध्र प्रदेश कोंडविदु का दमन कर कृष्णा नदी तक विजयनगर की उत्तरी एवं पूर्वी सीमा को बढ़ाया. इसने उड़ीसा के ‘गजपति' को भी पराजित कर दिया. इसके शासनकाल की उल्लेखनीय घटना है कि, इसने अपनी सेना में कुछ तुर्क धनुर्धारियों की नियुक्ति की.
देवराय स्वयं विद्वान था तथा विद्वानों का बड़ा र था. इसके दरबार में तेलुगू कवि श्रीनाथ कुछ समय तक रहा. फारसी राजदूत अब्दुल रज्जाक ने देवराय द्वितीय के समय में ही विजयनगर की यात्रा की थी. फरिश्ता ने लिखा है कि, देवराय ने लगभग 2 हजार मुसलमानों को अपनी सेना में भर्ती किया तथा उन्हें जागीरें दीं. उसने मुसलमानों को मस्जिद निर्माण की स्वतन्त्रता दे रखी थी. एक अभिलेख में देवराय द्वितीय को 'गजबेटकर' ( हाथियों का शिकारी) कहा गया है. 1446 ई. में इनकी मृत्यु हो गई. इसने संस्कृत में एक नाटक 'महानाटक सुधानिधि' एवं 'ब्रह्मसूत्र' पर एक भाष्य भी लिखा था.
देवराय द्वितीय के बाद मल्लिकार्जुन (1446-1466 ई.) जिसे प्रौढ़ देवराय भी कहा जाता है व विरुपाक्ष द्वितीय (1466-1485 ई.) शासक बने, ये दोनों कमजोर शासक थे. अतः इनकी कमजोरी का फायदा उठाकर नरेश नायक ने सालुव नरसिंह को शासक बना दिया.
> सालुव वंश (1485–1506 ई.)
इस वंश के संस्थापक सालुव नरसिंह ने (1485-1491 ई.) तक शासन किया और इसके बाद इसका पुत्र इम्मादि नरसिंह शासक बना. इस समय यह अल्पायु था. अतः नरेशं नायक ने इसे वेनुगोंडा के दुर्ग में कैद कर दिया तथा स्वयं शासक बन गया. 1505 ई. में नरेश नायक के पुत्र वीर नरसिंह ने इम्माडि नरसिंह की हत्या कर दी और स्वयं शासक बन गया और उसने ‘तुलुव वंश' की नींव डाली.
> कृष्णदेव राय की उपलब्धियाँ
सम्पूर्ण विजयनगर साम्राज्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक कृष्णदेव राय (1509-1529) था. इसके शासनकाल में विजयनगर का ऐश्वर्य एवं शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई थी.
राजा कृष्णदेव राय ने अपने सैनिक अभियान में 1509-10 ई. में बीदर के सुल्तान महमूदशाह को अदोनी के समीप पराजित किया. 1510 ई. में उसने उम्मातूर के विद्रोही सामन्त को परास्त कर दिया. 1512 ई. में कृष्णदेव राय ने बीजापुर के सुल्तान युसुफ आदिलशाह को हराकर रायचूर के दोआब पर अधिकार कर लिया. इसके बाद उसने गुलवर्गा के किले पर अधिकार कर लिया. कृष्णदेव राय ने बीदर पर पुनः आक्रमण कर वहाँ के सुल्तान महमूदशाह को बरीद के कब्जे से छुड़ाकर पुनः सिंहासन पर बैठाया और साथ ही उसने 'यवन राज स्थापना चार्य' की उपाधि ग्रहण की.
1513 से 1518 ई. तक कृष्णदेव राय ने चार बार उड़ीसा पर आक्रमण किया तथा वहाँ के गजपति शासक प्रताप रुद्रदेव को प्रत्येक बार पराजित किया और प्रतापरुद्र ने अपनी पुत्री का विवाह कृष्णदेव राय के साथ कर दिया.
कृष्णदेव राय का अन्तिम सैन्य अभियान बीजापुर के विरुद्ध रहा जिसमें कृष्णदेव राय ने सुल्तान इस्माइल आदिलशाह को परास्त कर गुलबर्गा के किले को ध्वस्त कर दिया.
कृष्णदेव राय की इस विजय के साथ ही उसने अपने समस्त शत्रुओं को पराजित कर दिया और अपने श्रेष्ठ पराक्रम का परिचय दिया.
कृष्णदेव राय ने अरब एवं फारस से घोड़ों के व्यापार को नियमित करने के लिए पुर्तगाली अल्बुकर्क से मित्रता की तथा भट्टकल में उसे किला बनाने की अनुमति प्रदान की. उसके समय में डोमिगो पायस (पुर्तगाली यात्री) ने विजयनगर की यात्रा की और उसने उसके राज्य की खूब प्रशंसा की है.
कृष्णदेव राय स्वयं बड़ा विद्वान् व्यक्ति था. उसने तेलुगू में अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ 'अमुक्त माल्यदा' लिखा. उसने अपने दरबार में अनेक कवियों एवं विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया. पेदन्ना उसके दरबार का प्रमुख कवि था. उसने स्वारोचित सम्भव या मनुचरित्र तथा हरिकथा सरनसमू जैसे ग्रन्थों की रचना की. उसके दरबार में एक अन्य प्रमुख विद्वान ‘तेनालीराम' था जिसने 'पाण्डुरंग महात्म' की रचना की.
कृष्णदेव राय का समय तेलुगू साहित्य के क्षेत्र में ‘क्लासिकी युग' कहा गया है. उसने आन्ध्र भोज, अभिनव भोज, आन्ध्र पितामह आदि उपाधियाँ धारण कीं. उसने स्थापत्य के क्षेत्र में 'नागलपुर' नामक नया नगर बसाया तथा 'हजारा' एवं 'विट्टलस्वामी' नामक मन्दिरों का निर्माण करवाया. इस महान् शासक की 1529 ई. में मृत्यु हो गई.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, कृष्णदेव राय अपने समय का एक महान् शासक था. उसकी राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक एवं साहित्यिक आदि सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ रहीं.
> तालीकोटा के युद्ध / राक्षसी - तंगड़ी के युद्ध पर टिप्पणी
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद अच्युतदेव राय (15291542 ई.) शासक बना, लेकिन वह एक दुर्बल शासक था. अतः उसके समय में केन्द्रीय सत्ता कमजोर हो गई. उसके बाद सदाशिव राय (1542-1570 ई.) शासक बना. यह एक महात्वाकांक्षी शासक था, लेकिन इसके साथ ही वह अदूरदर्शी भी था. उसके समय में वास्तविक शासक उसका मन्त्री रामराय था.
रामराय ने दक्षिण के मुसलमान राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप किया, क्योंकि वह समझता था कि इससे विजयनगर साम्राज्य की प्रतिष्ठा और शक्ति की पुनर्स्थापना हो सकेगी. 1543 ई. में रामराय ने बीजापुर के विरुद्ध अहमदनगर एवं गोलकुण्डा से मित्रता कर ली. कुछ वर्षों बाद रामराय ने अहमदनगर के विरुद्ध बीजापुर एवं गोलकुण्डा की तरफ से भाग लिया तथा अहमदनगर को उसने लूट लिया. उसने मस्जिदों को तोड़ा तथा कुरान का अपमान किया. इस्लाम के इस अपमान का स्वार्थी लोगों ने खूब बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार किया जिसके कारण दक्षिण भारत के मुसलमानी राज्यों ने विजयनगर के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बना दिया. 
बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा तथा बीदर की सम्मिलित सेनाओं ने 23 जनवरी, 1565 ई. को तालीकोटा के युद्ध क्षेत्र में विजयनगर की सेना को निर्णायक पराजय दी. निर्णायक स्वयं बड़ी ही वीरतापूर्वक लड़ा, लेकिन वह पकड़ा गया तथा उसका वध अहमदनगर के सुल्तान ने स्वयं कर दिया. विजेताओं को घोड़ों, तम्बुओं, हीरे, जवाहरातों एवं नकदी के रूप में अतुल सम्पत्ति हाथ लगी. इसके बाद विजयी सेनाओं ने विजयनगर में प्रवेश किया तथा वहाँ भयंकर Mewary मारकाट के साथ उन्होंने पूरे शहर को तोड़ दिया.
‘एक विस्मृत साम्राज्य’ नामक एक ग्रन्थ का लेखक सेवेल ने लिखा है कि, “संसार के इतिहास में कभी भी इतने वैभवशाली नगर का इस प्रकार सहसा सर्वनाश नहीं किया जैसाकि विजयनगर का.
डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव के अनुसार, तालीकोटा का युद्ध विजयनगर साम्राज्य के अस्तित्व को पूर्ण रूप से नहीं मिटा सका और इस विजय के बाद सुल्तानों की ईर्ष्या पुनः भड़क उठी और इसी के कारण वे विजयनगर के विरुद्ध मिलकर कार्य नहीं कर सके. इसी कारण विजयनगर कुछ हद तक अपनी खोई हुई शक्ति एवं भूमि को प्राप्त करने में समर्थ हो सका.
> अरविदु वंश
तालीकोटा के युद्ध के बाद रामराय का भाई तिरुमाल ने 'वेनुगौण्डा' को अपनी राजधानी बनाया तथा कुछ हद तक साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने में सफलता प्राप्त की. तिरुमाल एक महात्वाकांक्षी व्यक्ति था और 1570 ई. में उसने विजय नगर के वास्तविक शासक 'सदाशिव' को अपदस्थ कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया. और अरविदु वंश की नींव डाली.
तिरुमाल के बाद उसका पुत्र रंग द्वितीय शासक बना वह एक योग्य शासक था उसने अपने पिता द्वारा प्राप्त राज्य को अक्षुण्ण रखा. रंग के बाद वैंकट द्वितीय शासक बना जिसने चंद्रगिरि को अपने राज्य की राजधानी बनाया. इसी के M शासनकाल में 1612 ई. में मैसूर में 'वाडियार' वंश स्थापना हुई. इस वंश का अन्तिम शासक रंग तृतीय हुआ इसमें इतनी शक्ति नहीं थी कि वह अपने विद्रोही सामन्तों का दमन कर सकता तथा बीजापुर एवं गोलकुण्डा के सुल्तानों के आक्रमणों को रोक पाता. अतः श्रीरंगपट्टम, बेदनूर, मदुरा, तंजीर आदि के सामन्तों ने अपने को स्वतन्त्र कर लिया और विजयनगर साम्राज्य जो तीन सदियों से चला आ रहा था, का अन्त हो गया.
> बहमनी राज्य
बहमनी राज्य के संस्थापक अलाउद्दीन बहमनशाह के कार्यों पर टिप्पणी.
मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में 3 अगस्त, 1346 ई. को हसन नामक व्यक्ति ने, 'अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमनशाह' नाम से सिंहासन पर बैठकर बहमनी साम्राज्य की स्थापना की वह इस्फंदिया के पुत्र ईरानी वीर बहमनशाह का वंशज होने का दावा करता था. इसलिए उसने बहमनशाह की उपाधि धारण की.
हसन एक शक्तिशाली शासक था तथा उसने राज्य के विस्तार के लिए अनेक युद्ध लड़े. निरन्तर युद्धों के कारण उसके राज्य की सीमाएँ उत्तर में बानगंगा से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक, पश्चिम में दौलताबाद से लेकर पूरब में भौंगरी तक फैल गई. उसने अपनी राजधानी गुलबर्गा में स्थापित की तथा शासन संचालन की सुदृढ़ व्यवस्था की. उसने अपने सम्पूर्ण राज्य को चार प्रान्तों (तरफ) में विभाजित किया; यथा— गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार एवं बीदर. इनका शासन चलाने के लिए उसने तरफदारों की नियुक्ति की. ये तरफदार अपनी निजी सेना रखते थे तथा अपने सैनिक एवं असैनिक अधिकारियों की नियुक्ति करते थे. हसन इस्लाम का प्रचारक था तथा उसका अपने सहधर्मियों के प्रति व्यवहार न्यायपूर्ण था. 11 फरवरी, 1358 ई. को उसकी मृत्यु हो गई. इसके बाद उसका पुत्र मुहम्मदशाह शासक बना जिसने बहमनी साम्राज्य में ठोस शासन-व्यवस्था को प्रारम्भ किया.
> मुहम्मदशाह (1358-1375 ई.)
यह बहमनशाह की मृत्यु के बाद शासक बना. इसने विजयनगर एवं वारंगल को जीत लिया. अधिक मद्यपान के कारण इसकी मृत्यु हो गई.
> अलाउद्दीन मुजाहिदशाह (1375-1378 ई.) 
इसने विजयनगर से सन्धि कर गुलबर्गा को वापस कर लिया.
> दाऊद प्रथम (1378 ई.)
> मुहम्मदशाह द्वितीय (1378-1397 ई.) 
यह एक शान्तिप्रिय एवं विद्या का संरक्षक सुल्तान था. 
> ताजुद्दीन फिरोजशाह (1397-1422 ई.) 
यह बहमनी राज्य के संस्थापक हसन का पौत्र था. यह विद्वान् एवं विद्वानों के सत्संग का शौकीन होते हुए भी इन्द्रिय सुख में लिप्त रहता था और संकीर्ण विचारों से युक्त मुसलमान था.
ताजुद्दीन ने विजयनगर साम्राज्य से तीन युद्ध लड़े जिसमें दो युद्धों में इसे विजय प्राप्त हुई, परन्तु तीसरे युद्ध में यह स्वयं बुरी तरह पराजित हो गया तथा युद्ध क्षेत्र से भाग गया. विजयनगर की सेना ने बहमनी राज्य की दक्षिणी एवं पूर्वी सीमा पर अपना अधिकार कर लिया. इन सब घटनाओं ने उसे बहुत अपमानित किया तथा उसी के भाई अहमदशाह ने 1422 ई. में उससे सत्ता हथिया ली.
> अहमदशाह (1422-1435 ई.) : टिप्पणी
अहमदशाह ने बहमनी राज्य की राजधानी को गुलबर्गा के स्थान पर बीदर को बनाया तथा इसका नाम मुहम्मदाबाद रखा. राजधानी परिवर्तन का प्रमुख कारण बीदर की स्थिति गुलबर्गा से अच्छी तथा जलवायु अधिक स्वास्थ्य प्रद थी.
अहमदशाह के शासनकाल की प्रमुख घटना है— उसके दरबार के स्थानीय मुसलमान अमीर एवं अफाकी (विदेशी अमीरों) के मध्य प्रतिद्वन्द्विता. इनमें धार्मिक मतभेद भी थे. देशी या दक्षिणी अमीर अधिकतर सुन्नी सम्प्रदाय के थे, जबकि अफाकी शिया थे. दरबारी झगड़ों के कारण प्रशासनव्यवस्था में शिथिलता आ गई.
अहमदशाह ने अपने पूर्वजों के समान ही विजयनगर के हिन्दू राज्य पर अनेक बार आक्रमण किए तथा एक बार विजयनगर को चारों ओर से घेर लिया जिससे राजा को हर्जाना देने के लिए बाध्य होना पड़ा. 1424-25 ई. में अहमदशाह ने बारंगल को जीतकर वहाँ के शासक को मार डाला तथा बारंगल को अपने राज्य में मिला लिया. अहमदशाह ने मालवा के हुसैनशाह को परास्त कर उसे भारी क्षति पहुँचाई तथा गुजरात पर भी अभियान किया, किन्तु सफल नहीं हो सका. कोंकण के सामन्त के विरुद्ध भी अहमदशाह ने अभियान किए थे, जिसे वह अन्तिम रूप से दबाने में सफल रहा. 1435 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
> अलाउद्दीन द्वितीय (1435-54 ई.) : टिप्पणी
अहमदशाह के बाद उसका उत्तराधिकारी अलाउद्दीन द्वितीय हुआ, जिसने अपने भाई मुहम्मद के विद्रोह का दमन कर उसे ‘रायचूर के दोआब’ का सूबेदार नियुक्त किया जहाँ पर मुहम्मद ने अपने जीवन के अन्त तक वफादारी से कार्य किया.
अलाउद्दीन ने अपनी आन्तरिक स्थिति को मजबूत करने के बाद कोंकण पर आक्रमण कर उस क्षेत्र पर अपना प्रभावी नियन्त्रण स्थापित कर लिया. अलाउद्दीन ने संगमेश्वर के शासक को हराकर उसकी पुत्री से अपना विवाह कर लिया इस पर उसके श्वसुर खानदेश के नसीर खाँ ने अपनी पुत्री का पक्ष लेकर उस पर आक्रमण कर दिया, लेकिन वह हार गया.
अपने कुल की परम्परा के अनुसार अलाउद्दीन ने विजयनगर राज्य पर आक्रमण किया तथा बहुत-सा धन उसने वहाँ से प्राप्त किया. इस धन का उपयोग उसने एक अस्पताल के निर्माण में खर्च किया.
अलाउद्दीन द्वितीय की 1457 में मृत्यु हो गई.
> हुमायूँ (1457–1461 ई.) 
अलाउद्दीन द्वितीय का उत्तराधिकारी उसका सबसे बड़ा पुत्र हुमायूँ हुआ, जो एक अत्याचारी व्यक्ति था. लोग उसे ‘जालिम' के नाम से जानते थे. 
> निजामशाह ( 1461-1463 ई.) 
हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसका अल्पव्यस्क पुत्र निजामशाह शासक बना जिसकी दो वर्षों बाद ही मृत्यु हो गई. 
> मुहम्मदशाह तृतीय (1463-82 ई.) : टिप्पणी
निजामशाह की मृत्यु के बाद उसी का भाई मुहम्मदशाह शासक बना जो मदिरा तथा व्यभिचार का शौकीन था. उसका शासन संचालन उसका प्रसिद्ध मन्त्री 'महमूद गँवा' किया करता था, जिसे उसने 'ख्वाजा जहाँ' की उपाधि प्रदान कर रखी थी.
महमूद गँवा ने कर्त्तव्यनिष्ठा एवं स्वामिभक्ति से बहमनी राज्य की सेवा की. उसने कोंकण के हिन्दू राजा का दमन कर उसके अनेक दुर्गों पर अधिकार कर लिया. इसके साथ ही गँवा ने संगमेश्वर के राजा से 'खुलमा का किला' भी जीत लिया. ssine
गँवा की उल्लेखनीय विजय विजयनगर साम्राज्य के प्रसिद्ध बन्दरगाह 'गोआ' पर विजय प्राप्त करना थी. इन विजयों के अतिरिक्त गँवा ने विजयनगर एवं उड़ीसा पर Manga सैनिक अभियान कर अपार धन सम्पत्ति लूटी. इसके बाद मुहम्मदशाह के शासनकाल में भयंकर अकाल पड़ गया तथा इसी दौरान दक्षिणी अमीरों ने गँवा के विरुद्ध षड्यन्त्र रचकर मुहम्मदशाह को उसके विरुद्ध भड़का दिया, अतः शराब के नशे में मुहम्मदशाह ने गँवा को मार डालने का आदेश दे दिया और 5 अप्रैल, 1481 ई. को गाँवा का वध कर दिया गया.
महमूद गँवा की मृत्यु के साथ ही बहमनी राज्य की एकता एवं शक्ति नष्ट हो गई तथा उसकी मृत्यु एक वर्ष बाद सुल्तान मुहम्मदशाह की मृत्यु हो गई.
> महमूदशाह (1482-1518 ई.)
मुहम्मदशाह का उत्तराधिकारी उसका छोटा पुत्र महमूदशाह हुआ जिसमें योग्यता एवं चरित्र का अभाव था, दक्षिणी एवं अफाकी अमीरों के मध्य इसके शासनकाल में संघर्ष और तीव्र हो गया तथा सूबेदारों ने राज्य के हितों की अवहेलना करनी प्रारम्भ कर दी. अतः महमूद की राजसत्ता राजधानी के आस-पास तक ही सीमित हो गई. 1518 ई. में इसकी मृत्यु हो गई.
> महमूदशाह के उत्तराधिकारी 
महमूदशाह के बाद अहमद चतुर्थ (1518 - 1520 ई.), अलाउद्दीनशाह (1520-23 ई.), वहीउल्लाह (1523-1526 ई.) शासक बने. ये सभी सुल्तान 'दक्षिण की लोमड़ी कहे जाने वाले तुर्क सरदार ‘बरीद-उल-मुमालिक' की कठपुतली बने रहे.
> करम उल्लाह (1526-1538 ई.)
यह बहमनी राज्य का अन्तिम शासक था तथा ww इसके समय में बहमनी राज्य 5 स्वतन्त्र राज्यों; यथा— (1) बीजापुर, (2) अहमदनगर, (3) बरार, (4) गोलकुण्डा और (5) बीदर में बँट गया. 
इस प्रकार बहमनी साम्राज्य के कुल 18 शासकों ने 175 वर्ष तक शासन किया जिसमें से पाँच की हत्या की गई, तीन को अपदस्थ किया गया, दो को अन्धा किया गया व दो अत्यधिक मदिरापान के कारण मारे गए. इस प्रकार बहमनी साम्राज्य अपने ही शासकों की अयोग्यता, दरबारियों के षड्यन्त्र तथा निरन्तर संघर्षों के कारण समाप्त हो गया.
> विजयनगर साम्राज्य में स्थानीय ग्राम सभाओं की स्थिति
चोल काल तक ग्राम सभाओं एवं उनकी स्वायत्तता का स्वर्णिम युग रहा. लेकिन उसके बाद इन संस्थाओं का पतन आरम्भ हो गया और चौदहवीं शताब्दी तक आते-आते इनका अस्तित्व न के बराबर रह गया. डॉ. आर. एन. सोलीटोर के अनुसार विजयनगर साम्राज्य में ग्राम सभाएँ 'लघु गणतन्त्रों' के रूप में कार्यरत् रहीं.
इन स्थानीय ग्राम सभाओं के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी रहे उनमें प्रमुख था चौदहवीं शताब्दी का मलिक काफूर का दक्षिण भारत पर आक्रमण. इसके बाद मुस्लिमों के बार-बार अनेक आक्रमण हुए जिससे यहाँ की सामाजिक संरचना में परिवर्तन आ गया और सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ वहाँ के शासन तन्त्र और राजनीति की जड़ें भी खोखली हो गईं. नायंकार और आयागर संस्थाओं का विकास भी ग्राम सभाओं के पतन के लिए पर्याप्त रूप से उत्तरदायी था.
अतः स्पष्ट है कि विजयनगर साम्राज्य में ग्राम सभाओं की संख्या न के बराबर थी. अतः कहा जा सकता है कि उनका अस्तित्व समाप्त हो चुका था.
> विजयनगर प्रशासन में मन्दिरों की भूमिका
वियजनगर प्रशासन में मन्दिरों को अर्द्ध-राजनीतिक अधिकार प्राप्त थे. मन्दिरों के संचालन के लिए उन्हें करमुक्त भूमि अनुदान के रूप में दी जाती थी. मन्दिर कभी-कभी अपनी व्यवस्था के लिए स्थानीय कर भी वसूलते थे. कृष्णदेव राय ने चोलमण्डलम में मन्दिरों को 10,000 वराह दान में प्रदान किए और मन्दिरों को इतनी ही धनराशि कर के रूप में वसूल करने की अनुमति दी गई. मन्दिरों को क्रय-विक्रय का अधिकार भी प्राप्त था. 
मन्दिर बैंकों एवं ऋणदाता के रूप में भी कार्य करते थे और आपात स्थिति में ऋण प्रदान करते थे. अगर कर्जदार ऋण अदायगी नहीं कर पाता था, तो वह अपनी कुछ भूमि मन्दिर को सौंपकर कर से मुक्त हो जाता था. मन्दिर स्थानीय न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे और फौजदारी मामलों का निपटारा करते थे. वे लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करते थे. मन्दिरों का कार्य खाली पड़ी भूमि को कृषि योग्य बनाना, सिंचाई के लिए नहर और तालाब आदि बनवाना और विद्यालयों की व्यवस्था करना भी था.
> विजयनगर साम्राज्य : प्रशासन 
दक्षिण में विजयनगर का हिन्दू साम्राज्य लगभग 300 वर्षों तक अपना यश फैलाता रहा. इस अवधि में अनेक प्रतिभाशाली शासक हुए जिन्होंने निरन्तर युद्धों में व्यस्त रहने के बावजूद भी एक सुदृढ़ शासन व्यवस्था को स्थापित किया. विजयनगर की शासन व्यवस्था के विषय में ए. के. शास्त्री का विचार है कि “विजयनगर एक केन्द्रीयकृत राज्य था.' जबकि बर्टन स्टोन ने उसे विभाजित राज्य की संज्ञा दी है. कुल मिलाकर विजयनगर का साम्राज्य राजनीतिक रूप से खण्डित होने की बजाय अत्यधिक विस्तृत एवं संविभाजित था.
> केन्द्रीय शासन-प्रबन्ध
विजयनगर साम्राज्य का सर्वेसर्वा राजा होता था जिसे 'राय' कहा जाता था तथा इस काल में राज्य के प्राचीन 'सप्तांग सिद्धान्त' पर राज्य का गठन किया गया था. राजा के चुनाव में राज्य के मन्त्री एवं नायक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते थे. राजा को अपने अभिषेक के समयप्रजापालन एवं निष्ठा की शपथ ग्रहण करनी होती थी.
राजा के बाद प्रशासन में 'युवराज' का पद द्वितीय स्थान पर था. युवराज राजा का बड़ा पुत्र या राजपरिवार का कोई भी योग्य सदस्य बन सकता था. युवराज के राज्याभिषेक को 'युवराज पट्टाभिषेक' कहा जाता था, इस राज्य में संयुक्त शासन की व्यवस्था थी. जैसे- हरिहर एवं बुक्का तथा विजयराय एवं देवराय ने संयुक्त रूप से शासन का संचालन किया था. युवराज के अल्पायु होने पर राजा अपने किसी मन्त्री को उसका संरक्षक अपने जीवनकाल में ही नियुक्त कर देता था. कालान्तर में यही व्यवस्था विजयनगर के पतन का बहुत बड़ा कारण बनी.
यद्यपि राजा एवं युवराज उस समय की व्यवस्था के संस्थाओं, मन्त्रिपरिषद् एवं धार्मिक संस्थाओं द्वारा प्रभावशाली अनुसार निरंकुश थे, परन्तु उन पर व्यापारिक नियमों, ग्रामीण नियन्त्रण लगा रहता था. राज्य परिषद् राजा को सलाह एवं उसका अभिषेक करने का कार्य किया करती थी. राजा को राज्य परिषद् के अतिरिक्त सलाह देने के लिए अन्य परिषदों का भी गठन किया गया था, जिनमें प्रान्तीय गवर्नर, बड़े-बड़े नायक, सामन्त एवं व्यापारिक निगमों के प्रतिनिधि सदस्य सम्मिलित होते थे.
राजा के प्रशासनिक कार्यों में सहयोग देने के लिए ‘मन्त्रिपरिषद्’ की स्थापना की गई थी, जिसमें प्रधानमन्त्री मन्त्री, उपमन्त्री, विभागों के अध्यक्ष एवं कुछ राज-परिवार के सदस्य होते थे. मन्त्रिपरिषद् का मुखिया 'प्रधानी' या ‘महाप्रधानी’ कहलाता था. इसकी स्थिति प्रधानमन्त्री जैसी होती थी तथा प्रशासनिक व्यवस्था में इसका स्थान 'तृतीय' था. मन्त्रिपरिषद् के सदस्यों की संख्या 20 थी तथा इसके अध्यक्ष को 'सभानायक' कहा जाता था. प्रधानी भी कभीकभी मन्त्रिपरिषद् की अध्यक्षता किया करता था. राजा के लिए मन्त्रिपरिषद् की सलाह बाध्यकारी नहीं थी. केन्द्रीय प्रशासन में ‘दण्डनायक’ नामक एक उच्च पदाधिकारी होता था. सम्भवतः यह विभिन्न विभागों के अध्यक्ष का नाम था. दण्डनायक को न्यायाधीश, सेनापति, गवर्नर या अन्य प्रशासकीय अधिकारी का कार्यभार सौंपा जाता था. केन्द्रीय प्रशासन के कुछ अन्य छोटे अधिकारियों को कार्यकर्त्ता, कहा जाता था.
विजयनगर के केन्द्रीय-प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक सचिवालय की व्यवस्था होती थी, जिसमें विभागों का वर्गीकरण किया गया था. इन विभागों में ‘रायसम', 'कर्णीकम' या 'एकाउण्टेण्ट' होते थे.
> प्रान्तीय शासन प्रबन्ध
विजयनगर साम्राज्य अत्यन्त विस्तृत होने के कारण राज्य, प्रान्त या मण्डल में विभाजित किया गया था. कृष्णदेव राय के समय प्रान्तों की संख्या छः थी. प्रान्तों के प्रशासक सामान्यतया परिवार (राजा) के सदस्य होते थे. इन्हें सिक्कों को प्रसारित करने, नये कर लगाने, पुराने कर माफ करने एवं भूमिदान देने की स्वतन्त्रता थी. इन्हें भू-राजस्व वसूल कर उसका एक निश्चित भाग केन्द्र को भेजने का उत्तरदायित्व मिला था.
जित किया गया था. कोट्टम का एक अन्य नाम 'वलनाडु' भी प्रान्तों को मण्डल एवं 'मण्डल' को कोट्टम' में विभा था. वलनाडु को 'नाडु' में बाँटा था जिनकी स्थिति आज की तहसीलों के समान थी. नाडु आगे 'मेलाग्राम' में बँटे होते आयंगर व्यवस्था के थे, जिसमें 50 ग्राम सम्मिलित होते थे. ‘उर, या 'ग्राम' विजयनगर प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थे. इनका शासन के आधार पर चलाया जाता था. famo
> स्थानीय शाखा (Local Administration)
विजयनगर का स्थानीय प्रशाासन चोलों के स्थानीय प्रशासन पर आधारित था. इस काल में गाँवों को अनेक वार्डों में बाँटा गया था. प्रत्येक वार्ड से कुछ लोगों को मिलाकर ‘सभा' या 'उर' का गठन किया जाता था. उर को गाँव के लिए नई भूमि या सम्पत्ति उपलब्ध कराने, सार्वजनिक भूमि को बेचने, गाँव की तरफ से सामूहिक निर्णय लेने तथा गाँव की भूमि को दान में देने का अधिकार होता था. वह छोटेमोटे दीवानी और फौजदारी मामलों का निपटारा कर सकती थी. नाडु गाँव से बड़ी राजनीतिक इकाई थी तथा इसकी सभा को 'नाट्टावार' के नाम से जाना जाता था. अधिकार क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत होने के कारण इस पर राजकीय नियन्त्रण लगाया जाता था.
इस प्रकार स्पष्ट है कि विजयनगर राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था विकेन्द्रित होते हुए भी पर्याप्त रूप से केन्द्रीयकृत थी और इसके बावजूद भी स्थानीय संस्थाओं को काफी स्वतन्त्रता प्राप्त थी.
> विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में नायंगर एवं आयंगर-व्यवस्था 
(i) नायंगर-व्यवस्था
विजयनगर साम्राज्य की नायंगर-व्यवस्था की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है, कुछ इतिहासकारों के अनुसार विजयनगर के सेनानायकों को 'नायक' कहा जाता था, जबकि अन्य के अनुसार, 'नायक' भू-सामन्त होते थे. उन्हें वेतन के बदले एवं स्थानीय सेना के खर्च के बदले विशेष प्रकार के भूखण्ड दिये जाते थे, जिन्हें 'अमरम' कहा जाता था. ये नायक चूँकि 'अमरम' भूमि का प्रयोग करते थे. इस कारण इन्हें 'अमर नायक' भी कहा जाता था. अमरम भूमि की आय का एक निश्चित भाग राजकोष में जमा करना पड़ता था एवं इसी आय से राजा की सहायता के लिए एक सेना का रख-रखाव करना होता था. नायक को अमरम भूमि में शान्ति, सुरक्षा एवं अपराधों को रोकने का दायित्व का भी निर्वाह करना होता था. इसके अलावा जंगलों को साफ करना एवं कृषि योग्य भूमि का विस्तार करना भी उनके जिम्मे था. राजधानी में नायकों के दो सम्पर्क अधिकारी रहते थे. प्रथम नायक की सेना का सेनापति एवं द्वितीय प्रशासनिक अभिकर्ता ‘स्थापित' होता था. अच्युतदेव राय ने नायकों की उच्छृंख -7 नामक अधिकारियों की नियुक्ति की थी.
(ii) आयंगर-व्यवस्था
विजयनगर साम्राज्य में प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रत्येक ग्राम को स्वतन्त्र इकाई के रूप में संगठित करने का प्रयास किया गया था. इन ग्रामीण इकाइयों पर शासन हेतु बारह (12) प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति होती थी, जिनको सामूहिक रूप से 'आयंगर' कहा जाता था. ये अवैतनिक होते थे.
आयंगरों की सेवा के बदले इन्हें पूर्णतः कर-मुक्त एवं लगान-मुक्त भूमि प्रदान की जाती थी. इन लोगों का पद अनुवांशिक होता था. यह अपने पद को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच या गिरवी रख सकता था. ग्राम-स्तर की कोई भी सम्पत्ति या भूमि इन अधिकारियों की इजाजत के बगैर न तो बेची जा सकती थी और न ही दान में दी जा सकती थी. 'कर्णिक' नामक आयंगर के पास जमीन को क्रय-विक्रय से सम्बन्धित समस्त दस्तावेज होते थे.
> विजयनगर साम्राज्य में स्त्रियों की दशा
विजयनगर समाज में स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक थी. स्त्रियों को शिक्षा अर्जित करने का अधिकार था. कुछ स्त्रियाँ महान् विदुषियाँ एवं साहित्यकार थीं. सामान्यतः एक विवाह प्रथा प्रचलित थी पर शासक वर्ग और सम्पन्न वर्ग में विवाह का प्रचलन था. ब्राह्मणों में बहु बाल विवाह मुख्यतः चलन में था. विधवाओं की स्थिति सुधारने के लिए राज्य Mana द्वारा विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया गया. विजयनगर में विवाह कर आरोपित किए जाते थे, लेकिन विधवा पुनर्विवाह इस कर से मुक्त थे. 
उच्च वर्ग की स्त्रियों को घर पर ही शिक्षित किया जाता था. नृत्य और संगीत की शिक्षा उनके पाठ्यक्रम के महत्वपूर्ण अंग थे. लगभग प्रत्येक क्षेत्र में प्रवीण स्त्रियाँ मिल जाती थीं. स्त्रियाँ मल्लयोद्धा, भविष्यवक्ता, अंगरक्षिकाएँ, ज्योतिषी आदि होती थीं. युद्ध क्षेत्र में सैनिक के रूप में भी स्त्रियों की अहं भूमिका रहती थी. स्त्रियाँ विभिन्न राजकीय पदों पर भी नियुक्त की जाती थीं. विजयनगर शासक महिला अंगरक्षकों को अधिक विश्वसनीय मानते थे.
विजयनगर समाज में गणिकाओं को प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था. गणिकाएँ दो प्रकार की थीं—एक तो वे जो मन्दिरों से जुड़ी हुई थीं. दूसरी वे जो स्वतन्त्र रूप से आजीविका प्राप्त करती थीं. गणिकाएँ सुशिक्षित और सभ्य होती थीं और उनमें से अनेक को राज्य की ओर से विशेष अधिकार प्राप्त थे. विजयनगर समाज में सती प्रथा भी प्रचलित थी.
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Sun, 08 Oct 2023 08:32:16 +0530 Jaankari Rakho
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> दिल्ली सल्तनत - गुलाम वंश
मुहम्मद गोरी के गुलाम के रूप में कुतुबुद्दीन ऐबक के कार्य
कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 ई. से पूर्व तक मुहम्मद गोरी के प्रतिनिधि के रूप में शासन किया. इस काल में उसने विलक्षणं सैनिक सफलताओं द्वारा गोरी के भारतीय साम्राज्य को विस्तृत एवं सुदृढ़ बनाया. गोरी के गुलाम के रूप में ऐबक ने भारत में निम्नलिखित कार्य किए –
  1. गोरी की अनुपस्थिति में ऐबक ने 1192 ई. में अजमेर, एवं मेरठ के विद्राहों का दमन किया. इसके बाद उसने दिल्ली पर अधिकार कर लिया जो आगे चलकर भारत के तुर्की राज्य की राजधानी बनी. ऐबक की इन विजयों से अजमेर से लेकर दिल्ली तक का सारा प्रदेश मुसलमानों के अधिकार में आ गया. 1194 ई. में उसने अजमेर के दूसरे विद्रोह का दमन किया और इसी वर्ष चन्दवार के युद्ध में कन्नौज के शासक जयचन्द को पराजित कर दिया. 1195 ई. में ऐबक ने कोइल (अलीगढ़) पर अधिकार कर लिया. इसके साथ ही उसने रणथम्भौर के प्रसिद्ध किले को जीत लिया. 
  2. 1196 ई. में ऐबक ने अजमेर प्रान्त के मेड़ों के विद्रोह का दमन किया. इसी वर्ष गुजरात के शासक भीमदेव पर आक्रमण किया और उसे पराजित कर राजधानी अन्हिलवाड़ा में भयंकर लूट मचाई.
  3. 1202 ई. में बुन्देलखण्ड के चन्देल शासक "को हराकर ऐबक ने सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कालिंजर दुर्ग पर अधिकार कर लिया.
  4. ऐबक ने महोबा, कालपी और बदायूँ को भी अपने अधीन किया. ऐबक ने इन सभी अभियानों में भयंकर लूटमार मचाई और मुस्लिम परम्परा के अनुसार मन्दिरों का विनाश किया तथा यथासम्भव हिन्दुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, मुहम्मद गोरी के प्रतिनिधि के रूप में ऐबक ने भारत में उसके राज्य का अत्यधिक विस्तार किया.
> स्वतन्त्र शासक के रूप में ऐबक के कार्यों का मूल्यांकन
1206 ई. में मुहम्मद गोरी की मृत्यु का समाचार पाते ही कुतुबुद्दीन ने दिल्ली से लाहौर पहुँचकर अपने स्वतन्त्र होने की घोषणा कर दी तथा 24 जून, 1206 ई. को उसने अपना राज्याभिषेक कराया और शासक बनने के बाद निम्नलिखित कार्य किए -
  1. मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद ताजुद्दीन याल्दौज ने गजनी पर अधिकार कर लिया. इसके बाद याल्दौज ने नासिरुद्दीन कुबाचा पर आक्रमण करके मुल्तान को हथियाने का प्रयत्न किया. ऐसी स्थिति में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुबाचा के साथ मिलकर याल्दौज को परास्त कर दिया तथा गजनी पर अधिकार कर लिया, लेकिन उसे पुनः भारत लौटना पड़ा, क्योंकि याल्दौज ने पुनः गजनी पर अधिकार कर लिया, लेकिन इसके बाद उसने उसे कभी परेशान नहीं किया.
  2. गजनी में अपने शासनकाल के दौरान ऐबक ने उत्तराधिकारी सुल्तान महमूद से गुलामी से गुलामी का मुक्ति-पत्र प्राप्त कर लिया उसने ऐबक को राजकीय सत्ता के दो आवश्यक चिन्ह ‘धत्तर' और 'दण्ड' प्रदान किए. 
  3. कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुछ शक्तिशाली तुर्की सरदारों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके अपनी आन्तरिक स्थिति को मजबूत किया. सिन्ध और मुल्तान के शासक कुबाचा के साथ उसने अपनी बहन की शादी की. कि ताजुद्दीन एल्दौज की लड़की से उसने अपना स्वयं का विवाह किया तथा बिहार के गवर्नर इल्तुतमिश से अपनी लड़की का विवाह कर दिया. इन वैवाहिक सम्बन्धों से ऐबक ने तुर्क सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया. 
  4. बंगाल में अलीमर्दान नामक सरदार वहाँ के शासक बख्तियार खिलजी की हत्या करके खुद २ खुद शासक बन बैठा. उसके शासन से असन्तुष्ट होकर खिलजी सरदारों ने उसे जेल में डाल दिया और मोहम्मद शेख को शासक बना दिया. अलीमर्दान किसी तरह से जेल से भागकर ऐबक के पास पहुँचा तथा उसकी सहायता पाकर वह पुनः बंगाल का गवर्नर बन गया तथा ऐबक को टैक्स देना स्वीकार लिया.
  5. मुहम्मद गोरी की मृत्यु की सूचना मिलते ही राजपूत शासकों ने भारत में तुर्कों की सत्ता को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया. चन्देल शासक त्रैलोक्य वर्मन ने कालिंजर पर पुनः अधिकार कर लिया. अन्तर्वेद के कई छोटे-छोटे शासकों ने तुर्की सल्तनत को कर देना बन्द कर दिया.
ऐसी स्थिति में ऐबक ने विद्रोही हिन्दू सरदारों का बलपूर्वक दमन किया जिन हिन्दू सरदारों ने उसे कर देना स्वीकार कर लिया उन्हें उनकी भूमि का स्वामी बना रहने दिया गया, किन्तु याल्दौज के भय के कारण ऐबक अपनी पूरी शक्ति इनके विरुद्ध नहीं लगा सका.
इस प्रकार स्पष्ट है कि ऐबक ने स्वतन्त्र शासक की हैसियत से शासन करते हुए अपने जीते हुए नए राज्य को सुरक्षित रखा और प्रत्येक समस्या पर नियन्त्रण कायम किया.
> क्या ऐबक भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक था ?
गुलाम होते हुए भी ऐबक भारत में मुस्लिम राज्य का शासक बन गया. यह उसकी योग्यता, क्षमता और अथक परिश्रम का परिणाम था. कुछ इतिहासकारों ने ऐबक को भारत का प्रथम मुस्लिम शासक माना है, क्योंकि भारत में गोरी साम्राज्य को सुरक्षित रखने तथा उसके राज्य विस्तार का मुख्य श्रेय ऐबक को ही जाता है, लेकिन डॉ. आर.पी. त्रिपाठी एवं अन्य इतिहासकार निम्नलिखित कारणों से मुस्लिम राज्य का संस्थापक मानने से इन्कार करते हैं— 
1. ऐबक ने अपने नाम से कोई सिक्का जारी नहीं किया.
2. चौदहवीं सदी के विदेशी यात्री इब्नबतूता ने ऐबक का नाम भारत के सुल्तानों में नहीं गिनाया.
3. फिरोज तुगलक ने भी ऐबक का नाम सुल्तानों की सूची में नहीं लिखा है.
उपर्युक्त तर्कों के आधार पर हम चाहे ऐबक को संस्थापक न माने, लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि उसने ही भारत को गजनी के प्रभुत्व से मुक्त कराया तथा भारत में मुस्लिम राज्य के विस्तार का मार्ग खोल दिया. भारत में अपने 4 वर्षों के अल्प शासनकाल में ऐबक ने दिल्ली साम्राज्य की आधारशिला रखकर इस्लाम की बड़ी भारी सेवा की. भारत में तुर्की सरदारों को अपने साथ और अधीनता में लेकर उसने दिल्ली के तुर्की राज्य को एकता प्रदान की और दिल्ली सल्तनत की नींव डाली. यदि ऐबक ऐसा नहीं कर पाता तो सम्भव था कि भारत का तुर्की राज्य विभिन्न तुर्की सरदारों के पारस्परिक संघर्षों का शिकार बनकर टुकड़े-टुकड़े हो जाता और तब हिन्दू नरेश उसका समूल नाश कर देते. ऐबक के योग्य नेतृत्व एवं प्रबल शौर्य के कारण ऐसा नहीं हो सका. ऐसी स्थिति में उसे भारत में तुर्की राज्य का संस्थापक कहा जा सकता है.
किन्तु यदि हम गहराई से विचार करें तो उसे वास्तविक संस्थापक नहीं कह सकते, क्योंकि उसका अधिकांश समय विद्रोहों को कुचलने एवं षड्यन्त्रों को विफल करने में बीता, फिर भी उसे इनमें पूर्ण सफलता नहीं मिली. उसके समय में देश में अशान्ति एवं अव्यवस्था रही यद्यपि उसने भारत में गुलाम वंश की नींव डाली, परन्तु प्रशासकीय सुधारों द्वारा नवीन राज्य को संगठित करने का प्रयास उसने नहीं किया. परिणामस्वरूप उसके समय से ही भारत में विशृंखलन होना आरम्भ हो गया. इसी प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी कमजोरियों को देखते हुए सुल्तान की पदवी धारण नहीं की.
> इल्तुतमिश की कठिनाइयों का विवरण
कुतुबुद्दीन ऐबक के उत्तराधिकारी आरामशाह की अयोग्यता का लाभ उठाकर इल्तुतमिश ने दिल्ली पर आक्रमण कर उस पर अपना अधिकार कर लिया. शासक बनने के बाद उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिनका विवरण निम्नलिखित है—
कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय भारत का तुर्की राज्य पूर्णतया असंगठित था. शासन प्रबन्ध का भार मुख्यतः तुर्की सरदारों के नियन्त्रण में था जो इल्तुतमिश का विरोध कर रहे थे. इसके साथ ही दिल्ली में गोरी एवं ऐबक के समय के तुर्क सरदार मौजूद थे जो राजगद्दी पर अपना अधिकार मानते थे और वे इल्तुतमिश के स्थान पर किसी तुर्क को शासक बनाना चाहते थे.
इल्तुतमिश को सिन्ध और मुल्तान के शासक नासिरुद्दीन कुबाचा से बहुत अधिक खतरा था, क्योंकि ऐबक की मृत्यु के साथ ही उसने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी. उसके साथ ही उसने भटिण्डा, कोहराम, सरसुती तथा लाहौर को अपने अधिकार में कर लिया था. कुतुबुद्दीन ऐबक का सगा बहनोई होने के कारण वह स्वयं अपने क को दिल्ली का दावेदार मानता था.
ऐबक की मृत्यु के तुरन्त बाद गजनी के शासक याल्दौज ने भी अपने को हिन्दुस्तान का शासक घोषित कर दिया तथा इल्तुतमिश को भारत में अपने सूबेदार के रूप में कार्य करने का संदेश भेजा.
इल्तुतमिश को राजपूतों के प्रतिरोध का भी सामना करने के लिए तैयार रहना था, क्योंकि जालौर और रणथम्भौर के चौहान, कालिंजर तथा अजयगढ़ के चन्देलों ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था.
मौके का लाभ उठाकर बंगाल के गवर्नर अलीमर्दान ने भी अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी तथा दिल्ली को कर देना बन्द कर दिया. इस पर खिलजी सरदारों ने अलीमर्दान का वध कर उसकी जगह हिसामुद्दीन एवाज को बंगाल का शासक बना दिया था.
इन सब कठिनाइयों के अतिरिक्त उसको अपने राज्य की उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा को भी देखना था, क्योंकि मंगोलों द्वारा पराजित होकर ख्वारिज्म के शासक जलालुद्दीन मंगबर्नी इस सीमा पर आ बसा था तथा मंगोल उसका पीछा करते हुए भारत की सीमा तक आ गए थे.
इन कठिनाइयों के साथ-साथ उसकी समस्या यह भी थी कि वह एक गुलाम था तथा इस्लामी कानून के अनुसार एक गुलाम शासक नहीं बन सकता था तथा मुस्लिम धार्मिक वर्ग से उसे किसी सहयोग की आशा नहीं थी. इसके अतिरिक्त ऐबक के पुत्र और उत्तराधिकारी उसके मार्ग की बड़ी बाधा थे.
इस प्रकार स्पष्ट है इल्तुतमिश को राज्य के साथ-साथ काँटो से भरा ताज भी प्राप्त हुआ था जिसका उसने आगे चलकर सफलतापूर्वक समाधान किया.
> इल्तुतमिश ने अपनी समस्याओं का आसानी से समाधान किया, विवेचना
सुल्तान इल्तुतमिश को निम्नलिखित कारणों से अपनी समस्याओं के विरुद्ध सफलता मिली –
  1. इल्तुतमिश एक वीर, साहसी, दृढ़निश्चयी, सावधान एवं दूरदर्शी सेनानायक था. अपनी चारित्रिक विशेषताओं के बल पर उसने अपने शक्तिशाली शत्रुओं को कुचल दिया. इसके अतिरिक्त उसने सूफियों एवं सन्तों के प्रति बड़ा आदर-भाव रखा जिससे उसे मुस्लिम जनता का पूरा सहयोग मिला.
  2. इल्तुतमिश की सफलता का एक अन्य कारण उसके शत्रुओं में आपसी फूट तथा राजनीतिज्ञता की कमी थी. वे संयुक्त होकर इल्तुतमिश से सामना करने के बजाय आपसी संघर्ष का शिकार हो गए जिससे इनकी शक्ति क्षीण हो गई.
  3. इल्तुतमिश की सफलता में उसके द्वारा गुलामों के संगठन ‘तुर्कान-ए-चहलगानी' का सबसे बड़ा हाथ रहा. ये गुलाम इल्तुतमिश के प्रति सदैव स्वामीभक्त रहे.
  4. इल्तुतमिश के समय में मध् मध्य एशिया में मंगोलों ने भयंकर मारकाट मचा रखी थी जिससे वहाँ से अनेक योग्य लोग भारत आ गए जिन्हें इल्तुतमिश ने अपने दरबार में शरण दी तथा उनके सहयोग से उसने एक कुशल शासन प्रणाली का सूत्रपात किया.
  5. इल्तुतमिश ने अपने शत्रुओं के विरुद्ध अत्यन्त ही कठोर कदम उठाए. राजपूतों का दमन उसने बड़ी निर्ममता के • साथ किया. इन सबसे उसके शत्रुओं में भय व्याप्त हो गया तथा उसके सरदार अनुशासित हो गए.
  6. इल्तुतमिश ने मुस्लिम जगत के सर्वोच्च खलीफा द्वारा भारत के सुल्तान के रूप में मान्यता व 'खिलाफत' प्राप्त की जिससे उसकी भारत में स्थिति सुदृढ़ हो गई.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इल्तुतमिश ने अपनी दूरदर्शिता, राजनीतिज्ञता और सैनिक कुशलता के बल पर एक सुदृढ़ एवं संगठित राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की.
> दिल्ली सल्तनत के वास्तविक संस्थापक के रूप में इल्तुतमिश : मूल्यांकन  
इल्तुतमिश ने ऐबक के उत्तराधिकारी आरामशाह को परास्त कर दिल्ली की सत्ता प्राप्त की तथा कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा प्रारम्भ किए गए कार्यों को पूरा करने का प्रयास प्रारम्भ किया. उसने अपने विरोधियों का दमन किया तथा याल्दौज और कुबाचा को पराजित कर अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाया. उसने भारत के शक्तिशाली एवं महात्वाकांक्षी तुर्क सरदारों का दमन किया. वि . बंगाल एवं बिहार के खिलजी शासकों को हराकर अपने अधीन कर लिया.
इल्तुतमिश ने अपनी दूरदर्शिता से भारत पर चंगेज़ खाँ के होने वाले आक्रमणों से रक्षा की. इन सबके अतिरिक्त दोआब और राजस्थान के हिन्दू राजाओं का निर्ममतापूर्वक दमन कर दिया. इस प्रकार इल्तुतमिश ने न केवल राज्य में शान्ति-व्यवस्था को बनाया, बल्कि उसका विस्तार भी किया.
इल्तुतमिश ने विजय कार्यों के साथ-साथ सल्तनत में अनेक प्रशासकीय सुधार भी किए. इससे उसका प्रशासन मजबूत हो गया और शक्तिशाली सैनिक राजतन्त्र का इससे निर्माण हुआ. मुद्रा प्रणाली और न्याय व्यवस्था में भी उसने अनेक सुधार किए और भारतीय शासन प्रणाली को अरबी स्वरूप प्रदान किया. 
इल्तुतमिश ने भारत के मुस्लिम साम्राज्य को गजनी से पृथक् करके उसके स्वतन्त्र एवं स्थाई अस्तित्व का निर्माण की मान्यता गठिखलीफा से स्वयं के लिए सुल्तान की प्राप्त की. इससे नैतिक और वैधानिक दृष्टि से सल्तनत और अधिक बू हो गई.
इन सबके अतिरिक्त उसने अपने वैयक्तिक और चारित्रिक गुणों से सुल्तान तथा सुल्तान की पद-प्रतिष्ठा को और अधिक बढ़ाया. उसने अपने 26 वर्ष के शासनकाल में अथक परिश्रम करके अपने उत्तराधिकारियों के लिए एक विशाल सुसंगठित, सुव्यवस्थित और सुदृढ़ राज्य विरासत में छोड़ा. इस प्रकार यदि देखा जाए तो इल्तुतमिश ही भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहलाने का अधिकार रखता है. डॉ. ए. के. निजामी के शब्दों में"ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की रूपरेखा के बारे में केवल दिमागी आकृति बनाई थी पर इल्तुतमिश ने उसे एक व्यक्तित्व, एक पद, एक प्रेरणा शक्ति, एक दिशा, एक शासन व्यवस्था और एक शासक वर्ग प्रदान किया." अतः उसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक कहा जा nh सकता है.
> रजिया सुल्ताना की असफलता के क्या कारण थे  ? 
रजिया सुल्ताना की असफलता के निम्नलिखित कारण थे
  1. अयोग्य शासक रुकुनुद्दीन फिरोज के समय तुर्क सरदारों को मनमानी करने के बहुत अधिक प्राप्त हो गए थे. जब रजिया ने उनको मनमानी करने से रोका तब वे उसे गद्दी से उतारने पर तुल गए.
  2. रजिया की असफलता का सर्वप्रमुख कारण उसका औरत होना था. बूढ़े तुर्की योद्धा उसके नेतृत्व में रहना और युद्ध लड़ना अपनी शान के विरुद्ध समझते थे.
  3. रजिया ने शासन कार्य चलाने के लिए पर्दे का परित्याग कर दिया और पुरुषों के वस्त्र धारण कर लिए. युद्धों का संचालन वह मर्दाना पोषाक में करने लगी. इन सब कार्यों से कट्टर सुन्नी मुसलमान अप्रसन्न हो गए और उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे.
  4. रजिया ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए अनेक प्रशासनिक कदम उठाए और प्रशासनिक पदों का पुनर्वितरण किया. उसने अफ्रीका के हब्सी जमालुद्दीन याकूत को शाही अस्तबल का प्रधान (अमीर-ए-अखुर) बना दिया. रजिया के इस कार्य से तुर्कों में विरोध की ज्वाला भड़क उठी, तुर्की सरदारों को यह पसन्द नहीं आया कि, एक सुल्ताना अपने दरबार में एक दास को पसन्द करे.
उपर्युक्त सभी कारणों से उसके राज्य में विद्रोहों का ताँता लगा दिया. रजिया ने विद्रोहों को दबाने की भरसक चेष्टा की, लेकिन अपने जीवन से हाथ धोकर भी इसमें वह सफल न हो सकी.
> रजिया सुल्ताना का चरित्र एवं उसके कार्यों का मूल्यांकन
तेरहवीं सदी के भारतीय सुल्तानों में रजिया का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावशाली था. मिन्हाजुस सिराज के अनुसार, वह एक महान् शासिका थी जिसमें एक शासक के सभी गुण विद्यमान थे. रुकुनुद्दीन फिरोज के समय की बिगड़ी हुई स्थिति को उसने बड़ी आसानी से सम्भाल लिया. शक्तिशाली तुर्क अमीरों के उग्र विरोध के बावजूद बड़े साहस और कौशल से उसने अपनी सत्ता सुदृढ़ कर ली तथा सन् 1236 से 1238 ई. तक वह निरन्तर सफल रही. उसने तुर्क सरदारों के विद्रोह को कुचला एवं रणथम्भौर के विद्रोही राजपूतों को पराजित किया. उसने तुर्क अमीरों की शक्ति को कम करने के लिए प्रतिद्वन्द्वी दल का गठन किया. उसने तुर्की अमीरों एवं सरदारों को शाही आज्ञा मानने के लिए विवश कर दिया. वे सुल्ताना की शक्ति से भय खाने लगे.
1238 ई. में गजनी ननियान के ख्वारिज्म सूबेदार मलिक हसन करलुग ने उससे जब मंगोलों के विरुद्ध सहायता माँगी तब उसने उसके प्रति सहानुभूति अवश्य प्रकट की, लेकिन सैनिक सहायता नहीं प्रदान की. इस प्रकार उसने अपने पिता की तरह ही भारत को मंगोल अ आक्रमण से बचाया.
वास्तव में एक नारी होने के दुर्भाग्य के कारण ही उसे तुर्क सरदारों का सहयोग नहीं मिल सका और अन्त में उसे असफल होना पड़ा. 
> मंगोलों के आक्रमण रोकने के लिए बलबन द्वारा अपनाई गई नीति 
भारत पर मंगोलों के आकमण बहुत पहले से ही होते हैं आ रहे थे तथा बलबन के समय इन आक्रमणों का खतरा बहुत अधिक बढ़ गया था. वे प्रतिवर्ष पंजाब और सिन्ध पर विभिन्न दिशाओं से आक्रमण कर लूटपाट एवं रक्तपात करते रहते थे. अतः बलबन ने अपने साम्राज्य की रक्षा करने के लिए उत्तर-पश्चिम सीमा की ओर विशेष ध्यान दिया और इस दिशा में उसने कुछ निश्चित कदम उठाए जो निम्नलिखित थे—
  1. जिन मार्गों से भारत पर मंगोलों के हमले होते थे उन मार्गों पर बलबन ने बहुत से नए और मजबूत दुर्गों का निर्माण करवाया और उनमें शक्तिशाली चौकियाँ स्थापित की गईं.
  2. बलबन ने इस क्षेत्र की रक्षा का दायित्व अपने चचेरे भाई शेरखाँ को सौंपा जो अत्यन्त ही योग्य सेनापति था. उसने अपनी वीरता से मंगोलों के हृदय में आतंक फैला दिया. 1270 ई. में शेर खाँ की मृत्यु के बाद उसने अपने योग्य पुत्र मुहम्मद को मुल्तान का एवं दूसरे पुत्र बुगरा खाँ को समाना का अधिकारी नियुक्त किया. ये ही दोनों प्रान्त मंगोलों के आक्रमणों के प्रमुख लक्ष्य थे.
  3. बलबन ने इस क्षेत्र की निगरानी रखने के लिए अपना अधिकांश समय राजधानी दिल्ली में रहना प्रारम्भ किया तथा बाहर जाना बन्द कर दिया. उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त की सुरक्षा की वजह से ही उसने भारत के सुदूर प्रदेशों को जीतने का प्रयास नहीं किया.
बलबन के इन सभी प्रयत्नों के फलस्वरूप कुछ वर्षों तक उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर शान्ति बनी रही और मंगोल आक्रमणों की सम्भावना काफी कम हो गई, लेकिन 1285 ई. में तैमूर खाँ के नेतृत्व में एक विशाल मंगोल सेना ने पंजाब पर आक्रमण किया. बलबन के सबसे योग्य पुत्र मुहम्मद ने शत्रुओं को अपनी जान गँवाकर पराजित कर दिया. इससे बलवन को बड़ा भारी सदमा लगा और इसी सदमे से उसकी मृत्यु हो गई. 
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, बलबन द्वारा किए गए उत्तर-पश्चिम की सुरक्षा के लिए उपायों से वह अपने राज्य की सुरक्षा मंगोलों के विरुद्ध कर सका.
> बलबन ने तुर्कान-ए-चहलगानी का अन्त क्यों और कैसे किया ?
इल्तुतमिश के समय में स्थापित चालीस गुलामों का संगठन बलबन के राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा था. राज्य की भूमि का एक बड़ा भू-भाग इनके अधीन था. ये तुर्क सरदार बड़े शक्तिशाली, कपटी, धूर्त थे तथा बलबन की निरंकुशता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थे. अतः बलबन ने इनको कुचलने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए
  1. बलबन ने छोटे सरदारों को उच्च पद देकर उनको तुर्क सरदारों के समकक्ष बना दिया.
  2. साधारण अपराध करने पर भी तुर्क सरदारों को कठोर दण्ड दिए गए. बदायूँ के शासक मलिक बकबक को अपने एक सेवक को मार डालने के अपराध में 500 कोड़े सरेआम लगवाए गए. इसी तरह अवध के सूबेदार हैबत खाँ को 500 कोड़े लगवाये गये और फिर 20 हजार टका हर्जाना मृतक की विधवा को दिलवाकर उसे मुक्त किया गया. चालीस तुर्क सरदारों में एक अत्यन्त योग्य एवं महत्वाकांक्षी व्यक्ति शेरखाँ, जोकि बलबन का चचेरा भाई था, को जहर देकर मरवा डाला.
  3. बलबन ने तुर्क सरदारों की जागीरों के पट्टे को जाँचने के लिए सरकारी हुक्म जारी किया. इस तरह उसने यह पता लगाया कि, सरदारों ने जायदाद के अनुकूल सेना रख रखी थी या नहीं. उसने अपराधी सरदारों की इस बहाने से जागीरें जब्त कर लीं या उन्हें दिल्ली से बहुत दूर पुरानी बड़ी जागीरों के बदले छोटी जागीरें दे दीं. 
  4. तुर्क सरदारों को अपनी जागीरों से बहुत अधिक आमदनी होती थी. अतः उसने आदेश निकाला कि, एक निश्चित सीमा से अधिक की आय को सरकारी खजाने में जमा कराया जाए. 
  5. बलबन ने अपने सारे राज्य में गुप्तचरों का जाल बिछा दिया तथा ये गुप्तचर प्रत्येक दिन उसके पास महत्वपूर्ण सूचनाएँ भेजते थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि, बलबन ने अपनी कठोर दमनकारी नीति से चालीसा संघ या तुर्क सरदारों की शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया और सम्पूर्ण राज्य में सुल्तान के पद के गौरव का आतंक छा गया.
> बलबन के राजत्व सिद्धान्त की व्याख्या
बलबन के समय दिल्ली सल्तनत में सुल्तान की प्रतिष्ठा कम हो गई थी तथा तुर्क अमीर बहुत अधिक शक्तिशाली हो तथा वे राजाज्ञा की समय-समय पर अवहेलना किया करते थे. अतः राजपद की गरिमा को बनाने तथा अमीरों की शक्ति को कुचलने के लिए बलबन ने सर्वप्रथम फारस के इस्लामी राजत्व के राजनीतिक सिद्धान्तों व परम्पराओं के आधार पर अपने शासन को संगठित किया तथा अपने राजत्व के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया. उसने योग्य एवं प्रसिद्ध अधिकारियों को नियुक्त किया तथा कानूनों को कठोरता एवं उत्साह से लागू किया, ताकि राज्य शक्ति के पतन को रोका जा सके.
उसने राजपद को अमीरों की मेहरबानी नहीं, बल्कि ‘नियाबते खुदाई’ मानते हुए सुल्तान को 'जिल्ले अल्लाह ( ईश्वर का प्रतिनिधि) एवं ईश्वरीय प्रेरणा एवं क्रान्ति का भण्डार माना. राजत्व को उसने निरंकुशता का शारीरिक रूप माना. जनता में राजत्व के प्रति भय बनाए रखने के लिए वह = आवश्यक समझता था कि राजत्व को जनता के बीच नहीं जाना चाहिए अन्यथा जनता में राजपद पाने की लालसा जाग उठेगी. वह स्वयं कहता था कि- “जब भी मैं किसी नीच व्यक्ति को देखता हूँ, तो मेरी नसों का खून खौल उठता है." ऐसा सम्भवतः अपने दासत्व की ग्रन्थि से मुक्ति के लिए ऐसा करता था. इसी के साथ वह अपने को तुर्की के पौराणिक वीर ‘आफरियासियाब' का वंशज बताता था, ताकि लोग उसके उच्चकुलीन होने पर शक न कर सकें. उसने अपने दरबार को ईरानी शान और शौकत से सुसज्जित किया, 'सिजदा' और 'पायबोस' की परम्परा भी प्रचलित की तथा उसने अपने पौत्रों का नाम 'कैकुबाद' तथा 'केक्यूमर्श' भी ईरानी सम्राटों के नाम के आधार पर रखे.
दरबार में उसके पीछे प्रमुख अमीर बैठते थे तथा शेष लोग अपने पद के अनुसार खड़े रहते थे. दरबार में केवल वजीर ही उससे बात कर सकता था. वह न तो स्वयं हँसता था और न ही किसी को हँसने की इजाजत देता था. अपने निजी सेवकों तक से भी वह शाही पोशाक में मिलता था. दरबार में वह शाहजादा मुहम्मद की मृत्यु का समाचार सुनकर भी विचलित नहीं हुआ. इन सबका उद्देश्य जनता में राजपद का खौफ बनाए रखना था. वह खलीफा की धार्मिक सत्ता को स्वीकार करता था. वह कहता था- “राजा से प्राप्त संरक्षण के बदले जनता को अहसानमन्द रहना चाहिए." उसने ईश्वर व राजा तथा प्रजा के बीच त्रिपक्षीय सम्बन्ध को राज्य का आधार बनाने का प्रयास किया. राजत्व को वह एक विरासत मानता था तथा विरासत में प्राप्त राजत्व ही वास्तविक एवं औचित्यपूर्ण था.
> बलबन गुलाम वंश के महानतम शासक के रूप में : टिप्पणी
ग्यासुद्दीन बलबन के गुलाम वंश में निःसंदेह महानतम शासक होने का श्रेय दिया जा सकता है. इल्तुतमिश के अयोग्य और विलासी उत्तराधिकारियों के समय भारत में सारा मुस्लिम साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया था. बंगाल व बिहार विद्रोही हो गए थे तथा बहुत से हिन्दू शासकों ने अपनी सत्ता पुनः प्राप्त कर ली थी. इसके अतिरिक्त सल्तनत की सीमाएँ मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त थीं. चालीस गुलामों का दल नृप निर्माता बन गया था, किन्तु बलबन ने अपने धैर्य एवं शौर्य से उखड़ते हुए मुस्लिम साम्राज्य की नींव फिर से जमाई तथा विद्रोही तत्वों को कुचलकर राजपद को पुनः प्रतिष्ठा दिलाई.
भीषण संकटकाल में बलबन एक सुयोग्य शासक सिद्ध हुआ. उसने अपने 40 वर्षों के शासनकाल में 'रक्त और लौह' की नीति को अपनाकर दिल्ली सल्तनत को प्रतिष्ठित किया और इन्हीं कारणों से उसे गुलाम वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा जा सकता है. डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसारमहान् योद्धा, शासक, नीति निपुण बलबन, जिसने घोर संकटग्रस्त, अल्पव्यस्क मुसलमान राज्य को संरक्षित रखकर नष्ट होने से बचाया, मध्यकालीन भारतीय इतिहास में सदैव उच्च स्थान पाने का अधिकारी रहेगा. उसने अलाउद्दीन के सफल शासन की भूमिका तैयार की यदि उसने भारत में संघर्षरत मुस्लिम शक्ति को दृढ़ एवं संरक्षित न किया होता तो अलाउद्दीन मंगोलों के आक्रमण का सफल प्रतिरोध करने तथा सुदूरवर्ती प्रदेशों को विजित करने में कभी सफल नहीं होता.
> खिलजी वंश
जलालुद्दीन खिलजी की असफलता के कारण
खिलजी वंश के संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी ने 1290 ई. से लेकर 1296 ई. तक शासन किया इस दौरान वह अनेक कमजोरियों का शिकार रहा जिसके कारण उसकी गिनती एक असफल शासक के रूप में की जाती है. उसकी निम्नलिखित कमजोरियाँ थीं-
  1. जिस समय जलालुद्दीन खिलजी शासक बना था उस समय 'रक्त और तलवार' की नीति में विश्वास करने वाला शासक ही सफल हो सकता था. जलालुद्दीन ने इस नीति को न अपनाकर बड़ी भारी भूल की.
  2. दिल्ली के तुर्क खिलजियों को तुर्क नहीं मानते थे. वे उनसे घृणा करते थे और उन्हें अपने से छोटा समझते थे. अतः उनका प्रयत्न यही रहा कि, जलालुद्दीन खिलजी शासन सत्ता से हाथ धो बैठे.
  3. जिस समय जलालुद्दीन शासक बना उसकी उम्र वृद्धावस्था के नजदीक थी तथा अब उसमें प्रभावशाली 15ढंग से शासन करने की योग्यता नहीं थी. वह आवश्यकता से अधिक उदार था और इसका लाभ उसके विरोधियों ने खूब उठाया.
  4. जलालुद्दीन ने राजपद और उसके शानो-शौकत की कोई परवाह नहीं की. वह मामले में सदैव उदासीन ही बना रहा. उसकी कृपा एवं दया की नीति ने उसके राज्य की नींव हिला दी.
  5. जलालुद्दीन के साथी अत्यन्त ही महात्वाकांक्षी व्यक्ति थे वे चाहते थे कि सुल्तान एक विजेता की भाँति रहे लेकिन वह उदार नीति का अनुसरण करता था. इस कारण से उसके साथियों में निराशा फैल गई और वे इससे छुटकारा पाने के लिए प्रयासरत हो गए.
  6. जलालुद्दीन अपने स्वभाव से सबको खुश रखना चाहता था, लेकिन उसके युग में यह सम्भव नहीं था. सभी को खुश रखने के चक्कर में वह किसी को भी खुश नहीं रख सका.
जलालुद्दीन की अतिशय उदारता और विनम्रता ने उसकी कब्र खोद दी. वास्तव में जलालुद्दीन इसलिए असफल नहीं हुआ कि उसमें वीरता, योग्यता एवं कुशलता की कमी थी. उसकी असफलता अथवा अयोग्यता उसकी 'शान्तिप्रियता' थी.
> मंगोल आक्रमण और अलाउद्दीन खिलजी की मंगोल नीति
अलाउद्दीन के समय में मंगोलों का पहला आक्रमण 1297-98 ई. में कादर खाँ के नेतृत्व में हुआ. ट्रांसआक्सियाना के शासक दवा खाँ ने एक लाख सैनिक कादर खाँ के नेतृत्व में भेजे थे. कादर खाँ लाहौर तक बढ़ आया और उसने काफी लूटपाट मचाई. अलाउद्दीन खिलजी ने जफर खाँ और उलुग खाँ को कादर खाँ के विरुद भेजा. जालंधर के निकट कादर खाँ की विशाल सेना पराजित हुई. बीस हजार से अधिक मंगोल मारे गए और अनेक स्त्री-बच्चों को बन्दी बनाकर दिल्ली भेज दिया गया.
दवा खाँ के भाई सालदी के नेतृत्व में मंगोलों का दूसरा आक्रमण 1299 ई. में हुआ. उसने सेहवान पर अधिकार कर लिया, परन्तु वह भी जफर खाँ के हाथों पराजित हुआ. इस विजय से जफर खाँ की ख्याति इतनी बढ़ गई कि अलाउद्दीन खिलजी भी उसे खतरा मानने लगा.
तीसरा मंगोल आक्रमण दवा खाँ के पुत्र कुतलग ख्वाजा के नेतृत्व में 1299 ई. के अन्त में हुआ. इस अभियान में 2,00,000 मंगोल सैनिकों ने भाग लिया. कुतलग ख्वाजा वगैर, किसी विरोध का सामना किए दिल्ली तक आ पहुँचा. कुतलग ख्वाजा और अलाउद्दीन खिलजी के बीच कीली के मैदान में युद्ध हुआ. उलुग खाँ और जफर खाँ ने अलाउद्दीन का भरपूर सहयोग दिया. जफर खाँ ने मंगोलों के हौसले पस्त कर दिए पर मारा गया.
चौथा मंगोल आक्रमण तार्दीबेग के नेतृत्व में 1303 ई. में उस समय हुआ जब सुल्तान की अधिकांश सेना विभिन्न अभियानों पर गई हुई थी. अलाउद्दीन ने स्वयं को सीरी के किले में बन्द कर लिया. मंगोलों ने घेरा डाल दिया पर वे उसे जीत न सके और वापस लौट गए.
पाँचवाँ मंगोल आक्रमण 1305 ई. में अलीबेग और तार्तार खाँ के नेतृत्व में हुआ. इस बार मंगोल अमरोहा तक बढ़ आए. इस सेना को मलिक काफूर और गाजी मलिक ने परास्त कर वापस भेज दिया. 1306 ई. में इन्हीं मंगोल सेनापतियों ने पुनः असफल आक्रमण किया.
अलाउद्दीन के समय का अन्तिम मंगोल आक्रमणकारी इकबालमन्द था, परन्तु वह भी असफल रहा.
अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों का डटकर मुकाबला किया और उन्हें कभी सफल नहीं होने दिया.
> मंगोल आक्रमणों का प्रभाव
अलाउद्दीन खिलजी के समय हुए भारत पर मंगोल आक्रमणों का निम्नलिखित प्रभाव पड़ा - 
1. अलाउद्दीन ने मंगोलों के आक्रमण को विफल करने के उद्देश्य से एक विशाल और स्थाई सेना का गठन किया जो सदैव राजधानी में उपस्थित रहती थी. सीमा प्रान्त में नए दुर्गों का निर्माण किया गया तथा पुराने की मरम्मत करवाई गई.
2. मंगोलों के विरुद्ध बड़ी सेना तैयार करने में बहुत अधिक धनराशि की आवश्यकता पड़ी. अतः अलाउद्दीन ने राजस्व कर बढ़ाकर 1/2 कर दिया तथा बाजार नियन्त्रण व्यवस्था को लागू करने के लिए प्रेरित हुआ.
3. मंगोलों से निपटने के बाद अलाउद्दीन अपनी बड़ी सेना की सहायता से उत्तर व दक्षिण भारत के प्रदेशों को जीतने में सफल रहा.
> अलाउद्दीन खिलजी की विजयें :
(I) उत्तर भारत की विजय :
अलाउद्दीन ने 1296 ई. में शासक बनने के बाद सर्वप्रथम उत्तरी भारत के स्वतन्त्र राज्यों को जीतकर अपने राज्य में मिलाया. उसकी ये विजयें निम्नलिखित थीं –
(1) गुजरात - 1299 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सबसे योग्य सेनापतियों नुसरत खाँ एवं ऊलूग खाँ को गुजरात विजय के लिए एक विशाल सेना के साथ भेजा. गुजरात का शासक राजा कर्ण अपनी पुत्री देवल देवी के साथ भागकर दक्षिण में देवगिरी के शासक राजा रामचन्द्र की शरण में चला गया, किन्तु राजा कर्ण की रानी कमला देवी को मुसलमानों ने पकड़ लिया और उसे अलाउद्दीन के हरम में भेज दिया गया. गुजरात आक्रमण के दौरान नुसरत खाँ को मलिक काफूर हाथ लगा जो आगे चलकर अलाउद्दीन के दक्षिण के अभियानों का नायक बना.
(2) रणथम्भौर — रणथम्भौर के सैनिक दृष्टि से महत्व को देखते हुए अलाउद्दीन ने इस दुर्ग पर आक्रमण 1301 ई. में किया. यहाँ के चौहान वंशी शासक राणा हम्मीर ने मुसलमानी सेना से कड़ा संघर्ष किया तथा इसमें अलाउद्दीन का एक अत्यन्त योग्य सेनापति नुसरत खाँ मारा गया. इस सेना का नेतृत्व करने के लिए अलाउद्दीन स्वयं युद्ध क्षेत्र में उपस्थित हुआ तथा हम्मीर के दो मन्त्रियों रणमल और रत्नपाल को अपनी ओर मिलाकर रणथम्भौर पर अधिकार लिया.
(3) चित्तौड़ – चित्तौड़ पर अलाउद्दीन ने राजा रत्नसिंह की अत्यन्त रूपवती रानी पद्मिनी को प्राप्त करने के उद्देश्य से 1303 ई. में आक्रमण किया, परन्तु डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार, अलाउद्दीन का उद्देश्य सम्पूर्ण उत्तरी भारत को जीतना था न कि केवल पद्मिनी को प्राप्त करना.
सुल्तान का उद्देश्य चाहे कुछ भी रहा हो उसने चित्तौड़ को घेर लिया और यह घेरा सात माह तक चलता रहा. इस युद्ध में रत्नसिंह के दो सेनापतियों 'गोरा' व 'बादल' ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया, लेकिन अन्त में जब किले में रसद सामग्री समाप्त हो गई तब अन्तिम युद्ध में राणा पराजित हो गया तथा राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर अपने प्राण त्याग दिए. क्रुद्ध और हताश अलाउद्दीन ने कत्ले आम का आदेश दे दिया जिस पर 30,000 निरअपराध लोग मार दिए गए. अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने पुत्र खिज्रखाँ के नाम पर 'खिज्रबाद' रख दिया तथा उसे यहाँ का शासक नियुक्त कर दिया.
(4) मालवा एवं जालौर – 1305 ई. में अलाउद्दीन ने मुल्तान के गवर्नर एन-उल-मुल्क को मालवा जीतने का आदेश दिया. मालवा का शासक राय महलक देव 1305 ई. में पराजित हो गया और इसी के साथ ही धार, उज्जैन, चंदेरी तथा माण्डू आदि स्थानों पर अलाउद्दीन का अधिकार हो गया.
लगभग 1311 ई. में अलाउद्दीन के सेनापतियों ने जालौर के शासक कान्हड़देव को परास्त कर उस पर अधिकार कर लिया.
इस प्रकार विभिन्न विजयों के फलस्वरूप अलाउद्दीन खिलजी 1299 से 1311 ई. के मध्य सम्पूर्ण उत्तरी भारत को जीतने में सफल रहा.
> अलाउद्दीन खिलजी की विजयें 
(II) दक्षिण भारत की विजय :
उत्तरी भारत विजित करने के बाद अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत को जीतने के लिए अपने योग्य और वीर सेनापति मलिक काफूर को एक विशाल सेना के साथ दक्षिण भेजा. उसके निम्नलिखित दक्षिण अभियान रहे.
(1) देवगिरि–1306 ई. में मलिक काफूर ने देवगिरि पर आक्रमण किया. आक्रमण का प्रमुख कारण वहाँ के शासक रामचन्द्र का सुल्तान को कर देने के वादा करने के बाद भी कर न देना था. इसके अतिरिक्त गुजरात के शासक राजा कर्ण व उसकी पुत्री देवल देवी को उसने शरण दे रखी थी.
इस अभियान में रामचन्द्र ने बिना लड़े ही अपनी हार स्वीकार कर ली तथा हीरे आदि उपहारों के साथ वह दिल्ली गया, जहाँ सुल्तान अलाउद्दीन ने उसका स्वागत किया और ‘राय-रायान' की उपाधि से नवाजा. इसी अभियान में कर्ण की पुत्री देवल देवी को भी पकड़ लिया गया तथा उसका विवाह अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्रखाँ से कर दिया.
(2) वारंगल – 1309 ई. में देवगिरि के बाद मलिक काफूर ने तेलंगाना पर आक्रमण किया. वहाँ के शासक प्रताप रुद्रदेव ने थोड़े प्रतिरोध के बाद आत्मसमर्पण कर दिया. इस अभियान में मलिक काफूर को अतुल धन-सम्पत्ति हाथ लगी जिसे लेकर वह दिल्ली लौट गया.
(3) द्वार समुद्र – 1310 ई. में मलिक काफूर ने देवगिरि व वारंगल की सहायता से इस राज्य पर आक्रमण किया. यहाँ के शासक वीर बल्लाल तृतीय ने वीरतापूर्ण मुकाबला किया, किन्तु पराजित हो गया. उसने मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर अपनी सारी सम्पत्ति मलिक कफूर को समर्पित कर दी तथा वार्षिक कर देने का वायदा किया.
(4) माबर – 1311 ई. में द्वार समुद्र की विजय के बाद मलिक काफूर ने माबर के पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण किया. इस समय वीर पाण्ड्य एवं सुन्दर पाण्ड्य के मध्य गद्दी के लिए संघर्ष चल रहा था फिर भी उन्होंने शत्रुओं से डटकर लोहा लिया और अन्त में वीर पाण्ड्य को वनों में भाग जाना पड़ा. मलिक काफूर ने अब इस प्रदेश पर मनमाने ढंग से अत्याचार किए तथा राजधानी मदुरा को जी भरकर लूटा. इस आकमण में मलिक काफूर को अतुलित धन-सम्पत्ति हाथ लगी और वह दिल्ली लौट गया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि 1306 ई. से लेकर 1312 ई. तक अलाउद्दीन ने समस्त दक्षिण भारत को जीत लिया तथा बहुत धन-सम्पत्ति को प्राप्त किया तथा दक्षिण के राज्य आपसी कलह के कारण अपनी स्वतन्त्रता खो बैठे.
> अलाउद्दीन की दक्षिण नीति : विवेचना
अलाउद्दीन की दक्षिण नीति के सम्बन्ध में निम्नलिखित तीन मत प्रचलित हैं-
1. अमीर खुसरो के अनुसार, अलाउद्दीन दक्षिण भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना चाहता था, इसलिए उसने वहाँ के हिन्दू मन्दिरों को तोड़ा तथा कई स्थानों पर मस्जिदें बनवाईं.
2. डॉ. के. एस. लाल एवं अयंगर के अनुसार, अलाउद्दीन का दक्षिण विजय का उद्देश्य इस्लाम का प्रचार-प्रसार नहीं था, बल्कि वहाँ की धन-सम्पत्ति को लूटना था. उत्तरी भारत में अपनी स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिए उसे धन की भारी आवश्यकता थी.
3. कुछ इतिहासकारों के अनुसार, अलाउद्दीन का उद्देश्य केवल दक्षिण भारत की विजय करना था.
उपर्युक्त तीनोंतों पर विचार करें तो पाते हैं कि उसका दक्षिण में इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना मुख्य उद्देश्य नहीं था, क्योंकि इस कार्य हेतु उसने दक्षिण के राज्यों को जीतने के बाद वहाँ कोई स्थाई प्रबन्ध नहीं किए और न ही उसका दक्षिण को विजित कर अपने राज्य का विस्तार करना था. सम्भवतः वह केवल अपने प्रभुत्व का विस्तार करना चाहता था.
अलाउद्दीन का उद्देश्य चाहे जो कुछ भी रहा हो पर इतना तो स्पष्ट है कि उसने अपने दक्षिण अभियान से बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त की. इससे वह बहुत अधिक धनवान हो गया और इस धन से उसने एक बहुत बड़ी सेना एकत्र कर ली और इस विशाल सेना के खर्च के लिए ही उसने सम्भवतः दक्षिण में लूटपाट प्रारम्भ की और यही उसका मूल उद्देश्य दक्षिण अभियान का था.
> अलाउद्दीन का राजत्व सिद्धान्त
अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का एक महान् शासक था जिसने राजनीति और शासन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी दूरदर्शिता और मौलिकता का प्रदर्शन किया. उसका राजत्व सिद्धान्त (Theory of Kingship) भी उसकी मौलिकता का सुन्दर प्रमाण है. अपनी स्थिति के सुदृढ़ होते ही उसने बलबन के राजत्व सिद्धान्त की पुनः स्थापना की, लेकिन उसका केवल अन्धानुकरण ही नहीं किया, वरन् अपनी खुद की सूझ-बूझ भी प्रदर्शित की.
अलाउद्दीन की प्रथम समस्या थी, हड़पें हुए राजत्व को जनता की दृष्टि में उचित सिद्ध करना, जिससे कि वह वास्तविक राजत्व के समकक्ष हो जाए जिसके लिए जनता में प्रेम, लगाव व भक्ति थी. वह ऐसे राजत्व में विश्वास करता था, जो अपने अस्तित्व द्वारा अपना औचित्य सिद्ध कर सके. ‘अमीर खुसरो' ने अलाउद्दीन के लिए राजत्व का प्रतिपादन किया और अलाउद्दीन को 'ईश्वर की छाया' माना गया, किन्तु वह शरीअत में दिए गए सिद्धान्त पर आधारित नहीं था और न ही उसने इस्लामी सिद्धान्तों का सहारा लिया. वह राजनीति में धन के महत्व को समझता था. उसने अपने अपार धन का प्रयोग जनता का हृदय जीतने में किया अलाउद्दीन ने अपने राजत्व को धर्म के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त करने का प्रयत्न किया.
दिल्ली सल्तनत के इतिहास में प्रथम बार उसने यह घोषणा की कि वह उलेमा वर्ग को राज्य की नीति-निर्धारित करने की आज्ञा नहीं देगा. उसने कहा कि, “धर्माधिकारियों की अपेक्षा मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि राज्य की भलाई के लिए क्या आवश्यक है एवं क्या लाभप्रद है?" उसने कहा कि, "मैं नहीं जानता कि कानून की दृष्टि में क्या उचित है और क्या अनुचित ? मैं राज्य की भलाई के लिए जो उचित समझता हूँ, उसे ही करने की आज्ञा देता हूँ. मैं नहीं जानता कयामत के दिन मेरा क्या होगा." वह जानता था कि, वह उन्हीं सिद्धान्तों पर शासन कर सकता है जिसे हिन्दू जनता स्वीकार करती हो. इसी कारण उसने बलबन की उच्च जातीयतावादी नीति का त्याग कर दिया और योग्यता के आधार पर पदों का वितरण किया. उसने अपनी सत्ता के लिए खलीफा का सहारा नहीं लिया फिर भी उसने सदैव अपने को 'खलीफा का नाइब' कहा. वह केवल सैद्धान्तिक दृष्टि से खिलाफत को जीवित रखना चाहता था. विद्रोहों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए उसने अपनी गुप्तचर व्यवस्था को अत्यन्त कुशल बना दिया. दिल्ली में उसने पूर्णतया शराबबन्दी करवा दी. मिल्क, इनाम तथा वक्फ में दी गई भूमि को जब्त कर लिया तथा अमीरों पर अत्यधिक कर लगा दिया जिससे वे अत्यधिक गरीब हो गए और षड्यन्त्रों के विषय में सोचना बन्द कर दिया. इस प्रकार उसने अपने राज्य को षड्यन्त्र रहित बना दिया.
> अलाउद्दीन खिलजी द्वारा किए गए प्रशासनिक सुधार
अलाउद्दीन खिलजी एक महान् विजेता ही नहीं वरन् एक कुशल शासन-प्रबन्धक भी था. अपने विशाल साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उसने बड़ी कठोरता से शासन किया. साथ ही शासन के प्रत्येक क्षेत्र में उसने कुछ ऐसे सुधार भी किए जिन्हें आगे चलकर शेरशाह व अकबर ने भी अपनाया. उसके द्वारा प्रशासनिक क्षेत्र में भी निम्नलिखित सुधार किए गए -
  1. अलाउद्दीन ने मदिरापान पर प्रतिबन्ध लगा दिया तथा और उसने स्वयं शराब पीना बन्द कर दिया और शराब पीने वालों पर कठोर दण्ड की घोषणा की. चोरी से शराब तैयार करने वालों को अन्धे कुओं में फेंक दिया जाता था.
  2. प्रशासन के क्षेत्र में उसका दूसरा महत्पूर्ण कार्य पूर्व के सुल्तानों द्वारा मिल्क, इनाम एवं वक्फ में दी गई जागीरों को जब्त कर सम्पूर्ण भूमि को खालसा में परिवर्तित कर दिया. इससे राज्य की आय में काफी वृद्धि हुई.
  3. अलाउद्दीन ने राजस्व कर बढ़ाकर 1/2 कर दिया तथा उसने अन्य प्रकार के भी कई कर लगाए जिनसे प्रजा की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई और जनता अपनी आजीविका कमाने के लिए चिन्तित रहने लगी. इससे अलाउद्दीन को लाभ यह हुआ कि, लोगों के मन में विद्रोह की भावना समाप्त हो गई.
  4. अलाउद्दीन ने अमीरों, दरबारियों के आपसी मेल-जोल और सामाजिक दावतों पर प्रतिबन्ध लगा दिए, ताकि उन्हें शासन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने का मौका ही न मिले तथा यह नियम भी बना दिया कि सुल्तान की अनुमति के बिना अमीर व दरबारी न तो आपस में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करें और न ही दावतें दें.
  5. राज्य में विद्रोहों एवं षड्यन्त्रों पर काबू पाने के लिए अलाउद्दीन ने पूरे राज्य में गुप्तचरों का जाल बिछा दिया तथा ये गुप्तचर उसके कर्मचारियों एवं अधिकारियों की प्रत्येक गतिविधियों की जानकारी उस तक पहुँचाते थे.
  6. अलाउद्दीन ने हिन्दुओं के प्रति कठोर नीति का अनुसरण किया. बर्नी लिखता है कि, "सुल्तान ने ऐसी आज्ञाएँ जारी कीं जिनसे हिन्दुओं की बड़ी दुर्दशा हो गई. उनके घरों में सोना-चाँदी नामोनिशान के लिए भी नहीं रहे. हिन्दू मुकद्दम ( ग्राम का मुखिया), खुत (किसान) और चौधरी (राजस्व वसूल करने वाले ) आदि की दशा इतनी खराब हो गई कि उनको अपना गुजारा चलाने के लिए मुस्लिम सरदारों के यहाँ नौकरियाँ करनी पड़ीं.”
इस प्रकार स्पष्ट है कि अलाउद्दीन ने प्रशासन के क्षेत्र में अनेक सुधार किए तथा अपने राज्य को स्थिरता प्रदान की.
> अलाउद्दीन खिलजी के राजस्व सुधार
जियाउद्दीन बरनी ने अलाउद्दीन के राजस्व सुधारों का विस्तृत विवरण दिया है जिससे स्पष्ट होता है कि तुर्की सुल्तानों में अलाउद्दीन ही वह पहला सुल्तान था जिसने वित्तीय और राजस्व सुधारों में गहरी रुचि का प्रदर्शन किया और इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की. उसके द्वारा राजस्व व्यवस्था में अग्रलिखित सुधार किए गए –
  1. अमीरों, प्रशासकीय कर्मचारियों, धर्मशास्त्रियों आदि को दिए गए उन सभी भूमि अनुदानों को अलाउद्दीन ने वापस ले लिया, जोकि राज्य की ओर से उपहार, पुरस्कार या अनुदान के रूप में दिए गए थे. उसने उन सभी अमीरों के साथ कठोरता का व्यवहार किया जो उ अपने पुराने सुल्तान के प्रति वफादार नहीं थे, क्योंकि जब वे पुराने स्वामी का ही साथ न दे सके तो यह सम्भावना थी कि नए स्वामी के साथ भी अवसर आने पर साथ न देते.
  2. सुल्तान ने अधिकांश हिन्दू स्थानीय राजस्व कर्मचारियों, py जैसे—खुत, मुकद्दम, चौधरी आदि की सम्पत्ति जब्त कर ली, क्योंकि ये लोग राजस्व प्रशासन में बिचौलिए का कार्य करते थे और राजस्व का अधिकांश भाग चट कर जाते थे. अलाउद्दीन ने भूमि कर को बढ़ाकर 1/2 कर दिया तथा जमीदारों को छूट व सुविधाएँ देना बन्द कर दिया गया. उसने खेतों की उपज को अपने लगान का आधार बनाया. इसके अतिरिक्त व त दूध देने वाले जानवरों पर ‘चराई कर’ एवं ‘आवास कर' (घरई कर) भी लागू किया.
  3. सुल्तान अलाउद्दीन ने 'दीवान-ए-मुस्तखराज' नामक एक नए विभाग की स्थापना की जो राजस्व एकत्र करने वाले अधिकारियों के नाम बकाया राशि का जाँच करने और उसे वसूल करने का कार्य करता था. रिश्वत लेने वाले पदाधिकारियों चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान, कठोर दण्ड दिया जाता था.
  4. अलाउद्दीन ने राजस्व प्रशासन को संगठित करने के लिए भूमि की पैमाइस करवाई तथा उसके आधार पर करों का निर्धारण किया गया.
  5. राजस्व विभाग की कुशलता को बढ़ाने के लिए अनेक छोटे-बड़े नए अफसरों की नियुक्ति की गई तथा उनका वेतन बढ़ा दिया गया, ताकि वे रिश्वत न ग्रहण करें.
  6. अलाउद्दीन ने यह व्यवस्था कराई कि किसान भू- कर की अदायगी नकद या अनाज के रूप में कर सकें.
  7. राजस्व कर्मचारियों की जाँच के लिए 'शरफकाई' नामक अधिकारी की नियुक्ति की गई.
इन सब व्यवस्था के अतिरिक्त अलाउद्दीन ने गैरमुसलमानों से जजिया कर लिया, खुम्स (युद्ध में लूट का माल) व जकात (केवल मुसलमानों से) भी राज्य के प्रमुख आय के स्रोत थे. दक्षिण के राज्यों से वार्षिक कर लेने की व्यवस्था की गई. राजस्व प्रशासन संगठित करने से अलाउद्दीन को अपनी बड़ी सेना रखने में काफी सहायता मिली और करों की अधिकता ने जनता को निर्धन बना दिया जिससे उसकी विद्रोह करने की शक्ति क्षीण हो गई.
> अलाउद्दीन के आर्थिक सुधार 
अलाउद्दीन खिलजी ने आर्थिक क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण सुधार किए तथा उसके द्वारा किए गए सुधारों में सबसे महत्वपूर्ण सुधार बाजारों पर नियन्त्रण था. उसने आदेश जारी कर बाजार अनाज से लेकर घोड़ों और गाय-बैलों से लेकर गुलामों तथा आयातित कपड़ों के मूल्य को नियन्त्रित करने के लिए तीन बाजारों की स्थापना की. इनमें एक खाद्यान्न के लिए, दूसरा पशुओं एवं गुलामों के लिए व तीसरा आयतित कपड़े के लिए.
खाद्यान्न के मूल्यों का नियन्त्रण मध्ययुगीन शासकों के लिए लगातार चिन्ता का विषय बना रहा, क्योंकि नगरों में सस्ते खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के बिना नागरिकों व सेना का समर्थन, निष्ठा तथा विश्वास प्राप्त नहीं किया जा सकता अतः अलाउद्दीन ने सभी प्रकार के अनाजों के भाव निश्चित अलाउद्दीन के समय में कीमतों का सस्तापन उतने महत्व का कर दिए. इन मूल्यों में कोई भी वृद्धि नहीं की जा सकती थी. था. नहीं है जितना कि बाजार में कीमतों की स्थिरता कीमतें निश्चित करके सुल्तान ने अनाज का बाजार और सरकारी विक्रयालय स्थापित किए. उत्पादन मूल्य उत्पादकों के लागत से बहुत ज्यादा नहीं होता था. इससे व्यापारियों को मुनाफाखोरी का अवसर नहीं मिलता था. उन्हें बाजार में शाहना नामक अधिकारी के पास अपना नाम दर्ज कराना होता था. घुमक्कड़ व्यापारियों के पास अनाज आसानी से उपलब्ध कराने के लिए दोआब और दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों से 50 प्रतिशत भू-राजस्व वसूलने का आदेश दिया. यह सारा उपलब्ध अनाजं बाजार में आता तथा उसे भण्डारगृहों में रखा जाता था. सुल्तान ने कालाबाजार व मुनाफाखोरी पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगा दिया. अकाल के समय इन सरकारी भण्डारों का अनाज जनता में वितरित किया जाता था.
‘सराय-ए-अदल' निर्मित वस्तुओं तथा बाहर के प्रदेशों से आने वाले माल का बाजार था. विशेष रूप से यह सरकारी सहायता से चलने वाला बाजार था. व्यापारियों द्वारा लाई गई प्रत्येक वस्तु 'सराय-ए-अदल' में ही रखी जाती थी. अलाउद्दीन ने कपड़ा व्यापारियों को खाद्यान्न व्यापारियों की अपेक्षा अधिक महत्व दिया. दिल्ली में व्यापार करने वाले व्यापारी को एक निश्चित मात्रा में माल लाकर सराय-ए-अदल में लाकर बेचने के इकरारनामे पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे. सुलतान ने राजकीय कोष से मुल्तानी व्यापारियों को अग्रिम धन दिया जिससे वे अन्यत्र माल खरीदकर सराय-ए-अदल में बेच सकें. 'परवाना नवीस' बहुमूल्य वस्त्रों की खरीद के लिए प्रतिष्ठित व्यक्तियों को ही परमिट देता था जिससे कोई साधारण व्यक्ति उत्तम श्रेणी का कपड़ा 'सराय-ए-अदल' से सस्ते भाव में खरीदकर चौगुने मूल्य पर न बेच सके.
इसी प्रकार अलाउद्दीन ने पशुओं और दासों की भी कीमतें निर्धारित कर दीं. विभिन्न श्रेणी के पशुओं और दासों की कीमतें भिन्न-भिन्न थीं तथा घोड़ों की कीमत निर्धारित कर उसने दलालों को कठोर दण्ड दिया.
मूल्य नियन्त्रण सम्बन्धी आदेशों के उल्लंघन पर कठोर दण्ड-व्यवस्था की गई, किन्तु फिर भी व्यापारी ग्राहकों को ठगते एवं छलते थे, खोटे बाँट रखते थे और अच्छी किस्म की वस्तुएँ अलग रखते थे. परिणामतः अलाउद्दीन अपने छोटे गुलाम लड़कों को वस्तुएँ खरीदने भेजता था. इस सामान की जाँच कर दोषी व्यापारी को दण्ड दिया जाता था. यदि वह कम तौलता था तो उसकी क्षतिपूर्ति उसके मांस को काटकर की जाती थी.
इस प्रकार अलाउद्दीन की कठोर नियन्त्रण प्रणाली ने, बाजार व्यवस्था को अलाउद्दीन के जीवनकाल में असफल नहीं होने दिया.
> अलाउद्दीन की बाजार नियन्त्रण व्यवस्था के सफल होने के कारण
अलाउद्दीन की आर्थिक सुधार योजना निम्नलिखित कारणों से सफल हुई—
  1. सम्पूर्ण योजना को सुचारु ढंग से संगठित किया गया. वस्तुओं की दरों को नियत कर दिया गया और साथ ही उनकी उपलब्धता को निरन्तर बनाए रखा गया.
  2. अनाज के भण्डारण हेतु राजधानी दिल्ली में बड़े-बड़े सरकारी गोदाम बनवाए गए जिसमें हजारों मन अनाज एकत्र रहता था.
  3. अकाल के समय राशनिंग की व्यवस्था की गई.
  4. कर्मचारी वर्ग की कार्यकुशलता एवं ईमानदारी का पूरा ध्यान रखा गया तथा अपराधी पाए जाने पर उन्हें उचित दण्ड दिया गया.
  5. सरकारी कर्मचारियों को पर्याप्त अधिकार दिए गए, ताकि वे अधिक कार्यकुशल बन सकें.
  6. अलाउद्दीन ने स्वयं भी बाजारों एवं मण्डियों के भावों की निगरानी रखी. उसने ऐसी व्यवस्था की कि उसके खुद के नौकरों तथा सरकारी विभाग द्वारा उसे नियमित रूप से जानकारी मिलती रहे.
> अलाउद्दीन के आर्थिक सुधारों का मूल्यांकन 
अलाउद्दीन ने जो आर्थिक सुधार लागू किए वे कुछ मायने में तो राज्य के लिए अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए एवं कहीं वे बहुत अधिक हानिप्रद भी रहे जो अन्त में खिलजी साम्राज्यवाद के लिए घातक बने. इस व्यवस्था के गुण-दोष निम्नलिखित हैं-
गुण : 
  1. अलाउद्दीन के पास विशाल स्थाई सेना थी. अलाउद्दीन अपने आर्थिक सुधारों की वजह से राजकोष पर बिना अतिरिक्त बोझ डाले ही ही इस का खर्चा चलाने में सन सफल रहा.
  2. दिल्ली और आस-पास के लोगों को वस्तुएँ सस्ते दामों पर प्राप्त होने लगीं.
  3. जिन पदाधिकारियों के वेतन घटाए नहीं गए थे उन्हें वस्तुओं के सस्ती होने से काफी सुविधाएँ मिल गईं. 
  4. व्यापार चलाने के लिए राज्य की ओर से पेशगी के रुपए उधार दिए जाने से मुल्तानी व्यापारियों तथा अन्य सौदागरों को काफ़ी लाभ मिला.
दोष :
अलाउद्दीन के आर्थिक सुधारों से कुल मिलाकर हानियाँ और परेशानियाँ ही अधिक हुई –
  1. जन-साधारण पर आर्थिक सुधारों का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा. किसानों, कारीगरों, व्यापारियों, दस्तकारों आदि को सरकार के हाथ अपना माल बहुत कम कीमत पर बेचने के लिए बाध्य होना पड़ा. 
  2. आर्थिक सुधार मूल रूप से सैनिकों के लिए किए गए थे जितनी कीमतें कम की गईं थी उसी मात्रा में सैनिकों के वेतन में कमी कर दी गई थी.
  3. इन आर्थिक सुधारों के कारण व्यापारी वर्ग में असन्तोष पनपा. वे न तो माल जमा कर सकते थे और न ही वस्तुओं को निश्चित भाव से अधिक पर बेच सकते थे. उनका नाम सरकारी अधिकारियों के पास दर्ज रहता था और वे छोटे-छोटे अपराधों पर या मामूली भूलों पर कठोर दण्ड पाते थे.
  4. दिल्ली में वस्तुओं की कीमत में और बाहर की कीमत में भारी अन्तर होने की वजह से व्यापारियों ने दिल्ली में माल लाना बन्द कर दिया. इसके अलावा अतिरिक्त अच्छी व बहुमूल्य वस्तुएँ सुगमता से प्राप्त नहीं हो पाती थीं.
  5. किसानों की अवस्था तो बहुत ही दयनीय बन गई. उन्हें उपज का आधा भाग सरकार को भूमि कर के रूप में देना पड़ता था और शेष में से अपने गुजारे लायक बचाकर बाकी सब निश्चित सस्ती दरों पर बेचना पड़ता था. इस प्रकार उन्हें अपने परिश्रम का फल नहीं मिल पाता था. 
इस प्रकार स्पष्ट है कि अलाउद्दीन की आर्थिक सुधार योजना तथा मूल्य-नियन्त्रण नीति कुल मिलाकर बहुत अधिक सन्तोषजनक नहीं थी. डॉ. पी. सरन के अनुसार, उसकी आर्थिक नीति एक गम्भीर और आवश्यक राजनीतिक परिस्थिति का परिगाम थी. 
> खिलजी वंश के पतन के कारण
जलालुद्दीन खिलजी और अलाउद्दीन खिलजी ने तलवार के बल पर ही राजगद्दी हासिल की थी और तलवार के द्वारा ही उनके वंश का अन्त हुआ. मुख्यतः अलाउद्दीन ने शक्ति और आतंक के बल पर शासन किया था और शक्ति के आधार पर ही उस साम्राज्य की सुरक्षा सम्भव हो सकी. उसके शासन के दौरान सरदान और नागरिक भयभीत होने के साथ असन्तुष्ट भी थे. इस कारण स्थायित्व के तत्वों का सर्वथा अभाव था. कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी में अलाउद्दीन खिलजी जैसी योग्यता न थी. अतः वह असन्तुष्ट सरदारों एवं नागरिकों पर नियन्त्रण न रख सका. सत्ता के प्रति प्रेम, वफादारी और श्रद्धा उत्पन्न करना शासक का परम कर्तव्य होता है जिसे अलाउद्दीन खिलजी पूर्ण न कर सका. जिसका खामियाजा उसके उत्तराधिकारियों को भुगतना पड़ा. उसने वे सभी कार्य किए जिससे जनता में असन्तोष बढ़ता. अतएव कहा जा सकता है कि अलाउद्दीन की प्रशासनिक नीतियाँ खिलजी साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण थीं. इसके अतिरिक्त खिलजी की अयोग्यता और उसके दुर्गुणों ने भी पतन को गति प्रदान की.
> गियासुद्दीन की प्रशासनिक नीति
गियासुद्दीन ने सत्ता हथियाने के बाद नस्ल के आधार पर तुर्की अमीरों का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया और उसमें सफलता भी प्राप्त की. उसने खुसरव के समर्थकों को भी पदों पर रहने दिया, ताकि वे भी सन्तुष्ट रहें. उसने अलाउद्दीन खिलजी के वंश की लड़कियों के विवाह तो कराए, लेकिन अनेक खिलजी सरदारों से उनकी जागीरें छीन लीं. उन्हें सरकारी पदों से हटा दिया. अलाउद्दीन खिलजी ने जिन व्यक्तियों की जागीरें छीन ली थीं उन्हें उसने वापस कर दिया. इस प्रकार उसने उदारता और कठोरता की नीति का समन्वय करते हुए सभी नागरिकों और सरदारों को सन्तुष्ट करने का प्रयास किया. गियासुद्दीन ने खुसराव द्वारा अनावश्यक रूप से वितरित किए गए धन को वापस लेने का प्रयास किया, लेकिन निजामुद्दीन औलिया से वह धन वापस न ले सका.
उसने किसानों से लगान के रूप में उपन का 1/5 से 1/3 भाग लेना शुरू कर दिया. इसके अतिरिक्त उसने आदेश दिए कि एक वर्ष में एक इक्ता के राजस्व में 1/11 या 1/10 से अधिक वृद्धि न की जाए. पुराने हिन्दू लगान अधिकारियों को उनके विशेषाधिकार पुनः दे दिए गए. सरकारी कर्मचारियों को करमुक्त जागीरें दी गईं. उसने नस्क और बटाई प्रथा को जारी रखा. उसने कर्मचारियों को निर्देश दे रखा था कि किसानों को परेशान न किया जाए. अगर कोई कर्मचारी ऐसा करता पाया जाता, तो उसे दण्डित किया जाता था. अपनी इस नीति से गियासुद्दीन ने किसानों, लगान अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों को सन्तुष्ट कर राज्य में स्थिरता का वातावरण तैयार किया, जिसके फलस्वरूप राज्य का उत्पादन बढ़ा और समृद्धि बढ़ी. 
गियासुद्दीन ने पुलों एव नहरों का निर्माण करवाया, न्याय एवं सैन्य व्यवस्था को दुरुस्त कर साम्राज्य को सुरक्षित बनाया.
> मुहम्मद तुगलक का चरित्र दो विरोधी तत्वों का मिश्रण था : विवेचना
मध्यकाल में दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में मुहम्मद तुगलक निःसन्देह एक विशिष्ट एवं विचित्र व्यक्ति था. उसका चरित्र, व्यक्तित्व और कृतित्व असाधारण किन्तु विरोधाभासों से इतना परिपूर्ण था कि इतिहास में उसका स्थान निर्धारण करना एक कठिन कार्य है. उसके कार्यों को देखकर इतिहासकारों ने उसे पागल तक कहने में संकोच नहीं किया है. बरनी लिखता है कि, “ईश्वर ने सुल्तान मुहम्मद को एक अद्भुत जीव बनाया था. उसके विरोधाभासों एवं योग्यताओं को समझना आलिमों एवं बुद्धिमानों के लिए सम्भव नहीं है. उसे देखकर बुद्धि चकरा जाती है और उसके गुणों का अवलोकन कर चकित तथा स्तब्ध रह जाना पड़ता है.” वस्तुतः उसके साथ कुछ मौलिक गुण थे और साथ ही हमें उसमें अनेक दोष भी नजर आते हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है - 
मुहम्मद तुगलक अपने समय का प्रकाण्ड विद्वान था, उसमें योग्यता, सूझ-बूझ, बुद्धिमता, दानशीलता आदि अनेक उच्चकोटि के मानवीय गुण विद्यमान थे. वह गणित, ज्योतिष, भूगोल, चिकित्साशास्त्र एवं शरियत का ज्ञाता था.
मुहम्मद तुगलक लिखने एवं बोलने दोनों में दक्ष था. उसकी बुद्धि कुशाग्र, स्मरण शक्ति आश्चर्यजनक थी और वह असीम ज्ञान-पिपासु था, उसके विचार एवं जीवन स्तर बहुत ऊँचे थे. वह सामान्य व्यसनों से मुक्त था तथा स्वभाव से अत्यन्त विनम्र था.
मुहम्मद तुगलक अपने व्यक्तिगत जीवन में एक आस्थावान मुसलमान था तथा 5 बार नमाज पढ़ता था, लेकिन वह अन्धविश्वासी नहीं था. वह नियमों को अपने तर्क की कसौटी पर कसता था. वह उलेमा वर्ग की रूढ़िवादी व्यवस्था का विरोधी था. उसका नैतिक आचरण अनुकरणीय था. उसने एक से अधिक विवाह भी नहीं किया था. यह हिन्दुओं के प्रति अन्य सुल्तानों की अपेक्षा अधिक सहिष्णु था.
मुहम्मद तुगलक में अत्यधिक मौलिकता थी. नूतनता का वह पुजारी था. अतः नई-नई योजनाएँ बनाने और नए-नए कार्यों को जल्दी से पूरा कर देने में वह व्यावहारिकता की उपेक्षा कर देता था. सुल्तान ने प्रशासकीय, आर्थिक और सैनिक सभी क्षेत्रों में अभिनव प्रयोग किए, पर उसे यश न मिल सका, यह उसका दुर्भाग्य ही था कि उस जैसे प्रतिभाशाली मौलिक विचारों के धनी और ज्ञानी तथा अनुभवी शासक को लोगों ने ‘महान्' व की अपेक्षा ‘पागल’ कहा.
जो सुल्तान दया और उदारता की प्रतिमूर्ति था, सनक में आने पर वह मनुष्य के खून का प्यासा हो जाता था. उसके क्रोध से न तो मुसलमान बचता था और न ही हिन्दू. कोई कह नहीं सकता था कि उसका क्रोध कब भड़क उठेगा एक बार उसने 350 मनुष्यों की हत्या कराई.
वह एक विद्वान होते हुए भी बहुत अधिक घमण्डी था. उसमें दूरदर्शिता का अभाव था. उसका अहंकार इतना अधिक था कि वह विश्व-विजय का स्वप्न देखा करता था. उसमें व्यावहारिक ज्ञान की इतनी कमी थी कि वह किसी क्षेत्र में भी सफल नहीं हो सका. वह ऊँचे-से-ऊँचे सिद्धान्तों एवं कल्पनाओं में डूबा रहता था. लेनपूल ने लिखा है कि “मुहम्मद तुगलक के बहुत अधिक अच्छे विचार और इरादे होते हुए भी उसमें धैर्य की कमी थी. उसकी योजनाएँ सिद्धान्त रूप में ठोस होती थीं और कभी-कभी राजनीतिक सूझ भी होती थी, पर वे योजनाएँ अव्यावहारिक सिद्ध हुईं जिससे प्रजा व राज्य पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ा. यह सब कुछ सुल्तान की चारित्रिक कमियों के कारण हुआ. अपनी नीतियों की असफलता से वह क्रोधी एवं चिड़चिड़ा हो गया तथा अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठा तथा एक गड़बड़ी के बाद दूसरी गड़बड़ी करता चला गया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि मुहम्मद तुगलक गुणों एवं अवगुणों का पुंज था. वास्तव में उसमें विरोधी गुण एक साथ भरे थे. वह एक ऐसा बादशाह था जिसकी अस्थिर प्रकृति के कारण उसके गुण-अवगुण में बदल जाते थे. इसलिए वह अपने समकालीन व्यक्तियों में अबूझ पहेली ही बना रहा. वास्तव में वह समय से पूर्व पैदा हुआ था.
> मुहम्मद तुगलक और उसकी योजनाएँ
मुहम्मद तुगलक ने अपने शासन प्रारम्भिक 10 वर्षों में प्रजा की खुशहाली के लिए अनेक योजनाओं का निर्माण किया, परन्तु व्यावहारिकता की कमी के कारण उसकी सारी योजनाएँ असफल हो गईं और उसे आलोचना का शिकार होना पड़ा. उसकी योजनाएँ निम्नलिखित थीं-
(1) दोआब में कर वृद्धि - मुहम्मद तुगलक ने अपने राज्यारोहण के समय प्रचुर मात्रा में धन लुटाकर राजकोष, जोकि पहले से ही लगभग खाली था और खाली कर दिया तथा जनकल्याण को देखते हुए और अधिक धन की आवश्यकता थी. अतः 1330 ई. में दोआब के अत्यन्त ही उपजाऊ क्षेत्र में भूमिकर पहले की अपेक्षा दोगुना कर दिया.
जिस समय मुहम्मद तुगलक ने इस क्षेत्र में कर बढ़ाया उसी समय दुर्भाग्य से इस इलाके में अकाल पड़ गया तथा उस वर्ष कोई भी फसल नहीं हुई इस पर तुगलक के अधिकारियों ने बड़ी ही कठोरता से करों की वसूली की तथा किसानों की दशा इतनी शोचनीय हो गई वे खेत छोड़कर वनों में भाग गये. इससे देश की कृषि को अधिक बहुत आघात लगा.
कुछ समय बाद जब सुल्तान को स्थिति का ज्ञान हुआ तो उसने बढ़ाए गए कर वापस ले लिए. इतना ही नहीं उसने जनता की सहायता के लिए ऋण, निःशुल्क भोजन, कुओं, तालाबों एवं नहरों आदि का निर्माण करवाया, लेकिन इतने प्रयत्नों के बावजूद भी दोआब पहले जैसा आबाद नहीं हो सका.
(2) कृषि विभाग ( दीवान-ए-कोही) की स्थापना – मुहम्मद तुगलक का दूसरा महत्वपूर्ण प्रयोग कृषि विभाग की स्थापना था. इसे स्थापित करने का उद्देश्य यह था कि राज्य की ओर से सीधी सहायता देकर कृषि योग्य भूमि का विस्तार किया जाए. इस कार्य हेतु 60 वर्ग मील भूमि का चुनाव किया गया तथा इसमें बारी-बारी से फसलें उगाई गईं तथा दो वर्ष तक इस क्षेत्र के लिए राजकोष से भारी धनराशि प्रदान की गई, लेकिन निम्नलिखित कारणों से यह प्रयोग असफल सिद्ध हो गया -
(A) कृषि के लिए जिस भूमि का चुनाव किया गया वह उपजाऊ नहीं थी.
(B) सुल्तान स्वयं इस ओर ध्यान न दे सका फलस्वरूप कर्मचारियों ने अपनी मनमानी की.
(C) यह प्रयोग केवल तीन वर्ष तक के लिए चलाया गया तथा इतनी कम अवधि में आशा के अनुरूप परिणाम नहीं निकल सका.
(D) राज-कर्मचारियों द्वारा राजकोषीय धन के दुरुपयोग के कारण भी यह योजना असफल रही.
डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव के अनुसार, “राजस्वव्यवस्था इतिहास का सर्वाधिक विफल प्रयोग रहा और इसे त्याग देना पड़ा. " 
(3) राजधानी परिवर्तन – 1327 ई. में मुहम्मद तुगलक ने निम्नलिखित कारणों से अपनी राजधानी दिल्ली के स्थान पर दक्षिण के नगर देवगिरि बनाने का निश्चय किया - 
(A) बरनी के अनुसार, "देवगिरि दिल्ली की अपेक्षा साम्राज्य के केन्द्रीय स्थान पर था और वहाँ से विशाल साम्राज्य का शासन करना अधिक सुगम था.
(B) मुहम्मद तुगलक ने अपनी राजधानी को मंगोलों के हमलों से बचाने के लिए देवगिरि (दौलताबाद) को बनाया.
(C) डॉ. पी. सरन के अनुसार, राजधानी, परिवर्तन का वास्तविक कारण यह था कि वह उत्तर भारत के समान ही दक्षिण भारत में अपना शासन चलाना चाहता था.
(D) इब्नबतूता के अनुसार, सुल्तान प्रजा से रुष्ट हो गया था, क्योंकि उसकी प्रजा ने गुप्त-पत्रों के माध्यम से उसे गालियाँ भेजी थीं. अतः वह दिल्ली को नष्ट करने के बाद अपनी राजधानी दौलताबाद ले गया.
सुल्तान ने राजधानी परिवर्तन के आदेश दिए तथा मार्ग में जनता की सुविधा के लिए बहुत से इन्तजाम किए गए, लेकिन फिर भी जनता को अपार कष्टों का सामना करना पड़ा. बादशाह जब दक्षिण में रहने लगा तब उत्तर में प्रशासन शिथिल हो गया. अतः सुल्तान ने वापस नागरिकों को दिल्ली लौटने का आदेश दिया और लोगों को पुनः विषम कठिनाइयों का सामना करना पड़ा तथा राजकोष का विपुल धन बर्बाद हुआ और उसकी यह योजना पूर्णतया असफल हो गई.
(4) सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन 
मुहम्मद तुगलक ने 1330 ई. में अपने राज्य में पीतल व ताँबे के सिक्के जारी किए, जिसके कारण निम्नलिखित थे
(A) बरनी के अनुसार, सुल्तान ने राजकोष की हानि को पूरा करने और व्यापार को पुनः व्यवस्थित तथा उन्नत बनाने के लिए सांकेतिक मुद्रा चलाई.
(B) सुल्तान को नए-नए प्रयोग करने का बहुत अधिक शौक था और भारतीय मुद्रा इतिहास में एक नया अध्याय आरम्भ करने के उद्देश्य से ही उसने ताँबे के सिक्के चलाए.
(C) मुहम्मद तुगलक ने चीनी व ईरानी शासकों से प्रेरणा लेकर अपने यहाँ भी सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन किया. 
मुहम्मद तुगलक की यह योजना पूर्णतः असफल हो गई तथापि उसे सैद्धांतिक रूप से निराधार कहना गलत होगा. डॉ. मेंहदी हुसैन के अनुसार, सुल्तान का प्रयोग सामूहिक रूप से अच्छा था और राजनीतिज्ञपूर्ण था, परन्तु उसने इसे कार्यरूप देने में बहुत बड़ी गलती की. ताँबे के सिक्के चलाने से पूर्व टकसाल पर राज्य का एकाधिकार स्थापित करना चाहिए था और प्रचलित ताँबे के सिक्कों को राजकोष में जमा कर लेना चाहिए था, परन्तु सुल्तान ने ऐसा नहीं किया. जनता अपने पिछड़ेपन, अज्ञान और द्वेषभाव के कारण इस योजना के महत्व को न समझ सकी और उसकी यह योजना असफल हो गई.
सुल्तान की सबसे बड़ी भूल यह थी कि वह अपने युग की परिस्थितियों एवं कमियों को न समझ सका. इन परिस्थितियों में यह स्वभाविक था कि, उसकी योजनाएँ असफल हो गईं और उसे भयंकर निराशा का सामना करना पड़ा.
> क्या फिरोज तुगलक साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी था ?
अनेक इतिहासकार फिरोज तुगलक द्वारा अपनाई गई नीतियों को तुगलक साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी मानते हैं तथा इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं - 
  1. फिरोज तुगलक ने साम्राज्य के अमीरों और सरदारों के प्रति अत्यधिक उदार नीति का अनुसरण किया. इससे अमीरों की क्षमतां, कुशलता एवं स्वामिभक्ति पर विपरीत असर पड़ा तथा वे अपने हितों की खातिर साम्राज्य के हितों का बलिदान करने लगे. साम्राज्य की सैनिक शक्ति पर इसका विशेष रूप से बुरा प्रभाव पड़ा.
  2. फिरोज तुगलक ने उलेमा वर्ग को अत्यधिक महत्व प्रदान किया. इससे प्रशासन में उलेमा वर्ग का हस्तक्षेप बहुत अधिक बढ़ गया. इससे सल्तनत में धार्मिक कट्टरता और पक्षपात बहुत अधिक बढ़ गए. 
  3. फिरोज तुगलक एक धर्मान्ध व्यक्ति था. उसने हिन्दुओं और गैर-सुन्नी जनता पर अत्यधिक अत्याचार किए जो अन्त में उसके साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुए.
  4. पूर्व के सभी सुल्तानों ने अपने राज्य में वजीर के महत्व को अधिक बढ़ने नहीं दिया, लेकिन फिरोज ने अपने वजीर मकबूल और बाद में उसके पुत्र जूनाशाह को असीमित अधिकार प्रदान कर दिए. फलस्वरूप इन्होंने अपने को शक्तिशाली बनाने के लिए महत्वपूर्ण पदों पर अपने समर्थकों की नियुक्ति की.
  5. फिरोज तुगलक को दासों को रखने का बहुत अधिक शौक था. इसलिए उसने दासों के विभाग 'दिवान-ए-बंदागान' की स्थापना की. जिस दास प्रथा को बलबन ने समाप्त कर दिया था उसी प्रथा को फिरोज ने सबल बनाकर गुलामों और दासों का एक ऐसा वर्ग पैदा कर दिया जो केवल अपने ही हितों की चिन्ता करने लगा और साम्राज्य के हितों के प्रति या उसी प्रया बेखबर हो गया.
  6. अपनी उदार व्यवस्था के कारण फिरोज अपनी सैन्य व्यवस्था को सुदृढ़ नहीं रख सका. सैनिकों की भर्ती में भी सुल्तान ने पैतृक अधिकार को मान्यता दे दी जिसके फलस्वरूप योग्य और युद्ध निपुण पिता के निर्बल पुत्र भी सेना में स्थान पाने लगे तथा फिरोज ने स्थाई सेना रखने की परम्परा को भी त्याग दिया. उसने अपने सैनिकों एवं पदाधिकारियों में जागीरों का पुनः वितरण कर दिया."
स्पष्ट है कि फिरोज की शिथिल और दुर्बल सैन्य नीति ने सल्तनत की सैनिक शक्ति को गहरा आघात पहुँचाया तथा सुल्तान की आवश्यकता से अधिक उदारता की नीति ने सैनिक शक्ति को निष्क्रिय बनाकर सल्तनत के विनाश को अवश्यम्भावी बना दिया.
> फिरोज तुगलक द्वारा किए गए प्रशासनिक सुधार कार्य : मूल्यांकन
यद्यपि फिरोज को तुगलक साम्राज्य के पतन के लिए जिम्मेदार माना जाता है, किन्तु उसके द्वारा किए गए सुधार इन सबसे महत्वपूर्ण हैं. उसके द्वारा किए गए सुधार कार्य जनता तथा राज्य की समृद्धि, सुख तथा शान्ति से सम्बन्धित थे.
फिरोज ने राजस्व सम्बन्धी अनेक सुधार किए, जिसमें ‘तकावी ऋण' समाप्त करना, अफसरों के वेतन बढ़ाना तथा राज्य की आय-व्यय का चिट्ठा तैयार करवाना मुख्य थे. फिरोज ने 24 प्रकार के विभिन्न करों को समाप्त कर दिया. उसके द्वारा शरीअत के अनुसार, केवल चार कर 'जजिया, जकात, खम्स और खिराज' ही लागू किए गए. फिरोज ने 'खम्स' में राज्य का हिस्सा 4/5 से घटाकर 1/5 कर दिया. उसकी एक अन्य उपलब्धि थी— आन्तरिक व्यापार को कर मुक्त करना जिससे राज्य में व्यापार का पर्याप्त विकास हो सका. उसने राज्य की नहरों से सिंचाई सुविधा प्राप्त करने पर 'सिंचाई शुल्क' लागू किया.
सुल्तान ने कृषि की उन्नति के लिए 5 नहरों का निर्माण करवाया. ये नहरें यमुना से हिसार तक, सिरमौर से हाँसी तक, यमुना से फिरोजाबाद, सतलज से घग्घर तक व सतलज से फिरोजाबाद तक बनवाई थीं. इनके अतिरिक्त वह फिरोजपुर, जौनपुर, हिसार, फिरोजशाह का कोटला, फरीदाबाद आदि शहरों को बसाने वाला था तथा सौ पुलों, 200 सरायों, तीस महलों, सौ कब्रों, चार मस्जिदों तथा दस समाधियों का निर्माता भी था. उसने 1200 बाग लगवाए जिनसे 1,80,000 टका वार्षिक आय होती थी.
वह शरा के अनुसार न्याय करता था तथा इसी उद्देश्य से उसने एक मुख्य काजी व प्रान्तों में सहायक काजियों की नियुक्ति की. साथ ही उसने दण्ड की कठोरता में कमी कर दी तथा मानवता के प्रति दया का प्रदर्शन किया. उसने एक रोजगार दफ्तर, एक चिकित्सा विभाग (दारुलसफा) तथा एक 'दिवाने खैरात' नामक विभागों की स्थापना की तथा दासों तक के लिए पृथक् विभाग खोला व उन्हें भी रोजगार प्रदान किए.
सुल्तान स्वयं विद्वान तथा विद्वानों का आश्रयदाता था. 'बरनी' तथा 'सिराज उसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे. बरनी ने उसी के संरक्षण में तारीख-ए-फिरोजशाही एवं 'फतवा-ए-जहाँदारी' की रचना की. सुल्तान ने स्वयं अपनी आत्मकथा 'फूतूहात-ए-फिरोजशाही' लिखी. कांगड़ा विजय में प्राप्त संस्कृत के ग्रन्थों का फारसी में 'दलायसे फिरोजशाही' के नाम से अनुवाद करवाया.
किन्तु इन सारे सुधारों के बावजूद भी उसके द्वारा सेना को वंशानुगत बनाना, जागीरें देना, जजिया कर लगाना, उलेमा वर्ग का राजनीति में प्रभाव बढ़ाना उसे तुगलक साम्राज्य के पतन के लिए जिम्मेदार बना देता है.
> भारत पर तुगलक वंश के समय तैमूर के आक्रमण के कारण
तैमूर ने भारत पर आक्रमण करने से पूर्व अपने सरदारों से कहा कि, “मैं वहाँ के (भारत के) काफिरों को तलवार के घाट उतारकर मुस्लिम सिपाहियों को 'गाजी' की उपाधि प्रदान करना चाहता हूँ.” इसके अतिरिक्त तैमूर के भारत पर आक्रमण करने के निम्नलिखित कारण थे
  1. तैमूर एक महात्वाकांक्षी लुटेरा था जो अपने को भारत विजेता का गौरव प्रदान करना चाहता था.
  2. तैमूर ने जब भारत पर आक्रमण किया उस समय भारत में सर्वत्र कुव्यवस्था और भ्रष्टाचार का बोलबाला था तथा भारत की राजनैतिक स्थिति बड़ी सोचनीय थी. तैमूर के आक्रमण के लिए भारत की परिस्थितियाँ अनुकूल थीं.
  3. तैमूर भारत की धन सम्पदा से भली-भाँति अवगत था. उसने अतीत के आक्रमणकारियों द्वारा भारत की महान् लूट के वर्णन सुने थे. अतः वह भी इस सोने की चिड़िया को लूटने को लालायित हो गया.
  4. तैमूर ने इस्लाम का प्रचार एवं मूर्तिपूजक हिन्दुओं को नष्ट करने का अन्तिम बहाना किया तथा वह अपने इस कार्य से 'गाजी' की उपाधि पाने की लालसा लिए हुए था.
> तैमूर के भारत पर आक्रमण के निम्नलिखित प्रभाव पड़े
  1. तैमूर के आकमण से सर्वत्र अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई तथा दिल्ली सल्तनत का शासन छिन्नभिन्न हो गया. प्रान्तीय शासक अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतन्त्र हो गए.
  2. तैमूर के आक्रमण से तुगलक वंश का पतन हो गया.
  3. इस आक्रमण से सारा देश भीषण बर्बादी की आग में जलने लगा. देश की आर्थिक स्थिति को बड़ा धक्का लगा तथा जनता कंगाल हो गई. लाखों लोगों की हत्या किए जाने से सारा देश भय एवं शोक में डूब गया. चारों तरफ लाशों के सड़ने से महामारी एवं अन्य बीमारियाँ फैल गईं.
  4. पंजाब प्रान्त दिल्ली सल्तनत के हाथों से निकल गया और खिज्रखाँ वहाँ का शासक बना जो बाद में सैयद वंश का संस्थापक बना.
  5. इस आक्रमण से भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों में और भी अधिक द्वेष बढ़ गया.
  6. तैमूर भारतीय कलाकारों को अपने साथ समरकन्द ले गया जिन्होंने उसे एक अत्यन्त सुन्दर नगर बना दिया. इस प्रकार से भारत व मध्य एशिया की कला का सम्मिश्रण हुआ.
तैमूर के आक्रमण के प्रभाव भारत पर अस्थायी ही पड़े, क्योंकि वह जिस गति से भारत आया उसी गति से इसे लूट कर चला गया.
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Sun, 08 Oct 2023 07:59:40 +0530 Jaankari Rakho
मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत https://m.jaankarirakho.com/411 https://m.jaankarirakho.com/411 मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत

> मध्यकालीन इतिहास पर प्रकाश डालने वाले ग्रन्थ 
(1) ताजुल-मासिर — इस ग्रन्थ के रचयिता हसन निजामी हैं. इस ग्रन्थ में तत्कालीन 11वीं व 12वीं सदी के भारत का वर्णन किया गया है. इसमें तत्कालीन प्रशासन का भी विस्तृत विवरण मिलता है. यद्यपि इस ग्रन्थ की शैली अलंकृत है, किन्तु इसमें सत्य के अंश पर्याप्त मात्रा में हैं. इस ग्रन्थ में मुख्य रूप से युद्ध तथा युद्ध नीति का ही विवरण दिया गया है, परन्तु सामाजिक दशा का भी विवरण इसमें दिया गया है. सामाजिक जीवन से सम्बन्धित खेलों, मनोरंजन के साधनों आदि का भी इसमें विस्तृत विवरण है.
(2) तारीखे फखरुद्दीन मुबारक शाह–इस महत्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना फखरुद्दीन मुबारकशाह उर्फ फखरे मदव्वीर ने की, लेखक का गुलाम वंश के राजदरबार से घनिष्ठ सम्बन्ध था. इसने अपना अधिकांश समय कुतुबुद्दीन ऐबक के दरबार में बिताया और उस समय का आँखों देखा हाल इसने अपनी कृति में लिखा है. यद्यपि इस ग्रन्थ में सामान्यजनों की उपेक्षा की गई है और केवल शासकों का ही वर्णन किया गया है, परन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण रचना है.
(3) तबकाते नासिरी – इस महत्वपूर्ण कृति के रचनाकार मिनहाजुद्दीन सिराज हैं. लेखक ने स्वयं गौर वंश का उत्थान एवं पंतन देखा था. इस पर इल्तुतमिश, रजिया एवं नासिरुद्दीन की कृपा रही. इसलिए इसके ग्रन्थ में नासिरुद्दीन के शासनकाल के प्रारम्भ के वर्षों का इतिहास क्रमबद्ध रूप में दिया गया है. सांस्कृतिक स्थिति का विवरण भी इसमें पर्याप्त रूप से दिया गया है. 
(4) तारीख-ए-फिरोजशाही – इस पुस्तक के रचनाकार जियाउद्दीन बरनी हैं. बरनी स्वयं बहुत बड़े विद्वान् थे तथा उन्हें अमीर खुसरो एवं अमीर हसन देहलवी जैसे प्रकाण्ड विद्वानों की संगत प्राप्त थी. इस ग्रन्थ में तत्कालीन समाज की सांस्कृतिक दशा के साथ-साथ अलाउद्दीन के राजस्व विभाग, बाजार नियन्त्रण आदि व्यवस्थाओं का विवरण दिया गया है.
(5) तुजुके बाबरी— यह बाबर द्वारा तुर्की भाषा में विरचित उसकी आत्मकथा है. इस पुस्तक में बाबर द्वारा भारत की, उसके समय की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक दशा का वर्णन लिखा गया है. बाबर स्वयं प्रकृति प्रेमी था. अतः उसने फल-फूल, भोजन, मौसम, रहन-सहन, नदी-नालों आदि के विषय में भी लिखा है. यह ग्रन्थ स्पष्टवादिता एवं तथ्यों की सच्चाई के लिए विशेष मूल्यवान है.
(6) आइन - ए - अकबरी — इस ग्रन्थ के लेखक अबुल फजल थे, जोकि मुगल सम्राट अकबर के दरबारी एवं उसके नवरत्नों में से एक थे. इस पुस्तक में 16वीं सदी के भारत का विवरण है. इस समय की प्रत्येक प्रकार की सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक दशाओं का इसमें चित्रण किया गया है.
(7) तुजुके जहाँगीरी – इसमें 17वीं सर्दी के पूर्वार्द्ध की घटनाओं का विशेष रूप से वर्णन किया गया है. यह जहाँगीर द्वारा लिखी गई उसकी आत्मकथा है. इसमें उसने स्पष्ट रूप से अपने द्वारा की गई त्रुटियों को भी लिखा है. इस ग्रन्थ में तत्कालीन ललित कलाओं, संगीत, चित्रकला, साहित्य आदि का विस्तृत विवरण दिया गया है.
> अलबरूनी एवं उनकी पुस्तक किताबुल हिन्द/ तहकीके हिन्द
अलबरूनी मात्र एक इतिहासकार ही नही थे, अपितु व खगोल विज्ञान, भूगोल, तर्कशास्त्र, औषधि विज्ञान, गणित, दर्शन, धर्मशास्त्र के भी जानकार थे. इनके विषय में जानकारी हमें इनकी कृतियों से प्राप्त होती है.
अलबरूनी खींवा (प्राचीन ख्वारिज्म) देश के रहने वाले थे. जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया तब वे उसके साथ भारत आये. इससे पूर्व अलबरूनी खींवा वंश के अन्तिम शासक की सेवा में थे.
अलबरूनी द्वारा लिखी गई ‘किताबुल हिन्द' एक अनुपम कृति है जिसकी रचना मेधावी व्यक्ति द्वारा की गई जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखता था. इस कृति में उन्होंने भारतीय जीवन का सर्वेक्षण प्रस्तुत किया है.
इस पुस्तक को लिखने के लिए अलबरूनी ने स्वयं संस्कृत भाषा का अध्ययन किया. धार्मिक एवं वैज्ञानिक पुस्तकों को पढ़ा. उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण धार्मिक पूर्वाग्रह उनके ज्ञानात्मक गुणों को प्रभावित नहीं कर सके हैं. उन्होंने अनेक संस्कृत रचनाओं जैसे—ब्रह्मगुप्त, बलभद्र, वराहमिहिर की रचनाओं का अध्ययन किया. उनकी पुस्तक में गीता, विष्णु पुराण एवं वायु पुराण से लिए गये अनेक उद्धरणों का प्रयोग किया गया है.
अलबरूनी जहाँ अपने ज्ञान के विषय में सन्तुष्ट नहीं हैं वहाँ उन्होंने इस तथ्य को स्पष्टतः स्वीकार किया है. वे ऐसे तथ्यों का उल्लेख करते हैं, जिन्हें उन्होंने स्वयं जाँच करके नहीं देखा जैसा सुना वैसा लिख दिया. भारतीय परम्पराओं, रीति-रिवाजों, त्यौहारों, उत्सवों एवं धार्मिक अनुष्ठानों के अनेक विवरण इस रचना में दिये गये हैं. इस रचना में अनेक रोचक भौगोलिक आँकड़े दिये गये हैं तथा गणितीय और खगोल सिद्धान्तों की चर्चा की गई है. इस विषय पर उनके द्वारा निकाले गये निष्कर्ष बहुत अधिक आलोचनात्मक हैं. उन्होंने इस बात पर खेद व्यक्त किया है कि भारतीयों ने अपने पूर्वजों के दृष्टिकोणों का परित्याग कर दिया है.
भारत पर तुर्कों के हमले के ठीक पहले के काल के अध्ययन की दृष्टि से जो इस रचना का महत्व है इसकी तुलना किसी अन्य ग्रन्थ से नहीं की जा सकती.
> मिन्हास / उस-सिराज / तबकाते नासिरी
मिन्हास का जन्म सम्भवतः 1193 ई. में हुआ था तथा वे एक अच्छे खाते-पीते परिवार में पैदा हुए थे. उनके पिता सुल्तान मुहम्मद गौरी की सेवा में थे. मिन्हास काफी सुशिक्षित एवं महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे. मंगोलों की गतिविधियों के कारण उन्हें मध्य एशिया में अपना कोई भविष्य दिखाई नहीं दिया. अतः अनेक लोगों की तरह वे भी भारत में चले आये जो एशिया का एकमात्र ऐसा प्रदेश था जहाँ मुसलमानों का शासन था और अभी तक मंगोल आक्रमणों से सुरक्षित था. मिन्हास – इल्तुतमिश, रजिया, बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूदशाह और नासिरुद्दीन महमूद शाह के समकालीन थे और सम्भवतः बलबन के काल में उनकी मृत्यु हो गई. इन सुल्तानों के शासनकाल में वे अनेक महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त हुए थे.
तबकात-ए-नासिरी मिन्हास की उल्लेखनीय कृति है. इसमें मिन्हास ने आदम से आरम्भ करके नासिरुद्दीन महमूद के शासनकाल के 14 वर्षों तक के इतिहास का विवरण है. यह पुस्तक 23 तबकों (अध्यायों) में विभक्त है जिसमें वे विभिन्न क्षेत्रों के विभिन्न राजवंशों का अलग-अलग विवेचन करते हैं. इस रचना में मिन्हास के समय के 25 अमीरों की जीवनी भी दी गई है. प्रारम्भिक इस्लामी राजवंश का केवल सर्वेक्षण ही इस कृति में दिया गया है, लेकिन सुल्तान इल्तुतमिश के समय से इसमें अधिक विस्तार करते हुए उसके पुत्रों, अमीर वर्ग, काजियों एवं वजीरों तक के नामों को उपसम्मिलित किया गया है.
मिन्हास अपनी रचना में धार्मिक शब्दावली का प्रयोग बराबर करते हैं तथा युद्धों को ‘इस्लामी सेनाओं' तथा शैतानी शक्तियों के बीच लड़ाई के रूप में निरूपित करते हैं. कृति की आलोचना इस बात के लिए की जाती है कि वे आवश्यकता से अधिक राजाओं और अमीरों के मामले में उलझे रहे तथा जनसामान्य पर कोई ध्यान नहीं दिया, परन्तु उनके युग को देखते हुए यह आलोचना सही नहीं ठहरती क्योंकि मिन्हास उस युग में केवल वही कुछ लिख सकते थे, जिसकी उन्हें जानकारी थी. गहराई से देखने पर स्पष्ट होता है कि मिन्हास की दिलचस्पी केवल राजनीतिक सत्ता को कायम रखने में थी इसलिए जो विवरण इससे ताल्लुक नहीं रखते, उनको वे लिपिबद्ध नहीं करते थे.
> जियाउद्दीन बरनी
जियाउद्दीन बरनी का जन्म सैयद परिवार में 1284 ई. में हुआ था. उनके चाचा अला-उल-मुल्क सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सलाहकार तथा राजधानी दिल्ली के कोतवाल थे. T बरनी ने 46 प्रमुख विद्वानों से शिक्षा पाई थी. वे मुहम्मद तुगलक के नदीम (जिन्दादिल साथी) भी रहे, किन्तु फिरोज तुगलक के समय वे जेल में रहे. बरनी का अन्तिम समय बड़े कष्ट एवं गरीबी में बीता, अन्तिम दिनों में उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था. उन्होंने अपनी दयनीय स्थिति का स्वयं कई बार उल्लेख किया है. अपने जीवन के अन्तिम समय में बरनी ने विविध विषयों पर पुस्तकें लिखीं जिनमें से तारीख-ए-फिरोजशाही एवं फतवा-ए-जहाँदारी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं.
बरनी ने तारीख-ए-फिरोजशाही 1357-58 ई. में पूरी की. उनकी यह रचना मध्यकालीन इतिहास लेखन के विकास को दर्शाती है. बरनी ने अपनी इस पुस्तक में केवल एक क्षेत्र की राजनीतिक घटनाओं पर विचार व्यक्त किये हैं. उनके विभिन्न अध्याय अलग-अलग शासनकालों पर आधारित हैं तथा वे एक-दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करते. प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में शाही राजकुमारों एवं अमीरों की सूची देते हैं तथा जब वे फिरोज तुगलक पर आते हैं तब उसके शासनकाल को ग्यारह अध्यायों में बाँटते हैं. इन अध्यायों में फिरोज तुगलक के शासनकाल की सामान्य घटनाओं का उल्लेख किया गया है.
इस पुस्तक का उल्लेखनीय दोष यह है कि इसमें कालानुक्रम (Chronological Order) दोषपूर्ण हैं. वे तिथियों का प्रयोग इसमें कभी-कभार ही करते हैं. इसके साथ ही वार्तालाप लिपिबद्ध करने की जो विधि इन्होंने अपनाई है, वह भ्रामक है. इसे देखकर ऐसा लगता है कि वार्तालाप के समय वहाँ ये स्वयं मौजूद हों.
जियाउद्दीन बरनी की एक अन्य उल्लेखनीय कृति ‘फतवा-ए-जहाँदारी' है जिसकी हमें केवल एक प्रति प्राप्य है. इस पुस्तक में बरनी ने विभिन्न विषयों पर विविध ऐतिहासिक व्यक्तियों से वार्तालाप होते हुए दिखाया है. ये विचार उनके स्वयं के अपने हैं. यह इस बात से सिद्ध होता है कि वे ही विचार महमूद गजनवी के भाषणों रूप में पुस्तक में दिये गये हैं.
बरनी अपने पीछे एक अमूल्य कृतित्व विरासत में छोड़ गये हैं. इस युग में दिल्ली सल्तनत का स्वरूप क्या था, उसे किन समस्याओं का सामना करना पड़ा, इसकी जानकारी हमें बरनी द्वारा ही प्राप्य है. उनकी कृतियाँ मध्यकालीन राजनीतिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक इतिहास की जानकारी प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं.
> शम्स-ए-सिराज - अफ़ीफ़
जियाउद्दीन बरनी की तारीख-ए-फिरोजशाही के 50 वर्ष बाद अफ़ीफ़ ने भी ‘तारीख-ए-फिरोजशाही' की रचना की तथा यह दावा किया कि उनकी रचना बरनी की रचना की पूरक है, किन्तु इसका स्वरूप एकदम भिन्न है, क्योंकि जिन हालातों में इसकी रचना की गई वे एकदम भिन्न थे. अफ़ीफ़ की रचना के केवल कुछ अंश ही वर्तमान में उपलब्ध होते हैं. इसमें इन्होंने सल्तनत काल के अन्तिम वर्षों का इतिहास लिखा है. इस पुस्तक में फिरोजशाह के शासनकाल का विस्तृत विवरण दिया गया है. इसमें फिरोजशाह तुगलक की स्थापत्य सम्बन्धी गतिविधियाँ, नहरें बनवाने, बाग लगवाने, शाही टकसाल की कार्यविधि, सैनिक पड़ाव, शाही आखेट, खाद्य पदार्थों की कीमत, सिक्का ढलाई के ब्यौरे, उत्सव, समारोहों, राजस्व प्रबन्ध आदि का विस्तार से वर्णन किया गया है. इनकी रचना में पहली बार किसी मध्यकालीन इतिहासकार ने दरबारी क्षेत्र से निकलकर आम लोगों की समस्याओं की झलक दिखाई है.
> ख्वाजा अब्दुल मलिक इसामी
ख्वाजा अब्दुल मलिक इसामी ने अपनी रचना फुतुहआलोचना की है. यह सुल्तान बहमन शाह के दरबार में पद्य उस-सलातीन में सुल्तान मुहम्मद तुगलक के विषय में कटु शैली में लिखी गई. बहमन शाह ने बहमनी राज्य की स्थापना मुहम्मद तुगलक से विद्रोह करके की. इसलिए मुहम्मद तुगलक के विषय में इसामी के विचार पूर्वाग्रह पूर्ण थे फिर भी इसका अपना महत्व है, क्योंकि यह रचना मुहम्मद बिन तुगलक के विषय में कुछ अतिरिक्त सूचनाएँ प्रदान करती हैं.
> अमीर खुसरो
साल का पूरा विवरण अमीर खुसरो के ग्रन्थ तत्कालीन सल्तनत काल के साहित्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थ अमीर खुसरो के हैं. इनके ग्रन्थ साहित्य एवं इतिहास दोनों श्रेणियों में रखे जा सकते हैं. ऐतिहासिक ग्रन्थों में 1285 ई. से 1315 ई. तक के इतिहास का क्रमबद्ध विवरण प्राप्त होता है. इन्होंने चार शासकों का शासनकाल अपनी आँखों से देखा था. कैकुबाद, जलालुद्दीन खिलजी, अलाउद्दीन खिलजी तथा मुबारक खिलजी, इन चारों शासकों करते हैं.
अलाउद्दीन खिलजी के ये दरबारी कवि थे. इस कारण से उनका शाही परिवार से घनिष्ठ सम्बन्ध था तथा तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का पूर्ण ज्ञान कवि होने के कारण उनमें नैसर्गिक साहित्यिक प्रतिभा थी. उनके ग्रन्थ साहित्य में भी उत्तमकोटि के माने जाते थे. एक जागरूक साहित्यकार होने के कारण उन्होंने तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, लौकिक, रूढ़ियों एवं रीतियों, ज्योतिष, शैक्षिक, नैतिक एवं अन्य सभी प्रकार की संस्कृति एवं सभ्यता सम्बन्धी दशाओं का विशद् एवं व्यापक चित्रण किया है. उनकी प्रमुख पुस्तकें निम्नलिखित हैं
(1) किरान-उस-सदाइन – इसमें कैकुबाद का अपने पिता बुगराखाँ से भेंट का वर्णन है.
(2) मिफ्ता - उल - फूतूह – इसमें जलालुद्दीन खिलजी की चार विजयों का वर्णन है.
(3) खजाइनल फूतूह – इसमें अलाउद्दीन खिलजी के प्रथम 15 वर्षों के इतिहास का अलंकृत शैली में वर्णन किया गया है.
(4) नूहे सिपहर – इसमें कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी के शासनकाल का राजनैतिक एवं सामाजिक दशा पर प्रकाश डाला गया है.
(5) आशिकी – इसमें देवलरांनी एवं खिज्रखाँ के प्रेम का विवरण है.
(6) इजाजे खुसरवी – इसमें तत्कालीन प्रशासन का विस्तृत विवरण है.
(7) मतला-उल-अनवार व फजल-उल-फवायत — इन दोनों पुस्तकों में उस समय की सामाजिक दशा, रीति-रिवाज, प्रचलित लोकरूढ़ियों एवं अन्य सांस्कृतिक दशाओं की जानकारी प्राप्त होती है.
इस प्रकार स्पष्ट है कि, अमीर खुसरो ने अनेक साहित्यिक व ऐतिहासिक ग्रन्थों की रचना की जिससे हमें सल्तनतकाल के इतिहास के निर्धारण में बहुत अधिक सहायता मिलती है.
> यह्या-बिन- अहमद सरहिन्दी
यह्या-बिन-अहमद सरहिन्दी द्वारा 'तारीखे मुबारक शाही ' की रचना की गई थी जो 1388-1414 ई. के काल में सम्बन्धित समसामयिक इतिहास है. इस पुस्तक के लेखन का आधार प्रत्यक्षदर्शियों के विवरण एवं सुने-सुनाए साक्ष्य तथा स्वयं लेखक द्वारा किए गए निरीक्षणों को बताया गया है. इस पुस्तक में सैनिक एवं राजनैतिक इतिहास का ही निरूपण किया गया है. इस ग्रन्थ की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता प्रत्येक तथ्य का कालक्रमानुसार निरूपण है.
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Sun, 08 Oct 2023 07:40:07 +0530 Jaankari Rakho
भारत पर तुर्कों के आक्रमण https://m.jaankarirakho.com/410 https://m.jaankarirakho.com/410 > भारत में तुर्कों के प्रारम्भिक आक्रमण व महत्व
962 ई. में अल्पतगीन नामक व्यक्ति ने गजनी में एक स्वतन्त्र तुर्क राज्य की स्थापना की. उसके दामाद सुबुक्तगीन ने उसके वंश का अन्त कर 977 ई. में गद्दी हथिया ली तथा भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगा. पंजाब के हिन्दू शासक जयपाल ने 986-87 ई. के मध्य उसके आक्रमण को विफल करने के उद्देश्य एक बड़ी सेना के साथ उस पर आक्रमण कर दिया, लेकिन भारी वर्षा के कारण उसे हार का मुँह देखना पड़ा और अपमानजनक सन्धि करने के लिए विवश होना पड़ा, किन्तु लाहौर पहुँचने के बाद उसने सन्धि की शर्तों को स्वीकार करने से मना कर दिया. अतः सुबुक्तगीन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर लूटपाट की तथा पेशावर तक के भूभाग को हथिया लिया. जयपाल ने कुछ मित्र राजाओं की सहायता से सुबुक्तगीन पर आक्रमण किया जिसमें सुबुक्तगीन को ही विजयश्री मिली, इस प्रकार से तुर्की को अपने प्रारम्भिक आक्रमणों से ही सफलता मिल गई. इन आक्रमणों की सफलता से यह विदित हुआ कि उत्तर-पश्चिम से आक्रमणकारियों का भारत में प्रवेश आसान है और भविष्य में मुस्लिम आक्रमणकारी इसी रास्ते भारत आए. भारत में मुसलमानों ने इस्लाम को फैलाया. मन्दिरों को नष्ट किया. भारी संख्या में नरसंहार किया और अपार सम्पदा लूटकर ले गए. भारत में इस्लाम के प्रवेश के कारण यहाँ की संस्कृति भी काफी प्रभावित हुई.
> महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण : लुटेरे के रूप में
सुबुक्तगीन की मृत्यु (997 ई.) के बाद उसका महत्वाकांक्षी पुत्र महमूद गजनी का शासक बना. उसे बगदाद के खलीफा द्वारा 'यामिनिउद्दौला' तथा 'अमीन- उल मिल्लाह' की उपाधि मिली हुई थी. उसने शासक बनते समय यह प्रतिज्ञा की थी कि वह प्रत्येक वर्ष भारत पर आक्रमण करेगा. उसे मध्य एशिया में अपने राज्य विस्तार के लिए धन भारत से ही उसे मिलना उस समय सम्भव था. अतः उसके आक्रमण का मूल उद्देश्य भारत में धन की लूटपाट तथा इस्लाम का प्रचार करना था. इस उद्देश्य हेतु उसने भारत पर अनेक आक्रमण किये, जिनमें प्रमुख आक्रमणों का विवरण निम्नलिखित है -
  1. महमूद का प्रथम भारतीय आक्रमण पश्चिमोत्तर के शाही राजा जयपाल के विरुद्ध हुआ जिसमें जयपाल की पराजय हुई और महमूद उसकी राजधानी उद्भाण्डपुर जीतने व लूटने के बाद अतुल सम्पत्ति लेकर गजनी वापस लौट गया. जयपाल ने आत्महत्या कर ली. ही जयपाल के पुत्र आनन्दपाल व त्रिलोचनपाल 1021 तक महमूद के विरुद्ध छुटपुट संघर्ष करते रहे, लेकिन उसके बाद शाहिया वंश का अन्त हो गया. 
  2. महमूद ने दूसरा आक्रमण मुल्तान के शिया मतावलम्बी शासक फतेह दाऊद के विरुद्ध किया. 1006 ई. में उसने फतेह दाऊद को परास्त कर दिया तथा अपनी ओर से १. सुखपाल को वहाँ का शासक बनाया तथा 1008 में उसके विद्रोह करने के कारण, बन्दी बनाकर मुल्तान पर अधिकार कर लिया.
  3. महमूद ने 1005 ई. में भटिण्डा के मजबूत किले को जीतकर वहाँ के शासक विजयराय को भाग खड़े होने पर विवश कर दिया.
  4. 1009 में अलवर के नारायणपुर पर आक्रमण किया तथा 1014 ई. में थानेश्वर के चक्रस्वामी मन्दिर को तोड़ा, 1018 ई. में उसने मथुरा पर धावा बोला तथा वहाँ के अनेक मन्दिरों को ध्वस्त कर दिया तथा बहुत बड़ी धनराशि लेकर वह गजनी लौटा.
  5. महमूद गजनवी का सबसे प्रसिद्ध आक्रमण 1025-26 ई. में सोमनाथ के प्रसिद्ध मन्दिर पर हुआ, जोकि काठियावाड़ में स्थित था. यह मन्दिर पूरे भारत में अपनी । पवित्रता, गौरव व समृद्धि के लिए विख्यात था, महमूद ने सोमनाथ के किले का घेरा डाला तथा बिना किसी विशेष संघर्ष के उसमें प्रवेश करने में सफलता प्राप्त कर ली तथा लगभग 50000 ब्राह्मणों व पुजारियों का वध उसने कर दिया. सोमनाथ भगवान् की मूर्ति को तोड़कर उसे गजनी, मक्का और मदीना की मस्जिदों की सीढ़ियों में लोगों के पैरों की ठोकर खाने हेतु भेज दिया गया.
इस आक्रमण में महमूद को बहुत अधिक हीरे-जवाहरात और स्वर्ण हाथ लगा. यह कुल राशि लगभग 20 लाख दीनार के बराबर थी. इसे लेकर जब वह गजनी की ओर लौट रहा था तो मार्ग में जाटों ने उसकी कुछ सम्पत्ति लूट ली, लेकिन गजनी वहाँ सकुशल पहुँच गया.
जाटों से बदला लेने के लिए 1027 ई. में गजनवी ने पुनः सिन्ध पर आक्रमण किया तथा भयंकर कत्लेआम मचाया व उनके नगरों को जला दिया. 1030 ई. में उसकी मृत्यु से पूर्व यह उसका भारत पर अन्तिम आक्रमण था. उसने हर आक्रमण के दौरान भारत से अपार सम्पत्ति लूटी. उसने जितने भी आक्रमण भारत पर किए सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए किए. वह हर बार लुटेरे की भाँति आया और सम्पत्ति लूटकर ले गया.
> मुहम्मद गोरी का भारत पर आक्रमण
परिचय – महमूद गजनवी के बाद भारत पर दूसरे महत्वपूर्ण तुर्क विजेता का आक्रमण हुआ जो इतिहास में मुहम्मद गोरी के नाम से प्रसिद्ध है. गोर महमूद गजनवी के अधीन एक छोटा-सा राज्य था. महमूद की मृत्यु के बाद उसके कमजोर उत्तराधिकारियों के समय गोर के सरदारों ने अपनी शक्ति में काफी वृद्धि कर ली और राज्य का विस्तार प्रारम्भ कर दिया तथा यहाँ के शंसबनी शासकों ने गजनी पर अपना अधिकार कर लिया.
1173 ई. में शिहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी गजनी का शासक बना तथा इसने तीन वर्षों तक अपना सारा ध्यान गोर राज्य के उत्कर्ष में लगाया. 1175 ई. से उसने भारत पर आक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया तथा 1205 ई. तक आतेआते उसने भारत के हृदय स्थल दिल्ली में तुर्क राज्य की स्थापना कर दी. उसके आक्रमणों का मूल उद्देश्य भारत में इस्लाम का प्रचार करना था.
> तुर्क आक्रमणकारियों के विरुद्ध राजपूतों की असफलता : कारण
राजपूत लोग अत्यन्त वीर, साहसी एवं योद्धा होते हुए तुर्क आक्रमणकारियों के विरुद्ध देश की रक्षा करने में कुछ कारणों से असफल रहे, जिनका विवरण निम्नलिखित है-
  1. राजपूतों की पराजय का सबसे बड़ा कारण उनमें राजनैतिक एकता की कमी थी. ये लोग छोटे-छोटे अनेक राज्यों में बँटे थे तथा आपस में सदैव संघर्षरत रहते थे. प्रत्येक शासक अपने पड़ोसी शासकों के राज्य को हथियाना चाहता था.
  2. राजपूत राज्यों का स्वरूप सामंतवादी था. इस कारण वास्तविक सत्ता सामंतों के पास होती थी और केन्द्रीय सत्ता के निर्बल होते ही सामंत लोग अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर देते थे. इस कारण जनता राजनैतिक कार्यों में उदासीन बनी रहती थी तथा ऐसी स्थिति में किसी भी राज्य का पतन होना अवश्यम्भावी था.
  3. राजपूतों के पतन का एक उल्लेखनीय कारण उनका सैनिक संगठन भी था. राजपूत सेना में पैदल सेना की संख्या अधिक थी तथा घुड़सवार सेना के पास अच्छे घोड़े नहीं थे, जबकि मुसलमान सेना के पास घुड़सवारों की संख्या अधिक व उन्नत किस्म के घोड़े थे. वे युद्ध करने की नई पद्धतियों से भी परिचित थे.
  4. तत्कालीन समाज का सामाजिक संगठन भी राजपूतों की पराजय का एक बड़ा कारण था. समाज में जाति-पाँति, छुआछूत एवं ऊँच-नीच की भावनाएँ अत्यन्त प्रबल थीं. देश की रक्षा का भार केवल राजपूतों पर ही निर्भर था. समाज का एक बड़ा भाग देश की रक्षा के प्रति उदासीन था. इस कारण से देश में राष्ट्रीयता की भावना लुप्त हो ग गई.
  5. राजपूतों की पराजय में उनके दुर्गुणों ने भी भरपूर योगदान दिया; जैसे— मदिरापान, द्यूतक्रीड़ा, बहु विवाह आदि. इन सबके कारण उनके नैतिक जीवन में गिरावट आ रही थी. 
  6. राजपूतों पर अहिंसा के सिद्धान्तों का भी काफी असर पड़ा था. इसके साथ ही भाग्यवाद, कर्मवाद और अनेक अन्धविश्वासों का प्रचलन उनमें हो गया था. जिसने हिन्दू जनता की सैनिक शक्ति को कुण्ठित कर दिया था.
  7. राजपूतों के विरुद्ध मुसलमानों की सफलता का प्रधान कारण यह भी रहा कि तुर्क विजेता राजपूतों से अधिक योग्य और अनुभवी थे. सुबुक्तगीन, महमूद, कुतुबुद्दीन ऐबक आदि अपने समय के उच्चकोटि के सेनानायक थे. पृथ्वीराज ने तराइन के युद्ध में विजय पाने के बाद भी गोरी का वध न करके बहुत बड़ी भूल की, जिसका खामियाजा उसे अगले ही वर्ष भुगतना पड़ा.
  8. राजपूत लोग धर्म युद्ध करते थे जिसके अनुसार भागते शत्रु का पीछा न करना, शरण में आए हुए को अभयदान देना, घायल शत्रु पर वार न करना आदि उनका कर्तव्य था. इससे शत्रुओं को अधिक उत्साह के साथ दुबारा आक्रमण करने का मौका मिल जाता था.
उपर्युक्त विवेचऩ से स्पष्ट है कि राजपूतों की पराजय अनेक कारणों से सम्भव हुई तथा कभी भी उन्होंने आक्रामक रुख नहीं अपनाया. बार-बार तुर्कों के आक्रमण होने पर भी उन्होंने समस्त भारतीय राजाओं को संगठित कर उनके विरुद्ध स्थाई संयुक्त मोर्चा बनाने का प्रयास नहीं किया.
> होयसल मन्दिर स्थापत्य कला
होयसल राजाओं का काल कला एवं स्थापत्य की उन्नति के लिए इतिहास में प्रसिद्ध है. उनके काल में मन्दिर निर्माण की एक नई शैली का विकास हुआ. इन मन्दिरों का निर्माण भवनों के समान ऊँचे ठोस चबूतरे पर किया जाता था. चबूतरों तथा दीवारों पर हाथियों, अश्वारोहियों, हंसों, राक्षसों तथा पौराणिक कथाओं से सम्बन्धित अनेक मूर्तियों का निर्माण किया गया है.
होयसल शासकों द्वारा निर्मित अनेक सुन्दर मन्दिर आधुनिक हेलबिड, जोकि कर्नाटक में स्थित है, बेलूर तथा श्रवणबेलगोला से प्राप्त होते हैं. होयसलों की राजधानी द्वार समुद्र थी जो आजकल हेलबिड के नाम से जानी जाती है. यहाँ पर निर्मित मन्दिरों में होयसलेश्वर का प्राचीन मन्दिर सर्वाधिक प्रसिद्ध है. इस मन्दिर का निर्माण विष्णु वर्द्धन के शासनकाल में किया गया था. यह 160' लम्बा तथा 122' फुट चौड़ा है, इसमें शिखर का निर्माण नहीं किया गया है. इसकी दीवारों पर अद्भुत मूर्तियों का अंकन मिलता है. इसमें देवताओं, मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों आदि सभी की मूर्तियाँ हैं. विष्णु वर्द्धन ने ही बेलूर में 'चेन्नाकेशव मन्दिर' का भी निर्माण करवाया था. यह 178' x 156' का है. मन्दिर के चारों ओर वेष्ठिनी (रलिंग) है तथा उसमें तीन तोरण बने हुए हैं. तोरण द्वारों पर रामायण तथा महाभारत से लिए गए अनेक सुन्दर दृश्यों का अंकन है. मन्दिर के भीतर बनी मूर्तियों में नाचती हुई सरस्वती की मूर्ति का सौन्दर्य अद्भुत है. होयसल मन्दिर अपनी निर्माण शैली, सुदृढ़ता एवं आकारप्रकार तथा सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है.
> चोल प्रशासन
एवं विशिष्ट स्वरूप स्थानीय ग्रामीण प्रशासन एवं शहरी चोल प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि प्रशासन था. चोलों की केन्द्रीय व प्रान्तीय प्रशासनिक मध्यकालीन भारतीय अन्य वंशों में शासन था. चालुक्यों एवं व्यवस्था में कोई खास अन्तर नहीं था जिस प्रकार पूर्व राष्ट्रकूटों के समान ही चोल प्रशासन काफी केन्द्रीयकृत था.
> केन्द्रीय प्रशासन
केन्द्रीय प्रशासन का केन्द्र बिन्दु राजा था तथा उसके कार्यों में सहायता देने के लिए मन्त्रिपरिषद् या उदनकुट्टम थी जो सभी प्रधान विभागों के प्रशासन में उसकी मदद करती थी.
चोल युग में विस्तृत एवं जटिल प्रशासनिक व्यवस्था थी जिसमें विभिन्न स्तर के कार्यालयों का प्रशासनिक उपबन्ध सम्मिलित था. सरकारी कर्मचारी, समाज में विशिष्ट स्थान रखता था तथा उसका एक अलग वर्ग था. उच्च कर्मचारी को ‘पेरुन्दरम' तथा निम्न स्तर के कर्मचारी को ‘शिरुतरम' कहा जाता था. अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार ये वर्ग भू-भाग से पदाधिकारियों को इनाम दिया जाता था तथा विभिन्न कर वसूलने के अधिकारी होते थे. लूट के माल में से उपाधियाँ भी प्रदान की जाती थीं.
साम्राज्य अनेक प्रान्तों में बँटा हुआ था जिन्हें ‘मण्डलम' कहा जाता था जिसका प्रधान प्रायः राजकुमार हुआ करते थे. प्रान्त या मण्डलम 'बेलनाडु' में बँटा हुआ था, तथा 'बेलनाडु', 'नाडु' में बँटे होते थे. नाडु आधुनिक जिले के समान था जो कुर्रम (ग्राम) में बँटे थे.
शहरों के लिए स्वायत्त प्रशासन था जिसे 'तंकरूरु' कहा जाता था. यह एक परिषद् के समान थी."
चोलों के अधीन स्थानीय शासन सर्वाधिक सुदृढ़ था. ग्राम का प्रशासन ग्राम सभाएँ करती थीं जो दो प्रकार की थीं— (1) उर, (2) सभा या महासभा के सदस्य मूल रूप से अग्रहार पाए ब्राह्मण थे जिसके सदस्य पेरुमक्कल कहे जाते थे. ये सभाएँ अनेक समितियों में विभक्त थीं जिन्हें 'वारियम' कहा जाता था. इनमें संवत्सर वारियम (वार्षिक समिति), तड़ाग समिति, उपवन समिति, स्थाई समिति आदि थी. इन समितियों में सदस्यों की संख्या अनिश्चित थी तथा इनके सदस्य अवैतनिक थे.
ग्राम सभाएँ गाँव की भूमिकर संग्रहण कर न देने वाले को दण्ड तथा भू-विवादों का निपटारा करती थीं. ग्राम के विकास का उत्तरदायित्व भी इन्हीं सभाओं के पास था. 
समान्यतः चोल साम्राज्य के अन्तर्गत केन्द्र केवलं साम्राज्य की सुरक्षा, विदेश नीति, आन्तरिक शान्ति और लोक कल्याण के कार्यों को ही करता था शेष कार्य नगरों एवं प्रान्तों की संस्थाएँ ही करती थीं.
> राजस्व प्रशासन
चोल राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमि कर था जिसका निर्धारण भूमि सर्वेक्षण के आधार पर किया जाता था. अकाल तथा अन्य प्राकृतिक विपदाओं के समय कर में छूट दी जाती थी. कर के अन्य साधनों में वन सम्पदा, खानें, आयात और निर्यात कर तथा स्थानीय शुल्क थे. सार्वजनिक कार्यों हेतु बेगार भी ली जाती थी.
चोल नरेशों ने अपनी आय के साधनों को बढ़ाने और विभिन्न स्रोतों से कर एकत्रित करने के अनेक प्रयास किए थे. भूमि कर तथा भवन कर, राजस्व के प्रमुख स्रोत थे. इसलिए चोल शासकों ने भूमि कर वृद्धि और लगान वसूली में भी अधिक सक्रियता दिखाई. राजराज प्रथम ने तो भूमि का सर्वेक्षण कराकर पुनर्मूल्यांकन भी करवाया था. राजराज प्रथम के समय भूमि कर उपज का 1/3 से 1/6 6 तक लिया जाता था, किन्तु गाँव की कुछ भूमि कर मुक्त भी थी जिसे ‘इरैयिल’ (कर मुक्त) कहा जाता था. एक अभिलेख में अनेक व्यवसायों के ऊपर लगने वाले करों का उल्लेख है जिनमें कर, करघों, कोल्हुओं, व्यापार, सुनारों, नमक चुंगी, बाँटों, बाजारों आदि पर कर लगाए जाते थे. इनका अर्थ स्पष्ट नहीं है.
करों को वसूलते समय कभी-कभी जनता के साथ अत्यन्त कठोरतापूर्ण व्यवहार भी किया जाता था. लोगों को पानी में डुबो देने अथवा धूप में डुबो देने का भी उल्लेख मिलता है.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि चोलकालीन राजस्व प्रशासन पूर्ण रूप से संगठित था तथा उसमें जनकल्याण के काफी तत्व समाहित थे.
> चोल सैन्य प्रशासन
चोल राजाओं ने एक विशाल संगठित सेना का गठन किया था जिसमें लगभग एक लाख 50 हजार सैनिकों के अतिरिक्त एक विशाल नौसेना (Navy) भी थी.
चोल सेना 'मुनरुकई-महासेना' कहलाती थी जिसमें पैदल, अश्वारोही, गजारोही तीन मुख्य अंग थे. राजा सेना का प्रधान होता था. चोल अभिलेखों में सेना के 70 रेजिमेण्टों का उल्लेख किया गया है जिनमें प्रत्येक का सामूहिक जीवन होता था तथा इन्हें मन्दिर बनवाने तथा दान देने की स्वतन्त्रता होती थी. सेना समूचे प्रदेश में छोटे-छोटे गुल्मों एवं छावनियों में रहती थी जिसे 'कडगम' कहा जाता था. 
सेना में भर्ती के तरीकों और स्थाई सेना के कुछ निश्चित प्रमाण नहीं हैं. सेनाओं में अनेक ब्राह्मण सेनापतियों का उल्लेख अभिलेखों में है. सेना नागरिक कार्यों को भी सम्पादित करती थी और इसके हिस्से कई प्रकार के स्थानीय निगमों आदि का कार्य था. युद्ध भूमि में महत्वपूर्ण सेनापतियों को 'क्षत्रिय शिखमणि' की उपाधि प्रदान की जाती थी.
चोल सेना की एक प्रमुख विशेषता उनके पास एक शक्तिशाली नौसेना का होना था. इसी सेना की सहायता से चोल शासकों ने लंका, जावा, सुमात्रा आदि द्वीपों तक अपनी विजय पताका फहराई थी. लड़ाकू जहाजों के अतिरिक्त इस सेना में व्यापारिक जहाज भी सम्मिलित थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि चोलों का सैन्य संगठन अत्यधिक उत्कृष्ट एवं विशाल था जिसके कारण उन्होंने एक विशाल साम्राज्य का गठन किया जो अपने समय में सबसे बड़ा साम्राज्य था.
> चोल स्थानीय प्रशासन : लेख
चोल शासन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता वह असाधारण शक्ति तथा क्षमता है, जो स्वायत्तशासी ग्रामीण संस्थाओं के संचालन में परिलक्षित होती है. उत्तरमेरुर से प्राप्त 919 तथा 929 ई. के दो अभिलेखों के आधार पर हम ग्राम सभा की कार्यकारिणी समितियों की कार्य प्रणाली का विस्तृत ज्ञान प्राप्त करते हैं. ग्रामों में मुख्यतः दो प्रकार की संस्थाएँ कार्यरत थीं—(1) उर, (2) सभा.
(1) ‘उर’—नीलकण्ठ शास्त्री के अनुसार, 'उर' का अर्थ 'पुर' है, जो गाँव और नगर दोनों के लिए प्रयुक्त है. इसमें सभी ग्रामवासी बैठकों में शामिल होते थे और यह सामान्य लोगों की संस्था थी. इसकी कार्यसमिति को 'आलुंगणम' कहा जाता था. इसके सदस्यों के चुनाव के विषय में हमें कोई जानकारी नह नहीं मिलती. ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ सभाओं के लिए एक ही कार्यसमिति होती थी जो सभी कार्यों के लिए उत्तरदायी थी. कहीं-कहीं एक ही गाँव में दो उर संगठन कार्य करते थे.
(2) सभा अथवा महासभा– यह संस्था उन गाँवों में होती थी जिसमें ब्राह्मणों को अग्रहार दिए गए थे. इन गाँवों में मुख्यतः विद्वान् ब्राह्मण निवास करते थे. ये मुख्यतः कांची तथा मद्रास के क्षेत्रों में थीं. 'सभा' मुख्यतः समितियों (बारियम) के माध्यम से कार्य करती थी. बारियम का तमिल में अर्थ 'आय' है. एक लेख में सभा की कार्यसमिति को 'वरणम्' कहा गया है. सभा द्वारा किसी कार्य विशेष के लिए नियुक्त व्यक्तियों को 'वारियर' कहा जाता था. बारियम के सदस्यों को कोई पारिश्रमिक कअथवा पुरस्कार नहीं दिया जाता था.
संस्था के सदस्यों का निर्वाचन समय-समय पर किया जाता था, जो मतपत्र के आधार पर होता था. सभी चुनने योग्य उम्मीदवारों के नाम अलग-अलग ताड़-पत्रों पर लिख दिए जाते थे तथा एक बर्तन में डालकर एक बालक से उन पत्तियों को निकलवाया जाता था जिनकी पत्ती निकलती थी वे निर्वाचित माने जाते थे. निर्वाचन के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ थीं
योग्यताएँ :
1. उनकी आयु 35-70 वर्ष हो.
2. वेद अथवा ब्राह्मण ग्रन्थों का ज्ञान के स्वामी हों तथा एक वेद एवं भाष्य का ज्ञान हो. 
3. निजी घर हो.
अयोग्यताएँ :
1. यदि वह तीन वर्ष से किसी समिति का सदस्य रहा हो. 
2. व्यभिचारी, चोर अथवा अपराधी हो.
3. शूद्रों के सम्पर्क से अपवित्र हो गया हो.
मन्दिरों में इन समितियों की बैठक हुआ करती थी तथा विचारणीय विषयों पर बहस कर सर्वोत्तम व्यवसायी ( प्रस्ताव ) पारित कर दिए जाने के उल्लेख मिलते हैं.
सभा के कार्य—ग्राम सभा के पास राज्य के प्रायः सभी अधिकार मिले हुए थे. उनके पास सामूहिक सम्पत्ति होती थी, जिसे वह जनहित में बेच सकती थी. ग्रामवासियों के सामान्य झगड़ों का फैसला करती थी. ग्राम सभा के पास बैंक भी होते थे तथा वह धन, भूमि तथा धान्य के रूप में जमा राशि प्राप्त करती और फिर ब्याज पर उन्हें वापस लौटा देती थी. गाँव की सभी अक्षय निधियाँ ग्राम सभा के अधीन होती थीं. सभा को ग्रामवासियों पर कर लगाने, वसूलने तथा उनसे बेगार लेने का भी अधिकार था. पीने के पानी, उपवनों, सिंचाई तथा आवागमन के साधनों की व्यवस्था करना ग्राम सभा के मुख्य कार्य थे.
> दक्षिण की धार्मिक दशा या चोल काल : धार्मिक दशा 
चोल काल में शैव तथा वैष्णव धर्मों की उन्नति का काल था. नयनार ( शैव) व अलवार (वैष्णव) सन्तों के द्वारा इन धर्मों के प्रचार-प्रसार के लिए आन्दोलन चलाया गया. इन दोनों में भी शैव धर्म की लोकप्रियता कहीं अधिक थी. अधिकांश चोल शासक कट्टर शैव धर्म के उपासक थे. उन्होंने शिव के अनेक विशाल मन्दिरों की स्थापना की कुलोतुंग प्रथम तो इतना अधिक शिवभक्त था कि चिदम्बरम मन्दिर के नटराज मन्दिर में रखी विष्णु प्रतिमा को उखाड़कर समुद्र में फिकवा दिया. चोल शासकों ने शैव सन्तों को ही अपना राजगुरु नियुक्त किया: फलस्वरूप शासकों की देखा-देखी जनता में भी यह धर्म अधिक लोकप्रिय हो गया.
शैव धर्म के साथ-साथ वैष्णव धर्म भी इस समय उन्नति पर था. अलवार संतों का स्थान अब वैष्णव आचार्यों ने ग्रहण कर इस धर्म को दार्शनिक आधार प्रदान किया. इस समय शिव की तरह ही विष्णु के सम्मान में मन्दिर बनवाए गए व मठों की स्थापना की गई. मन्दिर तथा मठ चोलयुगीन धार्मिक जीवन के केन्द्र बिन्दु थे.
चोल शासक पर्याप्त रूप से धार्मिक सहिष्णु थे. उनके काल में जैन धर्म का विकास बौद्ध धर्म की अपेक्षा अधिक हुआ. इस काल में जैन मन्दिरों से भूमि कर माफ कर दिया गया. राजराज प्रथम की बहन कुन्दवे ने एक ही स्थान पर शैव, वैष्णव, जैन मन्दिरों का निर्माण करवाया. बौद्ध धर्म के प्रमुख केन्द्र इस काल में नेगापट्टम, कांची व श्रीनिवास में थे. इन्हें भी चोल शासकों द्वारा प्रभूत दान दिया गया था.
चोलकालीन धार्मिक जीवन की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इस समय आस्तिक धर्मों का बोलबाला अधिक था फलस्वरूप मूर्ति पूजा पर विशेष जोर रहा जिसके कारण वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान बन्द हो गया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि चोलकाल में शैव तथा वैष्णव धमों का ही उत्थान अत्यधिक हुआ तथा नास्तिक सम्प्रदायों का प्रभाव क्रमशः समाप्त हो गया.
> चोलकालीन कला एवं स्थापत्य
चोल काल में कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई. इस समय के कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन मन्दिर स्थापत्य में किया है. चोल शासकों द्वारा बड़ी संख्या में विभिन्न स्थानों पर मन्दिरों का निर्माण किया गया.
प्रथम चरण- चोलयुगीन प्रारम्भिक मन्दिर हमें पुदक्कोटै जिले से प्राप्त होते हैं. इनमें विजयालय द्वारा निर्मित चोलेश्वर का मन्दिर अत्यधिक प्रसिद्ध है. यह मन्दिर एक वर्गाकार आकार में गोलाकार गर्भगृह लिए निर्मित है तथा चार मंजिला है जिसमें क्रमशः ऊपर की मंजिलें छोटी होती गई हैं. शिखर के ऊपरी भाग पर गोल कलश है. मुख्य द्वार तथा ताखों में मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं. इसी प्रकार का एक अन्य मन्दिर कन्तूर का 'बाल सुब्रह्मण्यम मन्दिर' है, जो आदित्य प्रथम द्वारा बनवाया गया था. इस मन्दिर के चारों कोनों पर हाथियों की मूर्तियाँ हैं. इसी समय का एक अन्य मन्दिर 'नागेश्वर मन्दिर' है. इसमें गर्भगृह के चारों ओर अर्द्ध-नारी, ब्रह्मा, दक्षिणामूर्ति के साथ मनुष्यों की अनेक मूर्तियाँ बनी हैं.
द्वितीय चरण - श्रीनिवासनल्लूर का कोरंगनाथ मन्दिर चोलयुगीन मन्दिर निर्माण के द्वितीय चरण का प्रतिनिधित्व करता है. इस मन्दिर का आकार प्रकार अत्यन्त सुन्दर है. मन्दिर का शिखर 50' ऊँचा है तथा गर्भगृह 20' x 25' का है. गर्भगृह के बाहरी ताखों पर बनी भक्तों, सिंहों तथा गणों के साथ बैठी हुई दुर्गा की दक्षिणा मूर्ति तथा विष्णु एवं ब्रह्मा की खड़ी हुई उत्कीर्ण मूर्तियाँ मिलती हैं.
तृतीय चरण - इस चरण में चोल मन्दिर स्थापत्य कला का चर्मोत्कर्ष देखने को मिलता है. इस काल में बने मन्दिरों के श्रेष्ठ उदाहरण त्रिचनापल्ली जिले में निर्मित दो मन्दिरों तंजौर तथा गंगकोण्ड चोलपुरम के मन्दिर हैं. राज राजेश्वर अथवा वृहदीश्वर का मन्दिर भारत का सबसे बड़ा एवं भव्य मन्दिर है जो तंजौर में स्थित है. यह दक्षिण भारतीय शैली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. इसके निर्माण में ग्रेनाइट प्रस्तर का प्रयोग किया गया है. इसकी दीवारों को सुन्दर भित्ति चित्रों से सजाया गया है. गर्भगृह में विशाल वृहदीश्वर का शिवलिंग है. मन्दिर की दीवारों एवं ताखों पर सुन्दर मूर्तियाँ बनी हैं. पर्सी ब्राउन के शब्दों में, “इसका विमान न केवल द्राविड़ शैली की सर्वोत्तम रचना है अपितु इसे समस्त भारतीय स्थापत्य की कसौटी भी कहा जा सकता है." इंसी मन्दिर की तर्ज पर राजेन्द्र-I ने गंगैकोण्ड चोलपुर का मन्दिर बनवाया. 
गंगैकोण्ड चोलपुर तथा तंजौर के मन्दिर चोल स्थापत्य के चरमोत्कर्ष को व्यक्त करते हैं तथा साथ ही ये चोल सम्राटों की महानता एवं गौरवगाथा को आज भी सूचित करते हैं. इन मन्दिरों का आकार एवं भव्यता इतनी विस्तृत है, तभी तो फर्ग्युसन ने लिखा है कि "चोल कलाकारों ने दैत्यों के समान कल्पना की तथा उसे जौहरियों के समान पूरा किया."
> चोलयुगीन वृहदीश्वर मन्दिर पर टिप्पणी
वृहदीश्वर के शिव मन्दिर की स्थापना राजराजा प्रथम द्वारा की गई थी. यह मन्दिर दक्षिण भारतीय द्राविड़ शैली का सम्पूर्ण भारत में श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है. यह भारत के मन्दिरों में सबसे बड़ा एवं भव्य है. इसका विशाल प्रांगण 500 फुट लम्बा तथा 250 फुट चौड़ा है. इसके निर्माण में ग्रेनाइट प्रस्तर का प्रयोग किया गया है. इस मन्दिर को चारों ओर ऊँची दीवारों से घेरकर सुरक्षित किया गया है. इस मन्दिर का सर्वश्रेष्ठ आकर्षण पश्चिम में गर्भगृह के ऊपर बना लगभग दो सौ फुट ऊँचा विमान है जिसका आधार 82 वर्ग फुट है. आधार के ऊपर तेरह मंजिलों वाला पिरामिड के आकार का 190 फुट ऊँचा शिखर है. मन्दिर का गर्भगृह 44 वर्ग फुट का है जिसके चारों ओर 9 फुट चौड़ा प्रदक्षिणा पथ है. इसमें सुन्दर भित्तिचित्र बने हैं. गर्भगृह के भीतर एक विशाल शिवलिंग है जो वृहदीश्वर के नाम से जाना जाता है. इसके दोनों ओर दो द्वारपालों की आकृतियाँ बनी हैं. मन्दिर के बहिर्भाग में विशाल नन्दि स्थापित है जिसे एकाश्म प्रस्तर द्वारा बनाया गया है. मन्दिर की दीवारों एवं ताखों में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनी हैं. इस प्रकार यह मन्दिर भव्यता एवं कलात्मकता का अद्भुत नमूना है. पर्सी ब्राउन के शब्दों में, "इसका विमान न केवल द्राविड़ शैली की सर्वोत्तम रचना है, अपितु भारतीय स्थापत्य कला की कसौटी भी कहा जा सकता है. "
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Sun, 08 Oct 2023 07:36:33 +0530 Jaankari Rakho
बाह्य जगत् से भारतीय सम्पर्क https://m.jaankarirakho.com/409 https://m.jaankarirakho.com/409 > वृहत्तर भारत से तात्पर्य

वृहत्तर भारत से बाहर उस विस्तृत भूखण्ड से जाना जा भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार हुआ तथा प्राचीन भारतीयों ने अपने उपनिवेश स्थापित किए. सकता है, जहाँ जिसमें पाश्चात्य विश्व के साथ भारत का सम्पर्क मुख्यतः व्यापारपरक था, किन्तु उत्तर-पूर्व तथा दक्षिण-पूर्व के देशों में न केवल भारतीय सभ्यता का पूर्ण प्रसार हुआ, बल्कि उनमें से अनेक में प्राचीन भारतीयों ने अपने राज्य भी स्थापित कर लिए थे. इस भूभाग में हम मध्य एशिया, तिब्बत, चीन, हिन्द चीन एवं पूर्वी द्वीपसमूहों को सम्मिलित कर सकते हैं.
> भारत एवं मध्य एशिया से सम्बन्ध
चीन, भारत तथा ईरान के बीच स्थित प्रदेश को मध्य एशिया या चीनी तुर्किस्तान कहा जाता था, जो काशगर (शैल देश) से लेकर चीन की सीमा तक फैला हुआ था. इस प्रदेश में काशगर, यारकन्द, खोतान, शानशान, तुर्फान, कुची, करसहर आदि प्रदेश आते हैं.
मध्य एशिया के दक्षिणी राज्यों तथा भारत के उत्तरी पश्चिमी राज्यों के मध्य व्यापारिक सम्बन्ध होने के कारण यहाँ भारतीय उपनिवेशों की स्थापना हुई और शीघ्र ही ये स्थल धर्म प्रचार के केन्द्र में परिवर्तित हो गए. गुप्तकाल के प्रारम्भ होने तक यहाँ बौद्ध धर्म ने अपनी जड़ें जमा ली थीं. बौद्ध धर्म को यहाँ के शासकों ने अपनाया तथा कुलीन लोगों ने संस्कृत भाषा को .
उल्लेखनीय है कि धर्म के साथ-साथ भारतीय कला का प्रवेश भी इस क्षेत्र में हो गया और यह गान्धार शैली के रूप में दिखाई देती है. खोतान मध्य एशिया में भारतीय संस्कृति का प्रमुख केन्द्र था. यहाँ अशोक के पुत्र कुणाल ने हिन्दू राज्य की स्थापना की थी. चीनी यात्री फाह्यान भी खोतान में बौद्ध धर्म के प्रचार का विस्तृत विवरण देता है. गोमती विहार यहाँ बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था जहाँ 3,000 भिक्षु अध्यय करते थे.
मध्य एशिया के उत्तरी क्षेत्र में खोतान के समान ही भारतीय संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र कूची स्थित था. यहाँ के शासक भारतीय शासकों के समान अपना नाम धारण करते थे; जैसे— हरिपुष्प, हरदेव आदि यहाँ के विहारों में संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी. कुमारजीव यहाँ के प्रसिद्ध विद्वान् हुए जिन्होंने अपनी विद्वता से भारत, मध्य एशिया एवं चीन में यश प्राप्त किया. 
इस प्रकार स्पष्ट है कि मध्य एशिया के प्रदेशों में भारतीय धर्म एवं कला का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ.
> भारत व तिब्बत के मध्य सम्बन्ध
तिब्बत के विषय में प्रारम्भ में (7वीं सदी से पूर्व) कोई. जानकारी प्राप्त नहीं होती. 7वीं सदी के बाद तिब्बत में भारत से अनेक विद्वानों द्वारा बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार प्रारम्भ किया गया. इस समय यहाँ का शासक सनगम्पों था जिसने मध्य एशिया एवं नेपाल को विजित कर लिया था. तिब्बती भाषा में तारानाथ ने कंग्यूर एवं तंग्यूर नाम से बौद्ध ग्रन्थों का अनुवाद किया. इसी समय तिब्बत से अनेक जिज्ञासु विद्यार्थी अध्ययन के लिए नालन्दा महाविहार में आए. 
तिब्बत की चित्रकला में भारतीय धर्म एवं संस्कृति का प्रचार अधिक देखने को दृष्टिगोचर होता है. आचार्य दीपंकर नामक बौद्ध विद्वान् ने तिब्बत में प्रचार का कार्य किया. 
इस प्रकार स्पष्ट है कि ईसा की 7वीं सदी से ग्यारहवीं  सदी तक तिब्बत भारतीय सभ्यता का प्रमुख केन्द्र रहा. 
> भारत व चीन
भारत व चीन के मध्य सम्बन्धों की शुरूआत अत्यन्त प्राचीनकाल से ही है. महाभारत तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र से में इसका उल्लेख मिलता है. उस समय भी चीन से जल एवं थल मार्ग द्वारा व्यापार होता था. 
चीनी परम्पराओं के अनुसार चीन में भारत से बौद्ध प्रचारक 217 ई. पू. पहुँचे. 2 ई. पू. आक्सस घाटी के कुषाण (यूची) शासकों ने चीनी दरबार में कुछ बौद्ध ग्रन्थ भेंट किए थे. चीन का प्राचीनतम बौद्ध विहार 65 ई. में हानवंश के शासक मिगती ने कश्यप मातंग व धर्मरत्न के रहने के लिए बनवाया था. यह श्वेताश्वर विहार के नाम से जाना जाता है. ईसा की प्रथम सदी में ही चीन में बौद्ध धर्म का पूर्ण प्रचार हो गया था.
चीन में बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का कारण धर्म प्रचारकों का अति उत्साह था. मध्य एशिया के बौद्ध प्रचारक धर्मरक्षा एवं कुमारजीव का नाम इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है. बौद्ध धर्म की सरलता एवं व्यावहारिकता से प्रभावित होकर अनेक चीनी यात्री ने बौद्ध ग्रन्थों की प्रतियाँ लेने एवं धार्मिक स्थलों की यात्रा करने के उद्देश्य से भारत आए. फाह्यान, ह्वेनसांग एवं इत्सिंग के नाम इस सन्दर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.
भारत-चीन सम्बन्धों के फलस्वरूप स्वाभाविक रूप से चीनवासियों के जीवन पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव पड़ा. बौद्ध धर्म के सम्पर्क से चीन में मूर्ति पूजा, मन्दिर निर्माण, भिक्षु जीवन, पुरोहितवाद आदि प्रारम्भ हुए. बौद्ध ग्रन्थों का चीनी भाषा में अनुवाद किया गया. भारतीय गान्धार कला का चीन की कला पर प्रभाव पड़ा तथा बुद्ध एवं बोधिसत्वों की मूर्तियाँ बनाई गईं.
इस प्रकार स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति के विविध तत्वों का चीन की संस्कृति पर प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है.
> भारत व दक्षिण-पूर्व एशिया
दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्तर्गत कम्बोडिया, चम्पा, म्यांमार (बर्मा), स्याम, मलाया प्रायद्वीप जिन्हें सामूहिक रूप से हिन्द-चीन कहा जाता है तथा पूर्वी द्वीप समूह में सुमात्रा, जावा, बोर्नियो और बाली के द्वीप सम्मिलित हैं. प्राचीन भारत में इस पूरे क्षेत्र को ‘सुवर्णभूमि' अथवा 'सुवर्णद्वीप' के बहुमूल्य नाम से जाना जाता था जो गरम मसाले, स्वर्ण, धातुओं, खनिजों के लिए प्रसिद्ध था. समुद्री मार्ग से भारतीय व्यापारी धन की लालसा में यहाँ पहुँचे व स्वतन्त्र राज्यों की स्थापना कर डाली.
अर्थशास्त्र, कथासरित्सागर, पुराणों आदि में भी इन द्वीपों के विषय में जानकारी मिलती है. अरबी लेखक अलबरूनी ने भी अपने ग्रन्थ में इन द्वीपों का उल्लेख किया है.
इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि इन द्वीपों से सम्बन्ध का प्रमुख प्रेरक तत्व व्यापार था. जल एवं स्थल दोनों ही मार्गों से व्यापार इन द्वीपों से होता था. कालान्तर में यह व्यापारिक सम्पर्क राजनीतिक एवं सांस्कृतिक सम्पर्क में बदल गया. भिक्षुओं तथा प्रचारकों ने वहाँ अपने-अपने मतों का प्रचार किया.
> दक्षिण-पूर्वी एशिया : कला
भारतीय कला का स्पष्ट प्रभाव दक्षिण-पूर्वी एशिया की कला के प्रत्येक अंग पर व्यापक रूप से देखने को मिलता है. प्रसिद्ध कलाविद् कुमारस्वामी ने इस क्षेत्र की कला को भारतीय कला ही माना है. नगर निर्माण, स्थापत्य तथा मूर्तिकला के क्षेत्र में भारतीय प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक दर्शनीय है.
दक्षिण-पूर्वी एशिया के प्रसिद्ध नगरों में अंकोरवाट विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो कम्बोज राज्य की राजधानी थी. इसका निर्माण भारतीय नगरों की पद्धति पर हुआ था. यह एक वर्गाकार नगर था, जो चारों ओर गहरी खाईं तथा पत्थर की दीवारों से घिरा हुआ था. नगर में प्रवेश निमित्त खाईं के ऊपर पाँच पुलों का निर्माण किया गया था. इस नगर के भीतर भव्य एवं अलंकृत महल, मन्दिर तथा सरोवर बने हुए थे. इस प्रकार यह एक सुन्दर नगरं था.
दक्षिण-पूर्वी एशिया की वास्तुकला के अन्तर्गत हम जावा के बीरोबदूर स्तूप, कम्बोज के अंकोरवाट मन्दिर, म्यांमार के आनन्द मन्दिर तथा चम्पा के माइसोन एवं पोनगर के मन्दिरों का मुख्य रूप से उल्लेख कर सकते हैं.
जावा स्थित बोरोबुदूर का विशाल बौद्ध स्तूप वस्तुतः प्राचीन विश्व की अत्युत्कृष्ट रचना है. इसका निर्माण शैलेन्द्र राजाओं के संरक्षण में 750-850 ई. के मध्य हुआ था. इसमें कुल नौ चबूतरे हैं. प्रत्येक ऊपरी चबूतरे के मध्य घण्टाकृति का स्तूप बनाया गया है, जो सम्पूर्ण निर्माण को आच्छादित करता है. ऊपर के तीन चबूतरों पर 72 स्तूप निर्मित हैं जिनके ताखों में बुद्ध प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं. नीचे के चबूतरों की दीवारों पर जातक कथाओं तथा अन्य बौद्ध ग्रन्थों से लिए गए अनेक दृश्यों का कलापूर्ण अंकन हुआ है. चारों दिशाओं में ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनाई गई हैं. कुल मिलाकर बोरोबुदूर एक अत्यन्त भव्य रचना है.
कम्बोडिया का अंकोरवाट का विष्णु मन्दिर विशेष रूप से उल्लेखनीय है. इसका निर्माण 1125 ई. में कम्बोज के राजा सूर्य वर्मा द्वितीय द्वारा करवाया गया था. यह सम्पूर्ण मन्दिर प्रस्तर निर्मित है. ढाई मील के घेरे में स्थित इस मन्दिर के चारों ओर 650 फुट चौड़ी तथा 2 मील लम्बी खाई है. मन्दिर में जाने के लिए 40 फुट चौड़ा एक पुल बनवाया गया है. मन्दिर तीन हजार फुट की चौकोर पत्थर की मेढ़ी आधे मील की परिधि में बनी एक लम्बी वीथी (गैलरी) ( चबूतरे) पर बना है. प्रवेश द्वार के अन्दर जाते ही लगभग मिलती है. यह मन्दिर का प्रदक्षिणा पथ है. मन्दिर का गर्भगृह ऊँचाई पर स्थित है जिस तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया गया है. मन्दिर का मध्य शिखर सबसे ऊँचा है तथा चार अन्य छोटे शिखर चारों कोनों पर स्थित हैं. मन्दिर की दीवारों पर पौराणिक कथाओं से सम्बन्धित चित्रों का अंकन किया गया है. रामायण की पूरी कथा को यहाँ उत्कीर्ण किया गया है.
अंकोरवाट का मन्दिर मध्यकालीन हिन्दू स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, जो सदियों की प्राकृतिक आपदाओं को झेलता उसी भव्यता एवं दृढ़ता के साथ खड़ा है.
आनन्द मन्दिर जोकि म्यांमार के पागान में स्थित है अपनी वास्तुकला का भव्य उदाहरण है. यह मन्दिर 564 फुट के वर्गाकार प्रांगण में स्थित है. मुख्य मन्दिर ईंटों द्वारा निर्मित है. मध्य में भगवान् बुद्ध की विशाल मूर्ति स्थित है तथा दीवारों पर जातक कथाओं का कलात्मक ढंग से अंकन किया गया है. सम्पूर्ण मन्दिर पर भारतीय कला का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है.
चम्पा के माइसोन व पो-नगर के मन्दिर, अंकोरवाट का बेयोन मन्दिर, जावा का लोटोंजोगरम आदि मन्दिर भी इस काल की हिन्दू स्थापत्य कला का अत्यन्त कलात्मक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सम्पूर्ण दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय सभ्यता व संस्कृति का व्यापक प्रभाव पड़ा, जिसका अस्तित्व हमें आज भी यहाँ देखने को मिलता है.
> दक्षिण-पूर्वी एवं पूर्वी एशियाई देशों में धर्म के क्षेत्र में भारतीय प्रभाव
भारतीय धर्म प्रचारकों ने इन देशों में भारतीय धार्मिक विचारों और संस्थाओं को प्रचलित किया. वहाँ की जनता ने इसे आसानी से स्वीकार कर लिया. हिन्दू धर्म के दो सम्प्रदायों वैष्णव एवं शैव और बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय ने इन देशों में अपनी अच्छी-खासी जगह बना ली और अत्यन्त लोकप्रिय हुए. बर्मा, थाईलैण्ड और श्रीलंका में बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा लोकप्रिय हुई. शिव और विष्णु की पूजा इन देशों में अनेक रूपों में की जाती थी. संयुक्त देवताओं; जैसे— शिव और विष्णु का मिश्रित रूप, त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की पूजा का भी प्रचलन था. धार्मिक कर्मकाण्डों में वैदिक यज्ञों ने महत्वपूर्ण स्थान ले लिया था. बोर्नियो में यज्ञ स्तम्भ मिले हैं. कम्बोज में देवराज पंथ का स्तम्भ में उल्लेख हुआ है. इसकी तीन धार्मिक विचारधाराएँ थीं – लिंग की स्थापना, राजत्व के दैवीकरण और पूर्वजों की पूजा देवराज पंथ तन्त्रिकावाद पर आधारित था. एक में वहाँ के राजा ने विशाल लिंग मन्दिर का निर्माण करवाया भारतीय ब्राह्मण हिरण्यदामा इस धर्म से जुड़ा हुआ था. चम्पा जिसे भद्रेश्वर कहा जाता था. कम्बुज लिंग ऊँचे स्तूपों पर स्थापित किए जाते थे. एक अभिलेख में गौरी, भगवती, देवी, महादेवी और मातृलिंग देवी आदि का उल्लेख है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है शैव धर्म काफी प्रभावी हो गया था विष्णु के विभिन्न अवतार भी इन दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में पूजे जाते थे.
बौद्ध धर्म के इन देशों में प्रचलित होने का प्रमुख कारण था - इसका हिन्दू धर्म से सामीप्य बुद्ध ने ब्राह्मणवादियों के तीन देवताओं को बौद्ध धर्म में स्थान दिया, ये थे— पद्मोदभव (ब्रह्मा), अम्भोजनेत्र (विष्णु) और बुद्ध. छठी एवं आठवीं सदी के अभिलेखों में उत्कीर्णित है कि कम्बोज और चम्पा दोनों नगर बौद्धों को समर्पित थे.
जावा, सुमात्रा, बोरोबुदुर आदि के मन्दिरों से स्पष्ट है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय धर्मों ने अपना स्थान बना लिया था.
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Sun, 08 Oct 2023 07:32:14 +0530 Jaankari Rakho
पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, पाल, परमार, कलचुरि, प्रतिहार, गहड़वाल एवं चोलों का इतिहास एवं प्रशासन https://m.jaankarirakho.com/408 https://m.jaankarirakho.com/408 > पल्लव काल : धार्मिक आन्दोलन
पल्लव काल में धार्मिक आन्दोलन का सूत्रपात नयनार व अलवार संतों द्वारा किया गया. नयनार संत शैव धर्म के पोषक थे तथा अलवार वैष्णव के. पल्लव राजाओं का काल इन दोनों प्रकार के भक्ति आन्दोलनों का उल्लेखनीय काल रहा है. यह आन्दोलन छठी सदी से 9वीं सदी तक चलता रहा. इस काल में दोनों सम्प्रदायों में अनेक सन्त हुए जिनके प्रवचनों के प्रभाव में आकर पल्लव शासकों ने इनको संरक्षण प्रदान किया तथा इन्हें जनता ने अपनाया.
पल्लव शासनकाल में नयनार सन्तों द्वारा शैव धर्म का प्रचार-प्रसार किया गया. इन संतों की संख्या 63 बताई गई है जिनमें अप्पार, संबंदर, सुन्दरमूर्ति, मणिक्कवाचगर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं. इनके गीतों को 'देवारम' नामक पुस्तक में संगृहीत किया गया है. अप्पार, जोकि महेन्द्र वर्मन प्रथम के काल में हुए थे उन्होंने दास भाव से ईश्वर की सेवा की तथा एक निष्ठावान शैव बन गए. संबंदर ने बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित किया. सुन्दर मूर्ति, जोकि अल्पायु थे, को उनकी अनन्य शैव भक्ति के कारण उन्हें ईश्वर मित्र की उपाधि प्रदान की गई. इसी प्रकार मणिक्वागचर ने श्रीलंका के बौद्धों को वाद-विवाद में हराया तथा अनेक भक्ति गीत लिखे. उनके गीतों का संकलन 'तिरुवाशगम' में किया गया है जिसमें प्रेम की प्रधानता है.
सभी शैव सन्तों ने भजन-कीर्तन, शास्त्रार्थ एवं उपदेशों आदि के माध्यम से जनता में शैव धर्म का जोरदार अभियान छेड़ा तथा जाति-पाँति को त्यागकर सभी वर्गों के लोगों को भक्ति का उपदेश दिया, जिसके फलस्वरूप लोगों व शासकों द्वारा शैव धर्म को इस काल में खूब प्रश्रय दिया गया.
नयनार सन्तों की भाँति ही इस काल में वैष्णव भक्ति की धारा को दक्षिण में प्रवाहित करने का कार्य अलवार सन्तों द्वारा किया गया. इनकी संख्या बारह थी जिनमें भूतयोगी, सरोयोगी, महायोगी, भक्तिसार, मधुर कवि आदि मुख्य थे. प्रारम्भिक अलवार सन्तों में पोडिय, पोगोई तथा पेय के नाम मिलते हैं, जो मल्लई, काँची व मामल्लपुरम् के निवासी थे. इनके उपदेश सीधे एवं सरल थे. महेन्द्र वर्मन प्रथम के समय तिरुमलिराई हुए जिन्होंने अपने भक्ति गीतों के माध्यम से बौद्ध एवं जैन धर्मों का खण्डन किया. एकमात्र स्त्री अलवार संत अंदाल का नाम हमें इस काल में मिलता है, जो मध्यकालीन मीरा की तरह कृष्ण की प्रेम दीवानी थी. अलवार सन्तों की अन्तिम कड़ी के रूप में नम्मालवार और उनके शिष्य मधुर कवि का नाम मिलता है. इन्होंने बड़ी संख्या में भक्ति गीत लिखे जिनमें दार्शनिक चिन्तन का स्पष्ट भाव दृष्टिगोचर होता है.
अलवार सन्तों ने प्रेम भक्ति द्वारा ही आत्मसमर्पण को ही सर्वाधिक महत्व प्रदान किया. अलवार सन्तों के प्रभाव में आकर ही कई पल्लव शासकों ने वैष्णव धर्म अपना लिया और उसे राजधर्म बनाकर अपना संरक्षण प्रदान किया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि पल्लवकालीन समाज में नयनार एवं अलवार सन्तों द्वारा छेड़ा गया भक्ति आन्दोलन बड़े तीव्र वेग से पूरे दक्षिण भारत में प्रवाहित हुआ और बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म को दक्षिण भारत में हिला दिया. इस काल में शैव तथा वैष्णव धर्म से सम्बन्धित अनेक मन्दिरों का निर्माण किया गया, जोकि उस काल की धार्मिक गतिविधियों के केन्द्र थे.
> पल्लव कौन थे ?
पल्लव कौन थे ? यह जानना इतिहास के शोधार्थी के लिए समस्या का विषय है. जहाँ तक प्राचीनता का प्रश्न है दक्षिण भारत के तीनों राजवंशों चेर, चोल और पाण्ड्य के इतिहास में इनका कोई उल्लेख नहीं है. कुछ इतिहासकारों के अनुसार पल्लव उत्तर-पश्चिम भारत के पहलवों की शाखा के वंशज थे. इस मत के समर्थन में केवल इतना ही है कि दोनों के नामों में समानता है. इसके अतिरिक्त कुछ नहीं. दूसरे मत के अनुसार पल्लव दक्षिण भारत के मूल निवासी थे और कुरुम्ब, कल्लर, मारवार और अन्य जनजातियों से सम्बन्धित थे. एक अन्य मत के अनुसार कीलीवलवन चोल और मनीपल्लवरम की नाग राजकुमारी पीलीवलाई से उत्पन्न पुत्र ईलम तिराईयम ने तोंडमण्डलम में पल्लव राजवंश की स्थापना की डॉ. कृष्णास्वामी अयंगर के अनुसार संगमकाल में पल्लवों को तोंडाय्यार के नाम से जाना जाता था, जो सातवाहनों के अधीनस्थ नागवंश की सन्तति थे. के. पी. जयसवाल के अनुसार न तो वे विदेशी थे और न ही द्रविड़ वे उत्तर भारत के किसी शाही परिवार से थे, जो दक्षिण में बस गया था. तालागुण्डा अभिलेख में पल्लवों को क्षत्रिय कहा गया है.
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि पल्लवों के मूल स्रोत के विषय में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता.
> पल्लव साहित्य
संस्कृत एवं तमिल दोनों भाषाओं की दृष्टि से पल्लव काल उल्लेखनीय उन्नति का काल रहा है. पल्लव नरेश स्वयं उच्चकोटि के विद्वान् थे एवं अपने दरबार में विद्वानों, कवियों को आश्रय प्रदान करते थे. 'मत्तविलास प्रहसन' नामक नाटक की रचना स्वयं पल्लव शासक महेन्द्र वर्मन प्रथम ने की थी. इस नाटक में कापालिकों एवं बौद्ध भिक्षुकों की हँसी उड़ाई गई है. महाकवि भारवि, जोकि 'किरातार्जुनीयम्' के रचयिता थे उसकी राजसभा की शोभा बढ़ाते थे. महेन्द्र बर्मन का उत्तराधिकारी नरसिंह वर्मा भी महान् विद्या-प्रेमी था उसकी राजसभा में दण्डी जिन्होंने 'दशकुमारचरित' एवं 'काव्यादर्श' की रचना की थी, निवास करते थे. पल्लव शासकों लेख विशुद्ध संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं.
संस्कृत के साथ-साथ इस काल में तमिल भाषा की भी उल्लेखनीय प्रगति हुई. अलवार तथा नयनार सन्तों ने तमिल भाषा में हजारों गीतों की रचना कर तमिल साहित्य की श्रीवृद्धि की.
पल्लव शासकों की राजधानी उस समय विद्या का प्रमुख केन्द्र थी, जहाँ एक संस्कृत महाविद्यालय (घटिका) था. महाभारत का नियमित पाठ यहाँ के एक मण्डप में होता था तथा ब्राह्मण परिवार वेदाध्ययन किया करते थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि पल्लवकाल में न केवल संस्कृत भाषा, बल्कि तमिल भाषा का उल्लेखनीय विकास हुआ. वस्तुतः पल्लव काल साहित्य समृद्धि का काल था. शै
> पल्लवकाल की कला लियाँ
प्रसिद्ध कलाविद् पर्सी ब्राउन ने पल्लव वास्तुकला के विकास की शैलियों को चार भागों में विभक्त किया है जिनका क्रमशः विवरण निम्नलिखित है
(1) महेन्द्र शैली (610–640 ई.) – इस शैली के मन्दिरों को ‘मण्डप' कहा जाता है, जो कठोर प्रस्तर को काटकर गुहा मन्दिर के रूप में बनाए गए हैं. ये मण्डप स्तम्भ युक्त बरामदे हैं जिनकी पिछली दीवार में एक या अधिक कक्ष बनाए गए हैं. मण्डप के बाहर बने मुख्य द्वार पर द्वारपालों की मूर्तियाँ बनी हैं, जो कलात्मक दृष्टि से उत्कृष्ट कोटि की हैं. मन्दिर के सामने स्तम्भों की एक पंक्ति मिलती है. प्रत्येक स्तम्भ 7 फीट ऊँचा है. स्तम्भ प्रायः चौकोर हैं जिनके ऊपर के शीर्ष सिंह आकार के हैं. महेन्द्र शैली के मण्डपों में महाबलीपुरम का त्रिमूर्ति मण्डप, पल्लवरम का पंच पाण्डव मण्डप, महेन्द्रवाड़ी का महेन्द्र विष्णु मण्डप, त्रिचनापल्ली का ललितांकुर पल्वेश्वर गृह मण्डप आदि विशेष उल्लेखनीय हैं. इस शैली के प्रारम्भिक मण्डप सादे तथा अलंकरण रहित हैं, किन्तु बाद के मण्डपों को अलंकृत करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है. पञ्च पाण्डव मण्डप में छः अलंकृत स्तम्भ लगाए गए हैं. महेन्द्र वर्मा प्रथम के बाद भी कुछ समय तक इस शैली का विकास होता रहा.
(2) मामल्ल शैली – यह शैली नरसिंह वर्मा महामल्ल के काल में विकसित हुई तथा इसके अन्तर्गत मण्डप तथा एकाश्मक मन्दिर जिसे 'रथ' कहा गया, ये दो प्रकार के स्मारक बने. ये सभी स्मारक मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) में हैं. यहाँ मुख्य पर्वत पर दस मण्डप बनाए गए हैं. इनमें आदि वराह, महिषमर्दिनी, पंच पाण्डव, रामानुज मण्डप आदि विशेष उल्लेखनीय हैं. इन्हें विविध प्रकार से अलंकृत किया गया है. मण्डपों का आकार प्रकार बड़ा नहीं है तथा स्तम्भ क पतले व लम्बे बने हैं. इनके ऊपर पद्म, कुम्भ, फलक आदि अलंकरणों का निर्माण किया गया है. स्तम्भों को मण्डपों में अत्यन्त अलंकृत ढंग से संयोजित किया गया है. मण्डप अपनी मूर्तिकारी के लिए प्रसिद्ध हैं. इनमें महिषमर्दिनी, अनन्तशायी विष्णु, त्रिविक्रम आदि की मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं. आदि बाराह मण्डप में राजपरिवार के दो सदस्यों का जहाँ अंकन किया गया है वहीं पञ्च पाण्डप मन्दिर में गोवर्धनधारी कृष्ण का दृश्य अत्यन्त मनोहारी है.
मामल्ल शैली की दूसरी रचना रथ अथवा एकाश्मक मन्दिर इन्हें कठोर चट्टानों से काटकर एक ही पत्थर से बनाया गया है. रथ मन्दिरों का आकार-प्रकार अन्य कृतियों की अपेक्षा छोटा है. रथों का आकार 42' x 35' × 40' का है. प्रमुख रथ द्रोपदी, नकुल, सहदेव, अर्जुन, भीम, धर्मराज, गणेश, पिण्डारी आदि रथ मन्दिर हैं. 
इन रथ मन्दिरों में सर्वश्रेष्ठ रथ धर्मराज रथ है जिसमें पिरामिड के आकार का शिखर बनाया गया है. मध्य में वर्गाकार कक्ष तथा नीचे स्तम्भ युक्त बरामदा है. पर्सी ब्राउन के शब्दों में, इस प्रकार की योजना न केवल अपने में एक प्रभाव पूर्ण निर्माण है, अपितु शक्तियों से परिपूर्ण होने के साथ-साथ सुखद रूपों तथा अभिप्रायों का भण्डार है. भीम, सहदेव तथा गणेश रथों का निर्माण चेत्य ग्रहों जैसा है. वहीं द्रोपदी रथ नितान्त साधारण है. 
मामल्ल शैली के रथ अपनी मूर्ति कला के लिए प्रसिद्ध हैं, सभी रथों पर देवी-देवता, जैसे— दुर्गा, इन्द्र, शिव, गंगा, पार्वती आदि की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं. इन रथों को 'सप्त पैगोड़ा' कहा गया है. इन रथ मन्दिरों को द्राविड़ शैली का अग्रदूत कहा जा सकता है.
(3) राजसिंह शैली (674-800 ई.) – इस शैली का प्रारम्भ नरसिंह वर्मन द्वितीय राजसिंह द्वारा किया गया जिसमें पत्थर, ईंट आदि की सहायता से इमारती मन्दिरों का निर्माण किया गया. इस शैली के तीन मन्दिर महाबलीपुरम से प्राप्त होते हैं; यथा—शोर मन्दिर, ईश्वर मन्दिर तथा मुकन्द मन्दिर. शोर मन्दिर इस शैली का प्रथम उदाहरण है. काँची के कैलाश मन्दिर, बैकुण्ठ पेरुमाल का मन्दिर इस शैली के अन्य उदाहरण हैं.
महाबलीपुरम् के समुद्र तट पर स्थित शोर मन्दिर पल्लव कलाकारों की कारीगरी का अद्भुत नमूना प्रस्तुत करता है. मन्दिर का निर्माण एक विशाल प्रांगण में किया गया है. इसका गर्भगृह पश्चिम की ओर है तथा चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है. दीवारों पर गणेश स्कन्द, गज, शार्दूल आदि की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं. यह द्राविड़ वास्तु की सुन्दर रचना है.
काँची का कैलास मन्दिर राजसिंह शैली के चरम उत्कर्ष को व्यक्त करता है. इस मन्दिर की विशेषताएँ परिवेष्ठित प्रांगण, गोपुरम स्तम्भयुक्त मण्डप, विमान आदि का निर्माण एक साथ किया गया है. इसके निर्माण में ग्रेनाइट तथा बलुआ पत्थर दोनों का प्रयोग किया गया है. इस मन्दिर में शैव सम्प्रदाय एवं शिव लीलाओं से सम्बन्धित अनेक सुन्दरसुन्दर मूर्तियाँ अंकित हैं, जो उसकी शोभा को द्विगुणित करती हैं.
परमेश्वर वर्मन द्वितीय के समय में निर्मित बैकुण्ठ पेरुमाल का मन्दिर है. यह भगवान् विष्णु का मन्दिर है जिसमें प्रदक्षिणायुक्त गर्भगृह एवं सोपान युक्त मण्डप है. मन्दिर का विमान वर्गाकार एवं चार तल्ला है. मन्दिर की भीतरी दीवारों पर युद्ध, राज्याभिषेक, अश्वमेध, उत्तराधिकार चयन, नगर जीवन आदि दृश्यों का अत्यन्त सुन्दर ढंग से अंकन किया गया है. मन्दिर में भव्य एवं आकर्षक स्तम्भ लगे हैं. पल्लव वास्तुकला का विकसित स्वरूप इस मन्दिर में दिखाई देता है.
(4) नन्दि वर्मन शैली (800-900 ई.) — इस शैली के अन्तर्गत अपेक्षाकृत छोटे मन्दिरों का निर्माण किया गया. इसका उदाहरण काँची के मुक्तेश्वर एवं मातंगेश्वर मन्दिर, ओरगडम का बड़मल्लिश्वर मन्दिर, गुड्डिमल्लम का परशुरामेश्वर मन्दिर आदि हैं. काँची में इस शैली के प्राचीनतम नमूने मिलते हैं. इसमें प्रवेश द्वार पर स्तम्भ युक्त मण्डप बने हैं. इसके बाद के मन्दिर चोल शैली से प्रभावित एवं उसके निकट हैं.
इस प्रकार स्पष्ट है कि पल्लव राजाओं का शासनकाल एवं स्थापत्य की उन्नति के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध रहा. इस काल की कुछ कलात्मक कृतियाँ आज भी अपने निर्माताओं की महानता का परिचय दे रही हैं.
> पल्लव प्रशासन के अधिकारी 
1. रत्तिका - जिले का शासक 
2. मदम्बा - कस्टम अधिकारी 
3. देशाधिकत - स्थानीय अधिकारी 
4. गाम- गामभोजक - गाँव-गाँव विचरण करने वाले अधिकारी
5. अमच्च -  मन्त्री
6. अरखादिकत - रक्षक
7. गुमिक - जंगल का अधिकारी
8. दूतिक - दूत
9. संजरंतक - गुप्तचर
> बादामी के पश्चिमी चालुक्य
डॉ. डी. सी. सरकार ने चालुक्यों की उत्पत्ति कन्नड़ परिवार से बताई है और उन्हें क्षत्रिय माना है. s की शुरूआत जयसिंह से मानी जाती है, लेकिन बादामी का चालुक्य सत्ता " पहला चालुक्य शासक पुलकेशिन प्रथम (535-66 ई.) था. वह पहला चालुक्य शासक था जिसने महाराज की उपाधि : "धारण " की और अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया. उसने वातापी या बादामी को अपनी राजधानी बनाया. 
पुलकेशिन प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कीर्तिवर्मन बना, जिसने बंग, अंग, कलिंग, वटुरा, मगध आदि के शासकों को परास्त किया. उसने कदम्ब शासकों के संगठन को तोड़ दिया. कीर्तिवर्मन के बाद उसका भाई मंगलेश 598 ई. में गद्दी पर बैठा. उसने कलचुरियों को परास्त किया और रेवतीद्वीप पर अधिकार कर लिया. मंगलेश और उसके पुत्र पुलकेशिन द्वितीय के बीच गृहयुद्ध हुआ जिसमें विजय पुलकेशिन द्वितीय को मिली. 
पुलकेशिन द्वितीय ने 610-42 ई. तक शासन किया. उसने पृथ्वी वल्लभ, श्री पृथ्वी वल्लभ, परमेश्वर आदि उपाधियाँ धारण कीं. पुलकेशिन द्वितीय ने कदम्बों की राजधानी बनबासी पर अधिकार कर लिया और मैसूर के गंग और अलूपाओं को समर्पण करने के लिए बाध्य किया. गंग शासक ने अपनी पुत्री का विवाह पुलकेशिन द्वितीय के साथ कर दिया. अन्य अनेक शासकों को हराने के साथ-साथ पुलकेशिन द्वितीय ने 637-38 ई. में हर्षवर्धन को पराजित किया. पुलकेशिन द्वितीय ने महेन्द्रवर्मन को परास्त किया, लेकिन बाद में पल्लवों के हाथों पराजित हुआ. 
ऐसा कहा जाता है कि 642-55 ई. तक चालुक्य सिंहासन खाली पड़ा रहा. 655 ई. में विक्रमादित्य प्रथम ने पल्लवों से वातापी छीनकर पुनः चालुक्य सत्ता स्थापित की. विक्रमादित्य प्रथम ने 655-81 ई. तक, विनयादित्य ने 68196 ई. तक, विजयादित्य ने 696-733 ई तक शासन किया. कीर्तिवर्मन द्वितीय अन्तिम महान् चालुक्य शासक था. उसने 746-57 ई. तक शासन किया.
> चालुक्य प्रशासन
चालुक्यों का शासनकाल लगभग दो सदियों तक दक्षिण भारत में रहा और उन्होंने प्राचीन शास्त्रों में विहित राजतन्त्र प्रणाली के अनुसार शासन किया. समूचे प्रशासन तन्त्र का केन्द्र बिन्दु सम्राट था जिसका पद आनुवंशिक था जिसकी उपाधि परमेश्वर, महाराजाधिराज, परमभट्टारक, सत्याश्रय, श्री पृथ्वीबल्लभ आदि थी.
उत्तराधिकार प्रायः ज्येष्ठ पुत्र को अथवा उसके अल्पवयस्क होने पर भाई को दिया जाता था जैसा कि कीर्ति वर्मन की मृत्यु के बाद मंगलेश का राजपद का मिलना.
चालुक्य लेखों में किसी मन्त्रिपरिषद् का उल्लेख नहीं किया गया है. प्रशासन में राजपरिवार के सदस्य ही मुख्यतः सम्मिलित थे. महासंधिविग्रहिक, विषयपति, ग्रामकूट, महात्तरघिकारिन आदि पदाधिकारियों के नाम अभिलेखों में मिलते हैं.
इस युग में सामन्तवाद का अस्तित्व था. चालुक्य शासकों ने अपने विजित प्रदेशों को सामन्तों के अधीन रख छोड़ा था जहाँ उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता थी. वे समय-समय पर सम्राट को कर देते थे तथा युद्ध के समय सेना द्वारा राजा की सहायता करते थे. इस प्रकार प्रशासन उत्तरोत्तर विकेन्द्रित होता जा रहा था.
राजकुल के सदस्यों को विभिन्न प्रान्तों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता था. प्रायः युवराज केन्द्रीय प्रान्त का राज्यपाल होता था.
स्थानीय स्तर पर ग्राम ही प्रशासन की मुख्य इकाई थे जिसका अधिकारी 'गामुण्ड' कहलाता था. इसकी नियुक्ति केन्द्र द्वारा सीधे होती थी. इसके अतिरिक्त प्रत्येक गाँव में एक महाजन होता था जो ‘गामुण्ड' की सहायता करता था. विक्रमादित्य के समय के लक्ष्मेश्वर लेख से ज्ञात होता है कि स्थानीय संस्थाओं के शासन में सरकारी हस्तक्षेप बहुत अधिक होता था तथा उनका संचालन राजाज्ञाओं द्वारा ही होता था.
लक्ष्मेश्वर लेख के अनुसार कर प्रणाली के कुछ संकेत प्राप्त होते हैं जिनके पास अपने मकान एवं भूमि नहीं थी उन्हें भी अपनी व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार कर देना पड़ता था. निधि, उपनिधि (निक्षेप), विलप्त (लगान का बन्दोबस्त ) तथा उपरिकर आदि करों का उल्लेख अभिलेखों में मिलता है. इन करों के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के धार्मिक कर भी लिए जाते थे.
साम्राज्य अनेक प्रान्तों में बँटा था, यहाँ के प्रशासक मण्डलेश्वर के नाम से जाने जाते थे तथा क्षेत्रीय विभाजन 'नाडु' कहलाता था, जिसे विषय कहा जाता था.
नगर का प्रशासन वाणिज्यिक संघों द्वारा चलाया जाता था. नगराध्यक्ष नगरों का प्रशासक होता था.
इस प्रकार स्पष्ट है कि चालुक्य प्रशासन में केन्द्रीयकरण के लक्षण होते हुए भी उसमें विकेन्द्रीकरण के पर्याप्त तत्व मौजूद थे.
> चालुक्य काल में शिक्षा एवं साहित्य
चालुक्य काल में शिक्षा एवं साहित्य की उल्लेखनीय प्रगति हुई. ह्वेनसांग चालुक्य राज्य के लोगों को विद्या का व्यसनी बताता है. चालुक्य लेखों में संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है और यह उसके अत्यधिक विकसित रूप को प्रकट करता है.
विद्यार्थियों को नियन्त्रित एवं शिक्षकों को प्रशिक्षित किए जाने चालुक्य काल में शिक्षा के प्रमुख केन्द्र मन्दिर थे, जहाँ के साथ कला का भी विस्तृत विकास किया जाता था. मन्दिरों को काफ़ी अनुदान दिया जाता था. 
कर्नाटक में शिक्षा के मुख्य केन्द्र ब्रह्मपुरी, घटिकामठ, अग्रहार एवं मठ थे. ब्रह्मपुरी ब्राह्मणों का पृथक् निवास स्थान था जहाँ बाद में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान की जाती थी. अग्रहार उस ग्राम को कहा जाता था जो विद्वान् ब्राह्मणों को दान में दिया जाता था, ताकि शैक्षणिक एवं धार्मिक क्रियाकलाप सुचारु रूप से चल सके. तुलनात्मक रूप से घटिका स्थान एवं मठों की संख्या काफी कम थी.
चालुक्य काल में साहित्य का भी काफी विकास हुआ. पुलकेशियन द्वितीय के सामन्त गंजराज दुर्बिनिति ने 'शब्दावतार' नामक व्याकरण ग्रन्थ लिखा तथा किरातार्जुनीय के 15वें सर्ग पर टीका लिखी. उसने गुणाढ्य के 'वृहत्कथा' का संस्कृत भाषा में अनुवाद भी किया. इस चरण के अन्य विद्वानों में उदयदेव तथा सोमदेव सूरि भी थे. उदयदेव जैन मतानुयायी एवं प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य थे. उन्होंने 'जैनेन्द्र व्याकरण' की रचना की. सोमदेव सूरि ने 'यशस्तिलकचम्पू' तथा 'नीतिवाम्यामृत' नामक ग्रन्थों का प्रणयन किया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि चालुक्य काल में शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति हुई,
> चालुक्य काल : कला एवं स्थापत्य का विकास 
चालुक्य शासनकाल में कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति हुई. इस समय जैन एवं बौद्ध धर्म के अनुकरण पर हिन्दू देवी-देवताओं के लिए पर्वत गुफाओं को काटकर मन्दिर बनवाए गए. चालुक्य काल में बने मन्दिर बादामी एहोल व पत्तडकल से हमें प्राप्त होते हैं.
बादामी में पाषाण को काटकर चार स्तम्भ युक्त मण्डप बनाए गए हैं. इनमें से तीन हिन्दू तथा एक जैन धर्म से सम्बन्धित है. प्रत्येक में स्तम्भ युक्त बरामदा, मेहराब युक्त हाल, एक छोटा वर्गाकार गर्भगृह पाषाण में गहराई से काटकर बनाए गए हैं. इनमें से एक वैष्णव गुहा है जिसके बरामदे में विष्णु की दो मूर्तियाँ प्राप्त होती हैं. इन गुफाओं की भीतरी दीवारों पर विभिन्न प्रकार की सुन्दर-सुन्दर चित्रकारी है.
एहोल को मन्दिरों का नगर कहा जाता है. यहाँ कम-सेकम लगभग 70 मन्दिरों के अवशेष प्राप्त होते हैं. यहीं पर रविकीर्ति द्वारा बनवाया गया ‘मेंगुती का जैन मन्दिर' है. अधिकांश मन्दिर विष्णु तथा शिव के हैं. यहाँ का सबसे सुन्दर मन्दिर सूर्य का एक मन्दिर है जो 'लाढ़ खा' के नाम से प्रसिद्ध है. यह एक गुहा मन्दिर है, जो लगभग 50 वर्ग फुट में बना है. इसकी छत सपाट है. छत में एक छोटा गर्भगृह तथा द्वार मण्डप बने हुए हैं. गर्भगृह के सामने स्तम्भों पर टिका एक बरामदा तथा विशाल सभाकक्ष है. छत बड़े पत्थरों से निर्मित है. इसमें शिखर नहीं हैं. air use
एहोल में एक अत्यन्त अन्य सुन्दर मन्दिर दुर्गा का मन्दिर है. जो 60' x 36' के आकार में निर्मित है. इसका निर्माण एक ऊँचे चबूतरे पर किया गया है. इसकी चपटी छत जमीन से 30' ऊँची है. गर्भगृह के ऊपर एक शिखर है तथा बरामदे में प्रदक्षिणा पथ का निर्माण किया गया है. इस प्रकार यह मन्दिर बौद्ध गुहा चैत्यों के आधार पर बनाया गया है.
पत्तदकल में भी चालुक्यों द्वारा बनवाए हुए अनेक मन्दिरों के अवशेष प्राप्त होते हैं. यहाँ से 10 मन्दिरों के अवशेष जिनमें 4 नागर शैली में व 6 मन्दिर द्राविड़ शैली में निर्मित हैं. नागर शैली में 'पार्श्वनाथ का मन्दिर' तथा द्राविड़ शैली में ‘विरुपाक्ष’ व ‘संगमेश्वर' के मन्दिर उल्लेखनीय हैं. विरुपाक्ष मन्दिरों का निर्माण विक्रमादित्य द्वितीय की रानी ने 740 ई. के लगभग करवाया था. मन्दिर के सामने नंदि मण्डप बना है. इसके चारों ओर वेदिका तथा एक तोरण द्वार है. मन्दिर की बाहरी दीवार में स्तम्भ जोड़कर सुन्दर ताख बनाए गए हैं जिनमें मूर्तियाँ रखी गई हैं ये शिव, नाग, नागिन तथा रामायण से लिए गए दृश्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं. विख्यात कलाविद् पर्सी 'ब्राउन' के शब्दों में, 'विरुपाक्ष मन्दिर' प्राचीनकाल की उन दुर्लभ इमारतों में से एक है जिनमें उन मनुष्यों की भावना अब भी टिकी हुई है जिन्होंने इसकी कल्पना की तथा अपने हाथों से निर्मित किया.
अजन्ता तथा एलोरा दोनों ही चालुक्यों के राज्य में विद्यमान थे. सम्भवतः यहाँ की कुछ गुफाएँ इसी काल की हैं. अजन्ता के एक गुहा चित्र में पुलकेशियन द्वितीय को ईरानी मण्डल का स्वागत करते हुए दिखाया गया है.
इस प्रकार स्पष्ट है कि चालुक्य शासनकाल में न केवल शिक्षा साहित्य बल्कि कला विशेष रूप से स्थापत्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई.
> चालुक्यकालीन : धार्मिक स्थिति
चालुक्य शासक धर्मनिष्ठ हिन्दू थे तथा प्राचीन शास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार उन्होंने अपने जीवन का निर्वाह किया तथा उन्होंने हिन्दू धर्म को अपना संरक्षण प्रदान किया. ' उन्होंने अश्वमेध, वाजपेय आदि अनेक यज्ञों का अनुष्ठान अपने विजयों के फलस्वरूप किया. उन्होंने ब्राह्मणों को अतुल दान दिया. उनके कुल देवता विष्णु थे. इसके अतिरिक्त उन लोगों ने शिव की भी आराधना की. वराह चालुक्य शासकों का राजकीय चिह्न था. अधिकांश चालुक्य लेख विष्णु के वराह अवतार की आराधना से ही प्रारम्भ होते हैं. बादामी के चित्रों में शेष शय्या पर लक्ष्मी के साथ शयन करते हुए नरसिंह आदि रूपों को दिखाया गया है. कुछ चालुक्य शासकों की उपाधि ‘परम भागवत्' थी. विष्णु एवं शिव की आराधना के साथ-साथ पौराणिक देवी-देवताओं की पूजा के विधान भी प्रचलित थे.
चालुक्य शासक स्वयं ब्राह्मण होते हुए भी धर्म सहिष्णु थे. उन्होंने दक्षिणापथ में जैन एवं बौद्ध धर्मों के विकास को भी प्रोत्साहन दिया. चालुक्य लेखों से पता चलता है कि उन्होंने जैन शिक्षकों एवं साधुओं को भी ब्राह्मणों की ही भाँति दान दिए. एहोल अभिलेख का रचयिता रविकीर्ति जैन था, जिसके द्वारा 'मेगुति का मन्दिर बनवाया गया. बादामी तथा एहोल की गुफाओं में भी जैन मूर्तियाँ प्राप्त होती हैं.
चालुक्य शासनकाल में तुलनात्मक रूप से ब्राह्मण एवं जैन धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म हीन अवस्था में था, फिर भी चालुक्य राज्य में अनेक विहार तथा मठों का निर्माण किया गया था, जिसमें हीनयान एवं महायान दोनों ही सम्प्रदायों के मानने वाले निवास करते थे. ह्वेनसांग जो पुलकेशियन द्वितीय के समय महाराष्ट्र गया था, ने बादामी में पाँच अशोक स्तूप देखे थे. वह चालुक्य राज्य में मठों की संख्या 100 से अधिक बताता है, जिनमें 5 हजार से अधिक भिक्षुक निवास करते थे.
> कामरूप का वर्मन वंश
परिचय
इस वंश की प्रतिष्ठा का संस्थापक पुष्य वर्मन था. इसने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की जो इसकी स्वतन्त्र स्थिति का सूचक है. इसने अपनी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर बसाई. पुष्य वर्मन ने पुण्ड्रवर्धन में गुप्तों के विरुद्ध अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर अश्वमेध यज्ञ किया. मिदनापुर ताम्रपत्र अभिलेख उसे समस्त कामरूप ( आधुनिक असम) का स्वामी कहता है.
पुष्य वर्मन के बाद चन्द्रमुख, स्थित वर्मन, सुस्थित वर्मन हुए, जिनके विषय में केवल यह पता चलता है कि उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किए थे.
सुस्थित वर्मन का पुत्र मृगांक उसका उत्तराधिकारी हुआ जिसे हर्षचरित में ‘महाराजाधिराज' कहा गया है. हर्षचरित में • मृगांक की वीरता की बड़ी प्रशंसा की गई है, परन्तु इसे उत्तर गुप्त वंश के शासक महासेन गुप्त ने पराजित कर मार डाला.
> भास्कर वर्म
भास्कर वर्मन, वर्मन वंश का सर्वाधिक प्रतापी शासक हुआ. इसमें सैनिक एवं प्रशासनिक दोनों तरह की पर्याप्त योग्यता थी. वह एक अत्यन्त कूटनीतिज्ञ व्यक्ति था. इसने गौड़ नरेश के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से कन्नौज के हर्षवर्द्धन से मित्रता की कुछ विद्वान् यह मानते हैं कि भास्कर वर्मन ने हर्ष की अधीनता स्वीकार कर ली थी.
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भास्कर वर्मन के राज्य की यात्रा की थी. भास्कर वर्मन ने हर्ष के कन्नौज सम्मेलन में भी भाग लिया था. हर्ष की मृत्यु के बाद भास्कर वर्मन ने अपने राज्य का विस्तार किया और सम्पूर्ण गौड़ प्रदेश पर अधिकार कर पूर्वी भारत का सबसे बड़ा शक्तिशाली शासक बन गया. इसने लगभग 650 ई. तक शासन किया.
भास्कर वर्मन की मृत्यु के बाद कामरूप के वर्मन वंश के इतिहास के विषय में हमें जानकारी नहीं मिलती. बाद में कामरूप पाल वंश के अधीन हो गया.
> पाल राजवंश
बंगाल के पाल वंश के इतिहास पर प्रकाश डालने के लिए हमें निम्नलिखित अभिलेखीय एवं साहित्यिक साक्ष्यों का सहारा लेना पड़ता है - 
1. धर्मपाल का खालिमपुर अभिलेख.
2. देवपाल का मुंगेर अभिलेख.
3. नारायण पाल का भागलपुर ताम्रपत्र अभिलेख.
4. नारायण पाल का बादल स्तम्भ लेख.
5. महिपाल प्रथम के बानगढ़, नालन्दा तथा मुजफ्फरपुर से प्राप्त अभिलेख.
इन लेखों के अतिरिक्त समकालीन गुर्जर प्रतिहार तथा राष्टकूटों के अभिलेखों से भी पाल शासकों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है. इस काल में लिखी गई संध्याकर नन्दी की पुस्तक 'रामचरित' में रामपाल की उपलब्धियों का वर्णन प्रामाणिक रूप से प्राप्त होता है.
पाल वंश के प्रथम शासक गोपाल–पाल वंश के संस्थापक शासक गोपाल के प्रारम्भिक जीवन के विषय में बहुत कम जानकारी प्राप्त होती है. उसका पितामह दयितविष्णु एक विद्वान् व्यक्ति था तथा उनका पिता बप्यत एक योग्य सैनिक था. धर्मपाल के खालिमपुर अभिलेख के अनुसार “मात्स्यन्याय से छुटकारा पाने के लिए प्रकृतियों ( सामान्य जनता) ने गोपाल को लक्ष्मी की बाँह ग्रहण कराई." तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है.
गोपाल ने बंगाल में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित की तथा अपने शासन के अन्त तक सम्पूर्ण बंगाल पर अपना अधिकार सुदृढ़ कर लिया. देवपाल के मुंगेर अभिलेख में विवरण है कि उसने समुद्र तक पृथ्वी की विजय की थी.
विहार का निर्माण करवाया तथा इसका शासनकाल 750वह बौद्ध मतानुयायी था तथा नालन्दा में उसने एक 770 ई. तक था.
धर्मपाल (770-810 ई.) – धर्मपाल के शासक बनने के समय पालों की प्रतिद्वन्द्विता कन्नौज को लेकर प्रतिहारों एवं राष्ट्रकूटों से थी. धर्मपाल को इन दोनों शक्तियों से संघर्ष करना पड़ा.
सर्वप्रथम प्रतिहार नरेश वत्सराज ने धर्मपाल को हराकर कन्नौज को अपने अधिकार में कर लिया. इस पर राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव ने वत्सराज व धर्मपाल दोनों को हराकर शीघ्र ही दक्षिण को लौट गया. इस आक्रमण का धर्मपाल पर बहुत कम प्रभाव पड़ा तथा उसने शीघ्रता से अपनी शक्ति का संगठन कर लिया.
अब धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण कर वत्सराज की ओर से मनोनीत इन्द्रायुद्ध को हटाकर चक्रायुद्ध को शासक बनाया और कन्नौज में एक बड़े दरबार का आयोजन किया जिसमें अनेक राज्यों के शासकों ने भाग लिया था. इसी से स्पष्ट होता है कि एक समय वह उत्तरी भारत का सार्वभौमिक शासक बन गया था इसकी पुष्टि गुजराती कवि सोढ़ढल ने भी की है.
वत्सराज की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नागभट्ट-II ने धर्मपाल की सत्ता को पुनः चुनौती दी तथा कन्नौज पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया तथा मुंगेर के समीप हुए युद्ध में धर्मपाल को बुरी तरह से हरा दिया, लेकिन इसी बीच धर्मपाल को अवसर मिल गया जब राष्ट्रकूट इन्द्र तृतीय ने नागभट्ट को हरा दिया और दक्षिण लौट गया. ऐसी स्थिति में धर्मपाल ने पुनः अपने खोए हुए प्रदेशों को जीत लिया.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि त्रिपक्षीय संघर्ष में हालांकि धर्मपाल को प्रारम्भ में पराजित होना पड़ा, लेकिन में उसे ही सफलता मिली. अन्त
देवपाल – धर्मपाल के उपरान्त उसका बेटा देवपाल सत्तासीन हुआ जो पाल वंश का सबसे शक्तिशाली शासक सिद्ध हुआ. अभिलेखों में अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा में कहा गया विस्तृत विजयों के उपरान्त उसका साम्राज्य हिमालय से एवं पूर्वी से पश्चिमी समुद्र तट तक फैला हुआ था. ऐसा कहा जाता है कि उसने गुर्जर एवं हूणों को परास्त किया और उत्कल एवं कामरूप पर अधिकार कर लिया जिन और कम्बोज राजाओं ने देवपाल के समक्ष घुटने टेके उनकी सही-सही पहचान नहीं की जा सकी है. गुर्जर प्रतिद्वन्द्वी मिहिर भोज को माना जा सकता है जिसने पूरब में अपने राज्य का विस्तार करने की कोशिश की, किन्तु देवपाल के हाथों पराजित हुआ. 
देवपाल का योगदान बौद्ध धर्म के प्रति अत्यन्त महत्वपूर्ण है. बलदेवपुत्र, जो उसके समय में जावा के बौद्ध शैलेन्द्रों का शासक था, ने देवपाल के पास दूत भेजकर पाँच गाँवों की माँग की, ताकि नालन्दा में एक मठ की स्थापना की जा सके. देवपाल ने इसे स्वीकार करते हुए वीरदेव को मठ का प्रधान नियुक्त किया.
> पाल शासकों का शिक्षा एवं साहित्य के प्रति योगदान
पालवंशी शासकों ने शिक्षा एवं साहित्य के विकास में अपना अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान दिया. सोमपुरी, ओदत्तपुरी तथा विक्रमशिला में इनके द्वारा शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई. इनमें विक्रमशिला कालान्तर में एक ख्याति प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय विद्यालय बन गया, जिसकी स्थापना धर्मपाल द्वारा की गई थी. पूर्व मध्य काल में शिक्षा केन्द्रों में इसकी ख्याति सर्वाधिक थी यहाँ अनेक विहारों एवं बौद्ध मन्दिरों का निर्माण पाल शासकों द्वारा करवाया गया था. उस समय यहाँ लगभग 3,000 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे. बौद्ध धर्म और दर्शन के अतिरिक्त यहाँ, व्याकरण, न्याय, तन्त्र आदि की शिक्षा दी जाती थी. यहाँ विद्वानों की एक मण्डली थी जिसमें दीपंकर का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है. उन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार किया. इस समय विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने नालन्दा विश्वविद्यालय का स्थान ग्रहण कर लिया था. 1203 ई. में मुस्लिम आक्रमणकारी ब खिलजी ने इसे नष्ट कर दिया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पाल शासकों ने शिक्षा एवं साहित्य के प्रति अपना महती योगदान दिया था. इस काल में रामचरित के लेखक संध्याकर नन्दी हुए. अन्य विद्वान् हरिभद्र, चक्रपाणि दत्त, वज्रदत्त आदि के नाम प्रसिद्ध हैं.
> कलचुरि का चेदिवंश
परिचय
मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में तेवर नामक स्थान जिसकी पहचान त्रिपुरी से की जाती है कलचुरि चेदि वंश की राजधानी था और उसके आसपास का क्षेत्र ही उनका राज्य था. उनके अभिलेखों में उन्हें हैह्यवंशी सहस्रार्जुनीय कीर्ति वीर्य का वंशज कहा गया है जिससे स्पष्ट है, कि वे चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे.
  1. इस वंश में प्रथम राजा कोक्कल प्रथम हुआ जिसने तुरुष्क, वंग, कोंकण आदि प्रदेशों को जीतकर अपने राज्य में मिलाया. इसने चंदेल राजकुमारी नंदा देवी से विवाह कर चन्देलों से मित्रता कायम की. उसने राष्ट्रकूट कृष्ण-II से अपनी पुत्री का विवाह कर उनसे भी मित्रता कायम कर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार किया.
  2. कोक्कल के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र शंकरगण शासक बना तथा सोम वंशी शासक को हटांकर पाली पर अधिकार कर लिया. इसने अपनी पुत्री का विवाह कृष्ण-II (राष्ट्रकूट) के पुत्र जगतुंग से कर दिया.
  3. शंकरगण के बाद उसका पुत्र युवराज चेदि वंश का अगला शासक नियुक्त हुआ जिसने बंगाल के पाल तथा गंगों को पराजित किया. इसके राज्य पर राष्ट्रकूट कृष्णIII ने आक्रमण किया, जिसमें युवराज की बुरी तरह पराजय हुई, परन्तु शीघ्र ही उसने राष्ट्रकूट सेना को हराकर भगा दिया. ‘काव्य मीमांसा' तथा 'विद्धशाल भंजिका' के लेखक राजशेखर ने अपना प्रारम्भिक जीवन युवराज के दरबार में ही व्यतीत किया था.
  4. युवराज के बाद उसका पुत्र लक्ष्मण राज अगला शासक बना जिसने बंगाल, उड़ीसा तथा कौशल की विजय की. इसके बाद उसने पश्चिम की ओर बढ़कर गुर्जर लाट नरेशों को पराजित किया. लक्ष्मण राज ने अपनी पुत्री का विवाह चालुक्य नरेश विक्रमादित्य चतुर्थ के साथ किया. 
  5. लक्ष्मण राज के बाद शंकरगण व युवराज द्वितीय चेदि वंश में दो कमजोर उत्तराधिकारी हुए और इसी क्रम में तीसरा उत्तराधिकारी कोक्कल द्वितीय भी हुआ.
  6. लगभग 1019 ई. में इस वंश में एक प्रतापी शासक गांगेयदेव विकमादित्य हुआ जो प्रारम्भ में चन्देल विद्याधर के अधीन था. विद्याधर की मृत्यु के बाद वह स्वतन्त्र हो गया तथा उसने अंग, उत्कल, काशी व प्रयाग को विजित किया. इसके साथ ही उसने प्रयाग को अपनी द्वितीय राजधानी बनाया.
  7. गांगेयदेव के बाद कर्णदेव शासक बना, जोकि चेदि वंश का सर्वाधिक प्रतापी शासक था. उसने गुजरात के चालुक्य शासक भीम के साथ मिलकर मालवा के परमार वंशी भोज को पराजित कर दिया. कर्ण ने कलिंग को विजित कर 'त्रिकलिंगाधिपति' की उपाधि धारण की. पूर्व की ओर गौड़ व पाल शासकों को पराजित किया. पाल नरेश विग्रहपाल से अपनी पुत्री का विवाह किया.
चन्देल नरेश कीर्तिवर्मन ने कर्णदेव को पराजित कर दिया. कर्णदेव की मृत्यु के बाद कलचुरियों की शक्ति का हास हो गया और इनका स्थान चंदेलों ने ले लिया.
> राष्ट्रकूट - राजवंश
राष्ट्रकूटों के इतिहास को जानने का साधन
राष्ट्रकूट शासकों के अधिकांश अभिलेखों में तिथिक्रम, उनकी वंशावली, धार्मिक रुचियाँ, शासन व्यवस्था आदि के विषय में पर्याप्त जानकारी दी गई है, जो राष्ट्रकूट इतिहास जानने के प्रामाणिक साधन हैं. राष्ट्रकूट अभिलेखों का विवरण निम्नलिखित है-
1. गोविन्द तृतीय के राधनपुर, वनदिन्दोरी तथा बड़ौदा लेख.
2. अमोघवर्ष का एंजन लेख.
3. इन्द्र तृतीय का कमलपुर लेख.
4. दंतिदुर्ग के एलौरा तथा सामन्तगढ़ के ताम्रपत्र अभिलेख. 
5. कृष्ण तृतीय के कोल्हापुर, देवली तथा कर्नाट के लेख.
इनं अभिलेखों के अतिरिक्त राष्ट्रकूट काल में लिखे गए कन्नड़ तथा संस्कृत साहित्य से भी राष्ट्रकूटों के इतिहास के पुनर्निर्माण करने में सहायता मिलती है, जिनमें जिनसेन का 'आदिपुराण', महावीराचार्य का ‘गणित सार संग्रहण', अमोघवर्ष का 'कविराज मार्ग' आदि उल्लेखनीय हैं.
> राष्ट्रकूटों की उत्पत्ति तथा मूल निवास स्थान
अन्य राजपूत राजवंशों की भाँति ही राष्ट्रकूटों की उत्पत्ति सम्बन्धी अनेक विवाद हैं. अल्टेकर, नीलकण्ठ शास्त्री, हेमचन्द्र राय चौधरी, मजूमदार जैसे विद्वानों के अनुसार राष्टकूट वस्तुतः पहले प्रशासनिक अधिकारी थे. इस शब्द का अर्थ है 'राष्ट्र (प्रान्त) का कूट अर्थात् प्रधान' अतः राष्ट्रकूट जाति का सूचक न होकर पद का सूचक है. जिस प्रकार ग्राम का अधिकारी ग्राम कूट होता था, उसी प्रकार प्रान्त (राष्ट्र) का अधिकारी राष्ट्रकूट तथा इन्हीं अधिकारियों की कालान्तर में एक विशिष्ट जाति बन गई.
प्राचीनकाल में अशोक के अभिलेखों में रथिक नामक अधिकारियों का उल्लेख है. सातवाहनयुगीन नानाघाट के लेख में त्रणकारियों, महारथी का उल्लेख मिलता है. इसी प्रकार हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार खारवेल ने रथिकों को पराजित किया था.
राष्ट्रकूट वंश के स्वयं के अभिलेखों में इन्हें राष्ट्रकूट का बताया गया है. इन्द्र तृतीय के नौसारी लेख के अनुसार ‘अमोघवर्ष ने रट्ट कुल लक्ष्मी' का उद्धार किया. कृष्ण तृतीय के देवली व अरहड़ अभिलेखों में रट्ट को आदि पुरुष बताया राष्ट्रकूट तुंग कुल का बताया है, लेकिन बाद के गया है, जो तुंग के वंशज थे. इस आधार पर भण्डारकर ने अभिलेखों में उन्हें यदुवंश से जोड़ा गया है. कुछ लेख इन्हें चन्द्रवंशी क्षत्रिय बताते हैं. गोविन्द तृतीय की तुलना यदुवंशी कृष्ण से की गई है. अतः उपर्युक्त आधारों को ध्यान में रखते हुए इन्हें क्षत्रिय माना जा सकता है. 
> राष्ट्रकूट साम्राज्य की स्थापना में दन्तिदुर्ग का योगदान
दन्तिदुर्ग के विषय में हमें उसके समय के दो अभिलेखों (1) दशावतार (742 ई.) तथा (2) समनगड (753 ई.) से जानकारी मिलती है, जिनके अनुसार दन्तिदुर्ग ने बादामी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य द्वितीय के सामन्त के रूप में अपना जीवन प्रारम्भ किया. इसी रूप में उसने कुछ विजयें कर अपनी शक्ति व प्रतिष्ठा को बढ़ाया. उसकी प्रारम्भिक सफलता पर उसके स्वामी ने उसे पृथ्वी वल्लभ' तथा ‘खड़वालोक' की उपाधियाँ प्रदान की. इसके उपरान्त उसने युवराज कीर्तिवर्मा द्वितीय के साथ काँची के पल्लवों को एक महत्वपूर्ण युद्ध में हरा दिया. वापसी करते समय उसने कर्नूल उत्साहित होकर 744 ई. में दन्तिदुर्ग ने स्वतन्त्र राज्य स्थापित में भी शैल के शासक को पराजित किया. इन विजयों से करने के उद्देश्य से अपना अभियान प्रारम्भ किया और इसी उत्तराधिकारियों की उपेक्षा कर उसने अपना विजय अभियान समय चालुक्य शासक की मृत्यु हो गई और उसके कमजोर पूर्व तथा पश्चिम दिशा से प्रारम्भ किया, ताकि चालुक्य सम्राट का कम-से-कम प्रतिरोध सहना पड़े. 
दन्तिदुर्ग ने सर्वप्रथम नन्दिपुर के गुर्जरों तथा नौसादी के चालुक्यों को पराजित कर मालवा के प्रतिहार राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा उनकी राजधानी उज्जैन पर अधिकार कर लेने के बाद उसने 'हिरण्यगर्भदान' नामक यज्ञ सम्पादित किया, जिसमें कहा जाता है कि प्रतिहार राजा ने पाल का काम किया.
उल्लेखनीय है कि इसी अभियान के तुरन्त बाद उसने कोशल तथा कलिंग पर अपना अधिकार जमाया. इस प्रकार उसने अपना राज्य मध्य एवं दक्षिणी गुजरात तथा सम्पूर्ण मध्य प्रदेश तक विस्तृत कर लिया.
नौसारी के सामन्त के पुनः पदस्थापन करने के प्रयास के कारण कीर्ति वर्मा तथा दन्तिदुर्ग में युद्ध हुआ जिसमें कीर्ति वर्मा पराजित हुआ और उसके राज्य के एक बड़े भूभाग का स्वामी दन्तिदुर्ग बन गया.
स्पष्ट है कि दन्तिदुर्ग एक महान् विजेता तथा कूटनीतिज्ञ शासक था जिसने अपनी विजयों से स्वतन्त्र और विस्तृत राष्ट्रकूट साम्राज्य की स्थापना की.
> राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम की उपलब्धियाँ (756–773 ई.)
दन्तिदुर्ग के निःसंतान मर जाने के कारण राष्ट्रकूट वंश में उसका उत्तराधिकारी उसका चाचा कृष्ण प्रथम 756 ई. में बना. यह एक घोर साम्राज्यवादी शासक था जिसने सभी दिशाओं में अपने राज्य का विस्तार किया, जिसका विवरण निम्नलिखित है—
1. उसने अपने विद्रोही भतीजे कर्क द्वितीय, जोकि लाट प्रदेश का शासक था, पर आक्रमण कर उसके विद्रोह को विफल कर दिया.
 2. उसने राजाधिराज परमेश्वर की उपाधि 'राहप्पा' नामक किसी शासक को पराजित कर प्राप्त की, यह उसके ‘वेग्रमा' तथा 'सूरत' के दानपात्रों में उल्लिखित है.
3. उसके समय में चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन, जोकि कर्नाटक में शरण लिए हुए था, ने एक सेना तैयार कर कृष्ण प्रथम पर आक्रमण किया. लगभग 760 ई. में दोनों के मध्य भयंकर युद्ध हुआ जिसमें कृष्ण प्रथम ने उसकी शक्ति को पूर्ण रूप से विनिष्ट कर दिया. राधनपुर तथा वन दिन्दोरी अभिलेख में है. इसक उल्लेख
4. इसी अभिलेख के अनुसार कीर्तिवर्मन के समस्त पुत्र मार डाले गए तथा पूरे कर्नाटक पर उसका अधिकार हो गया.
5. शिलाहार वंश के संस्थापक 'सणफुल्ल' को उसने सह कोंकण को जीतकर उसका शासक नियुक्त किया.
6. गंग वंश के शासक श्री पुरुष को पराजित कर मैसूर का क्षेत्र उसने राष्ट्रकूटों की अधीनता में ला दिया,
7. कृष्ण प्रथम ने अपने पुत्र गोविन्द को युवराज बनाकर पूर्वी चालुक्यों आक्रमण का आदेश दिया जिसमें विष्णुवर्द्धन चतुर्थ ने बिना लड़े ही राष्ट्रकूटों की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अपने राज्य का एक बड़ा भू-भाग राष्ट्रकूटों को युद्ध हर्जाना के रूप में दे दिया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि कृष्ण प्रथम ऐक योग्य शासक तथा कुशल योद्धा था जिसने अपनी विजयों के द्वारा दक्षिण में अपनी स्थिति सर्वोच्च बना दी. उसके राज्य में महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश का अधिकांश भाग सम्मिलित था. इस प्रकार उसने अपने उत्तराधिकारियों के लिए उत्तर की ओर आक्रमण करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया:
योद्धा होने के साथ-साथ कृष्ण प्रथम महान् निर्माता भी था. उसके द्वारा बनवाया गया एलोरा का कैलाश मन्दिर स्थापत्य कला के क्षेत्र में विश्व में अपना अद्वितीय स्थान रखता है. वह एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति भी था जिसने ब्राह्मणों को प्रभूत दान दिया. अतः कृष्ण प्रथम का राष्ट्रकूट वंश के इतिहास में विशेष स्थान है.
> राष्ट्रकूट गोविन्द तृतीय के उत्तरी अभियान पर टिप्पणी लिखो 
जिस समय गोविन्द तृतीय ने उत्तरी भारत पर अभियान किया उस समय इस क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति बड़ी जटिल थी. कन्नौज को लेकर धर्मपाल (पाल नरेश) तथा नागभट्ट (प्रतिहार नरेश) के मध्य प्रतिद्वंद्विता थी. धर्मपाल तथा उसके संरक्षित कन्नौज नरेश चक्रायुद्ध को नागभट्ट ने बुरी तरह पराजित कर दिया था. अपनी पराजय का बदला लेने के लिए धर्मपाल ने गोविन्द तृतीय से सहायता माँगी जिसके फलस्वरूप वह उत्तर की ओर आक्रमण करने को उन्मुख हुआ. उसने सावधानी से अपनी योजना को क्रियान्वित करते हुए भोपाल-झाँसी मार्ग से कन्नौज के लिए प्रस्थान किया और नागभट्ट तथा गोविन्द तृतीय के मध्य सम्भवतः बुन्देलखण्ड के किसी स्थान पर संघर्ष हुआ. इस युद्ध में नागभट्ट बुरी तरह पराजित हुआ तथा भागकर राजपूताने में शरण लेने को विवश हुआ. इसके बाद धर्मपाल तथा चक्रायुद्ध ने स्वतः ही उसके सम्मुख हथियार डाल दिए.
उल्लेखनीय है कि नागभट्ट को पराजित करने तथा चक्रायुद्ध और धर्मपाल को आत्मसर्पण करवा लेने के बाद गोविन्द अपने गृह राज्य वापस लौट गया. उसके उत्तरी अभियान का मूल उद्देश्य राज्य का विस्तार करना न होकर, अपितु अपने यश मात्र की वृद्धि करना था. 
> इन्द्र तृतीय का उत्तरी अभियान
इन्द्र तृतीय के उत्तरी अभियान का मूल उद्देश्य कन्नौज पर अधिकार करना था, क्योंकि इसके समय में यह नगर उत्तरी भारत में सर्वप्रधान था. इस समय पाल नरेश महेन्द्रपाल की मृत्यु हो जाने के कारण कन्नौज की गद्दी के लिए उसके दो पुत्रों भोज द्वितीय तथा महीपाल के मध्य संघर्ष हो रहा था. इन्द्र ने महीपाल पर 916 ई. में आक्रमण किया. उसकी सेनाओं ने सम्भवतः भोपाल-झाँसी-कालपी मार्ग से होते हुए यमुना नदी पार कर कन्नौज पर आक्रमण कर प्रतिहार नरेश महीपाल को पराजित कर दिया तथा कन्नौज पर अपना अधिकार कर लिया. यह उसकी महान् सैनिक सफलता थी, क्योंकि अल्टेकर के शब्दों में ऐसे कम ही अवस़र आए हैं, जबकि दकन के किसी शासक ने उत्तर भारत की राजधानी पर कब्जा किया हो.
उल्लेखनीय है कि उसका यह अभियान एक धावा मात्र ही था और 916 ई. की ग्रीष्म ऋतु में वह स्वदेश लौट गया तथा 917 ई. में प्रतिहार महीपाल ने कन्नौज पर पुनः अधिकार कर लिया.
> राष्ट्रकूट : शासन-प्रबन्ध
राष्ट्रकूट शासन-प्रणाली में राजा का पद सर्वोच्च एवं आनुवंशिक था. महाराजाधिराज, परभट्टारक जैसी उपाधियों से वह सम्मानित था. राष्ट्रकूट शासक अपनी राजधानी में रहता था जहाँ उसकी राज सभा तथा केन्द्रीय प्रशासन के कर्मचारी रहते थे. सामन्त, राजदूत, मन्त्री, सैनिक तथा असैनिक अधिकारी, कवि, वैद्य, ज्योतिष आदि नियमित रूप से उसकी सभा में उपस्थित होते थे. हालांकि मन्त्रियों के विभागों का नाम अभिलेखों में उल्लिखित नहीं है फिर भी उसे राजा का दाहिना हाथ कहा गया है.
राष्ट्रकूट शासन में सामन्तवाद का महत्वपूर्ण स्थान था. उन्हें लगभग पूर्ण स्वायत्तता थी, वे अपने अधीन छोटे सामन्त रखते थे तथा समय-समय पर राजा को उपहार तथा सैनिक सहायता प्रदान करते थे.
सम्राट के सीधे नियन्त्रण वाले क्षेत्र को कई राष्ट्रों में बाँटा गया था, जिनका प्रधान राष्ट्रपति था जो आधुनिक कमिश्नर के समान था. वह नागरिक तथा सैनिक दोनों ही प्रकार के प्रशासन का प्रधान था. उसे वित्त तथा भू-राजस्व संग्रहण के भी अधिकार मिले हुए थे.
प्रत्येक राष्ट्र में कई विषय होते थे जो आधुनिक जिले के समान थे. इनमें 4 हजार तक गाँव थे. इसका प्रधान अधिकारी ‘विषयपति’ था. विषय भुक्तियों में बटे होते थे जिनके अधिकारी ‘भोगपति' कहलाते थे. प्रत्येक भुक्ति में 50 से लेकर 70 तक ग्राम होते थे. विषयपति तथा भोगपति ‘देशग्रामकूटक’ नामक वंशानुगत राजस्व अधिकारियों की सहायता से राजस्व प्रशासन चलाते थे इन्हें करमुक्त भूमि निर्वाह के लिए प्राप्त थी. ग्राम का शासन 'मुखिया द्वारा चलाया जाता था जिसकी सहायता के लिए लेखाकार होता था. मुखिया के अधीन एक सैन्य टुकड़ी रहती थी जो गाँव में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखती थी. मुखिया का पद आनु' वंशिक था.
राष्ट्रकूट प्रशासन में नगरों तथा गाँवों को स्वायत्तता  प्राप्त थी. यहाँ प्रशासन के लिए जनसमितियों का गठन किया गया था जो स्थानीय शासन का संचालन करते थे. समिति में प्रत्येक परिवार का वयस्क सदस्य होता था. ग्राम के बड़े-बूढ़ों को 'महत्तर' कहा जाता था. 'महत्तर' मन्दिरों, सड़कों, पाठशालाओं, तालाबों आदि की देखभाल के लिए उपसमितियाँ गठित करते थे, जोकि मुखिया की सहायता करती थीं.
राज्य की आय का मुख्य साधन भू-राजस्व था जिसे उद्रंग अथवा भोग कर कहा जाता था. यह उपज का 1/4वाँ भाग था और यह अनाज के रूप में लिया जाता था. अकाल आदि के समय कर माफ कर दिया ज जाता था. इसके अतिरिक्त वन, खनिज, क्रय-विक्रय आदि से भी राज्य को बहुत अधिक आमदनी होती थी.
>>राष्ट्रकूटकालीन धार्मिक स्थिति
राष्ट्रकूट शासकों ने ब्राह्मण तथा जैन दोनों ही धर्मों को प्रश्रय प्रदान किया जो उनकी धार्मिक सहिष्णुता का परिचायक है. राष्ट्रकूटों के काल में मूल रूप से दक्षिण भारत में जैन धर्म का विकास हुआ. महान् राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष की जैन धर्म में गहरी रुचि थी. प्रसिद्ध जैन आचार्य जिनसेन उनके गुरु थे तथा उसने अपने पुत्र कृष्ण के लिए जैन आचार्य गुणभद्र को नियुक्त किया था. उसने बनबासी के जैन विहार का निर्माण करवाया.
इस समय ब्राह्मण धर्म की उन्नति भी काफी हुई. राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम द्वारा बनवाया गया एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मन्दिर सुविख्यात है. अमोघवर्ष ने जैन होते हुए भी महालक्ष्मी की पूजा की तथा एक बार महामारी से बचने के लिए उसने अपनी अंगुली काटकर महालक्ष्मी की प्रतिमा को भेंट कर दी. 
राष्ट्रकूट काल में दक्षिण में अपेक्षाकृत बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार कम रहा. कन्हेरी का बौद्ध विहार उस समय प्रसिद्ध था. मुस्लिम धर्म के प्रति लोगों में सहिष्णुता थी तथा मुस्लिम लेखकों के विवरण से पता चलता है कि राष्ट्रकूट राज्य में मुस्लिम व्यापारियों को मस्जिद बनवाने तथा अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतन्त्रता मिली हुई थी.
> राष्ट्रकूटकालीन साहित्य
राष्ट्रकूट शासकों के संरक्षण में साहित्य का विकास प्रचुर मात्रा में हुआ. उनके समय में मुख्य रूप से संस्कृत तथा कन्नड़ साहित्य का विकास हुआ, राष्ट्रकूट अभिलेखों में संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है. अमोघवर्ष ने कन्नड़ भाषा में प्रसिद्ध काव्य ग्रन्थ 'कविराज मार्ग' लिखा था, उनकी राजसभा में 'आदिपुराण' के लेखक जिनसेन, गणितसार संग्रह' के रचयिता महावीराचार्य तथा 'अमोघवृत्ति के लेखक साक्तायन निवास करते थे. अकलंक एवं विद्यानन्द ने क्रमशः अष्टशती एवं अष्टसहस्त्री की रचना की. ये दोनों पुस्तकें मीमांशा पर भाष्य हैं.
एक अन्य कवि पोन्ना राष्ट्रकूट दरबार में रहते थे जिन्होंने ‘शांति पुराण’ की रचना कन्नड़ भाषा में की. तर्कशास्त्र के क्षेत्र में माणिक्यनंदिन ने आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ‘परीक्षामुखशास्त्र' लिखा.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राष्ट्रकूट काल के शासक विद्या तथा साहित्य के प्रेमी थे तथा उनके संरक्षण में प्रभूत साहित्य की रचना हुई.
> राष्ट्रकूटकालीन कला : एलोरा के कैलाश मन्दिर के सन्दर्भ में
रूप से राष्ट्रकूट काल के मन्दिर स्थापत्य के दर्शन हमें विशेष ऐलोरा में देखने को मिलता है. मन्दिरों में कैलाश मन्दिर अपनी आश्चर्यजनक शैली के लिए विश्व प्रसिद्ध है. इसका निर्माण कृष्ण प्रथम ने अत्यधिक धन व्यय करके करवाया था. यह प्राचीन भारतीय वास्तु एवं तक्षण कला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है. यह सम्पूर्ण मन्दिर एक ही पाषाण को काटकर बनाया गया है. इसका विशाल प्रांगण 276 फुट लम्बा तथा 154 फुट चौड़ा है. इसमें विशाल स्तम्भ लगे हैं तथा छत मूर्तिकारी से भरी है. मन्दिर के ऊपर का विशाल शिखर 95 फुट ऊँचा है तथा यह चार तल्ला है. मन्दिर में प्रवेश द्वार तथा मण्डप बनाए गए हैं. इसकी चौकी 25 फुट ऊँची है. मन्दिर के समीप ही पाषाण काटकर एक लम्बी पंक्ति में हाथियों की मूर्ति बनाई गई है. मन्दिर की वीथियों में भी अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं. महिषासुर का वध करती दुर्गा, सीता-हरण आदि के 50 रावण दृश्य इनमें कृष्ण, भगवान् विष्णु, कैलाश पर्वत उठाए हुए बड़े ही मनोहारी हैं. समग्र रूप में यह ह एक अत्युत्कृष्ट रचना है. पाषाण काटकर बनाए गए मन्दिरों में इस मंदिर का स्थान अद्वितीय है. 
> प्रतिहार राजवंश
परिचय–अग्निकुल के राजपूतों में सर्वाधिक प्रसिद्ध वंश प्रतिहार वंश था, जो गुर्जरों की शाखा से सम्बन्धित होने के कारण इतिहास में गुर्जर प्रतिहार के नाम से जाना जाता है. इस वंश की प्राचीनता 5वीं सदी तक ज्ञात होती है. पुलकेशियन द्वितीय के एहोल अभिलेख में गुर्जर जाति का सर्वप्रथम उल्लेख हुआ है. बाण के हर्षचरित में भी गुर्जरों का लेख किया गया है. चीनी यात्री ह्वेनसांग 'कु-चे-लो' (गुर्जर) देश का उल्लेख करता है जिसकी राजधानी पि-लोमो-ली अर्थात् भीनमाल बताता है.
उत्पत्ति – विभिन्न राजपूतों की उत्पत्ति के समान ही गुर्जर प्रतिहार वंश की उत्पत्ति भी अत्यन्त विवादास्पद है. विदेशी इतिहासकारों ने उन्हें 'खजर' नामक जाति से उत्पन्न माना है, जो हूणों के साथ भारत आई थी. इस मत की पुष्टि केम्बेल, जेक्सन, भण्डारकर, त्रिपाठी आदि विद्वानों ने की है, जबकि गौरी शंकर ओझा, सी. वी. वैद्य, दशरथ शर्मा जैसे विद्वान् गुर्जरों को भारतीय ही मानते हैं. वे इस शब्द का अर्थ 'गुर्जर देश का प्रतिहार अर्थात् शासक' लगाते हैं. के. एम. मुन्शी ने विभिन्न उदाहरणों से यह सिद्ध किया है कि गुर्जर शब्द स्थानवाचक है न कि जातिवाचक. हूणों को इतिहास में मलेच्छ कहा गया है, जबकि गुर्जरों को ब्राह्मण. ह्वेनसांग गुर्जर नरेश को क्षत्रिय बताता है. साहित्य अथवा इतिहास में इन्हें कहीं भी विदेशियों से नहीं जोड़ा गया है. उनके लेखों से हम इन्हें ब्राह्मण मूल का स्वीकार कर सकते हैं जिन्होंने बाद में क्षत्रिय धर्म स्वीकार कर लिया.  
> प्रमुख शासक व उनकी उपलब्धियाँ
वत्सराज (775-800 ई.)
वत्सराज एक शक्तिशाली शासक था जिसे इस वंश का वास्तविक संस्थापक माना जा सकता है. इसने शासक बनने के बाद कन्नौज पर आक्रमण कर वहाँ के शासक इन्द्रायुध को हराया तथा उसे अपने अधीन कर लिया. ग्वालियर अभिलेख के अनुसार उसने भण्डीकुल को पराजित कर उसका राज्य छीन लिया. वत्सराज ने गौड़ देश के शासक धर्मपाल को भी हरा दिया था. ऐसी स्थिति में धर्मपाल ने राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव को उत्तर की ओर अभियान करने के लिए उकसाया जिसके अभियान के फलस्वरूप वत्सराज को पराजित होना पड़ा. बाद में पाल नरेश धर्मपाल ने भी उसे पराजित कर दिया. 
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि वत्सराज की प्रारम्भिक सफलताएँ अत्यधिक महत्वपूर्ण थीं, लेकिन एक से अधिक  संगठित शत्रुओं का मुकाबला करने की योग्यता उसमें नहीं थी जिसके कारण उसे राजपूताने में शरण लेने को विवश होना पड़ा.
> मिहिरभोज प्रथम : त्रिपक्षीय संघर्ष में भूमिका 
इसके विषय में हमें प्रामाणिक सूचनाएँ उसकी ग्वालियर प्रशस्ति से प्राप्त होती हैं. इनके अतिरिक्त कल्हण तथा अरब यात्री सुलेमान के यात्रा विवरणों द्वारा भी हमें इसके विषय में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त होती है.
प्रारम्भ में भोज को अपने समय की दोनों प्रतिद्वन्द्वी शक्तियों पाल नरेश देवपाल तथा राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव से पराजित होना पड़ा, परन्तु देवपाल की मृत्यु तथा राष्ट्रकूटों की आन्तरिक उलझन के कारण इसे राज्य विस्तार का सुनहरा अवसर प्राप्त हो गया.
वत्सराज ने अपने मित्र गोरखपुर के चेदि तथा गुहिलोत सरदारों की मदद से देवपाल के उत्तराधिकारी नारायण पाल को बुरी तरह से पराजित कर दिया और उसके राज्य के पश्चिमी भागों पर अपना अधिकार कर लिया.
नारायण पाल को पराजित करने के बाद वह राष्ट्रकूट शासक कृष्ण द्वितीय, जोकि उस समय चालुक्यों के साथ युद्ध में फँसा हुआ था, पर आक्रमण कर दिया तथा नर्मदा के तट पर उसे परास्त कर दिया. इस विजय के फलस्वरूप मालवा पर उसका अधिकार हो गया. इसके बाद उसने गुजरात की ओर बढ़कर खेड़ा के आसपास के भू-भाग को जीत लिया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि त्रिपक्षीय संघर्ष में अजेय राष्ट्रकूट शक्ति को उसने पराजित कर प्रतिहार वंश में अपना स्थान महत्वपूर्ण शासक के रूप में दर्ज करवा लिया.
> महेन्द्र पाल : साहित्यिक उपलब्धियाँ
महेन्द्र पाल ने केवल एक विजेता एवं साम्राज्य निर्माता था, बल्कि कुशल प्रशासक एवं विद्या तथा साहित्य का महान् संरक्षक भी था. उसकी राज सभा में प्रसिद्ध विद्वान् राजशेखर निवास करते थे, जो उसके राजगुरु थे. राजशेखर ने ‘कर्पूरमंञ्जरी', 'काव्य मीमांसा', 'विद्धशाल भंजिका', 'बालरामायण’, ‘भुवनकोश', 'हरविलाश' जैसे प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की थी. उनकी रचनाओं से कन्नौज नगर के वैभव एवं समृद्धि का पता चलता है. महेन्द्र पाल के समय में कन्नौज नंगर हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति का केन्द्र बन गया तथा शक्ति और सौन्दर्य में इसकी बराबरी करने वाला कोई दूसरा नगर न रहा.
> मालवा का परमार वंश
परिचय - मालवा के परमार वंश का संस्थापक उपेन्द्र अथवा कृष्णराज था, जोकि प्रारम्भ में राष्ट्रकूटों के सामन्त के रूप में धारा में शासन करता था. धारा नामक नगरी परमारों की राजधानी थी. सीयक द्वितीय ने (945 ई.) में सर्वप्रथम राष्ट्रकूटों से स्वतन्त्रता प्राप्त की थी. इस वंश में सर्वाधिक प्रतापी शासक भोज हुआ था.
> भोज की उपलब्धियाँ : राजनैतिक (1011-1060 ई.)
भोज अपने पिता सिन्धुराज की मृत्यु (1011 ई.) के बाद परमार सिंहासन पर बैठा, जिसके विषय में सूचना देने के लिए हमें उसके 8 अभिलेख मिलते हैं. उदयपुर प्रशस्ति से हमें उसकी राजनैतिक उपलब्धियों का विवरण प्राप्त होता है, जिनका विवरण निम्नलिखित है
1. भोज का सर्वप्रथम संघर्ष कल्याणी के चालुक्यों से हुआ और उसने चालुक्यों से गोदावरी के आसपास का क्षेत्र जीत लिया.
2. भोज के सामन्त यशोवर्मा के लाट से प्राप्त अभिलेख के अनुसार उसने लाट प्रदेश के शासक कीर्तिवर्मा को हरा दिया.
3. लाट जीतने के बाद भोज ने शिलाहार वंश के शासक को हराकर कोंकण का प्रदेश जीत लिया.
4. भोज द्वारा उड़ीसा का प्रदेश भी जीता गया था. सम्भवतः उसके समय में वहाँ पर इन्द्ररथ शासन का था.
5. उदयपुर तथा कल्वन अभिलेखों के अनुसार उसने चेदि नरेश गांगेयदेव को भी पराजित किया था.
6. अपनी अनेक विजयों के बाद उसने अपने राज्य को अत्यन्त विस्तारित कर दिया, परन्तु विद्याधर ने भोज को जीवन के अन्तिम दिनों में पराजित कर दिया.
7. चालुक्य नरेश सोमेश्वर ने भोज की राजधानी धारा पर आक्रमण कर दिया जिसमें भोज पराजित होकर भाग खड़ा हुआ तथा चालुक्यों द्वारा राजधानी लूट ली उसकारा गई.
भोज का अन्त यद्यपि दुःखद रहा, तथापि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह अपने युग का एक पराक्रमी नरेश था. उसके उत्कर्ष काल में उत्तर तथा दक्षिण की सभी शक्तियों ने उसका लोहा माना था. उसने परमार सत्ता को चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया था. GEDA
> भोज की उपलब्धियाँ : सांस्कृतिक
भारतीय इतिहास में भोज की ख्याति उसकी विद्वता तथा विद्या एवं कला के उदार संरक्षक के रूप में अधिक है. उसने अपनी राजधानी को विद्या तथा कला का सुप्रसिद्ध केन्द्र बनाने के लिए यहाँ अनेक महल एवं मन्दिर बनवाए जिनमें सरस्वती मन्दिर सर्वप्रमुख था. 
भोज स्वयं विद्वान् था तथा उसकी उपाधि कविराज थी. उसने ज्योतिष, काव्यशास्त्र, वास्तु आदि पर महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की तथा धारा के सरस्वती मन्दिर में संस्कृत विद्यालय की स्थापना की.
उसकी रचनाओं में शृंगार प्रकाश, प्राकृत व्याकरण, कूर्मशतक, शृंगार मंजरी, भोज 1 चम्पू, कृत्यकल्पतरु आदि मुख्य हैं. उसके दरबारी कवियों एवं विद्वानों में भाष्करभट्ट, दामोदर मिश्र, धनपाल आदि मुख्य थे. 
भोज विद्वान् होने के साथ-साथ महान् निर्माता भी था. भोपाल के दक्षिण-पूर्व में उसने 250 वर्ग मील लम्बी एक झील का निर्माण भी करवाया था, जो आज भी 'भोजस' के नाम से जानी जाती है, धारा में उसने सरस्वती मन्दिर के समीप एक विजय स्तम्भ स्थापित किया था तथा भोजपुर नामक नगर की स्थापना करवायी. चित्तौड़ में उसके द्वारा त्रिभुवन नारायण के मन्दिर का निर्माण करवाया गया. मेवाड़ के नागोर क्षेत्र में भोज द्वारा अनेक भूमि दान दिए गए.
इस प्रकार स्पष्ट है कि भोज की प्रतिभा बहुमुखी थी. उसका शासनकाल राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टियों से परमार वंश के चरमोत्कर्ष को व्यक्त करता है.
> चाहमान वंश
परिचय–राजपूतों का चौहान (चाहमान) वंश अजमेर के उत्तर में साम्भर (शाकम्भरी) में राज्य करता था. इस वंश के प्रारम्भिक नरेश कन्नौज के प्रतिहार शासकों के सामन्त थे. दसवीं शदी ई. के मध्य इस वंश के सिंहराज ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दी. इस प्रकार शाकम्भरी के चाहमान राज्य का संस्थापक सिंहराज हुआ. इस वंश में अनेक प्रतापी शासक हुए जिनमें विग्रहराज चतुर्थ एवं पृथ्वीराज तृतीय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है.
विग्रहराज-IV (1153-1163 ई.) – चौहान वंशी राजाओं में विग्रहराज-IV सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था. उसने तोमर राजाओं को हराकर उनकी राजधानी दिल्ली पर अधिकार कर लिया. बिजोलिया लेख से ज्ञात होता है कि यहाँ का तोमर राजा तंवर था.
विग्रहराज ने अपने समकालीन चालुक्य शासक कुमारपाल को पराजित कर मेवाड़ तथा मारवाड़ पर अपना अधिकार कर लिया और उस कलंक को धो डाला, जो उसके पिता अर्णोराज की चालुक्यों के हाथों पराजय के रूप में मिला था.
विग्रहराज के शिवालिक अभिलेख से पता चलता है कि उसने तुर्क आक्रमणकारी, जोकि लाहौर का 'खुसरूशाह' था को पराजित कर देश की मलेच्छों से रक्षा की.
विजेता होने के साथ-साथ वह स्वयं एक विद्वान् तथा विद्वानों का आश्रयदाता था. उसे 'हरिकेली' नामक नाटक लिखने का श्रेय दिया जाता है. उसके दरबार में सोमदेव नामक कवि निवास करता था, जिसने ललितविग्रहराज' नामक ग्रन्थ लिखा, इतिहास में विग्रहराज-IV 'बीसलदेव' के नाम से प्रसिद्ध है.
पृथ्वीराज-III (1177-1192 ई.)- सोमेश्वर व कर्पूरी देवी से उत्पन्न पुत्र पृथ्वीराज-III चौहान वंश का सबसे प्रतापी राजा हुआ. इतिहास में वह राय पिथौरा के नाम से जाना जाता है.
अपने राज्य विस्तार एवं शक्ति को सुदृढ़ करने की प्रक्रिया में उसे सर्वप्रथम अपने चाचा नागार्जुन के विद्रोह का दमनं करना पड़ा. इसमें उसने उन्हें न केवल पराजित किया, बल्कि उसके सभी सहयोगियों को मौत के घाट उतार दिया .
इसके बाद पृथ्वीराज ने चन्देल शासक परमार्दीदेव को हराकर उसकी राजधानी महोबा पर अधिकार कर लिया जिसमें परमार्दीदेव के प्रसिद्ध सेनानायक आल्हा और ऊदल मारे गए और परमार्दीदेव ने आत्महत्या कर ली. पृथ्वीराज का मदनपुर अभिलेख इस तथ्य की पुष्टि करता है. पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज ने गुजरात पर आक्रमण कर वहाँ की कन्या संयोगिता का अपहरण कर उससे विवाह किया के चालुक्य शासक भीम को पराजित कर मार डाला. जयचन्द जिसके कारण उनसे पहले के बिगड़े सम्बन्ध और भी कड़वे हो गए.
  • पृथ्वीराज के समय में ही मुहम्मद गौरी के भारत पर आकमण हुए. 1191 ई. में तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज ने गोरी की सेनाओं को पराजित कर दिया तथा भागती हुई तुर्क सेना का पीछा नहीं किया. मिन्हज-उस- शिराज लिखता है कि पराजित होने के बाद गोरी की सेना बिना किसी रुकावट के स्वदेश लौट गई और चौहानों ने उसे परेशान नहीं किया. पृथ्वीराज निश्चिन्त होकर रंगरेलियाँ मनाने में लग गया.
  • गोरी को शक्ति जुटाने का पूरा अवसर मिला और अगले ही वर्ष 1192 ई. में वह तराइन के मैदान में पुनः आ डटा. इस युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय हुई तथा उसे निर्दयतापूर्वक कत्ल कर दिया गया. मुसलमानों ने राजपूत सेना का भीषण नरसंहार किया और चाहमान सत्ता के विभिन्न केन्द्रों पर गोरी का अधिकार हो गया "तथा इसके साथ ही चौहान सत्ता का अन्त. 
तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धों में से एक है, क्योंकि इस युद्ध ने भारत भूमि पर मुस्लिम सत्ता स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया.
> मूल्यांकन
यद्यपि तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज पराजित हुआ, फिर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वह अपने समय का महान् योद्धा था. इस युद्ध के पहले तक वह अजेय बना रहा तथा उसने अपने समय की सभी प्रमुख शक्तियों को करारी मात दी थी. उसका शरीर बलिष्ठ, सुन्दर एवं आकर्षक था. तीरन्दाजी में वह अपने समय का श्रेष्ठ वीर था. मुस्लिम लेखक भी उसकी शक्ति की प्रशंसा करते हैं योद्धा होने के साथ-साथ वह विद्वान् एवं विद्वानों का महान संरक्षक था. उसकी राज्यसभा में लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान् निवास करते थे जिनमें जयानक भट्ट, विद्यापति गौड़, पृथ्वी भट्ट, बागीश्वर, जनार्दन, विश्वरूप आदि उल्लेखनीय हैं. चन्दबरदाई उसका राजकवि था जिसकी रचना 'पृथ्वीराज रासो' को हिन्दी के प्रथम महाकाव्य के रूप में स्वीकार किया जाता है.
> गुजरात के चालुक्य
चालुक्यों अथवा सोलंकियों ने लगभग साढ़े तीन सदियों (950-1300 ई.) तक गुजरात और काठियावाड़ में शासन किया. उनकी राजधानी अन्हिलवाड़ थी. इस वंश के सभी शासक जैन धर्म के पोषक एवं संरक्षक थे. इस वंश के शासकों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है
> भीम प्रथम
यह अपने वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था. इसने धारा के परमार नरेश भोज के विरुद्ध कलचुरि नरेश कर्ण के साथ मिलकर एक संघ बनाया. इस संघ ने मालवा पर आक्रमण कर भोज की राजधानी धारा को लूट लिया.
भीम ने सिन्ध के राजा हम्मुक को पराजित कर उसे अपने अधीन कर लिया था. भीम प्रथम के समय की सर्वाधिक उल्लेखनीय घटना 1025 ई. में सोमनाथ पर महमूद गजनवी का आक्रमण थी जिसने सोमनाथ के मन्दिर को ध्वस्त कर दिया था. भीम ने उसका पुनर्निर्माण करवाया.
भीम महान् निर्माता भी था. पाटन में उसने भीमेश्वरदेव तथा भट्टारिका के मन्दिरों का निर्माण करवाया था. उसी के सामंत विमलशाह ने आबू का प्रसिद्ध दिलवाड़ा के जैन मन्दिर का निर्माण करवाया.
> कर्ण 
कर्ण की राजनैतिक क्षेत्र में विशेष उपलब्धि ज्ञात नहीं है, लेकिन उसके निर्माण कार्यों द्वारा उसे जाना जाता है. उसने कर्णावती नामक नगर की स्थापना की तथा वहाँ कर्णेश्वर नामक मन्दिर एवं कर्णसागर नामक तालाब का निर्माण करवाया. अन्हिलवाड़ के कर्णमेरु नामक मन्दिर के निर्माण का श्रेय भी उसे ही दिया जाता है.
> जयसिंह सिद्धराज
जयसिंह, जिसने सिद्धराज की उपाधि धारण की, अपने पिता कर्ण के उपरान्त गद्दी पर बैठा तथा लगभग 50 वर्षों तक शासन किया. अनेक विजयों द्वारा अपने राज्य को उसने विस्तृत किया. उत्तर में परमारों को हराकर उसने भीनमाल पर अधिकार कर लिया. इसके बाद उसने शाकम्भरी के चाहमानों को परास्त किया. उसने चन्देल राज्य पर भी आक्रमण किया तथा कालिंजर और महोबा तक पहुँच गया. दक्षिण में कल्याणी के चालुक्य विक्रमादित्य-VI पर भी विजय प्राप्त की.
जयसिंह विद्वानों का महान् संरक्षक था, उसके नेतृत्व में, गुजरात में ज्ञान और साहित्यिक गतिविधियों के अनेक केन्द्र थे. उसके दरबार में अनेक कवि एवं विद्वान् आश्रय पाते थे जिनमें हेमचन्द्र प्रमुख था. हेमचन्द्र ने 'सिद्ध-हेमचन्द्र' नामक व्याकरण एवं 'द्वयाश्रयनिकाय' नामक ग्रन्थों की रचना की. जयसिंह शैवधर्म का अनुयायी था और अनेक मन्दिरों का निर्माण उसके द्वारा करवाया गया जिनमें सर्वप्रमुख 'सिद्धपुर का रुद्रमहाकाल मन्दिर' था.
> कुमारपाल
सम्बन्धी जयसिंह सिद्धराज के बाद उसका दूर का कुमारपाल शासक बना. यह एक महत्वाकांक्षी शासक था. इसने अजमेर के चाहमान शासक अर्णोराज को हराकर उसकी पुत्री जाल्हणादेवी से अपना विवाह किया और उससे मैत्री सम्बन्ध कायम किया.
जैन ग्रन्थों के अनुसार कुमारपाल ने मालवा के शासक बल्लाल के ऊपर आक्रमण कर उसे मार डाला तथा कोंकण के शिलाहार वंशी शासक को भी जीत लिया. सम्भवतः यह शासक मल्लिकार्जुन था. 
हेमचन्द्र के प्रभाव में आकर इसने जैन धर्म स्वीकार कर लिया .
> भीमदेव-II  
अजयपाल का पुत्र भीमदेव 1172 ई. के आसपास गुजरात का शासक बना. इसके समय की उल्लेखनीय घटना है 1178 ई. ई. में उसके राज्य पर मुसलमानों के जिसका कि इसने सफलतापूर्वक प्रतिरोध लिया. आक्रमण किया. 
भीम-II गुजरात के चालुक्य राजपूतों का अन्तिम शासक था. 1197 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसके राज्य पर अधिकार कर लिया. 
इसके बाद उसके एक मन्त्री लवण प्रसाद ने गुजरात बघेल वंश की स्थापना की थी और यह वंश 1240 तक गुजरात में शासन करता रहा. बाद में गुजरात दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया.
> प्राचीन भारत में वैज्ञानिक विकास 
प्राचीन भारतीय साहित्य व्याकरण, व्युत्पत्तिशास्त्र, छन्द, अलंकारशास्त्र आदि में जितना समृद्ध था उतनी ही समृद्धता वैज्ञानिक साहित्य में भी थी. भैषज्य, शल्य चिकित्सा, गणित, ज्योतिष आदि वैज्ञानिक विषयों पर अनेक ग्रन्थ लिखे गए. इन ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि प्राचीन भारत में वैज्ञानिक ज्ञान कितना उन्नत था. गणित के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने काफी उन्नति की. अंकों तथा दशमलव पद्धति के आविष्कारों से गणित का विकास हुआ. शुल्वसूत्र में वेदियों के निर्माण, ज्यामितीय आकृतियों और पाइथागोरस प्रमेय आदि का उल्लेख है. पाँचवीं सदी में बीजगणित और अंकगणित का काफी विकास हुआ. भारतीय ज्योतिष का आविष्कार पाँचवीं सदी में हुआ. आर्यभट्ट को भारतीय ज्योतिष का आविष्कारक माना जाता है. आर्यभट्टीय उनका सुप्रसिद्ध ग्रन्थ था. छठी शताब्दी में वराहमिहिर ने पंच सिद्धान्तक लिखकर व्यावहारिक ज्योतिष को नए आयाम दिए. ब्रह्मगुप्त का ब्रह्मस्फुटिक सिद्धान्त और भास्कराचार्य का सिद्धान्त शिरोमणि' ज्योतिषशास्त्र के अन्य प्रमुख ग्रन्थ थे.
चिकित्सा क्षेत्र में चरक और सुश्रुत का नाम उल्लेखनीय है. चरक ने भैषज्य और सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा पर क्रमशः चरक संहिता और सुश्रुत संहिता नामक ग्रन्थ लिखे. अथर्ववेद में भी अनेक रोगों का निदान बताया गया है. छठी सदी में वाग्भट्ट ने ‘अष्टांग हृदय' लिखा, जिसमें अनेक रोगों की चिकित्सा विधि का उल्लेख है.
मेहरौली का लौह स्तम्भ तत्कालीन धातुकर्म में उन्नतिशीलता को दर्शाता है.
> राजपूत काल की सामाजिक दशा का विवरण
राजपूतकालीन समाज वर्णों एवं जातियों के जटिल नियमों में बँधा हुआ था परम्परागत चार वर्णों— ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रों के अतिरिक्त समाज में अनेक जातियाँ एवं उपजातियाँ पैदा हो गई थीं. राजतरंगिणी में 64 उपजातियों का उल्लेख हमें प्राप्त होता है. सदा की भाँति इस काल में ब्राह्मण आदरणीय थे एवं राजपूत योद्धा वर्ग था. वैश्य लोग व्यापार के साथ-साथ धन उधार देने का कार्य करते थे. शूद्रों का कार्य इस युग में कृषि, शिल्पकारी व अन्य वर्णों की सेवा करना था. वैश्य तथा शूद्र जाति के लोगों को मन्त्रोच्चारण का अधिकार नहीं था. उल्लेखनीय है कि शूद्रों के साथ कृषि व्यवसाय के जुड़ जाने के उनकी सामाजिक स्थिति पहले से बेहतर हो गई थी. ग्यारहवींबारहवीं सदी तक आते-आते समाज में जाति प्रथा की रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज उठाई गई. जैन, शाक्त, तान्त्रिक सम्प्रदाय के अनुयायियों तथा चार्वाक मत के समर्थक लोगों ने कर्म की महत्ता को प्रतिपादित किया. बी. एन. यादव के अनुसार जाति प्रथा के विरोध के पीछे निम्न वर्ग की आर्थिक स्थिति में सुधार होना मुख्य कारण था. 
राजपूत युग में स्त्रियों को सम्मानित स्थान प्राप्त था. उनकी मान पर्यादा एवं सतीत्व की रक्षा के लिए वे अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार रहते थे. स्वयंवर प्रथा के भी उदाहरण मिलते हैं. सामान्य स्त्रियों को पढ़ने के अधिकार से वंचित रखा गया तथा विवाह करने की आयु और कम हो गई तथा पर्दा प्रथा प्रचलन में आ गई थी. सतीप्रथा का प्रचलन बढ़ गया था तथा कई बार जबरन भी सती होना पड़ता था.
किन्तु भूमि पर सम्पत्ति के अधिकार की वृद्धि होने से औरतों के भूमि सम्बन्धी अधिकारों में भी वृद्धि हुई. पारिवारिक सम्पत्ति की सुरक्षा के नाम पर औरतों को अपने पुरुष सम्बन्धियों की सम्पत्ति उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त करने का अधिकार था.
राजपूतों को घुड़सवारी तथा हाथियों की सवारी का विशेष शौक था. वे शिकार में भी रुचि रखते थे. मदिरापान, धूतक्रीड़ा, अफीम का सेवन आदि दुर्व्यसन भी उनमें प्रचलित थे.
  • उल्लेखनीय है कि इसी काल में कायस्थ वर्ग जो मुख्यतः लिपिकीय कार्य करता था, का जन्म हुआ.
  • इस काल में उत्तर भारत में शिक्षित वर्ग का दृष्टिकोण और भी अनम्य हो गया, वे किसी नवीन विचार को ग्रहण करने या सूत्रपात करने की बजाय पुराने ज्ञान को ही दुहराते रहे. उन लोगों ने भारत से बाहर के वैज्ञानिक विचारों से अपने को अलग रखा और यही कारण भारत के पिछड़ेपन का रहा जिसकी आगे चलकर भारत को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.
इस प्रकार स्पष्ट है कि समाज का स्वरूप सामन्तशाही था तथा समाज में उन लोगों का प्रमुख स्थान था, जो बिना कार्य किये ही उस पर अधिकार रखते थे. इस काल में उत्तरी भारत में ऐसे समाज की स्थापना का व्यापक प्रभाव पड़ा.
> सामंतवाद
सातवाहन काल में सामंतवाद की शुरूआत भारत हुई. इसने गति पकड़ी गुप्तकाल में और यह अपने चर्मोत्कर्ष पर थी राजपूत काल में सामंतों की उत्पत्ति शासकों द्वारा दिए गए भूमि अनुदानों के कारण हुई. चाहे वे भूमि अनुदान वेतन के एवज में सरकारी कर्मचारियों को दिए गए हों या फिर विद्वानों एवं धर्म सम्बन्धी पुरुषों को दिए हो. सातवाहन और गुप्तकाल में ये राजनीति में ज्यादा प्रभावी नहीं रहे, लेकिन राजपूत काल के आते-आते ये राजनीति में अत्यन्त प्रभावी हो अतएव राजपूतों की राज पूर्णतः सामंतों पर हो गई. राजपूत काल में सामंतों की संख्या काफी अधिक हो गई थी. गुप्तकाल से ही सामंतों राजनीति में अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था. गुप्त राजनी साम्राज्य के पतन के लिए सामंतवादी व्यवस्था एक महत्वपूर्ण कारक थी. इस सामंतवादी व्यवस्था के कारण ही गुप्त शासन व्यवस्था का विकेन्द्रीयकरण हो गया था. 
सामंतवादी व्यवस्था में राजा के अधीन सामंत होते थे और बड़े सामंतों के अधीन छोटे सामंत सामंत अपने-अपने क्षेत्रों में निरंकुश शासक की भाँति कार्य करते थे. उनका प्रमुख कार्य अपने क्षेत्र से भू-राजस्व एकत्र करना और कानून व्यवस्था बनाए रखना था. ये अपने स्वामी राजा को प्रतिवर्ष भू-राजस्व का एक बड़ा हिस्सा पहुँचाते थे और जब कभी राजा को जरूरत पड़ती थी, तो सैन्य एवं आर्थिक सहायता क उपलब्ध कराते थे.
सामंतवादी व्यवस्था के अन्तर्गत राजा सम्पूर्ण सेना अपने नियन्त्रण में न रखकर सामंतों के अधीन रखता था और प्रत्येक सामंत को एक निश्चित संख्या में सैनिक रखना अनिवार्य था. सैनिकों की संख्या के हिसाब से ही सामंतों को जागीर दी जाती थी.
सामंतवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यह था कि अगर राजा थोड़ा-सा भी कमजोर हुआ, तो ये सामंत उसके खिलाफ ही विद्रोह कर देते थे और वक्त-वक्त पर अपनी निष्ठा बदलते रहते थे. राजा को सदैव उनकी सहायता पर निर्भर रहना पड़ता था. इन सामंतों में सदैव आपसी झगड़े होते रहते थे और उनमें फूट थी. इसी कारण जब कभी बाह्य आक्रमण हुए, राजपूतों की पराजय हुई.
> स्त्रियों की दशा
परिवार में स्त्रियों की स्थिति उनकी वैवाहिक स्थिति एवं आयु द्वारा निर्धारित होती थी. ये परिवार के मुखिया के नियन्त्रण में रहती थीं और कभी पूर्णतः स्वतन्त्र नहीं होती थीं. वैदिककाल में उनकी स्थिति परवर्ती काल के सापेक्ष काफी अच्छी थी. वैदिक काल में स्त्रियों को काफी स्वतन्त्रता प्राप्त थी, लेकिन राजपूतकाल तक आते-आते उनकी स्थिति में काफी परिवर्तन हो चुका था. अब उनका विवाह यौवनावस्था से पूर्व होने लगा. अनेक प्रकार के विवाहों में केवल चार प्रकार के विवाह ही मान्य थे – ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्रजापत्य विवाह विवाह की स्वयंवर प्रथा प्रचलित थी. कन्याओं को स्वयंवर में अपना पति चुनने का अधिकार था. उच्च जातियों में विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार नहीं था और न ही उनकी सामाजिक स्थिति अच्छी थी. विधवा का विवाह कुछ जातियों में देवर से मान्य था. सती प्रथा का प्रचलन हो चुका था.
सम्पूर्ण प्राचीनकाल में स्त्रियों की स्थिति सदैव एकसी नहीं रही. वह लगातार गिरती रही. राजपूतकाल में पर्दा प्रथा का प्रचलन हो चुका था. उच्च परिवार की स्त्रियाँ घर से बाहर नहीं निकलती थीं, जबकि निम्न जाति की स्त्रियाँ घर से बाहर काम पर जाती थीं. स्त्री के सतीत्व और पतिभक्ति पर काफी बल दिया जाता था.
वैश्यावृत्ति राजपूतों में प्रचलित थी. अनेक वैश्याओं को राजकीय संरक्षण प्राप्त था. बहुपत्नी प्रथा उच्च वर्ग में प्रचलित थी. जहाँ अनेक पत्नियाँ होती थीं वहाँ उपेक्षिता पत्नी के प्रति प्रेम और ध्यान का अभाव रहता था. पत्नियों को पति की शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकताओं को पूरा करना पड़ता था.
स्त्रियों की दशा पुरुषों के बराबर नहीं थी, उनकी स्थिति शूद्रों से कुछ ही बेहतर थी. 
> शैक्षिक संस्थान
गुरु आश्रम शिक्षा के केन्द्र थे. उच्च शिक्षा के जो केन्द्र गुप्तकाल या उसके बाद स्थापित किए गए थे, वे मुख्यतः धार्मिक केन्द्र थे. प्राचीन भारत के शिक्षा केन्द्रों में तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है. तक्षशिला विश्वविद्यालय मौर्यकाल में अपने चर्मोत्कर्ष पर था. इसके पतन के बाद नालन्दा विश्वविद्यालय ने इसका स्थान ले लिया. हर्ष के समय में इसकी ख्याति दूरदूर तक फैली हुई थी. ह्वनेसांग जब नालन्दा पहुँचा उस समय उसने वहाँ छः विहार देखे, जिन्हें छः राजाओं ने बनवाया था. इस विश्वविद्यालय में विभिन्न देशों से विशेषकर दक्षिण-पूर्वी एवं पूर्वी एशिया से विद्यार्थी पढ़ने आते थे. यह बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था. इत्सिंग के अनुसार मंगोलिया, चीन, कोरिया, तिब्बत और बुखारा जैसे सुदूरवर्ती देशों से भी विद्यार्थी यहाँ अध्ययन के लिए आते थे. विश्वविद्यालय में प्रवेश केवल प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने पर ही मिलता था. इत्सिंग के समय में विद्वान् शीलभद्र यहाँ के कुलपति थे. इत्सिंग के अनुसार इस विश्वविद्यालय में ब्राह्मण एवं बौद्ध साहित्य, धार्मिक तथा लौकिक, दार्शनिक एवं व्यावहारिक साहित्य, विज्ञान एवं कला सम्बन्धी साहित्य का अकृत भण्डार था. असंग, वसुबन्धु, दिग्नाग, धर्मपाल आदि यहाँ के प्रमुख शिक्षक थे. यह विश्वविद्यालय तेरहवीं शताब्दी में बख्तियार खलजी द्वारा नष्ट कर दिया गया.
काठियावाढ़ का वल्लभी विश्वविद्यालय, उत्तरी मगध का विक्रमशिला विश्वविद्यालय, ओदन्तपुरी और मिथिला विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के अन्य प्रमुख केन्द्र थे. ह्वेनसांग ने जब वल्लभी का भ्रमण किया था, तब वहाँ लगभग 6,000 भिक्षु थे, जो 1,000 संघारामों में रहते थे और यहाँ के अध्यक्ष स्थिरमति और गुणमति थे. यहाँ राजनीति, छन्दशास्त्र और चिकित्साशास्त्र के अध्ययन की व्यवस्था थी. विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पालशासक धर्मपाल ने नवीं शताब्दी में की.
ये विद्यालय वैदिककाल की परिषदी के समान थे. वैदिककाल की प्रमुख परिषदियों में पांचाल परिषदी थी जिसका संरक्षक जाबालि था. इन विद्यालयों में दूर-दूर से विद्यार्थी पढ़ने आते थे. प्राचीनकाल में भारत शिक्षा के लिए सम्पूर्ण विश्व में अग्रणी माना जाता था.
> राजपूत काल की मन्दिर स्थापत्य शैलियाँ
राजपूत शासक बड़े उत्साही निर्माता थे. अतः इस काल में अनेक भव्य मन्दिर, मूर्तियाँ एवं सुदृढ़ दुर्गों का निर्माण किया गया. राजपूतकालीन मन्दिरों के भव्य नमूने भुवनेश्वर खजुराहो, आबू पर्वत तथा गुजरात से प्राप्त होते हैं, इनका विवरण निम्नलिखित है, Bhair
> उड़ीसा के मन्दिर 
उड़ीसा के मन्दिर मुख्यतः भुवनेश्वर, पुरी तथा कोणार्क में हैं, जिनका निर्माण 8वीं से 13वीं सदी के मध्य किया गया. भुवनेश्वर के मन्दिरों के मुख्य भाग के आगे एक चौकोर कक्ष का निर्माण किया गया है जिसके अन्दर का भाग बिल्कुल सादा है, परन्तु बाहरी भाग को अनेक प्रतिमाओं और अलंकरणों से सजाया गया है. यहाँ के मन्दिरों में स्तम्भों का प्रयोग बहुत कम मिलता है. स्तम्भों के स्थान पर लोहे की शहतीरों का प्रयोग किया गया है.
यहाँ के मन्दिरों में सर्वश्रेष्ठ मन्दिर लिंगराज का मन्दिर' है, जोकि उड़ीसा शैली के मन्दिरों का श्रेष्ठतम उदाहरण है. इसमें चार विशाल कमरे हैं तथा मुख्य कक्ष के ऊपर विशाल गगनचुम्बी शिखर है. इसकी गोलाकार चोटी के ऊपर पत्थर का आमलक तथा कलश रखा गया है, इस मन्दिर का शिखर अपने में पूर्णरूप में सुरक्षित है.
इस लिंगराज मन्दिर के अतिरिक्त पुरी का जगन्नाथ मन्दिर एवं कोणार्क का सूर्य मन्दिर भी उड़ीसा शैली का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं. कोणार्क के सूर्य मन्दिर की वास्तुकला अपने आपमें अनुपम है. इसे रथ का आकार दिया गया है. इसका विशाल प्रांगण 865' x 540' के आकार का है. मन्दिर का शिखर 225' ऊँचा है, जो गिर गया है, किन्तु इसका • सभा भवन आज भी सुरक्षित है. सभा भवन तथा शिखर का निर्माण एक चौड़े तथा ऊँचे चबूतरे पर हुआ है जिसके चारों ओर 12 पहिये बनाये गये हैं. प्रवेश द्वार तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हैं तथा इसके दोनों ओर उछलती अश्व प्रतिमाएँ उस रथ का आभास कराती हैं जिस पर चढ़कर भगवान् सूर्य आकाश में विचरण करते हैं. मन्दिर के बाहरी भाग पर विविध प्रकार की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं. कुछ मूर्तियाँ अत्यन्त अश्लील हैं जिन पर तान्त्रिक विचारधारा का प्रभाव माना जा सकता है. सौन्दर्य तथा सम्भोग का मुक्त प्रदर्शन इस शैली की प्रधान विशेषता है.
> गुजरात तथा राजस्थान शैली
गुजरात तथा राजस्थान में चालुक्य शासकों के काल में अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया गया. ये मन्दिर मुख्यतः जैन धर्म से सम्बन्धित हैं.
गुजरात के प्रमुख मन्दिरों में मेहसाना जिले में स्थित 'मांडेहरा का सूर्य मन्दिर' उल्लेखनीय है. इसका निर्माण 11वीं सदी में किया गया. अब वर्तमान में यह मन्दिर ध्वस्त हो है तथा केवल अवशेष ही प्राप्य हैं. इसमें गर्भगृह, प्रदक्षिणा पथ, मण्डप आदि हैं; इसका निर्माण ऊँचे चबूतरे पर किया गया है. पाटन स्थित सोमनाथ के मन्दिर का भी उल्लेख किया जा सकता है जिसका पुनर्निर्माण स्वतन्त्रता के समय किया गया था. चालुक्य वंश के शासक कर्ण ने अन्हिलवाड़ में कर्णमेरु नामक मन्दिर बनवाया. सिद्धपुर स्थित में रुद्रमाल का मन्दिर भी स्थापत्य कला का सुन्दर उदाहरण है.
राजस्थान के आबू पर्वत पर कई मन्दिरों का निर्माण इस समय करवाया गया जिनमें संगमरमर के दो प्रसिद्ध मन्दिर जिन्हें दिलवाड़ा कहा जाता है, अत्यन्त प्रसिद्ध हैं. पहला मन्दिर तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है जिनकी आँखें हीरे की हैं. प्रवेश द्वार पर छः स्तम्भ तथा 10 गज प्रतिमाएँ हैं. इसमें 128' x 75' के आकार का एक विशाल प्रांगण है. यह मन्दिर अपनी बारीक नक्कासी तथा अद्भुत मूर्तिकारी के लिए प्रसिद्ध है. पाषाण शिल्पकला का इससे बेहतर उदाहरण कहीं नहीं मिलता. दूसरा मन्दिर जो तेजपाल कहा जाता है, इसी के पास स्थित है यह भी भव्य तथा सुन्दर है. पहाड़ी पर तीन अन्य जैन मन्दिर भी बने हुए हैं.
पश्चिमी भारत के मन्दिरों का निर्माण सामान्यतः ऊँचे चबूतरे पर किया गया है. इनके शिखर छोटी मीनारों से अलंकृत हैं. मन्दिर की भीतरी छतों पर खोदकर चित्रकारी की गई है. सभी मन्दिर अपनी सूक्ष्म एवं सुन्दर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं तथा इनमें श्वेत संगमरमर का भरपूर प्रयोग किया गया है.
> खजुराहो या बुन्देलखण्ड शैली
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खजुराहो नामक स्थान पर चन्देल शासकों ने अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया जोकि पूर्व मध्यकालीन वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं.
खजुराहो में आज भी लगभग 25 मन्दिर विद्यमान हैं जिनका निर्माण ग्रेनाइट व लाल बलुआ पत्थर से किया गया है. ये मन्दिर शैव, वैष्णव तथा जैन धर्मों से सम्बन्धित हैं. मन्दिरों का निर्माण ऊँचे चबूतरे पर किया गया है जिसके ऊपरी भाग को अनेक अलंकरणों से सजाया गया है. दीवारों में बनी खिड़कियों में अनेक छोटी-छोटी मूर्तियाँ रखी गई हैं. गर्भगृह के ऊपर सीधा शिखर है. मन्दिर आकार में बहुत बड़े नहीं हैं तथा उनके चारों ओर दीवार भी नहीं बनाई गई है. प्रत्येक मन्दिर में मण्डप, अर्द्धमण्डप तथा अन्तराल मिलते हैं. कुछ मन्दिरों के मण्डप अत्यन्त विशाल है जिन्हें महामण्डप नाम दिया गया है. मन्दिरों के प्रवेश द्वार को मकर तोरण कहा गया है, क्योंकि उसके ऊपर मकर मुख के तोरण की आकृति बनी हुई है. कुछ मन्दिरों में गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा मार्ग भी बनाये गये हैं.
खजुराहो के मन्दिरों में 'कन्दरिया महादेव का मन्दिर' सर्वश्रेष्ठ मन्दिर है. यह 109′ × 60 × 116' के आकार में बना है. इसका ऊँचा शिखर तथा इसमें कई छोटे-छोटे शिखर बनाये गये हैं. इनकी दीवारों पर बहुसंख्यक मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं. इसके गर्भगृह में संगमरमर का शिवलिंग स्थापित किया गया है.
जैन मन्दिरों में 'पार्श्वनाथ का मन्दिर' विशेष रूप से उल्लेखनीय है जो 62' x 31' के आकार में निर्मित है.. इसकी बाहरी दीवारों पर तीन पंक्तियाँ मूर्तियों की खोदी गई हैं. वैष्णव मन्दिरों में 'चतुर्भुज मन्दिर' उल्लेखनीय है जो 85' x 44' के आकार का है. इसका वास्तु-विन्यास कन्दरिया महादेव मन्दिर के जैसा ही है, यहाँ कुछ अन्य मन्दिर जैसे चौसठ योगिनि, ब्रह्मा, लालगुंवा महादेव, लक्ष्मण, विश्वनाथ मन्दिर आदि हैं.
वास्तुकला के समान खजुराहो के मन्दिर अपनी तक्षण कला के लिए भी प्रसिद्ध हैं. गुम्बददार छतों के ऊपर अनेक चित्र उत्खचित हैं. खजुराहो के मन्दिरों में देवी-देवताओं के साथ-साथ कई दिग्पालों, गणों, अप्सराओं, पशु-पक्षियों आदि की बहुसंख्यक मूर्तियाँ प्राप्त होती हैं. कुछ मूर्तियाँ अत्यन्त अश्लील हैं जिन पर सम्भवतः तान्त्रिक प्रभाव लगता है. इनमें भोग और जोग का अद्भुत मिश्रण है.
इस प्रकार समग्र रूप से खजुराहो के मन्दिर अपनी वास्तु तथा तक्षण दोनों कलाओं के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध हैं. के. डी. वाजपेयी के शब्दों में, प्रकृति तथा मानव जीवन की ऐहिक सौन्दर्य राशि को यहाँ के मन्दिरों में शाश्वत रूप प्रदान कर दिया गया है. शिल्प शृंगार का इतना प्रचुर तथा व्यापक आयाम भारत के किसी अन्य कला केन्द्र में शायद ही देखने को मिले.
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Sun, 08 Oct 2023 07:30:09 +0530 Jaankari Rakho
हर्ष काल https://m.jaankarirakho.com/407 https://m.jaankarirakho.com/407 > हर्षयुगीन इतिहास से सम्बन्धित स्रोत
हर्षचरित—हर्ष के समय के महत्त्वपूर्ण विद्वान् बाणभट्ट द्वारा रचित गद्य रचना है जो आठ उच्छावासों में विभक्त है. भाषा संस्कृत है, जहाँ प्रथम तीन उच्छावासों में बाणभट्ट की आत्मकथा वर्णित है वहीं शेष पाँच उच्छावासों में हर्षवर्द्धन के जीवन चरित व उपलब्धियों के साथ-साथ हर्ष के पूर्वजों के विषय में भी जानकारी सन्निहित है. विशेषकर प्रभाकर वर्द्धन के विषय में अनेक अतिशयोक्तिपूर्ण एवं अनैतिहासिक साक्ष्यों के बावजूद यह ग्रन्थ तत्कालीन भारत की राजनीतिक स्थिति एवं संस्कृति के विवेचन की दृष्टि से उल्लेखनीय कृति है.
कादम्बरी—बाणभट्ट द्वारा विरचित संस्कृत साहित्य की उत्कृष्ट गद्य रचना जिसके दो भाग पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध हैं. प्रथम भाग बाणभट्ट ने लिखा है, जो सम्पूर्ण ग्रन्थ का 2/3 भाग है तथा दूसरा ‘पुलिन्द भट्ट' द्वारा विरचित इस ग्रन्थ में ‘चन्द्रापीड’ तथा ‘कादम्बरी' की प्रणय कथा के साथ-साथ ‘पुण्डरीक’, महाश्वेता, वैश्वम्पायन आदि की कथाएँ भी वर्णित हैं. जाबाल मुनि के आश्रम, प्रकृति के मनोरम दृश्यों के चित्रण के साथ-साथ अलंकारों का सुन्दर संयोजन भी दृष्टव्य है.
आर्य मंजूश्रीमूल कल्प- महायान से सम्बन्धित प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थ जिसमें एक हजार श्लोक हैं, इसका सर्वप्रथम प्रकाशन 1925 ई. में ‘गणपति शास्त्री' ने किया. इस ग्रन्थ में सातवीं शताब्दी ई. पू. से लेकर 8वीं शदी तक का इतिहास वर्णित है. हर्ष युगीन इतिहास से सम्बन्धित कुछ घटनाओं/ तथ्यों की जानकारी भी इसमें विहित है, लेकिन उल्लेखनीय है कि हर्ष के लिए केवल 'ह' शब्द प्रयुक्त किया है. अनेक अनैतिहासिक साक्ष्यों के समावेश के बावजूद प्राचीन भारत के विभिन्न शासकों से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण तथ्य इसमें उपलब्ध हैं.
हर्ष की रचनाएँ—(1) रत्नावली— चार अंकों में विभक्त इस नाटक में सिंहल देश की राजकुमारी और 'वत्सराज उदयन' की प्रणयकथा और अन्ततोगत्वा विवाह सम्बन्धी साक्ष्य उल्लिखित हैं.
(2) नागानन्द —5 अंकों में विभक्त इस नाटक में विद्याधर कुमार जीमूतवाहन और सिकृद कन्या 'मलयवन्ति' का प्रणय-वर्णन और द्वितीय भाग में सर्पों की रक्षा हेतु जीमूतवाहन द्वारा स्वयं को गरुड़ के समकक्ष खाने हेतु अर्पित करने की कथा विवेचित है.
(3) प्रियदर्शिका – चार अंकों में विभक्त इस नाटक में वत्सराज उदयन और उदयवर्मा की कन्या प्रियदर्शिका की प्रेमकथा विवेचित है.
ह्वेनसांग और उसका ग्रंथ सी यू- की – ह्वेनसांग के मित्र 'हु-ली' द्वारा विरचित ग्रन्थ 'ह्वेनसांग की जीवनी’ जिसका सर्वप्रथम अंग्रेजी अनुवाद Beal द्वारा प्रस्तुत किया गया. इस ग्रन्थ में हर्षकालीन इतिहास से सम्बन्धित कई महत्वपूर्ण तथ्य विवेचित हैं, क्योंकि यह ग्रन्थ स्वयं ह्वेनसांग द्वारा सुनाए गए संस्मरणों पर आधारित था.
इत्सिंग (671-695 A.D.) — यह एक चीनी यात्री था जिसका मूल ग्रन्थ तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन अंग्रेजी अनुवाद जापांनी बौद्ध विद्वान् 'तक्कसू’ द्वारा ‘ए रिकॉर्ड ऑफ दी बुद्धिष्ट रिलिजन' नाम से किया गया है.
बाँसखेड़ा ताम्रपत्र – हर्ष से सम्बन्धित ताम्रपत्र जो 1894 ई. में उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में स्थित बाँसखेड़ा नामक स्थान से मिला जिसमें हर्ष सम्वत् 22 (628A.D.) तिथि अंकित है. इससे ज्ञात होता है कि हर्ष ने ‘अहिछत्र भुक्ति' के अंग विषय के मर्कत सागर को बालचन्द्र और भट्टस्वामी नामक दो भाइयों को दान में दिया. इसी अभिलेख में हर्ष के पूर्वजों के साथ राज्यवर्द्धन द्वारा मालवराज देवगुप्त पर विजय तथा गौड़ शासक शशांक द्वारा उसकी हत्या की जानकारी मिलती है.
मधुबन ताम्रपत्र – उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले की घोषी तहसील में स्थित स्थल जहाँ से हर्ष संवत् 25 (631A.D.) से अंकित ताम्रपत्र मिला है, जिसमें हर्ष द्वारा श्रावस्ती भुक्ति के सोमकुण्डा ग्राम को दान देने का उल्लेख है, जबकि अन्य तथ्य बाँसखेड़ा ताम्रपत्र के सदृश ही हैं. उल्लेखनीय है कि बाँसखेड़ा ताम्रपत्र हर्ष के हस्ताक्षर युक्त है. वे साक्ष्य जो कालान्तर में हर्ष की बौद्ध धर्म के प्रति निष्ठा के परिचायक हैं
1. कन्नौज के धार्मिक सम्मेलन में बुद्ध प्रतिमा को शोभा यात्रा के अवसर पर न केवल सबसे आगे रखा गया है, बल्कि यहाँ हुए वाद-विवाद में बौद्ध धर्म के प्रति यहाँ हुआ रुझान दृष्टिगत होता है.
2. कश्मीर के शासक से बलपूर्वक बुद्ध के दाँत के अवशेष प्राप्त करना.
3. ह्वेनसांग द्वारा इस तथ्य का उल्लेख कि हर्ष ने गंगा के तट पर हजारों स्तूपों का निर्माण करवाया था.
4. प्रयाग की महामोक्ष परिषद् ने सर्वोच्च स्थान बौद्ध धर्म और उसके अनुयायियों को दिया.
5. नालन्दा विश्वविद्यालय जैसा महत्वपूर्ण शिक्षा केन्द्र हर्ष द्वारा प्रदत्त दान से चलता था, जो बौद्ध शिक्षा की दृष्टि से अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण था. 
> कन्नौज का धार्मिक सम्मेलन ( अधिवेशन )
हर्ष के शासनकाल की महत्वपूर्ण घटना थी जिसका आयोजन 643 A.D. में किया गया. इस महती धर्म-सम्मेलन में 18 देशों के राजा, 3 हजार महायानी व हीनयानी भिक्षु, 300 ब्राह्मण एवं निर्गंथ एवं एक हजार नालन्दा विहार के भिक्षु उपस्थित थे. अधिवेशन का मुख्य उद्देश्य विभिन्न धार्मिक मतावलम्बियों के मध्य पारस्परिक संवाद था, जिसमें महायान की उत्कृष्टता स्वीकार की गई. महायान की ओर से प्रमुख वक्ता के रूप में ह्वेनसांग ने भाग लिया था जिसे विजयी घोषित किया गया और साथ ही 'महायान देव' तथा ‘महामोक्ष देव' की उपाधि से अलंकृत किया गया.
> प्रयाग की महामोक्ष परिषद्
ह्वेनसांग के विवरण से ज्ञात होता है कि हर्ष ने अपने शासन के प्रति 5वें वर्ष में प्रयाग में एक विशाल सम्मेलन आयोजित करता था जिसे महामोक्ष परिषद् कहा गया है. ह्वेनसांग जिस सम्मेलन में उपस्थित हुआ वह हर्ष के शासनकाल का छठा सम्मेलन था, जो गंगा-यमुना के संगम पर 644 A.D. में आयोजित किया गया. इस सम्मेलन में दक्षिण भारतीय शासक ध्रुव भट्ट और असम के भास्करवर्मन के साथ-साथ अन्य अनेक शाही लोग भी उपस्थित थे. इस सम्मेलन में उपस्थित लगभग 5,00,000 लोगों में श्रमण, साधु, नीरग्रन्थी, गरीब, अनाथ, असहाय लोग सम्मिलित थे. इस सम्मेलन के दौरान दान-दक्षिणा का कार्यक्रम 75 दिन गंगा के मैदान में चला.
सम्मेलन के प्रथम दिन बुद्ध की दूसरे दिन सूर्य की और तीसरे दिन शिव की पूजा की गई और मुक्त हस्त से दान दिया गया. चौथे दिन केवल बौद्ध भिक्षुओं को दान दिया गया. अगले बीस दिन हर्ष द्वारा केवल ब्राह्मणों को दान दिया गया. उसके अगले दस दिन साधुओं को दान दिया गया. इन
साधुओं में जैन धर्म के अतिरिक्त अन्य धर्मों के साधु थे. इसके पश्चात् भिखारियों, गरीबों, अनाथों एवं असहायों को दान दिया गया. इस सम्मेलन में हर्ष द्वारा दान इस हद तक दिया गया कि उसके राजसी वस्त्र तक दान में चले गए.
यह महामोक्ष परिषद् हर्ष की दानशीलता के लिए जानी जाती है.
> हर्ष के समय के प्रसिद्ध विद्वान्
बाणभट्ट, भूषण भट्ट, उद्योतकर एवं मयूर (सूर्यशतक एवं अष्टक) रचनाएँ हैं.
> नालन्दा विश्वविद्यालय 
बिहार में राजगिरि से 10 किमी दूरी पर आज जहाँ बेड़गाँव है. वहीं प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण शिक्षण केन्द्र नालन्दा विश्वविद्यालय के अवशेष मिले हैं. ह्वेनसांग ने इस विश्वविद्यालय के संस्थापक के रूप में शंकरादित्य ( कुमारगुप्त I) का उल्लेख किया है, लेकिन शिक्षा के महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में इसकी प्रतिष्ठा हर्ष के समय में ज्ञात होती है. इस विश्वविद्यालय में चीन, कोरिया, तिब्बत, तुखार आदि से विद्यार्थी अध्ययन आते थे जिनकी शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था थी. ह्वेनसांग के समय यहाँ 10,000 विद्यार्थी तथा 1510 शिक्षक थे तथा उपकुलपति प्रसिद्ध विद्वान् आचार्य शीलभद्र थे. जीवनी के अनुसार यहाँ के पाठ्यक्रम में महायान के अतिरिक्त अन्य बौद्ध सम्प्रदायों, हेतु विद्या, शब्द विद्या, चिकित्सा, अथर्ववेद, सांख्य आदि का अध्ययन, अध्यापन शामिल था. विश्वविद्यालय में एक विशाल पुस्तकालय था जिसे 'धर्मयज्ञ' कहते थे, जिसके तीन भाग थे - 
(i) रत्नोदधि.
(ii) रत्न सागर.
(iii) रत्नरंजक.
ह्वेनसांग नालन्दा विश्वविद्यालय में 637 ई. में पहुँचा, जहाँ उसने दो वर्ष तक अध्ययन किया. अध्ययन के प्रति उसकी निष्ठा के कारण वहाँ से जाने पर नालन्दा के भिक्षु 'प्रज्ञादेव' ने यहाँ के विद्यार्थियों की ओर से एक जोड़ी वस्त्र भी भिजवाए थे.
> नालन्दा विश्वविद्यालय के संरक्षक शासक 
(i) नरसिंहगुप्त बालादित्य 
(ii) कुमारगुप्त-II 
(iii) वेन्यगुप्त 
(iv) मौखरि शासक अवन्तिवर्मन 
(v) हर्षवर्धन.
> हर्ष का साम्राज्य विस्तार
गुप्त साम्राज्य के बाद हुई राजनीतिक विशृंखलता एवं विखण्डन को समाप्त कर हर्ष ने उत्तरी भारत को पुनः एक सूत्र में आबद्ध करने का महती कार्य किया. जहाँ एहोल प्रशस्ति में उसे 'सकलोत्तरपथनाथ' कहा गया है वहीं हर्षचरित में ‘चतुः समुद्राधिपति' तथा 'सर्व चक्रवर्ती नाम धौरेय' से विभूषित किया गया है.
लेकिन स्पष्ट तथ्यों के अभाव में हर्ष साम्राज्य विस्तार का सही रेखांकन विवादास्पद है. जहाँ बी. एन. शर्मा ने अपने ग्रन्थ ‘हर्ष एण्ड हिज टाइम्स' में समग्र उत्तरी भारत जिसमें कश्मीर व नेपाल भी सम्मिलित थे उसके आधिपत्य में स्वीकार किया है, तो देवाहुति अपने ग्रन्थ 'Harsh a Political Study' में इससे सहमत नहीं हैं. अन्य इतिहासविदों ने भी इस सन्दर्भ में अलग-अलग मान्यताएँ प्रस्तुत की हैं. अतः उसके साम्राज्य विस्तार का वास्तविक अंकन करने के लिए प्राप्त साक्ष्यों का सम्यक् विश्लेषण आवश्यक है.
बाणभट्ट ने हर्ष द्वारा गौड शासक को पराजित करने की प्रतिज्ञा एवं विभिन्न अहंकारी शासकों के उन्मूलन की बात तो कही है, लेकिन किन राज्यों और शासकों को पराजित किया इसका उल्लेख नहीं किया. ह्वेनसांग, हर्ष की पूर्व की ओर बढ़कर पञ्चभारत की विजय और अविरत छः वर्षों तक युद्ध का उल्लेख तो करता है, लेकिन विभिन्न राज्यों का नाम तक नहीं लिखा है.
ऐसा प्रतीत होता है कि हर्ष 619 ई. तक शशांक को पराजित तक नहीं कर सका, क्योंकि इस समय के गंजाम अभिलेख में उसके पूर्ण प्रतिष्ठा के साथ शासन करने का उल्लेख है. अतः सम्भावना यह है कि शशांक की के मृत्यु बाद उसके साम्राज्य के कांगोद तक के क्षेत्र हर्ष के साम्राज्य में आ गए जिसमें मगध और पश्चिमी बंगाल के भू-भाग भी सम्मिलित थे तथा पूर्वी भाग कामरूप के शासक 'भास्कर वर्मा' के अधिकार क्षेत्र में रहा.
मा-त्वान-लिन ने शिलादित्य की मगध राज की उपाधि का उल्लेख किया है जिससे भी मगध पर उसके अधिकार की पुष्टि होती है.
बाँसखेड़ा व मधुबन ताम्रपत्रों एवं सिक्कों की प्राप्ति के आधार पर अहिछत्र एवं श्रावस्ती के क्षेत्र उसके अधिकार में ज्ञात होते हैं, तो थानेश्वर एवं कन्नौज राज्याधिकार के साथ ही उसके साम्राज्य में सम्मिलित थे. ह्वेनसांग ने वल्लभी के शासक ‘ध्रुवसेन II’ की हर्ष द्वारा पराजय का उल्लेख किया है.
लेकिन बाद में अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर मैत्री सम्बन्ध स्थापित कर लिए. सम्भावना यह है कि 'पुलकेशिन II' एवं गुर्जर नरेश दद्दा II की प्रतिद्वन्द्विता के विरुद्ध यह एक कूटनीतिक कदम था.
इस समय दक्षिण भारत में चालुक्य शासक पुलकेशिन II का राज्य था. हर्ष द्वारा मध्य एवं पश्चिमी भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयास में उसके साथ नर्मदा तट पर युद्ध किया और उसका राज्य दक्षिण में नर्मदा घाटी से आगे नहीं बढ़ पाया.
इन साक्ष्यों के प्रकाश में हर्ष के साम्राज्य में 'थानेश्वर' (हरियाणा), दिल्ली, पंजाब, राजस्थान के कुछ भाग, कन्नौज, अहिछेत्र एवं श्रावस्ती ( रामनगर - बरेली), मगध, पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा में कांगोद तक का क्षेत्र सम्मिलित था. जिसकी दक्षिणी सीमा नर्मदा घाटी तक स्वीकार्य है.
> हर्ष का धर्म
ऐसा माना जाता है कि हर्ष के तीन पूर्वज शिव के उपासक थे. बाँसखेड़ा और मधुबन अभिलेखों में हर्ष ने स्वयं को परम महेश्वर और शिवभक्त कहा है. 631 ई. तक हर्ष शिवभक्त ही बना रहा बाद में ह्वेनसांग और बहन राजश्री के प्रभाव से बौद्ध धर्म की ओर उन्मुख हुआ. कन्नौज असेम्बली में हर्ष ने बौद्ध भिक्षुओं के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया. हर्ष के बौद्ध धर्म के प्रचारक होने के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं. उसने बौद्ध धर्म अपनाने के बावजूद सार्वजनिक स्थलों पर सूर्य और शिव की पूजा करना बरकरार रखा और ब्राह्मणों को मुक्त हस्त से दान दिया.
इससे स्पष्ट है कि हर्ष ने हालांकि बाद में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था, लेकिन उसने अन्य धर्मों के प्रति भी सहिष्णुता की नीति अपनाए रखी थी.
> ह्वेनसांग की भारत यात्रा का विवरण
ह्वेनसांग चीनी बौद्ध यात्री था जो भारत में बुद्ध की लीला भूमि एवं अन्य बौद्ध तीर्थस्थलों के दर्शन करने तथा बौद्ध धर्म से सम्बन्धित मूल ग्रन्थों के अध्ययन करने व संगठन करने की इच्छा से 629 A.D. में भारत आया. इसका यात्रा विवरण 'सी-यू- की' हर्षयुगीन जीवन के विभिन्न पक्षों का ज्ञान प्राप्त करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्रोत है.
चीन से प्रस्थान के बाद मार्ग में विभिन्न कठिनाइयों एवं बाधाओं का साहस के साथ सामना करते हुए यह चीनी यात्री तुर्फान कूचा, समरकन्द, काबुल, पेशावर और कश्मीर होते हुए पंजाब के मार्ग से थानेश्वर पहुँचा, जहाँ जयगुप्त नामक बौद्ध विद्वान् से बौद्ध धर्म का अनुशीलन किया. बाद में थानेश्वर से मथुरा होता हुआ कन्नौज पहुँचा, जहाँ उसका हर्ष ने स्वागत किया.
कन्नौज से अयोध्या, प्रयाग, कौशाम्बी, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कुशीनगर, वाराणसी, सारनाथ एवं वैशाली होता हुआ पाटलिपुत्र पहुँचा, उसके विवरण से ज्ञात होता है कि पाटलिपुत्र का प्राचीन गौरव एवं वैभव लुप्तप्रायः हो चुका था. यहाँ से वह बौद्धगया गया. वहाँ से ह्वेनसांग ने नालन्दा की ओर प्रस्थान किया जो इस समय शिक्षण केन्द्र के रूप में सुविज्ञ था.
उसने नालन्दा विश्वविद्यालय में न केवल अध्ययन किया, बल्कि जागरूक अध्येता के रूप में उसकी ख्याति सुस्थापित हुई. नालन्दा से कामरूप ताम्रलिप्ति, उड़ीसा होता हुआ दक्षिणी भारत में कांचीपुरम् पहुँचा जो उस समय शिक्षा का अन्य महत्वपूर्ण केन्द्र था. उसने कुछ समय वहाँ अध्ययन भी किया. बाद में उसने कन्नौज एवं प्रयाग के सम्मेलनों में भाग लिया. 644 A.D. में हर्ष से आज्ञा लेकर जालन्धर के शासक ‘उदित' की सहायता से भारतीय सीमा पार कर गया, जहाँ से गजनी, काशगर, खोतान होता हुआ चीन पहुँचा, लौटते समय अपने साथ 657 हस्तलिखित बौद्ध ग्रन्थ, 150 बुद्ध के अवशेष एवं प्रतिमाएँ ले गया.
> ह्वेनसांग द्वारा विवेचित तत्कालीन भारत का विवरण
ह्वेनसांग ने अपनी यात्रा के विविध स्थलों के अतिरिक्त विवेचन प्रस्तुत तत्कालीन जीवन के विभिन्न पक्षों का किया है. राजनीतिक जीवन के सन्दर्भ में उसने यहाँ के शासक के रूप में हर्ष ( शीलादित्य) का उल्लेख किया है तथा उसके शासन की अत्यधिक प्रशंसा की है. वह लिखता है कि सम्राट स्वयं परिश्रमी था जो समय-समय पर राज्य के विभिन्न भागों का दौरा करते हुए शासन कार्य को देखता था. प्रजा के हित के लिए तत्पर तथा करीब 2/3 समय धार्मिक कार्यों में व्यतीत करता था.
दिलचस्प बात यह है कि वह राज्य में विद्रोह एवं आपराधिक कार्यों का अभाव बताता है, जबकि स्वयं दो बार लूट लिया गया था. राज्य के विरुद्ध विद्रोह की स्थिति में मृत्युदण्ड अथवा राज्य निर्वासन का उल्लेख है. अंग-भंग के साथ-साथ अपराधों को स्वीकार करने के लिए दिव्य की परम्परा को उल्लिखित किया है. राज्य की आय मुख्यतः धार्मिक, राजकीय विद्वानों की सहायता एवं दान-पुण्यों के कार्यों में खर्च होती थी. सेना में स्थाई सैनिक 6 लाख, हाथी, 60,000 हजार व अश्वसेना एक लाख थी.
धार्मिक स्थिति के सन्दर्भ में उल्लेख किया है कि हर्ष बौद्ध धर्म का कट्टर समर्थक एवं अनुयायी था, लेकिन हिन्दू धर्म अधिक लोकप्रिय था. उसने भारत को ब्राह्मणों का देश कहा है. ब्राह्मण धर्म के अन्तर्गत यज्ञ, अनुष्ठान, मूर्तिपूजा, मन्दिर निर्माण आदि की परम्परा प्रचलित थी. बौद्ध धर्म अपेक्षाकृत पतनोन्मुख था. लेकिन मठ और विहार उसकी सक्रियता के केन्द्र थे. जैन धर्म भी पतनोन्मुख था यद्यपि वैशाली और पुण्ड्रवर्धन तथा समतट में इसका विशेष प्रचलन था. आर्थिक दृष्टि से वह देश की समृद्ध बताता है. सोनेचाँदी के सिक्कों का प्रचलन था, लेकिन सामान्यतः विनिमय में कौड़ियों का प्रयोग किया जाता था. कृषि विकसित स्थिति में थी. विभिन्न प्रकार के फल, अन्न, सब्जियों का पर्याप्त उत्पादन होता था. रेशम, ऊन एवं सूती वस्त्र निर्माण भी आर्थिक जीवन का उल्लेखनीय पक्ष था, हाथीदाँत और रत्नों के साथ-साथ आभूषण निर्माण के लिए यह मोती, माणिक व हीरों के प्रयोग की बात करता है. प्राचीन नगर व उनकी समृद्धि धूमिल हो गई थी और पाटलिपुत्र का स्थान कन्नौज ने ले लिया था, जिसके विषय में वह लिखता है कि उसके भवन, ऊँचे, सुन्दर उद्यान एवं तालाब स्वच्छ हैं और सभी दुर्लभ वस्तुएँ यहाँ प्राप्त हैं. 'ताम्रलिप्ति' एवं ‘कपीसा’ जैसे बन्दरगाहों का उल्लेख किया है, जहाँ से विदेशों के साथ व्यापार होता था.
कपड़ा, चन्दन की लकड़ी, जड़ी-बूटी, गर्म मसाले, मोती एवं हाथीदाँत की वस्तुएँ निर्यात होती थीं और सोना, चाँदी, हींग, घोड़े एवं धूप आदि का आयात होता था. सामाजिक व्यवस्था के प्रसंग में उसने बताया कि कि मध्य प्रदेश में चार वर्ग थे ब्राह्मण जो पवित्र आचार-विचार वाले थे.
क्षत्रिय – जो युगों से शासन कर रहे थे, वैश्य-व्यापार एवं व्यवसाय से सम्बन्धित थे. ह्वेनसांग ने इनकी दानशीलता एवं उदारता की प्रशंसा की है. चौथा वर्ग शूद्रों का था जो कृषि कार्यों से सम्बन्धित था. कठोर वर्ण-व्यवस्था और जनसामान्य का जीवन सात्विक एवं सरल था. मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का परहेज था तथा इसका सेवन करने वाले को नगर से बाहर रहना पड़ता था. लोगों का नैतिक जीवन उच्च था.
> हर्ष का प्रशासन
हर्ष ने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद न केवल उत्तरी भारत को एक सूत्र में आबद्ध करने का महती कार्य किया, अपितु साम्राज्य के सफल संचालन हेतु कुशल प्रशासन तंत्र की भी स्थापना की.
हर्ष का शासन जनहित के आदर्श एवं लक्ष्य से अनुप्राणित था. ह्वेनसांग ने हर्ष का उल्लेख एक आदर्श एवं लोकोपकारी शासक के रूप में किया है. जहाँ वह न केवल स्वयं राज्य के विभिन्न भागों का दौरा कर जन-समस्याओं के समाधान का प्रयास करता था, बल्कि उसके लिए समर्पित भी था. प्रयाग की 'महामोक्ष परिषद्' उसकी दानशीलता का महत्वपूर्ण प्रमाण है.
साम्राज्य का केन्द्र बिन्दु स्वयं सम्राट था, जो महाराजाधिराज, एकाधिराज, परमभट्टारक, चक्रवर्ती, परमेश्वर आदि कई उपाधियों को धारण करता था. विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति, सैन्य संचालन, न्याय व विविध विभागों की देखभाल उसका मुख्य दायित्व था. उसके अधीन राजा, महाराजा अथवा महासामन्त होते थे, जो समय-समय पर उसकी राज्यसभा एवं समारोहों में सम्मिलित होते थे तथा अवसर पड़ने पर उसकी सहायता करते थे.
शासन-कार्य में उसकी सहायता हेतु मन्त्रिपरिषद् होती थी. ह्वेनसांग के अनुसार पोनी के नेतृत्व में कन्नौज के मन्त्रियों एवं राजनीतिज्ञों ने हर्ष को कन्नौज का राजमुकुट धारण करने के लिए आमन्त्रित किया था. सुविधा के लिए शासन कई विभागों में बँटा था, जिसके अलग-अलग पदाधिकारी होते थे—
(i) संधिविग्रहिक—युद्ध, संधि एवं विदेश विभाग.
(ii) अक्षयपटलिक– सरकारी कागज-पत्रों की देखभाल करने वाला.
(iii) सेनापति – सेना का प्रधान.
(iv) मीमांशक – न्यायाधीश अथवा कानून की व्याख्या करने वाला.
(v) महाप्रतिहार – राजप्रसाद की रक्षा करने वाला.
(vi) भौगिक – उपज का. राजकीय भाग वसूलने वाला.
(vii) कर्णिक – लेखा-जोखा रखने वाला.
(viii) दीर्घाध्वज —–तीव्रगामी सन्देशवाहक.
> पुलिस विभाग से सम्बन्धित अधिकारियों में ‘दण्डपाशिक', 'चौरोद्धर्णिक' एवं 'दण्डिक' ज्ञातव्य है.
हर्ष के प्रशासन में ग्राम प्रशासन का विशेष उल्लेख हुआ है, जहाँ विभिन्न ग्राम अधिकारियों का उल्लेख मिलता है.
(i) शौकिक – चुंगी या शुल्क वसूल करने वाला.
(ii) गौनिक – वनों-उपवनों की देखभाल करने वाला.
(iii) अंग्रहारिक – ब्राह्मणों को दान में दिए गए गाँवों की देखभाल करने वाला.
(iv) ध्रुवाधिकरण – भूमिकर का अध्यक्ष.
(v) तलवक— गाँव का लेखा-जोखा रखने वाला.
ये विभिन्न अधिकारी गाँवों की भूमि के क्रय-विक्रय अधिकार, हस्तान्तरण, आय, दान आदि के निरीक्षण, प्रबन्धन एवं लेखा-जोखा के लिए उत्तरदायी थे.
> हर्ष प्राचीन भारत का अन्तिम महान् हिन्दू सम्राट
गुप्त साम्राज्य के विघटन के बाद भारत के राजनीतिक क्षितिज पर छोटे-छोटे राज्यों का आविर्भाव एवं अभ्युदय दृष्टिगत होता है. जिन्हें पुष्यभूति राजवंश ( अभिलेखों में वर्द्धन) के महत्वपूर्ण शासक हर्षवर्द्धन ने पराजित कर उत्तरी भारत को एक सूत्र में आबद्ध करने का महती कार्य किया. पुलकेशियन II की एहौल प्रशस्ति में उसे 'सकलोतरपथनाथ' तथा बाणभट्ट के हर्षचरित में 'चतुः समुद्धाधिपति' के रूप में विहित किया गया है.
यह सत्य है कि जिस समय हर्ष सिंहासन पर आसीन हुआ, अल्पायु था और साथ ही विभिन्न विपत्तियों से घिरा भी हूणों आक्रमण का खतरा, अनुभवी प्रभाकर वर्धन की मृत्यु, गृहवर्मा की हत्या, राज्यश्री का वैधव्य, अपने अग्रज राज्यवर्धन की छदम् हत्या एवं शशांक के आक्रमण की आशंका आदि ने उसके लिए विकट एवं प्रतिकूल परिस्थितियाँ . उत्पन्न कर दी थीं.
लेकिन हर्ष ने धैर्य, साहस एवं योग्यता का परिचय देते हुए न केवल अपने पैतृक राज्य की रक्षा की, अपितु उसे एक विस्तृत साम्राज्य के रूप में परिवर्तित एवं प्रतिष्ठित किया, जिसमें हरियाणा, पंजाब, राजस्थान के कुछ भू-क्षेत्रों के अतिरिक्त, उत्तर प्रदेश, बिहार, प. बंगाल एवं उड़ीसा में कांगोद तक के क्षेत्र के साथ-साथ दक्षिण में नर्मदा घाटी तक इसका विस्तार था. श्री कंठ 'जनपद' के एक छोटे से राज्य का यह विस्तार उसे महान् विजेता के रूप में प्रस्तुत करता है. यह सही है कि उसे चालुक्य शासक पुलकेशिन II से पराजित होना पड़ा, लेकिन इस पराजय से उसे कोई राजनीतिक क्षति नहीं हुई, चाहे दक्षिण में राज्य विस्तार सम्भव नहीं हो पाया.
प्रशासनिक प्रतिभा एवं जनसामान्य के हित व कल्याण के लिए उसका समर्पण, कामरूप के शासक भास्कर वर्मा तथा वल्लभी शासक ध्रुवसेन II के साथ मैत्री सम्बन्धों में कूटनीतिक दक्षता, साहित्यकारों को प्रश्रय, रत्नावली, नागानन्द, प्रियदर्शिका जैसे नाटकों का सृजन, बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए किए गए प्रयास, लेकिन अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुतापूर्ण नीति, सचमुच ही में हर्ष की महानता के प्रतीक हैं.
उसने गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्पन्न राजनीतिक अराजकता एवं अव्यवस्था (विशृंखलता) का अन्त कर देश के राजनीतिक एकीकरण के साथ-साथ देश के सांस्कृतिक उन्नयन का मार्ग प्रशस्त किया.
लेकिन यह कहना तर्कसंगत नहीं है कि वह प्राचीन भारत का अन्तिम महान् सम्राट था उसके बाद भी प्रतिहार शासक मिहिरभोज एवं महेन्द्रपाल, चोल शासक राजराज-I, राजेन्द्र प्रथम ने न केवल विस्तृत साम्राज्यों का निर्माण किया, बल्कि सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से उनका महत्व हर्ष से कम नहीं था.
> प्राचीन भारत में स्त्रियों की स्थिति
जहाँ तक प्राचीन भारत में स्त्रियों की स्थिति का प्रश्न है समय-समय पर परिवर्तित होती रही है. साथ ही तत्कालीन साहित्य में उसके महत्व एवं समाज व्यवस्था में उसकी अपरिहार्यता को लेकर विरोधी विचार एवं दृष्टिकोण अभिव्यक्त हुआ है. जहाँ एक ओर ‘शतपथ ब्राह्मण' में उसके बिना पुरुष को अपूर्ण एवं अधूरा समझा गया है. महाभारत में स्नेह एवं सन्तान से ही उसकी पूर्णता मानी गई है और वृहत् संहिता में उसको श्री तथा लक्ष्मी के रूप में मानव जीवन का सुख-समृद्धि से दीप्ति करने वाली कहा गया है, तो दूसरी ओर महाभारत में ही उल्लिखित है कि यदि कोई व्यक्ति स्त्रियों के दोषों को सौ वर्षों तक सौ जिह्वाओं से भी गिनाता रहे, तो वह उसके दोषों का बखान पूरा किए बिना ही मर जाएगा. बुद्ध तक ने यह स्वीकार किया है कि जिस प्रकार पाला पड़ने से फसल नष्ट हो जाती है उसी प्रकार स्त्रियों के प्रवेश से धर्म नष्ट हो जाता है.
ये कथन समाज-व्यवस्था में उसकी परिवर्तित स्थिति को इंगित करते हैं. वस्तुतः वैदिक युग से लेकर पूर्व मध्य युग तक उसकी स्थिति में अनेक उतार-चढ़ाव आते रहे और उसके अधिकारों में तद्नुरूप परिवर्तन भी होता रहा. वैदिक युग में अपेक्षाकृत उसकी स्थिति उन्नत और परिष्कृत थी. न केवल उसके स्वतन्त्रतापूर्वक शिक्षा प्राप्ति और विचरण का उल्लेख ज्ञातव्य है, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक एवं याज्ञिक कार्यों की सम्पन्नता में उसकी सहभागिता दृष्टिगत होती है, लेकिन कालान्तर में कर्मकाण्डों की जटिलता, याज्ञिक शुद्धता और पवित्रता, इनके लिए पुत्र की अपरिहार्यता के कारण इसकी स्थिति दयनीय होती गई.
स्त्रियों की इस दयनीय स्थिति के स्वर सूत्रों एवं स्मृतियों में मुखर हुए हैं. उन्हें निःसहाय, निर्बल और परतन्त्र माना गया, उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध भी लगा दिए गए. स्त्री धर्म को छोड़कर उनके साम्पत्तिक अधिकार भी अस्वीकार्य हुए. मनुस्मृति में उल्लेख है कि कन्या, पत्नि एवं माता जैसी स्थिति में वे क्रमशः पिता, पति और पुत्र द्वारा नियन्त्रित एवं संरक्षित है .
गुप्त युग में बृहस्पति एवं कात्यायान स्मृति में अंशतः उसके साम्पत्तिक अधिकार को स्वीकार किया गया. शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा एवं शाक्त धर्म के प्रभाव के कारण गौरी व भवानी के रूप में उसके महत्व सम्बन्धी साक्ष्यों के वाबजूद व्यवहार में उसकी दयनीय स्थिति का संकेत मिलता है. पिता उसके प्रति दायित्व भाव से बोझिल एवं संतृस्त होता रहा. हर्षचरित में उल्लेखित है कि कन्या किसी अनागत वर की धरोहर है, जिसको उसे प्रत्यर्पित करना है. साथ ही सती प्रथा, बाल-विवाह, पर्दा प्रथा जैसी प्रथाएँ भी उसकी दयनीय स्थिति की 'परिचायक' हैं.
पूर्वमध्य काल तक आते-आते उस पर नियन्त्रण और कठोर हो गये तथा उस पर पुरुष का पूर्ण एकाधिकार मान लिया गया. धर्म और समाज की रक्षा के नाम पर स्त्रियों को सुरक्षित रखने के लिए अनेक ऐसी व्यवस्थाओं का नियमन हुआ जिसके बन्धन में उसका व्यक्तित्व सिमट कर रह गया.
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Sun, 08 Oct 2023 07:19:22 +0530 Jaankari Rakho
गुप्तकाल https://m.jaankarirakho.com/406 https://m.jaankarirakho.com/406 > रामगुप्त की ऐतिहासिकता पर विभिन्न विचारों का परीक्षण 
समुद्रगुप्त (350–375 ई.) तथा चन्द्रगुप्त द्वितीय (375 - 412 ई.) के शासनकाल के मध्य में रामगुप्त नामक निर्बल शासक की ऐतिहासिकता के सन्दर्भ में अनेक मत प्रचलित हैं इसके पक्ष में निम्नलिखित साक्ष्य दिए गए - 
1. साहित्यिक साक्ष्य
1. विशाखदत्त—मुद्राराक्षस.
2. बाणभट्ट – हर्षचरित.
3. राजशेखर–काव्य मीमांसा.
4. भोज - शृंगार प्रकाश.
5. अबुल हसन अली – मजमुल उततवारीख.
साहित्यिक साक्ष्यों में वर्णित सूचनाओं से यह निष्कर्षात्मक तथ्य उभरकर आता है कि समुद्रगुप्त के ज्येष्ठ पुत्र रामगुप्त ने जब शकों से हारकर अपनी पत्नी ध्रुवस्वामिनी को उन्हें सौंप दिया तो रामगुप्त के छोटे भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय ने छद्म वेश धारण कर शकपति की हत्या कर अपने कुल की मर्यादा बनाए रखी और बाद में अपने भाई की हत्या कर राजा बन गया.
2. अभिलेखीय साक्ष्य
गुप्त साम्राज्य के इतिहास की जानकारी के लिए अनेक अभिलेखीय साक्ष्य उपलब्ध हैं जिनके आधार पर गुप्त इतिहास की प्रामाणिकता को जाँचा एवं परखा जा सकता है. अभिलेखीय प्रमाणों में सर्वप्रमुख है 'समुद्रगुप्त का इलाहाबाद अभिलेख'. वास्तव में यह मौर्य शासक अशोक का अभिलेख था जिस पर बाद में समुद्रगुप्त के मन्त्री हरिषेण ने अपने स्वामी के विजय अभियानों का उल्लेख किया है. इस अभिलेख के अलावा स्कन्दगुप्त का भितरी स्तम्भ अभिलेख उदयगिरि गुहा अभिलेख, मथुरा प्रस्तर अभिलेख, साँची अभिलेख, गधवा अभिलेख, चन्द्रगुप्त द्वितीय का महरौली का कांबे लेख और मंगली लेख आदि भी गुप्त इतिहास के अभिलेख, संजन लेख (अमोघवर्ष प्रथम का), गोविन्द चतुर्थ महत्वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्य हैं.
3. मुद्राएँ
मालवा के दो स्थानों भिलसा तथा एरण से प्राप्त ताम्र मुद्राएँ जिनमें एक पर रामगुप्त अंकित है. एरण से प्राप्त रामगुप्त की मुद्रा पर सिंह तथा गरुड़ की आकृति अंकित है. गरुड़ की आकृति रामगुप्त की ऐतिहासिकता में सहायक है, क्योंकि यह गुप्तों का राजकीय चिह्न था. इसलिए रामगुप्त की ऐतिहासिकता को विश्वास बनाकर उसे चन्द्रगुप्त द्वितीय का अग्रज ठहराने में अहम् भूमिका निभाते हैं.
उपर्युक्त साक्ष्यों के बाद भी अनेक विद्वान् स्मिथ, राय चौधरी, बनर्जी, मजूमदार रामगुप्त की ऐतिहासिकता स्वीकार करने से इनकार करते हैं तथा निम्नलिखित तर्क देते हैं—
1. गुप्त अभिलेखों में चन्द्रगुप्त द्वितीय को समुद्रगुप्त का तत्परिगृहीत कहा गया है, यानि समुद्रगुप्त के बाद चन्द्रगुप्त ही राजा बना.
2. गुप्त लेखों में रामगुप्त का नाम नहीं है.
3. रामगुप्त की मुद्राएँ ताँबे की हैं जिन पर प्राकृत में लेख हैं, जबकि सम्राटों की मुद्राएँ स्वर्ण, रजत की हैं और उन पर संस्कृत में लेख है.
4. अपनी पत्नी को समर्पित होने के लिए तैयार होना, अपने भाई की हत्या कर उसकी विधवा पत्नी के साथ विवाह आदि कार्य गुप्तकाल की स्वस्थ परम्पराओं के नितान्त प्रतिकूल कार्य है.
इन तर्कों का विद्वानों द्वारा खण्डन किया गया है और रामगुप्त की ऐतिहासिकता प्रमाणित की है. विद्वानों के अनुसार रामगुप्त चूँकि परवर्ती उत्तराधिकारी चन्द्रगुप्त द्वितीय का भाई था, इसलिए गुप्त अभिलेखों में उसका उल्लेख नहीं है. इसी तरह मुद्राओं का निर्माण उन पर प्राकृत या संस्कृत का प्रयोग उस काल की आर्थिक दशा और मुद्राकारों की कला कुशलता को दर्शाता है. गुप्त अभिलेखों में प्रयुक्त ‘तत्परिगृहीत’ व ‘तत्यादानुध्यात' शब्द केवल औपचारिक थे और पुत्र अपने पिता के प्रति सम्मान प्रकट करने हेतु प्रयुक्त करते थे.
निष्कर्ष के रूप में यही कहा जा सकता है कि रामगुप्त गुप्तवंश के शासकों में से ही एक था. अभिलेखीय साक्ष्यों ने रामगुप्त की ऐतिहासिकता को और भी पुष्ट कर दिया है.
> समुद्रगुप्त भारत के नेपोलियन के रूप में
'हरिषेण द्वारा विरचित प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की विभिन्न विजयों एवं तत्कालीन राज्यों के प्रति उसकी नीति के परिप्रेक्ष्य में प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासज्ञ विन्सेट स्मिथ ने इसे ‘भारत के नेपोलियन' के रूप में विहित किया है.
लेकिन समुद्रगुप्त अपेक्षाकृत अधिक महान् था, जहाँ नेपोलियन, वाटरलू के अन्तिम व निर्णायक युद्ध में पराजित हुआ, उसे सेण्ट हेलेना के द्वीप में निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा और उसी के साथ उसका साम्राज्य नष्ट हो गया, लेकिन समुद्रगुप्त ने गुप्त साम्राज्य को वह सम्बल व सुदृढ़ता प्रदान की कि वह आगामी 150 वर्षों तक पुष्पित एवं पल्लवित होता दृष्टिगत होता है.
> समुद्रगुप्त की दक्षिण नीति की समीक्षा
समुद्रगुप्त भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण शासक के रूप में ज्ञात है जिसकी विभिन्न उपलब्धियों का विवेचन हरिषेण द्वारा विरचित प्रयाग प्रशस्ति में वर्णित है. इससे ज्ञात होता है कि समुद्रगुप्त ने तत्कालीन विभिन्न व्यक्तियों एवं राज्यों के प्रति अलग-अलग नीतियों का अवलम्बन किया.
प्रशस्ति में उल्लिखित दक्षिण भारत के राज्य एवं शासक थे – कौशल का महेन्द्र, महाकान्तर का व्याघ्रराज, कोराल का मंतराजं, पिण्टुपुर का महेन्द्रगिरि, कोटूर का स्वामीदत्त, एरण्डपाल का दमन, अवमुक्त का नीलराज, वेंगी का हस्ति वर्मन, कांची का विष्णुगोप, देवराष्ट्र का कुबेर, पल्लक का उग्रसेन, कुशथलपुर का धनंजय इन सभी शासकों को समुद्रगुप्त ने परास्त किया था.
दक्षिण भारत के इन राज्यों के प्रति समुद्रगुप्त की 'ग्रहण मोक्षानुग्रह' अर्थात् ‘अधिकार करने के बाद भी स्वतन्त्र कर अनुग्रह किया' की नीति अपनाई. उल्लेखनीय है कि समुद्रगुप्त ने आर्याव्रत के राज्यों को बलपूर्वक अपने साम्राज्य में विलीन (प्रसभोद्धरण) कर लिया था. ऐसी स्थिति में स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है कि समुद्रगुप्त ने दक्षिणी भारत के इन राज्यों को अधिकार करने के बाद भी स्वतन्त्र क्यों कर दिया ?
ग्रहणमोक्षानुग्रह की नीति के कारण ऐसा माना जाता है कि समुद्रगुप्त का दक्षिण भारत पर आक्रमण का लक्ष्य वहाँ पर बहुलता में उपलब्ध स्वर्ण को प्राप्त करना था और जब इस उद्देश्य की पूर्ति हो गई तो उसने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए इन राज्यों को स्वतन्त्र कर दिया, क्योंकि दक्षिण भारत की दुर्गम और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण दीर्घ अवधि तक दक्षिणी भारत पर आधिपत्य रख पाना सुगम नहीं था.
चक्रवर्ती के आदर्श के वास्तविक क्रियान्वयन हेतु भी कार्य समुद्रगुप्त ने यह कदम उठाया और जब एक बार यह सम्पन्न हो गया तो उसने उन्हें पुनः स्वतन्त्र कर दिया, ताकि उत्तरी भारत में शासनतन्त्र शिथिल न होने पाए.
एक सहज प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जब 700 वर्ष पूर्व मौर्य शासकों ने दीर्घ अवधि तक इस क्षेत्र पर अपना आधिपत्य बनाए रखा तो गुप्त साम्राज्य के महान् शासक समुद्रगुप्त के लिए क्या यह सम्भव नहीं था, वस्तुतः समुद्रगुप्त के बदलते हुए राजनीतिक परिवेश में मौर्ययुगीन केन्द्रीयकरण की अपेक्षा विकेन्द्रीकरण की प्रकृति और सामन्तीय परम्परा का आविर्भाव दृष्टिगत होता है. इस नीति का अनुकरण कर समुद्रगुप्त ने व्यावहारिक दृष्टिकोण एवं कूटनीतिक दक्षता का परिचय दिया.
> गुप्तयुगीन धार्मिक स्थिति
गुप्तकाल भारतीय इतिहास में उन्नयन का प्रतीक है, जहाँ जीवन के विभिन्न पक्षों में चहुँमुखी विकास दृष्टिगत होता है. धार्मिक दृष्टि से इस समय विभिन्न परम्पराएँ प्रचलित थीं जिनमें पारस्परिक सौहार्द्र एवं सहिष्णुता ज्ञात होती है.
इस समय मुख्यतः ब्राह्मण धर्म एवं परम्परा का विकास द्रष्टव्य है. गुप्त सम्राटों ने वैदिक धर्म के विभिन्न अनुष्ठानों एवं क्रियाविधियों को न केवल अपनाया, अपितु उन्हें पुनः प्रतिष्ठित किया. विभिन्न वैदिक यज्ञों का प्रारम्भ, गुप्त शासकों द्वारा सम्पादित, अश्वमेध, अग्निनिष्ठोम आदि यज्ञ, ब्राह्मणों एवं मन्दिरों को भूमि दान देने की परम्परा का आरम्भ, लोगों की पंच महायज्ञों के प्रति श्रद्धा, ब्राह्मण धर्म के प्रचलन को पुष्ट करती है, तो साथ ही हिन्दू धर्म के दो महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय सम्प्रदायों वैष्णव एवं शैव के साथसाथ पौराणिक धर्म एवं परम्परा जो आज के लोकप्रिय हिन्दू धर्म का आधार है, इस समय स्पष्ट परिलक्षित है.
वैष्णव धर्म - गुप्त सम्राटों के राज्याश्रय एवं व्यक्तिगत रुझान के कारण वैष्णव धर्म की लोकप्रियता काफी बढ़ चुकी थी. चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य सहित विभिन्न गुप्त शासकों द्वारा धारण 'परम भागवत' की उपाधि इसी की प्रतीक है.
गुप्तकालीन सिक्कों पर गरुड़, शंख, चक्र, गदा, पद्म एवं लक्ष्मी का अंकन भी गुप्त शासकों की वैष्णव समर्थक नीति को पुष्ट करता है.
स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख, बुद्धगुप्त का एरण, स्तम्भ लेख, विष्णु की स्तुति से प्रारम्भ हुआ है. जूनागढ़ लेख में ही चक्रपालित द्वारा विष्णु मन्दिर निर्माण का उल्लेख हुआ है तो महरौली का लौह स्तम्भ वैष्णव धर्म की लोकप्रियता का प्रतीक है, जिसमें विष्णु ध्वज की स्थापना सम्बन्धी साक्ष्य निहित है. वैष्णव धर्म प्रचलन की दृष्टि से देवगढ़ का दशावतार मन्दिर और तिगवा का विष्णु मन्दिर भी उल्लेखनीय प्रतिमान हैं.
शैव धर्म - गुप्त शासकों की वैष्णव धर्म समर्थक नीति के बावजूद भी शैव धर्म का पर्याप्त प्रचलन इस समय ज्ञात होता है. कालिदास की रचनाएँ – कुमारसम्भव, मेघदूत आदि से शैव धर्म के प्रचलन के साथ-साथ इसके विभिन्न मतों की जानकारी मिलती है. रघुवंश का प्रारम्भ तो पार्वती-परमेश्वर की आराधना से हुआ है. उदयगिरि लेख का रचयिता और चन्द्रगुप्त II का संधिविग्रहिक 'शाब वीरसेन' शैव धर्म के प्रति विशेष अनुरक्त था. ‘कर्मदण्डा अभिलेख' में कुमारगुप्त के अधिकारी ‘पृथ्वीसेन’ द्वारा शिव मन्दिर को दान देने का उल्लेख मिलता है, तो स्कन्दगुप्त का सामन्त 'हस्तिन' शैव उपासक था. भूमरा एवं नचना कुठार के मन्दिर इस धर्म की लोकप्रियता के प्रतीक हैं.
सूर्य पूजा – वत्सभट्टि द्वारा रचित मन्दसौर अभिलेख में सूर्य मन्दिर के निर्माण एवं जीर्णोद्धार तथा स्कन्दगुप्त के इन्दौर ताम्रपत्र का प्रारम्भ सूर्य पूजा के साथ होना, तत्कालीन समय में सूर्य पूजा की परम्परा के प्रमाण हैं.
पौराणिक धर्म एवं परम्परा जो आधुनिक लोकप्रिय हिन्दू धर्म के आधार हैं इसी समय आविर्भूत हुआ जिसमें मुख्यतः अवतारवाद, ईश्वर भक्ति, दान, दक्षिणा, व्रत, उपवास, तीर्थों का माहात्म्य आदि को विशेष महत्व दिया गया.
इन समग्र साक्ष्यों के परिप्रेक्ष्य में यह स्वीकार करना समीचीन है कि गुप्तकाल हिन्दू धर्म एवं उसके विभिन्न पक्षों के उन्नयन का प्रतीक है.
बौद्ध धर्म–फाह्यान के विवरण से ज्ञात होता है कि इस समय बौद्ध धर्म का स्वाभाविक विकास हो रहा था. कश्मीर, अफगानिस्तान एवं पंजाब इसके महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे. वैशाली, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, बोधगया आदि अब उतने महत्वपूर्ण नहीं थे, लेकिन वहाँ इस धर्म का प्रचलन दिखाई देता है. गुप्त शासकों द्वारा वैष्णव धर्म को महत्त्व देने के बावजूद उनका दृष्टिकोण बौद्ध धर्म के प्रति उदार था. साँची के एक लेख के अनुसार चन्द्रगुप्त II का अधिकारी आम्रकदेव बौद्ध था जिसने 'काकनादार' के बौद्ध विहार को 25 दिनार दान में दिए थे जिसके सूद से वहाँ दीपक की व्यवस्था की गई तो इत्सिंग ने (चिलि-कि- तो) श्रीगुप्त द्वारा बौद्ध विहार के निर्माण का उल्लेख किया है.
जैन धर्म – गुप्तकाल में जैन धर्म विशेष प्रचलित नहीं था, लेकिन विशेष क्षेत्रों में इसके प्रचलन के साक्ष्य ज्ञात होते हैं. फाह्यान के अनुसार, प्रमुख नगरों में जैन देवालय विद्यमान थे. बल्लभी में इस समय वृहत जैन संगीति का आयोजन किया गया.
'कहौम अभिलेख' से ज्ञात होता है कि के क स्कन्दगुप्त समय भद्र नामक व्यक्ति ने 5 जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ स्थापित कराई थीं. दुर्जनपुर गाँव से प्राप्त रामगुप्त के लेख युक्त तीन जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की प्राप्ति भी जैन परम्परा एवं धर्म के प्रचलन की प्रतीक है. इस समय सर्वनन्दी सिद्धसेन एवं उमास्वति जैन आचार्यों ने जैन धर्म का प्रतिपादन किया.
> गुप्तकाल में दर्शन
दार्शनिक चिन्तन एवं अवधारणाओं के विकास की दृष्टि से गुप्तयुंग उल्लेखनीय है. इस समय कई दार्शनिक हुए जिन्होंने विभिन्न ग्रन्थों का सृजन कर कई महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रतिपादित किए.
शबर स्वामी का मीमांशा पर लिखा गया शबर भाष्य, ईश्वर कृष्ण की सांख्य कारिका, प्रशस्तपार का वैशेषिक दर्शन पर धर्म पदार्थ संग्रह इस युग के दार्शनिक चिन्तन के विकास के प्रमाण हैं. असंग, बसुबन्धु और दिंगनाग ने महायान के विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, तो जैन दर्शन से सम्बन्धित विभिन्न अवधारणाओं को सिद्धसेन, सर्वनन्दी एवं उमास्वाति जैसे आचार्यों ने प्रतिपादित किया. इसी समय दार्शनिक वाद-विवाद तथा प्रतिद्वन्द्वी मतों के तर्कपूर्ण खण्डन की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हुई.
> विधि का संहिताकरण
प्राचीनकाल से ही शासक को यहाँ प्रजा के निमित्त विधि स्थापित करने का अधिकार ही नहीं था वह न केवल धर्म (ऋषि, मुनियों द्वारा निर्धारित व्यवहार नियम), व्यवहार (प्रजा के रीति-रिवाज एवं परम्पराएँ), चरित ( पूर्व काल के दृष्टान्त) के आधार पर शासन करने का अधिकारी था. नारद स्मृति का कथन है कि इन तीनों के अभाव में ही शासक अपना शासन (विधि) स्थापित कर सकता था. विधि सम्बन्धी मान्यताओं में लोक प्रचलित अवधारणाओं, विश्वासों और परिवर्तित अवस्थाओं के अनुसार परिवर्तन या संशोधन होता रहा है.
मुख्यतः मनुस्मृति में पहली बार विधियों का विशद् विवरण प्रस्तुत कर संकलित किया गया. 
गुप्तयुग तक विधि साहित्य ने एक नया रूप धारण कर लिया और इस समय जहाँ एक ओर विधि से सम्बन्धित अवधारणा, सिद्धान्त एवं मान्यताओं में परिवर्तन हुआ. वहीं नवीन परिप्रेक्ष्य में उन्हें पुनः संकलित किया गया. संशोधित रूप में नई व्यवस्थाओं के साथ विधियों के पुनः संकलन का प्रयास विधि का संहिताकरण कहलाता है. इस दृष्टि से याज्ञवल्क्य, नारद, बृहस्पति, कात्यायन एवं पराशर स्मृतियाँ विशेष उल्लेखनीय हैं.
धर्मशास्त्रों के अनुसार विधि के 18 विषय थे किन्तु इनमें दीवानी और फौजदारी जैसा स्पष्ट विभेद नहीं था. यह स्पष्टतः गुप्तकाल में प्रथम बार दृष्टिगत होता है. बृहस्पति ने 18 विषयों की चर्चा करते हुए 14 को धर्म मूल (Civil) तथा 4 को हिंसा मूल बताया है. नारद ने विधि को इन विषयों के अतिरिक्त 132 उपविभेद भी बताए हैं. बढ़ते हुए भू-स्वामित्व के कारण धन सम्बन्धी विवाद अधिक दिखाई देते हैं और यही कारण है कि इस समय विधियों में इसके समाधान का प्रयास दृष्टिगत होता है. बृहस्पति ने चार प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख किया है ( प्रतिष्ठित, अप्रतिष्ठित, मुद्रित, शासित) — स्मृतियों में श्रेणी, पूग* एवं कुल के अपने न्यायालय होने का उल्लेख किया है. कात्यायन ने कृषकों, कारीगरों आदि को सलाह दी है कि वे अपना फैसला महत्तर के माध्यम से करवाए.
गुप्त अभिलेखों में इनका उल्लेख ग्राम व विधि शासन के प्रसंग में हुआ है.
यदि उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर न्यायालय किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते थे तो 'दिव्य' का सहारा लिया जाता था जिनमें जल, अग्नि, विष प्रमुख थे. फाह्यान शारीरिक दण्ड की बात अस्वीकार करता है. जबकि इस समय के ग्रन्थों में इसका उल्लेख हुआ है. मृच्छकटिकम में मृत्युदण्ड सम्बन्धी साक्ष्य का स्पष्ट उल्लेख है.
> गुप्तकालीन साहित्य
साहित्य सृजन एवं संस्कृत भाषा के विकास की दृष्टि से गुप्तकाल भारतीय इतिहास में अद्वितीय है. इस समय के विभिन्न अभिलेख एवं साहित्यिक कृतियाँ इसकी पुष्टि के स्पष्ट परिचायक हैं. यहाँ तक कि बौद्ध एवं जैन ग्रन्थ भी पालि एवं प्राकृत के स्थान पर संस्कृत में सृजित हुए. गुप्त शासकों द्वारा अपने लेखों एवं मुद्राओं पर काव्यमयी एवं परिमार्जित संस्कृत का प्रयोग किया गया. समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति, वत्सभट्टी द्वारा विरचित मन्दसौर लेख तथा कालिदास की रचनाएँ संस्कृत भाषा के उन्नयन के उल्लेखनीय प्रतिमान हैं.
इस समय विभिन्न कवि एवं विद्वान्, नाटककार एवं दार्शनिक हुए जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में विभिन्न साहित्यिक कृतियों का सृजन किया. प्रयाग प्रशस्ति का रचनाकार हरिषेण स्वयं एक महत्वपूर्ण विद्वान् था जिसके द्वारा विरचित यह प्रशस्ति चम्पू शैली का विशिष्ट उदाहरण है. मन्दसौर लेख भाषा की सरसता एवं अलंकारों की छटा की दृष्टि से उल्लेखनीय है. तत्कालीन साहित्यिक क्षितिज के उल्लेखनीय नक्षत्र हैं— कालिदास, जिनकी रचनाएँ संस्कृत साहित्य की अमूल्य निधि हैं. उनके काव्य ग्रन्थ रघुवंश, कुमारसम्भवम्, मेघदूत तथा ऋतु संहार तथा नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोवर्शीयम् इसी युग व प्रतिनिधित्व करते हैं.
इन ग्रन्थों में अलंकार योजना, भावों की अभिव्यक्ति भाषा की प्रांजलता, शैली की सरसता और शब्द चयन में मधुरता सुस्पष्ट है.
विशाखदत्त द्वारा विरचित मुद्राराक्षस एवं देवी चन्द्रगुप्तम् भी इस युग के उल्लेखनीय साहित्यिक ग्रंथ हैं, जिनमें क्रमश. नन्द, चन्द्रगुप्त मौर्य तथा रामगुप्त, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य सम्बन्धी कथानकों का साहित्यिक प्रस्तुतीकरण है. अतः इनका ऐतिहासिक महत्व भी है. शूद्रक द्वारा विरचित 'मृच्छकटिकम्’ राजकीय जीवन एवं प्रसंगों के स्थान पर जनसामान्य का प्रतिनिधित्व करता है. नायक चारुदत्त नामक दरिद्र ब्राह्मण एवं नायिका बसन्तसेना गणिका के साथ-साथ विभिन्न सामान्य पात्रों से उसके कथानक का ताना-बाना विनिर्मित है. नाटक में भाव एवं कर्म का सन्तुलन एवं करुणा व हास्य का सामंजस्य है.
अमरसिंह कृत अमरकोष संस्कृत का महत्वपूर्ण कोश है तो वात्स्यायन का कामसूत्र, काम-जीवन एवं शृंगार के विभिन्न पक्षों का वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत करता है. भट्टि का 'रावण वध', विष्णु शर्मा का 'पंचतंत्र' आदि भी गुप्तयुगीन साहित्यिक गौरव के प्रतीक हैं.
विधि के संशोधन एवं संकलन की दृष्टि से विरचित विभिन्न स्मृति ग्रन्थ नारद, बृहस्पति, कात्यायन, पराशर आदि की रचना भी इसी समय हुई. यदि रामायण और महाभारत को अन्तिम रूप इसी समय दिया गया तो मुख्य पुराणों का रचना काल भी यही समय है.
दार्शनिक ग्रन्थों में ईश्वरसिंह की 'सांख्य कारिका', प्रशस्तपाद का 'पदार्थ धर्म संग्रह', बसुबन्धु का 'अभिधम्म कोश', सिद्धसेन का 'न्यायावतार' आदि उल्लेखनीय कृतियाँ हैं तो वैज्ञानिक ग्रन्थों में आर्यभट्ट का 'आर्यभट्टीय', 'दशगीतिका सूत्र' व वराहमिहिर की 'पंच सिद्धान्तिका' महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं. इस प्रकार साहित्यिक विकास की दृष्टि से गुप्त युग स्वर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है.
> गुप्तकाल में व्यापार का स्वरूप
गुप्तकाल में व्यापार में काफी प्रगति हुई. श्रेष्ठी और सार्थों ने व्यापार की प्रगति में अहं भूमिका निभाई. आन्तरिक व्यापार की वस्तुओं में दैनिक उपयोग की वस्तुएँ सम्मिलित थीं जिन्हें ग्रामों एवं नगरों के बाजारों में बेचा जाता था. विलासिता की वस्तुएँ दूरस्थ स्थानों से लाई जाती थीं. व्यापार के लिए अनेक नियम निर्धारित किए गए थे. गुप्तकाल में कीमतें सदैव स्थिर नहीं रहती थीं उनमें स्थान-स्थान पर अन्तर होता था. तौल की माप भी विभिन्न स्थानों पर भिन्न थी. आन्तरिक और बाह्य दोनों ही प्रकार के व्यापार सड़क और जलमार्गों द्वारा होते थे. व्यापारियों के लिए समुद्री मार्ग सुरक्षित नहीं था. चीन से भारत तक का मध्य एशियाई भाग खतरों से भरा था. विदेशी व्यापार समुद्र द्वारा मुख्यतः श्रीलंका, फारस, अरब, इथोपिया, रोम, चीन आदि देशों को होता था. गुप्तकाल में चीन के साथ भारत के वाणिज्यिक सम्बन्धों में वृद्धि हुई. भारत में आयातित चीन के रेशम चीनांशुक कहा जाता था. गुप्तकाल में भारत-रोम व्यापार का पतन हुआ. इस कारण पश्चिम के साथ भारत के व्यापार में कमी आई, लेकिन बेजेंटाइन साम्राज्य के साथ व्यापारिक सम्बन्ध सुधरे. बेजेंटाइन साम्राज्य को भारत से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुएँ रेशम और मसाले थे. बेजेंटाइन साम्राज्य में रेशम व्यापार इतना विस्तृत हो चुका था कि को जस्टीनियन को रेशम की कीमत विनियमित करने के लिए यह कानून बनाना पड़ा कि एक पाउण्ड रेशम की कीमत सोने की आठ मुद्राओं से अधिक नहीं होनी चाहिए.
भारत के साथ दक्षिण-पूर्वी एशिया के व्यापारिक सम्बन्ध बढ़े, जिसका वहाँ के जनजीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा. व्यापार के माध्यम से वहाँ भारतीय संस्कृति भी विकसित हुई.
> गुप्तकालीन कला
कला की दृष्टि से गुप्तकाल उन्नयन का प्रतीक है. इसके काल का वैभव एवं गौरव तत्कालीन कलाकृतियों एवं स्मारकों में स्पष्ट परिलक्षित है. गुप्तयुगीन, शिल्पियों की पैनी दृष्टि, सुविकसित सौन्दर्य भावना, परिमार्जित एवं प्रौढ़ परिकल्पना, विलक्षण रचना कौशल तथा हस्तकला ने महत्वपूर्ण कलाकृतियों का सृजन किया जिसके कई पक्ष इस समय दृष्टिगत होते हैं.
(1) वास्तुकला – कलात्मक विकास की जो अभिव्यक्ति मूर्ति एवं चित्रकला में दिखाई देती है वह वास्तुकला के क्षेत्र में ज्ञात नहीं है. दुर्भाग्यवश इस क्षेत्र में गुप्तकालीन उपलब्धियों के अवशेष अत्यल्प हैं फिर भी यह अपने आपमें इसलिए महत्वपूर्ण है कि पहली बार मन्दिर निर्माण की परम्परा का आरम्भ इसी समय हुआ. इस समय के मन्दिरों की योजना एक ऊँचे वर्गाकार चबूतरे (पीठिका) पर आधारित है, जिसमें देवगढ़ के दशावतार मन्दिर को छोड़कर सभी की छतें सपाट हैं. गर्भगृह में प्रतिमा स्थित है जिसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है, लेकिन सभा कक्ष का अभाव है. इस युग के मन्दिरों में देवगढ़ का दशावतार मन्दिर, तिगवा पार्वती मन्दिर तथा भीतरगाँव का ईंटों से निर्मित मन्दिर का विष्णु मन्दिर भूमरा का शिव मन्दिर, नचना कुठार का उल्लेखनीय हैं.
इस (2) मूर्तिकला – मूर्तिकला के विकास की दृष्टि से गुप्तकाल स्वर्ण युग का प्रतीक है. मथुरा, सारनाथ एवं पाटलिपुत्र मूर्तिकला के महत्वपूर्ण केन्द्र थे. कुषाण युगीन भौतिकता के नैतिकता स्पष्ट अभिव्यंजित है. कुषाणकालीन सादे प्रभास्थान पर इस समय की मूर्तियों में आध्यात्मिकता एवं मण्डल के स्थान पर अलंकृत प्रभामण्डल का प्रयोग भी उत्कीर्ण हैं, जिनका कुषाण युग में अभाव था. इस काल की समय की मूर्तियों में ज्ञातव्य है. साथ ही कुंचित केश भी मूर्तियों ने सारनाथ की पद्मासन में बैठी हुई बुद्ध मूर्ति, मथुरा से प्राप्त बुद्ध, विष्णु एवं महावीर की मूर्तियाँ तथा सुल्तानगंज से प्राप्त ताम्र निर्मित बुद्ध की मूर्ति विशेष उल्लेखनीय हैं. मूर्ति कला के अन्य प्रतीकों में उदयगिरि की पहाड़ी पर उत्कीर्ण विष्णु के बराह अवतार की मूर्ति, कौशाम्बी से प्राप्त सूर्य प्रतिमा, वाराणसी से प्राप्त गोवर्धनधारी कृष्ण की मूर्ति आदि भी महत्वपूर्ण हैं.
(3) चित्रकला – कलात्मक विकास का अन्य उल्लेखनीय पक्ष है— चित्रकला, जिसे विशेष सम्मान प्राप्त था. तत्कालीन ग्रन्थों में इसकी लोकप्रियता एवं महत्व के संकेत प्राप्त होते हैं. गुप्तकालीन चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजन्ता की गुफाओं में भित्ति चित्रों के रूप में ज्ञात हैं. जिसमें मुख्यतः बुद्ध व बौधिसत्वों के चित्र, जातक कथाओं के वर्णनात्मक दृश्य तथा प्राकृतिक दृश्यों के साथ-साथ अप्सरा, गन्धर्व, यक्ष आदि के चित्र भी अभिचित्रित हैं.
अन्य चित्रकला का केन्द्र वाघ की गुफाएँ थीं जिसमें तत्कालीन वेशभूषा, केशविन्यास, शृंगार, अलंकार आदि लौकिक जीवन के विभिन्न पक्षों का चित्रण हुआ है.
संगीत के प्रति अभिरुचि भी इस समय सुस्पष्ट है. सिक्कों पर समुद्रगुप्त को वीणावादक के रूप में उत्कीर्ण किया गया है तो प्रयाग प्रशस्ति में हरिषेण ने उसे नारद एवं तुम्बरु से भी महान् संगीतकार बताया है.
इस प्रकार गुप्तकाल में कलात्मक विकास की प्रक्रिया कई पक्षों में स्पष्ट परिलक्षित है, जिनकी गुप्तकाल को स्वर्ण युग में प्रतिष्ठित करने में अहम् भूमिका है.
> गुप्तकाल में वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास 
चतुर्थ सदी ईस्वी से सातवीं सदी ईस्वी तक भारत में विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का विकास हुआ, जिनका उल्लेख तत्कालीन वैज्ञानिक ग्रन्थों में स्पष्टतः अभिव्यक्त है. मुख्यतः इस काल के प्रमुख गणितज्ञ ज्योतिष विद्या में भी निपुण थे और यही कारण है कि दोनों शाखाओं का समुचित विकास ज्ञात होता है. इस दृष्टि से आर्यभट्ट, भास्कर-I, वराहमिहिर एवं ब्रह्मगुप्त उल्लेखनीय हैं.
(1) आर्यभट्ट - आर्यभट्ट प्रसिद्ध गुप्तयुगीन गणितज्ञ था जिसके द्वारा. प्रतिपादित अवधारणाओं का बाद की शताब्दियों में अन्य गणितज्ञों ने लाभ उठाया. इनके उल्लेखनीय ग्रन्थों में आर्यभट्टीय (दस गीतिका सूत्र इसी का भाग है) तथा 'सूर्य सिद्धान्त'. यह आर्यभट्ट के प्रयत्नों का ही परिणाम था कि ज्योतिष को गणित से अलग शाखा के रूप में स्वीकार किया गया. उन्होंने दशमलव से सम्बन्धित सिद्धान्त को विकसित किया और ८ का मान (वृत्त का व्यास परिधि का अनुपात) निश्चित किया जो 2 या 3.142 स्वीकार्य है. इन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि “पृथ्वी गोल है तथा अपनी धुरी पर घूमने के कारण ग्रहण होता है."
(2) भास्कर-I—इन्होंने आर्यभट्ट के सिद्धान्तों पर टीकाएँ और स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना कर आर्यभट्ट द्वारा विहित अवधारणाओं को और अधिक पुष्ट किया. इनके उल्लेखनीय ग्रन्थ ‘महाभास्करीय, लघुभास्करीय एवं भास्य' हैं.
(3) वराहमिहिर—समय विवादास्पद होते हुए भी सामान्यतः इन्हें गुप्तयुगीन स्वीकार किया गया है. इन्होंने पंचसिद्धान्तिका, वृहत्जातक, लघुजातक, वृहत्संहिता जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की.
पंच सिद्धान्तिका के अनुसार ज्योतिष के 5 मुख्य सिद्धान्त विहित किए गए हैं— 'पैतामह', वाशिष्ट, सूर्य, पोलिस तथा रोमक.
वृहत् संहिता में ज्योतिष, वास्तु तथा तक्षण कला से सम्बन्धित विषयों का निरूपण हुआ है वराहमिहिर की ज्योतिष सम्बन्धी अवधारणाओं पर विदेशी प्रभाव होते हुए भी इनके द्वारा अभिव्यक्त सिद्धान्त गुप्तकालीन वैज्ञानिक परम्परा एवं विकास को पुष्ट करते हैं.
(4) ब्रह्मगुप्त - प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिष के ज्ञाता हुए हैं जिनकी उल्लेखनीय कृति है 'ब्रह्म सिद्धान्त' इनका महत्व ज्योतिषज्ञ के रूप में उतना नहीं है जितना ज्योतिष के इतिहासकार के रूप में..इन्होंने आर्यभट्ट, श्रीसेन, विष्णुचन्द्र, लात एवं प्रद्युम्न के सिद्धान्तों एवं प्रणालियों का उल्लेख करते हुए इनके प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाया है. मुख्यतः इस बात के लिए कि भारतीय ज्योतिष में विदेशी सिद्धान्तों को स्वीकार कर लिया गया.
(5) औषधि विज्ञान—औषधि विज्ञान का सैद्धान्तिक पक्ष बाग्भट्ट ने भी गुप्तकाल में सुविकसित दृष्टिगत होता है. (आष्टांग हृदय) आयुर्वेद से सम्बन्धित ग्रन्थ की रचना की. ऐसा जाना जाता है कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में आयुर्वेद का सुप्रसिद्ध चिकित्सक धनवन्तरि भी था जिसने विभिन्न रोगों के निदान से सम्बन्धित जानकारी प्रस्तुत की. 'नवनीतकम' नामक चिकित्साशास्त्र की रचना भी इसी समय की गई. पलकात्य नामक पशु चिकित्सक ने 'हस्त्यायुर्वेद' नामक नामक ग्रन्थ की रचना की जो हाथियों के रोगों और उनकी चिकित्सा से सम्बन्धित था, तो 'होली स्रोत’ द्वारा 'अश्वशाला' की रचना की गई.
भौतिक एवं रसायन विज्ञान का विकास भी इस समय सुविज्ञ है. वैशेषिक शाखा ने अणु सम्बन्धी सिद्धान्त का प्रतिपादन और प्रचार किया. बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन, रसायन एवं धातु विज्ञान का ज्ञाता था जिसने ये प्रमाणित किया कि सोना, चाँदी, ताँबा आदि खनिज पदार्थों के रासायनिक प्रयोग से रोगों का निवारण सम्भव है.
तकनीकि एवं विशेषीकृत ज्ञान मुख्यतः श्रेणियों के हाथों में था, जहाँ वंशानुगत व्यवसाय का प्रशिक्षण दिया जाता था. यद्यपि तकनीकि विकास के प्रतीकों के रूप में बहुत अधिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन फिर भी मेहरौली का लोह स्तम्भ, सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की ताम्र मूर्ति, स्वर्ण सिक्कों का बाहुल्य व उन पर उत्कीर्ण चित्रों, ताम्रपत्रों पर अंकित मोहरें इस युग धातु एवं तकनीकि ज्ञान के प्रमाण हैं.
> गुप्तकाल भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग के रूप में
गुप्तकाल भारतीय इतिहास में स्वर्ण युग के रूप में समाग्रत है. पारम्परिक भाषा में स्वर्ण युग से तात्पर्य ऐसे युग से है, जिसमें साहित्य, कला, धर्म, दर्शन का समुचित उ हो, राजनीतिक विशृंखलता के स्थान पर राष्ट्रीय एकीकरण की स्थापना तथा आर्थिक दृष्टि से समग्र देश में समृद्धि व्याप्त हो जनसामान्य निर्विघ्न अपना जीवनयापन कर सकें. यदि इस सन्दर्भ में गुप्त युग का मूल्यांकन करने का प्रयास करते हैं तो इसमें स्वर्णिम युग के कई तत्व परिलक्षित होते हैं. के
गुप्त शासकों ने कुषाण साम्राज्य के पतन के उपरान्त हुई रिक्तता एवं विखण्डन को समाप्त कर न केवल इसे एक विस्तृत रूप प्रदान किया, बल्कि शकों एवं हूणों जैसी विदेशी शक्तियों को पराजित कर राष्ट्रीयता की पुनः स्थापना की.
आर्थिक समृद्धि के भी पर्याप्त चिह्न गुप्तकाल में दिखाई देते हैं. देश के विभिन्न भागों से प्राप्त गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्के, सुविकसित नगरों का अस्तित्व, गुप्त अभिलेखों में की गई श्रेणियों की चर्चा विभिन्न कलाकृतियों का निर्माण साहित्यकारों को प्रश्रय एवं विपुल साहित्य का सृजन देश की आर्थिक सम्पन्नता के द्योतक हैं. संस्कृत भाषा एवं साहित्य के विकास की दृष्टि से गुप्त युग स्वर्ण युग का प्रतीक है. इस समय कालिदास, विशाखदत्त, शूद्रक, अमर सिंह, विष्णु शर्मा, आदि अनेक विद्वान् एवं साहित्यकार हुए, जिन्होंने विभिन्न साहित्यिक कृतियों का सृजन कर इसके विकास में उल्लेखनीय योगदान प्रदान किया. कालिदास की रचनाएँ आज भी विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं. आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, नागार्जुन आदि ने गणित, ज्योतिष, धातु विज्ञान, जैसी विज्ञान सम्बन्धी विभिन्न शाखाओं के विकास में अपना योगदान किया.
कला के क्षेत्र में यदि प्रथम बार मन्दिर निर्माण की परम्परा दृष्टिगत होती है, तो मूर्तिकला एवं चित्रकला उत्कृष्ट रूप में विकसित हुई. जहाँ मूर्तिकला भारतीयकरण एवं भावों के प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से उल्लेखनीय है, तो चित्रकला रेखिक निरूपण एवं रंगों के सुन्दर समन्वय के लिए सुविज्ञ है.
धार्मिक क्षेत्र में ब्राह्मण धर्म एवं परम्परा तथा उससे सम्बन्धित वैष्णव, शैव व पौराणिक धर्मों का उत्थान दिखाई देता है, तो बौद्ध एवं जैन धर्मों का अस्तित्व ज्ञात है. मुख्य बात यह है कि विभिन्न धर्मों में सहिष्णुता एवं सद्भाव के साथ-साथ शासकों की उदार नीति भी इस समय के धार्मिक जीवन का उल्लेखनीय पक्ष थी. इस प्रकार गुप्तकालीन जीवन के विभिन्न पक्षों में सम्यक् अनुशीलन के सन्दर्भ में यह स्वर्ण युग प्रतीत होता है.
लेकिन कुछ ऐसे संकेत भी मिलते हैं जो इसकी स्वर्णिमता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं. सामंतवाद और दास प्रथा का आरम्भ, विष्टि की परम्परा, स्त्रियों की स्थिति में गिरावट, सती, बाल विवाह और पर्दा प्रथा का प्रचलन, जातिगत, विषमता, फाह्यान द्वारा चाण्डालों की दयनीय स्थिति का उल्लेख इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है, तो साहित्यिक कवियों और कलात्मक प्रतीक उच्च वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई देते हैं. फिर भी समग्र परिप्रेक्ष्य एवं अन्य साम्राज्यों के साथ तुलनात्मक विवेचन के संदर्भ में गुप्त युग को स्वर्ण युग के रूप में स्वीकारना समीचीन होगा.
> समुद्रगुप्त का दक्षिण अभियान
उत्तर भारत पर आधिपत्य स्थापित करने के बाद उसने समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत पर विजय की योजना बनाई. समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के 12 राजाओं को विजित किया और उन्हें बन्दी बनाया. बाद में उन्हें स्वतन्त्र कर उनकी सत्ता उन्हें वापस सौंप दी. दक्षिण भारत के जिन शासकों को समुद्रगुप्त ने अपने अधीनस्थ किया वे प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार निम्नलिखित थे-
(1) कौशल का महेन्द्र – इसका राज्य बिलासपुर, रायपुर और संबलपुर क्षेत्र में विस्तृत था.
(2) महाकान्तार का व्याघ्रराज–महाकान्तार राज्य वर्तमान गोंडवाना क्षेत्र में अवस्थित था.
(3) कुराल का मंटराज – कुराल राज्य सोनपुर क्षेत्र में
महानदी के समीपवर्ती क्षेत्र में अवस्थि था. 
(4) पिष्टपुरा का महेन्द्र - पिष्टपुरा आधुनिक पीतमपुरा था.
(5) कोटूटूर का स्वामीदत्त — कोट्र्र राज्य वर्तमान गंजम जिले में अवस्थित था.
(6) एरण्डपल्ल का दमन—यह भी गंजम जिले में था. 
(7) काँची का विष्णुगोप–आधुनिक काँजीवरम ही काँची था.
(8) अवमुक्त का नीलराज. 
(9) वेंगी का हस्तिवर्मन.
(10) पालक्क का उग्रसेन – पलक्क आधुनिक नेल्लार था. 
(11) देवर राष्ट्र का कुबेर.
(12) कुस्थलपुरा का धनञ्जय.
> विज्ञान और प्रौद्योगिकी
(1) ब्रह्मगुप्त – यह गुप्तकालीन रेखागणितज्ञ था, जिन्होंने 'ब्रह्मस्फूट सिद्धान्त' तथा 'खण्डखाद्यम' नामक ग्रन्थ की रचना की. इन्हें गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त का जनक माना जाता है. इन्होंने न्यूटन से शदियों पहले बता दिया था कि प्रकृति के नियमानुसार सारी वस्तुएँ पृथ्वी पर गिरती हैं.
(2) वराहमिहिर – इनके 6 ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं— पंचसिद्धान्तिका, विवाह पटल, योगमाया, वृहत्संहिता, वृहत्जातक और लघुजातक हैं. पंच सिद्धान्तिका में ज्योतिष के पाँच प्राचीन सिद्धान्तों को बताया गया है (पैतामह, रोमक, पौलिस, वाशिष्ट, सूर्य). वराहमिहिर ने यूनानी व भारतीय ज्योतिषशास्त्र का समन्वय करके 'रोमक' व 'पौलिस' नाम से नए सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया. वराहमिहिर के पुत्र प्रथुयशा ने फलित ज्योतिष पर 'षटपच्चशिका' ग्रन्थ की रचना की.
रोमक सिद्धान्त के जनक- लातदेव हैं.
(3) सुश्रुत – ये प्रसिद्ध चिकित्सक थे तथा इन्होंने 'सुश्रुत संहिता' नामक ग्रन्थ लिखा. इसने शल्य क्रिया में काम आने वाले बहुत से यन्त्रों का उल्लेख किया है, जो इस्पात से बने हुए थे. पट्टियों के बाँधने का विवरण भी इन्होंने दिया है. ये प्लास्टिक सर्जरी के आविष्कारक थे. मोतिया बिन्द व नेत्र के रोगों को शल्य क्रिया द्वारा ठीक करने ने का विवरण भी दिया है.
(4) नागार्जुन – प्रसिद्ध रसायनशास्त्री तथा धातु विज्ञान वेत्ता था. इन्होंने लौहशास्त्र, रूप रत्नाकर, कक्षपुट, आरोग्य मंजरी, योगसार, रसेन्द्र मंगल ग्रन्थों की रचना की. नागार्जुन ने रस चिकित्सा का आविष्कार किया तथा यह अवधारणा प्रदान की कि सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा आदि धातुओं में भी रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है. पारे की खोज उसका महत्त्वपूर्ण आविष्कार था.
> बाघ की चित्रकला
मध्य प्रदेश के बाघ की गुफाओं के भित्तिचित्र गुप्तकालीन कला के महत्त्वपूर्ण प्रतीक हैं. जहाँ अजन्ता के चित्र मुख्यतः धार्मिक विषयों से अभिप्रेरित हैं, वही बाघ के चित्रों में मानव के लौकिक जीवन का चित्रांकन दृष्टव्य है.
तत्कालीन वेशभूषा, केश विन्यास, शृंगार, अलंकार आदि की अभिव्यक्ति यहाँ के चित्रों में दृष्टव्य है, जिनका ऐतिहासिक महत्त्व भी है. उल्लेखनीय है कि बाघ के चित्रों का संयोजन एक ही समय हुआ है जिनमें प्रसिद्ध चित्र संगीत एवं नृत्य का एक दृश्य है.
> देवगढ़ का दशावतार मन्दिर
उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले में देवगढ़ का दशावतार मन्दिर गुप्तयुगीन वास्तुकला का महत्वपूर्ण प्रतीक है. इस मन्दिर में स्थापत्य का महत्वपूर्ण तथ्य है यह कि इसमें 12 मीटर ऊँचा शिखर है जिसे भारतीय मन्दिर निर्माण परम्परा में शिखर का प्रथम उदाहरण माना गया है. जहाँ अन्य मन्दिरों में केवल एक मण्डप होता था वहीं इसमें 4 मण्डप हैं जो गर्भगृह की चारों दिशाओं में स्थित हैं. मूर्ति प्रकोष्ठ की दीवारों के स्तम्भ विभिन्न मूर्तियों से अलंकृत हैं जो पौराणिक कथाओं का संकेत देती हैं. यहाँ प्राप्त मूर्तियों में विष्णु, राजेन्द्र मोक्ष, रामावतार, कृष्णावतार आदि उल्लेखनीय हैं.
> शूद्रक का मृच्छकटिकम्
शूद्रक द्वारा रचित मृच्छकटिकम् नाटक जिसका अर्थ है— मिट्टी की गाड़ी या खिलौना, गुप्तयुगीन अन्य कृतियों की तुलना में यह विशिष्ट इस रूप में है कि उसमें राजकीय जीवन एवं धार्मिक कथा प्रसंगों की अपेक्षा जनसामान्य को प्रतिध्वनित किया है. इसका नायक चारुदत्त एक दरिद्र ब्राह्मण सार्थवाह है तथा नायिका गणिका बसन्तसेना विभिन्न पात्रों द्वारा अभिव्यक्त प्रादेशिक विभिन्नताएँ स्पष्ट परिलक्षित हैं, जो यथार्थ जीवन पर आधारित प्रतीत होती हैं. नाटक में भाव और कर्म का सन्तुलन तथा करुणा और हास्य का सुन्दर सामंजस्य है.
> गुप्तकालीन प्रमुख मूर्तियाँ
> सारनाथ की बुद्ध मूर्ति
इसमें महात्मा बुद्ध पद्मासन में बैठे हैं और दोनों हाथ धर्म चक्र प्रवर्तन की मुद्रा में हैं. उनके शीर्ष के चारों ओर अलंकृत प्रभामण्डल है तथा शीश पर कुंचित केश दृष्टव्य हैं. महात्मा बुद्ध के मुख पर आध्यात्मिक शान्ति विराजमान है.
> मथुरा की बुद्ध मूर्ति 
इसमें बुद्ध खड़े हुए दिखाए गए हैं और हाथ अभय मुद्रा में हैं मूर्ति के वस्त्र पारदर्शक हैं तथा इनमें आवर्तन हैं. मुखमुद्रा पर आध्यात्मिकता, करुणा एवं शान्ति के भाव हैं तथा शीश के चारों ओर अलंकृत प्रभामण्डल है.
> सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति
यह ताम्र निर्मित है. बुद्ध खड़े हुए दिखाए हैं. ऊँचाई 7½ फीट तथा वज़न एक टन है. शीश पर कुंचित केशवस्तु व प्रभामण्डल का अभाव है.
> मथुरा की विष्णु मूर्ति
इसमें भगवान् विष्णु रत्न जटित मुकुट धारण किए हुए हैं तथा कानों में आभूषण, शारीरिक अंगों में अनुपात, मुख पर करुणा और आध्यात्मिक शान्ति है.
> देवगढ़ के दशावतार मन्दिर की मूर्तियाँ
इस मन्दिर में अनेक सुन्दर मूर्तियाँ विद्यमान हैं जिनमें शेष शय्या पर विराजमान 'विष्णु की मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है. इनकी नाभि से कमल निकला है जिस पर ब्रह्मा विराजमान हैं और आकाश में शिव-पार्वती विष्णु के दर्शन कर रहे हैं.
> वराह की मूर्ति
गुप्तकालीन मूर्तियों में उदयगिरि पहाड़ी पर उत्कीर्ण विष्णु की वराह अवतार मूर्ति के रूप में बड़ा ही सजीव बन पड़ा है, जिसमें पृथ्वी को पाताल से उठाते हुए दिखाया गया है.
> गुप्तकालीन प्रमुख मन्दिर 
1. देवगढ़ का दशावतार मन्दिर. 
2. भूमरा का शिव मन्दिर. 
3. नचना कुठार का पार्वती मन्दिर. 
4. भीतरगाँव का विष्णु मन्दिर (ईंटों से निर्मित). 
5. तिगवा का विष्णु मन्दिर.
> जैन मूर्तियों
जैन मूर्तियों में मथुरा से प्राप्त महावीर की मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है जिसमें वे पद्मासन में ध्यानमग्न मुद्रा में बैठे हैं.
> वाकाटक गुप्त सम्बन्ध
वाकाटक वंश एवं गुप्तवंश दोनों का उदय दक्षिण भारत व उत्तर भारत में लगभग एक ही समय हुआ. दोनों राजवंश अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वप्रमुख थे. ये दोनों ही राज्य अति मह्मत्वाकांक्षी एवं विस्तारवादी थे. अतः यह स्वाभाविक ही था क्रि दोनों राज्य एक-दूसरे की पूर्णतया उपेक्षा नहीं कर सकते थे. अलग-अलग नरेशों के समय दोनों वंशों में अलगअलग सम्बन्ध रहे, जिनका विवेचन निम्नलिखित है—
(1) प्रवरसेन प्रथम एवं चन्द्रगुप्त प्रथम [275 ई.-335 ई., 319-350 ईः]–प्रवरसेन एवं चन्द्रगुप्त दोनों ही अपने वंश के शक्तिशाली नरेश थे प्रवरसेन ने प्रसिद्ध नागवंशी नरेश भवनाग की पुत्री से अपने पुत्र का विवाह कर अपने को सम्राट घोषित कर दिया तथा चन्द्रगुप्त ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह कर उसके राज्य को अपने राज्य में मिलाने के बाद महाराजाधिराज घोषित कर दिया. इन दोनों शासकों के मध्य उस समय कैसे सम्बन्ध रहे पूर्णतया विवाद का विषय है. अतः स्पष्ट रूप से इस विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता.
(2) रुद्रसेन प्रथम [335-360 ई.] व समुद्रगुप्त [350375 ई.]–रुद्रसेन व समुद्रगुप्त के समय में वाकाटकों एवं गुप्तों के मध्य शत्रुता स्थापित हो गई थी, क्योंकि समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त के 9 राजाओं को पराजित किया था जिसमें से अधिकांश नागवंशी शासक थे और नाग वाकाटकों के मित्र थे. डॉ. के. पी. जायसवाल समुद्रगुप्त को उसकी व्याघ्र हनन मुद्रा जिसमें उसकी उपाधि 'राजा' है, के आधार पर उसे वाकाटकों के अधीन सामन्त मानते हैं, परन्तु विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर इस मत को अमान्य घोषित कर दिया गया है.
(3) पृथ्वीसेन प्रथम, समुद्रगुप्त एवं चन्द्रगुप्त द्वितीयपृथ्वीसेन (360–385 ई.) समुद्रगुप्त एवं चन्द्रगुप्त-II दोनों के समकालीन था. समुद्रगुप्त ने अपने दक्षिण अभियान में कौशल, महाकान्ता, कुराल आदि राज्यों को जीत लिया. ये पहले वाकाटकों के अधीन थे, परन्तु अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि ये राज्य प्रवरसेन प्रथम की मृत्यु के बाद स्वतन्त्र हो गए थे. अतः उसके इस अभियान का दोनों वंशों के ऊपर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा.
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिम के शकों का नाश करने के उद्देश्य से वाकाटकों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए उनसे मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास किए. इस प्रभावती गुप्ता का विवाह कर दिया. विवाह के कुछ समय हेतु उसने पृथ्वीसेन के पुत्र रुद्रसेन के साथ अपनी पुत्री बाद रुद्रसेन की मृत्यु हो जाने तथा उसके पुत्रों की अवयस्कता के कारण प्रभावतीं गुप्ता ने वाकाटक वंश की बागडोर सँभाली. उसका यह काल 390-410 ई. तक चला और इसी काल में चन्द्रगुप्त II ने गुजरात व काठियावाड़ के शकों का उन्मूलन कर दिया. इस कार्य में वाकाटकों द्वारा गुप्तों को प्रत्यक्ष सहयोग दिया गया.
(4) प्रवरसेन द्वितीय - प्रवरसेन द्वितीय ने 410-440 ई. तक शासन किया तथा इस काल में उसके 13 दानपात्र प्राप्त होते हैं, जिसमें उसने अपने नाना चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया है. इन दानपात्रों के अनुसार उसका महाराष्ट्र पर नियन्त्रण था, जोकि पहले गुप्तों के अधीन था. अतः उनके मध्य मनमुटाव पैदा हो गया. 430 ई. के लगभग प्रवरसेन ने अपने पुत्र नरेन्द्रसेन का विवाह काकुत्स वर्मा ( कदम्ब वंश) की पुत्री अजितभट्टारिका से कर दिया. इसी की एक पुत्री का विवाह गुप्त वंश में भी हुआ था. अतः दोनों के मध्य का वैमनस्य समाप्त हो गया.
(5) नरेन्द्र सेन (440460 ई.) – यह गुप्त शासक कुमारगुप्त एवं स्कन्दगुप्त के समकालीन था. इसकी महात्वाकांक्षा के कारण दोनों वंशों के सम्बन्ध बिगड़ गए तथा नरेन्द्रसेन ने नलवंशी शासक को हराकर उसके राज्य को अपने राज्य में मिला लिया. गुप्तों पर इस समय पुष्यमित्रों के आक्रमण हो रहे थे. अतः ऐसी स्थिति में नरेन्द्रसेन ने मालवा, मेकल तथा कौशल के प्रदेश गुप्तों से छीन लिए, लेकिन स्कन्दगुप्त ने उन्हें पुनः गुप्त साम्राज्य में मिला लिया. उससे दोनों के मध्य सम्बन्धों में और अधिक कटुता आ गई.
(6) पृथ्वीसेन ( 460–480 ई.) – यह नरेन्द्रसेन का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था. इसने गुप्तों की कमजोरी का लाभ उठाकर मालवा एवं दक्षिणी कौशल छीन लिया और इसके बाद वाकाटकों का पतन हो गया तथा धीरे-धीरे गुप्त वंश अपनी आन्तरिक कमजोरियों के चलते पतन के मार्ग पर अग्रसर हो गया.
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Sun, 08 Oct 2023 07:16:03 +0530 Jaankari Rakho
स्वातंत्र्योत्तर भारत : ऐतिहासिक उपब्लियां https://m.jaankarirakho.com/405 https://m.jaankarirakho.com/405 स्वातंत्र्योत्तर भारत : ऐतिहासिक उपब्लियां
1. परिचय
2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के द्वारा संचालित आंदोलन ने देश में तत्कालीन न्च सरकार के खिलाफ एक लहर पैदा कर दी थी। इस आंदोलन के बाद कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए जिससे भारतीय जनता पार्टी तथा विरोधी दलों को लाभ मिला। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 'आम आदमी पार्टी' जैसे राजनीतिक दलों का पदार्पण अचानक हुआ तथा दिल्ली जैसे राज्य में इस दल को सत्ता प्राप्ति भी अचानक ही हुई।
परन्तु इन सभी घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा हाथ अन्ना आंदोलन का ही रहा। मनमोहन सिंह सरकार में हुए की कोयला घोटाला, 2G घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल घपले इत्यादि जैसे तथाकठित भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी सर विश्वसनीयता कम कर दी थी।
इसी बीच 2013 में भारतीय जनता पार्टी जो तत्काल मुख्य विपक्षी दल थी, उन्हें नये नेतृत्व के बारे में सोचने का अवसर मिल गया। आडवाणी 2009 में भाजपा तथा छ। के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी थे तथा उनके नेतृत्व में भाजपा को हार मिली थी। 2013 में भाजपा के थिंक टैंक को यह लगने लगा कि नेतृत्व परिवर्तन अत्यंत ही आवश्यक है।
भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने 2013 के मई में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी' को 2014 के मई में होने वाले चुनाव के लिए प्रचार कमिटी का अध्यक्ष बना दिया। इस बात को लेकर छ। के कुछ घटक दल जिसमें बिहार के मुख्यमंत्री श्रीमान नितीश कुमार की पार्टी जनता दल (यू.) ने छक। छोड़ने की घोषणा कर दी।
सितम्बर 2013 में भारतीय जनता पार्टी के संसदीय दल ने नरेन्द्र मोदी जी को 2014 में होने वाले आम चुनाव के लिए भाजपा तथा छ। का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। संसदीय दल में आडवाणी की सहमति थी या नहीं, इस पर संशय रखा। जब नरेंद्र मोदी जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया तब भाजपा तथा सहयोगी दलों की प्रचार रणनीति में एक नये उत्साह का संचार हुआ।
नरेंद्र मोदी लगातार 13 वर्षों से गुजरात के मुख्यमंत्री थे तथा 'गुजरात मॉडल' वाले विकास के लिए देश में काफी लोकप्रिय भी थे। भाजपा को यह लगा कि एक युवा नेतृत्व तथा गुजरात के विकास की लोकप्रियता उसे सत्ता के नज. दीक ले जा सकती है।
वैसे भाजपा को नरेन्द्र मोदी जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद कुछ हानि भी उठानी पड़ी तथा कुछ मात्रा में अंदेशा भी रहा, जैसे-
1. सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी जद (यू.) का अलग हो जाना। 
2. विरोधी दलों के द्वारा अल्पसंख्यकों को भाजपा के विरोध के लिए ध्रुवीकरण की कोशिश। 
3. आडवाणी जैसे वरिष्ठतम नेताओं की मनःस्थिति पर कोई विचार नहीं प्रकट करना, जैसे मुद्दे भी आ सकते थे।
परंतु 2013 के सितम्बर से ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र दामोदर मोदी ने अपना प्रचार आरंभ कर दिया था। सितम्बर 2013 में रेवाड़ी हरियाणा में उन्होंने अपने भाषण में युवाओं, जवानों तथा महिलाओं का मुद्दा उठाया। इस विषय में मोदी की लोकप्रियता काफी बढ़ गई तथा 2014 का आम चुनाव मनमोहन सिंह सरकार के विरोध से शिफ्ट होकर 'मोदी लहर' में तब्दील हो गया।
नरेन्द्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी ने अचानक ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बना दिया था। मोदी 2002 गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे जब गुजरात भाजपा में केशुभाई पटेल तथा शंकर सिंह वाघेला जैसे वरिष्ठ नेताओं के बीच काफी मनमुटाव चल रहा था। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने उस दशा में मोदी को मुख्यमंत्री बनाकर वहाँ भेजा था। मोदी गुजरात के एक ऐसे मुख्यमंत्री साबित हुए जिसमें कुछ नया करने की इच्छा थी । विभिन्न लेखकों के द्वारा गुजरात के विकास में मोदी के मुख्यमंत्रित्व काव्य को 'गुजरात मॉडल' का नाम दिया है।
गुजरात मॉडल को विभिन्न बिन्दुओं से इस तरह निरूपित किया जा सकता है -
1. उच्च आर्थिक विकास |
2. न्यूनतम शासन अधिकतम सेवा।
3. कार्यक्रमों को कम्प्यूटरिकृत करना।
4. ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सेवाओं को बढ़ाना।
5. शहरी क्षेत्रों का सर्वांगीण विकास करना ।
6. समावेशी विकास तथा सतत् विकास की अवधारणा ।
7. स्वास्थ्य सेवाओं तथा शिक्षा पर प्रत्यक्ष कार्यक्रमों को मिशन मोड में लेकर पूरे करना ।
8. कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करना।
उपरोक्त मॉडल ने भारत में गुजरात की लोकप्रियता बढ़ा दी। इसके अलावा यह कहना उचित होगा कि नरेन्द्र मोदी के भ्रष्टाचार रहित 13 वर्षों के शासन ने इस व्यवस्था को और भी चर्चित बना दिया। 2014 का आम चुनाव जल्दी ही ‘मोदी केन्द्रित' हो गया तथा हमें इस महत्वपूर्ण चीज को नहीं भूलना चाहिए कि इसके पीछे मनमोहन सिंह सरकार के 10 साल के शासन में उपजे तथाकथित घोटालों का आरोप तथा मोदी का गुजरात मॉडल दोनों का योगदान था।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने मोदी के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी की घोषणा करते हुए कहा था कि “भाजपा आज अपने वरिष्ठ नेताओं के सम्मान के साथ ही नयी पीढ़ी को नेतृत्व प्रदान करने जा रही है " 
2. 2014 का आम चुनाव और भाजपा की जीत
मार्च से मई 2014 के बीच चुनावी प्रक्रिया सम्पन्न होने की अवस्था में पहली बार 2014 में सोशल मीडिया का प्रयोग किया गया था। भारतीय जनता पार्टी की कार्यशैली तथा मोदी के नेतृत्व में एक नयापन देखने को मिला। मोदी की जीत हुई तथा भाजपा को पहली बार बहुमत मिला तथा 2014 का 16वीं लोकसभा का चुनाव सही मायनों में कांग्रेस के लिए दुःस्वपन साबित हुआ।
कांग्रेस को इतिहास में सबसे कम सीट मिली तथा सिर्फ 44 सीटों पर सिमट गयी। इस हार ने कांग्रेस के लिए एक प्रकार से आत्मनिरीक्षण के लिए द्वार खोल दिया।
आम चुनाव 2014 में विभिन्न पार्टियों को आने वाली सीटें
भाजपा - 282
एन.डी.ए. सहित - 326
कांग्रेस - 44
यू.पी.ए. - 58
तृणमूल कांग्रेस - 32
अन्ना डी. एम. के. - 37
विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार भाजपा की सरकार की स्थापना संभव हुई तथा 26 मई 2014 को मोदी सरकार विशेष रूप में उन उम्मीदों के लिए थी जो भ्रष्टाचार के विरोध में थी। नरेन्द्र मोदी को एक मजबूत कैबिनेट बनाने का अवसर मिला जिसमें सुषमा स्वराज, अरुण जेटली तथा राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर नेता शामिल थे।
नरेन्द्र मोदी सरकार ने उन वादों को प्राथमिकता देने की कोशिश की जो प्रचार में कहा गया था जैसे-
1. काला धन वापस लाने की स्थिति का निर्माण।
2. विभिन्न आर्थिक सुधारों को तरजीह देने की प्राथमिकता ।
3. हरेक साल 2 करोड़ रोजगार के अवसर मुहैया कराने की बात।
बृहत् तौर पर देखा जाए तो भाजपा ने एक आक्रामक प्रचार चलाया था तथा कांग्रेस नीत यू.पी.ए. की सरकार की भ्रष्टाचार से जुड़े हुए आरोपों के मामले पर उस सत्ता के प्रतिनिधियों को रक्षात्मक कर दिया था।
भाजपा को जीतने में भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना हजारे के द्वारा आयोजित किए गए जनलोकपाल आंदोलन ने भी काफी मदद की। यह आंदोलन दिल्ली में ही रामलीला मैदान में आयोजित किया गया था तथा प्रवृत्ति भी सरकार को उखाड़ फेंकने जैसा था। 26 मई 2014 के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार ने कई ऐसे फैसले लिए जो हमेशा इतिहास में अपनी नवीकरणीय तथा कठोर सुधार की कोशिश के तौर पर जाने जाएंगे। वैसे सत्ता प्राप्ति के बाद मोदी सरकार के कुछ ही दिनों बाद मॉब लिंचिंग तथा गौ-रक्षकों द्वारा की गई छिटपुट हिंसा ने मीडिया का ध्यान खींचा था। फिर भी प्रधानमंत्री की तरफ से बार-बार यह कहा गया कि गौर - रक्षकों की यह करतूत हो ही नहीं सकती। यह गुंडों की करतूत हो सकती है।
मोदी सरकार के द्वारा लिए गए कुछ नीतिगत तथा सामाजिक आर्थिक फैसलों ने इसे यानी गठबंधन को कभी-कभी असहज भी किया पर चुनावी परिणाम पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ा।
2014 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव के बाद परिणाम में अरविन्द केजरीवाल की पार्टी 'आम आदमी पार्टी' की जीत ने जरूर भाजपा को असहज किया। 2015 के नवम्बर में नितीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार को बहुमत मिलना भाजपा तथा एन.डी.ए. के लिए एक सबक बना। वैसे 2017 में भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर नितीश कुमार की पार्टी जद-यू. भाजपानीत गठबंधन में आ गयी।
भाजपा सरकार ने जो नया किया उसमें प्रमुख थे-
1. योजना आयोग के बदले नीति आयोग की स्थापना करना।
2. बैंकिंग खाता आम आदमी को सुलभ कराने के लिए 'प्रधानमंत्री जनधन योजना' मुहैया कराया। 
3. 8 नवम्बर 2016 में बजट के इतर जाकर अचानक नोटबंदी करना। यानी बाजार में 500 और 1000 के नोटों को अवैध घोषित करना।
4. जी.एस.टी. को संसद से पास किया।
जी.एस.टी. तथा नोटबंदी ऐसे फैसले थे जो काफी जिम्मेदारी से लिए गए थे परंतु जनता में इसका विचार कैसे जाएगा, यह भ्रम में था परंतु नोटबंदी के बाद यू.पी. में विधानसभा चुनाव तथा जी.एस.टी. में गुजरात का चुनाव भाजपा के द्वारा जीत जाना एक स्वीकारोक्ति ही माना गया।
नोटबंदी यानी विमुद्रीकरण करने के पीछे विभिन्न कारणों का उल्लेख करते हुए सरकार ने कुछ उद्देश्यों को समाहित किया, जैसे-
1. बाजार में 500 और 1000 के रूप में फैले काले धन पर रोक लगाना । 
2. भारतीय अर्थव्यवस्था में रुपयों के बटाव को सक्रिय करना जिसमें पूँजीगत व्यवसाय में मदद मिल सके। 
3. रुपयों की अधिकतम जमा पूंजी को बैंकिंग व्यवस्था में समाहित करने की स्थिति बनाना।
4. बाजार में मुद्राओं की जमाखोरी तथा मुद्राओं की परिवर्तनीयता को संतुलित करना ।
इस फैसले के महत्वपूर्ण उद्देश्य में सबसे अधिक आवश्यक था काले धन को कम करने की प्रवृत्ति ऐसा महसूस हुआ कि विमुद्रीकरण से काले धन पर अंकुश लगेगा। लगभग 2 साल बाद 2018 के अक्टूबर में यह रिपोर्ट बनी कि लगभग 98% मुद्रा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास वापस आ गई है।
विमुद्रीकरण की सफलता-असफलता की चर्चा करना एक अलग विषय हो सकता है लेकिन यह कहना अपेक्षित होगा कि बैंकिंग व्यवस्था की घोर लापरवाही ने तथा कारगुजारियों ने विमुद्रीकरण की पद्धति तथा फैसलों को विवादित तथा औसत सफलता लाने वाला ही बनाया। फिर भी विमुद्रीकरण के कारण कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियों को रेखांकित किया जा सकता है, जैसे
1. कई प्रकार की गलत तथा गैर-कानूनी कम्पनियों का पता चला। इसकी संख्या लाखों में थी तथा उस पर ताले लगे। 
2. नकली नोटों का कारोबार बंद होने की प्रवृत्ति उत्पन्न हुई तथा नकली नोट तत्काल रूप में बाजार से बाहर हो गए। 
3. यह नकली नोट का धंधा अंतर्राष्ट्रीय स्तर का था।
4. आयकर दाताओं की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई तथा भारत सरकार की रिपोर्ट में इसमें लगभग 120% की वृद्धि को देखा गया।
उपरोक्त विमुद्रीकरण के फैसले ने सरकार की इच्छा शक्ति को दर्शाया तथा कठोर आर्थिक सुधार करने की उप स्थिति भी दर्ज की।
नोटबंदी का नकारात्मक प्रभाव रोजगार पर विशेष रूप से पड़ा तथा कई हजार नौकरियों को त्याग दिया गया तथा समाप्त कर दिया गया। इसके अलावा आपसी तालमेल से बच निकलने की भी प्रवृत्ति देखी गयी। नोटबंदी के बाद जो मोदी सरकार ने फैसले लिए, उसमें 'जी.एस.टी.' की चर्चा करना अत्यंत आवश्यक है। 'जी.एस.टी. का' 'वस्तु एवं सेवा कर' के रूप में पूर्ण नाम दिया जाता है।
जी.एस.टी. भारत की स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ा 'कर सुधार' है। यह विभिन्न अप्रत्यक्ष करों के बदले एक कर है जो जनता को विभिन्न अप्रत्यक्ष करों से छुटकारा देता है। जी.एस.टी. सही रूप में वस्तु एवं सेवा कर को समान रूप में ही मानती है तथा एक ही बार इन दोनों प्रकार के करों को तय कर जटिलता को समाप्त करती है। मोदी सरकार ने 1 जुलाई 2017 को जी.एस.टी. की व्यवस्था शुरू की तथा इसे प्रधानमंत्री ने 'अच्छा तथा साधारण कर' बताया। इस जी.एस.टी. में लगभग सभी वस्तुओं तथा लगभग 90% सेवाओं को लाया गया है। कुछ वस्तुएं तथा सेवाओं को तत्काल रूप में इससे बाहर रखा गया है।
सरकार के द्वारा जी.एस.टी. के 4 स्लैब रखे गए हैं तथा इन्हीं चार स्लैबों में विभिन्न वस्तुओं तथा सेवाओं को समाहित किया गया है। ये 4 स्लैब 5%, 12%, 18% तथा 28% के स्तर पर है। जी.एस.टी. के कुछ तात्कालिक रूप से नकारात्मक प्रभाव भी पड़े हैं, जिसमें आर्थिक रूप से जी. डी. पी. में कमी तथा व्यापार तथा रोजगार पर खराब प्रभाव पड़ता दिखायी दिया है। किंतु ऐसी नकारात्मकताएं तात्कालिक मानी गयी हैं तथा भविष्य में तस्वीर सकारात्मक होगी। ऐसा माना गया है।
इन सब बातों से इतर जो मोदी सरकार की सबसे सफलतम नीति मानी गई है, उसमें 'विदेश नीति' का योगदान सबसे अहम है। मोदी जी ने सुषमा स्वराज जैसी प्रखर तथा अनुभवी नेत्री को विदेश मंत्री बनाने की इच्छा प्रेषित की थी, वह काफी सफल हुई।
विदेश मंत्री के तौर पर सुषमा स्वराज ने मोदी को ऐसे अनेक उदाहरण तथा सलाह दी जिसमें भारत का पक्ष विश्व स्तर पर इन 5 सालों में सबसे अधिक मजबूत हुआ।
3. मोदी सरकार की विदेश नीति के कुछ लक्षण
1. मोदी ने सत्ता संभालते ही यह कह दिया था कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत आंख मिलाकर बात करेगा।
2. विश्व के नेताओं को भारत को सीमा पारीय समस्याओं को समझने में सफलता हाथ लगी तथा विश्व स्तर पर पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ कदम उठाने को कहा जाने लगा।
3. मोदी ने अपनी अनगिनत अंतर्राष्ट्रीय यात्राओं से विश्व के हरेक महादेशों के विभिन्न नेताओं से व्यक्तिगत संबंध बनाए।
4. सुषमा स्वराज की तरफ से संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की आवाज को मजबूती से कहने के कारण भारत की कश्मीर नीति की स्वीकार्यता बढ़ी।
5. फ्रांस जैसे देशों की मदद से अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन बनाने में मोदी सरकार सफल हुई। 
6. पर्यावरणीय मुद्दों पर विकसित देशों की मनमानी के खिलाफ विकासशील देशों का नेतृत्व करने के लिए भारत को जगह मिली।
7. अफगानिस्तान की समस्याओं को सुलझाने की स्थिति में भारत को वार्ता का भागीदार बनाया गया। 
8. संघाई सहयोग संगठन, एम.टी.सी. आर. जैसे संगठनों में भारत की सदस्य के तौर पर नियुक्ति की गई। 
9. रूस तथा चीन जैसे देशों के साथ अनौपचारिक वार्ता करने की प्रवृत्ति आयी।
10. अरब देशों के साथ बहुत संबंध कायम हुए तथा यमन युद्ध के समय भारतीय नागरिकों तथा विश्व के और भी देशों के नागरिकों को निकालने में भारत सफल हुआ।
11. अपनी विदेश नीति के बल पर ही भारत पाकिस्तान को लगभग अलग-थलग करने की कोशिश करने में सफल हो रहा है।
उपरोक्त तथ्यों से यह परिलक्षित है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने विदेश नीति को भारतीयता के साथ भव्यता भी प्रदान की है। अब भारत महत्वपूर्ण रूप से अरब और इजरायल दोनों प्रकार के धुर विरोधी देशों का सच्चा मित्र है। मोदी सरकार की विदेश नीति के अलावा आतंक विरोधी नीतियों ने भी काफी प्रभावित किया है। आंतरिक सुरक्षा के मामले में नक्सली प्रभावित जिलों की संख्या तथा सही रूप में पूर्वोत्तर में अशांति की स्थिति को शून्य करने की इच्छाशक्ति जागृत हुई है।
यह सही रूप में कहा जा सकता है कि आंतरिक सुरक्षा के मामले में मोदी सरकार ने कुछ अलग प्रकार के अच्छे विकल्पों को तरजीह दी है। आतंक के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई तथा सीमा पार जाकर सर्जिकल स्ट्राइक करने के लिए सेना को छूट प्रदान करने का निर्णय भी मोदी सरकार की विशेष उपलब्धियों में गिनी जाएंगी।
इसके अलावा जो सबसे अधिक चर्चा में रही वह फरवरी 2019 में कश्मीर घाटी के पुलवामा एक फिदायीन हमले में 40 जवानों की शहीदी के बाद सरकार के द्वारा लिए गए बहुत ही साहस भरे तथा आक्रामक फैसले ने विश्व को चकित कर दिया।
14 फरवरी 2019 को पुलवामा में एक आत्मघाती हमलावर ने सी. आर. पी. एफ. कैम्प गाड़ी पर हमला कर 40 जवानों को शहीद कर दिया था। सरकार पर इसका बदला लेने का भारी दबाव था। अब सरकार ने सेना को खुली छूट देने की बात कही तथा 27 फरवरी और 28 फरवरी के बीच 3 बजे रात्रि में पाकिस्तान के बालाकोट पर वायु सेना (भारतीय) ने मिराज बम वर्षक विमानों से हमला कर 'जैश-ए-मुहम्मद' नामक आतंकवादी संगठन के मुख्य प्रशिक्षण कैम्पस को तबाह कर दिया।
मोदी सरकार की इस आक्रामकता ने विश्व की नजर में भारत को एक नया स्थान दिलाया। इसके अलावा यह भी परिलक्षित हुआ कि भारत अब आतंकी हमले पर रक्षात्मक रुख अख्तियार कभी नहीं करेगा। मोदी सरकार के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था ने विश्व में छठा स्थान हासिल किया। यह भी सही कि मोदी सरकार ने कई सामाजिक-आर्थिक योजनाओं को मिशन का रूप प्रदान किया।
इन सामाजिक-आर्थिक योजनाओं को हम निम्न तौर पर उल्लेखित कर सकते हैं
1. गरीबों को मुफ्त बिजली की कनेक्शन सुविधा
2. मुफ्त स्पच्ण्ळप की कनेक्शन सुविधा प्रदान करना तथा इसे 'उज्जवला' का नाम देना। ।
3. अटल पेंशन योजना
4. प्रधानमंत्री फसल बीमा जना।
5. प्रधानमंत्री जन-धन योजना।
6. आयुष्मान कार्यक्रम
7. डिजिटल इंडिया
8. मेक इन इंडिया
9. स्वच्छ भारत अभियान के तहत हरेक घर में शौचालय।
10. प्रधानमंत्री आवास योजना
विशेष तौर पर देखा जाए तो इन्हीं कार्यक्रमों तथा विदेशी स्तर पर आक्रामक तेवर ने मोदी सरकार को हाल के आम चुनाव में महत्वपूर्ण सफलता प्रदान कराई है।
2019 की 17वीं लोकसभा में भाजपा का 300 सीटें प्राप्त करना तथा एन.डी.ए. को 354 सीटें मिलना, एक महान उपलब्धि ही कही जाएगी।
मोदी की नयी तथा दूसरे कार्यकाल की सरकार को विभिन्न चुनौतियों से भी पार पाना होगा, जैसे-
1. आर्थिक वृद्धि दर को उत्तरोत्तर तरीके से बढ़ाना।
2. रोजगार के साधन उपलब्ध कराना।
3. नगरीय परियोजनाओं को पूर्ण करना।
4. किसानों की आय को दोगुना करने की प्रवृत्ति को वास्तविकता प्रदान करना ।
5. किसानों को ऋण ग्रस्तता से मुक्त करना इत्यादि ।
6. इसके अलावा कश्मीर समस्या का हल करना।
उपरोक्त समस्याओं को एक चुनौती मानकर हल करने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी। मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में कश्मीर में पंचायत चुनाव की सफलता ने एक अच्छा संदेश दिया था। परंतु अभी भी धारा 370 तथा 35 शश् जैसे मुद्दों पर विश्वास बहाल करने की प्रखर आवश्यकता है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर समस्या की जटिलता तथा भारत की सामाजिक जटिलता को ऐसे ही आसानी से पार नहीं किया जाएगा क्योंकि किसी सरकार की भी अपनी सीमा होती है। परंतु यह भी सही है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति से कुछ भी संभव है।
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Sun, 01 Oct 2023 08:01:54 +0530 Jaankari Rakho
स्वातंत्र्योत्तर लोकतांत्रिक उपलब्धियाँ https://m.jaankarirakho.com/404 https://m.jaankarirakho.com/404 स्वातंत्र्योत्तर लोकतांत्रिक उपलब्धियाँ
1. स्वतंत्रता के बाद की ऐतिहासिक उपलब्धियां (1947-2018) 'लोकतांत्रिक'
21वीं सदी को एशिया की सदी कहा जाता है सही मानें तो यह सदी भारत की सदी होगी। 1947 के बाद भारत आज लगभग 72 सालों से गणतंत्र में अपने भविष्य की ओर देख रहा है। इन 72 सालों में भारत में भारत की जो उप. लब्धियां रही हैं, वो ऐतिहासिक रही है।
भारत जब स्वतंत्र हो रहा था जब अंग्रेजों ने यह कहकर खिल्ली उड़ायी थी कि ब्रिटिश सरकार के जाने के बाद भारतीयों के दस वर्ष भी नहीं लगेंगे जब वो आपसी मूर्खता के कारण टुकड़ों में बिखर जाएंगे पर ऐसा नहीं हुआ।
प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने भारत को एक आधुनिक भारत बनाने की बात कही। उन्होंने भारत के विकास के लिए तीन मंत्र दिए जैसे: - 
1. आत्म विश्वास
2. उच्च आकांक्षा
3. सकारात्मकता
नेहरू ने यह कहा कि इन तीन मंत्रों से हम अपने सपनों को पूरा करेंगे तथा एक ऐसा भारत बनाएंगे जो:- 
1. आत्मनिर्भर हो ।
2. आधुनिक हो ।
3. सामाजिक तौर पर सशक्त हो ।
4. शक्तिशाली हो ।
5. आर्थिक रूप से सबल हो ।
6. ऊर्जावान हो ।
इन उपरोक्त सपनों को वास्तविकता में बदलने के लिए कई कार्यक्रम आरम्भ किए गए। नेहरू बहुउद्देश्यीय परिया. `जनाओं, पंचवर्षीय योजना तथा केन्द्र राज्य संबंध के विकास के जरिए भारत को एक महान संघ बनाने की ओर उन्मुख हुए।
1947-64 तक भारत अपनी गरीबी तथा पिछड़ेपन से लड़ते हुए एक सबल राष्ट्र बनने की चाहत में था। प्रथम तथा द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओं ने भारत में कृषि तथा उद्योग के विकास के लिए कई प्रयास हुए। वहीं चौथी और पांचवीं पंचवर्षीय योजनाओं को गरीबी हटाओ तथा आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के अस्तित्व को मजबूती देने के लिए लाया गया। योजनागत नीतियों तथा कई कदमों ने भारतीय जनता के हितों को काफी प्रासंगिक बनाया तथा सरकार को हरेक बजट में कुछ न कुछ विशेष सामाजिक आर्थिक योजनाओं को लाकर राज्यों के साथ काम करने की आवश्यकता महसूस हुई।
वास्तविक रूप में 1952 के बाद भारत की गणतांत्रिक पद्धति फली - फूली तथा सत्ता का हस्तांतरण बहुत ही शानदार लोकतांत्रिक तरीकों में हुआ या होता रहा है। विभिन्न तरह की नीतियों, कार्यक्रमों तथा अलग-अलग सरकारों की कोशिशों ने भारतीय लोकतंत्र को एक महान लोकतंत्र बनाने की स्थिति में ला खड़ा किया।
विभिन्न उपलब्धियों को अगर एक सारांश के रूप में बिंदूवार देखें तो निम्न प्रकार की उपलब्धियां उल्लेखित होंगीं: - 
1. राष्ट्रीय एकता
2. लोकतांत्रिक पद्धति की सफलता
3. चुनावी लोकतंत्र को महान सफलता
4. हरित क्रांति
5. सफलतम संघवाद की अभिव्यक्ति
6. संवैधानिक तंत्र में विश्वास की लगातार बढ़ोतरी
7. संसदीय व्यवस्था में जन-मन का विश्वास
8. राजनीतिक दलों के बीच वैचारिक दुश्मनी ही सिर्फ प्रासंगिक ।
9. एक प्रतिष्ठित न्यायपालिका।
10. एक संघात्मक गणतंत्र की सफलतम अवस्था ।
11. राज्यों के बीच आपसी सामंजस्य |
12. रक्तहीन सत्ता हस्तांतरण की परम्परा ।
13. शांति पूर्ण सैनिक व्यवस्था ।
14. मिश्रित अर्थव्यवस्था को स्वीकार करने की पद्धति ।
15. विभिन्न अति आवश्यक तथा उच्च शैक्षणि संस्थानों का निर्माण तथा विकास।
16. राजनीतिक प्रक्रिया में जन भागीदारी की बढ़ोतरी ।
17. पंचायती राज व्यवस्था का संवैधानिक स्वरूप |
18. महिला सशक्तिकरण की कोशिश।
19. राजनीतिक विरोध के सारगर्भित रूप।
20. वैश्वीकरण की सकारात्मकता को ग्रहण करना।
21. विभिन्न आर्थिक उपलब्धियां।
22. निजीकरण का नियंत्रित रूप ग्रहण करना।
23. गरीबी उन्मूलन की सही दिशा ।
24. साक्षरता में बढ़ोतरी तथा विकास |
25. जीवन की गुणवत्ता बढ़ना।
26. वैश्विक स्तर पर भारतीय पक्ष की प्रतिष्ठा ।
उपरोक्त सभी उपलब्धियों के बारे में यह साफ कर देना अति आवश्यक है कि इनमें कुछ उपलब्धियों की सफलता को 100: नहीं माना जा सकता पर तुलनात्मक रूप से यह सही है कि 1950 के बाद इनमें उत्तरोत्तर सकारात्मक सुध र हुआ है।
सर्वप्रथम राष्ट्रीय एकता की बात करना अति आवश्यक है। जब इटली ने ब्रिटिश संसद में यह घोषणा की कि भारत को अब स्वतंत्र कर दिया जाएगा तो अधिकतर ब्रिटिश अफसर जिसमें तत्कालीन वायसराय भी थे जिन्होंने यह कहा था कि अंग्रेजों के जाने के बाद भारत की विविधता इस देश के टुकड़े-टुकड़े कर देगी। परन्तु राष्ट्रीय जनमानस की अटूट अभिलाषा ने राष्ट्रीय एकता की स्थिति को सकारात्मक रूप से ग्रहित किया।
किसी नवोदित स्वतंत्र राष्ट्र के लिए उसकी एकता सबसे बड़ी प्राथमिकता होता है तथा उसमें भी भारत जैसे देशों में तो यह और भी आवश्यक था क्योंकि 1909, 1919, 1935 तथा 1946 की अंधकार पूर्ण अंग्रेजी तथा लीग की मनःस्थिति ने भारत की आत्मिक एकता को क्षति पहुंचाने की कोशिश की । परन्तु भारत जन-मानस में एकता के प्रति जो चेतना थी, वह कभी समाप्त नहीं हुई।
देश ने स्वतंत्रता के बाद 70 सालों में राजनीतिक, आर्थिक तथा भावनात्मक तौर पर एक होने की इच्छा को सर्वोपरी माना है तथा जनता ने सरकार की मदद से इसमें बहुत बड़ी सफलता प्राप्त की है। देश ने राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में 70 साल से अपना पल-पल लगाया है। भारत की विशाल विविधता भी राष्ट्रीय एकता में कोई भी बाधा उत्पन्न नहीं कर पाया है। लगभग हरेक दशक में कोई न कोई सामाजिक उथल-पुथल देश में होते रही है परन्तु इसके कारण तनाव के बावजूद भारतीय एकता खंडित नहीं हो सकी है।
यह सही है कि भारतीय एकता के सामने कई अवसरों पर कई प्रकार की चुनौतियां पेश हुई हैं पर इस पर सरकार की तथा जनता की उत्कट इच्छा विजय प्राप्त करती रही है। स्वतंत्रता के कुछ ही दिनों के बाद भाषा के आधार पर हुए उथल-पुथल तथा विभिन्न आंदोलनों ने कई प्रकार के संशय उत्पन्न किए पर सरकार ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के बावजूद क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक पहचान को भारत की एकमुश्त पहचान के विरोध में जाने नहीं दिया। इसके अलावा आदिवासियों की समस्या को भी देखकर, समाधान कर भारत की मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास किया गया।
यह सही है कि कुछ अलगाववादी समस्याएं तथा क्षेत्रीय असमानता राष्ट्र की अस्मिता को ठेस पहुंचाने की असफल कोशिश करती रही है परन्तु सरकार तथा जनता इस कारण राष्ट्रीय एकता को संभावित क्षति पहुंचाने के विरोध में एक होकर खड़ी रही है। विभिन्न राज्यों के बीच अंतर भी बना हुआ है परन्तु यह सही है कि कभी इस कारण भारत की एकता को खतरा नहीं पहुंचा है।
लेकिन यह सही है इसके पीछे राज्य प्रशासन की अपनी आंतरिक क्षमता अधिक है तथा यह किसी आंतरिक उप. निवेशवाद या अर्द्ध उपनिवेशवाद का नतीजा नहीं है जहां एक पिछड़े क्षेत्र का अधिक विकसित क्षेत्र या सारे देश द्वारा आर्थिक शोषण हो रहा हो । भारत सरकार ने राष्ट्रीय एकता बनाने के लिए संवैधानिक तथा वैधानिक दोनों तरह के ढाँचे खड़े किए हैं:
1. अंतर्राज्यीय परिषद
2. क्षेत्रीय परिषद
3. राष्ट्रीय एकता परिषद इत्यादि ।
इसमें अंतर्राज्यीय तथा क्षेत्रीय परिषद तो संवैधानिक है परन्तु राष्ट्रीय एकता परिषद नैतिक तथा वैधानिक है। इससे विभिन्न विचारों तथा संस्थाओं से एक मंच पर आकर राष्ट्रीय एकता के लिए काम करने की इच्छा को जोर देना रहा है।
इसके अलावा क्षेत्रीय आर्थिक तथा विकास संबंधी असमानताएं साम्प्रदायिक तथा जातीय विभाजन के साथ गंभीर समस्याएं खड़ी करना चाहती रही है। फिर भी सरकार की गंभीर कोशिशों ने इसे संतुलित कर रखा है। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय एकता में जो बाधाएं आती रही हैं उसमें आतंकवाद तथा साम्प्रदायिक दंगे रहे हैं। पंजाब की समस्या का अंत तथा आतंकवाद के विरुद्ध ठोस रणनीतिक की वर्तमान कोशिश का नतीजा अब इस विषय में एक सकारात्मक चिन्ह को निरूपित करता है।
1948, 1984 तथा 2002 के दंगों ने भारतीय एकता को ठेस पहुंचाने की कोशिश की है परन्तु जनता की कोशिश तथा न्याय क्षेत्र की सफलता तथा सरकार के संवैधानिक तंत्र में विश्वास ने इसके कारण राष्ट्रीय एकता टूटने नहीं दी है। निष्कर्षतः भारतीय लोकतंत्र की उपलब्धि जो स्वतंत्रता के बाद सबसे कड़ी है उसे बिना किसी लाग-लपेट के 'राष्ट्रीय एकता' कहा जा सकता है।
राष्ट्रीय एकता के बाद लोकतांत्रिक पद्धति की सफलता को उल्लेख करने से पहले हमें भारत की लोकतांत्रिक तथा प्राचीन परम्परा से अवगत होना आवश्यक है। प्राचीन काल से ही भारत में गणतंत्रात्मक शासन तथा लोकतंत्र की सफलता को अति महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र की सफलता इस बात में अधिक है कि किस तरह अपनी प्रशासनिक विकास की शक्ति तथा राजनीति दल पद्धति की परिपक्वता ने लोकतंत्र को भारत में सफल बनाया है।
कुछ बिन्दुओं की अभिव्यक्ति से हम भारत में लोकतांत्रिक पद्धति की सफलता के बारे में अधिक जान सकते हैं:
1. स्वतंत्रता के बाद निष्पक्ष चुनाव पद्धति का विकास। 
2. केन्द्रीय स्तर पर विकेन्द्रीकरण को सकारात्मक तरीके से पोषित करने की लोकतांत्रिक रूप से कोशिश।
3. संवैधानिक रूप से चुनाव आयोग का अस्तित्व।
4. एक स्वतंत्र तथा परिपक्व राजनीतिक दलीय पद्धति का विकास।
5. पंचायती राज को संवैधानिक कार्य देने की सफलता।
6. सरकार को लोककल्याणकारी होने की प्रेरणा मिलना तथा जनभागीदारी बढ़ाना।
उपरोक्त कथनों से इस परिणाम को रेखांकित किया जा सकता है कि भारत की लोकतांत्रिक पद्धति उत्थान क्रम में तथा विकसित अवस्था में आगे बढ़ती आ रही है।
2. चुनावी लोकतंत्र की महान सफलता
1951 के बाद यह कहना गर्व की बात है कि अभी तक 17 लोकसभा के चुनाव हो गए हैं तथा यह वास्तविकता है कि 17 में से 13 लोकसभा ने अपने पूर्ण कार्यकाल को प्राप्त किया है। सिर्फ 7 लोकसभा अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी. उसमें भी सिर्फ कारण समर्थन की कमी रही न कि कोई रक्त-रजित घटनाएं।
हरेक चुनाव के बाद सारगर्भित तरीके से सत्ता का हस्तांतरण हुआ है तथा चुनावी परिणाम में बड़े स्तर पर सबको विश्वास रहा है। प्रत्येक लोकसभा में चुनावी सफलता की कहानी गढ़ी रही है। चुनावी लोकतंत्र की सफलता भारत को सिर्फ संसद के स्तर पर केंद्रीय रूप में देखने को नहीं मिलती वरन् यह सही है कि इतने सालों में सरकार की कोशिश तथा जनसहभागिता ने चुनावी लोकतंत्र को पंचायत स्तर पर भी विकसित करने का प्रावधान किया है। इसमें कोई शक नहीं कि अब चुनावी लोकतंत्र के विकास ने भारत ने एक महान उड़ान को प्राप्त कर लिया है जो सही तरीके से चलने की कोशिश करता रहा है। संविधान में पंचायत स्तर पर चुनाव को विस्तृत किया गया है तथा इसके लिए वित्त भी मुहैया कराता रहा है।
3. हरित क्रांति
हरित क्रांति के बारे में पहले के अध्याय में बृहत् स्तर पर उल्लेख किया गया है। सही रूप में 1960 के अन्त में एम. एस. स्वामीनाथन की महान कोशिश ने भारत को भुखमरी तथा अकाल से बाहर निकाला था। अब द्वितीय हरित क्रांति की भी बात चल रही है।
4. सफलतम संघवाद की अभिव्यक्ति
वैसे तो संविधान निर्माताओं ने एकात्मक व्यवस्था लाकर सफल रूप में संघवाद की प्रासंगिकता को उजागर किया था परंतु इसमें कोई शक नहीं कि संविधान के इतर भी राज्य केंद्र के बीच एक अच्छा तालमेल देखने को मिलता रहा है। आपातकाल के उस संक्षिप्त काल को छोड़ दिया जाए तथा 356 धारा की छिटपुट प्रयोग को हटाकर देखा जाए तो व्यवहारिक रूप में केंद्र राज्य सरकार के अलग-अलग विचार ने भी एक साथ काम करने को तरजीह दी है। 
संघवाद के विकास के लिए प्रशासनिक तथा राजनीतिक स्तर पर भी संविधान से लेकर सरकार के प्रयास ने 70 सालों में एक महान विकास को संप्रेषित किया है। अलग-अलग समय पर राष्ट्रीय विकास परिषद्, अंतरराज्यीय परिषद्, क्षेत्रीय परिषद् तथा संवैधानिक धाराओं ने केंद्र-राज्य के बीच उठी विभिन्न समस्याओं को समाधान रूप देने की कोशिश की है।
70 सालों में राज्य केंद्र संबंध के कारण संघवाद की सफलता को रेखांकित किया जा सकता है। इसमें प्रशासनिक, राजनैतिक, वित्तीय संबंधों की संवैधानिक पद्धति ने अहम भूमिका निभाई है।
5. संवैधानिक तंत्र को स्वीकार करना
सवैधानिक तंत्र को स्वीकार करना भारतीय लोकतांत्रिक पद्धति की अहम विशेषता रही है। 70 सालों में संविधान के तहत आने वाली सभी संस्थाओं तथा संसदीय तंत्र को बहुत ही सम्मानपूर्वक देखा गया है। इसमें कई ऐसे भी मोड़ आए जिसने सकारात्मक रूप से संविधान की तंत्रीय पद्धति को मजबूत ही किया।
शक्तिशाली सत्ता तंत्र हो या मजबूत से मजबूत संस्था ही क्यूं न हो, भारत की संवैधानिक पद्धति तथा परम्परा के खिलाफ जाने की कोशिश कभी किसी ने नहीं की है। अगर आपातकाल में ऐसी कोशिश की भी गई तो सफल नहीं हो सकी।
6. संसदीय व्यवस्था में जन-मन का विश्वास
भारतीय संसदीय परंपरा में विश्वास को स्वतंत्रता के बाद की महान उपलब्धियों में गिना जाता है। पिछले 70 सालों में संसदीय तंत्र की सफलता ने भारतीय राजनीति पद्धति को परिपक्व बनाया है। संसदीय तरीकों से सरकार की अभिव्यक्ति तथा लोकतंत्र की प्रासंगिकता ने इसे और भी महत्वपूर्ण बना दिया है। भारतीय संसदीय व्यवस्था को स्वयं भू तथा क्रम रूप में विकसित होने की प्रकृति वाली व्यवस्था कहा जाता रहा है। इस व्यवस्था में जनता की इच्छा को सर्वोपरी माना गया है तथा संविधान तथा न्यायपालिका इसका रक्षण करती रही है। 
संसदीय परम्परा की ही शक्ति रही है कि भारत में एक प्रकार से ही बार-बार लोककल्याणकारी सरकारों का निव. चिन होता रहा है।
7. राजनीतिक दलों के बीच सिर्फ वैचारिक स्तर पर ही दुश्मनी की प्रासंगिकता
भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की अपनी विशेषता रही है। इन दलों की अपनी वैचारिक शक्ति होती है तथा सिद्धांत होता है। यह वैचारिक सिद्धांत दूसरे दलों को एक से अलग करता है। भारत में राजनीतिक दलों के बीच सिर्फ मतभेद होते हैं, मनभेद नहीं। अलग-अलग दलों के बीच सिर्फ राजनीतिक स्तर पर मत विभिन्नता ने लोकतंत्र को लगातार परिपक्व बनाया है।
भारत में वामपंथी दलों की भी प्रासंगिकता रही है तथा दक्षिणपंथी दल भी सत्ता में रहे हैं तथा कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी का भी अस्तित्व रहा है। भले ही इनके सिद्धांत एक-दूसरे के धुर विरोधी हों लेकिन राजनीति स्तर पर एक दूसरे के विरोध के आगे ये पार्टियाँ एक दूसरे का अहित नहीं सोचती क्योंकि भारतीय लोकतांत्रिक पद्धति की यह विशेषता है कि 'मतभेद का अर्थ मनभेद' कतई नहीं हो सकता।
8. एक प्रतिष्ठित न्यायपालिका
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय जनमानस में अपनी न्यायपालिका के प्रति गहरा विश्वास रहा है जो अभी तक कायम है। न्यायपालिका का स्वतंत्र रहना तथा निष्पक्ष रहना भारतीय तंत्र की अनुपम विशेषता है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय की बुद्धिमत्ता तथा विशेष सक्रियता ने देश की एकता तथा न्यायप्रियता समृद्ध ही किया है।
अलग - अलग समय पर न्यायपालिका की प्रासंगिकता ने सरकार को एक अच्छा रास्ता ही दिखाया है तथा कभी-कभी आत्म-निरीक्षण भी कराया है। स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे भारतीय न्यायपालिका की पद्धति ने अपनी इच्छाशक्ति तथा संवैधानिक विश्वास से जन-जन के मन में जगह बनायी है।
9. एक संघात्मक गणतंत्र की अवधारणा
1950 के बाद से ही भारत की गणतांत्रिक शक्ति ने लोकतंत्र को सफल रूप में संचालित किया है। गणतंत्र के रूप में भारत को 69 साल होने के बाद इसके प्रति विश्वास और भी बढ़ा है। कभी भी किसी ने भारत की गणतंत्रात्मक पद्धति को चुनौती देने का प्रयास नहीं किया है। बार-बार भारत की जनता ने अपनी इच्छा से अपने अध्यक्ष को चुना तथा बड़े-से-बड़े सत्ताधारितयों को पद से हटाया भी है।
10. राज्यों के बीच आपसी सामंजस्य
स्वतंत्रता के बाद भारत के अनेक राज्य एक हुए तथा अलग-अलग भी भौगोलिक आधार पर हुए परंतु किसी बड़े स्तर पर एक दूसरे से अलगाव की मानसिकता नहीं पाली । यह सही है कि संसाधनों के बँटवारे तथा जल-विवाद जैसेमुद्दों ने कुछ स्तर पर मन-मुटाव की प्रवृत्ति कभी-कभार प्रांसगिक हुए हैं परंतु सही अर्थों में यह कहा जा सकता है कि दो- राज्यों ने आपस में समन्वय तथा मदद की संरचना को स्वीकार किया तथा एक संघीय व्यवस्था में आपसी विश्वास को कायम करते रहे हैं ।
11. रक्तहीन सत्ता हस्तांतरण की परंपरा
हो गए हैं तथा हजारों 2019 में भारत के 17वें लोकसभा के चुनाव सम्पन्न होने तक लगभग 17 बार आम चुनाव बार अलग-अलग राज्यों के विधान सभा के चुनाव भी हो गए हैं। इन सभी चुनावों में जीत-हार कुछ भी हो, सत्ता का हस्तांतरण हमेशा सारगर्भित तरीके से होता आ रहा है। यह भारतीय लोकतांत्रिक पद्धति की पहचान बन गयी है तथा विश्व के लिए एक अनुपम उदाहरण भी।
12. शांतिपूर्ण सैनिक व्यवस्था
भारत की सेना विश्व की चौथी सबसे शक्तिशाली सेना है। इसके आंतरिक अनुशासन तथा संतुलित व्यवस्था ने इसे बहुत ही मजबूत बनाया है। भारत की सैन्य व्यवस्था ने अपनी सीमा कभी नहीं लांघी है तथा इसने कभी भी अपनी विचारधारा को सरकार की नीतियों पर नहीं थोपा है।
भारत की सेना सरकार संविधान तथा लोकतंत्र में प्रखर विश्वास रखती रही है तथा भारतीय परंपरा को सारगर्भित तरीके से मानती रही है। 
13. मिश्रित अर्थव्यवस्था की स्वीकार्यता
स्वतंत्रता के बाद भारतीय लोककल्याण के लिए एक संतुलित अर्थव्यवस्था का निर्माण हुआ तथा इसे मिश्रित कहा गया। परंतु 1991 में उदारीकरण के बाद विशाल रूप में इस प्रकार की अर्थव्यवस्था ने भारत की वैश्विक भागीदारी बढ़ाई है तथा सरकार की मानसिकता को भी सकारात्मक तरीके से बदला है। अब सरकार समावेशी, पोषणीय तथा वैश्विक विकास के लक्ष्य की तरफ बढ़ रही है।
स्वतंत्रता के बाद भारत के विभिन्न प्रकार के शैक्षणिक संस्थानों का विकास होता रहा है जिसमें चिकित्सा, अभियािं त्रकी, प्रबंधक तथा विधि एवं वैज्ञानिक खोज के विषय के समाहित किये गये हैं। इसके कारण वैश्विक स्तर पर भारत की बौद्धिक परंपरा को स्वीकार किया गया है। इसमें उन सभी संस्थानों को रखा गया है जो भारत को विकसित बना सके।
उपरोक्त तथ्यों के अलावा राजनीतिक जनभागीदारी तथा महिला सशक्तिकरण को अधिक महत्व दिया गया है। पंचायती राज का विकास तथा ग्राम विकास की कोशिश ने भारत को विकास के मार्ग पर बढ़ाया है। जनभागीदारी भारत की विशालता तथा विविधता को सारगर्भित रूप प्रदान करती है। यह सही है कि अभी भी गरीबी, साक्षरता तथा चिकित्सा सुविधाओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है परंतु पिछले 70 सालों ने देश को एक नयी दिशा प्रदान की है।
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Sun, 01 Oct 2023 07:57:52 +0530 Jaankari Rakho
कृषि एवं भू&सुधार (भाग& II) https://m.jaankarirakho.com/403 https://m.jaankarirakho.com/403 कृषि एवं भू-सुधार (भाग- II)
1. भू-दान आंदोलन
प्रसिद्ध गांधीवादी नेता तथा प्रखर समाज सेवी आचार्य विनोबा भावे अपने गांधीवादी ट्रस्टीशिप के विचारों तथा विभिन्न रचनात्मक गांधीवादी तकनीकों में से एक भू-दान आंदोलन को जनता के सामने 1950 के दशक में लाए ।
भू-दान आंदोलन को आरम्भ करने के पीछे बहुत सारे उद्देश्य थे। जैसे- भूमि का पुनर्विवरण एक आंदोलन के रूप में हो, कृषि में संस्थागत परिवर्तन हो पाए तथा समाज में ट्रस्टीशिप की गांधीवादी पद्धति का निर्माण हो।
विनोवा भावे ने सर्वोदय समाज को बढ़ावा देने के लिए सर्वोदय समाज की स्थापना की जो रचनात्मक कार्यकर्ताओं का अखिल भारतीय संघ था। इसका महान उद्देश्य था- अहिंसात्मक तरीके से सामाजिक परिवर्तन रखना।
विनोवा भावे के अनुयायी और स्वयं भावे पदयात्राएं करके प्रत्येक गांव जाने लगे तथा जमीदारों को अपनी जमीन का कम से कम 1/6 हिस्सा भू-दान के रूप में भूमिहीनों और गरीबों के बीच बांटने का आग्रह करते थे।
इस आंदोलन के जो सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य थे:- 5 करोड़ एकड़ जमीन दाखिल करना जो भारत में 30 करोड़ एकड़ जोतने लायक था। उसका 1/6 हिस्सा दिया जाता था।
विचार यह था कि औसत रूप से 5 सदस्यों का परिवार अपनी जमीन का 5 वां हिस्सा छोड़ दे या दान कर दे और भूमिहीन गरीब को अपने परिवार का सदस्य बना सके।
भू-दान आंदोलन की स्थिति का सरकार की सोच से कोई लेना-देना नहीं था। इसे कांग्रेस पार्टी की तरफ से सरकारी समर्थन हासिल था। कांग्रेस कमेटी ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि इस आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया जाए। कांग्रेस के अलावा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सदस्यों ने भी भू-दान आंदोलन का महान समर्थन किया। इस पार्टी के नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण सक्रिय राजनीति छोड़कर 1953 में भू-दान आंदोलन में शामिल हो गए।
विनोबा भावे के आंदोलन को पहली सफलता 18 अप्रैल, 1951 को मिली जब आंध्र प्रदेश के तत्कालीन तेलंगाना क्षेत्र में पोचकल्ली ग्राम में पहला भू-दान हुआ। इस जगह कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में सशस्त्र किसान विद्रोह काक प्रभाव भी महसूस किया जा रहा था। उन्होंने 3 महीनों तक इस क्षेत्र का दौरा किया और दान के रूप में 12,200 एकड़ भूमि पाई। इसके बाद आंदोलन उत्तर भारत में खासतौर से बिहार और उत्तर प्रदेश में फैल गया। आरम्भ के वर्षों में आंदोलन को काफी हद तक सफलता मिली। उसे मार्च 1956 तक दान के रूप में 40 लाख एकड़ से अधिक जमीन मिली। इसके बाद आंदोलन का जोर खत्म होने लगा और दान के रूप में बहुत कम जमीन मिलने लगी।
सबसे महत्वपूर्ण बात अब यह दिखने लगी कि जो भूमि दान में दी जाने लगी वो पतली या कर्ज वाली भूमि थी। इसके अलावा गरम जरुआ भूमि भी थी जो संदेह के आधार पर कभी भी किसी के द्वारा छीनी जा सकती थी। 1955 में इस आंदोलन की धारा बदल गयी। अब भू-दान के बदले ग्राम-दान की पद्धति काम करने लगी। इसका प्रेरणा स्रोत गांधी वादी विचार था। इसका अर्थ यह था कि- "सही भूमि गोपाल की"- इस 'गोपाल' का अर्थ भगवान कृष्ण के रूप में माना गया तथा यह कहा गया कि गांव में कोई भूमि किसी विशेष आदमी की न होकर भगवान की होगी तथा सभी ग्रामवासियों में बराबर रूप से बांटने की होगी। वह किसी एक व्यक्ति की नहीं मानी गयी। आंदोलन का आरम्भ उड़ीसा में हुआ और वहां वह बड़ा सफल रहा। 1960 के समय तक ग्रामदान गांवों की संख्या 4500 से अधिक हो चुकी थी।
इनमें से 1946 गांव उड़ीसा में थे, 603 गांव महाराष्ट्र में थे, 543 गांव केरल में थे, 483 गांव आंध्रप्रदेश में थे और 250 गांव मद्रास में थे। कहा जाता है कि इस आंदोलन ने उन्हीं गांवों में अधिक सहायता प्राप्त की जहां सामाजिक स्तर पर बहुत अधिक विभेद नहीं था। जहां जमीन का अंतर - लगभग नहीं के बराबर था। जैसे आदिवासी समुदायों की सामाजिक संरचना में। विनोबा भावे जी ने ग्राम्य स्थिति को चुनने के लिए इस बात का हमेशा ख्याल रखा।
इस आंदोलन के विकास में उत्परिवर्तन को महत्व नहीं दिया गया तथा इसे जैसे-तैसे जारी रखने की कोशिश की गई। सही रूप से यह भुला दिया गया कि ग्राम दान कर कितना महत्व है ?
भू-दान आंदोलन का उद्देश्य सबसे अधिक महान रूप से सामने आया पर इसके बिखरने से विभिन्न तरीके से बाद में अलग-अलग रूप में राज्य सरकारों ने संपत्ति के नियम तथा भू-दान समिति की समीक्षा कर इस आंदोलन को सिर्फ याद करने की कोशिश की।
भू-दान आंदोलन और उनकी संभावनाओं का उचित मूल्यांकन आज तक नहीं हो पाया है। विभिन्न इतिहासकारों ने अपनी रुचि तथा अपने पसन्द की विचारधाराओं के द्वारा इस आंदोलन को रेखांकित करने की कोशिश की है। कभी-कभी तो इस आंदोलन पर किसान संघर्षों को रोकने के लिए आंदोलन की हर स्थिति पर कलंक लगाया गया। कभी इसे यूरो. पियन तो कभी इसे प्रतिक्रियावादी विचार बताया गया। लेकिन भारत में इसे आम तौर पर ले जाना चाहिए। क्योंकि यहां प्रत्येक अच्छे कदमों का खुलकर विरोध किया जाता है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता भूमि सुधार की कोशिश करना था जो बिना किसी सरकारी सहायता के द्वारा किया गया। इसमें एक महान-दर्शन छिपा था जिसमें सभी भूमि को प्राकृतिक रूप से रख कर समान रूप से जमीन बंटवारे की बात की गई थी। इस आंदोलन में 'गांधीवादी दर्शन', 'ट्रस्ट्रीशिप', 'समाजवाद' तथा 'सामाजिक विभेद की समाप्ति' जैसे महान तत्व मौजूद थे। इसे बिना सरकार के प्रयास के कई महत्व की बातों को सामने रखकर प्रस्तुत किया गया था।
कांग्रेस की आंतरिक राजनीति और अच्छे कर्मों से टांग खींचने की प्रवृत्ति ने इस आंदोलन की धारा को कुचल दिया। एक इतिहासकर ने कहा कि विनोबा भावे के अलावा इस आंदोलन में कोई नेहरूवादी नेता होता तो इसे खुद सरकारी मदद दी जाती पर विनोबा भावे की शक्ति स्वयं द्वारा अर्जित थी।
दूसरी बात कि इसमें जयप्रकाश नारायण ने समर्थन दिया था जो नेहरू से खफा रहते थे। विभिन्न परिस्थितियों में इस आंदोलन को तथा इससे जुड़े नेताओं की लोकप्रियता से खबरदार होकर कांग्रेस ने बाद में चलकर इसे समर्थन देना मन से बंद कर दिया।
यह आंदोलन काल की आर्थिक असमानता कृषि के स्तर पर बचाने वाला था । भू-दान आंदोलन की प्रवृत्ति किसानों की स्थिति सुधारने के साथ ही गांव में भूमिहीन तबकों को स्वाभिमान की स्थिति में लाने की थी। भू-दान आंदोलन के बड़े तबकों ने इस बात को तरजीह नहीं दी कि इसका आयोजन क्यों किया जा रहा है। 
भूमि सुधार तथा शहरीकरण
कृषि सुधार तथा भूमि के समान वितरण में सहकारिता के महत्व को कांग्रेस के तत्कालीन शीर्ष नेतृत्व ने महत्व दिया। महात्मा गांधी से लेकर नेहरू खेती की विकसित अवस्था को प्राप्त करने के लिए सहकारिता को आवश्यक समझा। सहकारिता के महत्व को सर्वसम्मति से समाजवादी नेताओं से लेकर वामपंथी नेताओं ने भी समझा तथा इसे गरीबों की भलाई का सबसे बड़ा साधन माना।
सहकारिता के मामले में यह आम सहमति थी कि कोई भी कदम बिना सोचे समझे नहीं उठाया जाएगा। इसमें किसानों की सहमति तथा सदभाव से स्वीकारोक्ति को बहुत महत्व दिया गया तथा सहकारिता पद्धति को बलपूर्वक चलाने की गुंजाइश नहीं रखी गयी।
कांग्रेस की कृषि सुधार समिति ने 1949 में अपनी रिपोर्ट पेश की। इस समिति के अध्यक्ष श्री कुमारप्पा थे तथा उन्हीं के नाम से यह समिति जानी जाती थी। इस समिति के द्वारा सुझाव दिए गए थे। समिति के अनुसार कृषि के विभिन्न स्तरों के अनुरूप विभिन्न सहकारों को लागू करवाने के अधिकार सौपे जाने चाहिए। इस प्रकार यह कहा गया कि जहां पारिवारिक किसान को 'बाजार में बेचने', कर्जे तथा अन्य मामलों में बहुमुखी सहकारी संस्था का प्रयोग करना पड़ेगा, वहीं अनुत्पादक किसान को अपना खेत दूसरों के साथ मिलकर जोतना होगा।
इस समिति में रिपोर्ट में सहाकारिता लागू करने के लिए दबाव का प्रयोग करने का सुझाव दिया। समिति ने यह कहा कि अगर सही तौर पर यह एक सही रणनीति के तहत सहकारिता को प्रशिक्षित कार्यकर्ता के द्वारा लागू करवाया जाए तो किसानों की सोच बढ़ायी जाएगी तथा मनोवैज्ञानिक स्तर पर सहकारिता के लिए तैयार हो जाएगी। परन्तु इसमें एक मनोवैज्ञानिक दबाव की बात की गई थी तथा यही हुआ। यह सही रूप में जल्दबाज़ी में लिया गया निर्णय था।
प्रथम पंचवर्षीय योजना में सहकारिता से जुड़ी हुई बिन्दुओं को अच्छे से सोचा गया तथा इसमें छोटे और मध्यम जोतो को कृषि सहकारी संस्थाओं के रूप में साथ आने के लिए प्रोत्साहित करने और इसमें उनकी सहायता करने की भी बात की गई। योजना में इन्हें लागू करवाने के अधिकारों से जुड़ी हुई बातें नहीं की गयी। इसमें यह कहा गया कि गांव में बहुमत के आधार पर किसी भी जमींदार की जमीन को सहकारिता में शामिल किया जाना चाहिए। यह निर्णय पूरे गांव पर लागू किए जाने चाहिए।
1952 में आरम्भ सामुदायिक विकास कार्यक्रम की रूपरेखा को सहकारिता तथा भूमि सुधार के लिए एक आशय माना गया तथा कहा गया कि सामुदायिक विकास कार्यक्रम के प्रशिक्षित कार्यकर्ता भारतीय कृषि में संस्थागत परिवर्तन ला सकेंगे। क्या वे सामुदायिक कार्य के लिए स्वैच्छिक श्रम के संगठन में सहकारी की स्थापना में मदद करके भूमि सुधार लागू करवा सकेंगे। आरम्भ में ऐसे संगठनों से काफी अपेक्षाएं थीं। तथा ऐसी आशा की जा रही थी कि संस्थाएं खासकर सहकारिताएं कृषि में निवेश का स्थान ले पाएंगी। और कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि को योजनाबद्ध तरीके से हासिल कर सकेगी।
इस योजना की स्थिति तथा प्रभाव ऐसी दूसरी योजना में भी देखने को मिलता है। उसमें कहा गया कि द्वितीय पंचवर्षीय योजना के दौरान मुख्य जिम्मेदारी सहकारी खेती जैसे कदमों के लिए ठोस आधार तैयार करना है जिससे लगभग 10 वर्षों तक खेती की जमीन के काफी बड़े हिस्से पर सहकारी तरीके से खेती की जा सके। इधर दूसरे देशों अर्थात् चीन जैसे साम्यवादी देशों में सहकारीपूर्ण कृषि में वृद्धि की स्थिति आने लगी। लेकिन कुछ दिनों में इस पद्धति से विकास दर में कमी आने लगी। यहां तक कि 1974 में भारत में कृषि का विकास 2.5 की दर से बढ़ रहा था वहीं चीन में मात्र यह 2 प्रतिशत था।
1956 के मध्य में भारत सरकार द्वारा सहकारी कृषि के अध्ययन के लिए दो प्रतिनिधि मंडल को चीन भेजा गया। इसमें एक प्रतिनिधि मंडल आयोग (योजना) तथा दूसरा खाद्य एवं कृषि मंत्रालय का था। इसके अलावा इस प्रतिनिधिमंडल में सहकारी आंदोलन के नेता, सांसद, सहकारिता पदाधिकारी, तकनीकी विशेषता तथा योजना कर शामिल थे। इन दोनों प्रतिनिधिमंडलों का उद्देश्य चीन में सहकारों के संगठनों के अध्यनकाल और कृषि उत्पाद में वृद्धि के तरीकों से अवगत होना था। इन यात्राओं के मूल में यह भावना काम कर रही थी कि द्वितीय योजना द्वारा तथा किए गए कृषि विकास के उद्देश्य सम्मिलित थे। इसलिए इन उद्देश्य को बढ़ाया जाना चाहिए। समझा गया कि इसमें चीनी अनुभव लाभदायक होंगे और वे यह बता पाएंगे कि बिना अधिक कुछ खर्च किए उद्देश्य तक कैसे पहुंचा जा सकता है।
इन दोनों प्रतिनिधिमंडल ने एक तरह की रिपोर्ट दी जिसमें चीन के कृषि विकास के पीछे सहकारिता का हाथ बताया गया तथा यह कहा गया कि भारत में सहकारी कृषि में तेजी से विकास किया जाए।
कांग्रेस के 1959 जनवरी में नागपुर प्रस्ताव में यह कहा गया था कि गांव का संगठन पंचायतों एवं ग्राम सहकारों दोनों पर आधारित होना चाहिए। इन दोनों ही को अपने कार्य संपादित करने के पर्याप्त अधिकार और स्रोत मिलना चा. हिए। इस प्रस्ताव में यह कहा गया कि भविष्य में कृषि का स्वरूप सहकारी संयुक्त खेती होना चाहिए। इसके अन्तर्गत मिलजुलकर जोतने के लिए भूमि को इकट्ठा किया जाना चाहिए। किसानों के स्वामित्व के अधिकार बरकरार रहेंगे, और उन्हें अपनी जमीन के अनुपात में उत्पाद का हिस्सा मिलेगा। इसके अलावा, जो काम करेंगे, उन्हें संयुक्त फार्म में काम के अनुपात में हिस्सा मिलेगा।
रिपोर्ट में इस बात का अधिक जिक्र था कि तीन वर्षों के अन्दर देश में सहकारिता सेवा गठित की जानी चाहिए। यह चरण तीन वर्षों में पूरा किया जाना चाहिए। नागपुर प्रस्ताव में तीन वर्षों के अन्दर सहकारी कृषि के लवण को हासिल करने की बात कही गयी थी। संसद का अधिवेशन नागपुर प्रस्ताव के बाद हो गया। संसद के अधिवेशन में यह कहा गया कि सहकारी कृषि का विकास चीन की देखा देखी के तौर पर किया जा रहा है। यह अपने आप में वामपंथी के पीछे लगने की एक सूत्रीय पहल है। इसका भारी विरोध आरम्भ हो गया। कांग्रेस के प्रमुख नेताओं जैसे:- सी० राजगोपालाचारी, एन०जी० रंगा तथा चरण सिंह जैसे
अन्य ने इन कदमों का पार्टी के अन्दर और बाहर खुलकर विरोध किया। इनका भी आरोप था कि देश पर एकाधि कार वादी कम्युनिस्ट कार्यक्रम को थोपा जा रहा था। स्थिति ऐसी आ गयी कि पार्टी में विभाजन जैसी गंभीर समस्या को देखते हुए नेहरू ने सुलह की कोशिश की। उन्होंने फरवरी 1959 में संसद में यह कहा कि सहकारिता में ‘बलपूर्वक' जैसी कोई बात उचित नहीं है तथा दबाव बनाने की स्थिति को समर्थन करने वाली कोई विधि या एक्ट संसद के द्वारा सहकारिता के लिए नहीं बनाया जाएगा। नेहरू ने यह कहा कि मेरा व्यक्तिगत मत यह है कि सहकारी कृषि ऐच्छिक है तथा सही भी है तथा यह किसानों को समझाने की आवश्यकता है तथा उन पर दबाव डालने वाली कोई बात भी नहीं है।
1959 में तिब्बत के विवाद की स्थित को देखते हुए तथा दलाई लामा के निर्वासन के कारण चीन की कटूता तथा भारत के प्रति दुश्मनी की नीति ने भारत में चीन के प्रति तथा चीन की नीतियों के प्रति एक प्रकार का विरोध पनपने लगा तथा चीन के हरेक मॉडल को एक संदेह की नजर से देखा जाने लगा। कांग्रेस ने सारे देश में अगले तीन वर्षों में सेवाओं से संबंधित सहकारी संस्थाएं स्थापित करने का प्रस्ताव रखा । सहकारी फार्मों का विषय काफी हद तक अस्पष्ट छोड़ दिया गया। जहां कहीं अनुकूल परिस्थितियां हों, वहां स्वेच्छा से सहकारी फार्म स्थापित करने की बात की गई।
कांग्रेस को स्वयं पता था कि इन तीन वर्षों में सारे देश में सेवा सहकारी संस्थाएं स्थापित करना बहुत बड़ा काम था। कांग्रेस ने इस असंभव से दिखने वाले लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपने कार्यकर्ता को प्रशिक्षण देने की बात कही। ये प्रशिक्षिण कार्यकर्ता सेवा सहकारी संस्थाएं स्थापित करने में मुख्य भूमिका निभाने वाले थे। प्रादेशिक कांग्रेस समितियों को भी यही निर्देश दिया गया लेकिन प्रादेशिक समितियों ने इस निर्देश को पूरी तरह अनसुना कर दिया धीरे-धीरे इस योजना को ही छोड़ दिया गया।
तीसरी पंचवर्षीय योजना में सहकारिता के प्रति काफी विस्तृत रूप से ध्यान दिया गया। खेती के लिए प्रत्येक जिले में पायलट योजनाएं आरम्भ की गई। इसे सैद्धांतिक रूप से कृषि के विकास में एक अहम साधन माना गया तथा सही रूप से सामुदायिक विकास कार्यों, विक्रय वितरण और ग्रामीण उद्योग के विकास में भूमि सुधार की सफलता आवश्यक थी किंतु ये सभी एक विचार ही लगता था न कि कोई कार्य योजना ।
सहकारीकरण की कमियां :- सहकारी आंदोलन के उद्देश्यों को भारत में पूरा नहीं किया गया क्योंकि भूमि सुधार में. विभिन्न लक्ष्यों को पूरा अब तक नहीं किया गया था। यह 60 के दशक के अन्त की बात थी । इस समय दो प्रकार की सहकारी संस्थाएं थीं। एक इस प्रकार की थी जिसका मुख्य उद्देश्य भूमि सुधार से बचना तथा राज्य द्वारा दिए गए लाभ को उठाना था तथा इसका दूसरा उद्देश्य था प्रभावशाली जीमंदारों को बचाना। इसमें वे लोग शामिल थे जिनके पास बहुत पैसे थे तथा बहुत सारी जमीन थी। ये इस प्रकार की संस्थाओं में बोगस सदस्यों को प्रवेश करके रखते थे तथा इस तरह ये बोगस सदस्य खेतिहर मजदूर ही अधिक होते थे। इनको जमीन जोतने में इन प्रभावशाली जमींदारों के द्वारा लगाया जाता था, उनका मूल रूप से किराए के मजदूरों या काश्तकारों के रूप में ही इस्तेमाल होता था। इसके अलावा, इन सहकारी संस्थाओं को बनाने वालों को राज्य द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता में काफी लाभ होता था। यह सहायता सब्सिडी, खाद, बेहतर बीज की किस्में, यहां तक कि ट्रेक्टर जैसी आसानी से न मिल सकने वाली खेती की वस्तुओं की प्राथमिक स्तर पर सहायता के रूप में होती थी।
दूसरे प्रकार की पायलट परियोजना के तौर पर राज्य सरकारों के द्वारा सहकारी फार्म भी चलाए गए। इसमें आमतौर पर पहले से न इस्तेमाल की गई पतली भूमि को भूमिहीनों, दलितों तथा विस्थापितों को दिया गया। पतली जमीन, सिंचाई की उचित व्यवस्था न होने, सही रूप से प्रेरित तथा खेतिहरों द्वारा वास्तविक रूप में सहकारिता के रूप में चलाए जाने के बजाए सरकारी कार्यक्रमों के रूप में चलाए जाने से ये संस्थाएं महंगी और असफल साबित हो गयी। सहकारी खेती में जो अपेक्षित उत्पादकता वृद्धि और व्यापकता के लाभ होने चाहिए, वे इन फार्मों में नहीं थे। सहकारी सेवा समिति कृषि के विकास में पूरी तरह विफल थी । सहकारी खेती बहुत ही कम विकसित हो पाई, और सरकारी योजनाओं तथा बोगस सहकारों से आगे नहीं बढ़ा पाई सेवा सहकारी संस्थाएं कृषि सहकारों से थोड़ी बेहतार स्थिति में थीं। लेकिन उसमें बड़ी कमियां थीं। उनमें न सिर्फ असमानाताएं उपस्थिति थी, बल्कि उन असमानाओं को बढ़ाने की कोशिश भी हो रही थी। तब सहकारी संस्थाओं के बारे में कहा जाता था कि यह एक परिवार की भी बपौती होती थी। बाप अध्यक्ष, बेटा कोषाध्यक्ष, बेटी सचिव इत्यादि। ऐसे परिवार सिर्फ अपनी अथाह जमीन तथा संपत्ति को व्यापार तथा सूदखोरी के लिए इस्तेमाल करते थे। इस प्रकार ऐसे लोग सब्सिडी का प्रयोग कर रहे थे, जिनके लिए यह नहीं थी, और उसका प्रयोग निजी निवेश के लिए कर रहे थे। जहां कहीं समान उद्देश्यों वाले राजनीतिक संगठनों जैसे- कांग्रेस, वामपंथी दलों, समाजवादी तथा अन्य ने पंचायत स्तरों पर अपने राजनीतिक प्रभाव का उपयोग नहीं किया।
इन राजनीतिक दलों ने ग्रामीण स्तर पर सामुदायिक विकास कार्यक्रम को बढ़ावा नहीं दिया तथा दूसरे के प्रति अनुप तिस्थत चेतना रखी इसलिए पंचायत स्तर पर तथा ग्रामीण स्तर पर गांव के ही प्रभावशाली लोगों का नियंत्रण हो गया। तब इनका प्रयोग उन्होंने अपने आर्थिक एवं राजनीतिक हितों में किया।
आरम्भ के वर्षों में ग्रामीण गरीबों, भूमिहीनों को ऐसी संस्थाओं से बहुत बड़ा लाभ हुआ। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है कि रिसर्व बैंक ने 1954 में विस्तृत सलाह लागू करने से इनकार कर दिया। इसके अनुसार ग्रामीण सहकारी समितियां फसल के उत्पादक से कार्य दे, न कि भूमि के मालिक को। लेकिन सहकारी संस्थाओं ने फसल कर्जा या फसल होने की उम्मीद में कर्जा देने से इनकार कर दिया। उन्होंने वादे में भूमि जमानत के रूप में मांगी। इसका मतलब यह हुआ कि भूमिहीन को इस योजना से मौलिक रूप से अलग रखा गया। 1969 में रिजर्व बैंक ने नोट किया कि कान. नकार किसानों, खेतिहर मजदूरों तथा अन्य को बांटे गए कुल कर्जे में से केवल 4 से 6 प्रतिशत के बीच मिला। प्रसिद्ध इतिहासकार विपीन चन्द्रा कहते हैं कि “अखिल भारतीय ऋण शिक्षा समितिः 1969 की रिपोर्ट तथा कृषि संबंधी राष्ट्रीय कमिशन 1971 के अनुसार छोटे सीमांत किसानों के लिए ऋण सेवा संबंधी आंतरिक रिपोर्ट में भूमिहीन को इस प्रकार से पूरी तरह से अलग रखने की पुष्टि की। उनमें यह भी कहा गया कि छोटे एवं सीमांत किसान भी राष्ट्रीयकृत बैंकों एवं सहकारी संस्थाओं से कर्जा पाने में अलग रखे गए। "
सहकारी आंदोलन एक आंदोलन के रूप में न विकसित होकर एक विशाल सहकारी भवन बन गया। जिसमें अफसर, क्लर्क, इंस्पेक्टर आदि जैसे पद प्रखर, जिला, अनुमंडल और राज्य स्तरों पर निर्मित हो गए। ये सब एक विशाल आंदोलन के सिद्धांतों के साथ नहीं थे। उन पर अक्सर ही स्थानीय निहित स्वार्थों का दबाव रहता। ऐसे अफसरवादी सहकारों को विकसित करने का एरिया बनने के बजाए उसके रास्ते में बाधा बन गई। फिर भी कुल मिलाकर सेवा सहकारों खासकर ऋण सहकारों ने भारतीय कृषि में विशेष भूमिका अदा की।
1951-52 में जहां प्राथमिक कृषि ऋण समितियों ने जो ग्राम स्तरीय सहकारी समितियों के रूप में, 23 करोड़ का कर्जा दिया था 1960-61 में उन्होंने दो अरब रुपए कर्ज के दिए 1992-93 आते-आते यह आंकड़ा 49 अरब रुपये तक पहुंच गया। (आभार-विपीनचन्द्र)
परन्तु इन सबके बावजूद ग्रामीण भारत में सहकारी सेवा ने ग्रामीण भारत की तस्वीर को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी किसानों के अधिक व्यापक तबको को अधिक सस्ते कर्ज उपलब्ध कराने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी। इससे किसान न केवल बेहतर बीज, आधुनिक औजार, सस्ती खाद इत्यादि खरीद पाए बल्कि उन तक पहुंचने के रास्ते भी खुल गए। कई जगह यह देखा गया कि किसान अपना उत्पाद बाजार में बेच पाए । वास्तव में इन सबके कारण 60 के दशक के अंत में हरित क्रांति की सफलता के लिए अनुकूल स्थिति उत्पन्न हुई। यह क्रांति कृषि आधुनिक आवश्यक वस्तुओं के गठन प्रयोग पर आधारित थी। मई 1971 में विश्व बैंक के वार्षिक नोट में यह टिप्पणी की गई की इन सहकारी समिति से लाखों किसानों को फायदा पहुंचा है। उनके बिना ग्रामीण भारत की कल्पना नहीं की जा सकती।
2. दुग्ध उत्पादन में सहकारी सेवा की सफलता
सहकारी सेवा ने दुग्ध उत्पादन तथा सफेद क्रान्ति में अहम भूमिका निभायी है। सफेद क्रान्ति की शुरूआत गुजरात के खेड़ा जिले में हुई। इसके अलावा गुजरात के आनंद जिले में यह परवान चढ़कर देश के लिए एक उदाहरण बन गया। खेड़ा जिले के किसान अपना दुग्ध बम्बई आपूर्ति करते थे तथा उन्हें दुग्ध व्यवस्था रिपोर्ट के मनमानेपन का सामना करना पड़ता था। इन समस्याओं को लेकर किसानों से सरदार पटेल जी के मृत्यु के कुछ ही दिन पहले उनसे मिलकर अपनी समस्या बतायी तथा पटेल जी ने मोरारजी देसाई से इस बात पर चर्चा कर किसानों से इस मामले में एक यूनियन बनाने की सलाह दी। वे एक 'दूध हड़ताल' के जरिए बंबई सरकार पर दबाव डालने और उनकी यूनियन से सीधे दूध खरीदने पर मजबूर करने में सफल हुए। इस प्रकार, कैरा जिला सहकारी दूध उत्पादक संघ लि० का जन्म हुआ।
सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ लि० का पंजीयन दिसम्बर 1946 में हुआ और उसने आनंद नामक स्थान में एक साधारण सी शुरूआत की। अब किसान यहां प्रतिदिन 250 लीटर दूध आपूर्ति करने लगे। डॉ० वर्गीज कुरियन केरला के एक बहुत ही प्रतिभाशाली अभियंता थे। वे कैरा के किसानों के बीच काफी लोकप्रिय थे। वे 1950 से 1973 के बीच यूनियन के सी०ई०ओ० रहे तथा सफेद क्रान्ति के जनक बन गए। इस यूनियन का आरम्भ मात्र दो ग्राम सहकारी संस्थाओं से हुआ था जिनसे प्रत्येक में से 100 सदस्य से भी कम सदस्य थे। 1995 में आते-आते संस्थाओं की संख्या 954 को गई और कुल सदस्यता 5,37,000 दूध का कारोबार 250 लीटर प्रतिदिन से बढ़कर 10 लाख लीटर प्रतिदिन हो गया। संस्थाओं का वार्षिक कारोबार 3 अरब 44 करोड़ तक आ गया। यूनियन की गतिविधियों में बहुत बड़ी तेजी आयी। 1955 में उसने दूध पाउडर तथा मक्खन बनाने की फैक्ट्री लगाई। इसका एक कारण यह था कि मौसम में दूध अधिक होने से यह बेचा नहीं जा सकता था। 1955 में ही संघ ने अपने प्रोडक्ट के नामकरण के बारे में सोचा तथा इसका नाम 'अमूल' कर दिया। यह अमूल विश्व का सबसे शुद्धतम दुग्ध ब्राण्ड बन गया तथा घरेलू तौर पर अमूल को दूध का पर्याय माना जाने लगा। अमूल के अलावा इस यूनियन ने ग्रामीण स्तर पर सभी महिलाओं को शिक्षित तथा प्रशिक्षित करने में अपनी ऊर्जा लगाने की सोची। आनन्द 'इन्स्टीट्यूट ऑफ स्टाफ मैनेजमेंट' की स्थापना की गई तथा इसका उद्देश्य ग्रामीण विकास के लिए प्रशिक्षत समूहों का उपयोग करना बन गया।
1974 में आनन्द में गुजराज सहकारी दुग्ध व्यापार संघ लि० की स्थापना की गई जो जिले में सहकारों के उत्पाद बेचने के लिए सबसे गुणी संस्था थी। इस सहकारी प्रयास के कारण कैरा जिले की ग्रामीण आबादी का जीवन स्तर काफी सुधर गया तथा गरीब तथा भूमिहीन किसानों की भी स्थिति ठीक हो गई। एक अध्ययन के अनुसार सहकारों की गतिविधियों के कारण हाल के वर्षों में कैरा जिले के ग्रामीण परिवारों की आय का करीब 48 प्रतिशत डेयरी उद्योग से आने लगा। सहकारों की आय का कुछ भाग गांव से सामाजिक आर्थिक विकास के लिए अभी तक लगाया जाता है।
आनन्द मॉडल की विभिन्न विशेषताओं में इनके लोकतांत्रिक पद्धति के साथ प्रत्यक्ष उत्पादन तथा नियोजन की पद्धति के साथ प्रत्यक्ष उत्पादन तथा नियोजन की पद्धति भी शामिल रही। सभी दूध उत्पादक सेंटर में लाइन लगाकर अपना दूध दे आते थे तथा उनके खाते में पैसा देना आरम्भ किया गया। इसमें किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं किया गया। सरकार ने आनन्द मॉडल से सीख लेते हुए 'राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड' का निर्माण किया। यह निर्माण 1965 में किया गया। वर्गीज कुरियन की क्षमता से यह साबित हो गया था कि वे अपनी योग्यता से इसमें क्रांति ला सकते हैं।
तत्कालीन लाल बहादुरशास्त्री सरकार ने वर्गीज कुरियन को 'राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड' का अध्यक्ष बनाया। कुरियन बिना वेतन के इसकी अध्यक्षता को तैयार हो गए। कुरियन ने इस डेयरी विकास बोर्ड का मुख्यालय 'आनंद' में स्थापित करने का आग्रह की।
डेयरी विकास संघ की स्थापना से भारत में दुग्ध उत्पादन के मामले में बड़ी क्रान्ति आयी। यह कहा जा सकता है कि गरीब किसानों तथा पशुपालकों का एक बड़ा सहारा निकल गया तथा अपनी स्थिति को वह आर्थिक रूप से सुधार सके। आज भारत में दुग्ध उत्पादन विश्व में सबसे अधिक है।
सहकारिता ने भारत में मिला-जुला प्रभाव छोड़ा है परन्तु आज 60-70 दशक के बाद इसमें एक नयी शुरूआत को देखा जा सकता है। यह तय समय में पूरा न होने की स्थिति को दर्शाता है पर ग्रामीण भारत को बदलने में इसका अहम योगदान रहा है।
हरित क्रान्ति (Green Revolution)
आजादी के बाद हरित क्रान्ति के बारे में यही कहा जाता है कि भारत की गरीब जनता को अन्न का दाना मुहैया कराने में तथा भारत को खाद्य के मामले में आत्म-निर्भर बनाने की प्रतिबद्धता में इस क्रान्ति ने महान योगदान दिया है। हरित क्रान्ति की सफलता के पीछे सबसे अहम कारक है, महत्वपूर्ण कृषि तकनीकी सुधार जिनसे कृषि को एक नयी दिशा मिलने की स्थिति उत्पन्न हो गई। कृषि के विकास के स्वरूप, विभिन्न कृषि वर्गों की स्थिति, खासतौर पर गरीबों और सरकार के वर्गीय संतुलन जैसे मुद्दों पर तीव्र चर्चाएं हुई। परिणामस्वरूप कृषि में एक महान परिवर्तन हुआ तथा भारत अनाज के मामले में आत्म निर्भर हो गया।
वैसे तो जब योजना आयोग की स्थापना 1950 को हुई तो सबको लगा कि प्रथम पंचवर्षीय योजना में कृषि का विकास एक महत्वपूर्ण लक्ष्य होगा और ऐसा हुआ भी तथा यह कहने में कोई हिचक नहीं कि कृषि का लक्ष्य रखा गया तथा खेती पर योजनाओं का 30 से 31 प्रतिशत तक खर्च किया जिसमें सिंचाई भी शामिल था।
नेहरू ने आधुनिक कृषि तथा विभिन्न कृषि अनुसंधान प्रयोगशालाएं खोलने पर जोर दिया। तथा इनके विचार में कृषि का वैज्ञानिक विकास बहुत आवश्यक था पर उस समय सबसे अधिक आवश्यक भूमि सुधार था। नेहरू ने खेती के तकनीकी विकास पर और भी अधिक जोर देना आरम्भ कर दिया। नेहरू जी की दूरदृष्टि ने गहन कृषि जिला कार्यक्रम की शुरूआत की तथा प्रत्येक राज्य में एक जिले के हिसाब से 15 ऐसे जिले चुने जो एक नए कृषि कार्यक्रम के लिए प्राकृतिक दृष्टि से अनुकूल थे।
1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद बहुत सारी वैज्ञानिक तकनीकों की खोज की गई ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई जिसने नवोन्मुखी कृषि रणनीति को सही आकार देना प्रारम्भ कर दिया। स्वतंत्रता के बाद 10 सालों तक कृषि में विकास चलता रहा था। 60 के दशक में खाद्यान की सख्त कमी हुई क्योंकि आबादी बढ़ी तथा कृषि का विकास रुक गया। भारतीय कृषि पर बोझ बढ़ने लगा तथा भोजन की मांग बढ़ने लगी जिसे भारतीय बाजार पूरा नहीं कर पाता था। 50 के दशक के मध्य में खाद्यान के दामों को भी बढ़ता देखा जाने लगा। अब भारतीय जरूरतें पूरी करने के लिए खाद्यान का आयात करने की बात की गई तथा अमेरिका के साथ चर 480 जैसे दुर्भाग्यपूर्ण समझौते करने पड़े। 1956 में गेहूं का आयात आरम्भ किया गया। पहले ही वर्ष इस योजना के तहत करीब 30 लाख टन खाद्यान आयात आरम्भ किए गए तथा आयात की मात्रा बढ़ती चली गई। और 1963 में वह 45 लाख टन तक पहुंच गयी।
इन्हीं सब स्थितियों में चीन (1962) और पाकिस्तान (1965) के साथ दो युद्ध लड़ने पड़े। साथ ही 1965-66 में लगातार दो बार अकाल पड़ा। अकाल का दुर्भाग्यपूर्ण प्रभाव कृषि पर पड़ा । उत्पादन में 17 प्रतिशत तथा खाद्यान उत्पादन में 20 प्रतिशत की कमी हुई। खाद्यानों की कीमतें बढ़ने लगी। 1966 में भारत को लगभग 1 करोड़ टन से अधिक खाद्यान आयात कम पड़ा। इन्हीं परिस्थितियों में जब देश के विभिन्न भागों खासकर बिहार एवं यू०पी० में अकाल की परिस्थितियां पैदा हो रही थी। अमेरिका ने भारत को खाद्यान के निर्यात पर रोक लगाने की धमकी दी।
अमेरिका को गुमान हो गया कि खाद्यान के मामलों को लेकर भारत को अपनी उंगली पर नचाया जा सकता है। ऐसे में भारत सरकार ने कृषि विकास को नवोन्मुखी तरीके से करने की सोची जिनसे कृषि के मामले में खाद्यान रूप से भारत आत्म निर्भर हो सके।
लाल बहादुरशास्त्री जी के महान नेतृत्व में नयी कृषि नीति बनाने की प्रभावी कोशिश की तथा खाद्य मंत्री सी० सुब्रमण्यम ने अच्छी फसल की किस्मों के बीज, रसायनिक खाद और कीटनाशक दवाएं, सुविधाएं तथा कृषि शिक्षा कार्यक्रम को जोर देकर इसके लिए प्रयास करना आरम्भ किया। 3 करोड़ 20 लाख एकड़ जमीन अर्थात् कुल जोती गई जमीन का 10 प्रतिशत इस प्रकार से कार्यक्रम लागू करने के लिए आरम्भ की गई।
1965 में कृषि मूल्य आयोग की स्थापना की गई। इसकी कोशिश यह रही कि किसान के लिए निरंतर उत्पादक मूल्य के जरिए बाजार की गारंटी दी जाए। कृषि के क्षेत्र में एकल पूंजी बढ़ने लगी तथा इसमें संस्थागत निवेशक का विश्वास भी बढ़ा तथा किसानों द्वारा निजी निवेश के मुनाफे की क्षमता बढ़ गई । सिंचाई के क्षेत्र में वृद्धि दिखाई देने लगी तथा यह 25 लाख टन हेक्टेयर प्रति वर्ष तक जा पहुंची।
इस नये प्रयास ने भारतीय कृषि की स्थिति को बढ़ा डाला। 1967-68 तथा 1970-71 के बीच खाद्यानों का उत्पादन 35 प्रतिशत बढ़ गया। इसके अतिरिक्त 1964-65 तथा 1971-72 के बीच कुल अनाज उत्पादन 8 करोड़ 90 लाख टन से बढ़कर 11 करोड़ 20 लाख टन हो गया। यह वृद्धि लगभग 10 प्रतिशत की थी। वास्तविक अनाज आयात में भी गुणात्मक रूप में से कमी आ गई, जहां यह 1966 में एक करोड़ तीस लाख टन था वहीं 1970 में यह 36 लाख टन पर आ गया। इस अवधि में अनाज की उपलब्धि 7 करोड़ 35 लाख से बढ़कर 9 करोड़ 95 लाख टन हो गई। यह अनुमान लगाया गया है कि खाद्यान के मामले में भारत एक भिक्षुक के बदले एक दानी देश बन गया।
खाद्यान की उपलब्धि तेजी से बढ़ती चली गयी और वह 1978 में 11 करोड़ 2 लाख 50 हजार टन तथा 1984 में 12 करोड़ 88 लाख टन हो गई। भारत 1987 और 1998 में आए अकालों का सामना मजबूती से किया तथा बिना किसी भेदभाव के विदेशों में सहायता भी पहुंचायी।
हरित क्रांति ने भारत की स्थिति बदल दी। 1967-68 तथा 1989-90 के बीच कृषि उत्पादन के करीब 80 प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि हुई। यह वृद्धि 2.5 प्रतिशत प्रति वर्ष थी। खेती के क्षेत्रफल में मात्र 0.26 प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई। और वह सिर्फ 20 प्रतिशत विकास के लिए जिम्मेदार था । वास्तव में लाभ के वर्षों में करीब-करीब सभी उत्पादन वृद्धि उतनी ही जमीन पर खेती में वृद्धि के कारण हुई है. और खेती में काम करने वाली जमीन का क्षेत्रफल ज्यो का त्यो बना हुआ है, यहां तक कि कम भी हुआ है।
हरित क्रांति ने कृषि में विकास के साथ अधिशेष उत्पादन को बाजार में विक्रय योग्य भी बनाया तथा इसमें बहुत वृद्धि की। इस पहलू पर पर्याप्त ध्यान बाद में दिया गया। क्योंकि इसका प्रभाव सबसे अधिक पंजाब जैसे प्रांत में ही हुआ। यहां पर उत्पादन में वृद्धि प्रति एकड़ जमीन पर हुई न कि अधिक जमीन पर खेती करने से। इससे उत्पादन की प्रति इकाई बीज के लिए अनाज की आवश्यकता में कमी आई।
हरित क्रांति के फलस्वरूप बेचे जाने वाले अधिक खाद्यान के कारण सरकार अधिक अनाज खरीदकर भंडारण करने लगी तथा औद्योगिक विकास, शहरीकरण, बढ़ती आबादी और खाद्यान की कमी वाले क्षेत्रों की आवश्यकता को अब पूरी करने के लिए पूरी तरह तैयार थी। अब भारत ने चस्ख480 जैसे आयात को समाप्त कर दिया तथा एक ऐसा देश बन गया जो अपने आप में खाद्यान के उत्पादन के मामले में महान साबित होने लगा।
1965-73 के बीच हरित क्रांति मुख्यतः पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच फैली यहां गेहूं के उत्पादन का रिकॉर्ड बनने लगा तथा पंजाब में बहुत अधिक खाद्यान उत्पादन में वृद्धि हुई। 1970-73 से 1980-83 के दूसरे चरण में उच्च उत्पादन वाले बीजों की तकनीक के सहारे गेहूं की जगह धान के उत्पादन पर जोर दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि हरित क्रांति देश के अन्य भागों में तटीय क्षेत्रों, तमिलनाडु इत्यादि में पहुंच गई। अब पश्चिमी राज्यों में महाराष्ट्र, गुजरात तथा आंध्र प्रदेश जैसे तटीय राज्यों में विकास दर की रफ्तार बहुत आगे बढ़ गई।
1980-83 तथा 1992-95 के बीच का समय हरित क्रांति का सबसे बड़ा तकनीकी चरण रहा। इस चरण में हरित क्रांति भारत के सबसे गरीब राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार जैसे राज्यों में फैल गयी। पश्चिम बंगाल में 5.39 प्रतिशत प्रति वर्ष कृषि विकास दर की स्थिति आयी तथा धान सफल रूप में पैदावारी की स्थिति में पहुंच गयी। अब इस स्थिति में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला जब मध्य प्रदेश तथा राजस्थान जैसे राज्यों में गेहूं तथा तेलहन की फसलें होने लगीं। तीसरे चरण में विभिन्न राज्यों के बीच उत्पादन विकास स्तरों एवं प्रति हेक्टेयर उत्पादन के बीच अंतरों का गुणात्मक पिछले दशकों की तुलना में काफी कम था। इस दौर में सारे देश के पैमाने पर कृषि उत्पादन की वृद्धि तेज हो गई तथा 3.4 प्रतिशत प्रतिवर्ष के गंभीर आंकड़ों तक पहुंच गया।
हरित क्रांति के शुरूआती चरण में यह देखने को मिला कि ग्रामीण स्तर पर जमीनदारों की स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत होने लगी तथा इस मजबूती का आधार ग्रामीण खेतिहर मजदूरों का खून-पसीना था। इससे वर्ग विभेद में बढ़ोत्तरी हुई तथा जमींदारों के लोभ बढ़ने से मजदूरों का पलायन होने लगा क्योंकि अब खेती तकनीकि तौर पर अधिक मजबूत हो गयी। हरित क्रांति ने यह वर्ग विभेद कर आंशिक तौर पर नक्सलवाद की ओर भी बढ़ने को मजबूर कर दिया।
लेकिन सरकार ने विभिन्न सामाजिक आर्थिक कार्यक्रम को लाकर गरीबी कम करने की कोशिश की पर नक्सलवाद को प्रसारित होने से रोकना संभव नहीं लग रहा था। हरित क्रांति में खामियां नहीं थी परन्तु अभी भूमि सुधार को सौ प्रतिशत सफल नहीं माना जा सकता था परन्तु किसानों को इस क्रांति ने भूमिहीन होने से भी बचाया। तथा फसलों की पैदावार से इनकी आर्थिक स्थिति जीवन-यापन योग्य होती रही।
सिर्फ काश्तकार और बटाईदार ही घाटे में रहे जिन्हें सुरक्षा नहीं मिली। भू-किराया और भूमि का मूल्य हरित क्रांति के इलाकों में बढ़ने के साथ इन तबकों पर दबाव बढ़ने लगा। साथ ही इन क्षेत्रों में जमीन के मालिक भाड़े के मजदूरों को रखकर ही खेती कराने लगे।
देश के विभिन्न राज्यों में हरित क्रांन्ति का सबसे बड़ा आर्थिक प्रभाव यह रहा कि इसने खेती में रोजगार तथा शहरी रोजगार उत्पन्न किए हैं। इनके द्वारा कृषि उद्योगों, व्यापार, कृषि उत्पादों का भंडारण, खाद, कीटनाशक दवाओं, इत्यादि के उत्पादन, यातायात उद्योग में विकास, खेती के औजारों एवं इको टैक्टरों, बिजली और डीजल पंखों तथा अन्य प्रकार के सामानों, मशीनों इत्यादि में विकास की स्थिति पैदा की।
इस उपरोक्त विकास से और हरित क्रांति के प्रभाव से शहरी औद्योगिकीकरण की रफ्तार तेज हुई तथा ग्रामीण आय में वृद्धि हुई। इसके साथ छोटे शहरों में मिस्त्रियों, बढ़ईयों, दर्जियों, बुनकरों इत्यादि की मांग बढ़ गई। इसके अलावा फैक. टूरी में होने वाले उत्पादन तथा उपभोक्ता सामग्री जैसे:- पंखों, टी०वी०, वाशिंग मशीन, सिलाई मशीन, घड़ियां, साइकिलों इत्यादि की मांग बहुत बढ़ने लगी। इनमें से कुछ वस्तुओं की मांग शहरों से अधिक गांव में होने लगी। पंजाब में ग्रामीण स्तर पर रोजगार में भारी वृद्धि हुई।
हरित क्रांति ने अवश्य ही ग्रामीण क्षेत्रों में असमानता बढ़ा दी। लेकिन गरीबों को भी लाभ ही पहुंचा। पंजाब तथा हरियाणा में कहीं अधिक छोटे किसानों एवं भूमिहीन खेतिहर मजदूरों समेत गरीबों को लाभ भी पहुंचा है। हरित क्रांति के प्रसार के साथ-साथ खेतिहर मजदूरों का वास्तविक वेतन भी इस क्षेत्र में बढ़ा। इन राज्यों में बिहार तथा उत्तर प्रदेश से आए मजदूरों के कारण विकास के साथ थोड़ा बोझ भी बढ़ा । इसे हरित क्रांति में 'श्रम के प्रवास' के तौर पर जाना गया। संक्षेप में कहा जा सकता है कि हरित क्रांति का ग्रामीण गरीबी पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। इन प्रभावों में खाद्यानों की अधिक उपलब्धि भोजन की तुलनात्मक कीमतों में कमी, कृषि तथा गैर कृषि रोजगार उत्पन्न करने, वेतनों में वृद्धि, इत्यादि के लाभ दीख पड़ता है।
भारतीय आबादी की बहुसहायक जनता दो तिहाई से भी अधिक खेती पर निर्भर है। ऐसी स्थिति में गरीबी विरोधी कदम के रूप में हरित क्रांति किस्म के विकास का महत्व विस्तारित तौर पर स्वीकार किया गया है। इसी कारण हाल के वर्षों में सिंचाई तथा अन्य मूल योजनाओं में सार्वजनिक निवेश में कमी की आलोचना की गई है, क्योंकि वह तेज कृषि विकास के लिए आवश्यक है। परन्तु 2014 के बाद सिंचाई परियोजनाओं में सरकारी खर्च में अधिकता बढ़ी है। व्यापक रूप से देखें तो हरित क्रांति का प्रभाव हमेशा से रहा है। सरकार ने अपनी नीतियों में क्रांति को बढ़ाने की कोशिश की है पर कभी-कभी विभिन्न राजनीति ढांचे में को चुनाव जीतने के लिए मुक्त बिजली परोसने की आदत तथा बिना सोचे समझे कर्ज का माफी का विरोध नकारात्मक रूप से सरकारी खजाने पर बोझ डालता है। हाल के सालों में पर्यावरण और कृषि विकास को बनाए रखने में समस्याएं आई हैं। रसायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों की स्थिति इनती खराब को गई है कि पंजाब में मिट्टी की उर्वरता एक दम कम हो गई है। नवोन्मुख तकनीक तथा एक तरफा विकास की कमी से कहीं-न-कहीं कृषि के विकास में रुकावट आयी है। तकनीकी विकास प्रयोगजनित कृषि ने किसानों को भयावह स्थिति का सामना करने की ओर बढ़ाया है।
सरकार ने जैव उर्वरकों तथा जैव तकनीकी की खोज को कृषि के विकास में योगदान की सबसे महत्वपूर्ण विधि माना है। जैव तकनीक के प्रयोग तथा समावेशी विकास तथा सतत विकास की सोच ने दूसरी हरित क्रांति की इच्छा जता दी है जो आने वाली पीढ़ी के लिए महान उपयोगी होगा।
सरकार ने कृषि के विकास तथा सिंचाई की विधि में बहुत बड़ा निवेश किया है तथा 2014 के बाद सिंचाई प. रियोजना की विभिन्न फाइलों को खोलकर उन पर कार्य आरम्भ कर दिया है। अगर सही रूप से जैव उर्वरक तकनीक तथा सिंचाई की सुविधा नवोन्मुख तरीके से हो तो कृषि का विकास बृहत स्तर पर हो सकता है। जो पर्यावरण तथा आने वाली पीढ़ी के लिए भी उपयोगी होगा।
3. स्वतंत्रता के बाद कृषिगत आंदोलन
स्वतंत्रता के बाद विभिन्न प्रकार के किसान आंदोलन की चर्चा देखने को मिलती है। जो निम्न रूप से वर्णित है:
1. तेलंगाना किसान आंदोलन
2. पेप्सू काश्तकार आंदोलन
3. नक्सलपंथी या माओवादी आंदोलन
4. बिहार में खाडवाड़ आंदोलन
5. महाराष्ट्र में भीलों का आंदोलन
6. काश्तकार संघटन द्वारा वर्ली संघर्ष
7. पटियाला मुजारा आंदोलन
8. माया किसान आंदोलन
मध्य प्रदेश और बिहार में 1957-58 में खाड़वाड आदिवासी आंदोलन, महाराष्ट्र के धुलिया में 1967-75 का भीलों का आंदोलन, 1978 में मार्क्सवादी जेसुइट प्रदीप प्रभु के नेतृत्व में काश्तकार संघटना द्वारा चलाया गया। वर्ली संघर्ष इत्यादि । सब की उतनी लोकप्रिय नहीं रही पर तेलंगाना, पेप्सू तथा नक्सलपंथी आंदोलन बहुत अधिक चर्चा में रहा ।
भारती कम्यूनिस्ट पार्टी ने 1968 में मोगा में प्रथम राष्ट्रीय स्तर का खेत मजदूर संगठन, भारतीय खेत मजदूर यूनियन स्थापित किया। तंजोर में स्थापित काश्तकारी आंदोलन तथा केरल के और भागों में तथा देश के और भागों में काश्तकारों के आंदोलन ने अपना ध्यान खींचा। हम यहां बहुत ही लोकप्रिय तथा चर्चित आंदोलन की चर्चा करेंगे। इन आंदोलनों की चर्चा विभिन्न मुद्दों तथा अलग-अलग समय पर अभी भी की जाती है।
4. तेलंगाना किसान संघर्ष
हैदराबाद राज्य में निजाम के शासन तथा राज्य के कांग्रेसी, तेलुगु भाषा-भाषी तथा आंध्र प्रदेश के आंध्र भाषा सभा जैसे महान राष्ट्रवादी संगठनों के बीच 1930 के आस-पास तथा 1940 के समय राजनीतिक तौर पर मतभेद उभर रहे थे। देखा जाए तो 1940 के समय इस क्षेत्र में वामपंथी दल महत्वपूर्ण शक्ति यहां बन गए थे। जब अंग्रेजों ने 1942 में सी०पी०आई० पर लगी पाबंदी को युद्ध समर्थक नीति के कारण हटा लिया तो उन्होंने अपना प्रभाव तेजी से फैलाया और आंध्र महासभा पर अपना नियंत्रण कायम किया। तेलंगाना के किसानों को भागीदारों और देश मुखों के हाथों चरम सामंती किस्म के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा था। इनमें से कुछ जागीदार तो हजारों एकड़ के स्वामी हुआ करते थे। वामपंथी ने सरकार द्वारा लादी गई घृणित और अनाज लेवी तथा बेठ बेगारी या जमींदारों एवं अफसरों द्वारा जबर्दस्ती मजदूरी की व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष आरम्भ किया। कई ऐसी घटनाएं घटी जिनमें वामपंथियों ने गरीब किसानों की रक्षा की। परिण म स्वरूप 1945 से किसान आंदोलन तेजी से फैलने लगा।
हैदराबाद का निजाम उन कुछ ही शसकों में से था जिन्होंने आजादी के बाद भारतीय संघ में शामिल होने से इनकार कर दिया। वह पाकिस्तान और कुछ ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा प्रोत्साहित होकर अपनी भूमि तथा राज्य को भारत से अलग रखने की फिराक में था।
वामपंथी दलों ने सरकार द्वारा लादी गई घृणित और एकतरफा अनाज लगान तथा बंधुआ बेगार मजदूरी से तंग आकर संघर्ष आरम्भ कर दिया। यह संघर्ष वामपंथी दलों की तरफ से प्रोत्साहित था । फलस्वरूप 1945 से किसान आंदोलन तेजी से फैलने लगा।
इधर निजाम की कलुषित मानसिकता से तंग आकर किसानों ने अपनी क्षमता से तथा कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ता के द्व रा अलग-अलग आंदोलन प्रारम्भ कर दिया। कांग्रेस ने राज्य में हैदराबाद के एकीकरण के लिए आंदोलन प्रारम्भ कर दिया। महाराष्ट्र के साथ हैदराबाद की सीमाओं, समुद्री तटवर्ती क्षेत्रों इत्यादि में कैंप स्थापित किए गए। मुस्लिम मिलीशिया के हथियारबंद दस्तों से लड़ने वालों के लिए हथियार भेजे जाने लगे। ये दस्ते हिन्दू जनसंख्या पर हमले करते थे। वामपंथियों ने निजाम विरोधी और एकीकरण के समर्थन में चल रहे आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया।
अगस्त 1947 से सितंबर, 1948 के इसी दौर में जब वे निजाम-विरोधी और भारत समर्थक आंदोलन में भाग ले रहे थे। कम्यूनिस्टों को सबसे अधिक सफला मिली। इन वामपंथियों ने वारंगल, खमम तथा नालगोंडा जिलों में बहुत अधिक जनलोकप्रियता हासिल कर ली। जो जमींदार तथा भू-स्वामी थे उनमें से अधिकत शहर में जाकर बसने लगे। वामपंथियों ने किसानों की विभिन्न सभाओं की स्थापना की तथा विभिन्न छापामार दस्ते तथा 'दलम' बनाए तथा रक्षाकार केम्पों पर हमला करके गांवों की रक्षा की। इनके पास हमले करने के लिए अधिकतर लाठियां, गुलेल तथा पत्थर और कभी-कभी देसी कट्टा भी होता था। इन छापामार दस्तों ने लगभग 300 से ऊपर से गांवों को अपने अधिकार में कर लिया था। उन्हें इसे एक रास्ता बनाकर भूमि संबंधों को पुनर्गठित करने की कोशिश की। 1930 के आस-पस भू-स्वामियों तथा जमींदारों ने कई जमीन को हड़प लिया था। ये जमीने उनके असली मालिकों को लौटा दी गई। सरकार के स्वामित्व वाली बंजर और जंगल की जमीनें भूमिहीनों को बांट दी गई, खेतिहर मजदूरों के वेतन बढ़ाए गए।
जमींदारों की जमीनों पर हदबंदी आरम्भ की गई। पहले तो 500 एकड़ की फिर 100 एकड़ की और फाजिल जमीन भूमिहीनों तथा गरीब किसानों के बीच बांटी गई। अब जनता के सामने भू-स्वामी द्वारा जमीन कब्जा की गई जमीन को वापस लेने का लक्ष्य सबसे अधिक था। इसके अलावा पंजा जमीन तथा परती जमीन को सरकार को सुपुर्द करने की भी स्थिति पैदा करने की कोशिश हुई।
किसानों ने अपनी कब्जा की हुई जमीन को वापस लेने के लिए काफी प्रयास किए यहां तक कि उस जमीन को भी जो बंजर थी। किसानों की इच्छा थी कि अवसर को देखते हुए जमीन को वापस लिया जाए चाहे जो जोत योग्य हो या नहीं। सही स्तर पर आंदोलन समाप्त होने के बाद किसान अधिकतर इन जमीनों को ले गए लेकिन अतिरिक्त जमीनों को नहीं।'
13 दिसम्बर 1958 को हैदराबाद में सेना में प्रवेश किया तथा लोगों ने सेना का एक मुक्ति सेना के तौर पर स्वागत किया। निजाम की सेना ने कुछ ही दिनों के अंदर आत्म समर्पण कर दिया। इसके बाद फौजों का ग्रामीण स्तर पर फैलाव हो गया। ये फौजें रजाकरों को खत्म करने लगीं। किसानों ने भी फौजों का उत्साहवर्द्धक स्वागत किया। लेकिन इस बीच कम्युनिस्टों ने सशस्त्र संघर्ष जारी रखने का फैसला किया। उन्होंने अपने छापमार दस्ते खत्म नहीं किए। अपनी समझ के अनुसार उन्होंने साम्राज्यवाद समर्थक पूंजीवादी भू-स्वामी नेहरू सरकार के खिलाफ मुक्ति युद्ध चलाने का फैसला किया। इस नीति पर चलते हुए 'दलम' या छापामार के सदस्यों को जंगल में छिपकर भारतीय फौजों पर उसी तरह हमले का आदेश दिया गया जैसा कि वे रजाकरों पर किया करते थे।
कृषि एवं भू-सुधार (भाग-II) वामपंथी दलों ने इस पर अधिक नहीं सोचा कि भारतीय फौज एक अधिक ही तैयार फौज थी। जिसमें वह उत्साह था जो मध्ययुगीन हथियारों वाले घृणित रजाकरों में नहीं था । फलस्वरूप, एक अनावश्यक युद्ध आरम्भ हो गया। इसका परिणाम बहुत बुरा हुआ। इसके कारण फौजों ने कुछ ही महीनों में गांवों में कार्यकर्ता को निकाल बाहर किया। लेकिन इसके दौरान हजारों आम किसानों को बड़े कस्बे का सामना करना पड़ा। जंगलों में छिपे वामपंथी कार्यकर्ता वहां के आदिवासियों के बीच नया जनाधार बनाने की कोशिशें करते रहे, लेकिन इसमें उन्हें निरंतर कमतर सफलता मिलती गई। औपचारिक रूप से आंदोलन 1951 में ही वापस ले लिया गया। यह पार्टी के अंदर अंतहीन बहसों और वामपंथी के द्व रा रूस से बात-चीत के बाद हुआ। तब तक जंगलों में बहुत कम ही साथी बचे रह गए थे। कई जा चुके थे, शायद 500 के आस-पास और करीब 10,000 जेलों में बंद थे।
सरकार ने आंदोलन के कारणों पर ध्यान दिया तथा 1949 ही जागीरदारी उन्मूलन तैयार किया गया। 1950 में हैदारा. बाद काश्तकारी और कृषि भूमि एक्ट पास किया गया। 6 लाख से भी अधिक काश्तकारों को संरक्षित काश्तकार घोषित किया गया। उन्हें आसान शर्तों पर जमीन खरीदने का अधिकार प्रदान किया गया। काश्तकारों की यह संख्या कुल जोते जाने वाली जमीन के एक चौथाई पर खेती पर रही थी। 50 के दशक पर भूमि हदबंदी लागू की गई। भू-स्वामी अपनी आदत से बाज़ नहीं आए तथा अपनी जमीनें कम दामों पर बेच दी। ये आंदोलन निजाम विरोधी आंदोलन से किया गया। यह रास्ता वामपंथी और राष्ट्रवादी दोनों के लिए मिला जुला रहा। किसानों की मांग तथा वामपंथी ने साथ माना ये दोनों कभी भी गलत प्रभाव डालने के लिए प्रयासरत नहीं हुए।
पटियाला मुजारा आंदोलन
पटियाला में मुजारा काश्तकार आंदोलन चल रहा था। पटियाला पंजाब का एक रजवाड़ा था। पर अपने जुल्मी महाराज के लिए प्रसिद्ध रजवाड़ा था। यहां एक आंदोलन 1939 में आरम्भ हुआ तथा 1945 में इसने मुजारा और विस्वेदारों के बीच खुले टकराव का रूप ले लिया। राज्य सिर्फ बटाई और व्यक्तियों पर हमले संबंधी केस दर्ज किया करता। कई जगहों पर सशस्त्र झगड़े हुए। ये झगड़े कहीं कस्बे को लेकर कहीं बटाई को लेकर होते रहे । प्रजा- मंडल ने वृषमान के प्रभाव में महाराज विरोधी जनतंत्रिक आंदोलन का नेतृत्व किया। वृषमान कम्युनिस्टों एवं काश्तकारों के हमदर्द थे। प्रजा-मंगल को कांग्रेस का समर्थन मिलने से काश्तकारों को काम मिला।
आजादी हुई तथा पटियाला भारत में आ गया। लेकिन एक लोकतंत्रिक सरकार बनाने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। महाराजा सभी राजनीतिक दलों से अलग-थलग पड़ गए। उन्होंने मुजारों का दमन आरम्भ कर दिया। दिल्ली तक शिकायत पहुंची। गृहयुद्ध जैसी स्थिति बन गई। हथियारबंद स्वयं सेवक दल का निर्माण 1948 में तोजा सिंह के नेतृत्व में किया गया। यह दल पंजाब में वामपंथी से अलग था।
इस प्रकार 1948 के अंत तक हथियार बंद लोगों का दस्ता तैयार हो गया। इसकी ड्यूटी थी मुजारा की मदद करना जिन्हें विस्वेदारों और उनके संगठित दस्तों के लिए खतरा रहता था। 1951 में कांग्रेस के मंत्रिमंडल बनने के बाद सभी कुछ बदल गया। कृषि संबंधी सुझाव देने के लिए एक जांच समिति बनायी गयी। तथा कम्यूनिटों का संघर्ष चलता रहा। या कोई अभाव वाली बात अब नहीं रही।
5. नक्सली आंदोलन
1967 में पश्चिम बंगाल में गैर-कांग्रेसी सरकार आ गयी। इससे सी.पी.एम. सी. पी. आइ. + बंगला कांग्रेस आ गयी। इस सरकार ने भूमि सुधार को लागू करने का प्रण लिया। हरे कृष्ण कोणार नामक नेता ने भूमिहीनों को भूमि बांटने की बात की तथा किसानों को इसके लिए लाभबंद करने की कोशिश की। इससे गरीब किसानों की इच्छा जाग गई तथा छोटे तथा मध्यम जमींदार डर गए।
भूमि के मामलों में अधिकतर कानूनी झगड़े थे। सरकार में आए लोग इसे अच्छी तरह जानते थे। विपक्ष में रहने के बाद जो स्थिति थी वो सत्ता में आने के बाद बदल सी गयी। असलियत को लोग नहीं समझता चाहते थे क्या इसमें सबसे जिद्दी नक्सलवादी ग्रुप के लोग थे।
ये ग्रुप पांचवे दशक से ही दार्जिलिंग के नक्सलवादी में बटाईदारों और चाय बगानों के मजदूरों को संगठित करते आ रहे थे। ये लोग अधिकतर संथालो, औराओं तथा राजवंशी समुदाय के थे। ये जोतदार हाल तथा बीज अपराध कराते थे तथा बदले में फसलों में इनको हिस्सा मिलता था। हिस्सों के बारे में विवाद होता था तथा यह कई बार होता था। चाय बागान के मजदूर अक्सर ही चाय बागान के मालिकों के धान की खेती या काश्तकारों के रूप में काम किया करते थे।
इन जमीनों को हदबंदी से बचाने के लिए चाय बगानों के रूप में दर्ज किया जाता था। 'चरण मजूमदार' इस क्षेत्र के महत्वपूर्ण नेता थे। इनका विचार मार्क्सवादी था। वे कानूनी तरीके से भूमि सुधार लागू करने पर विश्वास नहीं करते थे। वह कहते थे कि ऐसा रास्ता किसानों को पीछे कर देगा।
मजूमदार ने कहा कि हथियार के बल पर जमीन हासिल करो। 1967 तक गांव-गांव संगठित हो गया था। जल्दी ही हजारों कार्यकर्ता तैयार हो गए। उन्होंने जमीन पर कब्जा कर लिया तथा घृणित भू-स्वामियों को फांसी पर लटका दिया। भूमि संबंधी रिकॉर्ड जला दिए तथा कर्ज माफ कर दिए। नकसल बाड़ी पुलिस थाने के अन्तर्गत घाटी गिया, साड़ी बाड़ी थाने के तहत बुटागंज और फांसी देवा पुलिस थाने के तहत चौपुखुलिया विद्रोहियों के केन्द्र बन गए।
सी०पी०एम० इसका समर्थन नहीं कार सकता था क्योंकि वह सत्ता में था। बाद में चलकर इसकी विचार धारा से जुड़े लोगों कम्यूनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी लेनिनवादी) की स्थापना की। नक्सलवादी रूप में शहरों तक तत्कालीन रूप से समिति हो गया।
नए किसान आंदोलन
स्थान- नासिक
वर्ष 1980
नेता - शरद जोशी
मुद्दे - व्यास और ईख खेती के अधिक दाम की मांग की गयी। शरद जोशी ने भारत बनाम इंडिया का नाम दिया तथा शहरी औद्योगिक कृषि का भारत का भी नारा दिया। इस आंदोलन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेता महेन्द्र सिंह टिकैत भी जुड़ गए। टिकैत ने उत्तर प्रदेश में इसी तरह का आंदोलन चलाया।
तमिलनाडु में विवसईगल कर्नाटक में राज्य रापड् संघ, पंजाब में यूनियन, गुजरात में खेडुत ने ऐसे ही आंदोलन चलाए। इस आंदोलन का आधार था कीमतों का बढ़ना तथा किसानों की साहुलियत । कृषि उत्पाद के कीमतों की कमी को इस नेता ने एक बड़ा मुद्दा बनाया तथा नए किसानों के आंदोलन ने मीडिया और राजनीतिज्ञों का काफी ध्यान आकर्षित किया। वैसे किसान हरित क्रांति के बाद हुए उत्पादों को कीमतों के मामलों में सही स्तर देने की मांग करते रहे। 1980 के दशक से उत्पाद की सही कीमत के लिए सरकार पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है। इन आंदोलनों को नया कहा गया तथा इसमें पर्यावरण तथा महिलाओं की समस्या को भी जोड़ दिया गया।
ऐसा नहीं है कि एकदम नया आंदोलन था पर मांग की स्थिति तथा किसानों की भी परिस्थितियों में ये एक नये रूप में आया। ये आंदोलन किसी भी राजनीतिक पार्टी से संबंधित नहीं थे। इनमें जितने भी संगठन थे, कोई भी किसी राजनीतिक पार्टी से संबंधित नहीं था। सही तौर पर हम देखें तो समय के साथ ये राजनीति के साथ जुड़ते चले गए।
टिकैत जहां राजनीतिक रूप से पहले कांग्रेस विरोधी थे पर जोशी के वी.पी. सिंह के नजदीक आने के बाद वह कांग्रेस के विरोधी हो गये तथा भाजपा के समर्थन राम मंदिर के लिए देने लगे। धीरे-धीरे जोशी और टिकैत का रास्ता अलग-अलग हो गया। जोशी जहां कृषि में उदारीकरण के भक्त हो गए वहीं टिकैत पारम्परिक कृषि की स्थिति को आगे बढ़ाने की बात करते रहे। उपरोक्त आंदोलन ने किसानों के दिल छू लिए पर सही रूप में विभाजन के शिकार हो गए।
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Sun, 01 Oct 2023 07:55:14 +0530 Jaankari Rakho
कृषि एवं भू&सुधार (भाग&I) https://m.jaankarirakho.com/402 https://m.jaankarirakho.com/402 कृषि एवं भू-सुधार (भाग-I)
1. स्वतंत्रता के बाद कृषि तथा भूमि सुधार (किसानों की स्थिति तथा चुनौतियां)
आजादी मिलने के बाद सरकार के सामने जो सबसे बड़ा प्रश्न था वो किसान तथा कृषि संबंधित मुद्दों को हल करना था। भारत आरम्भ से ही कृषि प्रधान देश रहा था तथा जब अंग्रेजों ने हस्तशिल्प तथा भारत की ग्रामीण औद्योगिक श्रृंखला को नष्ट कर दिया तो भारत की खेती पर बोझ बढ़ गया तथा कृषि की स्थिति बहुत की खराब हो गयी। जो व्यक्ति हस्त शिल्प उद्योग तथा कुटीर उद्योग में काम करते थे, वह भी अब कृषि पर निर्भर हो गए तथा आजादी के बाद सरकार के सामने इन बढ़े हुए बोझ को संतुलित करने के लिए कृषि में सुधार की आवश्यकता महसूस हुई।
सरकार ने कृषि की भूमिका को आमजन के जीवन में बढ़ाने के लिए न्याय के साथ कृषि के विकास की योजना बनायी जिसमें भूमि सुधार को सबसे महत्वपूर्ण माना गया तथा सरकार ने 'भूमि सुधार' को दो चरणों के लिए विकसित करने की योजना बनायी।
भूमि सुधार का पहला चरण आजादी के तुरंत बाद आरम्भ होकर 1960 तक चला जिसकी विभिन्न विशेषताएं थीं। जिसमें प्रमुख हैं
1. जमींदार, भागीदार की समाप्ति तथा बिचौलियों की समाप्ति।
2. " काश्तकारी - सुधार अधिनियम जिनमें काश्तकारों को जोत की सुरक्षा प्रदान की गई भूमि कर कम किया गया और काश्तकारी के स्वामित्व के अधिकार प्रदान किये गए।
3. भूमि के मामलों में हदबंदी आरम्भ की गयी तथा इसे नियमित करने की शुरूआत हुई। 
4. सहकारी और सामुदायिक विकास कार्यक्रम।
इस दौर को संस्थागत सुधारों का दौर भी कहा गया है। पहले चरण में सिर्फ संस्थागत सुधारों को ही मजबूत करने की कोशिश की गई। तथा कृषि के मामलों में भूमि सुधार की प्रक्रिया को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश भर हुई। 
दूसरे चरण को 1966 के आस-पास की शुरूआत माना जा सकता है। यह चरण हरित क्रांति तथा तकनीकि की सुधारों से संबंधित रहा है।
यदि इन दोनों चरणों को एक साथ देखे तो हमें यह यह समझ लेना जरूरी है कि इन चरणों में काफी समानताएं हैं। इनकी पुनरावृत्ति आवश्यक रूप में नहीं वरण् प्राकृतिक रूप से हुई है पर कई सुधारों को हम इन दो चरणों से जोड़कर देख सकते हैं।
हमें आजादी के बाद उन सुधारों को क्रमवार देखने की आवश्यकता है जिन्होंने सीढ़ी बनकर कृषि व्यवस्था को भारत में एक अनुशासित व्यवस्था तथा सामाजिक आर्थिक रूप से संतुलन का केन्द्र बनाया।
जमींदारी उन्मूलन
स्वतंत्रता के बाद यानी 1949 में जमींदारी उन्मूलन की विशेषताओं में विभिन्न कार्य किए गए। इनके लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जमींदारी उन्मूलन विधेयक तथा साथ में ही भूमि काश्तकारी कानून कई प्रदेशों में बनाए गए। जैसे:- मध्य प्रदेश, मद्रास, बंबई, उत्तर प्रदेश, असम, बिहार इत्यादि ।
उत्तर प्रदेश में जी.बी. पंत की अध्यक्षता में जमींदारी उन्मूलन समिति बनायी गयी जिसने एक उदाहरण का कार्य किया तथा इन समिति की रिपोर्ट को आधार मानकर कई प्रदेशों ने अपनी जमींदारी उन्मूलन नीति को कागजी रूप प्रदान किया। संविधान की बैठकों में इस बात पर सरदार पटेल ने चिंता जाहिर की कि जमींदार अपनी संपत्ति बचाने के लिए आंदोलन करेंगे तथा मुआवजे की मांग करेंगे। इसी बात को ध्यान में रखकर संविधान में आवश्यक प्रावधान किए गए तथा विभिन्न विधान सभाओं ने भी इस बिल को तय मुआवजे के साथ पेश तथा पास करवाने की उम्मीद दिखायी। जमींदारी उन्मूलन प्रक्रियाओं को सर्वसम्पति न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में बाहर रखा गया। जमींदारों को दी जाने वाली मुआवजे की रकम को सर्वसम्मति से पास किया गया तथा इसे वाणिज्यिक तथा औद्योगिक संपत्ति से दूर रखा गया । औद्योगिक तथा वाणिज्यिक संपत्ति के अधिग्रहण की विशेषताओं को अधिग्रहण के मामलों में अगले भाग में अलग तरीके से रखने पर विचार किया गया।
जितना आसान इन सभी बातों को समझा जा रहा था, यह उतनी आसान बात नहीं थी। देश के विभिन्न हिस्सों की जमींदारी के पैरोंकार तथा जमींदारों ने इन जमींदारी उन्मूलन को अवैध माना तथा पटना हाई कोर्ट ने इसे नयी आवाज दी। जमींदारी उन्मूलन के खिलाफ अपील की सुनवाई के लिए पटना उच्च न्यायालय तैयार हो गया। कांग्रेस सरकार इस मुद्दे को न्यायालय से दूर रखना चाहती थी, इसलिए सरकार ने इन मामलों में प्रथम संशोधन पेश किया तथा 1951 में प्रथम संविधान संशोधन तथा 1955 में चौथा संविधान संशोधन पेश किया। इन संशोधनों का उद्देश्य जमींदारी उन्मूलन लागू करने के लिए राज्य विधायिकाओं के हाथ मजबूत करना, और मूलभूत अधिकारों एवं मुआवजों के प्रश्नों को अदालतों की परिधि से बाहर रखना था।
इसके बाद बाद जमींदार हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील करते रहे। इनका उद्देश्य कम-से-कम अपनी संपत्ति के अधिग्रहण में बाधा उत्पन्न करना था तथा चाहत थी कि अधिग्रहण में देरी हो। इसके समर्थन में कोई नहीं आया तथा जनतंत्र में राजनीतिक तंग के ढांचे को मजबूत करने के लिए सभी धड़ में भूमि सुधार के समर्थन में लहर थी ।
1956 में जमींदारी उन्मूलन एक्ट अधिकतर राज्यों में पास हो चुका था लेकिन उन्हें लागू करने में एक बड़ी दिक्कत भूमि संबंधी पर्याप्त रिकार्डों का अभाव था। फिर भी, 1956 तक अंग्रेजी राज के जमाने के बिचौलियों, तथा जमीदारों का उन्मूलन करना जा चुका था।
इसका आधार स्वतंत्रता संघर्ष के तौर पर देखा जा सकता है। जब जमींदारों को एक तरफ कर दिया गया क्योंकि स्वतंत्रता संघर्ष जमींदारों को साम्राज्यवादी समूह का माना जाता था। इन जमींदारों को एक सामाजिक खलनायक के रूप में देखा जाता था तथा इसे एक महान विरोध बार-बार झेलना पड़ता था।
जमींदारी उन्मूलन का मतलब था कि करीब दो करोड़ काश्तकारों का भू-स्वामी बनना व काश्त परिवारों की संख्या और उनके तहत क्षेत्र संबंधी आंकड़ों पर निश्चित भरोसा नहीं किया जा सकता था। क्योंकि कई क्षेत्र में बटाई देने का काम मौखिक तौर पर होता था और इसलिए उनके कोई रिकॉर्ड नहीं है।
काश्तकारी का क्षेत्र 1950-51 में 42 प्रतिशत से घटकर 1960-70 के बीच 20-25 प्रतिशत तक रह गया। लेकिन काश्तकारी या बटाईदारी से कमी और स्वयं खेती करने में बढ़ोत्तरी सिर्फ काश्तकारों के भू-स्वामी बनने का नतीजा नहीं था, बल्कि वर्तमान काश्तकारों को भूस्वामियों द्वारा बेदखल करने का भी नतीजा था ।
वास्तव में जमींदारों को दिया गया मुआवजा आम तौर पर कम था। इनमें अलगाव अधिक था। कहीं किसी क्षेत्र में अधिक था तो किसी क्षेत्र में कम था। यह किसान आंदोलन की शक्ति और भू-स्वामियों एवं किसानों के बीच वर्ग संतुलन पर निर्भर था। साथ ही, यह कांग्रेस नेतृत्व तथा विधायिका की विचारधारा के चरित्र पर भी निर्भर था।
कश्मीर जैसे राज्य में कोई मुआवजा नहीं दिया। पंजाब में पटियाला के दखल करने वाले काश्तकारों को कुछ भी नहीं मिला। छोटे काश्तकारों को कुछ भी नहीं मिला। छोटे काश्तकारों को दी भी गई तो कम राशि दी गई। अकसर कई वर्षों में अदा की जाने वाली प्रथम किश्त दी। अधिकतर राज्यों में यू.पी. के नमूने के विभिन्न प्रकार अपनाए गए। उत्तर प्रदेश में मुआवजे की राशि आकार के विपरीत अनुपात में दी गयी। छोटे जमींदारों को अकसर खाते-पीते किसानों से अलग करना मुश्किल था। भूमि सुधारों को लागू नहीं किया गया। ऐसे भू-स्वामियों को जो 25 रुपये तक का भूमि शुल्क देते थे, मुआवजे के रूप में अपनी वास्तविक वार्षिक आय के 20 गुणा मिलना दूसरी ओर 2000 से 10,000 रु. तक भू-राजस्व अदा करने वाले बड़े जमींदारों को अपनी वास्तविक वार्षिक आय का मात्र दो में चार गुणा ही मुआवजा मिला। इसके अलावा, मुआवजा काफी लम्बी अवधि के लिए मिलना था, कभी-कभी तो 40 वर्षों के दौरान। एक अध्ययन के अनुसार बड़े जमींदारों को मिलने वाला मुआवजा उनके पहले की आय का मात्र चालीसवां हिस्सा था।
6 अरब 70 करोड़ रुपये के कुल बकाया में से 1961 तक मात्र 1 अरब 64 करोड़ बीस लाख रुपये ही दिए गए। यह एक छोटा आंकड़ा था। तुलना के लिए एक हिसाब के अनुसार, भारत ने 1946-53 में सिर्फ अनाज आयात में 10 अरब खर्च किए गए।
जमींदारी उन्मूलन के नकारात्मक पक्ष को हम देखें तो इसमें कानून के तौर पर बहुत ही खामियां थीं। जहां उत्तर प्रदेश में जमींदारों को वे जमीने अपने पास रखने की इजाजत दे दी गई जिन्हें उन्होंने अपनी व्यक्तिगत खेती घोषित कर दिया था। इसमें कोई भी जमींदार अपनी जगह बना सकता था। इसमें किसी प्रकार की समानता लाने तथा संतुलन बिठाने की कोई बात ही नहीं थी। इसके आलावा उत्तर प्रदेश, बिहार और मद्रास जैसे राज्यों में व्यक्तिगत खेती की कोई सीमा नहीं थी। यह सीमा तब बनी जब हदबंदी कानून पेश किए गए। दूसरी ओर कांग्रेस की कृषि सुधार समिति जो कुमारप्पा समिति भी कहलाती थी उसने अपनी रिपोर्ट में व्यक्तिगत खेती की परिभाषा कुछ और ही दी थी जो कम-से-कम कुछ शारीरिक तौर पर खेत में काम करते हैं तथा वास्तविक कृषि प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं। साथ ही समिति ने या तगत प्रयोग में शामिल की जाने वाली भूमि की सीमा बांध दी थी । वह सीमा किसी भी हालत में काश्तकार के लिए न्यूनतम आर्थिक सीमा से नीचे नहीं होनी चाहिए।
इसका परिणाम हुआ कि वास्तव में वे जमींदार भी जो अनुपस्थित भू-स्वामी थे, अब बड़ी जमीनों के मालिक बन सकते थे। कई इलाकों में जमींदार अपनी व्यक्तिगत जोत को अधिक से अधिक बड़ा दिखाने के लिए काश्तकारों खासकर छोटे काश्तकारों को बड़े पैमाने पर बेदखल करने लगे। इसके बाद हदबंदी और काश्तकारी कानूनों के लागू होने पर बेदखली के और दौर चले। इससे कुल मिलाकर भारत में भूमि सुधारों पर लगाम लग गयी।
फिर कई तौर पर कई जमींदारों ने अपनी खेती को व्यक्तिगत खेती के तौर पर बनाए रखा, वहां भी नियमित रूप से उन्होंने उसमें निवेश किया और अपने क्षेत्रों में पूंजीवादी खेती की ओर अग्रसर हुए। यह भूमि सुधारों के उद्देश्यों में से एक था। ‘व्यक्तिगत जोत' का तरीका जमींदारी उन्मूलन से बचने के कई तरीकों में एक मार्ग था। वैसे इससे बचने के कई तरीके और भी थे। जब विधान सभाओं में पेश किया गया तो जमींदार अपनी शक्ति का प्रयोग कर इसे लागू होने पर रोकते थे। प्रवर समिति को भोजन चर्चा में लम्बे समय से खींचना तथा कानूनी रूप से अढ़चन डालना जैसे कदमों से इसे पास करने में कितने समय बर्बाद हो गए तथा वर्षों तक इंतजार होता रहा।
जब कानून पास भी हो गया तथा जमींदारों ने न्यायालय की शरण लेनी शुरू कर दी। जमींदार सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गए। बिहार जैसे राज्य में जमींदारों ने सबसे अधिक विरोध किया। दो बार सर्वोच्च न्यायालय से हार के बाद भी उन्होंने कानून पर अमल रोकने की कोशिश की। अब जमींदारों ने अपना रिकॉर्ड देने से इनकार कर दिया। फलस्वरूप सरकार को अधिक विलंब करना पड़ा तथा नया रिकॉर्ड फिर से तैयार करना पड़ा। सबसे अधिक दिक्कत स्थानीय स्तर पर हुई। राजस्व अधिकारी और जमींदारों के बीच जो सांठ-गांठ थी, वह सबसे अधिक समस्या पैदा कर रही थी।
भू - स्वामियों ने वैधानिक रूप से तथा न्यायिक रूप से हरेक स्तर पर विरोध किया तथा इस कानून को न लागू करने के लिए कई प्रयास किए |
1951-52 के चुनाव घोषणा पत्र में कांग्रेस ने जमींदारी उन्मूलन को अपना लक्ष्य बनाया था। 1954 में कांग्रेस के सभी मुख्यामंत्रियों को यह कहा गया था कि जमींदारी उन्मूलन को प्राथमिकता देकर काम करने की कोशिश की जाए। कांग्रेस को इसे लागू करना मजबूरी थी क्योंकि अब लोकतांत्रिक पद्धति में वयस्क मताधिकार आ गया था। मताधिकार में आम आदमी का वोट सबसे अधिक था तथा जमींदारों की स्थिति पूरी तरह पतन की ओर हो गई थी।
कांग्रेस ने जमींदारी उन्मूलन का काम किया तथा इनके लिए संवैधानिक संशोधन भी करवाया । कांग्रेस ने 1951 तथा 1955 में संवैधानिक संशोधन कार भू-स्वामियों तथा आम आदमी के बीच संतुलन कायम करने की भी कोशिश की। कांग्रेस की सरकार ने 1951-60 बीच जमींदारों के प्रतिरोध के बावजूद जमींदारी उन्मूलन के लक्ष्य को अधिकतर जगहों पर पूरा किया तथा इसमें संतुलन कायम कर सकने की कोशिश की। बिहार को छोड़कर यह उन्मूलन बहुत जगह पूरा हो गया था। 1960 तक देखा जाए तो सामंतवाद समाप्त हो गया। बड़े भू-स्वामियों को भारी - हानि उठानी पड़ी। बड़े भू-स्वामी अब अपनी जमीन खो बैठे।
जमींदारी उन्मूलन का सबसे अधिक लाभ काश्तकारों का हुआ जिन्हें लंबे काल से जमींदारों से सीधी जमीन मिली थी। वे अब अपनी जमीन के मालिक हो गए। ये ऐसे काश्तकार थे जो बटाई पर दी हुई जमीन जोतते थे। इनके पास कम अधिकार थे। ऐसे छोटे काश्तकारों के साथ मौखिक समझौते ही होते थे जो जमींदारों की इच्छा पर ही निर्भर थे । अब काश्तकार स्वतंत्र हो गए।
काश्तकारी सुधार
जमींदारी उन्मूलन के बाद भी जमींदारी क्षेत्रों में मौखिक और बिना रिकॉर्ड वाले काश्तकारी के मुद्दे बने रहे। इस प्रकार की काश्तकारी उन भूतपूर्व जमींदारों की जमीन पर जारी रही जिनकी जमीनें अब व्यक्तिगत खेती की श्रेणी में बताई जाने लगी। साथ ही यह उन भूतपूर्व लंबे समय से अवस्थित काश्तकारों की जमीनों पर लगातार जारी रही जो अपनी जमीनें बटाई पर लगाने लगे।
इसके अलावा स्वतंत्रता के समय सिर्फ आधी भूमि ही जमींदारी व्यवस्था के तहत थी। बाकी जो आधी जमीन बची थी वह रैयतवारी के अन्तर्गत थी। जहां भू स्वामि की समस्याएं, असुरक्षा, भारी लगान वाली काश्तकारी इत्यादि समस्याएं अत्यंत व्यापक थीं।
इसलिए भूमि सुधारों का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य था- 'काश्तकारी कानून' का निर्माण। लेकिन सबसे बड़ी समस्या थी विभिन्न राज्यों में अलग-अलग कानून तथा लागू करने की परिस्थिति में भारी अंतर। फिर भी उनमें कुछ समान उद्देश्य थे और समय के साथ आम तौर पर उनके बीच से एक मिलती-जुलती रूप रेखा उभरी। इन्हीं मिलती-जुलती रूप रेखा की विशेषता को आगे रखकर यह कार्य किया गया।
2. काश्तकारी सुधार की विशेषताएं
1. उन काश्तकारों के लिए काश्तकारी की गारंटी देना जिन्होंने 6 वर्ष से अधिक उस पर खेती की हो। 
2. काश्तकारों द्वारा दिए गए लगान को एक उचित स्तर पर लाना जो कुल उत्पादन के 1/4 से 1/6 के बीच था। 
3. काश्तकार को उसके द्वारा जोती गई जमीन के स्वामित्व का अधिकार मिलना। लेकिन इसमें कुछ सीमाएं थी। जिसमें लगान अदा करना तथा बाजार भाव की स्थिति से उसे तारतम्य स्थापित करना ।
काश्तकारों की स्थिति सुधारने की कोशिश से भारत के काश्तकारी कानूनों ने आम तौर पर भू-स्वामी खासकर छोटे भू-स्वामी और काश्तकार के हितों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयत्न किया। भारत के अधिकतर हिस्सों में अनुप स्थित भू-स्वामियों द्वारा किए व्यक्तिगत खेती का काम आरम्भ करने की स्वीकृति दी गई। साथ में काश्तकारों को जोती जा रही जमीन का अधिकार भी दिया गया। यह व्यवस्था हदबंदियों और स्तरों के विभिन्न संतुलनों की जटिल प्रणाली के जरिए काम कर रही थी।
जमीन पर अनुपस्थित भू-स्वामी का अधिकार फिर से स्थापित करने की सीमा तय की गई। यह प्रश्न बड़े भू-स्वा. मियों से संबंधित था। प्रत्येक राज्य द्वारा तय की गई एक विशेष सीमा से अधिक फिर खेती आरंभ नहीं की जा सकती थी। प्रथम योजना से पारिवारिक भू-संपत्ति की तीन गुना की सीमा तय की गई। पारिवारिक भू-संपत्ति का अर्थ एक हाथ द्वारा जोती जाने वाली भूमि तथा पाया गया फिर भी खेती प्रारंभ करके भू-स्वामी काश्तकार से सारी जमीन वापस नहीं ले सकता था। केरल, उड़ीसा, गुजराज हिमालय प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं तमिलनाडु में काश्तकार के लिए उसे दी गई जमीन का कम-से-कम आधा छोड़ा जाना चाहिए था। बिहार जैसे कुछ राज्यों में काश्तकरी की जोत का आधा या कम से कम 5 एकड़ इनमें से जो भी कम हो । प० बंगाल में 2ऋ एकड़ सीमा थी।
इसके विपरीत, छोटे भूस्वामियों हक में यह निर्णय लिया गया कि भू-स्वामी की सारी जर्म नहीं ली जानी चाहिए और काश्तकार की जमीन प्रत्येक राज्य द्वारा तय हदबंदी से अधिक नहीं होनी चाहिए।
दूसरी पंचवर्षीय योजना में यह कहा गया कि "छोटे किसानों की आर्थिक परिस्थितियां काश्तकारों से इतनी अलग नहीं है कि काश्तकारी कानून उन्हें हानि पहुंचाए। इसलिए इस योजना में यह कहा गया कि बहुत छोटे भू-स्वामी अपनी भारी जमीन पर फिर से खुद खेती कर सकते थे। लेकिन काश्तकारी कानूनों का वास्तविक अमल कहीं अधिक जटिल था। "
तीसरी योजना में यह भी कहा गया कि बड़े भू-स्वामी ने अपनी जमीने संबंधियों एवं अन्य लोगों के नाम लिख दी। जिससे वे छोटे भू-स्वामी कहलाएं। फिर उन्होंने छोटे मालिकों के लिए बनाए गए कानूनों का प्रयोग इन जमीनों से काश्तकारों को बेदखल करने के लिए किया।
विपीन चन्द्रा काश्तकारी सुधार के मामलों में लिखते हैं कि "बेदखली के विरोध में कानूनी संरक्षण मिलने से पहले ही काश्तकारों को बड़े पैमाने पर बेदखल किया जाने लगा। उदाहरण के लिए, भूभि सुधार संबंधी योजना। कमिशन के पैमाना ने 1956 में नोट किया कि 1948 तथा 1951 के बीच संरक्षित काश्तक की संख्या बताई राज्य में 17 लाख से हटकर 13 लाख हो गई अर्थात 23 प्रतिशत की गिरावट आई । हैदराबाद संबंधी एक और विस्तृत अध्ययन में पाया गया कि 1951 में संरक्षण पाए प्रत्येक 100 काश्तकारों में 1954 में मात्र 45.4 प्रतिशत ही अपनी स्थिति बनाए रख पाए। 12.4 प्रतिशत भूमि अधिग्रहण के अधिकार का प्रयोग करके भू-स्वामी बन गए। 2.6 प्रतिशत को कानूनी तरीके से बेदखल किये गये तथा 22.1 प्रतिशत को गैर कानूनी तरीके से बेदखल किया गया और 17.5 प्रतिशत ने जमीन पर अपना अधिकार स्वयं ही छोड़ दिया। लेकिन यह स्वयं ही छोड़ने की बात वास्तव में धमकी देकर निकाल बाहर करने के एक आवरण मात्र था।
यह तरीका इतना व्यापक हो गया कि चौथी योजना में यह कहना पड़ा कि सारी बची जमीनें सरकार को ही सौपी जाए, तो फिर उचित व्यक्तियों को इसका बंटवारा करेगी। कुछ ही राज्यों ने इसे माना। " काश्तकारी कानून की विफलता के बाद लगभग 67.8 प्रतिशत काश्तकार अब सुरक्षित थे। कई जगह तो काश्तकारी चुपचाप तौर पर चलती रही। भूमि सुधार के समय में काश्तकारों को बटाईदार में बदल दिया जाता था। लेकिन यह सही है कि बटाईदरों को काश्तकार नहीं माना जाता था। इसलिए कुछ राज्यों में काश्तकारी कानून के तहत उन्हें कोई सुरक्षा नहीं मिलती।
यह बात साफ कर देना आवश्यक है कि अब पैसे के रूप में लगान देने वालों को ही काश्तकार माना जाता था और अनाज में लगान देने वालों को काश्तकार का दर्जा नहीं दिया जाता था। बटाईदार को भी काश्तकार नहीं माना जाता था। काश्तकारों की असुरक्षा का सबसे बड़ा कारण अधिकतर काश्तकारी का मौखिक एवं अनौपचारिक होना था। काश्तकारी के बारे में कोई रिकॉर्ड लिखित तौर पर नहीं था। अब कानून के बाद भी इन्हें कोई लाभ नहीं मिलता दिखा।
1971 में जब जनसंख्या जनगणना की रिपोर्ट आयी उसमें यह पाया गया कि उपज की जमीन का 91.6 प्रतिशत मालिकों को जोत के तहत है। बिहार में यह तो 99.6 प्रतिशत के आस-पास था जो अन्य सभी राज्यों के मुकाबले कहीं अधिक था। बिहार में तो रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि मात्र 0.22 प्रतिशत खेती बटाईदार लायक है तथा कुल जोती जाने वाली जमीन का मात्र 0.17 प्रतिशत है। 1961 की जनगणना में यह आंकड़ा 36.65 बताया जा रहा था। 1961 और 1971 की जनगणनाओं के बीच कोई अधिक काश्तकारियों का रिकॉर्ड नहीं किया जाना इसी का कारण बइ गई। इसका परिण शाम यह हुआ कि काश्तकार असुरक्षित ही रह गए। 1961 के जनगणना के अनुसार देश की 82 प्रतिशत काश्तकारियां असुरक्षित रह गई थी |
उचित रिकॉर्ड का न होना यू०पी० में जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार एक्ट के आरंभिक वर्षों में अनाज में कमी बड़ी बाधा साबित हुई तत्कालीन राजस्व मंत्री चौधरी चरण सिंह ने इसके लिए बड़ा कदम उठाया। बाद के वर्षों में कुछ क्षेत्रों में ऐसे अभियान वामपंथियों की पहल पर चलाए गए। इसके कारण सभी तरह के काश्तकारों को बहुत लाभ हुए। इसके उदाहरण केरल और पश्चिम बंगाल में भी मिलते हैं। केरल में झोपड़पट्टी में रहने वालों को पट्टा देने का व्यापक अभियान चलाया गया। यह अभियान काफी सक्षम रहा। इसमें किसान संगठन काफी सक्रिय रहे।
पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार ने 1977 के जून में जब आया तो बरगा अभियान चलाया गया। जिसे 'ऑपरेशन बरगा' कहा गया। एक विशेष अवधि के अंदर अंदर बरगादारों का पंजीयन करना जिससे कि वे अपने कानूनी अधिकार प्राप्त कर सकें।
ये अधिकार थे–स्थायी जोत तथा उसके उत्तराधिकार का अधिकार और भू-स्वामी तथा बटाईदार के बीच फसल का 1:3 का बंटवारा। पश्चिम बंगाल में अनुमानित 24 लाख बरगादरों में से जून 1978 तक सिर्फ 4 लाख रिकॉर्ड किए गए थे। लेकिन बरगा अभियान के रिकॉर्ड किए गए बरगादार की संख्या अक्तूबर 1979 में 7 लाख से बढ़कर नवम्बर, 1990 में करीब 14 लाख हो गई।
केरल की तरह पश्चिम बंगाल में बरगा अभियान का एक और महत्वपूर्ण पहलू ग्रामीण क्षेत्र की अभावग्रस्त जनता को इसके समर्थन में लाना था। इनमें खास स्तर पर बदगादार शामिल थे, जिन्हें इससे फायदा पहुंचा था। सुधारों की प्रक्रिया में उनका समर्थन विशेष तौर पर लिया गया। इसके सुधारों में बाधा पहुंचाने वालों, खास तौर से पटवारियों जैसे निन्म-स्तरीय राजस्व विभागीय अधिकारियों पर लगाम लगाने में हर संभव मदद मिली। पश्चिम बंगाल में गरीबों को अधिक जागरुक तथा राजस्व अधिकारियों की सोच में परिवर्तन के लिए अच्छा तरीका अपनाया। उसने बरगा अभियान के दौरान प्रशिक्षण कैंप लगाए जिनमें 30 से 40 खेतिहर मजदूर और बरगादार तथा 10-15 भूमि सुधार एवं अन्य विभागों के अधिकारी भाग लेते। वे सभी सुदूर ग्रामीण इलाकों में एक साथ एक ही जगह रहते, खाते पीते थे, विचार-विमर्शकरते थे। इनसे इन दोनों समूहों के बीच समन्वय बन गया।
आरम्भ में इस अभियान के परिणाम में बहुत बड़े स्तर पर बरगादारों को रिकॉर्ड किया गया। और उन्हें उसी प्रकार सुरक्षा मिली। लेकिन यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। 50 प्रतिशत के ऊपर काम होने पर यह प्रक्रिया रुक गई। इसके पीछे बहुत बड़े कारण थे। एक इसे आगे जारी रखना राजनैतिक रूप से हानिकारक और नैतिक रूप से असमर्थनीय पाया गया। यह तब हुआ जब भू स्वामी अपने अधिकार को लेकर सामने आने लगे। इन भू-स्वामी को भी उत्पाद का एक मात्र एक चौथाई मिलता था बाकी हिस्सा बरगादारों को देना पड़ता था।
“ पश्चिम बंगाल में देखा गया कि सामान्य रूप से छोटे खेतिहरों की संख्या बड़े स्तर पर थी। जिनके पास 5 एकड़ से भी कम जमीन थी। ऐसी स्थिति में बंटवारे संबंधी आगे कदम उठाना कठिन था।" 'वर्ग दुश्मन' छोटी जोतों के समुद्र में विलीन हो गया। यहां भी वही दुविधा थी जो भारत के अन्य भागों में थी, अर्थात् छोटे मालिकों और काश्तकारों के हितों के बीच संतुलन बनाए रखना। जैसा कि हम कह चुके हैं, काश्तकारी कानून में आम तौर पर कम पहलू का ध्यान रखा गया है और उसी अनुसार कानून में प्रावधान किए गए हैं। (विपीन चन्द्रा के अनुसार)
पश्चिम बंगाल में कुछ और समस्याएं थीं। जैसे- भूमि व्यक्ति कर अनुपात । बंगाल में यह समस्या ऐसे रूप में थी जिसमें भू-स्वामी एक ही जमीन के हिस्से को एक से अधिक बरगादारों को बारी-बारी से बटाई पर देता था। इस प्रकार काश्तकारी अधिकारों के एक से अधिक दावेदार होते थे। एक को पंजीकृत करता तो दूसरा बाहर हो जाता। इसके अलावा ऐसी स्थिति में यदि सारे बरगादार को पंजीकृत किया जाता तो प्रति खेतिहर जोत का आकार अनुत्पादक हो सकता था। इन कारणों से बरगा अभियान की राजनीतिक एवं आर्थिक सीमाएं थीं। वस्तुगत परिस्थितियां जोतने वालों को जमीनें देने या हर जोतदार को पूर्ण सुरक्षा देने के पूरी तरह अनुसार नहीं थी।
काश्तकारी सुधारों की सफलता समिति ही रही। सभी काश्तकारों को सुरक्षा नहीं मिल सकी। केरल और पश्चिम बंगाल में काश्तकारों को सुरक्षा तो मिली पर अभी भी बहुत ऐसे थे जो असुरक्षित थे। केरल और बंगाल में सफलता के बावजूद बिना सुरक्षा के काश्तकारी, देश के अधिकतर भागों में जारी रही। सही तौर पर अधिकतर कठगेना (ठीका) पैसे पर था । बटाईदारी (अनाज का 1/2) चलती रही बड़ी संख्या में असुरक्षित काश्तकारों के बने रहने से काश्तकारी कानून का दूसरा उद्देश्य, अर्थात् भू- कर को 'उचित' स्तर पर लाना, पूरा करना लगभग असंभव हो गया। बाजार की स्थिति अर्थात् प्रतिफल भूमि व्यक्ति अनुपात के कारण जो औपनिवेशिक भारत उत्पन्न हुआ, भू- कर बढ़ने लगा। ऐसी स्थिति में कानूनी 'उचित' भू-कर केवल उन्हीं काश्तकारों पर लागू हो सकता था, जो सुरक्षित थे और जिन्हें जो कर अधिकार मिला हुआ था, मतलब उन्हें हटाया या बदला नहीं जा सकता था।
खेती करने वाले काश्तकारों द्वारा अदा किए जाने किराए को नियमित करने के विधान सभी राज्यों में बनाए गए। अधिकतर राज्यों ने प्रथम तथा द्वितीय योजनाओं द्वारा तय अधिकतर भूमि कर अपनाए अर्थात् कुल उत्पादन का 20 से 25 प्रतिशत। पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने करों को 33.2 तथा 40 प्रतिशत के बीच ही रखा। देश में औसतन यह उत्पादन के 50 प्रतिशत के आस-पास बना रहा। इतना ही नहीं, काश्तकार को कई बार उत्पादन के खर्चे आंशिक या पूर्ण रूप से उठाने पड़ते।
60 के दशक के अंत में देश के कुछ भागों में चल रही हरित क्रांति ने समस्या को और हवा दे दी। पंजाब में जहां हरित क्रांति का प्रभाव अधिक था, जमीन कर कीमते और किराए बढ़ने लगे। पंजाब में वे बढ़कर 70 प्रतिशत हो गए। सबसे गंभीर बात यह थी कि गरीब असुरक्षित काश्तकार या बटाईदार ही थे जिन्हें बाजार भाव अदा करना पड़ता था। सिर्फ काश्तकारों के वे ऊपरी तबके ही जिन्हें जोत के अधिकार मिल गए थे और जो अकसर ही भू-स्वामी से अलग पहचाने नहीं जा सकते थे, कानूनी किराए की आदायगी लागू करवा सकने की स्थिति में थे।
भारत में काश्तकारी कानून का तीसरा उद्देश्य काश्तकारों को स्वामित्व का अधिकार दिलवाना था। यह भी आंशिक रूप से ही लागू हो पाया। लेकिन जमींदारी उन्मूलन, काश्तकारी कानूनों और हदबंदी कानूनों को कुल मिलाकर काफी प्रभाव पड़ा। इसके कारण भूमि सुधारों के एक मुख्य उद्देश्य अर्थात् निवेश करने वाले तथा उत्पादक प्रगतिशील किसानों का तबका तैयार करने में काफी मदद मिली। भारत के भूमिक सुधारों के एक गहन अध्ययन से यह पता चला कि लाखों काश्तकार अब बालिन बन गए।
लगभग 2 करोड़ काश्तकार भू-स्वामी बन गए। कई अनुपस्थित जमींदार फिर से खेती में शामिल हुए और अपनी व्यक्तिगत खेती आरम्भ की। रैयतवारी इलाकों में तकरीबन आधे काश्तकार जैसे बंबई और गुजरात में भू-स्वामी बन गए। इसके अलावा करीब आधे (बम्बई में करीब 70 प्रतिशत) ऐसे जमीन का प्रयोग जिन पर काश्तकारों को बेदखल किया गया उन्हें पूर्व रैयवारी इलाकों में बहुत बड़ी संख्या में छोटे काश्तकारों को जोत का अधिकार मिला।
पश्चिम बंगाल जैसे भूतपूर्व जमींदारी इलाकों में भी करीब आधे बरगादारों को स्थायी जोत का अधिकार मिला। इनमें उन तीस से 50 लाख खेतिहरों को भी जोड़ा जाना चाहिए। जिन्हें हदबंदी से बची अतिरिक्त जमीन मिली।
काश्तकार और बटाईदार जिन्हें जोत के अधिकार मिले और जो कम दर वाले कर दे रहे थे, काश्तकार जिन्हें स्वामित्व के अधिकार मिले, भूमिहीन जिन्हें हदबंदी से फाजिल जमीन मिली, अनुपतिस्थित भू-स्वामी जो प्रत्यक्ष खेतिहर बने। इनमें से कई अब अपने स्रोतों या वित्तीय संस्थाओं से करों के आधार पर प्रगतिशील किसान बने। ये संस्थागत स्रोत अधिकाधिक गरीब किसानों के लिए उपलब्ध थे।
3. भूमि - हदबंदी
'भूमि - हदबंदी' भूमि सुधार का एक प्रमुख पक्ष था। इसका उद्देश्य भूमि का वितरण अधिक समान बनाना था। इस सवाल पर सामाजिक सहमति थी तो परन्तु यह सहमति बहुत कमजोर स्तर की थी। इसका प्रतिबिम्बित रूप भूमि हदबंदी को लागू करने में दिखा जब सामाजिक स्तर पर आंदोलन का सामना करना पड़ा।
नवम्बर 1947 में कांग्रेस ने एक आर्थिक समिति का गठन किया। यह समिति आर्थिक कार्यक्रम तैयार करने के लिए बनाई गई थी। यह समिति जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में बनाई गई थी। इस समिति ने सुझाव दिया कि भूमि कं. अधिकतम सीमा तय की जानी चाहिए। इस सीमा से अधिक भूमि का अधिग्रहण करके ग्राम सहकारिता को सौंप देन चाहिए। कांग्रेस की कृषि सुधार समिति ने जुलाई 1949 में रिपोर्ट पेश की जिसकी अध्यक्षता जे०सी० कुमात्या ने की थी। कहा कि भूमि-हदबंदी आवश्यक है। इस समिति ने आर्थिक हदबंदी का तीन गुना होने का सुझाव दिया था। आर्थिक हदबंदी वह हदबंदी थी जो खेतिहर को उचित जीवन स्तर प्रदान करे, सामान्य आकार के परिवार को पूर्ण रोजगार दे और हरेक किसान को दो बैल और हल दे।
अखिल भारतीय किसान सभा ने 1946 में प्रति भू-स्वामी 25 एकड़ की अधिकतम भू स्वामितत्व की सीमा का समर्थन किया था। कांग्रेस ने भी 1947 में भू-हदबंदी के बारे में सकारात्मक प्रतिक्रिया ही दी । प्रथम पंचवर्षीय योजना में यह विशेष रूप से ख्याल रखा गया था कि किसी व्यक्ति द्वारा रखी जाने वाली भूमि की अधिकतम सीमा तय हो । इस योजना में सामान्यतः कुमारत्या समिति के द्वारा सुझायी गयी अधिकतम सीमा को सही माना। पर यह कहा कि 'अधिकतम सीमा' क्या हो? इसका फैसला राज्य अपने अनुसार करे। इसमें उन्होंने एक सहायता की तथा सलाह दी कि भूस्वामित्व और खेती संबंधी जानकारी जनगणना 1953 में प्रस्तावित है जिसके द्वारा इसके लिए विशेष आंकड़े मिल सकते हैं।
यह सही है कि उस समय अचानक से भूमि हदबंदी लागू करने का कोई कार्यक्रम नहीं था। प्रथम योजना का अंदाजा था कि आवश्यक सर्वे करने के लिए तथा हदबंदी कानून प्रभावशाली तरीके से लागू करवाने के लिए दो से तीन वर्षों की जरूरत होगी।
इसलिए इसमें अचरच नहीं कि आरम्भ में इसमें संबंधित संकल्प के प्रस्ताव के बाद भी स्वतंत्रता के बाद कुछ वर्षों में हदबंदी के सवाल पर अधिक प्रगति नहीं हुई। इसे कांग्रेस ने स्वीकार किया। 1952 में राष्ट्रीय विकास परिषद का गठन किया। इसके तहत नेहरू की अध्यक्षता में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री ने इस मामले पर चर्चा की। 1957 में राष्ट्रीय विकास परिषद की स्थायी समिति ने तय किया कि उन राज्यों में हदबंदी संबंधी कार्य 1960 के अंत तक पूरा किया जाए जहां ऐसे कानून बनाए जा चुके थे और अन्य राज्यों में 1958-59 में इससे संबंधित कानून पास कर लिये जाएं।
1960 के आस-पास देश के विभिन्न भागों में विभिन्न संस्थानों के द्वारा हदबंदी का विरोध होने लगा था। जैसे-मी. डिया, संसद, राज्य विधानसभा, और इससे अधिक कांग्रेस के अंदर भी । भू-स्वामियों और शहरी निहित स्वार्थों को निजी संपत्ति के लिए खतरा दीख पड़ने की स्थिति आ गयी। कांग्रेस कमेटी की विशेष समिति ने हदबंदी का विरोध किया। इसके बावजूद नागपुर कांग्रेस अधिवेशन ने एक प्रस्ताव पास किया तथा कहा कि हदबंदी संबंधी कानून 1959 तक बन जाना चाहिए। इस अधिवेशन में यह भी कहा गया कि हदबंदी से बची जमीन पंजायतों को दी जानी चाहिए और उनका प्रबंधन भूमिहीन मजदूरों की सहकारी संस्थाएं करें।
इस अधिवेशन में लिए गए निर्णयों की आलोचना हुई तथा कांग्रेस संसदीय पार्टी के सचिव एम०सी० रंगा ने दिसम्बर, 1958 में संसद के 100 कांग्रेस सदस्यों द्वारा हस्तांतरित एक पत्र नेहरू को भेजा गया जिसमें हदबंदी का विरोध किया गया। फरवरी, 1959 में कांग्रेस से रंगा ने इस्तीफ दे दिया। 
इतिहासकार विपीनचन्द्रा के अनुसार "नागपुर प्रस्ताव के फलस्वरूप देश के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में दक्षिणपंथी शक्तियों का काफी सुदृढ़ीकरण हुआ। एम०सी० रंगा और सी० राजगोपालाचारी ने भूमि हदबंदी तथा अनिवार्य सहकारिकता के खतरों से काफी चिंता व्यक्त थी। वे अब मीनु मसानी के साथ मिल गए तथा (Forum for free enterprise के नेता) जून, 1959 एक स्वतंत्रता पार्टी बनायी। जिसके अध्यक्ष रंगा थे। वे काश्तकार भी जिन्हें जमींदारी उन्मूलन से फायदा हुआ था और जब भू-स्वामी बन चुके थे। भूमि सुधार के अगले कदम के खिलाफ खड़े हो गए थे। यह कदम था हदबंदी से फाजिल जमीन का पुनर्वितरण ।" लेकिन हदबंदी कानूनों की विशेष सफलता राज्यों के स्तर पर ही मिली क्योंकि राज्यों में ही ये कानून बनाए और लागू किए जाते थे राज्य विधायिकाओं की बैठकें नागपुर अधिवेशन के बाद ही हुई। उन्होंने नागपुर प्रस्ताव लागू करने में कोई रुचि नहीं दिखाई। इस प्रकार हदबंदी का सवाल टलता रहा। अधिकतर राज्यों ने इस दिशा में कानून 1961 के अंत तक ही बनाए, अर्थात् अधिकारिक तौर पर यह विचार पेश किए जाने के करीब 14 वर्षों बाद ही बनाए गए।
4. हदबंदी कानून की सीमाएं
हदबंदी कानून का प्रभाव प्रभावी रूप से नहीं पड़ा। जमीन के पुनर्वितरण के लिए बहुत कम जमीन निकल पाई। अधिकतर राज्यों में हदबंदी कानूनों के अंतर्गत कुछ कमियां रह गई। ऐसी स्थिति में जहां भारत में 70 प्रतिशत से अधिक भू-संपत्तियां 5 एकड़ से कम की थी, राज्यों द्वारा तय की गई हदबंदियां काफी अधिक थी। उदाहरणस्वरूप आंध्र प्रदेश में भूमि के स्वरूप के अनुसार 27 से 32 एकड़ के बीच थी। पंजाब में 30 से 60 एकड़ के बीच थी। बंगाल में 25 एकड़ थी। महाराष्ट्र में 18 एकड़ थी।
इसके अतिरिक्त अधिकतर राज्यों में हदबंदी व्यक्तिगत आधार पर लागू की गई ना कि पारिवारिक भू-संपत्ति के आधार पर। इससे जमीन के मालिकों को अपनी संपत्ति को हदबंदी से बचाने के लिए परिवार के सदस्यों को नाम अलग-अलग कर देने का मौका मिल गया। इसके अलावा कई राज्यों में हदबंदी, बढ़ाई भी जा सकती थी, जैसे- मध्य प्रदेश में 90 प्रतिशत केरल में 67 प्रतिशत मद्रास और महाराष्ट्र में 100 प्रतिशत, त्रिपुरा में 140 प्रतिशत, पर यह बढ़ाने की राय जब परिवार के सदस्य 5 से अधिक होते थे तब होती थी।
दूसरी पंचवर्षीय योजना ने यह सुझाव दिए कि भूमि की कुछ श्रेणियों को हदबंदी से छूट दी जा सकती है। इसका फायदा उठाकर अधिकतर राज्यों में बड़ी छूट दी गई। इनमें चाय, कॉफी तथा रबर के बगान, बगीचे, पशु-पालन से प्रजनन, दूध आदि के उत्पादन, ऊन उत्पादन इत्यादि से संबंधित विशेष फार्मों जैसी श्रेणियों से छूट दी गई।
इसका स्पष्ट उद्देश्य था कि बड़े स्तर पर प्रगतिशील तथा पूंजीधारी कृषि का विकास हो तथा जनता को उद्यमों से कृषि के द्वारा आय हो। इसके अलावा इसका उद्देश्य था काश्तकारों एवं बटाईदारों के जरिए भूमि स्वामियों का अनुपस्थित कर समाप्त करना। परन्तु उपरोक्त छूट अत्यधिक अजीबों गरीब थी। जैसे तमिलनाडु में 26 प्रकार की छूटें दी गयी थीं और इसके साथ अच्छी तरह प्रतिबंध फार्म की बात अपने में इतनी अस्पष्ट थी कि बड़ी संख्या में भू-स्वामियों ने स्वयं को अच्छा प्रबंधक दिखाकर छूटें हासिल कर ली । इसी प्रकार, सहकारिताओं की भूमि का भी दुरुपयोग किया गया। उदा. हरण के लिए मद्रास सरकार ने सहकारी फार्मों का प्रस्ताव रखा। इसके परिणामस्वरूप भूमि के स्वामी ने फर्जी सहकारी संस्थाएं बनाकर जमीन अपने आप हस्तांतरित कर ली। साथ ही कुछ ऐसे उदाहरण भी सामने आए जिसमें कम से कम कुछ भू स्वामियों ने भूमि खोने के खतरे से डरकर सचमुच अच्छी खेती की।
सबसे बड़ी बात यह कि हदबंदी कानून बनाने में बहुत देर होने से इसका उद्देश्य काफी हद तक पूरा नहीं हो पाया। इस देरी के कारण बड़े जमींदारों को अपनी जमीन को अपने सगे-संबंधी के नाम करने में आसानी हो गयी। इसके अलावा, भू-स्वामियों ने बड़े पैमानों पर काश्तकारों को बेदखलकर किया और अपनी खेती कम-से-कम हदबंदी सीमाओं तक फिर से नियमित कर ली। इसके अलावा इन्होंने अपनी देखरेख में प्रगतिशील खेती फिर से आरम्भ कर दी। इस प्रकार जब तक हदबंदी कानून लागू होने लगे, तब बहुत कम ही अतिरिक्त जमीन बच पा रही थी। इस प्रकार फिर से बंटवारे के लिए बहुत ही कम जमीन निकली इस तथ्य को कांग्रेस नेतृत्व तथा तीसरी योजना ने भी स्वीकार किया।
सत्य तो यह था कि 1961 तक अतिकतर राज्यों के द्वारा हदबंदी कानून पास कर दिया गया था। फिर भी 1970 तक बिहार, मैसूर, केरल, उड़ीसा, राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में एक भी एकड़ अतिरिक्त घोषित नहीं किया गया। आंध्र प्रदेश में मात्र 1400 एकड़ जमीन हदबंदी के बाद बची घोषित की गई, लेकिन कोई भी जमीन बांटी नहीं गई। सिर्फ जम्मू-कश्मीर ही ऐसा राज्य था जहां 1955 के मध्य तक हदबंदी कानून पूरी तरह लागू कर दिया गया। काश्तकारों और भूमिहीन मजदूरों की 2,30,000 एकड़ अतिरिक्त जमीन का बंटवारा किया गया और वह भी बिना मुआवजा दिए ।
देश के हरेक कोने में 1970 के अंत तक सिर्फ 24 लाख एकड़ जमीन अतिरिक्त घोषित की गई। बांटी गई जमीन इस जमीन का मात्र आधा थी, जो भारत में कुल जोती जाने वाली जमीन का मात्र 0.30 : थी। हदबंदी और भूमि - वितरण में खराब रिकॉर्ड तथा ग्रामीण क्षेत्र में 60 के दशक के मध्य में तेजी से बढ़ते ध्रुवीकरण की स्थिति में भूमि सुधार में नई पहल की जरूरत थी। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वामी खेतिहर धनी किसानों के हितों का सुदृढीकरण हुआ। इसका प्रतिबिंब स्पष्ट राजनीतिक आवाज के रूप में हुआ । जैसे- भारतीय क्रांति दल की स्थापना । इसका निर्माण 1967 में यू०पी० में सी० बी० गुप्ता के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के गिरने के बाद चरण सिंह द्वारा किया गया था। बाद में बी०के०डी० का विलय स्वतंत्र पार्टी में हुआ तथा भारतीय लोकदल की स्थापना 1974 में हुई।
भारतीय लोकदल उस जनता दल का मुख्य हिस्सा था जो आपालकाल के बाद 1977 में सत्ता में आई । इस प्रकार स्वामी खेतिहर धनी किसानों के हितों का प्रभाव, जो अब तक राज्यों में दीख पड़ता था। अब केन्द्रीय था राष्ट्रीय स्तर पर महसूस किया जाने लगा।
1960 के दशक में तथा 1970 के आरम्भ में भूमि सुधार का दूसरा चरण आरम्भ हुआ। राष्ट्रीय विकास परिषद की भूमि सुधार अकाल कमिटी की बैठक जून 1964 में हुई। इसने मुख्यमंत्रियों को यह सलाह दी कि भूमि सुधार के कानून की कमियां दूर हो तथा यह प्रभावकारी ढंग से लागू हो ।
1970 ई० में इंदिरा गांधी ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में जोर देकर कहा कि भूमि सुधार की बची हुई परिस्थितियों पर सुधार किया जाए। श्रीमती गांधी ने कहा कि भूमि सुधार में किसानों, काश्तकारों, भूमिहीनों तथा मजदूरों को हिस्सा मिलना बहुत ही आवश्यक है। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने खेती की नई साझेदारी में समाजवाद की स्थिति को बढ़ाने की वकालत की।
अधिकतर मुख्यमंत्रियों ने सम्मेलनों में अधिकतर हदबंदी की सीमा बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया। अगर मगर की स्थिति में इस मामले को केन्द्रीय भूमि सुधार समिति के सुपुर्द किया गया। समिति के काम सम्मेलन में इस प्रकार तथा अन्य विवादस्पदविषयों पर विचार करना था।
केंद्रीय सुधार समिति (भूमि) ने 1971 में अपनी रिपोर्ट में कई सुझाव दिए । इस सुझाव में हदबंदी सीमा घटाने, अच्छी या यंत्रीकृत फार्मों को दी गई रियायतें वापस लाने तथा व्यक्तियों के अनुसार बल्कि परिवारों के आधार पर हदबंदी लागू करने के सुझाव शामिल थे।
1971 के चुनाव में कांग्रेस की महान सफलता के बाद मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में राष्ट्रीय मार्गदर्शन तैयार हुआ तथा भारत में हदबंदी कानून के मुख्य बिन्दुओं पर सहमति बनी। जैसे:
1. दो फसलों वाली नियमित सिंचाई की भूमि पर हदबंदी 10 से 18 एकड़ के बीच तय की गई । 
2. एक फसल वाली के लिए 27 एकड़
3. निम्न स्तर पर 54 एकड़
4. दृढ़बंदी के लिए 5 स्तर पर 5 सदस्यों के एक परिवार को सीमा माना गया।
5. एक फसल वाली खेती की हदबंदी 27 एकड़ को माना गया।
6. हदबंदी से जो जमीन बची वहां बंटवारे के भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को प्राथमिकता दी गई।
7. अतिरिक्त भूमि के लिए मुआवजा बाजार के भाव से काफी कम तय किया गया।
अब अधिकतर राज्यों ने इस संशोधित हदबंदी कानून को नया रूप से दिया। फिर भी हदबंदी को एक मजबूरी ही माना जा रहा था। पूरे देश में हदबंदी से जुड़े हुए मुकदमे चल रहे थे। सिर्फ आंध्र प्रदेश में ही लाखों मुकदमे चल रहे थे। इन झंझावातों से बचने के लिए सरकार ने संसद में 1974 में 34वां संविधान संशोधन पास करवाया । इसे पानी - हद. बंदी कानूनों की 9वीं अनुसूची में शामिल करवाया गया। जिससे कोई इसे संवैधानिक अधिकार पर चुनौती न दे सके। इसी काम ने पूरे देश में लगभग 22 लाख एकड़ से ऊपर जमीन बांटी गयी। लगभग करोड़ों जमीन बचा ली गई तथा इधर- उधर कर दी गई।
मार्च 1985 तक 72 लाख एकड़ जमीन अतिरिक्त थी। इसमें से 43 लाख एकड़ 33 लाख लोगों में बांट दी गयी। हदबंदी कानूनों को लागू करने के संबंध में भारी विभिन्नता अलग-अलग राज्यों में थी। जिन राज्यों में किसान जागरुक थे, वहां अधिक ही लाभ मिला।
हदबंदी कानून के कारण भू-बाजार खत्म हो गया तथा संकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया रुक गयी । पुनर्वितरण के लिए बड़े पैमाने पर अतिरिक्त भूमि अतिगृहित करने की स्थिति देर से बनी तथा गलत भी थी। अब पीढ़ी बढ़ने तथा बदलने से जमीन के टुकड़े होने लगे तथा धीरे-धीरे जोतों का आकार छोटा होता चला गया। अब देश के कुछ हिस्सों को छोड़कर जमींदारी शब्द भूतकाल की बात हो गई ।
अभी भी भारत में कृषि जमीन पर वितरण सही तौर पर नहीं है तथा ऊपर से विकास के नाम पर तथा शहरीकरण के नाम पर भूमि-अधिग्रहण काफी अधिक हो जाता है। सरकार ने उस समय परिस्थितियों से सीख लेकर किसानों को लगातार भूमि मुहैया कराने की बात की है फिर भी कृषिगत स्तर पर छोटे किसान बटाई वाली जमीन से ही अपनी खेती चलाते हैं। सरकार के द्वारा ऐसे किसानों को ग्रामीण स्तर पर खेती के अलावा रोजगार, पशुपालन, बागवानी तथा वृक्षारोपण का भी कार्य दिया जा रहा है। दूसरे भाग में हम भू-दान-आंदोलन और सहकारिता तथा हरित क्रांति की चर्चा करेंगे।
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Sun, 01 Oct 2023 07:51:19 +0530 Jaankari Rakho
स्वातंत्र्योत्तर भारत : महिलाओं की भूमिका https://m.jaankarirakho.com/401 https://m.jaankarirakho.com/401 स्वातंत्र्योत्तर भारत : महिलाओं की भूमिका
1. स्वतंत्रता के बाद "आधी आबादी की स्थिति" तथा 'भारत के विकास में महिलाओं की भूमिका”
स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति में काफी अंतर देखने को मिला है। महिलाओं की भूमिका सामाजिक रा. जनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में काफी गतिशील रही है। वैसे तो भारत में महिलाओं की स्थिति सुधार के लिए विभिन्न आंदोलन 19वीं शताब्दी में ही आरंभ हो गए थे। राजा राम मोहन राय ने महिलाओं की गरिमा के विषय को लेकर विभिन्न आंदोलन खड़े किये तथा कहा गया कि सती प्रथा जैसी परंपरा भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के नाम पर एक कलंक है।
1857 में सिपाही विद्रोह को स्वतंत्रता संग्राम के रूप में परिवर्तन को हम रेखांकित कर सकते हैं क्योंकि यह संग्राम कहीं न कहीं महिलाओं की भागीदारी से ही अपनी गरिमा को यशस्वी बना सका। 'झांसी की रानी' ने इस संग्राम को स्त्रियों की शक्ति तथा सहभागिता से जोड़ दिया तथा महिलाओं की सक्रियता को इसमें पूर्ण कर दिया।
20वीं सदी में महिलाओं की स्थिति को रेखांकित करने में आजादी की लड़ाई के लिए विभिन्न संघर्षो की भूमिका अहम है। महात्मा गांधी ने बार-बार यह कहा कि स्वतंत्रता के बाद महिलाओं के विकास के लिए आवश्यक है कि अभी से ही महिलाओं को रसोई घर से निकलकर अपनी भूमिका को देश की भलाई में लगाना चाहिए।
महिलाओं की भूमिका काफी बढ़ी तथा स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाएं चढ़ - बढ़कर भाग लेनी लगी। भारत के राष्ट्रीय आंदोलन ने महिलाओं को राष्ट्रीय भावना रखने वाली राजनीतिक हस्तियां माना तथा यह कहा कि संघर्ष और बलिदान में पुरूषों से कहीं अधिक नहीं तो कम-से-कम बराबर तो जरूर साबित हुई हैं।
महिलाएं 20वीं सदी के दूसरे दशक के बाद विभिन्न जुलूसों के साथ आगे निकलीं तथा विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय कार्यकर्त्ता की भूमिका निभायी। वे जेल भी जाने लगी। इस दशक में महिलाओं द्वारा विशाल जन संघर्षो में राजनीतिक भागीदारी ने ऐसी संभावनाएं खोल दी जो सामाजिक सुधारों की पूरी सदी ने भी नहीं खोली थी। महिला की स्थिति अब संघर्षशील की हो गयी थी।
देखा जाए तो जहां पहले महिला की छवि न्याय की हकदार के रूप में थी वहीं 20वीं सदी के आरंभ में राष्ट्रवादी पुरूषों की समर्थक और 1930 के बाद महिलाएं अब प्रत्येक आंदोलन में सहयोग की सबसे बड़ी सहभागी हो गई।
महिलाओं ने राष्ट्रीय आंदोलन की सभी धाराओं में भाग लिया गाँधीवादी, समाजवादी, वामपंथी तथा क्रांतिकारी सभी तरह के आंदोलनों में एक महती भूमिका देखना को मिली। महिलाएं 19वीं सदी से 100 वर्ष की यात्रा कर राजनीति के हरेक क्षेत्र में अब महानतम योगदान को रेखांकित कर रही थी।
सबसे अधिक महत्वपूर्ण तो था कि महिलाओं ने ट्रेड यूनियन में भी हिस्सा लिया तथा महिलाएं किसान सम्मेलन का हिस्सा रहीं। इनमें आजादी के बाद पिछले कठिन संघर्षो के नतीजों को मजबूती प्रदान करने का समय अब आ चुका था। इसलिए महिलाओं के स्वतंत्रता संघर्ष में दिए योगदान को पुरस्कृत तथा वैधानिकता प्रदान करने की अब बारी थी। अब महिलाओं को शक्ति प्रदान करने के लिए नीतिगत निर्णय लेने की बारी थी।
संविधान में ऐसे प्रावधान करने का प्रस्ताव लाया गया जो महिलाओं को समानता, स्वतंत्रता तथा शिक्षा प्रदान कर सके। महिलाओं को इसके साथ मताधिकार संपत्ति में अधिकार तथा आय के लिए साधन जुटाने के अधिकार दिए गए। मताधिकार तो एक ऐसा अधिकार था जिसके लिए पश्चिमी देशों ने कई वर्षो तक महिलाओं के आंदोलन देखने के बाद प्रावधानित किए थे पर भारत ने अपनी स्वतंत्रता के पहले दिन से ही इसे हासिल कर लिया। सही रूप में देखे तो भारत की स्वतंत्रता के बाद महिलाओं को बराबर का हक प्रदान करने कोशिश की पहले दिन से ही आरंभ हो गई।
1956 में हिन्दू पुनर्विवाह अधिनियम पारित करके या 1951 में हिन्दू कोर्ट विवाह की स्थिति को वास्तविकता में बदलकर महिलाओं की स्थिति को ठीक करने की कोशिश की गई। हिन्दू कोड बिल को हिन्दू विवाह एक्ट, हिन्दू उत्त. राधिकार एक्ट, नाबालिग एवम् अभिभावक एक्ट और गोद लेने तथा खर्चे का कानून पारित किया गया।
1947 के बाद विभिन्न महिला आंदोलनों के द्वारा ही विभिन्न संगठनों की अपनी पहचान बनी जो अपने कार्यों के द्वारा महिलाओं के विकास में योगदान देते रहे ।
इन संगठनों ने कार्य तो काफी किए है पर महिलाओं के मामले में अभी भी समानता जस की तस है। महिलाओं पर शोषण, दहेज हत्या, बलात्कार घरेलू हिंसा इत्यादि ने लोक परंपरा के साथ अपनी जगह बिछाली थी जो लगातार चलती आ रही है।
कहा जाए तो उपरोक्त मामलों में विचार काफी हुए पर 1970-90 के बीच विभिन्न आंदोलनों ने इस मामले में जन-चेतना जगाई तथा जनांदोलनों का विकास किया। स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राष्ट्रीय आंदोलनों की विभिन्न शक्तियां अपने-अपने रास्ते निकल पड़ी तथा महिला आंदोलन ने विभिन्न रूपों में अपना कार्य आरंभ किया। सबसे बड़ी घटना यह घटी कि विभिन्न महिला संगठनों तथा प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने आम जनता के बीच जाकर महिलाओं से संबंधित समस्याओं को उठाने की बात कही है।
स्वाभाविक है कि आधुनिक भारत में इन सभी संगठनों का ध्यान महिलाओं से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर गया है जिसमें ‘शोषण’ सब से प्रमुख घटना है। इसके अलावा दहेज हत्या, बालात्कार, घरेलू हिंसा इत्यादि ।
सबसे अधिक शोषण से संबंधित मुद्दों को लेकर 70 के दशक से 90 दशक के बीच आंदोलन हुए तथा 2011 समय में कुछ ऐसे आंदोलन हुए जो पूरी तरह महिलाओं की गरिमा से संबंधित थे।
ऐसा नहीं है कि महिलाओं ने सिर्फ विद्रोह या आंदोलन ही किए। बल्कि महिलाओं के कल्याण से संबंधित मुद्दों को संस्थागत रूप देने में सरकार की भूमिका के साथ महिलाओं की भूमिका भी अटल रही है।
स्वतंत्रता के बाद महिला नेताओं के द्वारा विभिन्न संस्थान आरंभ किए गए तथा महिला कल्याण संबंधी संस्थान से विकास के रास्ते पर ले जाने वाले संस्थाओं में महिला की भूमिका रही।
उदाहरण के लिए देश के विभाजन के समय दंगों और स्थानांतरण के फलस्वरूप छोड़ दी गई महिलाओं की खोज तथा पुनर्वास के काम, शहरों में कामकाजी महिलाओं के छात्रावास स्थापित करने और महिलाओं के वोकेशनल ट्रेनिंग केंद्र निर्मित किए गए थे। 1954 में वामपंथी महिलाओं ने अपना संगठन 'भारतीय राष्ट्रीय महिला फेडरेशन' बनाया।
यह फेडरेशन एक राजनीतिक संगठन बन गया तथा हमें कहने में तनिक संकोच नहीं करना चाहिए कि ऐसा होने के कारण 50-60 के दशक के बीच महिलाओं से संबंधित आंदोलन को संस्थागत रूप नहीं मिल सका।
1970 के बाद महिलाओं के मुद्दों को लेकर कई आंदोलन आरंभ हुए। महिलाओं ने किसान आदिवासी, ट्रेड यूनियन और पर्यावरण संबंधी आंदोलनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
इसके अलावा अलग-अलग भागों में बंगाल में भी महिलाओं ने अपने आंदोलन चलाए। 1946-47 में यहां महिलाओं ने ‘नारी वाहिनी' संगठित की। उन्होंने छिपने के स्थान तथा संचार व्यवस्था संगठित की। यह संगठन 'तेभागा किसान आंदोलन' के समय बनाया गया था । वामपंथी संगठनों ने महिलाओं को ग्रामीण स्तर पर संगठित किया। ग्रामीण स्तर पर इन संगठनों ने वित्त और संपत्ति में महिलाओं का अधिकार, ग्राम्य स्तर पर के आत्मरक्षा की स्थिति तथा घरेलू हिंसा के मुद्दों को उठाया।
लगभग इसी काम में हैदराबाद राज्य के तेलांगाना क्षेत्र में चलने वाला 'तेलंगाना आंदोलन' को उल्लेख करना महत्वपूर्ण f होगा। यह 1946-50 के बीच काफी लोक प्रिय हो गया था। इसकी प्रमुखता इस बात के लिए है कि यह आंदोलन पूरी तरह घरेलू हिंसा से संबंधित रहा था। सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात है कि इस आंदोलन में महिलाओं ने छापामार युद्ध सीख लिए तथा इन महिलाओं को कामरेड से शादी करने पर मजबूर किया गया जिससे कि एक प्रकार का बदलाव इस आंदोलन में देखन को मिला।
यह भी कहा गया कि इस आंदोलन की विधा बदल दी गयी तथा कहीं न कहीं इसे नक्सली महिला प्रमाण से जोड़ दिया गया।
1960 के बाद देश की राजनीति में हवा बढ़ी। इस समय लगभग 1970 के आस पास विभिन्न विषय भारत के राजनीतिक वातावरण में तैर रहे थे। जैसे:- नक्सली पंथी आंदोलन, जे.पी, आंदोलन, चिपको आंदोलन और महंगाई विरोधी आंदोलन। इन सभी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका भी रही।
1973-75 के बीच जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी तो देश में बढ़ती महंगाई के विरोध में वामपंथी महिलाओं तथा सोशलिस्ट महिलाओं ने संयुक्त रूप से विदर्भ तथा महारष्ट्र के और भागों में आंदोलन चलाया। यह आंदोलन एक अति-सफल आंदोलन था जिन महिलाओं को घर से निकलने पर पाबंदी थी, वो इस आंदोलन में घूमने लगीं तथा रैलियां करने लगीं। इन्होंने थालियां बजाकर अपना विरोध प्रकट किया तथा सबसे बड़ी बात कि इनकी विशेष रैलियां आयोजित हुई जिसमें महिलाओं के तरफ से ही आयोजनकर्ता भी थे।
यह महंगाई विरोध आंदोलन 1973 के अंत में आरंभ हुआ था 1974 में यह जय प्रकाश आंदोलन के साथ गुजरात से मिल गया जो संपूर्ण क्रांति तथा नव निर्माण की ओर अग्रसर थे। वैसे संपूर्ण क्रांति में विशेषकर भ्रष्टाचार. तानाशाही तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया की फिर से स्थापना ही मुद्दा था तथा महिलाओं में योगदान बढ़ा तथा आत्मविश्वास भी बढ़ा।
1974 के बाद महिलाएं पुरूष दमन के निषेध में तथा अपने हक के लिए आगे बढ़कर अपनी बात रखने लगी। लगभग इसी समय गुजरात में कपड़ा मिल में काम करने वाली महिलाओं के असंगठित समूहों ने टेक्सटाइल 'लेबर एसोसियेशन' नामक संगठन की स्थापना की। इस महिला संगठन का नाम 'सेवा' रखा गया तथा यह एक गांधीवादी संगठन के तौर पर लोकप्रिय हुआ। यह अपने में अलग किस्म का संगठन था जो असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को संगठित करता था। यह संगठन छोटी-मोटी दुकान चलाने वाली महिला, चौका बरतन करने वाली तथा घर-घर जाकर सामान बेचने वाली महिलाओं का संगठन था। 'सेवा' ने इन्हें संगठित किया तथा सामूहिक तौर पर इनके प्रशिक्षण, कर्जा तथा तकनीकी स्तर पर सेवा मुहैया करवायी। सेवा का प्रसार इंदौर, भोपाल, दिल्ली और लखनऊ तक हो गया। आज भी वह इला भट्ट के नेतृत्व में भारतीय महिलाओं के सबसे महत्वपूर्ण संगठनों के रूप में काम कर रहा है। अभी तक ‘सेवा’ का कार्य विस्तारित हो रहा है। इला भटट को इनके कार्य के लिए ‘मैग्सेसे' पुरस्कार भी मिल चुका है।
इसी तरह उत्तराखंड के सत्तर के दशक के अंत में महिलाओं ने शराब खोरी के विरोध में सुंदरलाल बहुगुणा की मदद से आंदोलन चलाया। स्पष्ट तौर पर गांधी के समय से ही महिलाओं की सामाजिक जागरूकता बढ़ गयी थी तथा यह साफ दिखने लगा था कि महिला भारत की विकास श्रृंखला में एक अहम तत्व साबित होंगी।
1974 के बाद महिलाओं की चिपको आंदोलन में भी अहम भूमिका रही तथा पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें राखी बांधती थी तथा कोई ठेकेदार पेड़ को काटने आता था तो वह पेड़ से चिपट जाती थी।
1977 के आस-पास मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में खदान श्रमिक संघ में आदिवासी महिलाओं की भागीदारी काफी रही इस आंदोलन का उद्देश्य सिलाई, इस्पात कारखाने के मशीनीकरण नीति का विरोध करना था। यह कहा गया कि अगर मशीनीकरण हो गया तो महिलाओं के रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इससे प्रभाव में आकर महिलाओं ने 'महिला मुक्ति संगठन' नामक एक संगठन की स्थापना की। 1979 में इसी जगह इस संगठन ने मांग की जमीनी स्तर पर महिलाओं के नाम से भी संपत्ति विशेषकर जमीन लिखी जाएं। ऐसी मांगों में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी' की भूमिका सर्वाधिक रही। यह वाहिनी जय प्रकाश नारायण के विचारों से प्रभावित थी। यहां भी 'गया' क्षेत्र में महिलाओं के नाम से पैतृक संपत्ति लिखने या करने की मांग अधिक की गयी। बिहार में ऐसी मांगो को प्रभाव में लाया गया तथा इससे प्रभावित होकर कुछ राज्य जमीनी संबंधी पट्टे महिलाओं के नाम से दिए जाने लगे। यह एक प्रकार की सफल सक्रिय आंदोलन की कसौटी थी।
1984 ई. में भोपाल गैस कांड में राहत मुआवजा दिलाने में महिलाओं की भूमिका सर्वाधिक रही है। महिला उद्योग संगठन ने गैस रिसने के शिकार व्यक्तियों को मुआवजा दिलाने के लिए कई प्रयास किए। ये प्रयास सफल भी हुए। एक और घटना जो उसी के आस-पास घटी थी वह थी शेतकरी की घटना। शेतकरी संघटना में इस बात की सबसे अधिक प्रशंसा की गई कि इसमें पंचायत स्तर पर तथा जिला परिषद् स्तर पर सिर्फ महिलाओं को ही चुनाव लड़ने की बात कही गई।
महिला आंदोलन की एक और धारा को 'स्वायत्त महिला दलों का आंदोलन' कहा गया है। इन आंदोलनों का प्रसार सत्तर के दशक के मध्य में शहरी इलाके में हुआ। इसमें संदेह व्यक्त किया गया कि इसका कुछ धड़ा नक्सल तथा माओवादी विचार धारा से प्रभावित था।
वैश्विक स्तर पर भी 1974-75 के आस-पास का समय महिलाओं के लिए काफी महत्वपूर्ण था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1975 को महिला वर्ष घोषित किया तथा यह इतना प्रभाव डालने वाला था कि महाराष्ट्र में बहुत सारी गतिविधियों होने लगी। 8 मार्च को विश्व महिला दिवस मनाया जाने लगा। उसी साल अक्टूबर में पुणे में एक महिला सम्मेलन आयेजित किया गया जिसमें सारे राज्य भर से माओवादी समूह, समाजवादी और रिपब्लिकन पार्टियां, मा.क.पा. इत्यादि शामिल हुए तथा विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की।
आपातकाल के बाद महिला पत्रकारिता के क्षेत्र में भी काफी विकास देखने को मिला। इस समय ऐसी पत्रकार मा. हलाओं के लेख तथा पत्रिकाएं छपी जो महिलाएं अभी भी काफी सक्रिय है तथा महत्व रखती है जैसे:- मधु किश्वर, तवलीन - सिंह, मृणाल पाण्डेय तथा नलिनी सिंह । इत्यादि ।
उपरोक्त महिलाओं में किसी विषय को समझने तथा निष्पक्ष तरीके से अपनी बात लिखने में बड़ा अनुभव रहा । वास्तव में मधु किश्वर ने मानुषी नामक पत्रिका का नेतृत्व कर भारत की महिलाओं से संबंधित मुद्दों को उठाया है। दूरदर्शन के लोकप्रिय होने के बाद 80 के दशक में महिलाओं ने अपने काम से टी.वी. पत्रकारिता की भी स्थिति बदल दी। वो आज और अधिक महिलाओं की लोकप्रियता तथा दक्षता को बढ़ा रहा है।
विभिन्न पाटियों की महिलाओं ने पार्टी के अंदर रहकर ही विभिन्न सामाजिक समाचारों को सामने लाया तथा इसके लिए आंदोलन भी किए। जनता पार्टी के अंदर महिलाओं ने अपनी समाजवादी विचारधारा को दहेज प्रथा के विरोध में प्रेरित किया तथा 1919 में इसके लिए बड़े आंदोलन किए गए। इस दिशा में विभिन्न रैलियां तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम किए गए। इन आंदोलनों की सबसे बड़ी विशेषता इसको विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा दिया गया समर्थन था। इन महिलाओं ने दहेज प्रथा के खिलाफ कानून को सुधारने की मांग की। 'दहेज पाबंदी एक्ट' (1961) में इस आंदोलन के प्रभाव से संसद में पेश संशोधन को शक्ति मिली तथा संयुक्त विशेष समिति को मांजा गया।
इस संयुक्त समिति ने अपने स्तर पर पूरे देश का दौरा किया। 1981 और 1982 में इस समिति ने विभिन्न जगह जाकर महिलाओं के बयान को रिकॉर्ड किया तथा 1984 में दहेज संबंधी अपराधियों को दंड देने के कानून पेश तथा पास किए गए। कुछ अन्य साधारण कानून भी बाद में लागू किए गए। लेकिन इसके बाद ऐसे आंदोलन का पतन आरंभ हो गया। दहेज प्रथा को सूक्ष्म स्तर पर कोई आंदोलन रोक नहीं पाया तथा लगातार यह कुप्रथा जोर ही पकड़ती चली गयी।
सामाजिक समस्याओं में महिला के साथ बलात्कार का भी मुद्दा काफी महत्वपूर्ण रहा। 2011 में निर्भया के साथ घटना के बाद जो उबाल आया उसके कई सालों पहले ऐसे उबाल आ जो चुके थे। जैसे- हैदराबाद में रमीजा- बी. का मामला, महाराष्ट्र में मथुरा का मामला, पश्चिमी उत्तरर प्रदेश में 1980 में आया-त्यागी का मामला इत्यादि ।
विभिन्न महिला संगठनों तथा राजनीतिक दलों ने बलात्कार के मामले को कई स्तर पर उठाया तथा यह कोशिश की कि सरकार बलात्कार के दोषों को कड़ी सजा देने के लिए संसद में कानून बनाए। 1980 में इसका असर हुआ तथा में सरकार ने बलात्कार के विरोध में मौजूदा कानून के संशोधन के लिए बिल पेश किए। 3 साल बाद यानी 1983 में यह बिल पास हो गया। इसमें यह कहा गया कि बलात्कारी अगर हिरासत में हो तो इस जघन्य अपराध के लिए सबूत पेश करने की जिम्मेदारी अब अपराधी पर आ गयी तथा इससे गरिमा बनी रही कि महिला जो पीड़ित रहती हो उसे ऊपर से मानसिक यातना सहना न पड़े। अब अपराधियों को दण्ड मिलने की संभावना काफी बढ़ गयी तथा इसके लिए सरकार को प्रशंसा भी मिली। इससे महिला आंदोलन कर्ताओं को लगा कि सरकार ने ऐजेंडे को ही बदल दिया तथा यह स्पष्ट हो गया कि आंदोलन में सुधार को स्वीकार करने की इच्छा नहीं थी। इसी तरह 1985-86 में शाहबानो मामले में सरकार ने गलती कर दी। एक मजबूत विज्ञापन के पक्ष में खड़े दिखने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने वोट बैंक के कारण शाहबानों के पक्ष में हलफनामा न दायर कर शरियत के साथ खड़े हो गए तथा इस समय भी इसका विरोध खड़ा हो गया। राजीव गांधी की सरकार को महिला गरिमा के सामने मुस्लिमों की पहचान का प्रश्न अधिक प्राथमिक हो गया।
शाहबानो मामले के समय भारत सरकार की नीति असमंजस की रही। पहले तो शाहबानो का साथ दिया गया तथा बाद में चलकर इसे साम्प्रदायिक रंग में रंगता देख मुसलमानों के सामने छद्म निरपेक्ष बने रहने की जुगत में इस सरकार ने गलती कर दी।
इसके बाद राजस्थान में कहीं दूर ग्रामीण क्षेत्र में सती प्रथा के खिलाफ माहौल बनाया गया तथा यह देखा गया कि राजस्थान के अभी भी अति पिछड़े इलाके में सती प्रथा चल रही है। 1990 के आस-पास महिला आंदोलनों के बर्ताव में काफी परिवर्तन देखने को मिला। अब रैलियां, धरना प्रदर्शन के बदले महिला सेलों की स्थापना, सलाह देना, दस्तावेज इकट्ठे करना, शोध कार्य करना तथा प्रकाशन कार्य इत्यादि जैसे कदम आवश्यक हो गए थे।
आंशिक रूप से यह देखा गया कि कानून में सुधार को लेकर धरना-प्रदर्शन करने वाले सुधार होने के समय पर भी इसे स्वीकार नहीं कर पाते थे। दिल्ली स्थित बहुत सारी ऐसी संस्थाएं थी जो महिलाओं की समस्या ही नहीं वरण् इनकी खुशियों पर भी विचार करती थी। उन्होंने महिलाओं की रूचि जैसे :- संगीत, नृत्य, लोककला, जैसे मुद्दों पर भी अपने विचार प्रकट किए। इनमें विभिन्न पत्रिकाओं का भी योगदान काफी रहा। जैसे:- सहेली, सरिता, फेमिना, तेजस्विनी इत्यादि।
1990 के दशक में फिल्मों में भी महिलाओं की समस्या तथा विभिन्न सामाजिक मामले जो महिलाओं से सीधे जुड़े थे को दिखाया गया तथा इस विषय पर फिल्म भी बनाई गई। इसमें मिर्च-मसाला, मंडी, रूदाली, इत्यादि जैसी फिल्में हैं।
सरकार ने 1988 में विस्तृत रूप से महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना तैयार की। इसमें महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और राजनीतिक हिस्सेदारी की विस्तृत बातें की गई। 1989 में पंचायती राज बिल पेश किया गया तथा 1993 में पास कर दिया गया।
इन पंचायतों में 33 प्रतिशत महिलाओं की सीट आरक्षित हो गई। इस समय स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं के लिए कई योजनाएं आरम्भ की गयी। इसमें ग्रामीण इलाकों में महिला मंडलों या संघों का सुझाव दिया गया जिसने स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रयास किए।
इसने महिला मंडलों के सदस्यों की क्षमताएं एवम् जीवन स्तर बेहतर बनाने के लिए उन्हें कर्ज दिए। यह स्थानीय स्तर पर उपयोग की क्षमता के अनुरूप ही प्रभावशाली हो सकता था और इससे राजनीतिकरण के स्तर और महिला प्रश्नो की चेतना के अनुसार अंतर दिखाई देता है। कई संगठन सरकारी स्कीमों के संरक्षण और वैधता का प्रयोग करके सामान्य गरीब महिलाओं तक पहुंच सके, अन्यथा यह काम उनके लिए कठिन था।
स्थानीय तथा राष्ट्रीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने की कोशिशें अभी भी जारी है। स्थानीय स्तर पर महिलाओं को पंचायती राज तथा जिला परिषद् में 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। यह स्थान कई मायनों में विकास की गाथा लिख रहें हैं।
स्वतंत्रता के बाद महिलाओं ने हरेक क्षेत्र में अपनी पहचान बनायी है। प्रत्येक दशकों में महिलाओं की स्थिति विक. सशील तथा सफलता से भरपूर रही है। 1950 के दशक में जहां महिलाओं की शिक्षा का स्तर 10 प्रतिशत से भी कम था वह अब लगभग 70 प्रतिशति के आस पास है। महिलाओं के विकास में स्वास्थ्य का योगदान बहुत अधिक रहता है। स्वतंत्रता के तुरंत बाद जहां महिलाओं की स्थिति बहुत ही खराब थी मातृत्व दर के मामले में वहीं अब गुणवत्ता तथा आंकड़ों के आकार में भी सुधरी है।
लिगांनुपात के मामले में भारत की स्थिति पहले से बहुत ही बेहतर हुई है। जहां पहले यानी 1990 के दशक में यह 860-70 के बीच थी वहीं अब बढ़कर 940 हो गयी है। अगर हम 2001 तथा 2011 की गणना की तुलना करेंगे तो निम्नानुसार विभिन्न राज्यों की स्थिति के बारे में पता चलेगा कि कितना गुणात्मक सुधार आया है जैसे:- जहां केरल में लिंगानुपात 1058 था अब 2011 के अनुसार 1084 हो गया है। पुडुचेरी में यह तो पुरूषों से अधिक है। जहां पुडुचेरी में 2001 में 1001 लिंगानुपात था वहीं 2011 में यह 1037 हो गया।
जहां 2001 में पूर्ण अनुपात - 933 था। 
वहां 2011 में पूर्ण अनुपात - 943 था।
विभिन्न मामलों में देखने को मिलता है कि महिला सशक्तिकरण की स्थिति अच्छी हुई है फिर भी कई ऐसी समस्याएं हैं जो कहीं-न-कहीं सोचने पर मजबूर करती हैं। अभी भी बहुत आगे जाना है। सरकार के प्रयास है तो सही पर स्वयं भी इसके लिए तैयार रहना आवश्यक है।
साक्षरता के मामले में स्वतंत्रता के बाद पश्चिमी राज्यों से अधिक अच्छी स्थिति दक्षिणी राज्यों की रही। तमिलनाडू और केरल राज्य ने साक्षरता के मामले में विशेष कर महिला साक्षरता के मामले में स्वतंत्रता कि बाद लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। जहां साक्षरता के मामले में पूरे भारत में 10 से 14 वर्ष की आयु श्रेणी में महिला साक्षरता दर शहरी इलाकों में 86 प्रतिशत थी ( नामांकन स्तर के हिसाब से) वहीं अब नामांकन दर 98.9 प्रतिशत हो गयी है।
जहां स्वतंत्रता के बाद महिला विश्वविद्यालयों की संख्या 1950 में मात्र एक थी वहीं अब औपचारिक रूप से 14 महिला विश्वविद्यालयों की संख्या है। महिलाओं की तकनीकी शिक्षा समय के साथ बढ़ती जा रही है।
स्वतंत्रता के तुरंत बाद महिलाओं को इंजीनियर बनने का अनुपात 0.8 प्रतिशत था वहीं अब लगभग 42 प्रतिशत के आस पास है। ITI में महिला पुरूष का अनुपात भी बढ़ा है। हरेक 100 लड़के पर पहले सिर्फ 2 लड़कियों का ही प्रवेश ITI में सुनिश्चित हो पाता था वहीं अब हरेक 14 छात्र पर एक छात्रा का अनुपात है। किंतु अगर 50:50 की स्थिति प्राप्त हो जाती है तब ही महिलाओं के सशक्तिकरण को प्राप्त किया जा सकता है।
स्वतंत्रता के बाद से ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षण, त्याग तथा सहभागिता बढ़ाने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है। महिलाओं ने भी इस क्षेत्र में अपनी भूमिका से प्रशंसा पायी है। सरकार के द्वारा चिकित्सा शिक्षा में काफी बड़े स्तर पर महिलाओं का प्रवेश सुनिश्चित किया जा रहा है।
अब छोटे-छोटे शहरों में भी महिलाओं के अपने क्लिनिक तथा जिला अस्पताल में चिकित्सा सेवा में अपने योगदान को देते देखा जा सकता है। आशा, जननी, सहायिका जैसी योजनाएं स्वास्थ्य के क्षेत्र में महिलाओं को सशक्कत कर रही है। यह अपने आप में एक उदाहरण है।
वित्तीय क्षेत्र में भी महिलाओं को योगदान स्वतंत्रता के बाद से ही बढ़ता गया है। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए भारत की वित्तमंत्री भी रही थी। यह कहना उचित है कि 2000 ई. के बाद बैंकिंग क्षेत्र में महिलाओं का प्रभुत्व बना। चंपा कोचर, शिखा शर्मा, उषा किरण, अरुंधती भट्टाचार्य जैसी महिलाओं ने इस क्षेत्र को महिलाओं के लिए काफी खास बना दिया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भी महिलाओं ने काफी अच्छा विकास किया है। इंदिरा नुयी, जैसी महिलाओ ने अपने काम से लोगों को महिलाओ के विकास के प्रति अपना ध्यान खींचा।
किरण मजमूदार ने एक बार यह कहा कि अगर हम भारत के गांव में जाकर देखें तो हम जैसी कई महिलाएं मिल जाएंगी जिसे अवसर मिले तो वह कुछ भी कर सकती हैं। किरण मजमूदार Biotech India' की प्रमुख बनी। 
राजनीति में स्वतंत्रता के बाद महिलाओं के योगदान की चर्चा हम पहले भी आंदोलन से संबंधित मुद्दों पर करते रहे हैं। राजनीतिक क्षेत्र में स्वतंत्रता के बाद महिलाओं ने अपने कार्य से एक नया उदाहरण पेश किया है। यह सही है कि संसद में महिलाओं की प्रतिशतता अभी 12 प्रतिशत ही है तथा आरक्षण पर सिर्फ भाषण ही दिया जाता है पर महिलाएं जो करना चाहती हैं, अपनी इच्छा शक्ति से उन्होंने राजनीति में वो कर दिखाया है ।
स्वतंत्रता के बाद से ही संसद में जहां तारकेश्वरी सिन्हा जैसी शख्सियत बिहार जैसे राज्य से आकर महिला की आवाज बनीं वहीं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में सुचेता कृपलानी ने अपनी भूमिका को विस्तृत किया तथा विभिन्न उदाहरण पेश किए।
इंदिरा गांधी को विरासत में स्थान जरूर मिला था पर उन्होंने अपनी मेहनत तथा प्रतिभा से एक व्हाइट नेता की भूमिका में बेहतर कार्य किए तथा उदाहरण पेश किए। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में भारत ने बहुत सारे कीर्तिमान स्थापित किए।
इंदिरा गांधी के बाद भी राजनीति के क्षेत्र में भारतीय महिलाओं ने अपने उच्च मुकाम हासिल किए। भारत की पूर्व विदेश मंत्री स्व. सुषमा स्वराज हो या रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण इत्यादि। ये महिलाएं आज भारत की सबसे संवेदनशीन सुरक्षा मामलों के समिति की सदस्य है। यह एक ही दिन में नहीं हो गया है। इसके लिए इन्होंने अपनी मेहनत से महिला समुदाय के हितों को राष्ट्र के पटल पर रख दिया है।
महिलाओं ने भारतीय राजनीति को एक अलग पहचान दी है तथा पंचायत सत्ता से लेकर संसद तक उन्होंने एक अलग स्थान हासिल किया है। इनकी उपस्थिति संसद तथा विधानसभा में कम है पर भविष्य उज्जवल है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता।
आजकल महिलाएं हर जगह हैं। फिल्मों में भी स्वतंत्रता के बाद से महिलाएं अपने कामों से विशेष योगदान देती आ रही है। जहां स्वतंत्रता के समय देविका रानी, मधुबाला, वैजयंती माला तथा नरगिस जैसी अभिनेत्रियों ने अपनी प्रतिभा से भारतीय फिल्मों को एक नयी उड़ान दी वहीं नरगिस तथा बैजयंती माला ने राजनीति में भी अपना परचम लहराया। नरगिस को तो राज्यसभा सदस्य भी बनाया गया था।
फिल्मों के द्वारा भारतीय महिलाओं ने भारत की विभिन्न भाषाओं की दीवारों को तोड़ा तथा तमिल, तेलगु, मलयालम, कन्नड़, हिन्दी जैसी भाषाओं को एक करने की कोशिश की। इस भूमिका में प्रसिद्ध अभिनेत्री स्वर्गीय श्री देवी को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होनें 70 के दशक में तमिल फिल्मों से अपना कैरियर आरंभ कर लगभग 50 सालों तक तमिल, तेलूगु, मलयालम, कन्नड़ हिन्दी फिल्मों में अपना राज कायम किया। श्री देवी ने भाषा की दीवारों को तोड़कर हिन्दी फिल्मों की पुरूषवादी मानसिकता को बदल डाला तथा अभिनेत्रियों के आदर भाव को जगा दिया।
महिलाओं ने स्वतंत्रता के बाद वैश्विक स्तर पर सौंदर्य के क्षेत्र में भी अपना अहम योगदान दिया है। जहां 60 के दशक में रीता फारिया ने मिस वर्ल्ड की प्रतियोगिता को जीत कर भारत का नाम रौशन किया था वहीं 1990 के दशक के बाद तो इस क्षेत्र में गजब का ही सकारात्मक परिवर्तन आया।
1994 में सुष्मिता सेन तथा ऐश्वर्या राय ने क्रमशः मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड का टाइटल जीतकर भारत का दुनिया के मानचित्र पर गौरव बढ़ाया। उसके बाद युक्ता मुखी, डायना हेडेन, लारा दत्ता, प्रियंका चोपड़ा जैसी महिलाओं ने भी ये पदक जीते। आज भारत की मलिाओं को इनसे बहुत बड़ी प्रेरणा मिल रही है।
वैसे तो संविधान में महिलाओं को बहुत सारे अधिकार प्रदान किए गए है पर ये उपलब्धियां महिलाओं के द्वारा ली गयी अपनी उपलब्धियां है। इसमें सबसे अधिक योगदान उनके स्वयं का है। सबसे बढ़कर तो हरेक दशक में इनकी जाग. रूकता का बढ़ना तथा विकास तथा शिक्षा के प्रति इनका उत्साह प्रशंसनीय है। आज भारतीय महिलाएं अंतरिक्ष विकास से लेकर भूगर्भीय विज्ञान तक अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं।
महिलाओं की विकसित स्थिति को प्राप्त करने का समय अब नजदीक आ गया है पर चुनौतियां भी कम नहीं है। भारतीय महिलाओं के सामने विभिन्न चुनौतियों की बात की जाए तो सबसे पहले आता है पुरूषों के मुकाबले शिक्षा का अनुपात कम होना।
साक्षरता की दर के मामले में भारत की उपस्थिति स्वतंत्रता के बाद से काफी अच्छी हुई है। जहां 1951 में साक्षरता दर सिर्फ 18.33 थी, वहीं 2011 में यह 74.04 हो गई। महिला साक्षरता दर जहां 1991 में 9 प्रतिशत थी, वहीं 2011 में 65 प्रतिशत थी। महिला साक्षरता दर में वृद्धि होने के बावजूद अभी भी पुरूषों के मुकाबले काफी पीछे हैं। सरकारी सुविधाओं तथा ग्रामीण स्तर पर विभिन्न योजनाओं के द्वारा इसमें सुधार की कोशिश की जा रही है।
दूसरी चुनौति लिंगानुपात है। 2011 में लिंगानुपात 940 था वहीं 1951 में लिंगानुपात 865 था। किंतु अभी भी ऐसे राज्य है जहां लिंगानुपात में अधिक अंतर है हरियाणा जैसे राज्यों में तो इसमें 150 से थोड़ा कम का अंतर है। सरकार की तरफ से 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना के द्वारा इसे विकसित करने की बात की जा रही है कि लड़कियां लड़कों से कम नहीं होंगी तथा इस मामले में सफलता भी मिल रही है।
तीसरी चुनौती सुरक्षा की है। शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की सुरक्षा अभी भी कई प्रकार से मुद्दा बन जाती है। यह मुद्दा शहरी क्षेत्र में अधिक है। काम करने वाली महिलाओं को कार्य स्थल पर तथा यात्रा करने वाली महिलाओं को अपने साथ किसी स्थान पर चलते हुए विभिन्न नैतिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कार्य किए हैं। डिजिटल युग में विशाखा जैसी योजना या कानून-व्यवस्था के स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए विभिन्न योजना आरंभ करवाना एक नई प्रकार की शुरूआत है। घरेलू हिंसा की पीड़ित तथा तेजाब पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने की भी कोशिश सरकार तथा न्यायापालिका के स्तर पर की जा रही है।
सबसे आवश्यक यह है कि महिला सशक्तिकरण के लिए स्वयं महिला को ही जगना होगा तथा हम सभी को इसमें इनका योगदान करना होगा। विभिन्न महिला आंदोलन तथा रैलियां इसमें अस्थायी रूप से ही मदद कर सकती हैं लेकिन जागरुकता तथा शिक्षा और इसके अलावा इच्छा शक्ति इन्हें आगे बढ़ा सकती है। आने वाला कल महिलाओं का ही है।
आजादी के बाद सरकार के द्वारा महिलाओं के लिए उठाए गए कदम तथा विभिन्न योजनाएं :
1. महिला साक्षरता योजना
2. दहेज प्रथा विरोधी अधिनियम 
3. हिन्दू पुनर्विवाह अधिनियम
4. प्रसुति सहायता कार्यक्रम
5. पंचायती राज विधेयक
6. स्वयं सिद्धा योजना
7. बाल विवाह विरोधी अधिनियम
8. वृद्धा पेंशन तथा विधवा पेंशन योजना
9. जननी-सहायता योजना
10. सबला योजना
11. स्वयं सहायता समूह
12. आंगनबाड़ी योजना
13. उज्जवला योजना
14. कस्तूरबा गांधी बालिका शिक्षा योजना
15. महिला प्रशिक्षण योजना
16. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना
17. घरेलू हिंसा विरोधी कानून
18. अहिल्या बाई सहायता योजना
19. राष्ट्रीय महिला आयोग इत्यादि ।
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Sun, 01 Oct 2023 07:45:14 +0530 Jaankari Rakho
जम्मू&कश्मीर: चुनौतियां https://m.jaankarirakho.com/400 https://m.jaankarirakho.com/400 जम्मू-कश्मीर: चुनौतियां
1. आजादी से लेकर वर्तमान समय तक की चुनौतियां
जम्मू-कश्मीर एक ऐसा राज्य है जिसने स्वतंत्रता के समय स्वतंत्र रहने की इच्छा जाहिर की। भारत की सरकार ने इस पर ऐतराज भी नहीं किया था क्योंकि एक तो इसकी संस्कृति अपनी पहचान वाली थी दूसरी मुस्लिम बहुल आबादी वाला राज्य होने के नाते उसे भारत छोड़ना नहीं चाहता था। भारत सरकार की मंशा यह थी कि अगर हैदराबाद के जैसे इस राज्य को मिलाया जाएगा तो हो सकता है कि पाकिस्तान सीमावर्ती राज्य होने के कारण कोई परेशानी खड़ा करे।
जब जम्मू कश्मीर के राजा ने यह कहा कि स्वतंत्र रहना है तो अधिक आपत्ति किसी को नहीं हुई पर पाकिस्तान की जो नियत थी तथा जिस नीयत के साथ उसका निर्माण ही हुआ था, वह नकारात्मक था तथा लोभ से भरा था। यदि 1947 में कश्मीर स्वत: पाकिस्तान में मिला होता तो भारत को इस पर कोई दिक्कत नहीं होती परंतु अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान ने जो हमला करके जबरदस्ती कश्मीर को अपने देश में मिलाने की कोशिश की वह सर्वथा असभ्य कृति थी। पाकिस्तानी सेना और पठान कबीलाईयों का आक्रमण और शेख अब्दुल्ला जैसे नेताओं के कारण जम्मू कश्मीर के राज्य का भारत में विलय का द्वार निश्चय हुआ तथा स्थिति बदल गयी।
पाकिस्तान ने इस आधार पर कश्मीर पर दावा किया कि वह मुस्लिम बहुल राज्य है। यह धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए अमान्य था जिसने दो राष्ट्र सिद्धांत को कभी स्वीकार नहीं किया था।
अब कश्मीर भारत के लिए सिर्फ जमीनी हिस्सा नहीं रह गया था वरण् समाज के मूलभूत चरित्र पर अतिक्रमण तथा भारतीय राजसत्ता की प्रतिष्ठा का प्रश्न था।
सरदार पटेल का कहना था कि अगर भारत से जम्मू कश्मीर अलग हो गया तो भारत की धर्मनिरपेक्षता पर एक सवाल खड़ा होगा तथा हम द्वि-राष्ट्रवाद के सिद्धांत को मानने वालों की जमात पर आकर खड़े हो जाएंगे।
अक्टूबर 1974 में कश्मीर के भारत में विलय के ठीक बाद भारत ने जम्मू कश्मीर के लोगो के लिए अंतर्राष्ट्रीय तत्वावधान में जनमत संग्रह करने का प्रस्ताव दिया था। जिससे इस पर कोई फैसले तक पहुंचा जा सके। परंतु इसमें एक शर्त थी कि जनमत संग्रह कराए जाने से पहले पाकिस्तानी सेना को कश्मीर के हिस्से जो पाक सेना के कब्जे में है उसे खुली करना होगा।
भारत को भी इस स्थिति में जनमत संग्रह के परिणाम को स्वीकार कर लेने में कोई हर्ज नहीं था। लेकिन जनमत संग्रह नहीं हो पाया क्योंकि पाकिस्तान को न स्वयं पर और न कश्मीर की जनता पर विश्वास था तथा उसने शर्त के आधार को न मानकर अपनी सेना को ष्टच्वज्ञष्ठ से नहीं हटाया तथा भारत के साथ उलझ गया।
अब जम्मू कश्मीर को केन्द्र में रखकर ही पाकिस्तान अपनी नीति बनाने लगा तथा अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों के नजदीक होने लगा। अमेरिका भी भारत को उसके गुटनिरपेक्ष वाली नीति के कारण हतोत्साहित करना चाहता था तथा इसी तर्ज पर अमेरिका पाकिस्तान को एक आक्रामक तथा मूर्खवादी गैर समझौतावाद वाले देश के तौर पर उत्साहित करने लगा।
1956 के बाद भारत सरकार ने अपनी नीति के बारे में पाक को और विश्व समुदाय को बता दिया कि अब भारत में कश्मीर का विलय एक वास्तविकता बन गया है। तथा 1953 के बाद या पहले की स्थिति में काफी अन्तर है। अब 1953 के प्रस्तावित मुद्दे कोई प्रासंगिकता नहीं रखते। उसके बाद भारत के लिए जम्मू-कश्मीर एक अटूट हिस्सा बन गया तथा भारत ने च्ज्ञ की स्थिति को भी अंतर्मन से तत्काल स्वीकार कर लिया।
2. जम्मू-कश्मीर तथा धारा - 370 
अक्टूबर 1947 में भारत में विलय के बाद जम्मू-कश्मीर में विलय के जिन दस्तावेज पर हस्ताक्षर हुए उनके द्वारा इस रियासत को भारतीय संविधान की धारा 370 के अन्तर्गत एक विशेष दर्जा प्रदान किया गया। जम्मू-कश्मीर ने भारतीय संघ में विलय सिर्फ प्रतिरक्षा विदेश और संचार मामले में ही किया था तथा अन्य सभी मामले में अपनी स्वायत्रत्ता बनाए रखी थी। इस राज्य को अपनी अलग पहचान बनाए रखने तथा अपना अलग संविधान बनाने, अलग झण्डा रखने तथा अलग राज्य प्रमुख निर्वाचित करने का अधिकार दे दिया गया।
इसका अर्थ यह था कि मौलिक अधिकारों से संबंधित भारतीय संविधान की धाराएं जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती और न ही सर्वोच्च न्यायालय चुनाव आयोग पर और भी सवैधानिक संस्थाओं जैसे महालेखाकार का वहां कोई अधिकार क्षेत्र लागू नहीं होता।
वैसे यह साफ कर देना उचित है कि 370 कोई स्थायी धारा नहीं थी तथा दूसरी तरफ यह विलय से संबंधित नहीं बल्कि केन्द्र राज्य संबंध से संबंधित थी।
1956 में जम्मू कश्मीर की संविधान सभा ने इस राज्य के भारत में विलय की मंजूरी दे दी। सालों के दौरान राज्यों के बीच जम्मू - कश्मीर की पहचान सिर्फ 370 के कारण नहीं रही। धीरे-धीरे व्यावहारिक रूप से धारा 370 के प्रावध नों की जटिलता को कम किया जाता रहा । उदाहरणस्वरूप संघ की संस्थाओं जैसे:- सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग और महालेखा परीक्षक एवम् संविधान की मौलिक अधिकारों से संबंधित धाराओं को भी इस राज्य पर लागू कर दिया गया। इस राज्य के लिए भी कानून बनाने का संसद को अधिकार तथा राज्य सरकार के ऊपर राष्ट्रपति का नियंत्रण तथा राष्ट्रपति शासन लगाने के अधिकार को भी बढ़ा दिया गया।
उपरोक्त प्रावधानों के साथ जम्मू कश्मीर की प्रशासनिक सेवाओं को भी अखिल भारतीय सेवाओं के साथ जोड दिया गया तथा राज्य की प्रशासनिक सेवा को भारतीय प्रशासनिक सेवा के साथ एकीकृत कर दिया गया। इस बदलाव का सबसे बड़ा कदम सद-ए-रिसासत के नाम को बदलकर राज्यपाल कर दिया गया तथा प्रधानमंत्री को मुख्यमंत्री कर दिया गया। 
कश्मीर की आबादी के एक बड़े हिस्से ने राज्य की स्वायत्तता से संबंधित प्रावधानों में से उपरोक्त विकास या बदलाव को गलत बताया।
धारा 370 ने राज्य के भारत में संपूर्ण विलय, सरकारी सेवाओं में अधिक हिस्सा और यहां तक कि जम्मू एवम् कश्मीर से अलग करने को लेकर जम्मू में एक महान आंदोलन को जन्म दिया। इस आंदोलन के कारण कई प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ा इस आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती थी कि जम्मू-कश्मीर को धर्म के आधार पर बांटने से रोकना। जम्मू-हिन्दू बहुल था तथा कश्मीर मुस्लिम बहुल था । यह राज्य अपने आप में एक धर्मनिरपेक्षता की सबसे बड़ी भूमि थी।
जम्मू में इस आंदोलन का नेतृत्व जम्मू प्रजा परिषद श्रच्च कर रही थी। अचानक 'JPP' का 'जनसंघ' में विलय हो गया। इसने इस आंदोलन को अखिल भारतीय स्तर तक उठाया। जनसंघ के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस मुद्दे को हर तरीके से उठाया। श्री मुखर्जी ने धारा 370 के खिलाफ तथा जम्मू-कश्मीर में भारत के पूर्ण अधिकार के लिए काफी प्रसास किए। श्री मुखर्जी ने कश्मीर को भारत का मुकुट कहा तथा इस संकल्पना को आगे किया कि कश्मीर भारत के अंग के रूप में है तथा इसे काटा नहीं जा सकता। 23 जून 1951 को श्री नगर जेल में जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्षत की संदेहास्पद स्थिति में मृत्यु हो गई। कहा गया कि उनकी हृदयगति रुक गयी है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी जेल भरो आंदोलन का नेतृत्व कर जेल चले गए थे। अब प्रजा परिषद जनसंघ से अलग हो गई तथा फिर उसकी राजनीति जटिल होती गई। 
अब जम्मू कश्मीर की स्थिति तथा उससे संबंधित मुद्दों का केन्द्र बिंदु शेख अब्दुल्लाह हो गए। कश्मीर से संबंधित भारत की आंतरिक समस्याओं की शुरूआत शेख अब्दुल्लाह के साथ हुई। वे एक असाधारण साहस और निष्ठा के ध नी व्यक्ति थे। उनका एक व्यापक जनाधार था जैसा कि विपीन चन्द्रा अपनी पुस्तक में उनका गुणगान करते हैं। पर यह भी वास्तविकता थी कि अब्दुल्लाह अस्थिर दिमाग से कार्य करने वाले थे। तानाशाही प्रवृत्ति के थे तथा मनमतंत्री थे।
कश्मीर घाटी में अब्दुल्लाह की राजनीति एक पेंडुलन (दोलन) वाली हो गई। अब्दुल्लाह भारत सरकार की धर्मनि. रपेक्षता की छवि को नीचा दिखाने तथा साम्प्रादायिक ताकतों को जम्मू-कश्मीर की समस्या की जड़ को रेखांकित करते थे को ऊपर दिखाने के जी तोड कोशिश करने लगे।
शेख अब्दुल्लाह अब पूरी तरह से भारत में पूर्ण विलय करने की वकालत करने वाले राष्ट्रवादी तथा पाकिस्तान के पक्ष में विलय की वकालत करने वाले अलगाववादी के बीच एक 'दोलन बिंदु' बन गए। आखिर उनको यह पता नहीं था कि किधर जाने से कितना लाभ होगा।
शेख अब्दुल्लाह समय बीतने के साथ यह लगने लगा कि अगर स्वायत्तता तथा विलय के सीमा रेखांकन को फोकस किया जाए तो बात बन सकती है। अतः उन्हें पूर्ण स्वायत्तता की याद आयी और वह इस पर अपनी राजनीति करने लगे। धीरे-धीरे शेख अब्दुल्लाह की मांग में आक्रामकता आ गयी तथा उसने विदेशी ताकतों से भी इस स्वयत्तता के लिए मदद मांगना आरम्भ कर दिया। विशेषकर अमेरिका से ।
शेख अब्दुल्लाह ने अब अपनी राजनीति का केन्द्र बिन्दु कश्मीर की आजादी को बनाया तथा यह कहा कि हमें जितनी जल्दी स्वायत्तता मिल जाएगी, भारत के लिए उतना ही अच्छा होगा। देखें तो भारत सरकार में अब्दुल्लाह के साथ डील करने के अधिक विकल्प मौजूद नहीं थे।
नेहरू ने अब्दुल्लाह को बार-बार यही कहा कि धैर्य रखें तथा भारत पर तथा हमारी सरकार पर विश्वास रखें पर अब्दुल्लाह को कोई असर नहीं हुआ। वह कश्मीरी मुसलमानों को साम्प्रदायिक तौर पर भड़काने लगे तथा जुलाई 1953 में उन्होंने औपचारिक रूप से यह मांग की कि "कश्मीर को आजाद होना चाहिए।"
वास्तविक रूप में अब्दुल्लाह की मांग को सिर्फ इसी मुहावरे में रेखांकित किया जा सकता था कि “बेगाने की शादी में अब्दुल्लाह दीवाना" क्योंकि वह अपनी पार्टी के बहुमत के भी खिलाफ थे तथा भारत की ओर विश्वसनीय रूप से जुड़े भी नहीं थे।
उनकी पार्टी ने उनके इस विघटनात्मक व्यवहार तथा गलत रवैये का विरोध किया तथा यहां तक कि उनके मंत्रिमंडल के साथियों ने भी उन पर भ्रष्टाचार, खतरनाक रवैया तथा तानाशाही का आरोप लगाया तथा उनकी बर्खास्तगी की मांग करने लगे। उस समय अब्दुल्लाह को कश्मीर का प्रधानमंत्री कहा जाता था तथा कश्मीर में एक सद्र - ए - रियाशत भी होते थे। उन्हें ही प्रधानमंत्री की बर्खास्तगी की शक्ति प्राप्त थी। इस मांग में सत्यता को देखते ही तत्कालीन सद्र - ए - रियाशत ने अब्दुल्लाह को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया तथा बख्शी गुलाम मुहम्मद को प्रधानमंत्री बना दिया। गुलाम मुहम्मद की सरकार ने अब्दुल्लाह को गिरफ्तार कर लिया। अब्दुल्लाह अब कश्मीर के लोगों के लिए हीरो बनने की कोशिश करने लगे। भारत सरकार कतई नहीं चाहती थी कि ऐसा हो । वह सदा के लिए अपनी गतिशीलता को कश्मीर में सकारात्मक रूप में दिखाना चाहती थी।
अब नेहरू को लगा कि अगर अब्दुल्लाह को रिहा करवा दिया जाए तो भारत की सरकार की प्रासंगिकता बढेगी तथा अब्दुल्लाह को भी अपनी राजनीति सकारात्मक रूप में आरम्भ करने में मदद मिलेगी। शेख नेहरू के मित्र थे तथा नेहरू को कश्मीर के लोगों के भी नजर में सकारात्मक भाव पेश करने की चाहत थी।
8 जनवरी 1958 को नेहरू की सहायता से शेख अब्दुल्लाह को रिहा कर दिया गया। हालांकि नेहरू कभी नहीं चाहते थे कि राज्य सरकार के कार्यों में हस्तक्षेप किया जाए। शेख अब्दुल्लाह जेल से निकलने के बाद तीन महीने तक निष्क्रिय रहे। फिर उन्होंने अपनी साम्प्रदायिक राजनीति शुरू कर दी तथा आजादी के गीत अलापने लगे। 1 अप्रैल 1958 में उन्हें फिर गिरफतार कर लिया गया। अब्दुल्लाह को इतिहास बनाने का अवसर मिला था पर उन्होंने साम्प्रदायिक्ता तथा अवसरवाद को अपनी राजनीति का केन्द्र बिंदु मानकर इस अवसर को खो दिया।
अप्रैल 1964 में नेहरू ने अब्दुल्लाह को फिर से रिहा करवा दिया। वैसे यहां पर यह साफ कर देना आवश्यक है कि अब्दुल्लाह की नीति अभी तक नहीं बदली थी और अभी भी उसने अपने अवसरवाद तथा साम्प्रदायिक्ता को नहीं छोड़ा था पर अब इन सभी नीतियों के बीच में वह कश्मीर की जनता की आत्मा को स्वच्छन्द करने के लिए आत्म निर्णय के अधिकार को देने की बात को ले आए थे। उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार दिया जाए तथा इसके लिए हम संघर्ष करते रहेंगे ।
उन्हें पाकिस्तान समर्थक राजनीतिक समूहों जिसका नेतृत्व मौलवी फारूख और आवामी एक्शन कमिटी कर रही थी का भी विरोध का सामना करना पड़ रहा था। अब्दुल्लाह की कारिस्तानी के कारण उन्हें फिर 1965 में नजरबंद कर दिया गया तथा 1968 में जाकर ही उन पर से यह उठाया गया।
अब्दुल्लाह के बाद गुलाम बख्शी की सत्ता आयी। वह एक कठोर तथा निरंकुश शासक निकला। उसने व्यापक तरीके से अपने पद का दुरूपयोग किया तथा उसके शासन में भ्रष्टाचार काफी मात्रा में बढ़ गया। गुलाम बख्शी के बाद मी०एम०सादिक और फिर मीर कासिम उत्तराधिकारी बने जो इमानदार थे । परन्तु सादिक और कासिम की पहुंच दिल्ली तक कम ही थी तथा अब्दुल्लाह की तरह इसके Background भी न के बराबर थे।
कासिम और सादिक के समय एक बहुत अच्छी बात यह रही कि जहां भ्रष्टाचार कम हुआ वहीं पाकिस्तान परस्त समूहों की स्थिति ठीक नहीं रही, इसका मतलब था कि इन्हें किसी बडे निर्णय में भागीदार बनाया जाए। 1971 आते ही कुछ राजनीतिक फिजाएं परिवर्तित हो गयीं तथा यह पूर्ण रूप से परिलक्षित हो गया कि बांग्लादेश के निर्माण के बाद अब कश्मीर की प्राथमिकताएँ बदल जाएंगी। इसका असर भी हुआ। पाकिस्तान परस्त आवामी एक्शन लीग तथा अलगाववादी 'प्लेबी साइट फ्रंट' को गहरा झटका लगा तथा यह लगने लगा कि अब परिवर्तन होकर रहेगा।
अब्दुल्लाह को आंशिक तौर पर भारतीय दर्शन का बोध हो गया था तथा भारत की प्रक्रियाओं तथा कानूनों में उन्होंने विश्वास जताने की इच्छा जाहिर की। अब्दुल्लाह को यह आत्मज्ञान हो गया था कि भारत सरकार के सामने जनमत संग्रह की मांग करना बेमानी है क्योंकि जनमत संग्रह के लिए सबसे अधिक फायदे में दिखने वाले पाकिस्तान की स्थिति ऐसे ही एक हारे हुए देश की थी।
अब्दुल्लाह ने अनौपचारिक रूप से इंदिरा गाँधी को यह कहा कि 'जनमत संग्रह की मांग नहीं की जाएगी तथा इस परिस्थिति में सिर्फ कश्मीर को अधिक अधिकार देने की मांग पर वह अपनी बात रखेंगे। "
अतः लगातार 1953 से 1975 तक भटकने वाले अब्दुल्लाह को फिर कश्मीर-जम्मू का मुख्यमंत्री बना दिया गया वे तथा नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता भी चुने गए। जुलाई 1977 में विधान समय के चुनाव हुए तथा उनकी जीत हुई। उन्होंने काफी कुछ बदलाव देखे तथा स्वयं भी बदलाव की रथ पर सवार होकर भारतीय संघ का एक अंग बनकर कार्य करने की सोच ली।
1982 में शेख अब्दुल्लाह की मृत्यु हो गई तथा उनके बेटे फारूख अब्दुल्लाह को मुख्यमंत्री बनाया गया फारूख अब्दुल्लाह के मुख्यमंत्री बनने के बाद तुरंत कोई ऐसा मुद्दा सामने नहीं आया जिसमें कोई अशांति फैले। 1983 में जून में मध्यावधि चुनाव कश्मीर में कराए गए तथा फिर एक बार नेशनल कांफ्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ। परन्तु शीघ्र ही फिर एक बार फारूख अब्दुल्लाह और केन्द्र सरकार के बीच विवाद उत्पन्न हो गया।
1984 के जुलाई महीने में फारूख अब्दुल्लाह के खिलाफ एक तख्तापलट की कारवाई में उनके बहनोई जी. एम. शाह ने नेशनल कांफ्रेस को विभाजित कर दिया। केंद्र सरकार के पास अब्दुल्लाह को हटाने का एक अवसर हाथ लग गया। इंदिरा गांधी जी ने राज्यपाल जगमोहन की रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए वहां पर राष्ट्रपति शासन की बात की पर राज्यपाल जगमोहन ने अब्दुल्लाह को बर्खास्त करके जी. एम. शाह को गद्दी पर बैठा दिया।
जी. एम. शाह के कार्यकाल को दुर्भाग्यपूर्ण काल माना जाता है। उनके कार्यकाल में कश्मीरी पंडितों पर हमले आरम्भ हो गये तथा शाह ने कुछ ऐसा नहीं किया जिससे इस पर रोक लग सके। जी. एम. शाह एक भ्रष्ट तथा अपरिपक्व शासक निकले। मार्च 1986 में उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया बाद में 1987 में परिस्थिति में परिवर्तन आया। 1987 में फारूख अब्दुल्लाह ने कांग्रेस से विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन किया। अब कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेस की सरकार बनाने की मांग जनता से की गई। सरकार बन भी गयी लेकिन जी. एम. शाह के शासन काल में आरंभ हुए हमले और हिंसा नहीं रुकी। घाटी में अलगाववादी आंदोलन जोर पकड़ने लगा।
अब घाटी में अलगाववादी समूहों जिसमें 'हिजबुल मुजाहिद्दीन', 'जम्मू एंड कश्मीर लिबरेशन फ्रंट' जैसों ने हिंसक विद्रोह आरंभ कर दिया इन समूहों को पाकिस्तान से नैतिक, वित्तीय तथा प्रशिक्षण सहायता दिया जाने लगा। इनकी शक्ति बढ़तो गयी तथा धीरे-धीरे इन्होंने कश्मीरी पंडितों को घाटी से निकाल दिया इन्होंने लगातार पुलिस थाने, घर तथा नागरिक प्रतिष्ठानों पर हमले आरंभ कर दिए। वी. पी. सिंह सरकार जब केंद्र में बनी तो उन्होंने अब्दुल्लाह सरकार को बर्खास्त कर दिया तथा यह एक अच्छा कदम माना गया क्योंकि राजीव गांधी के साथ फारूख अब्दुल्लाह के गठबंधन की सरकार के समय कश्मीर की हालत एकदम खराब हो गयी थी तथा दिनों दिन आतकंवादी घटनाएँ घटती जा रहीं थीं। अब वी.पी. सिहं न' 1990 म राष्टपू ति शासन कश्मीर में लगा दिया। फिर भी लगातार आतंकी घटनाएँ घटती ही गई।
वी.पी. सरकार के गृहमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद के परिवार के एक सदस्य को आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया तथा इसके बदले सरकार को कई आतंकी को छोड़ना पड़ा। 1990 से 1996 तक लगातार कश्मीर में राष्ट्रपति शासन रहा तथा संयुक्त मोर्चा सरकार में 1996 में जम्मू-कश्मीर में विधान सभा चुनाव हुए तथा नेशनल कांफ्रेस के नेता फारूख अब्दुल्लाह को मुख्यमंत्री बनाया गया। फिर भी हुर्रियत कांफ्रेस तथा जे. के. एल. एफ. की तरफ से आजादी की मांग की जाती रही तथा इसके नेताओं को नजरबंद या जेल में डाला जाता रहा हिजबुल को आतंकी संगठन घोषित किया गया तथा स्थिति बहुत ही अप्रिय होती गयी।
फारूख अब्दुल्लाह ने अपने 6 साल का कार्यकाल पूरा किया तथा 2002 में विषम परिस्थितियों में अटल बिहारी बाजपेयी की छक्। सरकार ने जम्मू-कश्मीर में विधान सभा चुनाव कराए। 2002 का चुनाव एक अच्छा कदम माना जाता है। 2002 में परिस्थिति को देखते हुए अधिकतर कयास लगाते जा रहे थे कि चुनाव असफल हो जाएंगे परंतु ऐसा नहीं हो सका। चुनाव हुए और जमकर जनता ने मत भी दिया। जी. डी. पी. और कांग्रेस के गठबंधन को भारी-जीत मिली तथा कांग्रेस और जी.डी.पी. में 3-3 साल नेतृत्व करने के समझौते का रूप दिया गया। यह गठबंधन मुफ्ती सईद और कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के बीच का था।
2002-2005 के बीच मुफ्ती मुहम्मद सईद को मुख्यमंत्री बनाया गया तथा 2005 से 2008 तक गुलाम नवी आजाद कांग्रेस के मुख्यमंत्री बने। इनका कार्य काल खत्म होने के बाद जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू कर चुनाव करवाए गए तथा 2009 में नेशलन कांफ्रेस के नेता ओमर अब्दुल्लाह मुख्यमंत्री बने। 2009 के बाद जम्मू-कश्मीर में कई नये प्रयोग हुए तथा यह कहा जा सकता है कि जनता की सहभागिता लोकतंत्र में बढ़ी परंतु आतंक घटनाओं को पूरी तरह रोका नहीं जा सका।
2015 में जब केंद्र में भाजपा सरकार आ गयी थी तो चुनाव कराए गए। इस 2015 के विधान सभा चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक सीटें मिली पर घाटी में सईद की पार्टी को बहुमत की सीटें मिली तथा जम्मू में भाजपा को। भाजपा और जी.डी.पी. के बीच एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर सरकार बनी तथा सईद बहुत ही अनुभवी मुख्यमंत्री के रूप में अपना कार्य करने लगे। 2016 में अचानक मुफ्ती मुहम्मई सईद की मृत्यु हो गई तथा कुछ दिनों तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा।
सईद के कार्यकाल में जम्मू-कश्मीर की स्थिति पहले से अधिक संवेदनशील हो गयी। सईद के जाने के बाद उनकी पुत्री यानी मेंहबूबा मुफ्ती ने कार्यभार संभाला तथा भाजपा के साथ मिलकर सरकार चलाने लगी। परंतु इनका वैचारिक आधार भाजपा के विचार से कार्य अलग था। यह पूरी तरह से दो ध्रुवों के बीच की स्थिति थी जिससे कहीं से दो पार्टी के बीच कोई समन्वयन नहीं दिख सकता था।
यह कहा जा सकता है कि कश्मीर समस्या के पीछे कहीं न कहीं विचार बिखराव भरी संकल्पना ही रही है। दिसम्बर 2017 में भाजपा ने मेहबूबा मुफ्ती से अपना समर्थन वापस ले लिया इसके अलावा भाजपा ने कभी भी कोई प्रयास नहीं किया कि उसकी जोड़-तोड की सरकार बन जाए। 1950 के दशक से ही कश्मीर राज्य की समस्या लगातार चलती आ रही है। कुछ ऐसे कारणों से भारतीय जनता की दूरी अपने ही राज्य कश्मीर में रही है। कश्मीर में मजबूत प्रशासन का सख्त अभाव रहा है। 1996 तक केन्द्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर की स्थिति को तत्काल रूप से कुछ दिनों के लिए ही ठीक करने का प्रयास किया तथा यह कभी कोई योजना नहीं बनायी कि इसका स्थायी समाधान कैसे निकालेगा? 2002 के समय कश्मीर समस्या के समाधान के लिए अटल बिहारी बाजपेयी ने मन से प्रयास आरंभ किया।
अटल बिहारी बाजपेयी ने कश्मीर के हाल के लिए नारा दिया। 'जम्हूव्यित इंसानियत' तथा ‘कश्मीरियत', इन्हीं प.रप्रेक्षण में इन्होंने कई कदम उठाए। अटल जी की सरकार की तरफ से कई ऐसे फैसले किए गए जो सकारात्मक प्रयास का द्योतक बने। इसमें रमजान में रोजे के कारण सीजफायर करने, हुर्रियत के नेताओं के साथ बैठकों की प्रक्रिया तथा जम्मू-कश्मीर में संचार की सुविधा जैसे महत्वपूर्ण कदम शामिल थे।
2004 में अटल जी की सरकार के जाने के बाद कोई बड़ा फैसला नहीं किया गया 2014 में नरेन्द्र मोदी जी की सरकार आने के बाद सेना को स्वतंत्रता का स्तर अधिक दिया गया। क्योंकि कश्मीर में उग्रवादियों की स्थिति में क्षेत्रों की विस्तारित प्रक्रिया कम हो गई पर घनत्व अधिक हो गया।
सेनाओं पर पत्थर फेंकने तथा उपद्रव करने की प्रवृत्ति लगातार चलती रही है। सेना को अपने सफाये की कारवाई में सफलता भी मिली है। जहाँ 2014 में 6 जिले आतंकवाद से ग्रस्त थे, अब लगभग देढ़ जिले ही ऐसे हैं। मोदी सरकार की रणनीति 2017 दिसम्बर के बाद बदल सी गयी है। तबसे सरकार उग्रवादी संगठनों के साथ कड़े तरीके पेश करने की नीति पर कार्य करती रही है।
भाजपा सरकार का स्पष्ट मानना है कि कश्मीर समस्या को जड़ में धारा 370 है। महबूबा मुफ्ती की सरकार में रहने के कारण भाजपा 370 की बात को गौण की हुई थी। उससे हट जाने की स्थिति में भाजपा को लगा कि उसकी विश्वसनीयता कम हो रही है। अब फिर से भाजपा 370 हटाने की बात कह रही है।
भाजपा सरकार की उपलब्धि हमारे कश्मीर में चुनाव पंचायत करवाने की रही है। इसमें कोई हिंसा भी नहीं हुई है। परंतु आतंकी घटनाओं को रोका नहीं जा सका है। 14 फरवरी 2019 को पुलवामा में हुए आत्मघाती कार विस्फोट में 40 जवानों का शहीद होना दुर्भाग्यपूर्ण रहा है।
परंतु संतोष इस बात का है कि मोदी सरकार ने अब आक्रामक नीति अपना ली है। इस सरकार के द्वारा हुर्रियत के नेताओं पर से सुरक्षा हटा दी गई है। श्रज्ञस्थ पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। हुर्रियत के सभी बैंक खाते सीज कर दिये गए है सरकार ने कश्मीर में आतंक को फंडिंग करने वालों पर कड़ी नजर रख रही है ।
इन कठोर कारवाईयों से तथा पाकिस्तान के साथ इस सरकार के कठोर व्यवहार से आशा की किरण जगी है कि कश्मीर में आतंकवाद खत्म हो जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अपना अंग है। पाक को अगर कश्मीर पर बात करनी है तो वह च्व्ज्ञ पर बात कर ले । ऐसी भावना भारत की जनता की रही है।
जहां तक कश्मीर के लोगों की बात है, हमारी सरकार को अटल बिहारी बाजपेयी के बताए रास्ते पर चलने की अवश्यकता है।
आज जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल की सरकार जरूर है पर सरकार का प्रयास यह होना चाहिए कि एक अच्छी सरकार बने तथा जनता के भले का काम हो। सबसे अधिक प्राथमिकता इस बात की है कि शेष भारत के लोगों को जम्मू-कश्मीर अपना घर लगे तथा अपनी स्थिति में रचने बसने जैसा माहौल बने और यह एक महान राजनीति इच्छा शक्ति के बिना संभव नहीं है।
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Sun, 01 Oct 2023 07:40:23 +0530 Jaankari Rakho
डॉ० मनमोहन युग ( UPA I, UPA II) सरकार (2004&2014) https://m.jaankarirakho.com/399 https://m.jaankarirakho.com/399 डॉ० मनमोहन युग ( UPA I, UPA II) सरकार (2004-2014)
1. डॉ. मनमोहन सिंह (2004-2014)
(UPA सरकार तथा सोनिया गांधी की भूमिका का ऐतिहासिक विश्लेषण)
2004 के आम चुनाव जो समय से 6 महीने पहले ही करवा लिये गय थे, इसके परिणाम के बारे में कोई भी संभावना ऐसी व्यक्त नहीं की जा रही थी जो सही तौर पर हुआ विपक्षी पार्टियों की अधिक सीटें आएंगी, या कोई भी सर्वे नहीं आंका जा रहा था बाजार से लेकर टी.वी. स्टूडियो के सर्वे ने भाजपा के नेतृत्व में एन.डी.ए. सरकार की वापसी की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही थी।
चुनाव परिणाम में इसके उलट हुआ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन गई । इसे 145 सीटें मिलीं और सहयोगियों के साथ 222 सीटें आयीं। वहीं भाजपा को 138 सीटें मिलीं तथा छक्। को 192 सीटें मिलीं। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को वामपंथी दलों ने बिना शर्त समर्थन दे दिया तथा वामपंथी दलों के 56 सदस्य मिलाकर कांग्रेस के पूर्ण बहुमत का जुगाड़ हो गया।
मई 18 को रिजल्ट आ गया था अब लगने लगा कि सोनिया गाँधी (कांग्रेस अध्यक्ष) के नेतृत्य में सरकार बनने वाली है। इस परिस्थिति में भी वामपंथी दल सहयोग को तैयार था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी ने सोनिया गांधी को सरकार पर चर्चा करने के लिए बुलाया। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह तथा तत्कालीन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति से मिलने गए यह कांग्रेस को सरकार बनाने का औपचारिक निमंत्रण मिलन था।
इधर भाजपा ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दों को उठाना आरंभ किया सुषमा स्वराज जी ने राष्ट्रपति से मिलकर सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया तथा सार्वजनिक घोषणा की कि “अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन गयी तो वह अपने सारे बाल कटा लेंगी तथा जमीन पर सोयेंगी तथा सिर्फ आवश्यकता के अनुसार सुखे अनाज खाएंगी"। इसी प्रकार उमा भारती ने भी एक मुख्यमंत्री के तौर पर औपचारिक विरोध किया। फिर भी ऐसी बात नहीं लग रही थी जिससे लगे कि सोनिया गांधी के नेतृत्व करने में कोई अवरोध होने वाला है क्योंकि सहयोगी और वामपंथी दल लगातार उनका समर्थन कर रहे थे।
19 मई को संसद के केंद्रीय हॉल में कांग्रेस के चुने हुए सदस्य की बैठक बुलायी गयी तथा यह बैठक संसदीय दल में नेता चुनने के लिए एक बैठक है, ऐसा माना गया। मगर इस बैठक में ऐसा कुछ हुआ जिसकी कोई भी कल्पना नहीं कर सकता था। सोनिया गाँधी ने अपने सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि मुझे प्रधानमंत्री बनने में कोई दिलचस्पी नहीं तथा मैं कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में ही अपनी सेवा देती रहूंगी। सांसदों ने बहुत ही विरोध किया तथा बहुत देर तक अलग-अलग सदस्यों के भाषण चलते रहे। फिर भी सोनिया गांधी नहीं मानी इसे मीडिया के एक धडे के द्वारा त्याग माना गया तथा कांग्रेस इस त्याग को एक महान परंपरा के तौर पर प्रोजेक्ट करने लगी।
अब कांग्रेस संसदीय दल की बैठक हुई तथा डॉ. मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री चुना गया तथा सोनिया गांधी ने घोषणा की कि मनमोहन सिंह के हाथ में अब देश सुरक्षित है। मनमोहन सिंह वही नेता थे जो ठप के गवर्नर और वित्त मंत्री दोनों के रूप में सेवा दे चुके थे तथा आर्थिक उदारीकरण के प्रणेता के तौर पर माने जाते थे। 
कांग्रेस और सहयोगी दलों की बैठक हुई तथा संयुक्त रूप से मनमोहन सिंह को नेता चुना गया वामपंथी दलों के साथ मिलकर एक संयुक्त सभा कार्यक्रम बनाया गया तथा वामपंथी दलों को सरकार के शामिल होने का निमंत्रण दिया गया पर वामपंथी समूह ने बाहर से ही समर्थन का वादा किया।
कांग्रेस और सहयोगी दलों ने साथ मिलकर अपने गठबंधन का नामकरण किया तथा तमिलनाडु में जो करूणानिधि की पार्टी ‘DMK' और कांग्रेस तथा साथी सहयोगी का जो संयुक्त समूह था उसी के नाम में इस गठबंधन का नाम ‘UPA' या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन रखा गया।
22 मई 2004 को डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपत ली तथा यह घोषणा की कि विदेशी संबंधों तथा पाकिस्तान के साथ बातचीत के सभी प्रयास बाजपेयी जी के बताये गए नीतियों के तहत ही होते रहेंगे।
डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह सोच उमड़ी कि सोनिया गांधी की भूमिका आखिर क्या होगी? क्या एक कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सरकार को सलाह देना तथा उसकी प्रशंसा प्राप्त करना एक अतिवादी कदम होता तथा प्रधानमंत्री पद तथा सरकार से ऊपर की यह संकल्पना बन जाती।
काफी सोच विचार के बाद यह फैसला किया गया कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनेगा तथा जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों के लोग होंगे तथा योजना आयोग के भी सदस्य होंगे तथा यह परिषद सरकार को विभिन्न सामाजिक-आर्थिक योजनाओं को शुरू करने या लागू करने के लिए सरकार को आदेश के बदले सलाह देगी।
निष्पक्ष भाव से देखा जाए तो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनने के पीछे कुछ विशेष कारण थे। सबसे पहला कारण था कि मनमोहन सिंह कोई राजनीतिक नेता के तौर पर कांग्रेस में जाने नहीं जाते थे। इस परिस्थिति में सरकार की योजनाओं के लाभ की प्रशंसा लेकर उनको वह लाभ नहीं होता। इधर सोनिया गांधी के नेतृत्व में ही कांग्रेस ने चुनाव जीता था। सोनिया गांधी को सरकार की विभिन्न अच्छी योजनाओं के लिए प्रशंसा प्राप्त करने का अधिकार नहीं होता। कम-से-कम सलाह देने के लिए परिषद को जरूर प्रशंसा मिलती तथा यश भी। राष्ट्रीय सलाह का परिषद बनाकर एक संतुलन कार्य किया गया, जिससे सरकार की संवैधानिकता पर भी प्रश्न न खड़ा हो तथा कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को इसका लाभ भी मिलता रहे।
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद सभी कल्याणकारी योजनाएं बनाती थी तथा सरकार जो सलाह देती थी कि इसे लागू करे। मनरेगा, सूचना का अधिकार तथा खाद्य सुरक्षा योजना ऐसी योजनाएं थी जो सीधी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से स्वीकृत होकर सरकार को भेजी गई थी कि इसे लागू किया जाए। इसके अलावा राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने 2005 राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन तथा टाज शुरू करने की सलाह दी।
दिसम्बर 2004 में दक्षिणी तृतीय राज्यों में भयंकर सुनामी आई तथा हजारों लोग मारे गए। अपार जन धन की हानि हुई प्रधानमंत्री को विश्व के अधिकतर देशों की तरफ से मदद की पेशकश की गई। इस परिस्थिति में यह पाया गया कि देश में किसी भी आपदा का मुकाबला करने के संसाधन उपलब्ध हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विश्व समुदाय को यह कहा कि 'भारत के पास इस आपदा से मुकाबला करने के लिए प्रर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं। " 
मनमोहन सिंह की सरकार को सूचना का अधिकार देने के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए। 2005 में सरकार ने सूचना के अधिकार को देशव्यापी स्तर लागू किया तथा यह भावना प्रकट की कि प्रत्येक लोक-अधिकारी के कार्यकाल में पारदर्शिता के लिए तथा जनता के कल्याण के लिए संवैधानिक तौर पर एक केंद्रीय सूचना आयोग तथा राज्य सूचना आयोग का प्रावधान, ‘सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में किया जा रहा है।
सूचना के अधिकार अधिनियम में यह कहा गया था कि इस कानून का प्रयोग करने हेतु कोई व्यक्ति किसी सरकारी संस्था से जानकारी के लिए अपना आवेदन दे सकता है जिस का जवाब उस सरकारी संस्थान को केवल 30 दिनों के अन्दर देना होता है।
सूचना के अधिकार की बात अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने ही की थी तथा इस पर एक कमिटी भी बनायी गयी थी तथा इसकी रिपोर्ट भी प्राप्त की थी। मनमोहन सिंह की सरकार में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के द्वारा इसी रिपोर्ट पर चर्चा कर सरकार को सलाह दी गयी कि इस पर कानून बनाया जाए।
उस वर्ष यानी 2005 में सूचना का अधिकार देना एक अहम कदम था। इस अधिकार के द्वारा जनता को सरकार के विभिन्न कार्य के लिए जानने को एक कानूनी अधिकार मिल गया था यह पारदर्शिता तथा व्यवस्था लाने के लिए एक जरूरी कदम था जो अनुशासन तथा व्यावहारिकता को आत्मा दे सकता था।
मनमोहन सिंह सरकार की दूसरी सबसे बड़ी कल्याणकारी योजना मनरेगा को कहा जा सकता है। तत्कालीन राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने इस रोजगार कार्यक्रम को एक अधिनियम के तौर पर लागू करने की सलाह दी। यह पहले भी कुछ राज्यों में अपना काम कर रही थी परंतु विधायिका की तरफ से अधिनियम बनाकर इसे पहली बार लागू करने की योजना पेश हुई।
मनमोहन सिंह सरकार ने 100 दिनों की रोजगार गारंटी योजना को पेश किया तथा इसके प्रभाव को फैलाने की बात दी। यह योजना राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तौर पर जानी गयी तथा इसे आरंभ में 100 जिलों में लागू किया गया बाद में इसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कहा गया। कुछ दिनों बाद इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया था।
मनरेगा ग्राम विकास के क्षेत्र में जनता के स्तर पर एक कल्याणकारी योजना थी इसमें गांव के गरीबी से जूझ रहे लोगों को आमदनी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की शक्ति थी। परंतु इस योजना में कई प्रकार जी जांच की प्रक्रिया तथा सही आदमी के पास पैसे जाने की प्रयोजना पर ध्यान नहीं दिया गया।
सामाजिक अंकेक्षण में कई बार गडबड़ियां पायी गयीं तथा इसका कारण था कि लाभान्वितों की पहचान के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं था यह योजना उस काल के परिप्रेक्ष्य में एक काल्याणकारी योजना थी पर ऐसा कोई माध्यम नहीं था जिससे भ्रष्टाचार इसमें नहीं हो।
सरकार मनरेगा के तहत किए जाने वाले कामों की देखरेख के लिए कोई विशेष टास्क फोर्स या समूह का निर्माण भी नहीं करा पायी तथा सभी कुछ ग्राम पंचायत के स्तर पर छोड़ दिया गया तथा धीरे-धीरे मनरेगा में पंचायत स्तर पर लगातार भ्रष्टाचार बढ़ता चला गया।
तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने मनरेगा योजना में सामाजिक अंकेक्षण को प्रोत्साहित किया तथा कार्य के आउटपुट प्राप्त करने के लिए कई समूह का भी निर्माण किया धीरे-धीरे कुछ सुधार देखने को मिले तथा इस योजना में तालाब निर्माण, पौधा रोपण, मेड़ बनाने तथा बांध निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य को सम्मिलित किया गया।
मनमोहन सिंह संदेह को दूर करते रहे जिससे यह लगे कि कांग्रेस वामपंथी के विचार से कुछ अलग कार्य कर रही है। वामपंथी दलों के समर्थन का ही नतीजा था कि मनमोहन सिंह सरकार ने उन मुद्दों को अभी नहीं छोड़ा जिस पर वामपंथी दलों से अलग राय रखी जाती थी।
वैसे मनमोहन सिंह ने वामपंथी दलों को सोनिया के साथ मिलकर यह आग्रह किया था कि सरकार में शामिल हो जाएं पर मार्क्सवादी इस बात पर सहमत नहीं थे। हालांकि भाकपा जिसके नेता ए. बी. वर्धन थे, उन्होंने कहा था कि अगर भाकपा तैयार होगी तो हम विचार का सकते है। पर भाकपा तैयार नहीं थी ।
मनमोहन सिंह ने जुलाई 2004 में पत्रकार परिषद में वामपंथी को महान देश भक्त बताया तथा उनके साथ मिलकर कार्य करने की बात कही। इधर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद तथा योजना आयोग में वामपंथी रूझान वाले बुद्धिजीवियों तथा सामाजिक कार्यकत्ताओं की नियुक्ति की गई । वामपंथी विचार के समर्थन से चलने वाली सरकार के साथ मुख्य विपक्षी भाजपा की दूरी - बढ़ती जा रही थी।
दिक्कत अधिक उस समय देखी गयी जब भाजपा के द्वारा नियुक्त सभी राज्यपालों को एक ही दिन में बर्खास्त कर दिया गया। इसमें वामपंथी रूझान तथा कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेताओं को उस पद पर भरे जाने के लिए प्रयोग के तौर पर देखा गया। इस कदम का सिर्फ विपक्ष ही नहीं बल्कि मीडिया के कई पक्षकारों ने भी विरोध किया तथा इंडिया टुडे ने लगातार तीन अंक में इस पर आवरण कथा छापकर इस कदम की समीक्षा की तथा नैतिक रूप से गलत कदम बताया हालांकि मनमोहन सिंह व्यक्तिगत रूप से किये भी प्रतिद्वंदी से मतभेद नहीं रखते थे पर अफसोस था कि वह एक चुने हुए प्रधानमंत्री नहीं थे। कही-न-कहीं पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मनमोहन सिंह को चुना था।
2005 ई. के अंत में मनमोहन सिंह सरकार ने कुछ ऐसा आर्थिक कदम उठाया जिससे आने वाले समय में ये अच्छे कमद साबित हो सकते थे। 2005 में इन्होंने आउटकम बजट की उपयोगिता पर चर्चा कर सभी योजनाओं के आउटपुट की सफलता का लेखा जोखा पेश करने की कोशिश की।
मनरेगा तथा सूचना के अधिकार के कारण मिलती लोकप्रियता ने मनमोहन सिंह सरकार को आर्थिक क्षेत्र में निवेश तथा कुछ और कल्याणकारी कार्यक्रम न करके ऐसी योजनाओं को अलीजामा पहनाना था जिससे राज कोषीय घाटा कम हो तथा सरकारी परिस्थिति में कम घाटा नजर आए।
सरकार ने गैस सब्सिडी पर पुनर्विचार करने की बात कही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने यह सुझाव दिया कि गैस सब्सिडी जारी रखनी चाहिए पर सब्सिडी वाले सिलिंडर की सीमितता बना देनी चाहिए यानी प्रत्येक साल एक सीमा तक ही गैस सिलिंडर सब्सिडी से मिलेंगे। मनमोहन सिंह केबिनेट ने 8 सिलिंडर प्रत्येक साल सब्सिडी में देने की घोषणा की तथा बाद में इसे 12 कर दिया गया।
मनमोहन सिंह सरकार की प्राथमिकताएँ 2006 से बदलने लगीं। क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर परिस्थितियां बदल रही थीं। अब मनमोहन सिंह की सरकार के साथ यह प्राथमिकता थी कि 2005 ई में जो घरेलू स्तर पर कल्याणकारी योजनाएं आरंभ हुई थी तथा जिससे लोक प्रियता मिली थी वहीं परिपक्वता तथा रणनीति अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी दिखानी चाहिए। मनमोहन सिंह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की नीतियों तथा द्विपक्षीय संबंधों को बाजपेयी के नक्शे-कदम पर ही ले जाना चाहते थे।
देखा जाए तो पाकिस्तान के साथ जिस संबंध की आधारशिला बाजपेयी ने तैयार की वही मनमोहन सिंह ने बढ़ाई। मनमोहन सिंह सरकार ने पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने के लिए श्रीनगर मुजफ्फराबाद बस सेवा की शुरूआत की तथा इसे अमन सेतु नाम दिया। देखा जाए तो मनमोहन सिंह के अपने शब्दों में इसे Confidence Building Measures ( विश्वास निर्माण उपाय) का नाम दिया गया।
इस उपायों में मनमोहन सिंह की सरकार ने उच्च स्तरीय वार्ता, वीजा प्रतिबंधों में ढील तथा दोनों देशों के बीच क्रिकेट मेचों को फिर से आरंभ करना शामिल है। श्री नगर और मुजफ्फराबाद के बीच नई बस सेवा ने भी दोनों पक्षों को करीब लाने में मदद की है। पाकिस्तान और भारत ने भी आर्थिक मोर्चों पर सहयोग करने का फैसला किया। क्रिकेट कूटनीति एक अहम प्रयोग था ऐसे इस कदम का कोई बहुत बड़ा लाभ नहीं मिला। लेकिन परवेज मुशर्रफ की पाकिस्तान की पारी क्रिकेट को उत्साहित करने के लिए भारत की यात्रा एक महत्वपूर्ण घटना थी यह यात्रा राजनैतिक से अधिक सांस्कृतिक थी यह आमंत्रण डॉ. मनमोहन सिंह ने ही दिया था।
यह 2004 में आरंभ हुए विश्वास बहाली के उपायों का ही कदम था। यह एक सदभावना पैदा करने के लिए महान कदम था मुशर्रफ से मनमोहन सिंह की द्विपक्षीय संधि हुई तथा मुशर्रफ ने बाजपेयी से किये वायदे को दोहराया। परवेज मुशर्रफ बाजपेयी से ही मिले तथा उन्होंने बाजपेयी को भारत पाकिस्तान संबंध के बीच सक्रिय भूमिका निर्माण की अपील की। भारत-पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया को लगातार बनाए रखने के लिए यात्रा, क्रिकेट तथा वार्ता तीनों को मनमोहन सिंह ने अहम माना।
UPA सरकार ने अमेरिका के साथ संबंधों को एक नया रूप दिया। बाजपेयी के काल में जो यह ठोस प्रक्रिया आरंभ हुई थी उसको मनमोहन सिंह ने आगे बढ़ाया। बाजपेयी ने बुश को भारत आने का आमंत्रण दिया था। इसीलिए मनमोहन सिंह ने अमेरिका के राष्ट्रपति की भारत यात्रा को अधिक महत्व देकर फिर से बुश को निमंत्रण देकर भारत की यात्रा की अपील की।
2006 के मार्च में जॉर्ज बुश ने भारत की यात्रा की। यह यात्रा तीन दिनों की थी। इस यात्रा को बुश ने अपने जीवन की एक अतुलनीय यात्रा बताया तथा कहा कि हम सभी मुद्दों पर बात करेंगे तथा दो महान लोकतंत्र के लिए सामजिक संबंधों की जरूरतों को पूरा करेंगे।
भारत के साथ अमेरिका ने इस यात्रा में ऊर्जा, पर्यावरण, व्यापार तथा आतंकवाद के मुद्दों पर विभिन्न समझौते किए। भारत को अमेरिका के द्वारा परमाणु ऊर्जा तकनीक देने की वार्ता यही से आरंभ हुई तथा इस मुद्दे को प्राथमिकता देने की चर्चा की गई।
बुश की यात्रा के बाद भारत - अमेरिका असैन्य परमाणु करार पर बात आरंभ हुई वैसे 2005 में मनमोहन सिंह की अमेरिका की यात्रा के समय वॉशिंगटन में संयुक्त वक्तव्य पर चर्चा हुई तथा यह बयान दिया गया था कि अमेरिका भारत को असैनिक परमाणु ऊर्जा में सहयोग देगा।
यह कहा गया था कि अमेरिका अपने नियमों में तथा नीतियों में समायोजन करेगा तथा भारत के साथ पूर्ण असैनिक परमाणु ऊर्जा सहयोग और व्यापार के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को समायोजित करने के उद्देश्य से मिलेगा और सहयोगियों के साथ मिलकर काम करेगा।
इसी प्रकार भारत ने भी चरणबद्ध तरीके से असैनिक और सैनिक परमाणु सुविधाओं की पहचान और उन्हें अलग. -अलग करके स्वेच्छा से अपनी सुसैनिक पूर्ण परमाणु सुविधाओं को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसियों की देखरेख के अन्तर्गत रखने तथा परमाणु परीक्षण पर भारत की एकतरफा रोक को जारी रखने की प्रति अपनी बचनबद्धता व्यक्त की।
मार्च 2006 में राष्ट्रपति बुश की भारत यात्रा के समय एक पृथकचरण योजना पर सहमति हुई थी तथा इसके बाद भारत के साथ असैनिक परमाणु सहयोग की एक शर्त के तौर पर पूर्ण रक्षोपायों की आवश्यकता से छूट देते हुए अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 (क) (2) के तहत अमेरिकी कांग्रेस में समर्थन के लिए विधेयक पारित किया गया था।
अमेरिकी कांग्रेस में दोनों दलों यानी डेमोक्रेट्स और रिपब्लिक के बहुमत से 123 विधेयक पारित हुआ। इससे भा. रत-अमेरिका परमाणु समझौते का मार्ग प्रशस्त हो गया। जून 2006 और जुलाई 2007 के बीच वार्ता के 5 दौर हुए। इन वार्त्ताओं का उद्देश्य राजनीतिक समझ बुनना और जुलाई 2005 एवम् मार्च 2006 की बचनबद्धताओं और 17 अगस्त 2006 को संसद में प्रधानमंत्री के वक्तव्य में अलेखित शर्तो और मौखिक सिद्धांतो की एक कानूनी समझौते में शामिल करना था।
समझौते की विशेषताओं को देखें तो यह समझौता ऐसे दो देशों के बीच है जिनके पास उन्नत परमाणु प्रौद्यौगिकी है और दोनों पक्षकारों के समाज हित और लाभ को दर्शाते हैं। इसके अलावा इस समझौते का उद्देश्य भारत और अमेरिका के बीच पूर्ण असैनिक परमाणु ऊर्जा सहयोग में सहयोग करना है। इस समझौते में पूर्ण असैनिक परमाणु ऊर्जा सहयोग का प्रावधान है जिसमें परमाणु रिएक्टर तथा सवंर्द्धन और पुनर्संसाधन सहित परमाणु ऊर्जा ईंधन चक्र के मुद्दे शामिल हैं।
इस समझौते में मार्च 2006 के आपूर्ति आश्वासन और सुधारात्मक उपायों के प्रावधान का पूर्ण समावेश है। यह समझौता भारत के रिएक्टरों के जीवन काल में आपूर्ति में किसी बाधा से सुरक्षा के लिए परमाणु ऊर्जा के सामरिक भंडार के विकास का प्रावधान करता है।
यह समझौता परमाणु व्यापार, परमाणु सामग्री, उपकरणों, पुर्जो से संबंधित सामग्री और प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण तथा परमाणु ईंधन चक्र क्रियाकलापों में सहयोग का प्रावधान करता है।
यह समझौता हस्तांतरित सामग्री और उपकरणों के लिए अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अनुप्रयोग का प्रावधान करता है।
इस समझौते के महत्त्व को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 17 अगस्त 2006 को संसद में भाषण देते हुए कहा कि इस समझौते में तीन मौलिक प्रावधान शामिल हैं। इसमें विशेष रूप से प्रावधान होगा कि भारत का सामरिक परमाणु कार्यक्रम, त्रिस्तरीय परमाणु कार्यक्रम तथा अनुसंधान और विकास कार्य निर्बाध और अप्रभावित रहेंगे।
दोनो सरकारों की पारस्परिक संतुष्टि के अनुरूप समझौता होना, भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों के बदलते स्वरूप के प्रतीक के रूप हैं तथा इसमें विभिन्न क्षेत्रों का विकास शामिल है। ऐसा माना गया।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु डील पर बहस का जवाब देते हुए कहा कि यह समझौता ऊर्जा की कमी का समाधान करेगा तथा भारत को 2020 तक 20,000 डॅ ऊर्जा के उत्पादन में इसका प्रत्यक्ष योगदान होगा। 2006 में यह 3700 डॅ था। भारत के ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा का बढ़ता हिस्सा जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता समाप्त करेगा और भारत के उत्सर्जन में कमी लाएगा।
डॉ. मनमोहन सिंह के जवाब के बाद भारतीय राजनीति में 1 साल तक लगातार भारत-अमेरिका परमाणु डील छाया रहा तथा लगातार इस बात की नकारात्मकता तथा सकरात्मकता को जगह मिलती रही ।
मनमोहन सिंह की सरकार को समर्थन दे रहे वाम दलों को यह समझौता एकदम मंजूर नहीं था। लेफ्ट की आपत्ति कुछ प्रावधानों को लेकर थी । लेफ्ट परमाणु समझौते से जुडे. हाइड एक्ट के खिलाफ था । हाइड एक्ट को एक मुद्दा बना दिया गया। यह हाइड एक्ट भारत की संबंधित कोई अमेरिकी नीति नहीं थी पर इसे परमाणु समझौते का स्रोत जरूर कह सकते हैं।
हाइड एफ्ट अमेरिका का राष्ट्रीय कानून था जबकि 123 समझौते से भारत का लेना-देना था। 123 समझौता जिस अमेरिकी अधिनियम के तहत होता वह हाइड एक्ट में वर्णित था। हाइड एक्ट कांग्रेस सदस्य का नाम था जिसने अपने विधेयक में यह प्रावधान पारित करवा लिया कि अमेरिका अगर भारत के साथ द्विपक्षीय समझौते को रद्द करता है तो भारत को तकनीक और दूसरे उपकरणों की आपूर्ति बंद कर दी जाएगी।
वाम दलों को इसी बात से नाराजगी थी तथा इसके लिए भी लेफ्ट नाराज था कि दो साल पहले अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में भारत ने इरान के खिलाफ वोट दे दिया था। लेफ्ट ने इसे भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से जोड़कर देखा तथा यह कहा कि मनमोहन सरकार अमेरिका को खुश करने के लिए विदेश नीति की स्वतंत्रता को खत्म कर रही है ।
लेफ्ट ने यह आशंका व्यक्त की कि 123 समझौते लागू हो जाने के बाद ऐसे कई कदम मजबूरी में उठाने पड़ेंगे तथा भारत अमेरिका की हाथ की कठपुतली हो जाएगा। वामदलों का मानना था कि हाइड एक्ट में भारत की विदेश नीति और सुरक्षा से जुड़े मानकों को लेकर कई निर्देश हैं। क्योंकि यह एक्ट अमेरिका के लिए बाध्यकारी है, इसीलिए वह अपना हर कदम इन निर्देशों के अनुसार ही उठाएगा और इस तरह भारत की संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी।
हाइड एक्ट के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को हर साल कांग्रेस को यह रिपोर्ट देनी थी कि भारत एक्ट के प्रावधानों का पालन कर रहा है या नहीं। वाम दल इसे भारत के लिए फंदा समझ रहे थे । मनमोहन सरकार ने वामदलों को समझाने के लिए एक समन्वय समिति बनायी जिसका अध्यक्ष डॉ. प्रणव मुखर्जी को बनाया गया था। इस समन्वय समिति में यह तय हुआ कि अमेरिका तथा अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ जो भी बातचीत होगी वामदल तथा सरकार के बीच की समन्वय समीति को बताया जाएगा।
सरकार वामदलों के रवैये के कारण इन समझौते को जितनी तेजी से डील करने की सोच रही थी, उसमें थोड़ी सुस्ती कर दी।
वामदलों ने कई महीने पहले यह कह दिया था कि वह भारत - अमेरिका परमाणु समझौते के खिलाफ है और यदि इस दिशा में भारत सरकार अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी के साथ अंतिम दौर की बातचीत शुरू करती है तो हम समर्थन वापस ले लेंगे।
2008 के जुलाई में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 9-8 की बैठक में भाग लेने के लिए जापान गए। उन्होंने अपने साथ गए पत्रकारों को यह कहा कि हमारी प्राथमिकता अमेरिका के साथ परमाणु समझौता लागू करने में है। अगर वाम दलों को समर्थन वापसी में रूचि है तो वो ले सकते हैं। भारत सरकार को वर्तमान में कोई खतरा नहीं है। हमारी सरकार को चलाने के लिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन हैं।
डॉ. मनमोहन सिंह के वापस आने के पहले ही वामदलों से बैठक की तथा समर्थन वापसी पर चर्चा की। पोलित ब्यूरो की बैठक के बाद भाजपा के तात्कालीन महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि “वाम मोर्चे ने बुधवार को राष्ट्रपति से समय मांगा है ताकि औपचारिक रूप से उन्हें संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार से समर्थन वापसी के बारे में कहा जा सके।"
प्रकाश करात ने कहा कि हमने प्रणव मुखर्जी को पत्र लिखकर यह सूचित कर दिया है कि पिछले साल 16 नवम्बर 2007 की समन्वय समिति की बैठक में फैसला हुआ था कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ बातचीत के बाद समिति को बताया जाएगा कि वहां क्या तय हुआ है? लेकिन सरकार की तरफ से ऐसा नहीं हुआ।
उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य पर कि "10 जुलाई 2008 को वामदलों को समझा दिया जाएगा" को हास्यपद बताया तथा कहा कि अब यह कहना हास्यपद है जब मनमोहन सिंह अपनी विदेश यात्रा में अंतर्राष्ट्रीय परमाण तु ऊर्जा एजेंसी के Board of Government के साथ बैठक करने वाले हैं।
10 जुलाई को प्रस्तावित समन्वय समिति की बैठक पर वामदलों का भरोसा अब नहीं रह गया तथा 9 जुलाई को ही वामदलों ने राष्ट्रपति से मिलकर समर्थन वापसी की घोषणा कर दी।
मनमोहन सिंह तथा कांग्रेस पार्टी इस घटना को भांप गयी थी तथा मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा से समर्थन का आश्वासन ले लिया था। सपा के तात्कालीन महासचिव अमर सिंह ने राष्ट्रपति (पूर्व) कलाम साहब से मिलकर यह सलाह ली थी कि परमाणु समझौते पर समर्थन करना चाहिए या नहीं।
कलाम साहब से हां सुनने पर मुलायम सिंह को एक नैतिक हथियार मिल गया था। 14 जुलाई को मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ विश्वास पर बहस हुई। न्च. 1 ने तब तक लोकदल तेलंगाना पर राष्ट्र समिति तथा निर्दलीय से समर्थन की बात की थी।
लोकसभा में विश्वास मत पर बहस के दौरान एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी। भाजपा के कुछ सांसद अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के सामने बैगों को ले आए जिसमें नोट (पैसे) भरे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की तरफ से विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मत देने के लिए पैसे बांटे जा रहे है। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने उन सांसदों को निलंबित कर दिया।
मनमोहन सरकार सपा, लोकदल, जै, निदर्लीय के समर्थन से सरकार बचा ले जाने में सफल हो गयी। यह मनमोहन सिंह सरकार को एक मौका देना हुआ तथा परमाणु करार का रास्ता साफ हो गया। मनमोहन सिंह को अब बढ़त मिल चुकी थी। सामाजिक योजनाओं तथा भारत निर्माण जैसी परियोजनाओं में कार्य करने की ललक ने इस सरकार को बढ़त दिला दी थी लेकिन सही रूप में आगे की चुनौतियों का अंदाजा इस सरकार की नजर में नहीं था।
नवम्बर 2008 में यह एक ऐसी चुनौती थी जिसने पूरे सरकारी सुरक्षा तंत्र को हिला कर रख दिया। इस चुनौती का नाम 26, 11 का मुम्बई हमला था। इस हमले में 26 विदेशी नागरिक सहित 166 लोगों की मौत हो गई थी। पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने भयानक तबाही मचायी थी तथा यह मुठभेड़ 60 घंटे तक लगातार चलती रही।
ये हमलावर कराची से नाव के द्वारा मुम्बई में घुसे थे । इस नाव पर चार भारतीय सवार थे। जिन्हें किनारे तक पहुंचते पहुंचते खत्म कर दिया गया। रात के तकरीबन 8 बजे ये हमलावर कोलाबा के पास कफ परेड के मछली बाजार पर उतरे। वहां से वे 4 गुटों में बंट गए और टैक्सी लेकर अपनी मंजिलों की ओर रुख किया।
लोकल मराठी बोलने वाले मछुआरों को इन लोगों की आपाधापी को देखकर शक हुआ और उन्होंने पुलिस को जानकारी भी दी। लेकिन इलाके की पुलिस ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। पुलिस ने इसे गंभीरता से ही नहीं लिया। ये हमलावर जो तीन समूह में बँटे थे, वो अलग-अलग अपने मिशन को अंजाम देने लगे।
एक समूह ने सबसे पहले दक्षिणी मुम्बई स्थित कोलाबा के लियोपोल्ड कैफ को निशाना बनाया तथा दो आतंकियों ने नरीमन हाउस को बनाया तो बाकी दो-दो की टोली छत्रपति शिवाजी टर्मिनल को तथा होटल ओबेरॉय तथा ताज होटल की तरफ बढ़ने लगे। 
रात के करीब 9 बजे मुम्बई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर गोलीबारी की खबर मिली। मुम्बई के इस ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन के मेन हॉल में दो हमलावर घुसे और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इनमें एक 'अजमल कसाब' पकड़ा गया तथा जिसे फांसी दी गयी। दोनों के हाथ ।ज्ञ 47 राइफल थी तथा 15 मिनट में ही इन्होंने 52 लोगों को मार दिया तथा 109 लोगों को जख्मी कर दिया।
आतंकियों का यह खौफ सिर्फ छत्रपति शिवाजी टर्मिनल तक सीमित नहीं था। दक्षिणी मुम्बई की लियोपोल्ड कैफे भी उन जगहों में शामिल था जहां हमले हुए। वहां 10 लोग मारे गए जिसमें विदेशी भी थे।
10 बजकर 40 मिनट रात्रि में एक टैक्सी बम को उड़ाने की सूचना मिली तथा छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर 58 लोग मारे गए। ताज होटल में 6 धमाके किए गए तथा पहली ही रात अग्निशमन के अधिकारियों के करीब 200 बंदी वहां से निकाले गए।
होटल ओबेरॉय के ऑपरेशन खत्म करने में तीन दिन लग गये। यह 28 नवंबर की दोपहर को समाप्त हुआ तथा उसी दिन शाम को नरीमन हाउस खाली करा दिया गया। ताज होटल में 29 नवंबर को मुठभेड़ खत्म हुई तथा 9 आतंकवादियों को मार गिराया गया। एक आतंकवादी पकड़ा गया।
इन मुठभेड़ों में मुम्बई पुलिस के बहादुर अफसरों हेमंत करकरे, विजय सालस्कर तथा अशोक काम्टे जैसे अतुलनीय कर्मठों ने शहीदी दी।
यह हमला भारत की संप्रभुता के लिए शर्म वाली बात थी। तत्कालीन मोहन सरकार ने इस हमले को रक्षात्मक तरीके से झेला। इस कदम की आलोचना भी की गई पर सरकार की यहीं मंशा थी कि अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति को ध्यान में रखकर कोई निर्णय लिये जाए।
सरकार ने 26/11 के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन किया तथा गैर कानूनी गतिविधि निरोधक कानून बनाए । तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम की सलाह थी कि एन.आई.ए. को खुली छूट दी जाए।
सरकार के लिए यह हमला एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। सरकार ने कोई आक्रामक रुख नहीं अपनाया तथा आंतरिक रूप से खूफिया जांच तथा सुरक्षा को ही पुख्ता करने पर डटी रही। सरकार की आलोचना अभी तक इस बात के लिए होती है कि 26/11 के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहिए था।
इस हमले की दुनिया भर में निंदा की गई तथा तत्कालीन विपक्ष के नेता आडवाणी ने इसे भारत के लिए चुनौति बताया। अमेरिका के तत्कानीन नव निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस हमल को कायराना हमला कहा तथा यह भी कहा कि अमेरिका और भारत जैसे देशों को मिलकर एक मजबूत प्रयास करना चाहिए जिससे आतंकवादी घटनाओं तथा आतंक के खिलाफ एक पक्ष का निर्माण हो सके।
मुम्बई हमले के कुछ दिनों बाद ही 2009 आया जब लोग इस हमले को भूलकर आम चुनाव की चर्चा करने लगे। 2009 का आम चुनाव एक प्रकार के न्च1 की 5 साल की कार्यशैली और मनमोहन सिंह के नेतृत्व के लिए अति संवेदनशील चुनाव था।
2009 का आमचुनाव फिर से मुख्य रूप से NDA और UPA के बीच ही मुकाबले के रूप में घटित होना था। इस चुनाव में ऐसी घटना नहीं घटी जिसे चुनाव के लिए मुद्दे बनाए जाएं। मुम्बई हमले को लेकर चर्चा होती थी पर सामान्य रूप से आक्रमकता खत्म हो गयी थी तथा अब फोकस UPA की कार्यशैली तथा भाजपा नीत छक। के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी के लिए ही लोग वोट डालने वाले थे।
कांग्रेस ने न्। में अपने दलों को समन्वित करके रखा ही थी। इसने तृणमूल कांग्रेस के नेता ममता बनर्जी से गठबंधन कर लिया था वामदल अब विपक्षी था। अधिकतर जगह मुकाबले त्रिकोणीय होने वाले थे। लेकिन मुख्य रूप से छ। और न्च के बीच मुकाबला रहा। भाजपानीत एन. डी. ए. की तरफ से इस पर आडवाणी जी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। भाजपा के पास ऐसे कई मुद्दे थे जिससे वह बढ़त ले सकती थी परंतु मनमोहन सरकार की मनरेगा तथा भारत निर्माण जैसी योजनाओं ने लोगों में एक विश्वास पैदा कर दिया था। यह चुनाव भाजपा के नेता आडवाणी के नेतृत्व में अंतिम चुनाव था। 
2009 का आम चुनाव बेहद अच्छे तरीके से चुनाव आयोग के द्वारा कराया गया। चुनाव परिणाम लगभग आवश्यकता के तथा संभावना के मेल से आया। संभावना यह जतायी जा रही थी कि मनमोहन सिंह सरकार को एक बार और अवसर मिलने वाला है। संभावना सच साबित हुई तथा 1991 के बाद पहली बार कांग्रेस की 200 के ऊपर लगभग 206 सीटें आयी। वास्तविकता में यह जीत मनमोहन सिंह की जीत थी पर अफसोस कि इस जीत को सोनिया गांधी तथा युवा उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जीत बताए जाने के प्रत्यन होने लगे। मनमोहन सिंह को इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह चुपचाप काम करने वाले प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते थे पर यह एक कमजोर कड़ी के रूप में मीडिया में प्रसारित हुआ तथा यह कहा जाने लगा कि मनमोहन सिंह एक कठपुतली प्रधानमंत्री हैं। असली पद सोनिया गांधी तथा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के पास है।
2009 की सरकार बनी तथा मनमोहन सिंह फिर एक बार प्रधानमंत्री बने । वह नेहरू, अटल जी, और इंदिरा गांधी के बाद चौथे प्रधानमंत्री बने। 2009 की सरकार में कुछ नये गठबंधन सहयोगी को कांग्रेस के साथ सरकार में शामिल देखा जा सकता था। ममता बनर्जी को रेल मंत्री बनाया गया। जिस पद पर 2004 से 2009 तक लालू प्रसाद रहे थे। 2009 वाली UPA II सरकार में लालू प्रसाद और राम विलास पासवान जैसी पार्टियों की हार हुई थी। इसीलिए मंत्रिमंडल में इन्हें शामिल नहीं किया गया।
अब UPA II में कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी पार्टी दूसरे स्थान पर तृणमूल कांग्रेस तथा डी. एम.के. थी। डी.एम. केको संचार विभाग मिला तथा पी.मे.के को स्वास्थ्य विभाग मिला। 2009 के बाद भारत में अन्तर्राष्ट्रीय तौर पर कुछ बड़े आयोजन होने थे।
इधर भाजपा को सिर्फ 114 सीटें आयी थी जो 1991 की राम लहर से भी कम थी। भाजपा के कई सहयोगी पहले ही चले गए थे फिर भी अकाली दल, बीजद, शिवसेना तथा पद (यू) जैसे दलों का विश्वास भाजपा में अभी भी था। 2004 की सरकार से यह मनमोहन सरकार कुछ भिन्न सरकार थी। 2010 के राष्ट्रमण्डल खेल का आयोजन एवं महाआयोजन था तथा दिल्ली सरकार की जिम्मेवारी प्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़ी हुई थी। राष्ट्रमण्डल खेल के लिए भारत की तरफ से सुरेश कलमाड़ी (जो कांग्रेस के नेता थे) को आयोजन समिति का प्रमुख बनाया गया था। 
यह आयोजन विभिन्न तरीके से एक तरह की परीक्षा थी कि सरकार जैसे इसका प्रबंध करती है। 2010 के अक्टूबर महीने में राष्ट्रमण्डल खेल का आयोजन हुआ। परंतु जब कैग रिपोर्ट आयी तो इस आयोजन में कई वित्तीय अनियमितताएं विश्व स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा कम करने वाली थी।
इधर 2010 में ही अमेरिकी राष्ट्रपति (तत्कालीन) बराक ओबामा की भारत यात्रा हुई तथा मनमोहन सिंह के साथ द्विपक्षी वार्ता में विभिन्न मुद्दों पर कई फैसले लिए गए तथा परमाणु संधि पर एक बार फिर विश्वास जताया गया। बराक ओबामा ने मुम्बई की भी यात्रा की तथा भारत-अमेरिका संबंध को एक नयी दिशा दी।
UPA II सरकार को घरेलू चुनौतियों से अधिक मुकाबला करने की चुनौती थी बनिस्पत किसी बाहरी चुनौती के। 2010 के बाद सरकार का पतन आरंभ हो गया।
2011 एक ऐसा साल था जो मनमोहन सरकार के लिए एक फैसले वाला साल साबित हुआ। यह साल देश के जनमानस को बदलने वाला साल साबित हुआ। 2010 की कैग रिपोर्ट ने कुछ ऐसी रिपोर्ट सार्वजनिक की जिनसे जनता में एक नयी लहर तथा नकारात्मक सोच भी मनमोहन सरकार के खिलाफ बनी। कैग रिपोर्ट में यह दर्शाया गया था कि 25 स्पैकट्रम निलामी में घोर अनियमितता बरती गयी है और जहां सरकार को 1.30 लाख करोड़ से 2.5 लाख करोड़ के बीच लाभ होना चाहिए था, वह औने-पौने में निलाम कर दिया गया। उसी तरह कोयला खदान आवंटन में भी किसी नफा-नुकसान को आँका नहीं गया तथा अपनी पैरवी तथा पहुंच से इसमें लूट हुई ।
राष्ट्रमंडल घोटाला तो पहले से था ही। 2ळ, कोयला तथा कॉमन वेल्थ घोटाले ने सरकार की छवि को ठेस पहुंचायी। इन घोटालों के बाद जनता की व्यग्रता को तथा गुस्से को झते हुए सरकार विपक्ष की 25 मामले में JPC (Jointn parliamentry commitee) की मांग को मंजूर कर लिया तथा यह कहा कि कोई भी अनियमितता की जाँच निष्पक्ष रूप से की जाएगी। सरकार के खिलाफ माहौल को देखते हुए प्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे ने अगस्त 2011 में जनलोकपाल विधेयक की मांग करते हुए रामलीला मैदान में अनशन शुरू कर दिया। सरकार को कतई संभावना नहीं थी कि अन्ना आंदोलन इतना विशाल हो जाएगा। अन्ना हजारे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध समाजसेवी के तौर पर जाने जाते थे तथा उन्होंने सेना में भी काम किया था। अतः इनकी पहचान एक इमानदार तथा कर्मठ समाज सेवी की थी। अन्ना हजारे का साथ देने में अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, संतोष हेगडे, प्रशांत भूषण कुमार विश्वास जैसे अनेक क्षेत्रों के विद्व न तथा सक्रिय सदस्य थे।
अन्ना हजारे का आंदोलन भ्रष्टाचार तथा सड़े तंत्र के खिलाफ एक आंदोलन था। अन्ना ने 14 दिनों तक अनशन किया तथा सरकार तथा संसद तक अपनी बात पहुंचा दी। सरकार ने 14 दिनों में उनकी बात मान ली तथा जन लोक पाल विधेयक को प्रस्तावित कर पास कर दिया। यह आंदोलन एक मोड़ साबित हुआ जिसने न्च की नींव हिला दी। मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ पूरे देश में एक नया आवेग उत्पन्न हो गया तथा सबसे बड़ी बात की इसका नेतृत्व समाज सेवी कर रहे थे जो चुनाव में नहीं जीतना चाहते थे। लोगों को इस कारण अधिक विश्वास हुआ।
अन्ना आंदोलन के शांत होने के बाद दिसम्बर 2011 में दिल्ली में एक और हृदय विदारक घटना घटी जिसमें एक बच्ची जो घर लौट रही थी उसके साथ कुकर्म किया गया तथा हत्या करने की कोशिश की गई। पूरे देश में निर्भया केस के रूप में यह फैल गया तथा लोगों में एक गुस्सा उत्पन्न हो गया।
निर्भया काण्ड के कारण सरकार को इसी साल एक बार और बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा तथा यह एक प्रकार की नकारात्मक घटना ही हुई मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ । अन्ना हजारे और निर्भया काण्ड के बाद जनता के बीच एक नयी सोच मगर न्च पर सरकार के विरोध में विकसित होने लगी तथा कुछ और लोग इसका लाभ उठाने की कोशिश करने लगे। देखा जाए तो सरकार के अंदर भी इन परिस्थितियों को डील करने की कोई इच्छा शक्ति नहीं दिखी तथा मंत्री स्तर पर एक दूसरे से समन्वय नहीं बन पा रहा था।
बाबा रामदेव ने अपने संस्था स्वाभिमान मंच की तरफ से रामलीला मैदान में फिर से एक आंदोलन आरंभ करने की सोची तथा सरकार ने अपने सुरक्षा बलों के द्वारा एक रात में ही इसे समाप्त करवा दिया। ऐसा नहीं था कि सरकार ने इन वर्षो में कुछ अच्छा नहीं किया। सरकार अपने स्तर से कुछ अच्छे विधेयक लाई जो जनता के कल्याण से जुड़े हुए थे जिसमें जनलोककल्याण विधेयक तथा महिला आरक्षण विधेयक को आंका जा सकता है।
इसके अलावा ध्क्क में निवेश को लेकर भी विधेयक था जो आर्थिक क्षेत्र में एक नयी कोशिश कहा जा सकता है। सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम तथा 'आधार' के लिए कदम उठाए । सरकार की तरफ से भरसक यह दिखाने की कोशिश हुई कि काम करने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है। मनमोहन सिंह ने 2011 के अगस्त में पत्रकार परिषद से मिलते हुए कहा कि मेरी सरकार अपना कार्य कर रही है तथा मेरे प्रधानमंत्री काल की गणना करने की जिम्मेदारी हम आनेवाले इतिहास पर छोड़ते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने 2013 में एक लेख के जरिये मनमोहन सरकार की छवि को लेकर सवाल पैदा किए। कुलदीप नैयर ने यह कहा कि कहीं न कहीं मनमोहन सिंह की UPAII सरकार की सरकार ‘Policy Paralysis' हो गई है। इसमें नीति बनाने को लेकर कोई अंतर विभागीय समन्वयन नहीं है और हो सकता है कि इसका सबसे बड़ा कारण मंत्रियों के प्रधानमंत्री को रिपोर्ट के बदले कांग्रेस नेतृत्व को रिपोर्ट करने में अधिक दिलचस्पी हो।
इस लेख की वास्तविकता के कारण भी थे। मीडिया जगत में यह बात फैल गयी थी कि मनमोहन सिंह की सरकार में वरिष्ठ मंत्रियों के बीच अहंकार युद्ध है तथा एक दूसरे के विभाग का कोई आदर नहीं करना चाहता। यह बात तब और साबित हो गई जब 2012 में वरिष्ठ नेता तथा मंत्री जिन्हें सरकार के संकट मोचक के तौर पर जाना जाता था यानी प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति बना दिया गया।
2012 के जुलाई के बाद समन्वयक के रूप में काम करने वाले प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति भवन चले गए थे। अब मनमोहन सिंह सरकार में सब कुछ ठीक नहीं था। घोटालों, फाइलों के पास होने में देरी तथा समन्वय की कमी को लेकर कई सवाल उठाए जाने लगे।
इधर कांग्रेस भी 2007 के समझौता ब्लास्ट के बाद अपनी राजनीति को एक नयी धार देनी शुरू कर दी तथा सच्चर कमिटी के बाद मुसलमानों को खुश करने के लिए 'भगवा आतंकवाद' का राग छेड़ा तथा ध्रुवीकरण के प्रयास आरम्भ कर दिए। कई हिन्दूवादी नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया तथा एक नये राजनीतिक प्रयोग करने की कोशिश आरंभ हो गयी थी।
इधर पर्यटन मंत्रालय के द्वारा एक हलफनामे में अयोध्या के मामले को लेकर एक नया शिगुफा छेड़ दिया गया कि “राम एक मिथक है।" इस परिवर्तन से विपक्ष को एक नया मुद्दा मिल गया। 2013 में एक नयी राजनीति की शुरूआत हुई। मनमोहन सिंह को यह पता था कि 2014 के बाद वह प्रधानमंत्री नहीं रहने वाले। मनमोहन सिंह ने कभी अपनी सीमा नहीं लांघी तथा खुलकर नकारात्मक भाषा का प्रयोग किसी मामले में नहीं किया।
2013 में मनमोहन सिंह सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम खाद्यान्न के मामले में पारित किया तथा इसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम कहा। इसमें गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए 1 रूपये किलो का अनाज, 2 रूपये किलो गेहूँ तथा 3 रूपये किलो चावल देने की बात कही गई थी। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा प्रावधान में गरीब परिवार को प्रत्येक व्यक्ति पर 5 किलो अनाज प्रति महीने देने की स्थिति को रेखांकित किया गया था।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की स्थिति एक गेमचेंजर हो सकती थी पर इन घोटालों की चर्चा ने भारत के मध्यम वर्ग की सोच को बदल दिया था। अब जनता सोचने लगी कि मनमोहन सिंह सरकार के विपक्ष में बहुत मजबूत लहर है। इधर मुख्य विपक्षी भाजपा में भी विभिन्न सक्रियताएं देखी जा रही थी। 2013 के जून में गोवा में हुए सम्मेलन में राजनाथ सिंह जो तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष थे, ने कहा कि “2014 में आम चुनाव जो होंगे, उसके प्रचार प्रमुख भाजपा की तरफ से नरेन्द्र मोदी बनाए जाएंगे। नरेन्द्र मोदी तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री थे।
यह भाजपा की तरफ से दूसरी पीढ़ी के नेताओं को शीर्ष सत्ता सौपने की सबसे बड़ी पहल थी। इस घोषणा के बाद छक्। के बिहार में सहयोगी तथा जनता दल (यू) के नेता मुख्यमंत्री, बिहार नीतिश कुमार ने छक् । छोड़ने का फैसला लिया। BJP ने अपनी नीति नहीं बदली तथा नरेन्द्र मोदी जी को और भी महत्वपूर्ण पद देने का मन बना चुकी थी। सितम्बर 2013 में भाजपा ने घोषणा कर दी कि 2014 के आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होंगे।
अब भाजपा की तरफ से एक नयी शुरूआत कर दी गयी थी। उधर न्। पट की सरकार में एक तरह से सक्रियता कम हो गयी थी। 2011 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गई थी। उधर प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति बन गए थे। कोई यह नहीं कह सकता कि 2014 में भाजपा के नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने न्च की तरफ से कौन नेता होगा? 2014 के चुनाव हुए तथा भाजपा की जीत हुई जिसकी चर्चा हम अगले अध्याय में करेंगे। मनमोहन सिंह की पहचान एक महान अर्थशास्त्री की रही तथा उन्होंने एक नये भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाई।
एक निर्वाचित प्रधानमंत्री न होने के बावजूद उन्होंने 2004 से 2009 के बीच एक काम करने वाली सरकार का नेतृत्व किया। उन्होंने एक गरीब परिवार से आगे आकर देश का नेतृत्व किया पर यह भी वास्तविकता है कि उनका दूसरा कार्यकाल कई विवादों तथा घोटालों के कारण चर्चित रहा। अटल जी के बाद मनमोहन सिंह को गठगंधन की सरकार को दो कार्यकाल पूर्ण करने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। सभी सरकारों की अपनी कार्यक्षमता है तथा इतिहास में सबकी अलग-अलग भूमिका होती है।
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Sun, 01 Oct 2023 07:38:34 +0530 Jaankari Rakho
अटल बिहारी बाजपेयी युग (1998&2004) https://m.jaankarirakho.com/398 https://m.jaankarirakho.com/398 अटल बिहारी बाजपेयी युग (1998-2004)
1. अटल बिहारी बाजपेयी युग
1996 ( एक गठबंधन सरकार के प्रणेता के रूप में भारत को परमाणु संपन्न बनाने तक का सफर ) (1998-2004)
1996 में तेरह दिन की सरकार में प्रधानमंत्री रहना अटल बिहारी बाजपेयी जैसे नेता की नेतृत्व शक्ति तथा परिपक्वता परखने के लिए काफी समय नहीं कहा जा सकता था। वैसे तो अटल जी प्रथम है जो स्वयं संघ के जुड़े हुए प्रखर तथा वक्ता थे। अपनी बेदाग छवि तथा साफ व्यक्तित्व से भारतीय राजनीति में सभी दलों के चहते थे। एक राष्ट्रीय छवि होने के कारण इनकी पूछ सभी दलों तथा भागों में होती थी।
वैसे 1990 में जब जनसंघ का भाजपा नामक दल में उत्परिवर्तन हुआ तो अटल जी इस पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। वे भाजपा के पहले संस्थापक अध्यक्ष भी बने। जब राम मंदिर के मुद्दे ने जोर पकड़ा तथा आडवाणी ने भाजपा की कमान संभाली तब अटल भी थोड़े बेफिक्र हो गए तथा अपनी पूरी भूमिका पार्टी के आंतरिक राजनीति बनाने के बदले संसद में विभिन्न भूमिका निभाने लगे। अटल जी का संसदीय अनुभव नेहरू काल से ही था। इन्होंने नेहरू के प्रधानमंत्री काल से लेकर गुजराल के काल तक के प्रधानमंत्री से संसद में प्रश्न पूछे थे । संसद की सभी बड़ी बहसों तथा बैठकों में इनकी उपस्थिति मात्र ही उस बहस को महत्वपूर्ण बना देती थी। इनकी भाषण कला तथा समर्पण देखकर नेहरू ने भाविष्यवाणी की थी कि भविष्य में यह युवक प्रधानमंत्री बनेगा।
अटल जी की नेतृत्व करने की भूमिका आगे आकर 1995 में देखने को मिलती है उस समय नरसिम्हा राव की सरकार थी। नरसिम्हा राव एक से बढ़कर एक ऐसे विवाद से जुड़ते जा रहे थे जिनकी चर्चा उस समय के प्रमुख विवादों अखबारों में छपती थीं। हवाला काण्ड उस समय के प्रमुख विवादों में एक था। इस हवाला काण्ड में राजनीति के बड़े-बड़े खिलाड़ियों को नामित किया गया था, जिनकी चर्चा पहले भी की जा चुकी है। अटल जी की एक साफ छवि थी कि हवाला के साजिशकर्ता उनके नाम को शामिल करने की हिम्मत न कर सके। यह अटल जी अधिक पार्टी रणनीति तथा आंदोलन में शामिल होने में कोई परहेज न रहते हुए भी किसी तिकड़म में नहीं पड़ना चाहते थे। 
परंतु आडवाणी जो तत्कालीन अध्यक्ष थे, को हवाला काण्ड में नामित किया गया था। भाजपा अध्यक्ष के रूप में आडवाणी का इस तरह हवाला काण्ड में नाम आना आश्चर्यजनक था। आडवाणी ने भाजपा की अध्यक्षता से इस्तीफा देने तथा संसद की सदस्यता और विपक्ष के नेता के पद को छोड़ने की बात कही। यह भी प्रण किया कि जब तक हवाला काण्ड से दोष मुक्त नहीं हो जाता तब तक में संसद में नहीं जाऊंगा और न कोई चुनाव लडुंगा ।
भाजपा ने कभी भी आडवाणी को दोषी नहीं माना तथा उन्हें त्यागपत्र देने के अपने फैसले पर फिर से विचार करने की बात कही। आडवाणी जी किसी तरह भाजपा अध्यक्ष पर रहने पर राजी तो हुए परंतु संसद की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया तथा 1996 का लोकसभा चुनाव न लड़ने की बात कही। 1996 के आम चुनाव में गांधीनगर से अटल जी ने ही चुनाव लड़ा। वैसे अटल जी की सीट लखनऊ भी थी। अटल जी उस समय भी लखनऊ से ही सांसद रहे तथा गांधीनगर से त्याग पत्र दे दिया।
1995 के गर्मी में मुम्बई (तात्कालीन बम्बई) में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक हुई। भाजपा के देशभर के कार्य कर्ता वहां गए हुए थे। यह भाजपा के 13 वर्षों के इतिहास में ऐसा दूसरी बार था जब मुम्बई में भाजपा की यह सबसे बड़ी बैठक होने वाली थी। इससे पहले 1980 में स्थापना के समय अटल जी ने मुम्बई में ही भाषण दिया था तथा भाजपा के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि “अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।" यह उक्ति बार-बार चर्चा के केन्द्र में रही। फिर से वही जोश के साथ 1995 में भाजपा की बैठक बम्बई में शुरू हुई।
लाल कृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में इस होने वाली बैठक के बारे में किसी भी व्यक्ति या कार्यकर्ता को इस बात की कोई आशा नहीं थी कि यह बैठक आगे की राजनीति को एक नयी दिशा देने जा रही है। 1995 की बैठक के बाद भाजपा की रणनीति धारदार हो गयी ।
आडवाणी ने अपनी अधयक्षता में कार्यकर्त्ता को संबोधित करते हुए कहा कि जब भाजपा को बहुमत मिलेगा तो भाजपा की तरफ से 'अटल बिहारी बाजपेयी' प्रधानमंत्री बनेंगे। ऐसी घोषणा की उम्मीद किसी को नहीं थी। भारतीय राजनीति में ऐसा पहली बार हो रहा था कि किसी विपक्षी दल के तरफ से चुनाव के पहले ही अपना प्रधानमंत्री तय किया जा रहा हो। अटल जी यह घोषणा सुनकर कोई बड़ी प्रतिक्रिया न दे पाए।
भाजपा को यह उम्मीद थी कि अटल बिहारी बाजपेयी का व्यक्तित्व तथा उनकी करिश्माई वाकपटूता और पारदर्शी छवि भाजपा को कहीं सत्ता जरूर दिलाएगी। ऊपर से भाजपा के विभिन्न सिद्धांतो जैसे समान नागरिक संहिता तथा धारा 370, राम मंदिर के बारे में नीतियों ने लगभग इस पार्टी को अछूत बना दिया था। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को यह वास्तविकता भी अटल जी का व्यक्तित्व तथा सद्व्यवहार राजनीतिक साथी चुनने में मदद करेगा। इसका फौरन लाभ भी मिला। बिहार में जनता दल से अलग हुए दो महत्वपूर्ण नेता जॉर्ज फर्नांडीस तथा नीतिशकुमार ने समता पार्टी बनायी तथा 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा (माले) से गठबंधन किया। हार हो गई। नीतिश और फर्नाडीस ने यह फैसला किया कि अटल जी के नेतृत्व को स्वीकारा जाए तथा भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा जाए। वैसे औपचारिक रूप से नीतिश कुमार ने इस कदम को लालू विरोधी मतों को बिखरने से रोकने का ही रास्ता बताया।
भाजपा जैसी पार्टी को समता जैसी समाजवादी विचारधारा वाली पार्टी का साथ मिलना महत्वपूर्ण था क्योकि अभी तक भाजपा के पास दो ही दल साथ थे जैसे:- शिवसेना तथा अकाली दल । इन दोनों दलों को भी कहीं-न-कहीं किसी सम्प्रदाय से जोड़ कर देखा जाता था।
समता पार्टी के आने से भाजपा की राजनैतिक अस्पृश्यता खत्म होने लगी तथा अटल जी का नेतृत्व आरम्भिक सत्ता पर स्वीकार्य होने लगा। 1996 के चुनाव के बाद भाजपा को 161 सीटें मिली जो 1991 में 119 थी। 13 दिनों की सरकार में भाजपा के सांसद सिर्फ मंत्री बने। 13 दिनों के बाद अटल जी को त्यागपत्र देना पड़ा।
अटल जी 1996-1998 तक लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे तथा अपनी शैली को बनाए रखा। गुजराल से कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद मार्च 1998 में अटल जी को 1996 की अपेक्षा अधिक समर्थन मिला। इस समय अटल जी के नेतृत्व में और भी दलों का विश्वास बढ़ने लगा। अब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, चन्द्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी, नवीन पटनायक का 'बीजू जनता दल' तथा जयललिता की 'अन्ना द्रविड़ मुनेग कडञम' भी भाजपा को समर्थन देने को तैयार हो गए।
19 मार्च 1998 को अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में अटल जी की सरकार बनी। इस सरकार में सहयोगी दलों के नेताओं को भी शपथ दिलायी गयी। पहली बार किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेतृत्व में क्षेत्रीय दलों की केन्द्र सरकार का जन्म हुआ। इस सरकार में उत्तर से दक्षिण तथा पूरब से पश्चिम भारत के क्षेत्रीय दलो के नेताओं को स्थान मिला था। सबसे महत्वपूर्ण बात कि अटल बिहारी बाजपेयी ने रक्षा मंत्रालय जैसे संवेदनशील मंत्रालय को क्षेत्रीय पार्टी के नेता जॉर्ज फर्नाडीस को सौंपा था। अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने मित्र जगमोहन तथा जेठमलानी को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जबकि भाजपा के सदस्य के रूप में इन दोनों की भूमिका कभी भी अधिक नहीं थी।
अटल बिहारी बाजपेयी के सामने एक ऐसी अर्थव्यवस्था थी जिसका राजकोषीय घाटा उफान पर था तथा मुद्रास्फीति भी अधिक थी। विदेशी निवेश मध्यम था तथा राजनीतिक अस्थिरता के कारण शेयर बाजार भी सुस्त था। उधर विदेशी संबंध भी शिथिल थे। पाकिस्तान की आक्रामक नीति सीमा पर क्लेश पैदा कर रही थी। अटल बिहारी बाजपेयी ने अपनी अनुभव शक्ति से यह कोशिश भी कि भारत को एक मजबूत देश बनाने के लिए इसकी समाजिक क्षमता को बढ़ाना आवश्यक है। दक्षिण एशिया की परिस्थिति तथा चीन का विकास भारत के लिए सोचने को मजबूर कर रहा था। अब अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के पास रणनीति बदलने तथा नयी दृष्टि लाने का भी सही समय मिला था। 19 मार्च 1998 से 10 मई 1998 तक अटल बिहारी बाजपेयी ने कोई बड़ा बयान जारी नहीं किया।
2. पोखरण 'द्वितीय' POKHARAN (II)
अटल जी के नेतृत्व में बनी सरकार की यह ऐसी उपलब्धि थी जिसने विश्व के लगभग सभी देशों में भारत को चर्चित कर दिया। 11 मई 1998 को भारत ने तीन परमाणु परीक्षण किए तथा 13 मई 1998 को 2 परीक्षण किए। यह परीक्षण राजस्थान के पोखरण रेंज में हुआ। इसके पहले भारत ने 1974 में इंदिरा गांधी के रिजिम में यह परीक्षण किया था वह पूर्ण नहीं हो सका था।
1998 का यह परीक्षण सफल योजना के अनुसार पूर्ण तथा शक्तिशाली था। अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के इस कदम ने भारत की सामरिक तथा वैश्विक रणनीति बदल कर रख दी। अधिकतर इतिहास लिखने वाले इस परीक्षण को कम कर आंकते हैं क्योंकि यह परीक्षण किसी ऐसे प्रधानमंत्री के काल में हुआ जिसे कभी सत्ता में रहकर अपनी भूमिका को इतिहास में लिखवाने के लिए पैरवी पुरस्कार देने की आवश्यकता नहीं हुई तथा अटल जी को इन सभी कदमों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
अटल बिहारी बाजपेयी ने इस परमाणु परीक्षण पर अपनी प्रतिक्रया में यह कहा कि 'यह न्यूनतम परमाणु प्रतिरोधक क्षमता है तथा भारत ने किसी दूसरे देश के लिए परीक्षण नहीं किया है बल्कि अपनी आत्मरक्षा के लिए परीक्षण किया है। वैसे भारतीय परमाणु कार्यक्रम 1948 में ही आरम्भ हो गये थे परंतु उस समय प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने जो लक्ष्य तय किए थे वह लक्ष्य उर्जा से संबंधित थे। इसके अलावा सभी प्रधानमंत्री ने निःशस्त्रीकरण की पैरवी के साथ ही परमाणु कार्यक्रमों को दृढ़ता से जारी रखा तथा नरसिम्हा राव ने इसे अधिक प्रासंगिक नहीं लिया।
भारत सरकार ने 1998 में परमाणु परीक्षण करने का निर्णय लिया वह एक दिन या महीने में लिया गया निर्णय नहीं था वरण् इसकी पृष्ठभूमि वर्षों की थी तथा ऐसे वातावरण से निर्मित हो रही थी कि वैश्विक परिदृश्य में परमाणु शक्ति संतुलन होना अनिवार्य था परंतु यह पूर्ण रूप से अन्यायपूर्ण था कि महाशक्तियों की प्रमुखता तथा प्रबलता ही बनी हुई थी।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परमाणु शक्ति की दृष्टि से विश्व पूरी तरह से असंतुलित रहा। एन. पी. टी. का मुख्य उद्देश्य विश्व के सिर्फ चार देशों जैसे:- अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रांस को ही परमाणु शक्ति होने के योग्य मानना था। परंतु चीन ने 1960 के दशक में इसमें लगभग जबरन प्रवेश किया तथा 5 देशों की नाभिकीय शक्ति समूह बनाने की पैरवी की। 1960 के बाद सी. टी.बी. टी. जैसे प्रयोग भी हुए तथा यह भी देखा गया कि वह गैर नाभिकीय देशों को परमाणु शक्ति के लक्ष्य के विरोध में संकल्प लेने के लिए हस्ताक्षर लेने को कहा गया। इस संधि में यह साफ था कि परमाणु शक्ति संपन्न देश दूसरे गैर परमाणु शक्ति देशों को परमाणु शक्ति बनने के विरोध करने को कह रहे थे। इस संधि में परमाणु शक्ति देशों के द्वारा अपने परमाणु हथियारों को नष्ट करने का वादा एकदम नहीं था। यह संधि, असंतुलित, अन्यायपूर्ण तथा भेद-भावों से पूर्ण थी।
भारत कभी भी सी.टी.बी.टी. और एन. पी. टी. पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं हुआ। भारत की प्रवृत्ति निःशस्त्रीकरण की पैरवी करने की थी पर संतुलित विश्व के साथ यह हो ऐसा भी इसने कई बार दोहराया था। भारत का पक्ष हमेशा यह रहा कि विश्व के सभी शक्तिशाली देशों को अपने परमाणु परीक्षण पर रोक लगाने तथा नष्ट करने की घोषणा करनी चाहिए तब ही विश्व में शांतिकर वातावरण तैयार होगा। पर कभी भी विश्व के परमाणु शक्ति संपन्न देश इस ओर बढ़ने के इच्छुक नहीं दिखे। बुरे मन से सोवियत संघ (रूस) और अमेरिका ने कई बैठके भी की पर यह संभव नहीं हो सका। इधर भारत परमाणु शक्ति संपन्न देशों से घिर चुका था भारत की सुरक्षा की संवेदनशीलता सबसे अधिक थी। एक तरफ चीन जैसा विशाल देश भारत को 1962 में ठेस पहुंचा चुका था वहीं उसके पास परमाणु बम का जखीरा मौजूदा था।
चीन के पास 1998 में एक अनुमान के अनुसार 400 से 500 नाभिकीय बम हैं तथा दूर तक परमाणु ढोने वाली मिसाइलें हैं जिनमें अंर्तमहाद्वीपीय मिसाइल भी शामिल है। ऐसी सूचना मिली कि चीन तिब्बत में नाभिकीय स्टेशन भी तैयार किया था तथा उसके साथ पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश भी थे जो 1947 बाद से हमेशा पीठ में चाकू भौंकने की फिराक में थे। पाकिस्तान ने चीन की मदद से कई मिसायल तकनीक भी हासिल कर ली थी तथा 'गौरी' तथा 'गजनवी' नाम देकर भारत को गीदड़ धमकी जैसा कृत्य आरंभ कर दिया। ये मिसाइल विकसित थे। इधर आकर भारत नाभिकीय शक्ति संपन्न देशों के सामने अपनी इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद एक कमजोर देश के रूप में जाना जाता था। उस समय युक्रेन, कजाकिस्तान, रूस इत्यादि के पास अच्छे खासे नाभिकीय हथियार थे । ऐसी खुफीया रिर्पोट भी थी कि परमाणु मामले में पाकिस्तान ने भी चीन की मदद से काफी विकास कर लिया था। पाकिस्तान के तत्कालीन नेताओं ने यह कहा और बार बार कहा कि पाकिस्तान के पास परमाणु शक्ति बनने की क्षमता है। पाकिस्तान के इन झूठे या सच्चे दावों ने भारत को अपनी रणनीति तथा सिद्धांत संबंधी नीति को बदलने पर मजबूर कर दिया।
पाकिस्तान भारत को तीन बार चुनौति दे चुका था चीन उसे आंख मूंदकर मदद भी पहुंचा रहा था। गौरी और गजनबी नामक मिसाइल बनाना एक इशारा था क्योंकि गौरी ने ही भारत पर हमला किया था तथा हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान को उस ने मार गिराया था। यह भी सिर्फ कथित रूप से कहा गया है। गजनबी भी इसी उद्देश्य से पाकिस्तान ने अपने मिसाइल का नाम रखा था।
भारत के पास कोई भी रक्षात्मक विकल्प नहीं था । पी. वी. नरसिंहराव परीक्षण करना चाहते थे पर आन्तरिक तथा बाहरी दबाव के कारण उन्होंने अटल बिहारे बाजपेयी को इसकी प्राथमिकता के बारे में बताया। बाजपेयी ने ए.पी.जे. अब्द. मूल कलाम तथा आर. बनर्जी को परमाणु परीक्षण के लिए आदेश दे दिए । कहा जाता है कि सरकार के सबसे शुरूआती निर्णयों में से एक है।
11 मई और 13 मई को भारत ने परमाणु परीक्षण किए तथा प्रधानमंत्री ने विश्व के सामने इसकी घोषणा कर दी। इस परीक्षण में यह भी दावा किया गया कि 45 किलों तक के हाइड्रोजन बम का भी परीक्षण किया गया है। अटल जी ने 13 मई को यह घोषणा की कि भारत अब परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गया है तथा अब देश में बने जमीन से जमीन पर मार करने वाने 'पृथ्वी' और 'अग्नि' मिसायल के द्वारा परमाणु बम को ढोया जा सकता है।
परमाणु परीक्षण की प्रतिक्रिया काफी मिली-जुली थी । वामपंथी दलों ने इसका विरोध किया। कांग्रेस ने वैज्ञानिकों को धन्यवाद दिया। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से कई पत्रकार और इतिहासकार ने भी सरकार के इस परमाणु परीक्षण के फैसले के अच्छे तथा इच्छा शक्ति वाले फैसले को नहीं सराहा। इसकी खामियां ही निकालते रहे। विपिन चन्द्रा ने अपनी पुस्तक में लिखा कि ऐसा जनमानस बना कि यह परमाणु परीक्षण चुनाव में फायदे के लिए किए गए परंतु विनम्रतापूर्वक कह कह देना आवश्यक है कि चुनाव महीने पहले ही हुए थे तथा आगामी चुनाव 4 साल बाद होने थे। क्योंकि कोई नहीं जानता था कि अगले साल इस सरकार को अल्पमत की स्थिति भुगतनी पड़ेगी।
कई पत्रकारों ने यह कहकर देश में अवस्थिति उत्पन्न करने की कोशिश की कि यह कदम पाकिस्तान को परमाण परीक्षण करने के लिए बाध्य करेगा। यह संभव नहीं था क्योंकि जून 1998 में पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किया। अटल बिहारी बाजपेयी ने संसद में अपने भाषण में इस मुद्दे पर यह कहते हुए सभी संदेहों को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने कहा 'जब पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण कर ही लिया है तो इस पर चर्चा हो ही जानी चाहिए कि क्या कोई देश प्रतिक्रिया स्वरूप सिर्फ 40 दिनों में परमाणु विकास कर सकता है क्या इसलिए यह कहना पूर्णतः भ्रमित करने वाला है कि भारत के परमाणु परीक्षण की प्रतिक्रिया से ही पाकिस्तान परमाणु परीक्षण करने पर मजबूर हुआ।"
भारत की परमाणु नीति को अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार न्यूनतम तथा प्रतिरोधी बताया तथा इसकी जरूरत की विश्व के सामने बात रखी। जॉर्ज फर्नांडीस (तत्कालीन रक्षामंत्री) ने अपने वक्तव्य में यह कहा कि अब भारत के सामने बड़ा खतरा चीन है, न कि पाकिस्तान। इस बयान की काफी आलोचना भी हुई थी। चीन ने परमाणु पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। यहां तक कि अपने दूत को बुला लेने की भी धमकी दी मतलब राजदूत को। चीन जैसे पड़ोसी देश की तरफ से गलत तथा नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं थी। सही रूप में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार की यह मंशा रही कि भारत अपनी नीति तथा सामरिक सहमति को पाकिस्तान केन्द्रित भाव से निकाले। इसमें चीन जैसे देश को गलत तरीके से सोचने की कोई आवश्यकता नहीं थी। भारत के ही तथाकथित महान इतिहासकारों तथा पत्रकारों ने भारतीय नीति में ऐसे बदलाव को टारगेट किया तथा पड़ोसी देशों के साथ संबंध खराब करने के नाम पर बाजपेयी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया।
अमेरिका ने भारतीय परमाणु परीक्षण के बाद उस पर प्रतिबंध लगा दिए तथा जापान ने भी रूस की भर्त्सना की। जापान के अलावा नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, नीदरनलैंड और कनाडा में भारत की स्थिति कमजोर करने की कोशिश हुई तथा भारत को मिलने वाली मदद को खत्म करने की बात कही गयी। अमेरिका ने 5-8 देशों से यह आग्रह किया कि भारत के दस कदम का प्रतिबंध की प्रतिक्रिया के रूप में जवाब दिया जाए परंतु फ्रांस, रूस तथा जर्मनी ने भारत का साथ दिया तथा पहले की तरह आर्थिक संबंध बनाए रखे। इधर ब्रिटेन ने भी भारत का साथ नहीं छोड़ा तथा यूरोपीय संघ के द्वारा उठाए गए कदमों का उसके अध्यक्ष के तौर पर विरोध किया।
भारत के लिए अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का असर भारत पर अंश मात्र भी नहीं पड़ा। भारत की सफलता थी। धीरे-धीरे अधिकतर देशों से सामान्य संबंध बहाल किए तथा अब तो विभिन्न राष्ट्राध्यक्ष भी भारत की यात्रा कर भारत के रक्षा संबंधी विषयों के प्रति समर्थन देने लगे।
भारत ने अपने परीक्षण से वर्षों से चले आ रहे दोहरे वैश्विक मापदण्डों को गहरी चुनौति दी। परमाणु परीक्षण कर भारत ने अमेरिका जैसे देशों को यह समझा दिया कि अमेरिका दोहरी रणनीति तथा स्वयंभू दृष्टिकोण नहीं ला सकता। अमेरिका की दोहरी नीति के कारण ही सी. टी.बी.टी. का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ तथा भारत जैसे देशों को यह मसला बार-बार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाना पड़ा।
भारत ने 11 मई को परीक्षण कर अपने विज्ञान दिवस को जीवित किया तथा इसे 'ऑपरेशन शक्ति' नाम देकर भारत की क्षमता को वैश्विक रूप देने की कोशिश की। परीक्षण के कुछ ही दिन बाद बिहार के बोधगया में प्रधानमंत्री अटल जी ने कहा 'भगवान बुध की धरती से में यह कहना चाहता हूँ कि 11 मई को बुद्ध मुस्कुराए क्योंकि हमने शांति के लिए परीक्षण किया। अब भारत को कोई डरा नहीं सकता पर यह भी सनद रहे कि भारत पहले किसी दूसरे देश पर परमाणु परीक्षण का प्रयोग विनाशकारी रूप के लिए नहीं करेगा।" 
“सरकार की अस्थिरता तथा जयललिता जैसी सहयोगी का अलग होना" 
परमाणु परीक्षण बाद धीरे-धीरे सभी देशों से रिश्ते समान होते गए तथा सरकार चलने लगी। अटल जी ने कुछ ऐसे फैसले इसी काल में लिए जो मील के पत्थर साबित हुए जैसे:- 'स्वर्ण चतुभुर्ज परियोजना' इस योजना के माध्यम से पूरे देश को चारों तरफ से विभिन्न शहरों से जोड़ना था जिसमें पूर्वी सिलयर से पश्चिमी पोरबन्दर तथा इधर श्रीनगर से कन्याकुमारी को सड़क के माध्यम से जोड़ना था। बड़े स्तर पर प्रधानमंत्री ने इसे अपनी रूचि से प्रारंभ कराया।
एक गठबंधन की सरकार की कुछ मजबूरी होती है तथा धारे-धीरे अलग-अलग सहयोगी अपने राज्यों को केन्द्र में रखकर अपने लाभ के लिए सरकार से मांग करने लगे। जहां एक तरफ जयललिता थी जो हमेशा कुछ-न-कुछ मांग रख देती थी। वे कई बार मंत्रालय बदलने के लिए अटल बिहारी बाजपेयी सरकार पर दबाव डालती थी।
जयललिता की पार्टी ए.आई.डी.एम.के. की प्रतिद्वंदिता करूणानिधि की पार्टी डी.एम.के. से थी। जयललिता उस समय तमिलनाडू में विपक्ष में थी। उन्होंने हमेशा बाजपेयी सरकार पर यह दबाव डाला कि तमिलनाडू की स्थिति पर समीक्षा करने के लिए केन्द्र से एक समूह भेजें। बाजपेयी राजनीतिक रूप से बिना मतलब के किसी विपक्षी सरकार को तंग नहीं करना चाहते थे। अटल जी बार-बार जॉर्ज फर्नाडीस को मद्रास भेजकर जयललिता से बात करने को कहते रहते थे तथा किसी भी तरह समर्थन मिलता रहता।
जय ललिता ने धीरे से अपनी रणनीति बदल ली। उन्होंने अब बार-बार दिल्ली आने का फैसला किया। यह रणनीति इसलिए बनी कि दिल्ली में सरकार के सहयोगी दलों को एकजुट कर सरकार पर दबाव डाला जाए। कितनी बार सरकार के सहयोगी एक साथ बुलाकर जयललिता बैठक करती थी। कभी कभी चाय के बहाने तो कभी भोज के बहाने यह क्रम चलता रहा।
अप्रैल 1999 में जयललिता ने एक चाय पार्टी दिल्ली में बुलायी। इसके मुख्य संयोजक सुब्रहमण्यम स्वामी थे। जयल. लिता ने इससे पहले बाजपेयी से सुब्रहमण्यम् स्वामी को वित्तमंत्री बनाने की मांग अनौपचारिक रूप से की थी पर अटल जी तैयार नहीं हुए। जयललिता की इस चाय पार्टी की सबसे बड़ी खासियत रही कि इसमें सोनिया गांधी भी आयीं तथा एक राजनीतिक भूचाल लाने की कोशिश की गई। कुछ ही दिनों बाद जयललिता ने अपने दल के मंत्रियों को त्यागपत्र देने के आदेश दे दिए तथा केन्द्र सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी।
17 अप्रैल 1999 को राष्ट्रपति के आदेश से बाजपेयी ने अपना विश्वास प्रस्ताव रखा तथा सिर्फ एक वोट से वह विश्वास प्रस्ताव हार गए। इसमें उड़ीसा के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री गिरिधर गामांग का वोट देना चर्चित रहा। क्योंकि उन्होंने अभी संसद की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था तथा एक मुख्यमंत्री के तौर पर लोकसभा में आकर सरकार के खिलाफ मतदान करना व्यावहारिक नहीं था। तत्कालीन लोक सभा अध्यक्ष ने उन्हें नैतिकता के आधार पर फैसला लेने को मजबूर कर दिया फिर भी वह नहीं माने तथा मतदान किया।
1 वोट से अटल जी की सरकार गिर गई तथा फिर एक बार राजनीतिक शून्य पैदा हो गया। यह एक कुठाराघात था। भारत के राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए यह खतरनाक भी था। राष्ट्रपति के. आर. नारायण ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया से गांधी सरकार बनाने के लिए प्रयास करने तथा बहुमत जुटाने को कहा। पहले तो सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति भवन में जाकर बहुमत होने की बात कही पर राष्ट्रपति ने उन्हें समर्थन देने वाले नेताओं की चिट्ठी लाकर देने की बात कही ।
सोनिया गांधी जी 272 सांसदों के समर्थन करने का दावा करने जाने वाली थीं, उसके पहले समाजवादी पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव ने राष्ट्रपति महोदय से मिलकर कांग्रेस को समर्थन नहीं देने की बात कह दी। उसके बाद राष्ट्रपति से मिलकर सोनिया गांधी ने यह कहा कि "मेरे पास सिर्फ 233 सांसदों का ही समर्थन है तथा जरूरी 272 सांसदों की संख्या नहीं है"।
अब राष्ट्रपति के सामने चुनाव में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। यह चुनाव 1996 के बाद तीसरा चुनाव था जो एक लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं था। इसी बीच कुछ घटना घटी जिसमें सरकार के अल्पमत या बहुमत में होने के मायने खत्म हो गए। अब सभी के लिए देश की सुरक्षा महत्वपूर्ण हो गई।
3. कारगिल प्रकरण
फरवरी 1999 में अटल बिहारी बाजपेयी ने एक ऐतिहासिक कदम उठाकर दिल्ली से लाहौर की बस यात्रा की योजना को मूर्त रूप दिया। उनके द्वारा उठाया गया यह कदम भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने की यह गहरी कोशिश थी। अटल जी ने दिल्ली से लाहौर की बस यात्रा की तथा अपने साथ भारत के सांस्कृतिक क्षेत्र के कई प्रतिनिधियों को ले गए।
बाजपेयी की लाहौर यात्रा में लाहौर घोषणा पत्र की औपचारिक घोषणा हुई तथा इसे एक नया आरंभ माना गया। अटल जी ने लाहौर में ऐतिहासिक भाषण देते हुए कहा कि "भारत-पाकिस्तान आपसी संबंधों को प्रकृति की स्वीकार्यता के आधार पर विकसित करे क्योंकि हम इतिहास बदल सकते हैं पर भूगोल नहीं।" लाहौर घोषणा पत्र को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा गया तथा यह उम्मीद जतायी जा रही थी कि अब सब कुछ सामान्य हो जाएगा। परंतु पाकिस्तान की सेना तथा आतंकवादी गठजोड़ ने पहले से ही एक बड़ी योजना पर कार्य को मंजूरी दी। फरवरी के महीने में ही धीरे-धीरे घुसपैठिये कश्मीर की कारगिल सीमा तक पहुंच चुके थे।
मई 1999 में खुफीया जानकारी मिली कि पाकिस्तान की सेना जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्र में घुसपैठियों के साथ अंदर आ चुकी है तथा वहां चोटियों पर कब्जा कर लिया है। यह महत्वपूर्ण चोटी की श्रृंखला कारगिल सेक्टर में थी। भारत को प्रतिक्रियात्मक कारवाई करनी पड़ी लगभग 70 दिनों तक जवाबी कारवाई होती रही। भारतीय सेना को भी अनगिनत जवानों की तिलांजलि देनी पड़ी तथा घुसपैठ वाले क्षेत्रों से पाकिस्तानियों को खदेड़ा गया। भारत में आंतरिक रूप से कारगिल मामले पर गजब एकता तथा उत्साह देखने को मिला।
कई हजार लोगों ने अपने वेतन तथा कई महिलाओं ने अपने जेवर सेना को दान किए तथा भारत के कोने-कोने से पाकिस्तान के विरोध में आवाज उठने लगी। भारत की सेना ने अपनी बहादुरी तथा वीरता से जुलाई तक सभी घुसपैठियों तथा उनका साथ दे रही पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया तथा चोटी पर फिर से कब्जा कर लिया।
देखा जाए तो कारगिल की शुरूआत में विश्व समुदाय ने भारत को शांत रहने की अपील की पर धीरे-धीरे वास्त. विकता से सामना होने के बाद भारत के पक्ष में बयान जारी करने लगा। एक बार तो तात्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव कॉकी अन्नान को अटल जी ने बहुत ही सधे तरीके से यह कहा कि आपका फोन नवाब शरीफ के बदले दिल्ली लग गया है महाशय क्योंकि श्री अन्नान अटल बिहारी बाजपेयी को फोन पर शांति की अपील कर रहे थे। श्री अन्नान ने तुरंत बयान जारी कर पाकिस्तान को सलाह दी कि वह अपनी सेना पीछे कर ले। भारतीय वायु सेना की मदद तथा कुशल नेतृत्व ने नवाज शरीफ को अमेरिका जाने पर मजबूर कर दिया तथा वाशिंगटन में ही नवाज शरीफ ने यह घोषणा की कि पाक सेना पीछे जाने को तैयार है।
अमेरिका, ब्रिटेन तथा चीन ने पाकिस्तान पर भारतीय क्षेत्र से हटने के लिए दबाव डाला पाकिस्तान की यह सिफारिश एक भी नहीं चली कि ये घुसपैठिये हैं तथा सिर्फ इसे पाक सरकार नैतिक समर्थन दे रही है।
भारत ने अपनी सीमा में रहते हुए ही विभिन्न कारवाई की तथा युद्ध को बड़े स्तर पर जाने नहीं दिया। भारत ने सधी हुई कूटनीति से पाकिस्तान को विदेश नीति पर भी पीछे धकेल दिया। 
कारगिल का प्रभाव अपने आप में एक अलग प्रकार से भारत पर पड़ा। इसने यह सदा के लिए भारत को सामरिक रणनीति तथा खूफिया नीति को बदलने को मजबूर कर दिया। हम यह नहीं कह सकते कि इसमें कोई खूफिया विफलता नहीं थी। पर एक ऐसा विषय है जिस पर निष्पक्ष सोचना चाहिए। 1998 के दिसम्बर से ही यह घुसपैठ हो रही थी तथां खूफिया विभाग की यह विफलता ही थी कि मई में इसका पता लगा जब तक सैकड़ो आतंकवादी अंदर प्रवेश कर चुके थे।
अटल सरकार ने कारगिल की समीक्षा के लिए के. सुब्रहमण्यम की अध्यक्षता में एक कमिटि बनायी जो 29 जुलाई 1999 से निर्मित होकर 15 दिसंबर 1999 को संसद में रखी गयी। इस कमिटि ने कई मोर्चे पर विफलता को दर्शाया तथा खूफिया तंत्र की आलसी स्थिति को रेखांकित किया। भारत सरकार को अपनी कश्मीर नीति को प्रभावित करने वाली सभी स्थितियों की समीक्षा करनी पड़ी।
कई इतिहासकारों ने तथा पत्रकारों ने अपने पारंपरिक लेखों तथा किताबों में यह लिखकर भ्रम फैलाने की कोशिश की कि भाजपा सरकार ने जान बूझकर आतंकवादियों को अंदर आने दिया ताकि चुनाव के समय युद्ध कर इसे मुद्दा बनाया जाए। यह सही तौर पर नहीं कहा जा सकता कि कोई सरकार जान बुझकर महीनों अपनी जमीन से अपने लाभ के लिए आतंकवादियों को आने दे सकती है क्योंकि घुसपैठ, कब्जा, तथा युद्ध किसी सरकार के लिए अच्छी तस्वीर नहीं पेश करता और उसमें भी एक ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व में सरकार चल रही थी जिसने देश के लिए अपनी जिंदगी लगा दी। किसी भी स्थिति में कारगिल घटना को उचित नहीं माना जा सकता पर किसी सरकार पर यह आरोप लगाना कि उसने आतंकवादियों को बुलाकर इस परिस्थिति को उत्पन्न होने दिया, कहीं से उचित नहीं है। अगर ऐसा होता तो 2004 से 2014 तक कांग्रेस की सरकार रही तथा वह बिना रोक टोक जांच करवा सकती थी। उसमें भी पहले 5 साल भाजपा के विपरीत प्रतिद्वन्दी वामपंथी उस सरकार को समर्थन दे रहे थे।
4. 1999 का आम चुनाव NDA की जीत
कारगिल युद्ध के बाद एक बार फिर आम चुनाव की बारी आयी। इसकी घोषणा और लोक सभा भंग करने की घोषणा पहले ही कर दी गई थी। इस बार भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने एक औपचारिक गठबंधन बनाकर उसका नामकरण किया तथा इसका नाम 'राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन' यानी छक् । ही रखा। इसके अध्यक्ष अटल बिहारी बाजपेयी बनाए गए तथा संयोजक 'श्री जॉर्ज फर्नाडीस' को बनाया गया। अब इस गठबंधन में कुछ नये दल भी आ गए थे जैसे:- 'द्रविड़ मुनेग कडगम' पूर्वोत्तर की कुछ पार्टियां तथा ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इत्यादि । यह एक व्यस्थित गठबंधन था जो विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता था।
इधर कांग्रेस पार्टी की स्थिति अलग थी। यह पार्टी अभी भी पूरी तरह अपने आंतरिक कलह से उबर नहीं पायी थी । वैसे सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को दिसम्बर 1998 में मध्यप्रदेश राजस्थान तथा दिल्ली में विधानसभा चुनाव में जीत मिली थी पर अभी भी सोनिया गांधी के विदेशी मूल को लेकर कुछ संदेह बने हुए थे । कांग्रेस पार्टी के नेता श्री शरद पवार तथा पी.ए. संगम ने कांग्रेस अध्यक्ष के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया तथा जीत नहीं होने का संदेह प्रसारित किया।
शरद पवार को कांग्रेस पार्टी से हटा दिया गया तथा शरद पवार ने 1999 में ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बना ली। यह एक ऐसी घटना थी जो कांग्रेस को चुनाव से पहले संकट में डालने वाली थी। सोनिया गांधी के विदेशी मूल के प्रश्न को विपक्ष ने भी काफी उछाला पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व तथा अटल बिहारी बाजपेयी ने व्यक्तिगत रूप से किसी भी भाषण में सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा नहीं उठाया।
सोनिया गांधी और कांग्रेस विदेशी मूल के प्रश्न पर रक्षात्मक हो गयी तथा यह लगने लगा कि अब कांग्रेस का नेतृत्व इस मुद्दे को जितना हल्का समझता था वह जनता के बीच उतना ही प्रसिद्ध तथा प्रभावी होता जा रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सोनिया गांधी का अमेठी के अलावा कर्नाटक के बेल्लारी से चुपचाप नामांकन करना था। यह एक ऐसी परिस्थिति थी जब भाजपा ने इसे एक नया मुद्दा बनाने की कोशिश करने की ठानी तथा अपनी तेजस्वी नेता सुषमा स्वराज को वहां मुकाबले के लिए भेज दिया। बेल्लारी एक ऐसी सीट थी जो सोनिया गांधी की तरफ से बेल्लारी में खड़ा होना कांग्रेस की रक्षात्मक स्थिति को दर्शाती थी।
1999 का चुनाव भाजपा ने राष्ट्र की स्मिता तथा राजनीतिक स्थिरता के नाम पर लड़ने का फैसला किया। यह कहा जा सकता है कि भाजपा के पास कारगिल, सरकार की सफलता तथा कुशल नेतृत्व दिखाने का अवसर था। उधर कांग्रेस को अभी भी गठबंधन पर विश्वास नहीं हुआ था। कांग्रेस ने औपचारिक रूप से गठबंधन न करने की बात कही तथा चुनाव लड़ने को तैयार हो गई।
चुनाव परिणाम आने के बाद यह पहली बार हुआ कि किसी चुनाव पूर्व गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला तथा अटल जी के नेतृत्व में छव। को पूर्ण विश्वास जनता के द्वारा प्राप्त हुआ यह एक ऐसा मोड़ था जब भारत की राजनीति गठबंधन के युग में प्रवेश करने वाली थी। भाजपा को 182 सीटें मिली तथा कांग्रेस को 134 सीटें मिली। भाजपा तथा उसके सहयोगी दल मतलब NDA को साथ में 296 सीटे मिली जो बहुमत से अधिक थी।
13 अक्टूबर 1999 को अटल बिहारी बाजपेयी को फिर से एक बार प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। अब ऐसी उम्मीद बंधी कि राजनीतिक स्थिरता तथा सर्वसम्मति से 5 साल तक सरकार नहीं बदलने वाली। अटल बिहारी बाजपेयी के सामने अब चुनौतियां भी कम नहीं थी। देखा जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास तथा अन्तर्राष्ट्रीय नीति में कुछ बड़े बदलाव हो रहे थे तथा इस स्तर में इसे एक नये बदलाव की आवश्यकता थी। हमारी नीतियों को अब एक नया सार चाहिए था। जिसमें आने वाली शताब्दी में भारत को एक नये तरीके से विश्व के द्वारा देखा जा सके।
अटल बिहरी बाजपेयी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़े स्तर पर बदलाव भी किए। सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश नीति को संतुलित स्तर पर बढ़ाना जिससे कि आमदनी हो सके तथा सरकारी खर्चा में भी कमी करना जिससे राजकोषीय घाटा कम हो सके जैसे लक्ष्य के लिए आगे बढ़ा गया तथा कुछ महत्वपूर्ण कठोर फैसले भी किए गए। वैसे देखा जाए तो ये फैसले दूरदर्शी थे पर तत्काल के लिए प्रायोगिक भी।
अर्थव्यवसथा में नयी जान फूंकने के लिए सरकार ने जो कदम उठाए वह भविष्य में अच्छे संकेत दे सकते थे पर उस समय जनता को उनकी नीतियां स्वीकार नहीं हो रहीं थी। देखा जाए तो सरकारी खर्च घटाने के लिए तथा राजकोषीय घाटा कम करने के लिए कुछ ऐसी नीति तथा फैसले लिये गए जो जनता को नागवार थे, उदाहरणस्वरूप 2004 के बाद सरकारी नौकरी में जाने वाले को पेंशन बंद करना, विभिन्न तरह के फंडों को नया रूप देना तथा उद्योग परिसर को बुनियादी सुधार के लिए आगे आने को कहना जैसी कई व्यावहारिक नीतियां बनीं। उधर कुछ फैसले भी लिए गए जो व्यावहारिक थे, जैसे:- प्रवासी भारतीयों के लिए बाण्ड स्कीम तथा देश में पैसे निवेश करने को प्रोत्साहन देना तथा विभिन्न मंत्रालयों को एकीकृत करना तथा इसमें प्रवासी भारतीय मंत्रालय तथा विनिवेश मंत्रालय को अधिक तवज्जों देना शामिल है।
सरकार की ऐसी नीतियां सकारात्मक प्रभाव के साथ परिणाम दे पायीं। 2004 में सरकार जब हट गई तो 8.3 प्रतिशत की विकास दर तथा 110 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा अंदर छोड़ कर गयी थी। यह खुद उन फैसलों की पैरवी करता है जो कड़े तौर पर लिये गए थे। राजकोषीय घाटा कम करने की इच्छा शक्ति इस सरकार में दिखाई दी तथा इसके अच्छे परिणाम भी मिले थे। इसके अलावा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, अंत्योदय योजना, स्वजल धारा योजना, इत्यादि जैसे कार्यक्रम ने जनता को बहुत ही सहुलियत प्रदान किया। यशवन्त सिन्हा तथा जसवंत सिंह इन दोनों वित्तमंत्रियों ने अपनी तरफ से बहुत सारे ऐसे प्रयास किए जो मील का पत्थर बने।
अटल बिहारी बाजपेयी ने संसद को यह बताया कि बिहार तथा उड़ीसा जैसे राज्यों को विशेष फंड जारी कर विकास करने के प्रयास किए जाएंगे पर योजना के अनुसार बिहार को कहा गया कि अपनी योजना बनाकर भेजे तथा फंड की सुविधा ले। बिहार जैसे पिछड़े राज्य का विकास कहीं न कहीं राज्य सरकार की कमी के कारण रुका था और वह तो योजना भी नहीं जानते थे। बाजपेयी सरकार ने एक नयी नीति के तहत राज्यों को विभिन्न योजना की लागत तथा आउटपुट के आधार पर पैसे देने लगी तथा इस कारण आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्य को लाभ हुआ तथा बिहार जैसे राज्य को भी जहां की सरकार भी सक्रिय नहीं थी, हानि हुई। वैसे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को अधिक सफलता मिली तथा विकास की रफ्तार इसके माध्यम से तेज हुए।
इसी सब के बीच दिसम्बर 1999 में एक अपहरण की घटना घटी तथा सरकार के सामने धर्म संकट खड़ा हो गया। काठमांडू से दिल्ली आने वाली उड़ान प्814 को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया तथा इसे अमृतसर होते हुए कांधार (अफगानिस्तान) लेकर चले गए। सरकार की प्राथमिकता विमान में बैठे लगभग 250 यात्रियों की जान बचाने की थी।
उस समय भारत के पक्ष में उतनी बातें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नहीं होती थीं जितनी आज है। भारत सरकार उस देश में अपनी कोई राजनयिक कोशिश को परिणाम के स्तर पर पहुंचने में नाकाम रही थी क्योंकि उस समय अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार थी जिसको सिर्फ पाकिस्तान ही ऐसा देश था जो मान्यता दिए हुए था। कई स्तरों पर देखा जाए तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो दवाव बनाए जा रहे थे, उससे कहीं अधिक सरकार के सामने आंतरिक दबाब थे। 250 यात्रियों के परिवार जन तथा विपक्षियों की तरफ से लगातार दबाव बनाए जा रहे थे यहां तक कि विदेश मंत्री जसवंत सिंह के प्रेस कांफ्रेस को भी घेर लिया गया था। विपक्षी समूहों ने सरकार पर 250 यात्रियों की सुरक्षा को सबसे अधिक प्राथमिकता देने की सलाह दी।
सरकार आतंकवादियों की शर्त को नहीं मानना चाहती थी जिसमें 4 आतंकवादियों को रिहा करने की शर्त भी मुख्य रूप से थी। लेकिन सर्वदलीय बैठक, खूफिया रिपोर्ट, आंतरिक दबाव के कारण सरकार को 'मजुद अजहर' जैसे आतंकी को छोड़ना पड़ा। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण समय था तथा जनता की सुरक्षा तथा सैकड़ों मानव संसाधन को बचाने के लिए लिया गया फैसला था। हालांकि तत्कालीन सरकार की आलोचना इस मुद्दे पर अभी भी होती है पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह फैसला सर्वदलीय आधार पर लिया गया फैसला था। इसके अलावा अफगानिस्तान जैसे देशों में जाकर कोई मिशन पूरे करने की (उस समय की स्थिति में) स्थिति संभव ही नहीं थी।
अटल बिहारी बाजपेयी ने इस घटना के बाद अपनी विदेश नीति में व्यवाहारिक परिवर्तन भी किए जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। सही तौर पर देखा जाए तो प्814 की घटना नेपाल में असुरक्षा तथा घोर लापरवाही रखने का खामियाजा था। सही स्तर पर जांच में पाया गया कि काठमांडू से उड़ाने पटना के लिए असुरक्षित है तथा पटना-काठमांडू की उड़ान को बंद कर दिया गया।
निष्पक्ष रूप में अपहरण की इस घटना का दूरदर्शी परिणाम नकारात्मक रूप से ही निकला। अपहरण होने पर मसूद को छोड़ना एक गलत फैसला था क्योंकि वह 'जैश-ए-मुहम्मद संगठन' नामक एक आतंकवादी समूह बनाकर लगातार कश्मीर में उपद्रव करवाता रहा है। तत्कालीन परिस्थितियों की सीख यही थी कि ऐसे मामलों तथा घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में अपनी नीति तथा अपनी आंतरिक सुरक्षा आक्रामक तथा पहले से अधिक परिपक्व होनी चाहिए।
जेश-ए-मुहम्मद ने 2001 ई. में अपनी कायराना हरकत को अंजाम देना आरंभ कर दिया। कश्मीर विधान सभा पर हमला हो या चरार-ए-शरीफ पर। सभी हरकतों तथा हमलों का जिम्मेवार इसी उग्रवादी संगठन को माना गया। सबसे बड़ी घटना को इस आतंकवादी संगठन ने 2001 के दिसम्बर 13 को अंजाम दिया। संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था तथा सामान्य ढंग से कार्यक्रम हो रहे थे। अचानक आतंकवादियों ने संसद पर कुछ हथियारों के साथ घुस कर हमला कर दिया। 3 आतंकवादियों ने घुसकर हमला किया। उस समय 200 से अधिक सांसद संसद में मौजूद थे।
सांसद, गृहमंत्री आडवाणी तथा मीडिया कर्मी वहीं मौजूद थे। सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठा लिये गये थे तथा इसमें 4 आतंकवादी मारे गए तथा 1 आतंकवादी जो फिदायीन था उसने विस्फोट से अपने आपको उड़ा लिया। हमले के बाद जैश-ए-मुहम्मद तथा लश्कर-ए-तैयस्बा ने घटना की जिम्मेवारी ली तथा भारतीय संसद पर हमले को अपनी सफलता बताया। इस हमले में संसद के 9 सुरक्षाकर्मी भी शहीद हुए तथा इन्होंने अपनी जान पर खेलकर संसद की सम्मान तथा सांसदो की जान की रक्षा की। इस हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरू समेत चार आतंकवादियों को पकड़ा गया। अफजल गुरू को बाद में फांसी दे दी गयी।
2002 ई. में सरकार के सामने आंतरिक स्तर पर कई चुनौतियां आई। इससे पहले भाजपा आलाकमान ने गुजरात जैसे गढ़ में बढ़ रहे सरकार के प्रति आंतरिक कलह को मिटाने की भरपूर कोशिश की मगर केशू भाई पटेल के नेतृत्व में भाजपा सरकार के प्रति गुजरात के अंदर आवाजें खिलाफ थी । अंततः सरकार को बदलने का फैसला किया गया। भाजपा के संसदीय बोर्ड ने तत्कालीन महासचिव तथा पूर्व प्रखर संघ प्रचारक श्री नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा। मोदी लगातार पार्टी और संघ के लिए वर्षो से बिना कोई चर्चा के काम करते रहे थे। उन्होंने गुजरात में अपनी छवि तथा अनुभव से भाजपा की तथा सरकार की समस्याओं को दूर करने का भरसक प्रयास किया तथा सफल भी हुए।
27 फरवरी 2002 को गोधरा शहर में एक घटना घटी मुजफ्फरपुर से अयोध्या होते हुए अहमदाबाद जाने वाली रेलगाड़ी गोधरा स्टेशन पर रूकी थी। इस गाड़ी में एक डिब्बा पूरे कारसेवकों से भरा हुआ था जो अयोध्या से लौट रहे थे। गाड़ी का नाम साबरमती एक्सप्रेस था। संदेहास्पद स्थिति में उस गाड़ी में आग लग गई तथा 59 यात्री जिंदा जल गए। यह भयानक घटना भारतीय इतिहास के लिए दुर्भाग्यपूर्ण थी। इस घटना के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे।
28 फरवरी 2002 को पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे तथा लगभग 1200 लोग मारे गए। 3 मार्च को गोधरा ट्रेन से जुड़े हुए कुछ व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया तथा उन पर पोटा (आतंकवाद निरोधी अधिनियम) लगाया गया। 6 मार्च 2002 को गुजरात सरकार ने कमीशन ऑफ इन्कवॉयरी के तहत गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच के लिए एक आयेग की नियुक्ति की । ये दंगा पूरे भारतीय राजनीति को एक नया रूप दे गया। विपक्षी कांग्रेस ने इसे भाजपा के द्वारा पोषित बताया तथा सभी दल गुजरात के मुख्यमंत्री को टारगेट करने लगे। बाजपेयी सरकार की स्थिरता पर कोई सवाल नहीं उठा तथा भाजपा की आंतरिक राजनीति भी संतुलित रही। एक समय ऐसा लगा कि अटल बिहारी वाजपेयी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जी को त्यागपत्र देने के लिए कहेंगे पर ऐसी कोई वजह नहीं पायी गई जिससे पता लगे कि मोदी तथा सरकार ने अपनी तरफ से दंगा रोकने में कोई कोताही की हो। 22 फरवरी 2011 को विशेष अदालत ने गोधरा कांड के लिए 31 लोगों को दोषी पाया तथा 63 को बरी कर दिया।
भारतीय सभ्य समाज में गोधरा जैसी घटना होना एक दुर्भाग्य था तथा दंगे कहीं भी उचित नहीं ठहराये जा सकते। इस गुजरात दंगों के पीछे ऐसी कोई बड़ी साजिश नहीं नजर आयी जिससे तत्कालीन राज्य सरकार को दोषी ठहराया जा सके। 
कई याचिकाओं में प्रत्यक्ष रूप में नरेन्द्र मोदी जी को दोषी ठहराने की मांग की गई तथा कई बार इस पर सरकार के द्वारा कमिटि तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा एस. आई. टी. बनायी गई पर किसी ने नरेन्द्र मोदी को दोषी नहीं माना तथा बरी कर दिया।
बाजपेयी सरकार की भूमिका गुजरात दंगों में एक संतुलित तथा धैर्य वाली सरकार की रही तथा सरकार कभी भी कुछ ऐसे कदम नहीं उठाना चाहती थी कि इसकी चर्चा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो। दंगे को नियंत्रित किया गया तथा दिसम्बर 2002 में विधानसभा चुनाव नये रूप में कराए गए। एक बार फिर नरेन्द्र मोदी को समर्थन मिला तथा केन्द्रीय सरकार को भी राहत मिली क्योंकि नया जनादेश मिल चुका था।
5. अटल बिहारी बाजपेयी सरकार की लाहौर यात्रा
1998 के मार्च में जब बाजपेयी सरकार बनी तो डेढ़ महीने के अंदर परमाणु परीक्षण कर इस सरकार ने यहू जता दिया था कि अब भारत की विदेश नीति काम चलाऊ नहीं वरण् सक्रिय तथा प्रायोगिक के साथ व्यवहारिक भी होगी। अटल बिहारी बाजपेयी जी के पसंदीदा विषयों में विदेश विभाग तथा इनसे जुड़े मुद्दे थे। अटल जी वर्षों तक विपक्ष में रहते हुए विदेश विभाग की स्थायी समिति के अध्यक्ष रहे थे तथा कितनी बार सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इनसे मदद भी ली थी।
मौलिक रूप से अटल बिहारी बाजपेयी ऐसे रणनीतिकार थे जिन्होंने चीन, पाकिस्तान और इजरायल जैसे देशों के साथ संबंध अच्छे करने के लिए गंभीर प्रयास किया था। यहीं एक ऐसी वजह थी कि इस दिशा में किए गए उनके प्रयास और व्यवहारिक दृष्टिकोण ने पड़ोसी देशों को सकारात्मक प्रतिक्रिया देने को मजबूर कर दिया। बाजपेयी में किसी भी बात के लिए तथा किसी भी बिन्दू पर चर्चा के लिए अद्भुत प्रतिभा थी तथा वह अपनी बात बहुत ही अतुलनीय रूप से रखते थे। अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने प्रधानमंत्री काल में पाकिस्तान से लेकर इजरायल तक के साथ अपने संबंध बनाने की कोशिश की तथा अमेरिका जैसे देशों के साथ संबंध सुधारने की दिशा में सफलतम प्रयास किए। यह सही है कि भारत की विदेश नीति अब व्यावहारिक तथा 20वीं सदी की जरूरतों के अनुसार ढल रही थी ।
6. पाकिस्तान के साथ संबंध
अटल बिहारी बाजपेयी ने पाक के साथ संबंध सुधारने की दिशा में क्रांतिकारी प्रयास किए। 1999 के फरवरी में अटल जी का दिल्ली से बस लेकर लाहौर जाना एक महानतम तथा क्रांतिकारी प्रयास था। अटल बिहारी बाजपेयी के काल में पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर जितनी चर्चा मीडिया में हुई उतनी चर्चा विरले ही दूसरे प्रधानमंत्री के कार्यकाल में हुई। फरवरी 1999 में अटल जी के द्वारा लाहौर की यात्रा ने विश्वास का एक संक्षिप्त तथा महत्वपूर्ण धागा तैयार किया।
नवाज शरीफ के साथ मिलकर लाहौर घोषणा पत्र की घोषणा अटल बिहारी बाजपेयी ने की थी। 21 फरवरी 1999 को दोनों तरफ के राष्ट्राध्यक्षों के द्वारा इस पर हस्ताक्षर हुए थे तथा बाद में भारत और पाक की संसद द्वारा इस पर हस्ताक्षर कर दिए गए थे। लाहौर घोषण पत्र में दोनों देशों की संधि के तहत परमाणु शस्त्रागार के विकास और परमाण का प्रयोग पहले एक दूसरे के खिलाफ नहीं करने की शर्तें शामिल थी। इन घोषणा पत्र में दोनों देशों के द्वारा पहले लड़ाई न करने के लिए आपसी समझ कायम की गई थी तथा यह कहा गया कि द्विपक्षीय संबंधों के लिए किसी तीसरे देश की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है।
लाहौर घोषणा के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंध सामान्य हो ही रहे थे तथा विश्वास का पुल बन ही रहा था कि कारगिल प्रकरण हो गया जिसकी चर्चा हमने पहले ही की है। जब अक्टूबर 1999 में फिर अटल जी चुनकर आए तो लगभग उसी समय पाकिस्तान में नवाज शरीफ का तख्ता पलट हो गया तथा जनरल परवेज मुशर्रफ के हाथ में सत्ता आ गई। सेना के हाथ सत्ता आने से भारत-पाक संबंध अब और अधिक संशय पूर्ण तथा ठहराव से भर गए।
भारत सरकार ने इस तख्तापलट को पाकिस्तान की आंतरिक समस्या बताया पर लोकतंत्र की असफलता के लिए पाकिस्तान की नीति को दोषी बताया। सेना के सत्ता में आने के बाद कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी घटनाएं अधिक होने लगी तथा आई.एस.आई के द्वारा भारत विरोधी कारवाई करने में भी तेजी आ गई।
परवेज मुशर्रफ ने जब 2001 के आरंभ में सेना से अवकाश लिया तो उसने पिछले दरवाजे से राष्ट्रपति पद हासिल कर लिया तथा अपने चहेतो को प्रधानमंत्री बना दिया। परंतु सत्ता की चाभी अपने पास रखने लगे। पाकिस्तान की तरफ से भारत को कई बार वार्ता के लिए निमंत्रण दिया जाने लगा परंतु भारत ने पहले आतंकवाद खत्म करने की बात कही। जुलाई 2001 में भारत ने पाकिस्तान को एक और मौका दिया। अटल बिहारी बाजपेयी ने मुशर्रफ को आगरा आने को निमंत्रण दिया तथा एक नये दौर की शुरूआत करने की कोशिश की। परवेज मुशर्रफ और बाजपेयी के बीच आगरा शिखर वार्ता हुई तथा इस वार्ता में भी पाकिस्तान ने अपनी आदत के अनुसार भ्रम पैदा करने की कोशिश की।
पाकिस्तान की यह रणनीति थी कि आगरा सम्मेलन को एक जरिया बनाकर कश्मीर मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय कर दिया जाए। बाजपेयी को इसकी भनक लग गयी। बाजपेयी ने अपनी तत्कालीन सूचना मंत्री सुषमा स्वराज जी को मीडिया में यह बताने को कहा कि 'भारत-पाक' के बीच वार्ता का केन्द्र आतंकवाद है तथा और भी मद्दे साथ में बातचीत से हल किये जा रहे हैं। इसी बिन्दू पर पाकिस्तान को ऐतराज हो गया। भारत ने पाकिस्तान की चाल नाकाम कर दी थी। मुशर्रफ ने बैठक में इसी का मुद्दा उठाया। ऐसी स्थिति आयी कि मुशर्रफ एक संयुक्त बयान पर भी सहमत नहीं हुए तथा आगरा सम्मेलन असफल हो गया।
आगरा के बाद भारत-पाकिस्तान के संबंध और भी खराब हो गये पर वह स्थिति नहीं आयी जो 2001 में दिसम्बर में भारतीय संसद के हमले के बाद आयी थी जिसमें भारत अपनी सेना को सीमा पर मजबूत कर रहा था। भारत-पाक के रिश्ते सबसे अधिक तल्ख दिसम्बर 2001 में संसद पर हमले के बाद हुए। 13 दिसम्बर 2001 को पाक परस्त आंतकियों ने संसद पर हमला करने की कोशिश की तथा इसमें 5 आतंकी सहित 14 लोग मारे गए जिसमें 9 सुरक्षाकर्मी शहीद थे। जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। 25 दिनों तक सीमा पर तनाव रहने के बाद मुशर्रफ को मजबूर होकर कुछ संगठनों पर रोक लगाने पड़े थे तथा उसके बाद संबंध अधिक खराब होने से रूक गए। अटल बिहारी बाजपेयी ने पाकिस्तान को बार-बार यह संदेश देने की कोशिश की कि वह सभी मुद्दों पर बात करने को राजी है बर्शते पाकिस्तान कश्मीर में चल रहे आतंकवाद के विरुद्ध भारत की सहायता करे। मुशर्रफ और बाजपेयी के बीच आगरा के बाद काठमांडू में एक बार फिर मुलाकात हुई लेकिन इसमें कोई बातचीत नहीं हुई। भारत-पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक संबंध जारी रहा।
2003 के उत्तर्राद्ध में भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध एक बार और सामान्य होना आरंभ हुए जब भारत सरकार ने इस्लामाबाद में होने वाले जनवरी 2004 को आयोजित सार्क सम्मेलन में शामिल होने के लिए हामी भरी। जनवरी 2004 में अटल बिहारी जी ने इस्लामाबाद की यात्रा की। हालांकि यह यात्रा द्विपक्षीय यात्रा के तौर पर नहीं थी पर मुशर्रफ के साथ बैठक होना तय हुआ जो महत्वपूर्ण था। अटल बिहारी बाजपेयी तथा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने सार्क सम्मेलन में द्वि पक्षीय विवादों की चर्चा नहीं की तथा इससे एक विश्वास का माहौल बना चाहे वह कुछ दिनों के लिए क्यों न हो? अटल बिहारी बाजपेयी और मुशर्रफ के बीच इस्लामाबाद में बैठक हुई तथा इस बैठक में मुशर्रफ ने काफी लचीला रुख अपनाया तथा एक संयुक्त बयान जारी हुआ इसमें पाकिस्तान के तरफ से घोषणा की गई थी कि "पाकिस्तान अपनी धरती का उपयोग भारत के खिलाफ नहीं होने देगा" यह भारत की जीत थी। यह भारत की तरफ से उन प्रयासों का नतीजा था जो लगातार किये जा रहे थे।
अटल बिहारी बाजपेयी की दूरदर्शिता तथा अनुभव पाकिस्तान के साथ संबंधों में काफी काम आये तथा 1999 से चली यात्रा इस्लामाबाद घोषणा पर जाकर रुकी। अब एक नये दौर की शुरूआत होने वाली थी जब अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता से हट गए तथा मनमोहन सिंह ने बाजपेयी की पाकिस्तान नीति को आगे बढ़ाने की बात कही।
7. अमेरिका के साथ संबंध (Relations with USA)
मई 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया तथा भारत को एक परमाण्विक रूप से गैर जिम्मेदार देश कहा। सही रूप में भारत अमेरिका संबंध उस काल में आपसी विश्वास की कमी से पीड़ित थे। वैसे तो भारत आरंभ से ही अमेरिका से दूरी बनाकर चल रहा था लेकिन गुटनिरपेक्षता की नीति में अमेरिका को पाकिस्तान के नजदीक जाने का अवसर दे दिया। ऐसे कई अवसर आए जब अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया।
1998 के बाद कुद दिनों के लिए भारत-अमेरिका संबंधों में संक्रमण काल आया। यह काल एक नयी शुरूआत का ही आरंभ था। संबंधों में मोड़ उस समय आया जब दिसंबर 1999 में कांधार कांड हुआ तथा भारत को आतंकवादियों के बदले अपने नागरिकों की जान का सौदा करना पड़ा था। वैश्विक स्तर पर यह परिलक्षित हो गया था कि पाकिस्तान कहीं-न-कहीं आतंकवादियों को आश्रय दे रहा है।
मार्च 2000 में तत्कालीन राष्ट्रपति क्लिंटन ने भारत की यात्रा की तथा एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण दोनों देशों के बीच पैदा हुए। दोनों देशों ने 'भारत-अमेरिका संयुक्त दृष्टिपत्र' (Indo-USA Combined vision for 21st century ) पर हस्ताक्षर किए तथा कहा कि “21वीं शताब्दी की एक परिकल्पना पर हस्ताक्षर किए एवम् विगत शंकाओं को दूर करने तथा विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच अपेक्षाकृत अधिक घनिष्ठ और गुणात्मक रूप से नये संबंध बनाने के लिए द्विपक्षीय संबंधों में नई दिशा देने की आवश्यकता है। " अब भारत - अमेरिका संबंध एक नये वैश्विक सामयिक सहयोग की ओर चल पड़े।
2000 ई. से 2004 जनवरी के बीच अमेरिका विदेश उपमंत्री स्ट्रॉब टॉलबोट तथा भारतीय विदेश मंत्री श्री जसवंत सिंह के बीच कई दौर की द्विपक्षीय बातचीत हुई तथा भारत-अमेरिका संबंधों की एक नयी इबारत लिखी गयी। भारत-अमेरिका संबंध अब अधिक परिपक्व तथा सुलझे हुए थे। अटल बिहारी बाजपेयी की उसके बाद अमेरिका की यात्रा तथा अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करने की उनकी यात्रा ने अमेरिका में भारत की प्रतिष्ठा को कई आगे किया। यह कहना सही होगा कि यह संबंध रूस की कीमत पर नहीं विकसित हो रहा था।
8. रूस के साथ संबंध
बाजपेयी युग में रूस के साथ संबंधों में और भी गहराई आई। परमाणु परीक्षण के बाद रूस उन देशों में था जिसने भारत के इस कदम का विरोध नहीं किया था। रूस भारत की स्थिति को अच्छी तरह जानता था । बाजपेयी के काल में रूस के साथ ‘वार्षिक शिखर सम्मेलन' करने की प्रतिज्ञा ली गई तथा बारी बारी से भारत-रूस के नेता एक दूसरे के यहां जाकर द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने पर सहमत हुए।
रूस के साथ व्यापारिक सामयिक तथा सांस्कृतिक संबंध और भी मजबूत हुए तथा ब्रह्मोस जैसे मिसाइलों तथा लड़ाकू पनडुब्बी के विकास पर समझौते किए गए। भारत ने रूस को अपना सबसे नजदीकी मित्र बनाए रखा। अटल जी की यह प्रखर कूटनीति थी कि उन्होंने यह कोशिश की कि अमेरिका तथा रूस के साथ संबंध प्रगाढ़ रहे तथा इसमें अमेरिका या रूस किसी को संदेह का भाव पैदा न हो।
रूस भारत संबंधों की यह ताकत ही थी कि स्लादिमीर पुतीन ने बाजपेयी की अमेरिका नीति को एक परिपक्व तथा निष्पक्ष कोशिश बताया।
9. इजरायल के साथ संबंध
वैसे तो भारत के साथ इजरायल के संबंध 1992 तक नहीं थे पर इसके पीछे भारत के कोई अपने कारण नहीं थे। भारत फिलीस्तीन की स्वतंत्रता का पक्षकार रहा तथा गुटनिरपेक्षता के कारण संबंध विकसित होने में कठिनाई थी। 1990 के दशक में कश्मीर में आतंकवाद तथा रूस की स्थिति विखण्डन के बाद खराब होने से नये राजनीतिक वातावरण में इजरायल भारत के लिए एक अहम देश बन गया। 1992 में भारत ने इजरायल के साथ राजनीतिक संबंध बनाए तथा एक शुरूआत की। बाजपेयी के सत्ता में आने के बाद भारत-इजरायल संबंध ने एक नये दौर में प्रवेश किया।
बाजपेयी ने इजरायल के साथ रूस के बाद सबसे बड़ा सामयिक संबंध स्थापित किया। इस समय तत्कालीन इजरायली राष्ट्रपति ने (एरियल रोटोन) भारत की यात्रा की तथा यह यात्रा किसी इजरायली राष्ट्रपति की पहली भारत यात्रा थी। इस यात्रा में कृषि सहित 9 मुद्दों पर सहमति बनी तथा अंतरिक्ष क्षेत्र के भी संबंध विकसित करने की बात कही गयी। इसके पहले 2000 ई. में तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह इजरायल की यात्रा कर चुके थे।
इजरायली तत्कालीन राष्ट्रपति भारत को विश्व का एक मजबूत तथा महत्वपूर्ण देश बताया तथा सबसे अधिक भाव देने की बात की। अटल जी ने इजरायल के साथ संबंधों को महत्व दिया तथा कहा कि हमारे पुराने संबंध हैं तथा हम नया करने की अब कोशिश कर रहे हैं। अब इजरायल एक अहम देश के रूप में भारत के साथ अब संबंध कायम कर चुका है तथा हाल ही में दोनों देशों के प्रधानमंत्री एक दूसरे के यहीं आ चुके हैं। 21वीं सदी की जरूरतों के अनुसार भारत-इजरायल संबंधों को आधार देने में अटल बिहारी बाजपेयी का योगदान सबसे बढ़कर रहा।
10. चीन के साथ संबंध
1998 में परमाणु परीक्षण के बाद तथा जॉर्ज फर्नांडीस के बयान जिसमें तत्कानीन रक्षा मंत्री ने यह कहा था कि चीन भारत के लिए पाकिस्तान से अधिक खतरे का विषय है, के बाद चीन थोड़ा निराश था तथा भारत के साथ संबंध ों में खुला नहीं था। वैसे 1962 के बाद से ही चीन, पाकिस्तान को अपनी नीतियों में प्रोत्साहित करता रहा तथा वैश्विक स्तर पर भी भारत के पक्ष के खिलाफ ही रहा।
अटल बिहारी बाजपेयी के शासन काल में चीन-भारत का द्विपक्षीय संबंध पुरानी बातों को लेकर आगे बढ़ा। बाजपेयी चीन के साथ व्यापार सीमा विवाद तथा वैश्विक विषयों सहित सभी सामयिक मुद्दों के साथ बात कर संबंध विकसित करना चाहते थे।
बाजपेयी ने विदेश मंत्री जसवंत सिंह को चीन भेजकर एक नये संबंध के दौर की शुरूआत की कोशिश की जिसमें यह निर्णय लिया गया कि विदेश सचिव स्तर की वार्ता नियमित रूप से चलती रहेगी तथा इस वार्ता में प्रमुख रूप से सीमा विवाद के मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा।
वर्ष 2003 में अटल बिहारी बाजपेयी की ऐतिहासिक चीन यात्रा हुई तथा इसमें अनेक द्विपक्षीय फैसले लिए गए। अटल बिहारी बाजपेयी की इस यात्रा में 23 जून 2003 को दोनों देशों के बीच संयुक्त घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए गए तथा यह उल्लेख किया गया कि “आपसी समझ और विश्वास को बढ़ाया जाएगा तथा रक्षा आदान प्रदान के साथ सामयिक संबंध भी स्थापित किए जाएंगे।' 
इसके अलावा तिब्बत पर भारत का दृष्टिकोण साफ किया गया तथा चीन को यह भरोसा बाजपेयी ने दिया कि अन्त. र्राष्ट्रीय स्तर पर भारत तिब्बत को विवादित विषय नहीं बनाएगा वहीं चीन ने सिक्किम को भारत का अंग माना बाजपेयी की इस यात्रा के बाद व्यापक तथा आदान प्रदान के मामले में संबंध और भी विकसित हुए।
11. अटल बिहारी बाजपेयी की कश्मीर नीति
बाजपेयी सरकार की कश्मीर नीति को किसी भी सरकार के लिए एक प्रेरणा माना जा सकता है। बाजपेयी कश्मीर की परिस्थितियों को प्रेम से तथा दिल में जगह बनाकर सुलझाना चाहते थे। उन्होंने कश्मीर के मामले में एक सूत्र दिया जिसमें तीन महत्वपूर्ण शब्द थे:- 'जम्हूरियत', 'कश्मीरियत', 'इंसानियत ।'
अटल बिहारी बाजपेयी अपने व्यवहार के अनुसार कश्मीर के विभिन्न राजनीतिक दलों और अलगाववादी समूहों सभी के साथ बातचीत के द्वारा सभी मसलों पर सुलझाव की कोशिश भी करते रहे। बाजपेयी ने यह कहा कि आम सहमति तथा व्यवहारिक रूप से कश्मीर के भले के लिए सभी को काम करना चाहिए।
बाजपेयी ने रमजान के महीने में सीज फायर की घोषणा करके एक नयी स्थिति को न्यौता दिया। हिजबुल मुजाहिदीन ने इसका रिसपौंड (जवाब) दिया तथा उसने भी सीजफायर की घोषणा की। बाजपेयी ने कई दौर में कॉन्फ्रेंस के साथ भी बातचीत का दरवाजा खोला तथा कई नेताओं को रिहा भी किया। नेशनल कॉन्फ्रेंस एक सहयोगी के रूप में बाजपेयी सरकार के कदमों का स्वागत करती रही।
सबसे सफल कदम बाजपेयी जी ने कश्मीर में चुनाव कराकर उठाया। 2002 में आतंकवाद के साये में बाजपेयी सरकार ने चुनाव करवाया तथा यह एक बहादुरी का कदम था। कश्मीरी लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। चुनाव के बाद नेशनल कांफ्रेस की हार हुई तथा कांग्रेस- पी डी पी गठबंधन सत्ता में आया तथा मुफ्ती मुहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने। सईद को भी बाजपेयी ने कश्मीर के विकास में आखिर तक योगदान दिया
12. 'भारत उदय' अभियान तथा एन.डी.ए. की हार
दिसंबर 2003 में तीन राज्यों के विधान सभा चुनावों में भाजपा की जीत हुई। राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में भाजपा की जीत का मतलब था कि "केन्द्र सरकार के कार्यों की स्वीकारोक्ति तथा लोक प्रियता" ऐसा माना गया भाजपा के आंतरिक राजनैतिक थिंक टैंक ने यही गलती कर दी तथा अपने आपको गलत रूप में आंका। ऐसा नहीं था कि सरकार के खिलाफ बहुत ही आक्रोश था। एक अच्छा नेतृत्व तथा कैटर वाली पार्टी ने यह सोचा कि जल्दी चुनाव करा लिये जाएंगे तो इसका लाभ मिलेगा। भाजपा ने चुनाव को ध्यान में रखकर ही 'भारत उदय' अभियान चलाया।
विपक्षी खेमा जहां 1999 में बिखरा था वहीं 2004 में यह साथ हो गए थे। कांग्रेस को यह समझ आ गया था कि बिना गठबंधन के अब वह एक पार्टी के रूप में पूर्ण बहुमत नहीं ला सकती। जहां कांग्रेस लचीला रूप अपनाकर आगे बढ़ रही थी तथा दक्षिण में डी. एम. के. तथा बिहार में लालू जी, पासवान जी की पार्टियों से चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया। वहीं एन.डी.ए. के अच्छे सहयोगियों ने रिश्ता खत्म कर लिया।
अक्टूबर 2004 में चुनाव होने थे, अब सरकार ने फैसला किया कि राजस्थान मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ की जीत को मनाया जाए तथा जल्दी चुनाव करवा लिये जाए हालांकि कहा जाता है कि अटल जी व्यक्तिगत रूप से इसके लिए राजी नहीं थे। प्रमोद महाजन तथा वैंकेया नायडू जो उस समय पार्टी के काम देखते थे, उन्होंने चुनाव करवाने की सलाह दी। अप्रैल-मई 2004 में चुनाव हुए तथा भाजपा और छक् । को कांग्रेस से 7 सीटे कम मिली। कांग्रेस को वामपंथी दलों की मदद से सरकार बनाने का अवसर मिल गया। अटल बिहारी बाजपेयी की हार आश्चर्यजनक थी। भारत उदय अभियान को इसका कारण माना गया। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व परीक्षण कर इस हार के लिए जल्दी चुनाव को भी एक अहम कारक माना।
अटल बिहारी के 6 साल के कार्यकाल में भारत को हरेक क्षेत्र में एक मजबूत आधार मिला। 2004 में जब बाजपेयी सत्ता से हटे तो उस समय भारत की विकास दर 8.10 प्रतिशत थी। मुद्रा स्फीती 3 प्रतिशत थी तथा विदेशी मुद्रा भंडार 100 अरब डॉलर के ऊपर पहुंच चुका था। विदेशी निवेश अच्छा हो रहा था तथा बुनियादी संरचना में सड़को का जाल बिछ रहा था। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसे कार्यो की सफलता उल्लेखनीय थी।
सबसे बढ़कर अटल बिहारी बाजपेयी एक ऐसे नेता बने जिसने भारत में पहली बार गठबंधन की सरकार को पूरे 6 साल चलाया। विभिन्न समीक्षक अटल बिहारी बाजपेयी को भारत के सफलतम प्रधानमंत्री के रूप में याद करते हैं। उनकी पहचान अपनी पार्टी से ऊपर, पार्टी से अलग तथा सब दलों में एक महान नेता की रही। 16 अगस्त 2018 को अटल जी का देहान्त हो गया। आज उनकी पार्टी सत्ता में है तथा उनके देखे सपने जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा देश के हरेक कोने में होगी का सपना पूरा कर रही है।
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Sun, 01 Oct 2023 07:35:30 +0530 Jaankari Rakho
भारतीय राजनीति का संक्रमण काल (द्वितीय चरण ) https://m.jaankarirakho.com/397 https://m.jaankarirakho.com/397 भारतीय राजनीति का संक्रमण काल (द्वितीय चरण )
1. भारतीय राजनीति का संक्रमण काल (द्वितीय चरण) (1916 ) (मार्च ) - 1998 (मार्च )
1996 के आम चुनाव परिणाम के बाद एक बार फिर भारत की राजनीति का संक्रमण काल आरंभ हो गया। यह संक्रमण 1998 के मार्च तक प्रखर स्तर पर रहा। वास्तव में यह संक्रमण वास्तविक रूप में 1999 के अक्टूबर तक रहा जब तक कि अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में NDA गठबंधन को बहुमत न मिल गया परन्तु 1998 के मार्च में अटल जी की सरकार बनी इसीलिए यहां 1996 से 1998 के संक्रमण की चर्चा इस शीर्षक में करेंगे।
1996 के आम चुनाव में कांग्रेस पहली बार दूसरे नम्बर का दल हुआ। भारतीय जनता पार्टी को 161 सीटें मिली और सबसे बड़ी पार्टी के रूप में में इसका पदार्पण हुआ। कांग्रेस को सिर्फ 140 सीटें मिली। अब यह महत्वपूर्ण था कि सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया जाए या नहीं। इसके पीछे कारण यह था कि 1996 में भी भाजपा के साथ दो ही दल मुख्य रूप से गठबंधन में थे परन्तु समता पार्टी के आ जाने से एक आत्म विश्वास पैदा हुआ था परन्तु उसके पास दो ही सांसद थे। भाजपा, शिव सेना, आवासीय दल, समता पार्टी मिलकर सामूहिक रूप से भी 272 की जादूई संख्या पर नहीं पहुंचते थे ।
भाजपा को उस समय भी साम्प्रदायिकता के नाम पर एक अछूत पार्टी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों के द्वारा समझा जाता था। सही रूप में ये दल अधिकतर कांग्रेस के निकाले नेता के द्वारा बने थे या वे थे जो क्षेत्रीय स्तर पर अपना प्रभाव रखते थे। तेलुगु देशम पार्टी, वामपंथी दल, मुपनार कांग्रेस इत्यादि जैसे दलों के द्वारा अच्छी सीटें जीती गई थी। परंतु तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा जी ने सबसे बड़े दल के नेता अटल बिहारी बाजपेयी को शपथ लेने का आमंत्रण दिया। 16 मई 1996 को अटल बिहारी बाजपेयी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी गई आज के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि एक गैर कांग्रेसी नेता प्रधानमंत्री बना।
1977 में मोरारजी देसाई भी कांग्रेस का विरोध कर ही प्रधानमंत्री बने थे परंतु वह भी एक कांग्रेसी ही थे। अटल जी का राजनीतिक गोत्र कभी कांग्रेसी का नहीं था।
अटल बिहारी बाजपेयी का राजनीतिक सफर बेदाग तथा निष्कलंक था। उनका व्यवहार तथा राजनीतिक अनुशासन अतुलनीय था। 1977-79 के बीच अटल जी भारत के विदेश मंत्री रह चुके थे। उन्होंने विदेश मंत्री के रूप में अच्छे कार्य किए थे। 40 वर्षों से अधिक समय तक संसद में सदस्य के तौर पर रहने का उनको अनुभव था। 1995 में मुम्बई में हुए भाजपा के राष्ट्रीय कार्य परिषद् की बैठक में तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। कहा जाता है कि इस घोषणा के पहले अटल जी को सूचना नहीं दी गयी थी। फिर भी अटल जी के नेतृत्व में 1996 के चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक सीटें मिलना एक ऐतिहासिक घटना थी।
16 मई को राष्ट्रपति महोदय ने अटल जी को शपथ दिलाकर संसद में 13 जून के अन्दर विश्वास मत प्राप्त करने को कहा। अटल जी एक प्रधानमंत्री के रूप में सिर्फ 13 दिन ही रह पाए। 31 मई को विश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए उन्होंने अपने आप को एक ऐसा नेता बताया जिसे सत्ता तथा विपक्ष दोनो एक समान रूप में दिखता है। उन्होंने कहा "मेरे लिए सत्ता का सहवास तथा विपक्ष का वनवास एक समान है। सरकारें आती रहेंगी, जाती रहेंगी पर ये देश रहना चाहिए, देश का जनतंत्र रहना चाहिए" दो दिनों की बहस के बाद अटल जी को लगा कि संख्या बल उनके पक्ष में नहीं है तो मतदान के पहले ही उन्होंने सदन में इस्तीफे की घोषणा कर दी।
अटल जी का त्यागपत्र भारतीय राजनीति में एक ऐसे काल को न्योता दे रहा था जिसमें पहली 94 क्षेत्रीय दलों की मिली-जूली सरकार बनती दिखाई दी तथा फिर वहीं कांग्रेस का बाहरी- समर्थन मिलना आवश्यक होता। यह दो बार पहले देखा जा चुका था जब 1779-80 में चौधरी चरण सिंह अल्पकाल के लिए कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने थे।
वहीं दूसरी बार 1990 के अंत में चन्द्रशेखर जी के नेतृत्व में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनी। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ये दोनों प्रधानमंत्री सबसे कम दिनों तक प्रधानमंत्री रहे थे तथा चौधरी चरण सिंह तो प्रधानमंत्री के रूप में संसद में बैठ भी नहीं पाए थे।
अटल जी के त्याग पत्र देने के बाद क्षेत्रीय दलों की बैठकें कई बार हुई। आखिर 13 क्षेत्रीय दलों ने मिलकर ‘संयुक्त मोर्चा' का निर्माण किया। इस संयुक्त मोर्चे में लगभग अधिकतर राज्यों के क्षेत्रीय दल तथा वामपंथी दल भी शामिल थे। डी.एम.के. जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल, असम गण परिषद, मुपनार कांग्रेस, तेलगु देशम पार्टी, समाजवादी पार्टी, जैसे दल इसमें शामिल थे। साथ ही भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी भी इसमें शामिल थी। संयुक्त मोर्चे का नेता कौन हो? इस मुद्दे पर कई दिनों तक रहस्य रहा। वी.पी. सिंह जी को भी प्रस्ताव दिया गया पर वह नहीं माने। पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु को भी कहा गया पर उन्होंने अपनी पार्टी की बाहर से समर्थन की बात कही। आखिरकार कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री को दिल्ली बुलाकर प्रधानमंत्री पद देने की बात कही गई।
एच.डी. देवगौड़ को प्रधानमंत्री के रूप में चुनना एक आश्चर्य ही था क्योंकि इस रेस में वह होंगे, कोई सोच भी नहीं सकता था। प्रधानमंत्री के रूप में एच.डी. गौड़ को शपथ दिलायी गयी। इस सरकार में 13 दलों को शामिल किया गया। कांग्रेस को बाहर से समर्थन देने के लिए कहा गया वह सहर्ष तैयार हो गयी। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के मंत्री इन्द्रजीत गुप्त को गृहमंत्री बनाया गया। मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी सरकार में शामिल नहीं हुई। जून 1996 से लेकर मार्च 1997 तक देवगौड़ की सरकार चली।
इधर कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन हो चुका था कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर उसके सबसे अधिक दिनों तक रहे कोषाध्यक्ष तथा बिहार से वरिष्ठ नेता 'सीता राम देसाई' आसीन हुए। केसरी की कार्यशैली अलग थी। उनकी कांग्रेस पार्टी एक ऐसी पार्टी बन गयी थी जो सही तौर पर इस गठबंधन तथा संक्रमण काल को अभी स्वीकार नहीं कर पायी थी।
धीरे-धीरे कांग्रेस अध्यक्ष केसरी के रिश्ते देवगौड़ सरकार से खराब होने लगे | केसरी अपनी पार्टी की तरफ से विभिन्न एजेण्डों को थोपने की कोशिश करने लगे। देवगौड़ को एक प्रधानमंत्री होने के बावजूद बार-बार सीता राम केसरी जी के घर के चक्कर लगाने पड़ते थे। देवगौड़ एक किसान नेता थे तथा उन्होंने कर्नाटक में एक अच्छी सरकार चलायी थी। केसरी की तरफ से उनको की गई बार - बार विभिन्न मांग अब देवगौड़ को चुभने लगी थी। देवगौड़ ने धीरे-धीरे कांग्रेस की मांगों को नजर-अंदाज करना आरंभ कर दिया। आखिरकार कांग्रेस ने देवगौड़ सरकार से अप्रैल की शुरूआत में यानी 1997 के अप्रैल में समर्थन वापस ले लिया। देवगौड़ ने विश्वास प्रस्ताव रखा जिसमें वह हार गए।
देश के सामने फिर एक बार अस्थिरता आयी। एक साल के अंदर ही प्रधानमंत्री को देश ने देख लिया था। समा. चारपत्रों तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस राजनीतिक अस्थिरता के लिए फिर कांग्रेस को उत्तरदायी माना गया। कांग्रेस के बारे में कई समाचार पत्रों में लेख लिखे गए तथा केसरी के प्रति विरोध प्रकट किए गए । कांग्रेस के अंदर भी समर्थन वापस लेने पर मतैक्यता नहीं थी। कांग्रेस की प्रणाली अब पहले की तरह नहीं थी। विपक्षी पार्टी की मजबूती तथा कांग्रेस की सत्ता से बाहर होने ने पार्टी के आंतरिक कलह को बढ़ा दिया था। सीता राम केसरी की व्यक्तिगत सोच के कारण ही देवगौड़ा सरकार को इस्तीफा देना पड़ा था।
अब एक बार फिर स्थिति संशयपूर्ण हुयी। आखिरकार कांग्रेस ने एक सप्ताह के अंदर यह प्रस्ताव दिया कि अगर संयुक्त मोर्चा सरकार के नेतृत्व के लिए कोई दूसरा नेता चुने तो कांग्रेस अपना समर्थन फिर से दे सकती है। संयुक्त मोर्चा के नेताओं ने आखिर देवगौड़ा सरकार में रहे विदेश मंत्री 'इन्द्र कुमार गुजराल' को प्रधानमंत्री चुना। कहा जाता है कि यह चुनाव कांग्रेस की सलाह से ही हुआ क्योंकि गुजराल अपने प्रशासनिक कार्यकाल से ही कांग्रेस के नजदीक थे। अब गुजराल देश के प्रधानमंत्री पद पर शोभा बढ़ाने वाले थे। गुजराल को 21 अप्रैल 1997 को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलायी गई।
गुजराल की पारी एक प्रधानमंत्री के तौर पर सिर्फ डेढ़ साल की रही। गुजराल एक अनुभवी नेता थे तथा समझौ. तावादी रुख रखते थे। एक गठबंधन के मार्चे को नेतृत्व करना आसान नहीं था। लेकिन देवगौड़ा से एक मामले में इनका यही अंतर था कि यह उनकी तरह सीधे मना नहीं कर देते थे। उदाहरण स्वरूप कांग्रेस के प्रति उनका रवैया सुनने तथा अधिकतर मांगो को मानने वाला रहा। नहीं मानने योग्य मांगों का वह सीधे विरोध नहीं कर विनम्र रवैया अपनाते थे।
देवगौड़ा सरकार अपनी प्रशासनिक नीतियों तथा वैदेशिक संबंधों में कुछ महत्वपूर्ण फैसलों के लिए याद की जाती रहेगी। गंगा नदी समझौता तथा चीन के साथ संबंधों की विषयगत सूचियों में महत्वपूर्ण स्थान है। वहीं इन्द्र कुमार गुजराल का कार्यकाल सबसे अधिक उनके डॉक्ट्रिन के लिए जाना जाता है।
इन्द्र कुमार गुजराल सही रूप से विदेश नीति विशेषज्ञ के तौर पर जाने जाते थे। इन्होंने अपनी 'गुजराल डॉक्ट्रिन' में भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को महत्वपूर्ण बताया। इस नीति में तीन महत्वपूर्ण बिन्दुओं को समाहित किया गया था जिसमें 'संप्रुभता', 'समानता' तथा 'अहस्तक्षेप' की नीति को महत्वपूर्ण बताया गया। गुजराल डॉक्ट्रिल का सिद्धांत दक्षिण एशिया में शांति उद्देश्य से निर्मित किया गया था।
> गुजराल सिद्धांत के 5 तथ्य निम्नलिखित थे: - 
1. भारत, नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका, भूटान जैसे पड़ोसी देशों से पारस्परिक आदान-प्रदान को नहीं कहेगा लेकिन आपसी-विश्वास एवम् - मंत्री बढ़ाने के सभी प्रयास करे। 
2. कोई भी दक्षिण एशियाई देश क्षेत्र के अन्य देश के हितों के विरुद्ध अपने भू-भाग के प्रयोग की अनुमति नहीं देगा। 
3. कोई भी दूसरे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
4. सभी दक्षिण एशियाई एक दूसरे की भू-भागीय अखण्ता और संप्रभुता का सम्मान करेंगे।
5. सभी दक्षिण एशियाई देश शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से अपने विवादों का समाधान करेंगे।
गुजराल डॉक्ट्रिन के ये पांच बिन्दु सैद्धांतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण थे। इस सिद्धांत की प्रशंसा भी हुई परंतु इसकी आलोचना भी कम नहीं हुई। इसके आलोचक इस डॉक्ट्रिन की अप्रासंगिकता को इस बात से महत्व देते थे कि शत्रु पड़ोसी पर सिद्धांत कैसे काम करेगा। समाचार पत्रों में गुजराल की 'डॉक्ट्रिन' के विपक्ष में अधिक लेख लिखे गए।
गुजराल सरकार के कांग्रेस से रिश्ते अच्छे थे। गुजराल ने सीता राम केसरी से भी व्यक्तिगत रूप से अच्छे संबंध बना लिए थे। परंतु कलह की बानगी उनकी अपनी पार्टी से ही आरम्भ हुई। बिहार का चारा काण्ड का मामला उस समय विवादों की जड़ में था । वह जिस जनता दल से संबंधित थे उस समय उस पार्टी का सबसे मजबूत गढ़ बिहार था। जनता दल के इस मजबूत गढ़ में सबसे अधिक जनाधार वाले नेता लालू प्रसाद यादव थे। चारा घोटाले की आग लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री पद को अपने लपेटे में लेने लगी। गुजराल के सामने दो मजबूरी थी। पहली तो राज्यपाल से कहें कि लालू प्रसाद पर मुकदमे चलाने के लिए आदेश दें तथा दूसरी कि लालू प्रसाद से त्यागपत्र लिया जाए। आखिरकार तत्कालीन राज्यपाल बिहारी डॉ. ए. आर. किदवई ने लालू प्रसाद यादव के खिलाफ मुकदमे चलाने के आदेश दे दिए। लालू प्रसाद ने इसके बाद भी इस्तीफे से मना कर दिया। गुजराल के सामने कोई भी विकल्प नहीं बचा था। प्रधानमंत्री की तरफ से इस्तीफे की मांग करना एक मुद्दा बन सकता था तत्कालीन संयुक्त मोर्चा के संयोजक 'चन्द्र बाबू नायडू' ने सबसे पहले लालू जी से इस्तीफे की मांग की तथा यह कहा कि लालू जी को नैतिक आधार पर त्यागपत्र दे देना चाहिए। इसके बाद जनता राय तथा वाम दल के भी नेता भी लालू से इस्तीफे मांगने लगे या त्याग पत्र देने की सलाह देने लगे।
लालू जी ने त्यागपत्र दे दिया बदले में उन्होंने अपनी पत्नी श्री मति राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। लालू ने जनता दल छोड़ दिया तथा राष्ट्रीय जनता दल नाम की पार्टी बना ली। राष्ट्रीय जनता दल के रूप में भी लालू के दल गुजराल को समर्थन जारी रखा।
गुजराल सरकार ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में हुई हिंसा के चलते राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की। उस समय कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। राष्ट्रपति डॉ. के. आर. नारायण ने इस पर पुनः विचार के लिए मंत्रिमंडल को कहा तथा उच्च न्यायालय ने भी इस पर कड़ी टिप्पणी की। गुजराल सरकार के लिए यह एक नकारात्मक टिप्पणी थी। अटल बिहारी बाजपेयी ने दिल्ली में उत्तर प्रदेश मामले पर अनशन किया। यह बात काफी बड़े स्तर पर चर्चित रही तथा गुजराल सरकार या यह बात काफी बड़े स्तर पर चालत रा के लिए छिछालेदारी जैसी स्थिति हो गयी।
गुजराल सरकार के पतन का आरंभ जैन आयोग की रिपोर्ट था। राजीव गांधी हत्या काण्ड के षड्यंत्र को उजागर करने के लिए जैन आयोग की स्थापना की गई थी। जैन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार डी. एम. के की भूमिका पर कुछ सवाल उठाना लाजिमी थे। जब यह रिपोर्ट संसद में रखी गयी तो यह सार्वजनिक हो गया कि डी. एम. के. की तरफ से तमिल उग्रवादियों को मौन समर्थन मिला हुआ था। इस रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस के संसद के भीतर तथा संसद के बाहर सरकार पर दबाव डाला गया कि डी. एम. के. के मंत्रियों को सरकार से हटाना चाहिए। प्रधानमंत्री गुजराल ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। गुजराल डी. एम. के. जैसे धड़े को अपने मोर्चा समूह से हटाकर एक जाखिम मोल नहीं लेना चाहते थे। 28 नवम्बर 1997 को कांग्रेस ने अंतत: गुजराल सरकार से समर्थन वापस ले लिया। गुजराल ने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।
सरकार की अस्थिरता से भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति खराब हो गयी थी। उधर-पूर्वोत्तर की अशांति भी कम नहीं थी। गुजराल के त्यागपत्र देने के बाद अभी विकल्पों पर चर्चा हुई पर किसी ने भी प्रयोग कार्य नहीं किया। आखिरकार राष्ट्रपति डॉ. के.आ. नारायण ने लोक सभा भंग करवा चुनाव की घोषणा कर दी।
1996 से लेकर 1998 तक यानी तीन वर्षों में तीन प्रधानमंत्री तथा तीन चुनावों को लेकर भारतीय राजनीतिक में संक्रमण की स्थिति बनी पर ये तीन साल कहीं उस युग की ओर इशारा कर रहे थे जो सामूहिक गठबंधन तथा विभिन्न दलों के आपसी तालमेल के साथ सरकार बनाने का युग था। यह कहना उचित होगा कि अब भारत का राजनैतिक कैनवास अपनी पृष्ठभूमि को विभिन्न रंगों से भरने वाला था तथा इस बात को कांग्रेस तब भी समझ नहीं पायी तथा भाजपा ने इसका मौका पाकर फायदा उठाया। इसी कार्य में भाजपा को अधिक सफलता मिली तथा वह अपने स्तर पर विभिन्न राज्यों में अलग-अलग दलों से गठबंधन कर चुनाव की तैयारी आरंभ करने लगी।
अब 1998 का चुनाव आने वाला था। जहां कांग्रेस अपनी परिस्थिति से निकल नहीं पा रही थी वहीं भाजपा अपने साथी दलों के साथ सरकार बनाने के लिए चुनावी सफलता की ओर बढ़ रही थी। मार्च 1998 के आम चुनाव में भाजपा को 181 सीटें मिली तथा कांग्रेस को 138 सीटें मिली। भाजपा अपने समर्थक दलों के साथ 252 सीटों तक पहुंच गयी। उस समय भाजपा के साथ चन्द्र बाबू नायडू तथा ममता बनर्जी भी थी। इधर कांग्रेस में सीता राम केसरी की अध्यक्षता खतरे में थी। अधिकतर नेता इनके खिलाफ थे। केसरी - इस्पीफा देने को तैयार नहीं थे। अचानक राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी ने कांग्रेस में आने की बात कही तथा सीताराम केसरी को मजबूरी में त्याग पत्र देना पड़ा तथा सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया गया। मार्च 19 को अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री बन गये थे तथा अब यह महसूस हुआ कि राजनीतिक स्थिरता आएगी परंतु अभी बहुत सी घटना होना बाकी थीं। इन घटनाओं ने आगे की राजनीतिक को रास्ता दिखाने में बहुत सहायता की।
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Sun, 01 Oct 2023 07:30:01 +0530 Jaankari Rakho
नरसिंहराव सरकार व 'उदारीकरण' की शुरूआत https://m.jaankarirakho.com/396 https://m.jaankarirakho.com/396 नरसिंहराव सरकार व 'उदारीकरण' की शुरूआत
1. नरसिंहराव सरकार तथा भारत का आर्थिक उदारीकरण (1991-1996)
1991 का आम चुनाव मध्यावधि का चुनाव था। भारत की राजनीति में इन दो सालों यानि 1989-91 में कई ऐसी घटनाएं घटी जो राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से विभिन्न स्थिति को उत्पन्न करने वाली थी। अब भारत की आर्थिक स्थिति को संभालना आवश्यक था तथा इसके लिए एक स्थिर सरकार की आवश्यकता थी। यह चुनाव तीन ध वों के बीच लड़ा गया। एक तरफ कांग्रेस और दूसरी तरफ जनता दल तथा तीसरी तरफ भाजपा थी।
चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तथा इसे 232 सीटें मिली भारतीय जनता पार्टी को 119 सीटें मिली तथा वामपंथी दलों को भी अच्छी खासी सीटें मिली जो जनता दल के साथ अधिकतर स्थानों पर दोस्ताना मुकाबले में थी।
राष्ट्रपति श्री० आर० वेंकट रमण ने नरसिंहराव को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया तथा नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने। 21 जुन 1991 को राव ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। सही तौर पर यह एक अल्पमत की सरकार थी। दूसरी पार्टियों ने 2 साल के अन्दर काफी कुछ सीख लिया था तथा इस सरकार को आरम्भ में अस्थिर करने का प्रयास नहीं किया। नरसिंहराव एक अनुभवी नेता थे तथा धीरे-धीरे उन्होंने अपने पक्ष में बहुमत कर लिया।
नरसिंहराव की सरकार पूरे 5 साल चली। धीरे से ही सही उन्होंने कुछ अच्छे कदम उठाए। अब पंजाब में स्थिति सामान्य हो गयी। साम्प्रदायिक तनाव तथा जातीय हिंसा में कमी आयी। कश्मीर और असम में भी गुणात्मक सुधार आया। इस सरकार ने कुछ ऐसे फैसले किए जो भारत के भविष्य के लिए अहम योगदान कर सकते थे तथा किए भी।
नरसिंहराव सरकार को जिन वजहों से सबसे अधिक याद किया जाता है वह है 'आर्थिक उदारीकरण' यह फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम मोड़ साबित हुआ तथा सदा के लिए भारतीय अर्थ नीति बदल गई।
कुछ वर्षों से भारतीय अर्थव्यवस्थाओं में गंभीर रूकावटें निर्मित हो रही थीं जो बड़े स्तर पर अर्थनीति तथा स्थिति को हानि पहुंचा रही थी। इनके साथ कई समस्याएं भी उत्पन्न हो रही थी। इन सभी स्थितियों का परिणाम यह हुआ कि अब भुगतान संतुलन पर संकट के बादल मंडराने लगे। भारत का विदेशी मुद्रा कोष जहां 1990-91 में सिर्फ 2.24 अरब डॉलर रह गया वही कर्ज अदायगी अनुपात इसी के साथ 35% हो गया। 1990 में कुवैत पर हमला किया गया तथा इससे तेल की कीमत में भारी वृद्धि हुई तथा खाडी क्षेत्र में भारतीय निर्यात में गिरावट आई। इस कारण भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति दयनीय हो गई। भारत की अंतर्राष्ट्रीय साख बहुत कम हो गई। बाहर से कर्ज लेना बहुत ही कठिन हो गया तथ अनिवासी भारतीयों द्वारा जमा की गई विदेशी मुद्रा भी वापस ली जाने लगी।
उपरोक्त परिस्थिति में भारत को विदेशों से बाहर उधार मिलना बंद हो गया। भारत सरकार को मार्च 1991 में जब चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री थे तो स्विटजरलैंड के युनियन बैंक को 20 टन सोना बेचना पड़ा ताकि तुरंत लेन देन का काम चल सके। जुलाई 1991 तक विदेशी मुद्रा भण्डार अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा दिए गए कर्जों के बावजूद मांत्र दो सप्ताह के अन्दर आयात को पूरा कर सकता था। देश दिवालिया होने के दरवाजे पर खड़ा था।
उपरोक्त परिस्थिति से निकलने के लिए नरसिंहराव सरकार ने अपने वित्त मंत्री डा० मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक सुधारों तथा बुनियादी सुधार का रास्ता अपनाया। ये आर्थिक सुधार अधिकतर लोगों के शब्दो में भारतीय आर्थिक क्रान्ति ही कहे जाते हैं।
एक जकड़ी हुई, बंद, ठहराव से भरी भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधारों की आवश्यकता बहुत दिनों से थी। वैसे मनमोहन सिंह ने कई वर्ष पहले एक अफसर के तौर पर तत्कालीन अर्थव्यवस्था में नयी-नीति तथा बदलाव लाने की पैरवी की थी। अब मनमोहन सिंह वित्तमंत्री थे। उन्होंने साहस दिखाया तथा “कम नियंत्रण तथा अधिक खुलेपन" की अर्थनीति का आधार तैयार किया।
इसके पहले 60 के दशक में इंदिरा गांधी के द्वारा अर्थव्यवस्था में इस तरह के कुछ बदलाव लाने के लिए शुरूआती प्रयास किए गए थे। सत्तर के दशक में भी कुछ सुधार किए गए जिसे 'चोरी-छिपे सुधार' कहा गया। रूपये के मुल्य को जानकर बाजार में स्वयं कम होने दिया गया। मूल्यन करना राजनीतिक दृष्टि से अव्यवहारिक था। रूपये को घटते स्टर्लिंग से जोड़ दिया गया। 1980 समय भी इंदिरा गांधी ने उदारीकरण के कुछ कदम उठाने की कोशिश की पर यह 1991 के उदारीकरण के सामने कुछ खास महत्व नहीं रखते थे।
मनमोहन सिंह ने 1991 में अपने आर्थिक सुधारों में निम्न बातों को शामिल किया । जैसे:- 
1. तुंरत वित्तीय सुधार
इसके तहत विनमय दर को बाजार से जोड़ देने पर आरम्भ में रूपए का 20% अवमूल्यन हो गया।
2. व्यापार तथा औद्यागिक नियंत्रणों का उदारीकरण
1. आयात आसान बना दिया गया।
2. औद्योगिक लाइसेंसिंग आसान तथा एम. आर. टी. पी कम की गई।
3. सार्वजिनक क्षेत्र में सुधार
धीरे-धीरे निजीकरण की पैरवी करना तथा निवेश की तरफ बढ़ना।
4. पूंजी बाजार और वित्तीय क्षेत्र में सुधार
विदेशी निवेश तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर से विभिन्न प्रतिबंधों को हटा दिया गया। महत्वपूर्ण रूप से विदेशी निवेश को आकर्षित करने की बात की गयी।
5. वैश्वीकरण का स्वागत
आर्थिक नियंत्रणों से अर्थव्यवस्था को मुक्त करना जिसमें भू-मण्डलीकरण की प्रक्रिया में भारत का भी योगदान हो । अर्थिक उदारीकरण के आने पर कई समस्याओं तथा संकटों के आने की भी शंका जाहिर की गई थी। कहा गया था कि इन कदमों से से लंबी मंदी आएगी तथा बड़े पैमाने पर गरीबी की स्थिति बनेगी क्योंकि मंदी के कारण बेरोजगारी भी बढ़ जाएगी। यह दूसरे देशों के आर्थिक उदारीकरण के प्रभाव को देखते हुए कहा गया था पर ऐसा नहीं हुआ।
1991 में भारत का कुल सकल घरेलू उत्पाद 0.8% रह गया लेकिन 1992-93 में यह 5.3% हो गया। 1993-94 में यह 6.2% रहा। यह 1996 आते-आते 7.5% तक पहुंच गया 1991 से लेकर 1997 के बीच कुल 23% रहा। 1992 से 1997 के बीच कुल घरेलु पूंजी निर्माण और कुल स्थिर पूंजी निर्माण भी 25.2% रहा तथा 22.3% रहा। 
1991 में औद्योगिक उत्पादन विकास दर बहुत ही कम 1 फीसदी से भी कम था तथा उत्पादन क्षेत्र में तो यह निगेटिव था।
वहीं 1992-93 में औद्योगिक उत्पादन की दर में जबरदस्त उछाल आया। अब यह 2.3% हो गया। 1993-94 में यह 9 फीसदी हो गया। 1993-94 में अभूतपूर्व 12.8% हो गया। कई वर्षो से मूल वस्तुओं का क्षेत्र नकारात्मक विकास दिखा रहा था। यह दर बढ़कर 1994-95 में 25 फीसदी हो गई। इससे यह आशंका गलत साबित हो गई तथा औद्योगिक उत्पादन 1994-95 में बढ़ कर 25% हो गया। अब यह पता लग गया कि एम०आर०टी०पी० की समाप्ति से इस पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ने के बजाए इसके विकास को मदद ही मिली। कृषि में विकास की रफ्तार बढ़ी तथा 1996-97 तक यह विकास दर 3 फीसदी हो गयी।
केन्द्रीय सरकार का वित्तीय घाटा 1990-91 में कुल राष्ट्रीय उत्पाद के 8.3% तक पहुंच चुका था। यह 1992 तथा 1997 में बंट कर लगभग 6 फीसदी पर आ गया। महत्व की बात यह है कि 1996-97 में 5.2% के कुल वित्तीय घाटे में से 4.7% सूद भुगतान पर खर्च हो रहा था। यह वित्तीय तिमाही का एक नतीजा था। प्राथमिक घाटा अर्थात् सूद भुगतान घाटा वित्तीय घाटा यानी चालु - वित्तीय दबाव या अति खर्चा होता है। यह 1996-1997 में सिर्फ 0.6% था जबकि 1990 में यह सकल घरेलू उत्पाद का 4.3% हो गया था और 1993-94 में 2.9% था।
देश की आर्थिक क्षेत्र में वैदेशिक स्थिति में काफी सुधार देखने को मिला। निर्यात के मामले में 1991-92 में डॉलर के हिसाब से 1.5 फीसदी की गिरावट आई लेकिन इसमें जल्द ही सुधार हुआ और 1993-96 में औसत विकास दर 20% तक पहुंच गई। महत्व की बात यह है कि भारत की आत्म निर्भरता इस स्तर पर बढ़ रही थी कि आयात के काफी बड़े भाग का भुगतान पर निर्यात के हाथ किया जाने लगा। आयात के भुगतान की तुलना में निर्यात में आय का अनुपात 80 के दशक में 60% से बढ़ कर 90 के दशक में 90 फीसदी हो गया।
चालू खाते के भुगतान संतुलन में घाटा 1990-91 में घरेलू उत्पाद में 3.2% तक पहुंच गया था। जो हानिकारक था। इस 1993-94 में घटाकर 0.4% तक लाया गया और 1995-96 में यह फिर बढ़कर 1.6% हो गया। फिर भी 1991-92 और 1997-98 के बीच औसत घाटा मात्र 1.1 फीसदी था। जो 7वीं योजना के 2.3% से काफी कम था। जनवरी 1991 में अंत तक सोना तथा एस०डी०आर० समेत विदेशी विनिमय कोष 30.4 अरब डॉलर के सम्मानजनक स्तर तक पहुंच गया था। इस कांप के सहारे सात महीनों तक आयात किया जा सकता था जबकि जुलाई 1991 में सिर्फ दो सप्ताह के आयात के लिए विदेशी मुद्रा उपलब्ध थी।
विपीनचन्द्रा अपनी ‘किताब आजादी के बाद भारत में कहते हैं कि कर्ज का संकट भी समाप्त होने लगा। भारत का विदेशी कर्जा तथा ळक्च का अनुपात 1991-92 में 41% के उच्च बिंदु पर था। 1995-96 में यह गिरकर 28.7% हो गया। कर्जा वापसी अनुपात भी 1990 में 35.3% से गिरकर 1997-98 में 19.5% हो गया। फिर भी चीन, मलेशिया और दक्षिण कोरिया के 10 फीसदी के नीचे के आंकड़ों से यह अभी काफी अधिक है।
80 के दशक तथा लगभग 1991 के उदारीकरण के बाद शेयर बाजार तथा स्टॉक मार्केट में काफी सुधार देखने को मिला तथा सही तौर पर ळवच के अनुपात के रूप में भारतीय स्टॉक बाजार में कुल बाजार पुंजीकरण 1980 में मात्र जो 5 फीसदी था अब वह 1990 में बढ़कर 13 प्रतिशत हो गया। 1991 के बाद हुए सुधारों में अब 1993 के अन्त तक बढ़कर 60% हो गए 1995 आते-आते यह स्टॉक बाजार विश्व का सबसे बड़ा बाजार हो गया।
मनमोहन सिंह ने 1997 में पूंजी शेयर नियंत्रण एक्ट को समाप्त कर दिया तथा इसके कारण विदेशी मुद्रा के निवेश में भारतीय कंपनियों ने अपनी शक्ति को बढ़ाया। इसका प्रयोग वह अपने विकास में कर रहे थे। इसमें पहले सरकार नए पूंजी शेयर और उनकी कीमते नियंत्रित किया करती थी।
उदारीकरण के परिणाम बृहत थे। अब विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर खरीद सकते थे तथा भारतीय कंपनियां विदेशी बाजार में धन इकट्ठा कर सकती थी। भारत में प्राथमिक बाजार में भारतीय कंपनियों के द्वारा जुटाई गई पूंजी 1980 में 92 करोड़ 90 लाख रूपये से बढ़कर 1985 में 2.5 अरब रूपये हो गई और 1990 में । खरब 23 अरब रूपये हो गई। 1993-94 में सह आकांडा 2 खरब 25 अरब रूपये हो गया।
उदारीकरण के फलस्वरूप भारत में पूंजी निवेश विशेषकर विदेशी पूंजी निवेश के नतीजे सकारात्मक निकले तथा 1991-1996 के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगभग 100% बढ़ गया। 1991 के 12 करोड़ से बढ़कर यह 1996 में 2.1 अरब डॉलर हो गया।
कुल विदेशी निवेश जहां 1990-91 में 20 लाख डॉलर था वह 1995-96 में यह बढ़कर 4.9 अरबर डॉलर हो गया। इस एक प्रकार इसे एक विशाल सुधार की संज्ञा दी गयी । आर्थिक उदारीकरण की अलोचना भी कम नहीं हुई। परम्परागत रूप से वामपंथियों के विचारों में यह एक गरीब विरोधी कदम था। कम्यूनिस्ट पार्टियों ने यह कहा कि यह सुधार अधिकतर देशों में फेल चुका है तथा मंदी आ गई और विकास रुक गया परन्तु इसे गरीब विरोधी कहना शायद ठीक नहीं होगा क्योंकि जहां 1987-88 में गरीबी दर 38.9% थी वही 1995 में 36% थी । यह सही है कि जहां दूसरे देशों में गरीबी दर कम हुई वही यहां वामपंथियों की बात अंशतः सच साबित हुई क्योंकि जिस रफतार से गरीबी घटनी चाहिए थी उसमे ऐसा नहीं दिखा।
आर्थिक सुधारों के द्वारा भारत में उच्चतर विकास हासिल करने के साथ-साथ गरीबी का स्तर कम करने की आशा भी मुख्य प्रश्न यह है कि जब वित्तीय घाटा कम होगा तथा सरकारी खर्च में कमी होगी तो गरीबी दर में उतनी कमी क्यों न दिखी? सबसे बड़ा कारण कृषि का विकास था। कृषि के विकास में जितनी वृद्धि दिखनी चाहिए थी, उतनी नहीं दिखी तथा सही तौर पर यह अपने आप में एक सेटबैक था 1991-92 में सुखा तथा उत्पादन की कमी दोनो का सामना करना पड़ा जिसमें अनाज की कीमतों में वृद्धि हुई सरकार को समझाने में देरी हो गई तथा वह ग्रामीण रोजगार पर अधिक ध्यान देती रही। गरीबी निवारण कार्यक्रमों में अधिक वृद्धि नहीं की गई जो करनी चाहिए थी। इस कदम की आलोचना हुई। परंतु 1993-1994 में गरीबी के स्तर में सुधार देखने को मिला तथा 1992 के मुकाबले 1993-94 में ग्रामीण एवम् शहरी गरीबी दोनों स्तरों पर 6% की कमी आ चुकी थी। यह स्तर 1986-87 से 1990-91 के सुधार पूर्व के 5 वर्षो की औसत से कम था। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सुधार जनित स्थायित्व ने गरीबी स्तर पर बहुत ही गलत प्रभाव नहीं डाला। इस पर हमेशा में यही बात कही जाती रही है कि ढाँचागत सुधारों के प्रभावी परिणाम गरीबी पर कोई गलत प्रभाव नहीं डालते हैं बल्कि वे अर्थ तंत्र की पूरी ऊर्जा मुक्त कर उनका भला ही करेंगे।
गरीबी में सुधार आर्थिक उदारीकरण के बाद हुआ और इसके पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है। सरकार ने 1991 के बाद कई सारी योजनाएं बनायी जो सामाजिक तथा ग्रामीण विकास के लिए थी। ग्रामीण विकास पर 1991-92 में सरकार का खर्च जहां पूरे खर्च का 4 फीसदी था वहीं 1992-93 में यह 7.8% हो गया। 1993 से 1998 के बीच यह 10 फीसदी तक हो गया। वास्तविक कृषि मजदूरी जो 1991-92 में 6.2% घट गयी थी वहीं अलग दो सालों में यह 5% बढ़ गयी। 1993-94 में सुधार के पहले से कही आगे निकल गई। 1991-92 के निम्न स्तर के बाद कुल अर्थ तंत्र में जनित अतिरिक्त रोजगार 1994-95 में बढ़कर 72 लाख हो गया। 1992-93 तथा 1994-95 के बीच प्रतिवर्ष औसत रूप से 63 लाख नौकरियों प्राप्त हुई ये 80 के दशक में प्रतिवर्ष औसतन 48 लाख नौकरिया से कहीं अधिक थी।
उपरोक्त तथ्यों के अलावा मुद्रास्फिति पर भी काफी प्रभाव पड़ा । यह पूरी तरह नियंत्रण में रखा गया। 1991 में वा. र्षिक मुद्रास्फीति दर 17 फीसदी तक जा पहुंची थी वह 1996 की फरवरी में 5% से भी नीचे लायी गई। कुल मिलाकर सुधारों की पहल सफल होती जा रही थी लेकिन अभी भी बहु कुछ करना बाकी था। सबसे बड़ी बात कि किसी भी सरकार के लिए कोई बड़ी पहल के लिए सामान्य जनसमर्थन से भी अधिक समर्थन की आवश्यकता थी लेकिन जब सरकार अल्पमत में रहती हैं तो कोई भी कड़े कदम उठाने में हिचकती है।
उपरोक्त कारण जिसमें नरसिंहराव सरकार के पास पूर्ण समर्थन नहीं था बहुत सारे क्षेत्रों में चाहकर भी सुधार नहीं किए गए। प्रस्तुत उदारीकरण में और भी सुधार की आवश्यकता थी। मसलन सार्वजनिक बचत बढ़ाने तथा सरकारी राज. कोषीय घाटे कम करने में कोई भी गंभीर कदम नहीं उठाए गए। उच्च वित्तीय घाटा बना रहा तथा 1992-96 के बीच सार्वजनिक बचत की एवम् निवेश के बीच का अंतर सकल घरेलू उत्पाद के औसतन 7.1 फीसदी के उच्च आंकडे पर बना रहा। अनाज की सब्सिडी 1991-92 में 28.5 अरब रूपयों से बढ़कर 1996-97 में 61.14 अरब रूपये हो गई।
खाद सब्सिडी भी 1988-89 के 32.01 अरब रूपयों से बढ़कर 1989-90 में 45.42 अरब रूपये और 1995-96 में 62.35 अरब रूपय हो गई भारी सब्सिडी के फलस्वरूप कृषि में स्त्रोतों की कमी के कारण वास्तविक निवेश में गिरावट का रुझान पैदा हो गया। प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री सी. एच. हनुमंत राव ने 1992 में नोट किया सिर्फ खाद पर दी वार्षिक सब्सिडी केन्द्र तथा राज्यों द्वारा कृषि पर वार्षिक खर्चे के बराबर है (जैसा कि विपीनचन्द्र ने लिखा है) ।
उस काल में और भी नागरिक आपूर्ति वस्तुओं पर सब्सिडी दी जा रही थी। डीजल, कैरोसीन तेल और रसोईगैस पर भी बड़ी मात्रा में सब्सिडी लगातार दी जा रही थी। 1995-96 में इस एकमुश्त सब्सिडी की राशि 93.6 अरब रूपयों तक पहुंच गई थी। जिसके फलस्वरूप उस वर्ष कुल जमा घाटा करीब 1 खरब 55 अरब रूपयों तक पहुंच गया। तेल कोष घाटा सरकार द्वारा तेल कंपनियों को अदा किया जाने वाला कर्ज था, जिसका प्रयोग आरंभिक तौर पर भारी सब्सिडी देने के लिए किया गया। इसके फलस्वरूप तेल कंपनियां तेल क्षेत्र में अत्यंत आवश्यक निवेश करने में असमर्थ रहीं। इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार के मामले में बहुत कम सफलता हासिल की गई है।
इसके अलावा चुनाव की जीत का लाभ भी सार्वजनिक खर्च से जुड़ता चला गया। सारी सरकारों को जीत के लिए लोक लुभावनी योजनाओं की घोषणा करने में सहुलियत होने लगी तथा विभिन्न राज्य सरकारें भी लागत से बहुत ही कम बिल चार्ज करने लगी। उसी काल में पंजाब सरकार ने तो बिजली पर भारी कर लगाने की जरूरत के उल्टे किसानों को मुफ्त बिजली परोसने की घोषणा कर दी। इससे पर्याप्त नुकसान उठाना पड़ा। इससे अर्थतंत्र पर विपरित प्रभाव पड़ा तथा कहीं-न-कहीं राजकोषीय घाटे का स्तर आवश्यकता से अधिक हो गया।
1996-97 में अर्थव्यवस्था में मंदी आना आंशिक रूप से पूर्वी एशियाई संकट का सबसे बड़ा परिणाम था। जापान में मंदी थी दक्षिण कोरिया, इण्डोनशिया, थाईलैण्ड तथा अन्य देशों में विकास की दरें ऋणात्मक हो गई। रूस और ब्राजील जैसे देशों में भी संकट की स्थिति पैदा हो गयी थी विश्व के स्तर पर विकास काफी धीमा पड़ गया। खास तौर पर 1998 में विश्व व्यापार का विकास। इस संकट के कारण पूंजी के अन्तर्राष्ट्रीय बहाव और निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। भारत में विदेशी निवेश तथा भारतीय निर्यात में कमी का यह आंशिक कारण था। इसका लाभ चीन ने लिया क्योंकि भारत की ‘आसियान नीति' उस समय प्रारम्भिक स्तर पर थी तथा नरसिंहराव ने 'पूरब की ओर देखो' नीति आरम्भ की थी।
आर्थिक सुधारों के कारण नरसिंहराव तथा मनमोहन सिंह को हमेशा याद किया गया जाता रहेगा परंतु विभिन्न पि रस्थितियों के कारण नरसिंहराव सरकार का विवाद में पडना अंत में इन सबसे बड़े सुधारों को ढकने का कार्य किया। 1994 के बाद परिस्थिति बदली तथा नरसिंह राव सरकार को विभिन्न संकटों का सामाना करना पड़ा। झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत काण्ड, सेंट किट्स घोटाला तथा चन्द्रास्वामी प्रकरण नरसिंहराव सरकार को विपक्ष के द्वारा कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी था। विपक्ष में भारतीय जनता पार्टी को मुख्य विपक्षी दल की संवैधानिक जिम्मेदारी मिली हुई थी।
औपचारिक रूप से कहानी उस समय आरम्भ हुई जब कांग्रेस का आंतरिक कलह बढ़ने लगा । अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी जैसे नेता जो नरसिंह राव की तुलना में अपने को गांधी परिवार से अधिक नजदीक कहते थे, सरकार के फैसले के खिलाफ रहते थे। नरसिंहराव ने अपने प्रतिद्वन्दियों को कभी सामने से कुछ नहीं कहा। मामला उस समय और बिगड़ गया जब 'हवाला प्रकरण' समाचार पत्रों के मंकसपदमे (शीर्षक) बनने लगे।
इस प्रकरण में कांग्रेस से लेकर तमाम विपक्षी नेताओं का नाम आ गया। भारतीय राजनीति में भूचाल आ गया। यह एक अविश्वासी प्रकरण था। इसमें लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर शरद यादव तथा विद्या चरण शुक्ल का नाम भी था जो उस समय संसदीय कार्य मंत्री थे। इन सभी नेताओं के विरुद्ध घूसबाजी तथा विदेशी मुद्रा संबंधी उल्लघनों के आरोप लगाए गए।
हवाला प्रकरण में ले-देकर नरसिंहराव सराकर की भूमिका संदेहास्पद मानी गयी तथा राजनीति के एक धड़े ने इसके लिए साजिश को लेकर नरसिंहराव सरकार को कटघरे में रखा दिया गया। 1995 के मध्य में तत्कालीन झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसद शैलेन्द्र महतो ने भाजपा में जाने का फैसला किया।
भाजपा में उन्होंने यह कहा कि नरसिंहराव की सरकार को बचाने के लिए झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को पैसा दिया गया था पर मैंने पैसे स्वीकार नहीं किये थे। यह एक प्रकार का आश्चर्यजनक तथा चुनाव के पहले की एक सांसद की स्वीकारोक्ति थी।
भाजपा ने इसका मुद्दा काफी बड़े स्तर पर बनाया तथा आम चुनाव की एक साथ की पूर्व अवधि में एक हथियार के तौर पर प्रयोग किया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, सेंट किट्स, चन्द्रा स्वामी प्रकरण तथा हवाला कोड ये अपने आप में नरसिंहराव सरकार के लिए अपयश था जिसने आर्थिक उदारीकरण जैसे बड़े कदम को ढक दिया।
7. 6 दिसंबर 1992 और बाबरी ढांचा विध्वंस
नरसिंहराव सरकार की ऐतिहासिक समीक्षा में बाबरी ढांचा पकरण की चर्चा करना भी अत्यंत आवश्यक है। 6 दिसम्बर 1992 को कार सेवकों के द्वारा बाबरी ढांचा को गिराने की घटना नरसिंहराव सरकार में ही हुई।
1991 में भाजपा की तरफ से 'राम मन्दिर का मुद्दा' बहुत बड़े स्तर पर उठाया गया तथा यह कहा गया कि 'राम मन्दिर' उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता में है। विश्व हिंदू परिषद भी इस मामले को लेकर आक्रामक मुद्रा में था। विश्व हिंदू परिषद ने पूरे भारत में राम जन्म भूमि को लेकर विरोध प्रदर्शन तथा धरना देना आरम्भ कर दिया। यही बात स्पष्ट रूप से कही गई कि “बाबरी ढांचा से पहले यहां मन्दिर था तथा उसे नष्ट कर बाबरी मस्जिद बनायी गई" लेकिन प्रशासन ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि प्राथमिकता में विध्वंस के बदले विध्वंस की बात की जा रही है। इससे पहले राजीव गांधी सरकार ने ढांचे का ताला खोलकर हर वर्ष राम लला की पूजा करने की स्वतंत्रता दे दी।
विश्व हिन्दू परिषद ने घोषणा की 6 दिसम्बर 1992 को राम मन्दिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ होगा। हजारों कार सेवक अयोध्या में एकत्रित हो गए। घोषणा में बताया गया है कि "मस्जिद के निकट प्रार्थना की जाएगी" ऐसा विश्व हिंदू परिषद की तरफ से विज्ञापन जारी कि गया। 
हजारों कार सेवक अयोध्या में उस मंच के पास इकट्ठा हो गए। मंच से नेताओं का भाषण होने लगा। तथा का सेवकों का दल धीरे-धीरे विवादित ढांचे की तरफ बढ़ने लगा। जबकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक तथा पुलिस दोनों के द्वारा इस पर रोक लगाने की बात कही गई थी। धीरे-धीरे भीड़ नियंत्रित हो गई तथा मस्जिद विध्वंस करने की तरफ बढ़ने लगी। कार सेवकों के पास लोहे की छड़ें तथा अन्य हथियार थे और जल्द ही कार सेवकों ने ढांचे के ऊपर चढ़ना आरम्भ किया।
आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेताओं की तरफ से बार-बार ऐसा न करने को कहा जाता रहा लेकिन वे बात नहीं माने। पुलिस ने अति गंभीर प्रयास नहीं किये क्योंकि पहले भी कार सेवकों की हत्या हो गई थी। ढांचे को ढहा दिया गया तथा सभी मलबे को तितर-बितर कर दिया गया।
बाबरी ढांचा विध्वंस एक दुर्भाग्यपूर्ण कारवाई माना गया तथा भाजपा ने औपचारिक सफाई दी कि यह भाजपा की तरफ से नहीं किया गया है तथा यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। उत्तर प्रदेश में दंगे भड़क गए तथा अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे 'काला दिन' बताया। महाराष्ट्र में शिवसेना ने मुम्बई में कुछ प्रदर्शन किए जिसमें वहां भी दंगे भड़के। 1993 में मुम्बई में याकुब मेंल के द्वारा दाऊद के इशारे पर कई जगह बम विस्फोट किए गए।
नरसिंहराव सरकार में उत्तर प्रदेश सहित सभी भाजपा शासित राज्यों की सरकार को बर्खास्त कर दिया। कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। ऐसा कहा जाता है कि नरसिंहराव सरकार ने बाबरी विध्वंस के मामले में काफी लचर रवैया अपनाया। नरसिंहराव सरकार ने ना पहले से कोई योजना बनाई और ना ही कोई कड़ा कदम उठाया तथा इस काण्ड को होने देने की सारी परिस्थितियों को एक मूकदर्शक के तौर पर विकसित होने दिया।
भारत में 90 दशक में ऐसी घटना की विदेश में भी आलोचना हुई। इसे “साम्प्रदायिक तौर पर घटना" के नाम से जाना गया तथा वर्षो तक इस घटना की निंदा की जाती रही।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के 10 दिन बाद गृह मंत्रालय के आदेश पर एक आयोग गठित किया गया। यह आयोग नर सिंहराव सरकार की तरफ से अपनी धर्म-निरपेक्ष छवि बचाने की अंतिम कोशिश थी। जस्टिस (न्यायधीश) लिब्रहान की अध्यक्षता में यह आयोग गठित किया गया था। इस आयोग को बाबरी विध्वंस तथा उसके बाद हुए दंगे की जांच करने की 
जिम्मेवारी दी गई। आयोग को अपनी रिपोर्ट तीन माह के अन्दर पेश करनी थी। परंतु यह आश्चार्य जनक तथा संशय पैदा करने योग्य था कि इस आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया और 17 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद 30 जून 2009 को अपनी रिपोर्ट मनमोहन सिंह सरकार को सौंपी गई। इस रिपोर्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह (उत्तर प्रदेश) पर घटना को नियंत्रित न करने के लिए तीखी टिप्पणी की गई तथा उत्तर प्रदेश सरकार को दोषी ठहराया।
अब 1996 आ गया था तथा नरसिंहराव सरकार को जनादेश लेने का समय भी। कांग्रेस ने मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा को तीन बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पकड़ा दिए थे। जिसमें भ्रष्टाचार सबसे अधिक बड़ा मुद्दा था। भाजापा को कांग्रेस की 5 सालों की नाकामियों को जनता के सामने ले जाने का अवसर मिला था। उधर दलितों के कई हितैषी बन बए थे। सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में भाजपा जैसे दलित आधारित दल बनकर कांग्रेस के वोट बैंक को छीन लिया था। इसी तरह अटल जी का व्यक्तित्व इधर कार्य कर रहा था तथा मुम्बई अधिवेशन में अचानक आडवाणी जी ने अटल जी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया था।
अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय दलों का प्रमुख बढ़ गया था तथा इस प्रगति की हानि सीधे कांग्रेस को होने वाली थी 1996 का चुनाव अप्रैल-मई में लड़ा गया तथा भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। कांग्रेस अब दूसरे नम्बर की पार्टी थी भाजपा को 161 सीटें मिली थी तथा कांग्रेस को 140 सीटें मिली थी। नरसिंह राव ने इस्तीफा दे दिया तथा 16 मई को तत्कालीन राष्ट्रपति ने (डा० शंकर दयाल शर्मा) अटल जी को सबसे बड़े दल के नेता होने के कारण प्रध नमंत्री पद शपथ दिला दी।
नरसिंह राव का कार्यकाल एक प्रयोगात्मक कार्यकाल रहा। उन्होंने अपने वरिष्ठ मंत्रियों के सहयोग से आर्थिक तथा वैदेशिक क्षेत्र में अच्छे काम किए। विदेश नीति में उन्होंने अटल जी जैसे विपक्षी नेताओं की भी मदद लेने में कोई हि. चकिचाहट नहीं की पर ऐसा कहा जाता है कि उनके कार्यकाल के साथ इतिहास की मजबूरी तथा कांग्रेस की आंतरिक राजनीति ने न्याय नहीं किया।
दिसम्बर 2004 में नरसिंहराव जी की मृत्यु हो गई तथा विवादित परिस्थितियों में एक पूर्व प्रधानमंत्री का अंतिम संस्कार दिल्ली के बदले हैदराबाद में हुआ।
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Sun, 01 Oct 2023 07:26:50 +0530 Jaankari Rakho
भारतीय राजनीति का संक्रमण काल https://m.jaankarirakho.com/395 https://m.jaankarirakho.com/395 भारतीय राजनीति का संक्रमण काल
1. भारतीय राजनीति का संक्रमण काल ( प्रथम चरण) (1989-1991)
1998 का आम चुनाव कई मायनों में बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हुआ। कहा जाए तो यह एक तरफ कांग्रेस की हार ही नहीं वरण् नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों में से किसी की दूसरी सबसे बड़ी हार होने वाली थी। इंदिरा जी की 1977 में हार के बाद उनके बेटे राजीव गांधी को हार का सामना करना पड़ा। यह ऐसी हार हुई जिसके बाद कभी प्रत्यक्ष गांधी परिवार का कोई भी सदस्य प्रधानमंत्री नहीं बना।
चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए एक जबरदस्त धक्का था । एकमात्र सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी यानि 197 सीटें जीतने के बाद भी राजीव गांधी को सरकार में जाने की दिलचस्पी नहीं थी क्योंकि उन्हें पथ मिल गया था कि एक तरफ वामपंथी जो 52 सीटें जीत गये थे तथा दूसरी तरफ भाजपा जो 86 सीटें जीती थी, वो दोनों विपरीत ध्रुव वी.पी. सिंह के राष्ट्रीय मोर्चे का समर्थन करेंगे जो 146 सीटें जीती थी।
अब गेंद विपक्षियों के कोर्ट में थी। वी.पी. सिंह को सबसे अधिक उपयुक्त उम्मीदवार माना गया तथा भाजपा उन्हें समर्थन को भी लगभग तैयार हो गई। चन्द्र शेखर जी वी.पी. सिंह को प्रधानमंत्री बनाने के सख्त खिलाफ थे तथा देव. केलाल उपप्रधानमंत्री पद से कम पर मानने को तैयार नहीं थे। राष्ट्रीय मोर्चा जिसमें अधिकतर कांग्रेस में रूठे तथा असंतुष्ट महत्वकांक्षी नेताओं की ही भीड़ थी ने एक विकल्प तो पेश किया था लेकिन ये सर्वसम्मत भाव कभी आपस में नहीं रख पाए।
काफी दौर की बैठको तथा समझौते के बाद वी. पी. सिंह के नेतृत्व में 2 दिसम्बर 1989 को पी.वी सिंह ने शपथ ली तथा देवीलाल जी को उपप्रधानमंत्री बनाया गया जो एक किसान नेता के तौर पर हरियाणा क्षेत्र में अपना स्थान रखते थे। देवीलाल की महत्वकांक्षा बहुत अधिक थी फिर भी उन्हें मंत्री पद की शपथ दिलायी गयी परन्तु उपप्रधानमंत्री के तौर पर परिचय किया गया।
वी.पी. सिंह की सरकार चल पड़ी तथा अपनी आदत के अनुसार बहुत ही बड़े स्तर पर कार्य शुरू किया। उन्होंने यह कोशिश की कि एक सुरक्षा घेरे में रहने वाने प्रधानमंत्री के तौर पर उन्हें न माना जाए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की नीतियों को हम जड़ से बदल देंगे तथा समान रूप से अब कुछ नहीं रहने वाला। उन्होंने स्वर्ण मंदिर की यात्रा की तथा यह दिखाने की कोशिश की कि समर्थन तथा सहमति से ही हमारी सरकार चलेगी।
तो वी.पी. सिंह की सरकार के कार्यकाल को भारतीय राजनीति के संक्रमण काल की शुरूआत ही कहा जा सकता है। ऐसी कुछ घटनाएँ उसी के आस पास आरम्भ हुई जो अभी तक भारत की सरकार के सामने कई चुनौतियां बनके पेश हो रही हैं। सबसे अधिक महत्वपूर्ण घटना तो कश्मीर में घटित हुई। वी. पी. सिंह ने जॉर्ज फर्नांडीस को कश्मीर मामलों का अध्यक्ष बना दिया। लेकिन उन्होंने तत्कालीन गृहमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद तथा अरूण नेहरू को उसके साथ सहयोग करने का भी अभिप्रमाण तथा आदेश भी दे दिया।
वी.पी. सिंह ने जगमोहन को कश्मीर का यानी (जम्मू एवम् कश्मीर) का गवर्नर बना दिया। राज्यपाल शासन लाने के कारण कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्लाह ने त्याग दे दिया। जगमोहन ने विधानसभा भंग कर दी तथा कई फैसले लिये जिसे वी.पी सिंह को पता हो, यह आवश्यक नहीं था। फलतः जगमोहन जी को दिल्ली वापस बुला लिया गया। वैसे जगमोहन ने कुछ अच्छे कार्य भी किए थे जिसमें अमरनाथ गुफा की यात्रा को आसान बनाना तथा खीर भवानी मंदिर का पुनुरुद्धार करना इत्यादि। सही तौर पर वी.पी. सिंह को यह लगा कि जगमोहन आंतरिक रूप से भाजपा के इशारे पर कार्य कर रहे थे तथा वह भाजपा के समर्थक के चलते जगमोहन का विरोध भी प्रत्यक्ष रूप नहीं में कर सकते थे। उन्होंने जगमोहन को बुलाकर राज्य सभा का सदस्य बना दिया तथा एक प्रकार से संतुलन बनाने की कोशिश की।
इसी बीच उग्रवादी घटनाएं जोर पकड़ने लगी तथा गृहमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद का उग्रवादियों द्वारा अपहरण कर लिया गया बदले में कई उग्रवादियों को छोड़ना पड़ा। जम्मू कश्मीर की चर्चा विस्तार से एक अलग अध्याय में की जाएगी।
वी.पी. सिंह सरकार ने नेपाल के साथ संबंध बनाए। फिर से एक नये रूप में तथा श्रीलंका से अपनी सारी सेना वापस बुला ली। परंतु आंतरिक स्तर पर कश्मीर के अलावा भी ऐसी बहुत सारी समस्याएं थीं जिसे वी.पी. सिंह सरकार के लिए हल करना अति आवश्यक था। इसमें अयोध्या का मामला एक बड़ा मामला था। भाजपा की रणनीति के केन्द्र में राम मंदिर का मुद्दा था। इसके अलावा मंडल कमीशन को सामने लाकर वी.पी. सिंह की सरकार ने एक विवाद तथा बहस का रूप ले लिया।
वी.पी. सिंह जी को सरकार चलाने में दिक्कत हो रही थी क्योंकि राष्ट्रीय मोर्चे की आंतरिक समस्याओं को हल करने में ही उनकी शक्ति अधिक खर्च हो रही थी। हमने पहले ही चर्चा की थी कि वी.पी. सिंह के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में चन्द्रशेखर एक रूकावट थे। चन्द्रशेखर अवसर खोज रहे थे। फारूख अब्दुल्लाह का मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने का विरोध सार्वजनिक रूप से चन्द्रशेखर ने ही किया। इधर देवीलाल चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को एकदम पसंद नहीं करते थे। देवीलाल को पूरे कैबिनेट में कोई पसंद नहीं करता था जबकि सिर्फ चन्द्रशेखर ही इनको एक पूर्ण रूपेण समर्थन करते थे। देवीलाल एक किसान नेता के रूप में प्रसिद्ध थे तथा हरियाणा के मुख्यमंत्री के तौर पर काफी लोकप्रिय थे। जब वह उपप्रधानमंत्री बने हरियाणा में उनके बेटे ओम प्रकाश चोटाला मुख्यमंत्री बन गए। उन्होंने अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाकर परिवारवाद को बढ़ाने का कलंक माथे पे लिया था। चोटाला के मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा में सदस्यता के लिए हुए उपचुनाव में उन पर धांधली का आरोप लगा। चुनाव आयोग ने चोटाला का चुनाव खारिज कर दिया। पूछताछ से पता चला कि चुनावों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई। मुख्यमंत्री चोटाला को इस्पीफा देना पड़ा परंतु दो महीने बाद फिर से उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया गया।
चोटाला का मुख्यमंत्री फिर से बननां राष्ट्रीय मोर्चा के सदस्यों को नागवार गुजरा। आरिफ मुहम्मद खान तथा अरूण नेहरू पूर्ण रूप से इस बात पर खफा कि चोटाला को जिस प्रकार मुख्यमंत्री बनाया गया वह न्यायसंगत नहीं है। आरिफ मुहम्मद खान तथा अरूण नेहरू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। अब वी.पी. सिंह ने भी यह कहकर त्यागपत्र ने की पेशकश की कि चोटाला को मुख्यमंत्री होना न्यायसंगत नहीं है। अब मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चोटाला ने इस्तीफा देनो की बात कही तथा वी.पी. ने अपना इस्तीफा वापस लिया। देवीलाल जी भयंकर पुत्र मोह में थे। अब देवीलाल दूसरी चाल चलने लगे। उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेस बुलाकर आरिफ मुहम्मद खान और अरूण जेटली पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया तथा यह कहा कि वी. पी. सिंह का लिखा हुआ 1987 का एक पत्र है जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति को यह संदेश दिया है कि नेहरू और खान दोनों बोफोर्स घोटाले में शामिल है। यह सीमा का पूर्ण उल्लंघन था। वी.पी. के अनुसार उन्होंने ऐसा कोई पत्र राष्ट्रपति को लिखा ही नहीं था। यह एक उपप्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के प्रतिष्ठा के पूर्ण खिलाफ था। वी.पी. सिंह ने 1 अगस्त 1990 को देवीलाल को बर्खास्त कर दिया।
देवीलाल को अपनी बर्खास्तगी बर्दाश्त नहीं हुई। उन्होंने अपनी ताकत दिखाने का फैसला किया। 9 अगस्त 1990 को दिल्ली में उन्होनें एक खिलाफ रैली का आयोजन किया। यह रैली एक प्रदर्शन था जो राजनीति में अपना वर्चस्व दिखाने का तथा केन्द्र सरकार को धमकी देने का एक रास्ता भी था।
वी.पी. सिंह सरकार तो दूसरे ही लक्ष्य की ओर जा रही थी। उन्होंने 7 अगस्त 1990 को जनता पार्टी सरकार (1977-79) में नियुक्त मंडल कमीशन रिपोर्ट को संसद में पेश किया। मंडल की सिफारिशों के अन्तर्गत सरकारी नौकरी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों में 27 फीसदी आरक्षण पिछड़ी जातियों के लिए रखा गया है। इस प्रकार आरक्षित श्रेणी 22.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 49.5 फीसदी हो गई। 22.5 प्रतिशत तो अब तक सिर्फ SC/ST के लिए ही था। कमीशन के द्वारा आरक्षण की कई सिफारिश दो स्तर की थी। दूसरे में शैक्षणिक संस्थानों तथा पदोन्नति के लिए था। मंडल कमीशन तात्कालीन भारतीय सामाजिक राजनीतिक परिदृश्यों में एक बवंडर आने लगा इस कमीशन की सिफारिशों को मानने के विरोध में प्रतिक्रियाएं कड़ी हुई। वी.पी. सिंह की तरफ से यह एक ऐसी रणनीति थी जो समाज के पिछड़े तबकों को आकर्षित कर सकती थी परंतु समाज के और स्तरों के बीच एक कुपोषित वातावरण भी उत्पन्न कर सकती थी। वी.पी. सिंह की सरकार के अंदर भी कुछ ऐसे लोग थे जो इस बात से खुश नहीं थे कि आम सम्मति क्यों बनायी गयी। बीजू पटनायक, रामकृष्ण तथा यशवन्त सिन्हा कुछ ऐसे नेता थे जो मंत्रिमंडल में रहने के बावजूद वी.पी. सिंह के इस कदम को मनमाना समझ रहे थे।
इधर भाजपा और वामपंथी पार्टियां जो सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थीं, काफी नाराज थीं। इनसे भी कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया था। चन्द्रशेखर ने बड़े स्तर पर वी.पी. सिंह के इस कार्य को मनमाना बताया। इसके समय को लेकर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा किया गया इनके अलावा पिछड़ी जातियों की पहचान का गलत तरीका तथा समाज में विभाजन की शंका जैसे मुद्दों को लेकर चन्द्रशेखर जैसे नेताओं ने इस पर बड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
वामपंथी पार्टियां जिसमें सी. पी. एल आगे थी, ने कहा कि आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए न कि सामाजिक । इसके अलावा प्रमुख समाज शास्त्रियों का यह मत था कि मंडल कमीशन में स्वतंत्रता के बाद हुए सामाजिक परिवर्तन को ध्यान में नहीं रखा गया है। इनके अनुसार रिपोर्ट में जिन्हें पिछड़ा कहा गया वह भूमि सुधार तथा हरित क्रान्ति के बाद जबरदस्त रूप से सकारात्मक स्तर पर विकसित हुए। उन्होंने कहा कि सामाजिक स्तर पर पिछड़ों की पहचान करने में सावधानी बरतने की आवश्यकता थी जो एक संवेदनशील मुद्दा था।
मंडल कमीशन को स्वीकार करने के विरोध में प्रतिक्रिया का गुबार छात्र समूह के स्तर तक पहुंच गया। छात्रों के एक समूह जो कि सामान्य वर्ग के थे ने भर्ती प्रक्रिया में इतनी सीटों के प्रतिशत को आरक्षित किए जाने का विरोध किया। छात्रों ने हिंसक विद्रोह आरम्भ कर दिया कई बसें जला दी गई, चक्का जाम किया गया तथा घेराव किया गया। दिल्ली, वाराण ासी, कानपुर, इत्यादि जैसे स्थानों में गोली कांड हुए। विरोध प्रदर्शन की स्थिति में पिछड़ता देख कुछ छात्रों ने सितम्बर के मध्य में आत्मदाह की कोशिश की। एक छात्र बच नहीं सका जो बिहार का था जहां राष्ट्रीय मोर्चा अच्छी स्थिति में था। स्थिति बहुत ही विषम हो गई। सामाजिक तौर पर तो अधिक ही विषैला वातावरण बनता चला गया। बिहार जैसे राज्य में तो स्थिति अधिक सामाजिक स्तर पर इसलिए खराब हुई कि वहां मुख्यमंत्री लालू प्रसाद जी ने सार्वजनिक मंच से अग्रण जाति के विरोध में मुहावरों का प्रयोग किया था। प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने बहुत बड़ी अपील की पर प्रभाव अधिक नहीं हुआ। कॉलेज, छात्रावास, चिकित्सा महाविद्यालय तथा इंजीनियरिंग सेक्शन यहां तक कि कार्यालयों में जातिवाद की प्रवृत्ति बढ़ गयी तथा 'अगड़ा-पिछड़ा चैलसनउ (वर्ग) ' के रूप में लोग इकट्ठे होने लगे। ये संस्थाएं इसलिए तैयार हुई थी कि ये जातिय स्तर की स्थिति से जनता को उपर उठाएंगे पर यही पर जातिवाद को हवा देना दुर्भाग्यपूर्ण था। 1 अक्टूबर 1990 को मंडल कमीशन की रिर्पोट को लागू करने पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी तो मामला शान्त हो गया। को बाहर से समर्थक दे रही सबसे बड़ी पार्टी ठश्रच अपनी रणनीति को आगे बढ़ा रही थी। मंडल इधर वी.पी. सिंह आयोग ने उसे यह सक्रिय मौका दे दिया मंडल कमीशन का व्यापक विरोध देखकर भाजपा ने अपना समर्थन वापस लेने की बात कह दी।
भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष तथा हिन्दुत्व के सबसे बड़े नेता लाल कृष्ण आडवाणी 25 सितम्बर 1990 को सोमनाथ से अयोध्या तक 6000 बीघा लम्बी राम रथ यात्रा लेकर चल पडे। उन्होंने अपना लक्ष्य अयोध्या पहुंच कर राम मंदिर की आधारशिला रखने की बात की। उनकी यात्रा लगभग 28 दिन बिना बाधा के चली। 23 अक्टूबर 1990 को बिहार में समस्तीपुर में लालू जी की सरकार के द्वारा उनकी गिरफ्तारी हुई। बिहार में अडवाणी जी की गिरफ्तारी की भी कहानी अलग है। अभी के वर्तमान उर्जामंत्री तथा पूर्व गृह सचिव राज कुमार सिंह तत्कालीन एस. पी. समस्तीपुर थे। लालू जी ने इन्हें आदेश दिया कि वह आडवाणी जी को गिरफ्तार करें। उन्होंने आडवाणी जी को गिरफ्तार कर लिया था। एक राष्ट्रीय नेता जिसके द्वारा केन्द्र सरकार में समर्थन दिया जा रहा था तथा जनता दल के पीछे राज्य सरकार के द्वारा अडवाणी को गिरफ्तार करना एक बहुत बड़ी बात थी। बिहार के मुख्यमंत्री (तत्कालीन) लालु यादव इस गिरफ्तारी के बाद पूरे देश में चर्चा के विषय बन गए। इधर भाजपा ने वी. पी. सरकार से समर्थन वापसी की औपचारिक घोषणा कर दी। वी. पी. सरकार की भाजपा के समर्थन का एक बहुत महत्त्वपूर्ण आवश्यकता थी।
परन्तु वी. पी. सिंह सरकार ने अपने दल को ही अधिक महत्व दिया तथा भाजपा को मनाने की कोशिश नहीं की। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। वो यादव जनता दल की तरफ से ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वी. पी. सिंह का नियंत्रण मुलायम सिंह पर अत्यधिक रूप से था। मुलायम सिंह ने 30 अक्टूबर को अयोध्या कारस. `वकों पर गोली चलाने का दिया जो आडवाणी का इंतजार कर रहे थे। ये सभी कारसेवक अयोध्या के मंदिर के शिलान्यास का इंतजार कर रहे थे। इन सभी घटनाओं का सामूहिक मिश्रण परिणाम यह था कि एक बार तो उत्तर प्रदेश में कुछ जगहों पर साम्प्रदायिक भावनाएं भड़कीं वहीं दूसरी तरफ 5 नवम्बर को जनता दल खुद फूट पड़ गयी। लगभग 58 सांसदों ने विद्रोह कर दिया तथा 7 नवम्बर को इन सांसदों ने चन्द्रशेखर को अपना नेता बना दिया। यह एक दुर्भाग्य ही था कि राजनीतिक अस्थिरता भारत की विकास दर को अपनी जकडन में खींच रही थी।
10 नवम्बर 1990 को चन्द्रशेखर जी कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने । चन्द्रशेखर का प्रधानमंत्री बनना एक बहुत बड़ी घटना नहीं थी। चन्द्रशेखर ने यह नहीं कहा कि प्रधानमंत्री बनकर मुझे भारत के सपनों को पूरा करना है। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि “मेरे सपने थे कि एक मध्यमवर्गीय परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री बने और इसलिए मुझे खुशी हो रही है" कांग्रेस को वी. पी. सिंह की सरकार जाने के बाद एक अवसर मिल गया था जिससे कांग्रेस फिर मुख्य भूमिका में आ जाए । कांग्रेस चाहती थी कि कुछ दिन एक कमजोर सरकार बनाकर समर्थन वापस लेकर चुनाव करवाया जाए। 5 मार्च 1991 को कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। चुनाव की घोषणा 19 मई को की गई। दो साल के अन्दर भारत को दूसरे आम चुनाव की ओर जाना पड़ रहा था।
मतदान का एक राउण्ड पूरा हो गया था चुनाव प्रचार बहुत ही तेजी से चल रहा था। इसी बीच एक भयावह घटना घट गयी। 21 मई 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मद्रास के पास पेरूमबुदुर में एक जनसभा कार्यक्रम में एक महिला बम ने आत्मघाती हमले से ( राजीव जी को) उड़ा दिया। राजीव गांधी के टुकडे-टुकडे हो गए। उनकी हत्या एक भयानक घटना थी। यह स्पज्ज्म की तरफ से हमला था।
चुनाव के अगले राउण्ड पूरे हुए तथा परिणाम में कांग्रेस को 232 सीटें मिली तथा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उनकी जीत हुई। नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने।
1989-91 एक प्रकार से ऐसे काल के रूप में गिना या आंका जाता है जिसमें आम जनमानस में संक्रमण कार्य या बाधा होती है। यह कार्य साम्प्रदायिकता, हत्या, राम जन्म भूमि तथा अस्थिरता का पर्याय है।
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Sun, 01 Oct 2023 07:23:04 +0530 Jaankari Rakho
राजीव गांधी : एक युवा प्रधानमंत्री : (सहानुभुति, संक्रमण तथा बोफोर्स का बवंडर) https://m.jaankarirakho.com/394 https://m.jaankarirakho.com/394 राजीव गांधी : एक युवा प्रधानमंत्री : (सहानुभुति, संक्रमण तथा बोफोर्स का बवंडर)
1. राजीव गाँधी तथा सहानुभति की राजनीति तथा “भारतीय राजनीति के संक्रमण कार्य का आरम्भ "
31 अक्टूबर 1984 की सुबह की इंदिरा गांधी जी उस समय प्रधानमंत्री की पूर्वनिर्धारित एक टेलीविजन साक्षात्कार के रिकॉर्डिंग के लिए अपने आवास से कार्यालय की ओर पैदल चल पड़ी। कुछ दूर आगे बढ़ने पर उनके दो सुरक्षा गार्डों ने उनके ऊपर गोलियां बरसाई। यह जून 1984 में स्वर्ण मंदिर से सिख आतंकवादियों को निकालकर बाहर करने के लिए तथाकथित बदले के रूप में देखा गया। इंदिरा गांधी की कुछ ही घण्टों में ण्डै में मृत्यु हो गई। राजीव गांधी पश्चिम बंगाल में थे।
राजीव गांधी को प्रणव मुखर्जी के बदले (जो एक स्वाभाविक उम्मीदवार कहे जाते थे) प्रधानमंत्री बना दिया गया। ऐसे कहा जाता है कि तथाकथित रूप से राजीव गांधी की प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयारी नहीं थी उनकी पत्नी सोनिया गांधी भी इसके विरोध में थी क्योंकि उन्हें लगता था कि राजीव का जीवन अधिक महत्वपूर्ण है।
संजय गांधी की मृत्यु (1980) के बाद राजीव गांधी को राजनीति में लाया गया। जून 1981 में उन्हें अमेठी लोकसभा के उपचुनाव में संजय गांधी के द्वारा रिक्त हुई सीट पर खडा किया गया था। उन्हें जीत मिली तथा इंदिरा गांधी जी द्व ारा उन्हें 1982 में दिल्ली में एशियाई खेल संगठित करने के जिम्मेदारी सौंप गयी। 1983 में दो महासचिव बनाए गए थे। अब तो उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर विभिन्न समस्याओं से अवगत होना था।
31 अक्टूबर 1984 के बाद प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए ही राजीव गांधी को यह सलाह दी गई कि प्रधानमंत्री नए चुनाव की घोषणा कर दं, वैसे 1985 में चुनाव नियत था। 1984 कं दिसम्बर में ही चुनाव करवाने का फैसला किया गया। कांग्रेस को सहानुभूति लहर का लाभ मिला तथा 415 सीटें मिली।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद यानी 31 अक्टूबर 1984 से लेकर 3 नवम्बर 1984 तक दिल्ली में सिखों पर जो जुल्म हुए वह भारत के स्वतंत्र्योत्तर इतिहास की सबसे भयानक त्रासदी, अन्याय तथा सरकार की महान विफलता के रूप में याद किया जाता है। सिखों के घर भी जला दिए गए। दिल्ली की सड़कों पर हजारों सिखों की हत्या कर दी गई। कहा गया कि इसमें कई कांग्रेस नेताओं तथा कार्यकर्त्ताओं की जमात शामिल थी जो ये दंगे करवा रहे थे। इसमें एक नेता सज्जन कुमार का नाम प्रमुख रूप से था जिन्हें कुछ ही दिनों पहले न्यायपालिका के द्वारा उम्र कैद की सजा मिली है। पुलिस ने इन दंगों पर अपनी आंखें बंद कर दी तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव जी के इस बयान पर कि “जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है" की बहुत ही संदेहास्पद तथा विस्मयी मानकर आलोचना भी हुई। परन्तु यह पूरी तरह से साफ शब्दों में स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि राजीव गांधी का यह बयान सिख दंगों से संबंधित था। सिखों को पड़ोसी हिन्दुओं ने बचाया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 3 नवम्बर को इंदिरा गांधी का अंतिम संस्कार किया गया। राजीव गांधी कुछ पीड़ित जगह पर गए भी। भारत के कुछ और राज्यों जैसे कानपुर और बोकारों में अहिंसा कुछ कम स्तर पर दोहराई गई।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दूसरा जो सबसे बड़ा काण्ड हुआ उसे भोपाल गैस ट्रेजडी के रूप में जाना जाता है। करीब 6 हजार लोग मारे गए। इनमें अधिकतर मजदूर थे। यह घटना यूनयिन कार्बाइड कंपनी की एक Chemical plant से 'मिथायम आइसो साइनेट गैस' निकलने से हुई। मुख्य अभिकर्ता तथा कंपनी के मालिक एंडरसन को रातों-रात विशेष विमान से भगा दिया गया। लम्बे मुकदमों के बाद कोई भी परिणाम सामने नहीं आया तथा कोई न्याय नहीं मिला। तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी जीवनी में यह लिखा कि एंडरसन को भगाने का राज मेंरे चिता के जलने के साथ ही खाक हो जाएगा।
राजीव गांधी की प्रशासनिक कार्य की शुरूआत पंजाब और असम के साथ समझौते से हुई। राजीव गांधी ने अपने विजन में एक तकनीकी भारत को प्रमुखता देने की बात कही तथा यह कहा कि भारत को इक्कीसवी सदी का राष्ट्र बनाने के लिए तकनीकी साधन उपलब्ध कराना होगा तथा इसके लिए हमें कई योजनाएं आरंभ करनी होंगी। उन्होंने कई योजनाएं जैसे कि साक्षरता मिशन, ग्रामीण पेयजल अभियान, टीकाकरण जैसे अभियान की शुरूआत भी की। अब हमारी राजनैतिक बहस का आधार बदल गया था तथा केन्द्र में इन सारे अभियानों को लेकर चर्चा शुरू की गई थी।
राजीव गांधी ने अपने मित्र सैम पित्रोदा से मिलकर तकनीकी क्रांति को आरम्भ करने की बात की तथा उनसे संबंधित तकनीक आयात पर घरेलू कर खत्म या कम कर दिया। विद्यालयों में कम्प्यूटरों की शिक्षा को बढ़ाने की बात कही गयी इसके अलावा राजीव गांधी ने पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिलाने के लिए भी असफल प्रयास किए। जनवरी 1989 में 8000 प्रतिनिधियों के साथ एक पंचायती सभा का सम्मेलन किया।
सामाजिक योजनाओं में उन्होंने एक जवाहर रोजगार योजना की शुरूआत की। केन्द्र सरकार की तरफ से इन्होंने 80% पैसे देने की भी बात कही इस योजना में गरीब ग्रामीण परिवार के कम-से-कम एक सदस्य को साल में 50 से 100 दिनों के लिए रोजगार प्रदान करना था।
राजीव गांधी सरकार ने 1980 में एक नयी शिक्षा नीति बनायी तथा इसके अन्तर्गत साक्षरता अभियान ब्लैक बोर्ड अभियान दूर शिक्षा तथा नामांकन सुविधा जैसे कार्यक्रम को इसमें शामिल किया गया। महिलाओं को पंचायती राज में 30 फीसदी आरक्षण की बात भी कही गयी। महिलाओं से संबंधित राष्ट्रीय योजनाएं आरम्भ हुई जिनमें दहेज विरोधी दण्ड अधिनियम 1986 तथा महिलाओं के लिए नये आयोग को भी प्रस्तावित किया गया।
राजीव गांधी ने एक नया पर्यावरण मंत्रालय बनाया तथा बड़े पैमाने पर गंगा सफाई के लिए गंगा एक्शन प्लान की शुरूआत की। इसका परिणाम क्या हुआ ? पता नहीं पर यह एक अच्छी शुरूआत थी।
राजीव गांधी ने वैश्विक तौर भारत मेला आयोजित किया तथा अपने देश की विरासत तथा बहुमूल्य मूर्तियों तथा संग. हित वस्तुओं का प्रदर्शन भी बहुत सारे देशों में किया गया। आलोचक कहते हैं कि इस प्रदर्शन में हमारी बहुत प्राचीनतम धरोहर कभी देश नहीं लौट पाई। थोड़ा बहुत पर्यटन में इस मामले से लाभ मिला तथा बुनियादी तौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति की विविधता को सामने लाने में मदद मिली। भारत ने विश्व के विभिन्न विभागों में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र कायम किए तथा हमारी परम्पराओं को विश्व के और भी देशों के नागरिकों से अवगत कराया।
राजीव गांधी ने अपने शासन काल में यह प्रयास किया कि कांग्रेस के अन्दर तथा नौकरशाही व्यवस्था में फैल रहे भ्रष्टाचार को समाप्त कर दिया गया जाए। इसके लिए उन्होंने कई स्तर के पारदर्शी रवैये अपनाने का सुझाव दिया। उन्होंने दल-बदल विरोधी एक्ट को लाने की सोची तथा 1985 में 52वें संविधान संशोधन को पास किया गया। इसमें यह कहा गया कि किसी भी पार्टी के संसदीय दल में से एक तिहाई सदस्य अगर चाहेंगे तभी ही दूसरे दल में जाकर किसी सरकार का समर्थन कर सकते हैं या नया दल बना सकते हैं। अगर एक तिहाई सदस्यों में से कम कोई भी ऐसी कोशिश करेगा तो उनकी सदन की सदस्यता खत्म हो जाएगी।
राजीव गांधी ने इसके अलावा लोक अदालतें उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास की रूपरेखा बनाने की कोशिश की। राजीव गांधी के कैबिनेट में वित्तमंत्री वी०पी० सिंह के रूप में एक ऐसा नेता था जिसने राजीव गांधी के सहयोग से कई बड़े घराने में छापे मरवाए तथा भ्रष्टाचार (विशेषकर वित्तीय अपराध) के विरोध में एक हवा बनी।
दिसम्बर 1985 में कांग्रेस के शताब्दी समारोह में राजीव गांधी ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि कांग्रेस के अन्दर सत्ता के दलालों की फौज भरी हुई है। यह एक ऐसी स्थिति थी जब किसी सबसे बड़ी पार्टी के मंच पर उसी के प्रध नमंत्री के द्वारा अपनी ही पार्टी का सामना दिखाया गया था। राजीव गांधी ने यह कहा कि मैं इन सत्ता के दलालों से कांग्रेस को मुक्त करूंगा। तथा कांग्रेस को नये रूप से जीवित करूंगा। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस भाषण तथा विशेष रूप से ऐसे विषय पर भाषण को पसंद नहीं किया। वरिष्ठ नेताओं ने यह कहा कि ऐसे मंच का प्रयोग अपनी विरासत को प्रशंसित करने के लिए होता है न कि अपनी नाकामी दिखाने का।
2. बोफोर्स का भूत और राजीव गांधी की हार
राजीव गांधी ने रक्षा के क्षेत्र में काफी अधिक मात्रा में नये प्रयास किए तथा इस क्षेत्र ने सशस्त्र सेनाओं के आध · निकीकरण की इजाजत दे दी। जिसमें प्रतिरक्षा खर्चा दो गुना हो गया। श्रीमति इंदिरा गांधी ने 1938 में ही अब्दुल कलाम जी के ओजस्वी नेतृत्व में मिसाइल कार्यक्रम विकास का आरम्भ करवा दिया गया था। राजीव ने इसे आगे बढ़ाया तथा त्रिशुल अग्नि फोर्स जैसी मिसाइलों के विकास ए०पी० जे० अब्दुल कलाम ने सरकार के निर्देश में पूरे किए। भारतीय नौसेना का भी काफी विस्तार किया गया। सोवियत संघ से लीज पर पनडुब्बी ली गयी तथा ब्रिटेन में हवाई जहाज की खेप ली गयी। स्वीडन से होविट्जर गन मिले और अर्जुन टैंक विकसित किया गया। राजीव गांधी के शासन के अंतिम दो वर्षों में सरकारी खर्चे का 5 वां हिस्सा प्रतिरक्षा पर खर्च हो रहा था। इसी बीच बोफोर्स का जिन्न निकला तथा भारत की राजनीति सदा के लिए बदल गयी। बोफोर्स के आरम्भ में फेयर फैक्स तथा भ्वॅ पनडुब्बी खरीददारी हुई। फेयर फैक्स विवाद राजीव गांधी जी के वित्तमंत्री वी०पी० सिंह द्वारा एक अमरिकी डिटेक्टिव एजेंसी फेयरफैक्स की नियुक्ति में खड़ा हुआ। फेयरफैक्स को भारत के नागरिको के द्वारा विदेशी बैंकों में विदेशी मुद्रा के गैर कानूनी रूप से जमा करने की जाँच का काम सौंपा गया था।
एक पेपर इसी एजेंसी को मिला जिससे पता लगता था कि प्रधानमंत्री के गहरे मित्र अभिताभ बच्चन भी इसमें शामिल थे। इसके विरोध में अंबानी वाडिया परिवार भी आ गए। वी० पी० सिंह का मंत्रालय बदल गया। जहां एक तरफ प्रध कानमंत्री ने इस बदलाव को एक समय की मांग बताया वहीं विपक्ष ने राजीव जी का यह कहकर घेराव किया कि राजीव ने अपने मित्र अभिताभ को बचाने के लिए वी०पी० सिंह को वित्त मंत्रालय से हटा दिया है। वी० पी० सिंह चुपचाप अपना काम करते रहे। इसी बीच एक और मामला चर्चा में आ गया। भारत ने पश्चिम जर्मनी से 1981 में 4 पनडुब्बीयां खरीदी थी। वह दो और खरीदना चाहता था और कीमतों में कुछ कटौती की मांग की। लेकिन जहाज यार्ड ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उसे बिक्री पर 7 फीसदी की भारी ड्यूटी देनी पड़ती है। वी०पी० सिंह ने, जो उस समय रक्षा मंत्री थे, बिना राजीव से पूछे जांच का आदेश दे दिया। राजीव गांधी आंतरिक रूप से इसे एक गैर जिम्मेदार कदम मान गए क्योंकि 1981 में यह 7 फीसदी की नई ड्यूटी वाली स्थिति इंदिया गांधी के रक्षा मंत्री बनते हुए की गई थी। वी०पी० सिंह को आंतरिक रूप से अकेलापन का सामना करना पड़ा ( कैबिनेट के आंतरिक स्तर पर) विरोधी पक्ष एवं मीडिया ने इसे वी०पी० सिंह की बहादुरी और शासन पद्धति में एक इमानदार नेता की छवि पेश की तथा जल्द ही उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। अब राजीव गांधी और वी०पी० सिंह की तुलना होने लगी। राजीव गांधी को मीडिया को भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने वाले एक व्यक्ति के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया था वहीं वी०पी० सिंह को एक महान इमानदार नेता के तौर पर दिखाया गया जिसे भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सजा दी गई थी।
वी० पी० सिंह के इस्तीफे के बाद एक और घटना घटी जो सबसे सूचित तथा अब तक के सबसे चर्चित 'बोफोर्स घोटाला' के नाम से जाना जाता है।
वी० पी० सिंह त्याग पत्र देकर निकल चुके थे। कुछ दिनों बाद 16 अप्रैल 1987 को स्वीडिश रेडियो पर एक खबर प्रसारित की गई कि फ्रांसीसी तोप के मुकाबले स्वीडन की बोफोर्स कंपनी की 410 तोपे खरीदने के लिए भारतीय अफसरों एवम् कांग्रेस पार्टी के सदस्यों को 60 करोड़ रूपयों की बराबरी की राशि घूस के रूप में दी गयी। इन सभी आरोपों को भारतीय समाचारों पत्रों ने बहुत ही रूचि से प्रकाशित किया। खासकर अंग्रेजी समाचार पत्र जैम भ्पदकन तथा जैम प्दकपंद माचतमे ने। जैम भ्पदकन के सम्पादक छण् त्ड तो ल्वनदह ठतंअम श्रवनतदंसपेज कहलाने लगे। राजीव गांधी की प्रखर आलोचना होने लगी इधर दूसरे मुद्दे ने एक बडा बवंडर का रूप ले लिया। विपक्षी दल राजीव गांधी तथा गांधी परिवार पर पैसे लाने का आरोप लगाने लगे। इटालियन व्यापारी तथा रक्षा एजेंट क्वात्रोची को लेकर विपक्ष लगातार राजीव गांधी परिवार को घेरने लगा। राजीव गांधी अब रक्षात्मक भाव में थे तथा उन्हें कोई भी जबाब देते बन नहीं रहा था। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को भी राजीव गांधी के तत्कालीन व्यवहार से परेशानी रहती थी। हमेशा वह कहा करते थे कि एक प्रध नमंत्री के रूप में महामहिम से नियमित मिलने से हिचक है। अब इस स्थिति में राष्ट्रपति भी अधिक से अधिक राजीव गांधी पर दवाब देने की कोशिश करने लगे। इसके अलावा पंजाब तथा मिजो समझौते की जानकारी देने की परम्परा का निर्वाह भी राजीव के द्वारा वही देने से वे काफी नाराज थे।
अब राष्ट्रपति राजीव गांधी के कैबिनेट को बर्खास्त करने की सोचने लगे। विरोधी पार्टी के समूचे तथा राजीव गांधी के कुछ निजी दुश्मनों ने भी राष्ट्रपति को पत्र लिखकर बर्खास्तगी की मांग की। लेकिन वी०पी० सिंह ने ऐसी किसी भी स्थिति में प्रधानमंत्री पद पर जाने से इन्कार कर दिया।
जैसे तैसे डेढ़ साल बीता तथा 1989 के वर्ष जो एक चुनावी वर्ष था, फिर से मुद्दे उभर आए। नियंत्रक एवम् महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट ने तोपों के चुनाव तथा अन्य कई मुद्दों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। ऐसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने राजीव को बरी कर दिया था। लेकिन बैकी रिपोर्ट को लेकर विपक्षी दलों ने राजीव गांधी को आड़े हाथों ले लिया तथा इस रिपोर्ट को सबूत बनाकर पेश करने लगी। तथा इनके इस्तीफे की मांग करने लगी। इसके बाद तो ये मांग बहुत ही अधिक आक्रामक हो गयी लोकसभा में सामूहिक रूप से सदस्यों इस्तीफे दिए जाने लगे तथा यह कहा गया था कि एक भ्रष्टाचारी सरकार अब नहीं चल सकती वैसे चुनाव बहुत नजदीक था इसलिए इन सांसदों के त्यागपत्र को बहुत बड़े त्याग के रूप में नहीं देखा जा सकता है। अब चुनाव आ चुका था तथा प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारी के 5 वर्ष पूरे करने वाले थे।
राजीव ने कुछ ऐसे संकल्प लिये थे जिनमें आधुनिकीकरण तथा वैज्ञानिकता शामिल है, के लिए प्रशंसा भी की गई लेकिन अपने विचार को बदल लेने की बार-बार की आदत ने उन्हें अपनी माँ तथा नेहरू से थोड़े अलग रूप में देखा। वह भावावेश में आकर बयान दे देते थे।
एक बार तो उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेस में अपने विदेश सचिव को पत्रकारों के सामने ही खूब खरी-खरी सुनायी तथा बर्खास्त कर दिया। ऐसी घटनाओं से उनके बारे में एक पक्ष की धारणा ऐसी बन गयी थी कि वे एक कठोर तथा अनुभवहीन प्रधानमंत्री है।
नवम्बर 1989 में चुनाव की घोषणा कर दी गयी। इस बार कांग्रेस के खिलाफ हवा थी । वी०पी० सिंह एक विकल्प के रूप में उभर चुके थे। 1987 में कांग्रेस से निकाले जाने के बाद वी. पी. सिंह के द्वारा चलाया गया अभियान जनता के मूड को छू गया। भ्रष्टाचार का मुद्दा तो गावं- गांव में पहुंच गया था। खासकर हिन्दी भाषी राज्यों में वी. पी. सिंह ने बहुत मेहनत की तथा व्यापक समर्थन हासिल करने की दहलीज पर खड़े हो गए।
वी.पी. सिंह ने राजीव गांधी को निजी तौर पर न पसंद करने वाले नेताओं को अपने पक्ष में किया जैसे आरिफ मो. हम्मद खान अरूण नेहरू वी. सी. शुक्ला सातपाल मलिक इत्यादि । असंतुष्टों ने 2 अक्टूबर 1987 को 'जन मोर्चा' बनाया।
वी.पी. सिंह ने अपने सिद्धांत को वामपंथी दलों के नजदीक बताया तथा सबसे से भी विनम्र संबंध बनाकर रखा। उनके संबंध आडवाणी जी और अटल जी से काफी व्यक्तिगत थे । वी. पी. सिंह की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा ही थी कि वामपंथ और दक्षिणपंथ साथ आकर वी. पी. सिंह का समर्थन करने लगे। 1998 में इलाहाबाद में उपचुनाव हुए जब से अमिताभ जी ने इस्तीफा देकर राजनीति से सन्यास ले लिया था वहां वी. पी. सिंह खड़े हुए तथा भाजपा ने अपना कोई उम्मीदावार नहीं दिया।
वी.पी. सिंह जीत गए तथा अटल जी के साथ उन्होंने जीत की खुशी में मंच भी साझा किया। उस मंच पर ज्योति बसु भी उपस्थित थे। यह एक बड़ी घटना थी तथा आने वाले समय का एक दृश्य भी।
भाजपा को एक अवसर मिला जिससे अपने अछूत वाले दाग को वह धो सके। राजनीति की मुख्यधारा में उनकी भूमिका बढ़ गयी। 1989 में चुनाव हुए तथा भाजपा को 86 सीटें मिली। 6 अगस्त 1988 को राष्ट्रीय मोर्चा बन गया तथा 11 अक्टूबर 1988 को जनता दल का निर्माण हुआ तथा भाजपा से 85 सीटों पर चुनावी तालमेल तथा अन्य सीटों पर वामपंथी पार्टियों से तालमेल बना।
1989 के चुनाव में राष्ट्रीय मोर्चे को 146 सीटें मिली तथा भाजपा को 86 सीटें मिली तथा बामदलों को 52 सीटें मिली। वामपार्टी तथा भाजपा ने वी. पी. सिंह को समर्थन दे दिया तथा राजीव गांधी की हार हो गई। वी.पी.सिंह प्रधानमंत्री बन गए।
3. राजीव गांधी की विदेश नीति संबंधी कुछ महत्वपूर्ण पहल
राजीव गांधी ने भारतीय विदेश नीति को एक अलग रूप देने के लिए कई गंभीर प्रयास किए तथा यह कहा गया कि वह गुटनिरपेक्षता तथा सार्वभौमिक सहअस्तिव की भावना को साथ में ले चलना चाहते हैं।
1984 में राजीव गांधी ने 6 देशों के शिखर सम्मेलन बुलाने की घोषणा की। उन्होंने निःशस्त्रीकरण के प्रयास को गंभीर रूप से आगे बढ़ाने की कोशिश की तथा तत्कालीन सोवियत संघ के नेता गोर्वाचोव से भी मिले। नवम्बर 1986 गोर्वाचोव ने भारत की यात्रा की तथा एक अहिंसक विश्व की अवधारणा प्रस्तुत की। दिल्ली की यह घोषणा न्छ० तक पहुंच गयी तथा जून 1988 में यह वैश्विक लक्ष्य रखा गया कि 2010 तक विश्व के सभी देशों को नाभिकीय हथियार समाप्त कर देना चाहिए।
राजीव गांधी ने महाशक्तियों के साथ संबंध बेहतर करने का प्रयत्न किया तथा यह कहा कि एक प्रयोगात्कम नीति के तहत वैश्वीकरण उचित है। लोगों ने एक युवा प्रधानमंत्री के तौर पर राजीव गांधी को विपक्षी के निशाने पर रहने वाला अमेरिका के मुक्त व्यापार नीति के सामने झुकने वाला बताया। 1985 में उन्होंने अमेरिका की यात्रा की तथा यह यात्रा सफल रही रीगन ने राजीव गांधी की यह बात मान ली कि मौसम संबंधी आंकड़े देने के लिए अमेरिका भारत को सुपर कम्प्यूटर देगा। वैसे अमेरिका पाकिस्तान का उस समय सबसे अच्छा मित्र होता था।
1988 में राजीव गांधी ने चीन की यात्रा की तथा यह स्वतंत्रता के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की दूसरी यात्रा थी या फिर यह कह ले कि 1962 के विश्वासघात के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। संबंध अच्छे हुए और इतने अच्छे कि एक सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत, चीन में लोकतंत्र की मांग करने वाले छात्रों की जून 1989 को तिएन-ऑन-चौक पर की गई हत्या की आलोचना भी न कर सका। यह एक नयी मित्रता की प्रतिष्ठा कहिए या लोकतंत्र का दुर्भाग्य परंतु भारत अपनी नई मित्रता को किसी कीमत पर बर्बाद नहीं करना चाहता था।
राजीव गांधी की विदेश नीति का सबसे असफल भाग पड़ोसियों के साथ संबंध को लेकर कहा जाता है। राजीव गांधी के काल में बांगलादेश एक प्रकार के इस्लामी संस्कार में उलझ गया था। पानी को लेकर भारत के साथ उनके संबंध ऐसे ही खराब हो गए थे पाकिस्तान की स्थिति भी ठीक नहीं थी । नेपाल के साथ अलग से समस्या उत्पन्न हो गई नेपाल की सरकार ने भारतरीय माल पर भारी टैक्स लगा दिए तथा चीनी सामान पर टैक्स में कटौती कर दी। 1988 में नेपाल-चीन संबंध अपने उफान पर था। 1988 में ही नेपाल को चीन से भारी मात्रा में हथियार भी मिले । नेपाल ने भारतीय निवासियों को परमिट लेकर रहने को कहा जबकि भारत में लाखों नेपाली नागरिक बिना परमिट के रह रहे थे। भारत सरकार ने मार्च में (1989 में) आर्थिक नाकेबंदी कर दी।
सबसे अधिक चर्चा करनी आवश्यक है श्रीलंका, भारत तथा राजीव गांधी की स्थिति यहीं आकर बहुत गलत तरीके से फंस गई। 1983 में हजारों तमिल भागकर श्रीलंका से तमिलनाडु आ गए। तथा जापान में लिट्टे के आधार क्षेत्र में श्रीलंका की सेना ने इन पर काफी दमनात्मक कारवाई आरंभ कर दी। लिट्टे तमिल स्वायत्ता की लड़ाई लड़ रहा था। तमिलनाडु की अधिकांश जनता इन तमिल शरणार्थियों की भावनात्मक मदद कर रही थी क्योंकि भाषा के आधार पर एक प्राकृतिक जुड़ाव था। तमिल जनता की मांग का समर्थन तमिलनाडु की जनता कर रही थी। जाफना पर श्रीलंका सरकार ने नाकेबंदी कर दी तथा दैनिक जरूरतों की चीजें भी जाफना में पहुंचना मुश्किल हो गया तथा भारत ने मछली मारने वाले से सहायता पहुंचाना आरंभ किया जिसका भी श्रीलंका की नौसेना ने विरोध किया तथा रोक लगा दी।
इसके बाद भारत ने मालवाहक हवाई जहाजों से वहां जरूरतों का सामान भेजना आरंभ किया मतलब गिराना आरंभ किया। श्रीलंका ने यहां से सामान जाने की इजाजत दे दी। लेकिन विद्रोह जारी रहा तथा श्रीलंका सरकार ने यह महसूस किया कि भारत की सहायता के बिना इस समस्या से निजात पाना संभव नहीं है। श्रीलंका के राष्ट्रपति जयबर्द्धने तथा राजीव गांधी के बीच बातचीत आरंभ होने शुरू हुई तथा जुलाई 1987 में एक समझौते पर पहुंचा गया। इस समझौते के तहत श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी प्रदेश एक ही प्रदेश का हिस्सा होंगे, अधिकारों का वितरण होगा तथा लिट्टे को भंग कर दिया जाएगा। हथियार जमा करने की एक समय सीमा दी जाएगी। यदि लंका की सरकार आग्रह करती है तो भारतीय सेना सहायता को पहुंचेगी। स्ण्ज्ज्ज्यम् इस समझौते से खुश नहीं था। श्रीलंका सरकार पर उसे एकदम विश्वास नहीं था तथा उसने आत्म समर्पण से इनकार कर दिया। इस बीच अब श्रीलंका के राष्ट्रपति को यह महसूस हुआ कि अब भारत से मदद मांग लेनी चाहिए। फौज की सहायता देने के लिए भारत तैयार हो गया। तमिल नाराज़ थे । जनगणना की स्थानीय परिस्थति के लिट्टे के लिए अनुकूल थी । श्रीलंका की जनता भी भारतीय फौज से बड़े स्तर पर खुश नहीं थी। प्रेमदासा जब राष्ट्रपति बने तो परिस्थति और भी जटिल हो गई तथा भारतीय फौज से देश से चले जाने को कहा। इसी बीच जब राजीव गांधी श्रीलंका की यात्रा कर रहे थे तो 'स्वागत सम्मेलन' में ही एक श्रीलंका के जवान ने उन पर हमला कर दिया। राजीव गांधी चरणबद्ध रूप से सेना को वापस करने पर राजी हो गए। 1989 के मध्य से फौज वापस होने लगी तथा 1989 के आम चुनाव के बाद फौज पूरी तरह वापस आ गयी।
श्रीलंका के इस संकट से भारत को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी तथा राजीव गांधी की मानव बम से हत्या कर दी गई।
राजीव गांधी की चर्चा ळ.15 के लिए भी की जाती है तथा यह उपर्युक्त है कि उनके प्रयास ने ळ.15 को खड़ा किया तथा ळ.7 का इसे विकल्प कहा गया। राजीव गांधी ने अपने 5 वर्ष के कार्यकाल को बहुत ही स्पष्ट तरीके से पेश किया तथा लगभग 62 देशों की यात्रा की । सही तौर पर कहा जाए तो भारत को विश्व पटल पर रखने की क्षमता सही रूप से राजीव गांधी के समय ही भारत की तरफ से उभरी।
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Sun, 01 Oct 2023 07:21:41 +0530 Jaankari Rakho
इंदिरा गांधी युग ( 1966–1984 ) (1971 का युद्ध आपातकाल तथा पंजाब की समस्या) https://m.jaankarirakho.com/393 https://m.jaankarirakho.com/393 इंदिरा गांधी युग ( 1966–1984 ) (1971 का युद्ध आपातकाल तथा पंजाब की समस्या)
1. इंदिरा गांधी युग (1966-1984) (1971 का युद्ध, आपातकाल तथा पंजाब समस्या) 
जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु मई 1964 में होने के बाद कांग्रेस के सामने उनके उत्तराधिकारी को चुनने की बात आयी। कांग्रेस के पास दो महत्वपूर्ण विकल्प थे : ( 1 ) मोरारजी भाई (2) लाल बहादुर शास्त्री | जहां मोरारजी भाई एक कड़े स्वभाव तथा दक्षिणपंथी विचारधारा के पोषक थे वहीं शास्त्री जी बहुत ही इमानदार तथा मृदभाषी स्वभाव के थे। दोनों नेताओं में सिंडिकेट ने (जिसके अध्यक्ष के. नारायाण थे) शास्त्री जी का नाम प्रधानमंत्री के लिए अनुमोदित किया। सिंडिकेट ने शास्त्री जी के उत्तराधिकारी हक को इसलिए आगे बढ़ाया कि उनकी पार्टी में कोई गुटबाजी नहीं थी और दूसरा कि सिंडिकेट उन्हें अपना खतरा नहीं मानता था। उन्हें यह लगता था कि शास्त्री जी का व्यक्तित्व एक उदार व्य.ि क्तत्व है और किसी भी तरह उन्हें प्रेरित किया जा सकता है। इसके अलावा सिंटिकेट को यह भी लगता था कि शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद किसी प्रकार का असंतोष नहीं पनपेगा। देसाई (मोरारजी) भाई को भी शास्त्री से कोई परेशानी नहीं थी। निर्विरोध लाल बहादुर शास्त्री को 2 जून 1964 को प्रधानमंत्री की शपथ दिला दी गई।
शास्त्री जी के प्रधानमंत्री काल में कई समस्याओं का समाधान करना पड़ा। एक तरफ अर्थव्यवस्था काफी व्यथित थी तो सूखे की समस्या विस्तरित थी। खाद्दानों का आपातकालीन भंडार खतरनाक सीमा तक कम हो गया था। समस्याओं से पार पाना आसान नहीं था। जनवरी 1965 में सरकार ने राज्य खाद्द व्यापार निगम का गठन किया । हरित क्रांति की शुरूआत की पर इसका परिणाम एक दो महीने में आना असंभव था।
उपरोक्त समस्याओं से निपटने की रणनीति का विश्वसनीय होना अब सवालों के घेरे में आ गया था तथा शास्त्री जी को कुछ समूहों के द्वारा एक कमजोर प्रधानमंत्री भी कहना आरंभ कर दिया गया था। परंतु धीरे-धीरे शास्त्री जी का व्यक्तित्व सामने आने लगा तथा वह स्वयं स्वायत्त रूप से निर्णय लेने लगे। सिंडिकेट की शिकायत आने लगी कि शास्त्री जी अब सिंडिकेट से कोई सलाह नहीं लेते। अब तो प्रधानमंत्री के रूप में शास्त्री जी वियतनाम पर अमेरिकी कार्यवाही का विरोध आरंभ हुआ शास्त्री जी ही पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने सचिवालय बनाया जो बाद में चलकर पी.एम.ओ. बन गया। शास्त्री जी की व्यक्तिगत मजबूती तथा पूर्ण इच्छा शक्ति के बारे में जनता को भारत-पाक युद्ध के समय पता चला। कश्मीर मुद्दे को लेकर पाकिस्तान भारत को लगातार भड़काने की कोशिश कर रहा था। 1965 में शेख अब्दुल्ला के अनुया. यियों एवम अन्य कश्मीरी नेताओं ने कश्मीर में अशांति पैदा करने की कोशिश की। पाकिस्तान शेख अब्दुल्लाह की नीति को लेकर काफी उत्साह में आ गया तथा अमेरिका से सैन्य उपकरण लगातार मिलने से वह अति आत्मविश्वास में था।
1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद से ही पाकिस्तान भारत को कम आंकने की गलती कर रहा था। पाकिस्तान ने अप्रैल 1965 में कच्छ के रण में एक उकसाने वाली कारवाई की तथा भारत ने शांति के लिए कोई आक्रामक जवाब नहीं दिया। ब्रिटेन के हस्तक्षेप से दोनों देश अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसका समाधान करने पर सहमत हो गए। यह एपिसोड भारत के विरुद्ध गया तथा पाकिस्तान को लगा कि भारत अभी कमजोर है तथा सेना युद्ध के लिए तैयार नहीं है। 
अगस्त 1965 में पाक ने कश्मीर घाटी में घुसपैठियों को भेजना शुरू किया। ये घुसपैठिये प्रशिक्षित थे तथा कश्मीर में भयंकर विद्रोह के लिए भेजे गए थे। भारतीय प्रधानमंत्री को जब यह पता चला तो उन्होंने सेना को यह आदेश दिया कि वह युद्ध विराम रेखा को पार कर जाए तथा उन रास्तों को ध्वस्त कर दे जिनके सहारे घुसपैठिये आकर कारगिल, उटी, हाजीपीर जैसी सामरिक चौकियों पर अपना अधिकार जमाना चाहते थे। इसके साथ ही 1962 से बिल्कुल अलग पूरा देश सरकार के समर्थन में आ गया।
1 सितंबर 1965 को पाकिस्तान ने जब (कश्मीर) सैक्टर पर टैंक से हमला किया तब शास्त्री जी ने सेना को सियालकोट तथा लाहौर तक बढ़ने का आदेश दे दिया। इस प्रकार भारत-पाक एक अघोषित युद्ध में कूद पड़े। चीन ने भारत को आक्रमणकारी घोषित कर दिया तथा धमकी देने लगा। ब्रिटेन और अमेरिका ने मानवीय सहायता देना बंद कर दिया। रूस ने चीन को पाकिस्तान की मदद करने से रोकने की कोशिश की।
सुरक्षा परिषद् की मदद से दोनों देश (25 सितंबर 1965) युद्ध विराम पर आ गए (23 सितंबर 1965) कश्मीर में घुसपैठ को नाकाम कर दिया गया। भारतीय सेना का 1962 में खोया उत्साह फिर से वापस आ गया। भारत राजनीतिक रूप से मजबूत होकर उभरा। शास्त्री जी एक राष्ट्रीय हीरो के रूप में उभरे।
4 जनवरी 1966 को सोवियत संघ के ताशकंद में भारत-पाकिस्तान के बीच सोवियत संघ की मध्यस्थता से बैठक हुई। इसमें पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब खान तथा प्रधानमंत्री (भारत) शास्त्री जी शामिल हुए। ताशकंद घोषण पत्र में दोनों देशों को एक दूसरे की हथियाई जमीन वापस करने को राजी किया गया। भारत के संदर्भ में इसका एक गलत संदेश गया। अब सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हाजी पीर दर्रा से पीछे हटना था जिसके द्वारा पाकिस्तान से उग्रवादी फिर भारत आ सकते थे। शास्त्री जी युद्ध के बदले इसी को पसंद कर पाए । सोवियत संघ का भी समर्थन आवश्यक था। 10 जनवरी 1965 को भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु ताशकंद में ही रहस्मयी हृदयाघात से हो गयी।
लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद एक बार फिर उत्तराधिकार के नाम पर कांग्रेस में एक विवाद खड़ा हो गया। मोरारजी देसाई फिर एक बार मेंदान में थे। देसाई के नाम पर सिंडिकेट अभी भी राजी नहीं था तथा उन्होंने ऐसे उम्मीदवार की खोज आरंभ की जो मोरारजी भाई के सामने स्वीकार्य हो तथा सिंडिकेट के अंदर भी रह सके। सिंडिकेट को ये सारी खूबिया इंदिरा गांधी में नजर आईं तथा इन्होंने इंदिरा जी को सामने कर दिया।
इंदिरा गांधी की अपनी विरासत थी तथा वह नेहरू जी की बेटी थी तथा एक प्रगतिशील सोच की धनी थी। सही इंदिरा किसी भी जाति, धर्म, राज्य या विशेष समूह की प्रतिनिधि नहीं थी। सिंडिकेट इंदिरा जी को इसलिए भी पसंद करता था कि यह एक गैर अनुभवी, युवा, महिला एवम् पार्टी के अंदर कोई अधिक पकड़ नहीं रखती थी। 14 मुख्यमंत्रियों में से 12 मुख्यमंत्रियों ने इंदिरा गांधी जी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अध्यक्ष को पत्र लिखा । इन्हें लग रहा था कि राज्यों में आम विधान सभा के चुनावों में इसका फायदा मिलेगा।
मोरारजी देसाई चुनावी प्रक्रिया के तहत चुनाव कराने पर जोर दे रहे थे। उन्हें यह विश्वास था कि अपनी वास्तिकता से तथा सर्वमान्य से चुनाव वही जीतेंगे। लेकिन इंदिरा जी को एक बच्ची कहना उनके लिए ठीक नहीं हुआ। कांग्रेस संसदीय दल की बैठक हुई तथा 19 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी ने 169 के बदले 323 मतों से मोरारजी भाई को हरा दिया। भारत में एक महिला के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया।
प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी के सामने बहुत सारी समस्याएं थी। आर्थिक स्थिति खराब थी। औद्योगिक उत्पादन कम था। सूखा पड़ा था। नागा और मिजो विवाद चरम पर थे। पंजाब की समस्या तो एक अलग तरह रही थी । आरंभ में तो इंदिरा गांधी की अनुभवहीनता से लगता था कि प्रधानमंत्री पद कैसे संभालेगी। एक साल पहले देश ने एक एक युद्ध भी झेला था।
अकाल से निपटने में इंदिरा गांधी को सफलता मिली तथा खाद्दानों का वितरण अब अधिक होने लगा तथा मानव क्षति में कमी हुई। यह प्रधानमंत्री के रूप में यह इंदिरा गांधी का पहला काम था।
इंदिरा गांधी के द्वारा आर्थिक स्थिति को ठीक करने के परिणाम उल्टा साबित हुए तथा उनके निर्यात को अधिक सफलता मिली। इंदिरा जी ने पैसे के अवमूल्यन का फैसला लिया। इसके पीछे बहुत से कारण थे। इसके पीछे निर्यात की कमी, अमेरिका से चर 480 खाद्य सुरक्षा का अमेरिका का आयात । इसके अलावा विश्व बैंक और अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष से फिर से सहायता लेने की आवश्यकता थी । विश्व बैंक तथा प्डथ् की भी इच्छा थी कि पैसे का अवमूल्यन हो । भारत सरकार ने 6 जून 1966 को रूपये में 35.5 प्रतिशत का अवमूल्यन किया।
अवमूल्यन का भारी विरोध हुआ तथा हर प्रकार के राजनीतिक विचार रखने वालों ने इस कदम का विरोध किया। वामपंथी दलों ने इसका विरोध किया। बुद्धिजीवियों ने इसका विरोध किया। सिंडिकेट (वामदल) ने इस पर कड़ी प्रतिक्रया व्यक्त की तथा कहा कि हमसे कोई सलाह नहीं ली गई। सरकार पर भी व्यापक असंतोष था तथा कहा गया कि सरकार विदेशी शक्तियों के प्रभाव में आ गयी।
अक्टूबर तक कोई बड़ा नतीजा सामने नहीं आया तथा यह कहा जा सकता है कि खाद्द पदार्थ तथा विदेशी सहायता के मामले में कोई विशेष सकारात्मकता नहीं दिखायी दी। इधर अमेरिका से आने वाले खाद्द पदार्थ भी वादे से कम आने लगे। अमेरिका वियतनाम के मुद्दे पर भारत की नीति बदलने का दबाव डालने लगा।
इंदिरा गांधी वियतनाम के मामले पर अमेरिका का खुला विरोध करने लगी तथा सोवियत संघ के साथ उन्होंने संयुक्त सहमति की। तत्काल दोनों देशों के द्वारा अमेरिका की कारवाई को “ साम्राज्यवाद आक्रमण" कहा गया। इंदिरा गांधी ने अब पूरी तरह से 'गुटनिरपेक्षता' की नीति पालन करने पर जोर दिया। इन्होंने मिस्र के नासिर तथा टीटो के साथ निकट के संबंध बनाए तथा राजनीतिक तथा अधिक सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया तथा नव उपनिवेशवाद का विरोध करना अब प्राथमिकताओं में शामिल हो गया। इसके अलावा सोवियत संघ के साथ मित्रता बढ़ाने पर भी इन्होंने काफी जोर दिया तथा चीन के साथ बातचीत आरंभ करने की कोशिश की।
जिस समय इंदिरा जी प्रधानमंत्री बनीं, देश में अब आंदोलन, हड़ताल, धरना अधिक देखने को मिल रहे थे। सरकारी कर्मचारियों की अपनी अलग समस्याएं थी | बहुत सारे लोग अपनी इच्छाओं के कारण विरोध कह रहे थे। कई जगह ये विरोध तथा आंदोलन हिंसक हो गए। कई जगह तो स्थिति नियंत्रण के लिए सेना को बुलाना पड़ा। प्रशासन एवम सत्ताधारी राजनीतिक नेतृत्व में जनता का विश्वास घटता ही जा रहा था।
जनसंघ जैसे विपक्षी दल तथा वामपंथी दल ऐसे आंदोलन के कारण मजबूत हो रहे थे। उन्होंने बंद, हड़ताल तथा अन्य प्रकार के आंदोलन का अधिक समर्थन किया जनसंघ ने अपनी विचारधारा को प्रचारित करने की भी कोशिश की। जनसंघ ने गौहत्या के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चलाने का फैसला किया तथा सरकार के विरोध में उग्र हो चला था। 7 नवंबर 1966 को हजारों नागा साधुओं ने तलवार, भाला, त्रिशूल लिए संसद भवन में प्रवेश करने की कोशिश की। उन्होंने कामराज के घर को घेर लिया। एक पुलिस कर्मी और 6 साधु मारे गए। गृहमंत्री गुलजारी नंदा से श्रीमति गांधी ने त्यागपत्र मांगा। यह एक क्षणिक विरोध था।
श्रीमति गांधी को कई बार संसद में भी व्यक्तिगत विरोध का सामना करना पड़ता था। उन्हें लैटिन की "गुंगी गुड़िया " कहते थे। पार्टी के अंदर तो श्रीमति गांधी की स्थिति एक लाचार व्यक्ति की थी। प्रधानमंत्री के बाद उन्हें महत्वपूर्ण विभ ागों पर भी कोई परिवर्तन करने का मौका नहीं मिला था। सिंडिकेट प्रधानमंत्री को एक सीमा में बांध कर रखना चाहता था। इंदिरा गांधी 1967 के कारण कुछ बोल नहीं पाती थी। उन्हें यह लगता था कि चुनाव वर्ष में जनता के सामने कोई असंतोष पर कलह की बात अभी तक जानी चहिए। ऊपर से उनमें कोई अपनी प्रभावशीलता नहीं थी।
1967 के आमचुनाव हुए। विधान सभाओं के भी चुनाव साथ में हुए । चुनाव परिणाम कांग्रेस की उम्मीद के अनुसार नहीं आए। बड़े पैमाने पर कांग्रेस को वोट मिले पर तुलनात्मक रूप से 1961 से बहुत कम मिले। कई राज्यों में तो गठबंधन की ओर कांग्रेस को कदम बढ़ाने पड़े । यह परिणाम कांग्रेस के अंदर की गुटबाजी तथा कलह का भी एक नतीजा था।
1967 के चुनाव के नतीजों ने जनसंघ, समाजवादी, स्वतंत्र पार्टी को साथ आने का अवसर मिला। उधर दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडू में सी. बी. एम. तथा मुस्लिम लीग ने हाथ मिलाया। पंजाब में तो जनसंघ अकाली और सी.बी. एस. भी साथ में थे
कांग्रेस को 520 में से 284 सीटें हासिल हुई तथा कांग्रेस ने 8 राज्यों में अपना बहुमत खो दिया। कांग्रेस के लिए लोगों का मोह भंग होना राजनीति को एक नयी दिशा देने वाला साबित हुआ। इस चुनाव में गठबंधन सरकारों तथा दलबदल की राजनीति का आरंभ हुआ। सबसे बड़ी बात थी कि कांग्रेस के विकल्प में छोटी-छोटी पार्टियों को सामने देखा गया। पंजाब, बिहार, और उत्तर प्रदेश में विलय की सरकारों का आना एक अहम प्रक्रिया थी 1967 के आम चुनावों से 1970 के अंत तक बिहार में सात सरकारें, उत्तर प्रदेश में चार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पंजाब और बंगाल में तीन-तीन और केरल दल में दो सरकारे बदली। इस दौरान सात राज्यों में राष्ट्रपति शासन के आठ दौर आए। नई सकारों के गठन और पुरानी सरकारों को गिराने के खेल में छोटी पार्टियों और निर्दलीय की भूमिका बहुत बड़ी हो गयी ।
अब ऐसा समय आ गया जब राजनीतिक पाटियों तथा विभिन्न अखबारों ने कांग्रेस के अंत की शुरूआत को एक मुद्दा बताया। परंतु यह सही नहीं था। कांग्रेस को अभी भी बहुमत प्राप्त था कोई मजबूत विपक्ष बड़े स्तर पर अभी भी नहीं था। राज्यों में भी अल्पमत के बावजूद भी वह सबसे बड़ी पार्टी थी।
1967 के चुनावों में सिंडिकेट की स्थिति खराब हो गयी । के. कामराज स्वयं हार गए । केन्द्र सरकार के गठन में इनकी स्थिति अब 1961-66 वाली नहीं रही। इंदिरा गांधी इस घटनाक्रम से मजबूत ही हुई तथा कांग्रेस संसदीय दल में उनका वर्चस्व हो गया। मोरारजी भाई भी अब उतने बड़े प्रतिद्वंदी नहीं रह गए थे । इंदिरा गांधी के सामने उन्होंने उप-प्रधानमंत्री पद पाने की मांग की तथा इंदिरा गांधी ने भी उनका समर्थन किया। लेकिन यह पद सिर्फ कहने के लिए था क्योकि वित्त मंत्री के अलावा उनके पास कोई भी अधिकार नही दिया गया था। 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया तथा इसी साल चार राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति खराब हो गयी। 1969 के बाद स्थिति बदल गयी थी। 1969 में ही इंदिरा गांधी को पद से हटा देने के लिए कई साजिशें की गई। सिंडिकेट इन पर दबाव लगा तथा मई 1969 में राष्ट्रपति ( जाकिर हुसैन) की मृत्यु के बाद जो नीलम संजीव रेड्डी तथा वि.वी. गिरी एपिसोड हुआ उसकी चर्चा हम पहले ही कर चुके है। अब इंदिरा जी की पार्टी 'कांग्रेस आर' हो गई तथा सिंडिकेट की 'कांग्रेस ओ'। इंदिरा गांधी अब कांग्रेस आर की स्वतंत्र तथा सबसे निर्विघ्न नेता चुन ली गई तथा उन्हें टक्कर देने वाला कोई नहीं रहा। अब कांग्रेस आर ही असली कांग्रेस बन गयी थी।
देश 1970 के अंत में आम चुनाव के लिए फिर से तैयार हो गया। इस चुनाव में कई ऐसी पार्टियां ने गठबंधन किया जो पूर्वनियोजित नहीं लगे थे। जैसे- कांग्रेस (ओ.) जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर एक गठबंधन बनाया जिसे ष्टळतंदक | ससपंदबमष्ठ कहा गया। इनके पास कोई एक विचार धारा या एजेण्डा नहीं था। किन्तु इनके पास एक ही एजेण्डा था :- "इंदिरा हटाओ " ।
इंदिरा गांधी को व्यक्तिगत प्रचार से अधिक ज्वलंत मुद्दों पर ध्यान देना था। इन्होंने अपने प्रचार करने के विषयों से संबंधित रखा। सामाजिक परिवर्तन, जनवाद, धर्म निरपेक्षता तथा समाजवाद जैसे मुद्दों को आगे कर उन्होंने प्रचार यात्रा आरंभ की। अधिकतर प्रचारों में उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र का विकास, ग्रामीण भूमि और शहरी संपत्तियों संबंधी हदबंदी लागू की जाने तथा गरीबी हटाओ जैसे नारों के साथ सामाजिक विषमता उन्मूलन की भी चर्चा की। उन्होंने जनसंघ को साम्प्रादायिक तथा वामपंथ को हिंसावादी बताकर जनता को अपने तरफ करने का प्रयास किया। उन्होंने गरीबों, मध्यमवर्गो तथा युवकों को संबोधित करने का प्रयास किया। इसके अलावा निजी क्षेत्रों को अर्थव्यवस्था में जगह देने की घोषणा की।
चुनावी परिणाम इंदिरा जी के पक्ष में आया तथा 518 सीटों में से 352 स्थान से उनकी पार्टी कांग्रेस (आर.) को जीत मिली। ग्रैंड एलायंस तथा दक्षिण पंथ को करारी हार का सामना करना पड़ा। अब कांग्रेस पार्टी फिर से भारतीय संसदीय तंत्र की एक वर्चस्ववादी पार्टी बन गई।
इंदिरा गांधी को अब वो जनादेश मिल गया था जिनकी इच्छा वो कर रही थी । इंदिरा जी अब कांग्रेस की सर्वोच्च नेता तथा स्वीकार्य रूप से शक्तिशाली प्रधानमंत्री बन गयी थी। उन्होंने जो वादा किया वो विशाल था तथा अब उन्हें वही हरा सकता था जो स्वयं इंदिरा थी।
2. 1971 का युद्ध (बंगलादेश)
1971 के आम चुनाव में विशाल जीत मिलने के बाद इंदिरा गांधी के सामने अपने वादों की पोटरी खोलने तथा उसे निभाने की चुनौती भी सामने थी। इंदिरा गांधी अपनी विभिन्न योजनाओं को मूर्त रूप दे रहीं थी तब पूर्वी पाकिस्तान यानी (अब की बंगलादेश) में एक राजनैतिक संकट खड़ा हो गया। भारत को अपनी सुरक्षा के कारण इस परिस्थिति में हस्तक्षेप करना पड़ा तथा भारत पाक युद्ध आरंभ हो गया।
पाकिस्तान का निर्माण धर्म के आधार पर क्षणिक आवेश में कर लिया गया था परंतु अलग-अलग संस्कृतियों को धर्म के आधार पर एक रूप में ही संयुक्त कर देना असंभव था। पश्चिमी - पाकिस्तान की संस्कृति पूर्वी पाकिस्तान की संस्कृति से बिल्कुल अलग थी। एक पंजाबी भाषा तथा दूसरी तरफ बंगाली बोलने वाले लोगों के बीच बिना कोई भौगो. लिक जुड़ाव के एक साथ रखना सिर्फ धर्म के ही वश की बात नहीं थी। पश्चिमी पाकिस्तान के लोग पाकिस्तान की राजनीतिक, प्रशासनिक, सामरिक, आर्थिक प्रशासन पर कब्जा किए हुए थे तथा पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को दोयम दर्जे का अधिकार मिला हुआ था। अतः पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की स्थिति दयनीय थी। धीरे-धीरे अपनी स्वायतत्ता की मांग के लिए उन्होंने कई प्रयास किए तथा एक शक्तिशाली आंदोलन विकसित होने लगा। पूर्वी पाकिस्तान के आंदोलन को पश्चिमी पाकिस्तानी शक्ति ने समझौते के टेबल पर लाकर कुचलने की कोशिश की तथा इसी कदम ने पूर्वी पाकिस्तान में आजादी के आंदोलन की रूप रेखा बना दी।
दिसंबर 1970 में पाकिस्तान में सैनिक शासन था। तानाशाह जनरल याह्या खान ने स्वतंत्र चुनाव करवाए। इस चुनाव में पूर्वी पाकिस्तान में मुजीवुर रहमान की आवामी पार्टी को पूर्वी पाकिस्तान की 99 प्रतिशत सीटें मिल गई। पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली में उनको बहुमत प्राप्त हो गया।
लेकिन पाकिस्तान के सैनिक तानाशाह ने शेख मुजिबुर रहमान को सरकार नहीं बनाने दी तथा जुल्फीकार अली भुट्टो को अपना समर्थन दिया शेख मुजीबुर रहमान ने इसका विरोध सविनय अवज्ञा आंदोलन देकर किया तब 25 मार्च 1971 को याहया खान ने सैनिक कारवाई का आदेश दे दिया। मुजिबुर रहमान को गिरफ्तार कर पश्चिमी पाकिस्तान में कही अज्ञात स्थान पर बंद कर दिया गया। पश्चिमी पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में आतंक राज आरंभ कर दिया तथा कहीं किसी भी पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों का दमन करने लगी। पूर्वी पाकिस्तान के अर्द्धसैनिक बल तथा पुलिस ने अपनी पहली प्रतिक्रिया दी। आवामी लीग के कुछ गिने-चुने नेता जो कलकत्ता में यात्रा कर रहे थे उन्होंने मुक्तिवाहिनी संगठन की शुरूआत की तथा निर्वासित बांग्लादेश सरकार का गठन किया।
पाकिस्तान सेना ने पूर्वी पाकिस्तान यानी पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं पर दमन आरंभ किया। इसके अलावा इसाइयों, तथा बौद्धों को भी पश्चिम बंगाल, आसाम, मेघालय में शरण लेने के लिए बाध्य होना पड़ा। नवंबर 1971 तक पूर्वी बंगाल से आए शरणार्थी की संख्या 1 करोड़ तक पहुंच चुकी थी। इंदिरा गांधी के पास युद्ध के अलावा कोई विकल्प नहीं था। परंतु इतने घटनाक्रम घट जाने के बाद भी कोई आक्रामक बयान नहीं दे रही थी तथा सभी मुद्दों को गौर से देख रही थी। वह पाकिस्तान के पाले में कोई अवसर ऐसा नहीं देना चाहती थीं जिससे कि पाकिस्तान वैश्विक समुदाय को यह कहे कि आजादी के लिए आंदोलन नहीं वरण भारत की एक साजिश हैं। वह कुछ ऐसा नहीं करना चाहती थी जो भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी कानून को न पालन करने का आरोप लगे। युद्ध के लिए तैयारी भी आवश्यक थी तथा भारत में वर्षा ऋतु के समय संचार की गतिविधियों में कमी हो जाती हैं। सर्दियों में चीन को पाकिस्तान की मदद करने में परेशानी होती। इसके अलावा मुक्तिवाहिनी संगठन को तैयारी करने का मौका भी मिल जाता।
इंदिरा गांधी हर कदम ठंडे दिमाग से रख रही थी। उन्होंने यह महसूस किया कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की स्वीकार्यता को पहले बढ़ाया जाए तथा शरणार्थियों की समस्या को भी सुलझाने की योग्यता हो क्योंकि इसमें भारत के आर्थिक और राजनीतिक स्थायित्व पर बोझ बन सकता था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शरणार्थियों को बिना किसी देरी के भारत से चले जाना चाहिए लेकिन पूर्वी पाकिस्तान को प्रशासनिक दिक्कतें थी। शरणार्थी उसी समय लौट सकते थे जब पूर्वी पाकिस्तान में शांति व्यवस्था कायम हो । 
इंदिरा गांधी की सरकार ने बांग्लादेश की निर्वासित सरकार को प्रश्रय दिया तथा मुक्तिवाहिनी संगठन को प्रशिक्षण देना आरंभ किया। इसके अलावा शरणार्थियों को भी भोजन, वस्त्र, आवास चिकित्सा देने की व्यवस्था की गई। भारत के इस कदम का पश्चिमी देशों का भारी समर्थन मिला तथा बाद में उधर की सरकारें भी समर्थन देने लगी। अमेरिका और चीन अभी भी पाकिस्तान के पक्ष में थे। अमेरिका पाकिस्तान को लगातार हथियार मुहैया करवा रहा था। चीन भी पाकिस्तान को भारी मदद कर रहा था।
9 अगस्त 1971 को भारत- सोवियत संघ के बीच एक सामरिक संधि हुई जिसे 20 साल के लिए हस्ताक्षरित किया गया। इस संधि में यह कहा गया था कि किसी देश में सैनिक खतरें के उपस्थित होने पर तत्काल ही आपसी सलाह मशविरा तथा यथोचित कारवाई करने के लिए सहयोग किया जाएगा। भारत का मनोबल काफी बढ़ गया।
इंदिरा गांधी यह मानकर चल रही थी कि बांगलादेश के मुद्दे और शरणार्थियों की समस्या पर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध अवश्य होगा। सेना तैयार थी तथा 4 दिसंबर को बांग्लादेश की मुक्ति के लिए सीधी कारवाई करने की योजना बन गयी थी पर यह काम तो पहले पाकिस्तान के शासक याहिया खान ने ही शुरू कर दिया। याहिया खान को लगा कि पहले हमला कर लाभ मिल जाएगा। 3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान वायुसेना ने पश्चिमी भारत के 8 सैनिक हवाई अड्डों पर हमला कर दिया। वे उम्मीद कर रहे थे कि भारतीय वायु सेना को संभलने का अवसर नहीं मिलेगा। इसके अलावा पाकिस्तान का यह उद्देश्य भी था कि यह समस्या अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की हो जाएगी। परंतु पाकिस्तान के दोनों उद्देश्य असफल रहे। भारतीय वायुसेना पहले से ही चौकन्नी थी।
भारत ने बांगलादेश को मान्यता देकर कठोर सैनिक जवाब देना आरंभ किया। भारत पाकिस्तान को पश्चिमी सैक्टर में उलझा कर रखना चाहता था तथा पूर्व में तेजी से पाकिस्तानी सेना को आत्म समर्पण करवाना चाहता था।
भारतीया सेना जनरल जे. एस. अरोड़ा के विलक्षण नेतृत्व में मुक्तिवाहिनी के साथ मिलकर पूर्वी बंगाल की राजधानी ढाका में 11 दिन ही कुच कर गयी तथा पाकिस्तानी आर्मी छावनी को घेर लिया। अमेरिका ने पाकिस्तान के पक्ष में हस्तक्षेप की कोशिश की। भारत को आक्रमणकारी देश घोषित कर दिया तथा सभी आर्थिक मदद बंद कर दी। परंतु में युद्ध विराम के प्रस्ताव को सोवियत संघ के द्वारा वीटो कर दिया गया। ब्रिटेन और फ्रांस ने भी मतदान नहीं किया। चीन सिर्फ जुबानी निंदा करते रहा। अमेरिका राष्ट्रपति निक्सन ने अपने सातवें बेडे को यूज करने का आदेश दिया तथा वायुयान वाहक यू.एस. एस एंटरप्राइज को नेतृत्व करने भेजा। भारत पर दबाव डालने को पाकिस्तान के तरफ से बंगाल की खाड़ी में रवाना किया गया। ताकि ढाका के पतन को थोड़ा टाला जा सके। परंतु इंदिरा गांधी ने इस दबाव को नजर अंदाज कर दिया तथा जनरल मानेक शॉ को यह कहा कि सैनिक गतिविधि नहीं रोकना चाहिए। 13 दिसंबर को भारतीय सेनाओं ने ढाका को चारों तरफ से घेर लिया तथा पराजित हुए 93000 पाकिस्तानी सैनिकों को 16 दिसंबर 1971 को आत्म समर्पण करने को मजबूर कर दिया।
17 दिसंबर को भारत सरकार ने पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध विराम की घोषणा कर दी। यह वैश्विक समुदाय के सामने न्याय प्रिय दिखने के लिए एक स्वाभाविक प्रयास था। दूसरी तरफ युद्ध की आग को भारत भी स्वाभाविक रूप से पसंद नहीं करता था।
पूर्व में सेना को हीरो बताया गया तथा पश्चिमी छोर पर भी सेना की प्रशंसा हुई। पाकिस्तान ने तुरंत युद्ध विराम को सहज स्वीकार कर लिया तथा मुजीबुर्ररहमान को रिहा कर दिया गया जो 12 जनवरी 1972 को सत्तारूढ़ हुए। भारत अब दक्षिण एशिया की सर्वोच्च शक्ति बन गया। भारत की 1962 में जो प्रतिष्ठा कम हुई थी वह लौट गयी। भारत ने न केवल अपने एक मुश्किल पड़ोसी को पराजित किया बल्कि अपनी विदेश नीति की ठसक को विश्व समुदाय के सामने प्रस्तुत भी किया। पाकिस्तान की नैतिकता तथा जिला का द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत अब फेल हो चुका था। अब भारत के मुसलमानों को यह एहसास हो चुका था कि पाकिस्तान ने पूर्वी बंगाल के लोगों के साथ कैसा बर्ताव किया था।
इंदिरा गांधी की लोकप्रियता इस युद्ध के बाद उच्चतम हो गई। उनकी नेतृत्व शक्ति अब सहर्ष स्वीकार हो गयी । भारत की जनता ने उन्हें एक शक्ति के रूप में देखा तथा संसद में विपक्षी पार्टी के नेताओं ने खासकर अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने दलीय सीमा से उठकर उनकी प्रशंसा की। भारत में जनरल मानेक शॉ को भी हीरो बना दिया गया। उन्हें फील्ड मार्शल (प्रथम) बना दिया गया।
युद्ध समाप्त हो गया तथा अभी भी पाकिस्तान के 90,000 युद्ध बंदी भारत के कब्जे में थे। पाकिस्तानी भू-भाग का 9,000 वर्ग कि.मी भी हमारे ही कब्जे में था। इंदिरा गांधी ने भारत पाक के बीच इन्हीं सब मुद्दों के लिए समझौता के स्तर तक जाना चाहती थी। पाकिस्तान ने अभी तक बांग्लादेश को एक देश के रूप में मान्यता भी नहीं दी थी। इंदिरा गांधी पाकिस्तान को कोई भी अवसर नहीं देना चाहती थी जो इस महाद्वीप की समस्याओं का अंतर्राष्ट्रीयकरण कर सके। इसी के उद्देश्य से जून 1972 में पाकिस्त के नये प्रधानमंत्री जुल्फीकार भुट्टो तथा इंदिराजी के बीच शिमला में एक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। शिमला में दोनों पक्षों ने काफी - रस्साकसी के बाद एक समझौते पर हस्ताक्षर किया जो शिमला समझौता के तौर पर जाना जाता है। इस समझौते के अनुसार भारत पाक की हथियाई गई धरती को वापस करने पर राजी हो गया। बदले में पाकिस्तान कश्मीर में नियंत्रण रेखा का आदर करने पर राजी हो गया। दोनों पक्षों ने आपसी बातचीत कर समस्या के समाधान की बात कही तथा बिना मध्यस्थता के सभी मसले सुलझाने की भी हामी भरी।
इसके अलावा भारत पाक युद्ध बंदियों को छोड़ने पर भी राजी हो गया। परंतु भारत ने इसे पाकिस्तान-बंग्लादेश समझौता के तहत करना प्रारंभ किया। पाकिस्तान को अपने 90,000 सैनिकों के बदले बांग्लादेश को अगस्त 1973 में मान्यता देनी पड़ी।
भारत अपनी स्वतंत्रता के 25वें साल में सहस्त्र रूप से एक क्षेत्रीय शक्ति बनने की दहलीज पर खड़ा था। भारतीय लोकतंत्र सफल था तथा देश में दो-तिहाई बहुमत की सरकार कार्य कर रही थी।
अब कांग्रेस के पास एक ही लक्ष्य था कि इंदिरा गांधी के नेतृत्व में सभी राज्यों में सरकार की नीतियां पहुंचे। इसलिए मार्च 1972 में उत्तर प्रदेश, तमिलनाडू केरल तथा उड़ीसा को छोड़कर देश के सभी राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव कराए गए तथा सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनी। इन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें इंदिरा गांधी के ही इच्छा के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में ही बनी।
इंदिरा गांधी ने कुछ ऐसे नीतिगत कार्य करना आरंभ किया जो भविष्य के लिए निर्णायक होता । बीमा को राष्ट्रीयकारण करना, कोयला उद्योग को राष्ट्रीयकृत करना तथा शहरी भूमि स्वामित्व पर हदबंदी लागू कर देना इत्यादि । इसके अलावा सरकार ने दो महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन कराए 1971 में 24वें संवैधानिक संशोधन लाए गए जो संसद को मौलिक अधिकार के मामले में संशोधन के अधिकार से संबंधित थे | 25वें संशोधन में संसद को यह अधिकर दिया गया कि वह भविष्य के उद्देश्यों से किसी भी निजी संपत्ति का अधिग्रहण करने के मामले में मुआवजे की रकम को उसकी अदायगी के तरीकों का निर्णय करने का अधिकारी है। अब सुप्रीम कोर्ट यह नहीं कह सकता था कि मुआवजा कितना होना चाहिए।
18 मई 1974 को भारत ने पोखरण में परमाणु विस्फोट किया। परंतु यह घोषणा की गई कि हमने अपनी क्षमता दिखायी है पर हम बनाने नहीं जा रहे । हमारा उद्देश्य आक्रामक नहीं शांतिपूर्ण है। यह भारत को तकनीक के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का एक रास्ता है। भारत को सामरिक रूप से आत्म निर्भर बनाने का एक रास्ता है।
3. आपातकाल
1971 के बंग्लादेश प्रकरण के बाद इंदिरा गांधी की क्षमता को स्वीकार कर लिया गया था। उन्हें भरपूर लोकप्रियता भी मिली तथा उन्हें राज्यों में बहुमत मिला पर 1973 आते ही सब गलत होने लगा। उनकी निरंकुश शैली अब चर्चा में आने लगी। उनकी लोकप्रियता घटले लगी। इस लोकप्रियता के घटने के पीछे का कारण तात्कालिक आर्थिक परिस्थि, तियों में गिरावट को माना जा सकता है।
युद्ध के बाद की यह समस्याएं एक साथ सामने नजर आने लगी। इनमें प्रमुख थे:- आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, महंगाई तथा खाद्द पदार्थों की कमी। खाद्द वस्तुओं की महंगाई तो चरम पर पहुंच गई। खाद्द तेल की महंगाई तो इतनी बढ़ गई कि गाँव में लोग यह नारा देने लगे “देखो - देखो इंदिरा का खेल 16 रूपये सरसों का तेल "। अधिक दिक्कत शरणार्थियों के कारण हुई जिसने भारतीय संसाधन को समेंट लिया । हमारा विदेशी मुद्र भंडार खाली हो गया था तथा देश में भयंकर सूखा पड़ गया। 1973 में कच्चे तेल की कीमत बढ़ गयी तथा इसका प्रभाव देश में डीजल, पेट्रोल की कीमतों पर भी पड़ा। अब हड़तालों का सिलसिला जारी हुआ तथा 1974 में रेलवे की हड़ताल 22 दिनों तक चली। मजदूर पक्ष भी काफी निराश हो गया। उपर से भ्रष्टाचार की बढ़ोतरी अधिक हो गई। इंदिरा जी पर भी छींटे पड़ना आरंभ हुई जब संजय गांधी की बेतरतीब-लाइसेंस मारूति उद्योग के लिए दिए जाने लगे। अब गरीब, धनी पूँजीपति, विपक्ष सभी तबकों के मन में भारी असंतोष भर रहा था।
विपक्ष के पास अब एक विकल्प था कि किन किन असंतोषों को अपने पक्ष में कैसे प्रासंगिक बनाया जाए। विपक्ष के पास कांग्रेस विरोध के रूप में एक बड़े संगठन को एक करने का हथियार था। अब वे एक हो रहे थे तथा अपनी आपसी उलझनों तथा खींचतान को “कांग्रेस-इंदिरा विरोध" के नाम पर तिलांजनी देने के लिए तैयार थे।
इसी बीच 1974 जनवरी में गुजरात में महंगाई के विरोध में भारी-आंदोलन फूट पड़ा। हड़ताल, दंगे, आगजनी की घटनाएं घटने लगी तथा विपक्ष भी इसका समर्थन करने लगा। पुलिस ने गोली चलाकर तथा हिंसा का सहारा लेकर इसकी संगठित इकाई को तोड़ने का प्रयास किया। इंदिरा गांधी ने गुजरात में राष्ट्रपति शासन लगाने की राष्ट्रपति से सिफारिश की तथा विधानसभा को निलंबित कर दिया गया। मार्च 1975 में मोरारजी भाई ने भूख हड़ताल शुरू कर दी तथा उसके बाद इंदिरा गांधी ने विधानसभा भंग करवाकर वहां जून में चुनाव करने की घोषणा कर दी।
इधर मार्च 1974 में बिहार में भी छात्र आंदोलन आरंभ हो गया। 18 मार्च 1974 को छात्रों ने विधानसभा का घेराव किया तथा पुलिस के साथ मुठभेड़ में 6 दिनों के अंदर 27 लोगों की मृत्यू हो गई। इसके बाद सभी विपक्षी दलों ने छात्रों का समर्थन करते हुए इस आंदोलन में कूदने की घोषणा कर दी।
जय प्रकाश बाबु राजनीति से संन्यास ले चुके थे परंतु उन्होंने अपने फैसले को त्याग कर इस आंदोलन का नेतृत्व करने की घोषणा कर दी।
जे. पी. ने ‘संपूर्ण-क्रांति' का नारा दिया तथा इस क्रांति लक्ष्य को व्यवस्था कि विरुद्ध संघर्ष बताया जिसने हरेक तंत्र तथा व्यक्ति को भ्रष्ट हो जाने पर मजबूर कर दिया था। जे.पी. ने सरकार से यानी इंदिरा गांधी से यह मांग की कि तुरंत विधान सभा भंग की जाए तथा छात्रों को कहा कि सभी विधायकों को त्यागपत्र देने के लिए बाध्य किया जाए। सरकार को ठप कर दिया जाए, सरकारी कार्यालयों का घेराव कर दें तथा विधानसभा को चलने न दें। समानांतर जन सरकार का आह्वान उन्होंने किया कोई 'कर' न देने की अपील भी उन्होंने की। इंदिरा जी विधानसभा भंग करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थी।
जे.पी. ने पूरे देश में भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन को संगठित करने का निर्णय किया तथा इंदिरा गांधी को जनता की नजर में एक निरंकुश तथा भ्रष्टाचार को प्रश्रय देने वाली प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने में वह सफल रहे। जे.पी. अब हिन्दी भाषी राज्यों में लोगों को संगठित करने लगे तथा छात्रों, मध्यवर्ग, व्यापारियों तथा बुद्धिजीवियों को व्यापक तौर पर संगठित भी कर लिया। गैर वामपंथी दलों के सभी संगठनों ने एक साथ होकर जे. पी को नेता मान लिया।
इंदिरा गांधी ने जे.पी. पर अराजकता फैलाने का आरोप लगाया तथा उन्हें 1976 के आम चुनाव में लोकप्रियता आंकने की चुनौति दी। जे.पी. ने इस चुनौति को स्वीकार कर सहयोग देने वाली समिति का ऐलान कर दिया। अब लोगों की इच्छा 1976 के आम चुनाव में दो-दो हाथ करने की ही रह गई थी।
इसी बीच एक अहम घटनाक्रम हुआ। 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के द्वारा दिए गए एक फैसले ने राजनीति को दूसरा ही रूप दे दिया। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले में 'राजनारायण' द्वारा दी गई चुनाव याचिका को स्वीकार करते हुब श्रीमति गांधी को भ्रष्ट चुनाव आचरण में लिप्त होने का दोषी पाया गया। श्रीमति गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करने का फैसला सुनाया गया। अब अगले 6 वर्षों तक इंदिरा जी न कोई पद ले सकती थी और न कोई चुनाव लड़ सकती थी। अब उनका प्रधानमंत्री बने रहना संभव नहीं रह गया था।
इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया तथा सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करने की बात की। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी अपील पर 14 जुलाई 1974 को सुनवाई के लिए तारीख भी दे दी थी। इसी बीच 24 जून को एक सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशकालीन न्यायमूर्ति ने यह फैसला देकर एक भ्रम पैदा कर दिया कि “सप्रीम कोर्ट के फैसले आने तक श्रीमति गांधी पद पर बनी रह सकती हैं, संसद में भाषण भी दे सकती हैं परंतु मत का प्रयोग नहीं कर सकती।”
इधर गुजरात विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई तथा विपक्षी 'जनता मोर्चा' 87 स्थान प्राप्त कर चुनाव जीत गया। अब विपक्षी पार्टियां फिर से सक्रिय हो गई तथा सब मिलकर औपचारिक रूप से इंदिरा गांधी को त्यागपत्र देने के लिए दबाब बनाने लगे। 25 जून 1974 को दिल्ली में रामलीला में विपक्षी पार्टियों की एक महारैली आयोजित की गई तथा यह कहा गया कि 29 जून को व्यापक स्तर पर राष्ट्र व्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया जाएगा। इसमें जे.पी. ने यह आह्वाहन किया कि सरकारी कार्यों के चलना असंभव बना दे तथा शस्त्र सेना, पुलिस, सरकारी अधिकारी से अपील की कि वे किसी भी सरकारी आदेश को न माने तथा इन आदेशों को गैर-कानूनी कहें। श्रीमति गांधी ने इस रैली के बाद रात 12 बजे 26 जून आते ही आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी ।
इंदिरा गांधी ने आपात काल लागू करने के अपने फैसले को देश की आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक व्यवस्था तथा लोकतांत्रिक अखण्डता के स्थायित्व के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने आपातकाल लागू कराने को मजबूर करने के लिए जे.पी. वाले विपक्षी नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया तथा उन्होंने यह कहा कि सशस्त्र बल और पुलिस बल को विद्रोह करने के लिए उकसाया जा रहा था। इसके अलावा गरीबों के तीव्र आर्थिक विकास करने का भी हवाला दिया।
इंदिरा गांधी अपने परिवार की महान लोकतांत्रिक विरासत को अपातकाल लगाकर दांव पर दे चुकी थी। उनके पास जल्द से जल्द बरसात के बाद चुनाव करवाने का विकल्प था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। धारा-352 को देश में लगाने की कोई सोच भी नहीं सकता था। अपातकाल लगते ही संघीय प्रावधानों को बर्खास्त कर दिया गया। सरकार ने प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी तथा सरकार के सभी विरोधियों पर पाबंदी लगा दी। 26 जून को सुबह-सुबह विपक्ष के सैकड़ों प्रमुख नेताओं को आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन कानून (डौ ।) के तहत बंदी बना लिया गया। गिरफ्तार किए गए लोगों में जय प्रकाश नारायण, अटल बिहारी बाजपेयी, मोरारजी भाई, चन्द्रशेखर, लालकृष्ण जैसे लोग भी थे जो देश के वरिष्ठ नेता थे। कई शिक्षा के बुद्धिजीवी, ट्रेड युनियन के नेता तथा छात्र नेताओं को भी जेल भेज दिया गया। जॉर्ज फर्नाडीस को यातनाएं दी गई तथा उनके परिवार को उच्च स्तर से धमकियां मिल रही थी। उन्हें बोरियों में डालकर जेल भेजा गया।
कई संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया जैसे:- आर. एस. एस., आनंदमार्ग, जमात-ए-इस्लामी, ब्च (डब) इत्यादि। जे.पी. और अटल बिहारी बाजपेयी जैसे नेताओं को खराब स्वास्थ्य के कारण अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। आपातकाल के दौरान नेताओं, बुद्धिजीवियों, छात्र नेताओं तथा पत्रकारों की गिरफ्तारियां चलती रहीं। 19 महीनों में एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया तथा गिरफ्तार किए गए नेताओं में ऐसे नेता भी थे जो बहुत सक्रिय भी नहीं रहा करते थे।
आपातकाल के दौरान संसद की प्रासंगिकता खत्म कर दी गई थी। विपक्ष के न पकड़े गए सांसदों को भाषण देने पर रोक लगा दी गई थी। राज्य सरकारों पर भी कड़ा नियंत्रण लगा दिया गया था। तमिलनाडु में डी. एम. के. तथा गुजरात में जनता पार्टी दोनों ही गैर-कांग्रेसी सरकारों को जनवरी तथा मार्च 1976 में बर्खास्त कर दिया गया। उत्तर प्रदेश और उड़ीसा में कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को बर्खास्त कर दिया गया। कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त कर दिया गया। पार्टी के अंदर संजय गांधी के नेतृत्व में युवा नेतृत्व ही पार्टी का सबसे बड़ी आला कमान हो गयी थी।
न्यायपालिका की शक्तियों को भी नहीं छोड़ा गया। कानूनों विज्ञप्तियों के द्वारा नियंत्रण रखने के लिए न्यायपालिका की शक्ति को कम कर दिया गया। नागरिक अधिकारों को हानि पहुंचाने के लिए मीसा में संशोधन कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब नवंबर 1976 में संविधान संशोधन के द्वारा आधारभूत नागरिक अधिकारवादी ढांचे को 42वें संविधान संशोधन के द्वारा बदलने की कोशिश की गई। इन संविधान संशोधनों में न्यायपालिका द्वारा पुनर्मूल्यांकन करने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया। अब यह कह दिया गया कि संविधान संशोधन करने के संसद के अधिकार पर कोई सीमा तय नहीं की जा सकती। मौलिक अधिकारों को अप्रत्यक्ष रूप से कमजोर करने के लिए उसे चालाकी से नीति-निदेशक तत्वों के सिद्धांतों के समानांतर करने का प्रयास किया गया था।
इंदिरा गांधी अपने इन कदमों से अपने आप को एक संवैधानिक सुरक्षा में डालना चाह रहीं थी। जनता ने आपातकाल पर प्रतिक्रिया कैसे व्यक्त की यह तो तत्काल दो-चार दिनों तक कोई पता नहीं चला क्योंकि 1975 में हमारी साक्षरता दर भी कम थी तथा लोग मीडिया के स्तर पर जागरूक भी नहीं थे। जब मीडिया पर सेंसरशिप लगा दिया गया था तो फिर जनता की क्या प्रतिक्रिया हो गयी, इस पर भी कहना मुश्किल है। प्रसिद्ध इतिहासकार विपीन चन्द्रा अपनी ने पुस्तक (आधुनिक भारत) में आपातकाल को जनता का मौन समर्थन बताया है परंतु यह बात उन्होंने अराजकता, हड़ताल, बन्द तथा झड़प के भाव को संबोधित कर कही थी। परंतु महंगाई होना, जी. डी. पी बढ़ना तथा शांति स्थापित होना, ये सब कारण इसके पीछे हो सकते हैं।
इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल के समय ही 20 सूची मांगो के कार्यक्रम को घोषित कर दिया। इस कार्यक्रम ने भूमिहीन मजदूरों, छोटे किसानों तथा ग्रामीण जनता को कर्ज से राहत देने के लिए एक प्रयास किया। बीस सूची-लागू करने का प्रयास किया गया तथा इससे तीस लाख से अधिक मकान बनाकर दलित को सौपें गए। बंधुआ मजदूरी को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया। खेतीहर मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ा दी गयी। भूमिहीनों को इससे विशेष लाभ मिला। विपीन चन्द्रा लिखते हैं कि “आपातकाल को जनता के द्वारा मौन समर्थन देने के पीछे इसका अल्प स्वरूप था। यह जनता के लिए लोकतंत्र के सामान्य नियमों तथा संस्थाओं का एक अल्पकालीन निलंबन था। इसे एक अंतरिम कदम के रूप में देखा जा रहा था। वे इसे लोकतंत्र के विकल्प तथा निरंकुश राजतंत्र के रूप में नहीं देख रहे थे। इंदिरा गांधी बार-बार दोहरा रही थी कि यह शांति को बनाए रखने के लिए है न कि निरंकुशता के लिए। 1976 के अक्टूबर आते-आते जनता में भारी-असंतोष चमकने लगा। इसके पीछे कई बड़े कारण थे।
आपतकाल के बाद आर्थिक विकास की रफ्तार जो थोड़ा ठीक हो गई थी, फिर वह खराब हो गई। कृषि की स्थिति भी खराब ही थी तथा मजदूर अपनी मजदूरी तथा महंगाई भत्ते पर रोक के अलावा हड़ताल करने के अधिकार पर रोक के खिलाफ थे। सरकार कर्मचारी और शिक्षक इस बात से असंतोष में थे कि उन्हें अपने कार्यालयों में अनुशासित किया जा रहा था।
बीस सूत्री कार्यक्रम को तथा विकास संबंधी कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने का जिम्मा उसी पुरानी भ्रष्ट एवम् असक्षम अफसरशाही एवम् चालबाज नेताओं को सौंप दिया गया था जहां तक सामान्य जनता की बात थी उन्हें कोई समाधान मिलता नहीं दिख रहा था। यहां तक कि लोगों में असुरक्षा तथा भय का वातावरण बहुत बड़े स्तर पर था। 
लोगों में भय तथा असुरक्षा की भावना का कारण पुलिस का कठोरपूर्ण व्यवहार तथा असरकारी रूप से अफसरशाही की भावना थी इनकी ताकत काफी बढ़ गई थी तथा जन आंदोलनों का दबाव और आलोचना का खतरा ही नहीं रह गया था। अफसर और पुलिस बल दोनों अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते थे। उत्तर भारत में पुलिस तथा अफसर के कठोरपूर्ण व्यवहार ने सामान्य जनता में एक भयंकर असुरक्षा की भावना का घर कर दिया था। इससे सभी प्रभावित हुए तथा यह असर सबसे अधिक गरीबों पर हुआ। यह प्रेस के कारण अधिक हुआ था। क्योंकि प्रेस के उपर सेंसरशिप होने के कारण सरकार पूरी तरह अनभिज्ञ हो गई थी कि देश में क्या कुछ हो रहा था। अब लोग आकाशवाणी पर विश्वास नही करते थे क्योंकि इनके समाचार सेंसर होते थे। अब वे अफवाहों पर अधिक विश्वास करने लगे थे और सरकार की कारवाईयों एवम उसकी मंशाओं के विषय में बद्तर चीजों को ही स्वीकार करने लगे।
आम लोगों को छोटे अधिकारियों द्वारा नागरिकों को आए दिन परेशान करना तथा घूस की मांग करना सामान्य बात हो गई थी। आपातकाल 19 महीने रहना कोई समान्य बात नहीं थी। इंदिरा गांधी ने संसदीय चुनाव को 1 साल टलवा दिया था। बुद्धिजीवी, स्थानीय पत्रकार, वकील इत्यादि ने लोकतंत्र की समाप्ति को एक मुद्दा बनाया तथा 42वें संविधान संशोधन की 1976 की अवधारणा संविधान के मौलिक ढांचे में बदलाव की मंशा को एक नकारात्मक दिशा दी।
वास्वत में इंदिरा गांधी की सरकार का शक्ति केन्द्र खुद इंदिरा गांधी नहीं थी। अब उनके छोटे बेटे संजय गांधी इस केन्द्र के स्वयं भू-केन्द्र थे। अब संजय गांधी ही समानांतर सत्ता के मालिक थे तथा प्रशासन के क्रिया-कलाप में अपने अनुसार ही हस्तक्षेप करते थे। केन्द्रीय मंत्री, वरिष्ठ नागरिक, मुख्यमंत्री, बड़े अफसर अब इंदिरा गांधी के समानान्तर संजय गांधी के ही इर्द-गिर्द रहने लगे।
संजय गांधी ने अपनी इच्छा को चार सूत्री कार्यक्रम में सार्वजनिक किया :- (1) विवाह के समय कोई दहेज न लें (2) परिवार नियोजन अपनाएं (3) परिवार को दो बच्चों तक सीमित रखें (4) वृक्ष लगाएं तथा साक्षरता बढ़ाए। संजय गांधी भारतीय शहर को झुग्गी-झोपड़ी से मुक्त कर सौंदर्यीकरण करना चाहते थे। वे वास्तविकता से एकदम दूर थे तथा संवैधानिकता को ताक पर रख चुके थे।
संजय गांधी की बात में आकर सरकार ने परिवार नियोजन को कठोरतापूर्वक लागू करने की शुरूआत कर दी। जबरदस्ती नसबंदी लागू की जाने लगी। सरकारी कर्मचारियों, स्कूल शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मचारियों का मनमाने तरीके से निश्चित कोटा आवंटित कर दिया गया जिन्हें उनको नसबंदी कराने के लिए प्रेरित करना था। इस कोटा को पूरा करने के लिए पुलिस और प्रशासन ने भी अपनी ताकत लगा दी। इससे सबसे अधिक प्रभावित ग्रामीण और शहरी गरीब लोग हो रहे थे जो भागने, छिपने और दंगा करने आदि से अपना विरोध दर्ज करते थे। इन सभी जबरदस्ती कारवाई की रिर्पोट जनता के बीच नहीं आ पाती थी। ना ही प्रेस में इससे संबंधित खबर छपती थी तथा सहायता ऐंजेंसी जो सरकार के द्व द्वारा संचालित थी वह सरकार के विरोध में जाकर कोई खबर नहीं छापती थी।
गरीबों की झुग्गी-झोपड़ी तथा कॉलोनी तोड़ने को परिवार नियोजन के अन्तर्गत ही चलाया जा रहा था। अब संजय गांधी के निर्देश पर चलाए जा रहे अत्याचारों ने जनता को त्राहि-त्राहि करने पर मजबूर कर दिया।
जनवरी 1977 को श्रीमति गांधी ने अचानक घोषणा की कि लोगसभा के चुनाव मार्च में कराए जाएंगे। उन्होंने रा. जनीतिक नेताओं को रिहा कर दिया। प्रेस को स्वतंत्रता दे दी तथा सभा करने की भी इजाजत दे दी।
1977 का चुनाव भारतीय इतिहास में एक अलग परिणाम के लिए जाना गया। इंदिरा जी और उनके बेटे संजय गांधी चुनाव हार गए । कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा।
4. जनता पार्टी का शासन
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नवंबर 1977 के 10 महीने पहले ही चुनाव की घोषणा कर दी क्योंकि आपातकाल में एक साथ संसद के कार्यकाल को बढ़ा देना और अचानक फिर जनवरी 1977 में ही चुनाव की घोषणा करना आश्चर्यजनक था। विपक्षी दलों के सामने अब चुनाव था। जनवरी में सभी विपक्षी नेताओं को जेल से छुट्टी मिल गई थी। जेल से बाहर आने के बाद विपक्षी नेताओं ने जनसंघ, कांग्रेस (ओ.), भारतीय लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी के साथ मिलकर जनता पार्टी के विलय की घोषणा कर दी। फिर जगजीवन राम, एच. एन. बहुगुणा तथा नंदिनी सत्यथी ने अचानक कांग्रेस त्यागपत्र देकर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी का गठन किया तथा डी. एम. के. अकाली दल तथा सी.पी.एम. के साथ इन लोगों ने जनता पार्टी से मिलकर एक साझा मोर्च का गठन किया।
विपक्षी दलों ने लोकतंत्र को खत्म करने का आरोप लगाते हुए इंदिरा हटाओ का एजेण्डा बनाया तथा 'आपातकाल को जनता के मन में एक ऐसे विचार के रूप में पेश किया जिससे जनता के मन में इंदिरा गांधी के प्रति नकारात्मक भावना को जन्म ले। चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए बहुत ही बुरा रहा। जनता पार्टी और इसके सहयोगी दल 542 में से 330 सींटों पर विजय हुए। कांग्रेस मात्र 154 सीटें लेकर काफी पीछे रही और इसकी सहयोगी सी.पी.आई. को मात्रा 7 एवम ए.आ.डी. एम. के. को 21 सीटें हासिल हुई। वस्तुतः उत्तर भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया। दक्षिण भारत में अपातकाल का प्रभाव काफी कम था। दक्षिण भारत में कांग्रेस का अच्छा प्रदर्शन हुआ।
जनता पार्टी की जीत के बाद प्रधानमंत्री के लिए तीन उम्मीदवार बनें :- (1) मोरारजी देसाई (2) चरण सिंह (3) जगजीवन राम, जय प्रकाश नारायण तथा जे.पी. कृपलानी ने मोरारजी देसाई के लिए अपना मत दिया। वे 23 मई 1977 को प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई ने नौ कांग्रेस शासित सरकारों को बर्खास्त कर उनकी विधानसभाओं के लिए ताजा चुनाव के आदेश दे दिए।
संसद एवम् विधानसभा दोनों के ऊपर पूर्ण नियंत्रण पा लेने के कारण जनता पार्टी अपने उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को संघ के राष्ट्रपति के रूप में जुलाई 1977 में निर्विरोध चुनाव करवा सकी। संविधान के 44 वें संशोधन के माध्यम से मोरारजी सरकार में 42 वे संशोधन के फैसले को बदला 144 वें संविधान के द्वारा विकृत करने वाले प्रावध ानों को वापस ले लिया गया। सर्वोच्च न्यायालय एवम् उच्च न्यायालय को केन्द्र एवम् राज्य द्वारा बनाए गए काननों की वैधता को परखने के लिए संबंधित अधिकार भी वापस दे दिया गया।
1977 से 1979 तक तो सरकार ठीक से चली तथा कुछ अच्छे काम भी किये लेकिन एक विभिन्न विचारों वाले नेताओं वाली पार्टी को एक साथ सुगठित रखना मुश्किल हो रहा था। जनता पार्टी की सरकार के सामने हजारों मुद्दे थे तथा बहुत सारे नेता थे जो मंत्रिमंडल में थे परन्तु देश की इच्छा काफी बड़ी थी। ग्रामीण क्षेत्रों में जो अगडा - पिछड़ा समाज की जो संरचना थी वह विषम हो गयी थी। 1977 में कई जगहों पर हरिजनो को जिंदा जलाने की भी सूचना मिलती थी।
1979 में तो हड़तालों तथा विद्रोहों की वही घटनाएं होने लगी जो 1974 में देखने को मिली थी। तत्कालीन जनता सरकार ने नेहरू तथा इंदिरा की नियोजन वाली व्यवस्था को पूरी तरह बदलने की शुरूआत कर दी तथा देखा जाए तो यही स्थिति उसके पतन का कारण बनी। क्योंकि इस आर्थिक विकल्प का कोई साधन जनता सरकार सामने नही रख पायीं।
जनता शासन का पहला वर्ष पूरा करने के बाद ही अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी और कृषि एवम् उद्योग दोनों ही निम्न विकास दर अथवा रूकावट दिखाने लगे। 1978-79 में आए गंभीर सूखा कई राज्यों में बाढ़ आने से कृषि उत्पाद बर्बाद हो गया। वित्तमंत्री, चौधरी चरण सिंह के द्वारा 1979 में जो बजट पेश किया वह भारी बजट घाटा तथा मुद्रास्फिती के प्रभाव को दिखाने वाला था। 1979 में केरोसिन तेल एवम् दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कमी बढ़ने लगी। मुद्रा स्फीति 20% से भी ऊपर जा चुकी थी।
जनता सरकार का कार्यक्रम एक बात के लिए जो सबसे अधिक याद किया जाता है, वह है उसकी विदेश नीति अटल जी को विदेश मंत्री के द्वारा एक महान ख्याति मिली तथा उन्होंने जब्तपहपदंस छवद. | ससपंदबम की बात की जिसमें प्राकृतिक रूप से सोवियत संघ के साथ मित्रता रखते हुए अमेरिका और ब्रिटेन के तरफ मित्रता का हाथ बढ़ाया। उनहोंने UNO में हिन्दी में भाषण देकर भारत के महत्तव को रेखांकित कर दिया था तथा पाकिस्तान से एक व्यावहारिक संबंध कायम करने की पूरी कोशिश की थी। मगर सरकार के आंतरिक कलहों के कारण इसकी प्रासंगिकता वहीं खत्म हो गई ।
जनता पार्टी के नेताओं का सबसे बड़ा काम अपनी पार्टी को एक करके रखना था। 1977 के अंत तक खण्डन की शुरूआत हो चुकी थी। जनसंघ की वैचारिक शक्ति जनता पार्टी को दबाव में ला रही थी तथा इसके कारण कांग्रेस (ओ) के नेताओं को इसमें परेशानी हो रही थी। अपनी डफली अपना राग लिये हुए नेता धीरे-धीरे एक दूसरे से दूर होते गए तथा एक सर्वमान्य नेता की कमी खलने लगी जे. पी की मृत्यु भी 1979 में हो गयी थी।
5. इंदिरा की वापसी तथा पंजाब की समस्या
जनता पार्टी के पतन से इंदिरा गांधी की स्थिति राजनैतिक रूप से धीरे-धीरे सुधरने लगी। 1978 में चिकमंगकुर उपचुनाव में उन्होंने जॉर्ज फर्नाडीस को पराजित किया तथा जनता पार्टी की सरकार ने एक विशेषाधिकार लाकर उनको संसद से निष्कासित कर दियां तथा एक सप्ताह के लिए जेल की सजा दी। इंदिरा गांधी ने इसका लाभ उठाया तथा चरण सिंह के नेतृत्व में एक सरकार को उन्होंने समर्थन दे दिया। विश्वास मत पर मतदान के पहले ही इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया था। चरण सिंह ने लोकसभा भंग करने की सिफारिश कर दी ।
1980 में चुनाव हुए तथा कांग्रेस (आई) को भारी बहुमत मिला। 529 में से 353 सीटें कांग्रेस को मिलीं । चुनाव के बाद 1989 में जनसंघ के नेता अटल बिहारी बाजपेयी ने भारतीय जनता पार्टी बनायी तथा जगजीवन राम कांग्रेस में शामिल हो गए।
लगभग 3 साल तक सत्ता से बाहर रही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनी तथा 9 विपक्ष शासित राज्यों को भंग कर दिया।
इंदिरा गांधी की वापसी कांग्रेस के लिए जनता में अपनी कार्यता को दिखना एक वास्तविकता थी। लगभग 10 साल बाद इंदिरा गांधी को फिर जनता ने स्वीकार कर लिया था। वापस आने के बाद इंदिरा गांधी जी के सामने बहुत सारी समस्याएं थीं जिनमें कुछ तो अचानक सामने आयीं तथा भारत की एकता-अखण्डता को सामने से चुनौती मिलने लगी इन समस्याओं से हम पंजाब की समस्या का उदाहरण दे सकते है।
1980 में पंजाब अलगाववाद की आग में झुलसने लगा। धीरे-धीरे यह आतंक के एक अभियान में बदल गया। यह भारतीय राष्ट्रीय सम्प्रभुता तथा शांति के लिए एक चुनौती बन गया। वह 1947 के बाद से लेकर अब तक के घटना क्रम की प्रवृत्ति थी। धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक व्यवस्था के आदर्श से इनकार करते हुए अवासियों ने इस बात पर बल दिया कि धर्म और राजनीति को अलग-अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि सीख राजनीति तथा धर्म दोनों में है। सिख पंथ को धर्म तथा सभी सिखों के राजनीतिक एवम् अन्य धर्मेत्तर हितों के लिए एक सम्मिश्रण के रूप में परिभाषित किया गया।
अकालियों ने हिन्दुओं पर आरोप लगाया कि वे सिखों के ऊपर हुकूमत करना चाहते है तथा ब्राह्मणवादी - रवैया लादकर सिख संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं। 1940 के समय में ही सिख बहुल अकालियों ने अपने पंथ को एक मुद्दा बना लिया इसके आलावा सरकारी सेवाओं में सिखों की कमी का जिक्र किया। 1961 में नेहरू ने एक कमिटी भी बनायी जिसमें यह रिपोर्ट आई कि सेवाओं से लेकर सेना में सिखों की भूमिका बहुत अधिक है।
अकालियों ने गुरूद्वारा प्रबंधक कमिटी तथा स्वर्ण मंदिर के जत्थे को अपनी मांगों के लिए प्रयोग करना आरम्भ किया नेहरू अपने जीवन काल में सिखों की विभिन्न उचित मांगो को मानने की प्रक्रिया में लगे रहे। यह काम बड़ी बात रही थी। नेहरू की मांग मान लेने जाने के बावजूद साम्पद्रायिकता का जोर पंजाब में बंद नहीं हुआ तथा मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो को साम्प्रदायिकता को कुचलने के लिए नैतिक समर्थन दिया। 1966 के आस-पास वामपंथी दलों तथा अकाली दल के बीच चुनाव के लिए गठबंधन हुआ जिसमें अकाली दल की राजनीति की मुख्य धारा में आने की स्थिति बनी।
1966 के बाद पंजाबी और हिन्दी पर विवाद होने लगा गुरूमुखी लिपि तथा देवनागरी लिपि के बीच इस विवाद को अकालियों ने एक नया रूप दिया जिसमें उन्होंने यह मांग की कि गुरूमुखी लिपि को ही सिर्फ पंजाब के लिए लिपि के रूप में इस्तेमाल किया जाए। हिंदू साम्प्रदायिक संगठनों ने इस बात पर जोर दिया कि गुरूमुखी के साथ-साथ देवनागरी का उपयोग किया जाना चाहिए इस मुद्दे को सिख और हिन्दू दोनों प्रकार के सम्प्रदायवादियों द्वारा शक्तिशाली रूप से साम्प्रदायिक रंग दिया गया।
दूसरा जो मुद्दा था वह पंजाब राज्य को लेकर था। 1955 में पंजाब के राजनीतिज्ञों ने भाषा के आधार पर पंजाब की स्थापना की मांग की पर आयोग ने यह कहा कि पंजाबी और हिन्दी में अधिक अंतर नहीं है। 1956 में पंजाबी और पेपसू का विलय कर अकाली दल को शांत रखने की पुरजोर कोशिश भी हुई।
मास्टर तारा सिंह के नेतृत्व में अकाली दल ने पंजाब की मांग भाषा के आधार पर करने के आंदोलन का बिगुल बजा लिया तथा एक महाशक्तिशाली आंदोलन आरम्भ हो गया सीधे तौर पर अकाली दल ने इसे सिखों के अस्तित्व की कहानी से जोड़ दिया हिन्दू संस्कृति को अपना आधार बनाने वाले दलों से कड़ी प्रतिक्रिया आई तथा हिन्दूओं को कहा कि अपनी भाषा हिन्दी लिखो ऐसे उनकी भी भाषा मातृ रूप में पंजाबी ही थी ।
संत फतह सिंह के नेतृत्व में पंजाब राज्य की मांग का आंदोलन शांतिपूर्वक शुरू हुआ। मास्टर तारा सिंह को निकाल दिया गया तथा कहा गया कि पंजाब की मांग सिर्फ भाषा के आधार पर ही की जा रही है। इसमें साम्प्रदायिकता का कोई स्थान नहीं है। हरियाणा क्षेत्र में हिन्दी भाषी राज्य की मांग भी जोर पकड़ने लगी जब कांगड़ा के लोगों ने हिमाचल प्रदेश में हिमाचल कांगड़ा विलय की मांग की। इंदिरा गांधी ने 1966 में पंजाब का दो राज्यों में विभाजन कर दिया। पंजाबी भाषा के साथ पंजाब, हिन्दी भाषी हरियाणा तथा कांगड़ा का हिमाचल प्रदेश के साथ विलय।
1980 में अकाली दल को चुनाव में हार मिली। इस हार के बाद लोगों में साम्प्रदायिक रंग भरने के लिए पंजाब के अकाली समर्थक कुछ नेताओं ने अपना कार्य शुरू कर दिया। यह कहा नहीं जा सकता कि अकाली दल के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से इस बार समर्थन था या नहीं।
1981 में संत लोंगोवाल के नेतृत्व में मुख्य अकाली दल ने प्रधानमंत्री को धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक 45 मांगों एवम् शिकायतों का मांग पत्र सौंपा। जिसमें पंजाब को चंडीगढ़ देने की मांग भी शामिल थी। अब अकालियों की तरफ से खुले रूप में साम्प्रदायिक आंदोलन शुरू कर दिये गए। गुरुद्वारों को इस आंदोलन का अडडा बना दिया गया।
अकाली उग्रवाद ने 1981 में आतंकवाद का रुख ले लिया तथा कांग्रेस की नीति फेल हो गयी। सतही तौर पर 1970 के दशक में कांग्रेस की लुंज- पुज नीति ने ही लोगों को विशेषकर अकालियों को प्रश्रय दिया | भिंडरावाला के पहले कांग्रेस नेता ज्ञानी जैल सिंह का मौन समर्थन रहता था जो इसे अकाली के विकल्प के रूप में देखते थे। परंतु भिंडरावाला तो खलनायक ही निकला भिंडरावाला तथा अमरीक सिंह के नेतृत्व में आतंकवादियों ने 24 अप्रैल, 1980 को निरंकारी गुरू की हत्या कर दी।
इसके बाद तो हत्याओं का दौर चल पड़ा। अधिकारीगण, कांग्रेसी तथा कई नेताओं को मार दिया गया। ज्ञानी जैल सिंह एक गृहमंत्री के तौर पर भिंडरावाला को बचाते रहें। अपने को सुरक्षित करने के लिए भिंडरावाला ने जुलाई 1982 में स्वर्ण मंदिर के अहाते में एक भवन गुरू नानक निवास में रहने लगे। वहां से पंजाब में आतंकवादी अभियान को संचालित करने लगे। अब पंजाब में भिंडरावाला ही चर्चा के केन्द्र में थे। 1983 में असीमित मात्रा में हिन्दूओं की हत्याएं होने लगी। भारत सरकार आतंकवाद के विरुद्ध कारवाई में हिचक रही थी। भिंडरावाला तो जहां-तहां विस्फोट भी करवाने . लगे, गुट की भी सदस्यता बढ़ने लगी।
दिसम्बर 1983 में गिरफ्तारी के डर से भिंडरावाला स्वर्ण मंदिर के अन्दर स्वर्ग की तरह सुरक्षित अकाल तख्त के अंदर चले गए और उसे अपना मुख्यालय, शस्त्रागार तथा अपने आतंकवादी अनुयायों के लिए शरण स्थान बना दिया। आतंकवादियों में तस्कर भी शामिल थे। स्वर्ण मंदिर के अन्दर आधुनिक हथियार, हथगोले तथा बन्दूकें जमा कर ली गयी। मंदिर के अहाते हथियारों की छोटी निर्माण इकाई भी बना ली गयी।
आतंकवादियों की तरफ अकाली नेतृत्व का रवैया दोहरी था। एक तरह वे उनके साथ शामिल नहीं थे और यहां तक कि अकाली आतंकवादियों के खिलाफ कोई रवैया नहीं अपनाते थे। वे सरकार द्वारा भिंडरावाला के खिलाफ कारवाई में सरकार का विरोध करते थे। 1981 में लोंगोवाल ने कहा कि संपूर्ण सिख समुदाय भिंडरावाला का समर्थन करता है।' अकालियों ने इन आतंकवादी घटनाओं के लिए भारत सरकार को जिम्मेवार ठहराया तथा भिंडरावाला से संबंध बनाकर रखने की कोशिश करते रहे। आंतरिक रूप में अकालियों को भिंडनवाला से राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता भी थी।
इंदिरा गांधी 1975 के बाद अपनी कठोरतम भूमिका से परहेज कर रही थी सही तौर पर देखा जाए तो वह अल. पसंख्यक-बहुसंख्यक संकल्पना में राजीतिक दृष्टिकोण को संतुलित करने का प्रयास करती रहीं 1981 से 1984 तक तो भिंडरावाला की करतूतों का तो रक्षात्मक जवाब ही उनके द्वारा दिया गया।
इंदिरा जी के द्वारा प्रकाश सिंह बदाल एच. एस. लोंगोवाल तथा जी. एस तोहरा के बीच बातचीत लगातार बिना कोई हत्या के चलती रही तथा अकालियों को तत्कालिक रूप से तथा लचर रूप से भी शांत करने की कोशिश की जाती रही।
1983 में एक कोशिश भी की गई जिसमें अटवाल की हत्या कर दी गई तथा इससे पंजाब के लोगों में असंतोष तथा क्रोध की भावना भी भड़की 1984 में तो पाकिस्तान का हस्तक्षेप बढ़ गया तथा उसने पंजाबी उग्रवादियों को सहायता देना भी शुरू कर दिया मई 1984 के अंत में अब सरकार की तरफ से यह इशारा दिया गया कि अब इसके खिलाफ कारवाई को टाला नहीं जा सकता है। सरकार ने सैनिक कारवाई का मन बना लिया तथा 'इसे जव्चमतंजपवद ठसनम जंत कहा गया इस ऑपरेशन की योजना बहुत जल्दी बना दी गयी 3 जून को सेना ने स्वर्ण मंदिर को घेर लिया और 5 जून को वहां प्रवेश कर गई। आश्चर्यजनक था कि मंदिर के अंदर हथियारों का जखीरा उम्मीद से कहीं अधिक था सेना को टैंक का प्रयोग करना पड़ा। करीब एक हजार भक्त मंदिर कर्मचारी अंदर थे कई दोनों तरफ की गोलीबाजी में मारे गए। मंदिर परिसर के कर्म भवन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए तथा और अकाल तख्त भी बर्बाद हो गया। हर मंदिर सहित जो सिख धर्म सबसे बड़ा पवित्र स्थल था उस पर गोलियों के सैकड़ो दाग थे। मारे गए लोगों में भिंडरावाला तथा उसके अनेक शागिर्द थे।
ऑपरेशन “ ब्लू स्टार" ने पूरे देश में सिखों की भावना को आहत किया तथा सिखों में गहरी नाराजगी पैदा थी। इसे धर्म विरोधी बताया गया हालांकि सरकार के पास मंदिर को निशाना बनाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। इस ऑपरेशन के बाद आतंकवादियों ने इंदिरा गांधी और उनके परिवार के खिलाफ स्वर्ण मंदिर को अपवित्र करने का पाप करने के लिए बदला लेने की बात कही गयी। 31 अक्टूबर 1984 की सुबह इंदिरा गांधी की अपने सुरक्षा गार्डो ने ही जिसमें दोनों सिख थे ने हत्या कर दी। उन्होंने यह सलाह ठुकरा दी थी कि सिख गार्डों को हटा दिया जाए।
इंदिरा गांधी ने यह साबित कर दिया था कि एक महिला अपनी इच्छा शक्ति से भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में राजनीतिक कौशल से शासन कर सकती है। उनकी इच्छा शक्ति विलक्षण थी। एक मजबूत कठोर नेता के तौर पर निर्णय लेने की उनकी क्षमता अतुलनीय थी।
इंदिरा जी को 1971 के बंग्लादेश निर्माण, 1975 के आपातकाल, 1969 के बैंको के राष्ट्रीयकरण, गरीबी हटाओ नारों, न्यायपालिका से विवाद तथा ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए हमेंशा याद किया जाता है। इंदिरा जी भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक अमिट स्थान रखती है तथा अभी देश के तीन सफलतम प्रधानमंत्रियों में नेहरू और अटल जी के साथ इनका नाम लिया जाता है।
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Sun, 01 Oct 2023 07:18:49 +0530 Jaankari Rakho
“राजनीति में सत्ता पक्ष तथा विपक्षी पार्टियों की भूमिका" https://m.jaankarirakho.com/392 https://m.jaankarirakho.com/392 “राजनीति में सत्ता पक्ष तथा विपक्षी पार्टियों की भूमिका"
1. स्वतंत्रता से लेकर अब तक पक्ष-विपक्ष की भूमिका (संसदीय भारत में पक्ष तथा विपक्ष 1947-2014)
स्वतंत्रता के बाद भारत एक लोकतांत्रिक देश के रूप में अपनी संसदीय परम्परा को एक अनुशासित सिपाही की तरह निभाता रहा है। हमारी संसदीय प्रणाली की सरकार ने अपने संसद के प्रति जवाबदेही को अक्षुण्ण रखा है। सही तौर पर किसी भी संसदीय प्रणाली में राजनीतिक दल का योगदान सबसे अहम होता है।
साधारण रूप में कोई भी लोकतांत्रिक देश बिना राजनीतिक दल के प्रासंगिक नहीं हो सकता। भारत के संसदीय इतिहास से लेकर अभी तक विभिन्न राजनीतिक दलों ने भारत के विकास में अभिन्न योगदान दिया है। इन राजनीतिक दलों ने अपने सिद्धांतवादी रवैये से भारतीय लोकतंत्र को एक महान लोकतंत्र कहलाने में हर संभव मदद की है। हम इस खंड में स्वतंत्रता के बाद पक्षीय और विपक्षी पार्टियों की भूमिका के बारे में ऐतिहासिक रूप से विभिन्न बिन्दुओं को परखेंगे।
2. कांग्रेस (Congress)
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय वैसे तो कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी क्योंकि राष्ट्रीय आंदोलन में इसका एक अहम योगदान था। वैसे इस पार्टी की स्थापना 1885 में किसी चुनाव लड़ने या सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं हुई थी। कांग्रेस ही सिर्फ स्वतंत्रता के बाद सत्ता की स्वाभाविक पार्टी थी फिर भी उस समय और भी राजनीतिक दल देश में थे:- 'समाजवादी पार्टी’, ‘कम्यूनिस्ट पार्टी', 'किसान मजदूर पार्टी' और 'भारतीय जनसंघ' जैसी पार्टियां भी संसदीय व्यवस्था की शोभा बढ़ा रही थी। विशेष रूप से प्रथम आम चुनाव में इन पार्टियों ने बहुत बड़ी भूमिका निभायी।
ये सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी प्रकृति से अखिल भारतीय थे | उपरोक्त पार्टियों का दबदबा किसी विशेष क्षेत्र में जरूर था लेकिन अपने सिद्धांत तथा सोचने की शैली से इनका स्तर अखिल भारतीय स्तर का था। इनका नेतृत्व भी संपूर्ण भारत के लोगो के समूह के द्वारा ही होता था और इस तथ्य में देखा जाए तो इनके सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक लक्ष्य भारत के आधार पर होते थे न कि विशेष क्षेत्र पर।
अगर संसदीय सीटों पर विधान सभा की सीटों के लिहाज में उस समय ही पार्टियों की गणना की जाए तो कांग्रेस के सामने जितने भी विपक्षी दल थे वे काफी कमजोर थे। परन्तु इस आधार पर हम उन्हें कमजोर नहीं कर सकते। रा. जनीतिक रूप में ये दल अति सक्रियता से सशक्तता से अपनी भूमिकाएं निभाते थे। इनके पास बहुत सारे सोच और एक विशेष आर्थिक तथा सामाजिक मुद्दों पर अच्छे विकल्प भी होते थे।
कांग्रेस की स्थिति 1951-52, 1957 तथा 1982 में यह थी कि उस समय के आम चुनावों में इतने वोट आए कि सभी विपक्षी पार्टियों के सामूहिक तौर पर कांग्रेस से अधिक आ गए। 1952 में विपक्षी पार्टियों को 26% सीट लोकसभा को मिलीं तो 1957 में 25% तथा 1962 के लोकसभा में 28% सीट पर अपना अधिकार जमा लिया। राज्यों की विध ान सभा में उनकी स्थिति और भी बेहतर थी । 1952 32% 1957 में 35% तथा 1962 के चुनावों में 40% सीटों पर उन्होंने अना कब्जा जमाया।
विपक्षी पार्टियों ने कांग्रेस पर अपना दबाव जमाया तथा कांग्रेस की सभी सरकारों को निरंतर आलोचनाओं में बांधे रखा। व्यवहार में जन-नीतियों के निर्धारण में उनका काफी प्रभाव बना रहता था। सच्चाई तो यह है कि विपक्षी दलों का प्रभाव उनके आकार के अनुपात में कहीं ज्यादा हुआ करता था।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि फिर भी कांग्रेस सत्ता में क्यों थी? इसका सही जवाब है विपक्षी पार्टियों की आपसी खींचतान। क्योंकि विपक्षी पार्टियों की आपसी जांच तथा सिद्धांत आपस में नहीं मिलते थे। कभी-कभी औसतन कह लें कि विपक्षी पार्टियों से कुछ पार्टियों की सोच कांग्रेस से अधिक मिलती थी अपेक्षाकृत विपक्ष की किसी अपनी साथी पार्टी से यह स्वाभाविक ही था क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस को बहुत सारी पार्टियों का साथ मिला था तथा साथ में ही आपस में समन्वयता से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते थे। कुछ पार्टियां जो जाति के आधार पर या किसी विशेष सम्प्रदाय के आधार पर थी वामपंथी और दक्षिणपंथी पार्टियां जब एक साथ हुई तो 1977 और 1989 में कांग्रेस की जबरदस्त हार हुई। स्वतंत्रता के साथ कांग्रेस को खत्म करने की बात गांधी जी ने अनौपचारिक रूप से की थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को राजनैतिक संगठन बनाकर रखा गया तथा उसके बाद भी कांग्रेस एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संगठन था। दरअसल कांग्रेस पार्टी का नेहरू युग में देश के हर गांव तथा हर कोने में विकल्प नहीं था । वास्तव में कांग्रेस की स्थिति एक जनआंदोलन करने वाले समूह की थी लेकिन पार्टी के रूप में उसके सदस्य राजनीतिक थे। सरदार पटेल की पहल पर एक प्रावधान बनाया कि कोई भी ऐसा व्यक्ति सरकार का सदस्य नहीं हो सकता जो किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी का समूह का सदस्य हो, जिसका अपना-अपना संविधान और संगठनिक ढांचा मौजूद हो। गांधी जी भी इस बात के लिए इसलिए सहमत थे कि कांग्रेस को राजनीतिक पार्टी के तौर पर नहीं आना चाहिए क्योंकि 1947 से पहले कुछ दलों को कांग्रेस के सदस्य का भी रूतबा मिला हुआ था।
पटेल की बात को कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने गलत तरीके से लिया। उन्होंने कांग्रेस को अब पूंजीवादी तथा अपने को एक दक्षिणपंथी विचार की तरफ ले जाने वाला दल बताया। नेहरू एक व्यापक स्तर पर कांग्रेस को बनाकर रखते थे। उनका कहना था कि कांग्रेस के बिना देश की एकता संभव नहीं है तथा न सामाजिक-आर्थिक विकास संभव है इसलिए वे कांग्रेस को वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच विभाजित नहीं करना चाहते थे।
नेहरू के कारण कांग्रेस की वामपंथी सुरक्षा बढ़ी तथा बहुत ही बुद्धिमता से भारत की अधिकतर राजनीतिक पार्टियों से कांग्रेस की नजदीकी बढ़ाने की कोशिश की।
परन्तु यह बात गौर करने योग्य है कि कांग्रेस एक दल के रूप में सत्ता प्राप्त करने के लिए लड़ना अपना कर्त्तव्य समझती थी परन्तु अपने स्वतन्त्रता पूर्व के सिद्धान्तों पर वह पूरी तरह कठोर न रह सकी। इसके लचीलेपन का विस्तार अधिक हुआ तथा आंतरिक अनुशासन में अस्पष्टता आई, मगर इसकी फैसले लेने की प्रक्रिया फिर भी लोकतांत्रिक बनी रही। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तथा प्रान्तीय या जिला कार्यालय पूरी तरह सक्रिय था।
कांग्रेस विभिन्न और विपरीत परिस्थिति में उत्पन्न वर्ग, सामुदायिक तथा क्षेत्रीय हितों के बीच तालमेल तथा समझौता और सहमति के साथ माध्यम के रूप में उसी तरह काम करती रही जैसा कि वह पहले सम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के दौरान कर चुकी थी। परन्तु अपने मतभेद खत्म करने तथा दो विपरीत विचारों में मतेक्यता लाने की संवेदशीलता भी बढ़ रही थी। कांग्रेस पूंजीपति वर्गो तथा गरीबों दोनों वर्गों के बीच अपनी उपस्थिति तथा महत्व को दर्शाने की भरपूर कोशिश करती रही इसने विभिन्न तबके तथा विभिन्न राजनीतिक सांस्कृतिक तत्वों को अपने अंदर जगह देने में भी यह सफल रहा। चूंकि खासतौर पर वामपंथ दल उन्हें प्रतिनिधित्व देने में आंदोलन करने में असफल रहे, इसलिए हर बात का महत्व बढ़ जाता है।
कांग्रेस के पास तीन बहुत जरूरी मुद्दे थे तथा यह एक बहुत बड़ी शक्ति भी उस पार्टी को प्रदान करती थी:-
1. आजादी की विरासत 
2. शक्तिशाली नेतृत्व तथा
3. नेहरू की राष्ट्रीय एकीकरण, जनवाद और सामाजिक परिवर्तन संबंधी धारणा।
नेहरू के काल में लोग कहते थे कि कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा के बीच काफी समानता है। दूसरे शब्दों में कह लें तो कांग्रेस उस काम में मध्यमार्गी वामपंथी दल की तरह भूमिका निभाता था। वैसे इस पार्टी के अन्दर वामपंथी तथा दक्षिणपंथी दोनो प्रकार के दलों की विचारधारा पनप रही थी। इसका अर्थ यह है कि उस समय कांग्रेस की जो विचारधारा सामने दिख रही थी उसमें, राष्ट्रवाद, आर्थिक न्याय, सामाजिक समानता, संपदा पुनर्वितरण, अवसरों की समता को समाजवादी तरीके से लागू करने की इच्छा थी।
अधिकतर इतिहासकारों ने कांग्रेस को मध्यमार्गी पार्टी बनाया था। सही तौर पर देखें तो ऐसा कहने के लिए कई माध्यम उपस्थित थे जैसे: - 
1. साम्प्रदायिक दलों को छोड़कर सभी विपक्षी दल इसकी नीतियों को अपने आंदोलनों अथवा कांगेस के अन्दर अपने समान विचार वाले लोगों के माध्यम से प्रभावित करने में सक्षम बने हुए थे। क्योंकि इस पार्टी के अंदर अनेक ऐसे गुट बने हुए थे जो उन विपक्षी दलों के विचारों को प्रतिबिंबित करते थे।
2. इस समझौतावादी रवैये के कारण विपक्षी दल हमेशा कांगेस के अंदर समाहित होने के लिए जाने लायक बने रहे। इसके अलावा, विपक्षी दलों के कार्यक्रमों और नीतियों को अपनाकर उनके जनाधारों और सामाजिक आधार को भी अपने अधीन ले जाते थे। विभिन्न प्रकार की छूट और सहमति के माध्यम से उग्र जन आंदोलनों को शांत करने तथा उनके नेतृत्व को अपने प्रभाव के अन्दर ले जाने में इस पार्टी ने सफलता प्राप्त कर ली थी।
3. वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों ही प्रकार की राजनीतिक शक्तियां अपने कैडरों को बचाने और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अधिक से अधिक अतिवादी रुख अख्तियार करती चली गई। कई बार उन्हें अपने नेताओं को भी कांग्रेस द्वारा आत्मसात करने से बचाने के लिए ऐसा करना पड़ा।
इन तीनों बिन्दुओं को इतिहास विपीनचन्द्रा ने उदाहण देकर समझाया है। उदाहरण के लिए जब भी कम्यूनिस्ट पार्टी तथा सोयशलिस्ट पार्टी यथार्थवादी मांग और कांग्रेस के प्रति गैर शत्रुतापूर्ण रूझान स्पष्ट करती तो उनके दलों में यह संकट उत्पन्न हो जाता था। परन्तु इन दोनों तरह की पार्टियों के लिए अतिवादी रूझानों के भी नकारात्मक परिणाम हुए, क्योंकि उसके कारण वे जनता के विचारों से दूर होती चली गई और कई बार उनके अन्दर आंतरिक विभाजन भी हुआ।
विपीनचन्द्रा या रामचन्द्र गुहा के विचार से या फिर विभिन्न कांग्रेस नेताओं की स्वीकारोक्ति में यह स्पष्ट है कि कांग्रेस पार्टी की उलझन का सबसे बड़ा स्त्रोत पार्टी नेतृत्व तथा सरकार के नेतृत्व के बीच संबंधों का कोई सही सुलझाव भरा रवैया न होना था। नवम्बर 1946 में नेहरू जब सरकार ( अंतरिम) में आए तो पार्टी के अध्यक्ष से इस्तीफा दे दिया। उनका मानना था कि एक साथ दोनों पद के साथ चलना मुश्किल होगा कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनके उत्तराधिकारी जेवी. कृपलानी ने इसके बाद यह मांग रखी कि पार्टी अध्यक्ष और दसवीं कार्यसमिति की सरकार के नीति निर्माण में प्रत्यक्ष भूमिका होनी चाहिए और सभी सरकारी निर्णय उनके साथ मशविरे के बाद ही लेना चाहिए। "
कृपलानी के अध्यक्ष के रूप में यह व्यक्तिगत मांग थी। सही तौर पर देखा जाए तो सरकार में शामिल जो भी नेता थे जिसमें नेहरू भी शामिल थे उन्होंने कृपलानी की उपरोक्त मांग का विरोध किया पर उन्होंने दलील दी कि सरकारी कार्य तथा कारवाई किसी पार्टी से कहीं ऊपर होती हैं सरकार से बाहर किसी भी व्यक्ति को उन्हें प्रकट होने नहीं देना चाहिए। तथा यह एकदम सही नहीं होगा कि प्रशासनिक कार्यो का लेखा-जोखा बाहरी शक्ति के हस्तक्षेप के अन्तर्गत लाया जाए। उनके विचार के अनुसार सरकार सांसदों तथा लोकसभा के प्रति जिम्मेदार है न कि कांग्रेस अध्यक्ष के प्रति वैसे यह बिन्दु 2004-2014 के काल में कैसे प्रासंगिक हुई, यह विचार करने का विषय हैं आगे इस पर थोड़ा प्रकाश डाला जाएगा। लेकिन नेहरू ने इस बात पर अपनी इच्छा जाहिर की कि संसदीय विचार तथा संसदीय अक्षुणता पार्टी के स्तर से कहीं ऊपर की चीज होती है।
कृपलानी अपने स्तर से यह पूर्ण प्रयास करते रहे कि सरकार पार्टी के सामने झुके तथा पार्टी को कभी-कभी या हमेशा यह एहसास न हो कि सरकार के अधीन है कई मुद्दों पर उनसे सलाह न लिए जाने के विरोध में उन्होंने अपना त्यागपत्र दे दिया। कृपालानी के बाद राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्ष बने तथा उनके बाद पट्टाभी रमैया । इन दोनो की छवि एक सीधे इंसान की थी तथा महात्वाकांक्षा भी नहीं थी। इन्होंने काफी प्रयास किया कि सरकार और पार्टी के बीच कोई विवाद न हो इन्होंने कई मुद्दे सुलझाए। लेकिन इस काल के बाद नेहरू तथा पटेल के बीच कुछ मुद्दों पर विवाद हो गया। पटेल ने सही रूप में कांग्रेस को एक पार्टी के रूप में शक्तिशाली करने के लिए महान कोशिशें की। पटेल कांग्रेस के अन्दर दक्षिपंथी गुटों के निर्वाद रूप से नेता थे। मगर दुर्भाग्य यह था कि दक्षिणपंथ के बारे में उनकी सोच को एक बहुत बड़ी जाल- साजिश के तहत गलत तरीके से पेश करने की कोशिश की गई। पटेल किसी भी मुद्दे को बहुत साफ तरीके से रखते थे। धर्मनिरपेक्षता के प्रति उनकी सोच विस्तृत थी उनका कहना था कि धर्मनिरपेक्षता की प्रतिबद्धता भारत के विकास का द्योतक होगा हमें पाकिस्तान नहीं बनना है। भारत में रह रहे मुसलमानों को सुरक्षित काम होगा तथा पूर्ण रूप से हम उनके साथ उन्हें यह महसूस कराने में सहयोग करें कि वो भारतीय हैं तथा अगर हम यह नहीं करा सके तो हम भारत के ही काबिल न होंगे।
पटेल ने छद्म धर्मनिरपेक्षता को एक मुद्दा बताया तथा किसी भी मुद्दे को टाल-मटोल की नीति के उलट सीधा और सुलझे तरीके से पेश किया। पटेल भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद के सख्त खिलाफ थे। इनके बारे में कहा जाता है कि पटेल उद्योगपतियों से तथा पूंजीपति से राष्ट्रीय आंदोलन के लिए चंदा लिया करते थे तथा सहायता भी। पर एक भी उद्योगपति या पूंजीपति उनको परिवार तथा व्यक्तिगत कार्य के लिए पैसे नहीं दे सकता था। नेहरू और पटेल के बीच संबंध काफी जटिल था आमतौर पर राजनीतिक शास्त्रियों तथा इतिहास के पंडितों ने इनके मतभेद को ही अधिक उभारा है। लेकिन दोनों के बीच जो देश के विकास के लिए समान दृष्टि थी, उनको हमेशा नकारा है।
अगर नेहरू और पटेल के बीच विभिन्न वैचारिक मताभिन्नता की बात की जाए तो कुछ महत्वपूर्ण बिन्दू सामने आते हैं जैसे: - 
1. प्रधानमंत्री की भूमिका
2. 1947 के विभाजन के बाद उपजे दंगों से निपटने की भूमिका
3. पाकिस्तान नीति इत्यादि
लेकिन अगर तत्कालिक रूप से देखा जाए तो इनके वैचारिक संघर्ष को पुरूषोत्तम दास टंडन के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद 1950 में धार मिल गया। नेहरू ने पटेल के इस विचार को नजर अंदाज किया कि मौलिक अधिकार में संपत्ति के अधिकार को शामिल करना चाहिए। कभी-कभी तो इनके बीच इतना मतभेद बढ़ जाता था कि ये दोनों अपने इस्तीफे की पेशकश पर जा पहुंचते थे ।
उपरोक्त जटिलताओं के बावजूद कभी पटेल नेहरू एक दूसरे से अलग नहीं हुए। ऐसा इसलिए हुआ कि उन दोनों को जो चीज जोड़ती थी वह अलग करने वाले से कहीं अधिक मजबूत और महत्वपूर्ण थी । इतना ही नहीं, वे कई मायने में एक दूसरे के पूरक थे । एक महान संगठन कर्ता और सुशासक था, दूसरा महान समाजवादी था।
नेहरू और पटेल के बीच आपस में अगाध आदर की भावना थी। दोनों एक दूसरे से अंदर तक जुड़े थे। गांधी की मृत्यु के बाद पटेल ने नेहरू को "महात्मा गांधी का उचित उत्तराधिकारी " बताया तो नेहरू ने पटेल को "शक्ति का स्तर" बताया। 
जब नेहरू और पटेल के बीच किसी बात पर मतैक्यता नहीं होती थी तो दोनों एक दूसरे के सामने इस बात को रखते थे। टंडन के अध्यक्ष चुने जाने के समय नेहरू इन्हें पसंद नहीं करते थे। 29 अगस्त 1950 को फिर भी टंडन जीत गए। इससे एक खास वर्ग नाराज हो गया तथा किसान मजदूर प्रजा पार्टी की स्थापना हुई।
नेहरू ने 15 दिसंबर 1950 के बाद ( सरदार की मृत्यु के बाद) कांग्रेस की कार्यसमिति पर अधिक से अधिक हस्तक्षेप करना आरम्भ किया वह एकता बढ़ावा कर तथा दक्षिण पंथी वर्चस्व को खत्म करना चाहते थे। 1951 में टंडन ने इस्तीफा दे दिया। नेहरू पार्टी अध्यक्ष चुने गए। अब वह अपने प्रधानमंत्री पद पर भी थे और अध्यक्ष पद पर भी। अब नेहरू पार्टी के निर्विवाद नेता बन गए तथा 1964 तक बने रहे। नेहरू के पार्टी अध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री दोनों पद पर रहने के बाद एक परम्परा बन गई तथा इसी समय से अध्यक्ष ही प्रधानमंत्री रहे नहीं तो कोई चमचा ही प्रधानमंत्री का कांग्रेस अध्यक्ष रहा। 2004 ई. में आकर यह धारणा बदली जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को गंभीरता से लिया जाने लगा था।
3. कांग्रेस का वैचारिक पतन
गांधी जी स्वतंत्रता के बाद अपने विभिन्न भाषणों में यह कहा करते थे कि कांग्रेस को राजनीतिक पार्टी के रूप में सत्ता प्राप्ति का प्रयत्न नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका लक्ष्य 'स्वतंत्रता' था, वे प्राप्त हो गई। लेकिन नेहरू जी ने कहा कि देश कि एकता, अखण्डता तथा संदभावना के लिए 'कांग्रेस' का अस्तित्व आवश्यक है।
गांधी जी कांग्रेस खत्म करने की बात इसकी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए कह रहे थे। गांधी जी का मानना था कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस की विरासत को एक संग्रह के तौर पर देख सके। अगर-कांग्रेस राजनीतिक पार्टी के तौर-पर सत्ता की प्रतियोगिता में शामिल होगी तो निश्चित तौर पर समय के साथ विभिन्न मुद्दों के ऊपर कांग्रेस को औरों का सामना करना पड़ेगा तथा इसकी विरासत अक्षुण्ण नहीं रह पाएगी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गांधी जी की बात अंशतः सच साबित होने लगी। लेकिन कुछेक वर्षो में पतन का स्तर बहुत अधिक स्तर बढ़ गया था तथा पार्टी के मूल्यों में भयंकर गिरावट आ गई थी । इतिहासकार विपीन चन्द्रा अपनी किताब 'आजादी के बाद भारत' में एक राजनीतिक विश्लेषण के कथन को इन शब्दों में अंकित करते है:- “कांग्रेस के अन्दर भ्रष्टाचार, मोहभंग और गरिमा का स्तर बढ़ता ही जा रहा था।" इसके अलावा नेहरू ने यह स्वीकार किया था कि हमारा बनाया आदर्श और नैतिकता का ढांचा लगातार ढहता जा रहा है।
गांधी जी का डर सच होता दिख रहा था। पंचायत स्तर पर वोट बैंक तथा दलाली की बात जोर पकड़ रही थी। अब कांग्रेस में निचले पर गुटबाजी, षडयंत्र तथा वैमनस्यता फैलने लगी। धीरे-धीरे राज्यों के नेतृत्व स्तर पर गुटबाजी बढ़ने लगी। मंत्री पद कार्यसमिति अध्यक्ष पद के लिए आपसी संघर्ष लगा। इसका परिणाम यह हुआ कि कंग्रेस का आम जनता के साथ संपर्क बढ़ने के बदले उलट घटने लगा। अब बुद्धिजीवी तथा युवा समूह आपसी प्रक्रिया के तहत सोचने विचारने लगे। ये लोग अब कांग्रेस की गुटबाजी तथा संघर्ष को नापसंद करने लगे थे। अब अधिकतर युवा समूह कांग्रेस से अधिक विपक्षी दलों में जाना पसंद करने लगे। कांग्रेस को अपनी अगली पीढ़ी के लिए जो संवे शीलता दिखानी चाहिए थी नहीं दिखाई ऐसा नहीं था कि नेहरू को यह मालूम नहीं था। नेहरू तो बार-बार अपने भाषण में कांग्रेस को एक संगठन के तौर पर कमजोरी से अवगत कराते थे। 1957 में तो उन्होंने खुलकर कहा कि कांग्रेस की स्थिति एक कमजोर तथा लाचार संगठन ही बन गयी है तथा अपने अतीत से कुछ सीखी नहीं है। अगर हम अभी भी नहीं सुधरे तो हमारा भविष्य अंधकारमय है।
कांग्रेस से सोशलिस्टों का निकलना भी इस नकारात्मकता के लिए एक कारण माना जा रहा था। नेहरू यह जानते थे कि समाजवादियों से कांग्रेस की दूरी कांग्रेस में कटता को बढ़ा रही है तथा एक प्रकार की असंवेदनशीलता पार्टी में घर कर रही है। उन्होंने यानी नेहरू ने समाजवादियों के प्रति अपना परम्परागत आदर दिखाया तथा जय प्रकाश नारायण जैसे नेताओं को तो भाई कहकर बहुत अधिक ही महत्व दिया 1948 से ही नेहरू चाहते थे कि समाजवादी कांग्रेस साथ हो जाए। पर जय प्रकाश नारायण की नाराजगी कांग्रेस से बहुत अधिक थी जय प्रकाश नारायण ने उदारता के लिए दिसम्बर 1948 में नेहरू को एक पत्र लिखा और यह कहा कि “आप कहने के लिए समाजवादी हो जाते हैं और करने के लिए पूंजीपती" इसके अलावा उन्होंने हड़तालों पर प्रतिबंध के कानून को फासीवादी तक करार दे दिया नेहरू ने इन झंझावतों के बाद अपना मन बदल लिया तथा कहा कि सोशलिस्ट " गैर जिम्मेदार है तथा गैर रचनात्मक भी " 
जय प्रकाश नारायण एक खुले दिल के नेता थे उन्होंने अनी वाणी से भारतीय राजनीति को एक नया रास्ता प्रदान किया था। जय प्रकाश नारयण नेहरू के प्रखर विरोधी थे। वे नेहरू की नीति और नियंता को फसीवादी बताते थे। उन्होंने नेहरू ने सरकार की 'मजदूर विरोधी' नीतियों को 'हिटलरशाही' कहा।
1952 के आम चुनाव के बाद नेहरू ने समाजवादियों के साथ काम करने का सबसे गंभीर प्रयास किया उन्हें उम्मीद थी कि आर्थिक विकास को सुदृढ़ करने और अपनी कांग्रेस के अंदर वामपंथी नीति तथा सोच को मजबूत करने के लिए एक व्यापक मोर्चा बनाया जा सकता है। 1957 में उन्होंने समाजवादियों को कांग्रेस के साथ सहयोग करने की अपील की। उनके 14 सूत्रीय कार्यक्रम में कुछ विशिष्ट संवैधानिक सुधार, प्रशासनिक और भूमि सुधार तथा बैंको और बीमा क्षेत्र के राष्ट्रकरण के मुद्दे शामिल थे।
नेहरू जयप्रकाश नारायण के कई मुद्दों से बिल्कुल सहमत थे, परंतु वे इसके लिए पहले से किसी वादे के खिलाफ थे। यदि वे स्वयं ऐसा कार्यक्रम अपनी पार्टी से स्वीकार और लागू करवा सकते तो फिर उन्हें सोशलिस्टों की जरूरत क्यों पड़ती।उन्हें इस सहयोग की जरूरत दरअसल इसलिए थी क्योंकि कांग्रेस के अंध वामपंथी घटक को मजबूत करने के बाद ही वे ऐसा करने में सफल हो सकते थे। बात सीधी थी कि रेडिकल कार्यक्रम सामाजवादी के कांग्रेस में शामिल होने का परिणाम होता । धीरे-धीरे कांग्रेस और सोशलिस्टों के बीच नफरत बढ़ी क्योंकि जयप्रकाश नारायण अपनी शर्तों से हटे ही नहीं तथा नेहरू को भी अपनी पार्टी से दबाव था।
अब नेहरू यह सोचने लगे कि कांग्रेस समाजवादी कार्यक्रम बिना सोशलिस्टों के बीच आगे बढ़े। उन्होंने इसके लिए कांग्रेस के अंदर की वामपंथी ताकतों को ही आवश्यक बताया विपीन चन्द्रा अपनी पुस्तक में दोहराते हैं कि सोशलिस्ट एक शैतान से भी अंधिक कांग्रेस से नफरत करते थे। नेहरू ने 1951 में जय प्रकाश नारायण को एक पत्र लिखा जिसमें उनकी मांग को 'वाहियात' करार दिया। था जयप्रकाश नारायण पर साम्प्रदायिक दलों की गोदी में खेलने का आरोप लगाया। जवाब में जयप्रकाश नारायण ने नेहरू पर एक राष्ट्रीय नेता से एक संकुचित पक्षपाती नेता होने का आरोप लगा दिया। 
सोशलिस्ट पार्टी की यह विचारधारा कांग्रेस विरोध के आधार पर अधिक टिकी थी राजनीति ने सोशलिस्ट पार्टी को काफी कमजोर करार दिया स्वयं वह पार्टी विभाजन की शिकार हुई तथा अधिक रूप से सोशलिस्ट कांग्रेस में शामिल होते चले गए।
जब नेहरू को लगा कि सोशलिस्ट कांग्रेस का मिलन नहीं होने वाला है तो कांग्रेस के समाजवादी पक्ष को वह उभार देने लगे। 1953 में भूमि सुधार लागू करने तथा 1955 में अवाड़ी कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने नियोजन के लक्ष्य को समाजवाद से जोड़ने की बात कहीं तथा राष्ट्रीय संसाधन को समानता के आधार पर बाँटने की बात कही। इसके अलावा विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं ने सामाजिक परिवर्तन के लिए अधिक प्रतिबद्धता से कार्य करने को संकल्पित दिखने की इच्छा जाहिर की। नेहरू ने योजनाओं के जरिए यह कोशिश कि सामाजिक समरूपता को जमीनी स्तर पर प्राप्त किया जाए तथा सही सही संधान (संसाधन) का वितरण हो ।
कांग्रेस की नजदीकी नेहरू ने वामपंथी धारा से बढ़ाने की कोशिश की तथा कई प्रयास भी किए। वास्तव में विभिन्न अधिवेशनों तथा प्रस्तावों में कांग्रेस- वामपंथ के बीच की दूरी को मिटाकर एक नयी राह पर नेहरू जाना चाहते थे। उन्होंने कृषि में वामपंथी विचार को शामिल करते हुए सहकारी कृषि की भी अवधारणा सामने लाने का प्रयास किया। नेहरू को दक्षिणपंथी दलों से सख्त नफरत थी। उनकी यह दूरी कभी मिटी भी नहीं पर वामपंथी दलों की नजदीकी के बावजूद वह आलोचना भी करते थे।
समाजवाद के प्रति अपनापन तथा संकल्प से भी कांग्रेस के वैचारिक पतन को रोका नहीं जा सकता उनकी देश में आलोचना बढ़ने लगी जनता में कांग्रेस की छवि नकारात्मक रूप से बढ़ने लगी तथा पार्टी के अंदर भी बहुत तनाव होने लगे कांग्रेस कार्यकर्त्ता में लोभ-लालच की लालसा पैदा होने लगी। निचले स्तर पर भी कार्यकर्ता अब पद के भूखे हो गए थे। अब कांग्रेस संरक्षणवादी हो चली थी। अब विपक्षी पार्टी जीतने लगी तथा नेहरू के उत्तराधिकारी की बात की जाने लगी। उस समय के मद्रास के मुख्यमंत्री (के. कामराज) ने कांग्रेस में नयी जान फूंकने के लिए कामराज योजना पर भी कार्य किया। तथा इस योजना के तहत 1963 के कांग्रेस कार्य समिति में यह प्रस्ताव पेश किया गया कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल तथा राज्यों के मुख्यमंत्री अपने पदों को अपनी इच्छा से त्याग दे तथा पार्टी के विकास के लिए कार्य आरम्भ कर दे।
कामराज योजना के तहत सभी मुख्यमंत्री तथा केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने त्यागपत्र दे दिया तथा नेहरू पर छोड़ दिया गया कि उन्हें किसका त्यागपत्र स्वीकार और आस्वीकार था नेहरू ने 6 केन्द्रिय मंत्रियों के इस्तीफे को स्वीकार कर लिया। इनमें लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी भाई, एस. के. पातीक, जगजीवन राम, बी. गोपाल रेडड्ी, के. एल. श्रीमाली इत्यादि थे।
कामराज योजना बहुत देर से आई। 1964 में जनवरी में कामराज को ही कांग्रेस अध्यक्ष बना दिया गया था कामराज के अध्यक्ष बनने के बाद भी कांग्रेस की स्थिति नहीं सुधरी तथा प्रदेश स्तर तक मोह लालच की क्षमता बढ़ने लग गयी। कहा गया कि कामराज योजना मोरारजी देसाई के व्यक्तिगत विरोध में थी। सन 1964 में कांग्रेस का पतन उस समय भी चल रहा था जब नेहरू की मृत्यु हो गयी।
शास्त्री जी प्रधानमंत्री बने । शास्त्री जी के छोटे से कार्यक्रम में कोई बड़ा उलट फेर कांग्रेस में नहीं हुआ 1960 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस के सामने एक अधिक मजबूत विपक्ष था। सही तौर पर अब कांग्रेस को समाजवादी, जनसंघ तथा सी. पी. एस जैसे सदस्यों से प्रतियोगिता करने की सीख लेनी थी।
1966 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी के अंदर की मुसीबतों का समाना करना पड़ा इस समय एक ऐसी कांग्रेस थी जिसकी जनता अब उससे रूठ चुकी थी। पार्टी का पतन भी लगभग था हो गया तथा अब कांग्रेस निष्क्रिय होती जा रही थी। अब कांग्रेस की समितियां गुटबाजी का अडड्डा़ बन गयी थी। हरेक राज्यों में असंतोष का सामनना करना पड़ रहा था। श्रीमति गांधी का कांग्रेस के अंदर कोई बड़ा नहीं था। जब उनका मंत्रिमण्डल बना तो एक प्रधानमंत्री के अलावा कुछ नहीं बदला। पार्टी के अध्यक्ष कामराज एवम् सिंडिकेट लगातार प्रधानमंत्री की तुलना में संगठन की महत्ता को अधिक महत्व देते थे। वे पार्टी के नीति निर्धारण को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहुंच से दूर रखना चाहते थे। जिसके आम चुनाव को देखते ही इंदिरा गांधी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तथा उनका अनुभव भी इसकी इजाजत नहीं देता था।
1967 के आम चुनाव के बाद कांग्रेस अपना जनादेश खो चुकी थी। लोग अब कांग्रेस के नेताओं की भोगवादी संस्कृति से तंग आ चुके थे। अब जनता अंधेरी रात की तरह सुबह की प्रतीक्षा में लगी थी क्योंकि कोई विपक्ष में भी नहीं था जो विकल्प बन सके। अब लोगों में जागरूकता आ गई थी। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व प्रदेश के मुख्य गुट को समर्थन देने लगा। अब गुटबाजी कोई असहनीय बात नहीं रही।
1967 के चुनाव में संयुक्त विपक्ष दल अब दक्षिणपंथी पार्टियों को भी विपक्षी पार्टियां स्वीकार करने लगी। तमिलनाडु में स्वतंत्र, सी. वी. एम मुस्लिम लीग तथा जाति आधारवादी डी. में. के सहयोगी बन गए। केरल में सी. पी. एम. फिर एक हो गए तथा पंजाब में अकाली दल - जनसंघ - सी. पी. एम. थे।
1967 के चुनाव परिणाम में कांग्रेस को 284 सीटें मिली तथा कांग्रेस ने 8 राज्यों, बिहार, यू. पी, राजस्थान, पंज. ब, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मद्रास में अपना बहुमत भी गंवा कर दिया। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा में जनसंघ, उड़ीसा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गुजरात में स्वतंत्र पार्टी तथा बिहार में. एस. एस. पी. एवम् पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट मुख्यविपक्षी दल बन गया।
1967 के चुनावों में अल्प तरीके से गठबंधन बना तथा दल बदल का आरम्भ हो गया। अब छोटे-छोटे दलों की स्थिति अच्छी होने लगी तथा तमिलनाडु को छोड़कर सभी राज्यों में गठबंधन की सरकार बनी । कांग्रेस भी कई राज्यों में गठबंधन में शामिल थी। अब सरकारों का 5 साल तक चलना अवश्यंभावी नहीं रह गया था। अब बड़े मंत्रिमंडल बदलाव तक राष्ट्रपति शासन का दौर चलने लगा।
1967 के चुनावों के बाद सिंडिकेट जो कांग्रेस का प्रभावी समूह था उसे धक्का लगा। इस बार इनके सभी नेता चुनाव हार गए तथा अब इनकी नियंत्रक वाली मुहिम खत्म हो गयी अब इंदिरा गांधी की कांग्रेस में स्वीकार्यता बढ़ गयी तथा एकमात्र प्रतिद्वन्द्वी मोरारजी भाई के अलावा कोई नहीं था। अब मोरारजी भाई को कांग्रेस में एक प्रभुत्व वाला मानने के लिए उप प्रधानमंत्री पद दिया गया। 1969 में कांग्रेस का विभाजन भी हुआ। 1969 में सिंडिकेट इंदिरा गांधी को प्रध ानमंत्री पद से हटाने की मुहिम चलाने लगे। इंदिरा गांधी अधिक स्तर पर जनता से जुड़ा रहना चाहती थी तथा जनमत को अपनी तरफ करना चाहती थी अब वह हरेक विपरीत परिस्थिति के लिए तैयार थी ।
1969 मई में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद कांग्रेस के अन्दर विभाजन की रूपरेखा एक घटनाक्रम में बढ़ी। अब सिंडिकेट ऐसा राष्ट्रपति बनाना चाह रहा था जो उसके इशारे को महत्व दे। 12 से 13 जुलाई के बीच बैंगलोर पार्टी अधिवेशन ने इंदिरा गांधी का विरोध करते हुए नीलम संजीव रोडड्ी को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के तौर पर खड़ा किया।
अब इंदिरा गांधी के सामने दो ही विकल्प थे कि सभी घटनाओं का चुपचाप समर्थन करते रहे तथा दूसरी तरह बिना किसी से डरे वह सोचते रहे कि प्रधानमंत्री पद एक शक्तिशाली पद है और जिस पर में विराजमान हूँ। उन्होंने यही सोचा तथा विपक्षी गुट को अपने विकास की रणनीति से पीछे कर देने की बात कही उन्होंने अक्रामक विकास का रास्ता बनाया तथा मोरारजी भाई को वित्तमंत्री से इस्तीफा दिलवा दिया। उन्होंने अपना वित्तमंत्री खुद को चुना तथा 1969 के 21 जुलाई को अध्यादेश लाकर 'राष्ट्रीयकरण बैंक विधेयक' को पारित करवा लिया। इसमें 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। आम जनता और वामपंथ ने उनकी इस घोषणा का स्वागत किया।
अब इंदिरा गांधी अधिक लोकप्रिय हो गई थी। इंदिरा गांधी अब नीलम संजीव रेडी के बदले वी. वी. गिरी को अपना समर्थन देना चाहती थी। अब उनके पास एक अंश था कि औपचारिक रूप से किस प्रत्याशी के लिए नामांकन दाखिल किया है, उसका विरोध कैसे किया जाए? इस स्थिति में सिंडिकेट एक भयानक गलती थी। अब सिंडिकेट स्वतंत्रता पार्टी से यह आग्रह किया वह रेडी के पक्ष में मतदान करें अब इंदिरा गाँधी को अवसर मिल गया तथा साम्प्रदायिकता के नाम पर वह सिंडिकेंट का विरोध करने लगी। उन्होंने यह कहा कि रेडी के लिए जनसंघ तथा स्वतंत्रता पार्टी की तरफ से एक समर्थन का पक्ष देना असहनीय होगा। श्रीमति गांधी अब खुलकर वी. वी गिरि का समर्थन करने लगी। और रेडड्डी़ के लिए जारी करने में इनकार कर दिया। उन्होंने सदस्यों को स्वतंत्र तथा विवेक से मतदान करने के लिए अपील की। चुनाव में करीब एक-तिहाई कांग्रेसियों ने अपने सांगठनिक नेतृत्व की अवहेलना करते हुए वी. वी. गिरी को वोट दिया जो बहुत ही कम वोट से जीत गए।
अब इंदिरा गांधी और सिंडिकेट के बीच का अलगाव खुलकर सामने आ गया था। इंदिरा गांधी कांग्रेस के दो पक्ष को रेखांकित करती थी। उनका कहना था कि कांग्रेस का एक समूह साम्प्रदायिकता को प्रमुखता दे रहा है। तथा उधर सिंडिकेट ने भी इंदिरा गांधी पर पाखण्ड का आरोप लगाया तथा यह कहा कि इंदिरा गांधी वामपंथी तानाशाही की तरफ बढ़ रही है।
अब सिंडिकेट ने इंदिरा गांधी को ही अनुशासनहीनता के कारण कांग्रेस से निकाल दिया। पार्टी विभाजित हो गई तथा इंदिरा गांधी ने एक अलग पार्टी की स्थापना की जिसे कांग्रेस (आर) यानी रिक्विजशनिष्ट कहा गया। सिंडिकेट के प्रमुख वाली कांग्रेस का नाम कांग्रेस (ओ) कहा गया। अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में 705 सदस्यों में से 446 इंदिरा गांधी के साथ थे।
कांग्रेस (R) एक बहुस्तरीय पार्टी बन गई। अब इंदिरा गांधी पार्टी और कांग्रेस की सर्वमान्य नेता बन चुकी थी। अब कांग्रेस में इंदिरा गांधी के सामने कोई बड़ा नेता नहीं था।
1970 में ही इंदिरा गांधी जी ने लोकसभा को भंग कर दिया फरवरी 1972 के अपने नियत कार्यकाल में 1 वर्ष पहले ही चुनाव कराने का निर्णय सोच समझकर लिया गया था। अब कांग्रेस, जनसंघ तथा सोशलिस्ट पार्टी उनके सामने विपक्ष में थी। इंदिरा हटाओ का नारा बना तथा व्यक्तिगत रूप से लांछन लगाने के प्रचार के लिए चुनाव को याद किया गया। उधर इंदिरा गांधी विभिन्न मुद्दों पर भाषण देती रही तथा विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को जनता के सामने रखती गई। उन्होंने ‘गरीबी हटाओं' का नारा दिया वे चुनाव जीत गई तथा 518 में 352 स्थान कांग्रेस (ओ) ने प्राप्त किया फिर 1979 के चुनाव में कांग्रेस को इंदिरा गांधी के काल में ही चुनाव का काल का भयंकर रूप से देखना पड़ा 1980 में कांग्रेस फिर सत्ता में आई लेकिन 1984 में कांग्रेस को इंदिरा गांधी की हत्या से धक्का लगा। अब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तथा कांग्रेस राजीव गांधी की हो गई। 1984 में कांग्रेस को चुनाव में भयानक जीत मिली। 543 सीटों में से कांग्रेस को 415 सीटें मिली। राजीव अमेठी से चुनाव जीत गए 1989 में कांग्रेस को बोफोर्स का मुद्दे ने हरा दिया तथा वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने। 1991 में राजीव गांधी की निर्ममता पूर्वक हत्या के बाद कांगेस की स्थिति दूसरी हो गई अब पी. वी नरसिम्हाराव प्रधानमंत्री बने तथा अध्यक्ष भी। 1996 में कांग्रेस की हार के कारण सीता राम केसरी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना पड़ा तथा 1998 में सोनिया गांधी के इस राजनीति में पदार्पण के बाद उन्हें जबरन त्यागपत्र देना पड़ा। 1998 से सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष रही तथा 2004 में कांग्रेस को वामपंथी दल के समर्थन से सरकार बनाने में उनको सफलता मिली। 2004-2011 तक अब कांग्रेस में अध्यक्ष की प्रतिष्ठा को प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा (मनमोहन सिंह) से ऊपर आंका जाने लगा तथा विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री को कठपुतली प्रधानमंत्री तक कहने से नहीं चूक रही थी। 2014 तक कांग्रेस का क्षय हो गया था तथा बुरी तरह कांग्रेस को हार मिली या ये कहलें कि इतिहास की सबसे बुरी हार। अब 2017 में सोनिया-राजीव के बेटे राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया तथा कांग्रेस लगातार विपक्षी पार्टी के रूप में अपना कार्य कर रही है।
कांग्रेस की हालत सही रूप में नेहरू के समय की निर्विवाद रूप में लोकप्रिय थी। इनके अलावा कोई भी नेतृत्व नेहरू की विरासत को उनके समान विवाद नहीं रह सकता।
4. विपक्ष (Opposition)
भारतय स्वतंत्रता के बाद संसदीय इतिहास में कांग्रेस के प्रभुत्वशाली आधिपत्य को कड़ा मुकाबला करने के लिए विपक्ष के ऐसे भी दाव थे जो अपनी लोकप्रियता तथा सिद्धांत से उस समय से लेकर वर्तमान तक अपनी छाप छोड़ चुके हैं। नेहरू जी के समय काम की बात की जाए कि जयप्रकाश नारायण बाबू एक महान विपक्षीय नेता थे तथा नेहरू के समानान्तर एक व्यक्तित्व के तौर पर जयप्रकाश बाबु को देखा जाता था।
स्वतंत्रता प्रप्ति के बाद विपक्षी दलों के प्रभाव की व्याख्या करने में सबसे पहले हमें सोशलिस्ट पार्टी की चर्चा करनी आवश्यक है। स्वतंत्रता के बाद विपक्षी दलों में से सोशलिस्ट पार्टी के प्रति ही जनता की काफी उम्मीदें थी। इस पार्टी के पास देश के महान नेता सर्वश्री जयप्रकाश नारायण थे। इनके अलावा इस पार्टी में और भी लोकप्रिय नेता थे जैसे:आचार्य नरेन्द्र देव, अच्युत पटवर्द्धन, अशोक मेहता, डॉ. राममनोहर लोहिया और एस. एस. एम जोशी इत्यादि। सोशलिस्ट पार्टी के सामने एक प्रकार की दुविधा रही कुछ जीवंत पत्रकारों ने सोशलिस्ट पार्टी के बारे में यह बार-बार लिखा कि अगर सोशलिस्ट पार्टी के कांग्रेस से संबंधो की सुविधा अगर नहीं होती तो सोशलिस्ट पार्टी 1950 से ही कही अधिक प्रखर रहती। उनका कहना सही भी था। इस पार्टी का जन्म 1934 में हुआ और उस समय से वह कांग्रेस का अंग बनकर साथ रही। लेकिन इस पार्टी का उस समय भी अपना एक अलग संविधान, अलग सदस्यता तथा अपनी विचारधाराएं थी।
सोशलिस्ट कुछ मुद्दों पर साफ थीं। इन्होंने संविधान समय का बहिष्कार किया तथा कैबिनेट मिशन का भी बहिष्कार किया।
सोशलिस्ट ने अंतरिम सरकार में कोई रूचि नहीं दिखाई तथा कांग्रेस कार्य समिति में जाने से भी इनकार किया। सोशलिस्ट पार्टी ने भारत विभाजन को आक्रमकता के साथ अस्वीकार किया तथा ये स्वतंत्रता के बाद भारत को एक समाजवादी देश के रूप में देखना चाह रहे थे। उन्होंने नेहरू को एक 'दक्षिणपंथी बुर्जुआ पार्टी' वाली कांग्रेस का प्रध नमंत्री कहा।
1948 में कांग्रेस ने यह नियम बनाया कि किसी दूसरी विचारधारा वाले सदस्य कांग्रेस कार्य समिति के सदस्य नहीं हो सकते। अतः 1948 में सोशलिस्टों ने कांग्रेस को छोड़ दिया। सोशलिस्टों द्वारा कांग्रेस छोड़ कर बाहर निकलना उनके लिए एक ऐतिहासिक गलती साबित हुई। सही तौर पर देखा जाए तो इस पार्टी की विचारधारा इस बात पर टिकी थी कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस अपनी स्थिति को सोशलिस्टों से जोड़ना चाहती है तो गैर समाजवादियों से संबंध तोड़े। शलिस्ट पार्टी द्वारा कांग्रेस समर्थित नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस में शामिल होने से इनकार करने पर सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष हरिहरन शास्त्री ने शोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र देते हुआ कहा:- राष्ट्रीय क्रान्ति का अधूरा कार्यभार यह मांग करता है कि कांग्रेस और सोशलिस्ट सहित देश के सभी प्रगतिशील समूह जनता के सभी लक्ष्य के प्रति संपूर्ण रूप से समर्पित हो ।
कांग्रेस में दक्षिणपंथी धारा का विरोध समाजवादी धारा ने यह कहते हुए जो किनारा कर लिया कि कांग्रेस दक्षिणपंथ के चंगुल में फंसते हुए चली जा रही है। दक्षिणपंथी धारा के इतने विरोध होने के बावजूद वह कांग्रेस से नहीं निकली। 
कांग्रेस से सोशलिस्ट के निकलने के बाद कांग्रेस के अंदर वामपंथी विचारधारा को कमजोर कर दिया। इसका परिणम यह हुआ कि नेहरू कठोर नेताओं के साथ अपनी योजना को मूर्त रूप देने लगे। इस प्रकार अब वामपंथी विचारधारा कमजोर होने लगी। सोशलिस्ट अपनी अच्छी नेतृत्व शक्ति तथा महान लक्ष्य के बावजूद भी अपने विनाश की तरफ बढ़ गयी क्योंकि कांग्रेस से निकलने के बाद इस पार्टी की दुविधा अधिक बढ़ गयी ।
1951-52 के चुनाव में सोशलिस्टों की पार्टी ने 12 सींटे हासिल की तथा सबसे बड़ी बात कि इस पार्टी के बड़े-बड़े नेता हार गए। इसे सिर्फ 10.6% मत प्राप्त हुए।
5. किसान मजदूर प्रजा पार्टी
जून 1951 में किसान मजदूर पार्टी की स्थापना हुई तथा जे. वी. कृपलानी ने इस पार्टी की स्थापना कांग्रेस से बागी होकर की थी। गांधीवादी होने का दावा करते हुए कांग्रेस के कार्यक्रम और नीतियों से सहमत होते हुए इस पार्टी ने उन्हीं कार्यक्रमों को असलियत में लागू करने का वादा किया। इसके दो नेता पी. वी घोष तथा टी. प्रकाशन पश्चिम बंगाल और मद्रास की कांग्रेस सरकारों के मुख्यमंत्री रह चुके थे। जबकि कृपलानी 1950 तक कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके थे। और अभी-अभी अपने पुनर्वाचन का दाव हार चुके थे। इन लोगों के कांग्रेस छोड़ने का कारण व्यक्तिगत ही था और जे. वी कृपलानी का कांग्रेस छोड़ने का कारण मात्र इस तरह से व्यक्तिगत ही था न कि कोई वैचारिक पक्ष।
किसान मजदूर प्रजा पार्टी ने भी आम चुनाव में बहुत उम्मीद से भाग लिया परन्तु इसके परिणाम भी सोशलिस्ट पार्टी से अधिक ही खराब थे। इसने 9 सीटे लोकसभा में प्राप्त की तथा इसे 5.8% मत प्राप्त थे। इस पार्टी ने राज्य विधानस. भाओं में 77 मत प्राप्त किए।
चुनाव के बाद सोशलिस्ट पार्टी तथा किसान मजदूर पार्टी दोनों ने आपस में विचार कर राजनीति करने का फैसला किया। इन दोनों दलों को महसूस हुआ कि उनके बीच कोई विचारधारात्मक मतभेद नहीं है। कृपलानी की इच्छा तथा उचित रूप से एक जातिविहीन, वर्ग विहीन समाज बनाने की थी। जिसमें कोई सामाजिक, राजनीतिक समाज कहते थे और कृपलानी इसे सर्वोदय समाज कहते थे।
दोनों पार्टियों के विलय के बाद पुन: सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की गई। जिसके अध्यक्ष कृपलानी और महासचिव अशोक मेहता बनाए गए। यह पार्टी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन गई जो कांग्रेस का सबसे बड़ा विकल्प बनकर उभरी। इस पार्टी को बहुत दिनों तक अपनी एकजूटता बनाकर रखना असंभव लगा तथा नियमित रूप से इनके कार्यकर्ता अलग रहे। इसके अधिकतर नेता काफी मात्रा में इस पार्टी से निकाले गए।
आरम्भ से ही इनकी अपनी भूमिका एक विपक्ष के रूप में क्या हो? इस पर काफी दुविधा थी। सबसे अधिक क्षति इस पार्टी को इस कारण पहुंची जिसकी चर्चा हमने आरम्भ में की। कांग्रेस के प्रति क्यो रवैया अपनाना चाहिए? इस पर कोई ठोस सिद्धांत नहीं अपनाने से इस पार्टी को विभाजित कर दिया।
सोशलिस्ट पार्टी में लोहिया जैसे व्यक्तित्व भी थे। जो कांग्रेस के प्रखर विरोध के पक्ष में थे, इन्होंने कहा कांग्रेस और वामपंथी दोनों से हमें समान दूरी बनाकर रखनी चाहिए तथा पार्टी को उग्र विरोध का रास्ता अपनाना चाहिए। लोहिया ने जनता के पक्ष के लिए उग्रविरोध में किसी सीमा के पक्ष में नहीं थे। लोहिया दुविधापूर्ण राजनीति से बहुत खुश नहीं होते थे। लोहिया संसद अंदर अपने ओजस्वी भाषण से नेहरू को जवाब देने पर मजबूर कर दिया करते थे। सही तौर पर देखा जाए तो लोहिया के पास कोई पृष्ठभूमि शक्तिशाली पार्टी के तौर पर नहीं होने के कारण इनके नेतृत्व का मार्ग दर्शन भारत की जनता को उनके सत्ता में नहीं आने के कारण से नहीं मिल सका। सोशलिस्ट पार्टी भी कमजोर होती चली गई। 1955 के अन्त में लोहिया और उनके समर्थन पार्टी से निकल गए तथा 1956 में आचार्य नरेन्द्र देव की मृत्यु हो गई। 1954 में तो जयप्रकाश बाबु राजनीति को ही अलविदा कर चुके थे। 1957 के आम चुनावों के बाद उन्होंने राजनीति से पूरी तरह सन्यास ले लिया और यह घोषणा की कि पार्टी आधारित राजनीति भारत के लिए उचित नहीं है। जयप्रकाश बाबु ने पार्टी छोड़ी 1971 तक तो आधी से अधिक पार्टी ही कांग्रेस में जा मिली सबसे बड़े नेता लोहिया जो 1967 में स्वर्ग को प्राप्त हो गए तथा 1971 में लोहियावादी सोशलिस्टों का भी चुनाव में पतन हो गया।
6. भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी
भाजपा को तो 1936 तक कांग्रेस का ही एक भाग माना जा सकता था। कांग्रेस की कार्यशैली को न पसंद करने के कारण 1945 में कांग्रेस को छोड़ दिया गया। स्वतंत्रता के बाद भाजपा ने एक नयी शुरूआत की। हजारों की संख्या में इसके समर्थनक थे। इसके पास कई योग्य नेता और हजारों की संख्या में समर्पित अनुशासित नेता थे जो काफी सक्रिय थे। इनकी पहुंच भारत के किसानों, मजदूरों के पास तक थी तथा यह सर्वहारा वर्ग की एक पार्टी बन गई थी। फिर भी पार्टी के अन्दर असंतोष तथा गुटबंदी का दौर उत्पन्न हो गया तथा 1964 आते-आते भाजपा दो टुकड़ो में बँट गयी भाजपा ने पहले भारत की स्वतंत्रता को स्वीकार किया तथा बाद में सोवियत संघ के निर्देश पर कह दिया कि ये स्वतंत्रता तो झूठी है अब तो 15 अगस्त उनके लिए स्वतंत्रता दिवस नहीं वरन् गद्दारी दिवस हो गया था। उनका कहना था कि नेहरू साम्राज्यवादी शक्तियों के पिठु हैं। अब भाजपा धीरे-धीरे सशस्त्र किसान संघर्ष का समर्थन करने लगी। पार्टी उग्रवादी रवैये में चलती जा रही थी तथा कई राज्यों में इस पार्टी को प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा।
1951-52 के आम चुनाव में भाजपा को 61 सींटो पर चुनाव लड़ने के बाद 23 सीटें मिलीं वहीं 1957 में 27 सीटें मिली तथा केरल में विधानसभा में बहुमत भी प्राप्त किया। 1962 में 29 लोकसभा सीटें मिली। भाजपा कई परिवर्त्तनों से गुजरी 1953 में उन्होंने स्वीकार किया कि भारत एक स्वतंत्र विदेश नीति को मान रही है तथा 1956 में यह भी स्वीकार किया कि भारत अब सही तौर पर स्वतंत्र हो चुका है। तथा एक सम्प्रभु राज्य है परन्तु नेहरू सरकार पूंजीवादी है तथा हमें एक जनवादी भूमिका अदा करनी है। 1958 के अमृतसर अधिवेशन में घोषणा हुई कि सामंतवाद को प्रेरित करना सिर्फ संसदीय रास्ते से ही संभव है जब भाजपा को बहुमत मिलेगा तो संपूर्ण नागरिक अधिकार की प्राप्ति होगी। 1961 के विजयवाड़ा अधिवेशन में तो यह प्रस्ताव पारित किया गया कि कांग्रेस के अच्छे कामों का समर्थन किया जाएगा।
परन्तु 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय भाजपा की रणनीति क्या हो? इस मुद्दे पर पार्टी के अन्दर काफी मतभेद उत्पन्न हो गया। पार्टी के एक धड़े ने भारत सरकार का समर्थन किया तथा दूसरे धड़ा नेहरू सरकार की कमजोरी के आधार पर विरोध करता रहा। चीन के प्रति सहानुभूति भाजपा में हमेशा रही तथा चीन ने भी भाजपा को उसकी आंतरिक नीतियों में हस्तक्षेपित किया।
1964 में भाजपा टूट गई। एक भाग दक्षिणपंथी का था तो दूसरा वर्ग वामपंथी रुझान का था । वामपंथी रूझान वाला हिस्सा मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के तौर पर जानी गई यह विभाजन सैद्धांतिक आधार पर भी था।
भाजपा के अनुसार भारतीय सत्ता तंत्र एक पूंजीपति वर्ग का समूह है जो विदेशी पूंजी के साथ लगातार सहयोग करतेजा रहे हैं। चूंकि कांग्रेस वर्गीय शासन का सबसे प्रमुख हथियार है, इसलिए उसे नष्ट किया जाना तय किया गया। भाजपा तो संविधान को ही जन विरोधी बताती थी लेकिन अपने संघर्ष को संविधान के अनुरूप ही चलाने को संकल्पित थी। भाजपा ने सशस्त्र विरोध की बात कही तथा यह भी कहा कि सामंतवाद विरोध के लिए शस्त्र उठाना उचित है।
भाजपा कई टूट के बाद त्रिपुरा की तरह पश्चिम बंगाल में सरकार बना पाई तथा त्रिपुरा, बंगाल में तो लगभग 28 वर्षो तक शासन भी किया। सही तौर पर माने तो कम्यूनिस्ट पार्टी 1996 के सरकार में केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में शामिल भी हुई लेकिन भाजपा ने दूरी बना ली। ज्योति वसु की तरफ से 'न' कहा गया परन्तु बाद में पोलित ब्युरो की तरफ से खेद भी व्यक्त किया गया।
7. भारतीय जनसंघ
भारतीय जनसंघ की स्थापना औपचारिक रूप से 1951 में की गई थी। एक दक्षिणपंथी पार्टी के तौर पर इसके विकास तथा निर्माण की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्वयं सेवक जंघ की धारणा को रेखांकित किया जा सकता है जिसकी स्थापना 1925 में की गई थी। जनसंघ की संगठनात्मक शक्ति का स्त्रोत आर. एस. एस. ही रहा। भारतीय विचारक भारतीय जनसंघ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राजनैतिक शपथ के तौर पर ही कहते रहे है।
भारतीय जनसंघ के नेताओं को उच्च प्रशिक्षित तथा कड़े तौर पर अनुशासित करने का कार्य आर. एस. द्व मूल एसरा ही होता था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना हिन्दुस्तान की अवधारणा पर की गई थी। इन्होंने भारत के नागरिकों की रक्षा मतलब हिन्दूओं की रक्षा को महत्व दिया तथा अपने आपको हिन्दू तथा समानता संस्कृति का रक्षक बताया। इसलिए आरम्भ में ही आर. एस. एस के नेता इस संगठन को एक सांस्कृतिक संगठन कहते हैं।
विपक्षी नेताओं की बात की जाए तो इन्होंने यह कहा कि जनसंघ की पहचान एक साम्प्रदायिक पार्टी की है। तथा इस ने साम्राज्यवाद का विरोध न करके अपना चेहरा तथा परियच दे दिया है। 1947 के विभाजन के तुरंत बाद जनसंख्या की लोकप्रियता काफी स्तर पर बढ़ी क्योंकि हिन्दू का एक बड़ा समूह जनसंघ में अपनी सुरक्षा को देखने लगा। गांधी जी की हत्या के बाद आर. एस. एस के नेताओं को गिरफ्तार कर लिया तथा इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
हालांकि यहां पर यह कह देना उचित है कि गांधी जी की हत्या से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कोई मतलब नहीं था। परन्तु अपनी विचारधारा में यह संघ गांधीजी की पाकिस्तान नीति का विरोध किया करता था। जैसे कि 1947 में तत्कालीन संघ चालक गोलवरकर ने गांधी जी पर सभी हिन्दूओं को मुसलमान बनाने की साजिश करने का आरोप लगाया तथा कांग्रेस को मुसलमान परस्त पार्टी बताया। उन्होंने कांग्रेस की यह कहकर निंदा की कि मुसलमान की करतूतों को कांग्रेस शांति-अहिंसा के मुखौटे छिपा देना चाहती है।
1948 में आर. एस. एस के उपर लगे प्रतिबंध को उठाने के लिए 1949 में काफी प्रयास किया गया। 1949 में आर. एस. एस के नेताओं ने यह शपथ ली कि राजनीति में भागीदारी नहीं की जाएगी। अब जनसंघ की स्थापना 1981 में इसी के विकल्प को भरने के लिए की गई। जनसंघ को आर. एस. एस. के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए कहा गया। तथा ‘मुखौटा संगठन' के तौर पर जनसंघ को बार-बार यह कहा गया कि आर. एस. एस अपनी विचारधारा जनसंघ के द्वारा ही सामने रखने का प्रयास करता रहा है ।
1951 में जनसंघ की स्थापना के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा से मिलने के बावजूद आर. एस. एस का किसी भी तत्कालीन चालक ने प्रत्यक्ष रूप से जनसंघ में हस्तक्षेप करने की कोशिश नहीं की। 1951 में जनसंघ के अध्यक्ष डॉ. श्यामा मुखर्जी हुए तथा थोड़ी स्वतंत्रता भी इस पार्टी को एजेण्डे के स्तर पर प्राप्त हुई। 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद जनसंघ का एक नया रूप देखने को मिला। 1954 में इस पार्टी के तत्कालीन नेता और अध्यक्ष मौली चन्द्र शर्मा ने पार्टी और है की वर्चस्व संबंधी बातों को लेकर त्याग पत्र दे दिया। इसके बाद से जनसंघ का है से संबंध खुलकर सामने आ गया। जनसंघ ने अपने विचार को मिश्रित अर्थव्यवस्था, नियोजन तथा सार्वजनिक नीतियों के आधार पर ही रूप दे दिया। इस पार्टी ने जमींदारी उन्मूलन, भूमि हदबंदी तथा किसानों के प्रति सहायक नीतयों का औपचारिक समर्थन किया। इसने अपने आर्थिक कार्यक्रम में खेतिहर मजदूरों, जमीन जोतने वाले किसानों, श्रमिकों, उद्योगों तथा आधारभूत उद्योगो की पहचान को अपने आर्थिक नीति में प्रश्न दिया।
जनसंघ ने अपने आपको सभी भारतीयों के पक्ष के लिए एक पार्टी बनाया तथा मुसलमानों को भी अपनी पार्टी में जगह दी। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि हमें हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना है। बल्कि भारत राष्ट्र का निर्माण करना है। जनसंघ नियमित रूप से दूसरी पार्टियों पर तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही है। डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी नेहरू को मुसलमानों के तुष्टीकरण करने से हमेशा सावधान करते रहे। जनसंघ ने आगे चलकर "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" की बात कही तथा गैर हिन्दुओं को भी भारतीय संस्कृति में विश्वास करने की इच्छा उत्पन्न करने की कोशिश करने की योजना बनायी गयी।
1971 के युद्ध के समय जनसंघ में 'अखण्ड भारत' का नारा दिया तथा पाकिस्तान के प्रति एक व्यवहारी नीति को अपनाया 1977 में जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हो गया तथा अटल बिहारी वाजपेयी भारत के विदेश मंत्री बने तथा पाकिस्तान के लिए एक अनुशासित तथा सौम्य नीति की रूपरेखा बनायी गयी।
जनसंघ ने भारतीय संस्कृति तथा भारतीय राष्ट्रवाद की स्थापना के दौर से प्रचारित करने की कोशिश कि भारतीय संस्कृति को महान बताकर समान नागरिक संहिता तथा धारा 370 के खत्म की घोषणा अपने एजेण्डे में लेकर जनसंघ ने अपना प्रचार आरम्भ किया।
1952 में जनसंघ को लोकसभा की 3 सीटें मिली तथा 1957 में 4 सीटें मिली 1962 में जनसंघ को 14 सीटें मिली 1967 में यह 35 सीटें तक पहुंच गयी। 1971 में 22 सीटें मिली।
1977 में जनता पार्टी में विलय के बाद जनता सरकार में भी जनसंघ के लोग शरीक हुए। अटल जी विदेश मंत्री तथा आडवाणी जी भी मंत्रिमण्डल में थे। 1980 में अटल बिहारी बाजपेयी तथा आडवाणी जी ने जनसंघ को नया रूप दिया तथा बम्बई में 6 अप्रैल 1980 को 'भारतीय जनता पार्टी' की स्थापना की। इन्होंने 'हिन्दुत्व' की अवधारणा को विस्तृत रूप देने की बात कही तथा अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष बने ।
1984 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ 2 सीटें मिली अटल जी भी चुनाव हार गए तथा भाजपा की यह नई पार्टी आत्म मंथन के दौर में चली गयी। 1984 का चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ था। कांग्रेस को सहानुभूति लहर का फायदा मिला। भाजपा अपनी 2 सीटों से आगे बढ़ी तथा आडवाणी बाद में भाजपा के अध्यक्ष बने। 1987-88 में राम मंदिर के मुद्दे ने जोर पकड़ लिया तथा भाजपा इसे एक राष्ट्रीय मुद्दा बनाने लगी। मुरली मनोहर जोशी की यात्रा तथा आडवाणी के भारत भ्रमण से एक माहौल भाजपा के पक्ष में बना तथा 1989 के आम चुनाव में भाजपा को 89 सीटें मिली अटल जी तथा अन्य नेता चुनाव जीत गए। वी. पी सिंह की सरकार इन्होंने सम भी दिया। 1990 में आडवाणी के राम रथ यात्रा ने वी.पी. सिंह सरकार को अस्थिर कर दिया तथा चन्द्रशेखर कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने। आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। जनता में भाजपा के प्रति एक नया जुड़ाव उत्पन्न हुआ। 1991 में आम चुनाव हुए तथा भाजपा को 119 सीटें लोकसभा में प्राप्त हुई। उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली तथा मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकारें बनीं। आडवाणी लोकसभा में विपक्ष के नेता बने। 1991-92 भारत की राजनीति में एक अहम स्थान रखता हैं 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी ढांचा गिरा देने से एक नया माहौल बना तथा भारतीय जनता पार्टी राजनीति के केन्द्र में आ गयी।
1992 के बाद भारतीय जनता पार्टी को अधिकतर समूह सत्ता के लिए एक मुख्य विकल्प के तौर पर देखने लगे। 1995 में बंम्बई अधिवेशन में आडवाणी ने अटल जी को भाजपा के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताया तथा 1996 के चुनाव में भाजपा की पहली बार ने केंद्र में 13 दिन की सरकार बनी। भाजपा को 161 सीटें मिली। अब भाजपा को गठबंधन साथी भी मिल गया था। भाजपा अपने कुछ एजेण्डे जैसे धारा 370, नागरिक संहिता को होल्ड करने की भी बात इस काल में की क्योंकि संक्रमण काल में गठबंधन की मजबूरी भाजपा को पता थी। अस्थिर राजनीतिक स्थिति के कारण 1998 में भारतीय जनता पार्टी को 181 सीटें लोकसभा चुनाव में मिली तथा वह गठबंधन सहयोगियों के साथ फिर सत्ता में आयी।
अटल जी फिर मार्च 1998 भारत के प्रधानमंत्री बने। 1999 के मई में ए. आर. डी. एम. के (जयललिता) की पार्टी ने अपना समर्थन वापस ले लिया तथा जून में कारगिल युद्ध आरम्भ हो गया। अक्टूबर 1999 में फिर आम चुनाव हुए तथा भाजपा को अपने सहयोगियों के साथ बहुमत मिला। इस बार भाजपा अटल जी के नेतृत्व में ष्टछक । ष्ठ बनकर गयी थी। जनता ने इस गठबंधन को समर्थन दिया। अटल जी के नेतृत्व में भाजपा ने 5 साल स्थिर सरकार दी तथा पहली बार भाजपा के नेतृत्व में गठबंधन सरकार पुरे 5 साल भारत में चली।
2004 में ‘भारत उदय' अभियान के फेल होने के कारण भाजपा को हार का सामना करना पड़ा तथा सही तौर पर यह देखने को मिला कि कांग्रेस को बिना अधिक प्रयास किए वामपंथी दलों के सहयोगी सरकार में आने का मौका मिल गया। 
2009 के चुनाव में भाजपा को आडवाणी के नेतृत्व में फिर हार का मुंह देखना पड़ा। अब सही तौर पर एक नये नेतृत्व तथा दूसरी पीढ़ी को सामने लाने की बात कही गयी ।
2013 में भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया तथा अपने चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष भी। 2014 के आम चुनाव में भाजपा को अकेले बहुमत मिल गया। 282 सीटें भाजपा को मिली तथा गठबंधन के रूप में छक। को 335 सीटें मिलीं। कांग्रेस को स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस को सिर्फ 44 सीटें मिली।
2017 में भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में भी काफी सफलता मिली देश के हरेक कोने में भाजपा को विस्तार मिला है परन्तु सही तौर पर अभी भी यह कहा जाता है कि 'राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ' की नीति भाजपा के द्वारा ही फलीभूत होती है लेकिन यह सर्वविदित है कि जनता में भाजपा के प्रति विश्वास बढ़ा है तथा 30 साल बाद 2014 में भारत की जनता ने एक बहुमत की सरकार भाजपा के नेतृत्व को ही प्रदान किया।
भाजपा के अलावा क्षेत्रीय दलों का भी विस्तार हुआ है। 60 के दशक के बाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य में क्षेत्रीय दलों का विस्तार हुआ। तमिलनाडु में तथा आंध्र प्रदेश में डी. एम. के तथा अन्ना डी. एम. के. या तेलुगु देश की स्थापना क्षेत्रीय दलों के विस्तार की प्रक्रिया का सूचक है। दक्षिण के दो बड़े राज्यों में क्षेत्रीय दलों के विस्तार तो लगातार रहा है। ये दो राज्य जैसे तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश में अधिकतर क्षेत्रीय दलों की ही सरकारें रहीं। कांग्रेस के कमजोर होने से हिन्दी भाषी राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों का विस्तार हुआ । उत्तर प्रदेश जैसे सबसे बड़े राज्य में समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी की भी सरकारें बनी तथा बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की तथा जनता दल (यूनाइटेड) की सरकारें लगातार रही हैं।
क्षेत्रीय दलों का विस्तार क्षेत्रीय तथा स्थानीय विकास के लिए सकारात्मक भी माना जाता है परन्तु राष्ट्रीय स्तर पर एजेण्डा लागू करने तथा केन्द्र सरकार की स्थिरता के लिए क्षेत्रीय दलों की भूमिका विवाद में भी रही है।
1996 में क्षेत्रीय दलों का संयुक्त मोर्चा भी सरकार में रहा तथा राष्ट्रीय दलों को पहली बार सत्ता से बाहर रहना पड़ा सही तौर पर देखें तो क्षेत्रीय दलों के अपने स्थानीय तथा राज्य स्तरीय लक्ष्य होते है तथा केन्द्रीय स्तर के अधिक विस्तारित लक्ष्य पर ये दल अधिक ध्यान नहीं देते रहे हैं।
1990 के दशक से राष्ट्रीय पार्टियां खुलकर क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन करने लगीं तथा साथ में सफल सरकार चलाने लगे। महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना की सरकार तथा बिहार में भाजपा-जदयू की सरकार का उदाहरण दिया जा सकता है।
1996 के बाद दोनों राष्ट्रीय दल जैसे भाजपा और कांग्रेस ने विभिन्न क्षेत्रीय दलों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने का चलन आरम्भ किया। यह माना जाना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी की अवधारणा गठबंधन से ही आगे बढ़ी तथा कांग्रेस को भी क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन को मजबूर होना पड़ा।
यह सही तथ्य है कि क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। तथा एक बड़े स्तर पर भारतीय संसदीय राजनीति में ऐसे दलों की आवश्यकता है। वर्तमान काल में भारतीय राजनीति में सत्ता दल तथा विपक्षी दलों की आर्थिक नीति एक समान ही है तथा भारत के विकास के लिए लगभग एक ही नीति का सभी दल अनुसरण करते हैं।
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Sun, 01 Oct 2023 07:14:55 +0530 Jaankari Rakho
नेहरू युग (1951&1964) https://m.jaankarirakho.com/391 https://m.jaankarirakho.com/391 नेहरू युग (1951-1964)
1. “एक प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के योगदान की समीक्षा"
(नेहरू युग की गाथा - 1951-1964)
जवाहर लाल नेहरू एक व्यक्ति के रूप में तथा एक नेता के रूप में अलग-अलग तौर पर भारतीय इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। परन्तु आजाद भारत में अगर नेहरू की चर्चा होती है तो अधिकतर दो कारणों से ही होती है। एक तो राष्ट्रीय आंदोलन में स्वतंत्रता के लिए इनका योगदान अहम है और दूसरा कि स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में इन्होंने भारत को आधुनिक तथा विकसित बनाने के लिए नीवें (ठेंम) रखीं।
अगर गणतांत्रिक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू युग को व्याख्ययित किया जाता है तो इसमें 13 साल यानी (1951-1964) उनकी मृत्यु तक के कार्यकाल को रेखांकित किया जाता है नेहरू जब 1951 के आम चुनाव के बाद भारत के पहले स्व संवैधानिक प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने स्वतंत्रता की रात्रि में अपने दिए गए भाषण को दोहराया तथा तीन प्रमुख शब्दों पर काफी जोर दिया। (1) उम्मीद (2) आकांक्षा (3) आत्मविश्वास
इसमें उम्मीद नये भारत की तथा आकांक्षा विकास की तेजी की तथा आत्म-विश्वास इस विकास को पाने से जुड़ा हुआ है। अप्रैल 1953 में जवाहर लाल नेहरू ने अपने एक देश के नाम संबोधन में कहा था - " मैं उस समय तक आराम से नहीं बैठ सकता जब तक कि इस देश की महिलाएं, व्यक्ति, बच्चे को न्यूनतम जीवन स्तर तथा उचित व्यवस्था की सुविधा न मिलेगी। आपको धैर्य रखना होगा तथा यह सोचना होगा कि हमारा यह लक्ष्य सिर्फ 5 साल में संभव नहीं है।
इसमें कम से कम 15 साल लगेंगे। "
नेहरू बार-बार अपने भाषण में यह कहते थे कि "हमारा आत्मविश्वास अतुलनीय है तथा कभी-कभी उन मुसीबतों को लगता है कि हम जीत गए हैं लेकिन देश में जो उम्मीद का वातावरण है, भविष्य के प्रति देश में जो विश्वास है तथा अपने सिद्धांत के प्रति आस्था जो है उसमें एक नयी सुबह आयी है तथा इस नयी सुबह की रोशनी से इतिहास में एक नए नये युग का सूत्रपात हो रहा है। "
भारत में उस समय एक नयी उम्मीद का उफान था। आम जनता के मन में नये विचारों को एक घर मिल रहा था। नागरिक अधिकार, प्रजातंत्र, आर्थिक विकास, समाजवाद, योजना आयोग, नियोजन, वैज्ञानिक विकास की शुरूआत, औद्योगिक विकास की शुरूआत तथा धर्मनिरपेक्षता के एक नये आयाम से लोगों में आम भावना की एक नयी लहर दौड़ रही थी।
परन्तु कहानी का एक पक्ष यह भी था कि गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, विकास की धीमी रफ्तार तथा भूमिसुधार की समस्या जैसे मुद्दे अभी भी मुह बाए खड़े थे तथा इस बात को लेकर विशेष रूप से शिक्षित वर्ग में काफी नाराजगी बढ़ रही थी।
नेहरू ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने विभिन्न कार्यों से भारत की इतिहास की परिधि में अपना एक अलग स्थान बनाया। उनके कार्य के सागर में न जाकर कुछ विशेष मुद्दों पर ही चर्चा करना सही होगा।
नेहरू ने निम्न रूप में भारत की प्रगति के लिए अहम खांका खींचाः
1. आर्थिक नियोजन की शुरूआत
2. स्वतंत्र विदेश नीति का विकास
3. चुनावी प्रक्रिया का ईमानदारी से आरम्भ
4. जनतांत्रिक तंत्र को प्रगाढ़ बनाने की चेष्टा
5. एक महान प्रशासनिक व्यवस्था की स्थापना
6. लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में भारत की पहचान की कोशिश
7. विज्ञान एवम् तकनीक का विकास
8. भाषा तथा जनजाति के मुद्दे का समाधान
9. सबसे बड़े लोकतंत्र की अवधारणा का विकास
नेहरू ने सर्वप्रथम भारत में एक जनवादी सरकार की स्थापना पर जोर दिया। वैसे उन्होंने 1947 से ही जनवादी सरकार के लिए एक जनहित वाले संविधान की प्रक्रियागत विकास का कार्य आरम्भ कर दिया था। तथा इसके शीर्ष नेतृत्व में गांधी जी भी शामिल थे। 1951-52 के दौरान हुए चुनाव में एक जनवाद की उच्च भावना का उदय हुआ। यह आजाद भारत के महान जनतंत्र के लिए किया गया प्रथम महान संवैधानिक प्रयास था । यह चुनाव वयस्क मताधिकार के तौर पर करवाए गए 21 वर्ष से ऊपर के सभी समान नागरिकों को मताधिकार प्रदान किया गया। मतदाताओं की कुल संख्या 17 करोड़ 30 लाख थी। इसमें अधिकांश लोग गरीब, अनपढ़ तथा ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे।
नेहरू ने चुनावी व्यवस्था को एक ऐसे सिद्धांत के रूप में विकसित करने की वकालत की जो भारतीय जनतंत्र के लिए कार्य कर सके। मतदाताओं की कुल संख्या 1951 में 17 करोड़ 30 लाख थी। 224,000 मतदान केन्द्र बनाए गए थे। आबादी करीब 1 हजार पर एक मतदान केन्द्र बनाया गया था। करीब 10 लाख अधिकारियों को चुनाव के संचालन की जिम्मेवारी दी गयी थी।
इस चुनाव में कुल मिलाकर 14 राष्ट्रीय दल तथा 63 क्षेत्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों को सामने रखा गया। इसके अलावा भारी संख्या में स्वतंत्र उम्मीदवार 489 लोकसभा सीटों और 3,283 राज्य विधान सभी सीटों के लिए चुनाव मैदान में उतरे इनमें से लोकसभा की 98 सीटों और विधानसभाओं की 669 सीटें ब्धै के लिए आरक्षित थी। इसके अलावा लगभग 17,500 उम्मीदवार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के संपूर्ण चुनाव खड़े हुए। चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से लेकर 21 फरवरी 1952 तक 4 महीने चलते रहे।
इस चुनाव में जवाहर लाल नेहरू ने एक शक्तिशाली चुनाव अभियान की शुरूआत की। नेहरू ने करीब 40,000 किलोमीटर की यात्रा की और 7.5 करोड़ लोगों को यानी भारत की आबादी के दसवें हिस्से को अपने चुनावी दौरों में संबोधित किया सही तौर पर माना जाए तो नेहरू उस चुनाव के केन्द्र में थे।
खास तौर पर उन्होंने ‘सांप्रदायिकता' को अपने इस अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने अपने हरेक चुनावी भाषण में यह कहा कि अब सबसे बड़ा खतरा साम्प्रदायिक ताकतों की बढ़ती विचारधारा है, धर्मनिरपेक्षता हमारी पूंजी है अगर हम साम्प्रदायिक ताकतों को न तोड़ पाए तो यह भारत को तोड़ डालेंगे।
चुनाव बहुत ही स्वतंत्र, निष्पक्ष और व्यवस्थित ढंग से बिना अधिक हिंसा के सम्पन्न हो गया इस बात की उस समय विश्व भर में व्यापक सराहना हो गयी पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को कई एशिया में और अफ्रीकी देशों में चुनावों के लिए विशेष सलाहकार की हैसियत से आमंत्रित किया गया। मई 1950 में गणराज्य के राष्ट्रपति के रूप में डॉराजेन्द्र प्रसाद और उपराष्ट्रपति के रूप में डॉ. एस. राधाकृष्णन को चुन लिए जाने के साथ ही चुनाव प्रक्रिया पूरी हो गयी।
कुल लोकसभा सीट -  484, कुल राज्य विधान सभाओं की जीती गई सीट:- 3279
सूची में के. एम. पी. पी का मतलब किसान मजदूर पार्टी तथा आर. आर. पी राम राज्य परिषद्
इस आम चुनाव के द्वारा प्रारंभ की गई राजनीतिक व्यवस्था को कई राजनीति शास्त्रियों ने एक दलीय प्रधान व्यवस्था की शुरूआत माना है। सही तौर पर यह बहुदलीय व्यवस्था का आरम्भ था इसमें कांग्रेस को इस व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण अंग और स्थिरता की गारंटी करने वाली ताकत का विशेष स्थान प्राप्त था परन्तु संसद के अन्दर विपक्ष को अत्यंत प्रभावी तौर पर प्रदर्शन करते देखा गया।
एक ओर प्रगति हुई। इस प्रगति में ट्रेड यूनियन किसान सभा, हड़ताल बंद और प्रदर्शन जैसी अन्य राजनीतिक भागीदारी के उपायों के उपलब्ध रहते हुए भी अब मध्यवर्ग, संगठित मजदूर वर्ग, समृद्ध और मध्यम किसान आदि दलों के लिए चुनाव की प्रत्यक्ष राजीतिक भागीदारी का ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सबसे बड़ा माध्यम बन गया।
पहले आम चुनावों के दौरान भी हम कुछ विकास से विमुख नाकारात्मक ताकतों पर प्रवृत्तियों को देख सकते हैं जिसमें कांग्रेस के अंदर टिकट लेने के लिए असंतोष, वोट बैंक की धारणा तथा धनाढ्य लोगों की पहुँच इत्यादि है।
नेहरू के काल में तीन आम चुनाव हुए। 1952, 1957 तथा 1962', इसमें लगातार मतदाताओं की भागीदारी बढ़ती गयी। जहां 1951 में 40% मतदान हुआ वही 1957 में 47% तथा 1962 में तो करीब 54% ले गया। इन दोनों चुनाव में कंग्रेस को भारी विजय प्राप्त हुई। और कम्यूनिस्ट तथा जनसंघ की हार हो गयी। 1957 के काल में वामपंथी की सरकार बनी। जहां जनता के द्वारा चुनी गई दुनिया की पहली कम्युनिस्ट सरकार थी।
नेहरू ने जनवाद को मजबूत बनाने की कोशिश के साथ ही नागरिकों के विभिन्न अधिकारों की बात की तथा प्रेस की आबादी तथा न्ययालय की आदरणीय स्थिति को कायम किया गया। नेहरू संसद को सर्वोच्च मानते हुए उनमें विपक्षी नेताओं को बोलते देने के पक्ष में रहते थे। विपक्ष को जो संसद में स्थान मिला, उसका लाभ विपक्ष ने पूर्ण रूप से लिया तथा उसके प्रमुख नेताओं ने काफी मुद्दों पर सरकार को घेरा।
2. नेहरू की केबिनेट
नेहरू जी ने अपने तरीके से अपना मंत्रिमंडल बनाया था। इस ‘अपने तरीके' का अर्थ लोकतांत्रिक प्रणाली तथा स्वस्थ मानसिकता से है। यह प्रयास किया गया कि मंत्रिमंडल को सामूहिक रूप से चलाया जाए तथा कोई भी फैसले समूह के बहुमत से ही लिए जाएं। नेहरू जी के व्यवहार से उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी बहुत अधिक प्रसन्न रहते थे। सी. डी. देशमुख एक वित्तमन्त्री के रूप में बहुत अधिक विद्वान थे तथा नेहरू के बहुत ही अच्छे मित्र थे नेहरू युग के दौरान मंत्रिमंडल ने संविधानों में दिए गए विभिन्न प्रावधानों के तहत लोकतांत्रिक तथा लोक कल्याणकारी फैसले लेने के लिए बहुत अधिक प्रयास किया।
नेहरू ने संघवाद को मजबूत बनाने के लिए राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया तथा राज्यों की स्वतंत्रता का आदर करते हुए नेहरू कभी भी राज्य सरकार पर अपना निर्णय नहीं थोपते थे और ना ही उनके निर्णय में हस्तक्षेप करते थे। नेहरू की नीतियों में यह खास बात थी कि उनमें नेहरू का अपना चिंतन भी समाहित रहता था लेकिन वह किसी नीति को राज्य पर थोपने की कोशिश नहीं करते थे। इसका उदाहरण नेहरू की भूमिसुधार की नीति को हम देख सकते हैं। हम कह सकते हैं कि भूमि सुधार के लिए उन्होंने एक भी राज्य पर दबाव नहीं डाला क्योंकि वह जानते थे कि राज्यों की शक्ति तथा अधिकार सीमा में हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति नहीं रखना चाहिए। कुछ मायनों में राज्यों के शक्ति में हस्तक्षेप नहीं करने का कारण भारत की एकता को मजबूत करना भी रहा होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि उनके युग में राज्यों में भी कांग्रेस की सरकारे फिर भी राज्यों के नेतृत्व को अपना नेता चुनने का महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त था।
नेहरू के प्रधानमंत्री काल सेना पर नागरिक की श्रेष्ठता पूरी तरह से स्थापति हो गयी। सेना पूरी तरह से 'अराजनी. तिक' हो गई नागरिकों में सेना तथा सरकार पर पूरा भरोसा था। नेहरू के मन में अवश्य आता था कि सेना राजनीति में दिलचस्पी ना लेने लगे, इसलिए उन्होंने सैनिक बलों के आकार को छोटा कारना चाहा तथा पाकिस्तान के द्वारा अपनी सेना बढ़ाने के लिए अमेरिका से सहयोग लेने की बातों को भी उन्होंने नजरअंदाज कर दिया। सैन्यबल पर खर्च भी काफी कम रखा गया जो राष्ट्रीय आय के 2% से भी कम था।
3. नेहरू की प्रशासनिक व्यवस्था
नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय नागरिक सेवा (ICS) जो अंग्रेजो के द्वारा बदली गयी थी, वहीं थी। लेकिन अब उसे पूरी तरह बदलने की जिम्मेवारी थी। इस सवाल पर पहले नेहरू और पटेल के बीच मतभेद था पटेल गृहमंत्री होने के कारण प्रशासन पर नियंत्रण रखने में नेहरू छै और पूरी नौकरशाही के विरोध में थे। उनका कहना था कि कठोरता छै में भरी पड़ी हैं। 1946 में उन्होंने मौजूदा प्रशासनिक ढांचे का वर्णन करते हुए कहा कि यह राज्य का जहाज है जो एकदम बेकार और टूट गया है इसे हटाकर अब नया कुछ बनाना पड़ेगा इसकी तरफ पटेल यह सोच रखते थे कि प्रशासनिक तंत्र बनाए रखना अति आवश्यक है क्योंकि इस देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में है तथा अराजकता का वातावरण घर कर रहा था पटेल ने कहा कि इसकी कठोरता के कारण इसका करना भारत की आंतरिक सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करना होगा।
इससे· प्रशासनिक शून्यता कायम हो जाएगी जो ठीक नहीं है। उन्होंने 1948 में अखिल भारतीय सेवा की संविधान सभा में यह कहकर प्रशंसा की कि अगर अखिल भारतीय सेवा को आप हटा देंगे तो निश्चित यह माना जाए कि पूरे देश में अराजकता के अलावा कुछ नहीं मिलने वाला है। उन्होंने यह भी कहा कि 1947 के समय विभाजन की परछाई में अगर सिविल सेवकों ने ठीक से काम नहीं किया होता तो यह संघ कब का टूट गया होता नेहरू पटेल की बातों को न मानने के मूड में थे लेकिन अराजकता तथा आंतरिक सुरक्षा की बिनाह पर बाद में तैयार हो गए तथा धीरे-धीरे प्रशासनिक सेवाओं को उन्होंने स्वीकार किया। काफी समय होने के बाद वे प्रशासनिक सेवक की तारीफ कर थकते नहीं थे। क्योंकि एक निरक्षर तथा गरीब भारत में सुयोग्य प्रशासनिक अफसरों का होना एक लाभ की बात थी। तथा सेवाओं को नागरिक कल्याण के लिए पहुंचाना भी एक अहम बात थी । प्रशासनिक व्यवस्था की मदद से भारत की सामाजिक कल्याणकारी तथा आर्थिक विकास की योजनाएं लागू करना प्राथमिकताओं में था।
परन्तु नेहरू प्रशासनिक सेवाओं के नकारात्मक रवैय से भी काफी चिंतित रहते थे। उन्होंने 1951 में एक भाषण में कहा कि हम पूरी तरह अधिकारिक सेवाओं तथा एजेसियों पर निर्भर होते जा रहे है तथा ये पूरी तरह अपनी ऐसी नीति लागू करना चाहते हैं जिसका आम जनता से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। नेहरू ने इन सेवाओं को बदलने की सोची। उनका मत दो बातों का था, एक तो 'पुनः प्रशिक्षण' तथा दूसरा "नये लोगों को नियुक्ति", कोई भी मत उन्होंने लागू नहीं किया भारतीय प्रशासनिक सेवा को आई. सी. एस. के ही तर्ज पर बनाया गया। नेहरू ने इन मुद्दों पर अधिक ध्यान नहीं दिया प्रशासनिक अफसरों की कठोरता तथा जनवादी विचारधारा को इस व्यवस्था में शामिल नहीं किए जाने का प्रयास तथा आधुनिक कार्य संस्कृति ना लाए जाने को लेकर नेहरू की आलोचना की जा सकती हैं क्योंकि प्रशासन समय के साथ बेहतरी के बदले बद्तर होता गया तथा यह आम नागरिक से दूर भी हो गया। इसमें 'नौकरशाही' और ‘भ्रष्टाचार' दो शब्दों की विशेषता महकने लगी। पदों में चोरी, घूसखोरी लाइसेंसराज, कोटा प्रणाली के कारण यह तंत्र और भी जटिल हो गया था। यह नैतिकता को लेकर प्रश्न था पर इसे ठीक करने के लिए कोई विशेष पहल नहीं की गई। यदि समय पर कठोर फैसले लिए गए तो युद्ध कालीन भ्रष्ट पथों को रोका जा सकता था और इस व्यवस्था के पतन को उत्थान की ओर मोड़ा जा सकता था।
प्रशासनिक व्यवस्था की आंतरिक गड़बडियों में सबसे अधिक वृद्धि परमिट राज तथा आर्थिक विकास है इसका कारण यह था कि सरकार के विकास संबंधी क्रिया-कलापों में इस परमिट राज का बढ़ना जारी रहा तथा इनके तंत्र में भ्रष्टाचार का बोल-बाला हो गया इसे एक नये तौर पर राजनीतिक - प्रशासनिक भ्रष्टाचार के बढ़ने के कई उदाहरण मिल सकते हैं। यह सही है कि प्रयास होते तो गांधीवादी - नैतिकता की बात कर इन कुकृत्यों को आंका जा सकता था। नेहरू लोक प्रशासन की इन समस्याओं से परिचित थे। नेहरू ने 1963 में मुख्यमंत्रियों को अपने लिखे अंतिम पत्र में "सरकारी तंत्र को मजबूत करने और अक्षमता तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ अनवरत संघर्ष" करने की आवश्यकता की तरफ इशारा किया।
'आजादी के बाद भारत' जैसी पुस्तक लिखने के वाले विपीन चन्द्रा नेहरू की उस उक्ति का विवरण देते हैं जिसमें नेहरू ने कहा था कि "भ्रष्टाचार विषय में बहुत चर्चाएं हो रही हैं। मुझे लगता है कि इस बारे में काफी बढ़ा-चढ़ा कर बातें कहीं जा रही हैं। परंतु फिर भी हमें महसूस करना चाहिए कि ऐसा सच में है और हमें अपने मजबूत इरादे और इच्छा शक्ति के साथ इसका सामना करने के लिए तैयार होना चाहिए। हमारा सरकारी तंत्र बहुत धीमी रफ्तार से चलता है और इसमें बहुत सारे अवरोध जो हमारे मन में आने वाली हर साहसिक योजना के रास्ते में आ खड़े होते हैं। मैं आप लोगों को इस बारे में इसलिए लिख रहा हूं कि हमें अपने सार्वजनिक जीवन को अवश्य स्वच्छ बना देना चाहिए।"
परंतु नेहरू के बारे में यह कहना कि उन्होंने सिर्फ अपनी बात कहकर जाने दिया तो गलत होगा। क्योंकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कुछ कदम भी उठाए गए लेकिन सबसे अधिक इस बात के लिए उनकी आलोचना होती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने कोई योजना या मुहिम नहीं चलायी । उनको यह महसूस होता था कि भारतीयों में इस से एक अफवाह घर कर जाएगी तथा अधिकारी तथा एजेंसी कोई भी रिस्क देने से घबराने लगेंगे।
4. नेहरू और वैज्ञानिक अनुसंधान तथा तकनीकि शिक्षा
नेहरू एक ऐसे नेता थे जिनका यह मानना था कि कोई भी देश विज्ञान तथा तकनीक के बिना अपना विकास नहीं कर सकता। 1938 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस को दिए अपने संदेश में नेहरू ने कहा कि विज्ञान एकमात्र ऐसा साधन है जो अकेला गरीबी, गदंगी और भूख में लड़ सकता है। इसके साथ ही विज्ञान की मदद से हम अशिक्षा, अंधविश्वास, संसाधनों की बर्बादी तथा 'अपनी संस्कृति' के प्रति निरूत्साह को खत्म कर सकते हैं।
नेहरू काल में विज्ञान एवम् तकनीक के क्षेत्रों में बहुत अधिक मात्रा में प्रयास किए गए। 1952 में भारत में पहला I. I. T खड़गपुर में खोला गया तथा इसके बाद मद्रास, मुबंई (बॉम्बे) तथा कानपुर और दिल्ली में भी खोला गया। इस प्रकार नेहरू के युग में इंजीनियरिंग तथा तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों की संख्या हजारों में पहुंच गयी। इसके बावजूद वैज्ञानिक अनुसंधान कमजोरी से पूर्ण था। क्योंकि वैज्ञानिक संस्थानों का विकास अफसर के हाथ में था। इस कारण नौकरशाही-तथा अफसरशाही के कारण इन संस्थानों में पैरवी अधिक मैरिट कम चलने लगी जिनसे परेशानी बढ़ने लगी तथा प्रतिभा पलायन होने लगा।
नेहरू ने परमाणु ऊर्जा के महत्व को समझते हुए कुछ बड़े कदम की घोषणा की उनका कदम था कि परमाणु ऊर्जा दुनिया के सामाजिक अधिक और राजनीति जीवन में एक क्रांति लाएगी तथा साथ ही देश की सुरक्षा क्षमता को प्रभावित भी करेगी। 1948 के आरम्भ में उन्होंने परमाणु ऊर्जा के प्रति अपनी सोच को इन शब्दों में जारी किया “भविष्य उनका होगा जो परमाणु ऊर्जा पैदा कर सकेंगे। यह भविष्य की सर्वप्रथम ऊर्जा बनकर रहेगा। स्वाभाविक रूप से सैनिक सुरक्षा भी इससे जुड़ी हुई है।"
औपचारिक रूप से 1948 में भारत सरकार ने परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की, जिसका अध्यक्ष ‘डॉ. होमी जहांगीर भाभा' को बनाया गया। यह आयोग भारतीय आयोग के तौर पर शांतिपूर्ण ऊर्जा बनाने तथा विज्ञान अनुसंधान को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान विभाग के तहत ही बनाया गया था जो सीधे प्रधानमंत्रीके दिशा-निर्देश में ही कार्य करता था।
1954 में भारत सरकार ने परमाणु विभाग को प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ही गठित किया जिसका अध्यक्ष होमी जहांगीर भाभा को ही बनाया गया। भारत का पहला परमाणु रिएक्टर, जो एशिया का भी पहला रिएक्टर था, ने बंबई में अगस्त 1956 में काम करना शुरू कर दिया था। भारत के आधुनिक और विकसित परमाणु कार्यक्रम में बहुत सारे परमाणु रिएक्टरों की स्थापना का लक्ष्य रखा गया था जो कुछ ही वर्षो में बिजली का भारी उत्पादन करने लगी हालांकि भारत परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण प्रयोग के प्रति समर्पित था, परंतु इस क्षमता का उपयोग आसानी से परमाणु बम बनाने के लिए भी किया जा सकता था।
भारत सरकार की सिर्फ परमाणु ऊर्जा-नीति ही लक्षित नहीं थी बल्कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी इन्होंने बहुत अधिक मात्रा में प्रयास करना आरम्भ किया 1962 में प्दकपंद छंजपवदंस ब्वउउपजजमम वित चबम त्मेमंतबी की स्थापना की गई तथा थुंबा में रॉकेट लॉचिंग फैसिलीटी स्थापित की गई। सैन्य साज- समान के उत्पादन की क्षमता का विस्तार करने के लिए कई कदम उठाए गए ताकि भारत रक्षा आवश्यकता की आत्मनिर्भरता को आगे ले जा सके। भारत ने रूपए की दशमलव प्रणाली तथा मापतोल की मीट्रिक प्रणाली को भी इस दौर में स्वीकार किया। हालांकि इस बात की चेतावनी भी दी जा रही थी कि अशिक्षा के कारण इसकी सफलता संदिग्ध है। वैज्ञानिक अनुसंधान एवम् तकनीक की ऐसी नींव पड़ी जिसमें परमाणु, तकनीक, रक्षा, अंतरिक्ष सभी कुछ शामिल थे जो भारत के भविष्य के लिए अति आवश्यक थे। 
नेहरू युग तथा सामाजिक क्षेत्र
वैसे तो भारतीय संविधान में भारतीय समाज के विकास के लिए अहम रास्ते बताए गए थे फिर भी नेहरू ने अपने स्तर से ‘सामाजिक कल्याण' के लिए विभिन्न प्रयास किये तथा, 'समाज के समाजवादी प्रारूप' को सबके सामने प्रस्तुत किया। ‘सामाजिक विकास' को नेहरू ने पंचवर्षीय योजना में शामिल किया ता उन्होंने 'सामाजिक सुधार कार्यक्रम' बड़े स्तर पर चलाने की कोशिश की। सामाजिक सुधार कार्यक्रम के तहत तीन कार्यों को बड़े स्तर पर लाने की कोशिश हुई। जैसे:- (1) भूमि-सुधार कार्यक्रम, (2) नियोजिक आर्थिक विकास, (3) सार्वजनिक क्षेत्र का तीव्र विकास। इसके अलावा मजदूरों के अधिकार और ट्रेड यूनियनों के विभिन्न अधिकार जैसे :- रोजगार की सुरक्षा, स्वास्थ्य, दुर्घटना बीमा का प्रावधान तथा हड़ताल करने का अधिकार शामिल है। संपत्ति के अधिक समतापूर्ण वितरण की दिशा में प्रयास किये गये। इस उद्देश्य को आयकर की ऊंची दर तथा आबकारी कर की नीति लागू की गई। शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक सुविधाओं का आमतौर पर विस्तार किया गया। नेहरू की सबसे बड़ी इच्छा समाज में सकारात्मक परिवर्तन की थी। 
नेहरू की सरकार ने सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से काफी प्रयास भी किए। 1955 में अस्पृश्यता विरोधी अधिनियम पास किया गया। जिससे किसी भी छुआछूत को अपराध बना दिया गया था। इसके अलावा सरकार ने विभिन्न संस्थानों में सामाजिक आरक्षण लागू करने की कोशिश की। सरकार ने ब्धै को समाज में ऊंचा स्थान प्राप्त करने के लिए वित्तीय सहायता तथा कानूनी सहायता पहुंचाने की भरसक कोशिश की।
विभिन्न योजनाओं के माध्यम से समाज में अनुसूचित जाति तथा जनजाति के विकास के लिए काफी प्रयास हुए। इसमें छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य, आवास, ग्रामीण विकास इत्यादि से संबंधित योजनाओं की चर्चा की जा सकती है जातीय असमानता तथा शोषण को खत्म करने के लिए काफी जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए गए।
नेहरू ने महिलाओं के योगदान के लिए काफी प्रयास किए। महिला के अधिकार तथा देश में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 1951 में हिन्दु कोड बिल प्रस्ताव लाने का प्रयास किया। इस प्रस्ताव का विपक्षी पार्टी खासकर जनसंघ ने काफी विरोध किया नेहरू ने इस कारण इस बिल को लागू करने पर रोक लगा दी गई क्योंकि इसे वह आम सहमति से लागू करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने 1951-52 के आम चुनाव में इसे एक मुद्दा बनाया।
1952 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नेहरू ने हिन्दू कोड बिल को विस्तारित रूप से कानून बनाकर लागू किया।
1. विवाह अधिनियम
2. तालाक प्रावधान
3. विवाह की उम्र सीमा
4. संपत्ति अधिनियम
इस प्रकार महिलाओं के अधिकार के लिए काफी महान कदम उठाए गए। लेकिन इन सब कानूनों में एक बहुत बड़ी कमजोरी तथा अभी तक जो समस्या है, उसकी जड़-छुपी थी कि यह कानून सभी धर्मो पर लागू नहीं किया गया उन्होंने ऐसे किसी बड़े कदम के खिलाफ आवाज बुलंद की जो अल्पसंख्यकों को इस देश में असुरक्षित महसूस करा सके। ऐसा नहीं है कि वह नहीं चाहते थे कि मुसलमान भी इस कानून में शामिल न हो परन्तु इस बात के लिए वह मुस्लिमों की इच्छा को प्रधानता देते थे। 
सामाजिक विकास में शिक्षा का योगदान एक महत्वपूर्ण पक्ष होता है। 1951 में कुल जनसंख्या का मात्र 16.6% ही लोग साक्षर थे। ग्रामीण जनसंख्या में यह भाग 6 प्रतिशत ही था । संविधान में यह निर्देश दिया गया था कि 1961 तक सरकार द्वारा 14 वर्ष की उम्र तक के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जाए। बाद में इसे समय के अनुसार 1966 तक कर दिया गया था। 1951-52 में सरकार ने शिक्षा पर खर्च की सीमा 19.80 करोड़ की थी वहीं यह 1964-65 तक बढ़कर 146.27 करोड़ हो गई। शिक्षा को राज्य सूची का विषय बनाया गया था इसलिए इसमें किसी भी वित्तीय कठिनाई को कम करने की बात की गई थी। कहा गया कि अगर वित्तीय दिक्कत शिक्षा के विकास में आए तो पूरी तरह से इसे औद्योगिक विकास के खर्च से कुछ कटौती कर पूरा कर लिया जाए ।
नेहरू ने बाल शिक्षा खासकर लड़कियों की शिक्षा में बहुत अधिक मात्रा में कार्य किया उनकी योजना को हम इस आधार पर सफल कह सकते हैं कि जहां 1950-51 में चौथी कक्षा तक के छात्रों की संख्या 1.37 करोड़ थी वहीं 1965-66 में वह 3.21 करोड़ हो गई। छात्रों की संख्या इसमें दो गुनी हो गई थी। माध्यमिक स्तर भी परिवर्तन काफी हुआ जहां 1951 में 10 लाख छात्र इस स्तर पर थे वहीं 1964 में 40 लाख हो गए। छात्राओं की संख्या तो 1.9 लाख से बढ़कर 10.2 लाख तक हो गई। इस दौरान माध्यमिक विद्यालय की संख्या 7,288 से बढ़कर 24,477 हुई। प्राथमिक एवम् माध्यमिक शिक्षा के बाद अगर उच्च शिक्षा की बात की जाए तो इसमें भी प्रगति दिखायी पड़ती है।
स्वतंत्रता के समय देश में सिर्फ 18 विश्वविद्यालय थे जबकि करीब उच्च शिक्षा में 3 लाख छात्र थे। 1964 तक विश्वविद्यालयों की संख्या 54 और कॉलेजों की संख्या 2,500 हो गई। स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों की संख्या 6.13 लाख हो चुकी थी। छात्राओं की संख्या 6 गुणा बढ़कर 22 प्रतिशत के करीब हो गयी थी। लेकिन प्राथमिक शिक्षा में प्रगति कम थी क्योंकि जनसंख्या का विस्तार अधिक हो रहा था।
प्राथमिक शिक्षा में अनिवार्य शिक्षा के लक्ष्य वर्ष 1966 के दौरान 6 से 14 वर्ष के बच्चे सिर्फ 61 प्रतिशत ही विद्यालय जा रहे थे। जिनमें छात्राओं की संख्या 43 प्रतिशत की थी।
सही तौर पर देखा जाए तो 1965 में ग्रामीण क्षेत्र में आबादी के आधार पर सिर्फ 95% के पास ही किसी स्कूल की उपलब्धता थी परन्तु अधिकतर स्कूल खुले आकाश में थे। इसके आलावा जो सबसे बड़ी समस्या थी, वह समस्या थी बीच में ही स्कूल छोड़ने वालों की अधिक संख्या पहली कक्षा में नाम लिखाने वाले 50% बच्चे स्कूल की चौथी क्लास एक जाते-जाते स्कूल छोड़ देते थे। फिर वापस निरक्षरता के घेरे में पहुंच जाते थे। पढ़ाई छोड़ने वालों में लड़कियों की संख्या लड़कों से बहुत अधिक थी। इसका अर्थ यह समझने में देर नहीं करना होगा कि शिक्षा का समान अवसर सबको प्राप्त नहीं हो रहा था। ग्रामीण लोगों की बहुसंख्यक आबादी इस लाभ से वंचित रहती थी। समय के साथ शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं होने के कारण और भी समस्याएं पैदा होने लगीं।
नेहरू के जेहन में यह बात थी कि शिक्षा की प्रगति असंतोष जनक है तथा इसे भरसक कोशिश कर सुधारने का प्रयास होना चाहिए नेहरू की यह उक्ति काफी लोकप्रिय है कि " अंतिम विश्लेषण में प्रत्येक व्यक्ति के लिए सही शिक्षा की उपलब्धि हमारी सभी मौलिक समस्याओं का समाधान" है। उन्होंने यह भी कहा कि औद्योगिक विकास को हम कुछ दिनों के लिए तो रोक सकते हैं लेकिन निचले स्तर पर शिक्षा का प्रसार हम रोक नहीं सकते जबकि उद्योगों के विकास की तीव्र इच्छा हमारे मस्तिष्क में है।
5. नेहरू जी तथा पंचायती राज की अवधारणा
प्रधानमंत्री नेहरू ने 1952 में पंचायती राज के महत्व को समझते हुए 'सामुदायिक विकास कार्यक्रम' आरम्भ किया। इसके प्रयास यानी सामुदायिक विकास कार्यक्रम की मिली-जुली प्रतिक्रिया के बाद 1959 में पंचायती राज का विकास किया गया। इस कार्यक्रम ने गांवों में कल्याणकारी राज्य का आधार तैयार करने की बात कही थी। प्रमुख रूप से इस कार्य के तहत गांवों के लोगों के जीवन स्तर में सुधार करने की बात कही थी।
सामुदायिक विकास कार्यक्रम 1952 में आरम्भ हुआ। इनमें 55 विकास खण्ड चुने गए। प्रत्येक खण्ड में 100 गांव और करीब 60 से 70 हजार की आबादी थी। 1959 तक प्रखण्डों के स्तर पर 6000 से अधिक पदाधिकारी तथा करीब 6,00,000 तक ग्राम सेवक अपने कार्य में लगे थे। इस कार्यक्रम में शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, कृषि सभी क्षेत्रों पर ध्यान देने की बात कही गई थी। इसमें सबसे अधिक जोर जनता को विकास कार्यक्रम में नीचे के स्तर तक जोड़ना था। इसका सबसे बड़ा लक्ष्य गांवों के लोगों को व्यापक अर्थो में देश के विकास में सम्मिलित करना था। इस कार्यक्रम में ग्रामीण तबकों को जीवन स्तर पर ऊंचा उठाने तथा अवसर की समता को परखने की बात कही गई थी। सामुदायिक विकास कार्यक्रम का विस्तार करने में कई सफलताएं प्राप्त थीं। जैसे :- बेहतर बीज, खाद आदि होने के परिणाम स्वरूप आम तौर पर खेती का विकास तेज हुआ और खाद्य उत्पादन बढ़ा। इसके अलावा सड़क, तालाब, कुआं, स्कूल तथा प्राथमिक चिकित्सक केन्द्र आदि का निर्माण शिक्षा तथा चिकित्सा स्तर पर काफी अधिक मात्रा में हुआ।
सामुदायिक विकास कार्यक्रम की कमजोरी का जिक्र 1957 में काफी स्पष्ट हो चुका था। 'बलबंत राय मेहता समिति' को इस कार्यक्रम के मूल्यांकन को कहा गया था। इस समिति ने इस कार्यक्रम के नौकरशाही के चंगुल में फंसने और लागों की भागीदारी के अभाव की जमकर आलोचना की। इस समिति ने यह सिफारिश भी की, कि ग्राम पंचायत को स्वशासित तरीके से विस्तारित किया जाए तथा इसे त्रि-स्तरीय बनाया जाए। नेहरू ने इनकी सिफारिशों को माना तथा 1959 में नागौर से पंचायती राज की शुरूआत कर दी। इसके साथ सामुदायिक विकास कार्यक्रम को जोड़ दिया गया तथा यह अवधारणा बनायी गयी कि सहकारिता को इसके सहयोग के लिए विकसित किया जाएगा।
इसमें हजारों सहकारी संस्थाओं का जाल बुन दिया गया, सहकारी बैंक, भूमि विकास बैंक, बाजार सहकारी समिति इत्यादि को इसमें जोड़ा गया ये सभी संस्थाएं स्वायत्त थी क्योंकि इसका संचालन चुनाव के आधार पर बनी संस्थाओं द्वारा किया जाता था। ग्रामीण विकास में पंचायती राज का योगदान बढ़ रहा था। इसके परिणाम अच्छे भी आए परन्तु अभी भी इसकी संवैधानिकता तथा जनता के बीच अहम भागीदारी बाकी थी।
6. नेहरू की विदेश नीति
वर्तमान काल में नेहरू की जिन नीतियों की चर्चा सबसे अधिक होती है उसमें विदेश नीति सबसे अधिक है। नेहरू ने अपने तरीके से विदेश नीति का आधार तैयार किया था। उन्होंने भारतीय नीति को एक 'स्वतंत्र विदेश नीति' के तौर पर विकसित किया। इनकी अपनी सोच थी और यह सोच एक ही दिन में विकसित नहीं हो गयी थी। सबसे पहले इन्होंने भारतीय विदेश नीति को एक स्वतंत्र विदेश नीति क्यों कहा इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
नेहरू कदापि नहीं चाहते थे कि भारत की महान सभ्यता अपनी आवाज किसी 200 वर्ष के उपनिवेश के तौर पर विश्व के सामने रखे। इसके लिए उन्होंने यह कोशिश की कि एक महादेश के रूप में भारत को विश्व के सामने अपनी आवाज निडरता से और आँख में आँख मिलाकर रखनी चाहिए। इसलिए उन्होंने कहा कि हमारी स्वतंत्रता एक आवश्यकता है।
7. नेहरू की विदेशनीति तथा गुटनिरपेक्षता की बातें:-
नेहरू ने ‘गुटनिरपेक्षता' की भावना को एक संगठन रूप प्रदान किया। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का सही रूप में अर्थ यह है कि भारत जैसे देशों को किसी महान शक्ति के सैन्य गुटों का हिस्सा नहीं होना चाहिए। क्योंकि हमारी समस्याएं? महाशक्ति की समस्या से अलग हैं उनके गुटों के हिस्से बनकर हमारी अपनी समस्या गौण हो जाएगी नेहरू ने यह जोर देकर कहा कि जिस देश ने नवस्वतंत्रता की सुबह देखी है, उनकी आवश्यकता गरीबी, निरक्षरता, बीमारी, बुनियादी रचना की कमी जैसी समस्याएं है। ऐसे देशों का किसी सैनिक गुटों में शामिल होना अपनी आत्म हत्या करने के समान होगा। नेहरू ने अपनी विदेश नीति में दो शब्दों को भारत और विश्व के लिए अति आवश्यक बताया तथा यह कहा कि 'शांति' तथा ‘शांतिपूर्ण-वातावरण' विश्व के लिए भविष्य के लिए जनता के लिए अति आवश्यक है।
नेहरू की गुटनिरपेक्षता का मतलब उन्हीं के शब्दों में था:
1. वैश्विक मुद्दे पर स्वतंत्रतापूर्वक अपना विचार रखना।
2. स्वयं पहचान करना सही क्या है, गलत क्या है?
3. लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए कार्य करना
4. उपनिवेशवाद, रंगभेद तथा फासिज्म का विरोध करना ।
5. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भवना विकसित करना।
6. विश्व को एक परिवार समझना।
7. निःशस्त्रीकरण का प्रयास करना
गुटनिरपेक्ष भारत तथा अन्य ऐसे देश जो तुरंत स्वतंत्र हुए थे के लिए अपनी आजादी बरकरार रखने तथा उपनिवेशक देश के जुल्मों का विरोध करने का महान चिन्ह था। गुटनिरपेक्षता ने विश्व संबंधो के लोकतांत्रिकरण में मदद दी। उप. निवेशवाद के विरोध तथा पूर्व औपनिवेशिक देशो की सहायता के कारण भारत की गुटनिरपेक्षता नीति काफी अहम थी। नेहरू ने परमाणु युद्ध के विरोध में काफी संघर्ष किया तथा नेहरू ने गांधी की अहिंसा की नीति को अपनी विदेश नीति में सहमति के तौर पर समाहित करने के लिए विश्व भर से प्रशंसा पायी। नेहरू ने परमाणु निःशस्त्रीकरण की विचारध रा को अपने सामने एक महान मुद्दे के तौर पर रखा तथा भारत के महान उद्देश्य के तौर पर इसको रेखांकित भी किया।
नेहरू ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की अवधारणा को मूर्त रूप देने के लिए पंचशील सिद्धांत को पेश किया। विभिन्न लेखकों ने पंचशील सिद्धांत को सिर्फ चीन से जोड़कर देखा है लेकिन सही तौर पर यह भारत की नेहरूवादी दृष्टिकोण का स्मारक है।
8. पंचशील के 5 सिद्धान्त
1. परस्पर सम्प्रभुता का सम्मान।
2. एक-दूसरे पर पहले हमला न करने की नीति ।
3. एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करें।
4. समानता तथा आपसी लाभ के लिए सहयोग | 
5. शांतिपूर्ण सह अस्तित्व।
नेहरू ने अपनी विदेश नीति के कारण विश्व में एक आदरणीय नेता की छवि बनायी। 1 मार्च 1947 में जब भारत को औपचारिक आजादी नहीं मिली थी तब ही इनके प्रयास से 'एशियाई देशों' का सम्मेलन हुआ था। यह सम्मेलन दिल्ली में आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में 20 से अधिक देशों ने भाग लिया। अगला सम्मेलन दिसम्बर 1948 में हॉलैंड की इण्डोनेशिया पर नापाक कोशिश के विरुद्ध बुलाया गया था। इसमें नेहरू ने हिन्द महासागर से जुड़े देशों को बुलाया। इसमें अधिकतर एशियाई तथा ऑस्ट्रेलिया के देश शामिल हुए। यह कोशिश रंग लायी तथा न्छ० ने तय किया कि हॉलैण्ड को अपना दावा छोड़ना पड़ेगा। अतः हमें यह कहने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि नेहरू एक वैश्विक नेता के तौर पर पहचान बना रहे थे।
1955 में उपनिवेशवाद के विरोध में बाडुंग सम्मेलन इण्डोनेशिया में हुआ। यह सम्मेलन भारत तथा अन्य कोलंबो शक्तियों ने बुलाया था। इस सम्मेलन में विश्व शांति और निःशस्त्रीकरण की विचारधारा पेश की गई। फिर 1961 में बेलग्रेड शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ जिनमें मिस्र के नासिक, युगोस्लाविया के टीटो के साथ मिलकर नेहरू ने परमाणु निःशस्त्रीकरण तथा शांतिपूर्ण विश्व की अवधारणा रखी।
नेहरू की विदेश नीति का एक अहम पड़ाव भारत के आर्थिक हितों को आगे बढ़ाना था। तथा उस रास्ते को मजबूत करना था जो उसने चुना था । गुटनिरपेक्षता की बात को आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा लाभ था कि दोनों पक्ष के देशों के साथ आर्थिक संबंध बढ़ाने की कोशिश रंग ला रही थी । आवश्यकता पड़ने पर उसे पूँजी, तकनीके, मशीने, एवम् अनाज पश्चिमी देशों से मिले। खासतौर पर 1954 के बाद अपना सार्वजनिक क्षेत्र विकसित करने के लिए उसने सोवियत संघ का सहारा किया।
अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत ने हर तरफ के देशों से तकनीकी मदद लेने की कोशिश की। उदाहरण के लिए एयर फोर्स के लिए नेहरू काल में ही उसने वायु सेना के लिए फ्रांस से 104 तुफानी हवाई जहाज, इंगलैंण्ड से 182 हंटर और 80 कैनबरा, फ्रांस से 110 मिन्टर्स, सोवियत संघ से 16 ए. एन - 12 और 26 एम. आई 4 तथा अमेरिका से 55 फेयर-चाइल्ड पैकेट खरीदे।
सिर्फ रक्षा खरीद की ही कोशिश नहीं की गई बल्कि रक्षा उत्पादन के मामले में भी कोशिशें की गई। इस प्रकार विभिन्न देशों से रक्षा साजो-समान बनाने के लिए लाइसेंस लिये गए जैसे:- ब्रिटेन जेनैट इंटरसेप्टर जहाज, ब्रिटेन से बी. एच. एस. 748 माल वाहक जहाज, फ्रांस से अफूते हेलीकॉप्टर सोवियत संघ से मीग हेलीकॉप्टर, स्वीडन से एल. 70 विमान-भेदी-तोपें, ब्रिटेन से विजयंता टैंक, जर्मनी से ट्रक, स्वीडेन से एफ. 70, फ्रांस से मोटरि से इत्यादि।
एक स्वतंत्र देश जो गरीब था उसकी प्रतिरक्षा की कोशिशों को नकारा नहीं जा सकता। यह सबसे बड़ी बात थी कि इस खरीद से विभिन्न देशों के साथ संबंध बने । सोवियत संघ और भारत के बीच 1963 में एक महत्वपूर्ण हथियार संधि आरम्भ हुई। अगस्त 1964 अगस्त 1965 तथा नवम्बर 1965 में संधियों पर हस्ताक्षर किए गए भारत सोवियत संघ का यह संबंध कई मायने में उदाहरणीय था। ऐसा नहीं कि सिर्फ सोवियत के साथ ही पर अमेरिका के साथ भी हमारा बहुआयामी संबंध था कृषि निवास के उपकरण तथा विभिन्न रक्षा तकनीक भी अमेरिका से आती थी। कई बार तो अमे. रिका और रूस ने रूपयों में ही भुगतान लिया जिससे भारत की विदेशी मुद्रा बचायी जा सके।
ये संस्थाएं भारत की वैश्विक समस्या को समझकर इसे एक महान स्थान देती थीं। नेहरू ने इन संस्थाओं के महत्व को समझकर ही राष्ट्रमंडल में रहने का फैसला किया। इस कदम का देश में विरोध भी हुआ लेकिन नेहरू ने कहा कि आजाद भारत पर ब्रिटेन का कोई अधिकार नहीं था। बहुराष्ट्रीय संस्था में बने रहने का भारत को बहुत लाभ होने वाला है। राष्ट्रमण्डल की सदस्यता एक सुरक्षा के तौर पर भी थी क्योंकि उस समय की परिस्थिति में मित्र और दुश्मन की बात तथा तथ्य का पता ही नहीं चलता था।
विश्व भर के अलग-अलग देशों में UNO की शांति सेना के तौर पर भारत ने एक सक्रिय भूमिका निभायी। सही तौर पर नेहरू की गुटनिरपेक्षता नीति के कारण उस समय के आलोक में भारतीय नेतृत्व को एक वैश्विक पहचान दिलायी।
9. नेहरू तथा उनके नेतृत्व में विश्व के प्रमुख देशों के साथ संबंध: - 
9.1 चीन के साथ संबंध
नेहरू के मन में चीन के प्रति एक अतुलनीय भाव था । साम्राज्यवाद के विरोध में चीन की लड़ाई के कारण नेहरू की दृढ़ता चीन के साथ संबंध बढ़ाने की हो गई। चीन पर जापान द्वारा कब्जा करने के विरोध में जापानी वस्तुओं के बहिष्कार का नारा भी दिया था। चीनी जनतंत्र को 1 जनवरी 1950 को मान्यता देने वाला भारत प्रथम देश था। नेहरू की सोच में यह भावना थी कि चीन के साथ मिलकर गरीबी जैसे समस्याओं से लड़ा जा सकता है। ये दोनों देश मिलकर एशिया को विश्व में अपना उचित स्थान दिला सकते है नेहरू ने सुरक्षा परिषद में चीन को स्थान दिलाने का प्रयत्न भी किया। जब 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया तो भारत की आपत्ति इस बात पर थी कि उसे विश्वास में नहीं लिया गया।
परन्तु यह आपत्ति सिर्फ विश्वास में नहीं लिये जाने के कारण थी इस आधार पर नहीं कि चीन ने तिब्बत पर कब्जा क्यो किया भारत का पक्ष था कि इतिहास में ऐसे कई अवसर आए जब तिब्बत पर चीन का कब्जा रहा। 1954 में भारत और चीन ने एक संधि पर समझौता किया जिसके तहत भारत ने तिब्बत पर चीन के आधिपत्य को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया।
भारत और चीन के आपसी संबंधो को पंचशील के आधार पर तय करने की बात कही गई। सही तौर पर देखें तो सीमा विवाद के रहने के बावजूद एक कोशिश की गयी। चीन से संबंध गहरे भी हुए। वैश्विक मंच पर नेहरू ने बार-बार चीन की प्रशंसा भी की। 1959 में तिब्बत में बड़ा विद्रोह हुआ तथा दलाई लामा अपने हजारों अनुयायियों के साथ तिब्बत से भाग निकले चीन इससे बहुत दुःखी हुआ। भारत फिर भी कोशिश करता रहा नेहरू ने दलाई लामा को शरण तो दी लेकिन किसी भी सरकारी या राजनैतिक कदम चलाने की सख्त मनाही कर दी। चीन फिर भी नाराज था। चीन के इस गुस्से का नतीजा लद्दाख में देखने को मिला जब हमारे 5 भारतीय सुरक्षा बल के जवानों को मार दिया गया। चाऊ-एन-लाई को बातचीत के लिए अप्रैल 1960 में दिल्ली बुलाया गया। लेकिन कोई परिणाम नहीं आया। इसलिए अधिकारी स्तर पर बातचीत का रास्ता अपनाया गया।
1962 का विश्वास घात
चीनी विश्वासघात का आरम्भ 8 सितम्बर 1962 को ही हो गया जब थागला पर हमला कर भारतीय फौजों को हटा दिया गया लेकिन भारत इसे अधिक तूल देने की स्थिति में समय नहीं बर्बाद करना चाहता था। नेहरू की विदेश यात्रा चल रही थी जब चीनी फौज ने फिर से एक बड़े स्तर पर हमला कर दिया।
उस समय के नेफा (अरूणाचल प्रदेश) पर भारतीय चौकियों पर कब्जा कर लिया गया तथा भारतीय कमांडर को भगा दिया गया। चीनी अंदर घुस गए। 20 अक्टूबर 1962 को चीनियों ने गल्वान घाटी में तेरह सीमावर्ती चौकियों पर कब्जा कर लिया चुशुल हवाई अडडे पर खतरा बढ़ गया। चीन के इस कदम का भारत में कड़ा प्रतिवाद हुआ तथा नेहरू ने अमेरिका के राष्ट्रपति (कैनेडी) को पत्र लिखे। उन्होंने अमेरिका से सेन्य सहायता की मांग की। उन्होंने ब्रिटेन से भी सहायता मांगी।
24 घंटो में चीन ने स्वतः वापस जाने की एकतरफा घोषणा कर दी। चीनी जिस तरीके से अंदर आए थे, उसी प्रकार चले भी गए परन्तु नेहरू तथा देश के प्रति जो विश्वास घात का घाव छोड़ गए वह भरना मुश्किल था।
नेहरू को अपने प्रियतम की इस करतूत पर बहुत की बुरा लगा। उनके मस्तिष्क में चीन के प्रति एक अटूट विश्वास था जो टूट गया। आंतरिक स्तर पर नेहरू की आलोचना होने लगी। इसी कारण नेहरू के सपनों का भारत के लिए जो बजट था उसमें से कटौती कर अब रक्षा पर खर्च किए जाने की बात शुरू हुई। रक्षा मंत्री कृष्णमेनन को जाना पड़ा तथा कांग्रेस संसदीय उपचुनाव में हार गई।
भारत की विपक्षी पार्टीयों ने नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति को असफल बताया तथा उनकी नीति के लिए उन्हें जी भर कोसा। नेहरू अपने आपको समाजवादी कहते थे तथा सबसे बड़े समाजवादी देश ने ही उन के नेतृत्व वाले भारत पर हमला कर दिया।
अमेरिका और ब्रिटेन का रूख सकारात्मक रहा लेकिन पाकिस्तान के करने में ये देश कश्मीर के मामले में भारत पर दवाब बनाते गये। अमेरिका ने तो सैनिक सहायता के प्रयोग का भी संकेत दे दिया नेहरू किसी दबाव में नहीं आए। सोवियत संघ से रिश्ता बनाना आरंभ तो था ही। दीर्घकालीन विश्वास की इमारत खड़ी करने की कोशिश होने लगी। इधर चीन पाकिस्तान के तरफ दोस्ती बढ़ाने लगा।
9.2 पाकिस्तान के साथ संबंध
जवाहर लाल नेहरू ने यह जरूर कहा था कि अगर विभाजन से भी शत्रुता समाप्त होती है तो वह भी सही है। लेकिन उन्हें यह सोचने का अवसर नहीं मिला कि यह शत्रुता अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की हो चुकी है। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान के नापाक कश्मीर में हमले में जो प्रक्रिया आयी वह लगातार चलती रही भारत ने कश्मीर का विलय जबरदस्ती नहीं करवाया था। पाकिस्तान ने कश्मीर के प्रति लोभ को कभी जाने नहीं दिया नेहरू के युग में अमेरिका और ब्रिटेन तो पूरी तरह पाकिस्तान के पक्ष में थे।
नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र संघ में जाने तथा जनमत संग्रह स्वीकार करने की बात कही जिसकी आज भी हरेक चर्चा में आलोचना होती है। यदि भारत न्छ० में नहीं जाता तो पाकिस्तान जाता और तब संघ जनमत संग्रह के लिए कहता UNO ने जनमत संग्रह की शर्ते 20 रखी कि पाकिस्तान को कश्मीर से अपनी फौज हटानी होगी। पाकिस्तान ने ऐसा नहीं किया इधर कश्मीर ने संविधान सभा के चुनावों में भाग लिया और भारत में शामिल होने के लिए वोट दिया भारत सरकार ने यह स्थिति अपनाई कि संविधान का वोट जनमत संग्रह के बराबर ही है कश्मीर में आम चुनाव हुए भारत के साथ तथा जमानत संबंधी संग्रह का मुद्दा गौण हो गया।
1956 के बाद सोवियत संघ भारत को कश्मीर के मुद्दे पर समर्थन करने लगा तथा सुरक्षा परिषद में भारत पर आने वाले दबाव को वीटो कर देता था। 1962 में पाकिस्तान ने चीन का साथ दिया तथा 1965 में भारत को घिरा देख हमला कर दिया।
भारत-पाकिस्तान संबंधों की कटुता नेहरू तथा सभी भारतीयों के लिए दुख एवम् उदासी का स्त्रोत रहा दोनों ही देशों का इतिहास भूगोल संस्कृति के लिए 1953 में पाकिस्तान का दौरा भी किया सिंधु नदी जल समझौते में उन्होंने महान उदारता दिखलायी। सही तौर पर नेहरू पाकिस्तान की इन गीदड़ चालाकी को बचपना ही समझते थे। 
9.3 अमेरिका के साथ संबंध
भारत की नीति आरंभ से ही अमेरिका के साथ मित्रता की रही। भारत ने अमेरिका को यह साफ कर दिया कि नेहरू की गुटनिरपेक्षता किसी देश के खिलाफ नहीं वरण यह उपनिवेशवाद तथा गुटबंदी के विरोध में है।
भारत ने अमेरिका के साथ संबंधो को बहुत महत्व दिया नेहरू यह भली भांति जानते थे कि भारत के विकास में अमेरिका का अहम योगदान हो सकता है। भारत को अमेरिका की भयंकर आवश्यकता थी। अनाज, मशीन तथा विकास के लिए सहायता यह सभी अमेरिका के द्वारा ही हो सकता था।
कश्मीर संबंधी अमेरिका की नीति ने भारत-अमेरिका संबंध को जमा (तमेमतअम) के रखा अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में नेहरू काल में हमेशा पाकिस्तान का पक्ष रखा।
भारत में भूखमरी की स्थिति थी। अमेरिका भारत की अनाज भेजने की मांग तथा अनुरोध को चुप होकर सिर्फ सुनता रहा लेकिन जब चीन और सोवियत संघ ने सदस्यता आरंभ की तो अनाज से भरे जहाज आने लग गए।
अमेरिका के मन में भारत के प्रति सबसे बड़ी कटूता चीन के मामले को लेकर थी । अमेरिका ने भारत की चीन को दी मान्यता को पसंद नहीं किया। और इससे भी बड़ी बात थी कि नेहरू जी के न्छ० में चीन की सदस्यता की पुरजोर मांग की इससे USA और भी क्रोधित था।
भारत भी अमेरिका के कुछ फैसलों का विरोध करता था जैसे पाकिस्तान को सहायता उपलब्ध करना तथा पाकिस्तान को सेंटो, सिएटो में शामिल करना भी कम खतरनाक नहीं था। भारत की सबसे बड़ी आपत्ति इस बात को लेकर थी कि अमेरिका वैश्विक मंच पर 'गुटनिरपेक्षता' की नीति को अनैतिक बताता था । दूसरी बात गोवा को लेकर भी थी जिसमें अमेरिका खुले तौर पर गोवा को पुर्त्तगाल का भाग बताता था। 1961 में भारत की गोवा पर विजय की भी आलोचना अमेरिका ने की।
अमेरिका और भारत विश्व के सबसे बड़े दो लोकतंत्र हैं। लेकिन उस समय जो सबसे बड़ा दोनों में आलगाव कर जो स्त्रोत था वह था “शीतयुद्ध के बारे में अलग-अलग दृष्टिकोण " नेहरू का विचार इस विश्व को लेकर बहुरंगी था वही अमेरिका के अपने विचार थे जिसमें पूँजीवाद शक्ति बढ़ाना शामिल था अमेरिका का मानना था कि साम्यवादी विच. ार को तरजीह देने वाला स्त्रोत अनैतिक है। भारत, एशिया और अफ्रीका के देशों को गुटनिरपेक्षता की प्रेरणा देता रहा।
अमेरिका की नाराजगी का कारण ब्रिटिश चरण था ब्रिटेन के लोगों को भारत की स्वतंत्रता अंदर से पसंद नहीं। चीन? कांग्रेस के प्रति उनकी सोच नकारात्मक थी। यही सोच अमेरिका को भी प्रभावित करती थी। अमेरिका भी ब्रिटेन की तरह मानता था कि 'भारत तेरे टुकड़े होंगे। इसके अलावा अमेरिका उपनिवेश का भी समर्थन करता था। वह भूल गया था कि 200 साल पहले वह भी उपनिवेश का विरोध कर ही स्वतंत्र हुआ है।
सोवियत संघ से भारत की बढ़ती दोस्ती ने अमेरिका के मन में थोड़ा परिवर्तन कर दिया। भारत की स्थिति सुध री तथा अमेरिका ने 1961 में एक नयी शुरूआत की जब नेहरू के मित्र गॉलब्रेथ को भारत में राजदूत बनाकर भेजा। 
9.4 सोवियत संघ के साथ संबंध
भारत की स्वतंत्रता के समय सोवियत संघ भारत को साम्राज्यवाद के प्रभाव में रहने वाला देश समझता था। कांग्रेस के नेताओं की साम्यवाद के प्रति संदेहवादी दृष्टिकोण से रूस असहमत था। भारत जब राष्ट्रीमण्डल में सम्मिलित हुआ तो रूस ने इस पर मुहर लगा दी कि भारत अब भी साम्राज्यवाद के गोद में खेलेगा।
मगर नेहरू सोवियत संघ के प्रति मित्रता का भाव रखते थे। 1927 में वह रूस की यात्रा पर भी गए थे। इसके अलावा उन्होंने अपने आप को समाजवादी भी कहा था। नेहरू ने राजकीय संबंध बनाने के लिए अपनी बहन विजय लक्ष्मी पंडित को राजदूत बनाकर रूस भी भेजा।
रूस की सकारात्मक प्रतिक्रिया उस समय आई जब 1951-52 में कोरिया संकट के समय भारत ने साम्राज्यवाद विरोध किया सोवियत संघ ने भारत को खाद्य सहायता देनी आरम्भ कर दी। उस समय रूस में भारत के राजदूत एस. राधा कृष्ण कान से स्टालिन की मुलाकात हुई तथा स्टालिन ने भारत के साथ मित्रता का प्रस्ताव भी रखा। न्छ० में सोवियत संघ ने कश्मीर का साथ दिया तथा भाजपा को नेहरू के विरोध को कम करने की सलाह दी गई। पाकिस्तान को अमेरिका के द्वारा 'सीटो' और 'सेटो' में शामिल करने के बाद 1954 में भारत को सोवियत संघ की तरफ से सैनिक सहायता की पेशकश भी आयी। 1958 में नेहरू ने सोवियत संघ की यात्रा की। उसी समय खुश्चेव और बुल्गानिन उतनी ही सफल यात्रा पर भारत आए। 1956 में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं अधिवेशन ने गैर स्तालिनीकरण की प्रक्रिया तेज कर दी साथ ही उसने विभिन्न सामाजिक व्यवस्थाओं वाले देशों के साथ मिलकर शीतयुद्ध के नकारात्मक प्रभाव को कम करने की कोशिश आरम्भ कर दी। अब साम्यवाद में मार्क्सवाद जड़ गया तथा भारत- सोवियत संघ की सहयोग की नीति बाधा रहित हो गयी। 1956 से सोवियत संघ ने सुरक्षा परिषद में भारत के हित को हमेशा तरजीह देना शुरू किया। इसके अलावा UNO में गोवा के मुद्दे को भारत का समर्थन किया गया है।
आर्थिक क्षेत्र में भी भारत सरकार की सार्वजनिक उपक्रम नीति ने रूस को काफी प्रभावित किया तथा भारत को भिलाई इस्पात कारखाने में 1956 में भारी मदद की।
1962 में चीनी हमले के समय रूस निष्पक्ष रहा क्योंकि क्यूबा संकट भी उस समय समानांतर तैर रहे थे। लेकिन दिसम्बर 1962 में सोवियत नेता 'सुस्लोव' (नेसवअ) ने इसके लिए चीन को पूरी तरह जिम्मेदार बताया। तब से लेकर अब तक भारत-सोवियत संघ (रूस) की मित्रता प्रगाढ़ ही होती आयी है।
9.5 कोरियाई युद्ध में नेहरू की भूमिका
भारतीय तंत्र के लिए कोरियाई युद्ध 1950 एक अवसर साबित हुआ जिसके द्वारा भारत ने अपनी गुटनिरपेक्षता की नीति को प्रासंगिक बताया। के. पी. एस. मेनन कोरिया संबंधी न्छ० के कमीशन के अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने न्छ० को अपनी रिपोर्ट में महाशक्तियों से कोरिया को "एक रहने दो" की अपील की थी। उन्होंने चेतावनी दी कि कोरिया में भयंकर विस्फोट होगा। परन्तु इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। युद्ध छिड़ जाने पर भारत ने सुरक्षा परिषद में साउथ कोरिया का समर्थन किया तथा उत्तर कोरिया को हमलावर बताते हुए युद्ध बंदी की अपील की। संयुक्त सैनिक विमान के मुद्दे पर भारत ने किसी पक्ष में मतदान नहीं किया। नेहरू किसी बाहरी देश का हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझते थे। नेहरू की बात में स्टालिन सहमत थे।
अमेरिका ने उत्तर कोरिया में अपनी सैन्य क्षमता को बहाल कर दिया। चीन ने भारतीय राजदूत के माध्यम से पश्चिमी देशों को चेतावनी भेजी। चीन और अमेरिका दोनों पक्षों को भारी नुकसान हुआ। चीन को न्छ० ने हमलावर घोषित कर दिया। भारत ने चीन का साथ दिया। और कहा कि चीन हमलावर नहीं था। भारत की कोशिशों को सफलता मिली तथा 1953 में समझौता हुआ। युद्धबंदी की अदला बदली का सूत्र तैयार हुआ। कृष्ण मेनन को जिन्होंने एक प्रस्ताव तैयार किया तथा निष्पक्ष देशों का रिहाइ कमीशन बनाया गया जिसके अध्यक्ष भारत के जनरल मिथैय्या थे।
भारत कोरियाई संकट के काल में एक ऐसा देश बना जो गुटनिरपेक्षता के सूत्र में विश्व को शांति दे सकता था। चीन और सोवियत संघ का मन भी बदला तथा भारत की भूमिका एक शांतिपूर्ण देश के रूप में स्वीकार्य हुई।
देखा जाए तो नेहरू की सिद्धांत की पराकाष्ठा ने भारत को एक नया रास्ता दिखाया। आज के परिप्रेक्ष्य में विवाद कई हो सकते हैं। इसके साथ भारत को एक "शांतिपूर्ण सह अस्तित्व वाला देश " के रूप में विश्व स्तर पर स्वीकार किया गया। सही रूप में माने तो विश्व की मंशा में “भारत एक समझदार देश है" का रास्ता नेहरू ने ही बनाया था। नेहरू को धोखा मिला परन्तु यह कहा जा सकता है कि नेहरू की विरासत एक वैश्विक भारत के रूप में है।
10. नेहरू का व्यक्तित्व एवम् कुछ तत्कालीन राष्ट्रीय मुद्दे:
10.1 राष्ट्रीय एकता
विभाजन तथा साम्प्रदायिकता से स्वतंत्र भारत की एकता खतरे में थी। भारत को एक मजबूत राष्ट्र के रूप में देखने की नेहरू की प्रबल इच्छा ने राष्ट्रीय एकता को प्राथमिक विषय बना दिया। नेहरू ने राष्ट्रीय एकता को स्वतंत्रता के साथ जोड़कर देखा तथा इसके लिए बार-बार यही कहा कि “अगर हमें अपनी आजादी कायम रखनी है तो 'राष्ट्रीय एकता' पर ध्यान देना होगा।"
10.2 नागरिक अधिकार तथा जनतंत्र
नेहरू के मन में नागरिक अधिकारों के लिए काफी समर्पण भाव था । सामाजिक सुधार कार्यक्रम को उन्होंने नागरिक अधिकार से जोड़कर देखा तथा यह कहा कि जनवाद में नागरिक कल्याण के लिए सामाजिक आर्थिक परिवर्तन होना नितांत आवश्यक है। उनकी सोचने की प्रणाली ही जनवादी थी।
नेहरू ने नागरिकों की वैचारिक स्वतंत्रता को सबसे ऊपर रखा तथा सरकार की योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने की अपनी योजना का भी खुलासा किया। उन्होंने कहा कि जनतांत्रिक विधि को छोड़ने का मतलब होगा, विखण्डन को न्योता देना।
नेहरू ने सामाजिक आर्थिक विकास को शोषण के विरुद्ध एक हथियार माना तथा नियोजन का सिद्धांत लाकर नागरिक सहभागिता बढ़ाने की भरसक कोशिश की। उन्होंने नागरिकों के राजनीतिक अधिकार के लिए स्थानीय शासन की नींव रखी तथा पंचायती राज को विकसित करने की घोषणा की।
10.3 नेहरू तथा समाजवाद
नेहरू की सोच देश के विकास के लिए विभिन्न स्त्रोतों से संबंधित थी। नेहरू विकास के स्त्रोत के लिए पूंजीवाद पर विश्वास नहीं करते थे। उन्होंने भारतीय समाज को बदलने के लिए समाजवाद को एक सर्वोत्तम विकल्प के रूप में पेश किया तथा समाजवाद के द्वारा देश के कोने-कोने तक विकास का आधार तैयार कराया।
नेहरू के समाजवाद विषय को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में बहुत ही साधारण रूप में समझने की आवश्यकता है। नेहरू के द्वारा समाजवाद का जो अर्थ दिया गया वह निम्न शब्दों या भावों से हम अच्छी तरह समझ सकते हैं
1. आर्थिक समानता
2. सामाजिक न्याय
3. आधुनिक विज्ञान के प्रति खोज की परम्परा
4. समान वितरण
5. सामाजिक असमानता का अंत 
6. सामाजिक सुधार के लिए वैज्ञानिक दृष्टिाकेण 
7. सहकारिता
8. मध्यवर्गीय उत्थान
9. गरीबी को दूर करना इत्यादि ।
नेहरू ने अपनी समाजवाद की नीति को देश के सामाजिक रूपांतरण तथा आर्थिक विकास के लिए आवश्यक बताया। नेहरू ने विशाल आबादी को एक लक्ष्य 'विकास' की ओर ले चलने में समाजवाद को सबसे अच्छा विकल्प समझा उन्होंने समाजवादी समाज की स्थापना को अहिंसा तथा शांति के लिए भी उपयोगी बताया। साधन तथा साधन के बीच एक सामंजस्य पैदा करने की एक अहम कड़ी समाजवाद ही था। गांधी जी भी कुछ स्तर पर समाजवाद को मानने लगे तथा साधन और साधन की अविभाज्यता को उन्होंने एक पूजा बताया।
नेहरू ने ऐसे रूप में भारत को बनाने की कोशिश की जिसको विश्व एक धर्मनिरपेक्ष विकसित तथा शांतिपूर्ण देश के रूप में देखे। उन्होंने हरेक वो काम किया जिससे भारत आत्मनिर्भर स्वतंत्र तथा उपयुक्त हो सके। भारत का एक राष्ट्र के रूप में सुदृढ़ीकरण करने के लिए नेहरू का योगदान इतिहास में अमर है।
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Sun, 01 Oct 2023 07:09:12 +0530 Jaankari Rakho
संवैधानिक प्रक्रिया (विकास, संस्थाएं, विशेषताएं तथा संरचना की गाथा) https://m.jaankarirakho.com/390 https://m.jaankarirakho.com/390 संवैधानिक प्रक्रिया (विकास, संस्थाएं, विशेषताएं तथा संरचना की गाथा)
1. स्वतंत्रता के बाद अपना संविधान ( विकास, संस्थाएं, विशेषताएं तथा संरचना )
भारत की स्वतंत्रता के बाद सरकार की कोशिश एक भविष्य का भारत बनाने की थी और इसके लिए सबसे अधिक आवश्यक था कि ' भारतीय संविधान' के उन सभी प्रावधानों को रेखांकित किया जाए जिससे मानव का कल्याण हो सके। 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ।
26 जनवरी 1950 को संविधान तो लागू हुआ लेकिन इसके बनने की शुरूआत कई दशक पहले ही हो चुकी थी। संविधान के लिए विभिन्न आधार के काम 'प्रतिनिधित्व' व्यवस्था जैसी महत्वपूर्ण बाते हैं। अगर राष्ट्रीय आंदोलन की बात की जाए तो हमें यह देखना होगा कि आंदोलन ने संसदीय जनतंत्र, गणतंत्रवाद, नागरिक अधिकार, सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय जैसे मुद्दे को पहले ही आधार बनाया था। 1920 के बाद कांग्रेस में भी चुनावी प्रतिनिधित्व की व्यवस्था चलने लगी तथा अध्यक्ष से लेकर पंचायत अध्यक्ष तक कांग्रेस में चुनाव के द्वारा चुने जाने लगे।
जब संविधान के बनने की शुरूआत हुई तो यह मानने में सर्वसम्मति थी कि इसका आधार जनतंत्र का आधार होना चाहिए। इसमें महिला उत्थान, तकनीकी उन्मूलन, शिक्षा का विकास इत्यादि को सर्वप्रमुखता देनी होगी। इन सबके बाद जो सबसे अधिक जरूरी था, वह था "जनता की भावना " ।
वैसे तो 1857 के बाद जब भारत में कंपनी की सरकार का स्थानांतरण 'ब्रिटिश सरकार की सरकार' से हो गया तो समय-समय पर कई 'भारत सरकार अधिनियम' आए जैसे 1861, 1882, 1919 तथा 1935 को भारत सरकार अधिनियम । लेकिन यह सुधार भारत की जनता की इच्छा के एक भाग को भी पूर्ण नहीं करता था। 
अगर सर्वप्रमुखता दी जाए तो 1935 के भारत सरकार अधिनियम से हमारे गणतांत्रिक संविधान को एक सहायता मिली।
2. संविधान का विकास
अगर हम भारतीय नेतृत्व तथा आंदोलन कर्त्ताओं के द्वारा इस कोशिश को शुरूआत के तौर पर देखें तो कहीं न कहीं एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक की 'होम रूल लीग' से हमें शुरूआत करनी होगी। यह 1916 में आरम्भ हुआ तथा यह संयोग था कि 1916 में ही कांग्रेस-मुस्लिम लीग पैक्ट ने संवैधानिक सुधारों की कांग्रेस-मुस्लिम लीग स्कीम को जन्म दिया। इसमें मांग की गई कि प्रादेशिक विधायिकाओं के 5-4 सदस्य जनता द्वारा व्यापकतम संभव मताधिकार द्वारा चुने जाए। 1918 के कांग्रेस के दिल्ली अधिवेशन में यह तय किया गया कि यह मांग आवश्यक है कि भारत की जनता को आत्मनिर्णय का अधिकार मिले। 1919 में सुधार की स्थिति सिर्फ अंग्रेज ही बदल सकते हैं। 1922 में असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद कांग्रेस के हिस्से से ही स्वराज- पार्टी बनी तथा संवैधानिक संघर्षो को अपना मुख्य मुद्दा बनाया।
स्वराज पार्टी में मोतीलाल नेहरू ने भी वही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने केन्द्रीय सभा में 8 फरवरी 1924 को एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें यह कहा गया कि सरकार को एक प्रतिनिधि गोलमेज सम्मेलन बुलाकर सभी के हितों एवम अधिकारों की रक्षा करना चाहिए तथा भारत के संविधान के लिए योजना पेश की जानी चाहिए। इस योजना का खाका भारत की नव निर्वाचित भारतीय संसद करे तथा ब्रिटिश संसद को इसका अनुमोदन करने दिया जाए। यह पहला अवसर था जब संविधान और उसके प्रावधान स्पष्ट रूप से पेश किए गए। यह प्रस्ताव राष्ट्रीय मांग बन गया तथा यह केन्द्रीय असेंबली में 76 के मुकाबले 48 मतों के बड़े बहुमत से पास हुआ। अंग्रेजो की इस मांग पर जो प्रतिक्रिया थी वह टालने की थी तथा इसे एक 'नजर देने योग्य' जैसे विषय बनाने की थी। अंग्रेजों को फिर भी कुछ करना था तो उन्होंने 1927 में “साईमन कमीशन" की नियुक्ति कर दी जिसमें सिर्फ अंग्रेज ही सदस्य थे | इस कदम का भारत के सभी राजनीतिक इलाकों में जोरदार विरोध हुआ। इस विरोध से अंग्रेज इतना भड़क गए कि बर्केनहैड ने ब्रिटिश उच्च सदन में भारतीयों को चुनौति दे डाली कि “वे एक ऐसा संविधान बनाकर दिखा दे जो सभी भारतीयों को सर्वसम्मत कर सके।
कांग्रेस को बर्केनहेड की चुनौति स्वीकार थी तथा इस पहल पर कांग्रेस की तरफ से सर्वदलीय सम्मेलन समिति का गठन किया गया जो “भारत के संविधान" के सिद्धांत तय करे। 10 अगस्त 1928 को पेश नेहरू रिपोर्ट प्रस्ताव में भारत के संविधान का ढांचा सुझाया गया था। नेहरू रिपोर्ट में एक ऐसे संविधान की बात की गई जो संसदीय प्रणाली, जिम्मेदार सरकार, मतदान का अधिकार, अल्पसंख्यकों का अधिकार सभी को प्रमुखता देता था। नेहरू रिपोर्ट ने भारत की जनता के लिए मूलभूत मानवाधिकार हासिल करने पर विशेष जोर दिया। इसके तथ्यों में धर्म की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा विचार की स्वतंत्रता, सभा की स्वतंत्रता, महिलाओं के समान अधिकार, यूनियन बनाने का अधिकार, प्राथमिक शिक्षा का अधिकार इत्यादि सभी शामिल थे।
नेहरू रिपोर्ट की सबसे अधिक मुख्य बात यह थी कि राज्य के धर्म निरपेक्ष चरित्र “मूलभूत अधिकारों" में शामिल थे। नेहरू रिपोर्ट के 19 अधिकारों में दस संविधान में शामिल किए गए। नेहरू रिपोर्ट में प्रदेशों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर करने की भी सलाह दी।
नेहरू रिपोर्ट जब प्रकाशित हुई तो साइमन कमीशन के खिलाफ एक जनभावना बनी तथा बहुत सारे प्रदर्शन हुए। दिसंबर 1929 में कांग्रेस ने 'पूर्ण स्वराज' की मांग को प्रमुखता दी तथा अप्रैल 1930 में बापू ने सविनय अवज्ञा आंदोलन की हुंकार भरी। इस आंदोलन का प्रभाव ज्यादा व्यापक तौर पर हुआ तथा करीब लाख लोग जेल गए। यह बात धीरे-धीरे साबित हो गई की संविधान स्वयं तैयार करने से कम कोई भी बात स्वीकार नहीं की जाएगी। यह विचार सामने आया कि यह काम सम्मेलनों में नहीं किया जाना चाहिए जैसा कि नेहरू रिपोर्ट के सिलसिले में किया गया था इस आधार पर यह मत बना कि संविधान के विकास के लिए “संविधान सभा " बननी चाहिए तथा सभी वर्गों को उसमें स्थान देना चाहिए।
जवाहर लाल नेहरू ऐसे प्रथम नेता थे जिन्होंने पहली बार औपचारिक रूप से 1933 में संविधान सभा का विचार पेश किया। ऐसा कहा जाता है कि सबसे पहले 'एम. एन. रॉय' यह सुझाव देने वाले प्रथम व्यक्ति थे। जून 1934 में कांग्रेस कार्यसमिति ने ब्रिटिश सरकार के द्वारा पेश 'श्वेत-पत्र' अस्वीकार कर दिया। साथ ही उसने यह तय किया कि श्वेत पत्र का एकमात्र संतोषजनक विकल्प वयस्क मताधिकार या इसकी निकटतम प्रणाली के आधार पर निर्मित संविधान सभा द्व द्वारा तैयार किया संविधान है। " 
1933 के बाद कांग्रेस ने 'संविधान सभा' की मांग को जारी रखा। 1936-37 चुनावों के लिए तैयार कांग्रेस घोषणा-पत्र में संविधान सभा की मांग को प्रमुखता दी गई। कांग्रेस को इस चुनाव में बहुत बड़ी सफलता मिली। उसने मंत्रिमंडल भी बनाया। परंतु यह साफ कर दिया कि वर्तमान संवैधानिक ढांचा उसने स्वीकार नहीं किया है।
कांग्रेस ने 11 में से 7 प्रदेशों को बहुमत से जीता था। मंत्रिमंडल बनाने के समय यह कहा गया कि सभी विधायक यह याद रखे उसे सदनों में संविधान सभा की मांग जल्द से जल्द रखनी है। विधायकों ऐसा 27-28 फरवरी 1937 के वर्धा कांग्रेस कार्य समिति में कहा गया।
नेहरू ने कांग्रेस अधिवेशन में यह कहा कि "सभी कांग्रेस सदस्यों को पंचायती राज के लिए काम करना चाहिए जिसका निर्माण संविधान सभा करेगी जो हमारी जनता द्वारा चुनी गई उच्च पंचायत होगी। उन्होंने साफ कहा कि “इस संविधान को पूरी तरह त्याग करना होगा ताकि सभा का रास्ता पूरी तरह साफ हो । " धीरे-धीरे कांग्रेस और नेहरू की धैर्य की सीमा न रही। 1937 के अगस्त में सभी राज्यों में कांग्रेस ने यह प्रस्ताव पेश किया कि जल्द से जल्द संविधान सभा का निर्माण हो तो 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट को खत्म किया जाए तथा इसकी जगह वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई संविधान सभा द्वारा निर्मित स्वतंत्र भारत के लिए 'संविधान (एक) ' लागू किया जाए ।
1937 ई. में 17 सितम्बर को केन्द्रीय एसेम्बली में एक प्रस्ताव पास किया गया तथा यह कहा गया कि 1935 एक्ट के बदले संविधान सभा में निर्मित संविधान को लागू करना होगा। यह अनुरोध 'एस. सत्यमूर्ति' ने किया। इस अनुरोध में यह भी शामिल था कि अंग्रेजों को महात्मा गांधी से मित्रता बढ़ानी चाहिए तथा संविधान सभा की मांग स्वीकार कर भारतीयों की इच्छा का सम्मान करना चाहिए। 1938 के कांग्रेस के हरिपुर अधिवेशन में भी यह मांग होती रही।
द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने के बाद कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया। ऐसा उन्होंने ब्रिटेन द्वारा भारत को बिना उसकी जनता से पूछे युद्ध में सहभागी बना लेने के विरोध में किया। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रदेशों के मंत्रिमंडल ने असेम्बली में यह प्रस्ताव पास किया कि “भारत को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया जाए तथा इसका अपना संविधान हो । इसके बाद गांधी जी को भी संविधान सभा की मांग के समर्थन में लेख लिखने पड़े। गांधी ने कहा कि "हम नेहरू या किसी भी और नेता से 'संविधान सभा के लिए अधिक उत्साही हैं।" गांधी का विचार था कि असीमित मताधिकार पर आध कारित संस्था वे जिसमें स्त्री और पुरूष दोनों भाग लेंगे, विरोधी विचारों के प्रति न्याय कर पाएगी उन्होंने कहा कि "मुझे इसमें रास्ता दिखाई देता है जो जन राजनैतिक एवम अन्य शिक्षा के लिए जरिया बनने के अलावा सांप्रदायिक एवम अन्य विभाजनकारियों का उपाय भी है। "
15 से 19 अप्रैल 1940 के बीच गांधी-नेहरू के बीच वार्ताओं का दौर चला तथा वर्धा में यह दौर कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में बदल गया। इस बैठक में नेहरू ने भारत की आजादी की मांग को प्रमुखता से उठाया तथा गांधी जी ने कहा कि संविधान सभा के पहले एसेम्बली बुलानी चाहिए और उसे आजादी का सवाल तय करने के लिए मुक्त छोड़ देना चाहिए। जैसा कि हमेशा देखा गया था गांधी जी बहुत ही सावधानी से अंग्रेजों को संशय में डालते रहते थे, इस बार भी उन्होंने ऐसा ही किया।
1940 में उस समय के वायसराय 'लिनलियगो' ने 'अगस्त- प्रस्ताव' की बात कही। इस प्रस्ताव का एक मात्र उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध में भारत का सहयोग पक्का करना था। इसमें पहली बार यह स्वीकार किया कि नए संविधान के निर्माण का कार्य पूरी तरह भारतीयों का होना चाहिए। हो सकता है कि यह स्वीकारोक्ति युद्ध के दबाव से ही निकली हो ।
अगस्त प्रस्ताव में यह स्वीकार किया गया कि युद्ध के बाद एक ऐसी संस्था बनायी जाएगी जो नये संविधान की रूपरेखा तैयार करेगी और इस संस्था में भारत के राष्ट्रीय स्तर के प्रतिनिधि शामिल रहेंगे। परंतु इसमें यह साफ तौर पर नहीं कहा गया कि इस संस्था का निमार्ण किस प्रकार हो । इसका अर्थ यह हुआ कि इसका रास्ता कैसा होगा जिससे प्रतिनिधि का चुनाव हो, या मनोनयन हो ।
संस्था के निर्माण की विधि पर चुप रहने के कारण भारत के सभी राजनीतिक दलों ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। कांग्रेस ने भारत से बिना मत लिए द्वितीय विश्व युद्ध में घसीटने के कारण 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आरम्भ किया। परंतु यहां एक बात और जानना आवश्यक है कि कांग्रेस ने युद्ध के कार्यों में कोई बाधा नहीं डाली क्योंकि इस युद्ध के उद्देश्य से कांग्रेस आंशिक सहमति रखती थी। सिर्फ कांग्रेस का विरोध इस बात पर था कि कांग्रेस को मत से यह फैसला लेना चाहिए था कि भारत भाग ले या न ले।
मार्च 1942 में दक्षिण-पूर्वी एशिया में ब्रिटेन हार गया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने 'सर स्टैफोर्डक्रिप्स' को भारत भेजने की घोषणा की। युद्ध कैबिनेट के एक महत्वपूर्ण लेबर पार्टी के सदस्य 'क्रिप्स' भारत के नेताओं के विशेषकर नेहरू के व्यक्तिगत मित्र थे । 'क्रिप्स प्रस्ताव मिशन' या 'क्रिप्स मिशन' ने संविधान सभा स्थापित करने के तरीकों का उल्लेख किया गया है :-
युद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद प्रादेशिक चुनाव होना आवश्यक होगा। इसके परिणाम के आधार पर निचले सदनों के सारे सदस्य एक चुनाव प्रकोष्ठ के सदस्य होंगे। वे समानुपातिक प्रतिनिधि के आधार पर एक संविधान बनाने वाली संस्था का निर्माण करेंगे। भारतीय रजवाड़ों के राज्य अपनी-अपनी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधि तय करेंगे, वैसे ही जैसे ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि और उन्हीं अधिकारों के साथ।
क्रिप्स प्रस्ताव को ब्रिटिश सरकार के द्वारा एक बहुत बड़ा कदम बताया जा रहा था। कांग्रेस ने भी इस प्रस्ताव को इस स्तर पर स्वीकार किया कि यह प्रस्ताव भारतीयों को संविधान बनाने की स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए सहमत था। संविधान सभा का विचार भी इस मिशन के द्वारा स्वीकार कर लिया गया। लेकिन कहानी सिर्फ यही नहीं थी। क्रिप्स प्रस्ताव के दूसरे जो भी प्रावधान थे वह कांग्रेस को स्वीकार नहीं थे।
क्रिप्स मिशन की विफलता एक बहुत बड़ा प्रतिघाती रवैया साबित हुआ। अंग्रेजों और सारे राष्ट्रीय आंदोलनकारियों के बीच टकराव बढ़ने लगे। कांग्रेस ने 8 अगस्त 1942 को 'भारत छोड़ो आंदोलन' का नारा दिया तथा साथ ही इसमें यह भी कहा गया कि आजाद भारत की अस्थायी सरकार संविधान सभा की योजना तैयार करेगी। जन आंदोलनों ने अंग्रेजों के मन में कोई शक नहीं छोड़ा कि अंतिम बातचीत का समय पहुंच चुका है। द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के तुरंत बाद मई 1945 में भारत संबंधी एक श्तेव - पत्र जारी किया गया। इसके बाद जून-जुलाई 1945 में शिमला सम्मेलन हुआ जो असफल रहा।
1945 के जुलाई में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की जीत हुई। वायसराय लॉर्ड वैबर ने 19 सितंबर 1945 को भारत संबंधी नई नीति घोषित की। 19 फरवरी 1946 को ब्रिटेन ने एक 'कैबिनेट मिशन' भारत भेजने की घोषणा की, जिसका उद्देश्य आजादी तथा संविधान निर्माण के प्रश्नों को हल करना था। कैबिनेट मिशन 24 मार्च 1946 को भारत पहुंचा और उसने भारतीय नेताओं के साथ विस्तार से बात की। बातचीत नहीं होने पर भी मिशन ने 16 मई 1946 को अपनी योजना घोषित कर दी। उसने स्वीकार कर लिया कि संविधान बनाने की संस्था स्थापित करने का सबसे अच्छा तरीका वयस्क मताधिकार पर चुनाव होना चाहिए। परंतु इसके साथ इस मिशन ने यह भी कहा कि ऐसा कदम उठाना काफी जटिल होगा तथा संविधान बनने में देर होगी। इसलिए यह विदित हो गया कि प्रदेशों की नव निर्वाचित असेंबली दस लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि के हिसाब से संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव करें। सिख तथा मुस्लिम विधायक अपने सम्प्रदायों की जनसंख्या के आधार पर अपने प्रतिनिधि चुन लें। संघीय तथा प्रादेशिक अधिकारों संबंधी कई अन्य प्रावधन भी प्रस्तावित थे। इसमें विशेष महत्व के प्रावधान प्रदेशों के वर्गीकरण के बारे में थे।
प्रदेशों को तीन समूहों में बाँटा गया था:-
समूह 'ए':- मद्रास, बंबई, यू.पी, बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा । ('हिन्दू बहुल' प्रदेश )
समूह 'बी' : - पंजाब, उ.प्र., सीमांत प्रदेश, सिंध।
समूह 'सी' :- असम तथा बंगाल।
कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव के अनुसार संविधान सभा के अध्यक्ष के चुनाव तथा अन्य औपचारिक कार्य करने के बाद अलग-अलग हिस्सों में बँटकर आगे का कार्य करें। प्रादेशिक प्रतिनिधि अपने-अपने कमीशनों में बैठकर पहले अपने प्रदेशों के या प्रदेशों के समूहों के संविधान तय करें। यह प्रक्रिया पूरी हो जाने पर प्रदेशों और रजवाड़ों (राज्यों) के प्रतिनिधि आपस में मिलकर संघीय संविधान तय करें। भारतीय संघ के पास विदेश प्रतिरक्षा एवम् संचार के विभाग होने चाहिए। कांग्रेस ने इस पर यह कहा कि संविधान सभा सार्वभौम होनी चाहिए। इसे विभिन्न मुद्दों पर कैबिनेट मिशन के सुझाव स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार होना चाहिए। अंग्रेजों की ओर से इस संबंध में कोई वादा नहीं किया जा रहा था। फिर भी काफी विचार के बाद कांग्रेस ने योजना स्वीकार करना तय किया। उसे महसूस हो रहा था कि इसे मानने से सत्ता-हस्तांतरण में देरी हो सकती है। मुस्लिम लीग इसे स्वीकार न कर हर कदम पर बाधाएं खड़ी करने की कोशिश कर रही थी। लीग हर मुद्दे पर संविधान सभा का विरोध कर रही थी, और इसके निर्माण के बाद भी विरोध करती रही।
3. संविधान सभा
अब यह तय हो गया था कि कैबिनेट मिशन की स्कीम को स्वीकार कर लिया गया तथा संविधान सभा के निमाण का रास्ता साफ हो गया था।
संविधान सभा के निर्माण के उद्देश्य सिर्फ संविधान बनाना नहीं था। यह तो सब जानते थे कि यह सभा संविधान बनाएगी। परंतु इस बात को अधिक महत्व का दिया कि संविधान क्यों बने? इसको केन्द्र में रखा जाए तथा इसके लिए कुछ केन्द्रित मुद्दे रखे गए जैसे:
1. संविधान भारत की आजादी के लिए
2. संविधान भूखमरी से लड़ने के लिए
3. संविधान गरीबों को अच्छी जिन्दगी देने के लिए।
4. संविधान भारत का विकास करने के लिए
5. संविधान भारतीयों को अपनी इच्छा से जिन्दगी जीने के लिए
संविधान सभा में प्रस्तावित रूप से 389 सदस्य थे। जिसमें 296 - ब्रिटिश तथा 93 भारतीयों रजवाड़े थे। इसमें यह बात कह देना साफ है कि आरम्भ में सिर्फ ब्रिटिश भारत के सदस्य संविधान सभा में थे। इसके लिए जुलाई से अगस्त 1946 के बीच चुनाव हुए। 210 सामान्य श्रेणी की सीटों में से कांग्रेस को 199 सीटें मिली। इसने पंजाब से 4 सिख सीटों में से 3 भी जीती। कांग्रेस को 78 मुस्लिम सीटों में से 3 सीटें मिली। इस प्रकार कांग्रेस को 208 सदस्य सीटें प्राप्त हुई वहीं मुस्लिम लीग को 78 मुस्लिम सीटों में से 73 सीटें मिली ।
संविधान सभा का चुनाव सर्वसम्मत से वयस्क मताधिकार के आधार पर नहीं हुआ था। इसलिए कांग्रेस की इस मांग को सफल नहीं कह सकते कि इस प्रतिनिधित्व के आधार पर सभा को स्थापित किया जाए। इसमें एक बात और महत्वपूर्ण मानी जा सकती है कि इसमें सिर्फ मुसलमानों और सिखों को ही विशेष प्रतिनिधित्व वाले 'अल्पसंख्यक' माना गया था। इन कारणों से सभा को सचमुच देश की विविधता का प्रतिनिधित्व बनाने के विशेष प्रयत्न किए गए। कांग्रेस कार्यसमिति ने जुलाई 1946 की शुरूआत में प्रादेशिक कांग्रेस कमेटियों को निर्देश दिया कि जनरल श्रेणी सूची में SC, पारसियों, एंग्लो इंडियनों, आदिवासियों और महिलाओं के प्रतिनिधि को शामिल करें।
असेंबली के चुनाव के लिए नाम तय करने में दूसरा महत्वपूर्ण पहलू संविधान तैयार करने के लिए अच्छे से सक्षम व्यक्तियों की खोज थी। गांधी जी ने स्वयं इसमें दिनचस्पी ली तथा उन्होंने अपनी तरफ से कांग्रेस की सूची में प्रमुख नामों का सुझाव दिया। इस प्रकार तीन ऐसे सदस्य कांग्रेस सूची में चुने गए जो इसके सदस्य नहीं थे। इससे असेंबली का वैचारिक स्वरूप स्वयं कांग्रेस सदस्यता के कारण अधिक व्यापक हो गया। संविधान सभा का चुनाव रोकने में मुस्लिम लीग पूरी तरह विफल हो गई तथा मुस्लिम लीग ने तब इस पर भाग लेने पर अपनी नीति को केन्द्रिन किया। कांग्रेस और जवाहर लाल नेहरू अपने स्तर से तथा अंतरिम सरकार की मुखिया की हैसियत से समझौते की कोशिश करते रहे तथा सरकार के अंतिम प्रयास तक भी कोई परिणाम नहीं निकला तथा 20 नवम्बर 1946 को संविधान सभा की बैठक जो प्रस्तावित थी उसे अब 9 दिसंबर 1946 को बुलाए जाने की घोषणा कर दी गई ।
9 दिसंबर को जब संविधान सभा को बुलाने की बात कर दी गई तो एक बात और सामने आई कि तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वैबेल इस सभा की बैठक रोक लेने के पक्ष में थे पर कांग्रेस अब इसमें देर करने के पक्ष में नहीं थी। कांग्रेस ने कहा कि किसी के कारण यानी मुस्लिम लीग के कारण हम रूके नहीं रह सकते। नेहरू को वायसराय की इच्छा का विरोध करना पड़ा। तब वायसराय ने सभा को बैठक के लिए मना किया। डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा को अस्थायी अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। सचिव की तरफ से सभी सदस्यों को बैठक में भाग लेने को निमंत्रित किया गया तथा यह बात जोर देकर प्रदर्शित की गई कि यह संविधान सभा सार्वभौमिक रूप से भारतीय सभा हो तथा इसमें ब्रिटिश सरकार की किसी भी भूमिका का वर्णन इतिहास में लिखा न जाए।
भारत की संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर 1946 को 11 बजे सुबह से आरंभ हो गया। वास्तव में भारतीय संसदीय इतिहास की आजादी की लौ यहीं से स्वतंत्रता पूर्वक जलनी शुरू हो गई। संविधान की रूपरेखा तय करने और इसके तहत जनता के अधिकार को सत्ता के साथ मिलाने के लिए एक नये स्तर से संविधान के निर्माण का काम आरंभ हो गया।
प्रथम अधिवेशन में 207 सदस्यों की भागीदारी थी। मुस्लिम लीग इसे न रोक सकी तो इसमें भाग ही नहीं लिया। मुस्लिम लीग के 76 सदस्य अलग रहे लेकिन कांग्रेस के 6 मुस्लिम सदस्यों ने इस अधिवेशन में भाग लिया।
11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष चुने गए। यह पद बाद में असेंबली का प्रेसिडेंट कहलाया। 13 दिसंबर 1946 को जवाहर लाल नेहरू ने “उद्देश्य संबंधी प्रस्ताव" पर अंतिम निर्णय को 'होल्ड' कर दिया ताकि इसमें मुस्लिम लीग तथा रजवाड़ो के प्रतिनिधि भी बैठक में हिस्सा लेकर अपना मत दे सके।
अगला अधिवेशन 20 से 22 जनवरी 1947 को हुआ जब यह देख- सुन लिया गया कि अब भी मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि हिस्सा नहीं लेने के इच्छुक हैं। अब 22 जनवरी 1947 को “ उद्देश्य संबंधी प्रस्ताव " को पास कर दिया गया। तीसरा अधिवेशन 28 अप्रैल से 2 मई 1947 को हुआ और इसमें भी लीग ने भाग नहीं लिया। 3 जून को अंततः “माउंट बैटन योजना " की घोषणा की गई। इसमें स्पष्ट किया गया कि भारत का विभाजन किया जाएगा। इसने संविधान सभा का परिप्रेक्ष्य ही पूरी तरह से बदल दिया। कैबिनेट मिशन योजना, जिसका सार था लीग के साथ समझौता अब प्रासंगिक नहीं रह गया।
जब हमारे देश ने 1947 को स्वतंत्र देश के रूप में जन्म लिया तो 'संविधान सभा ' एक सार्वभौम संस्था बन गई। यह संविधान सभा सर्वोच्च विधायिका के रूप में स्वीकार्य हो गई। इस पर संविधान बनाने तथा सामान्य कानून बनाने की भी जिम्मेदारी थी। विधायिका के रूप में इसका बड़ा आकार और विधायिका की इसकी जिम्मेदारी संविधान बनाने के काम में बाधा नहीं बने। इस कारण सदस्यों ने बड़ी जिम्मेदारी और सांगठनिक सूझ बूझ का परिचय देते हुए बड़ी तैयारियां की थी।
> संविधान सभा में विभिन्न कार्य को 5 चरणों में बाँटा गया था:
1. प्रथम कमिटी को मूल प्रश्नों पर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी।
2. संवैधानिक सलाहकार 'बी. ए. राऊ' ने विभिन्न काम काज-काजो का दस्तावेज तैयार किया। 
3. डॉ. अंबेडकर की अध्यक्षता में संविधान का एक मसौदा तैयार किया गया। इस कमिटि के बीच बहस और जनता की सहमति को जोड़ने की बात को सम्मिलित किया गया था।
4. मसविदे पर बहस हुई और संशोधन प्रस्तावित किए गए।
5. संविधान को स्वीकृत करने के लिए रखा जाना ।
संविधान सभा के लिए एक प्रस्ताव समिति का निर्माण किया गया। यह समिति जो 4 जुलाई 1946 को ही बनी थी (कांग्रेस के द्वारा) उसकी अध्यक्षता नेहरू ने की थी। इस समिति के सदस्य क्रमशः (1) आसफ अली (2) के. टी शाह (3) डी. आर. गागरिल (4 के. एम. मुंशी (5) हुमायुं कबीर (6) आर. संचानम् (7) एन. गोपाल स्वामी अय्यर थे। इस समिति ने नेहरू की अध्यक्षता में उद्देश्य संबंधी प्रस्ताव भी तैयार किया इसे कांग्रेस कार्यसमिति एवम् अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी ने 20 एवम 27 नवंबर 1946 को असेबंली के प्रथम अधिवेशन के पहले ही अनुमोदित कर दिया। संविधान की स्वीकृति तक यही तरीका अपनाया गया। जब भी किसी विशेष प्रस्ताव पर बहस होनी होती तो कांग्रेस के सदस्य पहले, पार्टी पर फिर सभा में बहस करते थे। कांग्रेस में किसी भी प्रस्ताव जो सभा में लाना होता वह पहले कांग्रेस के अन्दर के विचार के लिए पहले रखा जाता था। 
यहां सरदार वल्लभ भाई पटेल को याद नहीं करना अन्याय होगा। पटेल ने रजवाड़ों के प्रतिनिधियों को संविधान सभा में भाग लेने में निर्णायक भूमिका अदा की। पटेल ने इसके अलावा अलग मतदान अंग को समाप्त करने में एक महान भूमिका अदा की तथा जरूरी स्तर पर इसके लिए सफलतापूर्वक कोशिश की, कि धार्मिक स्तर पर अल्पसंख्यकों को सीटों का आरक्षण देने की कोशिश विफल हो जाए तथा पटेल इसमें सफल भी हुए ।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सभा के अध्यक्ष के रूप में निस्पक्षता की मूर्ति कहा गया तथा मौलाना आजाद ने अपने स्वभाव से सुलझे हुए होने के कारण अपनी शान और दार्शनिक मस्तिष्क का प्रयोग किया।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उस समय भारत में एकमात्र पार्टी थी जो कांग्रेस थी, इसमें सरकार, पार्टी, देश सभी सरकारें तथा संस्थाएं कांग्रेस के द्वारा शासित थीं तथा संचालित थी फिर भी संविधान की प्रकृति में ऐसी कोई कठोरता तथा संकुचितता देखने को नहीं मिली जिससे हम यह कह सकें कि कांग्रेस ने सभा को अपनी सुविधा से पारित कर लिया। 
सभा की पद्धति तथा प्रकृति उदार प्रजातांत्रिक तथा जनवादी थी । संविधान में यह सब रखने की कोशिश हुई कि विशेष की जगह पर बहुमत को तथा कुलीन तथा धनाढ्य की जगह गरीबी तथा सामान्य की आवश्यकता को अधिक महत्व दिया जाए।
4. संविधान के विभिन्न विशेष प्रावधान
यह तो पहले ही घोषणा कर ली गयी थी कि भारतीय संविधान को ऐसी जनतांत्रिक पद्धति के लिए बनाना है जिस पद्धति में मानव के विकास तथा सामान्यजनों के अधिकार दोनों की बात हो। इसलिए संविधान में विकास और मताधि कार के लिए किन-किन तंत्रों का निर्माण किया जाए उसकी रूपरेखा तैयार करनी थी बहुत सोच समझ कर संविधान में विभिन्न प्रावधानों को विशेष रूप से जोड़ा गया जो भारतीय संविधान की कहीं न कहीं विशेषता बन गई।
संविधान की विशेषता तथा विभिन्न प्रावधानों को लिए जाने के भी विभिन्न उद्देश्य थे जिसमें: संसदीय प्रणाली का निर्माण, पंचायती राज, सरकार कर विकेन्द्रीकरण, समाजवाद के प्रति भारतीय लोकतंत्र का झुकाव तथा सबसे बढ़कर भविष्य के प्रति भारत की चेतना विकसित करने जैसा उद्देश्य शामिल था।
इसलिए संविधान में निम्न प्रमुख प्रावधानों को सम्मिलित करने पर बल दिया गया। इसके अलावा यह आवश्यक किया गया कि जनता के कल्याण पर कोई समझौता न किया जाए। विभिन्न प्रावधानों में निम्न प्रमुख बिन्दुओं को शामिल किया गया:
(1) मूल दर्शन (2) मूल अधिकार (3) नीति निदेशक सिद्धांत (4) वयस्क मताधिकार (5) धर्मनिरपेक्षता इत्यादि मूल दर्शन की स्थिति को हम संविधान की भूमिका के तौर पर निरूपित कर सकते है।
भूमिका को की प्रस्तावना भी कहा गया। यह एक दर्शन था जो संविधान के उद्देश्यों को एक साथ प्रदर्शित करता था। इस प्रस्ताव को संविधान सभा के प्रथम अधिवेशन 13 दिसंबर 1946 को पेश किया गया तथा 22 जनवरी 1947 को इसे स्वीकृत किया गया। इस प्रस्ताव में यह रखा गया कि 'प्रस्तावना' एक उद्देशिका के तौर पर संविधान के बनाए जाने के पीछे की भावना को हमेशा याद करवायगी । प्रस्ताव में महत्वपूर्ण बातें थीं उनमें:
1. न्याय
2. मूल अधिकार
मूल अधिकार भारतीय संविधान को एक रास्ता दिखाने के लिए सम्मिलित किया गया था। यह अधिकार महानता की परंपरा के साथ उन कमियों को भी दूर करने की एक कोशिश थी जो समाज, राजनीति, अर्थ तथा संस्कृति की विविधता के कारण उत्पन्न हुए थे।
मूल अधिकार जनता की सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकारों की गारंटी के तौर पर सामने आया। मूल अधिकारों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सांस्कृतिक अधिकार, सामाजिक समानता, अवसरों की समता तथा विचारों की स्वतंत्रता को बहुत अधिक महत्व प्रदान किया गया था।
3. नीति निदेशक सिद्धांत
नीति निदेशक सिद्धांत की जहां तक बात है यह पूरी तरह भारतीय नागरिक के सामाजिक तथा आर्थिक अधिकार से जुड़े मुद्दे थे। इसमें सरकार को यह सलाह देने की बात की गयी थी कि वह विभिन्न ऐसे रास्ते खोजे जिससे जनता के विकास में सामाजिक, आर्थिक पक्ष को अधिक महत्व मिल सके। इसमें अधिकार की बात तो की गई थी पर यह साफ कर दिया गया था कि जनता के इन अधिकारों को पूर्ण करने का कार्य सरकारों का है और सरकार इसे अपने कर्त्तव्य तथा समर्थन के अनुसार पूर्ण करेगी। इसमें सामर्थ्य है, इसलिए जनता इसे पूर्ण करने के लिए न्यायालय नहीं जा सकती क्योंकि नीति-निदेशक सिद्धांतों में वे चीजें भी शामिल थी जो संसाधन के उपलब्ध होने पर ही संभव होते।
निदेशक सिद्धांतो में धारा 38 में यह कहा गया है कि “राज्य एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था प्रभावशाली ढंग से निर्मित करेगा और उसकी रक्षा करेगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक एवम राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं का काम करेगा और इस प्रकार जनता का कल्याण कर पाएगा । " इस तरह देखा जाए तो यह राज्य की जिम्मेदारी थी कि वह सभी नागरिकों को जीवन यापन के लिए उचित पार्टी मुहैया हो, संसाधनों का समान वितरण हो तथा संपत्ति का संकेन्द्रण न हो। समान काम तथा समान वेतन की अवधारणा तथा मजदूर, बच्चे, गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की भी रक्षा को भी प्रमुखता प्रदान की गई।
इसके अलावा भारत के नागरिकों को शिक्षा, कार्य, बेकारी, बीमारी, वृद्धावस्था की स्थिति में सरकार से सहायता लेने का अधिकार होगा।
नीति निदेशक सिद्धांतों में यह सम्मिलित किया गया था कि बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिले तथा समान आचार संहिता के उद्देश्य हासिल करने के लिए प्रयास किये जाएं। इसके अलावा जीवन स्तर सुधारने के लिए विभिन्न अधिकारों को भी महत्व प्रदान किया गया था।
नीति निदेशक तत्व के बारे में जवाहर लाल नेहरू ने यह कहा कि “राज्य नीति निदेशक तत्व" एक गतिशील तत्व है। मूलभूत सिद्धांत स्थायी पक्ष है जिन्हें बनाए रखना है। समय के साथ मुद्दे बदल जाए लेकिन उद्देश्य एक ही रहेंगे। मूलभूत सुधार में मौलिक अधिकार की विशेषताओं को सम्मिलित करना अनिवार्य है। मौलिक अधिकार को उस समय 7 भागों में रखा गया।
1. समानता का अधिकार
2. आजादी का अधिकार
3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
4. धर्म संबंधी अधिकार
5. सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक अधिकार
6. संपत्ति संबंधी अधिकार
7. संवैधानिक उपचार संबंधी अधिकार
मौलिक अधिकारों को अनुच्छेद 12-35 के बीच रखा गया था।
यह सही है कि 1971 तक आते-आते मूल अधिकारों की प्रधानता न्यायपालिका के हाथ अधिक दे दी गयी थी इसलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 में 25वें संशोधन तथा 1976 में 42वें संशोधन के द्वारा नीति निदेशक तत्वों की प्रधानता लाने में महत्वपूर्ण कोशिश की।
इसी बीच 1980 में सर्वोच्च न्यायालय ने मिनर्वा मिल्स बनाम भारतीय संघ के मुकदमें में एक फैसला किया। इनके अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा कि मूलभूत अधिकार तथा निर्देशक तत्व दोनों समान महत्व के हैं और एक की बिनाह पर दूसरे को छोड़ा नहीं जा सकता।
4. राष्ट्रीय एकता तथा मानविकी बराबरी का संकल्प लेने की पद्धति ।
प्रस्तावना में 'सामाजिक' और 'आर्थिक न्याय' की बात को बहुत ही सोच समझकर प्रस्तुत किया गया था क्योंकि हमारा समाज प्रिज्मेटिक है तथा गरीबी को हराना भी एक बहुत बड़ी चुनौती रही थी । 
5. वयस्क मताधिकार
इसकी मांग तो राष्ट्रीय आंदोलन के समय से ही कांग्रेस की प्रमुख मांगों में शामिल थी। इसे अब लागू करने की स्थिति सही थी। कुछ लोगों का यह मत था कि वयस्क मताधिकार को ग्राम पंचायतों के स्तर तक ही सीमित रखा जाए तथा उच्च स्तर पर अप्रत्यक्ष तरीके से हो । परंतु बहुत बड़े बहुमत का यह मानना था कि चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर सीधे हों, यह ब्राह्ममणवादी उच्च जाति के प्रमुख लागों, गरीबों, निरक्षर समाज के लिए काफी महत्व रखता था।
इसके बारे में के. एम. पारिकर ने यह कहा था कि, वयस्क मताधिकार का सामाजिक प्रभाव इसके राजनीतिक महत्व से कहीं आगे जाता है। कई सामाजिक समूह पहले अपनी शक्ति के प्रति सचेत नहीं थे और राजनीति परिवर्तनों से अछूते थे। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि वे सत्ता का प्रयोग कर सकते हैं।
वयस्क मताधिकार भारतीय जनतंत्र को एक महान नींव देने के लिए एक सबसे बड़ा कदम था। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि सरकार के निर्माण में प्रत्येक नागरिक के योगदान की बात वयस्क मताधिकार में समाहित है। 
6. धर्मनिरपेक्ष राज्य
वैसे तो धर्मनिरपेक्षता को 'पंथनिरपेक्षता' के तौर पर तब्दील कर इसे और प्रभावी बना दिया गया। फिर भी संविधान भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश तथा राज्य के रूप में निरूपित करता है। हालांकि 1976 में एक यह शब्द 42वें संशोधन में समाजवादी शब्द के साथ जोड़े गए थे। 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान का मूल लक्षण बताया। यह पंथ. निरपेक्षता किसी भी एक धर्म को विशेष अधिकार देने से वंचित करती है। यह शब्द धार्मिक स्वतंत्रता, धार्मिक विश्वास तथा धार्मिक स्तर पर कोई कार्य आयोजित करने के लिए स्वतंत्रता प्रदान करता है। भारत की विविधताओं की नींव इसी पर टिकी है।
5. संविधान की संरचना
संविधान की संरचना को समझने के लिए इसकी विशेषताएं जो मूल थी तथा संस्थाएं जो इसे संरक्षण प्रदान करता था उसकी व्याख्या करना काफी उचित होगा। इसलिए संविधान की संरचना की व्याख्या करने से पहले इनकी विशेषताएं तथा संस्थाओं को प्रदर्शित करने की आवश्यकता है।
संविधान की मुख्य विशेषताएं कहीं न कहीं भारतीय जनता के प्रति संवेदनशीलता तथा लोकतांत्रिक अधिकारों में प्रदर्शित है। सबसे बड़ी विशेषता है कि इसकी मूल रचना जो बदली नहीं जा सकती। यह बात 1973 में सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण बेंच ने केशवानंद भारती केस में स्पष्ट की गई। यह जरूरी तौर पर कहा गया कि संविधान की संरचना में मूल विशेषताओं को रेखांकित किया गया जिसमें निम्न मील के पत्थर सम्मिलित हैं:
1. सरकार का गणतंत्रीय एवम जनतांत्रिक रूप
2. संविधान का वर्चस्व
3. संविधान का धर्मनिरपेक्ष चरित्र
4. विधायिका, कार्यकारिणी, न्यायपालिका
5. संघीय ढांचा
6. मुक्त और न्यायपूर्ण चुनाव
7. भूमिका में वर्जित उद्देश्य
8. न्यायिक समीक्षा
9. व्यक्ति की आजादी और सम्मान
10. राष्ट्र की अखण्डता एवम एकता
11. समानता का सिद्धांत
12. सामाजिक एवम आर्थिक न्याय का विचार
13. मूलभूत अधिकारों तथा निर्देशक सिद्धांतों के बीच सामंजस्य
14. न्यायपालिका की आजादी
15. न्याय आसानी से कर सकने का अधिकार
इंदिरा गांधी के शासन में अपातकाल के दौरान 42वें संशोधन (1976) में घोषणा की गई कि संसद द्वारा संशोधन करने के अधिकार में कोई 'लेकिन, परंतु' सीमा नहीं होगी। साथ ही यह भी कहा गया कि संशोधन को किसी भी आध. र पर न्यायालय में जाकर चुनौती नहीं दी जा सकती। लेकिन मिनर्वा मिल्स बनाम भारतीय संघ के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान का मूल चरित्र बरकरार रखने पर पुनः जोर दिया। इसके विचार में न्यायिक समीक्षा एक ऐसा मूल पक्ष है जो “संविधान के संशोधन के जरिए भी समाप्त नहीं किया जा सकता है। वर्तमान स्थिति यह है कि यदि कोर्ट को यह विश्वास हो जाए कि संविधान संशोधन के मूल चरित्र को प्रभावित करेगा तो यह खारिज कर दिया जाएगा।" इस प्रकार ‘मूल लक्षणों' के सिद्धांत के आधार पर न्यायिक सुधार की दृष्टि में हमारे संविधान में ठोस सीमाएं लागू करी गई हैं।
जजों के बीच मूल पहलुओं के बारे में कुछ मतभेद रहे है। लेकिन मूल रचना इन लक्षणों के सिद्धांत पर सहमति है। संसदीय बहुमत का प्रयोग करके संविधान नष्ट करने की कोशिश को रोका जा सकता है।
भारतीय संविधान का ढांचा मतलब 'संघीय ढांचा' और 'केन्द्रीय ढांचा'
संविधान के ढांचे को सबसे अधिक साकार केन्द्रीय या संघीय ढांचे में ही देखा जा सकता हैं। सही तौर पर देखें तो भारतीय संविधान की विशेषताओं में संघीय ढांचे की मुख्यता को लेकर आरंभ में संदेह रहा । विपिन चन्द्रा की पुस्तक में इस मामले में ऑस्टिन की बातों को इस तरह निरूपित किया गया है :
“भारतीय संविधान इतना असाधारण है कि इसका संक्षेप में वर्णन करना कठिन है। अर्द्ध संघीय और 'स्थायी विकेन्द श्रीकरण' जैसे शब्द दिलचस्प है, लेकिन उनसे कोई विशेष जानकारी नहीं मिलती है । " असेंबली के सदस्यों ने खुद ही किसी संघीय विचार सिद्धांत को मानने से इनकार कर दिया। उनका विचार था कि भारत की समस्याएं विशिष्ट थी, ऐसी समस्याएं जिनका सामना इतिहास में दूसरे संघों को नहीं करना पड़ा था। इनका हल सिद्धांत का सहारा लेकर नहीं किया जा सकता था क्योंकि संघवाद कोई विशेष विचार नहीं था और इसका अर्थ स्पष्ट भी नहीं था। इसलिए असेंबली के सदस्यों ने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कनाडा, स्विटजरलैंड, ऑस्ट्रेलिया के महत्वपूर्ण संघों के अनुभवों का अध्ययन किया। उन्होनें “उनमें क्या काम कर रहा है और क्या नहीं, क्या राष्ट्र के चरित्र के हित के सबसे अनुकूल है, यह चुनने का रास्ता अख्तियार किया।'' इस प्रक्रिया से एक नए प्रकार का संघवाद उभरा जो भारत की विशेष आवश्यकताओं के अनुकूल था।
ऑस्टिन के शब्दों से अब यह सार मिल गया कि संविधान सभा में सदस्यों को 'भारतीय संघवाद' के लिए 'खाद-प. ानी' मिल गया जो न किसी दूसरे देश की नकल था न किसी देश की चुरायी चीज थी । बल्कि दूसरे देश के संघीय तंत्र और अपने देश की विवधता में कैसा संघ हो इस पर तुलना करके हमारी अपनी 'संघीय व्यवस्था' को सामने लाया गया था। इस संविधान सभा ने जो संघवाद अपनाने की काशिश की वह 'सहयोगी संघवाद' कहलाया । इस सहयोगी संघवाद का आकार तथा अर्थ “संघीय सरकार तथा राज्य की सरकार में आपसी निर्भरता के साथ संघीय तत्व को आदर देने की प्रवृत्ति था । ''
संविधान सभा एक ऐसी सहयोगी संघवाद की अवधारणा के लिए कार्य कर रही थी जिसमें केंद्र मजबूत हो तथा इस मजबूत केन्द्र के कारण राष्ट्रीय समस्या जैसे :- गरीबी, शरणार्थी, विभाजन से उपजी समस्या, आर्थिक पिछड़ेपन का एक भारत के लक्ष्य से समाधान किया जाए। लेकिन यह कहना उचित होगा कि विभाजन से पहले संविधान सभा ने अपने अस्तित्व के शुरूआती महीने में मजबूत केन्द्रीय सरकार का पक्ष नहीं लिया था। सभा की 'संघीय सत्ता समिति' ने नेहरू के नेतृत्व में अपनी पहली रिपोर्ट में बहुत ही कमजोर केन्द्रीय सरकार की सिफारिश की थी। परंतु जब 3 जून 1947 को विभाजन की घोषणा हुई तो संविधान सभा ने खुद को 1946 की कैबिनेट मिशन योजना से मुक्त समझा और अपने स्तर से एक मजबूत केन्द्र सरकार का पक्ष लेना आरंभ कर दिया।
अम्बेडकर की अध्यक्षता वाली प्रारूप समिति ने यह कहा कि “राज्यों का संघ" के बदले “राज्यों का केन्द्र " शब्द प्रयोग किए जाएं।
अम्बेडकर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रारूप समिति का यह मत है कि भारत को एक संघ के रूप में देखा जाना चाहिए था। यह संघ राज्यों द्वारा इसमें शामिल होने की सहमति पर आधारित नहीं था, और चूँकि संघ किसी समझौते का नतीजा नहीं था, इसलिए किसी भी राज्य को इससे अलग होने का अधिकार नहीं था। यह संघ एक केन्द्र है क्योंकि इसे नष्ट नहीं किया जा सकता है। हालांकि देश और जनता प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए विभिन्न राज्यों में विभाजित किए जा सकते हैं फिर भी देश एक ही है, इसकी जनता एक है जो एक ही स्त्रोत से निकाली सत्ता के तहत रहती है । "
उपरोक्त रिपोर्ट का अर्थ यह है कि संघ किसी समझौते का एहसास नहीं बल्कि एक केन्द्र है जिसमें प्रशासनिक सहूलियत के कारण राज्यों की सीमा में परिवर्तन तो हो सकता है पर शक्ति का स्त्रोत केन्द्र ही रहेगा। 
भारतीय संघवाद की विशेषताएं हम इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि भारत का नागरिक सिर्फ भारतीय नागरिक होगा न कि दोहरी नागरिकता उसके राज्य की अलग से होगी।
दूसरी विशेष शक्ति का वैधानिक विभाजन है जो स्पष्टतः टकराव कम करने के कारण बनाए गए है। इनमें तीन सूचियों को रेखांकित किया गया है :- (1) संघीय सूची (2) राज्य सूची (3) समवर्ती सूची
इन सूचियों में उन सभी विषयों को शामिल किया गया जो प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक थे। इसके अलावा जहां तक अधिकारियों की बात है केन्द्र के पास अधिकार अधिक हैं जिसमें वित्तीय अधिकार को प्रमुखता दी जा सकती है। राज्यों को केन्द्र से अधिक मदद लेने के लिए हमेशा इंतजार करना इसमें एक नकारात्मक बिन्दू हो सकता है लेकिन इसके भी अपने ही मायने हैं।
संघीय व्यवस्था की भारत में सबसे प्रगतिशील तस्वीर इस बात से सामने आयी कि अलग-अलग राज्यों में अलग. -अलग पार्टी की तस्वीरों को देखा जा सकता है और फिर भी यह केन्द्र सरकार के साथ काम कर रही है। अगर कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ।
संविधान के कार्य संचालन का भार राष्ट्रपति के हाथ में दिया गया। लेकिन प्रारूप समिति ने इसकी ब्रिटेन के राजा से तुलना की। इसका अर्थ यह हुआ कि राष्ट्रपति राज्य के प्रमुख तो है लेकिन कार्यकारिणी के नहीं है। इसका दूसरा मतलब यह हुआ कि वे राष्ट्र के प्रतिनिधि तो है लेकिन शासक नहीं है। यह कार्य मतलब शासन का कार्य तथा कार्यकारिणी के नेतृत्व करने की जिम्मेवारी तो प्रधानमंत्री को दी गयी थी। लेकिन राजा से तुलना करना यहां बेईमानी होगी क्योंकि ब्रिटेन में राजा को चुना नही जाता पर यहां राष्ट्रपति को चुना जाता है। फिर भी राष्ट्रपति सांकेतिक रूप से ही सही भारत का प्रधान मुखिया होता है।
परंतु राष्ट्रपति का संविधान में भारत के परिप्रेक्ष्य में एक अहम अधिकार है। लेकिन यह भी यहां जोड़ देना आवश्यक है कि राष्ट्रपति के कार्य मंत्रिमंडल की सलाह से ही किये जाते हैं। कुछ ऐसी स्थिति का भी वर्णन संविधान में किया गया है जब राष्ट्रपति को सक्रिय होना पड़ता है। उनके औपचारिक और वास्तविक अधिकारों के बीच आरंभ से ही राष्ट्रपति के विवेक को न्याय के तराजू पर तौला जाता है। जब राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति बने तो यह शंका जताई गयी थी कि राजेन्द्र बाबु इतने सक्रिय नेता रहे है। इसके कारण सरकार के कार्यकारी प्रमुख से इनको घर्षण हो सकता है। यह कहा जा सकता है कि राजेन्द्र प्रसाद जी को यह मौका मिला भी था जब 'हिन्दु कोड बिल' पर उन्हें काफी आपत्तियां थी। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कह भी दिया कि 'राष्ट्रपति की भूमिका' काफी अहम होती है फिर नेहरू ने संविधान विशेषज्ञों से इस पर चर्चा की तथा राजेन्द्र बाबू को संविधान सभा के उनके ही भाषण की प्रति दिखायी गयी जिसमें उन्होंने कहा थी कि “भारत में भी वही परंपरा पाली जाएगी जिसके तहत इंग्लैंड में राजा हमेशा ही अपने मंत्रियों की सलाह पर ही काम करता है तथा भारत के राष्ट्रपति को हरेक विषय में संवैधानिक राष्ट्रपति ही होना चाहिए।”
उपरोक्त कथन को राजेन्द्र बाबू के मन को बदलने वाला कहा जा सकता है तथा यह कहा जा सकता है कि संविधान में राष्ट्रपति की स्थिति को सारगर्भित तरीके से पेश किया गया है।
संविधान के अलावा अगर व्यावहारिक रूप में देखा जाए तो राष्ट्रपति की महत्ता को बहुमत वाली सरकार जो एक पार्टी से बनी हो के काल में अधिक सारगर्भित कहा जा सकता है। परंतु जब गठबंधन या कमजोर सरकार जो मिली-जुली रहती है उस काल में राष्ट्रपति के द्वारा हस्तक्षेप की संभावना बढ़ जाती है। नीलम संजीव रेड्डी से लेकर शंकर दयाल शर्मा जी को ऐसी परिस्थिति में विवेक सम्मत निर्णय लेने को राजी किया गया था।
उपरोक्त तथ्यों को अगर उदाहरणस्वरूप में देखना चाहेंगे तो हमें यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि ज्ञानी. जैल सिंह जी को एक बड़े उदाहरण के तौर पर ले सकते हैं। इन्होंने 'भारतीय डाक अधिनियम' विधेयक के खिलाफ कड़ी टिप्पणी भी की थी। बात तो यहां तक पहुंच गयी थी कि राजीव गांधी सरकार को वो बर्खास्त भी कर सकते है। किंतु हमें यह एहसास होना चाहिए कि राष्ट्रपति की शक्ति संविधान में इतने बड़े स्तर पर निहित है।
राष्ट्रपति की चर्चा एक मामले में और अधिक होती है जब धारा 356 लागू करने की बात होती है क्योंकि इस प्रकरण में राष्ट्रपति अपनी शक्ति का प्रयोग कर मंत्रिमंडल के इस फैसले को लौटा भी सकता है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, कर्नाटक, गोवा इसके बड़े उदाहरण रहे हैं 44वें संविधान संशोधन में राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदान कर दिया गया कि मंत्रिपरिषद् से अपने निर्णय पर पुनः विचार करने का अनुरोध करे। लेकिन यदि मंत्रिपरिषद अपने निर्णय पर कायम रहे तो राष्ट्रपति को वह स्वीकार करना होगा। यह एक बड़ा इशारा होता है जब राष्ट्रपति केन्द्र को किसी मंत्रिमंडल के फैसले को पुनः विचार के लिए भेजता है।
अनुच्छेद 111 में जब कोई बिल राष्ट्रपति के सामने पेश किया जाता है, तो उन्हें इससे असहमति जताने का अधिकार है, और यदि वे चाहें तो संसद को पुनर्विचार के लिए भेज सकते हैं। 1978 में किए गए 44वें संशोधन के अनुसार यह स्पष्ट किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह से ही अपातकाल की घोषणा कर सकता है। निस्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति कोई भी निर्णय मंत्रिमंडल की सलाह के अनुसार कर सकता है।
लोकसभा - यह निचला सदन होता है। मंत्रिमंडल इसी सदन के प्रति उत्तरदायी होता है। इस सदन का चुनाव जनता के द्वारा 5 वर्षों के लिए होता है। इसे इसका कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही समाप्त किया जा सकता है। अठारह वर्ष की आयु के बाद इसमें मतदान करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। 25 वर्ष की अवस्था प्राप्त करने के बाद लोकसभा का चुनाव भारतीय नागरिक लड़ सकता है।
राज्यसभा - यह ऊपरी सदन होता है। यह सदन राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें अधिकतम 250 सदस्य हो सकते हैं। 238 का चुनाव तथा 12 सदस्यों का मनोयन राष्ट्रपति करता है।
उपराष्ट्रपति - एक तो उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति ही होते हैं और दूसरी तरफ राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्यवाहक उपराष्ट्रपति होते हैं। धारा:- 65 में यह प्रावधान किया किया गया था उपराष्ट्रपति का चुनाव राज्यसभा और लोकसभा के सदस्य मिलकर करते हैं।
मंत्रिमंडल तथा प्रधानमंत्री - संविधान में यह वर्णन है कि वास्तविक कार्यकारिणी का अधिकार प्रधानमंत्री के हाथ में होता है तथा यह कार्य प्रधानमंत्री अपनी मंत्रिपरिषद् के द्वारा पूरा करता है। प्रधानमंत्री लोकसभा में बहुमत वाले दल का नेता होता है तथा राष्ट्रपति के द्वारा इनकी नियुक्ति होती है। नेहरू ने प्रधानमंत्री को “ सरकार का केन्द्र बिन्दु" कहा है वहीं हमारे संविधान में एक तरह से प्रधानमंत्री को सरकार का इंजन कहा गया है। सही तौर पर भारत में प्रधानमंत्री की कुर्सी एक ऐसी कुर्सी है जो राष्ट्रपति और संसद के बीच सेतु के रूप में होती है क्योंकि संसद का एक अंग राष्ट्रपति के होने के बावजूद संसद में विधेयक पास होकर राष्ट्रपति के पास ही जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत की नीतियों को सर्वोच्च स्तर पर संसद में पेश होने से पहले मंत्रिमंडन से ही पास किया जाता है। " 
राज्य सरकारें
> पूर्ण राज्य
> केंद्र शासित राज्य
पूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री राज्य कार्यकारिणी के कार्य सभी कार्य संचालित करते हैं। राज्य का राज्यपाल केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि होता है वहीं मुख्यमंत्री को राज्यपाल ही नियुक्त करता है। धारा 356 को आरोपित करने में राज्यपाल की भूमिका अहम होती है और कहीं-न-कहीं राष्ट्रपति, राज्यपाल के रूप में अपने प्रतिनिधि को राज्य में भेजता है।
राज्यपालों की भूमिका अधिकतर विवादों में रही है परंतु यह मान कर चलने में सही लगता है कि यह केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि होने के कारण केंद्र सरकार में जो पार्टी सत्ता में होती है उसकी नुमाइंदगी करता है। राज्यपाल टिप्पणी तथा कदम न्यायालय से सुनवाई का आधार भी बन जाता है। राज्यपाल से जुड़े विवाद अधिकतर उसी समय सामने आते हैं जब केन्द्र और राज्य में अलग-अलग पार्टी की सरकार होती है।
राज्य सरकारें विधानसभा में बहुमत के आधार पर बनती हैं। विधानसभा की अधिकतर सीटें 500 तक तथा न्यूनतम 60 तक होती हैं। कुछ राज्यों में विधान परिषद भी होता है।
केन्द्र शासित प्रदेशों में शासन केन्द्र के द्वारा संचालित होता है जिसमें उपराज्यपाल या प्रशासक की नियुक्ति होती है। ये प्रदेश पूरी तरह केन्द्र की सरकार के द्वारा ही संचालित होते हैं। दिल्ली और पांडिचेरी को संविधान के संशोधन के तहत अलग से अधिकार दिए गए। हैं।
6. स्थानीय प्रशासन
संविधान में स्थानीय स्वशासन की अवधारणा को स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं किया गया था। परंतु नीति-निर्देशक तत्व में अनुच्छेद '40' के तहत 'पंचायती राज' की चर्चा की गई थी। लेकिन यह कहना आवश्यक है कि नीति-निर्देशक तत्व के बारे में सरकार को सिर्फ सलाह के तौर पर ही कहा जा सकता था। इसके अलावा पंचायती राज की अवधारणा की बात अगर नींव के तौर पर चर्चा की जा सकती है तो गांधी जी के 1920-22 यानी असहयोग आंदोलन के हल से अपने कार्यक्रम में पंचायती राज को शामिल करना महत्वपूर्ण है।
उपरोक्त तथ्यों की प्रगति ही स्वतंत्रता के बाद पंचायती राज को एक महान विकास की ओर प्रेरित किया। सरकार ने आरंभ में ‘सामूदायिक विकास कार्यक्रम' के तौर पर इसकी नींव रखी।
1956 में सरकार ने बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन इस प्रणाली में सुधारों का सुझाव देने के लिए किया। बलवंत राय मेहता समिति ने तीन स्तरों वाली प्रतिनिधि इकाईयों वाले पंचायती राज की स्थापना की सलाह दी थी। ग्राम पंचायत ग्राम स्तर पर पंचायत समिति, प्रखण्ड स्तर पर तथा जिला परिषद् जिला स्तर पर कार्य करें, ऐसा बलवंत राय मेहता समिति का मत था।
1959-1960 के बीच सारे राज्य सरकारों ने पंचायती राज कानून लागू कर दिए। लेकिन यह कहना आवश्यक है कि उस काल में पंचायती राज के कार्य संतोषजनक नहीं रहे। सरकार ने बाद में चलकर पंचायती राज से संबंधित वि. भन्न समितियों जैसे- अशोक मेहता समिति 1978, जी.वी. के समिति 1985 तथा एल. एम. समिति 1986 ने इस मामले में काफी कुछ कहा।
1988 में पी.के. थुंगन समिति के नेतृतव में गठित समिति ने यह सुझाव दिया कि पंचायती राज से संस्थाओं को संवैधानिक रूप से मान्यता दी जाए। 1989 में संविधान में 64वाँ संविधान संशोधन बिल संसद में पेश किया गया पर यह राज्यसभा में गिर गया। 1993 में 73वें एवम 74वें संशोधन बिलों को 1993 में में पास करवाने में सरकार सफल हो गयी।
73वें संशोधन में ग्राम पंचायत तथा 74वें संशोधन में नगर निकाय के प्रावधान को संवैधानिक अधिकार प्रदान किया गया था। पंचायत स्तर पर 29 विषयों को रखा गया था।
7. न्यायपालिका
संविधान सभा एक ऐसे लोकतंत्र की बुनियाद रख रही थी जिनमें आम नागरिक को सस्ता एवम सुलभ न्याय मुहैया हो। आज यह कितना फलीभूत हुआ, इस पर बहस हो सकती है लेकिन संविधान सभा ने भारत देश के लिए एक वृहत न्यायपालिका की नींव रखी तथा सही रूप में इसे 'संविधान का रक्षक' बताया । संविधान में न्यायपालिका में जुड़े प्रावधानों को धारा 124-127 तथा 214-231 के बीच रखा गया है।
संविधान में न्याय-पालिका सही तौर पर एक सर्वोच्च कानूनी संस्था के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के लिए एक रास्ता बनाने का जिक्र है जो संसद की नीति बनाने की सर्वोच्च शक्ति तथा उसके द्वारा बनायी गयी नीतियों की संवैधानिकता को परखती है। 1950 में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक स्थापना हुई तथा इसके पहले इसे फेडरल कोर्ट के तौर पर जाना जाता था। परंतु इस फेडरल कोर्ट को सर्वोच्च कहना गलत होगा क्योंकि इसका फैसला ब्रिटेन में प्रिनी काउंसिल की न्यायिक समिति के समक्ष किया जा सकता था। प्रिवी काउंसिल का अधिकार अक्टूबर 1949 में खत्म कर तथा फेडरल कोर्ट की जगह 1950 में सुप्रीम कोर्ट ने ले ली। 1950 में सुप्रीम कोर्ट के जजों की संख्या 7 थी और 1986 में 25 थी। सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या को (25:1) के अनुपात में रखा गया था। मतलब 1 मुख्य न्यायाधीश तथा 25 न्यायाधीश। 64 वर्ष के अवकाश की अवधि अब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के लिए तथा 62 वर्ष के अवकाश की अवधि अब उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए रखी गई है। राष्ट्रपति के द्वारा मुख्यन्यायाधीश तथा अन्य जजों की सलाह से न्यायधीश की नियुक्ति होती है। धारा 124 में यह कहा गया है कि न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश की सलाह ली जाएगी। न्यायपालिका के इस सलाहकारी रवैये को हम अधिक स्वीकार्य रूप में ले सकते हैं। यह भी है कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के ही सबसे वरिष्ठ (सीनियर) न्यायाधीश होते हैं, वहीं बनते हैं, लेकिन कभी-कभी सरकार के द्वारा इसे उल्लंधित भी किया गया है। जैसे इंदिरा गांधी ने दो बार इसका उल्लंघन किया था। इस बात का बहुत बड़े स्तर पर विरोध भी हुआ।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने का रास्ता महाभियोग है जिसमें संसद के दोनों सदनों से बहुमत तथा उप. स्थित सदस्यों के दो-तिहाई सदस्य एक ही अधिवेशन में प्रस्ताव पास कर राष्ट्रपति को भेजने का प्रावधान किया गया है।
मौलिक अधिकार से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय को अपील या रिट संबंधी मूल अधिकार है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी व्यक्ति बिना अन्य न्यायालय में गए सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है। सर्वोच्च न्यायालय को केन्द्र तथा राज्यों के बीच तथा विभिन्न राज्यों के बीच मामलों के निपटारे संबंधी मूल अधिकार भी हैं। वह निचले न्यायालय से अपने पास केस मंगवा सकते हैं। संवैधानिक, नागरिक एवम अपराधिक मुकदमों में इसके पास अपील की सुनावाई के अधिकार भी हैं। इसके अलावा न्यायिक सक्रियता भी अहम है।
संविधान की व्याख्या में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका सर्वोच्च है। लेकिन यह साफ कह देना आवश्यक है कि यह सिर्फ मूल ढांचे को सुरक्षित करने के आधार पर किसी संशोधन को अवैध घोषित करने की परंपरा है। लेकिन सबसे अधिक आवश्यक है कि यह माना जाए कि सर्वोच्च न्यायलय के कार्य में 'संविधान की व्याख्या' के मायने संविधान के संरक्षण से है और इससे भी बढ़कर 'संविधान के मूल ढांचे' के संरक्षण से है।
उच्च न्यायालय के अपने अधिकार होते हैं। रिट का आदेश देने की शक्ति हाई कोर्ट थी, यह शक्ति सुप्रीम कोर्ट से भी अधिक है। इनका कार्य मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन तक सीमित नहीं है। मुख्य न्यायाधीश उच्च न्यायालय के उच्चतम पदाधिकारी होते हैं साथ ही दूसरे जज भी होते हैं। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का तरीका सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तरह ही होता है। हाई कोर्ट के कानून राज्य की सभी अदालतों पर एक समान लागू होते हैं।
राज्य के सभी न्यायालय उच्च न्यायालय के ही अधीन होते हैं। जिला न्यायाधीश कि नियुक्ति राज्यपाल के द्वारा हाई कोर्ट से सलाह करके होती है। निचली न्यायालय में जटिलता, भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद के रूप में एक विचार देखा जाता रहा है।
प्रशासनिक सेवा तथा इससे जुड़ी हुई सुविधाएं तथा नियम:
स्वतंत्रता के बाद भारत के तंत्र को चलाने के लिए एक मजबूत प्रशासनिक प्रणाली की आवश्यकता थी। उस समय में भारतीय प्रशासनिक तंत्र में (आजादी के तत्काल बाद) रजवाड़ो तथा जमींदार परिवारों के ही लोग शामिल थे जिसमें अंग्रेजी सरकार के आई.सी.एस. ने परीक्षा में भाग लिया था। यह तंत्र के उस काल का प्रतिनिधित्व करते थे जो नौकरशाही के तौर जर जाना जाता था।
आई.सी.एस. अफसर का मतलब था वह अंग्रेजी अफसर जिसे विशेषाधिकार प्राप्त था । स्वतंत्रता के बाद इसमें परिवर्तन आया तथा राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर लोग अपने देश में सेवा अपने देश के लिए करने की प्रेरणा में जीने लगे। आईसी. ए स. की जगह पै ने ली । अखिल भारतीय सेवा प्रादेशिक सेवा तथा केन्द्रीय या संघीय सेवा का मूल ढांचा बरकरार था। 
संविधान में भाग 14 जोड़ा गया तथा 'संघ तथा राज्यों के तहत सेवाएं' में कहा गया है कि केंन्द्रीय तथा राज्य विधनों में केन्द्र एवम राज्य की सेवाओं संबंधी भर्ती एवम कार्य नियम बनाए जाएंगे। धारा 315 में संविधान स्वतंत्र जन के द्वारा भर्ती का प्रावधान रखकर न्यायपूर्ण रुख अपनाने का प्रयत्न किया गया है।
संविधान के आरंभ में IAS और IPS की सेवाओं का मुख्य रूप से उल्लेख किया गया। नई अखिल भारतीय सेवाएं स्थापित करने के लिए राज्यसभा को दो तिहाई बहुमत से तय करने के अधिकार दिए गए।
प्रशासनिक तंत्र को सुचारू रूप से चलाने तथा लोकतंत्र में जनता की भावना का ख्याल रखने में प्रशासनिक अधि कारी का अहम योगदान होता है तथा नीतियों के मानचित्रण में सर्वोच्च हाथ इसी समूह का होता है।
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Sun, 01 Oct 2023 06:54:54 +0530 Jaankari Rakho
स्वातंत्र्योत्तर राष्ट्र के रूप में भारत (गठन की प्रक्रिया का संवैधानिक तथा नैतिक आधार) https://m.jaankarirakho.com/389 https://m.jaankarirakho.com/389 स्वातंत्र्योत्तर राष्ट्र के रूप में भारत (गठन की प्रक्रिया का संवैधानिक तथा नैतिक आधार)
1. परिचय
स्वतंत्रता के बाद भारत एक देश के रूप में अपने भविष्य की लकीर खींच रहा था तथा इसके लिए उन सभी आधारों को प्रमुखता देने की आवश्यकता थी जो भारतीय संवैधानिक प्रावधानों तथा उन नीतियों से बने थे जिनकी जरूरत भारतीय जनता के विकास के लिए आवश्यक थी।
भारत की स्वतंत्रता के बाद जो ज्वलंत समस्याओं से अवगत होना पड़ा उसमें सिर्फ विभाजन तथा साम्प्रदायिक झंझावात ही नहीं थे बल्कि नीतिगत तथा संवैधानिक स्तर की भी बातें थीं जो भविष्य के भारत के लिए मायने रखती थीं। इनमें प्रमुख मुद्दे निम्नलिखित थे
2. भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का मुद्दा
स्वतंत्रता के बाद बृहत् स्तर पर राज्यों के पुनर्गठन के मामले में 'भाषा का आधार' एक प्रमुख मुद्दा बन गया। यह मामला उठना स्वाभाविक था क्योंकि अंग्रेजों ने अपनी सहूलियत के अनुसार जो भारतीय प्रदेशों की भौगोलिक सीमाएं बनायी थीं। वह अस्वाभाविक तो थी ही पर अप्राकृतिक भी थीं। अंग्रेजों ने भारतीय प्रदेशों के सीमांकन में भाषा तथा संस्कृति की समरूपता पर कोई ध्यान नहीं दिया था। इस कारण अधिकतर राज्य बहुसांस्कृतिक तथा बहुभाषी थे।
जो भी प्रशासनिक तंत्र भाषाई प्रांतों पर आधारित थे उसकी विश्वसनीयता काफी अधिक थी। इसके पीछे कारण यह था कि भाषा और संस्कृति एक दूसरे से गहरी तौर पर जुड़ी होती है और इसका प्रभाव अंदर तक लोगों के जेहन में होता है। हम अपनी शिक्षा तथा दैनिक जीवन में भी सबसे अधिक मातृभाषा का ही प्रयोग करते हैं। विपीन चंद्रा अपनी पुस्तक 'आजादी के बाद भारत' में कहते हैं कि "आम जनता के लिए जनवाद भी तभी यथार्थ बन सकता है जबकि राजनीति और प्रशासन उस भाषा के माध्यम से संचालित हो जिसे वे ठीक से समझ सकते हों। प्रशासन किसी भाषा के माध्यम से चलाया जा रहा है, यही वह निर्धारित करता है कि आम आदमी की प्रशासन, राजनीतिक सत्ता और रोजगार तक कोई पैठ है भी या नहीं "। परंतु शिक्षा, प्रशासन और अदालतों की भाषा कोई मातृभाषा तब तक नहीं बन सकती जब तक कि प्रदेशों का गठन उसकी प्रमुख भाषा के आधार पर न किया जाए। "
कांग्रेस उपर्युक्त तथ्यों से पहले ही अवगत हो चुकी थी। 1921 में कांग्रेस ने अपने संविधान में संशोधन किया और अपनी क्षेत्रीय शाखाओं को भाषाई आधार पर पुनर्गठित किया। उस समय कांग्रेस का यह सोचना था कि भाषाई आधार पर प्रादेशिक सीमाओं के पुनर्निधारण की बात जायज है। बापू भी इस बात पर सहमति रखते थे कि प्रांतों का भाषाई आधार पर पुनर्गठन अनिवार्य है। उन्होंने एक समय यह भी कहा था कि “यदि प्रांतीय भाषाओं को अपनी पूर्ण रूपेण उन्नति करनी है तो भाषा के आधार पर प्रांतों का बनना आवश्यक है। इसलिए यह स्वीकार कर लिया गया था कि स्वतंत्र भारत अपनी प्रशासनिक इकाइयों के सीमा निर्धारण को भाषाई सिद्धांत पर आधारित करेगा। "
स्वतंत्रता मिलने के बाद बहुत सारी सोच एक नये ढर्रे में सोची जाने लगी। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण अस. हनीय विभाजन था। इस विभाजन ने बहुत सारी नई समस्याओं को जन्म दिया था। इन समस्याओं की प्रकृति प्रशासनिक,
आर्थिक और राजनीतिक भी थीं। इसके अलावा अर्थव्यवस्था कमजोरी तथा पाकिस्तान की दुष्टता के भी कम खतरे नहीं थे। विभाजन का परिणाम यह था कि उस समय सरकार के शीर्ष नेतृत्व तथा कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी सबसे आवश्यक ‘राष्ट्रीय एकता' को बनाए रखना अपनी जिम्मेदारी समझता था। उस समय के शीर्ष नेतृत्व ने यह स्वीकार किया कि अभी किसी भी तरह का आंतरिक पुनर्निधारण एक विद्रोह तथा जटिलता को जन्म देगा। यह कदम क्षेत्रीय एवं भाषायी आधार पर नई दुश्मनी को जन्म दे सकता है तथा प्रशासनिक तथा आर्थिक विकास को ठप्प कर सकता है। इसके अलावा इसके परिणाम में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। इस कारण नेहरू ने 1947 के नवम्बर महीने में 'भाषा का महत्व' विषय पर बोलते हुए यह कहा कि “पहली चीज सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण है कि, 'भारत की सुरक्षा और स्थायित्व' को सर्वप्रमुखता देना।" उन्होंने भाषायी आधार पर प्रांतों के गठन को निम्न प्रमुखता दी तथा यह भी कहा कि यह विषय इंतजार कर सकता है।
संविधान सभा में भाषाई पुनर्गठन के आधार पर काफी बहस हो चुकी थी। 1948 में संविधान सभा ने एस. के. दर के नेतृत्व में भाषाई राज्य आयोग की नियुक्ति भी की थी। इस आलोचना से भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की वांछनीयता का मूल्यांकन करने को कहा गया। एस. के. दर आयोग ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन को एक सिरे से नकार दिया। दर आयोग ने यह कहा कि भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन भारतीय प्रशासनिक संरचना के लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी चलाने जैसा होगा । यही कारण था कि संविधान सभा ने संविधान के अंतर्गत भाषाई सिद्धांत को सम्मिलित नहीं करने का निर्णय लिया। इसका भी परिणाम यह हुआ कि जनता की भावना इसके खिलाफ हो गयी । दक्षिण भारत में यह एक राजनीतिक मुद्दा बन गया। कांग्रेस को दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक जमीन भी बचानी थी। इसलिए कांग्रेस ने दिसम्बर 1948 में एक समिति की नियुक्ति कर दी तथा इसके सदस्य जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष पट्टाभि सीता रमैया बने। इस समिति का लक्ष्य पहले से ही निर्धारित था। समिति ने भाषाई राज्य के प्रश्न को फिर से 'विचारणीय' बताया। इसके बावजूद भी इस समिति ने यह सलाह दी कि “तत्काल कोई भी राज्य का पुनर्गठन ‘भाषा' के आधार पर नहीं होना चाहिए। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि "अभी सबसे अधिक आवश्यक देश की सुरक्षा, एकता, और आर्थिक विकास के लिए प्रयास करना है और अगर अभी हमने प्रांतीय पुनर्गठन को प्रमुखता देने की कोशिश की तो यह भारतीय एकीकरण के खिलाफ जा सकता है तथा हम स्वयं विखण्डनकारी शक्तियों को सदा के लिए दाना-पानी मुहैया करा देंगे।" जे.वी.पी. रिपोर्ट में यह बात भी कही गई थी कि अगर भाषा के आधार पर प्रांतों की माँग हिंसात्मक अवस्था में पहुँच जाए तो उस क्षेत्र से जुड़े दूसरे भाषाई समूह के लोग इस मांग से सहमत हों तो वहाँ भाषा पर आधारित नए राज्यों की स्थापना की जा सकती है।
इस रिपोर्ट के बाद राज्यों के पुनर्गठन के लिए व्यापक जनांदोलन आरम्भ हुए तथा यह अलग-अलग क्षेत्रों में 1960 तक चलता रहा। इसके उदाहरण में आंध्र प्रदेश की माँग भी कही जाती है जो 50 वर्षों से चली आ रही थी और इसके पक्ष में सभी राजनीतिक धरा भी सहमत थे ।
जे.वी.पी. रिपोर्ट में भी इसका समर्थन किया गया था और कहा गया था कि मद्रास प्रेसीडेंसी से अलग काटकर एक आंध्र राज्य के गज का तर्क काफी मजबूत है क्योंकि तमिलनाडु का नेतृत्व भी इस जाल के लिए सहमत है। फिर भी जे.वी.पी. आयोग ने इस बात को नहीं माना क्योंकि 'मद्रास शहर किसे मिलेगा', यह विषय विवादित हो गया था। आश्चर्य. जनक यह था कि तमिल भाषी बहुलता तथा तमिल संस्कृति प्रमुख मद्रास की मांग आंध्र नेतृत्व द्वारा की जा रही थी ।
उपरोक्त झंझावातों के बीच 19 अक्टूबर 1952 को एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी पोही श्री रामालु ने अलग आंध्र राज्य की मांग पर अनशन शुरू कर दिया तथा लगातार 58 दिनों तक अंतिम सांस तक वह अनशन पर ही रहे। उनकी मृत्यु अनशन के कारण होना दुर्भाग्यपूर्ण था। उनकी मृत्यु आंध्र प्रदेश की मांग का क्लाईमैक्स था। हिंसा, प्रदर्शन और हड़तालें आरम्भ हो गईं। पुलिस की गोली से कई लोगों ने अपनी जान गंवा दीं। सरकार तुरंत झुक गई और आंध्र राज्य की मांग को स्वीकार कर लिया। अक्टूबर 1953 में सरकार ने आंध्र प्रदेश की गठन की अधिसूचना जारी कर दी। इसके साथ ही तमिलनाडु भी अस्तित्व में आ गया।
इस राज्य की गठन की सफलता का प्रभाव देश के अन्य क्षेत्रों में भी पड़ा तथा कई और राज्यों की मांग भाषा के आधार पर होने लगी। नेहरू इस बात से काफी चिंतित थे कि बराबर भारत की आंतरिक प्रशासनिक संरचना को बदलना भविष्य के लिए ठीक नहीं होगा। इसके बावजूद इन मार्गों को रोकना या किसी भी ऐसे आंदोलन को कुचलना ठीक नहीं था। इसके साथ नेहरू यह भी सोचते थे कि किसी भी ऐसे राज्य की मांग जो भाषा के आधार पर संभव है, को रोका जा सकता है परंतु कुचला नहीं जा सकता है। नेहरू ने इन मांगों के जवाब में कुछ ऐसे कदम उठाए जो स्वीकार्य भी हों और कोई झंझावात भी पैदा न हो। अगस्त 1953 में नेहरू ने एक और राज्य पुनर्गठन आयोग नियुक्त किया जिसके सदस्य क्रमशः (1) न्यायाधीश फजल अली, (2) न्यायाधीश के. एम. पन्निकर तथा (3) हृदयनाथ कुंजान बनाए गए।
सरकार ने इस आयोग को यह सलाह दी कि बृहत् परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता को आधार मानते हुए संघ के सभी राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित प्रश्नों की जांच की जाए। इस आयोग का कार्यकाल लगभग 2 वर्षों का रहा तथा इन दो सालों में इस आयोग को कितने ही रुकावटें, जैसे- भूख हड़ताल, प्रदर्शन तथा विभिन्न मुद्दों का सामना करना पड़ा। विभिन्न भाषाई समूह इस बीच आपसी टकराहट से माहौल को काफी अशांत कर चुके थे।
इस आयोग ने एक संक्षिप्त टिप्पणी में अपनी बात रखी जो काफी दुखी करने वाला था- उन्होंने टिप्पणी की - "हमें यह देखकर बहुत कष्ट पहुँचा है कि कुछ क्षेत्रों में स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले प्रतिष्ठित समुदाय की आपस की लड़ाई और विवाद में पड़कर एक युद्ध जैसी स्थिति बना दी है। इन्होंने अपनी वाणी से साम्प्रदायिक तथा उन्माद से रंजित वातावरण का निर्माण कर दिया है तथा इससे एक प्रकार का ऐसा उन्माद पैदा हो गया है जो सिर्फ यह सोचता है कि अगर किसी खास भाषा समूह को प्रशासनिक इकाई नहीं बनाया गया तो उसका नैतिक और भौतिक पतन हो जाएगा।"
उपरोक्त टिप्पणी स्वयं बहुत कुछ देती है। 1955 में इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को दे दी। इस रिपोर्ट में यह सिफारिश की गई थी कि “प्रशासनिक और आर्थिक पहलुओं को समुचित महत्व देते हुए भी भाषाई आधार पर अधिक जोर देना चाहिए। इसी आधार पर राज्यों की सीमाओं को पुनर्निधारित करने के लिए आयोग ने अपनी संस्तुतियां सौंप दी। आयोग ने बंबई और पंजाब को भाषाई आधार पर बांटने का विरोध किया। इस रिपोर्ट पर देश के कई भागों में नकारात्मक प्रतिक्रियाओं ने जोर पकड़ा फिर भी सरकार ने इसे स्वीकार कर लिया तथा कुछ संशोधन के साथ शीघ्र लागू हो जाने की मंशा जाहिर की।
नवम्बर 1956 में भारतीय संसद ने राज्य पुनर्गठन विधेयक को पास कर दिया। इस विधेयक में 14 राज्य एवं 6 केंद्र शासित प्रदेशों की व्यवस्था की । इस विधेयक के द्वारा जो व्यवस्था की गई थी, वह निम्न प्रकार से थीं
केरल ट्राबनकोर + कोचीन + मालाबार = केरल 
बंबई (कुछ भाग), मद्रास (कुछ भाग), हैदराबाद (कुछ भाग), कुर्ग, कन्नड़ का भाग = मैसूर 
कच्छ + सौराष्ट्र + हैदराबाद (मराठी भाषी भाग) बंबई राज्य में मिलाया गया।
महाराष्ट्र जैसे राज्य में इस आयोग को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। महराष्ट्र में बड़े पैमाने पर दंगे भड़क उठे और जनवरी 1956 में पुलिस फायरिंग में अकेले बंबई शहर में 80 लोग मारे गये। छात्रों, किसानों, मजदूरों, कलाकारों, व्यापारियों की भावना के आधार पर विपक्षी दलों ने एक शक्तिशाली विरोध आंदोलन खड़ा कर दिया। यहाँ की जनता का कहना था कि हमारी आवाज को दबाया जा रहा है। सरकार ने दबाव में यह निर्णय लिया कि (जून 1956 में) बंबई राज्य को दो हिस्सों में बांटकर दो भाषाई राज्य महाराष्ट्र और गुजरात बनाए जाएंगे तथा बंबई केंद्र शासित प्रदेश बन जाएगा। महाराष्ट्र में फिर इसका विरोध किया गया। नेहरू अब अपने निर्णय पर सोचने लगे। उन्होंने फिर अपने निर्णय को बदलते हुए ग्रेटर बंबई नामक द्विभाजी राज्य बना दिया। फिर भी इस कदम का विरोध महाराष्ट्र और गुजरात दोनों ही जगह हुआ।
विशाल स्तर पर संयुक्त महाराष्ट्र समिति और महागुजरात जनता परिषद राज्य के दो हिस्सों में अलग-अलग आंदोलनों का नेतृत्व कर रही थी। महाराष्ट्र में भी बहुत स्तर पर कांग्रेस ने भी बंबई राजधानी वाली एक भाषी महाराष्ट्र की मांग का समर्थन किया। केंद्रीय मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री सी.डी. देशमुख ने इस सवाल पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दूसरी तरफ गुजरातियों को लग रहा था कि नए राज्य में वे एक अल्पसंख्यक बनकर रह जाएंगे। वे बंबई सिटी भी महाराष्ट्र को देने के लिए तैयार नहीं थे। अब हिंसा और आगजनी अहमदाबाद और गुजरात के अन्य हिस्सों में फैल गई। पुलिस फायरिंग में 16 आदमी मारे गए और 200 घायल हुए । बंबई शहर पर मतभेदों को नजरअंदाज करने का सरकार ने मन बना लिया था और नवम्बर 1956 में राज्य पुनर्गठन विधेयक पास कर दिया गया। 1957 में आम चुनाव में कांग्रेस जीती तो जनमत का अंतर काफी कम हो गया था। कांग्रेस की अध्यक्ष इस समय नेहरू जी की बेटी इंदिरा गाँधी जी थीं। कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से इंदिरा गाँधी ने इस सवाल को फिर से उठाया। इसमें उन्हें राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन का भी समर्थन प्राप्त था। अंतत: 1960 में सरकार बंबई राज्य को महाराष्ट्र तथा गुजरात में बांटने के लिए तैयार हो गई, जिसमें बंबई सिटी महाराष्ट्र को मिला तथा गुजरात की राजधानी अहमदाबाद हो गई।
अब एक पंजाब बचा था जिसका गठन भाषाई आधार पर नहीं हुआ था। 1956 में पेपसु (Pepsu) राज्यों को पंजाब में मिला दिया गया था, जिनमें पहले से ही तीन भाषाई समूह - पंजाबी, हिंदी और पहाड़ी रहते थे। राज्य की बहुलता पंजाबी भाषा बोलने वाले लोग थे । इनकी मांग पंजाबी भाषा राज्य बनाने की थी। दुर्भाग्य यह था कि यह मांग साम्प्रदा. यिकता के माथा-मोह में उलझ गयी । एक तरफ हिन्दूवादी नेताओं ने पंजाबी सूबा की मांग का विरोध किया वहीं सिखों के नेतृत्व में पंजाबी तथा गुरुमुखी के आधार पर सिख राज्य की मांग की। इसका समर्थन वामपंथी दल तथा कांग्रेस का एक समूह भी दे रहा था। नेहरू इस मांग को “साम्प्रदायिक " चश्मे से देख रहे थे तथा धर्म या सम्प्रदाय के आधार पर राज्य के निर्माण के एकदम खिलाफ थे। राज्य पुनर्गठन आयोग ने तो एकदम इसे अस्वीकार ही कर दिया था तथा कह दिया था कि न तो इससे पंजाब की भाषा समस्या का समाधान होगा, न ही सांप्रदायिक समस्या का। फिर भी कुछ समय बीतने के बाद जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री बनीं तो 1966 में उन्होंने पंजाबी और हिंदी भाषी दो राज्यों में पंजाब के विभाजन के लिए तैयार हो गईं। पंजाब और हरियाणा दो अलग-अलग राज्य बना दिए गए तथा पहाड़ी क्षेत्र जैसे कांगड़ा और होशियारपुर के कुछ जिले के भाग को मिलाकर हिमाचल प्रदेश प्रदेश में मिला लिया गया या हिमाचल प्रदेश बनाया गया। संयुक्त पंजाब की राजधानी और नवनिर्मित शहर चंडीगढ़ केंद्रशासित बना दिया गया। चंडीगढ़ अभी भी पंजाब और हरियाणा दोनों की साझा राजधानी है। पंजाब के बनने तथा हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की स्थापना के बाद भारत का भाषाई पुनर्गठन लगभग पूर्ण हो गया।
बहुत सारे विद्वान राज्यों के भाषाई आधार पर पुनर्गठन को "राष्ट्रीय एकीकरण के लिए एक आधार बनाने" की संज्ञा देते हैं। इसके बाद 'भाषा' राजनीति के केन्द्र से सदा के लिए हट गई ।
यह कहना महत्वपूर्ण है कि भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन ने देश के ढांचे को और मजबूत किया। राज्य-केंद्र के बीच आर्थिक विकास तथा विभिन्न योजनाओं के संदर्भ में एक सहयोगात्मक रवैया सामने आया तथा संघीय ढांचे को एक नया रूप मिला। राज्यों के पुनर्गठन ने भारत की एकता को मजबूत दर किया तथा उस काम में इसको लेकर आशंका जाहिर करने वाले नेताओं को गलत साबित कर दिया।
इसको लेकर रजनी कोठारी ने यह कहा कि “राज्यों के पुनर्गठन के बाद भारत के राजनीतिक मानचित्र को तर्कसंगत बनाया गया। इससे ऐसी समरूप राजनीतिक इकाईयों का जन्म हुआ जिन पर बहुसंख्यक जनता को समझ में आने वाली भाषा के माध्यम से प्रशासन चलाया जा सकता था। अतीत का मूल्यांकन करते हुए अब यह निश्चित ही कहा जा सकता है कि विभाजन वाली शक्ति साबित होने के बदले यह 'एकता' और 'समन्वय' के लिए साधन ही बनी।”
इन सभी अच्छी बातों के बावजूद कहानी खत्म अभी नहीं हुई थी। अभी यह नहीं कह सकते थे कि सभी विवादों तथा समस्याओं का समाधान राज्यों के पुनर्गठन के साथ ही खत्म हो गया था। अब भी कुछ ऐसे मुद्दे थे जो ज्वलंत और प्रासंगिक दोनो थे - 
1. सीमा विवाद (राज्यों के बाद)
2. भाषाई अल्पसंख्यकों की समस्या
3. नदी जल बंटवारा
4. खाद्यान्न तथा ऊर्जा से संबंधित समस्याएँ इत्यादि ।
परंतु, उपरोक्त समस्याओं के समाधान में राज्य पुनर्गठन विधेयक के कुछ प्रावधान ही मदद कर सकते थे। इस विधेयक में पांच क्षेत्रीय परिषद की स्थापना का प्रावधान था जिसका अध्यक्ष गृहमंत्री को बनाने का प्रस्ताव बनाया गया। यह परिषद एक सलाहकारी संस्था के रूप में काम करता तथा दो राज्यों के बीच तथा उससे अधिक राज्यों के बीच केन्द्र सरकार मध्यस्थता करती। अभी भी यह परिषद बहुत ही सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है।
भाषा से संबंधित समस्याओं में एक समस्या अल्प-संघटकों की भाषा से भी संबंधित मुद्दे थे। चाहे जिस भी तरह राज्यों को दूसरे एक से भौगोलिक रूप से विभाजित किया जाए, एकभाषी राज्यों का निर्माण असंभव था। भाषाई पुनर्गठन वाले राज्यों में भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी थे जो वहां की राजभाषा या भाषा नहीं जानते थे। भाषाई अल्पसंख्यक कहलाते थे क्योंकि इनकी आबादी करीब 18 प्रतिशत थी। 1971 की जनगणना के अनुसार कुल आबादी में भाषाई अल्पसंख्यकों का अनुपात केरल में 4 प्रतिशत से लेकर कर्नाटक में 34.5% तथा असम में 39% से लेकर जम्मू कश्मीर में 44.5% तक है।
स्वतंत्रता के बाद से ही राज्यों में इन अल्पसंख्यकों के अधिकारों और हैसियत का निर्धारण, एक महत्वपूर्ण बिन्दु बना रहा। एक तरफ तो उनकी सुरक्षा की समस्या थी क्योंकि हमेशा इस बात का खतरा बना हुआ था कि उनके साथ अनुचित व्यवहार किया जा सकता है, दूसरी तरफ उन्हें राज्य के प्रमुख भाषा समुदाय के साथ एकीकरण को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता थी। एक बात और भी जरूरी थी कि अल्पसंख्यकों को यह भी आत्मविश्वास प्रदान करना आवश्यक था कि उनके साथ बहुसंख्यकों के सामने कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और इतना ही नहीं, बल्कि उनकी भाषा तथा संस्कृति को विकसित करने में सहायता की जाएगी। बहुसंख्यकों के साथ कैसे समन्वय बैठाकर भाषाई अल्पसंख्यकों की मांग को माना जाए, इस पर भी कार्य करने की आवश्यकता थी।
संविधान सभा में इस मुद्दे पर काफी बहस हुई तथा संविधान में भाषाई अल्पसंख्यकों को कुछ मौलिक अधिकार प्रदान कर दिए गए। संविधान का अनुच्छेद 30 इसका उदाहरण है। इसके अलावा अनुच्छेद 347 में यह प्रावधान किया गया है कि अल्पसंख्यकों द्वारा मांग किए जाने पर राष्ट्रपति उस भाषा को किसी भी राज्य के लिए अधिकारिक रूप से उसे जारी कर सकता है अल्पसंख्यक भाषाओं के लिए बहुत सारे संशोधन भी किए गए। भाषाई अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए भाषाई अल्पसंख्यक आयुक्तों की भी नियुक्ति की गई। भाषाई अल्पसंख्यक आयुक्तों ने अपनी रिपोर्टों में स्कूली शिक्षा, तकनीकि तथा मेडिकल संस्थाओं में नामांकन तथा प्रादेशिक लोक सेवा आयोगों द्वारा प्रस्तुत रोजगार के अवसरों में प्रादेशिक राजभाषा में दक्षता नहीं होने के कारण भाषाई अल्पसंख्यकों के साथ होने वाले भेदभाव के विषय में लगातार सूचनाएं दी हैं।
अल्पसंख्यक भाषाओं में उर्दू एक खास भाषा है। भारत की यह सबसे बड़ी अल्पसंख्यक भाषा है। 1951 में करीब 2 करोड़ 33 लाख लोग उर्दू बोलते थे। वहीं अब लगभग 20 करोड़ उर्दू बोलते हैं।
जहाँ भारत की सभी प्रमुख भाषाएं एक न एक राज्य की राज्यभाषा है, वहीं उर्दू जम्मू कश्मीर के राज्य के अलावा कहीं की राजभाषा नहीं है। कश्मीर में भी मातृभाषा डोगरी, कश्मीरी तथा लद्दाखी है। बिहार जैसे राज्य में तो यह द्वितीय राजभाषा के रूप में मान्य है। हिन्दी और उर्दू का साथ होना भारतीय एकता की मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है।
अल्पसंख्यकों के बाद जो मुद्दे सबसे अधिक चर्चित थे, वह थे - जनजातीय लोगों की स्थिति तथा इनका राष्ट्र निर्माण में योगदान। स्वतंत्रता के बाद जनजातीय लोगों को मुख्यधारा में लाना एक महत्वपूर्ण कार्य था। यह कार्य कठिन भी था क्योंकि इनकी परिस्थितियां अलग-अलग थीं। वे अलग-अलग भाषाएं बोलते थे, अपनी अलग-अलग संस्कृतियां थी। उनकी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ भी एक जनजाति से दूसरे में भिन्न-भिन्न थी। इनकी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि तथा शिकार था। इनका सबसे अधिक घनत्व मध्य प्रदेश, बिहार ( अब झारखण्ड ), उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, आदतें, गुजरात, राजस्थान और पूर्वोत्तर प्रांतों में है। पूर्वोत्तर राज्यों में इनकी आबादी बहुसंख्यक रही है। इनकी परम्परा, जीवनशैली देश के साधारण लोगों से अलग रही है। ये देश की जनता से सामाजिक आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर सबसे अलग रहे हैं।
देश के अधिकतर हिस्से में ब्रिटिशकाल से ही इनका मौलिक परिवर्तन अलग प्रकार से हुआ है। उनके समाज में पूँजीवाद का प्रवेश देश की बहुसंख्यक जनता से जुड़ाव का एक पुल बना जिसने कहीं न कहीं इनमें उत्प्रेरक का कार्य किया। औपनिवेशिक काल में बड़ी संख्या में महाजन, व्यापारी, मालगुजार तथा दलाल इनके जीवन में हस्तक्षेप करने लगे तथा उन्होंने इनकी पारंपरिकता को ठेस पहुँचाने की कोशिश की। आदिवासी कर्ज के व्यूह में फंसते गए तथा अपने जंगल, जानवर जगह खोते रहे ।
धीरे-धीरे आदिवासी की स्थिति एक मजदूर की रह गई । स्वतंत्रता के बाद एक कानून बनाकर आदिवासियों की जमीन किसी बाहरी व्यक्ति को बेचने पर रोक लगाने की कोशिश हुई परंतु सफलता हाथ नहीं लगी। व्यापारी और ठेकेदार के द्वारा इन पर लगातार शोषण जारी रहा। तथा इनकी गरीबी तथा लाचारी सदा के लिए बनी रही।
आबादी बढ़ने से खेती का विस्तार होने लगा। इसके कारण जंगल कटते गए तथा आदिवासियों की संस्कृति घायल होती चली गई। जमीन की हानि, कर्ज का कारण, दलालों का शोषण, वन तथा वन उत्पाद तक पहुँच से रोक तथा पुलिस, वन अधिकारी और अन्य सरकारी मुलाजिमों द्वारा शोषण तथा लूट 19वीं तथा 20वीं सदी में कई विद्रोहों को जन्म दे चुका था।
स्वतंत्रता के बाद से ही भारत सरकार के सामने जनजातीय लोगों को शेष भारतीय जनता के साथ घुलाने-मिलाने की चुनौती थी। यह काम आदिवासियों की संस्कृति तथा परंपरा को हानि पहुँचाए बिना करने की आवश्यकता थी। नेहरू ने स्वतंत्रता के बाद जनजाति समुदाय के लिए अपने संबोधन में कहा था कि “जनजातियों के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता उनमें आत्मविश्वास का संचार करना है तथा उन्हें यह महसूस कराना है कि वे भारत के एक अंग है तथा यह देश उनका भी है। "
नेहरू जी ने कहा कि “आदिवासी के लिए भारत सिर्फ सुरक्षाकारी शक्ति ही नहीं बल्कि मुक्तिदायी शक्ति का भी प्रतीक होना चाहिए। उन्होंने कहा भारतीय तंत्र में राष्ट्र के लिए सोचने वाले समूह में एक 'जनजाति' समुदाय का भी नाम आना चाहिए। फिर भी उस काल यह प्रश्न सबके जेहन में था कि भारतीय समाज एवं राजनीति में जनजाति के लिए कैसा स्थान होगा? एक तो सोच यह थी कि उन्हें हस्तक्षेपित न करके उनकी पारंपरिकता तथा संस्कृति को अछूत मानकर छोड़ दिया जाए। दूसरी तरफ यह सोच अधिक स्वीकार्य थी कि जनजाति समुदाय को जल्द से जल्द भारत की मुख्यधारा में लाया जाए तथा उसे एक जगह दी जाए और उन्हें प्रशिक्षण दिया जाए कि मुख्यधारा में कैसे रहा जाता है ?
जवाहर लाल नेहरू ने इन दोनों पक्षों की बात को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें अपने हाल पर छोड़ा नहीं जा सकता तथा उन्हें भारतीय तंत्र में समेटना आवश्यक है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम उन्हें भूल जाएं। दूसरी तरफ उन्हें यह भी नहीं कहा जा सकता या उनके साथ यह भी नहीं किया जा सकता कि भारत के मुख्य समाज में आकर वह विलिन हो जाएं। इससे जनजातीय संस्कृति तथा सभ्यता नष्ट हो जाएगी। उन्होंने यह रेखांकित किया कि यदि उन्हें सामान्य तंत्र में मिलाने की कोशिश हुई तो बाहरी भ्रष्टाचारी उनकी संस्कृति, सभ्यता, जमीन, संघ सभी को नष्ट कर देंगे।
फिर भी नेहरू आदिवासियों को भारतीय समाज में शामिल तथा एकीकृत करने की स्थिति को सही मानते थे। नेहरू जनजातीय सभ्यता तथा संस्कृति को अछूत रखते हुए भी भारतीय संस्कृति को साथ में रखने के समर्थक थे। 
> नेहरू की जनजाति-नीति के कुछ मुख्य अंश निम्न प्रकार के थे - 
1. जनजातीय क्षेत्रों का विकास हो
2. उनके विकास उनके ही बताए रास्ते से हो।
3. उनकी संस्कृति तथा परंपरा अक्षुण्ण रहे।
4. भारतीय शेष समाज को आदिवासियों का सम्मान करना चाहिए।
5. जनजातीय समूह को निर्णय का अधिकार
6. जनजातीय भाषाओं को सम्मान और विकास देना चाहिए ।
उपरोक्त तथ्यों के अलावा यह एक और बात महत्वपूर्ण थी कि प्रशासन की जिम्मेदारी स्वयं जनजातीय लोगों को देना चाहिए। इसके लिए प्रशासकों की भर्ती उन्हीं लोगों के बीच से कर, उन्हें यह काम दिया जाना चाहिए। अगर बाहरी लोगों को भेजा भी जाए तो वैसे लोगों को ही जो आदिवासी के प्रति सहानुभूतिपूर्वक विचार रखता है ।
इसके अलावा यह बात भी आम सहमति की ओर बढ़ी कि जनजातीय क्षेत्रों में कभी भी प्रशासनिक ताम-झाम कर दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए यह प्रयास की आवश्यक है कि उन पर प्रशासन और उनका विकास जनजातीय सामाजिक और सांस्कृतिक विचारों एवं संस्थाओं के माध्यम से ही अधिक हो । नेहरू के ये सारे विचार उन राष्ट्रवादी नीतियों पर आधारित थे जिन्हें 1920 के दशक से ही जनजातियों के प्रति इस आंदोलन ने अपनाया था। गांधी ने जब इस काल में ही जनजातीय क्षेत्रों में आश्रम ही स्थापना और रचनात्मक कार्यों को प्रोत्साहन देना आरंभ किया था। आजादी के बाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद एवं अन्य प्रमुख नेताओं द्वारा इस नीति का समर्थन किया गया था। नेहरू की नीतियों का पालन करते हुए केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों ने जनजातीय लोगों के विकास के साथ-साथ उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक स्वायत्तता की सुरक्षा के लिए एक के बाद एक कदम उठाए।
संविधान के स्तर पर जनजातीय क्षेत्रों तथा आदिवासियों के लिए कई प्रावधान किए गए। अनुच्छेद 46 के तहत नीति-निदेशक तत्व में यह कहा गया कि राज्यों को जनजातीय लोगों के शैक्षणिक तथा आर्थिक विकास को बढ़ाने के लिए तथा शोषण एवं सामाजिक अन्याय से उनकी सुरक्षा के लिए विशेष कानून बनाना चाहिए । जनजातीय क्षेत्र वाले राज्यों के राज्यपालों से यह खास विनती की गई थी कि आदिवासी हितों की रक्षा की जाए तथा राज्य के कानूनों को जनजातीय क्षेत्रों में थोड़ा फेरबदल के साथ लागू किए जाएं। इसके अलावा आदिवासियों की भूमि को सुरक्षित रखने तथा सूदखोर से उनको बचाने के लिए एक कानून भी पास किया गया था । संविधान द्वारा जनजातीय लोगों को पूर्ण राजनीतिक अधिकार प्रदान किया गया। इसी उद्देश्य से मौलिक अधिकारों को लागू करने संबंधी प्रावधानों में संशोधन किया । संविधान में जनजातीय कल्याण के लिए प्रत्येक राज्य में जनजातीय सलाहकार परिषद् की स्थापना का प्रावधान भी इसमें निहित है। राष्ट्रपति ने भी अपनी तरफ से अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए एक आयुक्त की नियुक्ति की ताकि हमेशा इस बात को ध्यान दिया जाए कि इन लोगों के लिए सुरक्षा के जो प्रावधान बने हैं, उनका पालन हो रहा है या नहीं।
राज्य सरकारों द्वारा कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाए गए तथा जनजातीय लोगों को सुरक्षित रखने के कई कदम उठाए गए। केन्द्र एवं राज्य सरकार दोनों तरफ से उनके लिए विशेष सुविधा प्रदान की गई ताकि जनजातीय क्षेत्रों के विकास खासकर वहाँ ग्रामीण एवं कुटीर उद्योग के तहत रोजगार के अवसर प्रदान किए जा सके। इसके लिए योजनाओं से भारी-भरकम राशियां रखी गई और भारी खर्च भी हुआ। 1971 के बाद विशेष रूप से जनजातीय क्षेत्रों में कल्याण योजनाओं पर खर्च काफी बढ़ा है।
परंतु संविधान की व्यवस्था तथा केन्द्र एवं राज्य सरकारों की कोशिश के बाद भी जनजातीय लोगों की समस्याएँ रह ही गईं तथा उनकी विकास की रफ्तार धीमी ही रही ।
अभी भी एक अध्ययन के अनुसार मध्य प्रदेश से लेकर झारखंड तक आदिवासियों की स्थिति असंतोषजनक तथा पीड़ादायक है। पूर्वोत्तर भारत में जनजातीय लोगों की स्थिति थोड़ी सुधरी है । संविधान में प्रावधान के बावजूद उसे लागू करने में व्यावहारिक तौर पर प्रशासनिक दिक्कतें आई हैं। इसके लिए कई बार केन्द्र और राज्य सरकार की जनजातीय नीतियों में भी काफी अंतर देखा जा सकता है क्योंकि राज्य सरकारें कई मामलों में जनजातीय हितों के प्रति बहुत उदासीन पाई गई हैं। जनजातीय तरीकों को हस्तक्षेप किए बिना शिक्षा के स्तर तथा रहन-सहन में सुधार करने की कोशिश लगातार जारी रही है परंतु यह भी कहना सही होगा कि उनके सामाजिक ढांचों का बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। सरकार ने शुरू से ही यह प्रयास किया कि उनके विकास तथा शिक्षा के लिए आरक्षण तथा राजनीतिक तथा आर्थिक अवसर प्रदान किए जाए।
बृहत् स्तर पर देखा जाए तो स्वतंत्रता के बाद जनजातीय क्षेत्रों में कई खतों के कई विकास कार्य भी किये गये परंतु फिर भी खतरे के संकेत मौजूद है। जनजातीय अधिकारों तथा हितों की रक्षा के लिए सरकार ने आरक्षण से लेकर पंचायती राज तथा चेतना जागृत करने के लिए कई संसाधनों को भी बल प्रदान किया। संसद में इनके स्थान सुरक्षित है तथा विभिन्न स्तर पर इनकी स्थिति पहले से सुधरी है।
जहां तक पूर्वोत्तर भारत की बात है, जनजातीय लोगों के पक्ष में वहाँ की स्थिति थोड़ी अलग है। करीब 100 जनजातीय समूहों में बंटे और कई प्रकार की भाषा बोलने वाले आसाम के पहाड़ी इलाकों में बसे जनजातीय लोगों की विशिष्टताएं और समस्याएं बाकी देशों के जनजातीय लोगों से बहुत भिन्न भी नहीं है। परंतु इन इलाकों में ये लोग बहु. संख्यक हैं। गैर-जनजातीय लोग किसी महत्वपूर्ण स्तर तक इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पाए थे। लंबे समय से जनजातीय और गैर- जनजातीय लोगों के बीच आर्थिक संबंध विकसित होते रहे।
वैसे देखा जाए तो 19वीं सदी के आधा समय बीतने के बाद लगभग 1857 के बाद अंग्रेजों ने जनजातीय क्षेत्रों पर अपना अधिकार कायम किया तथा खास तौर से गैर-जनजातीय मैदानी लोगों को यहाँ जमीन खरीदने की इजाजत नहीं थी। प्रशासन के स्तर पर भी इस बात के लिए काफी सावधानी बरती गई थी।
एक बात जो महत्वपूर्ण थी कि अंग्रेजी सरकार ने इसाई मिशनरियों को जनजातीय क्षेत्रों में पहुँचने के लिए काफी प्रोत्साहित किया। स्कूल, चर्च, अस्पताल इत्यादि जो अंग्रेज के द्वारा खोले गए थे, वह बहुत तेजी से धर्म परिवर्तन करवाने लगीं। इस प्रकार, जनजातीय युवकों के एक समूह में एक प्रकार का नया दृष्टिकोण विकसित हुआ। इसके बदले में इसाई मिशनरियों ने अंग्रेजी सरकार को अपनी मदद पहुँचाता रहा। जनजातीय क्षेत्रों में इन मिशनरियों ने राष्ट्रवादी प्रभावों को दूर रखने का काम किया। इन्होंने जनजातीय लोगों को आसाम और शेष भारत की आबादी से दूरी बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन दिया। स्वतंत्रता मिलने के ठीक बाद कुछ मिशनरियों और विदेशियों ने पूर्वी भारत में अलगाववाद भड़काने का प्रयास भी किया।
एक बात और जो बहुत महत्वपूर्ण कही जा सकती है कि पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय लोगों के शेष भारत से जीवन-संपर्क उस समय नहीं था। भारत का एक राष्ट्र के रूप में गठन के पीछे औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बनाया गया बंधन था जो साम्राज्यवाद के विरोध में बना था। 1952 में नेहरू ने यह कहा कि "संपूर्ण पूर्वोत्तर सीमा क्षेत्र हमारे विशेष के ध्यान की मांग करता है, जिस पर सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि पूरी भारतीय जनता के ध्यान की आवश्यकता है। उनके साथ हमारे संबंधों से उन्हें भी लाभ होगा और हमें भी। यह भारत की शक्ति, विभिन्नता और सांस्कृतिक समृद्धि को बढ़ाएगा।
इस नीति की एक झलक हमें संविधान की छठी अनुसूची में देखने को मिलती है ये सिर्फ आसाम के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू होता था। स्वायत्त जिलों तथा जिला एवं क्षेत्रीय परिषदों के गठन के माध्यम से संविधान की छठी-अनुसूची ने जनजातीय लोगों को समुचित सीमा तक स्वप्रशासन उपलब्ध कराया था। इन परिषदों को असम विधायिका और संसद के अधीन कुछ वैधानिक और न्यायिक क्रियाकलापों की छूट भी दी गई। छठी अनुसूची का उद्देश्य जनजातीय लोगों को अपनी इच्छा से जीवन बिताने के योग्य बनाया गया। इसके अलावा यह भी प्रयास किया गया कि जनजातीय क्षेत्रों की स्थिति में भी काफी सुधार करने के प्रयास किए जाएं।
स्वतंत्रता के बाद नेहरू की नीतियों को सबसे उम्दा तरीके से 'नेफा' में लागू किया गया। नेफा को आसाम से सीमावर्ती हिस्से से अलग कर 1948 में बनाया गया था। नेफा की स्थापना आसाम के कार्यक्षेत्र से बाहर केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में हुई और इसे इस विरोध प्रशासन के तहत रखा गया।
आरम्भ से ही प्रशासन की जिम्मेदारी एक खास कैडर के अधिकारियों को यहां के लिए दी गई ताकि उनके विकास के रास्ते में उनकी संस्कृति व परंपरा को चोट न पहुँचे । नेफा को नये रूप में 1981 में एक राज्य बना दिया गया तथा अरुणाचल प्रदेश नाम दिया गया। जहां एक तरफ नेफा बहुत जल्द देश की मुख्यधारा में जुड़ गया वहीं दूसरे जनजातीय क्षेत्र जो प्रशासन से संबंधित थे वहाँ समस्याएं खड़ी हो गई। क्योंकि वहां आसामी और बंगाली जनता को पहाड़ी जनजाति से कोई सांस्कृतिक लगाव नहीं था। इन जनजातियों को असुरक्षा की भावना होने लगी तथा सरकार से भावनात्मक रूप से वह दूर भी होने लगी । खासतौर पर गैर - आदिवासी जो थे जिनमें प्रशासनिक स्तर के अफसर, व्यापारी, डॉक्टर इत्यादि अपने आप को आदिवासी से अधिक श्रेष्ठ समझते थे तथा इनका यही व्यवहार जनजाति समुदाय को एकदम नागवार गुजरता था। इसका परिणाम यह हुआ कि असम में एक असंतोष उभरा तथा 1950 के दशक मध्य में लगभग 1955-56 में एक अलग पहाड़ी राज्य की मांग होने लगी। केन्द्र सरकार असम के अलग होने की स्थिति में नहीं थी । स्वायत्तता के स्तर पर क्षेत्रीय भावना के पक्ष में जरूर थी।
1960 के समय आसाम के राजनीतिक शीर्ष नेतृत्व ने असमिया भाषा को राज्य की एकमात्र राजभाषा बनाने का कदम उठाया। 1960 में पहाड़ी क्षेत्रों की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने एकजुट होकर 'ऑल पार्टी हिल लीडर कांफ्रेंस' बनाया और भारतीय संघ के अन्दर अलग राज्य की मांग बताई। इसके बाद असम राजभाषा विधेयक को स्वीकृत कर दिया गया तथा असम को एकमात्र राज्य की राजभाषा बना दिया गया। 1962 के चुनाव में जनजातीय क्षेत्रों की असम विधानसभा
सीटों पर उन लोगों की भारी मतों से विजय हुई जिन्होंने अलग राज्य की वकालत की थी। कई आयोगों तथा समितियों ने इस मुद्दे की भरपूर जांच-पड़ताल की। अंतत: 1969 में एक संविधान संशोधन के माध्यम से “राज्य के अन्दर राज्य" के रूप में असम के अंदर मेघालय राज्य बनाया गया जिसे कानून और व्यवस्था को छोड़कर सभी स्वायत्तता प्रदान कर दी गई। इसके अलावा लोक सेवा आयोग, उच्च न्यायालय तथा राज्यपाल के पद के मामले में असम और मेघालय साथ रहे। 1972 में प्रांत पुनर्गठन के माध्यम से मेघालय को एक 'पूर्ण राज्य' बना दिया गया जिसके अन्दर मुख्य रूप से खासी, जयंतियां जनजातियाँ शामिल की गई। इसके अलावा मणिपुर, त्रिपुरा तथा अरुणाचल प्रदेश के संबंधित पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करने का विषय भी हल हो गया। परंतु नागालैंड और मिजोरम के विषय में यह समस्या जस की तस बनी रही।
नागा समुदाय आसाम-बर्मा में लगी पूर्वोत्तर सीमा स्थित नागा पहाड़ियों के निवासी थे। 1961 में उनकी आबादी लगभग 5 लाख थी जो भारतीय आबादी के उस काल में 0.01% थे। इनके अंदर कई अलग-अलग सामुदायिक कबीले थे जो अपनी अलग भाषाएं बोलते थे। ब्रिटिश सरकार एक साजिश के तहत नागाओं को भारत की मुख्यधारा से अलग करके रखे हुए थी। सिर्फ ईसाई मिशनरियों को गतिविधियां चलाने की इजाजत दी गई थी, जिसके परिणामस्वरूप एक छोटा शिक्षित तबका विकसित हो चुका है।
स्वतंत्रता के बाद सरकार ने नागाओं को असम तथा शेष भारत से जोड़ने की नीति पर कार्य आरंभ किए। परंतु नागा नेतृत्व के एक तबके के रूप में शिक्षित लोगों ने इस एकीकरण का विरोध किया। अंग्रेजों के द्वारा इसाई बनाए गए 'ए. जेड. फिजो' इस मामले में एक नेता बनकर उभरे। इन्होंने नागालैंड को भारत से अलग करने की ही मांग कर डाली। सही तौर पर इनको ऊर्जा तत्काल इसाई मिशनरियों तथा अंग्रेज अधिकारियों से मिल रही थी। 1955 में इन अलगाववादी नागाओं ने स्वतंत्र सरकार के गठन की घोषणा कर दी और हिंसक विद्रोह आरम्भ कर दिया।
भारत सरकार ने इस उपरोक्त मामले में दो रास्ते अपनाने की नीति बनाई । एक, जिसमें जनजाति समूह के कल्याण के कार्य को त्वरित गति प्रदान करने की थी और दूसरा कि भारत की एकता और अखण्डता से कोई सौदा नहीं किया जा सकता है। सरकार ने यह साफ कर दिया कि नागा अगर हिंसा का रास्ता अपनाते हैं तो इनका दमन किया जाएगा तथा कोई संधि नहीं अपनाई जाएगी। 1956 में भारत सरकार ने वहां शांति तथा व्यवस्था को नियमित करने के उद्देश्य से सेना भेज दी।
नेहरू की यह नीति तात्कालिक थी लेकिन उनकी सोच दीर्घकालिक स्तर पर दूसरी थी। इनका लक्ष्य नागा नेताओं से दोस्ती बढ़ाकर कहीं-न-कहीं इस समस्या के पूर्ण समाधान का था। इस मामले में अधिक स्वायत्तता देने के पक्ष में थे। इसलिए बेनागाओं का विश्वास जीतने के लिए स्वायत्तता देने की बात थी। इसका यह परिणाम निकला कि उन्होंने ‘फिजो' को यह संदेश दिया कि हम उस समय तक बात नहीं करेंगे जब तक कि नागा नेतृत्व शस्त्र न रोक दे। इसके अलावा भारत सरकार ने नरमपंथी नागाओं से संधि वार्ता जारी रखी जो स्वायत्तता से अधिक कुछ नहीं चाहते थे। इन नेताओं को नेहरू पर अधिक विश्वास था । इनका विश्वास स्वायत्तता से अधिक कुछ नहीं था।
1957 के जून में नागा ने सशस्त्र विरोध की स्थिति शुरू की गई। सशस्त्र विद्रोह को खत्म कर दिया गया। इस विद्रोह के खत्म होने के बाद नरमपंथी नेतागण की स्थिति मजबूत हो गई तथा 'डॉ. इमकोनग्लिबा ओ' के नेतृत्व में शीर्ष नेता सामने आए। इन्होंने भारतीय संघ के अंदर राज्य नागालैंड की मांग को जायज मानते हुए समझौता किया। भारत सरकार ने इनकी मांग को स्वीकार किया तथा 1963 में नागालैंड की राज्य के रूप में स्वीकार किया गया।
नागालैंड जैसी तो नहीं पर कुछ एक समस्या पूर्वोत्तर के मिजो स्वायत्त जिले में विद्रोह देखे गए। यहां तो 1947 में ही अंग्रेज अधिकारियों के सिखाने पर कुछ मांग शुरू हो गई थी। परंतु इस मिजो नेतृत्व को कोई समर्थन नहीं मिल पाया था। यह युवा नेतृत्व उस समय मिजो समाज के जनवादी कारण, आर्थिक विकास और असम विधान सभा में समुचित मिजो प्रतिनिधित्व जैसे विषयों को सामने ला रहा था। परंतु 1959 में अकाल के आने से परिस्थितियां असंतोष में बदल गयीं तथा 1961 में आसाम राजभाषा विधेयक का अनुमोदन किए जाने के कारण वहां लालडेंगा की अध्यक्षता में मिजो नेशनल फ्रंट का गठन हुआ।
मिजो नेशनल फ्रंट ने अपनी उल विकसित की तथा इसे प्रशिक्षण पूर्वी पाकिस्तान में मिलने लगा। मार्च 1966 को मिजो नेशनल फ्रंट ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इन्होंने भारतीय सैनिक ठिकानों पर हमले आरम्भ कर दिए। भारत सरकार ने त्वरित गति से इस विद्रोह को कुचल दिया। मिजो फ्रंट का शीर्ष नेतृत्व पूर्वी पाकिस्तान भाग गया।
1973 में मिजो नेताओं की मांग बदल गयी । इनकी मांगों में स्वतंत्रता की मांग को हटा लिया गया। भारत संघ के अंदर अलग मिजोरम राज्य की मांग स्वीकार करने की बात की गई तथा मिजो जिलों को असम से अलग कर मिजोरम को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। 1970 के दशक के बाद छिटपुट विद्रोह चलते रहे तथा 1986 में एक समझौता हुआ। लालडेंगा और मिजो नेशनल फ्रंट अपनी विद्रोहगत गतिविधियों को छोड़ने के लिए तैयार हो गए। भारत सरकार मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा देने को तैयार हो गई तथा उसे अपनी संस्कृति को बनाकर रखने की छूट प्रदान कर दी गई। संधि में यह शामिल था कि मुख्यमंत्री लालडेंगा होंगे तथा अंततः फरवरी 1987 में मिजोरम नामक एक राज्य का गठन सर्वसम्मति से संपन्न हो गया।
पूर्वोत्तर के बाद जो स्थिति दिखी उनमें छोटा नागपुर तथा संथाल परगना के बारे में चर्चा करना आवश्यक हो गया है। इस क्षेत्र में विभिन्न आदिवासी समुदाय जैसे संथाल, उरांव, मुंडा रहे हैं। इन जनजातियों की स्थिति विकराल थी। इनकी आरम्भ से ही मांग झारखंड बनाने की रही है। 1951 में झारखंड क्षेत्र का लगभग दो तिहाई भाग की आबादी में इनकी जनसंख्या थी । शिक्षा के प्रसार के कारण झारखंड नाम से अलग जनजातीय राज्य बनाने के लिए आंदोलन 1930 और 1940 के दशक में खड़ा होने लगा था। इसके अंतर्गत दक्षिण बिहार के छोटा नागपुर और संथाल परगना तथा उनके साथ मिलने वाले उड़ीसा पश्चिम संथाल के कुछ क्षेत्रों को भी शामिल किया गया था।
इनकी मांग थी कि झारखण्ड राज्य की स्थापना हो तथा गैर-जनजातीय लोगों का प्रभुत्व यहां समाप्त हो । 1950 में इस मांग के कारण जयपाल सिंह के नेतृत्व में झारखण्ड पार्टी की स्थापना की गई। 1952 के चुनावों में पार्टी को भारी सफलता मिली और छोटा नागपुर की 32 सीटों पर इसने जीत हासिल की। उस चुनाव में वह बिहार विधान सभा का प्रमुख विपक्षी दल बन गया। 1957 के चुनाव में इन्हें 25 सीटें प्राप्त थी। परंतु झारखंड पार्टी को गैर-जनजातीय लोगों का भी मत मिलता था। इसके लिए इस पार्टी ने गैर-जनजातीय लोगों को भी अपनी पार्टी में आने का प्रवेश दे दिया। फिर भी ये पार्टी जनजाति की शक्ति तथा अधिकार के लिए लड़ती रही। 1955 के राज्य पुनर्गठन आयोग ने इस राज्य की मांग अस्वीकार कर दी क्योंकि इस राज्य की कोई संयुक्त भाषा नहीं थी। भारत सरकार भी इसका समर्थन नहीं कर सकी क्योंकि जनजातीय लोग यहां बहुसंख्यक आबादी के तौर पर नहीं थे।
1960 के दशक में झारखंड पार्टी का पतन हो गया तथा 1963 में जयपाल सिंह कांग्रेस में शामिल हो गये। इसी क्रम में 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना हुई तथा उसमें नई बातों को प्रमुखता दी गई। उसने इस बात को स्वीकार किया कि यहां आदिवासी से अधिक गैर-आदिवासी हैं। इसलिए उन्होंने बिहार के उत्तरी सीमा से तुलना आरम्भ कर दी तथा कहा कि बिहार के लोग झारखंड पर अपना प्रभुत्व कायम करके रखते रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा की मांग को एक विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखा गया तथा इसे आदिवासी - गैर-आदिवासी के मुद्दे से अलग बिहार-झारखंड के मुद्दे के तौर पर देखा जाने लगा। शिबु सोरेन नाम के नेता इस पार्टी के तौर पर काफी लोकप्रिय हो गए। काफी उठा-पटक तथा विरोध-अवरोध के बाद 15 नवम्बर 2000 को अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने झारखंड राज्य को स्थापित कर दिया तथा एक नये राज्य की स्थापना हुई।
3. क्षेत्रीय विकास बनाम क्षेत्रवाद
स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार के सामने भारत को एक राष्ट्र के रूप में गठित करने के लिए 'क्षेत्रीयता तथा क्षेत्रवाद' की भावना की भी चर्चा करने की परिस्थिति उभरी। क्योंकि भारत जैसे विविधता से भरे देश में क्षेत्रीय विकास की अवधारणा को विस्तृत करना सही नहीं था । स्वतंत्रता आंदोलन में क्षेत्रीय विकास की बात तो कही गई परंतु यह भी कहा गया कि क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान के विरोध में प्रयोग नहीं किया जा सकता। इस परिप्रेक्ष्य में यह स्वीकार कर लिया गया था कि सामाजिक न्याय, गरीबी, शिक्षा की स्थिति में सुधार की मांग को क्षेत्रवाद के रूप में नहीं देखा जाएगा। यहाँ तक कि इस प्रकार के सकारात्मक लक्षणों की प्राप्ति पर आधारित थोड़ी अंर्तक्षेत्रीय प्रतियोगिता काफी अच्छी चीज हो सकती है। दरअसल हम लोगों में यह जितनी होनी चाहिए वह काफी कम है। बल्कि मातृभूमि से प्रेम लोगों को जाति या धार्मिक समुदायों के प्रति खतरनाक वफादारी से अलग हटाकर एक सकारात्मक भूमिका निभाने में सहायक हो सकती है।
इसके साथ यह भी कहा गया कि संविधान की संघीय ढांचे की परंपरा को क्षेत्रवाद के रूप में व्यक्त नहीं करना चाहिए। इसके अलावा यह विदित किया गया कि कहीं भी विकेंद्रीकरण की मांग या विकास की मांग इस स्तर पर अगर हो तो यह जरूर कहा जा सकता है कि यह मांग व्यावहारिक है न कि इससे क्षेत्रवाद उभरता है। क्षेत्रीयतावाद का मामला तब हमारे सामने आता है जब एक राज्य अथवा क्षेत्र के हितों को पूरे देश या दूसरे क्षेत्रों या राज्यों के विरोध में पेश करने की कोशिश की जाती है तथा इस आधार पर एक क्षेत्र की जनता को भड़काया जाता है।
उपरोक्त तथ्यों के बाद यह सही तौर पर साफ हो गया कि 1947 की स्वतंत्रता के बाद कम से कम क्षेत्रवाद की भावना नहीं उभरी परंतु हरेक विषय में एक अपवाद अवश्य होता है । इस अपवाद के तौर पर 'द्रविड़ मुनेत्र कडगम' द्व ारा 1950 और 1960 के दशकों में तमिलनाडु में चलाई गई राजनीति को माना जा सकता है। फिर भी इसकी राजनीति पूर्ण रूप से अलगाव पर कभी आधारित नहीं रही।
क्षेत्रीयतावाद भारत में विस्तारित उसी समय हो सकता था जब किसी विशेष क्षेत्र के लोगों को लगे कि उसके ऊपर कोई सांस्कृतिक या भेदभाव आरोपित करने की कोई कोशिश कर रहा है ।
अगर आजादी के बाद क्षेत्रवाद को विषम तरीके से देखा जाए तो अधिक से अधिक दो राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे से अधिक यह भावना और अधिक विषम नहीं हुई है। नदी जल बंटवारे को लेकर कई राज्यों के बीच तीखा विवाद बार-बार देखा जा चुका है। उदाहरण के लिए - (1) तमिलनाडु / कर्नाटक (2) कर्नाटक / आंध्र (3) पंजाब/हरियाण TI/ राजस्थान इत्यादि। इसके अलावा छिटपुट जगह भाषाओं को लेकर छोटे स्तर पर इस विवाद ने जन्म लिया फिर खत्म हो गया।
अगर क्षेत्रीय विकास की बात की जाए तो स्वतंत्रता के बाद गंभीर समस्याओं तथा आर्थिक क्षेत्रों के बीच जो एक समन्वय होना चाहिए था वह नहीं हो पाया। इस कारण यह मानना पड़ा कि कुछ राज्य पिछड़े है लेकिन इस पिछड़ेपन ने कभी भी क्षेत्रवाद की भावना का विकास नहीं किया।
अभी भी पूर्वी राज्य और पश्चिमी राज्य में काफी अन्तर है। सही तौर पर देखा जाए तो बंदरगाह तथा समुद्री सीमा से जुड़े हुए राज्य अधिक विकास कर सके परंतु इसका मलाल पिछड़े राज्य को नहीं रहा। एक विशेष दर्जे से मांग के ऊपर कोई भी विषय नहीं उभरा।
स्वतंत्रता के बाद से ही आर्थिक विषमताओं की गंभीरता को सरकार ने पहचाना तथा एक योजना बनाकर यह कोशिश की गई कि सभी राज्यों का समान रूप में विकास हो सके तथा सभी भागों में आर्थिक संतुलन स्थापित हो सके। 1956 के औद्योगिक नीति प्रस्ताव में भारत सरकार ने जोर देकर कहा कि "प्रत्येक क्षेत्र में संतुलित और समन्वित औद्योगिक और कृषक अर्थव्यवस्था को सभी तौर पर विकसित करके ही पूरा देश जीवन स्तर प्राप्त कर सकता है।
1961 में यह अस्वीकार किया गया कि देश के पिछले क्षेत्रों के तीव्र विकास को राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय योजनाओं में ध्यान देना चाहिए जिसमें दिए गए समय में सभी राज्य न्यूनतम विकास स्तर को प्राप्त कर सके।
आरम्भ में सरकार ने एक ऐसी नीति बनायी जिसमें यह प्रयास किया गया कि गरीबी उन्मूलन हो तथा पिछड़े क्षेत्रों का विकास किया जा सके। इसके लिए संविधान में वित्त आयोग की भी व्यवस्था की गई जिसमें केन्द्रीय करो तथा वित्तीय संसाधन का बंटवारा राज्यों के बीच किया जा सके।
केंद्र और राज्यों के बीच भी आर्थिक स्थिति संतुलित करने का प्रयास किया गया उसमें 'नियोजन' की संकल्पना को महत्ता प्रदान की गई। नियोजन के द्वारा यह प्रयास किया गया कि राष्ट्रीय स्तर पर विकास हो जिसमें कृषि, उद्योग, शिक्षा, मानव संसाधन सभी सम्मिलित हो। इसलिए यहाँ 15 मार्च 1950 को योजना आयोग की स्थापना कर 1951 में प्रथम योजना में कृषि को तथा द्वितीय योजना 1956 में उद्योग को प्रमुखता दी गई ।
योजना आयोग अपनी नीतियों से राज्यों के बीच संसाधन के बंटवारे में लगी रही तथा 2014 तक (नीति आयोग के बनने तक (2015) यह विभिन्न राज्यों के बीच संसाधनों का बंटवारा करती रही)
इसके अलावा क्षेत्रीय विषमताओं को दूर करने के लिए सार्वजनिक निवेश को भी बढ़ावा देने का प्रयास आजादी के बाद होने लगा तथा झारखण्ड तथा छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों को इसका लाभ मिल सका। 1969 में आते ही यह महसूस किया गया कि वित्तीय क्षेत्र में क्षेत्रीय विकास को बढ़ाने के लिए बैंकों के राष्ट्रीयकरण की नीति बनायी गयी। इसके अलावा सरकार के द्वारा हरेक दशक में अनेक योजनाओं का निर्माण किया गया।
क्षेत्रीयतावाद का एक विशेष भाव कुछ विशेष विषयों से ही आजादी के बाद से अवगत होता रहा है। जिसमें 'स्थ. नीय/बाहरी', अल्पसंख्यक भाषाई / बहुसंख्यक भाषाई, मूल जनता / पलायित जनता इत्यादि।
हमेशा से देखा गया कि रोजगार तथा शिक्षा के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य लोग जाते रहे हैं। धीरे-धीरे वहाँ उनकी आबादी बढ़ने लगी तथा मूल लोगों से संघर्ष भाव का जन्म होने लगा। उदाहरण के लिए 1961 के दौरान बंबई में मराठी भाषी मात्र 42.8% थे । बंगलौर में कन्नड़ बोलने वाले 25% से कम हो गए थे। कलकत्ता में भी बंगाली बोलने वालों की स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी ।
1950 के दशक में जनसंख्या में बड़ा बदलाव आया तथा शिक्षा का प्रसार आरम्भ हुआ। लोगों को नौकरियां मिलने लगी तथा लोग एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने-आने लगे। इससे बाहरी - भीतरी लोगों की संकल्पना बनी तथा ‘प्रवासी' शब्द चर्चा में आ गया। प्रवासी के मामले में खुलकर संविधान तो कुछ नहीं कहता है, परंतु यह जरूर कहता है कि ‘धर्म', जाति, नस्ल, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भेद भाव पर प्रतिबंध होना चाहिए।" (अनुच्छेद 15)
अनुच्छेद 16 में यह कहा गया कि किसी भी राज्य के अधीन नौकरियों या किसी पद के आधार पर नियुक्ति के लिए वंश, जन्म अथवा निवास स्थान के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाएगा। 1960 के दशक में महाराष्ट्र में बाला साहब ठाकरे के नेतृत्व में यह देखा गया कि मराठी बनाम अन्य के नाम पर राजनीति शुरू हुई “महाराष्ट्र मराठियों के लिए" एक नारा दिया गया तथा यह कहा गया कि तमिलों को मराठी क्षेत्र से जाना चाहिए ।
1970 के समय यह आंदोलन हिंसक भी हो गया तथा आगे चलकर शिवसेना का यह बर्ताव 'हिन्दू-सम्प्रदायवाद' से जोड़कर देखा जाने लगा।
उपरोक्त तथ्यों के साथ न्याय करना न करना उस समय सही कहलाएंगे जब यह कहेंगे कि इन बातों तथा घटनाओं के बाद भी भारत की अखंडता अक्षुण्ण रही। विभिन्न विवादों के बाद भी भारत एक संघ के रूप में अपना काम करता रहा ।
क्षेत्रीय विषमता तथा असंतोष के राजनैतिक पक्ष तो उभरे लेकिन इस असंतोष ने अपनी मांग को राजनैतिक तथा समन्वयकारी ही बनाकर रखा। हम यह गर्व से कह सकते हैं कि आजादी के 75 साल होने तक हम एक महान लोकतंत्र में केंद्र-राज्य को साथ कार्य करते हुए देख सकते हैं।
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Sun, 01 Oct 2023 06:43:51 +0530 Jaankari Rakho
स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में गठन : आधार https://m.jaankarirakho.com/388 https://m.jaankarirakho.com/388 स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में गठन : आधार
1. परिचय
एक औपनिवेशिक भारत के रूप में हमारे देश को अंग्रेजों ने विश्व में इसकी एक अलग पहचान देने की भरसक कोशिश की। फिर भी भारत एक राष्ट्र के रूप में स्वतंत्रता के बाद अपनी उन हजारों सालों की सभ्यता और संस्कृति को नहीं भूल पाया था तथा अपनी विविधता तथा राष्ट्रवाद की प्रवृत्ति के साथ उभरा तथा स्वतंत्रता संघर्ष की ताजी तथा जहरी अनुभूतियों के साथ अपने महान गठन की ओर बढ़ चला।
बहुत बड़े स्तर पर अपनी संस्कृतियों की विविधता के साथ तथा सभी विरासत के साथ भारत ने अनेक उपलब्धियां हासिल की थी। इन्हीं विरासत के द्वारा भारत को अनेकता में एकता को गढ़ने का बल मिला तथा सहिष्णुता तथा मतभेद को मनभेद में न बदलने का साहस भी मिला। कुछ इतिहासकारों के द्वारा यह बात लिखी गई है कि राजनीतिक और प्रशासनिक एकता के तत्व तो मुगलों के अधीन विकसित हुए थे परंतु अगर प्राचीन भारत की बात करने पर यह एकता मौर्यकाल में भी देखने को मिली है।
एक उपनिवेश के तौर पर भारत की पहचान के पहले यानी मध्यकाल में भी भारत में यातायात तथा संचार के व्यापक साधनों के अभाव के बावजूद भारत में व्यापार, उत्पादन तथा अधिशेष कृषि की अवधारणा महान तौर पर विकसित होने की भी काफी स्तर पर कही जाती है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के महान तत्व को हम इस तरह रेखांकित करते हैं कि हमारी इस व्यवस्था में ग्रामीण स्तर पर सभी संस्कृति की विरासत तथा 'आपसी निर्भरता' की जटिलता बहुत बड़े स्तर पर विकसित थी। इस व्यवस्था ने एक सभ्य समाज तथा राष्ट्रीय एकता की जड़ को काफी मजबूत किया हुआ था। ब्रिटिशकाल में इसे बर्बाद करने की पुरजोर कांशिश करने के बावजूद इसकी भावना खत्म नहीं हुई थी।
ब्रिटिश उपनिवेशवाद की नकारात्मकता ने भारतीय समाज में एक महान जागरूकता पैदा की तथा बृहत् स्तर पर अन्य काफी आंदोलनों का जन्म हुआ तथा इन्हीं आंदोलनों के फलस्वरूप हमारी एक समान राजनीतिक पहचान तथा सांस्कृतिक निष्ठा का विकास हुआ तथा एक 'भारत राष्ट्र' की अवधारणा की बात आरंभ हुई।
राष्ट्रीय आंदोलन की प्रवृत्ति ने भारतीय समाज को एक राजनीतिक पहचान के साथ सामाजिक जागरूकता का भी बोध कराया। इतिहासकार विपिनचन्द्र लिखते हैं कि “भारत अपने राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान राष्ट्र बनने की ऐतिहासिक प्रक्रिया से रू-ब-रू हुआ तथा एक लंबी छलांग लगाई। इसके अलावा, इस आंदोलन की गहराई, दीर्घ कालीनता और सामाजिक पैठ, एकता की इस भावना और राष्ट्रीयता को आम जनता के बीच ले गया। "
तत्कालीन आंदोलन के प्रणेताओं को अच्छी तरह पता था कि भारत अभी भी एक सुगठित राष्ट्र नहीं है तथा मात्र इसे बनने की प्रक्रिया पूरी हो रही है। तत्कालीन नेताओं को स्वतंत्रता पाने की मंजिल ही सामने नहीं थी वरण् उन्हें यह भी पता था कि स्वतंत्रता के बाद एकता, अखंडता तथा राष्ट्रीय समिता के लिए पुरजोर कोशिश करनी होगी। इस परिप्रेक्ष्य में जवाहर लाल नेहरू ने 1952 में यह कहा कि "सबसे महत्वपूर्ण पहलू, सर्वोच्च पहलू, भारत की एकता है।" इसके बाद लगातार नेहरू ने हरेक उपलक्ष्य में यह कहा कि "राष्ट्रीय एकता का पोषण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता " इसके पीछे एक बहुत बड़ा उद्देश्य था और वह उद्देश्य एक महान राष्ट्र का गठन था जो प्रासंगिक भी हो तथा विश्व स्तर पर स्वीकार्य भी है।
तत्कालीन स्थिति में भारत जैसे घोर जटिलता तथा विविधता वाले देश को एक समान आर्थिक योजना तथा सांस्कृतिक विभिन्नताओं में समान लक्ष्य रखना एक जटिल लक्ष्य था। इसके बावजूद स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन सरकार ने विभिन्न भाषाओं धर्म तथा संस्कृति को एक सूत्र में गठने की कोशिश हुई इसी परिप्रेक्षय में सरकार ने 14 प्रमुख भाषाओं को पहचाना तथा 1961 की जनगणना में 1549 भाषाओं को मातृभाषा के रूप में दर्ज किया गया था।
उपर्युक्त विविधताओं के बाद भी ये अनेकता राष्ट्रीय एकता के रास्ते में बाधा नहीं बनी तथा राष्ट्र के निर्माण में एक महान नींव की शुरूआत यहीं से हुई। तत्कालीन नेताओं ने यह जरूर कोशिश की कि विविधता से राष्ट्र को लाभ होना चाहिए न कि एक बाधा बन जाए। विविधता को ही सबसे बड़ा हथियार मानकर सरकार ने भारत को एक राष्ट्र के गठन के रूप में विकसित करने की बात कही। तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व ने अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म और विभिन्नताओं को अपनी शक्ति बनाकर सकारात्मक रूप से इसका उपयोग कर गणतंत्र भारत को एक महान देश के रूप में गठन करने की सोच बनायी।
हम यह नहीं कह सकते कि सिर्फ सोच बना देने से विविधाएं शक्ति की स्रोत बन गयी और यह तत्कालीन नेताओं को पूरी तरह ज्ञात था कि यह विविधताएं कमजोरी का स्रोत भी बन सकती थीं। ये विविधताओं को नकारात्मक रूप से प्रयोग कर कुछ तत्व साम्प्रदायिकता, जातिवाद, भाषावाद और क्षेत्रीयतावाद को भी बड़े स्तर पर फैलाने की मंशा रखते थे। इसके अलावा एक बड़े परिवर्तन की ओर देश बढ़ रहा था और इसके परिणाम स्वरूप रोजगार, शिक्षा, सत्ता तथा सहभागिता के भी मुद्दे साझे थे।
1947 के बाद भारतीय तंत्र को एक राष्ट्र के रूप में सुदृढ़ीकरण एक व्यापक रणनीति के तहत किया गया जिसमें क्षेत्रीय एकीकरण, राजनीतिक और संस्थागत संसाधनों का संचालन, एकीकरण, अनुकूल सामाजिक ढांचे का विकास, सामाजिक न्याय को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां वीभव्य समानताओं का उन्मूलन और समान अवसर उपलब्ध करना शामिल था।
स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक शीर्ष नेतृत्व ने एक न बिखरने वाली राजनीतिक तथा संवैधानिक संस्था के ढाँचों के निर्माण में अपनी ताकत को झोकने का प्रयास किया। यह लक्ष्य रखा गया कि विकास और अखण्डता के लिए एक साथ प्रयास किए जाए। नेहरू ने बार-बार अपने संबोधन में यह बताने की कोशिश की कि जनतांत्रिक रवैये को आदर देते हुए विकास की तरफ बढ़ना होगा। उन्होंने कहा कि भारत में अगर राष्ट्रीय एकता रखनी है तो सिर्फ जनतांत्रिक तरीका ही ऐसा हैं जिसमें विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों को एक नया आयाम मिल सकता है।
हमारा संविधान जब बना तो इसकी आत्मा में ही 'राष्ट्रीय एकता' को बनाए रखने की प्रवृत्ति थी। इसने एक मजबूत केन्द्रीय संरचना के साथ राज्यों को भी काफी मात्रा में शक्तियां देकर एक " संतुलित विभाजन शक्ति का" कर दिया। संविधान ने राष्ट्रीय मजबूती के लिए विकेन्द्रीकरण और विखणन, 'केन्द्रीकरण तथा एकता' के बीच एक लक्ष्मण रेखा खींच दी जिसमें भारत एक महान राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर हो सके। संविधान ने राष्ट्र निर्माण की विचारधारा चुनावी लोकतंत्र के माध्यम से आगे बढ़ाने की कोशिश की तथा भारतीय लोकतंत्र को विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक पद्धति बनने में मदद की।
चुनावी लोकतंत्र भारत में विभिन्न विचारों वाली राजनीतिक पार्टीयों के आपसी सामंजस्य को प्रासंगिक बनाने की कोशिश की तथा यह प्रयास किया कि अलग-अलग विचार रखना भी एक संविधान, एक राष्ट्र तथा एक लक्ष्य को रखकर आगे बड़ा जा सके। इसका परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन परिप्रेक्ष्य मे समाजवादी कम्यूनिस्ट, जनसंघ, कांग्रेस इत्यादि दल देश की एकता के लिए हमेशा प्रयासरत रहे ।
उपरोक्त राजनीतिक दलों ने प्रत्येक बार कहीं न कहीं राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के प्रयास किए। ये दल राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए काफी प्रयास करते थे। सभी दलों की विचारधारा अलग-अलग जरूर थी पर अखिल भारतीय स्तर पर एकता तथा अखण्डता के मुद्दे पर काफी समानताएं थीं। इन दलों के नेताओं की सोच तथा विचार राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता के मुद्दे पर पूर्ण रूप से एक समान ही थे। नेहरू, पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना आजाद जो सोचते थे वही सोच राष्ट्रीय एकता के प्रति जयप्रकाश नारायण जी, कृपलानी, राम मनोहर लोहिया तथा श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भी थी।
कांग्रेस का सिद्धांत उदारवादी था और उसने इसी रवैये से ही स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विभिन्न राजनीतिक सिद्धांतों तथा विचारों को एक किया था। स्वतंत्रता के बाद भी कांग्रेस का यह उदारवादी रवैया बना रहा। इन्होंने विरोधी दलों तथा विरोधी विचारों को सुनने और प्रसन्न करने की कोशिश की । वामपंथी दलों की हिंसात्मक प्रवृत्ति के बावजूद नेहरू ने उन्हें एक जगह दी तथा हिंसा छोड़ने के बाद इन्हें सामाजिक तथा राजनीतिक भागीदारी देने की भरसक कोशिश भी की। प्रशासनिक ढांचों को अनुशासित तथा शक्तिशाली बनाने के भरसक प्रयास आरम्भ हुए तथा इन सेवाओं में जाति-धर्म से उठकर समाज के सभी वर्गों को प्रवेश की सुविधा प्रदान की गई। इन सेवाओं की प्रकृति संधीय थी और केन्द्र सरकार के प्रति अफसर अपनी निष्ठा रखते थे। इसके अलावा भारतीय सेना भी राष्ट्रीय स्तर की हुई तथा राजनीतिक दलों तथा एजेण्डों से प्रशासन और सेना को अछुता रखा गया।
इसके अलावा राष्ट्रीय एकता के लिए सामाजिक न्याय और व्यापक सामाजिक एवम् आर्थिक आजादी को प्रोत्साहित करने वाली नीतियों को आगे करने की कोशिश हुई। नेतृत्व ने राष्ट्रीय संरचना की कोशिश को गरीब जनता के पक्ष में सामाजिक तथा आर्थिक विकास से जोड़कर रखा । स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र के निर्माण की एक बहुत बड़ी शक्ति यही थी कि आम जनता को किस तरह एक बड़ी भूमिका दी जाए। इसके लिए सबसे आवश्यक यही था कि आर्थिक विकास एवम् राजनीतिक स्वतंत्रता का लाभ जन-जन तक पहुँचे।
आम जनता की सहभागिता को संविधान में काफी स्थान दिया गया। सामाजिक असमानता तथा राजनीतिक भूमिका को देखते हुए धर्म, जाति, लिंग के आधार पर भेदभाव को समाप्त करने के लिए संविधान में मौलिक अधिकार जोड़े गए। इसके अलावा समाज के पिछड़े, अनुसूचित तबकों को स्थान दिया गया। संविधान के अलावा भी कानून बनाकर कुछ सामाजिक समता के कार्य आरम्भ हुए जैसे: जमींदारी प्रथा समाप्त करना ।
भारत के नेतृत्व के सामने यह स्पष्ट था कि एक संयुक्त तंत्र के रूप में भारत का विकास किसी एक धर्म तथा सोच के आधार पर नहीं हो सकता है। विभाजन से जुड़े विभिन्न अशांति को झेलते हुए तत्कालीन नेतृत्व ने एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र की नींव रखी। इस सिद्धांत ने अल्पसंख्यकों तथा साम्प्रदायिक सदभाव को सुरक्षा भी प्रदान करने में कार्य किया।
राष्ट्र के गठन के लिए सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ ही एक प्रखर विदेश नीति की भी आवश्यकता थी। नेहरू ने गुटनिर्पेक्षता और उपनिवेशवाद विरोधी सिद्धांत को भारतीय विदेश नीति का आधार बनाया तथा ऐसी स्थिति का निर्माण किया जिससे विश्व को यह लगे कि भारत किसी महाशक्ति के पक्ष में नहीं है।
भारत की बहुसांस्कृतिक विविधताओं से यह पा लेना अनिवार्य था कि हम इस देश को एक खास पक्ष या संस्कृति में नहीं रच सकते। इस देश में विभिन्न भाषाओं तथा विभिन्न संस्कृतियों का सम्मिश्रण तैयार करना होगा। भाषा हमारे संविधान की एक प्रमुख धाराओं में रची गयी। इसमें अभी तक अस्टम अनुसूची ने 22 भाषाओं को जगह दी गई थी। संविधान में यह स्वीकार किया गया कि भाषा की विविधता को अपनाए बिना देश के हर कोने में राजनीतिक तथा सांस्कृतिक विकास का दीप नहीं जल सकता।
कुछ स्तर पर भाषा की विभिन्नता के कारण राष्ट्रीय एकता में कुछ रूकावट भी आयी। इन रूकावटों में जो महत्वपूर्ण बातें थीं, वह इस तरह से व्याख्यालत की जा सकती हैं।
1. संघ की राजभाषा क्या थी ?
2. क्या भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हो सकता है? या यह पुनर्गठन न्यायपूर्ण होगा ? हिन्दी के मुद्दे पर देश के विभिन्न राज्यों में एक विकट स्थिति उत्पन्न हो गई तथा यह मान लिया गया कि हिंदी और गैर हिंदी विवाद से एक 'राष्ट्रीय भाषा' की खोज का विवाद जुड़ा हुआ नहीं है। क्योंकि सही तौर पर एक विविध ता से भरे देश में किसी एक भाषा को 'राष्ट्रीय भाषा' बनाकर उसे आनिवार्य करने की प्रधानता को स्वीकार करना एक बहुत बड़ी गलती होगी। भारत एक बहुभाषी देश था और इसे ऐसा ही रहना था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने अपना राजनीतिक और विचारधारात्मक कार्य विभिन्न भाषाओं को स्वीकार करके ही किया। इस बात का परिणाम यह निकला कि अंग्रेजी के बदले भारतीय प्रशासन में सभी भाषाओं को तरजीह दी जाए जिससे सभी राज्यों तथा क्षेत्रों के लोगों को सहूलियत महसूस हो।
जवाहर लाल जी ने विभिन्न मंचों से इस बात को प्रमुखता दी कि “भारतीय जनता की अपनी भाषाएं उनकी संस्कृति से जुड़ी है तथा प्राचीन काल से ही समावेशी रही है। किसी भी समाज का सांस्कृतिक विकास सिर्फ अपनी भाषा के माध्यम से ही संभव है। इसीलिए सभी राज्यों की शिक्षा तथा काम-काज उनकी अपनी भाषाओं में ही होना चाहिए।"
उपरोक्त तथ्यों से विवाद की नकारत्मकता समाप्त हो गई पर विवाद बना ही रहा। यह विवाद इस स्तर पर बना रहा की आखिर अखिल भारतीय स्तर पर केन्द्रीय सरकार के द्वारा किसी एक भाषा में काम-काज किया जाए और यह विवाद दो ही भाषा के इर्द-गिर्द सिमट गया जिसमें हिन्दी और अंग्रेजी सम्मिलित थी। यही वह मुद्दा था जिस पर संविध ान सभा में काफी तीखी बहस हुई थी ।
राष्ट्रीय आंदोलन के समय इस बात पर सहमति थी कि स्वतंत्रता के बाद संचार की भाषा अंग्रेजी नहीं होगी। यह कह देना आवश्यक था कि अंग्रेजी के वैश्विक महत्व को कम करके नहीं देखा गया। इसी को एक माध्यम बनाकर भारत के लोग विज्ञान, खोज, पश्चिमी विचारों तक पहुँच सकते थे। परन्तु इस भाषा को भारत में नेतृत्व करने वाली भाषा के रूप में स्वीकार करने की प्रवृत्ति कम करके देखी गयी ।
राजभाषा के रूप में हिंदी की स्वीकारोक्ति में कोई खास अर्चन नहीं आई। इसके पीछे यह कारण था कि हिंदी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा थी। सभी विचारों के नेता हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार करने के समर्थक थे। अपने अधिवेशनों और राजनीतिक कार्यों के दौरान राष्ट्रीय कांग्रेस अंग्रेजी की जगह हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं का उपयोग करती थी। 1925 में कांग्रेस ने अपनी संविधान की स्थिति में यह कहा कि “संभवतः भरसक रूप में कांग्रेस अपना कार्य हिन्दुस्तानी भाषा में ही चलाएगी।"
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Sun, 01 Oct 2023 06:36:59 +0530 Jaankari Rakho
स्वातंत्र्योत्तर समस्याएं एवं समाधान का प्रयास https://m.jaankarirakho.com/387 https://m.jaankarirakho.com/387 स्वातंत्र्योत्तर समस्याएं एवं समाधान का प्रयास
1. परिचय
सदियों की गुलामी तथा शोषण के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली। वह दिन देश के जनमानस में अदम्य खुशियां तथा साहस लेकर आया जिससे नई ऊर्जा का संचार हुआ क्योंकि स्वतंत्र मन ही इच्छा को जन्म देता है। इसके साथ एक और सच यह भी था कि देश का विभाजन भी हो गया।
स्वतंत्रता और विभाजन के बाद सबसे कठिन परिणाम यह देखने को मिला कि हमारे देश का एक बहुत ही बड़ा हिस्सा साम्प्रदायिक दंगे की चपेट में आ गया। साम्प्रदायिक दंगे के दो-तीन बड़े कारण थे- (1) नए देश में विशाल जन समूह का पलायन, (2) नए देश से विशाल जनसमूह का पलायन, (3) दैनिक जीवन की वस्तुओं का अभाव, (4) प्रशासनिक व्यवस्था का भ्रम, (5) छूट की स्थिति में नए तंत्र के निर्माण में देरी इत्यादि ।
जवाहरलाल नेहरू ने तो स्वतंत्रता के अवसर पर अपने औपचारिक भाषण में यह कह ही दिया था कि हमें स्वतंत्रता के साथ जो सबसे महत्वपूर्ण चीज मिली है, वह है 'अवसर' इस अवसर का उपयोग हम उन अपार समस्याओं के समाधान में करेंगे जो मुंह फैलाये हमारे देश के सामने खड़ी है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हमारा भविष्य आसान नहीं बल्कि संघर्ष से भरा है। हमें उन सभी वादों को पूरा करना होगा जिस पर हमें जनता से स्वतंत्रता के लिए समर्थन मिला है।
स्वतंत्रता के बाद के नेतृत्व के सामने तात्कालिक समस्याएं थी उनमें प्रमुख समस्याओं का सारांश हम निम्न रूप में देख सकते हैं:
1. विभाजन के साथ साम्प्रदायिक दंगों पर नियंत्रण
2. देशी राजवाड़ों का विषय
3. क्षेत्रीय स्तर पर प्रशासनिक एकीकरण
4. लाखों शरणार्थियों ( पाकिस्तान से आए) का पुनर्वास।
5. अल्पसंख्यकों की सुरक्षा
6. पाकिस्तान से युद्ध में विजय
7. वामपंथी आंदोलनों पर नियंत्रण
8. राजनैतिक स्थिरता को प्राप्त करना ।
9. कानून व्यवस्था बनाना।
10. सेना तथा प्रशासनिक स्तर पर धार्मिक विभाजन को सदा के लिए समाप्त करना ।
11. प्रशासनिक तथा आर्थिक सुदृढ़ीकरण ।
12. भारत की सुरक्षा तथा स्थायित्व
13. संवैधानिक व्यवस्था लागू करना ।
14. नागरिक स्वतंत्रता का अधिकार स्थापित करना ।
15. भूमि सुधार
16. लोकतांत्रिक सरकारों की स्थापना इत्यादि ।
इन तात्कालिक समस्याओं के साथ बहुत सारी ऐसी भी समस्याएं थीं जिन्हें हम दीर्घकालीन समस्याएं कह सकते है। इन्हें प्राप्त करना या इनका समाधान करना सिर्फ एक साल या दो साल के साथ नहीं वरन् एक दीर्घकालीन योजना के साथ ही हो सकता था।
2. दीर्घकालीन समस्याएं
1. गरीबी उन्मूलन,
2. भारत को एक सुदृढ़ राष्ट्र बनाना,
3. आर्थिक विकास तेज गति से करना
4. नियोजन प्रक्रिया को आगे बढ़ाना,
5. सामाजिक न्याय को प्राप्त करना,
6. सामाजिक समानता तथा आर्थिक अवसर प्रदान करना,
7. एक मजबूत विदेश नीति की स्थापना करना और
8. हर कीमत पर भारत की स्वतंत्रता की रक्षा करना इत्यादि ।
यह कह देना आवश्यक है कि दीर्घकालीन समस्याओं को हम उच्च स्तर पर एक लक्षित कार्य भी कह सकते हैं। जिसे कोई भी नेतृत्व टाल नहीं सकता था। यह समझ लेना आवश्यक है कि इन समस्याओं का समाधान करना जितना आवश्यक था, उससे भी अधिक यह आवश्यक था कि समस्याओं का समाधान का रास्ता वही हो या वही बातें अपनाकर हो, जो राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य हो तथा राष्ट्रीय आंदोलन के द्वारा बनाए गए मूल्यों पर टिका हो ।
उपरोक्त संकल्पों के साथ उस समय की सरकार ने अपने नेतृत्व तथा जनता के बीच एक विश्वास तथा आशा की संचार मनोदशा की कोशिश की जिससे विभिन्न दीर्घकालीन तथा तत्कालीन समस्याओं का समाधान हो सके। यह कहना सही होगा कि स्वतंत्रता के बाद या 1947 ई० के बाद लगभग 15 साल तक (1962 तक) विभिन्न समस्याओं के समाध कान के लिए बहुत ही मनन से कार्य किए गए। 1962 में चीन के साथ युद्ध के कारण हमारे देश का विकास तथा 1947 के समय लिया गया संकल्प की रफ्तार थोड़ी धीमी हो गई ।
युद्ध के बाद जो एक भारत सरकार के लिए बुरा अनुभव था सरकार के मन में एक परिवर्तन आ गया। नेहरू जी ने यह विचार रखा कि हमें पहले तत्कालीन समस्याओं पर बहुत ही संकल्पित होकर कार्य करना चाहिए फिर दीर्घकालीन समस्याओं के बारे में सोचेंगे।
3. समस्याओं से पार पाने के लिए हमारे पास संसाधन क्या थे?
सही तौर पर जब हम संसाधनों की पर्याप्तता की चर्चा करेंगे तो हमें भूत में जाना होगा परन्तु अधिक चर्चा उनकी नहीं करके हमें तत्कालीन संसाधनों की पर्याप्तता पर ध्यान देना होगा। यह सही है कि अंग्रेजों ने भारत के उद्योग, कृषि तथा प्राकृतिक संसाधनों को बर्बाद कर दिया था। यह सही है कि भारत सरकार के पास संसाधन नहीं थे कि जिससे उच्चतम विकास हासिल हो परन्तु जहां तक तत्कालीन समस्याओं के समाधान की बात है, उसके लिए जो सबसे अधिक आवश्यक था, वह था आदर्श नेतृत्व तथा दृढ़ इच्छा शक्ति। अगर इन पर यदि विचार किया जाए तो हमारे पास एक अनुभवी तथा आदर्श नेतृत्व था। नेहरू ने अपनी सरकार में उन महान नेताओं को शामिल किया था जो ईमानदार होने के साथ दृढ़ इच्छा शक्ति रखने वाले व्यक्ति भी थे। उनमें महान नेता नेता सरदार पटेल जी, डॉ० बी० आर० अम्बेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, वी० के० कृष्णमेनन, डॉ० जाकिर हुसैन, अब्दुल कलाम आजाद, राजेन्द्र प्रसाद ( कुछ समय के लिए) इत्यादि थे।
उपप्रधानमंत्री के रूप में पटेल ने 1947 के बाद भारत को एक नया रूप दिया तथा यह सुचारू रूप में व्यवस्थित करने की कोशिश की कि भारत एक शक्तिशाली देश बने। पटेल एक महान नेता थे। उन्होंने हमेशा कांग्रेस के लिए धन जमा करने की कोशिश की फिर भी अपने को किसी भी दाग से बचाए रखा।
सरदार जी ने विभाजन के बाद भारत की एकता और अखण्डता को बनाए रखने तथा बिखरे हुए मोतियों को पिरोकर एक माला बनाने में अमूल्य योगदान दिया। ब्रिटिश शासन काल में जो रिसायतें तथा रजवाड़े बिखरे थे तथा विभाजन के बाद जो एक चुनौती बन गई थी कि इन समस्याओं का समाधान कैसे किया जाए, इसका समाधान पटेल ने बहुत ही महानता तथा तन्मयता से किया।
सरदार पटेल जी ने विभाजन के बाद देशी रियासतों को एक प्रशासन के अन्तर्गत लाने के लिए काफी पुरजोर सफल कोशिश की। मुख्य तौर पर औपनिवेशिक भारत में भूगोल भारत का 40% से भी अधिक विभिन्न रियासतों के कब्जे में था। आंकड़ों के अनुसार लगभग ऐसी 56 रियासतें थीं इन रियासतों के साथ अंग्रेजों ने सुरक्षा के नाम पर ब्लैकमेल कर ने वर्षों शोषण किया था।
1947 के बाद अधिकतर लोगों के मन में यह विचार था कि अब देशी रियासतों के साथ क्या होगा? कुछ रियासतों के नेता या 'ड्राइविंग फोर्स' कह लें, इन्होंने तो एक आजाद रियासत या 'स्वत्रंत रियासत' का सपना भी देखना आरम्भ कर दिया था। विभिन्न रियासतों ने यह दावा किया कि भारत या पाकिस्तान को पारामाउंटसी हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। तत्कालीन प्रधानमंत्री एटली ने भी फरवरी 1947 में यह कह दिया था कि भारत या पाकिस्तान को पारामाउंटसी सौंपने का कोई विचार नहीं है ।
जिन्ना अपने भाषणों में इस बात के लिए रियासतों के नेतृत्व को भटकारते थे तथा उन्हें स्वतंत्र समझने के लिए उत्साहित भी करते थे। ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने अपने 20 फरवरी, 1947 के वक्तव्य को संशोधित करते हुए 18 जून 1947 को कहा कि “पारामाउंटसी की समाप्ति के बाद सभी रियासत स्वतंत्र संप्रभुसम्पन्न राज्य होंगे और वे यदि चाहें तो स्वतंत्र भी होगी। परन्तु ब्रिटिश सरकार को यह आशा थी कि सभी रियासतें कुछ ही समय के अंतराल पर धीरे-धीरे ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के एक या दूसरे डोमिनियन के अंदर अपना उचित स्थान तलाश लेंगी।
भारतीय नेतृत्व को यह कतई मंजूर नहीं था कि रियासतों को स्वतंत्र भारत में एक स्वायत्त राज्य के रूप में जाना जाए। सरदार पटेल ने यह कहा कि रियासतों की जनता ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया है तथा भारत को ही एक राष्ट्र के रूप में माना है तथा इन्हें एक बिन्दु पर आकर विकल्प तलाशना ही होगा कि अपनी जनता की इच्छा के अनुरूप वह या तो भारत में रहें या पाकिस्तान में।
सरदार पटेल की विद्वता तथा राजनयिक महानता से सैकड़ों रजवाड़ों तथा रियासतों का भारतीय संघ में दो चरणों में विलय सफर हो पाया।
ट्रावणकोर भोपाल और हैदराबाद के राजाओं ने सार्वजनिक रूप से यह घोषित किया कि वे स्वतंत्र दर्जो का दावा पेश करना चाहते हैं। पटेल ने उन्हें यह कहा कि अपनी सुरक्षा, विदेश नीति तथा संचार के स्तर पर रियासतों को भारतीय संघ में जुड़ जाना चाहिए। पटेल की कठोरता तथा ख्याति से उन्हें विकल्प के रूप में कुछ खास नहीं करना था सिवाय भारतीय संघ में शामिल होने के। 15 अगस्त 1947 तक सभी रजवाड़ों तथा रियासत शामिल हो गए। जुनागढ़ कश्मीर तथा हैदराबाद ने 1948 में हाँ कर दिया । जुनागढ़ के राजा की बात को अनसुनी कर वहां की जनता ने विद्रोह कर दिया तथा भारत में ही रहने की इच्छा जाहिर की। जुनागढ़ का राजा पाकिस्तान भाग गया। यहीं पर नेहरू जी के एक निर्णय पर विरोधाभास का स्वर सुनायी देता है कि उन्होंने कश्मीर में भी जनमत संग्रह की बात स्वीकार कर ली जैसे कि जुनागढ़ में भी हुआ था। नेहरू ने यह समझा कि जिस तरह जुनागढ़ की जनता अपने नवाब शाहनवाज मुद्दों के खिलाफ थी उसी तरह कश्मीर में लोग भारत के साथ होंगे। बेनजीर भुट्टों के दादा ने यह नहीं समझा कि जुनागढ़ में 70% से अधिक हिन्दू है और नेहरू ने यह नहीं विचार किया कि कश्मीर के बहुसंख्यक मुस्लिम है।
कश्मीर की सीमा भारत और पाकिस्तान दोनो में मिलती थी। कश्मीर का राजा हरि सिंह न भारत और न ही पा.कस्तान में कश्मीर का विलय करना चाहता था। हरिसिंह जी मध्य मार्ग अपनाना चाहते थे। वह न तो लोकतंत्र चाहते थे और न ही सम्प्रदायिक तौर पर निर्मित देश के साथ रहना चाहते थे। फिर भी कश्मीर के कुछ राजनीतिक समूह जिसमें नेशनल कांफ्रोस शेख अब्दुल्लाह थे वो उस समय कश्मीर का विलय भारत में चाहते थे। भारतीय नेताओं ने सही रूप में कश्मीर के लिए कोई विशेष नीति नहीं बनायी थी। नेहरू के बारे में तो पहले ही यह उल्लेख कर दिया गया कि वो जम्मू-कश्मीर का संग्रह से फैसला करना चाहते थे। महात्मा गांधी जी ने भी सितम्बर 1947 में कश्मीर की जनता को अपने मन के अनुसार फैसला करने के की आग्रह किया परन्तु पाकिस्तान कुछ और चाहता था। वह जुनागढ और हैदराबाद में भी जनमत संग्रह के खिलाफ था। भारत भी पाकिस्तान के कारण कश्मीर मामले में भ्रम में आ गया। 22 अक्टूबर 1947 को सर्दियों के आरम्भ में गैर कानूनी रूप से पाकिस्तान के आर्मी के कई पठान कबीलाइयों ने कश्मीर की सीमा अवैध रूप से पार करके श्रीनगर की ओर बढ़ने लगें। हरि सिंह की सेना पाकिस्तानी आर्मी का सामना करने में सक्षम नहीं थी। 24 अक्टूबर को हरि सिंह ने मजबूरी वश भारत से सैनिक सहायता की अपील की। पर फिर भी पता नहीं क्यों नेहरू जी बिना कश्मीर में जनमत संग्रह कश्मीर को भारत में विलय हो जाने के पक्ष में नहीं थे परन्तु भला हो उस मांउट बेटन की आत्मा का जिन्होंने यह कहा कि अंतर्राष्ट्रय कानूनों के तहत भारत अपनी सेवाएं कश्मीर तभी भेज सकता है जब राज्य का औपचाकि तौर पर भारत में विलय हो चुका हो । सरदार पटेल और शेख अब्दुल्लाह पूरी तरह कश्मीर का विलय भारत में करने के पक्ष में थे, आखिर नेहरू ने विलय के लिए मजबूरी में हाँ कर दी तथा 26 अक्टूबर को कश्मीर भारत में विलय हो गया तथा हरि सिंह ने शेख अब्दुल्लाह को कश्मीर के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में स्वीकार करने को हाँ कर दिया।
पिछले तीन दशकों का आतंकवादी घटनाओं तथा कश्मीर के लिए भारत की असीम शक्ति के खर्च को देखते हुए यह दुर्भाग्य ही था कि उस समय महाराज हरि सिंह तथा शेख अब्दुल्लाह ने कहने पर भी भारत में कश्मीर का स्थायी विलय नहीं किया बल्कि यह घोषणा की कि शांति तथा कानून और व्यवस्था बहाल करने या होने के बाद विलय के निर्णय पर जनमत संग्रह किया जाएगा। कुछ इतिहास कार इसे मूल नहीं वरण् सरकार की जन प्रतिबंद्धता तथा माउंटबेटन की सलाह को मोल देना मानते हैं। अगर इन बातों को मान भी लिया जाए तो क्या यह कहना उचित नहीं कि उस समय तो न पाकिस्तान, न हरि सिंह और न ही शेख अब्दुल्लाह जनमत संग्रह को बहुत महत्व देते थे। आखिर भारत के तत्काल. ीन प्रधानमंत्री की छोर सिद्धांतवादी नीति का यह सबसे दुखदायी पक्ष ही था कि अभी तक हमारा देश इसे भोग रहा है।
जो भी हो उस समय की बात करते हैं, 26 अक्टूबर, 1947 के विलय के बाद केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने सेनाओं को आदेश दिया कि हवाई जहाज से सेनाओं को श्रीनगर पहुंचाया जाए। गांधी जी ने कहा कि किसी भी कीमत पर कश्मीर में शैतानों के आगे समर्पण नहीं करना चाहिए और आक्रमणकारियों को निकाल बाहर करना चाहिए। 27 अक्टूबर को दोपहर तक 100 हवाई जहाजों में सैनिक और हथियार श्रीनगर पहुंचाए गए और युद्ध की चुनौती स्वीकार की गई। सेना ने श्रीनगर को सबसे पहले आक्रमणकारियों से छुड़ाया फिर राज्य के कई हिस्सों को स्वतंत्र करवाया । महिनों तक सेना ने इस पर कार्य किया तथा कई मुठभेड़ होते रहे।
इसी बीच लगभग 30 दिसम्बर 1947 को नेहरू जी ने माउंटबेटन की सलाह पर कश्मीर समस्या को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भेजने को तैयार हो गई जिसमें पाकिस्तान द्वारा अतिक्रमण किए गए क्षेत्रों को खाली करवाने का आग्रह किया गया था नेहरू जी से यही बड़ी गलती हो गई क्योंकि उन्हें यह महसूस हुआ था कि संयुक्त राष्ट्र तटस्थ होकर फैसला करेगा लेकिन उन्हें यह क्या पता कि न्छ० ब्रिटेन और अमेरिका की शह पर पाकिस्तान का पक्ष लेने लेगा।
संयुक्त राष्ट्र ने "कश्मीर समस्या को भारत पाकिस्तान विवाद का रूप दे दिया तथा इस को मजबूत करने के लिए कई प्रस्ताव भी पारित कर दिए। इन्हीं प्रस्तावों में एक प्रस्ताव के तहत 31 दिसम्बर 1948 को युद्ध विराम कर लिया गया तथा राज्य कश्मीर का विभाजन युद्ध विराम रेखा के तहत कर दिया गया। नेहरू इस प्रगति से काफी दुःखी थे नेहरू इस सभी प्रगति के पीछे ब्रिटेन की साजिश को समझते थे परन्तु शायद उन्हें आत्मनिरीक्षण का यह अवसर नहीं मिला कि उन्होंने कश्मीर प्रस्ताव को न्छैब में ले जाने का फैसला एक ब्रिटिश के कहने पर ही लिया था।
1951 ई० में न्छ० ने एक और प्रस्ताव पास किया जिसके तहत च्ज्ञ (पाक अधिकृत कश्मीर) से सेना हटने के बाद जनमत संग्रह का प्रस्ताव था परन्तु पाकिस्तान ने च्ज्ञ से सेना बुलाने से इनकार कर दिया। यह सही है कि भारत ने अभी तक कश्मीर में अपने को प्रतिरोधात्मक स्तर पर ही बनाए रखा है। परन्तु पाकिस्तान 1980 के बाद परोक्ष युद्ध को आरम्भ कर हमारी सेना को चुनौती देता रहा है।
कश्मीर के इतर हैदराबाद भी स्वतंत्रता के बाद एक महत्वपूर्ण समस्या बना जिसे पटेल ने अपनी विलक्षण बुद्धिमता से हल किया। हैदराबाद के निजाम ने स्वतंत्रता के बाद भारत में विलय को स्वीकर नहीं किया तथा एक स्वतंत्र राज्य के तौर पर अपने को पेश किया।
मांउंटबेटन इस मामले में मध्यस्थता करने को उत्सुक रहते भी चुप था। यह सही है कि निजाम पाकिस्तान में शामिल होने को तैयार नहीं था। पटेल इस बात को जानते थे तथा समय का इंतजार कर रहे थे। ब्रिटेन हैदराबाद को ड्रोमिनियन स्टेट का दर्जा देने को तैयार नहीं थे। पटेल ने सार्वजनिक रूप से यह कह दिया कि भारत सरकार को यह कभी मंजूर नहीं होगा कि उसके क्षेत्र में ऐसी कोई जगह रह जाए जो हमारे संघ को बर्बाद कर दे।
नवम्बर 1947 में भारत सरकार ने निजाम के साथ एक संधि की इसमें यह कहा गया कि निजाम अपनी रियासत में एक ऐसी प्रतिनिधि मूलक सरकार का निर्माण करेगा जो आगे चलकर भारत में विलय को असान बनाएगी। इसके साथ यह भी तय हुआ कि संधि वार्ता जारी रहेगी। निजाम संधि वार्त्ता को लंबी खीच कर अपनी सैनिक शक्ति को मजबूत करने की नीति पर कार्य कर रहा था। इसी बीच हैदराबाद में कांग्रेस के द्वारा एक जनवादी आंदोलन की शुरूआत हो गई तथा तेलंगाना क्षेत्र में वामपंथी आंदोलन बनने लगे। निजाम इसमें उलझने में शक्ति लगाने की पुरजोर कोशिश करने लगा।
जून 1948 में सरदार पटेल ने नेहरू को अस्पताल के बेड से ही एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने यह लिखा कि हमें अब और इंतजार नहीं करना चाहिए तथा हैदराबाद के निजाम को कह देना चाहिए कि विलय से कुछ मंजूर नहीं है। और वह भी बिना शर्त । निजाम फिर भी नहीं माना तथा 13 सितंम्बर 1948 में सेना अंतत: हैदराबाद में प्रवेश कर गई। तीन दिनों के बाद निजाम ने आत्मसमर्थन कर दिया तथा नवम्बर 1948 में भारत में विलय को स्वीकार कर लिया। भारत सरकार ने निजामों को सजा नहीं दी तथा उसे एक औपचारिक राज्य प्रमुख के तौर पर बहाल रखा तथा 50 लाख रूपये प्रत्येक साल देने की बात की तथा कोई भी संपत्ति लेने से इनकार कर दिया।
हैदराबाद के विलय के साथ ही भारत सरकार का यह कठिन विलय का कार्य सम्पन्न हुआ तथा पटेल को महान नेता के तौर पर स्थापित भी किया। पटेल ने इतने बड़े देश को एक शासन में लाने के लिए सिर्फ एक साल खर्च किया तथा सफल रहे।
अब भारत के क्षेत्र में दो ऐसे प्रांत थे जो अभी भी विदेशियों के कब्जे में थे। ये थे पांडिचेरी तथा गोवा। 1954 मे फ्रांसीसियों ने भारत को यह राज्य (पांडिचेरी) सौंप दिया तथा कोई हिंसा भी नहीं हुई।
गोवा का मामला दूसरा था । पुर्तगाली यहां से जाने को तैयार नहीं थे। ब्रिटेन और अमेरिका पुर्तगाल को उकसा रहे थे। भारत अपनी सीमा विवाद को शांति पूर्ण तरीके से सुलझा लेने के प्रति समर्पित था। गोवा की जनता काफी आंदोलित हो गई तथा उसने एक आंदोलन आरम्भ कर दिया। 17 दिसंबर 1961 को रात में सेना को नेहरू ने गोवा में प्रवेश करने का आदेश दे दिया। गोवा के गवर्नर जनरल ने बिना युद्ध के ही समर्पण कर दिया तथा भारत को संघ तथा एक सम्प्रभु के रूप में उसी दिन से पहचान मिली।
4. विभाजन से जन्म लेने वाले तत्कालीन समस्याओं में प्रमुख थे:
1. शरणार्थियों की समस्या
2. पुनर्वास
3. साम्प्रदायिकता
4. महामारी
5. पाकिस्तान की दुष्टता
विभाजन के बाद लगभग 60 लाख शरणार्थियों की देखभाल तथा पुनर्वास एक अहम समस्या थी सांप्रदायिकता भी इसके साथ एक अहम समस्या थी। सबसे बड़ी बात साम्प्रदायिकता का जहर जो पश्चिमी भारत से पूर्वी भारत तक फैल गया था। साम्प्रदायिकता को तो प्रलय भी कहा जा सकता है। प्रलय कहने का मतलब यह है कि साम्प्रदायिक हिंसा में उस समय लगभग 5 लाख लोग मार डाले गए, इसके आलावा अरबों लोगों की संपत्ति भी बर्बाद हो गई या लूट ली गई। साम्प्रदायिक हिंसा ने समाज के जड़ चेतन को समाप्त कर दिया। इसी कारण तत्कालीन सरकार को इन महान संकटों का सामना करना पड़ा सरकार को इस बात के लिए धन्यवाद देना चाहिए कि उस साम्प्रदायिक झंझावात की लत देश को नहीं लगने नहीं दी तथा एक धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में भारत की स्थापना की।
भारत ने सेना की मदद से बहुत जल्दी तत्कालीन स्थिति पर काबू कर लिया तथा साम्प्रदायिक हिंसा की कमर तोड़ दी गई। सबसे अधिक महत्व इस बात का है कि सरकार मुस्लिम अल्पसंख्यकों को सुरक्षित रखने में सफल रही। इसी कारण भारत में लगभग साढ़े चार करोड़ मुसलमानों ने भारत में ही रहना पसंद किया । धीरे-धीरे भारत की छवि एक महान धर्मनिरपेक्ष देश की बन गई। इसी के साथ एक धर्मनिरपेक्ष संविधान का निर्माण भी आरम्भ हो गया।
यह सही है कि साम्प्रदायिकता को नियंत्रित कर दिया गया था पर पूर्णत: समाप्त नहीं किया गया था। क्योंकि परिस्थि तियां अनुकूल उतनी नहीं थी जितनी आवश्यक थी। नेहरू ने मुस्लिम लीग के विरोध के साथ हिंदुओं के बीच फासीवादी विचारधारा की 'उत्पत्ति' को भी एक चिंतनीय स्थिति का दर्जा दिया तथा यह कहा कि अभी भी हमें अपनी विचारधारा को भटकाव से बचाने की आवश्यकता है। नेहरू भारत में एक 'साम्प्रदायिक संस्कृति' विकसित होने से रोकने को काफी कोशिश करने की बात करते थे। 'भारत एक सच्चा धर्मनिरपेक्ष राज्य हो' इसके लिए नेहरू काफी प्रयासरत रहते थे।
गांधी जी तो साम्प्रदायिकता के इतने खिलाफ थे कि 'स्वतंत्रता के अवसर' को वह मातम के तौर पर ले रहे थे। उनकी अंतिम सांस भी साम्प्रदायिकता के विरोध में ही थी।
साम्प्रदायिकता के अलावा जो शरणार्थियों की समस्या थी, उसमें बंगाल से आने वाले शरणार्थियों की समस्या सबसे अधिक थी। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह था कि वहां से हिंदूओं का आना सालों तक लगातार जारी रहा। जहां पश्चिमी पाकिस्तान से आने वाले सभी हिंदू और सिख सामूहिक तौर पर 1947 में ही भाग कर आ गए। वहीं पूर्वी बंगाल में हिन्दू बहुत दिनों तक रूके रहे जब भी पूर्वी बंगाल में दंगा भड़कता था वहां से कुछ टुकड़े में हिन्दू आने लगे या आते गए। यह रफ्तार 1971 तक लगातार जारी रही। जहां पश्चिमी पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थी पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान में बस गए वहीं पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को असम या पश्चिमी बंगाल में बसाया गया। इसके अलावा त्रिपुरा में बसाया गया पर शरणार्थियों की संख्या अधिक होने के कारण एक तो घनत्व बढ़ गया वहीं निम्न मध्यवर्गीय शहरी जनसंख्या में असमान वृद्धि हो गई। पूर्वी भारत विशेषकर बंगाल और असम में अभी तक शरणार्थियों की समस्या देखने को मिल रही है।
पाकिस्तान की कुटनीतिक तथा दुष्टतापूर्ण चाल को मात देने की भी समस्या स्वतंत्रता के बाद सबसे अधिक सरकार के लिए चिंता की बात थी। विपीन चन्द्रा के अनुसार "जनवरी 1948 में भारत सरकार ने गांधी जी द्वारा अनशन के बाद विभाजित संपत्ति के रूप में 55 करोड़ रूपए पाकिस्तान को अदा कर दिए। हालांकि यह डर बना हुआ था कि इस पैसे का कश्मीर में सैनिक कार्रवाईयों को वित्तीय मदद देने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।" फिर भी पाकिस्तान सरकार कश्मीर मुद्दे को तनाव का केन्द्र मानता रहा तथा पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं को सताने का सिलसिला जारी रहा। नेहरूजी ने पाकिस्तान को यह बार-बार कहा कि वह हिन्दुओं की सुरक्षा का ख्याल रखे। एक बार तो उन्होंने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देकर निजी व्यक्ति के तौर पर पूर्वी बंगाल जाने का निर्णय भी कर लिया।
8 अप्रैल 1950 ई० को नेहरू लियाकत समझौते में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई। इसके अलावा भी पाकिस्तान के साथ कई और समझौते हुए।
पाकिस्तानी समस्याओं से इतर स्वतंत्रता के बाद की सरकार के सामने की वामपंथ की समस्याओं का भी वर्णन जरूरी है। सी० पी० आई० की कई गतिविधियों की नेहरू कड़ी निन्दा करते थे। फिर भी उन्होंने कभी उन्हें देश के लिए खतरा नहीं कहा। उन्होंने वामपंथी दलों को 'एक आर्थिक सामाजिक विचारधारा' बताया।
संक्षेप रूप से कहा जाए तो सरकार की प्राथमिकताएं विभिन्न समस्याओं के मंचन से ही निकाली थी जो तत्काल रूप में समाधान चाहती थी। सरकार ने पुरजोर प्रयास किए तथा कुछ हद तक सफल भी रही।
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Sun, 01 Oct 2023 06:34:41 +0530 Jaankari Rakho
आजादी और 'राष्ट्रीय आंदोलन' का आत्मसातकरण https://m.jaankarirakho.com/386 https://m.jaankarirakho.com/386 आजादी और 'राष्ट्रीय आंदोलन' का आत्मसातकरण
1. परिचय
भारत की स्वतंत्रता के बाद हुए परिवर्तनों ने उस समय के नेतृत्व के सामने दो महत्वपूर्ण विकल्प दिये- एक तो गरीबी को दूर करने के लिए कया किया जाए तथा दूसरा राष्ट्रीय आंदोलन से प्रेरित होकर कैसे भारत को एक सूत्र में बांधा जाए। इनमें सबसे बड़ी बात राष्ट्र निर्माण की अवधारणा थी, जो भविष्य के लिए अति आवश्यक थी। राष्ट्र निर्माण के लिए पूंजी के रूप में उस समय जो भारतीय नेतृत्व के सामने सबसे अमूल्य संसाधन थे, उसमें आजादी के पहले के राष्ट्रीय आंदोलन से मिली हुई सीखें थी। राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्श, मूल्य, विचारधारा ने स्वतंत्र भारत को एक नया रास्ता दिया।
राष्ट्रीय आंदोलन ने स्वतंत्र भारत के सभी क्षेत्रों तथा सभी विचारों को एक नया रास्ता दिया। हमारे देश के पास उस समय राष्ट्रीय आंदोलन से उपजे हुए कार्यकर्ता थे तथा वह विचार थे जो देश को एक भविष्य की राह दिखा सकते थे। सही तौर पर माने तो वामपंथी या दक्षिणपंथी, उच्च वर्ग या मध्यम वर्ग सभी के पास राष्ट्रीय आंदोलन से प्रेरणा लेने की इच्छा थी तथा यह होता भी था ।
2. राष्ट्रीय आंदोलन के सिद्धांत तथा स्वतंत्र भारत की आकांक्षा
राष्ट्रीय आंदोलन की विशालता तथा प्रखरता ने इसके सिद्धांत को एक धार दी तथा उस काल में जन-जन तक उन आंदोलनों के विचार को पहुंचाया तथा ब्रिटिश सरकार से इन आंदोलनों के द्वारा जनता की तत्कालीन इच्छा को पूर्ण करने की मांग भी की। राष्ट्रीय आंदोलन ने अहिंसात्मक रूप में उन मांगों को रखा जो उस काल में सबसे अधिक आवश्यक भी था।
स्वतंत्रता के बाद सरकार को उन आंदोलनों से उपजे विचार तथा मांग ने अपने कर्त्तव्य का बोध करवाया तथा सर. कार ने इसे देखते हुए गरीबी के बावजूद मौलिक अधिकार तथा वयस्क मताधिकार को लागू किया। उस समय देश में सामाजिक एकता, शिक्षा तथा राजनीतिक इच्छा शक्ति की सबसे अधिक जरूरत थी तथा इन आकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन का परिणाम एक लक्ष्य की ओर बढ़ने का सबसे प्रभावी माध्यम था।
आंदोलन के स्वरूप में सत्याग्रह तथा जन सहभागिता स्वतंत्र भारत की जनता के लिए एक अहम पूंजी का कार्य कर सकता था। उस काल में एक नये लोकतंत्र के लिए सहभागिता तथा सत्याग्रह की सीख एक अमृत की तरह थी जो एक सुनहरे लोकतंत्र की ओर ले जाने के लिए काफी थी।
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जनता आंदोलनों के प्रति उत्साहित थी तथा जब आजादी मिली तो जनता की आकांक्षा 
उस आंदोलन से उपजे परिणाम की प्रासंगिकता को धरातल पर उतारने की थी। भारतीय गणतंत्र के संस्थापकों ने जनता की आकांक्षा और राजनीतिक क्षमता पर पूर्ण विश्वास किया। उन्होंने एक स्वतंत्र भारत की नींव रखी जो राष्ट्रीय आंदोलन के कंधे पर बढ़ने को तैयार था।
3. आजाद भारत का नागरिक तथा राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत
राष्ट्रीय आंदोलन के केन्द्र में सबसे महत्वपूर्ण आयाम 'नागरिक' था। इसका अर्थ भारतीय नागरिक से है जिसकी अपनी इच्छा शक्ति तथा आकांक्षाएं थी। राष्ट्रीय आंदोलन इसी लिए पूर्ण रूप से प्रतिनिधि मूलक प्रजातंत्र तथा नागरिक स्वतंत्रता को सबसे आगे कर अपना कार्य करता था।
राष्ट्रीय आंदोलन के चिंतन में नागरिक स्वतंत्रता की अवधारणा सबसे अधिक प्रबल थी। राष्ट्रीय आंदोलन ने जनप्रिय विचारों तथा आम जनता के पक्ष में बनाए गए उन संस्थानों को आत्मसात करने का प्रयास किया जो नागरिक के प्रति संवेदनशील हो। इसीलिए उस राष्ट्रीय आंदोलन ने जितना ध्यान प्रेस की आजादी पर दिया उतना ही विदेश तथा आर्थिक नीति पर। इन आंदोलनों ने वैध राजनीतिक कदमों पर तथा उन गतिविधियों पर ध्यान केन्द्रित किया जो नागरिक स्वतंत्रता को धरातल पर उतार सके। 1937 ई० में स्थापित कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने विभिन्न आंदोलनकर्त्ताओं, किसानों, मजदूरों तथा यहां तक कि वामपंथी दलों को भी नागरिक अधिकार का लाभ बड़े पैमाने पर उपलब्ध कराया। यही स्वतंत्रता के बाद एक बृहत् अवधारणा के रूप में सामने आया।
कांग्रेस ने अपने स्थापना काल से ही नागरिकों की इच्छा को अपने चुनिदा विचारों में जगह दी। अपने सिद्धांतों में लोकतांत्रिक पद्धति को सर्वप्रमुख स्थान देकर विभिन्न प्रस्तावों को नागरिक की इच्छा के आधार पर पारित करता था। उदाहरणस्वरूप 1920 में अहसयोग आंदोलन की बात हो या 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रस्ताव हो । असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव तो 1886 मतों से पारित किया गया था। इसमें विरोध के पक्ष में 884 मत पड़े थे। इसी तरह सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रस्ताव की बात हुई थी तो गांधी जी ने यह कहा कि सर्वप्रथम क्रांतिकारी गतिविधियां जो हिंसात्मक हुई थीं उसका निंदा प्रस्ताव पारित किया जाए। उदाहरणस्वरूप 1929 के लाहौर अधिवेशन में 'इस अधिवेशन में वायसराय के ट्रेन पर बम फेंकने की घटना के विरोध में निंदा प्रस्ताव 942 मतों के पक्ष से पारित हुआ था। इसके विरोध में 794 मत मिले थे। इसी तरह कांग्रेस ने 1942 में गांधीजी के द्वारा लाया गया यह प्रस्ताव कि अंग्रेजों को विश्वयुद्ध में मदद की जाए, का पूर्ण रूपेण विरोध कर दिया था। इस प्रस्ताव का एक स्वर से अस्वीकार कर दिया गया था।
कांग्रेस ने आरम्भ से ही विभिन्न प्रस्तावों में यह जताने की कोशिश की कि नागरिक की इच्छा तथा अकांक्षा सर्वोपरि है तथा इसका विरोध नहीं किया जा सकता। यह कह देना उचित है कि राष्ट्रीय आंदोलन में नागरिक की इच्छा को सर्वोपरि रखना सिर्फ कांग्रेस की ही प्राथमिकता नहीं थी बल्कि उस समय के विभिन्न राजनीतिक संगठन जैसे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी जनहित संगठन, ट्रेड यूनियन, किसान सभा, वामपंथी दल, हिन्दू महासभा, महिला संगठन इत्यादि ने भी जनवादी नियमों या नागरिक प्राथमिकता के स्तर पर ही अपने विभिन्न कार्य किया करते थे।
राष्ट्रीय आंदोलन के अधिकतर नेताओं ने नागरिक स्वतंत्रता का बड़े स्तर पर समर्थन दिया। एक बार बाल गांगाधर तिलक ने प्रेस की स्वतंत्रता को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ा तथा उन्होंने कहा कि "प्रेस की स्वतंत्रता और बोलने की स्वतंत्रता ही एक राष्ट्र को जन्म देती है और इसका पालन-पोषण करती है। इसी तरह गांधी जी ने बार-बार नागरिक अधिकारों की मांग कर ब्रिटिश सरकार को पीछे हटने पर बाध्य किया। 1939 में महात्मा ने कहा “अहिंसा पालन के साथ ही नागरिकों को विभिन्न अधिकार दिया जाना भी स्वराज की दिशा में पहला कदम हो सकता है। नागरिक अधि कार के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता । " इसी तरह एक बार 1936 में भी गांधी जी ने कहा कि “यदि नागरिक अधिकारों का दमन होता है, तो एक राष्ट्र अपनी जीवंतता खो देता है और किसी महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए अक्षम हो जाता है।
कांग्रेस ने 1931 के कराची अधिवेशन को नागरिकों के मौलिक अधिकार तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए ही समर्पित कर दिया था। इसी परिप्रेक्ष्य में विभिन्न क्रांतिकारी गतिविधियों का भी समर्थन किया गया था।
औपनिवेशिक शासन ने सबसे अधिक करारा प्रहार नागरिक स्वतंत्रता तथा अधिकार पर ही किया था। नागरिकों के लिए अंग्रेजी सरकार भयंकर निरंकुश थी। राष्ट्रीय आंदोलन ने अपने कदमों से लोक सम्प्रभुता, प्रतिनिधित्व तथा नागरिक अधिकार की अवधारणा को देश के सामने रखा। अंग्रेज तो बार-बार यही कहते थे कि भारत में नागरिकों की एकता तथा स्वतंत्रता असम्भव है क्योंकि विविधता से भरे देश में नागरिक इसके योग्य ही नहीं पर राष्ट्रवादी तथा जन सहभागी आंदोलन ने इसे झुठला दिया। उन्होंने यह विचार प्रेषित किया कि भारतीय परम्परा में ही गणतंत्र की अवधारणा है तथा जन सहभागिता इसके केंद्र में है। धीरे-धीरे अंग्रेजों को भी यह समझ में आ गया कि राष्ट्रीय आंदोलन बिना एकता तथा नागरिक की सहभागिता के जोर नहीं पकड़ सकता।
4. राष्ट्रीय आंदोलन ने आजाद भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रेरित किया ?
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने उस समय की ब्रिटिश औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की नकारात्मक प्रवृत्तियों को उजागर कर ‘भारत के पिछड़ते अर्थ तंत्र' को एक अहम मुद्दा बनाया तथा एक व्यापक रणनीति का निर्माण किया। इस महत्वपूर्ण िकदम ने आजाद भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत आधार का कार्य किया।
राष्ट्रीय आंदोलन ने एक ऐसे भारत की मांग की जो स्वतंत्र तथा आत्मनिर्भर हो । इसका सार यह है कि विश्व के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था न कि किसी के अधीन रहने वाली अर्थव्यवस्था । वि. भन्न नेताओं ने उस समय ब्रिटिश अधीनता वाली अर्थव्यवस्था को भारत की समस्याओं की जड़ बताया तथा इसे एक नये रूप में सामने लाए।
स्वतंत्रता के समय नेहरू जी (जवाहर लाल नेहरू) ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक भविष्य की राह दिखाते हुए कहा था कि हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार के खिलाफ नहीं है और हम इसके प्रोत्साहन के लिए भी समर्थन में है। परन्तु हमारी मंशा आर्थिक साम्राज्यवाद से सुरक्षा के लिए अधिक सजगता दिखाने की है। राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न चरणों में साम्राज्यवाद के प्रति काफी सजगता रखी गई। आर्थिक रूप से भारत को कमजोर करने में औपनिवेशिक साम्राज्यवाद का हाथ होने को सबसे अधिक प्रमुख बनाया गया। इसके साथ ही राष्ट्रवादियों ने स्वतंत्र भारत के लिए आधुनिक कृषि तथा उद्योगों के विकास को एक सबसे प्रमुख लक्ष्यों में शामिल करने की वकालत की जो विभिन्न मांगों में शुरू से ही शामिल था तथा संरचनात्मक आंदोलनों का आधार भी।
गांधी जी ने विभिन्न संरचानात्मक कार्य के जरिये यह बताने का प्रयास किया कि भारत को औद्योगिकरण अपनाना ही होगा अन्यथा देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी। इसके साथ ही उद्योग और कृषि दोनों को स्वदेशी तरीके से आगे बढ़ना होगा तभी हम साम्राज्यवाद के दिए हुए देश को समाप्त कर सकते हैं। गांधी जी आरम्भ से ही ग्रामीण विकास को सर्वोपरि मानते थे तथा इसके लिए विभिन्न उद्योगों के विकास को एक आधार के रूप में देखते थे। आंदोलन कर्त्ताओं ने बेरोजगारी के मुद्दे को औद्योगीकरण से जोड़ा तथा मशीनीकरण के सीमित प्रयोग का समर्थन किया । रोजगार को बढ़ाने के लिए लघु एवम् कुटीर उद्योगों को प्राथमिकता दी गयी।
राष्ट्रवादियों ने स्वदेशी तरीके से भारतीय उद्योग के विकास के लिए कार्य करने की वकालत की। वे कहा करते थे कि परतंत्र भारत में विदेशी पूंजी के आगमन से भारत कभी स्वतंत्र नहीं होगा। अगर आजादी मिल जाती है तो सीमित पूंजी निवेश किया जा सकता है। स्वतंत्रता के बाद इसीलिए विभिन्न भारी उद्योगों के विकास में विदेशी सहायता ली गई।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद भारतीय नेताओं ने कृषि - ढांचे को पुनर्संगठित करने के लक्ष्य पर अधिक ध्यान दिया तथा कृषि को उसके स्वामी के अधीन करने की वकालत की। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पक्ष था जमींदार और बिचौलियों को कृषि के लायक खेतों से दूर करना ।
राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र में राज्य की लोक कल्याणकारी आर्थिक नीतियां बनाने का कर्त्तव्य' निहित था। आंदोलनकर्त्ताओं ने यह कहा कि तीव्र औद्योगीकरण तथा कृषि का विकास राजकीय हस्तक्षेप से ही संभव है तथा इसके लिए एक व्यापक नीति की आवश्यकता है। 1938 में राष्ट्रीय नियोजन समिति का गठन किया गया तथा इस समिति ने आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के तीव्र विकास को सबसे अधिक आवश्यक माना था। इस समिति के द्वारा ही स्वतंत्र भारत में आधारभूत उद्योग, ऊर्जा, सिंचाई, सड़क, जन आपूर्ति के विकास की रूपरेखा तैयार की गई । 
1931 भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कराची अधिवेशन में पारित आर्थिक कार्यक्रम में यह घोषणा कर दी गई कि "राज्य आधारभूत उद्योगों और सेवाओं जैसे कि रेलवे, सार्वजनिक यातायात, जहाजरानी, जलमार्गों इत्यादि का स्वामी तथा नियंता होगा। 1943 में गठित भारतीय पूंजीपतियों की 'बम्बई योजना' ने भी इस बात का समर्थन दिया था।
राष्ट्रीय आंदोलन ने सार रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था को निम्न आयाम दिए:-
1. राज्य को हस्तक्षेप कर अर्थव्यवस्था को मजबूत करना ।
2. मानव श्रम को विस्थापित करने वाले सभी कदमों का विरोध |
3. आधारभूत उद्योगों का विकास।
4. सार्वजनिक हित के लिए उद्योगों का पुरजोर विकास ।
5. कृषि ढांचे को बेहतर बनाने के लिए कदम बढ़ाना।
6. सार्वजनिक क्षेत्र को विकसित कर लोक कल्याण के लिए आधारभूत संरचना का निर्माण करना। 
7. स्वतंत्र भारत में सीमित विदेशी पूंजी को लाना जिसमें आधुनिक उद्योग का विकास हो सके। 
8. आर्थिक विकास के केन्द्र में ग्रामीण विकास तथा कुटीर उद्योगों को प्राथमिकता देकर रोजगार विकसित करना।
5. राष्ट्रीय आंदोलन तथा गरीबी दूर करने की इच्छा शक्ति
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन आरम्भ से ही गरीबी को 'उपनिवेशवाद' के कारण ही उत्पन्न समस्या मान रहा था। दादाभाई नौरोजी अपने प्रत्येक भाषण तथा लेख में भारतीय जनता की गरीबी का सबसे बड़ा शत्रु ब्रिटिश उपनिवेशवाद को ही मानते थे। इसके बाद गांधी जी के विचार भी राष्ट्रीय आंदोलन में गरीबी उन्मूलन को प्रमुखता देने की थी।
असहयोग आंदोलन के बाद कांग्रेस के युवा नेता जैसे:- नेहरू, बोस तथा अन्य वामपंथी झुकाव वाले आंदोलनकर्त्ताओं ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक समाजवादी समाज की ओर ले जाने के गंभीर प्रयास किए तथा यह कहा गया कि स्वतंत्र भारत में समाजवाद रास्ते पर ही चलकर गरीबी दूर की जाएगी।
स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने समाजवाद को अपना लक्ष्य न मानकर भी समतावाद को अपना आदर्श मान लिया तथा ऐसे समाज की अवधारणा को प्रस्तुत किया जिसमें सभी नागरिकों को समान अवसर मिल सके तथा जीवन स्तर में वृद्धि हो सके। धीरे-धीरे स्वतंत्र भारत ने राष्ट्रीय आंदोलन के उन आदर्शों को अपना लिया जो सही मायने में भारत को एक नई राह दिखा सकता था, जैसे:- सामाजिक न्याय, सामाजिक अवसर, आर्थिक समानता प्राथमिक शिक्षा की आनिवार्यता, विभिन्न करों में कमी, किसानों को राहत, भूमि सुधार तथा न्यूनतम मजदूरी की गांरटी, इत्यादि ।
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय गांधी जी ने यह घोषणा कर भारतीय सामाजिक स्तर पर एक छाप छोड़ दी कि "जमीन उसकी है जो उस पर काम करता है और किसी की भी नहीं।" इसके अलावा किसी भी प्रकार की असमानता का विरोध करने की प्रवृत्ति ने एक नये आयाम को जन्म दिया। राष्ट्रीय नेताओं ने आंदोलन के काल में ही सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव, लिंग आधारित शोषण के विरोध में कई प्रस्ताव पास किए। इसके अलावा उन्होंने उस समय देश में चल रहे विभिन्न सामाजिक सुधार आंदोलन का भी साथ दिया और अपने में आत्मसात कर लिया।
6. राष्ट्रीय आंदोलन तथा सामाजिक समस्याएं
राष्ट्रीस आंदोलन से स्वतंत्र भारत की विभिन्न समस्याओं से छुटकारा पाने की जो प्रेरणा मिली उसमें सामाजिक संस्थाओं का एक अहम स्थान है। विभिन्न तरह के आंदोलनों ने इस काल में विभिन्न सामाजिक समस्याओं को सामने लाकर उसे दूर करने का प्रयास किया। उस काल में जो सामाजिक समस्याएं अधिक प्रबल थी वह निम्न है।
1. लिंग आधारित भेदभाव
2. जातिगत भेदभाव
3. महिला उत्पीड़न
4. सामाजिक शोषण
5. अनुसूचित जाति जनजाति के प्रति भेदभाव।
6. अस्पृश्यता की समस्या इत्यादि ।
राष्ट्रीय आंदोलन और उस समय के विभिन्न संगठनों के बीच सामाजिक समस्याओं के प्रति एक समान जगरुकता थी। विभिन्न राष्ट्रीय आंदोलन ने अपने सुधारवादी कदमों में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार के साथ उनकी शिक्षा तथा समान राजनीतिक अधिकार के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए तथा विभिन्न संगठनों में उन्हें शामिल किया गया। इसके अलावा जातिगत असमानता और उत्पीड़न के विरोध में अनेक आंदोलन किए गए तथा अस्पृश्यता के खिलाफ असहयोग आंदोलन के बाद एक चरणबद्ध आंदोलन प्रारम्भ किया गया। 1920 के बाद तो अछूत प्रथा के उन्मूलन को एक सर्वोच्च प्राथमिक कार्यक्रम के तौर पर आंदोलनों में शामिल किया गया।
जाति प्रथा तथा जातिगत शोषण की पराकाष्ठा का ही परिणाम था कि स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण घोषित किए जाने के विरोध में संविधान सभा में शून्य मत पड़े थे। इसी तरह महिलाओं के पक्ष में भी कई फैसले लिए गए।
उपरोक्त तथ्यों के अलावा समाज में धर्म के नाम पर पक्षपात करने की संकल्पना प्रस्तुत हुई तथा 1920 से ही ‘धर्मनिरपेक्षता' को राष्ट्रीय आंदोलन का आधार मानकर कार्य शुरू किया गया। आंदोलनकर्ताओं ने धर्मनिरपेक्षता को भ. ारतीय परम्परा का आधार मानकर एक प्रेरणा बताया जो अभी तक भारतीय संस्कृति की वाहक है। राष्ट्रीय आंदोलन के सार में धर्म को निजी मसला मानने की संकल्पना थी इसीलिए गांधी जी ने भारतीय मुसलमानों को देश की बुनियाद में एक मजबुत प्रकरण बताया।
1931 के कराची अधिवेशन में मौलिक अधिकार पर चर्चा हुई तथा यह प्रस्ताव पास किया गया कि सभी नागरिकों को अपने अंतःकरण की आजादी और अपने धर्म को खुलकर मानने तथा अपने इष्ट की अराधना तथा उपासना करने की छूट दी जाएगी। इसके साथ ही यह भी प्रस्ताव पास किया गया कि सभी नागरिक कानून के सामने बराबर होंगे चाहे वे किसी भी जाति, संप्रदाय या लिंग के हों। राज्य सभी धर्मों के मामले में तटस्था का पालन करेगा।
संविधान सभा ने उपरोक्त सभी प्रस्तावों को संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में दर्ज किया तथा इसके साथ ही एक नया भारत बनाने की आधार नींव तैयार हो गई। स्पष्ट रूप से देखा जाए तो राष्ट्रीय आंदोलन की आत्मा समानता, स्वंतत्रता तथा धार्मिक आजादी में ही बसती थी। गांधी जी ने बार-बार यह कहा कि ब्रिटिश सरकार और हमारे में यही फर्क है कि वह धार्मिक आधार पर देश को तोड़ना चाहती है। परन्तु भारत के नेतागण सभी धार्मिक आधार पर आंदोलन में शामिल होने की अपील नहीं करते हैं और न ही करेंगे। नेहरू जी तो एक कदम आगे चलकर साम्प्रदायिकता के विरोध में भावावेश में आकर भाषाण देते थे। कभी भी उन्होंने यह नहीं कहा कि ब्रिटिश सरकार ईसाईकरण कर रही है। चाहे वह यह अच्छी तरह से जानते हों कि ब्रिटिश समूह ईसाईकरण करना चाहता है। भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश सरकार की आलोचना राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक स्तर पर की।
उपरोक्त तथ्यों के कुछ नकारात्मक परिणाम भी निकले और यह परिणाम देश का विभाजन ही था क्योंकि राष्ट्रीय आंदोलन के पुरोधाओं ने साम्प्रदायिकता के विरोध के लिए कोई प्रतिरोधात्मक पंक्ति खड़ी करने की कोशिश कभी नहीं की। परंतु यह भी कहना सही होगा कि यह आंदोलन की धर्मनिरपेक्ष शक्ति की मजबूती ही थी कि 1946-47 में विभाजन के समय उन्मादी दंगों के बावजूद भारत एक धर्मनिरपेक्ष, संवैधानिक, सम्प्रभु तथा लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में उभरा।
7. राष्ट्रीय आंदोलन तथा स्वतंत्र भारत की विदेश नीति
1857 के विद्रोह के बाद ही उस समय के राष्ट्रीय नेताओं ने यह समझ लिया था कि फासीवाद तथा सामंतवादी ताकतों का विरोध करके ही भारत स्वतंत्र रह सकता है या हो सकता है। काल बीतने के बाद यही सोच एक अंतर्राष्ट्रीय
स्तर पर विकसित हो गई। आज हमारी विदेश नीति स्वतंत्र विकसित, समानता तथा विश्व बन्धुत्व पर आधारित है। कहीं-न-कहीं इसकी नींव राष्ट्रीय आंदोलन के काल में ही पड़ गयी थी। 1930 के बाद भारतीय नेताओं ने फासीवाद के विरुद्ध जबरदस्त तरीके से आवाज उठाई।
गांधी जी ने 1940 के काल में पहली बार हिंसा को प्रतिरोध का जरिया मानकर हिटलर की सनक का विरोध किया। गांधी जी ने हिटलर द्वारा यहूदियों के निर्मम नरसंहार के बारे में यह कहा "यदि विश्व को मानवता बचाने के लिए युद्ध करना पड़े तो बिल्कुल उचित होगा । "
गुटनिरपेक्षता तथा स्वतंत्र विदेश नीति का आधार तो नेहरू ने 1935 के बाद ही रख दिया था जब उन्हें लगा था कि अब साम्राज्यवाद अपने अंतिम चरण में है। उन्हें यह अभास हो गया था कि भारत तभी विकास कर सकता है जब अपनी नीति में बराबर रूप में फासीवादी और साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध खड़ा रहे ।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन विदेशियों के प्रति काफी सहिष्णु रवैया अपनाता रहा। ब्रिटिश सरकार के प्रखर नस्लवादी दुराचार के बाबजूद भारतीय नेताओं ने कभी भी अपनी नीति में नस्लवाद के प्रतिरोध में कोई नीति नहीं बनायी। राष्ट्रीय नेताओं ने यह बार-बार कहा कि भारत अपनी संस्कृति तथा परम्परा में विश्व बंधुत्व को सबसे अहम बिन्दु मानता रहेगा। नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं को हमेशा इस तरह प्रशिक्षित किया कि अंग्रेजों के खिलाफ वह व्यक्तिगत कटुता से बचे। सार रूप में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने स्वतंत्र भारत के लिए निम्न प्रेरक तत्वों को प्रेषित कियाः
1. धर्मनिरपेक्षता
2. सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक अवसर
3. स्वतंत्र विदेश नीति
4. समाजवाद की अवधारणा
5. सामाजिक, आर्थिक समानता
6. धार्मिक स्वतंत्रता
7. अनुशासन
8. आर्थिक अवधारणा
9. लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा
10. देश को विकसित करने की इच्छाशक्ति
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Sun, 01 Oct 2023 06:26:10 +0530 Jaankari Rakho
स्वातंत्र्योत्तर भारत : औपनिवेशिक विरासत https://m.jaankarirakho.com/385 https://m.jaankarirakho.com/385 स्वातंत्र्योत्तर भारत : औपनिवेशिक विरासत

1. परिचय

15 अगस्त 1947 को भारत एक स्वतंत्र देश के तौर पर विश्व बिरादरी में शामिल हुआ। भारत की यह स्वतंत्रता वर्षों की गुलामी और प्रखर राष्ट्रीय चेतना से उत्पन्न आंदोलन के बाद प्राप्त हुई थी।
सैकड़ों वर्ष में एक उपनिवेश के तौर पर भारत की पहचान में दीर्घकालिक परिवर्तन हो गया था। मुख्य रूप से प्राचीन काल में जो भारत अपनी एक पृथक स्थिति समृद्धता तथा आत्मनिर्भरता के लिए जाना जाता था, परन्तु मध्यकाल में एक संक्रमण का उत्पन्न होना तथा ब्रिटिश गुलामी के बाद यह स्थिति बदल गयी ।

2. आखिर ब्रिटिश शासन से भारत में क्या बदलाव हुए ?

यह सत्य है कि अंग्रेजी शासन से भारतीय बुनियादी संरचना में सकारात्मक परिवर्तन हुए, परन्तु यह परिवर्तन मानवीय तथा कल्याणकारी न होकर व्यापारिक ही थे । ब्रिटिश शासन से भारतीय तंत्र पूरी तरह बदल गया । अंग्रेजों ने भारतीय तंत्र में जो भी परिवर्तन किए उसने कहीं-न-कहीं पिछड़ेपन को ही जन्म दिया। ये पिछड़ापन बहुआयामी था। प्रत्येक क्षेत्र इससे प्रभावित हुआ। कृषि, उद्योग, वित्त, नागरिक, शिक्षा, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र इत्यादि क्षेत्रों में ब्रिटिश सरकार के द्वारा असंख्य क्षति पहुँचाई गई। विभिन्न क्षेत्रों में जो क्षति पहुंचाई गई उसका भयंकर परिणाम मिला और वह था एक गुलाम अर्थव्यवस्था तथा अकाल से उत्पन्न गरीबी की मार ।

3. भारतीय कृषि पर उपनिवेश का प्रभाव

औपनिवेशिक शासन में सबसे नकारात्मक प्रभाव कृषि पर पड़ा । अंग्रेजी सरकार ने अपने लाभ के लिए भारतीय कृषि की पारम्परिक सहजीविता को समाप्त कर दिया तथा धीरे-धीरे कृषि अनुशासन शून्य हो गया।
निम्नांकित पहलुओं से हम कृषि पर औपनिवेशक प्रभाव को समझ सकते है:
  1. 20वीं सदी के आरम्भ में जो कृषि उत्पादन की व्यवस्था थी वह 1940 के दशक में आते-आते 14 प्रतिशत की गिरावट के साथ उत्पादित होने लगी। इसमें प्रति व्यक्ति की स्थिति तो और भी खराब हो गई। जहां 1901 में प्रतिव्यक्ति खाद्यान्न उत्पादन अधिशेष में था वह 1940 के बाद 24 प्रतिशत की कमी के रूप में दर्ज होने लगा।
  2. कृषि क्षेत्रों में सामंतीकरण और उपसामंतीकरण की अवधारणा उत्पन्न होने लगी। इसमें बटाईदारी तथा अधीनस्थ काश्तकारी प्रथा को बल मिला । स्वतंत्रता के पहले दशक में लगभग 70 प्रतिशत भूमि पर जमीदारों का कब्जा हो चुका था।
  3. महाजन पद्धति की पहचान औपनिवेशिक शासन के लिए एक पर्याय बन गया। औपनिवेशन महाजन गठजोड़ से कृषि उत्पादन का लगभग 50% चट कर जाता था।
  4. औपनिवेशिक शासन की संकल्पना कृषि विकास के लिए शून्य थी। यह शासन सिर्फ लगान वसूलने में दिलचस्पी रखता था। कृषि के उत्पादन के लिए अंग्रेजी सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया।
  5. भूमिहीन खेतिहिर मजदूरों की संख्या अत्याधिक हो गई तथा जहां 1875 ई० में कृषक आबादी का सिर्फ 15 प्रतिशत भूमिहीन मजदूर थे, वहीं 1951 में यह लगभग 28% हो गया।
  6. कृषिगत भूमि के छोटे होने से कृषि हानि का व्यापार हो गया। अधीनस्थ काशतकारी ने इसे काफी आगे बढ़ाया।
  7. कृषि में व्यावसाधिक उत्पादन का आरम्भ तो हुआ तथा भारत की खेती विश्व के बाजारों से जुड़ गई परन्तु पूंजीवादी खेती के साथ तकनीकी विकास नहीं हो पाया तथा योग्य भूमि को व्यापारिक फसलों के लिए प्रयोग किया जाने लगा।
  8. कृषि के लिए ब्रिटिश सरकार ने कोई दीर्घकालिक नीति का निर्माण नहीं किया तथा प्रशिक्षण की मात्रा नगण्य ही रही। जिससे खेती का आधुनिकीकरण नहीं हो पाया। जो भी कृषिगत औजार थे वह सदियों से बदले नहीं गए थे। स्वतंत्रता के पहले अधिकतर मुगलकालीन हल ही प्रयोग में आता था।
  9. कृषि को आपदा से बचाने के लिए कोई प्रखर योजना नहीं थी तथा कृषि अनुसांधन के लिए कोई संस्था भी नहीं थी। सही तौर पर देखें तो 1946 तक देश में सिर्फ 9 कृषि महाविद्यालय थे।

4. उपनिवेशवाद का भारतीय उद्योग पर प्रभाव

प्राचीन तथा मध्यकाल में भारतीय उद्योग विशेषकर हस्तशिल्प तथा दस्तकारी उद्योग अतुल्य था। 19वीं सदी में दस्तकारी उद्योग का पतन अधिक तेजी से हुआ क्योंकि ब्रिटेन से सस्ते औद्योगिक वस्तुओं कर आयात अधिक मात्रा में होता था।
उद्योग पर उपनिवेशवाद के प्रभाव
  1. भारतीय उद्योग अपनी परम्परागत तथा अंतर्संबंधीय तंत्र के कारण काफी तेजी से विकसित हुआ था। आरम्भ से ही यूरोप तथा मध्य एशिया से भारतीय माल की मांग सर्वाधिक रहती थी। परन्तु अंग्रेजों ने मुक्त व्यापार की नीति लागू कर भारतीय औद्योगिक तंत्र की कमर तोड़ दी।
  2. ब्रिटेन से सस्ते औद्योगिक वस्तुओं के आयात होने से दस्तकारी तथा शिल्प उद्योग चौपट हो गया तथा कृषि पर इसका विपरीत बोझ पड़ गया।
  3. औद्योगिक विकास पूरी तरह से ठप्प पड़ गया था तथा जो भी विकास हो रहा था वह चाय, कपास, तथा जूट उद्योग तक ही सीमित था। इससे धीरे-धीरे जनसंख्यात्मक बोझ बढ़ गया था। स्वतंत्रता के तुरंत बाद आधुनिक उद्योगों से प्राप्त कुल राष्ट्रीय आय का मात्र 7.5% था।
  4. भारतीय उद्योग को ब्रिटिश सरकार ने पूरी तरह परजीवी बना दिया था। 1950 ई० में भारत ने अपनी आवश्यकता की 90 प्रतिशत मशीनों का आयात किया था।
  5. उद्योगों की पतनशील स्थिति का पता इसी से लगया जा सकता है। कि जब 1901 में मात्र 63.7% लोग खेती पर आश्रित थे वहीं 1941 ई० तक आते-आते यह संख्या 70 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। दूसरी तरफ विभिन्न उद्योगों जैसे:- निर्माण उद्योग में जहां 1902 ई० में 1 करोड़ 40 लाख लोग कार्यरत थे वहीं 1951 में सिर्फ 88 लाख लोग हैं कार्यरत थे।
  6. 1940 ई० तक भारतीय औद्योगिक तंत्र में विदेशी पूंजी का वर्चस्व हो गया था। विदेशियों ने भारतीय उद्योग की विभिन्न शाखाओं पर कब्जा कर रखा था। अधिकतर कंपनियां जैसे:- बैंकिंग, बीमा, चाय, कोयला, कॉफी यहां तक कि जहाजरानी जैसे उद्योग ब्रिटिश नियंत्रण में आ गए थे।
  7. भारतीय औद्योगिक तंत्र के गलत नेतृत्व का खामियाजा असमान क्षेत्रीय विकास के रूप में देखने को मिला। देश के कम ही क्षेत्रों में अधिक मात्रा में उद्योग लगे हुए थे। इससे क्षेत्रीय स्तर पर आय की असमानता फैली तथा एकता पर बुरा प्रभाव पड़ा।

5. उपनिवेशवाद का बुनियादी संरचना पर प्रभाव

ब्रिटिश सरकार के द्वारा किया गया यही एक ऐसा क्षेत्र है जो कहीं-न-कहीं सकारात्मकता को आत्मसात करता है। स्वतंत्रता के बाद पहले की बुनियादी संरचना ने एक आधार का कार्य किया तथा भारतीय अर्थव्यवस्था के आधार तत्व के रूप में इसके द्वारा प्रारम्भ जोन बनाया गया। देखा जाए तो स्वतंत्रता के बाद लगभग 1948 में भारत के पास लगभग 66000 मील पक्की सड़क और करीब 42,000 मील रेलवे लाईन मौजूद थी। सड़क और रेल ने देश के विभिन्न क्षेत्रों की दूरी कम करने के साथ एकता को भी बढ़ावा दिया।
विभिन्न स्तर पर विश्लेषण से यह पता चलता है। कि बुनियादी संरचना के विकास का लाभ भारतीयों को एकता बढ़ाने के अलावा कुछ खास नहीं मिला क्योंकि बुनियादी संरचना के विकास के साथ उस तेजी से उद्योगों का विकास नहीं हो रहा था जिससे कि भारत की जनता को लाभ हो।
इसके उलट ब्रिटिश सरकार को बहुत लाभ हुआ क्योंकि रेलवे विकास से कच्चा माल बंदरगाह तक आसानी से और तेजी से जा सकता था जिससे कि आयातित वस्तुओं का प्रसार भारत में आसानी से हो सके। रेल का विकास आंतरिक व्यापार की दृष्टि से नहीं किया गया था। भारत में इससे इस्पात तथा मशीन उद्योग पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा।

6. उपनिवेशवाद का शिक्षा पर प्रभाव

ऐसे तो स्वतंत्रता के समय शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय लोगों का छोटा ही सही परन्तु एक बुद्धिजीवी वर्ग तैयार हो गया था परन्तु अंग्रेजो ने शिक्षा के तंत्र को 'ब्रिटिश जटिलता' का शिकार बना दिया। मैकाले ने ब्रिटेन के लाभ के मकसद से भारतीय शिक्षा तंत्र का विकास किया। परन्तु पूरे भारत में एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करने का लाभ हुआ। इससे एक उच्च शिक्षित बुद्धिजीवियों का विशाल वर्ग तैयार हुआ जिसने उपनिवेशवाद के नकारात्मक पहलुओं को जनता के सामने लाकर रख दिया। फिर भी अंग्रेजों ने उस शिक्षा पद्धति के माध्यम से ऐसी नीति लागू की जिससे भारतीय भाषाओं का पूर्ण विकास नहीं हो पाया। अंग्रेजों ने 'याद आधारित ' प्रतियोगिता आरम्भ कर एक पुराने ढर्रे को ही आगे बढ़ाया। इससे साक्षरता का स्तर बढ़ नहीं पाया।
1951 में करीब 84% लोग निरक्षर थे तथा औरतों में तो सिर्फ 8.10 ही साक्षरता की दर थी। देश में स्वतंत्रता के बाद 13,590 माध्यमिक स्कूल तथा 7,288 हाई स्कूल थे।
अंग्रेजों ने वैज्ञानिक तथा तकनीकी शिक्षा के प्रसार को जानकर रोके रखा तथा शोषण को आगे बढ़ाया। 1947 में भारत में सिर्फ 7 इंजीनियर कॉलेज थे जिनमें सिर्फ 2500 छात्र ही पढ़ रहे थे।

7. उपनिवेशवाद तथा भारतीय लोकनीति

ऐसे तो इंडियन सिविल सर्विस में भारतीयों का चुना जाना 1919 के बाद से आरंभ हो गया परन्तु असली सत्ता का नियंत्रण ब्रिटिश के हाथ में होने से लोकनीति का निर्माण सामंतकारी ही रहा। अधिकतर नीतियां तो ब्रिटेन में ही बनती थी। ऐसे नीति निर्माण में योगदान देने वाले भारतीय अफसर भी अधिकतर अंग्रेजों के ही चमचे हुआ करते थे। इससे किसी लोक-कल्याणकारी नीति निर्माण का सपना देखना असंभव ही था। कोई सामाजिक-आर्थिक नीति जनता की भलाई के लिए लागू नहीं थी। जो भी नीतियां बनती थी वह जनता के शोषण के लिए ही थी तथा अंग्रेजों के काम के लिए ही थी। सही तौर पर देखा जाए तो लोकनीति का निर्माण होता तो था परन्तु वह अंग्रेजी जनता के कल्याण के लिए ।

8. उपनिवेशवाद तथा भारतीय जनता के स्वास्थ्य की समस्याएं

स्वास्थ्य का हाल तो इसी बात से लग सकता है कि 1943 ई० में देश में सिर्फ 10 मेडिकल कॉलेज थे तथा सिर्फ 1000 डॉक्टर थे। लगभग 7500 स्वास्थ्य कर्मचारी थे। 1951 में देखा गया तो 180000 डॉक्टर थे तथा अस्पतालों की
संख्या सिर्फ 1915 थी। इसके अलावा 6,589 डिसपेंसरी थी। अधिकतर भारतीय स्वास्थ्य सेवाओं से पूरी तरह वंचित थे परन्तु धनी लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा की सहुलियत थी।

9. औपनिवेशिक शासन तथा नागरिक अधिकार

औपनिवेशक सरकार ने वैसे तो नागरिक अधिकार को लागू कर रखा था परन्तु जन आंदोलनों के डर से इस पर बार-बार प्रतिबंध भी लगा दिया जाता था। 1900 ई० तक आते-आते प्रेस आजादी तथा बोलने की आजादी पर कई बार रोक लगाने की कोशिश की गई।
विधान मंडल में भारतीयों का प्रवेश आरम्भ हुआ परन्तु कोई शक्ति नहीं दी गई जिससे कि नागरिक को कोई लाभ मिल सके। 1919 में मात्र 3% ही मताधिकार का प्रयोग कर सकते थे। 1935 के बाद 15% ही इसका प्रयोग कर सकते थे। विभिन्न राष्ट्रवादियों ने नागरिक अधिकारों का प्रयोग उपनिवेशवाद का विरोध करने में किया तथा इसका प्रभाव भी बृहत् स्तर पर हुआ।
न्याय तंत्र की एक बात अच्छी थी कि नागरिकों से जाति और लिंग के आधार पर पक्षपात नहीं किया जाता था। परन्तु यूरोपीय तथा भारतीय इन दो स्तरों पर न्यायालयों का फैसला पक्षतापूर्ण हो जाता था।

10. निष्कर्ष

निष्कर्षतः हमें उपनिवेशवाद से जो स्वतंत्र भारत को मिला उसे निम्नांकित बिन्दुओं में प्रकाशित कर सकते है:
  1. गरीबी तथा अकाल 
  2. पिछड़ापन (आर्थिक) तथा दरिद्रता 
  3. भारतीय औद्योगिक तंत्र बर्बाद हो गया। 
  4. कृषि पर बोझ के बढ़ने से आय की दर कम हो गई। 
  5. धन का निष्कासन बृहत् मात्रा में हुआ। 
  6. भारतीय कर ढांचा का विनाश हो गया। 
  7. जनता का जीवन स्तर निम्नतम हो गया। 
  8. भारतीय प्रशासनिक तंत्र ब्रिटिश प्रभाव में चला गया। 
  9. भारतीय भाषा का विकास अवरुद्ध हो गया। 
  10. असमान क्षेत्रीय विकास के होने से अर्थव्यवस्था का विकास ठीक से नहीं हो पाया।
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Sun, 01 Oct 2023 06:06:54 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड : एक अवलोकन https://m.jaankarirakho.com/343 https://m.jaankarirakho.com/343 झारखण्ड : एक अवलोकन

1. झारखण्ड भारत का राज्य है
– 28वाँ
2. झारखण्ड राज्य की उपराजधानी है
– दुमका 
 
3. झारखण्ड राज्य का अक्षांशीय विस्तार है
– 2105810 से 25°1915"
4. झारखण्ड राज्य का देशान्तरीय विस्तार है
– 83°19' से 87°57 
5. उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर झारखण्ड राज्य का विस्तार है
– 380 किमी०
6. पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर झारखण्ड राज्य का विस्तार है
– 463 किमी० 
7. क्षेत्रफल की दृष्टि से झारखण्ड राज्य का भारत में स्थान है
– 15वाँ
8. झारखण्ड राज्य का क्षेत्रफल है
 - 79,714 वर्ग किमी०
9. झारखण्ड राज्य का कुल क्षेत्रफल भारत के कुल क्षेत्रफल का प्रतिशत है
– 2.42%
10. झारखण्ड राज्य में अभी तक कुल कितने व्यक्ति मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुए
– 06
11. झारखण्ड उच्च न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश हैं.
– न्या. (डॉ.) रवि रंजन
12. झारखण्ड में कितने जिले हैं
–24
13. झारखण्ड राज्य में कुल कितनी संसदीय सीटें है,
–20
14. लोकसभा में झारखण्ड को कुल कितनी सीटें प्राप्त हैं
–14
15. झारखण्ड राज्य में कुल प्रखण्डों की संख्या है
–263
16. झारखण्ड राज्य में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लम्बाई है
– 3367 किमी०
17. झारखण्ड राज्य निर्माण के समय राज्य में कुल जिलों की संख्या थी
–18
18. झारखण्ड राज्य के किस प्रमण्डल में सर्वाधिक जिले हैं
– उत्तरी छोटानागपुर
19. झारखण्ड राज्य का सबसे बड़ा संसदीय क्षेत्र है
– पश्चिमी सिंहभूम
20. झारखण्ड राज्य का सबसे छोटा संसदीय क्षेत्र है
– चतरा
21. झारखण्ड राज्य में निवास करने वाली कुल अनुसूचित जनजातियों की संख्या है
–32
22. झारखण्ड राज्य का राजकीय पक्षी है
– कोयल
23. झारखण्ड राज्य का राजकीय पशु है
–हाथी
 
24. झारखण्ड राज्य का राजकीय वृक्ष है
–साल
25. झारखण्ड का राजकीय फूल कौन-सा है
–पलाश
26. झारखण्ड राज्य का उच्च न्यायालय कहाँ स्थित है
–राँची
27. झारखण्ड राज्य के गठन के बाद कितने नये जिलों का गठन किया गया है 
–06
28. झारखण्ड राज्य के नये लोगो (Logo) में कितने हाथी को दर्शाया गया है
–24
29. झारखण्ड राज्य की कुल जनसंख्या है
–3,29,88,134
30. जनसंख्या की दृष्टि से झारखण्ड का भारत में स्थान है
–14वाँ
31. झारखण्ड की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का कितना प्रतिशत है
–2.72%
32. झारखण्ड राज्य की कुल जनसंख्या में महिलाओं का प्रतिशत है
–48.68%
33. राज्य की कुल जनसंख्या में अनुसूचित जाति का प्रतिशत लगभग है
–26%
34. झारखण्ड राज्य का सर्वाधिक जनसंख्या वाला जिला है
–राँची
35. झारखण्ड राज्य का न्यूनतम जनसंख्या वाला जिला है
- लोहरदगा
36. राज्य में 2001-11 के दौरान दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर अंकित किया गया है
–22.42%
37. झारखण्ड राज्य का जनसंख्या घनत्व है
–414
38. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला जिला है
–धनबाद
39. झारखण्ड राज्य में न्यूनतम जनसंख्या घनत्व वाला जिला है
–सिमडेगा
40. झारखण्ड राज्य में लिंगानुपात है
–949
41. राज्य में सर्वाधिक लिंगानुपात वाला जिला है 
–पश्चिमी सिंहभूम
42. राज्य में न्यूनतम लिंगानुपात वाला जिला है 
–धनबाद
43. झारखण्ड राज्य में ग्रामीण लिंगानुपात है 
–961
44. झारखण्ड राज्य में शहरी लिंगानुपात है 
–910
45. झारखण्ड राज्य में शिशु लिंगानुपात है
–948
46. जनगणना 2011 के अनुसार झारखण्ड की साक्षरता दर है 
–66.40%
47. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक साक्षरता दर वाला जिला है
- राँची 
48. झारखण्ड राज्य में न्यूनतम साक्षरता दर वाला जिला है
–पाकुड़
49. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक महिला साक्षरता दर वाला जिला है
- राँची
50. राज्य में न्यूनतम महिला साक्षरता दर वाला जिला है
–पाकुड़
51. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक अनुसूचित जनजाति किस जिले में निवास करते हैं 
- राँची
52. झारखण्ड राज्य में न्यूनतम अनुसूचित जनजाति किस जिले में निवास करते हैं 
–कोडरमा
53. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक अनुसूचित जाति किस जिले में निवास करते हैं 
–पलामू
54. झारखण्ड राज्य में न्यूनतम अनुसूचित जाति किस जिले में निवास करते हैं 
- लोहरदगा 
55. निम्नलिखित में से कौन-सा एक झारखण्ड की उपराजधानी है
- दुमका
56. झारखण्ड राज्य किस तिथि को एक अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया 
–15 नवंबर, 2000
57. झारखण्ड में गाँवों की कुल संख्या कितनी है
–32620
58. 2011 की जनगणना के अनुसार झारखण्ड की पुरूष साक्षरता दर क्या है 
–76.84%
59. कौन - सा शहर 'झारखण्ड की सांस्कृतिक राजधानी' के रूप में जाना जाता है
– देवघर  
60. झारखण्ड की पहली राजभाषा कौन-सी है
–हिन्दी
61. भारत के राज्यों के संबंध में झारखण्ड का स्थान क्या है
- 28वां
> झारखण्ड का इतिहास
1. तुजुक-ए-जहाँगीरी में झारखण्ड के लिए किस शब्द का प्रयोग किया गया है 
–खोखरा
2. झारखण्ड प्रदेश का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है 
– ऐतरेय ब्राह्मण में
3. महाभारत में झारखण्ड को किस नाम से जाना जाता था 
–पुंडरीक
4. कौटिल्य के अर्थशास्त्र में झारखण्ड प्रदेश को संबोधित किया गया है 
–कुकुट
5. झारखण्ड राज्य की प्राचीनतम जनजाति है 
–असुर
6. कांस्ययुगीन औजारों का प्रारंभकर्ता किस जनजाति को माना जाता है
–असुर
7. झारखण्ड राज्य के बेनूसागर (सिंहभूम) नामक स्थान से प्राप्त हुआ है
–जैन मूर्तियाँ
8. पारसनाथ की पहाड़ी स्थित है
–गिरिडीह
9. पारसनाथ पहाड़ी की ऊंचाई कितनी है
–4480 फुट
10. पारसनाथ की पहाड़ी किस धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है
–जैन
11. सूर्यकुण्ड अवस्थित है
–हजारीबाग में
12. प्राचीन काल का वह प्रथम शासक जिसकी राजधानी झारखण्ड क्षेत्र में अवस्थित थी
– शशांक
13. शशांककालीन वेणुसागर मंदिर किस देवता से संबंधित है
- शिव
14. छोटानागपुर पर शासन करने वाले नागवंशी शासकों में निम्न में से कौन शामिल नहीं था 
– विक्रमकर्ण
15. किसे ‘झारखण्डी सुल्तान' के नाम से जाना जाता है
 - आदिलशाह द्वितीय
16. झारखण्ड राज्य का कौन सा क्षेत्र मुस्लिम आक्रमण से लगभग अप्रभावित रहा
–धनबाद
17. नागवंशी राज्य की स्थापना किसने की
–फणी मुकुट राय
18. 'बरवा की लड़ाई' में सरगुजा के रक्सेल राजा को किसने पराजित किया था
–भीम कर्ण
19. नागवंशी राज्य की प्रथम राजधानी कहाँ थी
- सुतियांबे
20. झारखण्ड राज्य का प्रसिद्ध 'भूमिज स्वराज्य आंदोलन ' किस वंश के शासनकाल में हुआ 
–मान वंश
21. पलामू के चेरो वंश की स्थापना किसने की
–भागवत राय
22. झारखण्ड राज्य में 1857 ई० का विद्रोह किस स्थान से प्रारंभ हुआ
–रोहिणी गाँव
23. 1857 ई० के विद्रोह के समय रामगढ़ बटालियन का मुख्यालय कहाँ था
–राँची
24. 1857 के विद्रोह के दौरान झारखण्ड में 'मुक्तवाहिनी सेना' की स्थापना किसने की
- विश्वनाथ शाहदेव
25. असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गाँधी के नेतृत्व में झारखण्ड में विदेशी कपड़ों की होली कहाँ जलाई गयी
–राँची में
26. सन् 1929 में किसकी अध्यक्षता में झरिया में भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया
–जवाहर लाल नेहरू
27. राँची में अंजुमन इस्लामिया की स्थापना किसने की
–अबुल कलाम आजाद
28. कांग्रेस का एकमात्र अधिवेशन झारखण्ड के किस स्थान पर आयोजित किया गया
–रामगढ़
29. झारखण्ड में 1940 में आयोजित कांग्रेस के 53वें अधिवेशन की अध्यक्षता किसने की
–अबुल कलाम आजाद
30. झारखण्ड राज्य में अंग्रेजो के विरूद्ध किया गया प्रथम विद्रोह था
–ढाल विद्रोह
31. चेरो विद्रोह का दमन किस अंग्रेज अधिकारी ने किया
–कर्नल जोंस
32. तिलका आंदोलन में प्रचार-प्रसार हेतु प्रयोग किया गया
–साल के पत्ते का
33. ‘मुण्डा उलगुलान' को किसने नेतृत्व प्रदान किया
–बिरसा मुण्डा
34. निम्नांकित में से कौन मुण्डा विद्रोह का नेता था
–बिरसा मुण्डा
35. वर्ष 1857 की क्रान्ति में सम्पूर्ण सिंहभूम क्षेत्र में क्रांतिकारियों के प्रमुख नेता कौन थे
–राजा अर्जुन सिंह
36. 'छोटानागपुर टिन्योर्स एक्ट' कब लागू किया गया
- 1969
37. 1881 ई० की जनगणना के खिलाफ किसने खरवार आंदोलन के दूसरे चरण का नेतृत्व किया
–दुविधा गोंसाई
38. साफाहोड़ आंदोलन को किसने नेतृत्व प्रदान किया
–लाल हेम्ब्रम 
39. टाना भगत आंदोलन किसके नेतृत्व में संचालित किया गया 
–जतरा भगत
40. टाना भगत आंदोलन की शुरूआत कब हुई थी
–अप्रैल, 1914
41. संथाल आंदोलन का नेता कौन था
–सिद्धो-कान्हो
42. भूमिज विद्रोह को किसने नेतृत्व प्रदान किया
–गंगा नारायण
43. कोल विद्रोह किसके नेतृत्व में संचालित किया गया
–सिंगराई मानकी
44. सथाल विद्रोह कब हुआ था
–1855-56 में
45. झारखण्ड के प्रथम इसाई मिशन 'गॉस्नर मिशन' की स्थापना किस देश के इसाई दल द्वारा की गई
–जर्मनी
46. किस व्यक्ति को ‘संथालों का देवदूत' नाम से जाना जाता है
- डॉ० एण्डू कैम्पबेल
47. खरवार आंदोलन कब हुआ
– 1874
48. निम्न में से किसे झारखण्ड आंदोलन का जनक माना जाता है
–जे. बार्थोलमन
49. झारखण्ड का प्रथम अंतर्जातीय आदिवासी संगठन है
–छोटानागपुर उन्नति समाज 
50. जुएल लकड़ा का संबंध है
–छोटानागपुर उन्नति समाज से
51. जयपाल सिंह मुण्डा द्वारा गठित 'झारखण्ड पार्टी' नामक संगठन को पूर्व में किस नाम से जाना जाता था
–आदिवासी महासभा
52. 'झारखण्ड पार्टी' के संस्थापक थे
–जयपाल सिंह
53. 1952 के बिहार विधान सभा चुनाव में झारखण्ड पार्टी का चुनाव चिह्न निम्न में से था
–मुर्गा
54. झारखण्ड मुक्ति मोर्चा नामक पार्टी के प्रथम अध्यक्ष थे
–विनोद बिहारी महता
55. झारखण्ड आंदोलन में शामिल विभिन्न दलों को एकजूट करने के उद्देश्य.से 'झारखण्ड समन्वय समिति' का गठन किया गया 
–1987 में
56. झारखण्ड क्षेत्र स्वायत्त परिषद् का गठन कब हुआ
–9 अगस्त, 1995
57. झारखण्ड क्षेत्र स्वशासी परिषद् का अध्यक्ष कौन था
- शिबू सोरेन
58. झारखण्ड क्षेत्र स्वशासी परिषद् का उपाध्यक्ष कौन था
- सूरज मंडल
59. झारखण्ड राज्य गठन हेतु संसद से पारित बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक, 2000 पर किसने अपना हस्ताक्षर कर उसे स्वीकृति प्रदान की 
–के. आर. नारायणन
60. किस तिथि को बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक, 2000 पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर किया गया, जिसके बाद झारखण्ड राज्य के गठन का मार्ग प्रशस्त हो गया
–25 अगस्त, 2000
61. झारखण्ड राज्य गठन के समय देश के प्रधानमंत्री कौन थे
–अटल बिहारी बाजपेयी
62. झारखण्ड राज्य गठन के समय बिहार का मुख्यमंत्री कौन था
–राबड़ी देवी
63. राँची में कैथोलिक गिरजाघर की स्थापना कब हुई थी
–1909
64. संविधान सभा में छोटानागपुर के इनमें से कौन-से आदिवासी नेता सदस्य थे
–जयपाल सिंह
65. संथाल परगना क्षेत्र को अति प्राचीन काल में क्या कहा जाता था
–नरीखंड
66. साफाहोड़ आंदोलन किस आदिवासी समुदाय से संबंधित है
–संथाल
67. झारखण्ड के स्वतंत्रता सेनानियों में से प्रथम शहीद होने का गौरव किस सेनानी को प्राप्त है 
– तिलका माँझी
68. स्वतंत्रता सेनानी पोटो सरदार था
 -  मुण्डा 
69. 1954 के छोटानागपुर संयुक्त संघ का अध्यक्ष कौन था
–सुखदेव महतो
70. नागवंशी शासक राजा दुर्जन शाल ने 1628 में मुगल सम्राट जहाँगीर को वार्षिक कर देना स्वीकार किया था। वार्षिक कर की राशि थी
–6000 रूपये
71. किस वर्ष संथाल परगना के 18 जिलों और छोटानागपुर को मिलाकर झारखण्ड क्षेत्र स्वायत्त परिषद् का गठन किया गया था
–1995
72. किस वर्ष एक अलग झारखण्ड की माँग के लिए एक ज्ञापन साइमन कमीशन के समक्ष प्रस्तुत किया गया था
–1928
73. सन् 1855 में किन दो भाइयों के नेतृत्व में संथाल विद्रोह फूट पड़ा
- सिद्धु और कान्हु
74. 1771 में संथाल जनजातीय क्षेत्र में किसने जमींदारों और ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध प्रथम विद्रोह का नेतृत्व किया था
–तिलका माँझी
75. झारखण्ड की जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए किस वर्ष छोटानागपुर उन्नति समाज का आरंभ हुआ था
–1915
76. रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन कब आयोजित किया गया था
–1940
77. किसके नेतृत्व में 1874 के खेरवार आंदोलन ने जोर पकड़ा 
–भागीरथ माँझी
78. कौन- सा आंदोलन 1874 में झारखण्ड में फूटा था
–खरवार आंदोलन
79. ताना भगत आंदोलन कब हुआ
–1913-14
80. ताना भगत आंदोलन किसने शुरू किया था
–जतरा उराँव
81. उलगुलान आंदोलन किसके नेतृत्व में आरंभ हुआ था
- बिरसा मुण्डा
82. 1857 में झारखण्ड में किस स्थान पर विद्रोह भड़का था
–हजारीबाग
83. झारखण्ड के निम्नलिखित में से किन्हानें 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी
–शेख भिखारी
84. अंग्रेजों के विरूद्ध सबसे लंबा, बृहत्तम और सबसे खूनी आदिवासी विद्रोह कौन-सा है
–तमाड़ विद्रोह
85. मानभूम का भूमिज विद्रोह कब हुआ
–1855-60
86. सरकार द्वारा झारखण्ड क्षेत्र स्वशासी परिषद् (JAAC) कब बनाई गयी
–1995
87. 1874 में खेरवार आंदोलन ने किसके नेतृत्व में प्रसिद्धि पायी
–भागीरथ माँझी
88. वर्ष 1948 में झारखण्ड में निम्नलिखित में से किस क्षेत्रीय पार्टी का गठन किया गया
–यूनाइटेड झारखण्ड पार्टी
89. जहाँगीर के अधीन बिहार के गर्वनर इब्राहिम खाँ के छोटानागपुर के किस राजा को पराजित किया था
–राजा दुर्जन शाल
90. 500 ई.पू. के दौरान झारखण्ड राज्य का उत्तरी भाग निम्नलिखित में से किस महाजनपद के अधीन था
–मगध
91. 1931 में ठेबले उराँव द्वारा कौन-सा एक संगठन शुरू किया गया
–किसान सभा
92. पलामू में 1819-20 का मुण्डा विद्रोह कौन-से नेता के नेतृत्व में लड़ा गया था 
–भूखन सिंह
93. राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए किस वर्ष छोटानागपुर उन्नति समाज और किसान सभा का विलय हुआ
–1935
94. सोनोत संथाल समाज की स्थापना निम्नलिखित में से किस राजनीतिक नेता द्वारा की गई थी 
- शिबू सोरेन
95. किस जिले में राजमहल शहर अवस्थित है जिसे अकबर ने बनवाया था 
–साहेबगंज
96. मुक्ति आंदोलन या हूल जैसा संथाली में जाना जाता है, इसे कि आदिवासी नेता द्वारा शुरू किया गया था
–मुर्मू बंधु
97. बिरसा मुण्डा की मृत्यु कब हुई थी
–9 जून, 1900
98. अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह में 13 जनवरी, 1784 को तिलका ने अपने तीरों से किसे मारा था
–आगस्तस क्लिवलैंड
99. किसके नेतृत्व में 1780-85 के दौरान संचालित जनजातीय विद्रोह ने भागलपुर ब्रिटिश सेना प्रमुख को चोटिल करने और उसे फांसी देने में सफलता प्राप्त कर ली थी
–तिलका माँझी
100. किस आयोग ने उस ज्ञापन को प्रस्तुत किया था, जिसमें अलग झारखण्ड राज्य के गठन की मांग की गई थी
- साइमन आयोग
101. कौन-सा आंदोलन अपने शुरूआती चरण में कुरूख धरम के नाम से जाना गया (यथाशब्द कुरुख था उराँव का मूल धर्म)
–ताना भगत आंदोलन
102. निम्नलिखित में से कौन खेरवार विद्रोह के नेताओं में से एक है
–भागीरथ
103. बिरसा के नेतृत्व में शुरू उलगुलान का क्या मतलब है 
–विद्रोह
104. इनमें से कौन 1857 के विद्रोह के साथ जुड़ा हुआ है
–शेख भिखारी
105. चेरो विद्रोह कब हुआ था
–1800-18
106. भूमिज विद्रोह के नेता कौन थे
–गंगा नारायण सिंह
107. सिद्धु-कान्हू किस विद्रोह से संबद्ध थे
–संथाल विद्रोह
108. किस वर्ष में भारतीय संसद में झारखण्ड को अलग राज्य के रूप में बिहार पुनर्गठन.का विधेयक पारित किया था
- 2000
109. राजा जय सिंह जिन्होनें खुद को 13वीं सदी में झारखण्ड का शासक घोषित कर दिया था, किस राज्य के थे
–उड़ीसा
> झारखण्ड में विभिन्न शासन व्यवस्थाएँ
1. मुण्डाओं के ग्राम पंचायत को क्या कहा जाता है
–हातू
2. पड़हा पंचायत स्थल को क्या कहा जाता है
–अखरा
3. पड़हा पंचायत के प्रधान को क्या कहते हैं
–मानकी
4. मुण्डा गाँव के धार्मिक प्रधान को क्या कहा जाता है
–पाहन
5. मुण्डा जनजाति की शासन व्यवस्था में सर्वोच्च पद है
–मुण्डा
6. मुण्डा जनजाति में पाहन को दी जाने वाली लगान मुक्त भूमि को क्या कहा जाता है
–डाली कटारी
7. मुण्डा जनजाति में गाँव का सांस्कृतिक केन्द्र होता है
–अखरा
8. मुण्डा जनजाति में गाँव को भूत-प्रेत से बचाने हेतु पाहन द्वारा की जानेवाली पूजा-पाठ के बदले उसे दी जाने वाली भूमि को क्या कहा जाता है
–भूतखेता
9. नागवंशी शासन व्यवस्था के प्रथम शासक कौन थे
–फणी मुकुट राय
10. नागवंशी राजाओं द्वारा मुगल शासकों को दिए जाने वाले कर ( नजराना) को क्या कहा जाता था
–मालगुजारी
11. मानकी लोगों को नागवंशी शासकों द्वारा किस नाम से जाना जाता था 
–भुईंहर
12. पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था का संबंध किस जनजाति समुदाय से है 
–उराँव
13. उराँव जनजाति में ग्राम प्रधान को क्या कहा जाता है
–महतो
14. उराँव जनजाति में महतो का सहयोगी क्या कहलाता है
–माँझी
15. पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था में दो या अधिक गाँवों के बीच के विवादों का समाधान कौन करता है
–पड़हा
16. पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था में जिस मामले का निपटारा ग्राम के स्तर पर नहीं होता है, वह किसे हस्तांतरित किया जाता है
–पड़हा दीवान
17. पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था में निम्न में से कौन सर्वोच्च न्यायालय की तरह कार्य करता है
–पड़हा दीवान
18. पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था में गाँव के धार्मिक कार्यों का संपादन कौन कराता है 
–पाहन
19. पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था में पाहन को दी जाने वाली भूमि को क्या कहा जाता है 
–पहनई भूमि
20. माँझी परगना शासन व्यवस्था में ग्राम पंचायत का प्रधान क्या कहलाता है 
–माँझी
21. माँझी के कार्यों के सफल संचालन में कौन उसे सहयोग प्रदान करता है
- गुड़ैत
22. जोगमाँझी की अनुपस्थिति में उसके दायित्वों का निर्वहन कौन करता है
–प्रानीक
23. माँझी के सचिव के रूप में कौन कार्य करता है
–प्रामाणिक
24. माँझी परगना शासन में गाँव के प्रहरी के रूप में कार्य करता है
–लासेर टांगाय
25. माँझी परगना शासन व्यवस्था में कौन पुलिस की भांति कार्य करता है
–चौकीदार
26. माँझी परगना शासन व्यवस्था में यौन अपराधों के लिए दी जाने वाली सजा क्या है
- बिटलाहा
27. बिटलाहा के तहत दोषी को किस प्रकार की सजा दी जाती है
–गाँव से बहिष्कार
28. माँझी परगना शासन व्यवस्था में सबसे हल्की सजा क्या है
–करेला दण्ड
29. माँझी परगना शासन में गाँव का धार्मिक प्रधान क्या कहलाता है
–नायके
30. माँझी परगना शासन व्यवस्था में निम्न में से किसे भूमि प्रदान नहीं की जाती है
–भग्दो प्रजा
31. हो जनजाति की पारंपरिक शासन व्यवस्था को किस नाम से जाना जाता है
–मुण्डा मानकी
32. निम्न में किस शासन व्यवस्था को भारत की प्रथम गणतांत्रिक व्यवस्था के रूप में जाना जाता है 
–मुण्डा-मानकी
33. मुण्डा मानकी शासन व्यवस्था में गाँव के प्रधान मुण्डा का सहयोगी कौन होता है
- डाकुआ
34. मुण्डा मानकी शासन व्यवस्था में गाँव का धार्मिक प्रधान क्या कहलाता है
–दिउरी
35. ढोकलो सोहोर शासन व्यवस्था का संबंध किस जनजाति समुदाय से है
–खड़िया
36. ढोकलो का शाब्दिक अर्थ क्या होता है
–बैठक
37. खड़िया समाज द्वारा 'अखिल भारतीय महासभा' का गठन कब किया गया था
–1934-35
38. निम्न में से कौन-एक खड़िया जनजाति की प्रकार नहीं है
–टांगे खड़िया
39. खड़िया जनजाति में गाँव के मुखिया को कहते हैं
–प्रधान
40. खड़िया शासन व्यवस्था में शासन संचालन में प्रमुख भूमिका निभाता है
–करटाहा
41. पहाड़ी खड़िया गाँव के प्रधान को क्या कहा जाता है
–डंडिया
42. पहाड़ी खड़िया गाँव के धार्मिक प्रधान को क्या कहा जाता है
- दिहुरी
43. ढोकलो सोहोर महासमिति समर्थन किया था
–जाति प्रथा का
44. जिसने जंगल को साफ किया और खेती के लिए तैयार किया उस परिवार को क्या कहते हैं 
–भुईहारस
45. ग्रामीण शासकी व्यवस्था में बैगा का कार्य है
–पूजा-पाठ
46. प्रारंभिक काल में मुण्डा जनजाति के भुईहरी पड़हा के अधिकारी थे
–कुवर, कार्तो, लाल
47. प्रारंभिक काल में महतो के कार्यभार से पहले उराँव ग्रामों का पुरोहिती एवं लौकिक प्रधान कौन था
–बैगा
48. संथालों के सामुदायिक व्यवस्था में माँझी का उपप्रधान कौन था
–प्रानीक
49. मुण्डा-मानकी व्यवस्था को किस अंग्रेज पदाधिकारी ने मंजूरी दी थी
–थॉमस विल्किंसन
50. किस जनजाति की संगठित शासन व्यवस्था नहीं है
लोहार
51. भूमिज जनजाति की शासन व्यवस्था के संबंध भाई के नहीं होने पर पिता की संपत्ति का अधिकार होता है
- पुत्री
52. करमाली जनजाति की जातीय पंचायत का प्रधान क्या कहलाता है
–मालिक
53. परहिया जनजाति की जाति पंचायत को किस नाम से जाना जाता है
–भैयारी व जातिगोठ
54. कोरवा जनजाति में 'भात - भीतर' प्रथा क्या है
–समाज बहिष्कृत सदस्य को पुनः अपनाना
55. बिरहोर जनजाति के लोग विभिन्न शिकार समूहों में बंटे होते हैं, जिसे कहा जाता है
- टंडा
56. बिरहोर जनजाति का सर्वोच्च संगठन है
- टंडा
57. किस जनजाति में गाँव के प्रधान को 'गौटिया' कहा जाता था तथा वर्तमान समय में यह पद विद्यमान नहीं है
–खोंड
58. बथुड़ी जनजाति की परंपरागत पंचायत व्यवस्था का प्रधान क्या कहलाता है
–दोहर
59. 'मादी' तथा 'गद्दी' नामक पद किस जनजाति की शासन व्यवस्था में पायी जाती है 
–बिंझिया
60. बेदिया जनजाति में कई गाँवों को आपस में मिलाकर अंतग्रमीण पंचायत का गठन किया जाता है, इसके मुखिया को किस नाम से जाना जाता है
–सरकार
63. खरवार जनजाति में चार गाँवों की पंचायत को कहा जाता है
–चट्टी
> झारखण्ड के भूमि संबंधी कानून
1. सन् 1862 में किसके नेतृत्व में भुईहरी भूमि तथा मझियस भूमि को चिन्हित करने हेतु भुईहरी सर्वे प्रारंभ किया गया था
बाबू राखलदास हलधर
2. छोटानागपुर भूस्वामी एवं काश्तकारी प्रक्रिया अधिनियम कब पारित हुआ
–1897
3. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम कब पारित किया गया
–1908
4. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम को कब लागू किया गया
–11 नवंबर, 1908
5. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम का खाका किसने तैयार किया था
–जॉन एच. हॉफमैन
6. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम कुल कितने अध्यायों में विभाजित है 
–19
7. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम में कुल कितनी धाराएँ हैं
- 271
8. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम का एक प्रमुख उद्देश्य है
–भूमि संबंधी विवादों का निपटारा
9. सीएनटी एक्ट के तहत् ऐसी जंगली भूमि जिसे भूस्वामी के अतिरिक्त किसी अन्य कृषक द्वारा तैयार की गयी हो, क्या कहलाता है
–कोरकर
10. वैसी भूधृत्ति, जिसे परिवार के पुरुष वारिस न हाने पर, रैयत के निधन के बाद पुनः भूस्वामी को वापस कर दिया जाता है, उसे कहते हैं
- पुनर्ग्राह्य भूधृत्ति
11. बंगाल, बिहार और उड़ीसा में अंग्रेजी सरकार द्वारा कब स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया 
–1793
12. अनधिभोगी रैयत है
– रैयत का एक प्रकार
13. वह व्यक्ति जो किसी व्यक्ति की जमीन खेती कार्य हेतु धारण करता है तथा उसका लगान चुकाता है, उसे सीएनटी एक्ट के तहत क्या कहा जाता है
–भूधारक
14. वह मुण्डारी जिसने जंगली भूमि के किसी हिस्से को जोत में लाने हेतु भूमि का अधिकार अर्जित किया हो, उसे सीएनटी एक्ट के तहत क्या कहा जाता है
- मुण्डारी खूँटकट्टीदार
15. छोटानागपुर भूधृत्ति अधिनियम, 1869 के तहत तैयार रजिस्टर में शामिल भूमि को कितने वर्षों तक धारण करने पर भुईहर को स्थायी बंदोबस्त समझा जाएगा
–12 वर्ष
16. सीएनटी एक्ट की किस धारा के तहत सिंहभूम जिले के सरायकेला और खरसावां अनुमंडल में रैयत द्वारा फलों के उद्यान, खलिहान और खाद गड्ढा के रूप में प्रयुक्त जोत के लिए कोई लगान का भुगतान नहीं किया जाएगा
– धारा-24
17. सीएनटी एक्ट की किस धारा में रैयत के जोत के लगान में कमी के संबंध में प्रावधान किया गया है
– धारा-33क
18. संथाल परगना अधिनियम, 1949 की किस धारा के तहत जमीन, जो किसी भी रूप में दर्ज नहीं किया गया है वो मूल रैयत का जोत (निजी जोत) या मूल रैयती जोत (अधिकृत जोत) माना जाएगा
–10
19. संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की धारा 33 के अंतर्गत कोई भी बंजर भूमि का बन्दोबस्ती रद्द करने के योग्य है, अगर उसमें ............ वर्ष तक कृषि न किया गया हो 
–5 वर्ष
20. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1869 के अंतर्गत पद 'भुईहरी रैयती' की परिभाषा में सम्मिलित किया गया है
–मुंडा को
21. संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 के तहत, खास गांव के तात्पर्य एक ऐसे गांव से है जहां  - 
–न तो मूल रैयत और न ही मुख्यिा हो
22. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की किस धारा के तहत अनुसूचित जनजाति / पिछड़ा वर्ग / अनुसूचित जाति भूमि के हस्तांतरण पर प्रतिबंध प्रदान की गई है 
–46
23. धारा 46 के तहत बेदखली के समय, वर्ष है, जिसके तहत इस अवधि के समाप्ति के बाद प्रतिकूल कब्जे में रही भूमि का हस्तांतरण परिपूर्ण होगा 
–12
24. 'हिल एसेंबली प्लान' किसके द्वारा आदिवासी उन्नति के लिए किया गया था 
–क्लीवलैंड
25. संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 के तहत गांव के मुखिया का पद 
–अस्तांतरणीय है
26. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की धारा 37 के तहत किसी खूँटकट्टी अधिकार प्राप्त रैयत ............. वर्षों से अधिक की काश्तकारी सृजित की गई हो, तो भूमि का लगान नहीं बढ़ाया जाएगा
–20
27. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की धारा 46 के तहत किसी रैयत द्वारा अधिकतम कितनी अवधि के लिए अपनी जोत या उसके किसी भाग का अंतरण किया जा सकता है 
–5 वर्ष
28. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की धारा 46 के तहत कोई रैयत ......... वर्षो से कम किसी अवधि के लिए अपनी जोत या उसके किसी भाग को भुगतबंध बंधक कर सकता है 
–15
29. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की किस धारा के तहत किसी न्यायालय  द्वारा किसी रैयत के जोत के विक्रय हेतु कोई आदेश पारित नहीं किया जाएगा
–47
30. छोटानागपुर काश्ताकरी अधिनियम, 1908 की धारा 53 के तहत निम्न में से किस रीति से लगान का भुगतान किया जाएगा 
–माल कचहरी में या डाक मुद्रादेश द्वारा
31. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की धारा 58 के तहत बकाया लगान पर अधिकतम कितने प्रतिशत वार्षिक की दर से साधारण ब्याज प्रभारित किया जा सकता है 
–6.25%
32. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की किस धारा के तहत किसी भूस्वामी द्वारा काश्तकार से लगान के अतिरिक्त अवैध रकम वसूलने पर दण्ड का प्रावधान किया गया है
–धारा 63
33. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की किस धारा के तहत राज्य सरकार की किसी बंजर भूमि को बंदोबस्त किया जा सकता है 
–63क
34. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 के तहत कोड़कर का क्या तात्पर्य है 
–कोड़कर तैयार की गई भूमि
35. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की किस धारा के अंतर्गत उपायुक्त के आदेश से भूमि को कोड़कर में परिवर्तन किया जा सकता है 
 –धारा 64
26. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की धारा 67क के तहत कोड़कर में परिवर्तित किसी भूमि पर कितने वर्षो तक लगान देय नहीं होगा
–4 वर्ष
27. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की किस धारा के तहत राज्य सरकार भूस्वामी, कश्तकारों या अन्य व्यक्तियों के बीच जल के उपयोग या बहाव से संबंधित विवादों का समाधान करने तथा उसका सर्वेक्षण करने का आदेश राजस्व अधिकारी को दे सकती है
–धारा 82
28. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनिमय, 1908 की किस धारा में भूस्वामी की विशेषाधिकारयुक्त भूमि की परिभाषा दी गई है
–धारा 118
29. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनिमय, 1908 की किस धारा के तहत किस मुण्डारी.खूँटकट्टीदारी काश्ताकारी अंतरण को प्रतिबंधित किया गया है 
–धारा 240
30. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 एक जिले में लागू नहीं होता है 
–राँची
31. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की धारा 5 के तहत किसी खास ग्राम के ग्राम प्रधान की
नियुक्ति किसके द्वारा की जाएगी
–उपायुक्त द्वारा
32. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 के तहत किस खास ग्राम के ग्राम प्रधान की नियुक्ति हेतु गाँव के कितने रैयतों की सहमति आवश्यक है
–दो-तिहाई
33. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की किस धारा के अंतर्गत रैयतों के वर्ग का निर्धारण किया गया है
–धारा 12
34. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की किस धारा के तहत किसी रैयत को अपने घरेलू या कृषि संबंधी प्रयोजनों के लिए अपने जोत में बिना किसी प्रभार के ईट व खपड़े बनाने का अधिकार होगा
–धारा 15
35. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की किस धारा के तहत किसी रैयत को अपने निजी जोत पर वृक्ष लगाने, उसे काटने तथा उसका उपयोग करने का अधिकार होगा
–धारा 17
36. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की किस धारा के तहत रैयती भूमि का विनिमय किया जा सकता है
–धारा 20
37. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की किस धारा के तहत किसी बंजर भूमि की बन्दोबस्ती किये जाने का प्रावधान किया गया है
–धारा 27
38. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की किस धारा 33 के तहत कितने वर्षों के बंदोबस्त बंजर भूमि को आबाद नहीं किये जाने पर बंदोबस्त रद्द की जा सकती है
–5 वर्ष
39. संताल परगना काश्तकारी अधिनियम, 1949 की किस धारा के तहत किसी पहाड़िया गाँव में बंजर भूमि का बंदोबस्त गैर पहाड़िया के साथ नहीं किया जा सकता है
–धारा 41
40. पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 कब पारित किया गया
–1996
41. ब्रिटिश सरकार ने किस वर्ष छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम पेश किया था 
–1908
42. झारखण्ड पंचायती राज अधिनियम, 2001 को पंचायत राज में महिलाओं के लिए आरक्षण की कितनी प्रतिशत प्रदान करने के लिए संशोधन किया गया था
- 50 %
43. छोटानागपुर में विल्किंसन कानून कब लागू हुआ
–1834
> झारखण्ड की प्रमुख नीतियाँ
1. झारखण्ड सरकार की नयी औद्योगिक नीति (2016) ने ग्रामीण विद्युतीकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए विद्युतीकरण का लक्ष्य तय किया है
–100% विद्युतीकरण 2017 तक
2. झारखण्ड सरकार की 2016 औद्योगिक नीति के लागू रहने की अवधि है
–5 वर्ष
3. नई औद्योगिक नीति (2016) के अंतर्गत सीमेंट क्षेत्र में बृहत परियोजना के लिए न्यूनतम पूंजी निवेश की आवश्यकता है
–300 करोड़
4. 2008 की विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के अनुसार राज्य स्तरीय विस्थापन एवं पुनर्वास परिषद् की बैठक कम से कम ...... वर्ष में होगी
–दो बार
5. पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप परियोजना के लिये जमीन के अधिग्रहण के वास्ते किने प्रतिशत 
लोगों की स्वेच्छा का प्रावधान, पुनर्वास एवं विस्थापन अधिनियम, 2013 के तहत किया गया है
- 70%
6. झारखण्ड सिंगल विंडो क्लेयरेंस कानून लागू हुआ था सन्
–2015 में
7. निम्न में से किस नीति के तहत झारखण्ड सरकार ने राज्य में 'मोमेंटम झारखण्ड' नामक गतिविधि का आयोजन किया
–औद्योगिक नीति, 2012
8. निम्न में से किस नीति के अंतर्गत सरकार द्वारा जिला स्तर पर 'भूमि बैंक' का निर्माण करना सुनिश्चित किया जा रहा है
–औद्योगिक
9. राज्य की औद्योगिक नीति के तहत राज्य में उद्योगों को प्रोत्साहन देने हेतु विभिन्न तकनीकी संस्थानों, पॉलिटेकनिक कॉलेजों, अभियंत्रण कॉलेजों आदि की स्थापना का प्रयास किया जा रहा है। इन संस्थानों में राज्य के निवासियों हेतु कितनी प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान इस नीति के तहत किया गया है 
–25%
10. झारखण्ड में औद्योगिक नीति के तहत सरकार 'आर्थिक क्षेत्र' का गठन करना चाहती है, ताकि औद्योगिक निवेश को प्रोत्साहित किया जा सके। इस उद्देश्य हेतु राज्य के किस स्थान पर ऑटोमोबाइल के विकास हेतु विशेष आर्थिक क्षेत्र प्रस्तावित है
–आदित्यपुर
11. विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के तहत कम-से-
कम किस स्तर तक के अधिकारी को विस्थापन एवं पुनर्वास प्रशासक के रूप में नियुक्ति किया जाएगा
–उपायुक्त
12. विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के तहत सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन की स्वीकृति के कितने दिनों के अंदर किसी क्षेत्र को प्रभावित क्षेत्र के रूप में घोषित किया जाना अनिवार्य है
–15 दिनों के अंदर
13. विस्थापन एवं पुनर्वास योजना के तहत की गई किसी घोषणा को कम-से-कम कितने समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाना अनिवार्य है।
- तीन
14. विस्थापन एवं पुनर्वास योजना के तहत की गई किसी घोषणा को कम-से-कम कितने हिन्दी समाचार पत्र में प्रकाशित किया जाना अनिवार्य है
- दो
15. विस्थापन एवं पुनर्वास योजना के तहत घोषणा के कितने दिनों के अंदर सर्वेक्षण पूरा किया जाना अनिवार्य है
–60 दिनों के अंदर
16. विस्थापन एवं पुनर्वास योजना के तहत प्रशासक इससे संबंधित आपत्तियों पर विचार के कितने दिनों के भीतर सर्वेक्षण के ब्यौरों को राज्य सरकार को भेज देगा
–15 दिनों के भीतर
17. विस्थापन एवं पुनर्वास योजना के तहत राज्य सरकार द्वारा प्रशासक से सर्वेक्षण का ब्यौरा प्राप्त होने के कितने दिनों के भीतर उसे शासकीय राजपत्र में प्रकाशित कराया जाएगा 
–15 दिनों के भीतर
18. विस्थापन एवं पुनर्वास योजना के तहत राज्य सरकार द्वारा राजपत्र में सर्वेक्षण को ब्यौरा प्रकाशित कराने के कितने दिनों के भीतर किसी क्षेत्र / क्षेत्रों को विस्थापन क्षेत्र के रूप में घोषित किया जाएगा 15 दिनों
–15 दिनों के भीतर
19. यदि किसी परिवार का घर अधिग्रहीत किया जाता है, तो एकल परिवार को विस्थापन एवं पुनर्वास योजना के तहत बिना लागत के कितनी जमीन आवंटित की जा सकती है
–ग्रामीण क्षेत्र में 41 डिसमील तथा शहरी क्षेत्र में 5 डिसमील
20. यदि विस्थापन से प्रभावित किसी परिवार को सरकारी भूमि नहीं दी जा सके तो विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के तहत उसे परियोजना या टाउनशिप या इससे सटे क्षेत्र में भूमि उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है। उसे कितनी भूमि उपलब्ध कराई जाएगी 
–अपनी खोई भूमि का 10 प्रतिशत
21. यदि किसी विस्थापित परिवार के पास पशु हो, तो उसे पशुशाला के निर्माण हेतु विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के तहत कितनी राशि सहायतार्थ उपलब्ध करायी जाएगी 
–35000 रूपये
22. यदि किसी विस्थापित परिवार के पास पक्की दुकान या गुमटी है जिसमें वह व्यवसाय  करता है, तो विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के तहत उसे दुकान के निर्माण हेतु एकमुश्त कितनी राशि उपलब्ध कराये जाने का प्रावधान किया गया है
–50000 रूपये
23. केन्द्र या राज्य सरकार की किसी सार्वजनिक उपक्रम परियोजना के अतिरिक्त अन्य किसी व्यावसायिक परियोजना के मामले में प्रभावित परिवारों के बीच परियोजना की वार्षिक शुद्ध आय का ...........प्रतिशत मौद्रिक रूप में वितरण किया जाना विस्थापन एवं पुनर्वास नीति में सुनिश्चित किया गया है 
- 1%
24. विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के तहत अनुसूचित जाति/जनजाति परिवारों से भूमि अर्जन के किसी भी मामले में भूमि का कब्जा लेने से पूर्व उन्हें प्रतिकर का प्रथम किस्त के रूप में अदा करना अनिवार्य है भाग
–एक-तिहाई
25. विस्थापन एवं पुनर्वास नीति के अंतर्गत शामिल मामलों से पैदा होने वाली.शिकायतों के समयबद्ध निपटान हेतु राज्य सरकार द्वारा एक न्यायाधिकरण के गठन का प्रावधान किया गया है। इस न्यायाधिकरण में कितने सदस्य होंगे
–3
26. राज्य स्तरीय विस्थापन एवं पुनर्वास परिषद् का अध्यक्ष कौन होगा
–मुख्यमंत्री
27. प्रत्यार्पण एवं पुनर्वास नीति, 2009 के तहत उग्रवादी के प्रत्यार्पण को स्वीकार करने हेतु गठित स्क्रीनिंग समिति का अध्यक्ष कौन होता है
–पुलिस अधीक्षक
28. प्रत्येक जिला में प्रत्यार्पण करने वाले उग्रवादियों के लिए गठित पुनर्वास समिति का अध्यक्ष कौन होता है
–जिला दण्डाधिकारी
29. प्रत्यार्पण एवं पुनर्वास नीति, 2009 के तहत कितनी राशि पुनर्वास अनुदान के रूप में प्रदान किये जाने का प्रावधान किया गया है
- 2,50,000
30. प्रत्यार्पण करने वाले उग्रवादी द्वारा रॉकेट लॉचर/ एल. एम. जल का समर्पण करने पर पुनर्वास अनुदान के अतिरिक्त कितनी राशि देने का प्रावधान प्रत्यार्पण एवं पुनर्वास नीति में किया गया है
- 1 लाख
31. प्रत्यार्पण नीति के तहत दी जाने वाली पुरस्कार राशि को उग्रवादी संगठन में स्थान के आधार पर कितनी श्रेणियों में विभाजित किया गया है
- 10
32. झारखण्ड की स्थानीयता नीति के तहत नीति की घोषणा के अगले कितने वर्षों तक अनुसूचित क्षेत्रों में राज्य के तृतीय एवं चतुर्थवर्गी पदों को स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित कर दिया गया है 
–10 वर्ष
33. स्थानीयता नीति के तहत झारखण्ड राज्य का स्थायी निवासी के रूप में मान्यता के लिए कितने शर्तों में से किसी एक को पूरा करना अनिवार्य है
–6
34. झारखण्ड राज्य की पर्यटन नीति कब घोषित की गयी है
- 2015 में
35. झारखण्ड राज्य में किस वर्ष खाद्य प्रसंस्करण नीति की घोषणा की गयी है। 
- 2015 में
36. झारखण्ड राज्य में किस वर्ष निर्यात नीति की घोषणा की गयी है
- 2015 में
37. झारखण्ड राज्य में किस वर्ष स्टार्टअप नीति की घोषणा की गयी है
- 2016 में
38 . झारखण्ड राज्य की स्टार्टअप नीति के अंतर्गत 10 प्रतिष्ठित संस्थानों को इन्क्यूबेशन सेंटर खोलने हेतु प्रति संस्थान कितनी राशि उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है
–50 लाख
39. राज्य की निर्यात नीति के तहत देश के कुल निर्यात में राज्य की हिस्सेदारी को वर्ष ........तक 2 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य निधारित किया गया है  
- 2019
> झारखण्ड की कला एवं संस्कृति
1. झारखण्ड में सबसे बड़ी जनजाति है
–संथाल
2. झारखण्ड राज्य में निवास करने वाली जनजातियों में सर्वाधिक जनसंख्या किस जनजाति की है   
–संथाल
3. झारखण्ड राज्य में निवास करने वाली जनजातियों में दूसरी सर्वाधिक जनसंख्या किस जनजाति की है 
– उरांव
4. झारखण्ड राज्य में निवास करने वाली जनजातियों में तीसरी सर्वाधिक जनसंख्या किस जनजाति की है 
- मुण्डा 
5. संथाल जनजाति का संबंध है 
–प्रोटो-ऑस्ट्रेलायड से 
6. झारखण्ड की अधिकतर जनजातियाँ किस प्रजाति की हैं
- प्रोटो –ऑस्ट्रेलायड से
7. इनमें कौन सी जनजाति झारखण्ड के अलावा और कहीं नहीं पायी जाती है
- मुंडा
8. संथाल जनजाति के चार हडों (वर्णों) के संबंध में निम्न में कौन एक सही सुमेलित नहीं है
–सोरेन हड सेवादार
9. संथाल जनजाति से संबंधित 'किरिंग बापला' है
–विवाह का एक प्रकार
10. निषिद्ध यौन-संबंधों का दोषी पाये जाने पर संथाल समाज में कौन सी सजा का प्रावधान है।
-बिटलाहा
11. संथालों के निवास स्थान को कहा जाता है
–दामिन-ए-कोह
12. संथालों में गाँव के प्रधान को क्या कहते हैं
–मांझी
13. उराँव जनजाति की भाषा है
–कुडुख
14. उराँव जनजाति में युवागृह को किस नाम से जाना जाता है 
–घुमकुरिया
15. 'घुमकुरिया' किस जनजाति की सामाजिक संस्था है 
–उराँव 
16. मुण्डा जनजाति में स्त्री द्वारा तलाक दिये जाने पर वधु मूल्य के रूप में उसे लौटाना पड़ता है 
- गोनोंग टका 
17. मुण्डा जनजाति की परंपरा एवं विकासक्रम पर प्रकाश डालने वाली लोककथा है
 - सोसो बोंगा 
18. एक स्थान जहाँ मुण्डा जनजाति के पूवर्जों की हड्डियां दबी होती हैं, कहलाता है 
-  सासन
19. हो जनजाति की पारंपरिक जातीय शासन प्रणाली है 
 - मुण्डा - मानकी प्रशासन 
20. किस जनजाति में युवागृह जैसी संस्था नहीं पायी जाती है
- खरवार
21. 'ओलोलदाय' विवाह किस जनजाति में प्रचलित है
–खड़िया
22. निम्न में से किस जनजाति में गोत्र प्रथा नहीं पाया जाता है
–परहिया
23. घुमन्तु जीवन जीने वाले बिहरोरों को किस नाम से जाना जाता है
–उलथू व भुलियास
24. 'बिरहोर' का शाब्दिक अर्थ क्या है
–जंगल का आदमी
25. भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत् राष्ट्रपति द्वारा जनजातियों को अधिसूचित किया जाता है
–अनु. 342
26. किस जनजातीय समाज में विवाह पूर्व सगाई की रस्म प्रचलित है
 - बंजारा
27. किस जनजाति में वरमाला की प्रथा प्रचलित है
–खोंड
28. छिन्नमस्तिका मंदिर अवस्थित है
–रजरप्पा में
29. देवघर में शिवमंदिर का निर्माण किसने करवाया था
–पूरणमल ने
30. झारखण्ड के किस मंदिर को 'पत्थर पर लिखी कविता' की संज्ञा दी जाती है 
–सूर्य मंदिर, राँची
31. डोमकच क्या है
–विवाह गीत
32. झारखण्ड में 'पाइका' क्या है
–नृत्य
33. सुधेन्द्रु नारायण सिंह का संबंध है
–छऊ नृत्य से
34. झारखण्ड के किस नृत्य-शैली को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि मिली
–छऊ
35. सोहराय नामक पर्व मनाया जाता है
–कार्तिक अमावस्या को
36. सोहराय किस जनजाति का सबसे बड़ा पर्व है
–संथाल
37. कौन सा पर्व 12 वर्ष में एक बार आयोजित किया
जाता है
- देशाउली
38. हिन्दू भाद्रपद में जनजातियों की कौन-सी पूजा होती है
–सरहुल
39. कौन सा त्योहार असुर जनजाति द्वारा लोहा गलाने के उद्योग की उन्नति हेतु मनाया जाता है
–कुटसी
40. हिजला मेला का आयोजन किस नदी के किनारे किया जाता है
–मयूराक्षी
41. हिजला मेला किस शहर में होता है
–दुमका
42. जादोपटिया का संबंध है
- चित्रकारी से
43. झारखण्ड में आदिवासियों के फूलों के त्योहार का नाम क्या है
–सरहुल
44. संथाली भाषा की लिपि है
–ओलचिकी
45. 'ओलचिकी लिपि' का आविष्कार किसने किया
–रघुनाथ मुर्मू ने
46. किसे ‘संथाली साहित्य का भारतेन्दु' के नाम से जाना
–डोमन साहू समीर
47. संथाली भाषा को किस संविधान संशोधन द्वारा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया
–92वाँ संविधान संशोधन
48. नागपुरी भाषा से संबंधित प्रमुख रचना 'नागवंशवली' की रचना किसने की
–बेनीराम महथा
49. झारखण्ड में सर्वाधिक बोली जाने वाली जनजातीय भाषा है
–संथाली
50. शासक पूरणमल के द्वारा निम्नलिखित में से किस मंदिर का निर्माण करवाया गया
–देवघर का शिव मंदिर
51. 'आंजन धाम' झारखण्ड के किस जिले में है
–गुमला
52. खोरठा संकलनों का प्रकाशन 'मेघदूत' नाम से किस रचनाकार ने किया
–श्रीनिवास पानुरी
53. मुंडा परंपरा का 'रिजगढ़' किस स्थल से संबंधित है
–राजगीर
54. 'अंडी' और 'ओपोरतीपि' नाम से प्रचलित विवाह किस आदिवासी समुदाय से संबंधित है
–हो
55. 'गायब होता हुआ देश' उपन्यास के लेखक हैं
–रणेन्द्र
56. 'कोचे कड़बा' नाटक के रचनाकार हैं
–सोलेमान मुरमू
57. 'खेरवाल बांशो धोरोम पुथी' के रचयिता हैं
–माँझी रामदास टुडू
58. ‘आदि धर्म' पुस्तक के रचनाकार हैं
–रामदयाल मुण्डा
59. संथाली का प्रथम छोटी कहानी का संग्रह था
–कुकमु
60. लाँगड़े क्या है
–नृत्य
61. कजली कब गाया जाता है
–वर्षा ऋतु में
62. टाँगीनाथ किस संप्रदाय का केन्द्र था
–पाशुपत संप्रदाय
63. सोहराई त्योहार दिपावली के दूसरे दिन झारखण्ड में किसके महिमा में मनाई जाती है
–जानवर धन
64. संथालों में विवाह का सबसे सामान्य रूप कौन-सा है
–बापला
65. झारखण्ड के सदान का मुख्य व्यवसाय क्या है
–खेती
66. कौन-सा भाषा झारखण्ड के आदिवासी समुदाय से विलुप्त हो रहा है
–आसुरी
67. झारखण्ड कि किस जनजाति को 'सरल कारीगर' के रूप में वर्गीकृत किया जाता है 
–माहली
68. झारखण्ड के किस जनजातीय समूह द्वारा लिखने के लिए 'ओलचिकी' लिपि का प्रयोग किया जाता है 
–संथाल
69. किस संथाली नाटककार को उनके उपन्यास 'राही रावण काना' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार नवाजा गया
–मोगला सोरेन  
70. द्रविड़ परिवार से संबंधित भाषाओं का समूह
–उराँव व खड़िया
71. चित्रकला की कला 'जादो- पटिया' किसकी विशेषता है
–संथाल
72. 1979 में महाश्वेता देवी द्वारा रचित साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत ऐतिहासिक उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार' (जंगल का अधिकार)किसके जीवन पर आधारित है
- बिरसा मुण्डा
73. संथाल जनजाति के लोग कुशल होते हैं
–बुनाई में
74. ‘“झारखण्ड : कॉसल ऑवर ग्रेव्स" (झारखण्ड: कब्रों पर महल) के लेखक कौन हैं
–विक्टर दास
75. औंदी गीत कब गाया जाता है
–विवाह के समय
76. झारखण्ड में ‘बंदना' त्योहार कब मनाया जाता है
–कार्तिक अमावस्या के समय
77. किस जनजाति को झारखण्ड सरकार द्वारा शिकारीसंग्रहकर्ता प्रकार माना जाता है
–कोरवा
78. झारखण्ड के पुरूषों की सबसे सामान्य पोषाक को क्या कहा जाता है, जो कपड़े का एक ही टुकड़ा होता है
–भगवान
79. झारखण्ड की जेल में चेतन महाजन द्वारा लिखित पुस्तक का नाम क्या था 
–द बैड वॉइस ऑफ बोकारो जेल 
80. कौन-सा त्योहार झारखण्ड के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक मानी जाती है और वर्ष में दो बार अर्थात् मार्च और नवंबर में मनाई जाती है 
- छठ
81. किसे झारखण्ड की एक उपेक्षित जनजाति के रूप में माना जा सकता है
–बैगा
82. झारखण्ड में वह कौन-सा त्योहार है जो पूर्ण रूप से भाईयों और बहनों के प्रेम और लगाव के प्रति समर्पण के लिए मनाया जाता है
–करमा
83. मुण्डा भाषा निम्नलिखित में से कौन-से भाषा समूह से संबंधित है
–ऑस्ट्रो-एशियाटिक
84. कौन-सा लोकगीत झारखण्ड में सुबह गाया जाता है
–प्रातकली
85. झारखण्ड सहित भारत के उत्तरी राज्यों में छठ पूजा के दौरान किस भगवान की पूजा की जाती है
–सूर्य
86. कौन-सा धातु शिल्प मल्हार और तंत्री जनजातियों द्वारा किया जाता है
–डोकरा
87. किस कला रूप में पशुओं, वन्य तथा पालतू जानवरों व वनस्पतियों की तस्वीरें बनाई जाती हैं 
- गंजू
88. निम्नलिखित में से कौन-से नृत्य में साल और महुआ फूलों का समरोहपूर्वक प्रयोग किया जाता है 
–बाहा
89. बसंत के मौसम के दौरान और साल के पेड़ की शाखाओं पर नए फूल आने पर निम्नलिखित में से कौन-सा त्योहार मनाया जाता है 
- सरहुल
90. झारखण्ड का कौन-सा जनजाति समूह है, जो बसे हुए किसानों के समूह से संबंधित है 
–संथाल
91. अस्त होते सूर्य को प्रसन्न करने के लिए झारखण्ड में निम्नलिखित में से कौन-सा त्योहार मनाया जाता है
–छठ
92. राँची में जगन्नाथपुर मंदिर का निर्माण किसने करवाया था
–ठाकुर ऐनी नाथ शाहदेव
93. सामाजिक मानदण्डों द्वारा स्वयं अपने अपेक्षित समूह में विवाह करना किस नाम से जाना जाता है
–सगोत्र विवाह
94. झारखण्ड में आदिवासी किस पौराणिक पात्र की पूजा करने पर शान्ति हेतु आग्रह रखते हैं
–बली चक्रवर्ती
95. झारखण्ड में कौन-सा नृत्य आमतौर पर फसल के मौसम में किया जाता है
- झूमर
96. छऊ नृत्य की उपशैली है
–मयूरभंज, सरायकेला व पुरुलिया
97. दोहारी है
–एक आदिवासी गीत
98. कला इतिहासकार भारत में सबसे पुरानी गुफा चित्रकारी 'स्क्रॉल चित्रकारी' को झारखण्ड की किस जनजाति का लिखा मानते हैं
–शाबर्स
99. कौन-से नृत्य में साल और मोहुआ फूलों का समारोहपूर्वक किया जाता है
–बाहा
100. किस जनजाति का संकेन्द्रण पलामू में है
- चेरो
101. कौन-सी जनजाति सत्य के लिए तथा सत्य हेतु सभी कुछ बलिदान करने के लिए प्रसिद्ध है 
–खरवार
102. झारखण्ड का 'धोका' किस शिल्प कला से संबंधित है।
–धातु 
103. झारखण्ड में कौन-से त्योहार में लड़कियाँ रंगीन कागज से लकड़ी / बांस के एक फ्रेम को सजाती हैं और आस-पास की पहाड़ी नदी को भेंट कर देती है
–टुसु परब
104. बसंत पंचमी का त्योहार किस मौसम के आगमन का अग्रदूत है
–बसंत
105. पुस्तक ‘मरंग घोड़ा नीलकंठ हुआ' के लेखक कौन हैं
–महुआ माझी
106. 'मुंडारी लोक कथाएं' पुस्तक किसने लिखी है
–जगदीश त्रिगुणायत
107. झारखण्ड की प्रसिद्ध छठ पूजा किस देवता की अराधना करने के लिए की जाती है 
–सूर्य
108. नटुआ नृत्य किस प्रकार का नृत्य है
–पुरूष नृत्य
109. डोमकच क्या है
–एक तरह का लोकनृत्य
110. हिन्दू कैलेन्डर के अनुसार सरहुल कब मनाया जाता है
–चैत्र
111. झारखण्ड में सरहुल किस रूप में जाना जाता है
–एक उत्सव
112. कौन-से त्योहारों के दौरान, जनजाति महिलाएँ पूरे दिन पुरूष के कपड़े पहन कर पशुओं का शिकार करती है
–मुक्का सेन्द्रा
113. झारखण्ड में 'ठेकुआ' किस रूप में जाना जाता है
–मिठाई
114. कौन-से त्योहार को झारखण्ड में बीज बोने के त्योहार के रूप में जाना जाता है
–रोहीन
> झारखण्ड का भूगोल एवं पर्यावरण
1. झारखण्ड राज्य मानचित्र पर अवस्थित है
–उत्तर-पूर्वी गोलार्द्ध में
2. झारखण्ड किस गोलार्द्ध में स्थित है
–उत्तरी गोलार्द्ध में
3. झारखण्ड के साथ कितने राज्यों की सीमाएँ लगती हैं
–5
4. झारखण्ड राज्य की जलवायु का प्रकार है
–उष्णकटिबंधी मानसूनी
5. झारखण्ड राज्य के कुल कितने क्षेत्र पर वन का विस्तार है
–29.62%
6. राज्य के साथ झारखण्ड राज्य के सर्वाधिक जिलों की सीमाएँ लगती हैं
–पश्चिम बंगाल तथा बिहार से
7. झारखण्ड राज्य के किस जिले की सीमा किसी भी अन्य राज्य से संलग्न नहीं होती है
–खूँटी तथा लोहरदगा
8. झारखण्ड राज्य के किस जिले की सीमा उत्तर प्रदेश राज्य के साथ संलग्नित है
–गढ़वा
9. झारखण्ड राज्य के किस जिले का क्षेत्रफल न्यूनतम है
–पाकुड़
10. राजमहल ट्रैप का निर्माण हुआ है
–ज्वालामुखी प्रक्रिया से
11. 'पाट' का शाब्दिक अर्थ है
–समतल जमीन
12. पाट क्षेत्र के ऊपरी भाग को क्या कहा जाता है
- टांड़
13. पाट क्षेत्र के निचले भाग को क्या कहा जाता है
–दोन
14. शंख नदी किस प्रकार के धरातलीय स्वरूप से निकलती है
–पाट क्षेत्र से 
15. पारसनाथ की पहाड़ी किस नदी घाटी के निकट अवस्थित है 
–बराकर नदी घाटी
16. कौन-सी झारखण्ड की सदानीरा नदी है
–सोन नदी 
17. कौन-सी एक झारखण्ड की एकमात्र नौकागम्य नदी है 
–मयूराक्षी
18. दामोदर नदी है
–दक्षिणवर्ती नदी
19. उत्तरी कोयल नदी है
–उत्तरवर्ती नदी
20. झारखण्ड राज्य की सबसे लंबी नदी कौन-सी है
–दामोदर नदी
21. झारखण्ड राज्य की सबसे प्रदूषित नदी कौन-सी है
–दामोदार नदी
22. किस नदी का अपवाह क्षेत्र झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक है
–उत्तरी कोयल नदी
23. दामोदर नदी की लंबाई लगभग है
–590 किमी.
24. झारखण्ड का सबसे ऊँचा जलप्रपात है
–बुढ़ाघाघ
25. झारखण्ड की एकमात्र नदी जो स्वतंत्र रूप से बंगाल की खाड़ी में गिरती है 
–स्वर्णरेखा नदी
26. झारखण्ड का दूसरा ऊंचा जलप्रपात है
–हुंडरू 
27. हुण्डरू जलप्रपात किस नदी पर अवस्थित है
–स्वर्णरेखा 
28. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक गर्म जलकुण्ड किस जिले में अवस्थित है
–हजारीबाग
29. झारखण्ड राज्य का सर्वाधिक गर्म स्थान है
–जमशेदपुर 
30. झारखण्ड में वर्षा किस मानसून से होती है
–दक्षिणी-पश्चिमी मानसून 
31. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला स्थान है
–नेतरहाट का पठार 
32. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला जिला है
- हजारीबाग 
  
33. झारखण्ड राज्य का सर्वाधिक ठंडा स्थान है
–नेतरहाट
34. झारखण्ड राज्य की सर्वप्रमुख मिट्टी है
–लाल मिट्टी 
35. झारखण्ड राज्य में वनों का विस्तार है
–23,605 वर्ग किमी. 
36. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक वनभूमि वाला जिला है
–पश्चिमी सिंहभूम
37. झारखण्ड राज्य में न्यूनतम वनभूमि वाला जिला है
–जामताड़ा
38. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक वन प्रतिशत वाला जिला है
–लातेहार
39. झारखण्ड राज्य में न्यूनतम वन प्रतिशत वाला जिला है
–जामताड़ा
40. लाह के उत्पादन हेतु उपयुक्त वर्षा होती है,लगभग
150 सेमी. से कम
41. लाह के उत्पादन हेतु तापमान की आवश्कता है, 
लगभग
12 डिग्री सेल्सियस
42. बेतला राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना किस वर्ष की गई
1986
43. झारखण्ड राज्य में विश्व बैंक के सहयोग से संचालित परियोजना है
स्वर्णरेखाप परियोजना
44. बिरसा जैविक उद्यान अवस्थित है
ओरमाँझी में
45. झारखण्ड राज्य में कुल सिंचित भूमि है,
- 15%
46. झारखण्ड राज्य में शष्य सघनता है
–126%
47. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक उत्पादित की जाने वाली फसल है
धान
48. झारखण्ड में मुख्यतः कितने प्रकार की फसलें पैदा होती हैं
- तीन
49. झारखण्ड राज्य में उत्पादित की जाने वाली दूसरी प्रमुख फसल है
मक्का
50. झारखण्ड राज्य में सिंचाई का सर्वाधिक प्रमुख साधन है
- कुँआ
51. अजय बराज परियोजना किस जिले में है
बोकारो
52. दामोदर घाटी परियोजना का प्रारंभ किया गया
1948 में
53. हजारीबाग के सूर्यकुण्ड का तापमान है, लगभग
88°C (190°F)
54. छोटानागपुर में 'फुसफुस' बलुआ मिट्टी किस क्षेत्र में पाई जाती है
दामोदर घाटी क्षेत्र में
55. मयूराक्षी परियोजना झारखण्ड के साथ किस राज्य की संयुक्त परियोजना है
पश्चिम बंगाल
56. महुआडांड़ अभयारण्य झारखण्ड के किस जिले में है
लातेहार
57. झारखण्ड में वार्षिक वर्षा अंतराल है
- 100 से 200 सेन्टीमीटर के मध्य
58. NIDM रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड राज्य में कितने प्रकार के जलवायु क्षेत्र मौजूद हैं 
–3
59. झारखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (JSDMA) इस वर्ष में गठित की गई है
 2010 में
60. जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) का नेतृत्व कौन करता है
जिला दण्डाधिकारी
61. दसोंग/दशम जलप्रपात किस नदी पर स्थित है
कांची नदी
62. तिलैया बाँध इस नदी पर निर्मित है
बराकर
63. पारसनाथ पहाड़ी की ऊँचाई क्या है
1365 मीटर
64. पश्चिमी सिंहभूम में अवस्थित चिरैया (चिड़िया) प्रसिद्ध है
लौह अयस्क खनन हेतु
65. झारखण्ड में प्रति व्यक्ति वन एवं पेड़ों का आच्छादन है
0.08 हेक्टेयर
66. शहीद निर्मल महतो पार्क जिसे झारखण्ड के झारपार्क प्रोग्राम में सम्मिलित किया गया है, यह किस जिले में अवस्थित है
हजारीबाग
67. रजरप्पा किन नदियों के संगम पर अवस्थित है
- दामोदर व भेरा
68. सी. ए. एम.पी.ए. (CAMPA) से क्या तात्पर्य है
- झारखंड प्रतिपूरक वनीकरण कोष
प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण
69. झारखण्ड सरकार ने राज्य के विभिन्न वन्यजीव अभ्यारण्यों में .........वर्ष की अवधि के लिए वन्यजीव प्रबंधन योजना शुरू
 –10 वर्ष
70. झारखण्ड राज्य गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण का गठन किस वर्ष किया गया 
–2009 में
71. इनमें से किस वर्ष झारखण्ड राज्य ने वर्षा की कमी कारण गंभीर सूखे का अनुभव किया
–2010
72. आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की कौन-सी धारा राज्य के राज्यपाल को राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) की स्थापना करने की शक्ति प्रदान करता है 
–धारा 14 (1)
73. भारतीय कृषि में जलवायु परिवर्तन नॉलेज नेटवर्क (CCKNIA) महाराष्ट्र, झारखण्ड और ओडिसा तीन राज्यों में किस वर्ष शुरू किया गया था 
 
– 2013 
74. किस के सहयोग से झारखण्ड राज्य जलवायु केन्द्र स्थापित कर दिया गया है 
–यूएनडीपी
75. जलवायु परिवर्तन पर झारखण्ड कार्य योजना किस वर्ष प्रकाशित हुई
–2014
76. झारखण्ड जलवायु परिवर्तन कार्य योजना रिपोर्ट (2014) के अनुसार सबसे संवेदनशील जिला कौन सा है
–सरायकेला-खरसावां
77. झारखण्ड राज्य में कुल कितने टाइगर रिजर्व हैं
- 01
78. झारखण्ड की सीमा को कितने राज्य स्पर्श करते हैं
- 5
79. दामोदर नदी का उद्गम कहाँ है
–छोटानागपुर पठार
80. कौन-सा राज्य झारखण्ड के पूरब में स्थित है
–पश्चिम बंगाल
81. पलामू में किस तिलहन का सर्वाधिक मात्रा में उत्पादन होता है
–तिल
82. कौन-सी झारखण्ड राज्य की महत्वपूर्ण निर्यात फसल है
–पपीता
83. कौन- सा जलप्रपात को गौतम धारा के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि माना जाता है कि भगवान बुद्ध ने वहाँ स्नान किया था
–जोन्हा जलप्रपात
84. सतवागन झरना झारखण्ड के निम्नलिखित शहरों में से किस शहर में स्थित है 
–कोडरमा
85. झारखण्ड में पाँच जलप्रपातों के समूह के लिए एक सामूहिक नाम वाला जलप्रपात है 
–पंचगढ़ जलप्रपात
86. मयूराक्षी नदी का उद्गम स्थल कहाँ स्थित है 
- त्रिकूट पहाड़ी
87. झारखण्ड की प्रमुख खाद्य फसल है
–चावल
88. झारखण्ड भारत के किस हिस्से में अवस्थित है
- पूर्व
89. झारखण्ड में निम्नलिखित में से किस नदी से प्रसिद्ध दशम जलप्रपात बनता है
–कांची
90. श्री सम्मेद शिखर को और किस नाम से जाना जाता है।
–पारसनाथ पहाड़ी
91. बोकारो किस नदी के तट पर स्थित है
–दामोदर
92. झारखण्ड का मगरमच्छ प्रजनन केन्द्र कहाँ स्थित है
–मूता
93. दामोदर नदी पर निर्मित बहुद्देशीय बिजली परियोजना डी.वी.सी. भारत के किन राज्यों से होकर बहती है
–झारखण्ड तथा पश्चिम बंगाल
94. झारखण्ड का पहला रज्जुमार्ग का निर्माण कहाँ किया गया था
–त्रिकुट पहाड़ी
95. छोटानागपुर पठार की आग्नेय, अवसादी और कायांतरित चट्टानें संबंधित हैं 
- धारवाड़ काल से
96. झारखण्ड राज्य में कृषि कार्य करने वाले जनसंख्या का प्रतिशत कितना है
–75%
97. झारखण्ड का महुआडांड़ वन्यजीव अभ्यारण्य किसके लिए प्रसिद्ध है
- विलुप्तप्राय भेड़िया
98. झारखण्ड के पश्चिम में स्थित है
–ओडिसा
99. स्वर्णरेखा नदी की मूल जगह है
–छोटनागपुर पठार
100. गढ़वा जिले के साथ अपनी सीमा साझा करने वाला राज्य है
–उत्तर प्रदेश
101. झारखण्ड की वह कौन-सी प्रमुख खाद्यान्न फसल है, जो कुल फसली क्षेत्र के लगभग 80 प्रतिशत फैली हुई है
–चावल
102. झारखण्ड के किस जिले में गर्गा बांध स्थित है
–बोकारो
> झारखण्ड की अर्थव्यवस्था
1. निम्न में से किस राज्य को 'भारत का रूर' कहा जाता है
–झारखण्ड
2. 'रूर प्रदेश' किस देश में अवस्थित है
–जर्मनी
3. भारत में आधुनिक रूप से लौह-इस्पात तैयार करने का कार्य प्रारंभ किया गया
–झरिया में
4. भारत का प्रथम उर्वरक कारखाना स्थापित किया गया
–सिंदरी में
5. भारत का प्रथम लौह-इस्पात उद्योग स्थापित किया गया
–जमशेदपुर में
6. एशिया की सबसे बड़ी कोल वाशरी अवस्थित है
–करगाली में
7. भारत की प्रथम कोल वाशरी स्थापित की गयी
–घाटो में
8. भारत का प्रथम मिथेन गैस कुआँ कहाँ है
–परबतपुर में
9. आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अनुसार वर्ष 2019-20 में झारखण्ड राज्य का आर्थिक संवृद्धि दर है 
–6.7%
10. आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अनुसार वर्ष 2019-20 में झारखण्ड राज्य में प्रति व्यक्ति आय है 
– ₹ 79,873 
11. बजट 2021-22 के अनुसार झारखण्ड राज्य में राजस्व प्राप्तियाँ अनुमानित हैं 
– ₹76707 करोड़ 
12. बजट 2021-22 के अनुसार झारखण्ड राज्य में पूंजीगत प्राप्तियाँ अनुमानित हैं 
- ₹14570 करोड़ 
13. बजट 2021-22 के अनुसार झारखण्ड राज्य का राजस्व व्यय अनुमानित हैं 
– ₹75755.01 करोड़ 
14. बजट 2021-22 के अनुसार झारखण्ड राज्य का पूंजीगत व्यय अनुमानित हैं 
- ₹15521.99 करोड़ 
15. बजट 2021-22 के अनुसार राज्य का राजस्व घाटा राज्य सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिशत है 
– (-) 0.26%
16. बजट 2021-22 के अनुसार राज्य का प्रभावी राजस्व घाटा राज्य सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिशत है 
– (-) 3.16% 
17. बजट 2021-22 के अनुसार राज्य का राजकोषीय घाटा राज्य सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिशत है 
– 2.83% 
18. बजट 2021-22 के अनुसार राज्य का प्राथमिक घाटा राज्य सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिशत है 
–1.11%
19. आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अनुसार सकल राज्य मूल्य वृद्धि में प्राथमिक क्षेत्र का योगदान है 
–21.5%
20. आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अनुसार सकल राज्य मूल्य वृद्धि में द्वितीयक क्षेत्र का योगदान है 
–32.8%
21. आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अनुसार सकल राज्य मूल्य वृद्धि में तृतीयक क्षेत्र का योगदान है 
–45.8% 
22. देश के कुल कोयला भंडार में झारखण्ड की भागीदारी है 
–लगभग 27.37% 
23. झारखण्ड राज्य में लौह अयस्क का सर्वाधिक भण्डार है
–सिंहभूम क्षेत्र में
24. नोवामुण्डी प्रसिद्ध है
–लौह अयस्क हेतु 
25. झारखण्ड के किस क्षेत्र में क्रोमाइट का भंडार पाया जाता है
–सिंहभूम क्षेत्र में 
26. लोहरदगा जिला किस खनिज के भंडार हेतु जाना जाता है
–बॉक्साइट
27. झारखण्ड में अभ्रक का सबसे अधिक उत्पादन होता है, स्थानीय भाषा में उसे क्या कहते हैं
–रूबी
28. झारखण्ड राज्य के किस जिले में इल्मेनाइट पाया जाता है
–राँची
29. झूमरी तिलैया नामक स्थान प्रसिद्ध है
–अभ्रक
30. झारखण्ड का लिप्साबुरू जाना जाता है
–कायनाइट हेतु 
33. झरिया में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है
–कोयला का भंडार
34. राउरकेला इस्पात संयंत्र को कोयला की प्राप्ति होती है
–बोकारो से
35. झारखण्ड राज्य का जादूगोड़ा नामक स्थान किस खनिज भंडार के लिए जाना जाता है
–यूरेनियम
36. झारखण्ड में टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी की स्थापना कब हुयी थी
–1907
37. टाटा स्टील की स्थापना किसके द्वारा की गयी
–जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा
38. किस वर्ष टिस्को का नाम बदलकर टाटा स्टील कर दिया गया
–2005
39. टाटा स्टील से किस वर्ष उत्पादन प्रारंभ हुआ
–1911
40. बोकारो स्टील संयंत्र की स्थापना किस वर्ष हुई
–1964
41. बोकारो स्टील संयंत्र से किस वर्ष उत्पादन कार्य प्रारंभ किया गया
–1974
42. बोकारो स्टील संयंत्र की स्थापना किस देश के सहयोग से की गयी थी 
–रूस
43. बोकारो स्टील संयंत्र को चूना पत्थर की आपूर्ति किस राज्य से की जाती है
–मध्य प्रदेश
44. भारत का प्रथम तांबा उद्योग किस वर्ष स्थापित किया गया
–1924
45. भारत का प्रथम तांबा उद्योग किस स्थान पर स्थापित किया गया
–घाटशिला 
46. झारखण्ड के किस स्थान पर एलुमीनियम कंपनी लिमिटेड द्वारा एलुमीनियम उद्योग की स्थापना की गयी है
–मुरी (राँची)
47. झारखण्ड के मूरी नामक स्थान पर किस वर्ष एलुमीनियम उद्योग की स्थापना की गयी 
–1938
48. भारी इंजीनियरिंग उद्योग संयंत्र (HEC) झारखण्ड के किस स्थान पर अवस्थित है 
–हटिया
49. किस देश की सहायता से झारखण्ड में भारी इंजीनियरिंग उद्योग (HEC) की स्थापना की गयी
 –रूस एवं चेकोस्लोवाकिया
50. भारी इंजीनियरिंग उद्योग की स्थापना किस वर्ष की गयी
–1958
51. भारत के प्रथम उर्वरक कारखाना की स्थापना सिंदरी (धनबाद) में किस वर्ष की गयी 
–1951
52. झारखण्ड का कौन-सा स्थान लाह के निर्यात की दृष्टि से अग्रणी स्थान रखता है 
 - टोरी
53. भारतीय लाह अनुसंधान संस्थान अवस्थित है
–राँची में 
54. झारखण्ड के किस जिले को 'देश की अभ्रक राजधानी' के नाम से जाना जाता है
–कोडरमा
55. झारखण्ड राज्य में कुल राष्ट्रीय राजमार्ग की संख्या है
-33
56. झारखण्ड राज्य में राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई है
–3367 किमी.
57. झारखण्ड राज्य का सबसे लंबा राष्ट्रीय राजमार्ग है
–NH-33
58. राष्ट्रीय राजमार्ग - 33 झारखण्ड राज्य में कितने जिलों से होकर गुजरता है
–06
59. झारखण्ड राज्य में राजकीय राजमार्गों की कुल लंबाई है
–1232 किमी.
60. झारखण्ड राज्य का सबसे लंबा राजकीय राजमार्ग है
- SH-24
61. राँची स्थित हवाई अड्डा का नाम है
–बिरसा मुण्डा हवाई अड्डा
62. झारखण्ड राज्य की प्रथम जल विद्युत परियोजना है
–तिलैया जल विद्युत परियोजना
63. झारखण्ड राज्य में एकलव्य विद्यालय योजना का शुभारंभ किस वर्ष किया गया 
–2006
64. झारखण्ड सरकार द्वारा संचालित मुख्यमंत्री दाल भात योजना किस तिथि को प्रारंभ किया गया
–15 अगस्त, 2011
65. मुख्यमंत्री विद्या लक्ष्मी योजना किस वर्ष प्रारंभ किया गया है
–2015-16
66. मुख्यमंत्री विद्या लक्ष्मी योजना का प्रमुख उद्देश्य क्या है
–अनुसूचित जाति तथा जनजाति की
बालिकाओं का ड्रॉप आउट दर कम करना ।
67. झारखण्ड सरकार द्वारा वर्ष 2015-16 में प्रारंभ की गई योजना 'तेजस्विनी ' के अंतर्गत किस आयु वर्ग की महिलाओं को शामिल किया गया है 
11-25 वर्ष
68. मुख्यमंत्री लाडली लक्ष्मी योजना किस तिथि को शुरू किया गया था 
15 नवंबर, 2011
69. बिहार स्पंज आयरन संयंत्र, अवस्थित है
- चांडिल
70. भारत के किस राज्य में सर्वप्रथम 'मुख्यमंत्री जन वन योजना' प्रारंभ किया गया 
- झारखण्ड
71. झारखण्ड में विधवाओं के लिए लागू भीमराव अम्बेडकर आवास योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2016-17 में कुल निर्मि किये जाने वाले आवासों की संख्या है
–11000
72. झारखण्ड सरकार द्वारा 'योजना बनाओ' प्रयास की शुरूआत कब की गयी 
–2016
73. झारखण्ड सरकार विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े श्रमिकों के लाभ के लिए 'सरस्वती योजना' की शुरूआत किस वर्ष में की
–2014
74. वर्ष 2016 में विश्व बैंक एवं DIPP के अनुसार व्यापार सुगमीकरण में भारतीय राज्यों में झारखण्ड का स्थान है
–सप्तम
75. किस वस्तु के सीधा लाभ हस्तानांतरण में झारखण्ड देश का पहला राज्य बना है
–किरासन तेल
76. तुरामडीह में किस खनिज का खनन होता है
–यूरेनियम 
77. बैंटोनाइट निक्षेप झारखण्ड में पाया जाता है
–साहेबगंज
78. बोकरो इस्पात संयंत्र का निर्माण किस देश के सहयोग से हुआ था
–रूस
79. जेएमएमडीसी द्वारा स्थापित ग्रेनाइट पॉलिशिंग उद्योग अवस्थित है
–तुपुदाना (राँची)
80. गार्डेन रीच सीप बिल्डर्स एंड इंजीनियर लि. का डीजल इंजन संयंत्र अवस्थित है
–राँची में
81. भारत सरकार ने इलेक्ट्रोनिक्स निर्माण क्लस्टर की स्वीकृति की है
–आदित्यपुर में
82. झारखण्ड राज्य के किस जिले में सर्वाधिक ग्रेफाइट पाया जाता है
–पलामू
83. टिस्को (TISCO) का गठन कब किया गया था
–1907
84. जादूगोड़ा निम्नांकित में से किस खनिज पदार्थ से संबंधित है
- यूरनियम
85. झरिया खान निम्नलिखित में से किस राज्य में स्थित है
–झारखण्ड
86. निम्नलिखित में से किस स्थान पर दुनिया में लौह-अयस्क का सबसे बड़ा एकल भंडार है 
–चिरिया
87. झारखण्ड सरकार द्वारा बालिकाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए कौन-सी योजना शुरू की गयी थी 
–सुकन्या समृद्धि योजना
88. भारत में कोयला उत्पादन में झारखण्ड की स्थिति कौन सी है
- तृतीय
89. झारखण्ड किस खनिज का देश में एकमात्र उत्पादक है
–प्राइम कोकिंग कोल
90. जादूगोड़ा यूरेनियम खदान झारखण्ड की निम्न में से किस जिले में स्थित है
–पूर्वी सिंहभूम
91. निम्नलिखित में से किस जिले में तांबा अयस्क का समृद्ध भंडार है
–पूर्वी सिंहभूम
92. भारत में लाह के उत्पादन में झारखण्ड का स्थान कौन-सा है
–दूसरा
93. झारखण्ड सरकार की 'कन्यादान योजना के तहत कितनी राशि दी जाती है। 
–15000
94. झारखण्ड में किस कार्यक्रम के तहत विद्यार्थियों में साइकिल वितरित की जाती है 
–शिक्षा उन्नति कार्यक्रम
95. घार्टा प्रसिद्ध है 
–तांबे के खान हेतु
96. फुलडुंगरी निम्नलिखित में से किस शहर के निकट स्थित है
–घाटशिला
97. केन्द्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान झारखण्ड में कहाँ स्थित है
–धनबाद
> झारखण्ड की राजव्यवस्था
1. झारखण्ड राज्य किस तिथि को अस्तित्व में आया
–15 नवंबर, 2000
2. झारखण्ड राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जाति हेतु कितनी सीटें आरक्षित हैं
–09
3. झारखण्ड राज्य की विधानसभा में अनुसूचित जनजाति हेतु कुल कितनी सीटें आरक्षित हैं
–28
4. झारखण्ड राज्य में लोकसभा तथा राज्यसभा हेतु क्रमशः कितनी सीटें हैं
–14 एवं 6
5. राज्य की लोकसभा सीटों में अनुसूचित जनजातियों के लिए कुल सीटें आरक्षित हैं
–05
6. झारखण्ड सरकार के मंत्रिपरिषद् में मुख्यमंत्री के अतिक्ति कुल कितने मंत्री हो सकते हैं 
–11
7. झारखण्ड विधानसभा के अध्यक्ष हैं
–रवीन्द्रनाथ महतो
8. झारखण्ड विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं
–बाबूलाल मरांडी 
9. झारखण्ड राज्य के मुख्यमंत्री हैं
–हेमंत सोरेन
10. झारखण्ड राज्य के संसदीय कार्य मंत्री हैं
–आलमगीर आलम
11. झारखण्ड विधानसभा के लिए मनोनीत प्रथम सदस्य का नाम है
–जोसेफ पेचेल गालस्टीन
12. झारखण्ड विधानसभा में वर्तमान मनोनीत सदस्य हैं
–ग्लेन जोसेफ गालस्टीन
13. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक विधायक किस राजनीतिक पार्टी से हैं
–झामुमो
14. 17वीं लोकसभा में झारखण्ड राज्य में भारतीय जनता पार्टी के कुल कितने सदस्य हैं 
–11
15. वर्तमान राज्यसभा में झारखण्ड राज्य से भारतीय जनता पार्टी के कुल कितने सदस्य हैं 
–03
16. झारखण्ड राज्य के वर्तमान राज्यपाल हैं
–रमेश बैस
17. झारखण्ड राज्य में एक पदावधि के दौरान सर्वाधिक अवधि तक मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहने वाले व्यक्ति हैं
- रघुवर दास
18. झारखण्ड राज्य में कुल कितनी बार राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है
–03 बार
19. झारखण्ड राज्य के प्रथम कार्यवाहक राज्यपाल कौन थे
–विनोद चंद्र पाण्डेय
20. झारखण्ड राज्य के मुख्य न्यायाधीश हैं
–न्या. (डॉ.) रवि रंजन
21. ग्राम पंचायत के एक सदस्य का निर्वाचन कितनी जनसंख्या के आधार पर किया जाता है
–500
22. ग्राम सभा के सदस्य
–18 वर्ष एवं उससे अधिक उम्र के
23. ग्राम कचहरी का प्रधान कहलाता है
–सरपंच
24. ग्राम रक्षा दल में किस उम्र-समूह के व्यक्तियों को शामिल किया जाता है
–18-30 वर्ष
25. पंचायत समिति का सचिव कौन होता है
–प्रखण्ड विकास पदाधिकारी
26. वर्तमान समय में झारखण्ड में कुल कितने नगर निगम हैं
- 09
27. राँची नगरपालिका की स्थापना की गई थी
- 1869 में
28. राँची नगर निगम की स्थापना की गई थी
–1979 में
29. झारखण्ड राज्य का बजट संविधान के किस अनुच्छेद के तहत् प्रस्तुत किया जाता है
–202
30. झारखण्ड राज्य में सबसे नवनिर्मित जिला है
–रामगढ़
31. झारखण्ड राज्य से कितने संसद के सदस्य हैं
- 20
32. झारखण्ड में पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए कौन-सा अधिनियम बनाया गया
–झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम, 2001
33. वह क्षेत्र जहाँ सैन्य बलें स्थायी रूप से तैनात होते हैं, सीमांकित किया जाता है 
–छावनी क्षेत्र
34. चाईबासा झारखण्ड में किस जिले का मुख्यालय है 
–पश्चिमी सिंहभूम
35. गोड्डा, देवघर, दुमका जिले झारखण्ड के कौन-से प्रमण्डल के भाग हैं 
–संथाल परगना
36. झारखण्ड में कितने राज्य विधानसभा क्षेत्र हैं
–81
37. जनवरी, 2010 से सितम्बर, 2011 तक झारखण्ड के राज्य में एम.ओ. हसन फारूख ने कौन-सा पद धारण किया था
–राज्यपाल
> झारखण्ड : विविध
1. झारखण्ड के प्रथम राज्यपाल कौन थे
–प्रभात कुमार
2. झारखण्ड राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री कौन थे
–बाबूलाल मरांडी
3. झारखण्ड राज्य के प्रथम निर्दलीय मुख्यमंत्री का क्या है नाम
 - मधु कोड़ा    
4. झारखण्ड राज्य की प्रथम महिला मंत्री का नाम है
–जोबा माँझी
5. झारखण्ड राज्य के प्रथम महाधिवक्ता का नाम है
–मंगलमय बनर्जी
6. झारखण्ड राज्य महिला आयोग की प्रथम अध्यक्ष का नाम क्या है
–लक्ष्मी सिंह
7. झारखण्ड राज्य में प्रथम परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले व्यक्ति कौन हैं
–अल्बर्ट एक्का
8. झारखण्ड राज्य में अशोक चक्र प्राप्त करने वाले प्रथम व्यक्ति का नाम है
–रणधीर वर्मा
9. झारखण्ड राज्य की प्रथम अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी महिला हॉकी खिलाड़ी का नाम क्या है
–सावित्री पुर्ती
10. झारखण्ड राज्य का प्रथम हिन्दी मासिक पत्रिका का नाम क्या है
–घरबंधु
11. झारखण्ड राज्य का प्रथम हिन्दी दैनिक पत्रिका का नाम क्या है
–राष्ट्रीय भाषा
12. झारखण्ड राज्य का प्रथम अंग्रेजी दैनिक पत्रिका का नाम क्या है
–डेली प्रेस
13. झारखण्ड राज्य का प्रथम हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका का नाम क्या है
–आर्यावर्त्त
14. झारखण्ड राज्य का प्रथम विश्वविद्यालय है
–राँची विश्वविद्यालय
15. एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने वाली प्रथम आदिवासी महिला का नाम क्या है
–विनीता सोरेन
16. झारखण्ड राज्य का सबसे ऊंचा जलप्रपात है
–बूढ़ाघाघ
17. झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक जनजाति वाला प्रमण्डल है
–संथाल परगना
18. 'भारत का पिट्सबर्ग' उपनाम से किसे जाना जाता है
–जमशेदपुर
19. 'भारत की अभ्रक राजधानी' उपनाम से किसे जाना जाता है
–कोडरमा
20. 'भारत का रूर' उपनाम से किसे जाना जाता है
–छोटानागपुर
21. झारखण्ड का शिमला किसे कहा जाता है
–राँची
22. 'झारखण्ड का शेफील्ड' उपनाम से किसे जाना जाता है
–भेंडरा
23. 'झारखण्ड की हल्दी घाटी' उपनाम से किसे जाना जाता है 
–कोराम्बे
24. 'छोटानागपुर की रानी' उपनाम से किसे जाना जाता है 
–नेतरहाट
25. 'छोटानागपुर का प्रवेश द्वार' किसे कहा जाता है
–चतरा
26. मंदिरों का शहर के नाम से जाना जाता है
–देवघर
27. शहीदों का शहर के नाम से जाना जाता है 
–राँची
28. 'गाँवों में बसा शहर' किसका उपनाम है
–मैक्लुस्कीगंज
29. इस्पात नगरी किसे कहा जाता है
–जमशेदपुर
30. 'पहाड़ियों की मल्लिका' उपनाम से किसे जाना जाता है
–नेतरहाट
31. 'सूर्योदय एवं सूर्यास्त का सौंदर्यस्थल' उपनाम से किसे जाना जाता है
–नेतरहाट
32. झारखण्ड का सबसे ठंडा स्थान कौन-सा है
–नेतरहाट
33. खेल नगरी किसे कहा जाता है
–जमशेदपुर
34. जयपाल सिंह की मृत्यु का कारण था
–ब्रेन हेमरेज
35. मरांग गोमके के नाम से प्रसिद्ध हैं
–जयपाल सिंह मुण्डा
36. कीनन स्टेडियम किस शहर में है
–जमशेदपुर
37. बिड़ला इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नॉलाजी कहाँ स्थित है
 - राँची
38. सिद्धू -कान्हू विश्वविद्यालय किस जिले में अवस्थित है
–दुमका
39. झारखण्ड राज्य के किस शैक्षणिक संस्थान को
आई.आई.टी. का दर्जा भारत सरकार ने प्रदान करने की घोषणा की है
–इन्डियन इंस्टीच्यूट ऑफ माइन्स
40. पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र राज्य के किस जिले में स्थित है
–हजारीबाग
41. झारखण्ड राज्य के किस जिले में राज्य के प्रथम महिला अभियंत्रण महाविद्यालय की स्थापना की गयी है
–रामगढ़
42. बिरसा मुण्डा का जन्म किस स्थान पर हुआ था
–उलिहातू
43. बिरसा मुण्डा के पिता का नाम है
–सुगना मुण्डा
44. बिरसा मुण्डा का जन्म तिथि है
–15 नवंबर, 1875  
45. बिरसा मुण्डा के धार्मिक गुरू थे
–आनंद पाण्डे
46. भारत में नागरिक उड्डयन का जन्मदाता किसे कहा जाता है
–जे. आर. डी. टाटा
47. जयपाल सिंह का मूल नाम था
–वेनन्ह पाह
48. 1930 में इनमें से किसने 'किसान सभा' की स्थापना की
–ठेबले उराँव
49. दिशोम गुरू के नाम से विख्यात हैं
–शिबू सोरेन
50. किस व्यक्ति ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छऊ नृत्य को प्रसिद्धि महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है
–सुधेन्द्रु नारायण सिंह
51. बिरसा मुण्डा ने निम्न में से किस पंथ की शुरूआत की
–बिरसाइत पंथ
52. 'सात सौ पहाड़ियों का क्षेत्र' कहा जाता है
–सारंडा को
53. किसे 'प्रिंस ऑफ छोटानागपुर स्टेट' के नाम से जाना जाता है
–मुकुद नायक
54. सुमेराय टेटे का संबंध किस खेल से है
–हॉकी
55. झारखण्ड निवासी दीपसेन गुप्ता का नाम किस खेल से जुड़ा हुआ है
–शतरंज से
56. सन् 2011 में संपन्न 34वें राष्ट्रीय खेलों का शुभंकर छउआ था
–शिशु हिरण
57. झारखण्ड की सबसे पहली महिला जिन्होनें माउंट एवरेस्ट पर विजय प्राप्त की 
–प्रेमलता अग्रवाल
58. मोहन कुमार मंगलम स्टेडियम अवस्थित है
–बोकारो
59. इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (इंडियन स्कूल ऑफ माइंस) की स्थापना हुई थी सन्
–1926
60. राँची विश्वविद्यालय की स्थापना किस विश्वविद्यालय से अलग करके हुई थी
–बिहार विश्वविद्यालय
61. एक्स. एल. आर. आई (XLRI) जमशेदपुर की स्थापना की थी
–सोसाइटी ऑफ जीसस ने
62. झारखण्ड की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी जिसने ओलंपिक खेला
–निक्की प्रधान
63. झारखण्ड का पहला वाई-फाई ग्राम निम्नलिखित में से किस प्रखण्ड में स्थित है
–कसमार
64. झारखण्ड की सबसे ऊंची चोटी का नाम क्या है
–पारसनाथ
65. केन्द्रीय ईंधन शोध संस्थान जो प्रमुख शोध संस्थानों में से एक है, की स्थापना वर्ष 1945 में किस स्थान पर हुई थी 
–धनबाद
66. धनबाद में कोयला बेल्ट में श्रमिक संघ आंदोलन का नेतृत्व किसने किया था
–ए. के. राय ने
67. भारत की कोयला राजधानी कहा जाता है
–धनबाद को
68. झारखण्ड में मोराबादी पहाड़ी को और किस नाम से जाना जाता है
–टैगोर हिल 
69. राँची झील के मध्य में किसकी प्रतिमा बनायी गयी है
–स्वामी विवेकानंद
70. क्रिकेटर एम. एस. धोनी किस राज्य के हैं
–झारखण्ड
71. यह नारा किसने दिया था - "वोट से नहीं, चोट से लेंगे लालखंड"
–ए. के. राय
72. 15 नवंबर, 2000 को किसकी जयंती पर झारखण्ड का गठन एक पृथक राज्य के रूप में किया गया था
–भगवान बिरसा मुण्डा
73. दीपिका कुमारी किस खेल से संबंधित हैं
–आर्चरी/तीरंदाजी
74. झारखण्ड में इंडियन स्कूल ऑफ माइंस
–सिंदरी
75. धरती आबा के नाम से विख्यात हैं
–बिरसा मुण्डा
76. झारखण्ड का पहला कृषि विश्वविद्यालय है
–बिरसा कृषि विश्वविद्यालय
77. एमजीएम मेडिकल कॉलेज कहाँ स्थित है
- जमेशदपुर
78. नेतरहाट किस जिले में है
– लातेहार
  
79. किस शहर को टिस्को और टेल्को शहर के रूप में जाना जाता है
- जमशेदपुर
80. 34वें राष्ट्रीय खेलों का उद्घाटन समारोह किस स्थान पर आयोजित किया गया
–राँची
81. 2011 में आयोजित 34वें राष्ट्रीय खेल के दौरान किस खिलाड़ी ने खेल मशाल जलाई
–दीपिका कुमारी
82. बिरसा मुण्डा कौन थे
–आदिवासी नेता
83. वैद्यनाथ धाम का पुराना नाम क्या है
–बैजनाथ मठ
84. झारखण्ड पार्टी का विलय किस पार्टी में किया गया था
–कांग्रेस में
85. छोटानागपुर पठार का निर्माण निम्न में से किस पदार्थ से हुआ है
–लावा
86. झारखण्ड लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का अधिकार किसे प्राप्त है
–राष्ट्रपति
87. रजरप्पा नामक स्थान पर निम्न में से कौन सा मंदिर अवस्थित है 
–छिन्नमस्तिका मंदिर
88. बासुकीनाथ राज्य के किस जिले में अवस्थित है  
–दुमका 
> 7वीं - 10वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा (2021) में पूछे गये प्रश्न
1. मुगलों के समय झारखण्ड प्रदेश इस नाम से जाना जाता था 
–कुकरा
2. अंग्रेजों का झारखण्ड में सर्वप्रथम प्रवेश इस क्षेत्र से हुआ
 - सिंहभूम
3. भूमिज विद्रोह के नेता कौन थे
–गंगा नारायण
4. किस आदिवासी में विधवा पुनर्विवाह को 'मैयारी' कहा जाता है
–कोरवा
5. 'घुमकुड़िया' का क्या तात्पर्य है
–युवागृह
6. निम्नलिखित में से किस पर्व से पहाड़ी खड़िया की आर्थिक स्थिति उजागर होती है 
–फागो
7. किन आदिवासियों में निवास स्थान 'टंडा' के नाम से जाना जाता
–बिरहोर
8. लोहा गलाना किन आदिवासियों का एक पारंपरिक पेशा है 
–असुर
9. किस मंदिरों के नगर के रूप में जाना जाता है
–मलूटी
10. पालकोट की गुफाएँ कहाँ अवस्थित हैं
–गुमला
11. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की कौन-सी धारा भूमि के उपयोग के संबंध में अधिभोगी रैयत के अधिकार के बारे में प्रावधान करती है
–धारा 21
12. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के अंतर्गत सर्वेक्षण करने और अधिकार अभिलेख तैयार करने का आदेश देने की शक्ति किसमें है
–राज्य सरकार
13. कोरकर भूमि को जाना जाता है
–जलसासन, अरियत, बाभला खनवत
14. झारखण्ड क्रिकेट एसोसिएशन की ओर से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण कब हुआ 
था
–2013
15. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम अधिनियमित किया गया
–11 नवंबर, 1908
16. संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम की कौन-सी धारा रैयत के अधिकारों के अंतरण का प्रावधान करती है
–धारा 20
17. बंजर भूमि की बंदोबस्ती को निरस्त किया जा सकता है, यदि उस पर खेती नहीं की जाती है 
–5 साल
18. निम्नलिखित में से कौन काश्तकारी के वर्ग में नहीं आते हैं 
–भुईहारी खूँट कट्टीदार 
19. संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम के अंतर्गत सभी आवेदन दिये जायेंगे 
–वादहेतु के उत्पन्न होने के 1 साल के भीतर
20. संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम के अंतर्गत पुनर्विलोकन का प्रावधान वर्णित किया गया है 
–धारा 60
21. संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम की कौन सी धारा रैयती भूमि के विनिमय के बारे में प्रावधान करती है 
–धारा 22
22. झारखण्ड भाड़ा नियंत्रण अधिनियम, 2011 के अंतर्गत सलामी, शुल्क या इसी तरह का कोई अन्य राशि, भवन के किराया के अतिरिक्ति नहीं होगा
 - 1 महीने के किराया से
23. जोजोहातु, जो पश्चिम सिंहभूम में स्थित है, किसके लिए प्रसिद्ध है
–क्रोमाईट
24. झारखण्ड में यूरेनियम के भंडार मौजूद हैं
–नरवापहाड़, तुरामडीह, जादूगोड़ा
25. झारखण्ड उचित मुआवजा एवं पारदर्शी भू-अर्जन पुनःस्थापन एवं पुनः बंदोबस्ती संशोधन अधिनियत, 2017 प्रभावी कब से माना जायेगा
- 1 जनवरी, 2014
26. कनहर नदी, जो छत्तीसगढ़ के सरगुजा से शुरू होती है झारखण्ड में गढ़वा जिला के किस ब्लॉक से प्रवेश करती है 
–भंडरिया
27. पिपरवार, अशोक, सराधु एवं मगध कोयले की खदानें ऊपरी दामोदर घाटी के किस सामुदायिक विकास खंड में स्थित हैं
–बड़कागाँव
28. नगड़ी गाँव स्वर्णरेखा एवं किस नदी के उत्पत्ति के लिए प्रसिद्ध है
–दक्षिणी कोयल
29. मोतीझरा जलप्रपात किस नदी पर बना है
–अजय
30. भारत राज्य वन रिपोर्ट 2019 के अनुसार झारखण्ड में कुल वन आवरण क्षेत्र है 
–29.62%
31. 2019 के आँकड़ों के अनुसार झारखण्ड में प्रति व्यक्ति वन एवं वृक्ष है
–0.08 हेक्टेयर
32. झारखण्ड के किस सैंक्चुअरी का क्षेत्रफल सर्वाधिक है
–पलामू सैंक्चुअरी
33. झारखण्ड में बहिर्जात या बाह्य स्थाने संरक्षण का उदाहरण है
- बिरसा मुंडा जैव पार्क
34. देश के कुल खनिज का झारखण्ड में पाया जाता है
–40%
35. झारखण्ड की औद्योगिक पार्क नीति का वर्ष है
–2015
36. झारखण्ड में औद्योगीकरण सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कुल कितनी नीतियाँ बनायी हैं 
–16
37. झारक्राफ्ट की स्थापना कब की गयी है 
–2006
38. प्रत्यार्पण एवं पुनर्वास नीति की घोषणा की गयी थी
–2009
39.पी.वी.टी.जी. डाकिया योजना की शुरूआत की गयी थी 
–2017
40. पी.वी.टी.जी. डाकिया योजना संबंधित है
–आदिम जनजातियों से
41. झारखण्ड निर्यात नीति, 2015 के तहत 2020 तक अखिल भारतीय निर्यात में झारखण्ड का योगदान पहुंचाना है 
–2% तक
42. टाटा रोबिन्स फ्रेजर (टीआरएफ) लिमिटेड का प्रोमोशन टाटा स्टील एवं एसीसी लिमिटेड द्वारा किया गया था। टीआरएफ की स्थापना कब हुई 
–20 नवंबर, 1962
43. वित्त वर्ष 2018-19 के अंत में डीवीसी हाइडल पावर प्लान्टस की कुल स्थापित क्षमता थी
–147.2 मेगावाट
44. मूल डीड के अनुसार एचइसी के पास कितनी एकड़ भूमि है
–7199.51
45. झारखण्ड टेक्सटाइल, परिधान एवं फुटवियर नीति कब बनाई गयी थी
–2016
46. जोहार परियोजना में वित्त पोषित एजेंसी है 
–विश्व बैंक
47. पीवीटीजी डाकिया योजना कब शुरू की गयी थी
- 2017
48. झारखण्ड में किस जिले में न्यूनतम प्रतिशत क्षेत्र वनों के अंतर्गत हैं
–जामताड़ा
50. झारखण्ड के किस पार्क / सैंक्चुआरी की स्थापना सबसे पहले की गयी थी 
–पलामू सैंक्चुअरी
51. झारखण्ड वन विभाग द्वारा हर्बल डेमोन्स्ट्रेशन नर्सरी की स्थापना की गयी है 
- पेटरवार, बोकारो में
52. झारखण्ड में झरिया के पश्चात दूसरा सबसे अधिक प्रमाणित कोयला भंडार है 
–उत्तरी कर्णपुरा
53. झारखण्ड में खेती योग्य बंजर भूमि का प्रतिशत है
–4.2%
54. झारखण्ड नवीकरणीय संसाधन में समृद्ध है क्योंकि 
–प्रचुर मात्रा में जलप्रपात हैं
55. झारखण्ड में देखे गये जलवायु परिवर्तन का कारण है 
–ऊर्जा क्षेत्र, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, मानवजनित गतिविधियाँ
56. झारखण्ड राज्य जल नीति, 2011
–प्राकृतिक आपदा के प्रति भेद्यता को कम करता है
57. झारखण्ड नहर सिंचाई के मामले में बुरी तरह से पिछड़ा है क्योंकि
–पहाड़ी इलाका है 
58. झारखण्ड आपदा प्रबंधन योजना
–बुनियादी ढांचे की बहाली और मजबूती की परियोजनाएँ शुरू करना
59. खनन के प्रभावों को कम करने के लिए राज्य सरकार ने किस राज्य के मॉडल के अनुरूप विधायी उपाय लाने का प्रस्ताव लिया
–आंध्र प्रदेश
60. कौन-सा निकाय संसाधन जुटाने और शमन और अनुकूलन योजना की समय डिलिवरी सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है
–राज्य संचालन समिति
61. JAPCC द्वारा जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय योजना कब जारी की गयी
–30 जून, 2008
62. NAPCC के तहत निम्न जिला को ग्रीन इंडिया मिशन के लिए चुना गया है 
–सरायकेला-खरसावां 
63. शहरीकरण का स्तर झारखण्ड के किस जिले में झारखण्ड आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार सबसे अधिक था 
 –धनबाद
64.झारखण्ड को स्वच्छ सर्वेक्षण 2019 के लिए सबसे स्वच्छ राज्यों में कौन-सा दर्जा दिया गया है
–दूसरा
65. झारखण्ड का एकमात्र जिला जिसने 30-09-2019 तक वर्षा की सामान्य औसत सीमा (951 मिमी) से थोड़ा अधिक प्राप्त किया है, वह है
–साहेबगंज
66. झारखण्ड के लिए IPCC SRES उत्सर्जन परिदृश्य यह दर्शात है
–सर्दियों एवं वर्षाकाल के बाद
गर्माहट अपेक्षाकृत अधिक होगी
67. झारखण्ड में खरीफ मार्केटिंग सीजन किस अवधि में चलता है
–वर्ष की पहली अक्टूबर से अगले वर्ष के 
30 सितंबर तक
68. झारखण्ड के सकल राज्य मूल्य वर्धित में औद्योगिक क्षेत्र की लगभग हिस्सेदारी वर्ष 2019-20 (Pr.) में है
–39%
69. भारत सरकार ने 150 एकड़ के क्षेत्र में 120 करोड़ की लागत से प्लास्टिक पार्क की स्थापना को कहाँ मंजूरी दी है
–देवघर
70. झारखण्ड में मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद योजना कब लागू की गयी
–अगस्त, 2019
71. उस शासक का नाम बताएँ जिसने नागवंशी राज्य की राजधानी सुतियाम्बे से चुटिया स्थानांतरित की
–प्रताप राय
72. पड़हा पंचायत के प्रमुख को क्या कहते हैं
–परहा राजा
73. एक संथाल गाँव में ग्राम प्रधान के सहायक
को क्या कहते हैं
–प्रमाणिक
74. मुण्डा ग्राम के धार्मिक प्रधान को क्या कहते हैं
–पाहन
75. ढोकलो सोहोर प्रशासनिक व्यवस्था आदिवासी से संबद्ध है
–खड़िया
76. 'बिटलाहा' क्या है
–एक प्रकार की सजा
77. 'सेंदरा बैंसी' क्या है
–शिकार परिषद्
78. मुण्डा गाँव में पंचायत की बैठक किस स्थान में होती है 
–अखड़ा
79. निम्नलिखित में से कौन-सी जनजाति झारखण्ड के आधिकारिक अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल है
–बिरजिया
80. निम्नलिखत में से कौन खेरवार आंदोलन का नेता था
–भागीरथ माँझी
81. झारखण्ड की किस विभूति ने ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में झारखण्ड के आदिवासियों का ईसाई धर्म में परिवर्तन का विरोध किया था
–कार्तिक उराँव
82. बी.पी. केसरी के अनुसार निम्नलिखित में से कौन सदान नहीं है
–भूमिहार
83. किस वर्ष झारखण्ड स्वशासी परिषद् ने शपथ ली
–9 अगस्त, 1995
84. किस दल ने 1952 के आमसभा चुनाव में नारा दिया था 'झारखण्ड अबुआ, डाकु दिकु सेनुआ
–झारखण्ड पार्टी
85. हो समुदाय में 'वधु मूल्य' को क्या कहा जाता है 
–गोनोम
86. कौन-सी विभूति 1913 में 'छोटानागपुर उन्नति समाज' के गठन में शामिल थी
–थेबले उराँव
87. 'डोम्बारी बुरू' किस आंदोलन से संबंधित है
–बिरसा उलगुलान
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Sun, 10 Sep 2023 05:50:28 +0530 Jaankari Rakho
मोमेंटम झारखण्ड https://m.jaankarirakho.com/342 https://m.jaankarirakho.com/342 > सामान्य परिचय
> भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम से प्रोत्साहित होकर राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों को झारखण्ड में निवेश हेतु आकर्षित करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा मेक इन झारखण्ड पहल के तहत 'मोमेंटम झारखण्ड' का आयोजन किया गया।
> इस अभियान का लोगो ( शुभंकर) एक युवा हाथी है, जो उड़ना सीख रहा है। इस लोगो के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश की गयी है कि झारखण्ड देश का युवा राज्य है जिसमें विकास की असीम संभावनाएँ विद्यमान हैं तथा यह राज्य विकास के पथ पर तेजी से अग्रसर है।
> इसे वैश्विक निवेशक सम्मेलन-2017 (Global Investors Meet-2017) का नाम दिया गया है। 
> इस सम्मेलन का आयोजन राँची के खेलगाँव में किया गया।
> इस सम्मेलन के दौरान राँची शहर को दुल्हन की तरह सजा दिया गया था।
> इस सम्मेलन का आयोजन 16-17 फरवरी, 2017 को किया गया था।
> सम्मेलन का उद्घाटन ताना भगत स्टेडियम, खेलगाँव, राँची में 16 फरवरी को किया गया।
> सम्मेलन का समापन ताना भगत स्टेडियम, खेलगाँव, राँची में 17 फरवरी को किया गया। 
> भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी को मोमेंटम झारखण्ड का ब्रांड एम्बेस्डर बनाया गया था। 
> उद्देश्य
> झारखण्ड को भारतीय तथा विदेशी दोनों निवेशकों के लिए एक प्रमुख निवेश गंतव्य के रूप में स्थापित करना । 
> निवेशकों के समक्ष झारखण्ड में विद्यमान प्रचुर खनिज संपदा, व्यापार हेतु अनुकूल माहौल तथा गतिशील नीतियों कों प्रदर्शित करना ।
> राज्य में व्यवसाय समुदाय, सरकारी प्रतिनिधियों, निवेशकों तथा अन्य हितधारकों के बीच नेटवर्किंग का मंच प्रदान करना ।
> लक्षित क्षेत्र
> राज्य में स्टार्ट अप परिवेश को मजबूती प्रदान करना।
> महिलाओं, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा दिव्यांग उद्यमियों को प्रोत्साहित करना। 
> राज्य में उद्यमिता की संस्कृति को बढ़ावा देना। 
> प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रोजगार का सृजन ।
> राज्य की खनन क्षमता, विनिर्माण सक्षमता का उत्तोलन एवं वैश्विक निवेशकों से संबद्ध करना । 
> राज्य में निवेश की संभावनाओं तथा नीतिगत प्रोत्साहनों का प्रदर्शन।
> राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के साथ मध्यम एवं लघु उद्योगों को जोड़ना।
> B2B (व्यवसाय से व्यवसाय ) एवं B2G ( व्यवसाय से सरकार) के माध्यम से हितधारकों के बीच अंतर्क्रिया को बढ़ाना। 
> समझौता ज्ञापन (MoU)
> राज्य सरकार के विभिन्न विभागों एवं निवेशकों के बीच कुल 210 परियोजनाओं के लिए 3,10,753.12 करोड़ रूपये हेतु समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया।
> इस समझौता ज्ञापन के लागू होने पर राज्य में 2,11,226 रोजगार सृजन की संभावना है। 
> भूमि बैंक
> निवेशकों को परियोजनाओं की स्थापना हेतु भूमि बैंक से भूमि उपलब्ध कराया जाएगा। 
> राज्य में औद्योगिक विकास की स्थापना हेतु झारखण्ड औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (JIADA) महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
> यह प्राधिकरण राज्य में 4 औद्योगिक विकास प्राधिकरणों में विभाजित है
> राँची औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण 
> आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण 
> बोकारो औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण 
> संथाल परगना औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण 
> इन प्राधिकरणों द्वारा अपने-अपने क्षेत्रों में भूमि को चिन्हित कर भूमि बैंक की स्थापना की जाती है तथा इसी भूमि बैंक से औद्योगिक विकास हेतु भूमि उपलब्ध करायी जाती है। 
> निवेशकों को आकर्षित करने हेतु सरकार के पहल
> एकल खिड़की क्लीयरेंस
> एकल खिड़की क्लीयरेंस प्रणाली ।
> जरूरी अनुमोदनों की पहचान हेतु अंतर्क्रियात्मक (interactive) प्रणाली। 
> सभी प्रक्रियाओं, समयसीमा तथा प्रारूपों आदि सूचनाओं तक आसान पहुँच।
> उत्तरदायी एवं आसान प्रक्रिया
> गैर-अनुपालन पर परिभाषित दंडात्मक कारवाई। 
> प्रोत्साहन हेतु संयुक्त आवेदन ।
> कम समयसीमा
> एक दिन में व्यावसायिक कर पंजीकरण ।
> 72 घंटों के अंदर निरीक्षण - पीसीबी, वन, शहरी, वाणिज्यिक कर एवं श्रम विभाग। 
> 30 दिनों के अंदर जल आवंटन का अनुमोदन।
> पर्यावरण अनुपालन में आसानी
> 58 क्षेत्रकों के लिए प्रदूषण क्लीयरेंस आवश्यक नहीं । 
> आसान नियमन 
> 14 श्रमिक कानूनों में एकल संयुक्त निरीक्षण |
> 5 वर्षों में एक बार निरीक्षण |
> औद्योगिक लाइसेंस की पाँच वर्ष तक वैधता ।
> ऑनलाईन पंजीकरण एवं आवेदन प्रक्रिया
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Sun, 10 Sep 2023 05:40:39 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के प्रमुख व्यक्तित्व https://m.jaankarirakho.com/341 https://m.jaankarirakho.com/341 जनजातीय विद्रोह से संबंधित व्यक्तित्व
1. बिरसा मुण्डा
> बिरसा मुण्डा का जन्म 15 नवंबर, 1875 ई. को उलिहातू गाँव (खूँटी) में मुण्डा परिवार में हुआ था। (नोट : बिरसा मुण्डा के जन्मदिवस को केन्द्र सरकार ने वर्ष 2021 से आदिवासी जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है।)
इ> नका जन्म सोमवार को हुआ था परंतु परिवार द्वारा बृहस्पतिवार के आधार पर इनका नाम बिरसा रखा गया। बिरसा मुण्डा के बचपन का नाम दाउद मुण्डा था।
> बिरसा मुण्डा के पिता का नाम सुगना मुण्डा था, जो उलिहातू गाँव के बंटाईदार थे।
> बिरसा मुण्डा की माता का नाम कदमी मुण्डा था।
> बिरसा मुण्डा के बड़े भाई का नाम कोन्ता मुण्डा था।
> बिरसा मुण्डा के प्रारंभिक शिक्षक का नाम जयपाल नाग था।
> बिरसा मुण्डा के धार्मिक गुरू का नाम आनंद पाण्डे था। ये वैष्णव धर्मावलंबी थे।
> बिरसा मुण्डा ने जर्मन एवेंजेलिकल चर्च द्वारा संचालित विद्यालय में अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। 
> छात्र जीवन में चाईबासा के भूमि आंदोलन से जुड़ने के बाद बिरसा मात्र 18 वर्ष की आयु में चक्रधरपुर के जंगल आंदोलन से जुड़ गये।
> इन्होनें वन और भूमि पर आदिवासियों के प्राकृतिक अधिकार के लिए व्यापक लड़ाई लड़ी। 
> बिरसा मुण्डा ने जमींदारों और साहूकारों द्वारा मूलवासियों के खिलाफ निर्णायक बगावत का नेतृत्व भी किया। 
> 1895 ई. में बिरसा मुण्डा ने स्वयं को सिंगबोंगा का दूत घोषित कर दिया।
> बिरसा मुण्डा ने एक नये पंथ की शुरूआत की जिसका नाम 'बिरसाइत पंथ' है। इसमें अनेक देवी-देवताओं के स्थान पर केवल सिंगबोंगा की अराधना (एकेश्वरवाद) पर बल दिया गया।
> बिरसाइत पंथ में उपासना हेतु सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में गाँव के सरना (उपासना) स्थल को मान्यता दी गयी । 
> बिरसा मुण्डा ने अहिंसा का समर्थन करते हुए पशु बलि का विरोध किया तथा हड़िया सहित सभी प्रकार के मद्यपान के त्याग का उपदेश दिया। अपने उपदेशों में बिरसा ने जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण करने पर बल दिया।
> बिरसा मुण्डा झारखण्ड के प्रमुख आदिवासी नेता  थे। इन्होने 1895-1900 ई. के उलगुलान विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया।
> डोम्बारी बुरू पहाड़ बिरसा आंदोलन का प्रमुख केन्द्र बिन्दु था।
> 1895 ई. में बिरसा को अंग्रेज सरकार द्वारा षड़यंत्र रचने के आरोप में 2 वर्ष की जेल तथा 50 रूपये जुर्माने की सजा मिली थी। बिरसा मुण्डा को जी. आर. के. मेयर्स (डिप्टी सुपरिटेन्डेंट) द्वारा गिरफ्तार किया गया था। जुर्माना न चुकाने के कारण सजा की अवधि को 6 माह के लिए विस्तारित कर दिया गया था। 
> 1900 ई. में उन्हें पुन: गिरफ्तार किया गया तथा 9 जून, 1900 ई. को राँची जेल में हैजा नामक बिमारी से बिरसा की मृत्यु हो गयी। 
( नोट : 15 नवंबर, 2021 को इस राँची जेल परिसर में 'भगवान बिरसा मुण्डा स्मृति उद्यान सह स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय' का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वीडियो कॉफ्रेंसिंग के माध्यम से किया गया। )
> बिरसा मुण्डा को गिरफ्तार करवाने हेतु अंग्रेजों ने 500 रूपये का ईनाम रखा था। यह ईनाम बिरसा मुण्डा की गिरफ्तारी में सहयोग करने हेतु जगमोहन सिंह के आदमी वीर सिंह महली आदि को दिया गया था। 
> बिरसा मुण्डा के जन्म दिवस पर ही 15 नवंबर, 2000 को झारखण्ड राज्य का निर्माण किया गया।
> बिरसा मुण्डा झारखण्ड के एकमात्र आदिवासी नेता हैं जिनका चित्र संसद के केन्द्रीय कक्ष में लगाया गया है। 
> प्रसिद्ध उपन्यासकार महाश्वेता देवी ने बिरसा मुण्डा के जीवन को आधार बनाकर 1975 ई. में 'अरण्येर अधिकार' (जंगल का अधिकार) नामक उपन्यास की रचना की है।
2. सिद्धू- कान्हु
> अंग्रेज शासकों, जमींदारों तथा साहूकारों के विरूद्ध 1855-56 में प्रारंभ संथाल विद्रोह का नेतृत्व चार मूर्मू नेताओं सिद्धू, कान्हु, चाँद तथा भैरव ने किया।
> सिद्धू का जन्म 1815 ई., कान्हु का जन्म 1820 ई., चाँद का जन्म 1825 ई. तथा भैरव का जन्म 1835 ई. में हुआ था।
> 1855 ई. में मूर्मू बंधुओं ने भोगनाडीह (मूर्मू बंधुओं का गाँव) में विद्रोह (हूल) का निर्णय लिया तथा सिद्धू द्वारा यहाँ 'करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो' का नारा दिया गया।
> अंग्रेजों द्वारा संथाल विद्रोह के विरूद्ध कार्रवाई में चाँद तथा भैरव की गोली लगने से मौत हुई और सिद्धू तथा कान्हु को गिरफ्तार कर फाँसी दी गई ।
> मूर्मू बंधुओं के पिता चुन्नी माँझी थे तथा सिद्धू की पत्नी का नाम सुमी था।
3. तिलका माँझी
> तिलका माँझी का दूसरा नाम जाबरा पहाड़िया था।
> तिलका माँझी का जन्म तिलकपुर नामक गाँव (सुल्तानगंज, भागलपुर) में 11 फरवरी, 1750 को संथाल परिवार में हुआ था।
> तिलका माँझी संथाल (मुर्मू) जनजाति के थे। 
> इनके पिता का नाम सुंदरा मूर्मू था।
> तिलका माँझी अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह करने वाले प्रथम आदिवासी थे। अतः उन्हें 'आदि विद्रोही' भी कहा जाता है।
> तिलका माँझी ने वनचरीजोर (भागलपुर) से अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह प्रारंभ किया। साल पत्ता इस विद्रोह का प्रतीक चिह्न था जिसके द्वारा घर-घर संदेश भेजकर संथालों को संगठित किया गया। 
> तिलका माँझी ने भागलपुर पर अपने आक्रमण के क्रम में क्लिवलैंड को तीर से मार गिराया था।
> 1785 ई. में तिलका माँझी को भागलपुर में बरगद के पेड़ पर फाँसी दे दी गई।
> झारखण्ड के स्वतंत्रता सेनानियों में सर्वप्रथम शहीद होने वाले स्वतंत्रता सेनानी तिलका माँझी हैं। 
> तिलका माँझी के नाम पर ही 1991 में भागलपुर विश्वविद्यालय का पुनः नामकरण तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय के रूप में किया गया।
4. भागीरथ माँझी
> भागीरथ माँझी का जन्म तलडीहा (गोड्डा) में खरवार जनजाति में हुआ था।
> भागीरथ माँझी को बाबाजी के नाम से भी जाना जाता है।
> भागीरथ माँझी ने 1874 ई. में खरवार आंदोलन  का प्रारंभ किया। प्रारंभ में यह आंदोलन एकेश्वरवाद तथा सामाजिक सुधार की शिक्षा के प्रसार पर केंद्रित था, परन्तु बाद में यह आंदोलन राजस्व बन्दोबस्ती के विरूद्ध एक जन आंदोलन में परिणत हो गया।
> भागीरथ माँझी ने स्वयं को राजा घोषित कर जमींदारों को कर न देने की अपील की । इसके परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
> 1877 ई. में भागीरथ माँझी रिहा किए गये तथा 1879 ई. में उनकी मृत्यु हो गयी। 
5. बुद्ध भगत
> बुद्ध भगत का जन्म 18 फरवरी, 1792 ई. को सिल्ली गाँव (राँची) में एक उराँव परिवार में हुआ था। 
> बुद्धु भगत ने 1828-32 तक हुए लरका महाविद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया। 
> बुद्धु भगत 1831-32 के कोल विद्रोह के प्रमुख नेता थे।
> बुद्धु भगत छोटानागपुर के प्रथम क्रांतिकारी थे जिन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेज सरकार ने 1,000 रूपये ईनाम की घोषणा की थी।
> बुद्ध भगत की मृत्यु 14 फरवरी, 1832 ई. को कैप्टेन इम्पे के नेतृत्व में सैनिक कार्रवाई में हुयी जिसमें उनके साथ भाई, बेटे व भतीजे सहित लगभग 150 लोगों की मृत्यु हो गयी।
6. जतरा भगत
> जतरा भगत का जन्म 2 अक्टूबर, 1888 को चिंगरी नावाटोली गाँव (विशुनपुर, गुमला) में एक उराँव परिवार के घर में हुआ।
> जतरा भगत के पिता का नाम कोहरा भगत तथा माता का नाम लिबरी भगत था। उनकी पत्नी का नाम बुधनी भगत था।
> 1914 ई. में उन्हें हेसराग गाँव के तुरिया भगत से मति का प्रशिक्षण प्राप्त करते समय आत्मबोध की प्राप्ति हुई तथा इसके बाद उन्होनें ताना भगत आंदोलन प्रारंभ किया। 
> ताना भगत आंदोलन एक संस्कृतिकरण आंदोलन है जो गाँधीजी के आंदोलन से प्रभावित था।
> जतरा भगत की मृत्यु 1916 ई. में हुई।
> देश की आजादी के बाद सन् 1948 में भारत सरकार द्वारा ताना भगत रैयत कृषि भूमि पुनर्वापसी अधिनियम पारित किया गया था।
7. रघुनाथ महतो
> रघुनाथ महतो का जन्म घुटियाडीह गाँव ( सरायकेला-खरसावां ) में हुआ था।
> रघुनाथ महतो ने चुआर विद्रोह के प्रथम चरण को नेतृत्व प्रदान किया था।
> 1769 ई. में उन्होनें ‘अपना गाँव अपना राज, दूर भगाओ विदेशी राज' का नारा दिया। 
> रघुनाथ महतो ने अंग्रेजों के विरूद्ध व्यापक विद्रोह किया जिसमें छापामार पद्धति का अधिकाधिक प्रयोग किया गया। 
> 1778 ई. में लोटागाँव के समीप एक सभा के दौरान अंग्रेज सैनिकों द्वारा रघुनाथ महतो को गोली मार दी गयी जिसमें उनकी मृत्यु हो गयी।
8. गंगा नारायण सिंह
> गंगा नारायण सिंह का जन्म बाड़भूम (वीरभूम) राज परिवार में हुआ था।
> इन्होनें 1832-33 ई. में मानभूम के भूमिज विद्रोह का नेतृत्व किया था। इस विद्रोह को अंग्रेजों ने 'गंगा नारायण का हंगामा' कहा।
> 7 फरवरी, 1833 को खरसावां के ठाकुर चेतन सिंह के सैनिकों के द्वारा गंगा नारायण सिंह की हत्या कर दी गई। 
9. तेलंगा खड़िया
> तेलंगा खड़िया का जन्म 9 सितम्बर, 1806 ई. को मुर्ग गाँव (गुमला) में खड़िया जाति के कृषक परिवार में हुआ था।
> उनके पिता का नाम ढुइया खड़िया तथा माता का नाम पेतो खड़िया था।
> तेलंगा खड़िया ने 1849-50 ई. में अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया।
> 22 अप्रैल, 1880 को बोधन सिंह नामक व्यक्ति ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।
> गुमला में उनके शव को दफनाये गये स्थान को 'तेलंगा तोपा टांड' कहा जाता है। 
> 10. रानी सर्वेश्वरी
> रानी सर्वेश्वरी संथाल परगना के सुल्तानाबाद की रानी थी ।
> रानी सर्वेश्वरी ने 1781-82 में पहाड़िया सरदारों के सहयोग से संथाल परगना क्षेत्र में विद्रोह किया था। 
> 6 मई, 1807 को भागलपुर जेल में रानी सर्वेश्वरी की मृत्यु हो गयी ।
11. पोटो सरदार
> पोटो सरदार झारखण्ड के प्रमुख आदिवासी आंदोलनकारी थे। इन्होनें अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोहों में प्रमुखता से भाग लिया था।
> इन्होनें सिंहभूम में लोगों को एकजुट कर कई अंग्रेज सैनिकों की हत्या की थी।
> ब्रिटिश सरकार द्वारा 1 तथा 2 जनवरी, 1838 को पोटो सरदार सहित 7 हो (मुंडा) आदिवासियों को सिंहभूम में ब्रिटिश सैनिकों की हत्या के आरोप में फाँसी की सजा सुनाई गयी । 
> पोटो सरदार का संबंध मुंडा जनजाति से था।
> 1857 के विद्रोह से संबंधित व्यक्तित्व
1. जमादार माधव सिंह, सूबेदार नादिर अली खाँ तथा सूबेदार जयमंगल पाण्डेय
> 1857 के विद्रोह में अंग्रेजी सेना में शामिल जमादार माधव सिंह, सूबेदार नादिर अली खाँ तथा सूबेदार जयमंगल पाण्डेय ने लेफ्टिनेंट ग्राहम के नेतृत्व में हजारीबाग जाने के क्रम में रामगढ़ में विद्रोह कर दिया।
> 3 अक्टूबर को नादिर अली खाँ तथा जयमंगल पाण्डेय को अंग्रेजी सेना द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया तथा 4 अक्टूबर को दोनों को फाँसी दे दी गई, जबकि माधव सिंह अंग्रेजी सेना से बचकर भाग निकला।
2. पाण्डेय गणपत राय
> 1857 के विद्रोह में हजारीबाग के विद्रोहियों ने पाण्डेय गणपत राय की सहायता से नागवंशी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव से संपर्क स्थापित किया था।
> 21 अप्रैल, 1858 को पाण्डेय गणपत राय को राँची में कमिश्नर कंपाउंड (वर्तमान जिला स्कूल) में एक पेड़ पर फाँसी दे दी गई।
3. ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव
> 1857 के विद्रोह में ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने हजारीबाग के विद्रोहियों का नेतृत्व किया था । 
> विश्वनाथ दुबे तथा महेश नारायण शाही के विश्वासघात के कारण अंग्रेजों ने ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को गिरफ्तार कर लिया।
> 16 अप्रैल, 1858 को राँची के कमिश्नर कंपाउंड ( वर्तमान जिला स्कूल) में एक पेड़ पर ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को अंग्रेज सरकार द्वारा फाँसी दे दी गई ।
4. टिकैत उमराव सिंह
> टिकैत उमराव सिंह ओरमाँझी के 12 गाँवों के जमींदार थे।
> अंग्रेजों द्वारा विद्रोहियों में भय उत्पन्न करने हेतु कैप्टेन मैक्डोनाल्ड की मद्रासी सेना की सहायता से टिकैत उमराव सिंह को उनके दीवान शेख भिखारी एवं भाई घासी सिंह के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। 
> 8 जनवरी, 1858 को राँची के टैगोर हिल के पास उन्हें फाँसी दे दी गई ।
5. राजा नीलमणि सिंह
> राजा नीलमणि सिंह 1857 के विद्रोह के समय पंचेत के राजा थे तथा इन्होनें संथालों को अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह करने के लिए उकसाया।
> कैप्टेन माउण्ट गोमरी ने नबंबर, 1857 में इन्हें गिरफ्तार कर कोलकाता के अलीपुर जेल भेज दिया। 
6. राजा अर्जुन सिंह
> राजा अर्जुन सिंह 1857 के विद्रोह के समय पोरहाट के राजा थे तथा इन्होनें चाईबासा के विद्रोही सैनिकों को शरण प्रदान की थी।
> 1857 की क्रांति में राजा अर्जुन सिंह संपूर्ण सिंहभूम क्षेत्र में क्रांतिकारियों के प्रमुख नेता थे। 
> राजा अर्जुन सिंह की मृत्यु वाराणसी में हुयी ।
7. नीलांबर-पीतांबर
> 1857 के विद्रोह को पलामू क्षेत्र में नीलांबर-पीतांबर ने नेतृत्व प्रदान किया।
> अपने पारिवारिक सदस्यों के साथ एक गुप्त स्थान पर जाने के क्रम में जासूसों द्वारा खबर दिये जाने पर नीलांबर पीतांबर को गिरफ्तार कर लिया गया तथा अप्रैल, 1859 में लेस्लीगंज (पलामू) में फाँसी दे दी गई। 
8. शेख भिखारी
> शेख भिखारी का जन्म 1831 ई. में राँची के ओरमाँझी (होक्टे गांव ) में हुआ था। 
> ये ठाकुर विश्वनाथ राय के दीवान थे।
> 1857 के विद्रोह में इन्होनें बड़कागांव की फौज में राँची एवं चाईबासा से नवयुवकों को भर्ती करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
> 8 जनवरी, 1858 को चूट्टूपाल घाटी की पहाड़ी पर इन्हें अंग्रेजों द्वारा फाँसी दी गयी।
> राष्ट्रीय आंदोलन से संबंधित व्यक्तित्व
1. जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा
> जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा का जन्म 3 मार्च, 1839 को नौसारी (गुजरात) में हुआ था।
> इनके पिता का नाम नौशेरवानजी तथा माता का नाम जीवनबाई था।
> इन्होनें 1887 ई. में नागपुर में कपड़ा बुनाई मिल के रूप में 'इम्प्रेस कॉटन मिल' तथा सूत कताई मिल के रूप में 'टाटा स्वदेशी मिल' की स्थापना की।
> टाटा स्टील (टिस्को) की स्थापना का प्रारंभिक विचार इन्होनें ही दिया। यही कारण है कि इन्हें टाटा कंपनी का संस्थापक माना जाता है।
> इन्होनें बेंगलुरू में भारतीय विज्ञान संस्थान ( Indian Institute of Science) तथा मुंबई में होटल ताज की स्थापना की। 
> 19 मई, 1904 को जर्मनी में जे. एन. टाटा की मृत्यु हो गयी।
( नोट टाटा स्टील (टिस्को) की स्थापना सन् 1907  ई० में दोराबजी टाटा द्वारा की गयी थी। इन्हें टाटा स्टील का वास्तविक संस्थापक माना जा सकता है। )
2. सखाराम गणेश देउस्कर
> सखाराम गणेश देउस्कर का जन्म मराठा परिवार में देवघर में हुआ था। 
> देउस्कर ने बांग्ला भाषा में कई पुस्तकों की रचना की है जिनमें तिलकेर मुकदमा, देशोर कथा (1904) आदि प्रमुख हैं। देशोर कथा में इन्होनें भारत पर अंग्रेजी राज्य के प्रतिकूल आर्थिक परिणामों का विवेचन किया है। इस पुस्तक को अंग्रेज सरकार द्वारा 1910 ई. में प्रतिबंधित कर दिया गया।
> देउस्कर बांग्ला दैनिक 'हितवादी' के उपसंपादक भी थे।
3. नागरमल मोदी
> नागरमल मोदी स्वदेशी आंदोलन की शुरूआत करने वाले महत्वपूर्ण लोगों में शामिल थे।
> इन्होनें 1935 ई. में विधवा तथा निराश्रित महिलाओं के लिए अबला आश्रम की स्थापना की।
4. राम नारायण सिंह
> राम नारायण सिंह का जन्म तेतरिया (चतरा) में हुआ था तथा वे पेशे से वकील थे।
> महात्मा गाँधी के आह्वान पर वे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गये।
> 1940 ई. में कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में महात्मा गाँधी ने उन्हें छोटानागपुर केसरी की उपाधि दी।
> 'स्वराज लुट गया' राम नारायण सिंह की प्रसिद्ध रचना है।
5. जहाँगीरजी रतनजी दादाभाई ( जे.आर.डी.) टाटा
> जे. आर. डी. टाटा का जन्म 29 जुलाई, 1904 को पेरिस (फ्रांस) में हुआ था।
> इनके पिता का नाम जे. एन. टाटा तथा माता का नाम सूनी था। इनकी माँ फ्रांसीसी थीं।
> 1929 ई. में विमान उड्डयन का लाइसेंस पाने वाले वे भारत के प्रथम व्यक्ति थे।
> जे. आर. डी. टाटा ने सन् 1932 में टाटा एयरलाइंस की स्थापना की। इन्हें भारत में 'नागरिक उड्ययन का जन्मदाता' कहा जाता है।
> टाटा एयरलाइंस का नाम बदलकर बाद में एयर इण्डिया कर दिया गया तथा 1953 ई. में इसका राष्ट्रीयकरण कर दिया गया।
> 1944-45 में भारत में आर्थिक विकास से संबंधित बॉम्बे प्लान को प्रस्तुत करने वाले दल में जे. आर. डी. टाटा भी शामिल थे।
> जे. आर. डी. टाटा ने 1945 ई. में मुंबई में टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ फण्डामेंटल रिसर्च (TIFR) की स्थापना की।
> जे. आर. डी. टाटा भारत रत्न (1992) प्राप्त करने वाले प्रथम उद्योगपति हैं।
> वे टाटा समूह के चौथे अध्यक्ष थे। इन्होनें सन् 1938 से 1991 तक टाटा समूह के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया।
> झारखण्ड आंदोलन से संबंधित व्यक्तित्व
1. जयपाल सिंह
> जयपाल सिंह का जन्म 3 जनवरी, 1903 ई. को टकरा गाँव (खूँटी) में एक मुण्डा परिवार में हुआ था। 
> जयपाल सिंह का मूल नाम वेनन्ह पाह था । इसाई धर्म अपनाने पर इनका नाम ईश्वर दास हुआ तथा खूँटी के पुरोहित द्वारा इनका नामकरण जयपाल सिंह किया गया।
> जयपाल सिंह की पत्नी का नाम तारा मजुमदार था, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी की पुत्री थी ।
> जयपाल सिंह का दूसरा विवाह जहाँआरा से हुआ जो ब्रिटिश फौज के कर्नल रोनाल्ड कार्टिश की पत्नी थी। 
> जयपाल सिंह की कुशाग्र बुद्धि से प्रभावित होकर सेंट पाल हाई स्कूल के हेडमास्टर केनन कोसग्रेव ने उन्हें उच्च शिक्षा ग्रहण करने हेतु इंग्लैंड भेज दिया।
> 1928 ई. के एम्सटर्डम (नीदरलैंड) में आयोजित ओलंपिक में जयपाल सिंह ने भारतीय हॉकी टीम का नेतृत्व किया। इस ओलंपिक में भारत ने अपना पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक पुरूष हॉकी में प्राप्त किया। 
> जयपाल सिंह ने 1939 में आदिवासी महासभा के गठन में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया।
> सन् 1950 में जयपाल सिंह ने पृथक झारखण्ड की मांग को लेकर झारखण्ड पार्टी का गठन किया। पृथक झारखण्ड की मांग करने वाले वे पहले नेता थे।
> वर्ष 1952 तथा 1957 के आम चुनावों में झारखण्ड क्षेत्र में झारखण्ड पार्टी को भारी सफलता प्राप्त हुई तथा यह पार्टी बिहार विधान सभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी।
> 20 मार्च, 1970 को मस्तिष्क रक्तस्राव (Brain Haemorrhage) से जयपाल सिंह की नई दिल्ली में मृत्यु हो गयी।
> जयपाल सिंह को मुण्डा राजा तथा मरंङ गोमके * की संज्ञा भी दी जाती है। 
2. जुएल लकड़ा
> जुएल लकड़ा का जन्म मुरगू गाँव (राँची) में एक उराँव परिवार में हुआ था।
> जुएल लकड़ा ने 1915 ई. में छोटानागपुर उन्नति समाज की स्थापना की थी।
> इन्होनें यंग छोटानागपुर टीम के नाम से हॉकी तथा फुटबाल टीम का भी गठन किया था।
> जुएल लकड़ा झारखण्ड राज्य से पद्मश्री पुरस्कार (अक्टूबर, 1947 ) पाने वाले प्रथम आदिवासी हैं।
> 13 सितम्बर, 1994 ई. को जुएल लकड़ा की मृत्यु हो गयी।
3. विनोद बिहारी महतो
> विनोद बिहारी महतो को आदिवासियों के झारखण्ड आंदोलन को झारखण्डियों के आंदोलन में परिणत करने हेतु जाना जाता है।
> इन्होनें सन् 1969 में कुर्मी समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों को दूर करने हेतु शिवाजी समाज की स्थापना की।
> 1973 में गठित झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक सदस्यों में विनोद बिहारी महतो भी शामिल रहे हैं। वे झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के प्रथम अध्यक्ष बने।
> विनोद बिहारी महतो को लोग प्यार से बाबू के नाम से पुकारते थे। 
4. शिबू सोरेन
> शिबू सोरेन का जन्म 1942 ई. में नेमरा (रामगढ़) नामक स्थान पर हुआ था ।
> शिबू सोरेन का मूल नाम शिवचरण लाल महतो है।
> इनके पिता का नाम सोबरन माँझी तथा माता का नाम सोनामनी है।
> इन्होनें जयपाल सिंह के निधन के बाद पृथक झारखण्ड राज्य आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया।
> शिबू सोरेन ने 1970 ई. में सोनोत (शुद्ध) संथाल समाज का गठन किया।
> 1973 ई. में गठित झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक सदस्यों में शिबू सोरेन भी शामिल रहे हैं। वे झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के प्रथम महासचिव बने ।
> 1978 ई. में शिबू सोरेन के नेतृत्व में जंगल काटो अभियान चलाया गया जिसमें केन्द्र सरकार द्वारा हस्तक्षेप किया गया।
> 1986 ई. में निर्मल महतो के साथ मिलकर शिबू सोरेन ने ऑल झारखण्ड स्टूडेन्ट्स यूनियन (आजसू) का गठन किया।
> शिबू सोरेन द्वारा संचालित आंदोलन के दबाव में केन्द्र सरकार द्वारा 1989 में 'झारखण्ड विषयक समिति' का गठन किया गया तथा 1995 में बिहार सरकार द्वारा 'झारखण्ड एरिया ऑटोनोमस काउंसिल' का गठन किया गया।
> शिबू सोरेन तीन बार झारखण्ड राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
> शिबू सोरेन को दिशोम गुरू तथा गुरूजी के नाम से भी जाना जाता है।
> झारखण्ड के अन्य प्रमुख व्यक्तित्व के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य 
> ठेबले उराँव ने 1930 ई. में 'किसान सभा' की स्थापना की। इसके सचिव पाल दयाल थे। ये 'सनातन आदिवासी महासभा' से भी जुड़े थे।
> बोनिफेस लकड़ा ने 1933 ई. में ‘छोटानागपुर कैथोलिक सभा' की स्थापना की। इस सभा के प्रथम महासचिव इग्नेस बेक थे।
> सुशील कुमार बागे ने मुण्डारी पत्रिका 'जगर सड़ा' का संपादन किया।
> बागुन सुम्ब्रई ने 1967 ई. में 'ऑल इण्डिया झारखण्ड पार्टी' का गठन किया।
> कार्तिक उराँव ने 1968 ई. में 'अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद्' की स्थापना की। इन्होनें ईसाई मिशनरियों द्वारा झारखण्ड के आदिवासियों को ईसाई धर्म में परिवर्तन का घोर विरोध किया था। 
> अजीत कुमार राय ( ए. के. राय) ने धनबाद कोयला खदानों के मजदूरों को संगठित कर मजदूर आंदोलन चलाया। इन्होनें 1971 ई. में 'मार्क्सवादी समन्वय समिति' का गठन किया। अलग झारखण्ड राज्य की मांग को लेकर इन्होनें 'लालखंड' का नारा दिया था।
> के. सी. हेम्ब्रम स्वायत्त कोलाहिस्तान की मांग करने वाले प्रथम नेता हैं। इन्हें बिहार सरकार द्वारा देशद्रोही करार दिया जा चुका है।
> भारतीय थल सेना में शामिल झारखण्ड के अल्बर्ट एक्का ने भारत-पाक युद्ध, 1971 में वीरता से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र पाने वाले वे झारखण्ड के प्रथम एवं एकमात्र सैनिक हैं। 
> ललित मोहन राय अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध चित्रकार हैं जिन्हें 1989 ई. में कलाश्री सम्मान प्रदान किया जा चुका है। इनके चित्रों में मुख्यतः आदिवासी जनजीवन को प्रदर्शित किया जाता है।
> पद्मभूषण सम्मान प्राप्त फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम में हुआ था तथा वे बाद में झारखण्ड के निवासी बन गये। इन्होनें भारत में हिन्दी विषय में पहली बार हिन्दी माध्यम में शोध किया। इनके शोध का विषय 'रामकथा : उत्पत्ति एवं विकास * था। इन्होनें कई हिन्दी रचनाओं के अतिरिक्त हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोष की भी रचना की।
> डॉ० गाब्रियल हेम्ब्रम झारखण्ड में जड़ी-बुटी के प्रसिद्ध विशेषज्ञ हैं। गुमला जिले के निवासी श्री हेम्ब्रम अपनी दवाओं से कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी का भी इलाज करते हैं ।
> कड़िया मुण्डा झारखण्ड से भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा सांसद तथा लोकसभा के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। वर्ष 2019 में समाज सेवा के क्षेत्र में योगदान हेतु इन्हें पद्मभूषण सम्मान प्रदान किया गया है।
> बाबूलाल मरांडी झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री हैं। अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार में बाबूलाल मरांडी केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री के पद पर आसीन रह चुके हैं।  इन्होनें 'झारखण्ड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) ' नामक राजनीतिक पार्टी की स्थापना की।  26 अक्टूबर, 2007 को गिरिडीह-जमुई की सीमा पर स्थित चिलखारी नामक स्थान पर एक नक्सली वारदात में इनके पुत्र अनुप मरांडी सहित 20 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी थी।
> यशवंत सिन्हा झारखण्ड के प्रमुख राजनीतिज्ञ हैं। श्री सिन्हा भारत के वित्त मंत्री भी रह चुके हैं। श्री सिन्हा द्व रा वर्ष 2001 से प्रातः 11 बजे लोकसभा में बजट प्रस्तुत करने की परंपरा प्रारंभ की गयी। इससे पूर्व बजट का प्रस्तुतीकरण सांय 5 बजे किया जाता था। 
> पलामू में जन्मे भीष्म नारायण सिंह केन्द्रीय मंत्री के अतिरिक्त असम तथा तमिलनाडु के राज्यपाल रह चुके हैं। 
> सीमोन उराँव ने निरक्षरता के बावजूद अपनी लगन तथा कुशाग्र बुद्धि से ग्रामीण खुशहाली हेतु कई प्रयत्न किए। इन्होनें सामुदायिक स्तर पर जल संरक्षण एवं उसके समुचित उपयोग का सफल क्रियान्वयन किया। इनके कार्यों से प्रभावित होकर कैंब्रिज विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने "How to practically converse the forest in Jharkhand" विषय पर शोध कर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की है।
> डॉ० रामदयाल मुण्डा झारखण्ड से राज्यसभा के लिए मनोनीत होने वाले प्रथम व्यक्ति हैं। श्री मुण्डा को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2007 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार तथा वर्ष 2010 में सांस्कृतिक योगदान हेतु पद्मश्री सम्मान प्रदान किया जा चुका है। 30 सितम्बर, 2011 को राँची में श्री मुण्डा का निधन हो गया। 
> पंडित रघुनाथ मुर्मू ने संथाली लिपि 'ओलचिकी' का आविष्कार किया।
> मुकुंद नायक नागपुरी लोकसंगीत तथा नृत्य के प्रसिद्ध कलाकार हैं तथा राँची में इन्होनें अपनी लोककला के विकास हेतु ‘कुंजवन' की स्थापना की है।
> सचिन दा संयुक्त शांति पदक से सम्मानित होने वाले प्रथम भारतीय छायाकार हैं।
> हरेन ठाकुर प्रसिद्ध चित्रकार हैं तथा इन्होनें 'बिजुका' को केंद्रबिन्दु मानकर एक श्रृंखला में अपनी पेंटिंग प्रस्तुत की है।
> बुलू इमाम ने जनजातीय लोककला 'सोहराय' तथा 'कोहबर' को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलायी है। वर्ष 2019 में इन्हें पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया जा चुका है।
> जमुना टुडू को 'लेडी टार्जन' के नाम से जाना जाता है। पर्यावरण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु इन्हें 2019 में पद्मश्री सम्मान दिया जा चुका है।
> दिगंबर हांसदा को शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु 2018 में पद्मश्री सम्मान मिल चुका है। 
> सिमोन उराँव प्रख्यात पर्यावरणविद् हैं। इन्होनें लकड़ी की तस्करी को रोकने हेतु 'जंगल सुरक्षा समिति' का गठन किया है। इन्हें ‘पानी बाबा' के नाम से भी जाना जाता है । 2016 में इन्हें पद्मश्री पुरस्कार दिया जा चुका है। 
> राजकुमार सुधेन्द्र नारायण सिंह देव सरायकेला शैली के छऊ नृत्य के अंतर्राष्ट्रीय नर्तक एवं नृत्य निर्देशक नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
> पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त केदारनाथ साहू छऊ नृत्य के विश्वविख्यात कलाकार हैं। 
> श्रीप्रकाश झारखण्ड के संजीदा विषयों पर डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण हेतु प्रख्यात हैं। यूरेनियम खान के दुष्प्रभाव का प्रदर्शन करने वाली इनकी फिल्म 'बुद्धा विप्स इन जादूगोड़ा' को अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। 
> चामी मुर्मू को भारत सरकार द्वारा 'इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्ष मित्र' सम्मान से नवाजा जा चुका है।
> दयामनी बरला को ग्रामीण पत्रकारिता हेतु 'काउंटर मीडिया अवार्ड' से सम्मानित किया जा चुका है। इन्हें ‘आयरन लेडी ऑफ झारखण्ड' कहा जाता है।
> आर. के. आनन्द झारखण्ड ओलंपिक संघ के अध्यक्ष हैं।
> अमिताभ चौधरी झारखण्ड राज्य क्रिकेट एसोशिएशन के अध्यक्ष हैं।
> शेखर बोस प्रसिद्ध बॉलीबॉल प्रशिक्षक हैं।
> सावित्री पुर्त्ती झारखण्ड राज्य की प्रथम आदिवासी अंतर्राष्ट्रीय महिला हॉकी खिलाड़ी हैं। 
> राजीव गाँधी खेल रत्न, पद्मश्री तथा पद्मभूषण सम्मान प्राप्त महेन्द्र सिंह धोनी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान हैं। धोनी की कप्तानी में भारतीय टीम 2011 का विश्व क्रिकेट कप जीतने में सफल रही है। 
> जमशेदपुर के सौरभ तिवारी भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य हैं।
> जमशेदपुर के वरूण एरोन भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज हैं। 
> झारखण्ड की दीपिका कुमारी विश्व स्तर पर प्रसिद्ध तीरंदाज हैं। इन्होनें टाटा धनुर्विद्या अकादमी, जमशेदपुर से प्रशिक्षण प्राप्त किया है। इन्हें 2016 में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।
> झानो हांसदा ने तीरंदाजी के क्षेत्र में एशियन चैंपियन में स्वर्ण, विश्व कप आर्चरी में स्वर्ण तथा अन्य कई प्रतियोगिताओं में विभिन्न खिताब हासिल किया है।
> सुबोध कुमार सैफ फुटबाल चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम के सदस्य रह चुके हैं। 
> सुमेराय टेटे अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हॉकी खिलाड़ी हैं। इन्होनें भारतीय महिला हॉकी टीम का नेतृत्व किया है। 
> अंसुता लकड़ा भारतीय महिला हॉकी टीम की सदस्य हैं। 
> विमल लकड़ा भारतीय हॉकी टीम के प्रमुख सदस्य रह चुके हैं।
> राहुल बनर्जी टाटा आर्चरी एकेडमी से जुड़े हैं। इन्होनें राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। 
> अरूणा मिश्रा ने 2004 तथा 2005 के एशियन गेम्स में मुक्केबाजी का स्वर्ण पदक प्राप्त किया है। 
> जमशेदपुर के इम्तियाज अली बॉलीवुड के प्रख्यात निर्देशक हैं।
> राँची की अलीशा जीटीवी के कार्यक्रम 'डांस इण्डिया डांस' की उपविजेता बनी थीं।
> दीपक तिर्की महुआ चैनल पर प्रसारित कार्यक्रम 'चक दे बच्चे' के विजेता रह चुके हैं।
> धनबाद के म्यांग चांग बॉलीवुड के उभरते सितारे हैं।
> 2004 की फेमिना मिस इण्डिया तनुश्री दत्ता बॉलीवुड की प्रख्यात अभिनेत्री हैं। 
> जमशेदपुर के माधवन भारतीय सिनेमा के जाने-माने कलाकार हैं।
> ज्योति रोज यूनिसेफ द्वारा वर्ष 2007 में 'गर्ल स्टार' के रूप में सम्मानित की जा चुकी हैं। इन्होनें विपरीत परिस्थितियों में रहकर शिक्षा प्राप्त की तथा झारखण्ड के लोकगीत तथा शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल की है। वर्तमान में ज्योति रोज ऑल इण्डिया रेडियो में कार्यरत हैं।
> स्टार चैनल पर प्रसारित कार्यक्रम 'अमूल छोटे उस्ताद' की विजेता झारखण्ड की आकांक्षा हैं। इन्होनें पाकिस्तान के रेहान के साथ मिलकर यह खिताब जीता है।
> झारखण्ड के लोक गायक मधु मंसूरी हंसमुख तथा छऊ नृत्य कलाकार शशधार आचार्य को वर्ष 2020 के लिए तथा समाज सेवी छुटनी देवी को वर्ष 2021 के लिए पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है।
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Sun, 10 Sep 2023 05:39:04 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के प्रमुख शैक्षणिक संस्थान https://m.jaankarirakho.com/340 https://m.jaankarirakho.com/340 > अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
> राँची विश्वविद्यालय का गठन 12 जुलाई, 1960 को बिहार विश्वविद्यालय से अलग करके हुआ था। 
> 11 अप्रैल, 2017 को राँची महाविद्यालय को डॉ० श्यामा प्रसाद विश्वविद्यालय में उत्क्रमित कर दिया गया है। 
> बिरसा कृषि विश्वविद्यालय राज्य का प्रथम कृषि विश्वविद्यालय है।
> बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के प्रमुख संकाय कृषि, पशु चिकित्सा, वानिकी, दुग्ध तकनीकी, मत्स्य विज्ञान, बागवानी तथा जैव प्रौद्योगिकी हैं।
> झारखण्ड में आधुनिक शिक्षा के प्रसार में इसाई मिशनरियों ने सर्वप्रमुख भूमिका अदा की है। इस दिशा में 1845 ई. में सर्वप्रथम गोस्सनर इवेनजेलिकल लुथरेन चर्च द्वारा राँची में एक विद्यालय की स्थापना की गई थी। 
> हजारीबाग में अवस्थित संत कोलम्बा डिग्री कॉलेज झारखण्ड राज्य का प्रथम डिग्री कॉलेज है। इसकी स्थापना 1899 ई. में डुबलिन युनिवर्सिटी मिशन द्वारा की गई थी।
> संत जेवियर्स कॉलेज, राँची की स्थापना 7 जुलाई, 1944 को की गई थी तथा यहाँ 1948 से पढ़ाई की शुरूआत हुई। 
> जनजातीय शोध संस्थान, राँची की स्थापना 1953 ई. में की गई थी।
> नेतरहाट विद्यालय, लातेहार की स्थापना 1954 में चार्ल्स नेपियर द्वारा की गई थी।
> एक्स.एल.आर.आई (XLRI) की स्थापना 1949 में सोसाइटी ऑफ जेसस * के द्वारा की गई थी तथा यह भारत का सबसे प्राचीन बिजनेस मैनेजमेंट स्कूल है।
> नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ फाउंड्री एंड फोर्ज टेक्नोलॉजी की स्थापना यूएनडीपी-यूनेस्को के सहयोग से की गई थी। 
> वर्ष 2002 में एन.आई. टी. जमशेदपुर को डीम्ड यूनवर्सिटी का दर्जा प्रदान किया गया था। 
> झारखण्ड राज्य में वर्तमान में कुल 17 सरकारी पॉलिटेक्निक कॉलेज हैं।
> वर्ष 2001 में झारखण्ड सरकार द्वारा शिक्षा के सुदृढ़ीकरण हेतु प्राथमिक शिक्षा निदेशालय, माध्यमिक शिक्षा निदेशालय, उच्च शिक्षा निदेशालय तथा झारखण्ड शिक्षा परियोजना परिषद् की स्थापना की गई। 
> झारखण्ड शिक्षा परियोजना परिषद् का प्रमुख उद्देश्य राज्य में प्राथमिक शिक्षा का सार्वव्यापीकरण करना है। 
> झारखण्ड शिक्षा परियोजना परिषद् की ओर से राज्य के प्राथमिक एवं मध्य विद्यालयों में कार्यरत शिक्षक तथा शिक्षिकाओं के लिए उजाला I तथा उजाला II के नाम से एकदिवसीय प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया है। 
> झारखण्ड राज्य में दुमका, राँची, धनबाद तथा चाईबासा में राज्य पुस्कालय अवस्थित हैं जबकि हजारीबाग में प्रमण्डलीय पुस्तकालय स्थित है।
> राज्य के रामगढ़ जिले में राज्य के प्रथम महिला अभियांत्रिकी महाविद्यालय की स्थापना की गयी है। 
> राज्य के खूँटी जिले के जरदाग में राज्य के प्रथम रक्षा विश्वविद्यालय के भवन का निर्माण किया जा रहा है। वर्तमान समय में इसका संचालन रांची में किया जा रहा है तथा यह देश का तीसरा रक्षा विश्वविद्यालय है।
> वर्ष 2015 में हजारीबाग के बरही में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की स्थापना की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा रखी गई है। इसका प्रमुख उद्देश्य कृषि के क्षेत्र में एकीकृत कृषि प्रणाली का निर्माण कर समावेशी विकास को प्रोत्साहित करना है। इसका प्रमुख लक्ष्य पूर्वी भारत में कृषि क्रांति के द्वारा उत्पादन एवं उत्पादकता में वृद्धि करना है।
> इंडियन स्कूल ऑफ माइंस का उद्घाटन 9 दिसंबर, 1926 को भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड इरविन द्वारा किया गया था।
> वर्ष 2016 में भारतीय खनिज संस्थान, धनबाद को आई.आई.टी. का दर्जा प्रदान किया गया है। 
> तुरामडीह (पूर्वी सिंहभूम) स्थित परमाणु ऊर्जा केन्द्रीय विद्यालय का संचालन Atomic Energy Education Society, मुंबई (परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत स्वायत्त संस्था) द्वारा किया जाता है।
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Sun, 10 Sep 2023 05:34:05 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के जिले https://m.jaankarirakho.com/339 https://m.jaankarirakho.com/339 > टैगोर हिल / टैगोर पहाड़ी 
> यह पहाड़ी राँची के पश्चिमी भाग में स्थित है।
> इस पहाड़ी पर गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिद्रनाथ टैगोर की समाधि निर्मित है। 
> ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर 1 अक्टूबर 1908 को शांति की खोज में राँची आए तथा 4 मार्च, 1925 को अपने देहांत तक राँची स्थित टैगोर हिल पर ही रहे । उनका अंतिम संस्कार हरमू घाट पर किया गया था। 
> ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर से पूर्व कैप्टन ए. आर. ओस्ली ने इस पहाड़ी पर रहने हेतु 1842 में एक रेस्ट हाउस बनवाया था। 1848 ई. में उनके भाई द्वारा इस रेस्ट हाउस में आत्महत्या कर लेने के बाद उन्होंने इस पहाड़ी पर आना बंद कर दिया।
> ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर ने यहाँ के जमींदार हरिहरनाथ सिंह से 290 रूपये वार्षिक भाड़े पर इसे लेकर रेस्ट हाउस की मरम्मत करायी तथा यहीं रहने लगे। 
> ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर ने ही इस पहाड़ी पर चढ़ने हेतु सीढ़ियाँ, तोरण द्वारा तथा पहाड़ी के चोटी पर ध्यान करने हेतु एक खुले मंडप (शैल बलुआ पत्थर से नागर शैली में निर्मित) का निर्माण कराया था।
> ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर ने पहाड़ी पर पूर्व से निर्मित मकान का नाम 'शांतालय' रखा तथा पहाड़ी के नीचे एक नया मकान बनवाया जिसका नाम 'सत्यधाम' रखा।
> योगदा मठ आश्रम
> 1917 ई. में परमहंस योगानंद ने राँची में 'सत्संग सोसाइटी ऑफ इण्डिया' की स्थापना की थी। 
> 1918 ई. में कासिम बाजार के महाराज मणीन्द्र चंद्र नंदी ने अपना महल और 25 एकड़ भूमि परमहंस योगानंद को आश्रम व विद्यालय की स्थापना हेतु दान में दे दिया। इसी भूमि पर योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय की स्थापना की गयी जिसे बाद में योगदा सत्संग शाखा मठ के नाम से जाना गया। 
> योगदा सत्संग के आश्रम राँची कोलकाता, द्वारहाट एवं नोएडा में हैं तथा देश-विदेश में इसके कई ध्यान केन्द्र हैं। इन सभी का संचालन राँची स्थित आश्रम से ही किया जाता है। 
> स्वामी परमहंस योगानंद के जीवन एवं उनकी शिक्षाओं पर लिखी गयी पुस्तक का नाम 'योगी कथामृत है'. जिसे विश्व के कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। 
> इस आश्रम में शरद् ऋतु के दौरान 'शरद् सत्संग' का आयोजन वृहद स्तर पर किया जाता है। 
> 1925 एवं 1934 ई. में महात्मा गाँधी भी इस विद्यालय में आए थे।
> मैक्लुस्कीगंज
> मैक्लुस्कीगंज राँची जिला मुख्यालय से लगभग 60 किमी की दूरी पर है।
> यह विश्व का एकमात्र एंग्लो-इण्डियन गाँव है।
> इस गाँव की स्थापना अर्नेस्ट टिमोथी मैक्लुस्की द्वारा की गयी थी। यही वजह है कि इस गाँव का नाम उनके नाम पर पड़ा। 
> 1932 ई. में मैक्लुस्की ने पूरे भारत में रह रहे लगभग 2,00,000 एंग्लो-इण्डियन लोगों को इस गाँव में आकर रहने हेतु आमंत्रित किया। 
> इस गाँव में लगभग 300 लोग आकर बसे । परन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अधिकतर परिवार यहाँ से विदेश चले गए तथा मात्र 20 परिवार ही यहाँ बच गये। 
> मैक्लुस्की ने 1933 ई. में 'कोलोनाइजेशन सोसाइटी ऑफ इण्डिया' का गठन किया तथा रातू महाराज से एक समझौते के तहत 10,000 एकड़ जमीन मैक्लुस्कीगंज गाँव की स्थापना हेतु प्राप्त किया था।
> प्रमुख धार्मिक स्थल 
> सूर्य मंदिर, देउड़ी मंदिर, पहाड़ी मंदिर, जगन्नाथपुर मंदिर
> प्रमुख शैक्षणिक संस्थान
> राँची विश्वविद्यालय, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, केन्द्रीय विश्वविद्यालय (ब्राम्बे), राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय, बिड़ला इन्स्टीच्यूट ऑफ टे. क्नालॉजी, मेसरा, राँची कृषि महाविद्यालय, छोटानागपुर लॉ कॉलेज, इण्डियन लाख एण्ड रिसर्च इन्सटीच्यूट (नामकुम), कुष्ठ रोग अनुसंधान केन्द्र, द जेवियर इन्स्टीच्यूट ऑफ सोसल साइंसेज (XISS), भारतीय विधि माप विज्ञान संस्थान, राँची आयुर्विज्ञान संस्थान, रिनपास, श्री कृष्ण लोक प्रशासन प्रशिक्षण संस्थान, झारखण्ड न्यायिक अकादमी, रक्षा शक्ति विश्वविद्यालय, भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) 
> अन्य तथ्य
> सर्वाधिक जनसंख्या, सर्वाधिक साक्षरता दर ( 76.06%), सर्वाधिक पुरूष साक्षरता दर (84.26%), सर्वाधिक महिला साक्षरता दर (67.44%), सर्वाधिक
अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या, सर्वाधिक विधानसभा क्षेत्र ( 07 )
> डोंबारी बुरू ( पहाड़ी )
> यह पहाड़ी खूँटी जिले के अड़की प्रखण्ड में स्थित है। 
> बिरसा उलगुलान के दौरान 9 जनवरी, 1899 ई. को अपने अनुयायियों के बिरसा मुण्डा द्वारा अपने 12 अनुयायियों के साथ एक सभा कर रहे थे। उन्हें सुनने हेतु आस-पास के गाँव से सैंकड़ो लोग (महिलाओं एवं बच्चों सहित) सभा में आ गए जिसे अंग्रेजों ने चारों ओर से घेर कर निर्दोषों लोगों को गोलियों से भून दिया था। 
> इस दर्दनाक घटना में सैंकड़ों लोग शहीद हो गये । यद्यपि बिरसा मुण्डा बचकर भागने में सफल रहे थे। 
> प्रमुख धार्मिक स्थल 
शिव मंदिर, अम्रेश्वर धाम 
> अन्य तथ्य 
सर्वाधिक अनुसूचित जनजाति प्रतिशत ( 73.25% ) 
> नेतरहाट
> नेतरहाट को 'पहाड़ों की रानी', 'पहाड़ियों की मल्लिका' तथा 'सूर्योदय एवं सूर्यास्त का सौंदर्यस्थल भी कहा जाता है। 
> नेतरहाट एक पठारी क्षेत्र जो चारों ओर से पहाड़ियों, नदी, झरने और जंगलों से घिरा हुआ है। 
> नेतरहाट की ऊँचाई समुद्रतल से लगभग 3700 फीट है।
> नेतरहाट झारखण्ड में न्यूनतम तापमान वाला स्थान भी है।
> नेतरहाट के निकट विभिन्न पाट हैं जैसे नेतरहाट पाट, पसरी पाट, डुमरू पाट, जोभी पाट, जमेडूरा पाट, दासवान पाट आदि।
> नेतरहाट के नामकरण को लेकर दो धारणाएँ हैं। पहली धारणा यह है कि यहाँ पहले बाँस का बाजार लगता था जिसके कारण इसका नाम बाँस (नेतुर) व बाजार (हाट) को मिलाकर किया गया। दूसरी धारणा के अनुसार अंग्रेजी के शब्द नेचर व हार्ट को मिलकार यह नाम बना है।
> नेतरहाट में एक आवासीय विद्यालय भी स्थित है, जो पूरे देश में अपनी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु प्रसिद्ध है। 
> बिहार एवं उड़ीसा के तत्कालीन गवर्नर जनरल सर एडवर्ड गेट ने ग्रीष्मकालीन प्रवास हेतु नेतरहाट को विकसित किया था। 
> नेतरहाट में लगभग 100 वर्षों तक ब्रिटिश सरकार का मिलिट्री कैंप भी स्थापित रहा, जिसे पानी की अनुपलब्धता के कारण बंद कर दिया गया था।
> यहाँ मुख्य रूप से असुर, बिरजिया, बिरहोर आदि जनजातियाँ निवास करती हैं, जिनमें असुर सबसे पुरानी जनजाति है। 
> नेतरहाट का 'मैगनोलिया प्वाइंट' सूर्यास्त के मनोरम दृश्य हेतु अत्यंत लोकप्रिय है।
> सारंडा वन
> सारंडा वन को 'सात सौ पहाड़ियों का घर' कहा
जाता है। 
> सारंडा वन को एशिया में साल वृक्ष का सबसे घना वन माना जाता है। साल के अतिरिक्त इस वन में सागवान, मम्हारी, केंदू, बहेरा, अर्जुन, कुसुम आदि के वृक्ष भी मौजूद हैं। 
> इस वन की ऊँचाई समुद्र तल से लगभग 1800 फीट है। 
> इस वन का विस्तार लगभग 820 वर्ग किमी. क्षेत्र में है।
> जैव-विविधता से पूर्ण इस वन में वृक्षों के साथ-साथ वन्यजीवों की भी कई प्रजातियाँ पायी जाती है, जिसमें चीता, तेंदुआ, हाथी, भालू, जंगली सूअर, जंगली भैंसा, सांभर, चीतल आदि प्रमुख हैं। 
> इस वनक्षेत्र के बीच टोयबो जलप्रपात, रॉयल व्यू प्वाइंट, लिर्गिदा (दलदली क्षेत्र) आदि इसकी प्राकृतिक खुबसूरती में चार चांद लगा देते हैं।
> इस वनक्षेत्र में दो लिंगवाला शिवलिंग है, जिसे नगाड़ा मंदिर कहा जाता है। इसके साथ ही यहां खंडित शिवलिंग वाला महादेव मंदिर भी है।
> मलूटी गाँव
> यह गाँव दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखण्ड में अवस्थित है।
> इसे 'मंदिरों का गाँव/नगर' कहा जाता है। * इस गाँव को 'गुप्तकाशी' भी कहा जाता है।
> इस गाँव में पूर्व में यहाँ 108 मंदिर थे जिनमें से वर्तमान में 72 मंदिर ही शेष बचे हैं। इनमें से 52 शिव मंदिर तथा शेष अन्य देवी-देवताओं के मंदिर हैं।
> सभी शिव मंदिरों का निर्माण 'शिखर शैली' में किया गया है, जो एक कक्षावाला 'चार चाला कुटीर' की आकृति में है। 
> इन मंदिरों में टेराकोटा से अत्यंत मनमोहक चित्र बनाए गये हैं, जिसके कारण इसे 'टेराकोटा मंदिर' भी कहा जाता है। 
> इन मंदिरों का निर्माण ननकर राज्य के संस्थापक बसंत राय एवं उनके राजपरिवार द्वारा 16वीं शताब्दी में कराया गया था। 
> इस गाँव में आदि शक्ति माँ मौलीक्षा का भी एक मंदिर है। 
> इस गाँव के पूर्व में सातरंगम गाँव, पश्चिम में भगवछुट्ट गाँव, उत्तर में घटकपुर गाँव तथा दक्षिण में सतीघ्रदा गाँव स्थित है।
> 1979 से पूर्व इस गाँव के बारे में गाँव के बाहर के लोग अधिक नहीं जानते थे। परन्तु 1979 में भागलपुर के तत्क. कालीन आयुक्त अरूण कुमार पाठक इस गाँव में पहुँचे तथा मंदिरों के इस गाँव को देखकर इसकी जानकारी भारतीय पुरातत्व विभाग एवं बिहार पुरातत्व विभाग को दी, जिसके बाद इसके संरक्षण का कार्य प्रारंभ किया गया। 
> सन् 2015 के गणतंत्र दिवस समारोह में झारखण्ड के मलूटी मंदिर झांकी को राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय पुरस्कार प्रदान किया गया था।
> प्रमुख धार्मिक स्थल
वासुकीनाथ मंदिर, छोटेनाथ की मूर्ति
> प्रमुख शैक्षणिक संस्थान
 सिद्ध-कान्हू विश्वविद्यालय (दुमका)
> राष्ट्रीय राजमार्ग (NH)
114A, 333
> प्रमुख नदियाँ 
अजय, पथरा, जयंती, मयूराक्षी, ब्राह्मणी
> प्रमुख खनिज 
क्वार्टजाइट
> प्रमुख उद्योग 
डॉबर दवा कंपनी (जसीडीह), हैदराबाद इण्डस्ट्रीज
> प्रमुख पर्यटक स्थल 
 त्रिकुट पहाड़ी, बकुलिया प्रपात, करौं गाँव
> त्रिकुट पहाड़ी
> यह पहाड़ी देवघर से लगभग 16 किमी दूर दुमका रोड़ पर है। 
> इस पहाड़ी पर 840 फीट की ऊँचाई पर रोपवे बना हुआ है।
> किवदंती है माता सीता का हरण करके जाते समय रावण इस पर्वत पर रूका था तथा माता सीता ने यहाँ दिया जलाया था। अतः इसे 'रावण का हेलिपैड' कहा जाता है।
> करौं गाँव
> करौं ऐतिहासिक गाँव है जो अशोककालीन है।
> इस गाँव को अशोक के पुत्र राजा महेन्द्र ने बौद्ध विहार के रूप में बसाया था।
> इस गाँव में अशोक के स्तूप तथा गाँव के आसपास भगवान बुद्ध की प्रतिमाएँ भी मिलती हैं।
> एक किवदंती के अनुसार इस गाँव का नामकरण महाभारतकालीन कर्ण के नाम पर किया गया था, बाद में इसका नाम करौं हो गया।
 > यहाँ कर्ण द्वारा स्थापित कर्णोस्वर मंदिर भी है।
> इस गाँव के अंतिम राजा काली प्रसाद सिंह थे, जो झरिया स्टेट के भी राजा थे।
> प्रमुख धार्मिक स्थल 
वैद्यनाथ मंदिर, युगल मंदिर, तपोवन मंदिर, लीला मंदिर, कुण्डेश्वरी मंदिर, सत्संग नगर
> सत्संग नगर 
 > वर्ष 1946 में बांग्लादेश के पवना से आकर श्रीश्री ठाकुर अनुकूलचंद्र जी ने देवघर में सत्संग आश्रम की स्थापना की थी।
> बाद में इसका विस्तार हुआ तथा एक बड़े क्षेत्र में यह सत्संग नगर रूप में बस गया।
> यहाँ सर्वधर्म मंदिर, संग्रहालय, चिड़ियाघर तथा विद्यालय भी निर्मित किए गये हैं। 
> प्रमुख शैक्षणिक संस्थान 
> हिन्दी विद्यापीठ
> अन्य तथ्य 
> दूसरा न्यूनतम वन क्षेत्र (203 वर्ग किमी.) व वन प्रतिशत ( 8.22% ) प्राचीन काल में इसे 'हरितकीवाना' नाम से जाना जाता था। 
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Sun, 10 Sep 2023 05:31:02 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में स्थानीय शासन https://m.jaankarirakho.com/338 https://m.jaankarirakho.com/338 > ग्रामीण प्रशासन / पंचायती राज
> सन् 2001 में झारखण्ड में झारखण्ड पंचायतीराज अधिनियम, 2001 लागू किया गया जिसके तहत राज्य में त्रिस्तरीय पंचायती राज की स्थापना की गई है।
> झारखण्ड पंचायतीराज अधिनियम, 2001 में अधिसूचित क्षेत्रों अनुसूचित जनजाति के लिए 80% तथा गैर-अधिसूचित क्षेत्र में 50% आरक्षण की व्यवस्था की गई है।
> इस अधिनियम के तहत राज्य में पंचायती राज प्रणाली में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गयी है।
> वर्ष 2007 में भारत के राष्ट्रपति के आदेशानुसार झारखण्ड राज्य में निम्न क्षेत्रों को भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची के अन्तर्गत अधिसूचित क्षेत्र का दर्जा प्रदान किया गया है: –
1. राँची जिला
2. लोहरदगा जिला
3. गुमला जिला
4. सिमडेगा जिला
5. लातेहार जिला
6. पूर्वी सिंहभूम जिला
7. पश्चिमी सिंहभूम जिला
8. सरायकेला-खरसावां जिला
9. साहेबगंज जिला
10. दुमका जिला
11. पाकुड़ जिला
12. जामताड़ा जिला
13. राबदा व बकोरिया पंचायत ( सतबरवा, पलामू)
14. भंडरिया प्रखण्ड (गढ़वा)
15. सुंदरपहाड़ी व बौरीजोर प्रखण्ड (गोड्डा)
> त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था में विभिन्न स्तरों पर निम्न शामिल हैं:
> ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत
> प्रखण्ड स्तर पर पंचायत समिति
> जिला स्तर पर जिला परिषद्
1. ग्राम पंचायत
> यह पंचायतीराज प्रणाली की सर्वप्रमुख संस्था है तथा यह स्वायत्त संस्थाओं में सबसे नीचे के स्तर पर अवस्थित है।
> झारखण्ड पंचायतीराज अधिनियम, 2001 के तहत प्रत्येक 5,000 ग्रमीण जनसंख्या पर एक ग्राम पंचायत के गठन का प्रावधान किया गया है।
> वर्तमान में झारखण्ड में कुल 4,423 पंचायत हैं तथा सभी पंचायतों में ग्राम पंचायत कार्यरत है। इसमें से 2071 पंचायतों को अधिसूचित घोषित किया गया है तथा इन पंचायतों में ग्राम पंचायत के सभी पद अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षित हैं।
> इसके तहत प्रत्येक 500 की जनसंख्या पर एक ग्राम पंचायत सदस्य के चयन का प्रावधान किया गया है। ग्राम पंचायत के चुनाव में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है।
> ग्राम पंचायत का प्रधान मुखिया होता है तथा उसकी सहायता के लिए उपमुखिया का प्रावधान किया गया है। इन दोनों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है ।
> मुखिया का निर्वाचन ग्राम पंचायत के सदस्यों द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन विधि से किया जाता है तथा ग्राम पंचायत के सदस्य दो-तिहाई बहुमत से मुखिया के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित कर उसे पद से हटा सकते हैं।
> मुखिया की अनुपस्थिति में उपमुखिया द्वारा उसके कार्यों का निर्वहन किया जाता है। परंतु उपमुखिया 6 माह से अधिक समय तक मुखिया के रूप में कार्यों का निर्वहन नहीं कर सकता है। 
> 6 माह तक मुखिया के अनुपस्थित रहने पर अनिवार्यतः नये मुखिया का निर्वाचन किया जाता है। 
> पंचायत सेवक, ग्राम पंचायत का पदेन सचिव होता है जिसकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा की जाती है। वह सरकार तथा ग्रामवासियों के बीच कड़ी का कार्य करता है ।
> ग्राम पंचायत के कार्यों को निम्न 6 भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है: – 
(i) प्रशासनिक कार्य
(ii) कानून व्यवस्था बनाये रखने का कार्य
(iii) विकासात्मक कार्य
(iv) कल्याणकारी कार्य
(v) वाणिज्यिक कार्य
(vi) नागरिकों की सुविधा संबंधी कार्य
> ग्राम पंचायत को मुख्यतः तीन स्रोतों से आय की प्राप्ति होती है : –
(i) करारोपण से प्राप्त आय
(ii) राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान
(iii) लोगों एवं अन्य संस्थाओं से स्वैच्छिक दान
> ग्राम पंचायत के चार अंग होते हैं: –
> ग्राम सभा*
> यह गाँव के स्थानीय नागरिकों की आम सभा होती है। इसमें गाँव के सभी व्यस्क मतदाताओं को शामिल किया जाता है।
> प्रत्येक गाँव में एक ग्राम सभा होती है जबकि एक ग्राम पंचायत का निर्माण सामान्यतः दो-तीन गाँवों को मिलाकर होता है। ग्राम पंचायत के सदस्यों का निर्वाचन ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा ही किया जाता है। 
> ग्राम पंचायत, ग्राम सभा के प्रति उत्तरदायी होता है तथा ग्राम सभा द्वारा ग्राम पंचायत के कार्यों की निगरानी की जाती है। अतः ग्राम सभा को सुरक्षा प्रहरी की संज्ञा दी जाती है।
> ग्राम सभा के प्रमुख कार्यों में ग्राम पंचायत के प्रशासनिक कार्यों का अनुमोदन करना, संबंधित प्रस्तावों पर विचार-विमर्श एवं उनका अनुमोदन तथा ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करना शामिल है। 
> ग्राम पंचायत
> यह ग्राम सभा की कार्यकारिणी समिति के रूप में कार्यरत होती है। कार्यकारिणी समिति में मुखिया सहित 9 सदस्य होते हैं।
> ग्राम पंचायत के मुखिया का प्रमुख कार्य ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत की बैठकों का आयोजन एवं उसकी अध्यक्षता करना, वित्तीय एवं कार्यपालिका संबंधी कार्यों का संपादन करना तथा ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत के निर्णयों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है।
> ग्राम कचहरी
> यह गाँव के छोटे-मोटे दीवानी एवं फौजदारी मामलों को निपटाता है।
> इसका प्रमुख सरपंच कहलाता है जिसका चुनाव प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के आधार पर किया जाता है। 
> ग्राम कचहरी में सरपंच सहित कुल 9 सदस्य होते हैं तथा वे आपस में से एक उपसरपंच का चुनाव करते हैं।
> उपसरपंच का कार्य सरपंच की सहायता तथा उसकी अनुपस्थिति में उसके कार्यों का संपादन करना है। 
> ग्राम पंचायत का मुखिया तथा उसकी कार्यकारिणी समिति का कोई सदस्य ग्राम कचहरी के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने के लिए पात्र नहीं होता है।
> ग्राम कचहरी के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है।
> ग्राम कचहरी अधिकतम 10,000 रूपये तक के मामले निपटाने का कार्य करती है तथा इसे अधिकतम 3 माह के साधारण कारावास एवं 1,000 रूपये तक जुर्माना लगाने का अधिकार प्राप्त है। जुर्माने की राशि नहीं चुकाये जाने की स्थिति में कारावास की अवधि 15 दिन तक बढ़ायी जा सकती है।
> ग्राम रक्षा दल
> यह गाँव की पुलिस व्यवस्था है जिसमें 18 से 30 आयु वर्ग के युवाओं को शामिल किया जाता है। 
> ग्राम रक्षा दल का नेता दलपति कहलाता है जिसकी नियुक्ति मुखिया एवं कार्यकारिणी के अन्य सदस्यों की सलाह पर की जाती है।
> यह दल गाँव में शांति व्यवस्था बनाये रखने, गाँव की रक्षा करने तथा संकटकालीन परिस्थितियों में गाँव के लोगों की सहायता करने का कार्य करता है।
2. पंचायत समिति
> पंचायतीराज व्यवस्था में द्वितीय स्तर पर स्थित यह संस्था इस प्रणाली की केन्द्रीय इकाई है। 
> इसकी स्थापना प्रखण्ड (Block) स्तर पर की जाती है तथा संबंधित प्रखण्ड के नाम पर इसका नामकरण किया जाता है।
> राज्य के सभी 260 प्रखण्डों में पंचायत समिति कार्यरत है। इसमें से 132 प्रखण्डों को अधिसूचित घोषित किया गया है तथा इन प्रखण्डों में पंचायत समिति के सभी पद अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षित है।
> झारखण्ड में पंचायत समिति में निम्न लोग शामिल होते हैं:
> निर्वाचित सदस्य पदेन सदस्य – प्रत्येक 5,000 की जनसंख्या पर 01 सदस्य का निर्वाचन 
> पदेन सदस्य – प्रखण्ड क्षेत्र से निर्वाचित सभी मुखिया
> सह सदस्य – प्रखण्ड क्षेत्र से निर्वाचित विधान सभा सदस्य (विधायक) तथा लोकसभा एवं राज्यसभा के सदस्य (सांसद)
> पंचायत समिति का प्रधान प्रमुख कहलाता है तथा उसकी सहायता के लिए एक उपप्रमुख होता है। 
> प्रमुख तथा उपप्रमुख का चयन पंचायत समिति के सदस्य अपने सदस्यों के बीच में से आपसी मतों द्वारा करते हैं। इन दोनों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है।
> पंचायत समिति के सदस्य दो तिहाई बहुमत द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर प्रमुख को उसके पद से हटा सकते हैं।
> पंचायत समिति के प्रमुख का कार्य समिति की बैठकों का आयोजन एवं उसकी अध्यक्षता करना है। 
> प्रमुख की अनुपस्थिति में उपप्रमुख द्वारा उसके कार्यों का संपादन किया जाता है।
> प्रखण्ड विकास पदाधिकारी (Block Development Officer - BDO) पंचायत समिति का पदेन सचिव होता है। इसका कार्य पंचायत समिति के निर्णयों का क्रियान्वयन करना है ।
> प्रखण्ड विकास पदाधिकारी पंचायत समिति की कार्यवाही में हिस्सा लेता है परंतु वह मतदान नहीं कर सकता है।
> पंचायत समिति के कार्यों को निम्न 3 भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है: –
(i) राज्य सरकार द्वारा विभिन्न विकास कार्यक्रमों के संचालन हेतु निर्देशित कार्य।
(ii) सामुदायिक विकास कार्यक्रम जिसके तहत कृषि, सिंचाई, पशुपालन एवं मत्स्य पालन, लघु एवं कुटीर उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य कल्याणकारी कार्य शामिल हैं।
(iii) ग्राम पंचायत के कार्यों का निरीक्षण तथा जाँच, ग्राम पंचायत के बजट का संशोधन, नये कर लगाना तथा प्रखण्ड विकास पदाधिकारी के कार्यों का पर्यवेक्षण |
> पंचायत समिति के आय का प्रमुख स्रोत सरकार से प्राप्त अनुदान तथा भूमिकर व उपार्जित कर है। 
> झारखण्ड में 132 प्रखण्ड अधिसूचित श्रेणी के हैं, जिनके सभी एकल पद अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षित हैं। 
3. जिला परिषद्
> यह पंचायती राजव्यवस्था में तृतीय एवं सर्वोच्च स्तर की इकाई है।
> इसकी स्थापना जिला (District ) स्तर पर की जाती है तथा संबंधित जिला के नाम पर इसका नामकरण किया जाता है।
> राज्य के सभी 24 जिलों में जिला परिषद् कार्यरत है। इसमें से 13 जिलों को अधिसूचित किया गया है तथा इन जिलों में जिला परिषद् के सभी पद अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षित हैं।
> झारखण्ड में जिला परिषद् में निम्न लोग शामिल होते हैं:-
> निर्वाचित सदस्य – प्रत्येक 50,000 की जनसंख्या पर 01 सदस्य का निर्वाचन 
> पदेन सदस्य – जिला क्षेत्र से निर्वाचित सभी प्रमुख 
> सह सदस्य सदस्य (सांसद) - जिला क्षेत्र से निर्वाचित विधान सभा सदस्य (विधायक) तथा लोकसभा एवं राज्यसभा के
> जिला परिषद् का प्रधान अध्यक्ष कहलाता है तथा उसकी सहायता के लिए एक उपाध्यक्ष होता है। 
> अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का चयन जिला परिषद् के सदस्य अपने सदस्यों के बीच में से आपसी मतों द्वारा करते हैं। 
> जिला परिषद् के सदस्य दो तिहाई बहुमत द्वारा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर अध्यक्ष को उसके पद से हटा सकते हैं। अध्यक्ष को राज्य सरकार द्वारा भी उसके पद से हटाया जा सकता है।
> अध्यक्ष जिला परिषद् का सर्वोच्च अधिकारी होता है जिसका कार्य समिति की बैठकों का आयोजन एवं उसकी अध्यक्षता करना है। इसके अतिरिक्त वह राज्य सरकार को जिला परिषद् के कार्यों की सूचना देता है तथा जिला परिषद् के सचिव का प्रतिवेदन प्रतिवर्ष जिलाधिकारी को प्रस्तुत करता है । वह ग्राम एवं पंचायत समिति के कार्यों पर भी निगरानी रखता है।
> अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष द्वारा उसके कार्यों का संपादन किया जाता है।
> उप विकास आयुक्त (Deputy Development Commissioner - DDC) जिला परिषद् का पदेन सचिव होता है। वह अध्यक्ष के आदेश पर जिला परिषद की बैठक बुलाता है। इसके अतिरिक्त वह जिला परिषद् का प्रमुख परामर्शदाता होता है और सभी समितियों में समन्वय स्थापित करता है।
> जिला परिषद् के कार्यों को निम्न 6 भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है: –
(i) परामर्शकारी कार्य जिसके अंतर्गत जिले में विकास कार्यों और सरकार द्वारा जिला परिषद् को प्रदत्त कार्यों का क्रियान्वयन करना शामिल है।
(ii) वित्तीय कार्य जिसके अंतर्गत पंचायत समितियों के बजट का परीक्षण करना तथा उनको स्वीकृति देना शामिल है। इसके अतिरिक्त केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा आवंटित निधियों को पंचायत समितियों में विभाजित करने का कार्य भी जिला परिषद् द्वारा किया जाता है।
(iii) समन्वय एवं पर्यवेक्षण कार्य जिसके अंतर्गत जिले के प्रखण्डों द्वारा तैयार विकास योजनाओं का समन्वय एवं पर्यवेक्षण करना शामिल है।
(iv) नागरिक सुविधा संबंधी कार्य
(v) कल्याणकारी कार्य
(vi) विकासात्मक कार्य
> जिला परिषद् के आय के स्रोतों को तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है:
(i) विकास कार्यों के लिए राज्य सरकार द्वारा आवंटित राशि
(ii) राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान राशि
(iii) भूमिकर, अन्य उपकर तथा स्थानीय करों में हिस्सा
> झारखण्ड पंचायती राज संशोधन अध्यादेश- 2021
> इस अध्यादेश का विस्तार नगरपालिका को छोड़कर पूरे झारखण्ड राज्य में होगा।
> इस अध्यादेश के तहत किसी भी महामारी की वजह से कार्यकाल के खत्म होने पर यदि पंचायत चुनाव नहीं हो सका, तो उचित वजह बताते हुए छः माह तक या उससे अधिक या चुनाव होने तक पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल विस्तारित हो जायेगा।
> यह अध्यादेश पंचायत चुनाव के साथ-साथ जिला परिषद् के चुनाव हेतु भी लागू होगा।
> नगरीय प्रशासन
1. नगर निगम
> वर्तमान समय में झारखण्ड में 9 नगर निगम विद्यमान हैं: –
(1) राँची नगर निगम
(2) धनबाद नगर निगम
(3) देवघर नगर निगम
(4) आदित्यपुर नगर निगम 
(5) चास नगर निगम 
(6) मेदिनीनगर नगर निगम
(7) हजारीबाग नगर निगम 
(8) मानगो नगर निगम 
(9) गिरिडीह नगर निगम
> राँची नगर निगम की स्थापना 15 सितम्बर, 1979 को की गई थी । 
> आदित्यपुर ( जमशेदपुर ) नगर निगम की स्थापना 7 फरवरी, 2015 को तथा चास नगर निगम की स्थाना 9 फरवरी, 2015 को की गई है।
> दिसंबर, 2001 में झारखण्ड में राँची नगर निगम (अंगीकरण एवं संशोधन) अधिनियम, 2001 लागू कर महापौर (Mayor) तथा उपमहापौर (Deputy Mayor) के प्रत्यक्ष निर्वाचन का प्रावधान किया गया। इस अधिनियम से पूर्व इनका निर्वाचन पार्षद तथा एल्डरमैन द्वारा किया जाता था। 
> राँची नगर निगम को कुल 55 वार्डों में विभाजित किया गया है |
> महापौर शहर का प्रथम नागरिक कहा जाता है। इसकी सहायता के लिए एक उपमहापौर होता है तथा इन दोनों का कार्यकाल 5 वर्षों का होता है।
> महापौर नगर निगम का नाममात्र का प्रधान होता है। नगर निगम का वास्तविक प्रधान कमिश्नर होता है जिसकी नियुक्ति झारखण्ड सरकार द्वारा की जाती है।
> झारखण्ड में 9 नगर निगम के अलावा कुल 20 नगर पंचायत, 20 नगर परिषद् तथा 1 अधिसूचित क्षेत्र समिति (NAC) है। इस प्रकार राज्य में नगरीय स्थानीय प्रशासनिक निकायों की कुल संख्या 50 है। 
> 31 दिसंबर, 2020 को गोमिया नगर परिषद् (बोकारो) को भंग कर दिया है।
> झारखण्ड राज्य में एकमात्र अधिसूचित क्षेत्र समिति (NAC) जमशेदपुर है।
> वर्तमान समय में राज्य में एकमात्र अधिसूचित क्षेत्र समिति (NAC) जमशेदपुर है। 
> नगरीय प्रशासन से संबंधित अन्य तथ्य
> झारखण्ड की प्रथम नगरपालिका के रूप में 1869 ई. में राँची नगरपालिका की स्थापना की गई थी जिसे 1979 में राँची नगर निगम के रूप में परिवर्तित कर दिया गया।
> झारखण्ड का एकमात्र क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण (Regional Development Authority) राँची क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण (RRDA) है जिसकी स्थापना 1975 ई. में की गई थी। यह नगर के योजनाबद्ध विकास तथा सौंदर्यीकरण के लिए मास्टर प्लान तैयार करता है।
> 1975 ई. में उन्नयन न्यास को क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण के रूप में परिणत किया गया।
> झारखण्ड राज्य में नगर निगमों की संख्या 09, नगर पंचायतों की संख्या 20, नगर परिषदों की संख्या 20 तथा अधिसूचित क्षेत्र समिति (NAC) की संख्या 01 है। (Source- Jharkhand Economic Survey 2020-21) 
> अधिसूचित क्षेत्र के सदस्यों को सरकार द्वारा मनोनीत किया जाता है तथा समिति का अध्यक्ष अनिवार्य रूप से कोई सरकारी पदाधिकारी होता है।
> झारखण्ड का एकमात्र छावनी बोर्ड रामगढ़ में विद्यमान है।
> छावनी बोर्ड की स्थापना संसदीय अधिनियम के तहत उन शहरों में की जाती है, जहाँ सैन्य छावनी अवस्थित हैं। यह प्रत्यक्ष रूप से केन्द्रीय रक्षा मंत्रालय के अधीन आता है तथा राज्य सरकार का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होता है। छावनी का कमांडिंग ऑफिसर छावनी बोर्ड का पदेन अध्यक्ष होता है। 
> छावनी बोर्ड के आधे सदस्य निर्वाचित तथा आधे सदस्य मनोनीत होते हैं ।
> जनजातीय सलाहकार परिषद् 
> राज्य सरकार ने राज्य में जनजातीय सलाहकार परिषद् (टीएसी) की नयी नियमावली की अधिसूचना जारी की है। इसके तहत् इस परिषद् के गठन में राज्यपाल की भूमिका को समाप्त कर दिया गया है। 
> परिषद् में एक अध्यक्ष व एक उपाध्यक्ष के अलावा 18 सदस्य होंगे। मुख्यमंत्री इस परिषद् के पदेन अध्यक्ष तथा जनजातीय कल्याण मंत्री इसके पदेन उपाध्यक्ष होंगे।
> परिषद् के 15 सदस्य अनुसूचित जनजाति के विधायक होंगे जिनका चयन मुख्यमंत्री द्वारा किया जायेगा। इनकी सदस्यता विधानसभा की सदस्यता तक होगी।
> परिषद् में तीन सदस्य जनजातीय विषयों के विशेषज्ञ होंगे जिनका मनोनयन मुख्यमंत्री द्वारा किया जायेगा। मुख्यमंत्री की सहमति से इनका कार्यकाल बढ़ाया जा सकेगा।
> इस परिषद् का सचिव सरकार की तरफ से चुना गया व्यक्ति होगा।
> राज्य में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण व विकास हेतु राज्यपाल इस परिषद् की सलाह ले सकेंगे।
> परिषद् के सदस्यों को किसी प्रकार का भुगतान नहीं किया जायेगा। 
> एक वर्ष में परिषद् की कम-से-कम दो बैठकें आयोजित होंगी तथा बैठक से 10 दिनों पूर्व सदस्यों को बैठकों की सूचना देना अनिवार्य होगा।
> बैठक की गणपूर्ति (कोरम) हेतु अध्यक्ष सहित कम-से-कम सात सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।
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Sun, 10 Sep 2023 05:22:27 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड सरकार https://m.jaankarirakho.com/337 https://m.jaankarirakho.com/337 महत्वपूर्ण तथ्य
> झारखण्ड राज्य के प्रथम कार्यवाहक राज्यपाल का नाम विनोद चंद्र पाण्डेय है। 
> झारखण्ड उच्च न्यायालय के तृतीय मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्त हो चुके हैं।
> झारखण्ड उच्च न्यायालय की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्र हैं। श्रीमती मिश्र भारत के सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश भी रह चुकी हैं ।
> झारखण्ड उच्च न्यायालय का गठन 15 नवंबर, 2000 को राज्य गठन के साथ ही किया गया था। यह देश का 21वाँ उच्च न्यायालय है। यह राँची में स्थित है।
> झारखण्ड उच्च न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति विनोद कुमार गुप्ता थे।
> झारखण्ड उच्च न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश न्या. (डॉ.) रवि रंजन ( 17 नवंबर, 2019 से) हैं।
> झारखण्ड उच्च न्यायालय में कुल सृजित पद 20 (मुख्य न्यायाधीश सहित) हैं।
> राज्य निर्माण के समय झारखण्ड उच्च न्यायालय में कुल 08 न्यायाधीश (01 मुख्य न्यायाधीश तथा 07 अन्य न्यायाधीश) कार्यरत थे।
> झारखण्ड उच्च न्यायालय द्वारा जिला न्यायाधीश तथा मुसिफ स्तर के पदाधिकारियों को प्रशिक्षण देने हेतु वर्ष 2002 में 'झारखण्ड ज्युडिशियल अकादमी' की स्थापना की गयी है।
> झारखण्ड के प्रथम लोकायुक्त न्यायमूर्ति लक्ष्मण उराँव थे।
> झारखण्ड राज्य के निवर्तमान लोकायुक्त न्यायमूर्ति डी. एन. उपाध्याय का जून, 2021 में निधन होने के बाद से यह पद रिक्त है।
> झारखण्ड राज्य के प्रथम महाधिवक्ता का नाम मंगलमय बनर्जी है।
> झारखण्ड राज्य के वर्तमान महाधिवक्ता राजीव रंजन हैं।
> झारखण्ड लोक सेवा आयोग की स्थापना जनवरी, 2002 ई. में की गई थी।
> झारखण्ड लोक सेवा आयोग का मुख्यालय राँची में है।
> झारखण्ड लोक सेवा आयोग में 01 अध्यक्ष एवं 08 अन्य सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान है।
> झारखण्ड लोक सेवा आयोग के प्रथम अध्यक्ष फटिक चंद्र हेम्ब्रम थे।
> झारखण्ड लोक सेवा आयोग के वर्तमान अध्यक्ष अमिताभ चौधरी हैं। झारखण्ड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुधीर त्रिपाठी को झारखण्ड कर्मचारी चयन आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
> झारखण्ड लोक सेवा आयोग राजपत्रित एवं अराजपत्रित पदों पर नियुक्ति हेतु संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन करता है।
> राज्य के प्रथम मुख्य सचिव का नाम विजय शंकर दुबे है ।
> राज्य के वर्तमान मुख्य सचिव सुखदेव सिंह हैं।
> राज्य के प्रथम पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) का नाम शिवाजी महान कैरे है।
> राज्य के वर्तमान पुलिस महानिदेशक नीरज सिन्हा हैं।
> झारखण्ड के राज्यपाल का निवास स्थान राँची स्थित राजभवन है। इसका निर्माण 1931 ई. में किया गया था तथा इसके आर्किटेक्ट सदालो ब्लेयर्ड थे। 
> झारखण्ड पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुण्डा केन्द्र सरकार में केन्द्रीय जनजातीय कल्याण मंत्री तथा कोडरमा सांसद अन्नपूर्णा देवी केन्द्रीय शिक्षा राज्यमंत्री हैं।
> द्रौपदी मुर्मू झारखण्ड राज्य की पहली महिला राज्यपाल हैं तथा झारखण्ड राज्य के राज्यपाल के तौर पर 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाली पहली राज्यपाल हैं।
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Sun, 10 Sep 2023 05:18:27 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड विधानसभा चुनाव (2019) https://m.jaankarirakho.com/336 https://m.jaankarirakho.com/336 > महत्वपूर्ण तथ्य
> सर्वाधिक मतों से विजयी प्रत्याशी आलमगीर आलम, 
>> पाकुड़ विधानसभा से 65,108 मतों से विजयी 
> सबसे कम मतों से विजयी प्रत्याशी भुषण बारा, कांग्रेस - महत्वपूर्ण तथ्य 1 कांग्रेस
>> सिमडेगा विधानसभा से 285 मतों से विजयी 
> पूर्वी जमशेदपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी सरयू राय ( चुनाव चिन्ह - गैस सिलेण्डर छाप) ने तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास को पराजित किया।
> राँची विधानसभा सीट से भाजपा के सी. पी. सिंह लगातार छठी बार विजयी हुए। 
> सबसे अधिक उम्र के विधायक डॉ. रामेश्वर उराँव, कांग्रेस
>> लोहरदगा विधानसभा सीट से विजयी
> सबसे कम उम्र की विधायक अंबा प्रसाद, कांग्रेस
> बड़कागाँव विधानसभा सीट से विजयी
> इस सीट पर 2009 में अंबा प्रसाद के पिता योगेन्द्र साहु तथा 2014 इनकी माता निर्मला देवी कांग्रेस पार्टी चुनाव जीत चुके हैं। से
> 2019 के विधानसभा चुनाव में कुल प्रत्याशियों की संख्या 1216 थी। 
> सर्वाधिक उम्मीदवार - ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र (31 प्रत्याशी ) 
> न्यूनतम उम्मीदवार सरायकेला विधानसभा क्षेत्र
> 2019 के विधानसभा चुनाव में 22 विधायक पहली बार चुनकर आए हैं।
> 2019 के विधानसभा चुनाव में 10 महिलाएँ विधायक बनी है। जो झारखण्ड के अभी तक के चुनावों में सर्वाधिक है। , 
> 2005 – 05 महिलाएँ
> 2009 – 08 महिलाएँ
> 2014 – 09 महिलाएँ
> 2019 – 10 महिलाएँ
> 10 महिला विधायकों में से 6 महिलाएँ पहली बार विधानसभा में चुनकर आयी हैं ।
> हेमंत सरकार का शपथ ग्रहण
> हेमंत सोरेन सरकार का शपथ ग्रहण समारोह 29 दिसंबर, 2019 को राँची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित किया गया।
> हेमंत सोरेन (झामुमो) ने राज्य के 11वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया।
> हेमंत सोरेन बरहेट तथा दुमका दो सीटों से निर्वाचित हुए हैं। उन्होनें बरहेट सीट से विधानसभा सदस्य के रूप में सबसे पहले शपथ ग्रहण किया।
> बरहेट विधानसभा के विधायक के रूप में शपथ ग्रहण करने के बाद हेमंत सोरेन ने दुमका विधानसभा सीट से ने इस्तीफा सौंप दिया।
> प्रो. स्टीफन मरांडी प्रोटेम स्पीकर हैं, अतः उन्होनें विधायकों के शपथ ग्रहण के दौरान विधायक के रूप में शपथ ग्रहण नहीं किया।
> बहरागोड़ा के विधायक समीर मोहंती पर वारंट निर्गत होने के कारण उन्होनें विधायकों के शपथ ग्रहण के दौरान शपथ ग्रहण नहीं किया।
> भाजपा के अनंत ओझा ने संस्कृत में शपथ ग्रहण किया था।
> झारखण्ड की पाँचवी विधानसभा के अध्यक्ष पद हेतु एकमात्र प्रत्याशी के रूप में नाला से झामुमो के विधायक रवीन्द्रनाथ महतो ने नामांकन पत्र दाखिल किया था। 7 जनवरी को इन्हें सर्वसम्मति से झारखण्ड विधानसभा का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। रवीन्द्र नाथ महतो झामुमो पार्टी से तीसरी बार नाला के विधायक निर्वाचित हुए हैं।
> झारखण्ड विधानसभा उपचुनाव ( नवंबर, 2020)
> नवंबर, 2020 में झारखण्ड राज्य में रिक्त विधानसभा सीटों (दुमका तथा बेरमो) पर उपचुनाव संपन्न हुआ।
> 2019 के विधानसभा चुनाव में झामुमो के हेमन्त सोरन दुमका तथा बरहेट दो सीटों से विजयी हुए थे जिसके बाद उन्होनें दुमका सीट से इस्तीफा दे दिया था। दुमका विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में झामुमो के बसंत सोरेन ने भाजपा की लुइस मरांडी को पराजित किया है।
> 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेन्द्र प्रसाद सिंह बेरमो सीट से विजयी हुए थे। मई, 2020 में उनके निधन के बाद यह सीट खाली हो गया था। बेरमो विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के कुमार जयमंगल सिंह ने भाजपा के योगश्वर महतो को पराजित किया है।
> अन्य तथ्य 
> बाबुलाल मरांडी (धनवार) ने 2019 के विधानसभा चुनाव में झामुमो से चुनाव लड़ा था, परंतु बाद में वे भाजपा में शामिल हो गये।
> प्रदीप यादव (पोड़ैयाहाट) ने 2019 के विधानसभा चुनाव में झाविमों से चुनाव लड़ा था, परंतु बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गये।
> बंधु तिर्की (मांडर) ने 2019 के विधानसभा चुनाव में झाविमो से चुनाव लड़ा था, परंतु बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गये।
> बेरमो के तत्कालीन विधायक राजेन्द्र प्रसाद सिंह के निधन के पश्चात् उनके पुत्र कुमार जयमंगल ने उपचुनाव में जीत दर्ज की।
> हेमंत सोरेन 2019 के विधानसभा चुनाव में दुमका तथा बरहेट से जीत दर्ज की थी। दुमका से उन्होनें अपनी दावेदारी छोड़ दी, जिस सीट पर संपन्न उपचुनाव में बसंत सोरेन (झामुमो) ने जीत दर्ज की। 
> 2019 के विधानसभा चुनाव में मधुपुर से निर्वाचित विधायक हाजी हुसैन अंसारी का निधन हो गया था। इस सीट पर हुए उपचुनाव ( 2 मई, 2021 ) को परिणाम की घोषणा) में हाजी हुसैन असांरी के पुत्र हाफीजुल हसन (झामुमो) से विजीय हुये हैं। इस निर्वाचन से पूर्व ही हाफीजुल हसन को सरकार में मंत्री बनाया गया था।
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Sun, 10 Sep 2023 05:15:51 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की राजव्यवस्था का परिचय https://m.jaankarirakho.com/335 https://m.jaankarirakho.com/335 > भारतीय संविधान के उपबंधो के अनुसार झारखण्ड भारत संघ का एक राज्य है जिसकी शासन प्रणाली अन्य राज्यों के समान है।
> झारखण्ड राज्य का शासन केन्द्र की भांति संसदीय शासन प्रणाली के अंतर्गत संचालित होता है। 
> झारखण्ड राज्य का गठन 15 नबंबर, 2000 को बिहार से पृथक एक अलग राज्य के रूप में किया गया है। 
> झारखण्ड राज्य के गठन हेतु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत 2 अगस्त, 2000 को लोकसभा में बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक पारित किया गया।
> राज्य में एकसदनीय विधानमंडल की व्यवस्था है।
> राज्य विधानसभा में सदस्यों की कुल संख्या 82 है जिसमें 81 सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन होता है तथा 01 एंग्लो इण्डियन सदस्य की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
> झारखण्ड विधान सभा की कुल सीटों में से 09 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए तथा 28 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।
> झारखण्ड राज्य में राज्य सभा के लिए 06 तथा लोकसभा के लिए 14 सीटें ( कुल - 20 ) * निर्धारित हैं। 
> लोकसभा के लिए निर्धारित 14 सीटों में से 01 अनुसूचित जातियों के लिए तथा 05 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है।
> राज्य का सबसे बड़ा संसदीय क्षेत्र पश्चिमी सिंहभूम तथा सबसे छोटा संसदीय क्षेत्र चतरा है। 
> राज्य में गुमला तथा लोहरदगा दो ऐसे जिले हैं जिनके सभी विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जनजाति हेतु आरक्षित हैं। 91वें संविधान संशोधन, 2003 के अनुसार झारखण्ड राज्य के मंत्रिपरिषद् में कुल सदस्यों की संख्या मुख्यमंत्री ` सहित 12 ( कुल सदस्यों का अधिकतम 15% ) से अधिक नहीं हो सकती है।
> झारखण्ड में अर्जुन मुण्डा तथा शिबू सोरेन सर्वाधिक तीन-तीन बार मुख्यमंत्री का पद धारण कर चुके हैं। 
> इंदर सिंह नामधारी सर्वाधिक तीन बार झारखण्ड विधानसभा के अध्यक्ष पद पर आसीन रह चुके हैं। 
> राज्य सरकार के तीन प्रमुख अंग - कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका |
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Sun, 10 Sep 2023 05:11:41 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड बजट (2020&21) https://m.jaankarirakho.com/333 https://m.jaankarirakho.com/333 > झारखण्ड बजट 2021-22 मुख्य विशेषताएँ
> वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए झारखण्ड राज्य का बजट राज्य के वित्त मंत्री श्री रामेश्वर उराँव द्वारा 03 मार्च, 2021 को झारखण्ड विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
> राज्य के वित्त मंत्री रामेश्वर उराँव ने वित्त मंत्री के रूप में अपना पहला बजट प्रस्तुत किया है।
> आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए ₹91, 277 करोड़ रूपये का वार्षिक बजट का आकलन है, जिसमें राजस्व व्यय ₹75,755.01 करोड़ रूपये तथा पूंजीगत व्यय ₹15,521.99 करोड़ रूपये का है।
> वित्तीय वर्ष 2021-22 के बजट में प्रावधानित सकल राशि में से सामान्य प्रक्षेत्र के लिए 26,734.05 करोड़ रूपये, सामाजिक प्रक्षेत्र के लिए 33625.72 करोड़ रूपये तथा आर्थिक प्रक्षेत्र के लिए 30,917.23 करोड़ रूपये का उपबंध किया गया है।
> बजट में प्रावधानित राशि में से राज्य को अपने कर राजस्व से लगभग 23,265.42 करोड़ रूपये तथा गैर-कर राजस्व से 13,500 करोड़ रूपये, केन्द्रीय सहायता से 17,891.48 करोड़ रूपये, केन्द्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी के रूप में 22050.10 करोड़ रूपये, लोक ऋण से करीब 14,500 करोड़ रूपये तथा उधार व अग्रिम की वसूली से करीब 70.00 करोड़ रूपये प्राप्त होंगे।
> वित्तीय वर्ष 2019-20 में झारखण्ड राज्य की विकास दर 6.7 प्रतिशत थी। कोरोना महामारी के कारण देश के साथ-साथ राज्य के विकास दर में भी गिरावट दर्ज की गयी है।
> वित्तीय वर्ष 2020-21 में देश के सकल घरेलू उत्पाद में 7.5 प्रतिशत की गिरावट की तुलना में झारखण्ड में 6.9 प्रतिशत गिरावट का अनुमान है। सरकार की दूरदर्शी नीतिगत सुधारों के फलस्वरूप आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में विकास दर 9.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यद्यपि प्रचलित मूल्य पर यह विकास दर 13.6 प्रतिशत अनुमानित है।
> आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में राजकोषीय घाटा 10,210.87 करोड़ रूपये रहने का अनुमान है, जो आगामी वित्तीय वर्ष के अनुमानित GSDP का 2.83 प्रतिशत है।
> मनरेगा मजदूरों को अब 194 रूपये के बदले 225 रूपये मजदूरी प्रदान की जाएगी।
> इस वर्ष मनरेगा के अंतर्गत बिरसा हरित ग्राम योजना, नीलाम्बर-पीताम्बर जल समृद्धि योजना, वीर शहीद पोटो हो खेल विकास योजना तथा दीदी-बाड़ी योजना को प्रारंभ किया गया है।
> ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए इस बजट में ग्रामीण विकास विभाग, जल संसाधन विभाग, कृषि, पशुपालन एवं सहकारित भाग हेतु समेि रूप से 18,653 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। यह राशि वित्तीय वर्ष 2020-21 की तुलना में लगभग 11 प्रतिशत अधिक है।
> वित्तीय वर्ष 2020-21 में भविष्य में आने वाले ऋण- भारों के मोचन हेतु निक्षेप निधि (Consolidated Sinking Fund) में पहली बार 303.87 करोड़ रूपये का निवेश किया गया है। आगामी वित्तीय वर्ष में इस कोष में 472 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है, जो ब्याज भुगतान की सतत्ता एवं बेहतर वित्तीय प्रबंधन में एक कड़ी है।
> राज्य के समक्ष उपलब्ध चुनौतियों के बावजूद ब्याज- राजस्व प्राप्ति अनुपात 8.06 प्रतिशत रहा है।
> 2021-22 में पहली बार 11 विभागों के 21 माँगों के लिए परिणाम बजट (Outcome Budget) प्रस्तुत किया गया है। आगामी वित्तीय वर्षों में अन्य विभागों का भी परिणाम बजट प्रस्तुत किया जायेगा। परिणाम बजट एक ऐसे व्यय के पूर्व का अनुमान है, जिससे व्यय के पश्चात् लक्षित परिणाम को लोकदृष्टि में लाया जायेगा एवं वित्तीय संव्यवहारों (Financial Transactions) में पारदर्शिता एवं जवाबदेही तय होगी।
> इस बजट में समाज के अंतिम व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ सतत् विकास लक्ष्यों के अनुरूप बजटीय प्रावधान किए गये हैं।
> झारखण्ड बजट 2021-22 : क्षेत्रवार विशेषताएँ
> कृषि प्रक्षेत्र
> राज्य की 75% आबादी कृषि एवं संबंधित प्रक्षेत्र पर निर्भर हैं।
> राज्य सरकार द्वारा राज्य के कृषकों हेतु झारखण्ड कृषि ऋण माफी योजना की शुरूआत की गयी है। इस योजना का शुभारंभ 1 फरवरी, 2021 को जामताड़ा से किया गया है। इस योजना के अंतर्गत आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में 1200 करोड़ रूपये का बजटीय प्रावधान किया गया है।
> समेकित बिरसा ग्राम विकास योजना - इस योजना के तहत राज्य के प्रत्येक जिले से गाँव का चयन करते हुए बिरसा ग्राम के रूप में नामित किया जायेगा। इस योजना के अंतर्गत किसान सर्विस सेंटर की स्थापना करके किसान समूहों को प्रशिक्षित किया जाएगा तथा उन्हें कृषि के विभिन्न आयामों से जोड़ते हुए बाजार उपलब्ध कराया जायेगा। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी। इस योजना हेतु आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में 61 करोड़ की राशि का प्रावधान किया गया है।
> किसान समृद्धि योजना –इस योजना के अंतर्गत प्रत्येक जिले के विभिन्न प्रखण्डों में सोलर आधारित डीप बोरिंग के द्वारा सामूहिक रूप से सिंचाई की सुविधा उपलब्ध करायी जाएगी। इसके लिए बजट में आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 हेतु 45.83 करोड़ की राशि का प्रावधान किया गया है। 
> शहरी क्षेत्रों में बागानी फसलों की खेती – इस योजना का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में घरों के आस-पास खाली पड़ी भूमि में गृह वाटिका का विकास करते हुए शहर के निवासियों को अत्यंत कम लागत पर ताजी व स्वास्थ्यवर्धक सब्जियाँ उपलब्ध कराना है। इसके तहत वित्तीय वर्ष 2021-22 में राज्य में 2 करोड़ की लागत से 5,000 पौष्टिक गृह वाटिका का विकास किया जाएगा। इस योजना के कार्यान्यवन के द्वारा शहरी परिवारों के भोजन में पौष्टिकता वृद्धि के साथ-साथ प्रदूषण मुक्त व स्वच्छ वातावरण का विकास होगा।
> झारखण्ड राज्य उद्यान प्रोत्साहन सोसाइटी – इस सोसाइटी के गठन का उद्देश्य एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था का विकास करना है, जो क्षेत्र स्तर पर उद्यान निदेशालय एवं राज्य बागवानी मिशन के द्वारा संचालित योजनाओं का बेहतर अनुश्रवण एवं मूल्यांकन कर सके। इस सोसाइटी के गठन के फलस्वरूप पर्याप्त संख्या में तकनीकी रूप से सक्षम मानव बल की सेवा प्राप्त की जा सकेगी एवं योजनाओं के बेहतर अनुश्रवण के फलस्वरूप बजटीय आवंटन का समुचित उपयोग हो सकेगा एवं योजनाएँ ससमय पूर्ण हो सकेंगी। इस सोसाइटी के गठन के पश्चात् कृषकों, कृषि उद्यमियों एवं व्यापारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सकेगा। इस हेतु आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में 10 करोड़ की राशि का प्रावधान किया गया है।
> चैंबर ऑफ फार्मस - इसके गठन का उद्देश्य कृषकों एवं व्यापारियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना एवं मार्केट लिंकेज की संभावना को बढ़ाना है। चैंबर ऑफ फामर्स के गठन के परिणामस्वरूप कृषक समूहों का निर्माण होगा एवं राज्य में लघु कृषि उद्योग के विकास की संभावनाएँ प्रबल होंगी। इसके परिणामस्वरूप किसान अपने उपज का उचित मू-य प्राप्त कर सकेगा। साथ ही कई छोटी खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना होगी। इस हेतु आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में 7 करोड़ की राशि का प्रावधान किया गया है।
> पोस्ट हार्वेस्ट एवं प्रिजर्वेशन आधारभूत संरचना का विकास - इस योजना का उद्देश्य बागानी फसलों की कटाई के पश्चात् होने वाले नुकसान की रोकथाम करना एवं फलों व सब्जियों की सेल्फलाईफ को बढ़ाकर इसे अधिक समय तक संरक्षित रखना है। इसके तहत राज्य में 31 करोड़ रूपये की लागत से 24 शीतगृह / लघु शीतगृह की स्थापना की जाएगी। इसके परिणामस्वरूप बागानी फसलों का संरक्षण, आधारभूत संरचना (शीतगृह, पैक हाउस आदि) का विकास होगा तथा किसानों को विपणन में सहायता मिलेगी व उनकी आय में वृद्धि होगी।
> झारखण्ड राज्य फसल राहत योजना – इस योजना का संचालन प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के असंतोषजनक प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए वित्तीय वर्ष 2020-21 से किया जा रहा है। इस योजना के अंतर्गत प्रतिकूल मौसम के कारण फसलों के उत्पादन में ह्रास होने की स्थित में फसलों की क्षति का आकलन करके किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। इस योजना हेतु वित्तीय वर्ष 2021-22 में 50 करोड़ की राशि का प्रावधान किया गया है। 
> पशुपालन
> बकरा विकास हेतु Goat Estate – चतरा जिला में वृहत भेड़ प्रजनन प्रक्षेत्र के अधीन बकरा विकास हेतु Goat Estate के विकास की योजना का संचालन किया जाना है। इसका प्रमुख उद्देश्य दुग्ध व मांस उत्पादन को बढ़ाकर राजस्व प्राप्त करना है।
> चूजा प्रजनन केन्द्र – राज्य में पूर्व से संचालित गौरियाकरमा एवं खूँटी में चूजा प्रजनन केन्द्र स्थापित किया जाना है। इससे मुर्गीपालकों को कम दर पर स्थानीय स्तर पर चूजा उपलब्ध हो सकेगा। साथ ही स्थानीय नस्ल की मुर्गी का उत्पादन बढ़ेगा जिससे राजस्व की प्राप्ति होगी।
> गो-मुक्ति धाम – राज्य के प्रत्येक प्रमण्डल में एक-एक गो-मुक्ति धाम की स्थापना की जाएगी, ताकि मृत्यु प्राप्त गाय के शरीर का पवित्र तरीके से निष्पादन किया जा सके।
> जोड़ा बैल वितरण योजना – इसके अंतर्गत राज्य के प्रक्षेत्रों एवं अन्य गोपालकों द्वारा प्राप्त नर बाछाओं को बैल के रूप में तैयार किया जाएगा। इन बैलों को राज्य के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में कार्यरत किसानों को वितरित किया जाएगा, ताकि किसानों को कम लागत में खेती कार्य में सहयोग मिल सके व अधिक मुनाफा प्राप्त हो सके।
> गव्य विकास
> दुग्ध उत्पादन – वित्तीय वर्ष 2019-20 में अनुमानित दूध उत्पादन 68 लाख लीटर प्रतिदिन है, जबकि वित्तीय वर्ष 2020-21 में 73.50 लाख लीटर प्रतिदिन दूध उत्पादन का अनुमान है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में प्रतिदिन लगभग 80 लाख लीटर दूध उत्पादन का लक्ष्य है। झारखण्ड मिल्क फेडरेशन द्वारा राज्य के 16 जिलों में अब तक 669 मिल्क पूलिंग प्वाईंट्स से संबद्ध कुल 2,372 गाँवों के 19630 दूध उत्पादकों को जोड़कर औसतन 1 लाख 02 हजार लीटर दूध प्रतिदिन संग्रहित किया गया है जिसके परिणामस्वरूप दुग्ध उत्पादकों के निजी बैंक खातों में 10 करोड़ की राशि का भुगतान किया जा रहा है। -
> मवेशी पालकों को KCC राज्य के दुधारू मवेशी पालकों को किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा से आच्छादित करने की योजना के तहत 30 हजार डेयरी कृषकों को लाभान्वित करने की कार्रवाई की जा रही है। राज्य में अबतक कुल 4,749 डेयरी कृषकों को 22.94 करोड़ रूपये की साख अधिसीमा की स्वीकृति विभिन्न बैंकों द्वारा प्रदान की गयी है।
> ग्रामीण दुग्ध उत्पादकों / प्रगतिशील डेयरी कृषकों के लिए अतिरिक्त आमदनी के सृजन व स्वरोजगार के उद्देश्य से अनुदानित दर पर 2 दुधारू गाय वितरण, कामधेनु डेयरी फार्मिंग, प्रगतिशील डेयरी कृषकों को सहायता, हस्त व विद्युत चालित चैफ कटर का वितरण तथा तकनीकी इनपुट सामग्रियों के वितरण की योजना प्रस्तावित है।
> झारखण्ड मिल्क फेडरेशन के माध्यम से दुग्ध उत्पादन, संग्रहण विधायन एवं विपणन हेतु आधारभूत संरचनाओं के सुदृढ़ीकरण एवं विस्तार हेतु जमशेदपुर तथा गिरिडीह में नए डेयरी प्लांट एवं राँची में मिल्क प्रोडक्ट प्लांट एवं मिल्क पाउडर प्लांट की स्थापना प्रस्तावित है।
> संस्थागत दुग्ध संग्रहण के संवर्द्धन व विस्तार हेतु ग्रामीण दूध उत्पादकों के द्वारा झारखण्ड मिल्क फेडरेशन को आपूर्ति किए गए दूध के लिए एक रूपया प्रति लीटर की दर से प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराया जाना प्रस्तावित है।
> मत्स्य
> मछली उत्पादन – राज्य के युवाओं को स्वरोजगार एवं जनता को मछली के रूप में सुपाच्य एवं उत्तम प्रोटीन की उपलब्धता सुनिश्चित कराना एवं मत्स्य उत्पादन को लगातार बढ़ाना सरकार का सर्वोपरि लक्ष्य है। चालू वित्तीय वर्ष (2020-21 ) में सभी स्रोतों से मछली उत्पादन के कुल 2,40,000 मीट्रिक टन के लक्ष्य के विरूद्ध जनवरी, 2021 तक 1,90,425 मेट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ है। आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में 2,65,000 मेट्रिक टन मछली उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
> मछली बीज उत्पादन – स्थानीय स्तर पर मत्स्य बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु 7,390 स्थानीय मत्स्य बीज उत्पादकों को अनुदान पर मत्स्य स्पॉन, स्पॉन-आहार तथा फ्राई कैचिंग नेट उलपब्ध कराया गया है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में 7,500 स्थानीय मत्स्य बीज उत्पादकों के माध्यम से 1,100 करोड़ मछली बीज के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। -
> सामाजिक मात्स्यिकी - आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में जलाशयों में मछली मारने वाले स्थानीय विस्थापित मछुआरों के लिए सामाजिक मात्स्यिकी के तहत मत्स्य अंगुलिकाओं का संचयन करने तथा अनुदान पर नाव देने का प्रस्ताव है। मत्स्य उत्पादन में लगातार अभिवृद्धि हेतु फीड बेस्ट फिशरीज एवं इम्प्रूड वेराईटी की मछलियों का पालन किया जायेगा।
> प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना – आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत केन्द्रांश तथा राज्यांश के सहयोग से राज्य के मछुआरों / प्रगतिशील मत्स्य कृषकों / मत्स्य विक्रेताओं / रंगीन मछली पालकों तथा लघु उद्यमियों को अनुदान / आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जायेगी, ताकि ये स्वनियोजित / आत्मनिर्भर हो सकें। 
> केज कल्चर विस्तार एवं सुदृढीकरण योजना – इसके अंतर्गत जलाशयों में नये केजों का अधिष्ठान कर मछली पालन तथा पुराने केजों का रिमॉडलिंग कराते हुए मछली पालन कराया जायेगा। जलाशयों के विस्थापित अथवा मत्स्यजीवी सहयोग समितियों के सदस्य इसके लाभुक होंगे।
> समेकित मत्स्य पालन योजना – यह योजना प्रायोगिक तौर पर मछली-सह- बत्तख एवं मछली-सह- सूकर पालन हेतु आरंभ की जायेगी। इससे लाभार्थी को कम लागत में अधिक आय प्राप्त होगी।
> सहकारिता
> सहकारिता के क्षेत्र में वित्तीय वर्ष 2021-22 में लैम्पस / पैक्स / व्यापार मंडल / विशेष प्रकार की सहकारी समितियों को कार्यशील पूँजी, आधारभूत संरचना के विकास के लिए 10 करोड़ का प्रावधान बजट में किया गया है।
> कृषि, पशुपालन एवं सहकारिता विभाग द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं से 11 लाख से अधिक नागरिक आच्छादित होंगे।
> लैम्पस / पैक्स – किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य दिलाने हेतु लैम्पस / पैक्स का गठन राज्य में किया गया था। जिला एवं राज्य स्तर पर इनके संघ एवं महासंघ की संरचना के अभाव में ये प्राथमिक समितियाँ अपना काम सही ढंग से नहीं कर पा रही हैं। वित्तीय वर्ष 2021-22 में कृषि एवं लघु वनोपज के संग्रहण, व्यापार व प्रसंस्करण सुनिश्चित करने हेतु राज्यस्तरीय महासंघ गठित करने का प्रस्ताव है। 
> सिंचाई
> मसालिया मेगालिफ्ट सिंचाई योजना – कृषि में सिंचाई की आवश्यकता एवं महत्व तथा झारखण्ड के सिंचित क्षेत्र को बढ़ाने के उद्देश्य से राज्य के संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासी बाहुल्य दुमका जिले के अंतर्गत भूमिगत पाईपलाईन के माध्यम से मसालिया मेगालिफ्ट सिंचाई योजना का कार्यान्वयन वित्तीय वर्ष 2021-22 में प्रारंभ किया जाएगा। इससे जिले के बहुत बड़े भू-भाग को सुनिश्चित सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होगी जिससे कृपकों केझारखण्ड सार संग्रह आर्थिक एवं सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।
> वर्षों पूर्व निर्माण जीर्ण- शीर्ण योजनाओं के विकास पुनरुद्धार व आधुनिकीकरण के कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए 12 पुरानी सिंचाई योजनाओं के नहरों के लाईनिंग का कार्य आगामी वर्ष में कराये जाने का प्रस्ताव है।
> राज्य के पठारी भौगोलिक स्थलाकृति के कारण लघु सिंचाई योजनाओं की सार्थकता एवं उपादेयता बनाये रखने के लिए 213 आहर / तालाब / मध्यम सिंचाई योजना एवं 100 जमींदारी बांधों के जीर्णोद्धार का कार्य आगामी वर्ष में कराये जाने का कार्यक्रम निर्धारित है।
> ग्रामीण विकास
> सखी मण्डलों को निधि - ग्रामीण क्षेत्रों में निधि की त्वरित एवं सुलभ उपलब्धता हेतु राज्य के सखी मण्डलों को इस वर्ष करीब 4449 करोड़ रूपये चक्रीय निधि, सामुदायिक निवेश निधि तथा 546 करोड़ रूपये क्रेडिट लिंकेज के रूप में उपलब्ध कराया गया है। आगामी वित्तीय वर्ष में 50,000 सखी मण्डलों को चक्रीय निधि एवं 20,000 सखी मण्डलों को सामुदायिक निधि उपलब्ध कराने की योजना है।
> आजीविका संवर्द्धन हुनर अभियान (ASHA) – इस अभियान के जरिये राज्य के 20.8 लाख परिवारों को आजीविका के सशक्त माध्यमों से जोड़ा गया है। अगले वित्तीय वर्ष में 26 लाख अतिरिक्त परिवारों को जोड़ने का लक्ष्य है। 
> पलाश ब्रांड – अनुदान तथा प्रशिक्षण के साथ सखी मण्डलों द्वारा निर्मित उत्पादों को 'पलाश ब्रांड' के द्वारा एक नई पहचान देकर करीब 2 लाख ग्रामीण महिलाओं की आमदनी में बढ़ोत्तरी का प्रयास किया जा रहा है। अब तक लगभग 1 करोड़ का कारोबार इस ब्रांड के द्वारा किया गया है तथा आगामी वित्तीय वर्ष में इस योजना का विस्तार तेजी से किया जायेगा।
> जोहार परियोजना – इस परियोजना के अंतर्गत तब तक कुल 3,921 उत्पादक समूहों का निर्माण किया जा चुका है तथा इसके माध्यम से 2 लाख 13 हजार परिवारों को विभिन्न उत्पादनों के लिए जोड़ा गया है। आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में कुल 4,000 उत्पादक समूहों का निर्माण किया जाना है, जिसके माध्यम से 1 लाख 10 हजार परिवारों को विभिन्न उत्पादनों से जोड़ा जाएगा।
> फुलो-झानो आर्शीवाद अभियान – इस अभियान के तहत करीब 15,063 महिलाओं को विगत 4 माह में हड़िया - दारू निर्माण एवं बिक्री के कार्य से मुक्त कराकर आजीविका के विभिन्न साधनों से जोड़ा गया है। इस वित्तीय वर्ष में हड़िया - दारू बेचने के कार्य में मजबूरीवश लगी शेष महिलाओं को भी आजीविका के विभिन्न साधनों से इस योजना के तहत जोड़ा जायेगा।
> मानव दिवस सृजन का पुनरीक्षण – मनरेगा योजना प्रारंभ होने के पश्चात् पहली बार राज्य हेतु निर्धारित मानव दिवस सृजन के लक्ष्य का तीन बार पुनरीक्षण किया गया है। इस Rural Distress के समय ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने हेतु वर्तमान में 1,150 लाख मानव दिवस सृजन किया गया है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में 4,17,875 योजनाओं को पूरा किया गया। कुल 8,84,270 योजनाओं पर कार्य जारी है।
> 2021-22 में मानव दिवस सृजन – वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए राज्य द्वारा मनरेगा योजना के अंतर्गत 1,100 लाख मानव दिवस का सृजन किया जायेगा, जिसके अनुसार प्रस्तावित बजट की राशि 3,770.07 करोड़ रूपये होगी।
> Land and Water Treatment – राज्य में गरीब ग्रामीणों तथा आदिवासियों के जीवन स्तर को बेहतर करने के उद्देश्य से BRLF (Bharat Rural Livelihoods Foundation ) द्वारा ग्रामीण विकास विभाग के सहयोग से राज्य के छ: जिलों (गुमला, खूँटी, पश्चिमी सिंहभूम, पाकुड़, साहेबगंज तथा गोड्डा) में कुल 24 Non CFT प्रखण्डों में MoU कर कार्य आरंभ किया जा रहा है। इस साझीदारी में मनरेगा कार्यक्रम की निधि का बेहतर उपयोग करते हुए Integrated Natural Rosources Management (INRM) के सिद्धांत के आधार पर Watershed Approach को अपनाते हुए Land and Water Treatment का कार्य किया जायेगा।
> बिरसा हरित ग्राम योजना इस योजना के अंतर्गत 20,000 एकड़ लक्ष्य के विरूद्ध 26,000 एकड़ में आम एवं मिश्रित बागवानी का कार्य किया गया है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में 25,000 एकड़ भूमि पर इस कार्य को करने का लक्ष्य रखा गया है।
> नीलाम्बर-पीताम्बर जल समृद्धि योजना - इस योजना के अंतर्गत 1 लाख हेक्टेयर लक्ष्य के विरूद्ध 1,12,094 हेक्टेयर भूमि का उपचार किया जा चुका है। लगभग 98,065 हेक्टेयर भूमि का उपचार प्रगति पर है। वर्ष 2021-22 में 1 लाख हेक्टेयर भूमि के उपचार का लक्ष्य रखा गया है।
> बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर आवास योजना – इस योजना के अंतर्गत 32 हजार 244 आवास स्वीकृत करते हुए 23 हजार 331 आवास पूर्ण किया गया है। आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में 3,000 नये आवास बनाने का लक्ष्य निर्धारित है।
> पक्का आवास – पक्का आवास की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु वित्तीय वर्ष 2020-21 के भौतिक लक्ष्य 4,22,125 आवासों के विरुद्ध अब तक 335,307 आवास स्वीकृत एवं 37,981 आवास पूर्ण किये जा चुके हैं। आगामी वित्तीय वर्ष 2021-22 में 2 लाख 45 हजार नये आवास बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
> ग्रामीण पथ – ग्रामीण क्षेत्रों में पथों के घनत्व को बढ़ाने तथा आवागमन हेतु प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में पूर्व की योजनाओं को मिलकार कुल 962 योजनायें 2,410 किमी. क्रियाशील है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में 2,000 किमी. पथ निर्माण एवं 250 पुल पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में Road Connectivity Plan in LWE affected areas (RCPLWE) अंतर्गत 600 किमी. पथ निर्माण एवं 10 पुल निर्माण कार्य कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस वित्तीय वर्ष में PMGSY Phase-III से 4,125 किमी. स्वीकृत कराने का लक्ष्य है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में पूर्व से स्वीकृत लगभग 2,000 किमी. ग्रामीण सड़कों का सुदृढ़ीकरण तथा 75 ग्रामीण पुलों का निर्माण कार्य पूर्ण कराने का लक्ष्य रखा गया है। -
> 15वें वित्त आयोग की अनुशंसा - 15वें वित्त आयोग की अनुशंसा के आलोक में सामान्य आधारभूत अनुदान त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं को उपलब्ध कराने हेतु ग्राम पंचायतों के लिए 1,618.65 करोड़ रूपये, पंचायत समितियों के लिए 304.03 करोड़ रूपये तथा जिला परिषदों के लिए 202.68 करोड़ रूपये का बजटीय उपबंध प्रस्तावित है।
> राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान किए जायेंगे - इस योजना के उद्देश्य को पूर्ण करने हेतु राज्य में निम्न कार्यक्रम संचालित
> क्षमता वर्द्धन एवं सृजन – इसके अंतर्गत ग्राम पंचायत विकास योजना से संबंधित प्रशिक्षण, hand holding support तथा अन्य प्रशिक्षण एवं अन्य गतिविधियाँ यथा - प्रशिक्षण यात्रा, प्रचार-प्रसार, सूचना, मुद्रण इत्यादि कार्य कराये जायेंगे।
> संस्थागत संरचना – संस्थागत संरचना के विकास हेतु जिला पंचायत संसाधन केन्द्र, राज्य पंचायत संसाधन केन्द्र का रख-रखाव, अनुरक्षण, संवर्द्धन, मानव संसाधन उपलब्ध कराये जायेंगे। पंचायत भवनों का निर्माण, मरम्मत, प्रज्ञा केन्द्र को पंचायत भवन में स्थापित कराने जैसे कार्य कराये जायेंगे।
>  ई - सक्षमता – ई - सक्षमता के माध्यम से पंचायतों को कम्प्यूटर एवं उपस्कर, तकनीकी सहयोग (मानव संसाधन सहित) उपलब्ध कराये जायेंगे।
> स्वास्थ्य
> कोविड टीकाकरण – कोविड- 19 से बचाव एवं नियंत्रण हेतु राज्य भर के जिला अस्पताल एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में कोविड टीकाकरण कक्ष की स्थापना की गयी है। 16 जनवरी, 2021 से कोविड टीकाकरण का शुभारंभ राज्य के 129 केन्द्रों पर किया जा रहा है। 
> कोविड वैक्सीन हेतु टास्क फोर्स - कोविड-19 वैक्सीन नागरिकों को उपलब्ध कराने हेतु राज्य स्तर, जिला स्तर तथा प्रखण्ड स्तर पर टास्क फोर्स का गठन किया गया है। प्रथम चरण में सभी स्वास्थ्यकर्मियों तथा फ्रंटलाइनर वर्कर्स को वैक्सीन उपलब्ध कराया गया है।
> कोविड रिकवरी दर – देश में कोविड-19 के अंतर्गत रिकवरी दर 97.10 प्रतिशत तथा मृत्यु दर 1.40 प्रतिशत है, जबकि झारखण्ड में रिकवरी दर 98.71 प्रतिशत तथा मृत्यु दर 0.90 प्रतिशत है।
> कोविड अवसंरचना – राज्य में कोविड-19 से निपटने हेतु पर्याप्त संख्या में आवश्यक आधारभूत संरचना यथा 19,358 आसोलेशन बेड, 2021 ऑक्सीजन बेड, 577 आईसीयू बेड तथा 642 वेंटिलेटर युक्त बेड उपलब्ध है। 
> 108 एम्बुलेंस सेवा - ‘108' आपातकालीन एम्बुलेंस सेवा (सभी आवश्यक उपकरणों, दवा एवं पारामेडिक्स सहित) का विस्तार करने हेतु पूर्व से संचालित 337 एम्बुलेंस के अतिरिक्त वित्तीय वर्ष 2021-22 में 117 नये एम्बुलेंस का संचालन आरंभ किया जायेगा। 
> आयुष्मान भारत- प्रधामन्त्री जन आरोग्य योजना – इस योजना के तहत राज्य में 489 निजी अस्पतालों एवं 220 सरकारी अस्पतालों को मिलाकर अब तक कुल 709 अस्पतालों को सूचीबद्ध किया गया है। योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए अबतक 88,76,567 गोल्डन कार्ड बनाया जा चुका है। कुल 7,34,021 लाभुकों को इस योजना का लाभ प्राप्त हो चुका है। राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं के सार्वभौमिकीकरण के उद्देश्य की पूर्ति के साथ-साथ झारखण्ड की जन आकांक्षा एवं हितों के अनुरूप आयुष्मान भारत - प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को आयुष्मान भारत - मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के रूप में संचालित करने का निर्णय लिया गया है। 
> राँची सदर अस्पताल – राँची जिलान्तर्गत निर्माणाधीन 500 शय्या वाले सदर अस्पताल को मार्च, 2021 के पूर्व पूर्ण कराकर संचालित कर दिया जायेगा।
> शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज अस्पताल धनबाद, एम. जी. एम. मेडिकल कॉलेज अस्पताल जमशेदपुर तथा राज्य के प्रमण्डलीय मुख्यालय में अवस्थित जिला अस्पतालों के साथ-साथ साहेबगंज जिला अस्पताल को विशेषज्ञ चिकित्सकों की सेवा उपलब्ध कराते हुए अत्याधुनिक मशीन - उपकरण, साज-सामानों से युक्त कर संचालित किये जाने की योजना है, ताकि वहाँ ईलाज कराने वाले मरीजों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया करायी जा सके।
> ट्रामा सेन्टर - राज्य के दुर्घटना संभावित राष्ट्रीय राजमार्गों पर निर्मित एवं निर्माणाधीन कुल 10 ट्रॉमा सेन्टर को आवश्यक मानव संसाधन एवं मशीन उपकरणों से सुसज्जित करते हुए संचालित किये जाने की योजना है। इसके अतिरिक्त अन्य 48 दुर्घटना संभावित स्थानों को चिन्हित किया गया है, जिसके नजदीकी सरकारी अस्पतालों / स्वास्थ्य केन्द्रों में ट्रॉमा सेन्टर की स्थापना किये जाने की योजना है। 
> जन औषधि केन्द्र – झारखण्ड सरकार तथा Beureau of Pharma PSUs of India (BPPI) के बीच राज्य में कुल 250 जन औषधि केन्द्र खोलने हेतु MoU किया गया है। वर्तमान में राज्य में 64 जन औषधि केन्द्रों को औषधि अनुज्ञप्ति प्राप्त है। वर्ष 2021-22 में राज्य के सभी मेडिकल कॉलेजों, सदर अस्पतालों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में जन औषधि केन्द्र खोले जाने की योजना है। 
> खाद्य आपूर्ति
> गुरूजी किचन योजना – वर्ष 2021-22 में इस योजना को शुरू किया जाएगा। इस योजना के अंतर्गत वर्तमान में चलाये जा रहे दाल-भात केन्द्रों के अतिरिक्त भोजन में विविधता, गुणवत्ता एवं स्वच्छता को बेहतर करने के उद्देश्य से नये भोजन केन्द्रों की स्थापना की जायेगी।
> राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम – इसके अंतर्गत जनवितरण प्रणाली, दुकानदारों में आर्थिक समानता लाने के उद्देश्य से दुकानवार राशनकार्ड की संख्या को Rationalize करने का प्रस्ताव है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में इस कार्य को पूर्ण कर लिया जायेगा। 
> धोती, साड़ी एवं लुंगी का वितरण - राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम से आच्छादित लाभुकों की सम्मानजनक स्थिति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से अनुदानित दर पर धोती, साड़ी एवं लुंगी का वितरण किया जायेगा।
> झारखण्ड राज्य खाद्य सुरक्षा योजना – इस योजना के तहत राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम से अनाच्छादित 15 लाख लाभुकों को 5 किलोग्राम चावल 1 रूपये प्रति किलोग्राम की अनुदानित दर पर उपलब्ध करायी जायेगी। 
> धान अधिप्राप्ति योजना किया जायेगा। - आगामी खरीफ विपणन मौसम में धान अधिप्राप्ति योजना के लक्ष्य में बढ़ोत्तरी
> पेयजल एवं स्वच्छता
> सभी में नल के माध्यम से स्वच्छ जल – इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु राज्य योजना, जल जीवन मिशन आदि योजनाओं के तहत राज्य के सभी ग्रामीण घरों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने का कार्य प्रगति पर है। 
> Functional House Tap Connection – राज्य में वर्ष 2024 तक कुल 58,95,843 परिवारों को Functional House Tap Connection के माध्यम से सभी ग्रामीण घरों को जलापूर्ति से आच्छादित किये जाने का लक्ष्य है। अबतक 11.05 प्रतिशत लक्ष्य की प्राप्ति कर ली गयी है। वर्ष 2021-22 में इसे बढ़ाकर 30 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य तय किया गया है। 
> वृहत् ग्रामीण जलापूर्ति योजना – विभिन्न योजनाओं के तहत 495 वृहत् ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं का निर्माण किया जा चुका है एवं 176 अदद् ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं का निर्माण कार्य प्रगति पर है। वर्ष 2021-22 में इस जल जीवन मिशन के तहत 51 अदद् नये वृहत् ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं का निर्माण कार्य प्रारंभ करने की योजना है।
> सोलर आधारित लघु ग्रामीण जलापूर्ति योजना –राज्य के ऐसे ग्रामीण क्षेत्र जहाँ वृहत् जलापूर्ति योजनाओं के निर्माण हेतु सही स्त्रोत उपलब्ध नहीं है, वैसे क्षेत्रों को सोलर आधारित लघु ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं से आच्छादित किया जा रहा है।
> एकल ग्रामीण जलापूर्ति योजना – जल जीवन मिशन के तहत 15,000 एकल ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं का निर्माण किया जा रहा है।
> नलकूप निर्माण – राज्य के ऐसे सुदूर क्षेत्र जो जलापूर्ति से आच्छादित नहीं हो पाये हैं या आंशिक रूप से आच्छादित हैं, उन टोलों में जल उपलब्ध कराये जाने हेतु राज्य के सभी 4,374 पंचायतों में 5-5 अदद् प्रति पंचायत की दर से कुल 21,870 अदद् नलकूप का निर्माण कराये जाने की योजना है। वर्ष 2021-22 में अप्रैल माह के अंत तक इन योजनाओं को पूर्ण कर लिया जायेगा।
> EDF के माध्यम से जलापूर्ति – जल जीवन मिशन के तहत आर्सेनिक एवं फ्लोराईड प्रभावित चिन्द्रित 483 अदद् टोलों में Electrolytic Defluoridation (EDF) के माध्यम से शुद्ध पेयजलापूर्ति की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है। 1
> शहरी विकास
> शहरी जलापूर्ति योजना – शहरी जलापूर्ति योजना के माध्यम से सभी शहरी क्षेत्रों में आवासित परिवारों को नल द्वारा शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने हेतु सरकार दृढ़संकल्पित है। 
> ठोस अपशिष्ट प्रबंधन – नगरीय क्षेत्रों में बढ़ती आबादी को स्वच्छ वातावरण उपलब्धता के लिए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित 24 नगर निकायों में Concessionaire की नियुक्ति कर दी गयी है। शेष नगर निकायों में वित्तीय वर्ष 2021-22 में Concessionaire की नियुक्ति कर दी जायेगी ।
> ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्लांट – गिरिडीह में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्लांट चालू कर दिया गया है तथा देवघर, गोड्डा एवं चाकुलिया में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्लांट परीक्षण के स्तर पर है। 
> अमृत योजना – इस योजना के अधीन 05 मिशन शहरों में से 01 मिशन शहर आदित्यपुर में सिवरेज एवं 04 मिशन शहरों (चास, हजारीबाग, देवघर व गिरिडीह) में सेप्टज परियोजनाओं का कार्य प्रगति पर है। इस योजना के तहत 07 चयनित शहरों में 33 पार्कों का निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया है तथा 2021-22 में दो पार्क का निर्माण कार्य पूर्ण किया जायेगा।
> नमामि गंगे योजना – इस योजना के अधीन फुसरो के लिए 2021-22 में Interception and Diversion तकनीक पर आधारित 15 Mega Litre Per Day Sewage Treatment Plant (MLD STP) योजना का कार्यान्वयन कराया जायेगा।
> प्रधानमंत्री आवास योजना – इस योजना के तहत सभी सुयोग्य लाभुकों को 2022 तक पक्का घर उपलब्ध कराया जाना है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में 67,938 आवासों को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
> स्मार्ट सिटी योजना - इसके तहत राँची के HEC क्षेत्र में Green Field Project के अधीन सड़क, नाली, पैदल पथ, जलापूर्ति आदि आधुनिक सुविधाओं व आधारभूत संरचनाओं के निर्माण द्वारा एक विश्वस्तरीय शहर की स्थापना का लक्ष्य है।
> बाह्य संपोषित योजना – इसके अंतर्गत विश्व बैंक तथा एशियाई विकास बैंक के वित्तीय सहयोग से 16 निकायों में जलापूर्ति योजनाओं, धनबाद में 20 किमी. सड़क निर्माण आदि का कार्य किया जा रहा है।
> राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन – इस मिशन के तहत 3 लाख शहरी महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़ने, 3000 शहरी गरीबों से सूक्ष्म उद्यम स्थापित करने में बैंक सहायता उपलब्ध कराने, 129 आश्रयगृह निर्माण करने आदि का लक्ष्य है।
> कल्याण
> मरङ गोमके जयपाल सिंह मुण्डा पारदेशीय छात्रवृत्ति योजना - इस योजना के अंतर्गत राज्य के अनुसूचति जनजाति के अधिकतम 10 युवाओं को देश से बाहर यूनाईटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एवं नॉर्दन आयरलैंड के चयनित विश्वविद्यालयों / संस्थानों यथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय आदि के चयनित उच्च स्तरीय कोर्स (Masters / M.Phil Full Degree Program) हेतु वित्तीय सहायता प्रदान करने का लक्ष्य है। 
> आवासीय विद्यालय – वर्तमान में विभाग द्वारा कुल 143 आवासीय विद्यालय का संचालन किया जा रहा है, जिनमें से 7 एकलव्य एवं 11 आश्रम विद्यालय हैं। भारत सरकार द्वारा राज्य के 69 प्रखण्डों हेतु स्वीकृत कुल 69 एकलव्य विद्यालयों की स्थापना की जानी है।
> प्रमण्डलीय स्तर पर आवासीय विद्यालय – राज्य के अनुसूचित जनजाति / जाति एवं पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए बेहतर शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से आवश्यकतानुसार प्रमण्डलीय स्तर पर एक-एक आवासीय विद्यालय की स्थापना की जायेगी।
> साईकिल योजना - निर्बाध शिक्षा को प्रोत्साहन देने तथा ड्रॉप-आउट रेट को कम करने की दिशा में सरकार द्वारा साईकिल योजना का संचालन किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत योग्य छात्र-छात्राओं को साईकिल क्रय हेतु राशि दी जाती है। सभी को साईकिल निश्चित रूप से उपलब्ध हो सके, इसके लिए वर्ष 2021-22 से राज्य सरकार पूर्व की भांति साईकिल का क्रय कर छात्र-छात्राओं को उपलब्ध करायेगी।
> शहीद ग्राम विकास योजना – इस योजना का मुख्य उद्देश्य जनजातीय शहीद, जिन्होनें अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ते हुए अपने प्राणों की आहूति दे दी, उनके जन्मस्थली को आदर्श ग्राम के रूप में विकसित करना है। इस योजना के अंतर्गत बिरसा मुण्डा, गया मुण्डा, जतरा टाना भगत, वीर बुधु भगत, सिद्धो-कान्हू, नीलाम्बर-पीताम्बर, दिवा एवं किशुन तथा तेलंगा खड़िया, पोटो हो तथा भगीरथ मांझी के ग्रामों को चयनित करते हुए आवास, पेयजल आपूर्ति, सोलर विद्युतीकरण, सोलर स्ट्रीट लाईट, स्मारकों का जीर्णोद्धार, शहीदों की मूर्तियों का अधिष्ठापन आदि कार्य किया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में इस योजना के क्रियान्वयन हेतु 5 करोड़ रूपये की राशि का प्रावधान किया गया है।
> मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना - इस योजना के अंतर्गत झारखण्ड राज्य आदिवासी सहकारी विकास निगम / झारखण्ड राज्य अनुसूचित जाति सहकारी विकास निगम / झारखण्ड राज्य अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम / झारखण्ड राज्य पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम द्वारा अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग तथा दिव्यांगजन के युवाओं को स्वयं का व्यवसाय शुरू करने हेतु सुगम एवं सस्ते दर पर ऋण-सह-अनुदान देने हेतु मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना क्रियान्वित की जा रही है। पूर्व वर्ष में इस योजना के अंतर्गत अनुदान 25 प्रतिशत था तथा अधिकतम अनुदान राशि 2.50 लाख थी, इसे बढ़ाकर वित्तीय वर्ष 2021-22 में ऋण की राशि का 40 प्रतिशत अथवा अधिकतम 5 लाख रूपये करने का प्रावधान किया गया है। पूर्व में इस ऋण की प्राप्ति के लिए दो सरकारी नौकरी प्राप्त गारंटर की आवश्यकता थी, जिसे अब एक कर दिया गया है। इस योजना हेतु 12 करोड़ रूपये का प्रावधान बजट में किया गया है।
> Targeting the Hardcore Poor (THP) Project – इस परियोजना के अंतर्गत संथाल परगना के साहेबगंज, गोड्डा, दुमका एवं पाकुड़ जिलों के 5,000 अति कमजोर जनजातीय समूह को आच्छादित किया जा रहा है । परियोजना का उद्देश्य 24 माह की परियोजना अवधि में लाभुकों को गरीबी की जटलिता को निकालना है। वर्ष 2021-22 में इस योजना को सघनता से लागू किया जायेगा।
> झारखण्ड आदिवासी सशक्तिकरण एवं आजीविका परियोजना – इस परियोजना का वित्त पोषण IFAD (International Fund for Agricultural Development) द्वारा किया जा रहा है। इस परियोजना का क्रियान्वयन झारखण्ड ट्राइबल डेवलपमेंट सोसाइटी द्वारा राज्य के 14 अनुसूचित जिलों के 32 प्रखण्डों के 169 पंचायतों के 1,779 गाँवों में किया जा रहा है। इस परियोजना के अंतर्गत कुल 2.11 लाख जनजातीय परिवार आच्छादित किये जा रहे हैं। इस परियोजना के Localised Weather Based Planning की वृहद् प्रशंसा की गयी है । 
> कौशल विकास - कौशल विकास हेतु SPV (Special Purpose Vehicle) के रूप में गठित प्रेझा फाउंडेशन द्व रा राज्य में 21 कल्याण गुरूकुल, 06 नर्सिंग कौशल कॉलेज तथा 01 आईटीआई कौशल कॉलेज का संचालन किया जा रहा है। राज्य के लातेहार एवं जामताड़ा जिले में शीघ्र ही नर्सिंग कॉलेज शुरू करने की योजना है। । राज्य नर्सिंग काउंसिल द्वारा आयोजित परीक्षा में चान्हो नर्सिंग कॉलेज की सभी छात्राएँ Distinction के साथ उर्तीर्ण हुयी हैं। वर्ष 2020-21 में चान्हो नर्सिंग कौशल कॉलेज की सभी 92 छात्राओं को अपोलो एवं क्लाउड-9 जैसे प्रतिष्ठित अस्पतालों में अच्छे वेतन पर नियोजित किया गया है।
> अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र-छात्राओं के लिए
कोचिंग एण्ड एलायड योजना – अल्पसंख्यक समुदाय   के छात्र छात्राओं हेतु इस योजना का संचालन किया जाना है। पिछले वर्ष तक इस योजना से मात्र अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति तथा पिछड़ा वर्ग के छात्र-छात्राएँ ही आच्छादित हुए हैं।
> समाज कल्याण
> मशीनी परिष्कृत पूरक पोषाहार - आगामी वित्तीय वर्ष से 06-36 माह के बच्चों, 06-72 माह के कुपोषित बच्चों, गर्भवती महिलाओं एवं धात्री माताओं को मशीनी परिष्कृत पूरक पोषाहार Micronutrient fortified and/or Energy Dense Food (MFEDF) उपलब्ध कराने की सरकार की योजना है। इससे कुल 24.14 लाख लाभुकों को लाभान्वित करने का लक्ष्य है जिस पर 500 करोड़ रूपये का व्यय आने की संभावना है। 03-06 वर्ष के बच्चों को दोपहर के भोजन में प्रत्येक सप्ताह के तीन दिन एक अण्डा प्रतिदिन उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है।
> बच्चों को स्कूली शिक्षा हेतु सक्षम बनाने के लिए सरकार द्वारा यूनिसेफ के सहयोग से Early Childhood Care and Education के तहत Curriculum तैयार कराया गया है, जिसे सभी आंगनबाड़ी केन्द्रों में संचालित किया जायेगा। बच्चों को मनोरंजन पूर्वक ज्ञानवर्द्धक शिक्षा प्रदान कर उनके बौद्धिक विकास में सहयोग करना योजना का लक्ष्य है। इस योजना हेतु 3.80 करोड़ रूपये का बजटीय उपबंध किया गया है।
> समर अभियान – इस अभियान का उद्देश्य राज्य के बच्चों एवं महिलाओं में व्याप्त कुपोषण व अनीमिया को समाप्त करना है। इसके तहत विभिन्न संबंधित विभागों के समन्वित प्रयास से 1,000 दिनों की अवधि में राज्यव्यापी समर (SAAMAR Strategic Action for Alleviation of Malnutrition and Anaemia Reduction) अभियान का संचालन किये जाने का प्रस्ताव है। 
> DIVINE योजना – वित्तीय वर्ष 2021-22 में DIVINE (Dignity to Vulnerable Individuals for Nurturing with Empathy) योजना का संचालन किया जायेगा जिसका प्रमुख उद्देश्य कठिनतम परिस्थिति में जीवन यापन करने वाले विभिन्न वर्गों (बच्चे, महिलाएँ, परित्यक्ता, विधवा, वृद्ध, ट्रांसजेन्डर आदि) को चिह्नित कर महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग के योजनाओं व कार्यक्रमों से जोड़ना है। इस योजना का कार्यान्वयन डिजिटल प्लेटफार्म व सिविल सोसाइटी संगठनों के माध्यम से किया जाएगा। 
> Dietary Allowance तथा साझा पोषण कार्यक्रम – इसका उद्देश्य किशोरियों व युवतियों की भागीदारी से राज्य में Intergenerational कुपोषण चक्र को तोड़ना है। इस कार्यक्रम के तहत किशोरियों एवं युवतियों के समूहों को Dietary Allowance उपलब्ध कराया जायेगा तथा साझा रूप से पोषक भोजन व अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने हेतु ‘साझा पोषण कार्यक्रम' का संचालन वित्तीय वर्ष 2021-22 से किया जायेगा। 
> सार्वभौमिक पेंशन योजना - इस योजना के तहत राज्य के सभी जरूरतमंद वृद्ध, विधवा, दिव्यांग व अनाथ आच्छादित होंगे। अब तक इस योजना के अंतर्गत सीमित लक्ष्य तय होने के कारण कई जरूरतमंदों को लाभ नहीं मिल पा रहा था।
> Addiction Treatment Facility Centre – राज्य के 12 जिलों में सरकारी चिकित्सालयों में नशापान से मुक्ति की आवश्यकता वाले लोगों को निःशुल्क चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने हेतु Addiction Treatment Facility Centre खोले जाने का प्रस्ताव है। 
> Place for Safety भवन - वित्तीय वर्ष 2021-22 में जघन्य अपराध आरोपी बच्चों को सामान्य अपराध के आरोपी बच्चों से अलग रखने के उद्देश्य से राज्य में Place for Safety भवनों का निर्माण कराया जायेगा।
> Half Way Home – राज्य के अंतर्गत स्वस्थ हो चुके मानसिक रोगियों के पुनर्वास हेतु वित्तीय वर्ष 2021-22 में राँची, पूर्वी सिंहभूम तथा धनबाद जिलों में 30-30 व्यक्तियों की क्षमता वाले कुल तीन Half Way Home संचालित करने की योजना है। 
> स्कूली शिक्षा
> प्रारंभिक शिक्षा के सार्वव्यापीकरण एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को विद्यालयों में सुनिश्चित करने हेतु राज्य के अंतर्गत कई नूतन प्रयास ज्ञानोदय, ज्ञानसेतु कार्यक्रम, विद्यालय प्रमाणीकरण, ई - विद्यावाहिनी के रूप में किये गए प्रयासों के परिणामस्वरूप राज्य ने कई महत्वपूर्ण सूचकांको (Groos Intake Rate-GIR, Net Intake Rate-NIR) में प्रगति करते हुए राष्ट्रीय औसत से अधिक उपलब्धि हासिल की है।
> राज्य के प्रत्येक पंचायत को जीरो ड्रॉपआउट पंचायत के रूप में घोषित करने का लक्ष्य रखा गया है। विद्यालयों में छीजन दर को कम करने हेतु कई नवाचार किये जा रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप राज्य के 1,828 पंचायत जीरो ड्रॉपआउट घोषित हो चुके हैं तथा आगामी वर्ष में 1,000 और पंचायतों को जीरो ड्रॉपआउट घोषित करने का लक्ष्य रखा गया है।
> वैश्विक महामारी के दौरान झारखण्ड वापस आने वाले प्रवासी मजदूरों के 5,099 बच्चों को विद्यालय में नामांकन कराते हुए डिजिटल शिक्षा के माध्यम से जोड़ने का काम भी किया गया है।
> सभी प्रारंभिक विद्यालयों के अध्ययनरत बच्चों को वैश्विक महामारी के दौरान मध्याह्न भोजन योजना के अंतर्गत सूखा राशन एवं नगद राशि विद्यार्थियों को शिक्षकों के माध्यम से घर-घर उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया, ताकि आपदा की इस घड़ी में राज्य के 32 लाख विद्यार्थियों के पोषण के स्तर में कोई कमी नहीं आए।
> आदर्श विद्यालय योजना – इस योजना का शुभारंभ वित्तीय वर्ष 2020-21 में किया गया तथा 2024-25 तक राज्य सरकार द्वारा 18.86 करोड़ की लागत से राज्य के 4,496 विद्यालयों को आदर्श विद्यालय के रूप में विकसित करने का लक्ष्य रखा गया। इसमें 80 जिला स्तरीय विद्यालयों को उत्कृष्ट विद्यालय ( School of Excellence), 325 प्रखण्ड स्तरीय आदर्श विद्यालय सहित कुल 4,091 पंचायत स्तरीय विद्यालयों को आदर्श विद्यालय के रूप में विकसित किया जायेगा। प्रथम चरण में 80 विद्यालयों को उत्कृष्ट गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केन्द्र में विकसित करने हेतु इस वर्ष 450 करोड़ की राशि उत्कृष्ट आधारभूत संरचना, विषय आधारित शिक्षक की व्यवस्था, डिजिटल शिक्षा, विज्ञान प्रयोगशाला, कम्प्यूटर लैब, व्यवसायिक शिक्षा, STEM लैब आदि की व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु स्वीकृत करते हुए केन्द्रीय विद्यालयों के तर्ज पर CBSE से संबद्धता प्राप्त करते हुए अंग्रेजी माध्यम से शिक्षण भी इन विद्यालयों में उपलब्ध करायी जायेगी। 
> डिजिटल शिक्षा एवं स्मार्ट क्लास - एशियाई विकास बैंक के वित्त पोषण योजना से वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2025-26 तक राज्य के विद्यालयों को उत्कृष्ट बनाने हेतु एक नई योजना प्रारंभ करने का प्रस्ताव है। इस योजना के तहत प्राप्त निधि का आदर्श विद्यालय योजना के साथ Convergence करते हुए लगभग 4,639 विद्यालयों में डिजिटल शिक्षा एवं स्मार्ट क्लास की सुविधा उपलब्ध करायी जायेगी।
> SAMADHAN कार्यक्रम – इस कार्यक्रम के तहत राज्य के सरकारी विद्यालयों में दक्ष शिक्षकों की विषयवार व्यवस्था हेतु कार्यक्रम संचालित किये जाएंगे। इस हेतु आवश्यकतानुसार विषयवार योग्य शिक्षकों की व्यवस्था आदर्श लय योजना के तहत घंटी आधारित, अनुबंध एवं शिक्षकों के युक्तिकरण के माध्यम से की जायेगी। योग्य शिक्षकों के चयन हेतु 'समाधान ऐप' भी शीघ्र लागू किया जायेगा। 
> Exemplar School – राज्य के प्रारंभिक विद्यालयों को Exemplar School (प्रेरक गुणवत्ता शिक्षा के केन्द्र) के रूप में वित्तीय वर्ष 2021-22 में विकसित करने की योजना है।
> आकांक्षा कार्यक्रम इस कार्यक्रम के तहत राज्य के सरकारी विद्यालयों में शिक्षारत मेधावी छात्रों को निःशुल्क मेडिकल एवं इंजीनियरिंग की कोचिंग की व्यवस्था प्रदान की जाती है। सरकार के द्वारा ऐसे छात्रों को लैपटॉप प्रदान कर प्रोत्साहित किया गया है।
> मुख्यमंत्री स्वच्छ विद्यालय पुरस्कार - इसके अंतर्गत राज्य के 928 विद्यालयों ने 5 स्टार तथा 5,688 विद्यालयों - ने 4 स्टार प्राप्त कर स्वच्छता एवं गुणवत्ता के पैमाने पर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।
> DAHAR App – विद्यालय से बाहर रह गए बच्चों को विद्यालय से जोड़ने हेतु राज्यव्यापी सर्वेक्षण का व्यापक अभियान चलाकर बच्चों को चिन्हित किया जा रहा है तथा DAHAR App के माध्यम से इन बच्चों का डेटाबेस तैयार करते हुए इनके शिक्षण एवं मुख्यधारा के विद्यालयों में ठहराव हेतु आवश्यक रणनीति का निर्माण किया गया है।
> पढ़ना - लिखना अभियान – राज्य सरकार द्वारा शीघ्र ही शत-प्रतिशत साक्षरता के दर को हासिल करने हेतु एक नूतन योजना 'पढ़ना-लिखना अभियान' का शुभारंभ किया जायेगा।
> मुख्यमंत्री प्रोत्साहन राशि योजना – इस योजना के तहत राज्य के अधिविद्य परिषद्, सीबीएसई तथा आईसीएसई बोर्ड में राज्य स्तर पर वर्ष 2020 की मैट्रिक एवं इन्टर की परीक्षाओं में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय आने वाले विद्यार्थियों को क्रमशः 3,00,000 रूपये, 2,00,000 रूपये एवं 1,00,000 रूपये तक की प्रोत्साहन राशि दी गयी । 
> ज्ञानसेतु एवं ज्ञानोदय कार्यक्रम – गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को सुनिश्चित करने हेतु ज्ञानसेतु एवं ज्ञानोदय कार्यक्रम का संचालन किया जा रहा है तथा आगे भी इसे जारी रखने की योजना है। SATHe (Sustainable Action for Transforming Human Capital) के तहत इसे और सशक्त बनाने का कार्य किया जा रहा है। 
> मध्याह्न भोजन योजना के अंतर्गत रसोईया-सह-सहायिका के मानदेय में 500 रूपये मासिक वृद्धि की जायेगी। 
> मुख्यमंत्री विशेष छात्रवृत्ति योजना – इस योजना का शुभारंभ 10 करोड़ रूपये के बजटीय उपबंध से किया जा रहा है। 
> राष्ट्रीय शिक्षा नीति - राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों को वित्तीय वर्ष 2021-22 से लागू करने हेतु 10 करोड़ रूपये की राशि का प्रावधान किया गया है ।
> शारीरिक शिक्षा एवं खेलकूद - इस हेतु राज्य सरकार द्वारा विस्तृत हस्त-पुस्तिका तैयार की गयी है तथा उच्च माध्यमिक कक्षाओं में शारीरिक शिक्षा एवं खेलकूद को विषय के रूप में भी शामिल करने की योजना है।
> "आओ पढ़ें : खूब पढ़ें", पठन अभियान - इस अभियान को राज्य के प्रारंभिक विद्यालयों में बच्चों के पठन क्षमता को विकसित करने हेतु व्यापक रूप से आगामी वित्तीय वर्ष में संचालित किया जायेगा।
> उच्चतर एवं तकनीकी शिक्षा
> झारखण्ड जनजातीय विश्वविद्यालय एवं झारखण्ड खुला विश्वविद्यालय – वर्ष 2021-22 में इन दोनों विश्वविद्यालय की स्थापना की जानी है ताकि राज्य के सुदूर एवं ग्रामीण क्षेत्रों में उच्चतर शिक्षा की पहुँच संभव हो सके।
> महिला महाविद्यालयों में आवश्यकता आधारित 300 शैय्या छात्रावास का निर्माण कराया जायेगा। 
> केन्द्रीय Placement Cell – अधिक से अधिक छात्रों को रोजगार एवं प्रशिक्षण का अवसर उपलब्ध कराने हेतु इस Cell के गठन का प्रस्ताव है।
> श्रम, नियोजन, प्रशिक्षण एवं कौशल विकास
> झारखण्ड असंगठित कर्मकार सामाजिक सुरक्षा योजना - इस योजना के तहत असंगठित कर्मकार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम की धारा-3 की उपधारा-4 में निहित प्रावधानों के अनुसार असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए 5 योजनाएँ संचालित की जा रही हैं
1. असंगठित कर्मकार मृत्यु / दुर्घटना सहायता योजना
2. अंत्येष्टि सहायता योजना
3. असंगठित कर्मकारों के बच्चों के लिए मुख्यमंत्री छात्रवृत्ति योजना
4. कौशल उन्नयन योजना
5. चिकित्सा सहायता योजना
वित्तीय वर्ष 2021-22 में 1.50 लाख श्रमिकों का निबंधन करते हुए उनके हितार्थ संचालित योजना से लाभान्वित करने का लक्ष्य तय किया गया है।
> बंधुआ मजदूरों का पुनर्वास – इसके लिए प्रत्येक जिला में 10 लाख के कोर्पस फंड का गठन किया गया है। इस कोष से विमुक्त कराये गये बंधुआ श्रमिकों को अविलंब सहायता राशि उपलब्ध कराने की योजना है। मुख्यमंत्री झारखण्ड अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी श्रमिक अनुदान योजना इस योजना के अंतर्गत विदेश प्रवास पर गये श्रमिकों की असामयिक मृत्यु होने पर उनके आश्रितों को एकमुश्त 5 लाख रूपये का भुगतान संबंधित उपायुक्त के द्वारा किया जाना है।
> 'कार्यरत सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों का मॉडल ITI के रूप में उन्नयन" योजना के अंतर्गत औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (सामान्य) राँची, बोकारो तथा देवघर को मॉडल ITI के रूप में उन्नयन करने का प्रस्ताव है। 
> SANKALP कौशल विकास कार्यक्रम के संचालन की प्रक्रिया को सहज एवं सर्वसुलभ करने तथा संच. सलन व्यवस्था का विकेन्द्रीकरण करने के उद्देश्य से राज्य में SANKALP (Skills Acquisition and Knowledge Awareness for Livelihood Promotion) के तहत राज्य के सभी 24 जिलों में स्थानीय आवश्यकता एवं मांग के अनुरूप जिला कौशल विकास योजना तैयार करते हुए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। 
> उद्योग
> PMEGP – वित्तीय वर्ष 2021-22 में 5,000 युवक-युवतियों को प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) योजना के तहत स्वरोजगार हेतु लाभान्वित करने का लक्ष्य है। 
> कलस्टर विकास योजना - इसके तहत आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में समेकित इलेक्ट्रॉनिक मैन्यूफैक्चरिंग कलस्टर की स्थापना 185 करोड़ रूपये की लागत से की जा रही है।
> झारखण्ड औद्योगिक आधारभूत संरचना विकास निगम को केन्द्र एवं राज्य सरकार के सहयोग से कार्यान्वित की जा रही कई महत्वपूर्ण परियोजना यथा- प्लास्टिक पार्क, फार्मा पार्क एवं सर्ल्ड ट्रेड सेंटर, राँची आदि का कार्यान्वयन एजेंसी बनाया गया है।
> मेगा हैण्डलूम कलस्टर – गोड्डा में भारत सरकार के सहयोग से मेगा हैण्डलूम कलस्टर का कार्य प्रारंभ किया गया है जिससे संथाल परगना के सभी छः जिलों के बुनकरों को लाभ होगा।
> तसर रेशम – वित्तीय वर्ष 2021-22 में 3,000 मेट्रिक टन तसर रेशम के उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
> स्वरोजगार एवं खादी के विकास हेतु राज्य के परंपरागत 1,600 शिल्पियों को स्वरोजगार निमित्त प्रशिक्षण एवं 75 प्रतिशत अनुदान पर औजार एवं उपस्कर का वितरण किया जायेगा।
> स्फूर्ति योजना – इस योजना (Scheme of Fund for Regeneration of Traditional Industries-SFURTI) के अंतर्गत स्वीकृत 7 कलस्टर का कार्यान्वयन 2021-22 में किया जायेगा। इसमें लगभग 2,500 उद्यमियों को लाभान्वित किये जाने का लक्ष्य है। बोर्ड द्वारा शिल्पियों / उद्यमियों का आर्टिजन कार्ड बनवाकर राज्य एवं केन्द्र की अन्य योजनाओं के तहत 30,000 शिल्पियों / उद्यमियों को लाभान्वित किये जाने का भी प्रस्ताव है। /
> पथ निर्माण
> सड़क घनत्व – राज्य में सड़कों के घनत्व को बढ़ाने हेतु बजट में 3,480 करोड़ रूपये की राशि का उपबंध
किया गया है।
> प्रस्तावित कार्य – आगामी वित्तीय वर्ष में पथ निर्माण विभाग में निम्न कार्य प्रस्तावित हैं
1. माईनिंग कॉरिडोर का निर्माण ।
2. गिरिडीह, धनबाद, देवघर में रिंग रोड का निर्माण।
3. गोविन्दपुर- साहेबगंज सड़क का फोर लेनिंग कार्य।
4. राज्य के महत्वपूर्ण सड़कों को जोड़ने वाली सड़कों को फोर लेन करने का प्रस्ताव।
5. राज्य के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों को अच्छी सड़कों से जोड़ने का कार्य ।
> रेलवे एवं वायु मार्ग
> Institute of Driving Training and Research – इसकी स्थापना टाटा मोटर्स लिमिटेड के साथ मिलकर जमशेदपुर में की जायेगी जिसके लिए केन्द्र सरकार द्वारा अनुदानित 17 करोड़ की राशि की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।
> Multi Modal Terminal – राज्य के साहेबगंज जिला में राष्ट्रीय जलमार्ग-1 के अंतर्गत गंगा नदी पर जलमार्ग विकास परियोजना के तहत इस टर्मिनल का निर्माण विश्व बैंक के सहयोग से भारतीय अन्तर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण द्वारा किया जा रहा है।
> ट्रैफिक पार्क की स्थापना – राज्य में सड़क दुर्घटनाओं के कारण होन वाली मृत्यु को रोकने हेतु दक्षिणी राज्यों की तर्ज पर झारखण्ड में ट्रैफिक पार्क की स्थापना का प्रस्ताव है। इसके माध्यम से जन-साधारण को ट्रैफिक नियमों का अनुपालन किये जाने हेतु अद्यतन ग्राफिक्स तथा तकनीकी उपकरणों से अवगत कराया जायेगा। इस योजना हेतु वित्तीय वर्ष 2021-22 में 10 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है।
> Electric Vehicle Policy – राज्य में जीवाश्म ईंधनों से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण को न्यूनतम किये जाने के उद्देश्य से राज्य में इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित करने हेतु 2021-22 में Electric Vehicle Policy गठित करने का प्रस्ताव है। इसके लिए 2021-22 में 5 करोड़ की राशि का उपबंध बजट में किया गया है।
> झारखण्ड की औद्योगिक राजधानी जमशेदपुर को हवाई यातायात से जोड़ने के उद्देश्य से धालभूमगढ़ स्थित पुरानी हवाई पट्टी की 245 एकड़ भूमि को एक घरेलू हवाई अड्डे के रूप में विकसित करने की परियोजना पर कार्य किया जायेगा।
> UDAN Scheme – Regional Connectivity Scheme UDAN (उड़े देश का आम नागरिक) के तहत बोकारो तथा दुमका हवाई अड्डा के उन्नयन का कार्य प्रगति पर है । आगामी वित्तीय वर्ष में इन दोनों हवाई अड्डों से नियमित उड़ान सेवा प्रारंभ करने की दिशा में प्रयास किया जायेगा।
> देवघर में घरेलू हवाई अड्डा से आगामी वित्तीय वर्ष की प्रथम तिमाही में नियमित उड़ानों का परिचालन शुरू करने की दिशा में प्रयास किया जायेगा।
> राँची तथा अन्य हवाई अड्डों की हवाई पट्टियों पर एयर एंबुलेंस की स्थायी सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास किया जायेगा।
> राज्य की हवाई पट्टियों पर उपलब्ध खाली पड़े अनुपयोगी भूमि पर Solar Photo Voltaic Panels के माध्यम से निर्बाध विद्युत आपूर्ति का प्रयास किया जायेगा।
> ऊर्जा
> राज्य में निर्बाध बिजली आपूर्ति हेतु केन्द्र संपोषित स्कीम, राज्य स्कीम एवं विश्व बैंक संपोषित स्कीम क्रियान्वित है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु राज्य में संचालित प्रमुख योजनाएँ –
1. दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना
2. Restructured Accelerated Power Development Reforms Programme (RAPDRP)
3. झारखण्ड संपूर्ण बिजली आच्छादन योजना
4. Jharkhand Power System Improvement Project (JPSIP) - विश्व बैंक द्वारा संपोषित
> मीटरिंग एवं एनर्जी एकाउंटिंग योजना - इस योजना का मुख्य उद्देश्य बिलिंग एवं संग्रहण दक्षता को बढ़ाना है तथा इसके लिए स्मार्ट मीटरिंग का कार्य किया जायेगा। वित्तीय वर्ष 2021-22 में इस योजना के लिए 150 करोड़ का प्रस्ताव किया गया है। इस योजना की कुल लागत 450 करोड़ रूपये है। यह योजना 2021-22 से 2022-23 तक क्रियान्वित होगी तथा इस योजना के लिए विश्व बैंक व वार्षिक विकास योजना से भी राशि का व्यय किया जायेगा।
> जलाशयों पर फ्लोटिंग सोलर संयंत्र – इस योजना के तहत प्रथम चरण में गेतलसूद जलाशय, राँची में 100 मेगावाट क्षमता का फ्लोटिंग सोलर संयंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव है। 
> सोलर सिटी – राज्य के गिरिडीह शहर को सोलर सिटी के रूप में विकसित करने की योजना है।
> वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन
> वन क्षेत्र - वन संवर्द्धन एवं संरक्षण के सतत् प्रयासों के कारण राज्य का वनावरण एवं वृक्षारोपण बढ़कर राज्य कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 33.81 प्रतिशत हो गया है, जो राष्ट्रीय वन नीति, 198 के अनुरूप राज्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। ISFR, 2019 के अनुसार 2017 से 2019 के बीच राज्य में विभिन्न प्रकार के वन क्षेत्रों में 58 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है।
> वृक्षारोपण कार्यक्रम – राज्य के सभी 24 जिलों में अब तक 703 किमी. नदी तट पर वृक्षारोपण कार्य संपन्न कराया गया है। इस योजना को और आगे बढ़ाते हुए वित्तीय वर्ष 2021-22 में शेष नदियों पर वृक्षारोपण कार्यक्रम कराया जायेगा। इसके अलावे नदी के उद्गम स्थलों पर भी वृक्षारोपण / वन संवर्द्धन का कार्य कराया जायेगा।
> मुख्यमंत्री जन-वन योजना – इस योजना में नीतिगत परिवर्तन करते हुए किसानों की जमीन पर लगाये जाने वाले वृक्षों के लिए अनुदान की राशि को बढ़ाकर 75 प्रतिशत कर दिया गया है। इस वित्तीय वर्ष में इस योजना के तहत कृषकों के द्वारा उनके निजी भूमि पर विभाग के सहयोग से लगभग 5 लाख फलदार एवं काष्ठ प्रजाति के पौधों से वृक्षारोपण का कार्य संपन्न किया गया है। वर्ष 2021-22 में इस योजना के अंतर्गत 3,000 एकड़ भूमि पर वृक्षारोपण का लक्ष्य रखा गया है।
> शहरी वानिकी योजना – शहरी क्षेत्र को हरा-भरा करने के उद्देश्य से वित्तीय वर्ष 2021-22 में 'शहरी वानिकी योजना' शुरू करने का प्रस्ताव है। इस योजना के तहत संपूर्ण राज्य के शहरी क्षेत्र में उपलब्ध भूमि एवं सड़क के किनारे वृक्षारोपण का कार्य किया जायेगा तथा शहरी क्षेत्र में निर्मित पार्कों के विकास एवं रख-रखाव का कार्य भी किया जायेगा, ताकि आम जनों को प्राकृतिक वातावरण के साथ-साथ मनोरंजन के साधन उपलब्ध हो सकें।
> झारखण्ड CAMPA – झारखण्ड CAMPA (Jharkhand Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority) के तहत प्राप्त निधि से अवकृष्ट भूमि पर क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण एवं अन्य वानिकी संबंधी आवश्यक कार्य कराये जा रहे हैं। साथ ही, ग्रामों के सर्वांगीण विकास हेतु विभिन्न वन प्रमण्डलों द्व ारा ग्राम वन प्रबंधन / इको समिति के सदस्यों को माईक्रो प्लान के निर्माण से संबंधित प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कुल 2,800 माईक्रो प्लान का निर्माण उनके माध्यम से किया जा रहा है। वनों के भीतर वन्य प्राणियों को जल उपलब्ध कराने हेतु वन भूमि पर आवश्यकतानुसार चेकडैम बनाये जा रहे हैं। वन्य प्राणियों के पर्यावास में सुधार के तहत वनों का संघनीकरण कार्य भी किया जा रहा है। 1
> विधि व्यवस्था एवं संवेदनशील प्रशासन
> गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अंतर्गत गृह एवं कारा प्रभाग के लिए वित्तीय वर्ष 2021-22 में 476. 80 करोड़ रूपये की राशि का उपबंध करने का प्रस्ताव है। इसमें से केन्द्रीय सेक्टर स्कीम के लिए 237.65 करोड़ रूपये, केन्द्र प्रायोजित योजना के लिए 11.65 करोड़ रूपये तथा राज्य योजना के लिए 227.50 करोड़ रूपये की राशि के उपबंध का प्रस्ताव है।
> विधि-व्यवस्था संधारण हेतु Frontline force के प्रशिक्षण हेतु निर्माणाधीन Constable Traning School, Musabani को वित्तीय वर्ष 2021-22 में पूर्ण किया जायेगा।
> Emergency Response Support System (ERSS) परियोजना के अंतर्गत पूर्व से क्रियान्वित आपातकालीन सेवा Dial-100 (पुलिस), Dial-101 (अग्निशमन एवं बचाव ), Dial 108 ( एम्बुलेंस) तथा Dial-181 (महिला एवं बाल सुरक्षा) को एकीकृत कर Dial-112 स्थापित करने की कार्रवाई की जा रही है।
> वित्तीय वर्ष 2021-22 में राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) को क्रियाशील करने का लक्ष्य है।
> राज्य में वज्रपात से आमजनों को बचाने हेतु झारखण्ड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केन्द्र द्वारा Geographical Information System (GIS) Portal / Moblie App विकसित किया गया है, जिसके द्वारा वज्रपात होने की पूर्व सूचना Location Based SMS के माध्यम से आमजनों को दी जा रही है।
> सूचना प्रौद्योगिकी एवं ई-गवर्नेस
> भारतनेट फेज-1 के तहत 2,787 ग्राम पंचायतों / प्रखण्ड मुख्यालयों तथा फेज-2 में 993 ग्राम पंचायतों / प्रखण्ड मुख्यालयों तक Optical Fiber Cable (OFC) बिछा दिया गया है। शेष ग्राम पंचायतों / प्रखण्ड मुख्यालयों में OFC बिछाने का कार्य 2021-22 में पूर्ण किया जाना है।
> National e-Vidhan Application – देश के सभी राज्य के विधानसभाओं एवं संसद में वर्तमान मैनुअल कार्यप्रणाली को ऑनलाईन करने हेतु National e - Vidhan Application को झारखण्ड विधानसभा में भी लागू किये जाने का कार्य प्रक्रियाधीन है।
> पर्यटन
> नई पर्यटन नीति राज्य में नई पर्यटन नीति लागू किये जाने का प्रस्ताव है। इस नई पर्यटन नीति के तहत पर्यटन क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने हेतु विभिन्न प्रकार के प्रोत्साहन एवं सब्सिडी का प्रावधान रखा जायेगा।
> फूड क्राफ्ट संस्थान - देवघर में फूड क्राफ्ट संस्थान का निर्माण कराया जा रहा है। इस संस्थान में होटल प्रबंधन के क्षेत्र में डिप्लोमा कोर्स तथा अल्पावधि प्रशिक्षण प्रदान किया जायेगा। इसे वित्तीय वर्ष 2021-22 में प्रारंभ किया जायेगा।
> प्रसाद योजना - इस योजना के अंतर्गत देवघर के विकास हेतु 39 करोड़ रूपये की योजना स्वीकृत की गई है। इस योजना के अंतर्गत काँवरिया पथ में Spiritual Congregation Hall निर्माण, शिवगंगा के पास Control & Command Centre निर्माण तथा देवघर आने वाले मार्गों पर भव्य स्वागत द्वार निर्माण कराया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2021-22 में इस योजना को पूर्ण करने का लक्ष्य है।
> लुगुबुरू एवं रजरप्पा के महत्व को देखते हुए इन्हें वृहद् पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित करने की योजना है। 
> राज्य के प्रमुख जलाशयों में जलक्रीड़ा तथा पर्यटन आकर्षण क्षेत्रों में साहसिक क्रीड़ा को संवर्धित किया जायेगा। 
> राज्य के ग्रामीण विरासतों ( सांस्कृतिक / धार्मिक/ऐतिहासिक/पुरातात्विक आदि) का संवर्धन तथा पर्यटक आवासन की समस्या को दूर करने हेतु होम स्टे को बढ़ावा दिया जायेगा।
> रोप-वे निर्माण – राज्य के दुर्गम पर्यटन क्षेत्रों में पर्यटकों की सुगम पहुँच तथा अधिकाधिक पर्यटकों को आकर्षित करने हेतु रोप-वे निर्माण प्रस्तावित है।
> खेल-कूद
> सिद्धो-कान्हो खेल क्लब – राज्य के सभी गाँवों में एक-एक सिद्धो-कान्हो खेल क्लब की स्थापना की जायेगी, जिन्हें युवा एवं खेल गतिविधियों से संबंधित कार्यक्रम हेतु प्रोत्साहन राशि प्रदान की जायेगी।
> खेल विश्वविद्यालय - खेल क्षेत्र में शोध एवं अध्ययन हेतु राज्य में खेल विश्वविद्यालय की स्थापना को मूर्त रूप देने का प्रस्ताव है।
> टैलेंट हंट कार्यक्रम – राज्य के विभिन्न प्रशिक्षण केन्द्रों में बच्चों को प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु वृहद् रूप से टैलेंट हंट कार्यक्रम का आयोजन किया जायेगा, ताकि प्रतिभावान खिलाड़ियों को उचित प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिल सके।
> आवासी एवं दिवा- प्रशिक्षण केन्द्र – राज्य में सीमान्त स्तर पर ल-कूद के प्रशिक्षण हेतु 36 आवासीय एवं दिवा–प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित है, जिसमें 3,000 खिलाड़ी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। वित्तीय वर्ष 2021-22 में इन प्रशिक्षण केन्द्रों की संख्या में बढ़ोत्तरी की जायेगी ।
> एथलेटिक ट्रैक एवं एस्ट्रोटर्फ – राज्य प्रशिक्षण केन्द्रों एवं जिला स्तर के बड़े स्टेडियम में एथलेटिक ट्रैक एवं एस्ट्रोटर्फ अधिष्ठापन का कार्य कराया जायेगा, ताकि खिलाड़ी अत्याधुनिक खेल संरचना में प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें।
> कला एवं संस्कृति
> क्षेत्रीय व जनजातीय भाषा केन्द्र – राज्य के 9 क्षेत्रीय व जनजातीय भाषाओं ( नागपुरी, कुरमाली, खोरठा, हो, संथाली, कुडुख, मुण्डारी, खड़िया एवं पंचपरगनिया ) हेतु एक - एक भाषा केन्द्र स्थापित किया जायेगा।
वर्ष 2018-19 के बजट पर की गयी कार्रवाई का प्रतिवेदन - मुख्य बातें
> वित्तीय वर्ष 2018-19 को 'न्यू इण्डिया, न्यू झारखण्ड' के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। 
> वित्तीय वर्ष 2018-19 के बजट में कुल 403 घोषणाएँ की गयी थीं।
> राँची, देवघर, सिमडेगा तथा निकटवर्ती जिलों में उद्यान विकास योजना के तहत फूलों की खेती प्रारंभ की गयी।
> राँची में 1 लाख लीटर की क्षमता के डेयरी प्लांट को शुरू किया गया।
> देवघर, पलामू, साहेबगंज तथा गिरिडीह में 50 हजार लीटर क्षमता के डेयरी प्लांट का निर्माण प्रारंभ किया गया। 
> गोड्डा में कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् से अनुमोदन प्राप्त हुआ। 
> साहेबगंज में कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु भारतीय कृषि अनुसंधान परषिद् से अनुमोदन प्राप्त किया जाना है।
> दीनदयाल उपाध्याय योजना के तहत किसानों के लिए सिंचाई की समुचित व्यवस्था हेतु 300 कृषि फीडर का निर्माण प्रारंभ किया गया।
> केन्द्रीय तसर अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के माध्यम से दुमका में रेशम प्रसंस्करण इकाई की स्थापना की गयी है।
> राँची में पीपीपी मोड पर सिल्क पार्क की स्थापना की गयी तथा खरसावाँ में सिल्क पार्क का निर्माण शुरू किया गया। जा रही है ।
> राज्य के 9 जिलों में खाद्य प्रसंस्करण इकाई की स्थापना हेतु भूमि का आवंटन किया गया। 
> लुगुबुरू महोत्सव एवं सरायकेला के छऊ महोत्सव को राजकीय महोत्सव घोषित किया गया।
> प्रसाद योजना के तहत देवघर के विकास हेतु 45 करोड़ रूपये की स्वीकृति प्रदान की गयी।
> स्वदेश दर्शन योजना के तहत जमशेदपुर, राँची, नेतरहाट एवं बेतला में इको टूरिज्म सर्किट का विकास किया जा रहा है।
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Sat, 09 Sep 2023 11:18:27 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड आर्थिक सर्वेक्षण (2020&21) https://m.jaankarirakho.com/332 https://m.jaankarirakho.com/332 > महत्वपूर्ण नोट
> 2014-15 से 2018-19 के बीच संवृद्धि दर में कमी का मुख्य कारण 2015-16 में संवृद्धि दर का ऋणात्मक (-6.2% ) होना है।
> वित्तीय वर्ष 2020-21 के प्रथम दो तिमाही में भारत एवं राज्यों के सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से कमी दर्ज की गयी है। यद्यपि अक्टूबर, 2020 से इसमें सुधार दर्ज किया गया है तथा आगामी तिमाहियों में इसमें v आकार में सुधार का अनुमान है।
> झारखण्ड राज्य का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का मात्र 1.6 प्रतिशत है।
> 2018-19 के आँकड़ों के अनुसार प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से झारखण्ड राज्य का देश के 29 राज्यों ( जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन के पूर्व) में 26वाँ स्थान है।
> झारखण्ड राज्य से कम प्रति व्यक्ति आय वाले राज्य केवल मणिपुर (27वाँ स्थान), उत्तर प्रदेश (28वाँ स्थान) तथा बिहार (29वाँ स्थान) हैं।
> विभिन्न क्षेत्रों की वृद्धि दर, GSDP वृद्धि दर में योगदान एवं GSVA में हिस्सेदारी 
> महत्वपूर्ण तथ्य
> सर्वाधिक वृद्धि दर वाला क्षेत्र/ उपक्षेत्र वायु परिवहन सेवा (31.7%) तथा व्यापार एवं मरम्मत सेवा (12.1%) क्रमशः रहा है।
> भण्डारण (-1.9%) क्षेत्र में ऋणात्मक वृद्धि दर्ज की गयी है।
> कोविड- 19 महामारी के दौरान वित्तीय वर्ष 2020-21 के प्रथम दो तिमाही में भारत के GDP एवं राज्य के GSDP में कमी दर्ज की गयी है। यद्यपि अक्टूबर, 2020 के बाद से इसमें सुधार देखने को मिला है तथा आगामी भविष्य में यह सुधार V आकार में दिखाई पड़ेगा।
> झारखण्ड राज्य का कुल GSDP भारत के कुल GDP का मात्र 1.6% है। 
> प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से (2018-19 का आँकड़ा) भारत के 29 राज्यों (जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन से पूर्व) झारखण्ड राज्य का स्थान 26वाँ (₹54,982) है। ज्ञात हो कि प्रति व्यक्ति आय के मामले में केवल तीन राज्य मणिपुर ( ₹51,180), उत्तर प्रदेश (₹44, 421) तथा बिहार (₹28,668) झारखण्ड से पीछे हैं। 
> तृतीयक क्षेत्र के उत्पादन में सर्वाधिक योगदान व्यापार, मरम्मत, होटल एवं रस्टूरेंट उपक्षेत्र का (29.4%) तथा इसके बाद परिवहन, भंडारण, संचार आदि क्षेत्र का ( 16.7% ) है।
> तृतीयक क्षेत्र के अंतर्गत सर्वाधिक तेज वृद्धि दर वायु परिवहन उपक्षेत्र में (31.7% ) की गयी है जबकि भंडारण उपक्षेत्र में नकारात्मक वृद्धि (-1.9%) दर्ज की गयी है।
> झारखण्ड में मुद्रास्फीति
> वित्तीय वर्ष 2016-17 2017-18 तथा 2018-19 में झारखण्ड में मुद्रास्फीति की दर 6% से कम रही है। ज्ञात हो कि इस अवधि में भारत में मुद्रास्फीति की दर भी 6% से कम रही है।
> अक्टूबर, 2019 के बाद झारखण्ड तथा भारत में मुद्रास्फीति दर में वृद्धि दर्ज की गयी तथा यह आरबीआई के उच्चतम सीमा (6%) से अधिक हो गया।
> हाल के महीनों में उच्च मुद्रास्फीति दर का कारण मुख्यतः कोविड-19 के कारण अर्थव्यवस्था में लॉकडाउन की स्थिति एवं आपूर्ति श्रृंखला का बाधित होना है।
> झारखण्ड के शहरी क्षेत्रों में मुद्रास्फीति की दर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक रही है। 
> झारखण्ड में निर्धनता
> वैश्विक बहुआयामी निर्धनता सूचकांक - 2019 के अनुसार 2005-06 से 2015-16 के दस वर्षों की अवधि में झाखण्ड में 72 लाख लोग बहुआयामी निर्धनता से बाहर निकल गये हैं।
> 2005-06 से 2015-16 के बीच झारखण्ड राज्य में बहुआयामी निर्धनता का प्रतिशत 74.7% से कम होकर 46.5% हो गया है।
2. राजकोषीय विकास एवं राज्य वित्त
> वित्तीय वर्ष 2014-15 से 2019-20 के बीच राज्य के बजट के आकार में 12.1% की औसत वार्षिक दर से वृद्धि दर्ज की गयी है तथा 2020-21 में इसके 22% रहने की संभावना है।
> वित्तीय वर्ष 2019-20 में कुल बजटीय व्यय का 53% योजना पर व्यय होने की संभावना है जबकि 2020-21 में इसके 57% रहने की संभावना है।
> पिछले सात वर्षों में राज्य का राजकोषीय घाटा (तीन वर्ष 2015-16 2016-17 एवं 2017-18 को छोड़कर) FRBM की 3% की सीमा के अंदर ही रहा है।
> वित्तीय वर्ष 2015-16 में राजकोषीय घाटा 5.58% के उच्च स्तर पर रहा है, जिसका प्रमुख कारण इस वर्ष 'उदय योजना' के तहत राज्य द्वारा लिया जाने वाला ऋण ( ₹5,553.37) करोड़ है।
> झारखण्ड राज्य में प्रति व्यक्ति ऋण ₹25 हजार (2019-20) है।
> 15वाँ वित्त आयोग एवं झारखण्ड
> 15वें वित्त आयोग की अंतिम रिपोर्ट (2021-26) में राज्यों को केन्द्रीय करों में 41% हिस्सेदारी देने की सिफारिश की गयी है।
> केन्द्रीय करों में हिस्सेदारी के अलावा 15वें वित्त आयोग ने झारखण्ड राज्य को वित्तीय वर्ष 2020-21 में अनुदान के रूप में निम्न राशि देने की सिफारिश की है
> ₹813 करोड़ – स्थानीय निकायों को
> ₹189 करोड़ – आपदा प्रबंधन हेतु
> ₹312 करोड़ – पोषण हेतु
> केन्द्रीय करों में हिस्सेदारी के अलावा 15वें वित्त आयोग ने झारखण्ड राज्य को वित्तीय वर्ष 2021 से 2026 के बीच अनुदान के रूप में निम्न राशि देने की सिफारिश की है
> ₹3367 करोड़ – शहरी स्थानीय निकायों को
> ₹6585 करोड़ – ग्रामीण स्थानीय निकायों को
> ₹4182 करोड़ – आपदा प्रबंधन हेतु
> ₹2370 करोड़ – स्वास्थ्य हेतु
> ₹179 करोड़ – उच्च शिक्षा हेतु
> ₹677 करोड़ – कृषि प्रदर्शन हेतु प्रोत्साहन राशि
> ₹966 करोड़ – प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना हेतु
> ₹275 करोड़ – न्यायपालिका हेतु
> ₹48 करोड़ –  सांख्यिकी हेतु
> 15वें वित्त आयोग ने राज्य में पर्यटन के विकास, नवीकरणीय ऊर्जा तथा बैद्यनाथ धाम हेतु ₹1300 करोड़ का विशेष अनुदान देने की सिफारिश की है।
3. संस्थागत वित्त
> वित्तीय संस्थाएँ (बैंक)
> झारखण्ड राज्य में बैकों की कुल 3203 शाखाएँ कार्यरत हैं जो देश के कुल बैंक शाखाओं का 2.07% ( सितंबर, 2020 तक) है।
> राज्य में प्रति एक लाख जनसंख्या पर 9.16 बैंक शाखाएँ उपलब्ध हैं, जो राष्ट्रीय औसत 11.8 से कम है। 
> राज्य की कुल बैंक शाखाओं में लगभग 80% शाखाएँ अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों की हैं। 
> निजी बैंकों की शाखाओं की हिस्सेदारी लगभग 13% है।
> राज्य की कुल बैंक शाखाओं का लगभग 40% राज्य के चार जिलों ( राँची, बोकारो, धनबाद तथा पूर्वी सिंहभूम) में संकेन्द्रित हैं।
> प्राथमिकता क्षेत्र को ऋण
> पिछले साढ़े पांच वर्षों में राज्य के कुल साख सृजन (वित्तीय संस्थाओं द्वारा जनता को ऋण) का 50% प्राथमिकता क्षेत्र को दिया गया है।
> गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ
> राज्य में प्राथमिकता क्षेत्र का NPA (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ) गैर-प्राथमिकता क्षेत्र के NPA की तुलना में अधिक है।
> पीएम-किसान
> प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम- किसान) के अंतर्गत 4 नवंबर, 2020 तक राज्य के 31.85 लाख किसान पंजीकृत हुए हैं। 
> वित्तीय समावेशन सूचकांक
> वित्तीय समावेश सूचकांक (FII) - 2017 में झारखण्ड के जिलों में राँची, पूर्वी सिंहभूम तथा लोहरदगा का स्थान क्रमश: प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय है। इस सूचकांक में सबसे अंतिम (24वाँ) स्थान पर गढ़वा का है। 
> प्रधानमंत्री जन धन योजना
> प्रधानमंत्री जन-धन योजना के अंतर्गत राज्य की कुल आबादी के 29.9 प्रतिशत लोगों का खाता खोला गया है। झारखण्ड राज्य का इस मामले में देश के राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में चौथा स्थान (1 - चंडीगढ़, 2 - असम, 3-मध्य प्रदेश है। साथ ही झारखण्ड का प्रदर्शन राष्ट्रीय औसत ( 21.7%) से भी बेहतर है।
4. ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज
> मनरेगा योजना
> मनरेगा योजना राज्य के सभी 24 जिलों के 263 प्रखण्डों के 4,403 ग्राम पंचायतों में संचालित की जा रही है।
> मनरेगा योजना में संलग्न सक्रिय श्रमिकों में अनुसूचित जनजाति तथा अनुसूचित जाति के व्यक्तियों का अनुपात क्रमश: 27.64% तथा 10% है।
> वित्तीय वर्ष 2020-21 में मनरेगा योजना में 961 लाख मानव दिवस कार्य सृजित हुआ जो वित्तीय वर्ष 2019-20 में सृजित 642 लाख की तुलना में 49.73% अधिक है।
> ग्रामीण रोजगार सृजन हेतु 3 नयी योजनाएँ
> राज्य में ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरी आधारित रोजगार सृजन के उद्देश्य से 4 जुलाई, 2020 को मुख्यमंत्री द्वारा राँची से 3 नई योजनाओं का शुभारंभ किया गया है। इन योजनाओं का संचालन मनरेगा योजना के तहत किया जाएगा। 
> इन श्रम-गहन योजनाओं के माध्यम से सरकार द्वारा लगभग ₹20,000 करोड़ मजदूरी के रूप में भुगतान किया जायेगा।
> इन योजनाओं के माध्यम से राज्य के उच्च बेरोजगारी दर वाले गाँवों में लॉकडाउन के दौरान वापस लौटे प्रवासी मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराते हुए बेरोजगारी दर को नियंत्रित करना है। 
> राज्य के श्रम, योजना व प्रशिक्षण विभाग के ऑकड़ों के अनुसार लॉकडाउन के दौरान लगभग 6.61 लाख प्रवासी मजदूर विभन्न स्थानों से राज्य में वापस आये हैं।
> बिरसा हरित ग्राम योजना
> यह एक वृक्षारोपण कार्यक्रम है जिसके तहत राज्य के लगभग 2 लाख एकड़ परती भूमि पर वृक्षारोपण किया जायेगा। 
> इस योजना के तहत राज्य के पाँच लाख परिवारों को प्रति परिवार 100 फल देने वाले पौधे उपलब्ध कराये जायेंगे। 
> इस योजना के तहत अगले कुछ महीनों में राज्य में 5 करोड़ फल देने वाले पौधे लगाने का लक्ष्य है। 
> इस योजना में पौधा लगाने से लेकर उसके फलने-फूलने तक के सभी कार्य मनरेगा योजना के तहत किये जायेंगे। 
> इस योजना के माध्यम से सभी परिवारों को पौधारोपण के तीन वर्षों के बाद 50,000 रूपये मासिक आय का अनुमान है।
> इस योजना के तहत अगले पाँच वर्षों में 25 करोड़ मानव दिवस कार्य सृजित किये जाने का अनुमान है।
> नीलांबर-पीतांबर जल समृद्धि योजना 
> यह योजना वर्षा जल एवं सतही जल हेतु कृषि-जल भंडारण इकाई के निर्माण पर लक्षित है।
> इस योजना के माध्यम से लगभग 5 लाख एकड़ कृषि योग्य भूमि की सिंचाई की जा सकेगी। 
> इस योजना द्वारा सीमांत भूधारक एवं किसान प्रतिवर्ष 5 लाख करोड़ लीटर वर्षा व सतही जल का भंडारण करने में सक्षम होंगे। इस योजना के द्वारा अगले 4-5 वर्षों में 10 करोड़ मानव दिवस कार्य सृजित किये जाने का अनुमान है। 
> इस योजना के अंतर्गत मुख्य रूप से पलामू प्रमण्डल के सूखा प्रभावित क्षेत्र पर बल दिया जायेगा।
> वीर शहीद पोटो हो खेल विकास योजना 
> यह आधारभूत खेल संरचना विकास योजना है जिसका संचालन मनरेगा योजना के अंतर्गत किया जाएगा।
> इस योजना के तहत संपूर्ण राज्य में लगभग 5,000 खेल मैदान का विकास किया जाएगा। 
> इस योजना के माध्यम से वर्तमान वित्तीय वर्ष में लगभग 1 करोड़ मानव दिवस कार्य सृजित किये जाने का अनुमान है।
> प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना
> प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत ( 3 फरवरी, 2021 तक) राज्य में 25,543 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण पूर्ण हो चुका है, जो देश में निर्मित कुल ग्रामीण सड़कों का 3.96% है।
> वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2020-21 के बीच ग्रामीण सड़कों के विकास के संदर्भ में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जिले क्रमशः गुमला, पश्चिमी सिंहभूम तथा पूर्वी सिंहभूम हैं जबकि धनबाद (अंतिम) व कोडरमा का प्रदर्शन सबसे निम्नतम रहा है ।
> प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण
> प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत 2022 तक राज्य में 12,72,916 मकानों के निर्माण का लक्ष्य है जिसमें से 7,51,571 मकानों का निर्माण किया जा चुका है।
> झारखण्ड एकीकृत आदर्श ग्राम योजना
> झारखण्ड एकीकृत आदर्श ग्राम योजना (JIGAY) के तहत सांसद आदर्श ग्राम योजना, प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना, मुख्यमंत्री स्मार्ट ग्राम पंचायत योजना तथा विधायक आदर्श ग्राम योजना को एकीकृत किया गया है।
> झारखण्ड राज्य आजीविका संवर्द्धन सोसाइटी
> ग्रामीण विकास विभाग द्वारा झारखण्ड राज्य आजीविका संवर्द्धन सोसाइटी का गठन किया गया है जिसके माध्यम से राज्य में गरीबी उन्मूलन योजनाओं का कार्यान्वयन किया जायेगा।
> झारखण्ड राज्य आजीविका संवर्द्धन सोसाइटी का प्रमुख उद्देश्य निर्धनता उन्मूलन, महिला सशक्तिकरण तथा समानता स्थापित करना है।
> झारखण्ड राज्य आजीविका संवर्द्धन सोसाइटी के द्वारा बैंक सखी मॉडल शुरू किया गया है जिसके अंतर्गत बैंक संबंधी क्रियाकलापों में स्वयं सहायता समूहों की मदद ली जा रही है।
> राज्य के राँची, खूँटी, पश्चिमी सिमडेगा, गुमला, पश्चिमी सिंहभूम तथा लातेहार जिले के 16 प्रखण्डों में वैज्ञानिक तरीके से लाह उत्पादन किया जा रहा है।
> पलाश ब्रांड
> स्वयं सहायता समूहों द्वारा निर्मित उत्पादन के प्रचार-प्रसार तथा बिक्री हेतु झारखण्ड सरकार के सहयोग से झारखण्ड राज्य आजीविका संवर्द्धन सोसाइटी द्वारा 'पलाश ब्राण्ड' की स्थापना की गयी है।
> उड़ान (UDAAN)
> यह दीनदयाल अंत्येदय योजना (DAY-NRLM) के अंतर्गत राज्य के 23,779 आदिम भेद्य जनजातीय समूहों (PVTG) का 3 वर्ष के अंदर विकास करना है।
> इस परियोजना के तहत 1,562 PVTG स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया है। 
> गुटु गलांग कल्याण ट्रस्ट पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा प्रखण्ड में PVTG महिलाओं द्वारा एक थैला निर्माण इकाई स्थापित किया गया है जिसमें प्रतिदिन 2500 थैलों का निर्माण किया जाता है। इन थैलों का प्रयोग डाकिया योजना के अंतर्गत वस्तुओं की पैकेजिंग हेतु किया जाता है।
> JHIMDI
> जापान के द्वारा राज्य में JHIMDI (Jharkhand Horticulture Intensification by Micro Drip Irrigation Project) हेतु ऋण उपलब्ध कराया गया है।
> JHIMDI का उद्देश्य राज्य में टपकन-सिंचाई (drip-irrigation) के द्वारा मजबूत व सतत् कृषि आधारित आजी. विका उपलब्ध कराना है। इसके अंतर्गत राज्य के 9 जिले व 30 प्रखण्ड आच्छादित हैं।
> जोहार (JOHAR)
> जोहार (JOHAR - Jharkhand's Opportunities for Harnessing Rural Growth) परियोजना का संचालन विश्व बैंक * के सहयोग से किया जा रहा है।
> इस परियोजना का उद्देश्य चयनित कृषिगत एवं गैर-कृषिगत क्षेत्र में घरेलू आय में वृद्धि करना तथा उसमें विविधता लाना है।
> इस परियोजना के अंतर्गत राज्य के 2,00,000 ग्रामीण परिवारों तथा लगभग 3,500 कृषि उत्पादक समूहों के लाभान्वित होने के अनुमान है, जिनमें महिलाएँ मुख्य रूप से उत्पादन, प्रसंस्करण व विपणन गतिविधियों में संलग्न हों। 
> इस परियोजना का संचालन राज्य के 17 जिलों में 68 प्रखण्डों में किया जा रहा है।
> पंचायती राज
> पंचायती राज संस्थाओं के अंतर्गत झारखण्ड राज्य में 24 जिला पंचायतें, 264 उप-जिला पंचायतें, 263 मध्यवर्ती पंचायतें, 4,364 ग्राम पंचायतें, 51 शहरी निकाय तथा 1 छावनी बोर्ड (रामगढ़) हैं।
> झारखण्ड राज्य में पंचायती राज व्यवस्था में कुल निर्वाचित प्रतिनिधियों में 50.6% भागीदारी महिलाओं की है।
> झारखण्ड राज्य में 16 जिलों में कुल 131 प्रखण्ड पेसा क्षेत्र के अंतर्गत अधिसूचित हैं जिसमें से 13 जिले पूर्णत: आच्छादित हैं तथा 3 जिले (पलामू, गढ़वा, गोड्डा) आंशिक रूप से आच्छादित हैं।
> नानाजी देशमुख राष्ट्रीय गौरव ग्राम सभा पुरस्कार - 2020 यह पुरस्कार गिरिडीह जिला के बिरनी प्रखण्ड के कपिलो ग्राम पंचायत को दिया गया है। 
> ग्राम पंचायत विकास योजना अवार्ड - 2020 - यह अवार्ड रामगढ़ जिले के डुलमी प्रखण्ड के होन्हे ग्राम पंचायत को दिया गया है।
> बाल-मित्र ग्राम पंचायत अवार्ड-2020 यह अवार्ड बोकारो जिले के पेटरवार प्रखण्ड के बुण्डु ग्राम पंचायत को दिया गया है। 1
5. शहरी विकास
> पेयजल एवं स्वच्छता
>>झारखण्ड राज्य के मात्र 27.3% ( भारत में 40.9% ) परिवारों को उनके आवासों में पाइपलाईन द्वारा पेयजल उपलब्ध है, जबकि राज्य के शहरी क्षेत्रों में यह आँकड़ा 46.15% है।
> राज्य के मात्र 54.9% परिवारों के पास अपना बाथरूम उपलब्ध है। भारत में यह आँकड़ा 75% है।
> राज्य के 22.4% परिवारों के बाथरूम तक पहुँच ही नहीं है। भारत में यह आँकड़ा 8.8% है।
> एलपीजी
> राज्य के शहरी क्षेत्रों में 67.8% लोगों के पास खाना बनाने हेतु एलपीजी ईंधन की सुविधा उपलब्ध हैस्तर पर यह आँकड़ा 86.6% है।
> सुशीला महिला समिति 
> सुशीला महिला समिति राँची निगर निगम क्षेत्र में एक स्वयं सहायता समूह है। 
> इस महिला समिति की सफलता की कहानी को डीडी नेशनल चैनल पर दिखाया गया है। 
> इस महिला समिति का गठन सितंबर, 2019 में हरमू, राँची में किया गया था। 
> इस महिला समिति की शुरूआत 10 महिलाओं द्वारा प्रति सदस्य ₹10 के योगदान से की गयी थी। 
> इस महिला समिति की सदस्यों ने एलइडी बल्ल निर्माण का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। 
> वर्तमान समय में एलइडी बल्ब बनाकर इस महिला समिति की सभी सदस्य प्रतिमाह 50 से 60 हजार रूपये की आमदनी प्राप्त कर रही हैं।
> मुख्यमंत्री श्रमिक योजना-2020
> मुख्यमंत्री श्रमिक (शहरी रोजगार मंजुरी फॉर कामगार) योजना की शुरूआत शहरी निर्धनों को रोजगार अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किया गया है।
> इस योजना के तहत उन प्रवासी श्रमिकों को लाभ प्रदान करने का लक्ष्य है जो लॉकडाउन की अवधि में वापस अपने घर आ गये।
> इस योजना का संचालन मनरेगा के तर्ज पर किया जा रहा है, जिसमें काम हेतु आवेदन देने के 15 दिनों के अंदर 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराया जाता है।
> रोजगार उपलब्ध नहीं कराने की स्थिति में लाभार्थी को बेरोजगारी भत्ता दिया जाता है।
> झारखण्ड नगरीय विकास परियोजना (JMDP) 
> इस परियोजना के संचालन हेतु 24 जून, 2019 को भारत सरकार, झारखण्ड सरकार तथा विश्व बैंक के बीच 147 मिलियन डॉलर हेतु एक समझौता किया गया है। 
> इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य झारखण्ड के शहरी क्षेत्र के लोगों को आधारभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना तथा शहरी स्थानीय निकायों की प्रबंधन क्षमता में सुधार करना है।
> विश्व बैंक से प्राप्त राशि का प्रयोग जलापूर्ति, सिवरेज, जल निकासी, शहरी सड़कों के विकास तथा झारखण्ड शहरी अवसंरचना विकास कंपनी (JUIDCO) की क्षमता को मजबूत करने हेतु किया जायेगा। 
> ऋण की यह राशि अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक द्वारा 22.5 वर्षों हेतु (7 वर्ष की रियायत अवधि सहित) दी गयी है।
> राँची स्मार्ट सिटी परियोजना
> राज्य की राजधानी राँची का चयन 25 मई, 2016 को स्मार्ट सिटी हेतु किया गया था।
> इस परियोजना के तहत राँची के एचइसी क्षेत्र में 656.30 एकड़ भूमि पर ग्रीनफील्ड परियोजना प्रस्तावित है।
> अमृत (AMRUT) मिशन
> अमृत मिशन के तहत झारखण्ड के 7 शहरों को शामिल किया गया है जिसमें राँची, धनबाद, चास, देवघर, आदित्यपुर, हजारीबाग तथा गिरिडीह शामिल हैं।
> अमृत मिशन के तहत शामिल शहरों में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहर राँची ( 10.73 लाख) तथा धनबाद (11.62 लाख) हैं।
> अमृत मिशन के तहत स्वीकृत 46 परियोजनाओं में 34 परियोजनाएँ ( 33 पार्क एवं 01 जलापूर्ति) पूर्ण की जा चुकी हैं।
> नमामि गंगे परियोजना
> नमामि गंगे परियोजना के तहत स्वीकृत 12 योजनाओं में से 7 परियोजनाएँ पूर्ण की जा चुकी हैं।
6. कृषि एवं संबद्ध गतिविधियाँ
> राज्य के कुल सकल मूल्य वृद्धि में कृषि व संबद्ध क्षेत्र का योगदान 13 प्रतिशत है।
> राज्य के कुल कार्यबल का 43 प्रतिशत कृषि एवं संबंद्ध गतिविधियों पर निर्भर है।
> पिछले पाँच वर्षों में इस क्षेत्र में खरीफ एवं रबी दोनों फसलों के उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई है। 
> राज्य में बागवानी, सब्जियों, डेयरी व मांस उत्पादन में भी वृद्धि दर्ज की गई है।
> भूमि के उपयोग की प्रवृत्ति
> राज्य के कुल क्षेत्रफल का 17.37% (1,385 हजार हेक्टेयर) शुद्ध बुआई क्षेत्र है।
> राज्य के कुल भूभाग का 17.38% चालू परती भूमि (पिछले एक वर्ष से कृषि कार्य नहीं) तथा 14.08% चालू परती के अलावा (1 से 5 वर्ष तक कृषि कार्य नहीं) है।
> भौगोलिक क्षेत्र के मामले में झारखण्ड से लगभग समानता रखने वाले राज्य छत्तीसगढ़ में शुद्ध बुआई क्षेत्र कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 33.94% है।
> राज्य के सकल फसली क्षेत्र का मात्र 15% ही सकल सिंचित क्षेत्र है।
> झारखण्ड राज्य की शस्य सघनता (Crop Intensity) 126% है।
> फसल
> वर्ष 2017-18 से 2019-20 के बीच राज्य में धान के कुल उत्पादन में 44% तथा प्रति हेक्टेयर उत्पादन में 36% की कमी दर्ज की गयी है।
> वर्ष 2017-18 से 2019-20 के बीच राज्य में मक्का के कुल उत्पादन में 24% तथा प्रति हेक्टेयर उत्पादन में 14% की कमी दर्ज की गयी है।
> सिंचाई
> राज्य के देवघर जिले में पुनासी जलाशय परियोजना लगभग पूर्ण हो चुकी है। पुनासी मुख्य नहर की लंबाई लगभग 72 किलोमीटर है।
> राज्य में कुल 4 वृहद् सिंचाई परियोजनाओं तथा 105 मध्यम सिंचाई परियोजनाओं का संचालन किया जा रहा है।
> कृषि वित्त
> राज्य में 2014-15 से 2019-20 के बीच कृषि क्षेत्र में ऋण के प्रवाह की दर में लगभग 7 प्रतिशत की औसत वृद्धि दर्ज की गई हैं।
> राज्य में सभी सामान्य कंसीसी खातों को स्मार्ट केसीसी खातों में परिवर्तित किया रहा है । 
> स्मार्ट कंसीसी के तहत खाताधारक को एटीएम कार्ड की सुविधा उपलब्ध करायी जाएगी ताकि डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा दिया जा सके।
> राज्य के 75.78% केसीसी खाताधारकों को स्मार्ट केसीसी के तहत रूपे कार्ड जारी किया जा चुका है। 
> प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना
> 2016 में लागू होने के बाद से इस योजना के तहत 2018-19 के रबी मौसम तक राज्य के 2.5 लाख किसानों को लाभ प्रदान किया जा चुका है।
> भंडारण
> मार्च, 2019 को राज्य में भंडारण 5.51 लाख मीट्रिक टन थी। 
> मार्च, 2019 को राज्य में शीतगृह (कोल्ड स्टोरेज) क्षमता 2 लाख मीट्रिक टन थी।
> कृषि से संबंधित योजनाएँ
> झारखण्ड राज्य फसल राहत योजना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के स्थान पर इस योजना की शुरूआत वित्तीय वर्ष 2020-21 में की गयी है। इस योजना के अंतर्गत प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल के नुकसान होने पर आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। योजना के तहत पंजीकृत किसानों को मुआवजे की राशि को बीमा कंपनी के द्वारा की जाएगी। इस योजना की शुरूआत ₹100 करोड़ की राशि से की गयी है। 
> झारखण्ड कृषि ऋण माफी योजना - इस योजना की शुरूआत 2020-21 में की गई है। इस योजना की शुरूआत ₹2000 करोड़ की राशि से की गयी है। यह एक ऋण माफी योजना है जिसके तहत मानक फसल ऋण बकाया खातों में ₹50,000 तक के बकाया राशि माफ किये जायेंगे।
7. खाद्य सुरक्षा एवं पोषण सुरक्षा
> राज्य में लगभग 56.85 लाख परिवार अथवा 2.61 व्यक्ति PHH (Primary Household) एवं AAY (Antyoday Anna Yojana) के दायरे में शामिल हैं।
> राज्य में बाल मातृत्व पोषण स्वास्थ्य में सुधार हेतु 2019-20 एवं 2020-21 में पोषण अभियान का संचालन किया गया।
> अनाज भंडार
> राज्य में चावल का सर्वाधिक स्टॉक पूर्वी सिंहभूम, गेहूँ का दुमका, नमक का लातेहार तथा चीनी का धनबाद में है।
> गोदाम निर्माण
> राज्य में अनाजों के भण्डारण हेतु गोदामों के निर्माण के उद्देश्य से 2008 से निजी उद्यमिता गारंटी (PEG) योजना का संचालन किया जा रहा है।
> PEG योजना के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी के आधार पर भंडारण-गोदामों का निर्माण किया जा रहा है।
> पीडीएस डीलर एवं उचित मूल्य की दुकान
> राज्य में कुल 25,549 पीडीएस डीलर तथा 24,281 उचित मूल्य की दुकानें संचालित हैं।  
> पीडीएस डीलर की सर्वाधिक संख्या राँची (2,213), गिरिडीह ( 2,195) तथा धनबाद (1,670) है, जबकि पीडीएस डीलर की न्यूनतम संख्या लोहरदगा (402) है।
> राज्य के कुल उचित मूल्य की दुकानों में से 86.6% का संचालन व्यक्तिगत तौर पर जबकि 11.4% का संचालन स्वयं सहायता समूहों द्वारा किया जा रहा है।
> राशन कार्ड
> राज्य में चार प्रकार के राशन कार्ड ( रंग के आधार पर) लाभार्थियों को उपलब्ध कराया जाता है
1. गुलाबी – PHH हेतु
2. पीला – AAY हेतु
3. हरा – जो PHH एवं AAY में शामिल नहीं हैं
4. सफेद – जिनकी वार्षिक आय ₹1 लाख से अधिक है
> विशेष खाद्य सुरक्षा योजना 
> राज्य के ऐसे लोग जो राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का लाभ नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं, उनके लिए राज्य सरकार द्वारा विशेष खाद्य सुरक्षा योजना का संचालन किया जा रहा है। 
> इस योजना का लाभ राज्य के 15 लाख लोगों को होगा। 
> इस योजना के तहत लाभार्थियों को ₹1 रूपये की दर पर पाँच किग्रा अनाज प्रतिमाह उपलब्ध कराया जायेगा।
> इस योजना के लाभार्थियों को PHH, अंत्योदय एवं PVTG में वर्गीकृत किया गया है।
> इस योजना में वृद्धजनों तथा दिव्यांगों को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गयी है।
> अनाजों का वितरण
> झारखण्ड राज्य में पीडीएस के माध्यम से चावल, गेहूँ, नमक, चीनी तथा किरोसिन तेल का वितरण किया जाता है।
> कोविड- 19 लॉकडाउन के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत दाल व चना का भी वितरण किया गया है।
> कोविड – 19 के दौरान जरूरतमंद लोगों को 100 रूपये मूल्य का विशेष भोजन पैकेट निःशुल्क वितरित किया गया जिसमें 2 किग्रा चुड़ा, 500 ग्राम गुड़ तथा 500 ग्राम चना शामिल था।
> इस विशेष भोजन पैकेट का वितरण राँची जिला में 5000 तथा शेष सभी 23 जिलों में 2000 व्यक्ति प्रति जिला करने का लक्ष्य रखा गया था।
> विशेष प्रकार के दाल-भात केन्द्र
> विशेष दाल-भात केन्द्र –  200 जरूरतमंद लोगों को प्रतिदिन निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इस प्रकार के 498 केन्द्रों के संचालन की स्वीकृति दी गयी थी।
> विशिष्ट दाल-भात केन्द्र - कोविड-19 महामारी के दौरान खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उपरोक्त मॉडल पर 361 केन्द्र के संचालन की स्वीकृति दी गयी थी।
> अतिरिक्त दाल-भात केन्द्र - लॉकडाउन के बाद इस प्रकार के 382 केन्द्रों का संचालन थाना (पुलिस स्टेशन) स्तर पर किया गया जिसका उद्देश्य 200 लोगों को प्रतिदिन निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराना था।
> प्रवासी मजदूर दाल-भात केन्द्र - इस प्रकार के 94 केन्द्रों का संचालन राष्ट्रीय राजमार्ग तथा राज्य राजमार्ग के किनारे किया गया जिसका उद्देश्य घर लौट रहे लोगों को एक समय का भोजन निःशुल्क उपलब्ध कराना था।
> मुख्यमंत्री दाल-भात योजना
> इस योजना के तहत निर्धन लोगों को ₹5 की दर पर एक समय का भोजन उपलब्ध कराया जाता है।
> इस योजना के अंतर्गत राज्य में 377 दाल-भात केन्द्रों का संचालन किया जा रहा है। साथ ही 11 रात्रि दाल-भात केन्द्रों का संचालन भी किया जा रहा है।
> इसके अतिरिक्ति राज्य के राँची तथा जमशेदपुर में बढ़ी हुई गुणवत्ता तथा सुविधाओं के साथ पायलट आधार पर मुख्यमंत्री कैंटीन योजना का संचालन किया जा रहा है।
> PVTG डाकिया योजना
> इस योजना का संचालन अप्रैल, 2017 से किया जा रहा है।
> इस योजना के तहत PVTG परिवारों को 35 किग्रा अनाज उनके घर पर निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। 
> वर्तमान समय में राज्य में PVTG परिवारों की संख्या 73,618 है।
> झारखण्ड राज्य आकस्मिक खाद्यान्न कोष
> राज्य में भूख से होने वाले मौत को रोकने हेतु जिला स्तर से लेकर पंचायत स्तर तक वित्तीय वर्ष 2018-19 में इस कोष का निर्माण किया गया था। 
> इस कोष में जमा राशि से योग्य लाभार्थियों को निःशुल्क अथवा स्थानीय बाजार समिति द्वारा निर्धारित दर से कम पर 10 किग्रा चावल उपलब्ध कराया जाता है। 
> झारखण्ड में मातृत्व मृत्यु दर 
> '2016-18 के लिए भारत में मातृत्व मृत्यु पर विशेष बुलेटिन' के अनुसार झारखण्ड में मातृत्व मृत्यु दर 71 दर्ज किया गया है, जो राष्ट्रीय औसत 113 से काफी कम है। 
> निम्न मातृत्व मृत्यु के मामले में केरल (43), महाराष्ट्र (46), तमिलनाडु (60) तथा आंध्र प्रदेश (65) के बाद झारखण्ड का चौथा स्थान है। 
> ज्ञात हो कि 2004-06 की अवधि में झारखण्ड राज्य में मातृत्व मृत्यु दर 312 थी।
8. उद्योग
> वर्ष 2019-20 में झारखण्ड के सकल राज्य राज्य मूल्य वृद्धि में उद्योग क्षेत्र का योगदान 42% रहा है।
> औद्योगिक क्षेत्र में सर्वाधिक योगदान वाले क्षेत्र विनिर्माण ( 54% ), खनन व उत्खनन ( 21.3% ) तथा निर्माण (21.1%) प्रमुख हैं।
> 2015-16 से 2017-18 के बीच राज्य में स्थायी पूँजी की वृद्धि दर 41% रही है जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आँकड़ा 17% रहा है। स्पष्ट है इस दौरान राज्य में दीर्घावधिक निवेश की दर राष्ट्रीय स्तर से अधिक रहा है।
> इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण कलस्टर
> पूर्वी का भारत का पहला व सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण कलस्टर (Electronic Manufacturing Cluster) जमशेदपुर के आदित्यपुर में शुरू किया जा रहा है। 
> इस कलस्टर का विस्तार 82 एकड़ भूभाग पर होगा। 
> इस कलस्टर का निर्माण जियाडा (JIADA) द्वारा ₹186 करोड़ की राशि से किया जा रहा है, जिसमें केन्द्र सरकार द्व रा ₹41.48 करोड़ राशि का सहयोग प्रदान किया गया है। 
> इस कलस्टर में एलइडी टीवी, एलइडी बल्ब तथा मोबॉइल व ऑटोमोबाइल में प्रयुक्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के साथ-साथ चिप निर्माण हेतु इकाईयों की स्थापना की जाएगी।
> प्लास्टिक पार्क
> केन्द्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने राज्य के देवघर जिले में एक प्लास्टिक पार्क की स्थापना हेतु स्वीकृति प्रदान की है।
> यह परियोजना जीडको (JIIDCO Jharkhand Industrial Infrastructure Development Corporation) के प्राधिकार में कार्यरत होगा। 
> इस परियोजना का निर्माण ₹120 करोड़ की राशि से 150 एकड़ क्षेत्र में किया जाएगा।
> इस पार्क में विभिन्न प्रकार के पॉलिमर उत्पादों का निर्माण किया जाएगा जिसमें मॉल्डेड फर्नीचर, पानी की टंकी, मच्छरदानी आदि शामिल हैं। 
> इस पार्क की स्थापना के साथ-साथ यहाँ सीपेट (CIPET- Central Institute for Plastic Engineering & Technology) की भी स्थापना की जाएगी।
> खनन
> झारखण्ड राज्य में देश के कुल खनिज भंडार का 40% उपलब्ध है।
> झारखण्ड राज्य देश में कोकिंग कोयला, यूरेनियम एवं पाइराईट का एकमात्र उत्पादक राज्य है। 
> कोयला, अभ्रक, केसानाइट तथा तांबा के उत्पादन की दृष्टि से झारखण्ड का देश में पहला स्थान है। 
> पिछले वर्षों में उद्योग में खनन योगदान में कमी आयी है। 2015-16 में 30.16% से कम होकर इसका कुछ योगदान 2019-20 में 21.34% हो गया है।
> खनन क्षेत्र रॉयल्टी संग्रहण की दृष्टि से राज्य के जिलों में धनबाद ( 25.66% ) का प्रथम स्थान है। इसके बाद क्रमशः पश्चिमी सिंहभूम व चतरा का स्थान है। रॉयल्टी संग्रहण की दृष्टि से राज्य का गढ़वा जिला अंतिम स्थान पर है।
> सेरीकल्चर, हैंडलूम तथा हस्तशिल्प उद्योग
> झारखण्ड का देश में तसर रेशम उत्पादन की दृष्टि से पहला स्थान है। देश के कुल तसर उत्पादन का 76.4% राज्य में उत्पादित किया जाता है।
> इस उद्योग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से राज्य में 2006 में झारक्रॉफ्ट (JHARCRAFT) की स्थापना की गयी है।
> झारखण्ड में विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) 
> राज्य के गोड्डा जिले के मोटिया, माली, गायघाट तथा आसपास के गाँवों में विद्युत उत्पादन हेतु विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) की स्थापना हेतु अडानी पावर लिमिटेड को स्वीकृति प्रदान की गयी है। 
> इस परियोजना की कुल लागत ₹14,000 करोड़ है।
> यहाँ 2022 तक एक कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना का निर्माण किया जाएगा जिससे 1600 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जाएगा।
> इस परियोजना से उत्पादित बिजली में से 1,496 मेगावाट बिजली की आपूर्ति बांग्लादेश बिजली विकास बोर्ड को की जाएगी।
> व्यापार सुगमता
> केन्द्र सरकार द्वारा जारी व्यापार सुगमता रिपोर्ट में झारखण्ड राज्य का रैंक 5वाँ (2019 में ) रहा है।
> इस रिपोर्ट में झारखण्ड को 98.05 अंक प्राप्त हुआ है।
> इस रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना तथा मध्य प्रदेश क्रमश: प्रथम, द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ स्थान पर रहे हैं।
> वर्ष 2017 में 98.05 अंकों के साथ झारखण्ड का स्थान चौथा था।
9. अवसंरचना तथा संचार
> ऊर्जा उत्पादन
> झारखण्ड राज्य में कुल ऊर्जा उत्पादन हेतु कुल स्थापित क्षमता में कोयला का योगदान 91% है।
> राज्य में कोयला आधारित तापीय संयंत्र से 2,276.46 मेगावाट विद्युत ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है।
> राज्य के कुल ऊर्जा उत्पादन में जल आधारित विद्युत का योगदान 8% तथा नवीरकणीय ऊर्जा का योगदान 1% है।
> 2009-10 से 2019-20 के बीच राज्य में विद्युत उपलब्धता, विद्युत आवश्यकता से लगातार कम रहा है (2015-16 तथा 2018-19 को छोड़कर ) ।
> ऊर्जा उपभोग
> झारखण्ड राज्य में ऊर्जा का सर्वाधिक उपभोग घरेलू क्षेत्र द्वारा ( 68.48% ) किया जाता है । इसके बाद क्रमशः उद्योग (26.11%), वाणिज्यिक क्षेत्र ( 9.37% ) तथा रेलवे ( 2.07% ) का स्थान है। कृषि क्षेत्र द्वारा ऊर्जा उपभोग का प्रतिशत मात्र 1.47% है।
> झारखण्ड बिजली वितरण निगम लिमिटेड की पहल
> सरल - समीक्षा (SARAL-SAMIKSHA) यह एक ऑनलाइन प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग टूल है जिसके माध्यम से कार्यरत परियोजनाओं, ट्रांस्फर्मर रिपेयरिंग आदि की रियल-टाइम मॉनिटरिंग की जा सकती है। 
> सुविधा (SUVIDHA) केन्द्र सरकार के सौभाग्य योजना के अंतर्गत, झारखण्ड बिजली वितरण निगम लि. ने राज्य में सभी घरों को 2018 तक विद्युत कनेक्शन देने का लक्ष्य निर्धारित किया था। इन्ही लक्ष्यों के आलोक में सुविधा का संचालन किया गया।
> सक्षम (SAKSHAM) इसका उद्देश्य बिजली विभाग में कार्यरत कर्मचारियों की क्षमता में वृद्धि करना तथा उनमें आपसी प्रतिस्पर्द्धा का विकास करना है।
> सशक्त (SASHAKT) - इसका उद्देश्य राज्य में उच्च उपभोक्ता सेवा प्रदान करना तथा उपभोक्ता की शिकायतों का निवारण करना है। इसके माध्यम से उपभोक्ताओं को नई तकनीक आधारित शिकायत करने का प्लेटफार्म प्रदान किया जायेगा।
> सड़क
> राष्ट्रीय राजमार्ग- झारखण्ड राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग की कुल लंबाई 3,367 किमी. (2020 में) है। 2018 में राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग की कुल लंबाई 2,649 किमी. थी। इस प्रकार 2018 से 2020 के बीच राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग में 27% की वृद्धि दर्ज की गयी है।
> राज्य राजमार्ग – झारखण्ड राज्य में राज्य राजमार्ग की कुल लंबाई 1231.9 किमी. है।
> राष्ट्रीय राजमार्ग – झारखण्ड राज्य में सड़क घनत्व 159.78 किमी./1000 वर्ग किमी. है। राष्ट्रीय स्तर पर यह आँकड़ा 226 किमी./प्रति वर्ग है।
> रेलवे
> झारखण्ड राज्य दक्षिण-पूर्वी रेलवे जोन के अंतर्गत आता है।
> राँची रेलवे डिवोजन का निर्माण 2003 में किया गया था। इसका उद्देश्य राज्य में रेल नेटवर्क, रेल अवसंरचना तथा रेलवे सुविधाओं का विकास करना है।
> वायु परिवहन
> देवघर अवाई अड्डा देवघर में हवाई अड्डा के निर्माण हेतु झारखण्ड सरकार, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण तथा डीआरडीओ के बीच एक समझौता ज्ञापन पर मार्च, 2017 में हस्ताक्षर किया गया था। 
> देशभर में प्रस्तावित हवाई अड्डे की कुल लागत ₹300 करोड़ है जिसमें से ₹50 करोड़ झारखण्ड सरकार द्वारा. ₹50 करोड भारतीय विमानपत्तन प्राधिकारण द्वारा तथा ₹200 करोड़ डीआरडीओ द्वारा वहनीय होगा।
> धालभूमगढ़ अवाई अड्डा - धालभूमगढ़ हवाई अड्डा (जमशेदपुर) के विकास हेतु झारखण्ड सरकार तथा भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के बीच 2019 में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया है।
> सीपीएल ट्रेनिंग संस्थान राज्य के दुमका में सीपीएल ट्रेनिंग संस्थान की स्थापना हेतु झारखण्ड सरकार ने जायन एविएशन प्राईवेट लि. के साथ समझौता किया है।
> आरसीएस-उड़ान राज्य के दुमका तथा बोकारो में क्षेत्रीय कनेक्टिविटी स्कीम, उड़े देश का आम नागरिक (RCS-UDAN) योजना के तहत हवाई अड्डा का निर्माण प्रस्तावित है।
दूरसंचार
> दूरसंचार – झारखण्ड राज्य में दूरसंचार घनत्व ( प्रति 100 व्यक्तियों पर टेलिफोन व मोबाइल की दूरसंचार घनत्व संख्या) 2018 के 62.25 से कम होकर 2019 में 58.92 हो गया है।
> निर्भरता अनुपात
> वर्ष 2018-19 में झारखण्ड राज्य में निर्भरता अनुपात 58.3 (भारत-46.6) रहा है।
> झारखण्ड के शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में निर्भरता अनुपात अधिक रहा है।
10. सिक्षा 
> झारखण्ड राज्य में 2018-19 में साक्षरता दर में लिंग समानता 0.82 ( भारत 0.83) है। 2001 में यह 0.58 (भारत 0.71) था।
> विद्यालयों का विलय
> राज्य में विभिन्न विद्यालयों के विलय के पश्चात् 2016-17 से 2019-20 के बीच विद्यालयों की संख्या में 11.53 प्रतिशत की कमी आई है।
> छात्र - शिक्षक अनुपात
> राज्य में सभी स्तर के विद्यालयों को मिलाकर छात्र शिक्षक अनुपात 37.8 है।
> प्राथमिक विद्यालयों में छात्र शिक्षक अनुपात 28.6 ( शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 30 होना चाहिए) तथा उच्च-प्राथमिक विद्यालयों में छात्र शिक्षक अनुपात 39.6 (शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 35 होना चाहिए) है।
> शिक्षा में सुधार हेतु सरकारी पहल
> जीरो ड्रॉप-आउट पंच विद्यालयों में ड्रॉप-आउट की दर को कम करने हेतु इस पहल की शुरूआत 2016-17 में की गयी है।
> अभी राज्य के 1,828 पंचायतों को 'जीरो ड्रॉप-आउट पंचायत' घोषित किया जा चुका है। 
> राज्य के 16,699 विद्यालयों को 'जीरो-ड्रॉप आउट विद्यालय' घोषित किया जा चुका है। 
> मॉडल विद्यालय
> राज्य के 89 प्रखण्ड मुख्यालयों में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की स्थापना मॉडल विद्यालय के रूप में की गयी है।
> समर्थ आवासीय विद्यालय
> राज्य के विभिन्न जिलों में 20 समर्थ विद्यालयों की स्थापना की गयी है।
> इन 20 में 18 समर्थ विद्यालयों में नक्सल गतिविधियों से प्रभावित बच्चों, अनाथ बच्चों तथा एकल अभिभावक के बच्चों को कक्षा 1 से 8 तक की पढ़ाई करायी जाती है।
> शेष 2 समर्थ विद्यालयों की स्थापना राँची तथा पश्चिमी सिंहभूम जिले में आवासीय विद्यालयों के रूप में की गयी है। इन दोनों समर्थ विद्यालयों में मानव तस्करी की शिकार बच्चियों को कक्षा 8 तक की शिक्षा प्रदान की जाती है।
> ई-विद्यावाहिनी
> ज्ञानोदय योजना के अंतर्गत ई-विद्यावाहिनी पहल को शुरू किया गया गया है। 
> इसे ₹120 करोड़ के प्रारंभिक बजट के साथ शुरू किया गया है।
> इस योजना का संचालन झारखण्ड एकेडमिक काउंसिल द्वारा जैप-आईटी तथा एनआईसी के सहयोग से की जा रही है।
> साथी - ई (SATHE-E)
> झारखण्ड राज्य को शिक्षा के क्षेत्र में मॉडल राज्य में परिवर्तित करने तथा अकादमिक प्रतिस्पर्द्धा निर्मित करने के उद्देश्य से नीति आयोग द्वारा 'साथी-ई परियोजना के तहत 2017-18 में झारखण्ड राज्य का चयन किया गया है।
> इस परियोजना को राज्य के आकांक्षी जिलों ( वर्तमान में 17 जिले) में लागू किया गया है जिसके लिए नीति आयोग, झारखण्ड सरकार तथा बीसीजी ( बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप) के बीच त्रिपक्षीय समझौता किया गया है।
> ज्ञान सेतु
> राज्य में कक्षा 1 से 9 तक के छात्र-छात्राओं के अकादमिक उपलब्धियों में वृद्धि करने के उद्देश्य से 'ज्ञान सेतु' को सभी जिलों में लागू किया गया है।
> साक्षर भारत कार्यक्रम
> राज्य में 80% की साक्षरता दर के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु इस कार्यक्रम की शुरूआत की गयी है। 
> इस कार्यक्रम का दूसरा प्रमुख उद्देश्य साक्षरता में लैंगिक असमानता को 10% तक लाना है। 
> बालिकाओं की छात्रवृत्ति
> राज्य में बालिका ड्रॉप-आउट दर को कम करने के उद्देश्य से अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की उन बालिकाओं को जिन्होनें 5वीं कक्षा उतीर्ण कर ली है, उन्हें उच्च कक्षा में नामांकन कराने पर ₹2000 की राशि प्रदान की जाती है।
> क्षेत्रीय भाषाओं में पुस्तकों का प्रकाशन
> जनजातीय तथा क्षेत्रीय भाषाओं के छात्र-छात्राओं को पढ़ाई में सहुलियत प्रदान करने हेतु पाँच जनजातीय भाषाओं (मुण्डारी, हो, संथाली, खड़िया तथा कुडुख ) एवं दो क्षेत्रीय भाषाओं (ओडिसी एवं बंगाली) में पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है।
> स्वच्छ विद्यालय प्रतियोगिता
> स्वच्छ विद्यालय प्रतियोगिता (2017-18) में झारखण्ड के 52 विद्यालयों को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किया जा चुका है।
> देश के सभी राज्यों के बीच झारखण्ड राज्य को 'तीसरा' तथा राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों के बीच 'चौथा' स्थान प्राप्त हुआ। वहीं पूर्वी व उत्तर-पूर्वी राज्यों में झारखण्ड को 'प्रथम' स्थान प्राप्त हुआ।
> उच्च शिक्षा
> झारखण्ड राज्य में कुल विश्वविद्यालयों की संख्या 32 है, जिसमें 07 विश्वविद्यालयों की स्थापना वर्ष 2019-20 में की गयी है।
> राज्य में विश्वविद्यालय
1. केन्द्रीय विश्वविद्यालय – 01
2. राष्ट्रीय महत्व के संस्थान – 05
3. राज्य सार्वजनिक विश्वविद्यालय – 11
4. राज्य निजी विश्वविद्यालय – 14
5. डीम्ड विश्वविद्यालय –  01
11. स्वास्थ्य एवं पोषण
> वर्ष 2020 में झारखण्ड राज्य की अनुमानित जनसंख्या 3.7 करोड़ है, जिसमें 1.9 करोड़ पुरुष तथा 1.8 करोड़ महिलाएँ शामिल हैं।
> कोरानावायरस - 19
> राज्य में कोरोना वायरस का पहला मामला 31 मार्च, 2020 को राँची में दर्ज किया गया था। 
> राज्य के राँची जिले में कोरोना वायरस के सर्वाधिक मामले ( 26% ) दर्ज किये गये । पूर्वी सिंहभूम जिला ( 16% ) दूसरे स्थान पर रहा।
> कोरोना से मौत के मामले में पूर्वी सिंहभूम ( 36% ) पहले स्थान पर रहा, जबकि राँची (21%) दूसरे स्थान पर रहा। 
> जननी सुरक्षा योजना
> जननी सुरक्षा योजना के अंतर्गत संस्थागत प्रसव के मामले में गढ़वा ( 90% ) सर्वोच्च स्थान पर रहा है। रामगढ़ तथा पूर्वी सिंहभूम ( दोनों 50% से कम) इस मामले में क्रमशः 24वें व 23वें स्थान पर रहे हैं। 
> पोषण अभियान / राज्य पोषण मिशन
> पोषण अभियान केन्द्र प्रायोजित कार्यक्रम है जिसके तहत बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा दुग्धपान कराने वाली माताओं के पोषण स्तर में सुधार का प्रयास किया जाता है।
> झारखण्ड राज्य पोषण मिशन राज्य प्रायोजित कार्यक्रम है जिसे 2017 में शुरू किया गया था।
> राष्ट्रीय गैर-कृमि दिवस के अवसर पर 1 से 19 वर्ष के बच्चों को अल्बेन्डाजोल की गोलियाँ वर्ष में दो बार देने की शुरूआत की गयी ।
> झारखण्ड मातृ शिशु स्वास्थ्य एवं पोषण माह के तहत 9 माह से 5 वर्ष की उम्र के बच्चों को विटामिन-ए की गोलियाँ वर्ष में दो बार उपलब्ध कराने की शुरूआत की गयी ।
> 'एनेमिया मुक्त भारत' कार्यक्रम के तहत आयरन फोलिक एसिड (IFA) सप्लीमेंट दिया गया, जिसका विवरण इस प्रकार है –
1. IFA सीरप – 6 माह से 5 वर्ष हेतु
2. IFA Pink Tablet - 5 वर्ष से 10 वर्ष हेतु
3. IFA Blue Tablet – 10 वर्ष से 19 वर्ष हेतु
4. IFA Red Tablet - गर्भवती, दुग्धपान कराने वाली तथा प्रजनन करने वाली महिलाओं हेतु 
> स्वास्थ्य बीमा
> झारखण्ड राज्य के शहरी क्षेत्र में कुल आबादी के मात्र 2.2% लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा की सुविधा उपलब्ध है।
12. पेयजल एवं स्वच्छता
> राज्य के ग्रामीण क्षेत्र में मात्र 10.73 परिवारों की (राष्ट्रीय औसत 33.47% ) ही पाइप द्वारा जलापूर्ति तक पहुँच है। अर्थात् राज्य ग्रामीण क्षेत्रों के 89.27 परिवार पेयजल हेतु अन्य जलीय स्रोतों पर निर्भर हैं।
> ग्रामीण क्षेत्रों में पाइप द्वारा जलापूर्ति के मामले में राँची ( 27.57% परिवारों को उपलब्ध) का पहला, रामगढ़ का दूसरा तथा गिरिडीह का तीसरा स्थान है, जबकि पाकुड़ ( 1.63% ) का अंतिम स्थान है। 
> जल जीवन मिशन के तहत 2024 तक ग्रामीण क्षेत्रों में सभी घरों तक FHTC (Functional Household Tap Connection) की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।
> FHTC की उपलब्धता के मामले में देश के राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में झारखण्ड का 27वाँ स्थान है। 
> 2018-19 में झारखण्ड राज्य को 'खुले में शौच से मुक्त' घोषित किया जा चुका है।
> नैना आजीविका विकास समूह 
> यह रामगढ़ जिले के दुलमी प्रखण्ड के जमीरा ग्राम पंचायत में जैरो गाँव की एक स्वयं सहायता समूह है। 
> इस स्वयं सहायता समूह ने गाँव के 50 से अधिक घरों के शौचालयों पर महत्वपूर्ण संदेश के साथ चित्रकारी की है। 
> इस चित्रकारी के माध्यम से लोगों में स्वच्छता को प्रोत्साहन, कोरोना महामारी से बचाव के उपाय आदि के प्रति जागरूकता का प्रयास किया गया है।
> रेडियो फ्रीक्वेंसी आधारित कचरा संग्रहण प्रणाली
> राँची नगर निगम द्वारा रेडियो फ्रीक्वेंसी आधारित कचरा संग्रहण प्रणाली को लागू करने हेतु योजना तैयार की गयी है। 
> इसके अंतर्गत दो लाख घरों में कचरे के डिब्बे पर RFID टैग लगाया जाएगा, जिसके माध्यम से नगर निगम के नियंत्रण केन्द्र द्वारा रियल टाइम आधारित कचरा संग्रहण किया जा सकेगा।
13. महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा
> झारखण्ड राज्य में वित्तीय वर्ष 2019-20 से बाल बजट की शुरूआत की गयी है।
> राज्य के 17 चयनित जिलों में तेजस्विनी योजना का संचालन किया जा रहा है जिसका उद्देश्य किशोरियों व युवा महिलाओं का सामाजिक-आर्थिक विकास करना है।
> आंगनबाड़ी-कर्मी
> आंगनबाड़ी कर्मियों को अतिरिक्त पारिश्रमिक दिया जा रहा है। इसके तहत कार्यकर्ताओं को ₹1900, मिनी आंगनबाड़ी कर्मियों को ₹1200 तथा सहायिकाओं को ₹950 अतिरिक्त पारिश्रमिक दिया जा रहा है।
> स्वामी विवेकानंद निःशक्त स्वावलंबन प्रोत्साहन योजना
> इस योजना के तहत 5 वर्ष से अधिक उम्र के सभी व्यक्तियों को प्रति माह पेंशन ₹600 रूपये प्रदान किया जाता था, जिसे वित्तीय वर्ष 2020-21 से बढ़ाकर ₹1,000 कर दिया गया है।
> मुख्यमंत्री राज्य वृद्धावस्था पेंशन योजना
> इस योजना के तहत विधवा, दिव्यांग, छुड़ाए गये बंधुआ श्रमिक (18 वर्ष से अधिक उम्र के) तथा 60 वर्ष से अधिक उम्र के असहाय व्यक्तियों को, जिनकी वार्षिक आय ग्रामीण क्षेत्रों में ₹10500 से कम तथा शहरी क्षेत्रों में ₹12,500 से कम हो, को 1,000 प्रति माह पेंशन उपलब्ध कराया जाता है।
> पेंशन की इस राशि को राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है।
> आदिम जनजाति समूहों हेतु मुख्यमंत्री राज्य पेंशन योजना
> इस योजना के तहत राज्य के 8 आदिम जनजाति समूह परिवार के एक व्यक्ति को ₹1,000 रूपये प्रति माह पेंशन की राशि उपलब्ध करायी जाती है।
> मुख्यमंत्री राज्य विधवा सम्मान पेंशन योजना
> इस योजना के तहत 18 वर्ष से अधिक उम्र की विधवा महिलाओं को ₹1,000 रूपये प्रतिमाह की वित्तीय सहायता पेंशन के रूप में उपलब्ध करायी जाती है।
> HIV/AIDS पीड़ित व्यक्ति हेतु मुख्यमंत्री राज्य पेंशन योजना
> इस योजना के तहत HIV/AIDS से प्रभावित व्यक्तियों को ₹1,000 रूपये प्रतिमाह की वित्तीय सहायता पेंशन उपलब्ध करायी जाती है। Tag
14. जनजातीय कल्याण व वंचितों हेतु हस्तक्षेप
> झारखण्ड के जनजातियों में साक्षरता दर 57.1% है तथा इनमें सर्वाधिक साक्षरता दर उराँव जनजाति (67%) में है। 
> राज्य में जनजातीय पुरूषों की साक्षरता दर 68.2% तथा जनजातीय महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 58.1% है।
> झारखण्ड के जनजातियों में लिंगानुपात 1003 है जब सर्वाधिक लिंगानुपात वाली जनजाति हो ( 1021 ) है। 
> झारखण्ड के जनजातियों में बाल लिंगानुपात 976 है जबकि सर्वाधिक बाल लिंगानुपात वाली जनजाति बैगा (1104) है।
> राज्य में उच्च अनुसूचित जनजाति की आबादी वाले जिलों में अनुसूचित जाति की आबादी का संकेन्द्रण कम है। 
> बिहार की सीमा से संलग्न जिलों में अनुसूचित जाति की आबादी का संकेन्द्रण अधिक है।
> राज्य के 22 अनुसूचित जाति में सर्वाधिक आबादी वाली अनुसूचित जाति चमार (26% ) है।
> राज्य में अनुसूचित जनजाति का सर्वाधिक प्रतिशत वाला जिला खूँटी ( 73.26% ) तथा न्यूनतम प्रतिशत वाला जिला कोडरमा (0.9 है।
> राज्य में अनुसूचित जाति का सर्वाधिक प्रतिशत वाला जिला पलामू ( 27.65% ) तथा न्यूनतम प्रतिशत वाला जिला पाकुड़ (3.16%) है।
> आदिम जनजाति समूह
> राज्य की कुल जनजातीय आबादी में आदिम जनजाति की भागीदारी 3.4% है।
> राज्य की आदिम जनजातियों का जनसंख्या के आधार पर क्रम इस प्रकार है - माल सौरिया
पहाड़िया (46%), पहाड़िया (16%), कोरवा (12%), परहिया (9%), असुर (8%), बिरहोर ( 4% ), सवर (3%) तथा बिरजिया (2%)।
> कोरवा जनजाति की 88% तथा परहिया जनजाति की 93% आबादी गढ़वा, पलामू तथा लातेहार जिले में निवास करती है।
> सौरिया पहाड़िया जनजाति की 98% तथा माल पहाड़िया जनजाति की 56% आबादी पाकुड़, साहेबगंज तथा गोड्डा जिले में निवास करती है।
> सवर जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यतः पूर्वी सिंहभूम में है।
> असुर जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यतः गुमला, हजारीबाग, लोहरदगा, रामगढ़ तथा लातेहार जिले में है। 
> बिरजिया जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यतः गुमला तथा लातेहार जिले में है।
> झारखण्ड राज्य में शहरी निर्धनता की तुलना में ग्रामीण निर्धनता का प्रतिशत अधिक है। 
> झारखण्ड राज्य में निर्धनता का प्रतिशत ( 39.1% ) राष्ट्रीय औसत ( 29.8% ) की तुलना में अधिक है। 
> साइकल वितरण योजना
> इस योजना के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के छात्र-छात्राओं को विद्यालय जाने हेतु प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से साइकल का क्रय करने हेतु 3,000 की राशि दी जाती थी, जिसे वित्तीय वर्ष 2018-19 बढ़ाकर 3,500 रूपये कर दिया गया है ।
> स्वास्थ्य सुविधाएँ
> चिकित्सा सहायता राज्य के अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति तथा पिछड़े वर्ग के समुदायों को चिकित्सीय सहायता के रूप में ₹10,000 की राशि प्रदान की जाती है। इस योजना के तहत योग्य लाभार्थी को ₹3,000 तक की स्वीकृति जिला कल्याण पदाधिकारी द्वारा तथा अत्यंत विकट मामलों में ₹10,000 तक की स्वीकृति उपायुक्त द्वारा दी जाती है। 
> पहाड़िया स्वास्थ्य योजना- पहाड़िया जनजाति को स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राज्य में 18 पहाड़िया स्वास्थ्य उपकेन्द्रों का संचालन संथाल परगना के चार जिलों (पाकुड़, साहेबगंज, दुमका, गोड्डा ) में किया जा रहा है।
> कल्याण अस्पताल - वंचित वर्गों (विशेषत: अनुसूचित जनजाति) को निःशुल्क स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राज्य में 14 कल्याण अस्पताल ( पूर्व में ग्रामीण अस्पताल या मेसो अस्पताल) का संचालन किया जा रहा है। इन अस्पतालों में 50 बेड की सुविधा होती है।
> बिरसा आवास योजना
> बिरसा आवास योजना का संचालन राज्य गठन के बाद से कल्याण विभाग द्वारा किया जा रहा है। 
> इस योजना के तहत आदिम जनजाति के परिवारों को आवासीय सुविधा हेतु 100% अनुदान दिया जाता है।
> इस योजना के तहत लाभार्थी परिवार को आवास निर्माण हेतु ₹1,31,500 की राशि प्रदान की जाती है।
> शहीद ग्राम विकास योजना
> इस योजना की शुरूआत 2017-18 में की गयी है।
> इस योजना का प्रमुख उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले राज्य के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके गाँवों का मॉडल गाँव के रूप में विकास करना है।
> इसके अंतर्गत शहीदों के गाँव में आवास, जलापूर्ति, सौर ऊर्जा व अन्य मूलभूत सुविधाओं का विकास किया जायेगा। 
> आजीविका सुरक्षा
> कौशल विकास प्रेझा फाउंडेशन द्वारा राज्य में 22 कल्याण गुरुकुल का संचालन किया जा रहा है, प्रमुख उद्देश्य अनुसूचित जाति/जनजाति व अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं तथा युवाओं का कुशलता विकास करके उनकी आय को बढ़ाना है। 
> कौशल कॉलेज – राज्य में अल्पसंख्यक व जनजातीय समुदाय की बालिकाओं को कुशलता प्रदान करने हेतु राज्य के 8 जिलों में 9 कौशल कॉलेज का संचालन किया जा रहा है। 
> झारखण्ड जनजाति सशक्तिकरण एवं आजीविका परियोजना (JTELP) – इस परियोजना के तहत चयनित पंचायतों में 10,000 आदिम जनजातीय परिवारों, महिला प्रधान परिवारों, ग्रामीण युवाओं तथा निर्धनता रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले परिवारों को आच्छादित किया गया है।
> निर्धनता उन्मूलन
> राज्य के जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक व पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग द्वारा 2017-18 से हार्डकोर पूअर प्रोजेक्ट (THP) का संचालन किया जा रहा है।
> THP परियोजना का संचालन बंधन - कोन्नागार तथा अब्दुल लतीफ पॉवर्टी एक्शन लैब (J-PAL) के सहयोग से किया जा रहा है।
> THP परियोजना का संचालन राज्य के दुमका (दुमका सदर एवं मसलिया प्रखण्ड) तथा पश्चिमी सिंहभूम (टोंटो एवं झींकपानी प्रखण्ड) में किया जा रहा है ।
> THP परियोजना के तहत अत्यंत निर्धन 2000 एकल महिला प्रधान जनजातीय परिवारों को निर्धनता रेखा से बाहर निकालने का लक्ष्य रखा गया है।
15. प्राकृतिक संसाधन वन, एवं खनिज संपदा 
> वन संसाधन
> भारत वन स्थिति रिपोर्ट, 2019 के अनुसार झारखण्ड राज्य में रिकार्डेड वन क्षेत्र 23,605 वर्ग किमी है, जिसमें 4,387 वर्ग किमी आरक्षित वन (Reserved Forest) 19, 185 वर्ग किमी. संरक्षित वन (Protected Forest ) तथा 33 वर्ग किमी अवर्गीकृत वन (Unclassed Forest) है।
> राज्य में 1 राष्ट्रीय उद्यान तथा 11 वन्यजीव अभ्यारण्य हैं, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 2.74% क्षेत्र पर विस्तारित है।
> राज्य के 23,611.41 वर्ग किमी. क्षेत्र पर वनावरण है जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 29.62% है। 
> राज्य के 2,603.20 वर्ग किमी. क्षेत्र पर अत्यंत सघन वन, 9,687.36 वर्ग किमी. क्षेत्र पर मध्यम सघन वन तथा 11,320.85 वर्ग किमी. क्षेत्र पर खुले वन का विस्तार है।
> वर्ष 2017 की तुलना में वर्ष 2019 में राज्य में 58 वर्ग किमी. ( 0.25%) वनक्षेत्र की वृद्धि दर्ज की गयी है। 
> वर्ष 2017 से 2019 के बीच वनक्षेत्र में वृद्धि का प्रमुख कारण राज्य में वृक्षारोपण एवं संरक्षण गतिविधियों का संचालन है।
> 2017 से 2019 के बीच राज्य में 77 वर्ग किमी. गैर-वन भूमि का परिवर्तन वन-भूमि के रूप में हुआ है। झारखण्ड राज्य के 17 जिले आदिवासी जिलों के रूप में (राष्ट्रीय स्तर पर 2018 जिले) चिन्हित किए गये हैं। मध्य प्रदेश (24) तथा असम (19) के बाद झारखण्ड इस मामले में तीसरे स्थान पर है।
> वर्ष 2017 से 2019 के बीच समग्र भारत के जनजातीय जिलों में इनसाइड रिकार्डेड फारेस्ट एरिया में 741 वर्ग किमी. की कमी दर्ज की गयी है, जबकि झारखण्ड में 15 वर्ग किमी. की वृद्धि दर्ज की गयी है ।
> मुख्यमंत्री जन वन योजना इस योजना का प्रमुख लक्ष्य निजी भूमि पर वनावरण को बढ़ावा देना तथा किसानों की आय को बढ़ाना है। इस योजना के तहत 2019-20 एवं 2020-21 में 8.82 लाख से अधिक पौधों का पौधारोपण किया गया जिसमें से सर्वाधिक पौधारोपण जामताड़ा जिला (3,31,520) में किया गया।
> CAMPA इसके तहत संचालित गतिविधियों को गूगल से जोड़ा गया है तथा झारखण्ड के 1,605 वृक्षारोपण कार्यों को इस पर देखा जा सकता है।
> नदी महोत्सव एवं वृहत् वृक्षारोपण अभियान इस कार्यक्रम के तहत वर्ष 2019 में 15.67 लाख पौधों का पौधारोपण किया गया था जबकि 2020 में 2.04 करोड़ पौधों का पौधारोपण किया गया। वर्ष 2020 में पौधारोपण के मामले में मेदिनीनगर वन प्रमण्डल (8%) का प्रथम स्थान रहा है, जबकि गोड्डा (7%) द्वितीय एवं बोकारो (6%) तृतीय स्थान पर रहा। 
> जैव विविधता एवं वन्यजीव
> वर्तमान समय में झारखण्ड राज्य में 1 राष्ट्रीय उद्यान तथा 11 वन्यजीव अभ्यारण्य हैं, जिनका विस्तार राज्य के कुल 2,182.11 वर्ग किमी. क्षेत्र पर है।
> खनिज संसाधन
> झारखण्ड राज्य का कोयला भंडार की दृष्टि से देश में प्रथम स्थान, लौह अयस्क भंडार की दृष्टि से दूसरा स्थान, तांबा अयस्क भंडार की दृष्टि से तीसरा स्थान तथा बॉक्साइट भंडार की दृष्टि से सातवां स्थान है। 
> झारखण्ड प्राइम कोकिंग कोल का देश में एकमात्र उत्पादक राज्य है।
> झारखण्ड राज्य में कुल 11,104 खनन क्षेत्र हैं जिनमे से 168 वृहद खान ( major mines) तथा 936 लघु खान (minor mines) हैं।
> वृहद् खानों की सर्वाधिक संख्या धनबाद ( 64 ) में तथा इसके बाद क्रमश: चाईबासा (19) एवं रामगढ़ (16) में है।
> लघु खानों की दृष्टि से राज्य के तीन बड़े जिले क्रमशः साहेबगंज (103), पाकुड़ (100) तथा पलामू (87) हैं।
> 2015-16 से 2017-18 के बीच झारखण्ड राज्य में 36 किलोग्राम सोना का उत्पादन किया गया है।
> जल संसाधन
> झारखण्ड राज्य में 6.21 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) वार्षिक रिप्लेनिशेबल (पुनर्भरनीय) सतही जल संसाधन तथा 5.69 बिलियन क्यूबिक मीटर निवल सतही जल उपलब्ध है।
> सतही जल की दृष्टि से राज्य के 3 प्रखण्डों में अति दोहन हो चुका है तथा 12 प्रखण्ड संकटग्रस्त / अर्द्ध-संकटग्रस्त स्थिति में हैं।
> केन्द्रीय जल आयोग देश के 125 वृहद जलाशयों का पर्यवेक्षण करता है जिसमें से 6 ( तेनुघाट, मैथन, पंचेत, कोनार, तिलैया, गेतलसूद) झारखण्ड राज्य में हैं।
> कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स (CWMI) - 2019 में उत्तर प्रदेश, ओडिसा, बिहार, नागालैंड व मेघालय के साथ झारखण्ड भी निम्न प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल है।
> कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स (CWMI) - 2019 में देश के 17 गैर-हिमालयी राज्यों में झारखण्ड का स्थान अंतिम (17वाँ) है।,
> ऊर्जा संसाधन
> ऊर्जा सांख्यिकी, 2019 रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड राज्य में नवीकरणीय ऊर्जा की अनुमानित क्षमता 18,489 मेगावाट है, जो देश की कुल नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का 1.69% है।
16. प्राकृतिक संसाधन वन, जल एवं खनिज संपदा
> पर्यटन
> झारखण्ड राज्य में आने वाले देशी पर्यटकों की संख्या 2013 में 32.5 लाख थी जो 2019 में बढ़कर 35.6 लाख हो गयी।
> झारखण्ड राज्य में आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या 2013 में 1.3 लाख थी जो 2019 में बढ़कर 1.8 लाख हो गयी।
> 2013 से 2019 के बीच राज्य में आने वाले देशी पर्यटकों की संख्या में 1.53% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गयी है जबकि इसी अवधि के दौरान विदेशी पर्यटकों की संख्या में 4.7% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गयी है।
> झारखण्ड राज्य में सर्वाधिक पर्यटक जुलाई-अगस्त माह में आते हैं। इसका मुख्य कारण श्रावण माह में देवघर में भगवान शिव पर जल अर्पण किया जाना है।
> प्रमुख पहल
> झारखण्ड राज्य के सरायकेला स्थित राजकीय छऊ नृत्य कला केन्द्र एवं सिल्ली स्थित राजकीय मानभूम छऊ नृत्य कला केन्द्र में छऊ नृत्य का प्रशिक्षण दिया जाता है, जबकि राँची स्थित झारखण्ड कला मंदिर में स्थानीय नृत्य का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।
> भाषा
> झारखण्ड में मात्र 4% लोग ही अपने घरों में बातचीत हेतु हिन्दी भाषा का प्रयोग करते है, जबकि 96% लोग बातचीत हेतु घरों में स्थानीय भाषा का प्रयोग करते हैं।
> घरों में बोलचाल हेतु स्थानीय भाषा का प्रयोग करने वाले लोगों में से 33% लोग संथाली, 17.5 प्रतिशत लोग खड़िया, 9.5 प्रतिशत लोग कुडुख, 7.6% लोग मुण्डारी तथा 5.7% लोग हो भाषा का प्रयोग करते हैं।
> अन्य
> रायपुर (छत्तीसगढ़) में आयोजित राष्ट्रीय जनजातीय नृत्य महोत्सव में झारखण्ड के तथा तीसरा स्थान हासिल किया था।
> ईटखोरी में पुरातात्विक विशेषताओं पर एक दस्तावेज का प्रकाशन किया गया है ।
> मलुटी के 20 मंदिरों को अभी तक संरक्षित किया जा चुका है।
> महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती पर गाँधी पैनोरमा कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
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Sat, 09 Sep 2023 11:13:36 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में विद्युत परियोजनाएँ https://m.jaankarirakho.com/331 https://m.jaankarirakho.com/331 > झारखण्ड में ताप विद्युत परियोजनाएँ
1. बोकारो ताप विद्युत गृह
> यह कोयला आधारित प्रथम ताप विद्युत गृह है जिसे दामोदर घाटी परियोजना के तहत स्थापित किया गया था। 
> सन् 1953 में यहां से बिजली उत्पादन प्रारंभ हुआ तथा इसकी उत्पादन क्षमता 830 मेगावाट है। 
> यह संयंत्र दामोदर नदी की सहायक बोकारो नदी पर स्थापित की गई है । 
> इससे राष्ट्रीय ग्रिड को विद्युत आपूर्ति की जाती है।
2. चंद्रपुरा ताप विद्युत गृह
> इसकी स्थापना 1965 ई. में दामोदर घाटी निगम द्वारा बोकारो जिले में की गई है। 
> इसकी उत्पादन क्षमता 780 मेगावाट है।
3. पतरातू ताप विद्युत गृह
> रामगढ़ में अवस्थित यह संयंत्र रूस के सहयोग से चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान 1973 ई. में स्थापित किया गया था।
> 840 मेगावाट वाले इस संयंत्र से हटिया ( राँची) स्थित एच०सी०एल० को विद्युत आपूर्ति की जाती है। 
> यह संयंत्र झारखण्ड राज्य विद्युत बोर्ड (JSEB) के अधीन कार्यरत है। 
4. तेनुघाट ताप विद्युत गृह
> यह संयंत्र बोकारो जिले में तेनुघाट बाँध के समीप स्थापित की गई है।
> इसकी स्थापना 1990 के दशक में की गई थी ।  
> इसकी क्षमता 420 मेगावाट है।
> झारखण्ड में जल विद्युत परियोजनाएँ
1. तिलैया जल विद्युत केन्द्र
> यह झारखण्ड की प्रथम जल विद्युत परियोजना है।
> इसकी स्थापना 1953 ई. में दामोदर घाटी निगम द्वारा की गई थी
> यह कोडरमा जिले में बराकर नदी पर स्थित है।
> इसकी उत्पादन क्षमता 60,000 किलोवाट है।
2. मैथन जल विद्युत केन्द्र
> इसकी स्थापना दामोघर घाटी निगम के अधीन 1957 ई. में की गई थी।
> यह धनबाद जिले में बराकर नदी पर स्थित है।
> यह गैस टरबाइन पर आधारित झारखण्ड का एकमात्र विद्युत उत्पादन केन्द्र है।
> यह दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी तरह का प्रथम विद्युत केन्द्र है।
> इसकी उत्पादन क्षमता 60,000 किलोवाट है।
3. स्वर्णरेखा जल विद्युत परियोजना
> 1989 ई. में स्थापित यह परियोजना राँची जिले में स्वर्णरेखा नदी पर अवस्थित है।
> विश्व बैंक की सहायता से इस परियोजना का निर्माण झारखण्ड, पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा सरकार द्वारा किया गया है।
> इसके तहत हुण्डरू जलप्रपात (राँची) से 130 मेगावाट विद्युत उत्पादन किया जा रहा है।
> इसके द्वारा उत्पादित विद्युत की आपूर्ति राँची क्षेत्र के उद्योगों को की जायेगी।
4. कोनार जल विद्युत केन्द्र
> यह परियोजना बोकारो जिले में कोनार नदी पर स्थित है ।
> इसकी उत्पादन क्षमता 40,000 किलोवाट है ।
> यहाँ भूमिगत जल विद्युत केन्द्र का निर्माण किया गया है।
5. अय्यर जल विद्युत केन्द्र
> यह परियोजना दामोदर नदी पर स्थित है।
> इसकी उत्पादन क्षमता 45,000 किलोवाट है।
6. पंचेत जल विद्युत केन्द्र
> यह परियोजना धनबाद एवं पुरूलिया ( प० बंगाल) की सीमा पर स्थापित किया गया है।
> दामोदर नदी पर स्थित इस परियोजना की उत्पादन क्षमता 40,000 किलोवाट है।
7. बाल पहाड़ी जल विद्युत केन्द्र
> यह परियोजना गिरिडीह जिले में बराकर नदी पर स्थित है।
> इसकी उत्पादन क्षमता 20,000 किलोवाट है।
> कोयलकारो परियोजना ( प्रस्तावित)
> यह परियोजना कोयल तथा कारो नदी पर राष्ट्रीय पनबिजली निगम (NHPC) द्वारा निर्मित किया जाना है। 
> इस परियोजना से संबंधित जिले राँची, गुमला और पश्चिमी सिंहभूम हैं। 
> इस परियोजना के तहत कुल 732 मेगावाट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है जिसमें 710 मेगावाट विद्युत का उत्पादन प्रथम चरण में तथा शेष 22 मेगावाट विद्युत का उत्पादन द्वितीय चरण में किया जाना है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:57:59 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की संचार व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/330 https://m.jaankarirakho.com/330 1. डाक व्यवस्था
> वर्ष 2001 में झारखण्ड राज्य में झारखण्ड डाक सर्किल की स्थापना की गई है। यह बिहार डाक सर्किल के अंतर्गत कार्यरत है।
> पिनकोड प्रणाली में झारखण्ड राज्य के लिए प्रथम अंक के रूप में 8 का प्रयोग किया जाता है। 
> झारखण्ड में डाकघरों की कुल संख्या 3097 है।
2. आकाशवाणी प्रसारण व्यवस्था
> झारखण्ड में प्रसारण का मुख्य साधन आकाशवाणी केन्द्र है जिसके माध्यम से स्थानीय एवं प्रादेशिक कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है।
> राज्य का प्रमुख आकाशवाणी केन्द्र राँची है जो उच्च शक्ति ट्रांसमिशन क्षमता से युक्त है। 
> राज्य के अन्य आकाशवाणी केन्द्र चाईबासा, धनबाद, जमशेदपुर, हजारीबाग तथा मेदिनीनगर हैं जो निम्न शक्ति ट्रांसमिशन क्षमता से युक्त हैं।
> झारखण्ड में ऑल इण्डिया रेडियो के 13 स्टेशन हैं। ये केन्द्र राँची, जमशेदपुर, हजारीबाग, मेदिनीनगर, गढ़वा, गुमला, चाईबासा, चतरा, बोकारो, धनबाद, देवघर, घाटशिला तथा गिरिडीह में हैं। 
3. दूरदर्शन व्यवस्था
> राज्य में सर्वप्रथम राँची में छठी पंचवर्षीय योजना के दौरान 1974 ई. में दूरदर्शन केन्द्र की स्थापना की गई थी। 
> वर्ष 1983 में राष्ट्रीय उपग्रह 1बी (INSAT - 1B) के प्रक्षेपित किये जाने के बाद दूरदर्शन कार्यक्रम के सीधे प्रसारण हेतु धनबाद, दुमका, देवघर, बोकारो, जमशेदपुर तथा हजारीबाग में लघु शक्ति वाले ट्रांसमीटर केन्द्र स्थापित किये गये हैं।
> राज्य में उच्च शक्ति ट्रांसमीटर केन्द्र की स्थापना मेदिनीनगर ( डाल्टेनगंज ) में भी की गई है। 
4. अन्य तथ्य
> झारखण्ड राज्य में 2005-06 में झारनेट ( झारखण्ड स्टेट वाइड एरिया नेटवर्क) की स्थापना की गयी थी। यह राज्य के सभी जिलों में उपलब्ध है।
> झारखण्ड राज्य में ई-गवर्नेस परियोजनाओं के संचालन हेतु एक स्वायत्त संस्था के रूप में 'झारखण्ड एजेंसी फॉर प्रोमोशन ऑफ इन्फोरमेशन टेक्नोलॉजी (जैप-आईटी) का गठन 29 मार्च, 2004 को किया गया है। 
> राज्य के सूचना प्रौद्योगिकी एवं ई-गवर्नेस विभाग द्वारा इसरो के सहयोग से 2003 में झारखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र (JSAC) का गठन किया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य राज्य के प्राकृतिक संसाधनों के आकलन व मानचित्रीकरण, सुदूर संवेदन आदि हेतु अंतरिक्ष तकनीक का प्रयोग करना है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:55:40 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के उद्योग https://m.jaankarirakho.com/329 https://m.jaankarirakho.com/329 > झारखण्ड में खनिज आधारित उद्योग
1. लौह एवं इस्पात उद्योग (Iron and Steel Industry)
(a) टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी (टिस्को) (Tata Iron & Steel Company - TISCO)
> इसकी स्थापना 1907 ई. * में दोराबजी टाटा द्वारा साकची (जमशेदपुर) में की गई थी तथा 1911 ई. में इस संयंत्र से लोहे का तथा 1914 ई. में इस्पात का उत्पादन प्रारंभ हुआ। टाटा स्टील की स्थापना का प्रारंभिक विचार जमशेदजी नौशेरवानजी टाटा का था, जिनकी मृत्यु 1904 ई० में हो गयी। परन्तु इन्हें टाटा स्टील का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
> यह भारत का पहला तथा सबसे बड़ा लौह एवं इस्पात संयंत्र है।
> यह पूर्वी सिंहभूम जिले में स्वर्णरेखा एवं खरकई नदी के संगम पर स्थित है। 
> टिस्को को विभिन्न खनिजों की प्राप्ति निम्न प्रकार होती है :
> कोकिंग कोयला – रानीगंज तथा झरिया से
> मैंगनीज एवं क्रोमाइट – चाईबासा खान से
> चूना पत्थर एवं डोलोमाइट – सुन्दरनगर (उड़ीसा) से
> कच्चा लोहा – मयूरभंज तथा नोआमुण्डी (सिंहभूम) से
> सन् 1948 में टाटा समूह ने अपने उद्योगों का विस्तार करते हुए जमशेदपुर में 'टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव' की स्थापना की थी।
> वर्ष 2005 में टिस्को का नाम बदल कर टाटा स्टील (Tata Steel) कर दिया गया है।
(b) बोकारो स्टील प्लांट ( Bokaro steel plant )
> 1964 ई. (29 जनवरी) में स्थापित यह झारखण्ड का दूसरा लौह-इस्पात उद्योग है।
> 1972 ई. (2 अक्टूबर) में इस संयंत्र में आग की प्रथम भट्टी स्थापित की गयी थी। 1974 ई. से इस संयंत्र से उत्पादन प्रारंभ हुआ तथा 26 फरवरी, 1978 को यहाँ से 1.7 मीट्रिक टन इगनट स्टील (Ignot Steel) का उत्पादन पूर्ण हुआ।
> यह भारत का पहला स्वदेशी स्टील संयंत्र है।
> यह बोकारो के माराफारी नामक स्थान पर स्थित
> इसकी स्थापना रूस (सोवियत यूनियन ) की सहायता से की गई है। 
> यह भारत का चौथा बड़ा लौह - इस्पात संयंत्र है।
> यह संयंत्र दामोदर नदी घाटी के तेनुघाट और गरगा डैम के समीप अवस्थित है।
> यह सेल (Steel Authority of India Limited- SAIL) के अंतर्गत कार्यरत है।
> इस संयंत्र को विभिन्न खनिजों की प्राप्ति निम्न प्रकार होती है :
> कोकिंग कोयला – झरिया से  
> लौह-अयस्क – क्योंझोर की खान से
> चूना पत्थर – मध्य प्रदेश से 
2. तांबा उद्योग (Copper Industry)
> झारखण्ड के घाटशिला ( सिंहभूम जिला ) में भारत का प्रथम तांबा उद्योग 1924 ई. में स्थापित किया गया था।
> इन खानों से तांबा के अयस्क को रज्जूमार्ग द्वारा मउभण्डरा भेजा जाता है जहाँ इनसे शुद्ध तांबा निकाला जाता है। 
> इंडियन कॉपर कॉरपोरेशन ( Indian Copper Corporation) ने 1930 ई. में घाटशिला के पास तांबा शोधन केन्द्र स्थापित किया है।
> झारखण्ड में तांबा उद्योग के अन्य महत्वपूर्ण केन्द्रः
> हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड –जादूगोड़ा
> इंडियन केबल कंपनी लिमिटेड – जमशेदपुर
3. एलुमिनियम उद्योग (Aluminium Industry)
 > भारत में एलुमिनियम अयस्क (एलुमिना ) का 16% भाग झारखण्ड से प्राप्त होता है।
> झारखण्ड के मुरी (राँची) में इंडियन एलुमिनियम कंपनी लिमिटेड द्वारा 1938 ई. में एलुमिनियम उद्योग की स्थापना की गई है।
> यह भारत का दूसरा सबसे पुराना एवं दूसरा सबसे बड़ा संयंत्र है।
> इस संयंत्र को लोहरदगा से बॉक्साइट के रूप में कच्चे माल की प्राप्ति होती है।
> बॉक्साइट से एलुमिना बनाकर इसे अलमपुरम एवं अलवाय (केरल), बेलूर (कोलकाता) और लेई (मुंबई) के कारखानों में भेज दिया जाता है।
> एलुमिनियम का उपयोग बर्तन, बिजली के तार, मोटर, रेल एवं वायुयान बनाने में किया जाता है। 
4. सीमेंट उद्योग (Cement Industry)
> झारखण्ड में चुना पत्थर के प्रचुर भंडार उपलब्ध होने के कारण यहाँ सीमेंट उद्योग का पर्याप्त विकास संभव हुआ है।
> झारखण्ड के जपला (पलामू), झींकपानी (पश्चिमी सिंहभूम), खलारी (राँची), सिंदरी (धनबाद), जमशेदपुर (पूर्वी सिंहभूम), डोमोटांड (हजारीबाग) आदि क्षेत्रों में सीमेंट उद्योग स्थापित किए गए हैं।
> सिंदरी, बोकारो, झींकपानी एवं जमशेदपुर के कारखानों में स्लैग (Slag ) एवं स्लज (Sludge) का उपयोग सीमेंट निर्माण हेतु किया जाता है। स्लेग तथा स्लज सीमेंट कारखानों के उपउत्पाद हैं।
> झारखण्ड में झींकपानी एवं जमशेदपुर का लाफार्ज सीमेंट कारखाना लौह-इस्पात उद्योग के अवशिष्ट पर आधारित सीमेंट संयंत्र हैं।
> झारखण्ड में प्रथम सीमेंट उद्योग की स्थापना 1921 ई. में जपला (पलामू) में की गयी थी ।
5. इंजीनियरिंग उद्योग (Engineering Industry ) 
(a) हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन (Heavy Engineering Corporation - HEC)
> इसकी स्थापना भारत सरकार द्वारा रूस एवं चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से 1958 ई. ( 31 दिसंबर ) में राँची के हटिया नामक स्थान पर की गई है।
> इसकी स्थापना कंपनी अधिनियम, 1956 के अंतर्गत की गयी थी।
> देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने राँची यात्रा के दौरान 15 नवंबर, 1963 को इस संयंत्र को राष्ट्र को समर्पित किया था ।  ( Source- hecltd.com/archive.php)
> इस संयंत्र में 1964 ई. में उत्पादन प्रारंभ हुआ। (Source- hecltd.com/rti.php) 
> इस संयंत्र में कल-कारखानों के लिए मशीनों, कल-पुर्जे आदि इंजीनियरिंग वस्तुओं का निर्माण किया जाता है:–
> एच०ई०सी० के द्वारा तीन संयंत्रों की स्थापना की गई है :
> हैवी मशीन बिल्डिंग प्लांट (HMBP)
>> रूस की सहायता से स्थापित यह संयंत्र किसी भी उद्योग की संरचना डिजाइन करने की क्षमता रखता है। 
> हैवी मशीन टूल्स प्लांट (HMTP )
>> चेकोस्लोवाकिया की सहायता से स्थापित इस संयंत्र में भारी मशीनों के औजारों का निर्माण किया जाता है। 
> फांउड़ी फोर्ज प्लांट (FFP)
>> चोकोस्लोवाकिया की सहायता से स्थापित यह एक ढलाई भट्टी (Foundry Forge) है। 
>> इसमें भारी मशीन या औजार के निर्माण के लिए लोहा को गलाने एवं विशेष आकृतियों में ढालने का काम किया जाता है। 
6. कोयला धोवन उद्योग (Coal Washeries Industry)
> कोयला धोवन गृहों के द्वारा कोयले से शेल, फायरक्ले आदि अशुद्धियों को दूर किया जाता है। 
> झारखण्ड में जामादोबा, बोकारो, लोदला, करगाली, दुगदा, पाथरडीह, कर्णपुरा आदि प्रमुख कोयला धोवन केन्द्र हैं।
> करगाली कोल वाशरी (बोकारो) एशिया की सबसे बड़ी कोल वाशरी है।
7. उर्वरक उद्योग (Fertilizer Industry)
> भारत का प्रथम उर्वरक कारखाना 1951 ई. में सिंदरी (धनबाद) में फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया द्वारा स्थापित किया गया था।
> 15 जून, 2016 को इसका नामकरण हिन्दुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (HUCL) कर दिया गया है तथा इसे एक संयुक्त उपक्रम कंपनी बना दिया गया है जिसमें निम्न की हिस्सेदारी है –
> कोल इण्डिया लिमिटेड, एनटीपीसी, आईओसीएल – 89%
> फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड, हिन्दुस्तान फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन लिमिटेड 11% 
> यह पूर्वी भारत का सबसे बड़ा उर्वरक कारखाना है।
> यहाँ से अमोनियम सल्फेट, नाइट्रेट एवं यूरिया का उत्पादन किया जाता है।
7. काँच उद्योग (Lead Industry)
> जापान के सहयोग से भुरकुण्डा (रामगढ़) में अत्याधुनिक काँच कारखाना स्थापित किया गया है। 
> इसे इण्डो-आशाई ग्लास फैक्ट्री (Indo-Ashai Glass Factory) के नाम से जाना जाता है। 
> झारखण्ड में काँच उत्पादन के अन्य प्रमुख क्षेत्र कतरासगढ़ व अम्बोना (धनबाद) और कान्द्रा (सिंहभूम) हैं।
> इसे कच्चे माल की प्राप्ति राजमहल पहाड़ी क्षेत्र, मंगल घाट एवं पत्थर घाट से होती है। 
8. रिफैक्ट्री उद्योग (Refractory Industry)
> इस उद्योग के अंतर्गत उच्च ताप सहन करने वाली धमन भट्टियों का निर्माण किया जाता है जिसका प्रयोग लौह-इस्पात उद्योग सहित विभिन्न उद्योगों में किया जाता है।
> झारखण्ड में चिरकुण्डा, कुमारधुबी, धनबाद, राँची रोड, मुग्मा आदि में इस प्रकार के उद्योगों का विकास हुआ है।
> दामोदर घाटी क्षेत्र में पायी जाने वाली मिट्टी इस उद्योग की स्थापना हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है।
> झारखण्ड में वन आधारित उद्योग
1. लाह उद्योग (Lac Industry)
> भारत में कुल लाह का 60% उत्पादन झारखण्ड राज्य से होता है। लाह उत्पादन की दृष्टि से भारत में झारखण्ड का स्थान प्रथम है।
> कुसुम, पलाश, बेर आदि के पौधों पर लाह के कीड़ों का पालन किया जाता है।
> पलामू प्रमण्डल लाह उत्पादन की दृष्टि से प्रथम स्थान पर है। इसके बाद क्रमशः राँची व पश्चिमी जिले का स्थान है।
> टोरी ( लातेहार ) का लाह निर्यात की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान है।
> झारखण्ड में कुल लाह उत्पादन का 90% निर्यात कर दिया जाता है।
> लाह उत्पादन की दृष्टि से राज्य में खूँटी का स्थान प्रथम है।
> 1925 ई. में नामकुम ( राँची ) में भारतीय लाह अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई थी। 
2. रेशम उद्योग (Silk Industry)
>>झारखण्ड में देश का 76.4% तसर रेशम उत्पादित किया जाता है। (Source - Jharkhand Economic Survey 2020-21)
> रेशम उत्पादन की दृष्टि से प्रमुख क्षेत्र सिंहभूम ( 40% ) संथाल परगना ( 26% ) तथा हजारीबाग (13%) हैं। 
> राज्य में तसर रेशम का उत्पादन मुख्यत: चाईबासा, खरसावां, जमशेदपुर, मेदिनीनगर, हजारीबाग, लोहरदगा, दुमका आदि स्थानों पर किया जाता है।
> राज्य की राजधानी राँची में नगड़ी नामक स्थान पर 'तसर अनुसंधान केंद्र' अवस्थित है। 
3. तंबाकू उद्योग (Tobacco Industry)
> झारखण्ड में मुख्यतः बीड़ी उद्योग के रूप में तंबाकू उद्योग विकसित हुआ है। 
> बीड़ी का निर्माण केन्दु पत्ता एवं तंबाकू से किया जाता है 
> झारखण्ड में बीड़ी उद्योग का विकास मुख्यतः सरायकेला, जमशेदपुर, चक्रधरपुर एवं संथाल परगना में हुआ  है।
> झारखण्ड में हस्तशिल्प
> झारखण्ड राज्य के विभिन्न भागों में 40 से अधिक हस्तशिल्पों का निर्माण होता है। इनमें टेराकोटा, तसर प्रिंट, ढोकरा, अगरबत्ती, बांस के उत्पाद, चर्मशिल्प, चित्रकला, जनजातीय आभूषण, पिपली आदि प्रमुख हैं।
> राज्य के हजारीबाग, पलामू, धनबाद, राँची, दुमका तथा देवघर जिले में हस्तशिल्प संसाधन सह विकास केन्द्रों द्वारा हस्तशिल्प हेतु प्रशिक्षण की व्यवस्था की गयी है ।
> राज्य में मिट्टी की शिल्पकारी को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 2017 में 'माटीकला बोर्ड' का गठन किया गया है।
> राज्य के बुनकरों एवं शिल्पकारों को समुचित प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय डिजाइन इंस्टीच्यूट, अहमदाबाद के सहयोग से राँची में ‘क्रॉफ्ट एण्ड डिजाइन इंस्टीच्यूट' स्थापित किया जा रहा है। इस संस्थान के द्वारा क्रॉफ्ट एवं डिजाइन से संबंधित डिप्लोमा व डिग्री कोर्स का संचालन किया जाएगा।
> सी-डैक (C-DAC) की सहायता से राज्य के राँची, हजारीबाग, देवघर, सरायकेला-खरसावां व लातेहार में डिजाइन के क्षेत्र में कम्प्यूटर आधारित प्रशिक्षण की सुविधा प्रारंभ किये जाने का प्रस्ताव है। 
> महत्वपूर्ण तथ्य
> झारखण्ड आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार 2005-06 से 2017-18 के बीच राज्य में कारखानों की संख्या में 5% की दर से वृद्धि हुयी है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह वृद्धि दर 4.5% रही है। » 
> झारखण्ड आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार औद्योगिक विकास की दृष्टि से राज्य के विभिन्न श्रेणियों में देश में स्थान इस प्रकार है
> कारखानों की संख्या के आधार पर –20वाँ स्थान
> स्थायी पूंजी के आधार पर –13वाँ स्थान
> कार्यरत श्रमिकों की संख्या के आधार पर –17वाँ स्थान
> उत्पादन के आधार पर – 16वाँ स्थान
> विश्व बैंक द्वारा 'व्यापार सुगमता सूचकांक 2018' मे भारत के राज्यों में झारखण्ड का स्थान चौथा ( 2017 में सातवाँ) है। प्रथम स्थान पर आंध्र प्रदेश, दूसरे स्थान पर तेलंगाना तथा तीसरे स्थान पर हरियाणा राज्य अवस्थित हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस सूचकांक में 190 देशों की सूची में भारत का स्थान 100वाँ (2017 में 130वाँ) है।
> झारखण्ड देश में एकल हस्ताक्षर तकनीक लागू करने वाला पहला राज्य है।
> झारखण्ड देश का पहला तथा एकमात्र राज्य है जहाँ मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में 'कॉर्पोरेट सोशल रेस्पॉसिबिलिटी परिषद्' का गठन किया गया है।
> गार्डेन रीच सीप बिल्डर्स एंड इंजीनियर लिमिटेड भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत एक सार्वजनिक उपक्रम है। इसके द्वारा राँची के अरगोड़ा में 06.10.1969 को 'मेरीन डीजल इंजन प्रोजेक्ट' के नाम से उद्योग की स्थापना की गयी थी। 1988 में इसका नाम परिवर्तित करके 'मेरीन डीजल इंजन प्लांट' कर दिया गया। 
> टाटा- रोबिन्स फ्रेजर (टीआरएफ) लिमिटेड की स्थापना 20 नवंबर, 1962 को की गयी थी । इसके वित्तीय प्रमोटर्स टाटा स्टील व एसोसिएट सिमेंट कंपनी (एसीसी) थे जबकि हेवीट- रोबिन्स (अमेरिका) व जनरल इलेक्ट्रिक (यूके) के द्वारा इसे तकनीकी सहायता प्रदान की गयी थी । यह कंपनी बिजली, खनन, उर्वरक, सिमेंट, पत्तन आदि के क्षेत्र में कार्य करती है ।
> हस्तशिल्प एवं रेशम आधारित स्वरोजगार को बढ़ावा देने हेतु राँची में राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान, अहमदाबाद के सहयोग से 'क्रॉफ्ट एंड डिजाइन संस्थान' की स्थापना की जा रही है।
> राष्ट्रीय स्तर पर विकसित किए जा रहे 'इस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर' तथा 'अमृतसर- दिल्ली इंडस्ट्रियल कोरिडोर' का 196 किलोमीटर मार्ग झारखण्ड राज्य से होकर गुजरता है।
> हजारीबाग के बरही को 'इंडस्ट्रियल मैनुफैक्चरिंग क्लस्टर' के ग्रोथ सेंटर के रूप में चिन्हित किया गया है। 
> राँची में 'सेंट्रल इंस्टीच्यूट ऑफ प्लास्टि इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नोलॉजी' की स्थापना की गयी है। 
> राज्य सरकार ने देवघर को 'प्लास्टिक हब' के रूप में विकसित करने की योजना तैयार की है। इसके लिए राज्य के देवघर जिले में 150 एकड़ भूमि पर 120 करोड़ रूपये की लागत से 'प्लास्टिक पार्क' की स्थापना प्रस्तावित है। इसके साथ-साथ यहाँ भी 'सेंट्रल इंस्टीच्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नोलॉजी' (CIPET) की स्थापना की जानी है।
> भारत सरकार के इलेक्ट्रोनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा आदित्यपुर ( जमशेदपुर ) में एक विश्वस्तरीय इलेक्ट्रानिक विनिर्माण कलस्टर की स्थापना हेतु स्वीकृति प्रदान की गयी है। 
> वर्ष 1945 में धनबाद में केन्द्रीय ईंधन एवं शोध संस्थान की स्थापना की गयी थी ।
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Sat, 09 Sep 2023 10:53:43 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में खनिज संसाधन https://m.jaankarirakho.com/328 https://m.jaankarirakho.com/328 > झारखण्ड खनिज संसाधन की दृष्टि से भारत का अग्रणी राज्य है। 
> झारखण्ड को 'भारत का रूर' कहा जाता है ।
> देश के कुल खनिज का लगभग 40% * खनिज झारखण्ड राज्य में पाया जाता है। 
> विभिन्न खनिजों के भंडार की दृष्टि से झारखण्ड का देश में स्थान इस प्रकार है
> पहला स्थान – कोयला, ( कोयला उत्पादन की दृष्टि से तीसरा स्थान ), प्राइम कोकिंग कोल, मध्यम कोकिंग कोल, पन्ना (Emerald), रॉक फास्फेट
> दूसरा स्थान – तांबा, निकेल, लौह अयस्क, एंडेलुसाइट, कोबाल्ट, सेमी-कोकिंग कोल, एपेटाइट 
> तीसरा स्थान –ग्रेनाइट, बेंटोनाइट, गैर-कोकिंग कोल
> चौथा स्थान – फायरक्ले, एस्बेस्टस, कायनाइट, बॉक्साइट, क्रोमाइट, ग्रेफाइट ( ग्रेफाइट उत्पादन की दृष्टि से प्रथम स्थान)
> पाँचवा स्थान – वर्मीकुलाइट
> छठा स्थान – चाइनाक्ले, अभ्रक, क्वार्ट्ज
> सातवां स्थान – फेल्सपार, क्वाट्जाईट, गारनेट
(Source - Indian Mineral Yearbook 2018 & 2019 published by Indian Bureau of Mines)
> झारखण्ड आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार झारखण्ड राज्य का तांबा भंडार की दृष्टि से देश में तीसरा तथा बॉक्साइट भंडार की दृष्टि से सातवां स्थान है।
> वित्तीय वर्ष 2020-21 में राज्य में कुल 2296.96 करोड़ रूपये मूल्य के खनिज संसाधनों का उत्पादन किया गया है। रॉयल्टी प्राप्ति के मामले में झारखण्ड के जिलों में धनबाद, पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) तथा चतरा का स्थान क्रमश: पहला, दूसरा व तीसरा है।
> इंडियन मिनरल बुक के अनुसार चकमक पत्थर (Flint Stone) का एकमात्र उत्पादक राज्य झारखण्ड है। 
> झारखण्ड के आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार भारत में कोकिंग कोयला, यूरेनियम तथा पाइराइट का एकमात्र उत्पादक राज्य झारखण्ड है ।
> झारखण्ड आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार राज्य कुल 373 बड़े खदान हैं। इनमें सर्वाधिक खदान धनबाद (109 खदान) तथा इसके बाद पश्चिमी सिंहभूम ( 78 खदान) हैं।
झारखण्ड में धात्विक खनिज
(A) लौह धात्विक खनिज
1. लौह अयस्क
> सिंहभूम क्षेत्र लौह अयस्क की प्राप्ति का प्रमुख केन्द्र है जिसका विस्तार उड़ीसा के मयूरभंज एवं क्योंझर तक है। 
> यह विश्व का सर्वाधिक लौह भंडार वाला क्षेत्र है।
> देश के कुल लौह अयस्क भंडार का लगभग 26% झारखण्ड राज्य में निक्षेपित है।
> झारखण्ड में सर्वाधिक हेमाटाइट लौह अयस्क वाला जिला पश्चिमी सिंहभूम है।
> देश में हेमेटाइट लौह अयस्क के भंडार की दृष्टि से झारखण्ड का दूसरा स्थान है।
> यहाँ नोवामुण्डी की खान एशिया में लौह अयस्क की सबसे बड़ी खान है।
> पश्चिमी सिंहभूम का चिरिया * नामक स्थान भी लौह अयस्क के भंडार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लौह अयस्क भंडार की दृष्टि से यह भारत का सबसे बड़ा निक्षेप है। 
> यहाँ से हेमेटाइट वर्ग का लौह अयस्क उत्पादित किया जाता है । जिसमें 60% से 68% तक लोहे का अंश होता है।
> झारखण्ड में उपलब्ध कुल लौह अयस्क का 99% हेमेटाइट वर्ग का लौह अयस्क
> राज्य में मैग्नेटाइट लौह अयस्क के भंडार पूर्वी सिंहभूम, पलामू, गुमला, हजारीबाग तथा लातेहार जिले में हैं। 
2. क्रोमाइट
> झारखण्ड में क्रीमाइट का संकेन्द्रण मुख्यतः सिंहभूम क्षेत्र के जोजोहातु में है।
> राज्य में लगभग 7,36,000 टन क्रोमाइट का भंडार मौजूद है।
> इसका उपयोग स्टेनलेस स्टील बनाने के साथ-साथ विभिन्न रासायनिक उद्योगों में भी किया जाता है।
3. मैंगनीज
> झारखण्ड में मैंगनीज अयस्क का संकेन्द्रण मुख्यतः सिंहभूम क्षेत्र में है। 
> राज्य में लगभग 13.7 मिलियन टन मैंगनीज का भंडार उपलब्ध है।
> मैंगनीज का प्रयोग इस्पात बनाने, सुखी बैटरी व रसायन उद्योग में होता है
> यह धारवाड़ चट्टानों से प्राप्त होता है।
4. जस्ता
> यह संथाल परगना, हजारीबाग, पलामू, राँची एवं सिंहभूम जिले में पाया जाता है। 
5. टिन
> यह आग्नेय चट्टानों में उपलब्ध कैसिटराइट नामक कच्चे धातु से प्राप्त होता है।
> झारखण्ड के हजारीबाग, राँची, सिंहभूम, संथाल परगना तथा पलामू में यह पाया जाता है।
6. सोना
> राज्य के सिंहभूम क्षेत्र की चट्टानों में सोना अल्प मात्रा में पाया जाता है।
> झारखण्ड में इसका उत्पादन मुख्यतः हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड द्वारा किया जाता है।
> पूर्वी सिंहभूम के कुंदेर-कोचा नामक स्थान पर मनमोहन मिनरल इंडस्ट्रीज प्रा. लिमिटेड नामक कंपनी द्वारा भी सोने का उत्पादन किया जा रहा है।
> इंडियन मिनरल इयरबुक (2018-19) के अनुसार कर्नाटक के बाद देश में सोने का सर्वाधिक उत्पादन झारखण्ड राज्य में होता है।
> झारखण्ड की नदियों (स्वर्णरेखा व सोन नदी) के रेत में भी सोने का अंश पाया जाता है, लेकिन रेत से इसके उत्पादन की लागत अत्यधिक होने के कारण इसका उत्पादन नहीं किया जाता है।
(B) अलौह धात्विक खनिज
1. तांबा
> तांबा के उत्पादन की दृष्टि से झारखण्ड भारत का अग्रणी राज्य है।
> देश के कुल तांबा भंडार का 18.5% झारखण्ड राज्य में निक्षेपित है।
> झारखण्ड में पूर्वी सिंहभूम के मोसाबनी, धोबनी, सुरदा, केन्दडीह, राखा, छापरी - सिद्धेश्वर एवं घाटशिला  तांबा उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र हैं।
> मोसाबनी तांबा खदान की शुरूआत इंडियन कॉपर कॉरपोरेशन लिमिटेड (ब्रिटिश कंपनी) द्वारा 1928 में की गयी थी।
> वर्तमान समय में सुरदा खदान का संचालन भारत संसाधन लिमिटेड (पर्थ, ऑस्ट्रेलिया की कंपनी) द्वारा किया जाता है। 
> राज्य के पूर्वी सिंहभूम जिले में घाटशिला नामक स्थान पर हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड द्वारा तांबा अयस्क का उत्पादन किया जाता है जबकि इसे गलाने का कार्य इंडियन कॉपर कॉम्पलेक्स द्वारा किया जाता है।
> इसके अतिरिक्त राज्य के हजारीबाग जिले में भी तांबा की उपलब्धता के प्रमाण मिले हैं।
> तांबा का उपयोग बिजली के उपकरणों, धातु मिश्रण आदि में किया जाता है।
2. बॉक्साइट
> झारखण्ड में उच्च कोटि का बॉक्साइट पाया जाता है जिसमें 52% से 55% तक एलुमिनियम होता है। 
> यह राज्य के लोहरदगा, गुमला, लातेहार, गोड्डा तथा साहेबगंज जिले में पाया जाता है।
> बॉक्साइट से एलुमिनियम निकाला जाता है।
> झारखण्ड के लोहरदगा, गुमला एवं लातेहार जिले में हिण्डालको इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा बॉक्साइट का खनन किया जाता है।
> झारखण्ड के मुरी नामक स्थान पर बॉक्साइट को गलाने का संयंत्र है। 
3. टंगस्टन
> इसका उपयोग विजली के उपकरण बनाने तथा लौह धातु के निर्माण में किया जाता है।
> टंगस्टन का उत्पादन कालामाटी (पूर्वी सिंहभूम) में किया जाता है। इसके अलावा यह हजारीबाग जिले में भी पाया जाता है।
झारखण्ड में अधात्विक खनिज
1. अभ्रक (Mica)
> झारखण्ड राज्य में प्रचुर मात्रा में अभ्रक की उपलब्धता है।
> कोडरमा  जिला का झूमरी तिलैया अभ्रक का प्रमुख क्षेत्र है। इसके अतिरिक्त राज्य के गिरिडीह व हजारीबाग में भी इसका उत्पादन होता है।
> कोडरमा को 'भारत की अभ्रक राजधानी' कहा जाता है। 
> झारखण्ड में उच्च कोटि का सफेद अभ्रक पाया जाता है जिसे 'रूबी अभ्रक' के कारण इसकी वैश्विक स्तर पर अधिक मांग है। 
> झारखण्ड में उत्पादित कुल अभ्रक का 90% भाग निर्यात कर दिया जाता है।
> अभ्रक का उपयोग बिजली के उपकरण, औषधि, सजावट उपकरण, अग्निरोधक सामग्री आदि के निर्माण में किया जाता है।
2. कायनाइट
> झारखण्ड में कायनाइट का सबसे बड़ा भण्डार पूर्वी सिंहभूम के लिप्साबुरू क्षेत्र में है। इसके अतिरिक्त पश्चिमी सिंहभूम व सरायकेला-खरसावां जिले में भी कायनाइट की उपलब्धता है।
> सिंहभूम के राजखरसावां (सरायकेला-खरसावाँ) के निकट इसका उत्पादन भारतीय तांबा निगम द्वारा किया जाता है।
> यह ताप सहन करने वाला खनिज है। इसका उपयोग ताप निरोधक ईट बनाने के साथ - साथ चीनी मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में भी होता है। 
3. ग्रेफाइट
> यह पलामू में सर्वाधिक पाया जाता है। इसके अतिरिक्त लातेहार व गढ़वा में भी ग्रेफाइट पाया जाता है। 
> यह कार्बन का एक रूप है जिसे काला सीसा भी कहा जाता है।
> इसका उपयोग उच्च तापसह्य उद्योगों (Refractory Industry ) में किया जाता है।
4. चूना पत्थर
> यह हजारीबाग, राँची, सिंहभूम, पलामू, बोकारो, धनबाद, गढ़वा, गिरिडीह, गोड्डा, लातेहार, पूर्वी सिंहभूम व पश्चिमी सिंहभूम में पाया जाता है।
> इसका उपयोग सीमेंट बनाने के साथ-साथ लौह-इस्पात उद्योग में भी किया जाता है।
5. डोलोमाइट
> पलामू जिला के डाल्टनगंज (मेदिनीनगर) व गढ़वा में डोलोमाइट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।
> इसका उपयोग कागज, सीसा, लौह इस्पात, सीमेंट आदि उद्योगों में होता है।
6. एस्बेस्टस
> यह एक रेशेदार खनिज है, जो धारवाड़ क्रम की चट्टानों में पाया जाता है।
> यह पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम व सरायकेला-खरसावां जिले में पाया जाता है ।
> यह छत बनाने के काम में प्रयुक्त होता है।
7. बैंटोनाइट
> यह एक एलुमीनियम सिलिकेट मिट्टी है, जिसका निर्माण ज्वालामुखी के राख से होता है। 
> इसे आम भाषा में मुल्तानी मिट्टी भी कहा जाता है। 
> इसका प्रयोग निर्माण तथा अभियांत्रिकी में किया जाता है।
> यह राज्य के साहेबगंज तथा पाकुड़ जिले में पाया जाता है।
8. ग्रेनाइट
> राँची के तुपुदाना के पास ग्रे-ग्रेनाइट की उपलब्धता है परंतु अभी तक इसका पर्याप्त खनन नहीं हो पाया है। 
> इसका प्रयोग भवन निर्माण के क्षेत्र में किया जाता है।
> झारखण्ड में ग्रेनाइट के उपलब्ध प्रकार - टाइगर - स्कीन, मयूराक्षी - ब्लू, सावन - रोज, इंग्लिश - टीक, ब्लैक ग्रेनाइट (ब्लैक चीता, ब्लैक जेब्रा ) ।
9. सोपस्टोन व क्वार्ट्ज
> यह झारखण्ड के संपूर्ण छोटानागपुर क्षेत्र के साथ-साथ कुछ अन्य जिलों में भी उपलब्ध है। 
झारखण्ड में ऊर्जा खनिज
1. कोयला
> झारखण्ड भारत में सर्वाधिक कोयला उत्पादक राज्य है। 
> झारखण्ड सरकार के विभागीय आँकड़ों के अनुसार देश का लगभग 27.37% कोयला झारखण्ड राज्य में पाया जाता है।
> इंडियन मिनरल इयरबुक (2019-20) के अनुसार झारखण्ड राज्य में देश के कुल कोयला उत्पादन का 18.5% उत्पादित किया गया है।
> इस रिपोर्ट के अनुसार कोयला के भंडार की दृष्टि से झारखण्ड का देश में प्रथम तथा उत्पादन की दृष्टि से छत्तीसगढ़ (22.2%) व उड़ीसा (19.8%) के बाद तीसरा स्थान है।
> इस रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड राज्य में कुल 132 कोयला खदान हैं जो देश में सर्वाधिक है। पूरे देश में कुल 476 कोयला खदान हैं।
> राज्य के कुल कोयला उत्पादन का लगभग 95% उत्पादन दामोदर घाटी कोयला क्षेत्र में होता है। 
> दामोदर घाटी कोयला क्षेत्र कोकिंग कोल का शत प्रतिशत उत्पादन करता है। विदित है कि देश के कोकिंग कोल का उत्पादन करने वाला झारखण्ड एकमात्र राज्य है।
> दामोदर घाटी क्षेत्र में कोयला की कुछ प्रमुख खदानें पिपरवार, सराधु तथा मगध, अशोक, संघमित्रा, अम्रपाली तथा चंद्रगुप्त की अवस्थिति बड़कागाँव (हजारीबाग) क्षेत्र में है। ये सभी क्षेत्र उत्तरी कर्णपुरा कोलफिल्ड एरिया के अंतर्गत आते हैं। 
> झारखण्ड में सर्वप्रथम कोयला खनन का काम दामोदर घाटी निगम क्षेत्र के अंतर्गत झरिया में आरंभ हुआ। 
> झरिया (धनबाद) में कोयला का प्रचुर भंडार है तथा यहाँ से कोयला का सर्वाधिक उत्पादन होता है। 
> झरिया पूरे झारखण्ड के कोयला उत्पादन का 60% कोयला उत्पादन करता है।
> झरिया क्षेत्र भारत किंग कोल लिमिटेड के अंतर्गत आता है।
> राउरकेला के इस्पात कारखाने को बोकारो से कोयले की आपूर्ति की जाती है।
> झारखण्ड में बिटुमिनस एवं एंथ्रेसाइट दोनों किस्मों का कोयला पाया जाता है। 
> बिटुमिनस कोयले में 78% से 86% तक कार्बन का अंश होता है जबकि एंथ्रेसाइट कोयले में 94% से 98% तक कार्बन का अंश होता है।
> झारखण्ड को खनिजों से प्राप्त कुल राजस्व का 75% हिस्सा केवल कोयले से प्राप्त होता है। 
> उत्पादन की दृष्टि से झारखण्ड का सबसे बड़ा कोयला की खान झरिया तथा क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा कोयले की खान कर्णपुरा है।
> झारखण्ड में रूस की सहायता से संचालित कोयला परियोजना: – 
» झरिया से कुमारी ओ. सी. पी कोयला क्षेत्र तक का विकास
» झरिया से सीतानाला कोयला क्षेत्र तक का विकास
> झारखण्ड में विश्व बैंक की सहायता से संचालित कोयला परियोजना :
» झरिया कोकिंग कोयला परियोजना
» रजरप्पा परियोजना
» राजमहल परियोजना
» दामोदर परियोजना
» कतरास परियोजना
> झारखण्ड में कोयले के तीन प्रकार (कोकिंग, अर्द्ध कोकिंग तथा गैर-कोकिंग) पाया जाता है। 
> कोकिंग तथा अर्द्ध कोकिंग कोयले का प्रयोग उद्योगों में मुख्यतः धौंक भट्टी (Blast Furance ) में किया जाता है। जबकि गैर-कोकिंग कोयले का प्रयोग स्पन्ज लोहा, ताप शक्ति, रेलवे, सीमेंट, खाद, ईट भट्टी व घरेलू ईंधन आदि में किया जाता है।
> सेंट्रल कोलफिल्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) राज्य के बोकारो, गिरिडीह, रामगढ़, उत्तरी कर्णपुरा तथा दक्षिणी कर्णपुरा में कोयला खदानों का संचालन करता है।
> सीसीएल राज्य में बोकारो के कथरा व स्वांग तथा रामगढ़ के रजरप्पा व केदला में कोल वाशरी का भी संचालन करता है।
2. प्राइम कोकिंग कोल
> झारखण्ड राज्य देश में प्राइम कोकिंग कोल का एकमात्र उत्पादक है।
> झारखण्ड में प्राइम कोकिंग कोल का भंडार लगभग 5313 मिलियन टन है जो देश के कुल कोकिंग कोल का लगभग 100% है।
> इसके अलावा देश के कुल मध्यम कोकिंग कोल का 90%, सेमी कोकिंग कोल का 44% एवं गैर-कोकिंग कोल का 18.4% झारखण्ड राज्य में ही निक्षेपित है।
3. यूरेनियम
> यह एक आण्विक खनिज है।
> झारखण्ड के जादूगोड़ा धालभूमगढ़, बागजत, केरूआ डुमरी, नरवापहाड़ आदि क्षेत्रों में यह खनिज पाया जाता है।
> पूर्वी सिंहभूम के जादूगोड़ा में यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड (1967 में निगमित) द्वारा यूरेनियम की खुदाई की जा रही है।
> जादूगोड़ा के पश्चिम में स्थित तुरामडीह में भी यूरेनियम का खनन किया जाता है। 
> भारत में यूरेनियम का सर्वाधिक उत्पादन (लगभग शत-प्रतिशत) झारखण्ड राज्य में ही किया जाता है।
4. थोरियम
> यह एक आण्विक खनिज है।
> झारखण्ड के राँची पठार और धनबाद में इसका विस्तार है।
5. इल्मेनाइट
> यह एक आण्विक खनिज है।
> यह राँची में पाया जाता है।
> देश के कुल इल्मेनाइट का 0.12% झारखण्ड राज्य में उपलब्ध है। 
> इसका प्रयोग अंतरिक्ष यान तथा टाइटेनियम बनाने में होता है।
6. बोरिलियम
> यह बेरिल नामक खनिज प्रस्तर से प्राप्त होता है।
>>झारखण्ड के कोडरमा तथा गिरिडीह जिले में बोरिलियम पाया जाता है।
7. जिरकन
> इसकी प्राप्ति झारखण्ड में राँची तथा हजारीबाग जिले से होती है।
> झारखण्ड राज्य खनिज विकास निगम लिमिटेड
> राज्य सरकार द्वारा खनिज संसाधनों के विकास एवं उनके समुचित उपयोग के उद्देश्य से झारखण्ड राज्य खनिज विकास निगम लिमिटेड (JSMDC) का गठन किया गया है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:50:02 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की अर्थव्यवस्था का परिचय https://m.jaankarirakho.com/327 https://m.jaankarirakho.com/327 > देश के कुल खनिज संसाधन का लगभग 40 प्रतिशत है। अतः झारखण्ड की भूमि को रत्नगर्भा भी कहा जाता है।
> खनिज संसाधनों की प्रचुरता के कारण इस राज्य की तुलना जर्मनी के रूर प्रदेश से की जाती है। इसी कारण झारखण्ड को भारत का रूर कहा जाता है।
> भारतीय खनन ब्यूरो के अनुसार झारखण्ड में कुल 58 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं तथा यहाँ की अर्थव्यवस्था का मूल आधार खनिज संसाधन और उन पर निर्भर उद्योग-धंधे हैं।
> झारखण्ड में देश के कई प्रमुख औद्योगिक शहर अवस्थित हैं जिनमें जमशेदपुर, राँची, बोकारो तथा धनबाद प्रमुख हैं।
> देश में औद्योगिक दृष्टिकोण से विभिन्न बातों में झारखण्ड का प्रथम स्थान है: –
> देश का प्रथम उर्वरक कारखाना–सिंदरी (धनबाद)
> देश का प्रथम लौह-इस्पात उद्योग–जमशेदपुर
> एशिया की सबसे बड़ी कोल वाशरी–y
> देश का प्रथम कोल वाशरी– घाटो (रामगढ़)
> देश का  प्रथम मिथेन गैस कुआँ–परबतपुर (बोकारो)
> भारत में आधुनिक रूप से लौह-इस्पात तैयार करने का प्रथम प्रयास 1779 ई. में धनबाद जिले के झरिया नामक स्थान पर किया गया था।
> आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अनुसार सकल राज्य मूल्य वृद्धि (GSVA) में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 41.7% है
> राज्य में प्रमुखत: खनिज आधारित उद्योगों का विकास हुआ है जिनमें टाटा आयरन एण्ड स्टील कंपनी (टिस्को), टाटा इंजीनियरिंग एण्ड लोकोमोटिव कंपनी (टेल्को), सिंदरी फर्टिलाइजर्स तथा हैवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन (एच.ई.सी.) आदि प्रमुख हैं।
> राज्य में उत्पादित खनिजों में लौह-अयस्क, मैंगनीज, कोयला तथा डोलोमाइट की बहुलता है जिन्होनें लौह-इ - इस्पात उद्योगों के विकास हेतु मजबूत आधार प्रदान किया है ।
> राज्य में तांबा, गंधक, एस्बेस्ट्स, बॉक्साइट, अभ्रक, यूरेनियम आदि खनिजों के उत्पादन के कारण तांबा उद्योग, विद्युत संयंत्र उद्योग तथा एलुमिनियम उद्योग आदि का विकास संभव हुआ है ।
> झारखण्ड राज्य में परिवहन एवं संचार के साधनों हेतु सड़क, रेल तथा वायु मार्ग का विकास किया गया है। राज्य में अधिकांश नदियाँ पहाड़ी क्षेत्रों से प्रवाहित होती हैं, जिसके कारण यहाँ जल परिवहन का विकास संभव नहीं हो पाया है।
> राज्य की एकमात्र मयूराक्षी नदी वर्षा के दिनों में जल परिवहन हेतु उपयुक्त दशाएँ प्रदान करती है। 
> राज्य में वनों की प्रचुरता के कारण विभिन्न प्रकार के वनाधारित उद्योगों का विकास हुआ है जिनमें लकड़ी उद्योग, कागज एवं लुग्दी उद्योग तथा लाख उद्योग महत्वपूर्ण हैं।
> झारखण्ड में ऊर्जा संसाधन के रूप में मुख्यतः कोयला तथा जल की उपलब्धता है तथा ऊर्जा के शेष संसाधन नगण्य मात्रा में उपलब्ध हैं।
> राज्य की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 2,626 मेगावाद है।
> राज्य में उत्पादित कुल विद्युत का 31.23% स्वामित्व राज्य सरकार के पास, 25.63% केन्द्र सरकार के पास तथा 43.12% निजी कंपनियों के पास है।
> 20वीं पशु जनगणना- 2019 के अनुसार राज्य में मवेशियों की कुल संख्या 22.93 मिलियन है। 
> झारखण्ड में प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता 2018-19 में 177 ग्राम प्रतिदिन है। (Source nddb.coop) 
> राज्य में नेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ डिजाइन, अहमदाबाद के सहयोग से राँची में डिजाइन इंस्टीच्यूट की स्थापना प्रस्तावित है।
> राज्य के राँची तथा खरसावाँ में सिल्क पार्क की स्थापना प्रस्तावित है।
> राज्य के देवघर में प्लास्टिक पार्क की स्थापना प्रस्तावित है।
> हजारीबाग स्थित पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र को पुलिस अकादमी में अपग्रेड करने की राज्य सरकार की योजना है। 
> अपराध अनुसंधान हेतु प्रशिक्षित बल तैयार करने के उद्देश्य से राँची में Investigation Training School की स्थापना प्रस्तावित है।
> बजट 2021-22 के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में राज्य की आर्थिक संवृद्धि दर 6.9 प्रतिशत अनुमानित है। बजट 2019-20 में अनुमानित आर्थिक संवृद्धि दर 6.7% था जबकि 2021-22 के लिए आर्थिक संवृद्धि दर 9.5% अनुमानित है।
> प्रचलित मूल्यों पर वर्ष 2019-20 में राज्य का प्रति व्यक्ति आय 79,873 रूपये अनुमानित है। 
> प्रति व्यक्ति आय की दृष्टि से झारखण्ड का स्थान भारत के राज्यों में 26वाँ (जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन के बाद) है। 
> झारखण्ड राज्य में 2019-20 के बजट में बाल बजट की शुरूआत की गयी थी।
> वैश्विक बहुआयामी निर्धनता सूचकांक 2019 के अनुसार झारखण्ड राज्य की कुल जनसंख्या का 46.5% (2015-16 में) निर्धनता रेखा से नीचे जीवन बसर करती है। 2005-06 में यह आँकड़ा 74.9% था। 2005-06 से 2015-16 के बीच पूरे देश में निर्धनों की संख्या में सबसे अधिक कमी झारखण्ड राज्य में ( 72 लाख लोग ) ही दर्ज की गयी है।
> झारखण्ड राज्य में कुल कार्यरत बल का 46.75% कृषि क्षेत्र में, 18.54% निर्माण क्षेत्र में तथा 8.7% विनिर्माण क्षेत्र में संलग्न हैं।
> राज्य में नगरीय विकास
> जनगणना-2011 के अनुसार झारखण्ड राज्य की कुल जनसंख्या का 24.05% नगरीय क्षेत्र में निवास करता है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आँकड़ा 32% है।
> जनगणना-2011 के अनुसार राज्य के शहरी क्षेत्र में गंदी बस्ती (Slums) की कुल आबादी 3,72,999 है। इनमें से गंदी बस्ती की सर्वाधिक आबादी क्लास - I शहर में तथा न्यूनतम आबादी क्लास-V 5,723 है। 
> गंदी बस्ती की कुल आबादी में 35% जनसंख्या अशिक्षित है जबकि कार्यरत जनसंख्या मात्र 68% है।
> अन्य महत्वपूर्ण आँकड़े (2019-20)
> आर्थिक संवृद्धि दर
> सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी)– 6.7%
> सकल राज्य मूल्य वृद्धि (जीएसवीए)–5.6%
> क्षेत्रवार संवृद्धि
> कृषि क्षेत्र – 2.5%
> खनन व उत्खनन क्षेत्र – 1.8%
> प्राथमिक क्षेत्र ( कृषि + खनन व उत्खनन) –2.2%
> द्वितीयक क्षेत्र – 4.9%
> उद्योग क्षेत्र ( द्वितीयक + खनन व उत्खनन )–4.3%
> तृतीयक क्षेत्र – 7.9%
> निर्भरता अनुपात (2018-19) – 58% ( भारत – 46% )
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Sat, 09 Sep 2023 10:47:13 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में आपदा प्रबंधन https://m.jaankarirakho.com/326 https://m.jaankarirakho.com/326 > आपदा
> ऐसी दुर्घटनाएँ जो अचानक घटित हो तथा जिनके प्रभावस्वरूप जीवन एवं संपत्ति की व्यापक हानि होती हो, आपदा कहलाती है।
> आपदा को प्राकृतिक आपदा तथा मानवजनित आपदा में वर्गीकृत किया जाता है।
> प्राकृतिक पर्यावरण के अंतर्गत पर्यावरण के ऐसे घटकों को शामिल किया जाता है, जिनका निर्माण प्रकृति द्वारा किया गया है जैसे- वायु, जल, मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु आदि । अर्थात् मानवीय क्रियाकलापों द्वारा अविक्षुब्ध पर्यावरण प्राकृतिक पर्यावरण कहलाता है।
> ऐसी आपदाएँ जो प्राकृतिक कारणों जैसे- भूकंप, ज्वालामुखी, चक्रवात, आँधी- तुफान, सुनामी, सूखा, बाढ़ आदि के कारण घटित हों, प्राकृतिक आपदाएँ हैं।
> मानवीय कारणों से उत्पन्न आपदाएँ जैसे- युद्ध, परमाणविक घटनाएँ, रासायनिक घटनाएँ आदि शामिल हैं। इसे सामाजिक आपदा भी कहा जाता है।
> आपदा की भयावहता को देखते हुए आपदाओं के घटित होने पर कार्रवाई करने की अपेक्षा आपदा के कुशल प्रबंधन पर अधिक जोर दिया जाता है। इसके तहत आपदा के पूर्व ही प्रबंधन उपायों द्वारा उनसे होने वाले नुकसान को कम करने की कोशिश की जाती है।
> झारखण्ड विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक एवं मानवजनित आपदाओं का शिकार होता रहा है तथा इनसे निपटने हेतु आपदा प्रबंधन को मजबूती प्रदान करना नितांत आवश्यक है। इन आपदाओं में भूकंप, बाढ़, सूखा, चक्रवात, सुनामी के प्रभाव, तड़ित, खनन दुर्घटना, रासायनिक दुर्घटना, औद्योगिक दुर्घटना, जंगलों में आग, हाथियों का आक्रमण आदि प्रमुख हैं।
> भूकंप
> भूकंप की दृष्टि से झारखण्ड राज्य को न्यून जोखिम वाले क्षेत्र में रखा जा सकता है। 
> भूकंप संवदेनशीलता की दृष्टि से राज्य को जोन II, III एवं IV में रखा जा सकता है।
> जोन II के अंतर्गत राज्य के 7 जिले (राँची, लोहरदगा, खूँटी, रामगढ़, गुमला, पूर्वी सिंहभूम व पश्चिमी सिंहभूम) आते हैं।
> तथा जोन III के अंतर्गत राज्य के 15 जिले (पलामू, गढ़वा, लातेहार, चतरा, हजारीबाग, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, कोडरमा, देवघर, दुमका, जामताड़ा, गोड्डा, पाकुड़ व साहेबगंज) आते हैं।
> जोन IV में गोड्डा तथा साहेबगंज का उत्तरी भाग अवस्थित है, जो सर्वाधिक भूकंप प्रभावित क्षेत्र है। 
> बाढ़
> झारखण्ड राज्य के 11 जिले बाढ़ की समस्या से प्रभावित हैं जिनमें साहेबगंज, गोड्डा, पाकुड़, दुमका, धनबाद, देवघर, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम तथा हजारीबाग प्रमुख हैं।
>>राज्य में बाढ़ का प्रमुख कारण मानसूनी वर्षा द्वारा नदी के जलस्तर में वृद्धि होना है।
> सोन तथा उत्तरी कोयल नदी के जलस्तर में वृद्धि के कारण पलामू, गढ़वा तथा लातेहार जिला में भी बाढ़ का प्रभाव होता है।
> बाढ़ के कारण राज्य में धान की फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसके फलस्वरूप राज्य की खाद्यान्न व्यवस्था नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।
> कुछ जिलों में बाढ़ आपदा का रूप ग्रहण कर लेती है जिसके कारण मकान, सड़क, पुल-पुलिया आदि क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।
> बाढ़ के कारण सर्वाधिक प्रभाव राज्य के उत्तरी - पूर्वी क्षेत्रों में पड़ता है जो गंगा नदी के अपवाह तंत्र से जुड़े हैं।
> वर्षा के दिनों में जलस्तर में वृद्धि के कारण राँची तथा जमशेदपुर जैसे नगरों में सड़कों पर जल का प्रवाह प्रारंभ हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप परिवहन व्यवस्था पर दुष्प्रभाव पड़ता है। साथ ही विभिन्न बिमारियों के पनपने के कारण मानवीय स्वास्थ्य पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 
> सूखा
> किसी क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा होने के आधार पर सूखा का वर्गीकरण किया जाता है। इसके तहत सामान्य से 25 प्रतिशत कम वर्षा होने पर सामान्य सूखा, 25-50 प्रतिशत कम वर्षा होने पर मध्यम सूखा तथा 50 प्रतिशत से कम वर्षा होने पर गंभीर सूखा कहा जाता है। यदि किसी क्षेत्र में सामान्य के 75 से कम वर्षा होती है, तो यह आपदा का रूप ले लेती है।
> राज्य के उत्तरी-पश्चिमी हिस्से में सूखा कई बार आपदा का रूप धारण कर लेती है, जिसके परिणामस्वरूप पलामू, गढ़वा, लातेहार, चतरा तथा लोहरदगा जिलों की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 
> राज्य का पलामू जिला सूखा की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील जिला है।
> वर्ष 2010 में झारखण्ड राज्य गंभीर सूखे से प्रभावित रहा है । इस दौरान राज्य के 24 में से 12 जिले गंभीर सूखे की प्रकोप में रहे हैं। इन सभी जिलों में वर्षा का अनुपात औसत वर्षा के 50 प्रतिशत से भी कम रहा।
> सूखे जैसी आपदा से निपटने हेतु राज्य में बाँध, तालाब, डोभा, वाटर शेड प्रबंधन, उचित फसलों का चयन, मृदा संरक्षण, वृक्षों की कटाई पर नियंत्रण आदि उपाय अपनाये जाने की जरूरत है।
> इसके लिए संबंधित क्षेत्र के लोगों को जागरूक तथा प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। 
> तड़ित (लाइटनिंग )
> वर्षा के दिनों में चमकने वाली बिजली का जमीन पर गिरना तड़ित कहलाता है जिसके कारण झारखण्ड में प्रत्येक वर्ष अनेक लोगों की मृत्यु हो जाती है। साथ ही इस दुर्घटना में कई मवेशियों की भी मृत्यु हो जाती है। 
> इस आपदा से राज्य के पलामू, चतरा, लातेहार, गुमला, राँची, गिरिडीह तथा कोडरमा जिला मुख्य रूप से प्रभावित हैं।
> राज्य के श्रीकृष्ण लोक प्रशासन संस्थान द्वारा इस समस्या से निपटने हेतु एक विशेष ट्रेनिंग माड्यूल का निर्माण किया गया है।
> इस समस्या से होनेवाली जानमाल की हानि को कम करने हेतु राज्य के लोगों को बचाव से संबंधित प्रशिक्षण दिये जाने की आवश्कता है जिसके तहत् वर्षा के समय घरों में रहना, पेड़ के नीचे नहीं खड़ा होना, बिजली एवं तार के खंबे से दूर रहना आदि शामिल हैं।
> खनन दुर्घटना
> झारखण्ड राज्य में देश के कुल खनिज का लगभग 40 प्रतिशत भंडार संचित है।
> राज्य की अर्थव्यवस्था में खनिजों का खनन एक प्रमुख गतिविधि है तथा इस दौरान प्राकृतिक तथा मानवीकृत दुर्घटनाएँ उत्पन्न होती हैं।
> राज्य के कई कोयला खदानों में आग लगी हुई है तथा तीव्रता से इसका प्रसार हो रहा है। इनमें झरिया, रामगढ़ आदि प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।
> खनन के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में खानों का धंसना, मजदूरों को खनन से निर्मित गड्ढे में गिर जाना तथा खनन दौरान होने वाले प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ प्रमुख हैं।
> खनन दुर्घटना से निपटने हेतु इन क्षेत्रों में कार्य करने वाले मजदूरों को प्रशिक्षित किए जाने के साथ-साथ खनन के धँसाव के समय त्वरित राहत प्रणाली को विकसित किए जाने की आवश्यकता है। 
> साथ ही मजदूरों को खनन के दौरान उत्पन्न प्रदूषकों के प्रति जागरूक करते हुए मॉस्क के प्रयोग हेतु प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है।
> जंगलों में आग
> जंगलों में आग जलवायु का एक प्रमुख घटक है, जो राज्य के वनक्षेत्र के जलवायु को प्रभावित करने में अहम् भूमिका अदा करता है। 
> झारखण्ड राज्य में वनों की बहुलता है तथा इसमें शुष्क पतझड़ वन सर्वाधिक पाये जाते हैं। इन वनों में ग्रीष्म ऋतु में कई कारणों से लगने वाली आग कई बार भयावह हो जाती है तथा यह आपदा का रूप ग्रहण कर लेती है।
> जंगलों में आग लगने का प्रमुख कारण हवाओं के कारण पेड़ों के टकराने से उत्पन्न आग, मानव द्वारा महुआ व वृक्ष की लकड़ियों के संग्रहण के दौरान रोशनी के लिए आग जलाना तथा पर्यटकों की लापरवाही के कारण जलती हुई माचिस की तीली का जंगलों में फेंका जाना महत्वपूर्ण हैं।
> मार्च तथा अप्रैल के महीने में जंगलों में रहने वाले लोग आग जलाकार रातों में तथा प्रातः काल महुआ चुनने का कार्य करते हैं तथा इनके जलाए हुए आग कई बार विस्तारित होकर जंगली आग का कारण बनते हैं। 
> झारखण्ड राज्य के उत्तर-पश्चिमी तथा दक्षिणी पश्चिमी भाग में जंगल में सर्वाधिक आग लगने की घटना होती है। इनमें पलामू, लातेहार, गढ़वा, चतरा, हजारीबाग, सिमडेगा, गुमला आदि जिले शामिल हैं। 
> जंगलों में लगने वाले आग को रोकने हेतु कानूनी प्रशासनिक तथा जागरूकता के स्तर पर कार्य किया जाना आवश्यक है। 
> इस संबंध में पर्यटन संबंधी कानूनों में कठोर प्रावधान तथा संग्राहकों के बीच जलाये हुए आग को बुझाने के संबंध में जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए।
> साथ ही प्रशासनिक स्तर पर ऐसे वृक्ष जो अधिक आयु के हो गये हैं, उन्हें काटकर उनके स्थान पर नये वृक्ष लगाने का कार्य किया जाना चाहिए। इसके तहत् जंगलों में फायर टावर बाँध का निर्माण तथा वनों का सड़कों द्वारा विभाजन किए जाने की भी आवश्यकता है।
> हाथियों का आक्रमण
> हाथी झारखण्ड का राजकीय पशु है तथा राज्य में इनकी संख्या काफी अधिक है। राज्य के पलामू, दुमका, सारंडा, हजारीबाग, दालमा आदि के जंगलों में सर्वाधिक हाथी पाये जाते हैं।
> राज्य में आये दिन जंगली हाथी के आक्रमण की घटनाएँ सुनने को मिलती हैं, जो बसाव क्षेत्र के जन-जीवन की एक प्रमुख समस्या है।
> हाथियों के आक्रमण का प्रमुख कारण इनके प्राकृतिक आवासों में मानव का हस्तक्षेप है। जंगलों में मानव हस्तक्षेप में वृद्धि के कारण जहाँ एक ओर हाथियों को ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँचने का रास्ता उपलब्ध हुआ है वहीं वनों के कटाव ने इन्हें अपने प्राकृतिक आवास से पलायन हेतु मजबूर किया है।
> इसके अतिरिक्त सुगंधित महुआ फूलों की ओर आकर्षित होना हाथियों के आक्रमण का एक प्रमुख कारण है।
> हाथियों के आक्रमण की समस्या राज्य के खूँटी, सिमडेगा, गुमला, लातेहार, पलामू, चतरा, हजारीबाग आदि जिले में पायी जाती है।
> हाथियों के आक्रमण से बचाव हेतु सर्वप्रथम लोगों को जागरूक किये जाने की आवश्कता है ताकि लोग हाथियों के प्राकृतिक आवासों में हस्तक्षेप करना बंद करें।
> हाथियों के आक्रमण के पश्चात् कई गाँवों में ढोल-नगाड़ों की आवाज, आग तथा मिर्च की गंध द्वारा उन्हें भगाने का प्रयास किया जाता है।
> झारखण्ड में आपदा प्रबंधन
> किसी भी प्रकार की आपदा से निपटने हेतु तीन चरणों में निपटने की व्यवस्था की जाती है - आपदा पूर्व व्यवस्था, आपदा के दौरान व्यवस्था तथा आपदा के बाद व्यवस्था ।
> आपदा पूर्व व्यवस्था में आपदा की तैयारी, इसका निवारण तथा इससे बचाव से संबंधित उपाय किए जाते हैं। 
> आपदा के लिए की जाने वाली तैयारी में आपदा का स्तर एवं प्रकृति, इसका पूर्वानुमान, चेतावनी तंत्र तथा इसके प्रति लोगों में जागरूकता को शामिल किया जाता है।
> आपदा के दौरान बचाव कार्य, लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाना तथा उनके लिए मूलभूत व्यवस्थाएँ जैसेभोजन, पानी, दवा, वस्त्र आदि की आपूर्ति पर बल दिया जाता है।
> आपदा के बाद की व्यवस्था के अंतर्गत प्रभावित लोगों का पुनर्वास, आपदा से क्षतिग्रस्त क्षेत्रों का पुनर्निर्माण तथा सामान्य जन-जीवन का पुनः संचालन को शामिल किया जाता है।
> भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया है। इसी परिप्रेक्ष्य में राज्य स्तर पर मुख्यमंत्रियों की अध्यक्षता में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तथा जिला स्तर पर जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया है।
> झारखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (JSDMA)
> झारखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन 28 मई, 2010 * को किया गया है। इस प्राधिकरण का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 14 (1) के आलोक में किया गया है । इस धारा के तहत राज्य के राज्यपाल को एक राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन करने की शक्ति * प्रदान की गयी है।
> राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है तथा इसमें अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं।
> इस प्राधिकरण का प्रमुख उद्देश्य आपदा नियंत्रण हेतु भिन्न-भिन्न स्तरों पर योजना एवं रणनीति का निर्माण करना तथा आपदा के पश्चात् पुनर्निर्माण एवं सामान्य जन-जीवन की बहाली के लिए उपयुक्त परियोजना का निर्माण करना है।
> झारखण्ड राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की सहायता के लिए एक राज्य कार्यकारी समिति का गठन किया गया है। जिसके अध्यक्ष राज्य के मुख्य सचिव हैं। यह समिति आपदा के संबंध में राष्ट्रीय नीति, राष्ट्रीय योजना और राज्य योजना के क्रियान्वयन एवं उनके बीच समन्वय स्थापित करता है।
> जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का मुख्य कार्य जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिए योजना, समन्वय एवं क्रियान्वयन हेतु कार्य करना है।
> झारखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के प्रमुख कार्य निम्नवत् हैं
> आपदा पर त्वरित कार्रवाई हेतु योजना तैयार करना।
> राज्य में आपदा के न्यूनीकरण हेतु ढाँचागत क्षमता का विकास करना। 
> राज्य, जिला, प्रखण्ड तथा पंचायत स्तर पर एक सूचना संपर्क नेटवर्क का विकास करना ताकि आपदा के दौरान जरूरी सूचनाओं को एकत्रित कर उस पर उचित कार्रवाई की जा सके।
> आपदा न्यूनीकरण हेतु भौगोलिक सूचना प्रणाली का विकास करना। 
> प्रशासनिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा अन्य संस्थाओं के बची समन्वय स्थापित करना।
> आपदा से बचाव हेतु उपयुक्त दिशा-निर्देशों का आम जनता के बीच जागरूकता का प्रचार-प्रसार करना। 
> प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करना । 
> झारखण्ड आपदा प्रबधंन योजना
> इस योजना के अंतर्गत अक्टूबर, 2004 में झारखण्ड राज्य आपदा विभाग का गठन किया गया है। जिसका प्रमुख कार्य आपदा से प्रभावित व्यक्तिों को त्वरित राहत पहुँचाना है।
> आपदा के दौरान राहत कार्य के समुचित संचालन हेतु एक राज्य आपदा कार्रवाई कोष का गठन किया गया है जिसमें 75 प्रतिशत हिस्सेदारी केन्द्र तथा 25 प्रतिशत राज्य सरकार की होती है।
> वर्ष 2009 में आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा राज्य आपदा प्रबंधन योजना तैयार की गई है। 
> राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत् राज्य एवं जिला स्तर पर सभी जिलों में आपातकालीन ऑपरेशन सेंटर का गठन किया जा रहा है तथा इसे वी-सैट उपग्रह से जोड़ा जा रहा है।
> वर्ष 2005 में देश में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 को लागू किया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकारों को आपदा प्रबंधन योजनाओं को तैयार करने, आपदा से बचाव हेतु समुचित उपाय करने, विकास योनाओं में आपदाओं के निवारण अथवा रोकने के उपायों पर विचार करने, निधियों को आवंटित करने, चेतावनी प्रणाली स्थापित करने तथा आपदा प्रबंधन से संबंधित विभिन्न एजेंसियों की सहायता करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया है।
> आपदा के दौरान राहत एवं बचाव कार्य हेतु राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2006 में राष्ट्रीय आपदा कार्रवाई बल ( NDRF) का गठन किया गया है। इसी प्रकार राज्यों द्वारा राज्य स्तर पर राज्य आपदा कार्रवाई बल (SDRF) का गठन किया जाता है।
> वर्ष 2005 से श्रीकृष्ण लोक प्रशासन संस्थान, राँची द्वारा आपदा केन्द्र प्रबंधन का संचालन किया जा रहा है जिसका प्रमुख कार्य आपदा के संबंधित विभिन्न पहलुओं के प्रति प्रशिक्षण प्रदान करना है। इस संस्थान को राज्य सरकार द्वारा प्रशिक्षण से संबंधित कार्यक्रमों के संचालन हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
> वर्ष 2015 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के सहयोग से राज्य में 'विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम का संचालन किया गया है।
> आपदा के समय दूर संवेदन, कार्टोग्राफी तथा अंतरिक्ष से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाओं को साझा करने हेतु सरकार द्वारा झारखण्ड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर की स्थापना की गयी है।
> राज्य में आपदा की पूर्व जानकारी तथा इससे जुड़ी समस्याओं की जानकारी एवं उनके प्रभाव को न्यून करने हेतु 'आपदा प्रबंधन ज्ञान - सह-प्रदर्शन केन्द्र' ( सृजन) विभाग का विकास किया जा रहा है जिसके लिए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (सूखा हेतु), भारतीय खनन स्कूल, धनबाद ( खनन आपदा हेतु), बी. आई.टी., मेसरा (भूकंप हेतु) तथा जे. सैक (बाढ़, सूखा एवं जंगल में आग हेतु) शैक्षणिक एवं तकनीकी कार्यों का संचालन कर रहे हैं।
> मेकॉन, राँची औद्योगिक आपदा जोखिम प्रबंधन से संबंधित गविविधियों को संचालित करती है । 
> आपदा प्रबंधन ज्ञान-सह-सूचना प्रदर्शन केन्द्र (सृजन)
> इसकी स्थापना झारखण्ड आपदा प्रबंधन योजना के तहत की गयी है। 
> इसका प्रमुख कार्य समुदाय एवं आम जनता को विभिन्न प्रकार के संभावित आपदाओं एवं उनसे होने वाली हानी के संबंध में जागरूक करना है। साथ ही इसके माध्यम से आपदा के प्रभावों को कम करने हेतु विभिन्न तकनीकों एवं उपकरणों से भी अवगत कराया जाता है। 
> इन केन्द्रों का विकास विशेष आपदाओं यथा- बाढ़, सूखा, खनन आपदा, जंगलों में आग आदि के अनुरूप पर किया गया है। 
> ये केन्द्र स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर सूचना प्रदान करने, संचार, प्रसार प्रविधियों तथा जागरूकता  के प्रसार के उपकरण के रूप में कार्य करते हैं।
> जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन (DDMA)
> जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन हेतु राज्य के सभी 24 जिलों में जिला दंडाधिकारी (District Magistrate) या जिला समाहर्त्ता (District Collector) या उपायुक्त (Deputy Commissioner ) की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया गया है। अन्य सदस्यों में मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जल एवं सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता, पशु चिकित्सा पदाधिकारी और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि सदस्य शामिल हैं।
> इस समिति का प्रमुख कार्य जिला की आवश्यकता के अनुसार जिला आपदा योजना तैयार करना तथा आपदा के दौरान इसका क्रियान्वयन करना है।
> यह समिति जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन टीम को प्रशिक्षित करने में मदद करती है तथा विभिन्न माध्यमों से आम जनता में आपदा से बचने के उपायों का प्रचार-प्रसार करती है ।
> प्रखण्ड (ब्लॉक) स्तर पर आपदा प्रबंधन
> ब्लॉक स्तर पर एक आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया जाता है जिसका अध्यक्ष प्रखण्ड विकास पदाधिकारी होता है। अन्य सदस्यों में समाज कल्याण पदाधिकारी, स्वास्थ्य अधिकारी, ग्रामीण जलापूर्ति अधिकारी, पुलिस अग्निशमन सेवाओं के अधिकारी, गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि तथा वरिष्ठ नागरिक शामिल होते हैं।
> यह समिति प्रखण्ड की जरूरतों के अनुरूप आपदा प्रबंधन की योजना का निर्माण तथा उसके क्रियान्वयन में जिला प्रशासन को मदद करती है।
> यह समिति आपदा से बचने हेतु आम लोगों को कृत्रिम तरीके से पूर्वाभ्यास (मॉक ड्रिल) कराती है तथा आम जनता के बीच आपदा से निपटने के उपायों का प्रचार-प्रसार करती है ।
> ग्राम स्तर पर आपदा प्रबंधन
> ग्राम स्तर पर एक आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया जाता है जिसका अध्यक्ष ग्रामसभा का मुखिया होता है। 
> यह समिति गाँव के स्तर पर आपदा प्रबंधन की योजना के निर्माण तथा उसके क्रियान्वयन का कार्य करती है ।
> यह समिति आपदा से बचने हेतु आम लोगों को कृत्रिम तरीके से पूर्वाभ्यास (मॉक ड्रिल) कराती है तथा आम जनता के आपदा से निपटने के उपायों का प्रचार-प्रसार करती है ।
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Sat, 09 Sep 2023 10:44:40 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में पर्यावरण संबंधी तथ्य https://m.jaankarirakho.com/325 https://m.jaankarirakho.com/325 > हमारे चारों ओर जैविक तथा अजैविक घटकों से निर्मित वातावरण को पर्यावरण कहा जाता है। इसके जैविक घटकों में सूक्ष्म जीवों से लेकर सभी जीव-जन्तु तथा पेड़-पौधे शामिल हैं। अजैविक घटकों में सभी निर्जीव तत्व जैसे- वायु, जल, मृदा, पर्वत, पठार, चट्टान आदि और उनसे जुड़ी गतिविधियाँ शामिल हैं।
> पर्यावरण को मुख्यतः प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक/मानवनिर्मित पर्यावरण में वर्गीकृत किया जा सकता है।
> प्राकृतिक पर्यावरण के अंतर्गत पर्यावरण के ऐसे घटकों को शामिल किया जाता है, जिनका निर्माण प्रकृति द्वारा किया गया है जैसे- वायु, जल, मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु आदि । अर्थात् मानवीय क्रियाकलापों द्वारा अविक्षुब्ध पर्यावरण प्राकृतिक पर्यावरण कहलाता है।
> प्राकृतिक पर्यावरण में मानवीय हस्तक्षेप द्वारा होने वाले परिवर्तन को सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है। उद्योगों का विकास, नगरीकरण, परिवहन व्यवस्था, कृषि आदि सांस्कृतिक पर्यावरण के अंग हैं।
> मानव द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण में लगातार हो रहे हस्तक्षेपों ने विश्व जगत के सामने प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास और विभिन्न प्राकृतिक आपदा की समस्या उत्पन्न कर दी है, जिसके समाधान हेतु उचित कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
> पर्यावरण प्रदूषण
> हमारे पर्यावरण में अवांछित तत्वों का प्रवेश पर्यावरण प्रदूषण कहलाता है। इन अवांछित तत्वों को प्रदूषक कहा जाता है। प्रदूषक ठोस, द्रव तथा गैस पदार्थ के रूप में अथवा ध्वनि, उष्मा, रेडियोधर्मिता आदि ऊर्जा के रूप में हो सकते हैं।
> प्रदूषक के प्रकार तथा स्रोत के आधार पर प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं, जैसे – 
1. वायु प्रदूषण
2. जल प्रदूषण
3. मृदा प्रदूषण
4. ध्वनि प्रदूषण
5. ताप प्रदूषण
1. वायु प्रदूषण
> वातावरण में विभिन्न प्रकार के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक तत्वों के मिश्रण के परिणामस्वरूप वायुमंडल में उपस्थित गैसों की मात्रा या अनुपात में असंतुलन होना वायु प्रदूषण कहलाता है। ।
> वर्तमान समय में मानवकृत विकास द्वारा उत्सर्जित प्रदूषकों ने वायु प्रदूषण में सर्वाधिक वृद्धि की है।
>  वायु प्रदूषण हेतु जिम्मेदार प्रमुख कारण निम्नवत् हैं
> मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जंगलों की अंधाधुंध कटाई, जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरण में ऑक्सीजन की मात्रा में कमी आती हैं, वहीं दूसरी ओर कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि होती है। 
> उद्योगों तथा वाहनों से निकलने वाले धुएँ एवं प्रदूषक, जिसमें सल्फर के ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, कार्बन मोनोक्साइड, कार्बन डाई आक्साइड जैसी हानिकारक गैसें शामिल हैं। 
> कृषि कार्य में दलदली भूमि से मिथेन का उत्सर्जन, जो एक प्रमुख हरित गृह गैस है। 
> हरित गृह प्रभाव में वृद्धि
> हरित गृह प्रभाव में वृद्धि के लिए कार्बन डाई ऑक्साइड गैस की बढ़ती मात्रा सर्वाधिक जिम्मेदार है। जलावन की लकड़ी को प्रयोग, जीवाश्म ईंधन का प्रयोग तथा अन्य कार्यों हेतु वृक्षों का कटाव इसके प्रमुख कारण हैं।
> इसके अतिरिक्त मिथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, हाइड्रोफ्लोरो कार्बन, सल्फर के ऑक्साइड व नाइट्रोजन के आ. क्साइड हरित गृह गैस में शामिल किए जाते हैं।
> हरित गृह गैसों के प्रभाव में वृद्धि परिणामस्वरूप पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि हुई है जिसने भूमण्डलीय उष्मण जैसी समस्या को जन्म दिया है।
> भूमण्डलीय उष्मण
> भूमण्डलीय उष्मण के प्रभावस्वरूप जहाँ पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि हुई है, वहीं वायुमंडलीय आर्द्रता की अधिकता के कारण वर्षा की मात्रा में भी वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप उष्णकटिबंधीय चक्रवात की आवृत्ति एवं तीव्रता में वृद्धि के कारण तटीय तथा तटों से संबंधित क्षेत्रों में चक्रवातीय वर्षा होती है। लगभग प्रत्येक वर्ष बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न चक्रवातीय वर्षा का प्रभाव झारखण्ड राज्य में भी होता है, जिसके परिण मस्वरूप कई बार जानमाल की हानि तक हो जाती है।
> भूमंडलीय उष्मण के परिणामस्वरूप जलधाराओं के प्रतिरूप में परिर्वतन होता है। इसके कारण एल-नीनो की उत्पत्ति एवं समय अंतराल में कमी आयी है। इसका प्रभाव भारत की मानसूनी जलवायु पर पड़ा है तथा इसने भारत की कृषि व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।
> ओजोन क्षरण
> हमारे वायुमंडल में ओजोन परत सूर्य से आनेवाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर हमें चर्म कैंसर तथा अन्य गंभीर रोगों से बचाने हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है।
> हाल के वर्षों में क्लोरोफ्लोरो कार्बन की मात्रा में वृद्धि के परिणामस्वरूप ओजोन मंडल का ह्रास हुआ है, जिसे ओजोन क्षरण के नाम से जाना जाता है।
> ओजोन क्षरण के परिणामस्वरूप पराबैंगनी किरणों की तीव्रता में वृद्धि हुई है जिसने भूमण्डलीय उष्मण की दर को बढ़ाने के साथ-साथ वनस्पति जगत के प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है ।
> झारखण्ड जैसे वनस्पति बाहुल्य राज्य में भी इसके नकारात्मक प्रभाव परिलक्षित होते हैं। इसने वनस्पति की उत्पादकता को कम कर पारिस्थितिकी तंत्र को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप जैव विविधता का ह्रास हुआ है।
> इसके अतिरिक्त ओजोन क्षरण जैविक घटकों की आनुवंशिक संरचना में परिवर्तन कर आनुवंशिक गुणों को ह्रास करता है जिसके परिणामस्वरूप जैविक समुदाय की प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
> वर्तमान समय में मानव समुदाय को त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद तथा आँख व त्वचा से संबंधित अन्य बिमारियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिए ओजोन क्षरण प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। 
> अम्लीय वर्षा
> जीवाश्म ईंधन के बढ़ते प्रयोग से वायुमंडल में सल्फर तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो अम्लीय वर्षा के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।
> झारखण्ड राज्य में वनों पर आधारित जनजातीय समुदाय तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन जैसे- जलावन के लिए लकड़ी का प्रयोग के प्रति जागरूकता का अभाव है।
> साथ ही नए राज्य के निर्माण के पश्चात् राज्य में वाहनों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई जिसमें जीवाश्म ईंधन यथा- डीजल व पेट्रोल का प्रयोग किया जाता है।
> अम्लीय वर्षा के दुष्परिणाम –
> मृदा की अम्लीयता में वृद्धि के कारण उर्वरता में कमी।
> जल प्रदूषण के कारण जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव तथा जैव विविधता का ह्रास। 
> ऐतिहासिक इमारतों में रासायनिक परिवर्तन के फलस्वरूप क्षरण ।
2. जल प्रदूषण
> जल में घुलनशील अथवा अघुलनशील पर्दाथों की मात्रा में वृद्धि के कारण जब जल की गुणवत्ता जैसे- रंग, स्वाद आदि में परिवर्तन आता है, तो उसे 'जल प्रदूषण' कहा जाता है। 
> जल प्रदूषण के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण निम्नवत् हैं
> विभिन्न जल स्रोतों में दैनिक जीवन में प्रयुक्त अपशिष्ट पदार्थो जैसे- मल-मूत्र, प्लास्टिक, कचरे, डिटर्जेंट आदि का प्रवाह । 
> जल स्रोतों में उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थो जैसे- रसायन, कचरे, अम्ल तथा क्षार आदि का प्रवाह ।
> कृषि कार्यों में प्रयुक्त कीटनाशकों तथा रसायनों का वर्षा जल में घुलकर नदियों में मिलना।
> जल प्रदूषण के परिणामस्वरूप एक अशुद्ध पेयजल की समस्या उत्पन्न होती है, जो मानवीय स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। साथ ही अशुद्ध जल मृदा घुलकर उसकी उर्वरता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है, जिसके परिणामस्वरूप जैव विविधता का ह्रास होता है।
3. मृदा प्रदूषण
> मृदा के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों में होने वाला अवांछनीय परिवर्तन 'मृदा प्रदूषण' कहलाता है।
> मृदा प्रदूषण के परिणामस्वरूप मृदा की गुणवत्ता में कमी होती है, जिसके परिणामस्वरूप वनस्पति की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
> मृदा प्रदूषण एक ओर जहाँ मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, वहीं दूसरी ओर इसका नकारात्मक प्रभाव जैव विविधता पर भी पड़ता है।
> मृदा प्रदूषण के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण हैं
>> प्लास्टिक की थैलियों का प्रयोग। 
>> रसायनों एवं कीटनाशकों का प्रयोग।
>> वन अपरोपण के कारण मृदा का ह्रास ।
>> जल प्रदूषण। 
4. ध्वनि प्रदूषण
> ध्वनि की ऐसी मात्रा जो अवांछनीय तरीके से जीव-जन्तुओं के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करता है।
> वैश्विक स्तर पर दिन के समय 45 डेसीबल तथा रात में 35 डेसीबल से अधिक ध्वनि को मानवीय स्वास्थ्य हेतु अनुपयुक्त माना जाता है।
> ध्वनि प्रदूषण के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण निम्नवत् हैं –
>> मानव द्वारा उत्पन्न शोरगुल जिसमें उद्योगों, परिवहन, मनोरंजन के लिए निकाले गये ध्वनि शामिल हैं। 
>> प्राकृतिक रूप से आँधी - तुफान, वर्षा, बिजली, तुफान, चक्रवात आदि के कारण उत्पन्न ध्वनि। 
5. ताप प्रदूषण 
> जीवाश्म ईंधन तथा नाभिकीय ऊर्जा हेतु संचालित संयंत्रों को ठंडा रखने हेतु प्रयुक्त जल, जिसका तापमान अधिक होता है, के कारण ताप प्रदूषण उत्पन्न होता है। 
> इस प्रकार के प्रदूषण से पर्यावरण के साथ-साथ जीव-जन्तुओं के स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है।
> जलवायु परिवर्तन
> जलवायु परिवर्तन का तात्पर्य हमारी जलवायु में एक निश्चित समय के पश्चात् होने वाले परिवर्तन से है। सामान्यतः इसके लिए 15 वर्ष की समय सीमा का निर्धारण किया जाता है।
> वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन हमारे समक्ष एक गंभीर चुनौती के रूप में उभरा है, जिसने जैवमण्डल के अस्तित्व पर एक प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
> जलवायु परिवर्तन के लिए कई प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं जिनमें हरित गृह गैसों की मात्रा में वृद्धि, ओजोन क्षरक की मात्रा में वृद्धि तथा अम्लीय वर्षा के लिए उत्तरदायी तत्वों की मात्रा में वृद्धि प्रमुख हैं।
> जलवायु परिवर्तन ने हमारे समक्ष निम्न समस्याओं को उत्पन्न किया है –
>> इसके परिणामस्वरूप निम्न अक्षांशीय क्षेत्रों के आर्द्र जलवायु प्रदेश में वायुमंडलीय आर्द्रता की मात्रा में वृद्धि के कारण वर्षा की मात्रा में वृद्धि होगी। साथ ही इस क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय चक्रवात की आवृत्ति और तीव्रता में भी वृद्धि होगी। इसके फलस्वरूप अधिक वर्षा के कारण बाढ़ की समस्या उत्पन्न होगी। 
>> वहीं दूसरी ओर शुष्क और अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेशों में वाष्पीकरण का दर अधिक होने के कारण जलीय स्रोतों के सूख जाने की संभावना है जिसके कारण सूखा के प्रभाव नजर आ सकते हैं। 
>> मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में वाताग्री चक्रवात के विकास के कारण बाढ़ की समस्या तथा उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में हिमगलन से जलभराव तथा समुद्र जलस्तर में वृद्धि की समस्याएँ बढ़ जाएंगी।
> जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को देखते हुए वैश्विक स्तर पर निम्न प्रयास किए गए हैं – 
>> सन् 1979 में पहली बार स्वीट्जरलैंड के जेनेवा में जलवायु सम्मेलन का आयोजन किया गया। वर्ष 1990 में दूसरी बार जलवायु सम्मेलन का आयोजन किया गया।
>> सन् 1985 में आस्ट्रिया के वियना में वियना कन्वेंशन का आयोजन किया गया जिसमें ओजोन क्षरण हेतु उत्तरदायी पदार्थों (क्लोरोफ्लोरो कार्बन एवं मिथाइल ब्रोमाइड) के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का विचार किया गया। 
>> 16 सितम्बर, 1987 को कनाडा के मांट्रियल में क्लोरोफ्लोरो कार्बन पर प्रतिबंध लगाने हेतु एक बाध्यकारी समझौता किया गया ताकि ओजोन क्षरण को रोका जा सके। इसी कारण 16 सितंबर को प्रतिवर्ष ओजोन संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है। 
>> वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो में पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन किया गया इसमें 'यूनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' का गठन किया गया।
>> वर्ष 1994 से वैश्विक स्तर पर कोप सम्मेलन का आयोजन प्रारंभ किया गया।
>> वर्ष 1997 में जापान के क्योटो कार्बन उत्सर्जन की कटौती को लेकर एक बाध्यकारी समझौता किया गया जिसे ‘क्योटो प्रोटोकॉल' के नाम से जाना जाता है। 
> झारखण्ड राज्य में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की सहायता से एक राज्य जलवायु केन्द्र की स्थापना की गयी है।
> राज्य में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय योजना को 30 जून, 2008 को जारी किया गया था जबकि वर्ष 2013 * में राज्य में 'जलवायु परिवर्तन पर झारखण्ड कार्य योजना' (SAPCC) का प्रकाशन किया गया। इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य का सरायकेला-खरसावां जिला सर्वाधिक संवेदनशील जिला * है।
> जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत (NAPCC) के तहत राज्य के सरायकेला-खरसावां  को ग्रीन इण्डिया मिशन हेतु चुना गया है।
> CCKN-IA
> भारतीय कृषि में जलवायु परिवर्तन नॉलेज नेटवर्क (CCKN-IA) की शुरूआत वर्ष 2013 में की गयी है। 
> इस पहल का प्रमुख उद्देश्य नवोन्मेष सूचना एवं संचार तकनीक आधारित प्लेटफार्म का प्रयोग करने हेतु कृषि मंत्रालय के साथ सहयोग करना है। 
> भारत में इसे झारखण्ड, महाराष्ट्र तथा ओडिसा तीन राज्यों में प्रारंभ किया गया है।
> जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से झारखण्ड राज्य भी अछूता नहीं है ।
> राज्य की कुल भूमि के 23 प्रतिशत भाग पर कृषि कार्य किया जाता है। राज्य की कृषि मूलतः मानसूनी जलवायु पर आधारित है।
> भारत के 15 कृषि जलवायु प्रदेशों में तीन कृषि जलवायु प्रदेश झारखण्ड राज्य में स्थित हैं। इनमें मध्य एवं उत्तरी-पूर्वी पठारी उप- कृषि जलवायु प्रदेश, पश्चिमी पठारी उप-कृषि जलवायु प्रदेश तथा दक्षिणी-पूर्वी पठारी प - कृषि जलवायु प्रदेश शामिल हैं। उप
> झारखण्ड राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 17 प्रतिशत है तथा राज्य की 70 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आजीविका हेतु कृषि पर निर्भर है।
> राज्य में औसत वार्षिक वर्षा 1149.3 मिमी. है जिसका 83 प्रतिशत दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से प्राप्त होता है। 6.5 प्रतिशत वर्षा की प्राप्ति लौटते हुए मानसून से, 4 प्रतिशत पश्चिमी विक्षोभ के कारण तथा शेष 6.5 प्रतिशत मानसून पूर्व की वर्षा द्वारा प्राप्त होती है।
> पिछले 100 वर्षों में झारखण्ड क्षेत्र में 150 मिमी. वर्षा की मात्रा में कमी आयी है जो जलवायु परिवर्तन का परिणाम है।
> जलवायु परिवर्तन ने राज्य की कृषि उत्पादकता, कृषि दक्षता तथा कृषि प्रतिरूप को प्रभावित किया है।
> झारखण्ड में पर्यावरण संरक्षण
> झारखण्ड राज्य अपनी जलवायु तथा जैव-विविधता हेतु राष्ट्रीय स्तर पर प्रख्यात है। राज्य के जंगलों में विभिन्न प्रकार के पेड़, औषधीय पौधे, जड़ी-बूटी तथा फल-फूल के वृक्ष-पौधे पाये जाते हैं।
 > राज्य के नेतरहाट, पिठोरिया घाटी, सारंडा के जंगल, पारसनाथ पहाड़ी, दालमा पहाड़ी, हजारीबाग के वन, पलामू के वन आदि जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत संपन्न हैं।
> पिछले वर्षों में लगातार बढ़ते प्रदूषण ने राज्य की जैव विविधता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। राज्य में जानवरों की विलुप्त होती प्रजातियाँ तथा महत्वपूर्ण पेड़-पौधों की संख्या में कमी इसके उदाहरण हैं।
> राज्य में विकास कार्यक्रमों को गति देने हेतु उद्योगों की स्थापना, सड़कों का निर्माण, कृषि कार्य का विस्तार आदि के कारण वृक्षों की व्यापक पैमाने पर कटाई की जा रही है। परिणामतः पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ जैव विविधता का भी ह्रास हुआ है।
> राज्य में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा प्राकृतिक संसाधनों, वन्य जीव तथा जैव विविधता के संरक्षण हेतु तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। विभाग द्वारा इस हेतु व्यापक पैमाने पर वनरोपण, वन संरक्षण हेतु जागरूकता अभियान तथा प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु विधिक उपाय किए जा रहे हैं।
> पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न होने के कारण विलुप्त होने वाले जीव-जंतुओं में गिद्धों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। राज्य में गिद्ध की तीन प्रजातियाँ जिप्स बेंगलेंसिस, जिप्स इंडिकस तथा आजिप्शियन पायी जाती है। इनकी विलुप्ति का प्रमुख कारण डाईक्लोफेनेक नामक दर्द निवारक दवा है, जिसका प्रयोग पशुओं के इलाज में किया जाता है। साथ ही गिद्धों के प्राकृतिक आवास मुख्यतः पेड़ों की कटाई भी इनकी संख्या में कमी का एक महत्वपूर्ण कारक है।
> राज्य में वनाच्छादित क्षेत्रों की वृद्धि हेतु वर्ष 2015 मे 'मुख्यमंत्री जन वन योजना' की शुरूआत की गई है। इसके माध्यम से निजी भूमि पर वृक्षारोपण हेतु लोगों को प्रोत्साहित किया जाता है। इस योजना के तहत लोगों को प्रोत्साहन राशि के रूप में वृक्षारोपण एवं उसके रख-रखाव पर हुए व्यय का 75 प्रतिशत हिस्से की प्रतिपूर्ति वन विभाग द्वारा की जाती है।
> राज्य सरकार द्वारा इको-फ्रेंडली तरीकों को प्रोत्साहित करने हेतु 'इको-टूरिज्म नीति (2015) ' को अधिसूचित किया गया है। इसके तहत राज्य सरकार द्वारा प्रथम चरण में साहेबगंज में फॉसिल पार्क, गिरिडीह में पारसनाथ, हजारीबाग में कैनहरी हिल, देवघर में त्रिकुट पर्वत, कोडरमा में तिलैया डैम, पलामू में व्याघ्र परियोजना, लातेहार में नेतरहाट तथा जमशेदपुर में दालमा गज अभ्यारण्य को विकसित किया जा रहा है।
> साथ ही राज्य में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने हेतु स्थानीय गाँवों में लोगों को 'नेचर गाइड' के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आय में भी वृद्धि की जा सके।
> राज्य सरकार ने सूखे की समस्या से निपटने हेतु मनरेगा के तहत डोभा निर्माण कार्य प्रारंभ किया है, जिसमें वर्षा जल को संचित किया जा सकेगा। इस कार्य हेतु वर्ष 2016-17 के बजट में 200 करोड़ रूपये का विशेष प्रावधान किया गया है। पूरे राज्य में इस वित्तीय वर्ष में 6 लाख डोभा निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
> राज्य सरकार द्वारा ठोस कचरा प्रबंधन हेतु राँची, पाकुड़, धनबाद तथा चाकुलिया में पीपीपी मोड पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट योजना को मंजूरी प्रदान की गई है।
> वन अधिकार अधिनियम के तहत वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति तथा वनवासी को वन भूमि का पट्टा वितरित किया जा रहा है। यह पट्टा 2006 से पूर्व से वनों में रह रहे वनवासियों को प्रदान किया जाएगा।
> राज्य के शहरी क्षेत्रों में मनोरंजन पार्क का निर्माण कराया जा रहा है तथा इसके माध्यम से शहरी क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन के विभिन्न पहलुओं से लोगों को परिचित कराकर उनमें इन विषयों के प्रति जागरूकता का प्रसार किया जा रहा है।
> राज्य में अधिकाधिक लोगों को लाह की खेती से संबद्ध करने की सरकार की योजना है। इसके लिए लाह के उत्पादन एवं इस पर आधारित स्वरोजगार हेतु राज्य के कई जिलों यथा - राँची, खूँटी, पश्चिमी सिंहभूम, सिमडेगा, गुमला, लातेहार, पलामू आदि का चयन किया गया है। इन जिलों में वन प्रबधंन समिति तथा स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लाह की खेती को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है ।
> जापान की हिताची कंपनी को राज्य में ठोस कचरा पर आधारित बिजली उत्पादन हेतु संयंत्र लगाने हेतु सहमति प्रदान की गई है।
> राँची नगर निगम द्वारा सफाई व्यवस्था का कार्य अगले 25 वर्षों के लिए निजी कंपनी 'एस्सेल इंफ्रा' को सौंपा गया है।
> भारत सरकार द्वारा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के नियंत्रण हेतु आठ मिशनों की घोषणा की गई है। इस हेतु राज्य सरकार ने विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय बनाने के लिए 'झारखण्ड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य इकाई' की स्थापना करने का निर्णय लिया है।
> झारखण्ड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य इकाई राज्य में पर्यावरण संतुलन को बनाए रखते हुए आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन तथा जीविका के साधनों की उपलब्धता पर बल दे रहा है। यह इकाई राज्य में जलवायु परिवर्तन से संबंधित मुद्दों को ध्यान में रखते हुए कार्य करेगी ।
> राज्य में तापमान एवं वर्षा में परिवर्तनशीलता के कारण कृषि तथा अन्य क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक राज्य में 2020 से 2050 के बीच राज्य में ग्रीष्म ऋतु में अधिकतम तापमान 2-3 डिग्री तक तथा शीत ऋतु में 4-5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की संभावना है।
> इस संदर्भ में झारखण्ड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य इकाई ने जलवायु परिवर्तन से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने, अति संवेदनशील क्षेत्रों के मानचित्र तैयार करने, कोयला एवं खनन उद्योग द्वारा होने वाले पर्यावरण प्रदूषण की मात्रा को नियंत्रित करने तथा प्रभावित क्षेत्रों को संबंधित नीतियों एवं योजनाओं में शामिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
> राज्य में प्रदूषण नियंत्रण तथा इससे संबंधित मामलों पर नियंत्रण रखने हेतु झारखण्ड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) की स्थापना 2001 में की गई है।
> यह एक नियामक निकाय है, जो उद्योगों को पर्यावरण सरंक्षण हेतु उच्च तकनीकों के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करता है।
> राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2012 में झारखण्ड ऊर्जा नीति की घोषणा की गई है जिसका मुख्य उद्देश्य गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के विकास को प्रोत्साहित करना है ।
> नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विकास को प्रोत्साहित करने हेतु राज्य में 2001 में 'झारखण्ड नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी' (JREDA - Jharkhand Renewable Energy Development Agency) का गठन किया गया है। 
> राज्य सरकार द्वारा जल संसाधनों के उचित प्रबंधन हेतु वर्ष 2011 में झारखण्ड राज्य जल नीति-2011 लागू की गई है। इस नीति का निर्माण राज्य में प्राकृतिक आपदा के प्रति भेद्यता को कम करने के उद्देश्य से बनाया गया है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:42:23 +0530 Jaankari Rakho
बहुद्देशीय नदी घाटी नदी घाटी परियोजना https://m.jaankarirakho.com/324 https://m.jaankarirakho.com/324 > वैसी परियोजनाएँ जो एक से अधिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निर्मित की जाती हैं, उन्हें बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजना कहा जाता है।
> इन परियोजनाओं के अंतर्गत नदियों पर बाँध बनाकर सिंचाई के साथ-साथ बाढ़ नियंत्रण, जल विद्युत उत्पादन, मत्स्यन आदि का कार्य संपन्न किया जाता है।
> झारखण्ड में बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ 
1. दामोदर नदी घाटी परियोजना
> यह भारत की पहली बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजना है जिसे 1948 ई. में प्रारंभ किया गया। 
> यह झारखण्ड एवं पश्चिम बंगाल  की संयुक्त परियोजना है।
> यह परियोजना अमेरिका की टेनेसी घाटी परियोजना से प्रेरित है।
> इस परियोजना के संचालन हेतु 7 जुलाई, 1948 ई. को दामोदर घाटी निगम (DVC) की स्थापना * की गई थी जिसका मुख्यालय कोलकाता में है।
> इस परियोजना के अंतर्गत 8 बड़े बाँध, 
> तिलैया , मैथन  एवं बाल पहाड़ी (दामोदर की सहायक बराकर नदी पर) 
> पंचेत , अय्यर एवं बेरमो ( दामोदर नदी पर )
> बोकारो (दामोदर की सहायक बोकारो नदी पर) एवं कोनार (कोनार नदी पर)
> दामोदर घाटी परियोजना के 4 प्रमुख बाँध
> इस परियोजना से 1200 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जाता है।
> इस परियोजना से 8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जाती है।
2. स्वर्णरेखा नदी परियोजना
> 1982-83 ई. में प्रारंभ यह झारखण्ड, पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा की संयुक्त परियोजना है।
> यह परियोजना विश्व बैंक के सहयोग से चलायी जा रही है।
> इस परियोजना के तहत स्वर्णरेखा नदी पर चांडिल बाँध  ( सरायकेला-खरसावां ) एवं गोलूडीह बाँध (पूर्वी सिंहभूम) तथा खरकई नदी पर ईचा बाँध (पश्चिमी सिंहभूम) एवं गजिया बाँध ( पूर्वी सिंहभूम) बनाया जाना है। इसके अतिरिक्त इस पर पालना बाँध ( सरायकेला-खरसावां) का निर्माण भी किया जा रहा है। 
> इस परियोजना के तहत हुंडरू जलप्रपात से लगभग 200 मेगावाट विद्युत उत्पादन किया जा रहा है।
3. मयूराक्षी परियोजना
> यह झारखण्ड एवं पश्चिम बंगाल की संयुक्त परियोजना है। 
> इस परियोजना के तहत मयूराक्षी नदी पर दुमका के मसानजोर नामक स्थान पर मसानजोर बाँध / कनाडा बाँध ( कनाडा के सहयोग से) बनाया गया है। 
4. उत्तरी कोयल परियोजना
> इस परियोजना के तहत गढ़वा जिले के कुटकू नामक स्थान पर एक बाँध एवं विद्युत गृह निर्मित किया जाना है। 
> इस परियोजना से गढ़वा तथा पलामू जिले को सिंचाई की सुविधा प्रदान किए जाने के साथ ही विद्युत उत्पादन का कार्य भी किया जाएगा।
5. कोयल-कारो परियोजना
> यह परियोजना दक्षिणी कोयल नदी एवं उसकी सहायक कारो नदी पर अवस्थित है ।
> 2003 में इस परियोजना को आम जनता के विरोध के कारण बंद कर दिया गया।
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Sat, 09 Sep 2023 10:39:31 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की सिंचाई प्रणाली सिंचाई https://m.jaankarirakho.com/323 https://m.jaankarirakho.com/323 > झारखण्ड राज्य में कुल फसली भूमि का 15% भाग सिंचित है। 
> राज्य के देवघर जिले में पुनासी जलाशय परियोजना पूर्ण हो चुका है। पुनासी मुख्य नहर की लंबाई 72 किलोमीटर है।
> राज्य में कुल सिंचित भूमि का 58% भाग सतही जल द्वारा और 42% भाग भूमिगत जल द्वारा सिंचित होता है। 
> सिंचाई की सर्वाधिक आवश्यकता वाले जिले – साहेबगंज, गोड्डा, दुमका, गुमला 
> सिंचाई की उच्च आवश्यकता वाले जिले – देवघर, लोहरदगा, राँची एवं पश्चिमी सिंहभूम
> सिंचाई की मध्यम आवश्यकता वाले जिले –  गढ़वा, पलामू, हजारीबाग, गिरिडीह
> सिंचाई की निम्न आवश्यकता वाले जिले –  चतरा, बोकारो, धनबाद एवं पूर्वी सिंहभूम 
> झारखण्ड में सिंचाई के साधन 
> कुआँ
> यह सिंचाई का परंपरागत साधन है तथा झारखण्ड के कुल सिंचित क्षेत्र में कुआँ का योगदान लगभग 30% है।
> कुओं द्वारा सर्वाधिक सिंचाई झारखण्ड के गुमला जिले में (कुल सिंचित भूमि के 87.2% भाग पर) होती है। 
> इसके बाद क्रमशः गिरिडीह, राँची, धनबाद, हजारीबाग, पूर्वी सिंहभूम व पश्चिमी सिंहभूम जिले का स्थान है।
> तालाब 
> यह सिंचाई का सबसे पुराना साधन है तथा झारखण्ड के कुल सिंचित क्षेत्र में तालाब का योगदान लगभग 19% है। 
> तालाब द्वारा सर्वाधिक सिंचाई झारखण्ड के देवघर जिले में (कुल सिंचित भूमि के 49.3% भाग पर) होती है। 
> इसके बाद क्रमशः धनबाद, साहेबगंज, दुमका व गोड्डा जिलों का स्थान है। 
> नहर  
> यह सिंचाई का आधुनिक साधन है तथा झारखण्ड के कुल सिंचित क्षेत्र में नहरों का योगदान लगभग 18% है। 
> झारखण्ड के सिंहभूम एवं सरायकेला-खरसावाँ क्षेत्र में नहरों द्वारा सर्वाधिक सिंचाई की जाती है । 
> नलकूप
> यह सिंचाई का आधुनिक साधन है तथा झारखण्ड के कुल सिंचित क्षेत्र में नलकूप का योगदान लगभग 8% है। 
> नलकूप द्वारा झारखण्ड के लोहरदगा जिले में (कुल सिंचित भूमि का 32.6% ) सर्वाधिक सिंचाई की जाती है।
> इसके बाद क्रमशः पलामू, हजारीबाग व गिरिडी जिलों का स्थान है। 
> पठारी संरचना होने के कारण राज्य में अधिकांश भाग में चट्टानी संरचना पायी जाती है व कारण भूमिगत जल का स्तर भी कम पाया जाता है, जिसके यहाँ नलकूप द्वारा सिंचाई की संभावनाएँ अत्यंत कम हैं।
> झारखण्ड में सिंचाई परियोजनाएँ
1. वृहद् सिंचाई परियोजना
> 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र से अधिक सिंचाई व्यवस्था वाले परियोजना को वृहद् सिंचाई परियोजना कहते हैं।
2. मध्यम सिंचाई परियोजना
> 2,000 से 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की व्यवस्था वाले परियोजना को मध्यम सिंचाई परियोजना कहते हैं। 
> राज्य में 600 से अधिक मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ संचालित हैं। 
3. लघु सिंचाई परियोजना
> 2,000 हेक्टेयर क्षेत्र से कम में सिंचाई की व्यवस्था वाले परियोजना को लघु सिंचाई परियोजना कहते हैं। 
> राज्य सरकार द्वारा 'पहाड़ी क्षेत्र उद्वह सिंचाई निगम लिमिटेड' के माध्यम से विभिन्न लघु सिंचाई परियोजनाएँ चलायी जा रही हैं।
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Sat, 09 Sep 2023 10:38:21 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की कृषि https://m.jaankarirakho.com/322 https://m.jaankarirakho.com/322 > झारखण्ड की कुल भूमि के मात्र 23%।भाग पर कृषि कार्य किया जाता है।
> आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार राज्य के कुल सकल मूल्य वृद्धि में कृषि व संबद्ध क्षेत्र का योगदान लगभग 13% है, जबकि राज्य के कुल श्रमबल का 43% रोजगार हेतु इस क्षेत्र पर निर्भर है। 
> वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार झारखण्ड में 38 लाख हेक्टेयर भूमि पर कृषि कार्य संभव है जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 47.69% है।
> झारखण्ड में मुख्यतः तीन फसलों- धान, गेहूँ तथा मक्का की खेती की जाती है । धान झारखण्ड की सर्वप्रमुख फसल है तथा मक्का यहाँ की दूसरी प्रमुख फसल है।
> सिंचाई के साधनों की कमी के कारण यहाँ की कृषि वर्षा पर आधारित है। राज्य में शुद्ध बोये गये कृषि क्षेत्र के मात्र 15% पर ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध है।
> राज्य में सिंचाई का सर्वप्रमुख स्रोत कुआँ है ।
> झारखण्ड में कृषि की उन्नत तकनीकों का वृहद् प्रयोग संभव नहीं हो पाया है। इसका प्रमुख कारण उबड़-खाबड़ खेत, जोतों का छोटा आकार एवं बंजर जमीन है।
> राज्य में लगभग 17.38% परती भूमि पायी जाती है।
> राज्य में जोतों का औसत आकार प्रति व्यक्ति मात्र 1.17 हेक्टेयर है।
> राज्य में कुल बोये गये क्षेत्र के 78% हिस्से पर खरीफ फसल की खेती की जाती है।
> झारखण्ड राज्य के 17 जिले राष्ट्रीय बागवानी मिशन से आच्छादित हैं।
> झारखण्ड में जूट की ही भांति रेशेदार फसल के रूप में मेस्टा का उत्पादन किया जाता है। 
> राज्य के हजारीबाग जिले में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (ICAR), नई दिल्ली द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IIAR) की स्थापना प्रस्तावित है।
> खरीफ फसल
> मानसून के आगमन के समय अर्थात् जून-जुलाई में इन फसलों की बुआई की जाती है तथा मानसून की समाप्ति पर अर्थात् सितम्बर-अक्टूबर में इनकी कटाई की जाती है।
> प्रमुख खरीफ फसल धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंग, मूंगफली, गन्ना आदि हैं।
> खरीफ फसल को झारखण्ड में दो फसलों में बांटा जाता है - भदई तथा अगहनी ।
> भदई फसल वैशाख जेठ (मई-जून) में बोयी जाती है तथा इसे भादो (अगस्त-सितंबर) में काट लिया जाता है। 
> अगहनी फसल की बुआई जेठ-आषाढ़ (जून) में की जाती है तथा अगहन (दिसम्बर) में इसकी कटाई कर ली जाती है।
> झारखण्ड की कुल कृषिगत भूमि में से लगभग 78% भाग पर खरीफ फसलों की कृषि की जाती है। 
> झारखण्ड आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार राज्य में वर्ष 2019-20 की तुलना में 2020-21 में खरीफ फसल के उत्पादन में 4,60,000 टन वृद्धि का अनुमान है। 2018-19 की तुलना में 2019-20 में खरीफ फसल के उत्पादन में वृद्धि (7,71,000 टन) दर्ज की गयी है।
> झारखण्ड आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार वर्ष 2020-21 में कुल 1938.1 हजार हेक्टेयर क्षेत्र पर खरीफ फसलों की कृषि का अनुमान है तथा कृषि उत्पादकता 2539 किग्रा प्रति हेक्टयर का अनुमान है। 2019-20 में 1623.5 हजार हेक्टेयर क्षेत्र पर खरीफ फसलों की कृषि की गयी थी तथा कृषि उत्पादकता 2539 किग्रा प्रति हेक्टयेर रही है।
> राज्य में खरीफ फसल के कुल क्षेत्रफल (1938 हजार हेक्टयेर) के 84.7 प्रतिशत क्षेत्र पर धान तथा 14 प्रतिशत क्षेत्र पर मक्के की खेती की जाती है।
> वर्ष 2017-18 में धान का उत्पादन 5132 हजार टन हुआ था जो 2018-19 में कम होकर 2894 हजार टन रह गया (44% की कमी)। 2020-21 में इसके 3976 हजार टन रहने का अनुमान है।
> वर्ष 2017-18 में मक्का का उत्पादन 597 हजार टन हुआ था जो 2018-19 में कम होकर 455 हजार टन रह गया (24% की कमी) । 2020-21 में इसके 593 हजार टन रहने का अनुमान है। 
> रबी फसल
> रबी फसल को ठंडे मौसम की फसल या वैशाखी फसल भी कहा जाता है।
> रबी फसल अक्टूबर-नवंबर में बोयी जाती है तथा मार्च में काट ली जाती है।
> गेहूँ, जौ, चना, तिलहन आदि प्रमुख रबी फसलें हैं।
> झारखण्ड की कुल बोये गये क्षेत्र के लगभग 16% भाग पर रबी फसल की खेती की जाती है।
> राज्य का अधिकांश क्षेत्र पठारी होने के कारण गेहूँ तथा जौ की कृषि बारी भूमि या सिंचाई साधनों से युक्त क्षेत्रों में ही की जाती है।
> आर्थिक सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार वर्ष 2019-20 में 222.4 हजार हेक्टयेर क्षेत्र पर रबी फसल की कृषि की गयी तथा 455.4 हजार टन उत्पादन दर्ज किया गया। इस दौरान रबी फसल की उत्पादकता 2048 किग्रा प्रति हेक्टेयर रही।
> राज्य में कुल रबी फसलों की कृषि योग्य भूमि में से लगभग 90% क्षेत्र पर गेहूँ व चना की खेती की जाती है।
> जायद फसल
> राज्य के कुल कृषिगत भूमि के मात्र 0.17% भाग पर ही जायद फसल की खेती की जाती है।
> झारखण्ड में खाद्य सुरक्षा
> झारखण्ड आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अनुसार, राज्य की कुल भंडारण क्षमता 5.51 लाख मीट्रिक टन है, जबकि शीत भंडारण गृह (कोल्ड स्टोरेज) की भंडारण क्षमता 2 लाख मीट्रिक टन है।
> झारखण्ड आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अनुसार, राज्य में खाद्यान्न के भंडारण हेतु कुल डिपो/गोदाम की संख्या 256 है, जिसमें सर्वाधिक गोदाम राँची (21) तथा पश्चिमी सिंहभूम (18) में है।
> राज्य में सर्वाधिक पीडीएस डीलर राँची जिला में तथा सबसे कम लोहरदगा जिला में हैं। 
> राज्य सरकार के खाद्य, जन वितरण तथा उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा पीडीएस प्रणाली से जुड़े सूचनाओं की जानकारी उपलब्ध कराने हेतु 'आहार' नामक ऑनलाईन पोर्टल शुरू किया गया है। इस पोर्टल के द्वारा उपभोक्ताओं को पीडीएस डीलर, खाद्यान्न का स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा से जुड़े विभिन्न जानकारियाँ उपलब्ध होंगी। 
> राज्य में बच्चों तथा माताओं को पोषण सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से वर्ष 2019-20 व 2020-21 में 'पोषण अभियान' का संचालन किया गया।
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Sat, 09 Sep 2023 10:36:23 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में वन्य प्राणी संरक्षण https://m.jaankarirakho.com/321 https://m.jaankarirakho.com/321 > वन्य प्राणियों को संरक्षण प्रदान करने तथा उनका विकास करने हेतु झारखण्ड में विभिन्न वन्य प्राणी क्षेत्रों की स्थापना की गई है।
> झारखण्ड में 1 राष्ट्रीय उद्यान, 11 वन्य जीव अभ्यारण्य तथा कई जैविक उद्यान अवस्थित हैं। इनका विस्तार राज्य के 2.63% भू-भाग पर है जो राज्य के 9% संरक्षित वन क्षेत्र के दायरे में विस्तृत है। 
> 2001 ई. में केन्द्र सरकार द्वारा पूर्वी सिंहभूम जिला में देश का प्रथम गज आरक्ष्य (Elephant Reserve) स्थापित किया गया है।
> साहेबगंज जिला में राजमहल पहाड़ियों के आस-पास नेचर क्लब द्वारा राजमहल जीवाश्म उद्यान (Rajmahal Fossils Park) विकसित किया गया है।
> झारखण्ड सरकार द्वारा राज्य के वन्यजीव अभ्यारण्यों में 10 वर्ष की अवधि के लिए वन्यजीव प्रबंधन योजना की शुरूआत की गयी है।
1. राष्ट्रीय उद्यान (National Park)
> बेतला राष्ट्रीय उद्यान झारखण्ड का एक मात्र राष्ट्रीय उद्यान है जिसकी स्थापना 1986 ई. में की गई थी। 
> लातेहार जिला में स्थित यह उद्यान 226.33 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है। (Source - Jharkhand Economic Survey 2020-21)
> यहाँ 1932 ई. में विश्व की पहली बाघ गणना की गई थी।
> 1973-74 ई. से यहाँ भारत सरकार द्वारा बाघों के स्व-स्थाने संरक्षण (in-situ) हेतु बाघ परियोजना (Project Tiger) की शुरूआत की गई है।
> बाघों के संरक्षण हेतु यहाँ 'पलामू बाघ आरक्ष्य' की स्थापना की गयी है जो, झारखण्ड का एकमात्र टाईगर रिजर्व (बाघ आरक्ष्य) है। 
> यहाँ मुख्य रूप से बाघ, शेर, तेंदुआ, जंगली सूअर, चीतल, सांभर, गौर, चिंकारा, नीलगाय, भालू, बंदर, मोर, घनेश, वनमुर्गी आदि वन्य प्राणी पाये जाते हैं।
> बेतला का पूरा नाम है - बायसन, एलीफैंट, टाइगर, लियोपार्ड, एक्सिस - एक्सिस (BETLA - Bison, Elephant, Tiger, Leopard, Axis-Axis)
> पलामू बाघ आरक्ष्य
> इसका विस्तार 1,026 वर्ग किमी क्षेत्र में है। 
> इस आरक्ष्य में 47 स्तनपायी की प्रजातियाँ, 174 पक्षियों की प्रजातियाँ, 970 वनस्पतियों की प्रजातियाँ, 25 लताओं की प्रजातियाँ, 46 झाड़ीदार वनों की प्रजातियाँ, 17 प्रकार के घास तथा 139 औषधीय पौधों की प्रजातियाँ पायी जाती हैं। 
> इसके अतिरिक्त यहाँ बाघ एवं हाथी के अतिरिक्त वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 में शामिल 16 अन्य महत्वपूर्ण प्रजातियाँ भी पायी जाती हैं।
2. वन्य जीव अभ्यारण्य (Wild Life Sanctury )
> झारखण्ड में एकमात्र पलामू वन्यजीव अभ्यारण्य राष्ट्रीय स्तर का है तथा शेष सभी अभ्यारण्य राज्यस्तरीय हैं। यह राज्य का सबसे पुराना वन्यजीव अभ्यारण्य है।
> पलामू अभ्यारण्य राज्य का सबसे बड़ा अभ्यारण्य  है जिसका विस्तार 794 वर्ग किमी. क्षेत्र में है। इसके बाद क्रमशः लावालौंग अभ्यारण्य (207 वर्ग किमी.) तथा हजारीबाग अभ्यारण्य (186 वर्ग किमी.) का स्थान है। 
> दालमा वन्यजीव अभ्यारण्य (पूर्वी सिंहभूम) में 1992 ई. में एशियाई हाथियों के स्व-स्थाने सरंक्षण (in-situ) हेतु हाथी परियोजना (Project Elephant) प्रारंभ की गई है।
> 26 सितंबर, 2001 को सिंहभूम क्षेत्र में देश के प्रथम गज आरक्ष्य (एलीफैंट रिजर्व) की स्थापना की गयी थी। 
> इसका विस्तार 13,440 वर्ग किमी. क्षेत्र में पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम तथा सरायकेला-खरसावां जिले में है। 
> उधवा झील पक्षी विहार ( साहेबगंज) प्रवासी पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ साइबेरिया सहित विश्व के विभिन्न पक्षी आते हैं।
> राज्य के लातेहार जिले में अवस्थित महुआडांड़ अभ्यारण्य विलुप्तप्राय भेड़िया प्रजाति के संरक्षण हेतु प्रसिद्ध है। 
> धनबाद के तोपचांची अभ्यारण्य के बीच में 'हरी पहाड़ी' नामक झील स्थित है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:33:51 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में वन प्रबंधन https://m.jaankarirakho.com/320 https://m.jaankarirakho.com/320 > झारखण्ड राज्य में वन प्रबंधन का सर्वप्रथम प्रयास सन् 1882-85 के बीच जे. एफ. हेबिट के द्वारा किया गया था। 
> सन् 1909 में बंगाल सरकार द्वारा वनों की सुरक्षा के लिए एक वन समिति का गठन किया गया। 
> भारत की आजादी के पूर्व झारखण्ड क्षेत्र में 95 प्रतिशत निजी वन थे तथा बाद में इनका सरकारीकरण किया गया। इसके पश्चात् क्षेत्र में वन आच्छादन में लगातार कमी परिलक्षित होती है।
> सन् 1985-86 में इस क्षेत्र के लगभग 42 प्रतिशत क्षेत्र पर वन था, जो वर्तमान में मात्र 29.62 प्रतिशत क्षेत्र पर सीमित हो गया है।
> भारत सरकार के लक्ष्य के अनुरूप 33 प्रतिशत वनाच्छादन हेतु राज्य में इस दिशा में समुचित प्रयास की आवश्यकता है, जिसका एक महत्वपूर्ण घटक वनों का प्रबंधन है।
> राज्य में वन प्रबंधन की दिशा में उठाये गये प्रमुख कदम निम्नवत् हैं
> वन प्रबंधन एवं वन संरक्षण में आम जनता की सहभागिता सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। इसके लिए सरकार द्वारा संयुक्त वन प्रबंधन संकल्प 2001 में प्रतिपादित किया गया है। इसके तहत राज्य में 10,000 से अधिक वन प्रबंधन समितियों का गठन किया गया है। ये समितियाँ 21,860 वर्ग किमी वन क्षेत्र में कार्यरत हैं।
> वनों के संरक्षण एवं विकास हेतु राज्य के सभी प्रादेशिक वन प्रमण्डलों में वन विकास अभिकरण का गठन कर लिया गया है।
> राँची में स्थित बिरसा कृषि विश्वविद्यालय से संबंद्ध वानिकी कॉलेज में एक वानिकी संकाय की स्थापना की गई है ताकि वनों के प्रबंधन हेतु समुचित प्रशिक्षण प्रदान किया जा सके।
> राज्य के 3,424 वर्ग किमी. क्षेत्र में वनरोपण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
> राज्य में 9 लाख हेक्टेयर से अधिक बंजर भूमि पर वन रोपण का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है।
 > सामाजिक वानिकी को प्रोत्साहन दिया जा रहा है ताकि ग्रामीणों की वनों पर निर्भरता को कम किया जा सके। साथ ही शहरी वानिकी के माध्यम से भी वनरोपण को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
> मुख्यमंत्री जनवन योजना के तहत निजी भूमि पर वनरोपण को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
> राज्य में 100 से अधिक स्थायी नर्सरी को तकनीकी रूप से उन्नत बनाया जा रहा है।
> स्वयं सहायता समूह एवं ग्राम वन प्रबंधन समितियों के माध्यम से लाह उत्पादन हेतु निःशुल्क प्रशिक्षण, उपयुक्त मशीन आदि उपलब्ध कराया जा रहा है ताकि ग्रामीणों की आय में वृद्धि की जा सके।
> आम लोगों में प्रकृति के प्रति लगाव एवं वन्य प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता उत्पन्न करने हेतु जागरूकता अभियान चलाये जा रहे हैं।
> राज्य में पर्या मित्र तथा सतत् वधियों द्वारा पारिस्थितिकी पर्यटन को प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके लिए ईको-टूरिज्म नीति, 2015 बनाई गयी है।
> अधिसूचित वन भूमि, गैर-वन भूमि पर मुख्य रूप से स्थल विशिष्ट वनरोपण योजनाएँ, भूसंरक्षण योजना, शीघ्र बढ़नेवाले पौधे की योजना, तसर वनरोपण, शीशम वनरोपण आदि के लिए वित्तीय वर्ष 2015-16 के बजट में 6900 लाख रूपये का प्रावधान किया गया है।
> स्थायी पौधशाला एवं सीड ऑर्चड्स योजना के अंतर्गत बॉस गैबियन वृक्षारोपण हेतु औसतन 5 से 8 फीट लंबे पौधे तैयार किए जा रहे हैं।
> केंद्र संपोषित राष्ट्रीय वानिकीकरण योजना से राज्य के 18 प्रादेशिक एवं वन्य प्राणी प्रमण्डलों में वन विकास अधिकरण का गठन किया गया है।
> वन अभिलेखों एवं वन सीमाओं का डिजीटलीकरण किया जा रहा है।
> शहरी क्षेत्र में अवस्थित पार्कों के प्रबंधन हेतु झार पार्क्स का गठन किया गया है।
> नदी महोत्सव एवं वृहद् वृक्षारोपण अभियान
> इस महोत्सव तथा अभियान का संचालन 2 जुलाई, 2019 से 2 अगस्त, 2019 के बीच किया गया।
> इस अभियान के तहत राज्य के सभी 24 जिलों में 24 नदियों के किनारे लगभग 140 किलोमीटर की दूरी तक कुल 15,66,660 पौधे लगाये गये। 
> इस अभियान के दौरान सर्वाधिक पौधे जमशेदपुर तथा राँची वन मंडल (1,35,000 प्रति मंडल) तथा उसके बाद धनबाद वन मंडल (1,09,140) में लगाये गये। 
> वन अधिकार अधिनियम, 2006 तथा नियमावली - 2008
1. इस अधनियिम के तहत वनवासियों को जंगल की जमीन पर निवास हेतु अधिकार प्रदान किए गए हैं जिन्हें निम्न दो तरह से परिभाषित किया गया है
(क) वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति - इसके तहत अनुसूचित जनजाति के ऐसे सदस्य या समुदाय आते हैं, जो प्राथमिक रूप से वनों में निवास करते हैं और जीविका की वास्तविक आवश्कताओं के लिए वनों या वन भूमि पर निर्भर हैं। इसके अंतर्गत अनुसूचित जनजाति के चारागाही समुदाय भी शामिल हैं। 
(ख) अन्य परंपरागत वन निवासी - इसके अंतर्गत ऐसा सदस्य, जो 13 दिसम्बर, 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढ़ियों तक प्राथमिक रूप से वन या वन भूमि में निवास करता रहा है और जीविका की वास्तविक आवश्यकताओं के लिए वनों पर निर्भर रहा है, शामिल हैं।
2. निवास एवं खेती के लिए जंगल की जमीन पर अधिकार तभी मिलेंगे जबकि अधिनियम में परिभाषित वन निवासियों के द्वारा -
(क) जंगल की जमीन 13 दिसम्बर, 2005 के पहले से अधिभोग में हो। 
(ख) जंगल की जमीन 13 दिसम्बर, 2007 तक अधिभोग में हो।
3. अधिनियम में 'वन ग्राम' को परिभाषित किया गया है । 'वन ग्राम' में रहने वाले ग्रामीणों को खेती एवं आवास के लिए वन भूमि पहले से ही वन विभाग के द्वारा दिया गया है, जिसे इस अधिनियम के तहत उन्हें अधिकार मिलना निश्चित है।
4. नये कानून में वन भूमि पर वन निवास के अधिकार को अवधारित करने के लिए प्रक्रिया आरंभ करने की शक्ति ग्राम सभा को दी गयी है। इस शक्ति का प्रयोग करने के लिए ग्राम सभा को नियमावली - 2008 के अनुसार ग्राम सभा का गठन करना है। इस अधिनियम में ग्राम सभा को वन बचाने के लिए भी प्राधिकृत किया गया है। इसके लिए ग्राम सभा अपने ही सदस्यों से एक समिति अलग से गठित करेगी।
5. अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकार की मान्यता) अधिनियम, 2006 करने हेतु मूलतः ग्रामसभा को दो तरह से आगे बढ़ना है 
(क) वन भूमि पर व्यक्तिगत/सामुदायिक अधिकारों को अवधारित करने की प्रक्रिया आरंभ करनी है तथा इसके लिए वन अधिकार समिति का गठन करना है।
(ख) वन को बचाने में प्राधिकार (शक्ति) पाने के लिए भी अलग से एक समिति (वन सुरक्षा समिति) का गठन करना है।
6. वन भूमि पर आवास एवं कृषि के लिए व्यक्तिगत/सामुदायिक स्तर पर जो अधिकार इस कानून में दिये गये हैं, उसके बारे में ग्रामवासियों को वास्तविक स्थिति की जानकारी अवश्य होनी चाहिए –
(क) झारखण्ड राज्य के 85 प्रतिशत वन लगभग इसके 13000 राजस्व गाँव में सुरक्षित वन के रूप में हैं। इन वनों से लकड़ी, फूल, फल, बीज, पत्ती, लाह लगाने इत्यादि का सामूहिक अधिकार सभी ग्रामवासियों के खतियान में है और वन कानून मान्य है।
(ख) किसी गाँव का कोई भी ग्रामीण प्राथमिक रूप से वनों में निवास करते रहे हैं और जीविका की वास्तविक आवश्यकताओं के लिए वनों या वन भूमि पर निर्भर नहीं रहे हैं, तो उन्हें इस अधिनियम के अनुसार 'वन निवासी' नहीं कहा जाएगा और वन भूमि पर कृषि या आवास के लिए उनका कोई अधिकार नहीं होगा। 
7. इस अधिनियम में ग्राम सभा को वन बचाने का भी अधिकार दिया गया है। इसके लिए गठित समिति के माध्यम से ग्रामवासियों को अधिकार, भागीदारी एवं सम्मान देने का निर्णय वन एवं पर्यावरण विभाग, झारखण्ड सरकार के संकल्प संख्या 6023 दिनांक 15 नवंबर, 2007 में लिया जा चुका है, जिसके लिए निम्नलिखित बिन्दुओं की जानकारी सभी ग्रामवासियों को होनी चाहिए
(क) वन सुरक्षा समिति की अनुमति के बगैर मामूली घटनाओं में किसी भी ग्रामीण पर वन मुकदमा नहीं चलेगा। 
(ख) वन अपराध की सुलह वन सुरक्षा समिति की अनुशंसा पर ही होगा।
> CAMPA
> झारखण्ड प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (Jharkhand Compensatory Afforestation Fund Management and Planning Authority-CAMPA) का गठन प्राकृतिक वनों के संरक्षण, वन्यजीवों के प्रबंधन, आधारभूत संरचना विकास तथा इससे जुड़ी अन्य गतिविधियों को पूरा करने हेतु किया गया है।
> CAMPA का गठन भारत सरकार के द्वारा जुलाई, 2004 में किया गया था तथा झारखण्ड CAMPA को क्टूबर, 2009 में अधिसूचित किया गया था। 
> झारखण्ड CAMPA के प्रमुख उद्देश्य एवं लक्ष्य निम्नलिखित हैं
1. मौजूदा प्राकृतिक वनों का संरक्षण, सुरक्षा, पुनर्जनन एवं प्रबंधन करना ।
2. संरक्षित क्षेत्रों के अंदर और बाहर के वन्यजीवों एवं उनके आवास का संरक्षण, सुरक्षा एवं प्रबंधन करना। 
3. प्रतिपूरक वनीकरण। 
4. पर्यावरणीय सेवाएँ प्रदान करना।
5. विज्ञान, शोध, प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण।
6. पर्यावरण संरक्षण एवं सतत वन प्रबंधन।
> CAMPA गतिविधियाँ गुगल से जुड़ी हुयी हैं तथा झारखण्ड राज्य में 1605 पौधारोपण परियोजना को इसके तहत पर्यवेक्षित किया जा रहा है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:31:50 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के वन https://m.jaankarirakho.com/319 https://m.jaankarirakho.com/319 > वन स्थिति रिपोर्ट-2019 के अनुसार झारखण्ड में राज्य के कुल क्षेत्रफल के 23,611.41 वर्ग किमी. पर वन पाये जाते हैं जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 29.62%  है।
> झारखण्ड में भारत के कुल वन क्षेत्र का 3.31% विस्तृत है । वन क्षेत्र के विस्तार के प्रतिशत की दृष्टि से झारखण्ड का देश के राज्यों में 10वाँ स्थान है।
> राज्य में प्रति व्यक्ति वन एवं पेड़ों का आच्छादन 0.08 (वन स्थिति रिपोर्ट- 2019 ) हेक्टेयर है। 
> झारखण्ड में देश के राष्ट्रीय औसत ( 21.67% ) से अधिक वन क्षेत्र ( 29.62% ) का विस्तार है, परन्तु यह राष्ट्रीय वन नीति के लक्ष्य (33%) से कम है।
> भारतीय वन सर्वेक्षण, देहरादून द्वारा प्रकाशित वन स्थिति रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड राज्य में कुल 26475 वर्ग किमी० क्षेत्रफल पर वन एवं पेड़ों का विस्तार है ।
> झारखण्ड सरकार ने राज्य में वन क्षेत्र को 33 प्रतिशत से अधिक करने के उद्देश्य से वन नीति का निर्माण किया है तथा इसमें निम्न प्रमुख बातों का उल्लेख है –
> प्रत्येक गाँव में एक वन समिति होगी, जिसमें गाँव के प्रत्येक परिवार का एक सदस्य होगा।
> ग्रामीणों की आवश्यकता के अनुसार वृक्षारोपण किया जाएगा।
> वनोत्पादों की सरकारी एजेंसियों के माध्यम से खरीद की जाएगी।
> वनों की सुरक्षा का भार ग्रामीणों और वन विभाग के ऊपर होगा।
> इस नीति के तहत राज्य में 10,000 से अधिक वन समितियों का गठन किया गया है।
> झारखण्ड में वनों की श्रेणियाँ
1. संरक्षित वन (Protected Forest )
> वैसे वन जिन पर मनुष्यों को कुछ प्रतिबंधों के तहत पशु चराने एवं लकड़ियों को काटने की अनुमति प्राप्त होती है, संरक्षित वन कहलाते हैं। इस प्रकार के वनों में बिना अनुमति के सभी प्रकार की गतिविधियों पर प्रतिबंध होता है। 
> झारखण्ड में कुल 19,185 वर्ग किमी. भू-भाग पर संरक्षित वनों का विस्तार है जो राज्य के कुल वन क्षेत्र का 81.28% है।
> संरक्षित वनों का सर्वाधिक विस्तार हजारीबाग जिले में है। इसके बाद क्रमशः गढ़वा, पलामू तथा राँची जिले का स्थान है।
2. आरक्षित बन (Reserved Forest )
> वैसे वन जिनमें मनुष्यों के पशु चराने एवं लकड़ी काटने पर पूर्णतः प्रतिबंध हो, आरक्षित वन कहलाते हैं। 
> झारखण्ड में कुल 4,387 वर्ग किमी. भूमि पर आरक्षित वनों का विस्तार है जो राज्य के कुल वन क्षेत्र का 18.58% है।
> राज्य का सबसे बड़ा आरक्षित वन- क्षेत्र पोरहाट एवं कोल्हान वन क्षेत्र है। इसके अतिरिक्त राजमहल एवं पलामू के वन क्षेत्र भी आरक्षित वनों के अंतर्गत आते हैं।
3. अवर्गीकृत वन (Unclassed Forest)
> वैसे वन जो आरक्षित या संरक्षित वनों की श्रेणी में नहीं आते हैं, अवर्गीकृत वन कहलाते हैं। 
> झारखण्ड में कुल 33 वर्ग किमी. भूमि पर अवर्गीकृत वनों का विस्तार है जो राज्य के कुल वन क्षेत्र का मात्र 0.14% है।
> राज्य का सबसे बड़ा अवर्गीकृत वन क्षेत्र साहेबगंज है। इसके बाद क्रमशः पश्चिमी सिंहभूम, दुमका तथा हजारीबाग का स्थान आता है। 
> झारखण्ड में वन प्रदेश
1. उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन प्रदेश
> 120 सेमी. से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आर्द्र पतझड़ वन पाये जाते हैं। इसी कारण ऐसे क्षेत्र को आर्द्र पर्णपाती वन प्रदेश कहा जाता है ।
> ये सागरीय मौसम से प्रभावित जलवायु क्षेत्र हैं जहाँ अधिक वर्षा होती है।
> झारखण्ड के सिंहभूम, दक्षिणी राँची, दक्षिणी लातेहार एवं संथाल परगना क्षेत्र में इन वनों का विस्तार है।
> इन वनों में साल, शीशम, जामुन, पलाश, सेमल, महुआ एवं बांस के वृक्ष पाये जाते हैं।
> साल के वृक्ष की ऊँचाई अधिक होती है तथा इसे पर्णपाती वनों का राजा भी कहा जाता है।
> राज्य के 2.66% भू-भाग उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन प्रदेश के अंतर्गत आते हैं।
2. उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन प्रदेश
> 120 सेमी. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में शुष्क पतझड़ वनों का विकास हुआ है। इसी कारण ऐसे क्षेत्र को शुष्क पर्णपाती वन प्रदेश कहा जाता है।
> झारखण्ड के पलामू, गिरिडीह, सिंहभूम, हजारीबाग, धनबाद एवं संथाल परगना में इन वनों का विस्तार है। 
> इनमें घास एवं झाड़ियों की प्रधानता होती है। इसके अतिरिक्त बांस, नीम, पीपल, खैर, पलाश, कटहल एवं गूलर के वृक्ष इस वन प्रदेश में पाये जाते हैं।
> राज्य के 93.25% भू-भाग उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन प्रदेश के अंतर्गत आते हैं।
> झारखण्ड में वनोत्पाद
1. मुख्य वनोत्पाद
(a) साल (Sal) / सखुआ (Sakhua)
> अत्यंत कठोर होने के कारण साल की लकड़ी का प्रयोग इमारती लकड़ियों, फर्नीचर बनाने, रेल के डिब्बे, पटरियों के स्लैब आदि के निर्माण के लिए किया जाता है। 
> साल के पुष्पों को सरई फूल तथा इसके बीजों से निकाले जाने वाले तेल को कुजरी तेल कहा जाता है। इस तेल का प्रयोग प्राकृतिक चिकित्सा के लिए किया जाता है।
> यह झारखण्ड का राजकीय वृक्ष है।
(b) शीशम (Siscoo)
> अत्यंत मजबूत होने के कारण इसका प्रयोग फर्नीचर बनाने में किया जाता है।
(c) महुआ (Mahua)
> यह झारखण्ड का सर्वाधिक उपयोगी वृक्ष है क्योंकि इसकी लकड़ी, फल, फूल तथा बीज सभी का उपयोग होता है।
> इसकी लकड़ी काफी मजबूत होने के कारण दरवाजे-खम्बे आदि बनाने हेतु, फूल शराब बनाने हेतु, फल सब्जी के रूप में तथा बीज तेल निकालने हेतु प्रयुक्त होता है ।
(d) सागौन (Teak)
> इसकी लकड़ी काफी मजबूत और सुन्दर होती है जिसका प्रयोग फर्नीचर, रेल के डिब्बे, हवाई जहाज आदि के लिए किया जाता है।
(e) सेमल (Semal)
> इसकी लकड़ी हल्की, मुलायम और सफेद होती है जिसका प्रयोग पैकिंग पेटियों, तख्तियां तथा खिलौना बनाने के लिए किया जाता है।
> इससे रूई ( cotton) का उत्पादन भी किया जाता है।
(f) गम्हार ( Gamhar)
> इसकी लकड़ी हल्की, मुलायम तथा चिकनी होने के साथ-साथ काफी टिकाऊ होती है जिसका उपयोग फर्नीचर निर्माण हेतु किया जाता है।
> लकड़ियों पर नक्काशी की दृष्टि से यह अत्यंत उपयोगी है।
(g) जामुन (Jambo)
> पानी में भी अत्यधिक दिनों तक खराब नहीं होने का गुण पाये जाने के कारण इसका सर्वाधिक प्रयोग कुओं के आधार के रूप में किया जाता है। इसका अन्य प्रयोग फर्नीचर निर्माण हेतु किया जाता है। 
> इसके बीजों से दवा निर्मित किया जाता है तथा इसके फलों का उपयोग खाने के लिए होता है।
(h) आम (Mango)
> इसकी सुलभता के कारण इसका प्रयोग फर्नीचर व दरवाजे आदि बनाने के लिए किया जाता है। 
(i) कटहल (Jackfruit )
> इसकी लकड़ी का प्रयोग इमारतों के लिए तथा इसके फल का उपयोग खाने हेतु किया जाता है। 
(j) केन्दु (Kendu)
> इसकी लकड़ियों का प्रयोग मुख्य उत्पाद के रूप में तथा इसकी पत्तियों का उपयोग गौण उत्पाद के रूप में किया जाता है।
> इसका प्रयोग प्रायः गौण उत्पाद के रूप में ही अधिक किया जाता है।
2. गौण वनोत्पाद
(a) लाह (Lac)
> भारत में कुल लाह उत्पादन का 50% झारखण्ड में उत्पादित किया जाता है। यह लाह उत्पादन की दृष्टि से भारत का अग्रणी राज्य है।
> लाह उत्पादन हेतु आवश्यक निम्न भौगोलिक दशाएँ झारखण्ड में आसानी से उपलब्ध हैं:–
> ऊँचाई – समुद्र तल से 350 मी०
> तापमान – 12°C तक
> वर्षा – 150 सेमी० से कम ०
> लाह की चार किस्में वैशाखी लाह, जेठवी लाह, कतकी लाह एवं अगहनी लाह होती है।
> झारखण्ड में कुल लाह उत्पादन का 82% वैशाखी लाह से प्राप्त होता है।
> झारखण्ड में लाह की खेती से स्वरोजगार एवं अतिरिक्त आय उपलब्ध कराने हेतु राँची, खूँटी, लातेहार, गुमला, सिमडेगा, गढ़वा, दुमका, सरायकेला आदि जिलों में 1750 वन प्रबंधन समिति का गठन वर्ष 2014-15 में किया गया है।
> राज्य के राँची जिले के नामकुम में लाह से संबंधित शोध कार्य हेतु भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के अंतर्गत 1924 ई. में भारतीय लाह शोध अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई थी ।
> लाह/लाख (Lac) शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'लक्ष' शब्द से हुयी है।
> JHAMFCOFED
> झाम्फ्कोफेड का पूरा नाम (The Jharkhand State Minor Forest Produce Co-operative Development and Marketing Federation Limited - JHAMFCOFED) है। 
> इसकी स्थापना झारखण्ड सरकार द्वारा 2007 में की गयी थी। 
> इसका प्रमुख उद्देश्य मध्यस्थों के शोषण से वनवासियों की सुरक्षा करना तथा गौण वनोत्पाद उद्योगों को सहकारिता के आधार पर प्रोत्साहित करना है। 
> झाम्फ्कोफेड की संरचना दो - स्तरीय है। इसके शीर्ष पर झाम्फ्कोफेड है तथा इसके निचले स्तर पर 88 प्राथमिक सहकारी समितियाँ कार्यरत हैं।
(b) केन्दु पत्ता (Kendu Leaves)
> यह राजस्व प्राप्ति की दृष्टि से झारखण्ड का प्रमुख गौण उत्पाद है।
> इसका प्रयोग बीड़ी एवं तम्बाकू के निर्माण हेतु किया जाता है।
> राज्य में केन्दु पत्ता के प्राथमिक संग्राहकों को केन्दु पत्ता के संग्रहण के बदले उचित मजदूरी के भुगतान हेतु झारखण्ड राज्य केन्दु पत्ता नीति - 2015 को अधिसूचित किया गया है।
(c) तसर रेशम (Wild Silk )
> तसर रेशम के उत्पादन की दृष्टि से झारखण्ड का देश में प्रथम स्थान है। यहाँ देश का 60% तसर रेशम उत्पादित किया जाता है।
> रेशम के कीड़ों के पालन हेतु झारखण्ड में साल, शहतूत, आसन, अर्जुन आदि वृक्षों का उपयोग किया जाता है।
> राज्य की राजधानी राँची के नगड़ी में भारत सरकार द्वारा 'तसर अनुसंधान केन्द्र की स्थापना की गई है। 
> रेशम आधारित उत्पादों के विकास हेतु सन् 2006 में राज्य सरकार द्वारा 'झारखण्ड सिल्क, टेक्सटाइल एवं हैंडीक्रॉफ्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (झारक्रॉफ्ट ) ' का गठन किया गया है।
> झारक्रॉफ्ट द्वारा झारखण्ड के चार जिलों में रेशम पार्कों की स्थापना की गयी है।
(d) बांस (Bamboo)
> झारखण्ड में जनजातीय समुदायों के द्वारा घरेलू सामानों के निर्माण एवं जीविकोपार्जन हेतु बांस का उत्पादन किया जाता है।
> इसका व्यापारिक उपयोग कागज उद्योग एवं घर निर्माण में किया जाता है।
> झारखण्ड राज्य में कुल 17 जनजातीय जिलों (भारत - 218) की पहचान की गयी है। जनजातीय जिलों की संख्या के मामले में भारत के राज्यों में झारखण्ड राज्य का स्थान तीसरा (मध्य प्रदेश - 24, असम-19) है। 
> 2017 - 19 के बीच भारत के जनजातीय क्षेत्रों में Inside RFA की मात्रा में 471 वर्ग किमी. की कमी दर्ज की गयी है, जबकि इसी अवधि में झारखण्ड के जनजातीय जिलों में Inside RFA की मात्रा में 15 वर्ग किमी. की वृद्धि दर्ज की गयी है।
> अन्य तथ्य
> नमामि गंगे परियोजना में शामिल क्षेत्र का मात्र 4.15% झारखण्ड राज्य में विस्तारित है, जबकि इस परियोजना के तहत शामिल कुल वन क्षेत्र का 14.48% झारखण्ड राज्य में विस्तारित है। 
> मुख्यमंत्री जन-वन योजना के तहत् वित्तीय वर्ष 2019-20 में झारखण्ड राज्य में 5,34,204 पौधों का पौधारोपण किया गया है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:30:23 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की मिट्टियाँ https://m.jaankarirakho.com/318 https://m.jaankarirakho.com/318 > निर्माण प्रक्रिया की दृष्टि से झारखण्ड में अवशिष्ट मिट्टी (Residual Soil) पायी जाती है।
> पठारी इलाकों में जमीन के अंदर खनिज एवं चट्टानों के अपक्षयन के परिणामस्वरूप निर्मित अवशेष से बनी मिट्टी अवशिष्ट मिट्टी कहलाती है।
> झारखण्ड में पायी जाने वाली मिट्टी को 6 प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है: –
> झारखण्ड में मिट्टी का वर्गीकरण
> मिट्टी का नाम
> लाल मिट्टी
> विस्तार
> छोटानागपुर
> विशेषता
 > यह झारखण्ड की सर्वप्रमुख मिट्टी है।
> यह मिट्टी छोटानागपुर के लगभग 90% भाग में पायी जाती है।
> दामोदर घाटी का गोंडवाना क्षेत्र तथा राजमहल उच्च भूमि को छोड़कर संपूर्ण छो. टानागपुर क्षेत्र में लाल मिट्टी की अधिकता है
> इस मिट्टी में फेरिक ऑक्साइड तथा बॉक्साइट की  जिसके कारण इसका रंग लाल हो जाता है। कहीं-कहीं इस मिट्टी का रंग पीला, धूसर, भूरा और काला भी मिलता है।
> राज्य के हजारीबाग व कोडरमा क्षेत्र में अभ्रकमूलक लाल मिट्टी तथा सिंहभूम व धनबाद के कुछ भागों में लाल-काली मिश्रित मिट्टी पायी जाती है। 
> नीस एवं ग्रेनाइट के अवशेष से निर्मित होने तथा नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस की कमी से युक्त होने के कारण इसकी उर्वरा शक्ति कम होती है।
> यह मिट्टी ज्वार, बाजारा, रागी, गन्ना, मूंगफली आदि की खेती हेतु अत्यंत उपयुक्त होती है। 
> मिट्टी का नाम
> काली मिट्टी
> विस्तार
> राजमहल पहाड़ी
> विशेषता
> इस मिट्टी को रेगुर मिट्टी भी कहा जाता है तथा यह काले एवं भूरे रंग की होती है। 
> इस मिट्टी का निर्माण अत्यंत बारीक कणों से होता है। अतः पानी पड़ने पर यह मिट्टी चिपचिपी हो जाती है।
> इस मिट्टी में लौह, चुना, मैग्नीशियम तथा एलोमिना का मिश्रण पाया जाता है।
> इस मिट्टी में नाइट्रोजन, जैविक पदार्थ तथा, फॉस्फोरिक एसिड की कमी पायी जाती है।
> बेसाल्ट के अपक्षयन से निर्मित यह मिट्टी कपास की खेती हेतु अत्यंत उपयोगी है किन्तु राजमहल क्षेत्र में इस मिट्टी में धान एवं चने की खेती की जाती है।
> मिट्टी का नाम 
लैटेराइट मिट्टी
> विस्तार 
> पलामू का दक्षिणी क्षेत्र, राँची का पश्चिमी क्षेत्र, संथाल परगना, पूर्वी राजमहल क्षेत्र, सिंहभूम का ढालभूम क्षेत्र 
> विशेषता
> यह गहरे लाल रंग की होती है तथा इसमें कंकड़ की अधिकता होती है। 
> इस मिट्टी का निर्माण मानसूनी जलवायु की आर्द्रता तथा शुष्कता में क्रमिक परिवर्तन के फलस्वरूप उत्पन्न परिस्थितियों के प्रभावस्वरूप हुआ है।
> इस मिट्टी में लौह ऑक्साइड की अधिकता होती है तथा यह कम उर्वर मिट्टी है। 
> सिंचाई साधनों की सहायता से इसमें मुख्यतः चावल तथा मोटे अनाज की कृषि की जाती है।
> मिट्टी का नाम  
> रेतीली मिट्टी 
> विस्तार
> पूर्वी हजारीबाग व धनबाद
> विशेषता
> इस मिट्टी में लाल तथा पीले रंग का मिश्रण पाया जाता है।
> इस मिट्टी में मोटे अनाजों की कृषि की जाती है।
> दामोदर घाटी क्षेत्र में मूलत: फुसफुस बलुई मिट्टी पायी जाती है।
> मिट्टी का नाम
> जलोढ़ मिट्टी
> विस्तार
> संथाल परगना
> विशेषता
> यह झारखण्ड में पायी जानेवाली नवीनतम मिट्टी है जिसमें मृदा परिच्छेदिका का विकास नहीं हुआ है।
> राज्य में भांगर (पुराना जलोढ़) एवं खादर ( नवीन जलोढ़) दोनों प्रकार की जलोढ़ मृदा पायी जाती है।
> राज्य में साहेबगंज के उत्तरी एवं उत्तर-पश्चिमी भाग में भांगर तथा पूर्वी भाग एवं पाकुड़ जिले के क्षेत्र में खादर मिट्टी पायी जाती है।
> इस मिट्टी में चूना एवं पोटाश की अधिकता जबकि नाइट्रोजन एवं ह्यूमस की कमी पायी जाती है।
> धान एवं गेहूँ के लिए यह अत्यंत उपयुक्त मिट्टी है
> मिट्टी का नाम
> अभ्रकमूलक मिट्टी
> विस्तार  
> कोडरमा, मांडू, झूमरी तिलैया एवं बड़कागाँव 
> विशेषता
> अभ्रक के खानों के समीप यह मिट्टी पायी जाती है। 
> कोडरमा, झूमरी तिलैया, मांडु और बड़कागाँव के क्षेत्रों में इस मिट्टी के पाये जाने के कारण इस क्षेत्र को अभ्रक पट्टी के नाम से जाना जाता है। 
> इस मिट्टी का रंग हल्का गुलाबी होता है तथा कुछ स्थानों पर नमी की कमी के कारण इसका रंग पीला हो जाता है। 
> यह मिट्टी अत्यंत उपजाऊ होती है लेकिन इन क्षेत्रों में जल की कमी के कारण इस मिट्टी में समुचित ढंग से कृषि कार्य संभव नहीं हो पाया है।
> अन्य गौड़ मिट्टी समूह
> मिट्टी का नाम
> अपरदित कगारों की मिट्टी 
> विस्तार
> तीव्र ढालयुक्त क्षेत्र
> विशेषता
> यह मिट्टी पतली तथा पथरीली है।
> यह निम्न उर्वरता वाली मिट्टी है।
> इसमें सुरगुजा, कुरथी, मक्का आदि की खेती की जाती है।
> मिट्टी का नाम
> उच्च भूमि की धूसरपीली मिट्टी
> विस्तार
> पलामू तथा गढ़वा के ऊँचे पठारी क्षेत्र
> विशेषता
> इस मिट्टी की उर्वरता मध्यम से उच्च स्तर की होती है।
> मिट्टी का नाम
> धात्विक गुणों से युक्त मिट्टी
> विस्तार
> पश्चिमी सिंहभूम का दक्षिणी भाग
> विशेषता
> इस मिट्टी का रंग लालिमायुक्त होता है।
> यह मिट्टी कम उर्वर होती है।
> मिट्टी का नाम 
> विषमजातीय मिट्टी 
> विस्तार 
 > पश्चिमी सिंहभूम के मध्यवर्ती एवं उत्तरी भाग तथा सरायकेला के क्षेत्र
> विशेषता
> यह मिट्टी विभिन्न मूल के चट्टानों के अवशेषों के मिश्रण से निर्मित होती है। 
> उच्च भूमि में इसका रंग पीला तथा निम्न भूमि में काला व धूसर होता है।
> इसमें मध्यम स्तर की उर्वरता पायी जाती है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:26:25 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की जलवायु https://m.jaankarirakho.com/317 https://m.jaankarirakho.com/317 > झारखण्ड एक उष्णकटिबंधीय प्रदेश है तथा यहाँ मानसूनी हवाओं का प्रभाव रहता है जिसके फलस्वरूप झारखण्ड में उष्णकटिबंधीय मानसूनी  प्रकार की जलवायु का विकास हुआ है। 
> यहाँ ग्रीष्म ऋतु, शीत ऋतु तथा वर्षा ऋतु के मौसम में पर्याप्त अंतर पाया जाता है। 
> झारखण्ड का औसत तापमान 25°C है।
> झारखण्ड में कृषि जलवायु प्रदेश 
> झारखण्ड राज्य भारत के कृषि-जलवायु प्रदेश VII के अंतर्गत आता है, जिसे 'पूर्वी पठार एवं पहाड़ी क्षेत्र' के नाम से जाना जाता है।
> राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM) की रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड राज्य को तीन कृषि जलवायु प्रदेशों में वर्गीकृत किया जा सकता है। 
> झारखण्ड में ऋतुएँ / मौसम
1. ग्रीष्म ऋतु (मार्च से मध्य जून तक )
> मार्च में तापमान में वृद्धि के साथ ग्रीष्म ऋतु आरंभ होने लगता है तथा मई में यहाँ का तापमान अधिकतम हो जाता है।
> झारखण्ड का मासिक औसत तापमान 29°C से 45°C के बीच रहता है ।
> झारखण्ड में सर्वाधिक गर्मी वाला महीना मई है।
> पठारी भाग होने के कारण यहाँ के मैदानी भागों में लू का प्रकोप नहीं होता है।
> जमशेदपुर राज्य का सबसे गर्म स्थान है।
> ग्रीष्म ऋतु में झारखण्ड के पठार के उत्तर-पूर्वी भाग में निम्न वायु दाब उत्पन्न होने के कारण पछुआ पवन का प्रवाह समाप्त हो जाता है तथा वातावरण शांत बना रहता है।
> यहाँ मई के महीने में नार्वेस्टर के प्रभाव से तड़ित झंझायुक्त वर्षा होती है जिसे आम्र वर्षा (Mango Shower) भी कहा जाता है।
2. वर्षा ऋतु ( जून अक्टूबर तक )
> झारखण्ड में मध्य जून में वर्षा ऋतु प्रारंभ हो जाता है।
> झारखण्ड में मुख्यतः दक्षिण-पश्चिम मानसून पवनों  के द्वारा वर्षा होती है। यहाँ मानसून की दोनों शाखाओं (बंगाल की खाड़ी की शाखा तथा अरब सागर की शाखा) द्वारा वर्षा होती है।
> यहाँ बंगाल की खाड़ी की शाखा द्वारा वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती है।
> झारखण्ड के मध्यवर्ती तथा पश्चिमी भाग में बंगाल की खाड़ी की शाखा तथा अरब सागर की शाखा दोनों द्वारा वर्षा होती है।
> झारखण्ड के पूर्वी भाग में मुख्य रूप से बंगाल की खाड़ी की शाखा द्वारा वर्षा होती है। 
> झारखण्ड में दक्षिण से उत्तर की ओर तथा पूरब से पश्चिम की ओर जाने पर वर्षा की मात्रा में कमी आती है। इसके अतिरिक्त ऊँचाई वाले भागों पर निम्न स्थानों की तुलना में अधिक वर्षा होती है। 
> झारखण्ड में कुल वर्षा का 80% जल वर्षा ऋतु में बरस जाता है।
> यहाँ औसत 140 सेमी. वार्षिक वर्षा होती है। अतः यह क्षेत्र मध्यम वर्षा वाला प्रदेश है।
> नेतरहाट का पठार झारखण्ड में सर्वाधिक वर्षा (180 सेमी. से अधिक) वाला स्थान है जबकि चाईबासा का मैदानी भाग सबसे कम वर्षा वाला क्षेत्र है। 
> सर्वाधिक वर्षा वाला जिला हजारीबाग है ।
> राज्य में वार्षिक वर्षा का अंतराल 100 से 200 सेंटीमीटर के बीच है। *
3. शीत ऋतु ( नवम्बर से फरवरी तक )
> झारखण्ड में नवम्बर महीने मे शीत ऋतु का आरंभ होता है जो फरवरी माह तक बना रहता है। 
> ऊँचाई वाले क्षेत्रों की अधिकता के कारण झारखण्ड में मैदानी भाग वाले क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक ठंड पड़ती है। इसी कारण यहाँ ठंड के मौसम का आरंभ अपेक्षाकृत पहले हो जाता है।
> शीत ऋतु के समय मौसम साफ एवं सुहावना होता है तथा इस दौरान यहाँ का तापमान 15°C से 21°C तक रहता है।
> इस मौसम में उत्तर पश्चिमी विक्षोभ के कारण थोड़ी-बहुत वर्षा हो जाती है जो रबी की फसल के लिए अत्यंत लाभदायक होती है।
> राज्य का सर्वाधिक ठंडा महीना जनवरी है तथा इस दौरान शीतलहरी चलने पर यहाँ पाला भी गिरता है। 
> राज्य का सर्वाधिक ठंडा स्थान नेतरहाट है। यहाँ का न्यूनतम तापमान 7 °C तक चला जाता है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:24:25 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में अपवाह प्रणाली https://m.jaankarirakho.com/316 https://m.jaankarirakho.com/316 > वर्षा के जल एवं अन्य जल के बहाव की समग्र व्यवस्था अपवाह प्रणाली के नाम से जानी जाती है। 
> राज्य के अपवाह प्रणाली के निर्माण में जल की मात्रा, भूमि की संरचना, ढाल की तीव्रता, वनस्पति का घनत्व तथा मिट्टी की संरचना जैसे तत्व मुख्य भूमिका अदा करते हैं ।
> जल संसाधान विभाग, झारखण्ड सरकार के अनुसार राज्य का 1.59 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जलीय स्रोतों द्वारा आच्छादित है, जो राज्य के कुल भूभाग का लगभग 2% है।
> 2018-19 में राज्य में 30,169 मिलियन घनमीटर जल संसाधन उपलब्ध है जिसमें 25,877 मिलियन घनमीटर (86%) सतही जल के रूप में तथा 4,292 मिलियन घनमीटर (14%) भूमिगत जल के रूप में मौजूद है।
> राज्य में औद्योगिक क्षेत्र हेतु 4,338 मिलियन घनमीटर जल की आवश्यकता है जबकि सिंचाई हेतु 3,813 मिलियन घनमीटर जल की आवश्यकता है। शहरी क्षेत्रों में 1616.35 लाख गैलन जल की आवश्यकता है जबकि यहाँ 734.35 लाख गैलन जल ही उपलब्ध है।
> राज्य के अधिकांश भाग पर आर्कियनकालीन चट्टान पाये जाने के कारण मृदा की छिद्रता (Porosity) काफी कम है। साथ ही पठारी क्षेत्र होने के कारण वर्षा का जल तीव्रता से प्रवाहित हो जाता है। परिणामतः भूमिगत जल की मात्रा काफी कम है।
> झारखण्ड में नदियाँ, जलप्रपात एवं गर्मकुण्ड अपवाह प्रणाली के मुख्य घटक हैं।
> झारखण्ड में नदियाँ
> सोन नदी के अतिरिक्त झारखण्ड की सभी नदियाँ बरसाती हैं जो जल के लिए मानसून पर निर्भर हैं। ये गरमी के महीने में सूख जाती हैं ।
> कठोर चट्टानी क्षेत्रों से प्रवाहित होने के कारण झारखण्ड की नदियाँ नाव चलाने हेतु उपयुक्त नहीं हैं। एकमात्र मयूराक्षी / मोर नदी का उपयोग नाव चलाने हेतु किया जाता है ।
> झारखण्ड की नदियों को प्रवाह की दिशा के अनुसार उत्तरवर्ती एवं पूरबवर्ती / दक्षिणवर्ती नदियों में विभाजित किया जा सकता है।
> वे नदियाँ जो पठारी भाग से निकलकर उत्तर की ओर प्रवाहित होती हुई गंगा या उसकी सहायक नदी में मिल जाती है, उन्हें उत्तरवर्ती नदी कहा जाता है। सोन, उत्तरी कोयल, पुनपुन, फल्गु, चानन आदि झारखण्ड की प्रमुख उत्तरवर्ती नदियाँ हैं।
> वे नदियाँ जो पठार के दक्षिण भाग से निकलकर पूर्व या दक्षिण की ओर प्रवाहित होती हैं, उन्हें पूरबवर्ती / दक्षिणवर्ती नदी कहा जाता है। दामोदर, स्वर्णरेखा, बराकर, दक्षिणी कोयल, शंख, मयूराक्षी आदि झारखण्ड की प्रमुख दक्षिणवर्ती नदियाँ हैं।
> झारखण्ड राज्य गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण
> गंगा नदी झारखण्ड राज्य के साहेबगंज जिले से होकर गुजरती है। अतः गंगा नदी के संरक्षण हेतु झारखण्ड राज्य की सहभागिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार द्वारा झारखण्ड राज्य गंगा नदी संरक्षण प्राधिकरण का गठन किया गया है।
> इस प्राधिकरण का गठन 20 फरवरी, 2009 को किया गया था। 
> इस प्राधिकरण का मुख्यालय राँची में है।
> इस प्राधिकरण के अध्यक्ष राज्य के मुख्यमंत्री हैं। प्राधिकरण के अन्य सदस्यों में राज्य सरकार के पर्यावरण मंत्री, वित्त मंत्री, शहरी विकास मंत्री, जल संसाधन एवं सिंचाई मंत्री तथा राज्य के मुख्य सचिव (सचिव) शामिल हैं। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार द्वारा किसी अन्य मंत्री को प्राधिकरण का सदस्य बनाया जा सकता है। साथ ही प्राधिकरण पांच ऐसे सदस्यों को सहयोजित कर सकता है, जो नदी संरक्षण, जल विज्ञान, पर्यावरण य इंजीनियरी, सामाजिक संघटन और ऐसे अन्य क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखते हों । 
> प्राधिकरण की शक्तियाँ एवं कार्य निम्नवत् हैं-
1. प्राधिकरण को ऐसे सभी उपाय करने की शक्ति प्राप्त है, जिन्हें वह गंगा नदी के प्रदूषण के प्रभावी उपशमन और संरक्षण के लिए और राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के विनिश्चयों या निर्देशों के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक समझे ।
2. प्राधिकरण राज्य स्तर पर सीवरेज अवसंरचना, जलागम क्षेत्र उपचार, बांध वाले मैदानों की सुरक्षा, लोक जागरूकता का प्रसार करने का प्रयास करेगा।
3. प्राधिकरण गंगा नदी के जल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इसके प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण एवं उपशमन के उद्देश्य वाले क्रियाकलापों का विनियमन करेगा तथा राज्य में नदी पारिस्थितिकी और प्रबंधन से संबंधित उपाय करेगा।
4. प्राधिकरण जल का पुनःचक्रण और पुन: उपयोग, वर्षा जल संचयन और विकेंद्रित मल जलशोधन तंत्र और जलागम में भंडारण परियोजनाओं द्वारा जल संवर्धन को प्रोत्साहित करने का प्रयास करेगा।
5. प्राधिकरण जल संरक्षण पद्दतियों के माध्यम से जल की गुणता और पर्यावरणीय रूप से सतत विकास सुनिश्चित करने के उद्देश्य से गंगा नदी में न्यूनतम पारिस्थितिकीय बहाव का अनुरक्षण करने का प्रयास करेगा।
6. प्राधिकरण गंगा नदी में प्रदूषण निवारण, नियंत्रण और उपशमन के लिए कार्यान्वयन अभिकरणों द्वारा तैयार किए गए विभिन्न कार्यक्रमों या क्रियाकलापों को मानीटर करेगा तथा उनका पुनर्विलोकन करेगा।
7. प्राधिकरण राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के विनिश्चयों या निर्देशों के कार्यान्वयन के प्रयोजन के लिए भूमि अर्जन, अतिक्रमण, संविदाएं, विद्युत आपूर्ति आदि से संबंधित मुद्दों और ऐसे मुद्दों का निराकरण करने का प्रयास करेगा।
> प्राधिकरण की अधिकारिता का विस्तार झारखण्ड राज्य में होगा।
> झारखण्ड में जलप्रपात
> ऊँचाई से गिरते हुए जल को जलप्रपात कहा जाता है। 
> झारखण्ड के पठारी क्षेत्रों में नदी के अपवाह मार्ग में मृदु शैलों के अपरदन या कठोर शैलों के अवरोध के कारण कई जलप्रपातों का निर्माण हुआ है जिनमें से प्रमुख जलप्रपात निम्न हैं: –
> झारखण्ड में गर्म जलकुंड 
> वह स्थान जहाँ भौमिक जलस्तर तथा धरातल का प्रतिच्छेदन हो जाता है, वहाँ का जल का प्रवाह सतह की ओर होने लगता है, इसे गर्म जलकुण्ड कहा जाता है।
> गर्म जलकुंड मृत ज्वालामुखी या भूगर्भ में स्थित रेडियो सक्रिय खनिजों से संबंधित होते हैं। इनमें पर्याप्त मात्रा में खनिज लवण, गंधक आदि पाये जाते हैं।
> इन जलकुंडों के जलों में रोगनाशक शक्ति पायी जाती है जो गठिया, खून की कमी तथा कई रोगों के इलाज में सहायक होते हैं।
> झारखण्ड राज्य में प्रमुख जलकुण्डों का विवरण निम्न है : –
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Sat, 09 Sep 2023 10:21:37 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड का धरातलीय स्वरूप https://m.jaankarirakho.com/315 https://m.jaankarirakho.com/315 > झारखण्ड के धरातलीय स्वरूप के निर्माण में छोटानागपुर पठारी क्षेत्र का सर्वप्रमुख योगदान है। यह पठार भारत के प्रायद्वीपीय पठार का उत्तर पूर्वी भाग है। इसका विस्तार उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार तथा छत्तीसगढ़ राज्य की सीमाओं तक है।
> छोटानागपुर पठार का निर्माण मुख्यतः लावा के जमाव से हुआ है।
> झारखण्ड में आर्कियनकालीन चट्टानों की अधिकता, मृदा की छिद्रता में कमी तथा पठारी ढाल के कारण जल के अंत: स्पंदन की दर कम होती है। परिणामतः यहां भूमिगत जल की मात्रा अत्यंत कम पायी जाती है। 
> छोटानागपुर पठार की औसत ऊँचाई 760 मी० है तथा इसकी सबसे ऊँची चोटी सम्मेद शिखर ( पारसनाथ पहाड़ी) है जिसकी ऊँचाई 1,365 मी० ( 4478 फीट ) है। यह झारखण्ड की भी सबसे ऊँची चोटी है।
> झारखण्ड के धरातलीय स्वरूप का विभाजन
1. पाट क्षेत्र ( पश्चिमी पठार)
> पाट का अर्थ समतल जमीन होता है। पारसनाथ के अतिरिक्त यह झारखण्ड का सबसे ऊँचा भाग है। 
> इसका विस्तार राँची के उत्तर पश्चिमी हिस्से से लेकर पलामू जिले के दक्षिणी हिस्से तक है। 
> पाट क्षेत्र की आकृति त्रिभुजाकार है। इसका शीर्ष दक्षिण में तथा आधार उत्तर में है। 
> इस क्षेत्र का ऊपरी भाग टांड़ तथा निचला भाग दोन कहलाता है।
> पाट क्षेत्र की समुद्रतल से औसत ऊँचाई 900 मीटर (लगभग 3000 फीट) है।
> झारखण्ड के तीन सबसे ऊँचे पाट नेतरहाट पाट (1,180 मी. / 3,871 फीट), गणेशपुर पाट (1,171 मी) तथा जनीरा पाट (1,142 मी.) हैं।
> पाट क्षेत्र की प्रमुख पहाड़ियाँ सानु एव सारऊ पहाड़ी हैं।
> पाट क्षेत्र उत्तरी कोयल, शंख आदि नदियों का उद्गम स्थल भी है।
> तश्तरीनुमा बारवे का मैदान झारखण्ड के पाट क्षेत्र का हिस्सा है।
2. राँची का पठार
> राँची का पठार झारखण्ड का सबसे बड़ा पठारी भाग है।
> यह समुद्रतल से औसतन 600 मीटर (लगभग 1970 फीट) की ऊँचाई वाला क्षेत्र है।
> राँची पठार की आकृति चौकोर है।
> इस पठारी क्षेत्र से निकलने वाली नदियाँ पठार के किनारों पर ढाल के कारण जलप्रपातों का निर्माण करती हैं। इनमें प्रमुख जलप्रपात बूढ़ाघाघ / लोधाघाघ, हुंडरू, दशम, जोन्हा / गौतमधारा आदि प्रमुख हैं। 
3. हजारीबाग का पठार
(a) ऊपरी हजारीबाग का पठार
> इसका विस्तार राँची पठार के समानान्तर हजारीबाग जिले में है।
> भूतकाल में यह राँची पठार के साथ जुड़ा हुआ था, लेकिन दामोदर नटी के कटाव के कारण यह राँची पठार से पृथक हो गया।
> इस पठार की समुद्रतल से औसत ऊँचाई 600 (लगभग 1970 फीट) मीटर है।
(b) निचला हजारीबाग का पठार
> यह हजारीबाग जिले के उत्तरी भाग में विस्तृत झारखण्ड का निम्नतम ऊँचाई वाला पठारी क्षेत्र है।
> छोटानागपुर के बाहरी हिस्से में अवस्थित होने के कारण इसे बाह्य पठार भी कहा जाता है। 
> यह क्षेत्र समुद्रतल से 450 मी० ( लगभग 1476 फीट) ऊँचा है। यह झारखण्ड में सबसे कम ऊँचाई वाला पठारी क्षेत्र है।
> इस क्षेत्र में गिरिडीह के पठार पर बराकर नदी की घाटी के निकट पारसनाथ की पहाड़ी स्थित है जिसकी ऊँचाई 1,365 मीटर (4478 फीट) है।
> यह अत्यंत कठोर पाइरोक्सी ग्रेनाइट से निर्मित है।
(4) राजमहल की पहाड़ियाँ एवं मैदानी क्षेत्र
> यह असमान नदी घाटियों एवं मैदानी क्षेत्रों से मिलकर निर्मित हुआ है।
> यह पठारी क्षेत्र समुद्रतल से औसतन 150-300 मीटर ऊँचा है।
> इस क्षेत्र में स्थित राजमहल की पहाड़ी बिहार के दक्षिण-पूर्वी भाग तक विस्तृत है।
> राजमहल पहाड़ी का विस्तार दुमका, देवघर, गोड्डा, पाकुड़ एवं साहेबगंज जिले तक है।
> राजमहल पहाड़ी क्षेत्र 2,000 वर्ग किमी. क्षेत्र तक विस्तृत है।
> इस क्षेत्र में नुकीली पहाड़ियों का स्थानीय नाम टोंगरी तथा गुम्बदनुमा पहाड़ियों का डोंगरी है। 
> चाईबासा का मैदान इस क्षेत्र का सर्वप्रमुख मैदानी क्षेत्र है जो पश्चिमी सिंहभूम के पूर्वी मध्यवर्ती भाग में स्थित है।
> चाईबासा का मैदान उत्तर में दालमा की श्रेणी, पूर्व में ढालभूम की श्रेणी, दक्षिण में कोल्हान पहाड़ी, पश्चिम में सारंडा वन तथा पश्चिमोत्तर में पोरहाट की पहाड़ी से घिरा है। 
> इसके दक्षिण में अजय नदी घाटी मौजूद है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:17:18 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की भूगर्भिक संरचना https://m.jaankarirakho.com/314 https://m.jaankarirakho.com/314 1. आर्कियनकालीन चट्टानें
> झारखण्ड की चट्टानी संरचनाओं में यह सर्वप्रमुख है जिसका विस्तार झारखण्ड के 90% भू-भाग पर है। 
> प्रचुर मात्रा में खनिज संसाधनों का भंडार होने के कारण ये आर्थिक दृष्टि से झारखण्ड की सर्वप्रमुख चट्टानें हैं। 
> इन चट्टानों में आग्नेय, अवसादी तथा रूपांतरित तीनों प्रकार की चट्टानें मौजूद हैं तथा छोटानागपुर पठार की आग्नेय, अवसादी तथा रूपांतरित चट्टानों का संबंध इसी काल की चट्टानों से है । 
> इन चट्टानों का विस्तार झारखण्ड के सिंहभूम, सरायकेला, सिमडेगा तथा दक्षिण पूर्वी झारखण्ड के क्षेत्रों में है।
> इन चट्टानों को आर्कियन क्रम व धारवाड़ क्रम की चट्टानों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
> झारखण्ड आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 के अनुसार राज्य के 85% भूभाग पर आग्नेय व रूपांतरित चट्टानों का विस्तार है। 
> आर्कियन क्रम
> ये गर्म व तरल लावा के जमाव से निर्मित ग्रेनाइट चट्टान हैं, जो जीवाश्म रहित हैं।
> इनमें रूपांतरण के पश्चात ये चट्टानें नीस व सिस्ट में परिवर्तित हो गयी हैं।
> धारवाड़ क्रम
> इन चट्टानों का विकास आर्कियन क्रम की चट्टानों के अपरदन व निक्षेपण के परिणामस्वरूप हुआ है।
> इन चट्टानों के बारे में सर्वप्रथम जानकारी कर्नाटक के धारवाड़ जिले में मिली थी जिसके कारण इनका नामकरण धारवाड़ क्रम की चट्टान के रूप में किया गया है।
> ये चट्टानें भी जीवाश्म रहित हैं।
> झारखण्ड में इनका मूल विस्तार कोल्हान क्षेत्र में होने के कारण इसे कोल्हान क्रम की चट्टान भी कहा जाता है। 
> इन चट्टानों में लौह-अयस्क की प्रचुर उपलब्धता के कारण इन्हें 'लौह-अयस्क की श्रृंखला' (Iron-Ore Series) कहा जाता है। 
> झारखण्ड में इन चट्टानों का विस्तार पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम तथा सरायकेला-खरसावां जिले में हुआ है।
> इन चट्टानों में धात्विक खनिजों की उपलब्धता है जिसमें लोहा, तांबा, बॉक्साइट, निकेल, सोना, मैंगनीज, चाँदी आदि प्रमुख हैं।
2. विन्ध्यन क्रम की चट्टानें
> विन्ध्यन क्रम की चट्टानें झारखण्ड के उत्तर-पश्चिमी भाग में सोन नदी क्षेत्र (विशेष रूप से गढ़वा) में पायी जाती हैं। ये चट्टानें मूलतः रोहतास पठार का दक्षिणी हिस्सा है।
> अवसादों के जमाव से निर्मित ये चट्टानें बलुआ पत्थर एवं चुना पत्थर से युक्त क्षैतिज परतदार चट्टानें हैं। 
> पारसनाथ पहाड़ी का उत्थान भी इसी काल में हुआ है।
3. गोंडवाना क्रम की चट्टानें
> इन चट्टानों का निर्माण दामोदर घाटी के तलछट से हुआ है।
> इन चट्टानों में प्रचुर मात्रा में कोयला के भंडार के साथ ही बलुआ पत्थर की परत भी पायी जाती है।
> झारखण्ड के प्रमुख कोयला निक्षेपों का निर्माण इसी चट्टान से हुआ है। 
> आर्थिक दृष्टिकोण से ये चट्टानें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
> इन चट्टानों का विस्तार गिरिडीह, राजमहल की पहाड़ियों तथा उत्तरी कोयल नदी की घाटी क्षेत्रों में है। 
4. सिनोजोइक क्रम
> इस काल में हिमालय के उत्थान के दौरान इसका प्रभाव छोटानागपुर पठारी क्षेत्र पर भी पड़ा। 
> हिमालय के उत्थान व उसके प्रभाव को तीन भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है, जिसका विवरण निम्नवत है
> पहला उत्थान
> हिमालय के प्रथम उत्थान का संबंध मायोसीन काल से है।
> इस दौरान छोटानागपुर पठारी क्षेत्र में भूगर्भिक हलचलों के परिणामस्वरूप पाट क्षेत्र का उत्थान हुआ।
> इस उत्थान के परिणामस्वरूप पाट क्षेत्र राँची - हजारीबाग पठार से लगभग 1000 फीट ऊपर उठ गया। 
> दूसरा उत्थान
> इस उत्थान का संबंध अंतिम प्लायोसीन काल से है।
> इस दौरान भी छोटानागपुर पठारी क्षेत्र में भूगर्भिक हलचल हुयी ।
> इस दौरान राँची-हजारीबाग पठार का लगभग 1000 फीट उत्थान हुआ जिसके परिणामस्वरूप पाट क्षेत्र लगभग 2000 फीट ऊपर उठ गया।
> तीसरा उत्थान
> इस उत्थान का संबंध प्लीस्टोसीन काल से है।
> इस दौरान भी छोटानागपुर पठारी क्षेत्र मैं भूगर्भिक हलचल हुयी
> इस दौरान राँची - हजारीबाग पठार का लगभग 2000 फीट उत्थान हुआ जिसके परिणामस्वरूप पाट क्षेत्र लगभग 3000-3600 फीट ऊपर उठ गया।
> उपरोक्त तीनों उत्थानों के परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में विभिन्न नदियों का उद्भव हुआ। कालांतर में इन नदियों के द्वारा किए गए अपरदन के परिणामस्वरूप इस क्षेत्र के धरातलीय स्वरूप की ऊँचाई में कमी आयी।
> इन अपरदनों के पश्चात् इस क्षेत्र की वर्तमान ऊँचाई इस प्रकार है –
» पाट क्षेत्र–900 से 1100 मीटर
» राँची पठारी–600 मीटर से कम
» निम्न छोटानागपुर का पठार–300 मीटर से अधिक
4. राजमहल ट्रैप तथा दक्कन लावा की चट्टानें
> जुरैसिक युग में लावा दक्कन लावा का निर्माण हुआ है। बहाव से राजमहल ट्रैप का निर्माण हुआ है जबकि दरारों में लावा के प्रवाह से
> इन चट्टानों के अपक्षयन के परिणामस्वरूप लैटेराइट एवं बॉक्साइट का निर्माण हुआ है।
> राजमहल ट्रैप का मूल विस्तार झारखण्ड के उत्तरर-पूर्वी भाग में ( साहेबगंज के पूर्वोत्तर भाग व पाकुड़ के पूर्वी भाग में) है। इसके अलावा यह झारखण्ड के पाट क्षेत्र (पलामू, गढ़वा, गुमला तथा लोहरदगा) में भी विस्तारित है।
> इसकी ऊँचाई 900 से 1100 मीटर तक है। 
5. नवीनतम जलोढ़ निक्षेप
> नदियों के अपरदन व जलोढ़ों के निक्षेपण के परिणामस्वरूप इसका निर्माण हुआ है, जो वर्तमान में भी जारी है। 
> झारखण्ड के राजमहल के पूर्वी क्षेत्रों, सोन नदी घाटी तथा स्वर्णरेखा नदी की निचली घाटी के क्षेत्रों में नदियों के जलोंढ़ों के निक्षेपण से इस संरचना का निर्माण हुआ है।
> इनके द्वारा मैदानी क्षेत्र में निक्षेपण के परिणामस्वरूप कई स्थानों पर ग्रेनाइट के उच्च भूभाग का निर्माण हो गया है, जिसे मॉनेडनॉक कहते हैं।
> अन्य तथ्य
> राज्य की अधिकांश चट्टानों का विस्तार पूर्व-पश्चिम दिशा मे है।
> झारखण्ड में धारवाड़ क्रम की चट्टानों का विकास कोल्हान पहाड़ी क्षेत्र में हुआ है। इन चट्टानों को 'लौह अयस्क की श्रृंखला' भी कहा जाता है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:12:19 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड का भौगोलिक परिचय https://m.jaankarirakho.com/313 https://m.jaankarirakho.com/313 > झारखण्ड राज्य का भौगोलिक विस्तार 21°58'10" से 25°19'15" उत्तरी अक्षांश तथा 83°19'50" से 87°57' पूर्वी देशांतर के मध्य है।
> यह राज्य विश्व के मानचित्र पर उत्तरी गोलार्द्ध  में अवस्थित है।
> इस राज्य का निर्माण एकीकृत बिहार के 46% भूभाग को अलग करके किया गया था। 
> देश के पूर्वी भाग में स्थित झारखण्ड भारत का 28वाँ राज्य है।
> झारखण्ड प्रदेश में मुख्यतः छोटानागपुर पठार तथा संथाल परगना का वन क्षेत्र सम्मिलित है।
> छोटानागपुर झारखण्ड का सबसे बड़ा भाग है, जबकि संथाल परगना दूसरा सबसे बड़ा भाग है। झारखण्ड राज्य का विस्तार उत्तर से दक्षिण तक 380 किलोमीटर तथा पूर्व से पश्चिम तक 463 किलोमीटर तक है।
> झारखण्ड राज्य का क्षेत्रफल 79,714 वर्ग किमी. है जो देश के कुल क्षेत्रफल का 2.42% है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भारत का 15वाँ बड़ा राज्य है। (जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद)
> झारखण्ड राज्य की कुल जनसंख्या 3,29, 88,134 है जो देश की कुल जनसंख्या का 2.72% है। जनसंख्या की दृष्टि से यह राज्य देश में 14वें स्थान पर अवस्थित है।
> झारखण्ड राज्य की सीमाएँ देश के 5 राज्यों * को स्पर्श करती हैं। इसके उत्तर में बिहार, दक्षिण में उड़ीसा पूर्व में पश्चिम बंगाल तथा पश्चिम में छत्तीसगढ़ व पश्चिमोत्तर में उत्तर प्रदेश राज्य अवस्थित हैं। 
> झारखण्ड एक स्थलबद्ध (Landlocked) अथवा भू-आवेष्ठित राज्य है अर्थात इसकी भौगोलिक सीमा समुद्र को  स्पर्श नहीं करती है। भारत के अन्य स्थलबद्ध राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं हरियाणा हैं। 
> कर्क रेखा झारखण्ड राज्य के बिल्कुल मध्य से गुजरती है। यह राज्य के लातेहार (नेतरहाट), लोहरदगा (किस्को), गुमला, राँची (काँके व ओरमाँझी) तथा रामगढ़ (गोला) जिले से गुजरती है।
> झारखण्ड राज्य की आकृति चतुर्भुजाकार है।
> झारखण्ड राज्य में आर्कियन काल के ग्रेनाइट-नीस से निर्मित चट्टानों से लेकर चतुर्थकल्प काल की नवीन जलोढ़ मृदा तक पायी जाती है।
> राज्य की अधिकांश चट्टानों का विस्तार पूरब- पश्चिम दिशा में है। सिंहभूम में स्थित चट्टानें राज्य की एकमात्र ऐसी चट्टानें हैं जिनका विस्तार दक्षिण-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर है।
> छोटानागपुर का पठार झारखण्ड राज्य की धरातलीय संरचना के निर्माण की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण संरचना है।
> छोटानागपुर पठार का सबसे ऊँचा स्थान पाट (Pat) कहलाता है तथा यहाँ वनों व आदिम जनजातियों की बहुलता पायी जाती है।
> झारखण्ड की सबसे ऊंची चोटी पारसनाथ ( सम्मेद शिखर ) है ।
> सोन नदी के अतिरिक्त झारखण्ड की सभी नदियाँ बरसाती हैं तथा गर्मी के दिनों में प्रायः सूख जाती हैं।
> झारखण्ड में अनेकों जलप्रपात तथा गर्म जलकुंड पाये जाते हैं, जो झारखण्ड के जल संसाधन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
> झारखण्ड राज्य की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी प्रकार की है तथा इस राज्य में दक्षिण-पश्चिम मानसून की दोनों शाखाओं द्वारा वर्षा होती है। 
> चट्टानों के अपक्षयन से प्राप्त अवशेषों से निर्मित होने के कारण यहाँ की मिट्टी अवशिष्ट प्रकार की है। 
> झारखण्ड के कुल भू-भाग के 29.62% प्रतिशत (वन स्थिति रिपोर्ट- 2019 के अनुसार ) भाग पर वन पाये जाते हैं।
> वन स्थिति रिपोर्ट-2019 के अनुसार झारखण्ड राज्य का कुल कार्बन स्टॉक 178.01 मिलियन टन है, जो 652.70 मिलियन टन कार्बन डाई आक्साइड के बराबर है। यह देश के कुल कार्बन स्टॉक का 2.50% है। 
> पठारी क्षेत्र एवं सिंचाई सुविधाओं के अभाव के कारण इस राज्य में विभिन्न सिंचाई परियोजनाएँ चलायी जा रही हैं। 
> राज्य में संचालित बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं में दामोदर नदी घाटी परियोजना तथा स्वर्णरेखा नदी घाटी परियोजना प्रमुख हैं। दामोदर नदी घाटी परियोजना भारत की प्रथम बहुद्देशीय नदी घाटी परियोजना है।
> बिहार तथा पश्चिम बंगाल राज्य की सीमाओं को झारखण्ड के सर्वाधिक दस-दस जिले स्पर्श करते हैं । 
> उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा को स्पर्श करने वाला राज्य का एकमात्र जिला गढ़वा है । 
> गढ़वा जिला की सीमा तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा बिहार से लगी हुई है। 
> खूँटी तथा लोहरदगा ही ऐसे जिले हैं जो किसी अन्य राज्य की सीमा को स्पर्श नहीं करते हैं। 
> राज्य में क्षेत्रफल की दृष्टि से बड़े तथा छोटे जिले :
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Sat, 09 Sep 2023 10:09:43 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड का साहित्य https://m.jaankarirakho.com/312 https://m.jaankarirakho.com/312
> जनजातीय साहित्य
> संथाली
> झारखण्ड का संथाली साहित्य अत्यंत समृद्ध है। इस साहित्य में जंगली पशुओं को पात्र प्रस्तुत करते अधिकांश कहानियों की रचना की गई है। 
> इस भाषा का संबंध आस्ट्रिक या आग्नेय भाषा परिवार से है।
> संथाली भाषा पर प्रथम पुस्तक का प्रकाशन 1852 ई. में 'एन इंट्रोडक्शन टू द संथाल लैंग्वेज' के नाम से किया गया था।
> 1873 ई. में एल. ओ. स्क्रेप्सरूड द्वारा संथाली भाषा का प्रथम व्याकरण 'ए ग्रामर ऑफ दि संथाली लैंग्वेज' प्रकाशित किया गया था।
> 1867 ई. में सींथालिया एण्ड द संथाल (ई. जी. मन्न) तथा 1868 ई. में ए वोकेबुलेरी ऑफ संथाल लैंग्वेज (रे. ई. एल. पक्सुले) का प्रकाशन किया गया।
> 1899 ई. में कैंपवेल द्वारा 'संथाली - इंग्लिश एण्ड इंग्लिश-संथाली शब्दकोष' का प्रकाशन किया गया था। 
> 1929 ई. में पी. ओ. बोडिंग की मैटिरियल्स फॉर ए संताली ग्रामर का प्रकाशन किया गया।
> 1936 ई. में पाल जूझार सोरेन की मौलिक कविताओं का संग्रह 'ओनांडहें बाहा डालवाक' का प्रकाशन किया गया। 
> संथाली का प्रथम उपन्यास 'हाड़मवाक् आतो' (हाड़मा का गाँव) 1946 ई. में रोमन लिपि में प्रकाशित किया गया। इसके उपन्यासकार आर. कारर्टेयर्स थे । संथाली का दूसरा उपन्यास 'मुहिला चेचेत दाई' (अध्यापिका महिला) है, जिसके उपन्यासकार ननकू सोरेन हैं।
> देवनागरी लिपि में संथाली का प्रथम काव्य संग्रह 'कुकमू' (स्वप्न) बाल किशोर साहु द्वारा लिखा गया। 
> पंडित रघुनाथ मुरमू ने सन् 1941 में संथाली भाषा के लिए 'ओलचिकी' लिपि की खोज की है।
> संथाली भाषा का प्रथम साहित्यिक नाटक रघुनाथ मुर्मू द्वारा लिखित 'विदू-चांदन' है। इसका पहली बार 1942 में उड़िया लिपि में प्रकाशन किया गया।
> संथाली भाषा का प्रथम समाचार पत्र 'होड़ संवाद' था, जिसका संपादन 1947 ई. में डोमन साहू समीर 
( संथाली भाषा का भारतेंदु ) द्वारा किया गया। 
> 1947 ई. में ही मैकफेल की एन इन्ट्रोडक्शन टू संथाली का प्रकाशन किया गया। 
> 1951 ई. में डोमन साहू समीर द्वारा 'संथाली प्रवेशिका' तथा केवल सोरेन द्वारा 'हिंदी - संथाली' कोष का प्रकाशन किया गया। दोनों ही पुस्तकें देवनागरी लिपि में थी।
> 1953 ई. में शारदा प्रसाद किस्कु द्वारा देवनागरी लिपि में 41 कविताओं का संग्रह 'भुरका इंपिल' का प्रकाशन किया गया।
> 1953 ई. में ही डोमन साहू समीर की पुस्तक 'दिसोम बाबा' का प्रकाशन किया गया। इसमें देवनागिरी लिपि में छंद के रूप में संथाली लोकगीत हैं।
> मोगला सोरेन को संथाली नाटक 'राही रावण काना' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। 
> मुण्डारी
> सोंसो बोंगा * मुण्डारी साहित्य की एक प्रमुख लोककथा है जो देवड़ा द्वारा धार्मिक रीति के साथ कही जाती है। सोसो बोंगा को बैलेट के रूप में गढ़ा गया है।
> मुण्डा कथाओं का एक प्रमुख लोक संग्रह 'मटुरा कहानी' है, जिसकी रचना मेनास आड़ेया ने की है। 
> मुण्डारी भाषा पर 1873 में जे. सी. व्हिटली द्वारा 'मुण्डारी प्राइमर' पुस्तक लिखी गई 
> मुंडारी भाषा की पहली व्याकरण 'मुण्डारी ग्रामर' का प्रकाशन 1882 ई. में ए. नोट्रोट द्वारा किया गया। इन्होनें 1899 ई. में मुण्डारी बाइबिल नामक पुस्तक लिखी।
> 1891 ई. में डी. स्मेट की मुण्डारी ग्रामर का प्रकाशन हुआ। 
> फादर हॉफमैन ने 1896 ई. में मुण्डारी फर्स्ट प्राइमर तथा 1903 ई. में मुण्डारी ग्रामर नामक पुस्तक लिखी। 
> 1912 ई. में एस. सी. राय द्वारा लिखित 'मुण्डाज एंड देयर कंट्रीज', 1915 में जॉन हॉफमैन द्वारा लिखित 'इनसाइक्लोपीडिया मुण्डारिका' * तथा 1986 में पी. के. मित्रा द्वारा लिखित 'मुण्डारी फोकटेल' इस भाषा की प्रमुख पुस्तकें हैं। इनसाइक्लोपीडिया मुण्डारिका को मुण्डारी भाषा एवं साहित्य का विश्वकोष माना जाता है।
> 'मुण्डा दुरङ' मुण्डारी लोकगीतों का संकलन है जिसकी रचना डब्लू. जी. आर्चर ने 1942 ई. में की। 
> 1956 ई. में पी. के. मित्रा ने मुण्डारी फोकटेल नामक पुस्तक लिखी।
> 'मुण्डारी टुड को ठारि' नामक पुस्तक के लेखक मनमसीह मुण्डु हैं।
>>मुण्डारी भाषा की कुछ अन्य प्रमुख पुस्तकें बज रही बाँसुरी व सोसो बोंगा (जगदीश त्रिगुणायत), चंगा दुरंड (बलदेव मुण्डा), बिरसा भगवान नाटक (सुखदेव वरदियार) आदि हैं।
> इस भाषा में जयपाल सिंह द्वारा 'आदिवासी सकम' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया गया था।
> 'मुण्डारी लोक कथाएँ' नामक पुस्तक के लेखक जगदीश त्रिगुणायत हैं। 
> हो
> हो भाषा की अपनी शब्दावली एवं उच्चारण पद्धति है।
> हो भाषा की प्रथम पुस्तक 'द ग्रामेटिकल कंस्ट्रक्शंस ऑफ द हो लैंग्वेज' का प्रकाशन 1840 ई. में किया गया। 
> 1866 ई. में भीमराम सुलंकी की 'हो काजी व्याकरण ग्रंथ' का प्रकाशन किया गया।
> 1902 ई. में एन. के. बोस तथा सी. एच. बोम्बावस द्वारा हो जनजातियों के लोकगीतों पर पहली पुस्तक 'फोकलोर ऑफ द कोल्हान' का प्रकाशन किया गया।
> 1905 ई. में ए. नोट्राट की पुस्तक 'ग्रामर ऑफ द कोल' का प्रकाशन किया गया।
> 1915 ई. में लियोनल बरो की 'हो ग्रामर' का प्रकाशन किया गया।
> 1930 में हाफमैन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'एनसाइक्लोपीडिया मुण्डारिका' में भी हो भाषा के अनेक लोकगीतों एवं लोक कथाओं का संकलन है।
> डब्लू. जी. आर्चर की पुस्तक 'हो दूरङ' में हो लोकगीतों का संकलन है । यह पुस्तक देवनागिरी लिपि में है। इसे हो साहित्य का महाकाव्य कहा जाता है। इसका प्रकाशन 1942 ई. में किया गया।
> किसी हो व्यक्ति द्वारा लिखित पहली पुस्तक का नाम 'रूमुल' है। इसे सतीश कोड़ा सेंगल द्वारा लिखा गया है। 
> हो भाषा की अन्य प्रमुख पुस्तकें भीम राम सोलंकी द्वारा लिखित 'हो काजी', लियोनल बरो की 'हो ग्रामर', हो ग्रामर एंड वोकेबुलरी आदि हैं।
> खड़िया
> खड़िया का लिखित साहित्य अभी विकासशील अवस्था में है।
> 1894 ई. में जी. सी. बनर्जी द्वारा लिखित 'इंट्रेडक्शन टू खड़िया लैंग्वेज', 1934 में फ्लोर चेइसंस द्वारा लिखित पुस्तक 'खड़िया शब्दकोष' का प्रकाशन किया गया।
> 1937 में एस. सी. राय ने खड़िया लोकगीतों, लोक-कथाओं तथा मंत्रों को 'द खड़ियाज' मक पुस्तक में संकलित किया।
> 1942 ई. में डब्लू. जी. आर्चर द्वारा खड़िया लोकगीतों को 'खड़िया ओलोंग' नामक पुस्तक में संकलित किया गया।
> खड़िया भाषा की प्रमुख पत्रिकाएँ 'तारदी- और 'जोहार' का प्रकाशन भी किया गया।
> कुडुख
> झारखण्ड की सभी क्षेत्रीय भाषाओं में सर्वाधिक लिखित साहित्य कुडुख भाषा में ही उपलब्ध है। 
> 1874 ई. में ओ. फ्लैक्स द्वारा 'एन इंट्रोडक्शन टू उराँव लैंग्वेज' तथा सर जार्ज कैंपवेल द्वारा स्पेरिमेंस ऑफ लैंग्वेज ऑफ इण्डिया' नामक पुस्तक की रचना की गई।
> 1886 ई. में एफ. वैच की 'ब्रीफ ग्रमार एंड वोकेबुलरी ऑफ उरॉव लैंग्वेज मक पुस्तक की रचना की गई।
> फर्डिनेंट हॉन द्वारा 1898 ई. में 'कुडूख ग्रामर' तथा 1903 ई. में 'कुडुख - अंग्रेजी डिक्शनरी' की रचना की गयी।
> 1909 ई. में ए. ग्रिनार्ड द्वारा 'कुडुख फोकलोर' नामक पुस्तक की रचना की गई।
> 1924 ई. में ए. ग्रिनार्ड ने 'ए उराँव इंग्लिश डिक्शनरी' तथा 1941 में रेवहॉन व डब्लू. जी. आर्चर ने ‘लील-खोरा-खेखेल' नामक पुस्तक का प्रकाशन किया।
> 1949 ई. में अहलाद तिर्की 'कुडुख सरहा' नामक व्याकरण की रचना की।
> कवि बिहारी लकड़ा ने 1950 में कुडुख गीतों का संकलन 'कुडुख डंड़ी' प्रकाशित किया। इन्हें 2003 में साहित्य अकादमी के भाषा सम्मान से सम्मानित किया गया।
> 1950 ई. में देवले कुजूर की कविता संग्रह 'मुता- पूँप - झँपा' का प्रकाशन किया गया।
> 1940 ई. में इग्नेश बे ने 'विजबिनको' तथा 1949 ई. में अहलाद तिर्की ने 'बोलता' एवं 'धुमकुड़िया' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया।
> सदानी साहित्य
> खोरठा
> यह खरोष्ठी लिपि से संबंधित है तथा खरोष्ठी का ही अपभ्रंशित रूप है। 
> सिंधु सभ्यता के लोग खरोष्ठी लिपि का प्रयोग करते थे । 
> खोरठा साहित्य में अधिकतर राजा-रानी तथा राजकुमार राजकुमारी आदि की कथाएँ मिलती हैं।
> खोरठा से संबंधित प्रमुख रचनाएँ तथा रचनाकार:
> नागपुरी
> नागपुरी का लिखित साहित्य अत्यंत समृद्ध है।
> 1896 ई. में ई. एच. व्हिटली द्वारा नागपुरी का प्रथम व्याकरण 'नोट्स ऑन दि गँवारी डायलेक्ट ऑफ लोहरदगा, छोटानागपुरी' की रचना की गई।
> नागपुरी से संबंधित प्रमुख रचनाएँ तथा रचनाकार:–
> फादर पीटर शांति नवरंगी ने 'ईसु चरित चिंतामईन' (1964) की रचना नागपुरी भाषा में की है। इस पुस्तक में ईसा मसीह के जीवन का वर्णन किया गया है।
> पंचपरगनिया
> विनोदिया कवि / विनोद कवि को पंचपरगनिया साहित्य का आरंभकर्ता माना जाता है।
> पंचपरगनिया साहित्य में क्षेत्र एवं परिवेश के प्रति सजगता तथा वैष्णव भक्ति की झलक दिखायी पड़ती है। 
> पंचपरगनिया के कवि सोबरन ने पंचपरगनिया के कबीरपंथी धारा को प्रोत्साहित किया।
> पंचपरगनिया से संबंधित प्रमुख रचनाएँ तथा रचनाकार:–
> कुरमाली
> कुरमाली भाषा का प्रथम शोध डॉ० नन्दकिशोर सिंह ने किया है।
> कुरमाली भाषा का लिखित साहित्य अत्यंत कम मिलता है। 
> कुरमाली से संबंधित प्रमुख रचनाएँ तथा रचनाकार:–
> अन्य महत्वपूर्ण तथ्य 
> झारखण्ड के आरंभिक कवियों में वैद्यनाथ पोद्दार (बैजू बाबू), चिरंजी लाल शर्मा, कवि रांचिवी, कविराज देवकी नंदन शर्मा आदि प्रमुख हैं।
> चिरंजी लाल शर्मा हास्य प्रधान कवि थे।
> वैद्यनाथ पोद्दार झारखण्ड में प्रथम पीढ़ी के कहानीकार माने जाते हैं। 
> राधाकृष्ण झारखण्ड में द्वितीय पीढ़ी के कहानीकार हैं।
> रामचीं सिंह 'वल्लभ' के उपन्यास 'राजपूतानी शान ' (1906) को झारखण्ड के हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास माना जाता है ।
> अनन्त सहाय अखौरी के नाटक 'ग्रह का फेर' (1913) को झारखण्डी हिन्दी साहित्य का पहला नाटक माना जाता है।
> बिरसा मुण्डा और उनके आंदोलन को केन्द्र में रखकर के. एस. सिंह ने 'डस्ट स्टॉर्म एंड हैंगिंग मिस्ट: ए स्टडी ऑफ बिरसा मुण्डा एंड हिस मूवमेंट इन छोटनागपुर ( 1974-1901)' नामक पुस्तक की रचना की है। 
> संथाली भाषा का प्रथम छोटी कहानी का संग्रह 'कुकमु' है ।
> झारखण्ड के विधायक सरयू राय की चर्चित पुस्तक 'रहबर की राहजनी' है।
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Sat, 09 Sep 2023 10:03:28 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की भाषाएँ https://m.jaankarirakho.com/311 https://m.jaankarirakho.com/311 आदिवासी / जनजातीय भाषा
> भाषा
> संथाली
> संबंधित जनजाति
> संथाली जनजाति
> महत्वपूर्ण बातें
> संथाली अपनी भाषा को होड़ रोड़ अर्थात् होड़ लोगों की बोली कहते हैं। 
> संथाली भाषा के दो रूप हैं- शुद्ध संथाली एवं मिश्रित संथाली ।
> 92 वें संविधान संशोधन, 2003 द्वारा भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में संथाली भाषा को शामिल किया गया है। 
> आठवीं अनुसूची में शामिल की जानेवाली यह झारखण्ड की एकमात्र क्षेत्रीय भाषा है।
> संथाली भाषा के लिए पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा सन् 1941 में ओलचिकी लिपि का आविष्कार किया गया है।
> डोमन साहू समीर को संथाली साहित्य का भारतेन्दु कहा जाता है (प्रमुख रचना संताली प्रवेशिक,1951) I
> इस भाषा का संबंध ऑस्ट्रो एशियाटिक (मुण्डारी) भाषा परिवार से है।
> भाषा
> मुण्डारी
> संबंधित जनजाति
> मुण्डा जनजाति
> महत्वपूर्ण बातें
> इस भाषा के चार रूप पाये जाते हैं
» हसद मुण्डारी - खूँटी व मुरहू के आसपास के क्षेत्र में प्रचलित
» तमड़िया मुण्डारी – तमाड़ व आसपास के क्षेत्र में प्रचलित
» केर मुण्डारी - राँची व आसपास के क्षेत्र में प्रचलित
» नगुरी मुण्डारी - नागपुरी भाषा मिश्रित मुण्डारी
> इस भाषा का संबंध ऑस्ट्रो एशियाटिक (मुण्डारी) भाषा परिवार से है ।
> भाषा
> हो
> संबंधित जनजाति 
> हो
> महत्वपूर्ण बातें
> इस भाषा की अपनी शब्दावली एवं उच्चारण पद्धति है।
> 'लोका बोदरा' नामक व्यक्ति ने हो भाषा हेतु 'बारङचित्ति' नामक लिपि का विकास किया गया है ।
> भाषा 
> खड़िया
> संबंधित जनजाति 
> खड़िया
> महत्वपूर्ण बातें 
> इस भाषा का संबंध ऑस्ट्रो एशियाटिक (मुण्डारी) भाषा परिवार से है। 
> भाषा
> कुडुख/उराँव
> संबंधित जनजाति 
> उराँव
> महत्वपूर्ण बातें 
> झारखण्ड के क्षेत्रीय भाषाओं के संदर्भ में इस भाषा का सर्वाधिक लिखित साहित्य मिलता है। 
> इस भाषा का संबंध द्रविड़ भाषा परिवार से है। 
> भाषा 
> माल्टा / मालतो
> संबंधित जनजाति 
 > सैरिया पहाड़िया, माल पहाड़िया, गोंड 
> महत्वपूर्ण बातें 
> यह कुडुख भाषा का ही एक रूप है।
> इस भाषा का संबंध द्रविड़ भाषा परिवार से है।
> भाषा 
> असुरी
> संबंधित जनजाति 
> असुर
> महत्वपूर्ण बातें 
> यह भाषा लगभग विलुप्तप्राय * है और इसे बोलने वालों की संख्या कुछ हजार है।
> सदानी भाषा 
> भाषा
> खोरठा
> महत्वपूर्ण बातें
> इसका संबंध खरोष्ठी लिपि से है।
> यह भारोपीय (भारतीय - यूरोपीय) भाषा परिवार से संबंधित है।
> यह मागधी प्राकृत से विकसित एक भाषा है।
> यह हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, संथाल परगना, राँची व पलामू में बोली जाती है।
> खोरठा साहित्य में अधिकांशतः राजा-रजवाड़ों आदि की कथाएँ मिलती हैं। 
> भाषा
> पंचपरगनिया
> महत्वपूर्ण बातें
> यह भाषा पंचपरगना क्षेत्र ( तमाड़, बुण्डू, सोनहातू एवं सिल्ली) में बोली जाती है।
> यह भारोपीय (भारतीय यूरोपीय) भाषा परिवार से संबंधित है।
> इस भाषा में क्षेत्र एवं परिवेश के प्रति सजगता एवं वैष्णव भक्ति का चित्रण मिलता है।
> भाषा
> कुरमाली / करमाली
> महत्वपूर्ण बातें
> यह मूलतः कुरमी जाति की भाषा है।
> यह भारोपीय (भारतीय यूरोपीय) भाषा परिवार से संबंधित है।
> यह राँची, हजारीबाग, गिरिडीह, धनबाद, सिंहभूम एवं सथाल परगना में बोली जाती है।
> भाषा 
> नागपुरी
> महत्वपूर्ण बातें 
> इस भाषा का विकास मागधी प्राकृत भाषा से हुआ है।
> यह झारखण्ड की प्रमुख संपर्क भाषा है। 
> यह भाषा सादरी एवं गंवारी के नाम से भी जानी जाती है। 
> यह नागवंशी राजाओं की मातृभाषा थी। 
> नागपुरी के प्रथम ज्ञात कवि बेनीराम महथा ( रचना-नागवंशावली) हैं। 
> अन्य प्रमुख भाषाएँ
> भाषा
> भोजपुरी
> महत्वपूर्ण बातें
> झारखण्ड में प्रचलित भोजपुरी दो वर्गों में विभाजित है 
» आदर्श भोजपुरी - यह मुख्यतः पलामू व उसके आसपास के क्षेत्र में बोली जाती है।
» नगपुरिया, सदरी व सदानी भोजपुरी - यह छोटानागपुर व गैर-आदिवासी क्षेत्रों में बोली जाती है।
> भाषा
> मगही
> महत्वपूर्ण बातें
> डॉ जार्ज ग्रियर्सन (भाषा वैज्ञानिक) द्वारा प्रचलित मगही दो वर्गों में विभाजित किया गया है –
» आदर्श मगही - यह मुख्यत: हजारीबाग व पूर्वी पलामू क्षेत्र में बोली जाती है।
» पूर्वी मगही यह राँची, रामगढ़, हजारीबाग आदि क्षेत्रों में बोली जाती है।
> भाषा
> अंगिका
> महत्वपूर्ण बातें
> इसे मैथिली का ही एक रूप माना जाता है।
> यह मुख्य रूप से संथाल परगना क्षेत्र में बोली जाती है।
> छठी शताब्दी में रचित ललित विस्तार नामक ग्रंथ की रचना अंगिका भाषा में की गयी थी।
> भाषा
> जिप्सी
> महत्वपूर्ण बातें
> यह झारखण्ड के सीमित क्षेत्र में मुख्यतः नट, मलाट व गुलगुलिया जातियों द्वारा बोली जाती है।
> झारखण्ड की क्षेत्रीय भाषाओं का विभाजन
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Sat, 09 Sep 2023 09:58:55 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की चित्रकला व शिल्पकला https://m.jaankarirakho.com/310 https://m.jaankarirakho.com/310 > चित्रकला का नाम 
> जादोपटिया चित्रकला
> विशेषता
> जादो (चित्रकार) एवं पटिया (कागज या कपड़ा के छोटे-छोटे टुकड़े) को जोड़कर बनाया जाने वाला चित्रफलक है।
> यह चित्रकारी मुख्यतः संथालों में प्रचलित है । 
> इस चित्रकला में कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर निर्मित 15-20 फीट चौड़े पटों पर चित्रकारी की जाती है। प्रत्येक पट पर 4 से 16 तक चित्र बनाये जाते हैं।
> इसमें चित्रकारी हेतु मुख्य रूप से लाल, हरा, पीला, भूरा व काले रंगों का प्रयोग होता है।
> इन चित्रों की रचना करने वाले को संथाली भाषा में जादो कहा जाता है।
> इसमें बाघ देवता और जीवन के बाद के दृश्यों का चित्रण किया जाता है।
> यह चित्रकला दुमका जिले में अत्यंत प्रसिद्ध है।
> चित्रकला का नाम 
> सोहराय चित्रकला
> विशेषता
> यह चित्रकारी सोहराय पर्व से जुड़ी है।
> यह चित्रकारी वर्षा ऋतु के बाद घरों की लिपाई-पुताई से शुरू होता है। 
> इस चित्रकारी में कला के देवता प्रजापिता या पशुपति का चित्रण मिलता है तथा पशुपति का सांढ़ की पीठ पर खड़ा चित्रण किया जाता है। 
> 'मंझू सोहराय' तथा 'कुर्मी सोहराय' इस चित्रकला की दो प्रमुख शैलियाँ हैं।
> यह चित्रकला हजारीबाग जिले में अत्यंत प्रसिद्ध है।
> सोहराय व कोहबर चित्रकला को 2020 में जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) प्रदान किया गया है। यह झारखण्ड में किसी भी श्रेणी में प्राप्त होने वाला पहला जीआई टैग है। इसके लिए सोहराय कला विकास सहयोगी समिति, हजारीबाग द्वारा आवेदन दिया गया था।
> चित्रकला का नाम 
> कोहबर चित्रकला
> विशेषता
> कोहबर का सामान्य अर्थ 'गुफा में विवाहित जोड़ा' होता है।
> विवाहित महिला द्वारा अपने पति के घर कोहबर कला का चित्रण किया जाता है।
> इसमें घर-आंगन में विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों में फूल-पत्ती, पेड़-पौधे व नर-नारी का चित्रण किया जाता है।
> यह चित्रकारी मुख्यतः बिरहोर जनजाति में प्रचलित है।
> इसमें सिकी (देवी) का चित्रण मिलता है।
> कोहबर चित्रकला को 2020 में जीआई टैग प्रदान किया गया है।
> चित्रकला का नाम 
> गंजू चित्रकला
> विशेषता
> इस कला में पशुओं, वन्य तथा पालतू जानवरों एवं वनस्पतियों की तस्वीरें बनाई जाती हैं। 
> इस चित्रकला के माध्यम से संकटग्रस्त जानवरों को रीति-रिवाजों में दर्शाया जाता है।
> चित्रकला का नाम 
> पईत्कर चित्रकला
> विशेषता
> यह चित्रकारी अमादुबी (सिंहभूम) गाँव में अत्यंत प्रसिद्ध है, जिसके कारण इस गाँव को पईत्कर का गाँव भी कहा जाता है। 
> इसे झारखण्ड का स्क्रॉल चित्रकला भी कहा जाता है। यह प्राचीन काल से झारखण्ड में विद्यमान है। माना जाता है कि इसकी शुरूआत सबर जनजाति द्वारा की गई थी। इसे भारत का सबसे पुराना आदिवासी चित्रकला माना जाता है।
> यह चित्रकला गरूड़ पुराण में भी मिलती है।
> झारखण्ड के अतिरिक्त यह चित्रकला बिहार, उड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल में भी लोकप्रिय है।
> इस चित्रकला के माध्यम से जनजातियों द्वारा विभिन्न कहानियों तथा स्थानीय रीति का वर्णन किया जाता  है ।
> इसके माध्यम से जीवन के बाद होने वाली घटनाओं का वर्णन किया जाता है। 
> चित्रकला का नाम 
> राना, तेली एवं प्रजापति चित्रकला 
> विशेषता
> इन तीन चित्रकलाओं का प्रयोग उक्त तीन उपजातियों द्वारा किया जाता है।
> इस चित्रकला में पशुपति (भगवान शिव) को पशुओं एवं पेड़-पौधों के देवता रूप में प्रदर्शित किया जाता है।
> इस चित्रकला में धातु के तंतुओं का प्रयोग किया जाता है।
> कोहबर व सोहराय चित्रकला में अंतर
> शिल्पकला
> डोकरा कला
> डोकरा कला दस्तकारी की एक प्राचीन कला है जो झारखण्ड की संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। 
> यह भारत के साथ-साथ विदेशों में भी लोकप्रिय है।
> इसमें पुरानी मोम-कास्टिंग तकनीक का उपयोग करके अत्यंत सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया जाता है।
> इस कला में मधुमक्खियों से प्राप्त मोम का प्रयोग किया जाता है।
> इस कला में तांबा, जस्ता, रांगा (टिन) आदि धातुओं के मिश्रण की ढलाई करके मूर्तियाँ, बर्तन व अन्य सामान बनाए जाते हैं ।
> इस कला का उपयोग करके निर्मित मूर्ति का सबसे प्राचीन उदाहरण मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त नृत्य करती हुई लड़की की प्रसिद्ध मूर्ति है।
> इस कला का संबंध मलार जाति से है।
> इसे घढ़वा कला भी कहा जाता है।
> वर्तमान समय में बाजार की अनुपलब्धता के कारण इस कला का अस्तित्व खतरे में है।
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Sat, 09 Sep 2023 09:55:05 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के मेले https://m.jaankarirakho.com/309 https://m.jaankarirakho.com/309 > मेला का नाम 
> नवमी डोला मेला
> आयोजन स्थल 
> टाटीसिल्वे (राँची) 
> आयोजन तिथि 
> चैत महीने के कृष्ण पक्ष की नवमी को
> विशेषता 
> यहाँ राधा-कृष्ण की मूर्तियों को एक डोली मे रखकर झुलाया जाता है तथा उनका पूजन किया जाता है। 
> यह मेला होली के ठीक 9 दिनों के बाद प्रत्येक वर्ष आयोजित किया जाता है। 
> इस मेले में आदिवासियों की प्राचीन संस्कृति एवं परंपराओं का प्रदर्शन किया जाता है। 
> मेला का नाम 
> रथयात्रा मेला
> आयोजन स्थल  
> जगन्नाथपुर (राँची)
> आयोजन तिथि 
> आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को रथयात्रा तथा एकादशी को घुरती रथयात्रा का आयोजन किया जाता है।
> विशेषता
> जगन्नाथपुर में भगवान जगन्नाथ का ऐतिहासिक मंदिर है, जो उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर का अनुकरण करते हुए निर्मित किया गया है।
> रथयात्रा के उद्देश्य से यहाँ जगन्नाथ मंदिर से कुछ दूरी पर मौसी बाड़ी निर्मित की गयी है।
> भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ (कृष्ण), उनके भाई बलराम तथा बहन सुभद्रा की प्रतिमाओं को विशाल रथ से जुलूस यात्रा द्वारा मौसी बाड़ी तक ले जाया जाता है, जहाँ उन्हें 9 दिनों तक रखा जाता है। इसे ही रथयात्रा कहा जाता है।
> 9 दिनों के बाद एकादशी को इस रथ की वापस यात्रा होती है, जिसे 'घुरती रथयात्रा' कहा जाता है।
> इसी रथ यात्रा के अवसर पर रथयात्रा मेला का आयोजन किया जाता है।
> मेला का नाम
> मुड़मा जतरा मेला
> आयोजन स्थल
> मुड़मा (राँची से 28 किलोमीटर दूर) 
> आयोजन तिथि
> दशहरा के दस दिन बाद
> विशेषता
> आदिवासियों द्वारा इसे जतरा मेला कहा जाता है।
> इस मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है।
> इस दौरान जतरा खूँटा की पूजा की जाती है तथा मुर्गे की बलि दी जाती है।
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Sat, 09 Sep 2023 09:53:28 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के पर्व & त्योहार https://m.jaankarirakho.com/308 https://m.jaankarirakho.com/308 > पर्व - त्योहार 
> सरहुल
> विशेषता
> यह जनजातियो का सबसे बड़ा पर्व है।
> अन्य नाम: – 
> खद्दी (उराँव जनजाति)
> बा परब (संथाल जनजाति)
> जकोर (खड़िया जनजाति)
> यह प्रकृति से संबंधित त्योहार है।
> यह चैत / चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है।
> इस पर्व में साल के वृक्ष की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आदिवासी ऐसा मानते हैं कि साल वृक्ष में उनके देवता बोंगा निवास करते हैं।
> यह फूलों का त्योहार है । यह पर्व बसंत के मौसम में मनाया जाता है। इस समय साल के वृक्षों पर नये फूल खिलते हैं। 
> यह पर्व चार दिनों तक मनाया जाता है -
>> पहला दिन- मछली के अभिषेक किए हुए जल को घर में छिड़का जाता है। दूसरा दिन- उपवास रखा जाता है तथा गांव का पुजारी गांव के हर घर की छत पर साल के फूल रखता है ।
>> तीसरा दिन पाहन (पुरोहित ) द्वारा सरना ( पूजा स्थल) पर सरई के फूलों (सखुए का कुंज) की पूजा की जाती है तथा पाहन उपवास रखता है। साथ ही मुर्गी की बलि दी जाती है तथा चावल और बलि की मुर्गी का मांस मिलाकर सुड़ी नामक खिचड़ी बनायी जाती है, जिसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है ।
>> चौथा दिन - गिड़िवा नामक स्थान पर सरहुल फूल का विसर्जन कहलाता है। 
> एक परंपरा के आधार पर इस पर्व के दौरान गाँव का पुजारी मिट्टी के तीन पात्र लेता है और उन्हें ताजे पानी से भरता है। अगले दिन प्रातः वह मिट्टी के तीनों पात्रों को देखता है। यदि पात्रों में पानी का स्तर घट गया है तो वह अकाल की भविष्यवाणी करता है और यदि पानी का स्तर सामान्य रहता है, तो इसे उत्तम वर्षा का संकेत माना जाता है।
> सरहुल की पूजा के दौरान ग्रामीणों द्वारा सरना ( पूजा स्थल) को घेरा जाता है।
> पर्व - त्योहार
> मण्डा
> विशेषता
> इसमें महादेव (शिव) की पूजा होती है।
  यह पर्व बैशाख माह के अक्षय तृतीया को आरंभ होता है।
> यह पर्व आदिवासी और सदान दोनों में प्रचलित है।
> इस पर्व में उपवास रखने वाले पुरुष व्रती को भगता और महिला - व्रती को सोखताइन कहते हैं।
> झारखण्ड में महादेव (शिव) की यह सबसे कठोर पूजा है।
> इस पर्व के दौरान भोगताओं को रात में धूप-धवन की अग्नि-शिखाओं के ऊपर उल्टा लटकाकर झुलाया जाता है, जिसे धुवांसी कहा जाता है। 
> इस पर्व में भोगताओं को दहकते हुए अंगारों पर चलना होता है, जिसे फूल-खूंदी कहा जाता है। 
> इस पर्व के दौरान कहीं-कहीं लोहे से निर्मित अंकुश को रस्सी से बांधकर झुलाया जाता है तथा उससे भगता लोगों की पीठ पर छेद किया जाता है। इस दौरान भगता लोगों की माँ अथवा बहन भगवान शिव की अराधना करते रहती हैं।
> पर्व - त्योहार 
> करमा
> विशेषता
> यह प्रकृति संबंधी त्योहार है ।
> इस त्योहार का प्रमुख संदेश कर्म की जीवन में प्रधानता है।
> यह आदिवासी व सदानों में समान रूप से प्रचलित है।
> इस पर्व में भाई के जीवन की कामना हेतु बहन द्वारा उपवास रखा जाता है। यह पर्व हिन्दुओं के भईया दूज की ही भांति भाई-बहन के प्रेम का पर्व है। 
> यह पर्व भाद्रपद (भादो) माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। 
> इस त्योहार में नृत्य के मैदान (अखड़ा) में करम वृक्ष की दो डालियाँ गाड़ दी जाती है तथा पाहन द्वारा लोगों को करमा कथा (करमा एवं धरमा नामक भाईयों की कथा) सुनायी जाती है।
> इस पर्व के दौरान रात भर नृत्य-गान का कार्यक्रम किया जाता है।
> मुण्डा जनजाति में करमा की दो श्रेणियाँ हैं:–
>> राज करमा – घर आंगन में की जाने वाली पारिवारिक पूजा 
>> देश करमा –  अखरा में की जाने वाली सामूहिक पूजा 
> मुण्डाओं में मान्यता है कि इस पर्व के दौरान करम गोसाई से मांगी गयी हर मन्नत पूरी होती है।
> मुण्डा जनजाति की कुँआरी लड़कियाँ इस पर्व में एक बालू भरी टोकरी में कुर्थी, जौ, गेहूँ, मकई, उड़द, चना तथा मटर सात प्रकार के अनाजों की ‘जावा' उगाने की प्रथा का पालन करती हैं। इस टोकरी को पूजा स्थल में रखकर जवा का प्रसाद वितरित किया जाता है तथा अगले दिन सूर्योदय से पूर्व करम डाली को नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है।
> पर्व-त्योहार 
> सोहराई
> विशेषता
> यह पर्व दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाता है।
> इसका संबंध जानवर धन से है । अतः इस पर्व में मवेशियों को नहलाकर उनकी पूजा की जाती है। 
> पौष माह में फसल कट जाने के बाद यह पर्व मनाया जाता है।
> यह झारखण्ड में संथाल जनजाति का सबसे बड़ा पर्व है । 
> पर्व को मनाने से पूर्व जनजाति समुदायों द्वारा अपने घरों की दीवारों पर पेंटिंग भी की जाती है। पेंटिंग हेतु कृत्रिम रंगों के स्थान पर प्राकृतिक पदार्थों ( पत्तियाँ, चावल, कोयला आदि) का प्रयोग किया जाता है।
> यह पर्व पांच दिनों तक चलता है
» पहला दिन 'गोड टाण्डी' (बथान) में जाहेर एरा का आह्वान किया जाता है तथा रात में प्रत्येक गृहस्थ के युवक-युवतियाँ गो-पूजन करते हैं ।
» दूसरा दिन गोहाल पूजा की जाती है तथा गोशाला को अल्पना द्वारा सजाकर गाय को नहलाकर उसके शरीर को रंगा जाता है। गाय के सींग पर तेल व सिंदूर लगाकर उसके गले में फूलों की माला पहनायी जाती है।
» तीसरा दिन पशुओं को धान की बाली एवं मालाओं से सजाकर खूँटा जाता है जिसे 'सण्टाऊ' कहा जाता है।
» चौथा दिन- युवक व युवतियाँ गांव से चावल, दाल, नमक व मसाला आदि मांगकर जमा करते हैं ।
» पांचवा दिन- गांव से एकत्रित चावल, दाल आदि से खिचड़ी बनाया जाता है जिसे गांव के लोग साथ में खाते हैं।
> पर्व - त्योहार 
> धान बुनी
> विशेषता
> यह पर्व आदिवासी तथा सदान दोनों द्वारा मनाया जाता है ।
> इस समय धान बुआई का प्रारंभ होता है।
> इस पर्व में हड़िया का तपान चढ़ाया जाता है तथा प्रसाद वितरित किया जाता है।
> पर्व - त्योहार
> बहुरा
> विशेषता
> इसे राइज बहरलक के नाम से भी जाना जाता है।
> यह पर्व भादो माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन मनाया जाता है।
> यह अच्छी वर्षा तथा संतान प्राप्ति हेतु महिलाओं द्वारा मनाया जाता है।
> पर्व - त्योहार 
> कदलेटा
> विशेषता
> यह पर्व भादो माह में करमा से पहले मनाया जाता है।
> यह मेढ़क भूत को शांत करने के लिए मनाया जाता है।
> इस पर्व के दौरान पाहन पूरे गाँव से चावल प्राप्त करके हड़िया उठाता है।
> इसमें अखरा में साल, भेलवा तथा केन्दु की डालियां रखकर पूजा की जाती है तथा मान्यता के अनुसार पूजा के बाद लोग इस डाल को अपने खेतों में गाड़ते हैं ताकि फसल को रोगमुक्त रखा जा सके।
> इस पर्व में मुर्गी की बलि दी जाती है जिसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।
> पर्व - त्योहार
> टुसू
> विशेषता
> यह सूर्य पूजा से संबंधित त्योहार है तथा मकर सक्रांति के दिन मनाया जाता है।
> यह पर्व टुसू नाम की कन्या की स्मृति में मनाया जाता है।
> इस पर्व के अवसर पर पंचपरगना में टुसू मेला लगता है।
> इस पर्व के दौरान लड़कियों द्वारा रंगीन कागज से लकड़ी या बांस के एक फ्रेम को सजाया जाता है तथा इसे आस-पास के पहाड़ी क्षेत्र में प्रवाहित किसी नदी को भेंट कर दिया जाता है।
> पर्व-त्योहार
> फगुआ
> विशेषता
> यह फागुन पूर्णिमा को मनाया जाता है।
> यह होली के समरूप त्योहार है।
> इस पर्व के दौरान आदिवासी लोग पाहन के साथ मिलकर सेमल अथवा अरण्डी की डाली गाड़कर संवत् जलाते हैं तथा मुर्गे की बलि देकर हड़िया का तपान चढ़ाते हैं, जबकि गैर-आदिवासी लोग संवत् जलाते समय बलि नहीं देते हैं।
> इस पर्व के दूसरे दिन धुरखेल मनाया जाता है।
> पर्व-त्योहार 
> मुर्गा लड़ाई
> विशेषता
> इसे पुरातन सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त है।
> इस खेल में लोग सट्टा लगाते हैं।
> पर्व-त्योहार
> आषाढ़ी पूजा
> विशेषता
> यह पर्व आदिवासी तथा सदान दोनों द्वारा मनाया जाता है।
> आषाढ़ माह में मनाये जाने वाले इस पर्व में घर-आंगन में बकरी की बलि दी जाती है तथा हड़िया का तपान चढ़ाया जाता है।
> ऐसी मान्यता है कि इस पर्व से गाँव में चेचक जैसी बीमारी का प्रकोप नहीं होता है।
> पर्व-त्योहार
> रोग खेदना
> विशेषता
> यह पर्व रोगों को गाँव से बाहर निकालने हेतु मनाया जाता है।
> पर्व-त्योहार
> नवाखानी
> विशेषता
> यह पर्व करमा पर्व के बाद मनाया जाता है।
> नवाखानी का तात्पर्य है 'नया अन्न ग्रहण करना । 
> नये अन्न को घर लाकर शुद्ध ओखली व मूसल से कूट कर चूड़ा बनाया जाता है जिसे देवताओं व पूर्वजों को अर्पित किया जाता है।
> पर्व के दौरान दही-चूड़ा का तपान चढ़ाया जाता है तथा घर आये अतिथियों के साथ दही-चूड़ा ग्रहण किया जाता है।
> पर्व-त्योहार
> सूर्याही पूजा
> विशेषता
> अगहन माह में आयोजित इस पर्व में सफेद मुर्गे की बलि दी जाती है एवं हड़िया का तपान चढ़ाया जाता है।
> इस पर्व को किसी टांड़ (एक प्रकार का ऊँचा स्थान) पर मनाया जाता है।
> इस पर्व में केवल पुरूष भाग लेते हैं।
> पर्व-त्योहार
> जितिया
> विशेषता
> इस पर्व में माँ अपने पुत्र के दीर्घायु जीवन तथा समृद्धि के लिए व्रत रखती है।
> पर्व-त्योहार
> चाण्डी पर्व
> विशेषता
> यह पर्व उराँव जनजाति द्वारा मनाया जाता है।
> यह पर्व माघ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है।
> इस पर्व में महिलाएँ भाग नहीं लेती हैं तथा जिस परिवार में कोई महिला गर्भवती हो उस परिवार का पुरूष भी इस पर्व में भाग नहीं लेता है।
> इस पर्व में भाग लेने वाले पुरुष चाण्डी स्थल में देवी की पूजा करते हैं।
> इस पर्व में सफेद व लाल मुर्गा तथा सफेद बकरे की बलि दी जाती है।
> पर्व-त्योहार
> देव उठान
> विशेषता
> यह पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष के चतुर्दशी के दिन मनाया जाता है।
> इस पर्व में देवों को जागृत किया जाता है।
> इस पर्व के बाद ही विवाह हेतु कन्या अथवा वर देखने की प्रथा आरंभ की जाती है। 
> पर्व-त्योहार
> भाई भीख
> विशेषता
> यह पर्व बारह वर्ष में एक बार मनाया जाता है।
> इस पर्व में बहन अपने भाई के घर से भिक्षा मांगकर अनाज लाती है तथा एक निश्चित दिन निमंत्रण देकर उसे अपने घर पर भोजन कराती है।
> पर्व-त्योहार
> बुरू पर्व
> विशेषता
> यह पर्व मुण्डा जनजाति द्वारा मनाया जाता है।
> इस पर्व का मुख्य उद्देश्य वन्य जीवों तथा मानव का तालमेल स्थापित करना तथा प्राकृतिक प्रकोपों से समाज की रक्षा हेतु कामना करना है।
> पर्व - त्योहार
> छठ
> विशेषता
> यह झारखण्ड राज्य का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है।
> छठ पर्व वर्ष में दो बार मार्च और नवंबर में मनाया जाता है।
> इस पर्व के दौरान सूर्य भगवान की पूजा करते हुए उन्हें अर्ध्य अर्पित किया जाता है। 
> यह पर्व अस्त होते हुए सूर्य को प्रसन्न करने हेतु मनाया जाता है।
> इस पर्व के दौरान प्रसाद हेतु मिठाई (व्यंजन) * के रूप में 'ठेकुआ' का वितरण किया जाता है।
> पर्व-त्योहार
> बंदना
> विशेषता
 > इस पर्व का आयोजन कार्तिक अमावस्या के दौरान सप्ताह भर किया जाता है।
> इस पर्व की शुरूआत ओहिरा गीत * के साथ की जाती है।
> यह त्योहार मुख्यतः पालतू जानवरों से संबंधित है। इसमें कपड़ों तथा गहनों से जानवरों को सजाया जाता है। साथ ही प्राकृतिक रंगों द्वारा जानवरों पर लोक कलाकृति भी अंकित किया जाता है।
> पर्व-त्योहार 
> रोहिन / रोहिणी 
> विशेषता
> यह त्योहार झारखण्ड राज्य में कैलेंडर वर्ष का प्रथम त्योहार है ।
> यह बीज बोने के त्योहार के रूप में मनाया जाता है ।  इस त्योहार के प्रारंभ के दिन से किसानों द्वारा खेतों में बीज बोने की शुरूआत की जाती है ।
> इस त्योहार को मनाने के दौरान किसी प्रकार का नृत्य प्रदर्शन या लोकगीत गायन नहीं किया जाता है।
> पर्व-त्योहार 
> हेरो पर्व 
> विशेषता 
> हेरो शब्द का अर्थ छींटना या बुआई करना होता है। 
> इस पर्व का आयोजन मुख्यतः हो जनजाति द्वारा माघे व बाहा पर्व के बाद किया जाता है। 
> यह पर्व कोल्हान क्षेत्र में हो जनजाति द्वारा मनाया जाता है।
> यह पर्व खेतों में बोये गए बीज की सुरक्षा हेतु मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पर्व का आयोजन नहीं किए जाने पर कृषि कार्य को नुकसान होता है।
> पर्व-त्योहार 
> जावा पर्व 
> विशेषता 
> इस पर्व का आयोजन भादो माह  में किया जाता है।
> यह पर्व अविवाहित आदिवासी युवतियों में प्रजनन क्षमता में वृद्धि तथा अच्छे वर हेतु मनाया जाता है। 
> पर्व-त्योहार
> भगता पर्व
> विशेषता
> यह पर्व बसंत एवं ग्रीष्म ऋतु के मध्य मनाया जाता है।
> यह पर्व तमाड़ क्षेत्र में प्रचलित है।
> इस पर्व को सरना मंदिर में 'बुढ़ा बाबा के पूजा' रूप में मनाया जाता है।
> इस दिन लोग उपवास रखते हैं तथा गांव के पुजारी को कंधे पर उठाकर सरना मंदिर ले जाते हैं।
> पर्व-त्योहार 
> सेंदरा पर्व 
> विशेषता
> सेंदरा उराँव जनजाति की संस्कृति एवं परंपरा से संबंधित है।
> सेंदरा का शाब्दिक अर्थ 'शिकार' होता है।
> उराँव जनजाति में महिलाओं द्वारा शिकार खेलने की प्रथा को 'मुक्का सेंदरा' के नाम से जाना जाता है। इस पर्व के दौरान जनजातीय महिलाएँ पूरे दिन पुरूष के कपड़े पहनकर पशुओं का शिकार करती हैं ।
> यह पर्व उराँवों की आत्मरक्षा, युद्ध विद्या, भोजन व अन्य जरूरतों की पूर्ति से संबंधित है।
> उराँव जनजाति के लोग प्रत्येक वर्ष वैशाख में सू सेंदरा, फागुन में फागु सेंदरा तथा वर्षा ऋतु के प्रारंभ होने पर जेठ शिकार करते हैं।
> पर्व-त्योहार 
> जनी शिकार
> विशेषता
> इस पर्व के दौरान महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से पुरूषों का वेश धारण करके परंपरागत हथियार से जानवरों का शिकार किया जाता है। इस दौरान महिलाएँ बच्चों को बेतरा (बच्चों को पीठ पर बाँधने वाला एक कपड़ा) से अपनी पीठ पर बाँधकर शिकार के लिए निकलती हैं।
> शाम के समय किए गए शिकार को अखड़ा में पकाया जाता है तथा पाहन द्वारा सभी को पका हुआ मांस वितरित किया जाता है।
> यह भारत में केवल झारखण्ड राज्य में ही मनाया जाता है।
> यह पर्व 12 वर्षों के अंतराल पर मनाया जाता है।
> पर्व-त्योहार 
> देशाऊली 
> विशेषता
> यह 12 वर्ष में एक बार मनाया जाने वाला उत्सव है। 
> इस त्योहार में भुंईंहरदारी की ओर से मरांग बुरू देवता को काड़ा (भैंसा) की बलि दी जाती है तथा बलि को जमीन में गाड़ दिया जाता है।
> पर्व-त्योहार
> माघे पर्व
> विशेषता 
> यह पर्व माघ माह में मनाया जाता है।
>  इस पर्व के साथ ही कृषि वर्ष का अंत होता है तथा नया कृषि वर्ष प्रारंभ होता है ।
> यह कृषि श्रमिकों (धांगर) की विदाई का पर्व है। इस पर्व के दौरान धांगरों को उनके पारिश्रमिक के भुगतान के साथ रोटी व पीठा खिलाकर विदा किया जाता है। 
> पर्व-त्योहार
> सावनी पूजा
> विशेषता
> यह पूजा श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को की जाती है।
>>इसमें बकरे की बलि देकर देवी पूजा की जाती है हड़िया का तपान चढ़ाया जाता है।
> अन्य प्रमुख पर्व-त्योहार विशेषता
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Sat, 09 Sep 2023 09:51:38 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के प्रमुख वाद्य – यंत्र https://m.jaankarirakho.com/307 https://m.jaankarirakho.com/307 1. तंतु वाद्य – ऐसे वाद्य, जिनमें तांत, रेशम की डोरी या तार बंधे होते हैं तथा इनमें कंपन के माध्यम से ध्वनि उत्पन्न की जाती है। जैसे- एकतारा, केंदरा, भुआंग, बनम, टोहिला, सारंगी आदि। 
> एकतारा
> यह एक तार से बना हुआ वाद्य यंत्र है। 
> इसे लौकी के आधे कटे खोल के ऊपर चमड़ा मढ़कर बनाया जाता है।
> इसके तार को अंगुली या धातु के टुकड़े से छेड़कर ध्वनि निकाली जाती है।
> सामान्यतः इसका प्रयोग भक्ति संगीत में साधु-संतों द्वारा किया जाता है।
> केंदरा / केंदरी
> इसका निर्माण खोखले बाँस की छड़ी पर सूखे लौके का खोल बाँध कर किया जाता है। इसका निचला हिस्सा कछुए की खाल या नारियल के खोल का बना होता है।
> इसमें तीन तार होते हैं तथा इसके तारों पर गज या कमानी चलाने से ध्वनि निकलती है।
> इसे झारखण्ड का वायलिन भी कहा जाता है ।
> भुआंग
> यह संथालों का प्रमुख वाद्य यंत्र है।
> इसका प्रयोग नृत्य तथा संगीत में किया जाता है। 
> इसके निर्माण में लौकी का प्रयोग किया जाता है।
> इससे धनुष टंकार जैसी ध्वनि 'बुअंग' निकलती है। इससे एक ही प्रकार का स्वर निकलता है । 
> इसे ताल के साथ बजाया जाता है।
> भुआंग तथा केंदरा संथालों का प्रमुख वाद्य है।
> बनम
> इसका प्रयोग संथाल जनजाति द्वारा गीत के साथ संगत के रूप में किया जाता है।
> इसका निर्माण नारियल को काटकर उस पर गोह का चमड़ा लगाकर किया जाता है।
> यह वायलिन के समान होता है जिसके तार में कमानी से रगड़ने पर मोटी ध्वनि निकलती है।
> टोहिला
> इसे बनाने हेतु सूखी लौकी तथा खोखली लाठी का प्रयोग किया जाता है। 
> इससे अत्यंत कोमल ध्वनि निकलती है जिसके कारण इसे गीत के साथ संगत के रूप में बजाया जाता है।
> इसका वादन अत्यंत कठिन होने के कारण धीरे-धीरे इसका प्रयोग कम हो रहा है।
2. सुषिर वाद्य – ऐसे वाद्य जिसे फूँककर बजाया जाता है, उसे सुषिर वाद्य कहते हैं। जैसे- बाँसुरी, शहनाई, सिंगा, मुरली, मदनभेरी आदि ।
> बाँसुरी
> यह झारखण्ड का सर्वाधिक लोकप्रिय वाद्य है।
> इसका निर्माण बांस से किया जाता है तथा डोंगी नामक बांस से बहुत अच्छी बाँसुरी बजाई जाती है।
> शहनाई
> इसे सनाई भी कहा जाता है।
> इसका प्रयोग छऊ, पईका तथा नटुआ नृत्य में प्रमुखता से किया जाता है।
> झारखण्ड के जनजातीय समुदाय में शादी-विवाह, पर्व-त्योहार आदि अवसरों पर शहनाई का वादन किया जाता है।
> यह झारखण्ड के जनजातीय समुदाय का मंगल वाद्य है। 
> सिंगा
> इसका निर्माण बैल या भैंस के सींग से किया जाता है।
> इस वाद्ययंत्र को सींग के नुकीले सिरे पर किए गए छिद्र पर फूंक मारकर बजाया जाता है।
> इसका प्रयोग छऊ नृत्य के समय तथा पशुओं के शिकार के समय किया जाता है।
> मदनभेरी
> इसका वादन ढोल, बाँसुरी, शहनाई आदि के साथ सहायक वाद्य के रूप में किया जाता है। 
> इसका निर्माण लकड़ी की नली के अग्रभाग में पीतल की नली जोड़कर किया जाता है। 
3. ताल वाद्य – ऐसे वाद्य जिन्हें पीटकर बजाया जाता है, ताल वाद्य कहलाते है। ये दो प्रकार के होते हैं
(a) अनवद्ध वाद्य ये वाद्य लकड़ी के ढांचे पर चमड़ा मढ़कर निर्मित किए जाते हैं।
जैसे - मांदर, ढोल, नगाड़ा, ढाक, धमसा, डमरू, कामरा, ढप, खजरी, जुड़ी आदि ।
(b) घन वाद्य – ये वाद्य कांसा से निर्मित किए जाते हैं। इसे सहायक ताल वाद्य भी कहा जाता है जैसे करताल, झांझ, घंटा, काठ, ला आदि। 
> मांदर
> यह झारखण्ड का प्राचीनतम तथा प्रमुख वाद्य है।
> इसे तुमदक भी कहा जाता है।
> इसका प्रयोग विभिन्न अवसरों पर सभी जनजातियों द्वारा किया जाता है। इसका प्रयोग मुख्यतः नृत्य के समय किया जाता है।
> इसका निर्माण मिट्टी या लकड़ी के गोलाकार खोल के खुले सिरों के दोनों ओर बकरी का चमड़ा मढ़कर * किया जाता है।
> इसका बांया मुंह चौड़ा तथा दाहिना मुंह छोटा होता है।
> इसके छोटे मुंह वाले खाल पर एक विशेष लेप (किरण) लगाया जाता है । इस लेप के कारण इसकी आवाज गूंजायमान होती है।
> इसे रस्सी के सहारे कंधे से लटकाकर बजाया जाता है।
> इसकी आवाज अत्यंत गुंजदार होती है।
> ढोल
> यह झारखण्ड का अत्यंत प्रचलित वाद्य है।
> झारखण्ड में कई अवसरों पर ढोल का वादन प्रमुखता से किया जाता है। इसे हाथ या लकड़ी से बजाया जाता है। 
> इसका निर्माण, कटहल, आम तथा गम्हार की लकड़ी के खोल से किया जाता है।
> इसके मुंह को बकरी के खाल से मढ़कर तैयार किया जाता है।
> नगाड़ा
> नगाड़ा भी झारखण्ड का एक प्रमुख वाद्य है। इसका प्रयोग आदिवासी और सदान दोनों समुदायों द्वारा किया जाता है।
> यह आकार के आधार पर बड़े, मध्यम तथा छोटे तीनों प्रकारों का होता है।
> संथाल परगना में नगाड़ा को टामाक के नाम से जाना जाता है।
> इसका निर्माण कटहल की पेड़ के गुंबदाकार खोल के सिरों पर भैंस या बकरी का चमड़ा मढ़कर  किया जाता है। 
> इसे बजाने के लिए छड़ी का प्रयोग किया जाता है।
> ढाक 
> यह ढोल के समान ही एक प्रमुख वाद्य है। आकार में यह ढोल तथा मांदर से बड़ा होता है। 
> इसका निर्माण गम्हार की लकड़ी के सिरों को बकरी की खाल से मढ़कर किया जाता है।
> इसका वादन कई पर्व-त्योहारों पर किया जाता है। पइका तथा नटुआ नृत्यों के साथ भी इसका वादन किया जाता है।
> इसे कंधे पर लटकाकर लकड़ी से बजाया जाता है।
> धमसा / कुडुधतु
> इसका वादन ढोल, मांदर आदि के सहायक वाद्य के रूप में किया जाता है।
> छऊ नृत्य के दौरान युद्ध और सैनिक प्रयाण जैसे दृश्यों को साकार करने हेतु इसे बजाया जाता है। 
> इसकी आकृति कड़ाही जैसी होती है।
> करताल
> यह दो चपटे गोलाकार प्याले के जोड़े में होता है, जिनके बीच का हिस्सा ऊपर की ओर उभरा होता है।
> इनके उभरे हिस्से के बीच एक छेद होता है जिसमें रस्सी पिरो दी जाती है ।
> इसमें रस्सियों को हाथों की उंगलियों में फंसाकर प्यालों को ताली की भांति बजाया जाता है, जिससे मीठी ध्वनि निकलती है।
> झांझ
> इसका आकार करताल की ही भांति परंतु इससे बड़ा होता है ।
> इसकी आवाज करताल से अधिक होती है।
> थाला
> यह कांसे की थाली की भांति होता है जिसका गोलाकार किनारा ऊपर की ओर उभरा होता है।
> इसके बीच मे एक छेद में रस्सी पिरोकर इसे झुलाया जाता है। 
> इसकी रस्सी को एक हाथ से थामकर दूसरे हाथ से मक्के की खलरी से बजाया जाता है।
> काठी 
> यह कुड़ची की लकड़ी के दो टुकड़ों का जोड़ा है जिसे आपस में टकराने पर मधुर ध्वनि उत्पन्न होती है।
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Sat, 09 Sep 2023 09:49:13 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के लोकनाट्य https://m.jaankarirakho.com/306 https://m.jaankarirakho.com/306 > लोकनाट्य 
> जट-जटिन
> विशेषता 
> प्रत्येक वर्ष श्रावण से कार्तिक माह के बीच कुँवारी लड़कियों द्वारा इसका अभिनय किया जाता है।
> इसमें जट-जटिन के वैवाहिक जीवन को दर्शाया जाता है। 
> लोकनाट्य 
 > भकुली बंका 
> विशेषता
> इसका आयोजन श्रावण (सावन) से कार्तिक माह तक किया जाता है।
> इसका प्रदर्शन जट-जटिन के साथ किया जाता है। 
> इसमें भकुली (पत्नी) व बंका (पति) के वैवाहिक जीवन को दर्शाया जाता है। 
> लोकनाट्य 
> सामा-चकेवा
> विशेषता
> यह लोकनाट्य कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी से पूर्णमासी तक किया जाता है।
> इस लोक नाट्य में मिट्टी के पात्र निर्मित किए जाते हैं, लेकिन उनकी तरफ से बा. लिकाएँ अभिनय करती हैं।
> इस लोक नाट्य के प्रमुख नायिका को सामा, नायक को चकेवा खलनायक को चूड़क / चुगला एवं सामा के भाई को साम्ब कहा जाता है।
> इसमें सामूहिक गीतों के माध्यम से प्रश्नोत्तर शैली में विषय-वस्तु को प्रस्तुत किया जाता है। 
> यह भाई-बहन के पवित्र प्रेम से संबंधित लोकनाट्य है।
> लोकनाट्य
> डोमकच
> विशेषता
> यह स्त्रियों द्वारा विशेष अवसरों (जैसे विवाह आदि) पर आयोजित घरेलू लोक नाट्य है। 
> इसमें हास-परिहास, अश्लील हाव-भाव व संवाद का प्रदर्शन किया जाता है।
> इस लोकनाट्य का सामूहिक प्रदर्शन नहीं किया जाता है तथा पुरुषों को इस लोक नाट्य को देखने की मनाही होती है।
> इसका आयोजन विवाह एवं अन्य अवसरों पर रात भर किया जाता है।
> लोकनाट्य
> किरतनिया
> विशेषता
> इसमें भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन गायन के द्वारा किया जाता है।
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Sat, 09 Sep 2023 09:47:05 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के लोकनृत्य https://m.jaankarirakho.com/305 https://m.jaankarirakho.com/305 > लोकनृत्य
> छऊ नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रारंभ सरायकेला में हुआ तथा यहीं से यह मयूरभंज (उड़ीसा) व पुरुलिया ( प० बंगाल) में विस्तारित हुआ।
> अपनी विशिष्ट शैली के कारण छऊ नृत्य को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेष ख्याति प्राप्त है । 
> यह पुरूष प्रधान नृत्य है।
> इसका विदेश में सर्वप्रथम प्रदर्शन 1938 ई. में सुधेन्द्र नारायण सिंह द्वारा किया गया। 
> यह झारखण्ड का सबसे प्रसिद्ध लोकनृत्य है। इसकी तीन शैलियाँ सरायकेला (झारखण्ड), मयूरभंज (उड़ीसा) तथा पुरुलिया (प० बंगाल) हैं। ज्ञात हो कि छऊ की सबसे प्राचीन शैली ‘सरायकेला छऊ' है।
> झारखण्ड के खूँटी जिले में इसकी एक विशेष शैली का विकास हुआ है, जिसे 'सिंगुआ छऊ' कहा जाता है।
> यह एक ओजपूर्ण नृत्य है तथा इसमें विभिन्न मुखौटों को पहनकर पात्र पौराणिक व ऐतिहासिक है कथाओं का मंचन करते हैं। (इसके अतिरिक्ति कठोरवा नृत्य में भी पुरूष मुखौटा पहनकर नृत्य करते हैं)
> इस नृत्य में प्रयुक्त हथियार वीर रस के तथा कालिभंग श्रृंगार रस * को प्रतिबिंबित करते हैं।
> इस नृत्य में भावो की अभिव्यक्ति के साथ-साथ कथानक भी होता है जबकि झारखण्ड के अन्य लोकनृत्यों में केवल भावों की अभिव्यक्ति होती, कथानक नहीं।
> इसमें प्रशिक्षक/गुरू की उपस्थिति अनिवार्य होती है।
> वर्ष 2010 में छऊ नृत्य को यूनेस्को द्वारा 'विरासत नृत्य' में शामिल किया गया है।
> लोकनृत्य 
> जदुर नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य को नीर सुसंको भी कहा जाता है।
> यह नृत्य कोलोम सिंग - बोंगा पर्व (फागुन) के बाद प्रारंभ होकर सरहुल पर्व (चैत) तक चलता है। 
> इसका प्रदर्शन उराँव जनजाति द्वारा किया जाता है। 
> यह उत्पादकता, उर्जा तथा मातृभूमि के प्रति आदर का प्रतीक है।
> यह स्त्री-पुरूष का सामूहिक नृत्य है। 
> इसमें लय-ताल तथा राग के अनुरूप वृताकार पथ पर दौड़ते हुए महिलाएँ नृत्य करती हैं।
> लोकनृत्य  
> जपी नृत्य 
> विशेषता
> यह नृत्य शिकार से विजयी होकर लौटने के प्रतीक के रूप में किया जाता है। 
> यह सरहुल पर्व (चैत) में प्रारंभ होकर आषाढ़ी पर्व (आषाढ़) तक चलता है। 
> यह मध्यम गति का नृत्य है, जिसे स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से प्रदर्शित करते हैं। 
> इस नृत्य के दौरान महिलाएँ एक-दूसरे की कमर पकड़ कर नृत्य करती हैं तथा वादक, गायक व नर्तक पुरूष इन महिलाओं से घिरे होते हैं।
> लोकनृत्य
> करमा/लहुसा नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य में 8 पुरूष / 8 स्त्री भाग लेते हैं।
> यह नृत्य मुख्यतः करमा पर्व के अवसर पर सामूहिक रूप से किया जाता है।
> इस नृत्य में पुरूष व स्त्रियाँ गोलार्द्ध बनाकर आमने-सामने खड़े होते हैं तथा एक-दूसरे के आगे-पीछे चलते हुए नृत्य करते हैं ।
> यह नृत्य झुककर किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान ‘लहुसा गीत' गाया जाता है।
> इस नृत्य के दो प्रकार खेमटा और भिनुसारी  हैं।
> लोकनृत्य
> बुरू नृत्य
> विशेषता
> यह जदुर तथा करमा नृत्य का मिश्रण है।
> यह नृत्य मागे तथा गेना की ही भांति की जाती है।
> लोकनृत्य
> पाइका नृत्य
> विशेषता
> यह एक ओजपूर्ण नृत्य है।
> इसमें नर्तक सैनिक वेश धारण करके नृत्य करते हैं। नर्तकों को एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में शील्ड को संभालना होता है।
> इसमें नर्तक रंग-बिरंगी झिलमिलाती कलगी लगी या मोर पंख लगी पगड़ी ( टोपी) बाँधते हैं। इस नृत्य में पगड़ी पर कलगी अनिवार्य होता है।
> यह उत्तेजक, ओजस्वी, मनोरंजक व वीरतापरक गीत रहित नृत्य है |
> यह नृत्य पद के साथ मार्शल आर्ट तकनीक (मार्शिलय नृत्य / युद्ध नृत्य) का संयोजन भी है। 
> यह केवल पुरूष सदस्यों द्वारा किया जाता है तथा इस नृत्य में पाँच, सात या नौ के जोड़े होते हैं।
> यह एक युद्ध नृत्य है तथा यह आदिवासी व सदान दोनों में प्रचलित है।
> यह नृत्य मुण्डा जनजाति में सर्वाधिक प्रचलित है।
> डॉ. रामदयाल मुण्डा के नेतृत्व में इस नृत्य का मंचन भारत महोत्सव (रूस) में किया गया था जो रूस में अत्यंत लोकप्रिय हुआ था।
> लोकनृत्य
> जतरा नृत्य
> विशेषता 
> यह सामूहिक नृत्य है, जो उराँव जनजाति द्वारा किया जाता है। 
> इसमें स्त्री-पुरूष हाथ पकड़कर नृत्य करते हैं। 
> इसमें वृत्ताकार/अर्द्धवृत्ताकार घेरा बनाकर नृत्य किया जाता है। 
> लोकनृत्य  
> नचनी नृत्य 
> विशेषता
> यह पेशेवर नृत्य है।
> स्त्री और पुरूष कार्तिक पूर्णिमा के दिन विशेष रूप से यह नृत्य करते हैं।
> इस नृत्य में स्त्री नचनी एवं पुरूष रसिक के रूप में होते हैं। 
> लोकनृत्य
> नटुआ नृत्य
> विशेषता
> यह पुरुष प्रधान नृत्य है। 
> इसमें पुरुषों द्वारा स्त्री वेश धारण करके नृत्य किया जाता है। 
> लोकनृत्य  
> कली नृत्य 
> विशेषता
> यह पुरूष प्रधान नृत्य है, परंतु केन्द्र में नर्तकी (कली) रहती है।
> इसमें भाग लेने वाली नर्तकी श्रृंगार किए रहती है तथा सर पर मुकुट पहनती है।
> इसमें भाग लेने वाली नर्तकी (कली) फूल खिलने की सुंदरता को प्रतिबिंबित करती है।
> इस नृत्य में राधा-कृष्ण प्रेम-प्रसंग के गीतों की प्रधानता रहती है।
> इस नृत्य में नगाड़े, ढाँक, ढोल, मांदर, शहनाई आदि बजाया जाता है।
> लोकनृत्य
> अग्नि नृत्य
> विशेषता
> यह धार्मिक नृत्य है।
> इस नृत्य के द्वारा शील की पूजा की जाती है।
> यह नृत्य मण्डा या विपु पूजा के अवसर पर किया जाता है।
> लोकनृत्य
> मण्डा नृत्य या भगतिया नृत्य
> विशेषता
> यह पुरूषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है।
> इस नृत्य में बच्चे से बूढ़े तक शामिल होते हैं।
> इस नृत्य के दौरान महिलाएँ माथे पर लोटा में जल लेकर भगतिया नर्तकों के ऊपर आम्र पालवों से मार्जन करती हैं ।
> यह पुरूषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान गीत नहीं गाए जाते बल्कि केवल ढाँक, नगाड़ा, शहनाई आदि वाद्य यंत्रों का वादन होता है।
> यह सात्विक भाव के साथ किया जाने वाला कलात्मक नृत्य है।
> यह भगवान शिव या महादेव पूजा का नृत्य है।
> लोकनृत्य
> माठा नृत्य
> विशेषता
> यह सोहराई पर्व के समय किया जाने वाला पुरूष प्रधान नृत्य है।
> यद्यपि उराँव जनजाति में पुरूषों के साथ-साथ महिलाएँ भी इस नृत्य में भाग लेती हैं।
> इस नृत्य आदिवासी व सदान दोनों में प्रचलित है।
> लोकनृत्य
> झूमर नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य मुख्यतः फसल की कटाई के अवसर पर
किया जाता है। 
> यह स्त्री प्रधान नृत्य है । 
> जनजातियों द्वारा विवाह तथा अन्य पर्व-त्योहारों के अवसर पर भी इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। 
> यह नृत्य घेरा बनाकर समूह में किया जाता है। 
> झूमर नृत्य के प्रमुख प्रकार 
> लोकनृत्य 
> करिया झूमर नृत्य
> विशेषता
 > यह स्त्री प्रधान नृत्य है।
> इस नृत्य में महिलाएँ एक-दूसरे के हाथ में हाथ डालकर घूम-घूमकर नृत्य करती हैं। 
> लोकनृत्य
> मरदानी झूमर नृत्य
> विशेषता
> यह पुरूष प्रधान नृत्य है।
> इसमें नृत्य के साथ गायन भी होता है।
> इस नृत्य के दौरान एक गीत गाने वाला समूह ओजपूर्ण गीत गाते रहते हैं।
> लोकनृत्य
> ठड़िया नृत्य
> विशेषता
> यह झूमर की तरह का ही नृत्य है।
> इस नृत्य में सीधे खड़ी चाल में चलते हुए नृत्य किया जाता है। इसी कारण इसे ठड़िया (खड़ा) नृत्य कहा जाता है।
> यह स्त्री एवं पुरूष दोनों का नृत्य है।
> लोकनृत्य
> अंगनई नृत्य
> विशेषता
> यह महिला प्रधान नृत्य है, परंतु कभी-कभी इसमें पुरूष भी शामिल हो जाते हैं।
> अधिकांशतः करमा तथा जितिया के दौरान इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है।
> लोकनृत्य
> लुझरी नृत्य
> विशेषता
> इसमें लुझकते हुए नृत्य मंडली झूमर नृत्य करती
 है ।
> इसका प्रयोग स्त्री व पुरूष दोनों के द्वारा झूमर के दौरान किया जाता है।
> यह अंगनई की एक शैली है तथा इसे लुझकउआ नृत्य भी कहा जाता है।
> लोकनृत्य
> डंडुड़धरा नृत्य
> विशेषता
> यह पुरुष प्रधान झूमर नृत्य है जिसका प्रदर्शन मरदाना झूमर के दौरान किया जाता है।
> इस नृत्य में नर्तक एक-दूसरे की कमर पकड़ कर जुड़ जाते हैं तथा कतारबद्ध होकर हाथ, पैर व शरीर से विभिन्न प्रकार के लोच, लय, ताल व राग के अनुरूप नृत्य करते हैं।
> लोकनृत्य 
> कठोरवा नृत्य
> विशेषता
> यह पुरुष प्रधान नृत्य है।
> इसमें पुरुष मुखौटा पहनकर नृत्य करते हैं।
> लोकनृत्य
> मुण्डारी नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य मुण्डा जनजाति में प्रचलित है।
> इसमें रंग-बिरंगी पोशाक पहनकर नृत्य किया जाता है।
> इस नृत्य के प्रमुख प्रकार जदुर, ओरजदुर, नीरजदुर, चिटिद, जपी, गेना, छव, बरू, आदि हैं।
> लोकनृत्य
> गेना नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य में महिलाएँ एक-दूसरे की कमर पर हाथ रखकर कतार में जुड़कर नृत्य करती हैं।
> यह विजय के उत्साह का प्रतीक नृत्य है।
> लोकनृत्य
> जापी नृत्य
> विशेषता
> यह स्त्री-पुरूष का सामूहिक नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान नर्तक, वादक तथा गायक पुरूष व स्त्रियों से घिरे रहते हैं।
> इस नृत्य के दौरान पुरूष गायकों के गीतों की अंतिम कड़ी को महिलाएँ गाती हैं।
> यह शिकार से विजयी होकर लौटने का प्रतीक गीत नृत्य है।
> लोकनृत्य
> चिटिद नृत्य
> विशेषता
> यह महिला प्रधान नृत्य है।
> लहसना, जुड़े हाथों की मुद्रा तथा कदमों की विशिष्टता इस नृत्य की विशेषता है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन करम व जरगा के अखरा में होता है ।
> इस नृत्य के दौरान गायन भी किया जाता है।
> यह नृत्य उपासना का नृत्य है।
> लोकनृत्य
> गौंग नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य हो जनजाति में प्रचलित है।
> लोकनृत्य
> मागे/माघे नृत्य
> यह नृत्य हो जनजाति में प्रचलित है।
> यह एक सामूहिक नृत्य है, जिसमें महिला व पुरूष दोनों भाग लेते हैं।
> यह नृत्य माघ पूर्णिमा को किया जाता है।
> इसमें नृत्य करने वालों के बीच गाने व बजाने वाले घिरे होते हैं।
> लोकनृत्य 
> लांगड़े नृत्य 
> विशेषता
> यह संथाली जनजाति का लोकनृत्य है।
> यह नृत्य किसी भी खुशी या उत्सव के अवसर पर किया जाता है।
> लोकनृत्य
> बाहा नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य संथाली जनजाति द्वारा बाहा पर्व (सरहुल) के समय किया जाता है।
> इस नृत्य में साल एवं महुआ फूलों का प्रयोग किया जाता है। 
> यह नृत्य जाहेर या सरना स्थल पर किया जाता है।
> लोकनृत्य
> बा नृत्य
> विशेषता
> यह हो जनजातियों का एक प्रमुख नृत्य है।
> यह नृत्य सरहुल के अवसर पर किया जाता है।
> इस नृत्य में स्त्री तथा पुरूष सम्मिलित होकर सरहुल पर्व के समय गायन व नृत्य करते हैं।
> लोकनृत्य
> डाहर नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य संथाली जनजाति द्वारा यह नृत्य सड़कों पर किया जाता है।
> इस नृत्य में पुरूष तथा महिला सामूहिक रूप से भाग लेते हैं।
> यह नृत्य माघ महीने में माघा बोंगा पर्व के अवसर पर किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान मांदर, नगाड़ा, तुरही, ढांक, घंटी आदि बजाया जाता है।
> यह नृत्य गांव के अखरा में ही किया जाता है।
> इसे लांगड़े नृत्य भी कहा जाता है।
> लोकनृत्य
> दसाई नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का आयोजन दशहरा से ठीक पहले पांच दिनों हेतु आदिवासी पुरूषों द्वारा किया है। नृत्य के दौरान नृतक के माथे पर मोर का पंख लगा होता है। जाता
> इस नृत्य में भाग लेने वाले पुरुष महिला के वेश में वाद्ययंत्रों पर नृत्य करते हैं।
> इस नृत्य के दौरान प्रयुक्त होने वाला वाद्ययंत्र सूखे कद्दू से बनाया जाता है, जिसे भुआंग कहते हैं।
> इसके अतिरिक्त इस नृत्य में थाली व घंटी का भी प्रयोग किया जाता है।
> इस नृत्य की शुरूआत बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा आदिवासी क्रांतिकारियों को बंदी बनाने के बाद उन आदिवासियों को ढूंढने हेतु हुआ था। इस दौरान पुरूष द्वारा महिला का रूप धारण करके बंदी बनाए गए क्रांतिकारियों को ढूंढने हेतु टोलियों में निकलते थे। 
> इस नृत्य के प्रारंभ में माँ दुर्गा की अराधना की जाती है ।
> इस नृत्य की शुरूआत हाय रे हाय... शब्द ( बंदी बनाने का दुःख) के साथ शुरू होता है तथा इसकी समाप्ति देहेल, देहेल शब्द (विजय का प्रतीक) के साथ होती है।
> लोकनृत्य
> दसंय नृत्य
> विशेषता
> यह संथाल जनजाति में प्रचलित दशहरा पर्व के समय किया जाने वाला पुरूष प्रधान नृत्य है ।
> इस नृत्य के दौरान पुरूष महिलाओं की वेश-भूषा धारण करके नृत्य करते हैं।
> इस नृत्य के दौरान नृतक लोगों के घर जाकर उनके आंगन में नाचते हैं तथा अन्न प्राप्त करते हैं।
> यह नृत्य दशहरा के प्रथम दिन से विजयादशमी तक किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान करताल बजाया जाता है।
> लोकनृत्य
> डोमकच नृत्य'
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन विवाह के अवसर पर किया जाता है तथा विवाह के पूर्व से ही वर व कन्या के घर के आंगन में रात्रि में किया जाता है।
> यह मूलतः स्त्री प्रधान नृत्य है तथा इसमें महिलाओं के दो दल होते हैं। एक दल गीत उठाता है तो दूसरा दल उन गीतों की कड़ियों को दोहराता है।
> यह नृत्य परिवार या पड़ोस के सदस्य मिलकर घर के आंगन में ही करते हैं।
> इस नृत्य में शहनाई, बाँसुरी, मांदर, ढोल, नगाड़ा, ठेचका, करताल, झाँझ आदि वाद्ययंत्रों का वादन किया जाता है।
> इस नृत्य के कई भेद हैं जैसे – जशपुरिया, असमिया,  झुमटा आदि।
> लोकनृत्य
> हेरो नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का आयोजन धान की बुआई के बाद किया जाता है।
> इसके दौरान महिला एवं पुरूष सम्मिलित रूप से पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ गायन व नृत्य करते हैं।
> लोकनृत्य
> घोड़ा नृत्
> विशेषता
> इस नृत्य का आयोजन मेले, त्योहारों व बारात के स्वागत के समय किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान नर्तक बांस के पहिए से बिना पैर के घोड़े की आकृति बनाकर नृत्य करता है।
> नृत्य के दौरान नर्तक बांए हाथ से घोड़े की लगाम तथा दांये हाथ में दोधारी तलवार पकड़े होते हैं।
> नागपुरी क्षेत्र में पाण्डे दुर्गानाथ राय घोड़ा नृत्य हेतु प्रसिद्ध थे।
> लोकनृत्य 
> जरगा नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य माघ माह में किया जाता है।
> इस नृत्य की प्रमुख विशेषता पद संचालन है ।
> इसमें महिलाएँ सामूहिक रूप से नृत्य करती हैं।
> लोकनृत्य
> ओरजरगा नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य जरगा नृत्य के साथ-साथ किया जाता है।
> इसमें महिलाएँ तीव्र गति से नृत्य करती हुयी वर्गाकार घुमती है तथा इनके मध्य गायक, वादक व नर्तक पुरूष होते हैं।
> लोकनृत्य 
> सोहराई नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का आयोजन पालतू पशुओं के लिए किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान गोशाला में पूजा की जाती है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन सामान्यतः दीपावली के दूसरे दिन किया जाता है।
> नृत्य के दौरान महिलाओं के द्वारा चुमावड़ी गीत गाया जाता है। 
> इस नृत्य के दौरान पुरूष गाँव-जमाव गीत गाकर नाचते हैं।
> इस नृत्य के दौरान नर्तकों का दल घर-घर जाकर आंगन या चौरावे व रास्ते पर नृत्य करते हैं। 
> लोकनृत्य
> अंगनाई नृत्य 
> विशेषता 
> यह पूजा के अवसर पर किया जाने वाला एक धार्मिक नृत्य है।
> यह नृत्य मुख्यतः सदानों में प्रचलित है।
> इस नृत्य के प्रमुख प्रकार चढ़नतरी, रसक्रीड़ा, थडिया तथा खेमटा हैं।
> लोकनृत्य
> जोमनमा नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य नया अन्न ग्रहण करने की खुशी में किया जाता है।
> इसमें महिला तथा पुरूष सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं ।
> इस नृत्य के दौरान मांदर, नगाड़े, बनम आदि बजाया जाता है।
> लोकनृत्य
> गेना और जापिद नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य के दौरान महिलाएँ कतार जुड़कर नृत्य करती हैं तथा पुरुष स्वतंत्र रूप से नृत्य. करते हैं। पुरूषों द्वारा वाद्ययंत्र भी बजाया जाता है।
> लोकनृत्य
> टुसू नृत्य
> विशेषता
> यह महिला प्रधान नृत्य है।
> महिलाएँ मकर सक्रांति के अवसर पर टुसू के प्रतीक 'चौड़ाल' को प्रवाहित करती हैं। इस अवसर पर वे सामूहिक रूप से यह नृत्य करती हैं।
> लोकनृत्य
> रास नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान पुरूष नर्तक, वादक एवं गायकों के बीच महिलाएँ नृत्य करती हैं।
> लोकनृत्य
> राचा नृत्य
> विशेषता
> इसे बरया खेलना, नाचना या खड़िया नाच भी कहा जाता है।
> यह नृत्य विशेष रूप से खूँटी जिले के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में प्रचलित है।
> इस नृत्य के पहले चरण में महिला नर्तकियाँ पुरुष नर्तकों की ओर बढ़ती हैं तथा पुरुष पीछे हटते हैं, जबकि इसे दूसरे चरण में पुरूष गीत गाते हुए महिलाओं को नृत्य करते हुए पीछे की ओर भेजते हैं।
> इस नृत्य में मांदर तथा घंटी का प्रयोग किया जाता है।
> लोकनृत्य
> धुड़िया नृत्य 
> विशेषता
> यह नृत्य उराँव जनजाति में विशेष रूप से प्रचलित है। 
> खेतों में बीज बोने के पश्चात् मौसमी परिवर्तन के बाद जब खेतों से धूल उड़ती है, तब
धूल उड़ाते हुए यह नृत्य किया जाता है। 
> इस नृत्य के दौरान मांदर बजाकर लोग नाचते हैं। 
> लोकनृत्य
> कली नृत्य
 > विशेषता
> यह नृत्य महिलाओं द्वारा किया जाता है। 
> नृत्य करने वाली महिलाएँ श्रृंगार से सजकर मुकुट पहनकर नृत्य करती हैं। 
> इस नृत्य में राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंग की प्रमुखता होती है।
> इसे नचनी-खेलड़ी नाच भी कहा जाता है।
 > लोकनृत्य 
> दोहा नृत्य
> विशेषता 
> यह नृत्य मुख्यतः संथाल जनजाति में प्रचलित है। 
> यह नृत्य विवाह संस्कार के अवसर पर वर एवं कन्या दोनों के घर में किया जाता है।
> इसे दराम-दाः नृत्य भी कहा जाता है। 
> लोकनृत्य 
> दोंगेड़ नृत्य
> विशेषता  
> यह संथाल जनजाति में प्रचलित पुरुष प्रधान नृत्य है। 
> सामूहिक शिकार के अवसर पर यह नृत्य जंगल में किया जाता है जिसमें वाद्य यंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है।
> लोकनृत्य
> दंसय नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन दशहरे के अवसर पर गुरू - गृह में गुरू - चेलों द्वारा किया जाता है। 
> यह नृत्य मूलतः मंत्र विद्या की सिद्धि प्राप्ति के प्रशिक्षण अवसर पर किया जाने वाला नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान पुरूष ही महिलाओं की वेशषभूषा व आभूषण का धारण करके नृत्य करते हैं।
> इस नृत्य के दौरान भुआंग, नगाड़ा, ढांक, बांसुरी, तुरही, बनम आदि बजाना अनिवार्य होता है। 
> लोकनृत्य 
> दोसमी नृत्य 
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन अगहन के महीने में किया जाता है।
> इस नृत्य का आयोजन जाहेर स्थल पर किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान मांदर, नगाड़ा, टमक, घंटी आदि बजाया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान लांगड़े गीत गाया जाता है।
> लोकनृत्य
> सकरात नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य मुख्यतः संथाल जनजाति में प्रचलित है।
> यह नृत्य पूस माह में किया जाता है तथा नृत्य से पूर्व घर के चौखट की पूजा की जाती है।
> इस नृत्य में पुरुष तथा महिला दोनों भाग लेते हैं।
> लोकनृत्य
> हलका नृत्य
> विशेषता 
> इस नृत्य में महिला तथा पुरुष दोनों भाग लेते हैं, परंतु दोनों अलग-अलग दल बनाकर नृत्य करते हैं। 
> इस नृत्य के दौरान एक दल के नृत्य की समाप्ति के बाद ही दूसरा दल नृत्य करता है। 
> इस नृत्य के दौरान ‘पाडू' गीत गाया जाता है। 
> लोकनृत्य  
> डोयोर नृत्य 
> विशेषता
> यह हलका का ही एक रूप है जिसमें नर्तक / नर्तकी अपने कंधे पर एक-एक डंडा रखकर नृत्य करते हैं । 
> इसमें सर्पाकार गति से नृत्य किया जाता है। 
> लोकनृत्य 
> डोडोंग नृत्य 
> विशेषता
> इस नृत्य में दो कतार बनाकर तथा अगल-बगल खड़े होकर नृत्य किया जाता है। 
> नृत्य के दौरान मांदर बजाया जाता है। 
> इसे जदिरा नृत्य भी कहा जाता है। 
> लोकनृत्य  
> फगुआ नृत्य
> विशेषता
> यह फाल्गुन और चैत के संधिकाल का पुरुष प्रधान नृत्य है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन बसंत उत्सव या होली के अवसर पर किया जाता है। 
 > इस नृत्य में शहनाई, बाँसुरी, मुरली, ढोल, नगाड़ा, करह, ढाँक और मांदर जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
> इस नृत्य के कई प्रकार हैं। पंचरंगी फगुआ नृत्य में हर कड़ी पर राग बदलते जाते हैं, जबकि फगुआ पुछारी नृत्य दो दलों के बीच रागों में ही प्रश्नोत्तर चलते रहते हैं।
> लोकनृत्य 
> कदसा नृत्य
> विशेषता 
> इस नृत्य का प्रदर्शन 'कलश' ले जाने के दौरान किया जाता है।
> यह महिला प्रधान नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान महिलाएँ अपने सिर या कंधे पर कलश रखकर ले जाती हैं।
> पुरूष इस नृत्य में भाग नहीं लेते बल्कि वे केवल वाद्ययंत्र बजाते हैं।
> इस नृत्य का प्रदर्शन विभिन्न त्योहारों के दौरान या अतिथि के स्वागत में किया जाता है।
> लोकनृत्य 
> मइटकोड़ तथा पइनकाटन नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य विवाह के पूर्व मिटटी काटने एवं पानी काटने के नेग के दौरान किया जाता है। 
> इस नृत्य में दो-दो महिलाएँ एक-दूसरे की कमर दाएँ-बाएँ पकड़कर नृत्य करती हैं।
> इस नृत्य के दौरान गीत नहीं गाया जाता, बल्कि केवल बाजा बजाया जाता है। 
> लोकनृत्य 
> हरियो नृत्य 
> विशेषता
> यह युवाओं का जतरा नृत्य है। 
> यह महिला-पुरूषों का सामूहिक नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान नर्तक-नर्तकी वृत्ताकार दौड़ते हुए तीव्र गति का नृत्य करते हैं। 
> लोकनृत्य
> किनभर नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य फाल्गुन से बैशाख तक किया जाता है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन घर के आंगन में किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान 'हो हरे है रे' बोलते हुए कलात्मक नृत्य किया जाता है।
> लोकनृत्य
> हल्का नृत्य
> विशेषता
> इस महिला तथा पुरूषों का सामूहिक नृत्य है।
> इस नृत्य के साथ-साथ गीत भी गाया जाता है तथा गीत की अंतिम कड़ी की समाप्ति पर नर्तक - नर्तकी पैरों को उछालकर पटकते हुए तन को हल्का कर लेते हैं।
> इस नृत्य के दौरान गीत गाया जाता है। पाडू
> लोकनृत्य
> जेठ लहसुआ नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन जेठ मास की रात्रि में अखरा स्थल पर किया जाता है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन खड़िया जनजाति के युवा-युवतियों द्वारा किया जाता है।
> लोकनृत्य
> फग्गू खद्दी नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन सरहुल की प्रतीक्षा में की जाती है।
> इस नृत्य का प्रारंभ फाल्गुन मास से ही हो जाता है।
> इस नृत्य के अंत में 'हुर्रे' की ध्वनि निकाली जाती है।
> लोकनृत्य
> डोडोंग नृत्य
> विशेषता
> यह जदुरा नृत्य का ही उरांव रूप है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन मुण्डा तथा सदानों में भी होता है।
> इस नृत्य में मांदर बजाने का विशेष महत्व होता है ।
> इस नृत्य में 'खेइल लझेर लझेर' की ध्वनि निकाली जाती है। में
> लोकनृत्य
> धुड़िया नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य की पहचान धूल उड़ाने वाले नृत्य के रूप में होती है।
> जब सरहुल के उपरांत खेत जोत दिये जाते हैं तो जुते हुए खेत से धूल उड़ते हैं। इसी दौरान इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है।
> लोकनृत्य
> तुसगो नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन करम पर्व के बीत जाने के बाद किया जाता है ।
> इस नृत्य में सभी उम्र के लोग शामिल होते हैं ।
> इस नृत्य के दौरान मांदर बजाया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान नर्तक 'चला हैरे हैरे' कहते हुए एक-दूसरे की बांह पकड़कर नृत्य करते हुए आगे बढ़ते हैं।
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Sat, 09 Sep 2023 09:45:29 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के लोकगीत https://m.jaankarirakho.com/304 https://m.jaankarirakho.com/304 > जनजाति
> लोकगीत
> संथाल
> दोड (विवाह संबंधी लोकगीत)
> विर सेरेन ( जंगल के लोकगीत)
> सोहराय, लागेड़े, मिनसार, बाहा, दसाय, पतवार, रिजा, डाटा, डाहार, मातवार, भिनसार, गोलवारी, धुरूमजाक, रिंजो, झिका आदि
> मुण्डा
> जदुर (सरहुल / बाहा पर्व से संबंधित लोकगीत)
> गेना व ओर जदुर (जदुर लोकगीत के पूरक)
> अडन्दी (विवाह संबंधी लोकगीत)
> जापी (शिकार संबंधी लोकगीत)
> जरगा, करमा
> हो
> हैरो (धान की बुआई के समय गाया जाने वाला लोकगीत)
> नोमनामा (नया अन्न खाने के अवसर पर गाया जाने वाला लोकगीत)
> उराँव
> सरहुल (बंसत लोकगीत)
> जतरा ( सरहुल के बाद गाया जाने वाला लोकगीत)
> करमा ( जतरा के बाद गाया जाने वाला लोकगीत)
> धुरिया, असाढ़ी, जदुरा, मठा आदि 
> प्रमुख लोकगीत व उनके गाये जाने के अवसर
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Sat, 09 Sep 2023 09:40:25 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के प्रमुख मंदिर / मस्जिद / चर्च https://m.jaankarirakho.com/303 https://m.jaankarirakho.com/303 > मंदिर का नाम
> वैद्यनाथ मंदिर ( बैजनाथ मंदिर )
> अवस्थिति
> देवघर
> विशेषता
> धार्मिक ग्रंथों के अनुसार बैजनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग रावण के द्वारा स्थापित किया गया था।
> गिद्धौर राजवंश के 10वें राजा पूरणमल * द्वारा वर्तमान मंदिर का निर्माण 1514-1515 ई. के बीच कराया गया था।
> गिद्धौर वंश के ही राजा चंद्रमौलेश्वर सिंह ने मंदिर के गुंबद पर स्वर्णकलश स्थापित कराया था।
> यह भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक है।
> शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों * में मनोकामना लिंग यहाँ स्थित है ।
> इस मंदिर में ज्योतिर्लिंग व शक्तिपीठ एक साथ है।
> इस मंदिर के प्रांगण में कुल 22 मंदिर हैं।
> यहाँ शिव मंदिर के शिखर पर त्रिशूल के स्थान पर एक पंचशूल स्थापित है तथा ऐसी विशेषता वाला यह देश का एकमात्र शिव मंदिर है।
> पुराणों में इस मंदिर को अंतिम संस्कार हेतु उपयुक्त स्थान माना गया है। 
> मंदिर का नाम
> तपोवन मंदिर
> अवस्थिति
> देवघर
 > विशेषता
> भगवान शिव के इस मंदिर में अनेक गुफाएँ हैं जिसमें ब्रह्मचारी लोग निवास करते हैं।
> मान्यता है कि यहां सीता जी ने तपस्या की थी। 
> मंदिर का नाम
> युगल मंदिर
> अवस्थिति
> देवघर
 > विशेषता
> इसे नौलखा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस मंदिर के निर्माण में ₹9 लाख की लागत आई थी। 
> मंदिर के निर्माण हेतु रानी चारूशीला ने ₹9 लाख दान दिये थे।
> इस मंदिर का निर्माण तपस्वी बालानंद ब्रह्मचारी के अनुयायी ने कराया था। 
> इस मंदिर का निर्माण 1936 में शुरू हुआ तथा यह 1948 तक चला।
> इस मंदिर की बनावट बेलूर के रामकृष्ण मंदिर की भांति है।
> इस मंदिर की ऊँचाई 146 फीट है।
> मंदिर का नाम
> पथरौल काली मंदिर
> अवस्थिति
> देवघर
> विशेषता
> इस मंदिर का निर्माण पथरौल राज्य के राजा दिग्विजय सिंह ने कराया था।
> इस मंदिर में माँ काली की प्रतिमा स्थापित है, जो माँ दक्षिण काली के नाम से भी प्रसिद्ध है।
> दीपावली के अवसर पर यहाँ एक बड़े मेले का आयोजन होता है।
> मंदिर का नाम
> बासुकीनाथ धाम
> अवस्थिति विशेषता
> जरमुंडी (दुमका)
> विशेषता
> इसका निर्माण वसाकी तांती ( हरिजन जाति) ने कराया था।
> बासुकीनाथ की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुयी है। समुद्र मंथन में मंदराचल पर्वत को मथानी तथा वासुकीनाथ को रस्सी बनाया गया था।
> यह मंदिर लगभग 150 वर्ष पुराना है तथा शिवरात्रि के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।
> इस मंदिर में मनोकामना पूरा करने हेतु श्रद्धालुओं द्वारा धरना देने की परंपरा है। 
> मंदिर का नाम
> मौलीक्षा मंदिर
> अवस्थिति
> दुमका
> विशेषता
> इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में ननकर राजा बसंत राय द्वारा कराया गया था।
> इस मंदिर के गर्भगृह में माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित है, जिसका निर्माण लाल पत्थर से किया गया है ।
> यह प्रतिमा पूर्ण नहीं है, बल्कि केवल मस्तक है। यही कारण है कि इसे मौलीक्षा (माली - मस्तक, इक्षा दर्शन ) मंदिर कहा जाता है।
> मौलीक्षा देवी के दाँयी तरफ भैरव की भी प्रतिमा स्थापित है, जो बालुका पत्थर से निर्मित है तथा मौलीक्षा देवी के आगे काले पत्थर से निर्मित एक शिवलिंग है। 
> ननकर राजा मौलीक्षा देवी (दुर्गा) को अपना कुल देवी मानते थे।
> इस मंदिर का निर्माण बांग्ला शैली में किया गया है।
> यह मंदिर तांत्रिक सिद्धि का केन्द्र रहा है ।
> मंदिर का नाम 
> झारखण्ड धाम मंदिर
> अवस्थिति
> गिरिडीह
> मंदिर का नाम
> मां योगिनी मंदिर
> अवस्थिति
> बाराकोपा पहाड़ी (गोड्डा)
> विशेषता
> मान्यता है कि यहाँ माँ सती जी की दाहिनी जांघ गिरी थी जिसकी आकृति प्रस्तर अंश यहाँ स्थापित है।
> कामाख्या मंदिर की ही भांति यहाँ पिंड की पूजा की जाती है तथा इस मंदिर में लाल रंग के वस्त्र चढ़ाने की प्रथा है।
> इस मंदिर का निर्माण चारूशीला देवी ने कराया था।
> धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस मंदिर की चर्चा महाभारत में 'गुप्त योगिनी' के नाम से की गयी है तथा पांडवों ने अपने अज्ञात वर्ष के कुछ समय यहाँ भी व्यतीत किये थे।
> मंदिर का नाम 
> बेलनीगढ़
> अवस्थिति 
> मेहरमा प्रखण्ड (गोड्डा) 
> विशेषता 
> यह स्थान भगवान बुद्ध की स्मृतियों से जुड़ा है।
> मंदिर का नाम   
> छिन्नमस्तिका मंदिर 
> अवस्थिति
> रजरप्पा (रामगढ़) 
> विशेषता
> यह दामोदर तथा भैरवी (भेरा / भेड़ा) नदी के संगम पर स्थित है। 
> इस मंदिर में कारण इसे छिन्नमस्तिका कहा जाता है। माँ काली का यह छिन्न मस्तक चंचलता का प्रतीक है। माँ काली की धड़ से अलग सर वाली मूर्ति प्रतिष्ठापित होने के
> यहाँ देवी के दांये डाकिनी और बांये शाकिनी विराजमान हैं तथा देवी के पैरों के नीचे रति-कामदेव विराजमान हैं जो कामनाओं के दमन का प्रतीक है। ●
> एक किवदंती के अनुसार भगवान शिव के नृत्य के दौरान यहाँ सती का एक अंग गिरा था तथा पुराणों के अनुसार जिन-जिन स्थानों पर सती के अंग, वस्त्र या आभूषण गिरे वहाँ शक्तिपीठ अस्तित्व में आ गए।
> इस प्रकार भारत के प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में यह भी शामिल है। इस स्थान का प्रयोग तांत्रिक अपनी तंत्र साधना हेतु करते हैं।
> इस मंदिर में प्रतिष्ठापित माँ काली की प्रतिमा शक्ति के उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती है।
> 1947 ई. तक यह मंदिर वनों से घिरा था जिसके कारण इसका नाम 'वन दुर्गा मंदिर' भी पड़ गया।
> यहाँ शारदीय दुर्गा उत्सव के अवसर पर सर्वप्रथम संथाल आदिवासियों द्वारा माँ की महानवमी पूजा की जाती है तथा इन्हीं के द्वारा बकरे की पहली बलि दी जाती है।
> यह कामाख्या मंदिर की शिल्पकला से प्रभावित है।
> इस मंदिर को रामगढ़ के राजाओं द्वारा पर्याप्त संरक्षण मिला तथा इस मंदिर के निकट दक्षिणेश्वर मंदिर के आसपास के गाँवों से लाकर तांत्रिक पुजारियों को बसाने का श्रेय इन्हीं को जाता है।
> मंदिर का नाम
> कैथा शिव मंदिर
> अवस्थिति
> रामगढ़
> विशेषता
> इस मंदिर का निर्माण 17वीं सदी में रामगढ़ के राजपरिवार दलेर सिंह द्वारा करवाया गया था।
> इस मंदिर के निर्माण में मुगल, राजपूत तथा बंगाल स्थापत्य कला का मिश्रण है।
> इस मंदिर का उपयोग सैन्य उद्देश्य से किया जाता था।
> भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा इस मंदिर को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया है।
> मंदिर का नाम
> शिव मंदिर 
> अवस्थिति 
> बादमगाँव (हजारीबाग)
> विशेषता
> हजारीबाग के बादमगाँव में स्थित बादम पहाड़ियों में भगवान शिव के चार गुफा मंदिर हैं।
> इन मंदिरों का निर्माण 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में किया गया था।
> मंदिर का नाम
> माता चंचला देवी
> अवस्थिति
> कोडरमा
> विशेषता
> यह एक शक्तिपीठ है जो कोडरमा- गिरिडीह मार्ग पर स्थित चंचला देवी पहाड़ी पर स्थित है।
> चंचला देवी, माँ दुर्गा का ही रूप हैं।
> इस मंदिर में सिंदूर का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है।
> मंदिर का नाम
> वंशीधर मंदिर
> अवस्थिति
> नगर ऊंटारी ( गढ़वा)
> विशेषता
> यह मंदिर 1885 ई. में निर्मित किया गया था।
> इस मंदिर में अष्टधातु से निर्मित राधा-कृष्ण की मूर्ति प्रतिष्ठापित है जिसका वजन 32 मन तथा ऊँचाई 4 फुट है।
> इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा में कमल पुष्प पीठिका पर खड़ी मूर्ति है।
> मंदिर का नाम
> राम-लक्ष्मण मंदिर
> अवस्थिति
> बमण्डीग्राम (पलामू)
> विशेषता
> इस मंदिर में भगवान राम और लक्ष्मण की मूर्ति प्रतिष्ठापित है।
> मंदिर का नाम
> दशशीश महादेव मंदिर
> अवस्थिति
> जपला (पलामू)
> विशेषता
> किवदंती के अनुसार लंका के राजा रावण ने हिमालय पर्वत से शिवलिंग ले जाते समय यहाँ पर रखा था, जिसे वह बाद में उठा नहीं सका।
> मंदिर का नाम
> उग्रतारा मंदिर / नगर मंदिर 
> अवस्थिति
> चंदवा (लातेहार)
> विशेषता
> इस मंदिर में एक ही स्थान पर काली कुल की देवी उग्रतारा और श्रीकुल की देवी लक्ष्मी स्थापित हैं।
> इस मंदिर के प्रांगण में कुछ बौद्ध प्रतिमाएँ भी हैं।
> यह मंदिर एक सिद्ध तंत्रपीठ के रूप में विख्यात है।
> यद्यपि इस मंदिर के निर्माण को लेकर कोई प्रामाणिक जानकारी प्राप्त नहीं हुयी है, परन्तु पलामू गजेटियर के अनुसार इस मंदिर का निर्माण मराठों के विजय स्मारक के रूप में अहिल्याबाई ने कराया था।
> मंदिर का नाम 
> भद्रकाली मंदिर
> अवस्थिति
> इटखोरी का भदुली गांव (चतरा)
> विशेषता
> भद्रकाली की मूर्ति शक्ति के तीन रूपों (सौम्य, उग्र तथा काम) में से सौम्य रूप का प्रतिनिधित्व करती है। 
> यहाँ कमल के आसन पर खड़ी वरदायिनी मुद्रा में माँ है। इस प्रतिमा को बौद्ध धर्म के लोग 'तारा देवी' की प्रतिमा मानते हैं। 
> यहाँ माँ भद्रकाली की प्रतिमा के नीचे पाली लिपि में लिखा हुआ है कि बंगाल के शासक राजा महेन्द्र पाल द्वितीय द्वारा इस प्रतिमा का निर्माण किया गया है।
> इस मंदिर का निर्माण बालुका पत्थर के एक ही शिलाखंड को तराश कर किया गया है।
> इस मंदिर का निर्माण पाँचवी - छठी शताब्दी में पाल काल में किया गया था। इस मंदिर में 1008 छोटे-छोटे शिवलिंग उकेरे गए हैं।
>>इस मंदिर के बाहर कोठेश्वरनाथ स्तूप अवस्थित है। इसे मनौती स्पूप कहा जाता है। स्तूप के नीचे भगवान बुद्ध की परिनिर्वाण मुद्रा में एक प्रतिमा उत्कीर्ण है।
> स्तूप के ऊपरी भाग में चार इंच लंबा, चौड़ा व गहरा एक गड्ढा है, जिसमें हमेशा पानी भरा रहता है ।
> मंदिर का नाम
> कौलेश्वरी मंदिर
> अवस्थिति 
> कोल्हुआ पहाड़ (चतरा)
> विशेषता
> कोल्हुआ पहाड़ हिन्दु, बौद्ध तथा जैन धर्मों का संगम स्थल है। यह पहाड़ जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर शीतलनाथ की तपोभूमि व जिनसेन (जैन महापुराण के रचनाकार) का साधना स्थल माना जाता है। 
> कोल्हुआ पहाड़ पर भगवान बुद्ध की ध्यानमग्न मुद्रा में प्रतिमाएँ स्थापित हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव व पार्श्वनाथ की प्रतिमाएँ स्थापित हैं।
> इस मंदिर की ऊँचाई लगभग 1575 फीट है जिसमें माँ कौलेश्वरी (दुर्गा) की मूर्ति स्थापित है, जिसे काले पत्थर को तराशकर बनाया गया है। 
> मंदिर का नाम
> सहस्त्रबुद्ध (कांटेश्वरनाथ )
> अवस्थिति
> चतरा
> मंदिर का नाम
> टाँगीनाथ धाम मंदिर
> अवस्थिति विशेषता
> गुमला
> विशेषता
> यह मंदिर गुमला के मंझगांव पहाड़ी पर स्थित है।
> इस मंदिर के अंदर एक विशाल शिवलिंग के अलावा आठ अन्य शिवलिंग हैं।
> यहाँ शिवलिंग के अलावा माँ दुर्गा, लक्ष्मी, भगवती, गणेश, हनुमान आदि की प्रतिमाएँ हैं।
> इस मंदिर के पास एक अष्टकोणीय खंडित त्रिशूल अवस्थित है, जिसकी भूमि से ऊँचाई लगभग 11 फीट है। इतिहासकार इसे 5वीं - 6ठी सदी का मानते हैं। 
> इस मंदिर का निर्माण पूर्व मध्यकाल में हुआ था।
> इस स्थान का संबंध परशुराम से जोड़कर देखा जाता है।
> एक मान्यता के अनुसार यहाँ आज भी परशुराम का पदचिन्ह् मौजूद है तथा यहाँ परशुराम द्वारा प्रयुक्त फरसा ( टाँगी) गड़ा हुआ है।
> इस स्थान का संबंध पाशुपत संप्रदाय से है। 
> मंदिर का नाम
> वासुदेवराय मंदिर 
> अवस्थिति
> कोराम्बे ग्राम (गुमला)
> विशेषता
> यहाँ काले पत्थरों से निर्मित वासुदेवराय की प्रतिमा स्थित है। नागवंशावली के अनुसार नागवंशियों ने पलामू के रक्सेलों को पराजित करके प्राप्त की थी। 
> 1463 ई. में इस मूर्ति की विधिवत् स्थापना राजा प्रताप कर्ण के द्वारा की  गयी थी।
> एक अन्य किवदंती के अनुसार यह मूर्ति खेत जोतते समय घुमा मुण्डा ( सहियाना ग्राम निवासी) को मिली थी। 
> यहाँ रक्सेल एवं नागवंशियों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। अतः इस स्थान को हल्दीघाटी तथा यहाँ स्थापित मंदिर को 'हल्दीघाटी मंदिर' भी कहते हैं।
> मंदिर का नाम
> महामाया मंदिर
> अवस्थिति 
> हापामुनी गाँव (गुमला)
> विशेषता
> इस मंदिर का निर्माण नागवंशी शासक गजघंट राय ने 908 ई. में कराया था। 
> इस मंदिर में काली माँ की मूर्ति स्थापित है, जो एक तांत्रिक पीठ है।
> इस मंदिर के प्रथम पुरोहित द्विज हरिनाथ (मराठा ब्राह्मण) थे। 
> सियानाथ देव के द्वारा इसमें विष्णु की प्रतिमा स्थापित की गयी थी।
> 1831 के कोल विद्रोह के दौरान इस मंदिर में तोड़फोड़ हो गयी थी जिसे बाद में पुनर्निमित कर दिया गया।
> चैत्र पूर्णिमा के दिन इस मंदिर में मंडा पूजा ( शिव की पूजा) की जाती है तथा यहाँ मंडा मेला का आयोजन किया जाता है।
> मंडा पूजा के दौरान भोगता आग पर नंगे पाँव चलते हैं जिसे स्थानीय भाषा में ‘फूलखूँदी' कहा जाता है।
> मंदिर का नाम 
> अंजन धाम मंदिर
> अवस्थिति 
> अंजन ग्राम (गुमला)
> विशेषता
> इसे हुनमान जी का जन्म स्थान माना जाता है।
> यहाँ देवी अंजना की प्रस्तर - मूर्ति स्थापित है।
> यहाँ पर चक्रधारी मंदिर एवं नकटी देवी का मंदिर भी स्थित है। चक्रधारी मंदिर में शिवलिंग के ऊपर भारी पत्थर से बना एक चक्र स्थित है, जिसके बीच में एक छिद्र है।
> इस मंदिर को सूर्य के रथ की आकृति में निर्मित किया गया है।
> इस मंदिर का निर्माण राँची की एक संस्था 'संस्कृति विहार' ने कराया था तथा इसके शिल्पकार एस. आर. एन. कालिया थे।
> मंदिर का नाम
> वेउडी मंदिर
> अवस्थिति
> तमाड़ , राँची
> विशेषता
> यहाँ 16 भुजी माँ दुर्गा की मूर्ति स्थापित है, जो काले रंग के प्रस्तर खण्ड पर उत्कीर्ण है। यहाँ माँ दुगा शेर पर विराजमान न होकर कमल पर विराजमान (कमलासन) हैं।
> दुर्गा की मूर्ति के ऊपर शिव की मूर्ति तथा इसके ऊपर बेताल की मूर्ति है। अगल-बगल में सरस्वती, लक्ष्मी, कार्तिक व गणेश की मूर्तियाँ भी हैं।
>>परंपरागत रूप से यहाँ 6 दिन पाहन (आदिवासी) व एक दिन ब्राह्मण पुजारी के द्वारा पूजा किया जाता है। इस प्रकार आदिवासी एवं ब्राह्मण दोनों के द्वारा | पूजा कराया जाना इस मंदिर की अनोखी विशेषता है।
> दशहरा के अवसर पर इस मंदिर में बली देने की प्रथा है।
> इस मंदिर का निर्माण सिंहभूम के केड़ा के एक जनजातीय प्रमुख द्वारा कराया गया था। 
> इस मंदिर का निर्माण प्रस्तर खण्डों से किया गया है तथा यह चतुर्भुजाकार है।
> मंदिर का नाम
> मदन मोहन मंदिर 
> अवस्थिति
> बोड़ेया (कांके, राँची)
> विशेषता
> इस मंदिर का निर्माण 1665 ई. (विक्रम संवत् 1722) में प्रारंभ किया गया था, जो 1668 ई. में बनकर तैयार हो गया। मंदिर की चारदीवारी, चबूतरे आदि के निर्माण में कुल 14 वर्ष और लगे तथा 1682 ई. में यह तैयार हो गया। (Source - मंदिर का शिलालेख )
> मंदिर के चारों ओर पत्थरों को तराश कर चबूतरे का निर्माण किया गया है। 
> मुख्य मंदिर के छत पर 40 फीट ऊँचा गोल शिखर है, जिस पर लोहे का एक चक्र है तथा इस चक्र पर त्रिशूल है।
> 1665 ई. में राजा रघुनाथ शाह की उपस्थिति में लक्ष्मीनारायण तिवारी द्वारा वैशाख शुक्ल पक्ष दशमी को इस मंदिर का शिलान्यास किया गया। 
> लक्ष्मीनारायण तिवारी ने ही इस मंदिर का निर्माण कराया था।
> इसके निर्माण में लगभग 14,001 रूपये की लागत आयी थी।
> इस मंदिर का निर्माण ग्रेनाइट पत्थरों से किया गया है, जिसके कारण यह मंदिर लाल दिखाई पड़ता था। परंतु बाद में इस पर सफेद रंग की पुताई कर दी गयी। 
> इस मंदिर के शिल्पकार का नाम अनिरूद्ध था।
> इस मंदिर में सिंहासन पर राधाकृष्ण की अष्टधातु की प्रतिमा स्थापित है। अतः इसे राधाकृष्ण मंदिर भी कहा जाता है।
> इस मंदिर में राम-सीता व लक्ष्यण की प्रतिमा भी स्थापित की गयी है।
> श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर इस मंदिर में विशेष आयोजन किया जाता है, जबकि प्रत्येक पूर्णिमा को यहां सत्यनारायण की पूजा की जाती है। 
> इस मंदिर के दक्षिणी द्वारा के सामने एक बड़ा चबूतरा है, जहाँ होली के अवसर पर ‘फडगोल’ खेला जाता है। इस दौरान चबूतरे पर भगवान कृष्ण की मूर्ति को लाकर श्रद्धालु उन्हें अबीर-गुलाल लगाते हैं ।
> इस मंदिर के गर्भगृह में मंदिर के पुजारी के अलावा किसी का भी प्रवेश निषेध है। 
> मंदिर का नाम 
> पहाड़ी मंदि
> अवस्थिति
> राँची
> विशेषता
> यह मंदिर राँची में स्थित टुंगरी पहाड़ी (वास्तविक नाम राँची बुरू) पर स्थित है। 1905 ई. के आस-पास इस पहाड़ी के शिखर पर शिव मंदिर का निर्माण (संभवत: पालकोट के राजा द्वारा) किया गया था। 
> पहाड़ी पर स्थित इस शिव मंदिर के पास नाग देवता का भी एक मंदिर है जिसमें नाग देवता ( राँची के नगर देवता ) की पूजा-अर्चना की जाती है।
> इस मंदिर में श्रावण माह तथा महाशिवरात्रि के दिन अत्यंत भीड़ होती है। श्रावण माह के दौरान प्रत्येक सोमवार को श्रद्धालु मंदिर से 12 किमी. दूर स्थित स्वर्णरेखा नदी से जल लेकर इस मंदिर में चढ़ाते हैं ।
> स्वतंत्रता पूर्व इस पहाड़ी का प्रयोग अंग्रेजों द्वारा फांसी देने हेतु किया जाता था।
> मंदिर के समीप इस पहाड़ी पर 15 अगस्त, 1947 से प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस को तिरंगा फहराया जाता है।
> इस पहाड़ी की ऊँचाई 300 फीट है तथा इसमें 468 सीढ़ियाँ बनी हैं।
> यह पहाड़ी लगभग 4500 मिलियन वर्ष पूर्व 'प्रोटेरोजोइक काल' का है, जो हिमालय पर्वत से भी प्राचीन है।
> इस पहाड़ के चट्टान का भौगोलिक नाम 'गानेटिफेरस सिलेमेनाई शिष्ट' है तथा इसे ‘खोंडालाइट' नाम से जाना जाता है ।
> मंदिर का नाम
> राम-सीता मंदिर ( राधावल्लभ मंदिर ) 
> अवस्थिति 
> चुटिया (राँची)
> विशेषता
> नागवंशी राजा रघुनाथ शाह ने 1685 ई. में इस मंदिर का निर्माण कराया था तथा ब्रह्मचारी हरिनाथ (मराठा ब्राह्मण) को इसका पुजारी नियुक्त किया।
> इस मंदिर का निर्माण पत्थरों को तराशकर किया गया है।
> यह मंदिर पूर्व में राधावल्लभ मंदिर था। इसका प्रमाण मंदिर के ऊपरी मंजिल में कृष्ण की रासलीला करती मूर्ति से मिलता है ।
> 28 जनवरी, 1898 ई. को 'मुण्डा उलगुलान' के दौरान बिरसा मुण्डा ने अपने अनुयायियों के साथ इस मंदिर की यात्रा की थी।
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Sat, 09 Sep 2023 09:38:35 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के प्रमुख किले/राजप्रासाद https://m.jaankarirakho.com/302 https://m.jaankarirakho.com/302 > किला / राजप्रासाद
> पलामू किला
> अवस्थिति
> विशेषता
> लातेहार
> यह किला लातेहार जिले में बेतला राष्ट्रीय उद्यान से लगभग 5 किमी. दूर औरंगा नदी के तट पर स्थित है।
> इसका निर्माण चेरोवंशी शासकों द्वारा कराया गया था। (1619 ई. में निर्माण प्रारंभ) 
> यहाँ दो किले अवस्थित हैं, जिसमें पुराने किले का निर्माण चेरोवंशी शासक प्रताप राय ने करवाया था, जो शाहजहाँ का समकालीन था तथा नये किले का निर्माण चेरो राजा मेदिनी राय * ने करवाया था, जो औरंगजेब का समकालीन था।
> नये किले में 40 फीट ऊँचा व 15 फीट चौड़ा एक आकर्षक दरवाजा है, जिसे नागपुरी दरवाजा कहा जाता है।
> इस किले में एक तीन गुंबदों वाला मस्जिद स्थित है, जिसका निर्माण सन् 1661 ई. में दाउद खाँ ने करवाया था।
> यह औरंगा नदी के तट पर स्थित है।
> इस किले का नागपुरी दरवाजा अत्यंत आकर्षक है। इसकी ऊँचाई 40 फीट तथा चौड़ाई 15 फीट है। 
> किला / राजप्रासाद
> विश्रामपुर का किला
> अवस्थिति 
> पलामू
> विशेषता
> इसका निर्माण चेरोवंशी शासक राजा तड़वन द्वारा कराया गया था। 
> इस किले के निर्माण में लगभग 9 वर्ष का समय लगा था। 
> इस किले के पास एक मंदिर भी निर्मित है।
> किला / राजप्रासाद
> रोहिल्लों का किला
> अवस्थिति
> अलीनगर, जपला (पलामू)
> विशेषता
> इसका निर्माण रोहिल्ला सरदार मुजफ्फर खाँ ने कराया था।
> इस किले की आकृति त्रिभुजाकार है।
> किला/राजप्रासाद
> चैनपुर का किला
> मेदिनीनगर (पलामू)
> अवस्थिति
> विशेषता
> इसका निर्माण पूरनमल के वंशधरों ने कराया था।
> यह कोयल नदी के तट पर अवस्थित है।
> इस किले में चैनपुर बंगला नामक एक नये स्मारक का निर्माण कराया गया है।
> किला / राजप्रासाद 
> शाहपुर का किला 
> अवस्थिति 
> विशेषता 
> पलामू यह मुगलकालीन स्थापत्य का उदाहरण है। 
> इसका निर्माण गोपाल राय द्वारा 1772 ई. में कराया गया था।
> किला / राजप्रासाद 
 > नारायणपुर किला
> अवस्थिति 
> नारायणपुर किला
> विशेषता 
> इसका निर्माण चेरोवंशी शासक भागवत राय के लेखपाल जाज दास द्वारा कराया गया था। 
> किला / राजप्रासाद 
> पद्मा का किला 
> अवस्थिति 
> पद्मा (हजारीबाग)
> विशेषता 
> यह किला राष्ट्रीय राजमार्ग-33 के किनारे अवस्थित है। 
> इसे राज्य सरकार द्वारा पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र बना दिया गया है। 
> किला / राजप्रासाद 
> बादम का किला
> अवस्थिति 
> हजारीबाग
> विशेषता 
> इसका निर्माण रामगढ़ के राजा हेमन्त सिंह द्वारा किया गया था। 
> 1642 ई. में राजा हेमन्त सिंह ने यहाँ एक शिव मंदिर का निर्माण कराया था, जिसके अवशेष आज भी विद्यमान हैं। 
> किला / राजप्रासाद 
> रामगढ़ का किला
> अवस्थिति 
> रामगढ़
> विशेषता 
> इस किले का निर्माण 1670 ई. में रामगढ़ राजवंश के राजा हेमंत सिंह ने अपनी राजधानी को बादम से रामगढ़ स्थानांतरित करते समय कराया था। 
> यह किला 1805 ई. में राजाराम मोहन राय की रामगढ़ यात्रा का गवाह भी बना। 
> किला / राजप्रासाद 
> कुंडा का किला
> अवस्थिति 
> कुंडा (चतरा)
> रामगढ़
> विशेषता 
> इसका निर्माण 14वीं शताब्दी में चेरोवंशी राजा द्वारा कराया गया था। 
> किला / राजप्रासाद 
> कतरासगढ़ का किला
> अवस्थिति 
> धनबाद
> विशेषता 
> इस किले का निर्माण 18वीं शताब्दी में कतरास के शासकों द्वारा कराया गया था। 
> यह किला धनबाद जिले के बाघमारा प्रखण्ड में कटनी नदी के तट पर स्थित है। 
> किला/राजप्रासाद
> पंचकोट का किला
> अवस्थिति
> पंचेत पहाड़, धनबाद
> विशेषता
> यह किला धनबाद जिले में पंचेत पहाड़ पर स्थित है।
> इसका निर्माण गोवंशी शासक गोमुखी ने कराया था।
> इस किले की पट्टिकाओं पर इसका निर्माण तिथि 1600 ई. उत्कीर्ण है।
> यह किला पाँच दीवारों (कोटों) से घिरा हुआ है, जिसके कारण इसका नाम पंचकोट का किला पड़ा है।
> किला/राजप्रासाद
> झरियागढ़ महल
> अवस्थिति
> धनबाद
> विशेषता
> झरिया के राजाओं की प्रारंभिक राजधानी यहीं थी जिसे बाद में कतरासगढ़ स्थानांतरित कर दिया गया था।
> किला/राजप्रासाद
> रातू का किला
> अवस्थिति
> रातू (राँची)
> विशेषता
> रातू के वर्तमान किले का निर्माण 1870 ई. में नागवंशी राजा उदयनाथ शाहदेव ने कराया था।
> इस किले का निर्माण एक अंग्रेज कंपनी के ठेकेदार द्वारा किया गया था जिसके कारण इस पर अंग्रेजी स्थापत्य कला का प्रभाव देखने को मिलता है।
> किला/राजप्रासाद
> तिलमी का किला
> अवस्थिति
> कर्रा (खूँटी)
> विशेषता
> इसका निर्माण 1737 ई. में अकबर नामक एक नागवंशी ठाकुर ने मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से करवाया था।
> किला/राजप्रासाद
> नवरतनगढ़ महल / दोयसा का किला 
> अवस्थिति
> गुमला
> विशेषता
> इसका निर्माण 1585 ई. में नागवंशी राजा दुर्जनशाल ने करवाया था।
> यह एक पंचमंजिला भवन है, जो कंगूरा शैली में दांतेदार परकोटों (दीवारों) से घिरा है तथा इस महल के प्रत्येक मंजिल पर नौ-नौ कमरे थे।
> वर्तमान समय में इस महल में तीन मंजिल शेष हैं।
> इस किले का निर्माण चूना-सुर्खी एवं लाहौरी ईंटों से किया गया था।
> इस किले के अंदर शिव मंदिर व कपिलनाथ मंदिर जैसे मंदिरों का निर्माण भी कराया गया था।
> इसे 'झारखण्ड का हम्पी' भी कहा जाता है।
> इस किले को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।
> किला / राजप्रासाद 
> पालकोट का राजमहल
> अवस्थिति 
> गुमला
> विशेषता 
> पालकोट नागवंशी शासक यदुनाथ शाह की राजधानी थी तथा यहीं पर इन्होनें इस महल का निर्माण कराया था।
> यह राजमहल राष्ट्रीय राजमार्ग-23 पर गुमला - सिमडेगा मार्ग पर स्थित है। 
> किला / राजप्रासाद 
> नागफेनी का राजमहल 
> अवस्थिति 
> सिसई ( गुमला)
> विशेषता 
> पुरातात्विक दृष्टि से इसके निर्माण का समय 1704 ई. अनुमानित है।
> इसके अवशिष्ट दीवारों पर एक आलेख है, जिसमें पत्थर पर एक राजा और उसकी सात रानियों तथा एक कुत्ते का चित्र अंकित है। 
> किला / राजप्रासाद 
> जैतगढ़ का किला
> अवस्थिति 
> पश्चिमी सिंहभूम
> विशेषता 
> यह बैतरणी नदी के किनारे अवस्थित है।
> इसका निर्माण पोरहाट नरेश काला अर्जुन सिंह ने कराया था। 
> किला / राजप्रासाद 
> जगन्नाथ का किला / पोराहाट का किला
> अवस्थिति 
> पश्चिमी सिंहभूम
> विशेषता 
> इस किले का निर्माण पोराहाट वंश के राजा जगन्नाथ सिंह ने करवाया था। 
> किला / राजप्रासाद 
> चक्रधरपुर की राजवाड़ी
> अवस्थिति 
> चक्रधरपुर (पश्चिमी सिंहभूम
> विशेषता 
> इसका निर्माण राजा अर्जुन सिंह के पुत्र नरपति सिंह द्वारा 1910-20 ई. के बीच करवाया गया था। 
> इसका निर्माण राजमहल की ईंटों से कराया गया था। 
> राजा की पुत्री शशांक मंजरी द्वारा इस किले का विक्रय कर दिया गया था।
> किला/राजप्रासाद
> केसानगढ़ का किला
> अवस्थिति
> केसानगढ़ (पश्चिमी सिंहभूम)
> विशेषता
> यह चाईबासा के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित है।
> यहाँ इस किले का अवशेष एक टिले के रूप में मिला है।
> किला/राजप्रासाद
> तेलियागढ़ किला
> अवस्थिति
> राजमहल पहाड़ी, साहेबगंज
> विशेषता
> इसे बंगाल का प्रवेश द्वार ( गेटवे ऑफ बंगाल ) भी कहा जाता है।
> इस किले का निर्माण मुगल काल में एक तेली राजा ने कराया था, जिसने शाहजहाँ, के समय में इस्लाम धर्म अपना लिया था।
> इस किले का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसांग, ईरानी यात्री अब्दुल लतीफ एवं फ्रांसिस बुकानन व कनिंघम ने भी अपने यात्रा वृत्तांतों में किया है। इसके साथ ही ‘आइन - ए - अकबरी' तथा 'जहाँगीरनामा' में भी इस किले का उल्लेख मिलता है।
> मेगस्थनींज ने अपनी पुस्तक 'इंडिका' में गंगा नदी से सटे पहाड़ी पर काले पत थरों से निर्मित बड़े बौद्ध विहार का उल्लेख किया है, जिसका संबंध तेलियागढ़ी क्षेत्र से ही है।
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Sat, 09 Sep 2023 09:31:40 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की जनजातियाँ https://m.jaankarirakho.com/301 https://m.jaankarirakho.com/301 जनजाति
 संथाल
महत्वपूर्ण बातें
> यह झारखण्ड की सर्वाधिक जनसंख्या (35 प्रतिशत) वाली जनजाति है।
> जनजातियों की कुल जनसंख्या में इनका प्रतिशत 35%* है।
> यह भारत की तीसरी सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है। (प्रथम भील तथा दूसरी गोंड )
> झारखण्ड आने से पूर्व इनका निवास प. बंगाल में था, जहाँ इन्हें 'साओतार' कहा जाता है।
> इनका सर्वाधिक संकेन्द्रण झारखण्ड के उत्तर- पूर्वी क्षेत्र में है जिसके कारण इस क्षेत्र को संथाल परगना कहा जाता है।
> संथाल परगना के अतिरिक्त हजारीबाग, बोकारो, चतरा, राँची, गिरिडीह, सिंहभूम, धनबाद, लातेहार तथा पलामू में भी यह जनजाति पायी जाती है।
> राजमहल पहाड़ी क्षेत्र में इनके निवास स्थान को 'दामिन-ए - कोह' कहा जाता है।
> संथाल जनजाति का संबंध प्रोटो-आस्ट्रेलायड प्रजाति समूह से है।
> प्रजातीय और भाषायी दृष्टि से संथाल जनजाति ऑस्ट्रो एशियाटिक समूह से साम्यता रखती है।
> यह जनजाति बसे हुए किसानों के समूह से संबंधित है।
> लुगु बुरू को संथालों का संस्थापक पिता माना जाता है। 
> संथालों की प्रमुख भाषा संथाली है जिसे 2004 में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। इसके लिए संसद में 92वाँ संविधान संशोधन, 2003 पारित किया गया था। 
> संथाली भाषा की लिपि 'ओलचिकी' है, जिसका आविष्कार रघुनाथ मुर्मू द्वारा किया गया था।
> समाज एवं संस्कृति
> संथालों को चार हडों (वर्ण/वर्ग) में विभाजित किया जाता है :
1. किस्कू हड (राजा)
2. मुरमू हड (पुजारी)
3. सोरेन हड (सिपाही)
4. मरूडी हड (कृषक)
> संथाल जनजाति में 12 गोत्र (किली) पाया जाता है। इन 12 गोत्रों के उप- गोत्रों (खूट) की कुल संख्या 144 है।
> संथाल एक अंतर्जातीय विवाही समूह है तथा इनके मध्य सगोत्रीय विवाह निषिद्ध होता है।
> संथाल जनजाति में बाल विवाह की प्रथा का प्रचलन नहीं है।
> संथाल जनजाति में विभिन्न प्रकार के विवाहों (बापला) का प्रचलन है
> किरिंग बापला – मध्यस्थ के माध्यम से विवाह तय होता है।
 
> गोलाइटी बापला – गोलट विवाह
> टुनकी दिपिल बापला गरीब परिवारों में प्रचलित कन्या को वर के घर लाकर सिंदूर दान करके 
विवाह ।
> धरदी जांवाय बापला पड़ता है। विवाह के बाद दामाद को घर जंवाई बनके रहना पड़ता है।
> अपगिर बापला - लड़का-लड़की में प्रेम हो जाने के बाद पंचायत की सहमति से विवाह ।
> इतुत बापला पसंद के लड़के से विवाह की अनुमति नहीं मिलने पर लड़के द्वारा किसी अवसर पर लड़की को सिंदूर लगाकर विवाह । बाद में लड़की के घरवालों द्वारा स्वीकृति दे दी जाती है ।
> निर्बोलक बापला - लड़की द्वारा हठपूर्वक पसंद के लड़के के घर रहना तथा बाद में पंयाचत के माध्यम से विवाह ।
> बहादुर बापला लड़का-लड़की द्वारा जंगल में भागकर प्रेम विवाह | 
> राजा-राजी बापला बापला गाँव की स्वीकृति से प्रेम विवाह ।
> सांगा बापला बापला - विधवा / तलाकशुदा स्त्री का विधुर/ परित्यक्त पुरूष से विवाह 
> किरिंग जवाय बापला लड़की द्वारा शादी से पहले गर्भधारण कर लेने के बाद इच्छुक व्यक्ति से लड़की का विवाह ।
> किरिंग बाला सर्वाधिक प्रचलित विवाह है जिसके अंतर्गत माता-पिता द्वारा मध्यस्थ के माध्यम से विवाह तय किया जाता है।
> संथालों में विवाह के समय वर पक्ष द्वारा वधु पक्ष को वधु मूल्य दिया जाता है, जिसे पोन कहते हैं ।
> संथाल समाज में सर्वाधिक कठोर सजा बिटलाहा है। यह सजा तब दी जाती है जब कोई व्यक्ति निषिद्ध यौन संबंधों का दोषी पाया जाता है। यह एक प्रकार का सामाजिक बहिष्कार है।
> सामाजिक व्यवस्था से संबंधित विभिन्न नामकरण:
युवागृह – घोटुल
विवाह – बापला
वधु मूल्य – पोन
गाँव – आतों
ग्राम प्रधान – माँझी
उप-ग्राम प्रधान – प्रानीक/प्रमाणिक
माँझी का सहायक – जोगमाँझी
गाँव का संदेशवाहक – गुड़ैत/गोड़ाइ
> ग्राम प्रधान अर्थात् माँझी के पास प्रशासनिक एवं न्यायिक अधिकार होते हैं।
> माँझीथान में संथाल गाँव की पंचायतें बैठती हैं।
> इस जनजाति में महिलाओं का माँझीथान में जाना वर्जित होता है।
> आषाढ़ माह में संथालों के त्योहार की शुरूआत होती है।
> बा - परब ( सरहुल), करमा, ऐरोक * ( (आषाढ़ माह में बीज बोते समय), बंधना, हरियाड (सावन माह में धान की हरियाली आने पर अच्छी फसल हेतु), जापाड, सोहराई (कार्तिक अमावस्या को पशुओं के सम्मान में), सकरात (पूस माह घर-परिवार की कुशलता हेतु), भागसिम (माघ माह में गांव के ओहदेदार को आगामी वर्ष हेतु ओहदे की स्वीकृति देने हेतु), बाहा (फागुन माह में शुद्ध जल से खेली जाने वाली होली) आदि संथालों के प्रमुख त्योहार हैं।
> संथाल जनजाति के लोग चित्रकारी के कार्य में अत्यंत निपुण होते हैं।
> संथाल जनजाति के लोग बुनाई के कार्य में अत्यंत कुशल होते हैं।
> इस जनजाति में एक विशेष चित्रकला पद्धति प्रचलित है, जिसे 'कॉम्ब-कट चित्रकला' (Comb-Cut Painting) कहा जाता है। इस चित्रकारी में विभिन्न प्रकार के बर्तनों का चित्र बनाया जाता है । 
> इस जनजाति में गोदना गोदवाने का प्रचलन पाया जाता है। पुरूषों के बांये हाथ पर सामान्यतः सिक्का का चित्र होता है तथा बिना सिक्का के चित्र वाले पुरूष के साथ कोई लड़की विवाह करना पसंद नहीं करती है ।
> इस जनजाति में माह को 'बोंगा' के नाम से जाता है तथा 'माग बोंगा' माह से वर्ष की शुरूआत मानी जाती है।
> आर्थिक व्यवस्था
> संथाल मूलतः खेतिहर हैं जिनका रूपान्तरण कृषकों के रूप में हो रहा है।
> संथाल चावल से बनने वाले शराब (स्थानीय मदिरा) का सेवन करते हैं जिसे 'हड़िया' * या 'पोचाई' कहा जाता है ।
> धार्मिक व्यवस्था
> संथालों का प्रधान देवता सिंगबोंगा या ठाकुर है जो सृष्टि का रचयिता माना जाता है।
> संथालों का दूसरा प्रमुख देवता मरांग बुरू है। 
> संथालों का प्रधान ग्राम देवता जाहेर - एरा  है जिसका निवास स्थान जाहेर थान (सखुआ या महुआ के पेड़ों के झुरमुट के बीच स्थित) कहलाता है। 
> संथालों के गृह देवता को ओड़ाक बोंगा कहते हैं। 
> संथाल गाँव के धार्मिक प्रधान को नायके कहा जाता है।
> जादू – टोने के मामले में संथाली स्त्रियाँ विशेषज्ञ मानी जाती हैं। 
> संथालों में शव को जलाने तथा दफनाने दोनों प्रकार की प्रथा प्रचलित है। 
> जनजाति
> उराँव
> महत्वपूर्ण बातें
> यह झारखण्ड की दूसरी तथा भारत की चौथी सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है।
> जनजातियों की कुल जनसंख्या में इनका प्रतिशत 18.14%* है।
> इनका सर्वाधिक संकेंद्रण दक्षिणी छोटानागपुर एवं पलामू प्रमण्डल में है। झारखण्ड में 90% उराँव जनजाति का निवास इसी क्षेत्र में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त संथाल परगना, उत्तरी छोटानागपुर तथा कोल्हान प्रमण्डल में इनका निवास है। 
> ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार उराँव जनाजाति का मूल निवास स्थान दक्कन माना जाता है।
> उराँव स्वयं को कुडुख कहते हैं जिसका शाब्दिक अर्थ 'मनुष्य' है। उराँव कुडुख भाषा बोलते हैं। यह द्रविड़ परिवार की भाषा है।
> प्रजातीय एवं भाषायी दोनों विशेषताओं के आधार पर इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है।
> यह झारखण्ड की सबसे शिक्षित एवं जागरूक जनजाति है। यही कारण है कि झारखण्ड की जनजातियों में सर्वाधिक विकास उराँव जनजाति का हुआ है।
> समाज एवं संस्कृति
> उराँव जनजाति का प्रथम वैज्ञानिक अध्ययन शरच्चंद्र राय ने किया तथा इनके अनुसार उराँव जनजाति में 68 गोत्र पाये जाते हैं।
> उराँव जनजाति को मुख्यतः 14 गोत्रों (किली) में विभाजित किया जाता है।
> उराँव जनजाति के प्रमुख गोत्र एवं उनके प्रतीक 
> इनमें गोदना (Tatoo) प्रथा प्रचलित है। महिलाओं में गोदना को अधिक महत्व प्रदान किया जाता है।
> उराँव जनजाति में समगोत्रीय विवाह निषिद्ध है।
> इस जनजाति में आयोजित विवाह सर्वाधिक प्रचलित है जिसमें वर पक्ष को वधु मूल्य देना पड़ता है।
> इस जनजाति में सेवा विवाह की प्रथा प्रचलित है जिसके अंतर्गत भावी वर कुछ समय तक भावी वधु के परिवार की सेवा करता है।
> इस जनजाति में विधवा विवाह का भी प्रचलन है।
> इस जनजाति में एक ही गाँव के लड़का-लड़की के बीच शादी नहीं किया जाता है।
> इस जनजाति में आपस में नाता स्थापित करने हेतु सहिया का चुनाव किया जाता है, जिसे 'सहियारो' कहा जाता है। प्रत्येक तीन वर्षों की धनकटनी के बाद 'सहिया चयन समारोह का आयोजन किया जाता है।
> इस जनजाति में आपसी मित्रता की जाती है। लड़कियाँ इस प्रकार बने मित्र को 'गोई' या 'करमडार' तथा लड़के 'लार' या 'संगी' कहते हैं। विवाह के उपरांत लड़कों की पत्नियाँ आपस में एक-दूसरे को 'लारिन' या 'संगिनी' बुलाती हैं। इस जनजाति में परिवार की संपत्ति पर केवल पुरुषों का अधिकार होता है। 
> सामाजिक व्यवस्था से संबंधित विभिन्न नामकरण:
युवागृह – घुमकुरिया
ग्राम प्रधान – महतो (मुखिया)
पंचायत – पंचोरा
नाच का मैदान – अखाड़ा
> इस जनजाति में त्योहार के समय पुरुषों द्वारा पहना जाने वाला वस्त्र केरया तथा महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला वस्त्र खनरिया कहलाता है।
> उराँव जनजाति पितृसत्तात्मक तथा पितृवंशीय है।
> उराँव जनजाति के प्रमुख नृत्य को 'यदुर' * कहते हैं।
> उराँव जनजाति के लोग प्रत्येक वर्ष वैशाख में विसू सेंदरा, फागुन में फागु सेंदरा तथा वर्षा ऋतु के प्रारंभ होने पर जेठ शिकार करते हैं। उराँवों द्वारा किए जाने वाले अनौपचारिक शिकार को दौराहा शिकार कहा जाता है।
> उराँव इस जनजाति का प्रमुख त्योहार करमा (भादो माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी को) सरहुल, खद्दी (चैत माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को), जतरा (जेठ, अगहन व कार्तिक माह में धर्मेश देवता के सम्मान में), सोहराय (कार्तिक अमावस्या को पशुओं के सम्मान में), फागु पर्व (फागुन माह में होली के समरूप) आदि हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> यह जनजाति स्थायी कृषक बन गयी है।
> प्रारंभ में छोटानागपुर क्षेत्र में आने के बाद उराँव जनजाति ने जंगलों को साफ करके कृषि कार्य करना प्रारंभ किया। ऐसे उरांवों को 'भुइँहर' कहा गया था इनकी भूमि को ‘भुइँहर भूमि' व गाँव को 'भुईहर गाँव' कहा गया। बाद में आने वाले उराँवों को 'रैयत' या 'जेठ रैयत' कहा गया।
> उरांवों में ‘पसरी’ नामक एक विशेष प्रथा पायी जिसके जाती है जिसके अंतर्गत -बैल देकर आपस में मेहनत का विनिमय किया जाता है या किसी को हलउससे खेत को जोतने व कोड़ने में सहायता ली जाती है।
> इस जनजाति का प्रमुख भोजन चावल, जंगली पक्षी तथा फल है।
> यह जनजाति बंदर का मांस नहीं खाती है।
> हड़िया इनका प्रिय पेय है।
> धार्मिक व्यवस्था
> उराँव जनजाति का प्रमुख देवता धर्मेश या धर्मी है जिन्हें जीवन तथा प्रकाश देने में सूर्य के समान माना जाता है।
> इस जनजाति के अन्य प्रमुख दवी-देवता हैं:
मरांग बुरू – पहाड़ देवता
ठाकुर देव – ग्राम देवता
डीहवार – सीमांत देवता
पूर्वजात्मा –  कुल देवता
> इस जनजाति में फसल की रोपनी के समय 'भेलवा पूजा' तथा गाँव के कल्याण के लिए वर्ष में एक बार 'गोरेया पूजा' का आयोजन किया जाता है।
> उराँव गाँव का धार्मिक प्रधान पाहन तथा उसका सहयोगी पुजार कहलाता है। 
> उराँव का मुख्य पूजा स्थल सरना कहलाता है।
> इनके पूर्वजों की आत्मा के निवास स्थान को सासन कहते हैं।
> इस जनजाति में जनवरी में 'हड़बोरा' संस्कार का आयोजन किया जाता है जिसमें साल भर में मरे गोत्र के सभी लोगों की हड्डियों को नदी में निक्षेपित किया जाता है। इसे ‘गोत्र-खुदी' कहा जाता है।
> मान्यता है कि हड़बोरा संस्कार के बाद उनकी आत्मा पूर्वजों की आत्मा से मिलती है, जिसे ‘कोहाबेंजा' कहा जाता है।
> उराँव तांत्रिक एवं जादुई विद्या में विश्वास करते हैं।
> इस जनजाति में जादू-टोना करने वाले व्यक्ति को माटी कहा जाता है।
> उराँव जनजाति में शवों का सामान्यतः दाह संस्कार किया जाता है।
> इसाई उराँव के शव को अनिवार्यतः दफनाया जाता है तथा इनके सभी क्रिया-कर्म इसाई परंपरा के अनुसार किये जाते हैं।
> घुमकुरिया
> घुमकुरिया एक युवागृह है जिसमें युवक-युवतियों को जनजातीय रीति-रिवाजों एवं परंपराओं का प्रशिक्षण दिया जाता है।
> इसमें 10-11 वर्ष की आयु में प्रवेश मिलता है तथा विवाह होते ही इसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है। 
> घुमकुरिया में प्रायः सरहुल के समय 3 वर्ष में एक बार प्रवेश मिलता है। इसके लिए एक दीक्षा समारोह का आयोजन किया जाता है।
> घुमकुरिया में प्रवेश करने वाले सदस्यों की तीन श्रेणियाँ होती हैं- पूना जोखर (प्रवेश करने वाले नये सदस्य), माँझ जोखर (3 वर्ष बाद) तथा कोहा 
जोखर ।
> इसमें युवकों के लिए जोख-एड़पा तथा युवतियों के लिए पेल-एड़पा नामक अलग-अलग प्रबंध होता है। जोंख का अर्थ कुँवारा होता है।
> जोंख एड़पा को धांगर कुड़िया भी कहा जाता है जिसके मुखिया को धांगर या महतो कहते हैं। इसके सहायक को कोतवार कहा जाता है।
> पेल-एड़पा की देखभाल करने वाली महिला को बड़की धांगरिन कहा जाता है।
> घुमकुरिया के अधिकारियों को 3 वर्ष पर बदल दिया जाता है। इसके लिए 'मुखिया हंडी' (हड़िया पीना) नामक एक समारोह का आयोजन किया जाता है।
> जनजाति
> मुण्डा
> महत्वपूर्ण बातें
> इस जनजाति को कोल के नाम से भी जाना जाता है।
> मुण्डा झारखण्ड की तीसरी सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है।
> जनजातियों की कुल जनसंख्या में इनका प्रतिशत 14.56%* है।
> मुण्डा शब्द का सामान्य अर्थ विशिष्ट व्यक्ति तथा विशिष्ट अर्थ गाँव का राजनीतिक प्रमुख होता है।
> मुण्डा जनजाति का संबंध प्रोटो-आस्ट्रेलायड प्रजाति समूह से है। 
> मुण्डा लोग मुण्डारी भाषा का प्रयोग करते हैं तथा भाषायी विशेषताओं के आधार पर इनका संबंध ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से है।
> मुण्डा स्वयं को होड़ोको तथा अपनी भाषा को होड़ो जगर कहते हैं।
> मुण्डा जनजाति परंपरागत रूप से एक जगह से दूसरी जगह पर प्रवास करती रही है। आर्यों के आक्रमण के बाद यह जनजाति आजिमगढ़ (आजमगढ़, उत्तर प्रदेश) में बस गई। कालांतर में मुंडा जनजाति का प्रवास कालंजर, गढ़चित्र, गढ़- नगरवार, गढ़-धारवाड़, गढ़-पाली, गढ़ - पिपरा, मांडर पहर, बिजनागढ़, हरदिनागढ़, लकनौगढ़, नंदनगढ़ (बेतिया, बिहार), रिजगढ़ (राजगीर, बिहार ) * तथा रूईदासगढ़ में होता रहा है। रूईदासगढ़ से यह जनजाति दक्षिण की तरफ प्रवासित हुई तथा ओमेडंडा (बुरमु, झारखण्ड) में आकर बस गयी। 
> झारखण्ड में इस जनजाति का आगमन लगभग 600 ई. पू. हुआ।
> झारखण्ड में मुण्डा जनजाति का सर्वाधिक संक्रेंदण राँची जिला में है। इसके अतिरिक्त यह जनजाति गुमला, सिमडेगा, प० सिंहभूम तथा सरायकेला-खरसावा में भी निवास करती है।
> तमाड़ क्षेत्र में रहने वाले मुण्डाओं को तमाड़ी मुण्डा या पातर मुण्डा कहा जाता है। 
> यह जनजाति केवल झारखण्ड में ही पायी जाती है। वर्तमान समय में संचार साधनों के विकास के कारण यह जनजाति झारखण्ड से संलग्न राज्यों में भी कमोबेश संख्या में निवास करती हैं।
> मुण्डाओं द्वारा निर्मित भूमि को 'खूँटकट्टी भूमि' कहा जाता है।
> इनकी प्रशासनिक व्यवस्था में खूँट का आशय परिवार से है
> यह जनजाति मूलतः झारखण्ड में ही पायी जाती है।
> समाज एवं संस्कृति
> सामाजिक स्तरीकरण की दृष्टि से मुण्डा समाज ठाकुर, मानकी, मुण्डा, बाबू भंडारी एवं पातर में विभक्त है।
> मुण्डा जनजाति में सगोत्रीय विवाह वर्जित है।
> मुण्डाओं में विवाह का सर्वाधिक प्रचलित रूप आयोजित विवाह है।
> विवाह के अन्य रूप निम्न हैं:-
राजी खुशी विवाह – वर-वधु की इच्छा सर्वोपरि।
हरण विवाह – पसंद की लड़की का हरण करके विवाह ।
सेवा विवाह – ससुर के घर सेवा द्वारा वधु मूल्य चुकाया जाना
हठ विवाह – वधु द्वारा विवाह होने तक वर के यहाँ बलात् प्रवेश करके रहना।
> सामाजिक व्यवस्था से संबंधित विभिन्न नामकरण:
युवागृह – गितिओड़ा
विवाह–अरण्डी
विधवा विवाह–सगाई
वधु मूल्य–गोनोंग टका (कुरी गोनोंग)
ग्राम प्रधान–मुण्डा
ग्राम पंचायत–हातू
ग्राम पंचायत प्रधान–हातू मुण्डा
कई गाँवों से मिलकर बनी पंचायत–परहा/पड़हा
पंचायत स्थल– अखड़ा
पड़हा पंचायत प्रधान–मानकी
वंशकुल– खूंट
> यदि स्त्री तलाक देती है तो उसे वधु मूल्य ( गोनोंग टाका) लौटाना पड़ता है। 
> इस जनजाति में तलाक को साकमचारी के नाम से जाना जाता है। 
> अधिकांश मुण्डा परिवारों में एकल परिवार पाया जाता है।
> मुण्डा परिवार पितृसत्तात्मक तथा पितृवंशीय होता है।
> इस जनजाति में वंशकुल की परंपरा को खूँट के नाम से जाना जाता है।
> इस जनजाति में गोत्र को कीली * के नाम से जाना जाता है।
> रिजले द्वारा मुण्डा जनजाति के 340 गोत्र बताये गये हैं।
> मुण्डा जनजाति के प्रमुख गोत्र एवं उनके प्रतीक
> सोमा सिंह मुण्डा ने मुण्डा जनजाति को 13 उपशाखाओं में विभाजित किया है जिसमें महली मुण्डा तथा कंपाट मुण्डा सर्वप्रमुख हैं।
> सोसो बोंगा (यह एक प्रकार का बैलेट) मुण्डा जनजाति की प्रसिद्ध लोककथा है जो इनकी परंपरा एवं विकासक्रम पर प्रकाश डालता है।
> इस जनजाति में महिलाओं द्वारा धान की बुआई करना, महिलाओं के छप्पर कर चढ़ना तथा महिलाओं का दाह संस्कार में भाग लेने हेतु श्मशान घाट जाना वर्जित होता है।
> इस जनजाति में गांव की बेटियों द्वारा सरहुल का प्रसाद ग्रहण करना वर्जित है। 
> इस जनजाति में पुरूषों द्वारा धारण किये जाने वाले वस्त्र को बटोई या केरवा तथा महिला द्वारा पहने जाने वाले वस्त्र को परेया कहा जाता है।
> इस जनजाति के प्रमुख पर्व सरहुल / बा पर्व (चैत माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को बसंतोत्सव के रूप में), करमा ( भादो माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को), सोहराई (कार्तिक अमावस्या को पशुओं के सम्मान में), रोआपुना (धान बुआई के समय), बतौली (आषाढ़ में खेत जुताई से पूर्व छोटा सरहुल के रूप में) बुरू पर्व ( दिसंबर माह में मनाया जाता है) *, मागे पर्व, फागु पर्व (होली के समरूप), जतरा, जोमनवा आदि हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> मुण्डा कृषि व पशुपालन करते हैं । 
> पशु पूजा हेतु आयोजित त्योहार को सोहराय * कहा जाता है।
> मुण्डा सभी अनुष्ठानों में हड़िया एवं रान का प्रयोग करते हैं।
> आर्थिक उपयोगिता के आधार पर इनकी भूमि तीन प्रकार की होती है:–
पंकु–हमेशा उपज देने वाली भूमि 
नागरा–औसत उपज वाली भूमि
खिरसी–बालू युक्त भूमि
> धार्मिक व्यवस्था
> इस जनजाति का सर्वप्रमुख देवता सिंगबोंगा (सूर्य का प्रतिरूप) है।सिंगबोंगा पर मुण्डाओं द्वारा सफेद रंग के फूल, सफेद भोग पदार्थ या सफेद की ब चढ़ाने का प्रचलन है।
> इनके अन्य प्रमुख देवी-देवता
हातू बोंगा–ग्राम देवता
देशाउली–गाँव की सबसे बड़ी देवी
खूँटहँकार/ओड़ा बोंगा–कुल देवता
इकिर बोंगा– जल देवता
बुरु बोंगा–पहाड़ देवता
> मुण्डा पूजास्थल को सरना कहते हैं।
> मुण्डा गाँव का धार्मिक प्रधान पाहन कहलाता है जिसका सहायक पुजार/ पनभरा होता है।
> इस जनजाति में ग्रामीण पुजारी को डेहरी कहा जाता है।
> मुण्डा तांत्रिक एवं जादुई विद्या में विश्वास करते हैं तथा झाड़-फूंक करने वाले को देवड़ा कहा जाता है।
> मुण्डा समाज में शवों को जलाने तथा दफनाने दोनों प्रकार की प्रथाएँ विद्यमान हैं। परन्तु दफनाने की प्रथा अधिक प्रचलित है।
> जिस स्थान पर मुण्डा जनजाति के पूर्वजों की हड्डिया दबी होती हैं, उसे सासन कहा जाता है।
> सासन में पूर्वज / मृतक की स्मृति में शिलाखण्ड रखा जाता है जिसे सासन दिरि या हड़गड़ी कहा जाता है।
> जनजाति
> हो
> महत्वपूर्ण बातें
> यह झारखण्ड की चौथी सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है।
> हो जनजाति का संबंध प्रोटो-आस्ट्रेलायड समूह से है।
> इस जनजाति का सर्वाधिक संकेन्द्रण कोल्हान प्रमण्डल में है।
> हो जनजाति की भाषा का नाम भी हो है जो मुण्डारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक) परिवार की है।
> हो जनजाति द्वारा अपनी भाषा हेतु 'बारङचित्ति' नामक लिपि का विकास किया गया है। इस लिपि का आविष्कार 'लाको बोदरा' द्वारा किया गया है।
> समाज एवं संस्कृति
> हो समाज पूर्व में मातृसत्तात्मक था जो अब पितृसत्तात्मक हो गया है।
> इस जनजाति में किली (गोत्र) के आधार पर परिवार का गठन होता है।
> हो जनजाति 80 से अधिक गोत्रों में विभक्त है।
> हो जनजाति में सगोत्रीय विवाह निषिद्ध है।
> हो जनजाति में ममेरे भाई तथा बहन से शादी को प्राथमिकता दी जाती है।
> हो जनजाति में बहुविवाह की प्रथा प्रचलित है।
> इस जनजाति में आदि विवाह को श्रेष्ठ माना जाता है। आदि विवाह में वर विवाह का प्रस्ताव लेकर स्वयं किसी परिचित के माध्यम से वधु के घर जाता है। विवाह के अन्य रूप हैं:
> दिक्कू आदि विवाह– हिन्दू प्रभाव तथा हिन्दू बहुल गाँवो में रह रहे परिवारों में प्रचलित
> अंडी / ओपोरतीपि विवाह– वर द्वारा कन्या का हरण करके विवाह
> राजी-खुशी विवाह– वर-कन्या की मर्जी से विवाह
> आदेर विवाह– वधु द्वारा विवाह होने तक वर के यहाँ बलात् प्रवेश करके रहना
> सामाजिक व्यवस्था से संबंधित विभिन्न नामकरण:
युवागृह–गोतिआरा
गोनोंग/गोनोम या पोन–वधु मूल्य
गाँव के बीच में बसा अखरा–एटे तुरतुड
ग्राम प्रधान–मुण्डा
मुण्डा का सहायक–डाकुआ
सात से बारह गाँवों का समूह– पीर / पड़हा
पड़हा का प्रधान– मानकी
पड़हा का न्यायिक प्रधान– पीरपंच
> मुंडा-मानकी प्रशासन हो जनजाति की पारंपरिक जातीय शासन प्रणाली है जिसमें लघु प्रजातंत्र की झलक देखने को मिलती है।
> इस जनजाति में महिलाओं का हल एवं तीर-धनुष को चलाना व छूना वर्जित है। 
> सामान्यत: हो जनजाति के लोगों की मूंछ एवं दाढ़ी नहीं होती है।
> इस जनजाति के प्रिय एवं पवित्र पेय पदार्थ को 'इली' कहा जाता है, जिसका प्रयोग देवी-देवताओं पर चढ़ाने हेतु भी किया जाता है।
> इस जनजाति के प्रमुख पर्व माघे, बाहा, उमुरी, होरो, जोमनना, कोलोम आदि हैं। इनमें से अधिकांश पर्व का संबंध कृषि कार्य से है।
> आर्थिक व्यवस्था
> हो जनजाति का मुख्य पेशा कृषि है। 
> इस जनजाति में भूमि की तीन श्रेणियाँ हैं
> बेड़ो - निम्न एवं उपजाऊ भूमि "
> वादी – धान की खेती की जाने वाली भूमि
> गोड़ा - मोटे अनाज की खेती हेतु कम उपजाऊ भूमि मद्यपान इनका प्रिय शौक है।
> धार्मिक व्यवस्था
> हो जनजाति का सर्वप्रमुख देवता सिंगबोंगा है।
> अन्य प्रमुख देवी-देवता हैं:–
> पाहुई बोंगा –नागे देवता
> ओटी बोड़ोम–पृथ्वी देवता
> मरांग बुरू–पहाड़ देवता
> ग्राम देवता–नाग देवता
> दसाउली बोंगा–वर्षा देवता
> इस जनजाति की रसोईघर के एक कोने में पूर्वजों का पवित्र स्थान होता है जिसे 'अदिग' कहा जाता है।
> दिउरी (पुरोहित) धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करवाता है।
> हो लोग भूत-प्रेत, जादू-टोना आदि में विश्वास करते हैं।
> इस जनजाति में शवों को जलाने तथा दफनाने दोनों की प्रथाएँ विद्यमान हैं।
> जनजाति 
> खरवार / खेरवार
> महत्वपूर्ण बातें
> यह झारखण्ड की पाँचवी सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है।
> इनका मुख्य संकेंद्रण पलामू प्रमण्डल में है। इसके अलावा हजारीबाग, चतरा, रांची, लोहरदगा, संथाल परगना तथा सिंहभूम में भी खरवार जनजाति पायी जाती है।
> खेरीझार से आने के कारण इनका नामकरण खेरवार हुआ।
> पलामू एवं लातेहार जिला में इस जनजाति को 'अठारह हजारी' भी कहा जात है तथा ये स्वयं को सूर्यवंशी राजपूत हरिशचन्द्र रोहिताश्व का वंशज मानते हैं।
> यह एक बहादुर मार्शल (लड़ाकू) जनजाति है।
> सत्य बोलने के अपने गुण के कारण इस जनजाति की विशेष पहचान है। यह जनजाति सत्य हेतु अपना सभी कुछ बलिदान करने के लिए प्रसिद्ध है।
> खरवार जनजाति का संबंध द्रविड़ प्रजाति समूह से है।
> इस जनजाति की भाषा खेरवारी है जो ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित है।
> समाज एवं संस्कृति
> संडर के अनुसार खरवार की छः प्रमुख उपजातियाँ हैं- मझिया, गंझू, दौलतबंदी, घटबंदी, सूर्यवंशी तथा खेरी।
> खरवारों में सामाजिक स्तर का मुख्य निर्धारक तत्व भू-संपदा है।
> खरवारों में घुमकुरिया (युवा गृह) जैसी संस्था नहीं पायी जाती है। 
> इस जनजाति का परिवार पितृसत्तात्मक तथा पितृवंशीय होता है। 
> खरवार जनजाति में बाल विवाह को श्रेष्ठ माना जाता है। 
> सामाजिक व्यवस्था से संबंधित विभिन्न नामकरण:
विधवा पुनर्विवाह– सगाई
ग्राम पंचायत– बैठकी
ग्राम पंचायत प्रमुख– मुखिया या बैगा
चार गाँव की पंचायत– चट्टी
पांच गाँव की पंचायत– पचौरा
सात गाँव की पंचायत– सतौरा
> इस जनजाति के पुरूष सदस्य सामान्यतः घुटने तक धोती, बंडी एवं सिर पर पगड़ी पहनते हैं तथा महिलाएँ साड़ी पहनती हैं।
> इस जनजाति के प्रमुख पर्व सरहुल, करमा, नवाखानी सोहराई, जितिया, दुर्गापूजा, दीपावली, रामनवमी, फागू आदि हैं।
> इस जनजाति में सुबह के खाना को 'लुकमा', दोपहर के भोजन को 'बियारी' तथा रात के खाने को 'कलेबा ' कहा जाता है।
> आर्थिक व्यवस्था
> खरवार जनजाति का मुख्य पेशा कृषि है।
> इनका परंपरागत पेशा खैर वृक्ष से कत्था बनाना था।
> धार्मिक व्यवस्था
> खरवार जनजाति के सर्वप्रमुख देवता सिंगबोंगा हैं।
> खरवार जनजाति में पाहन या बैगा (धार्मिक प्रधान) की सहायता से बलि चढ़ाई जाती है।
> घोर संकट या बीमारी के समय यह जनजाति ओझा या मति की सहायता लेती है। इस जनजाति में जादू-टोना करने वाले व्यक्ति को माटी कहा जाता है।
> जनजाति
> खड़िया
> महत्वपूर्ण बातें
> खड़खड़िया (पालकी) ढोने के कारण इस जनजाति का नाम खड़िया पड़ा।
> यह जनजाति प्रोटो-आस्ट्रेलायड समूह से संबंधित है।
> इस जनजाति की भाषा का नाम भी खड़िया है जो मुण्डारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक) समूह की भाषा है।
> झारखण्ड में इनका मुख्य निवास गुमला, सिमडेगा, राँची, लातेहार, सिंहभूम और हजारीबाग में है।
> झारखण्ड से बाहर यह जनजाति उड़ीसा, मध्य प्रदेश, असम एवं बंगाल में पायी जाती है।
> समाज एवं संस्कृति
> यह जनजाति तीन वर्गों में विभाजित है- पहाड़ी खड़िया सर्वाधिक पिछड़े, लकी खड़िया तथा दूध खड़िया
> आर्थिक संपन्नता के आधार पर इनका क्रम (अधिक संपन्नता से कम संपन्न) इस प्रकार है- दूध खड़िया ढेलकी खड़िया → पहाड़ी खड़िया
> इन तीनों वर्गों में आपस में विवाह नहीं होता है।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'गिनिंग तह' कहा जाता है।
> खड़िया परिवार पितृसत्तात्मक तथा पितृवंशीय होता है।
> खड़िया समाज में बहुविवाह प्रचलित है।
> इस जनजाति में सर्वाधिक प्रचलित विवाह का रूप ओलोलदाय है जिसे असल विवाह भी कहा जाता है।
> विवाह के अन्य रूप हैं:
उधरा-उधारी–सह पलायन विवाह
ढुकु चोलकी–अनाहूत विवाह
तापा या तनिला–अपहरण विवाह
राजी खुशी–प्रेम विवाह
सगाई–विधवा / विधुर विवाह
> सामाजिक व्यवस्था से संबंधित विभिन्न नामकरण:
युवागृह– गितिओ
ग्राम प्रधान– महतो
ग्राम प्रधान का सहायक–नेगी
संदेशवाहक–गेड़ा
जातीय पंचायत–धीरा
जातीय पंचायत प्रमुख–ददिया
> खड़िया जनजाति के प्रमुख पर्व जकोर (बसंतोत्सव के रूप में), बंदई (कार्तिक पूर्णिमा को), करमा, कदलेटा, बंगारी, जोओडेम (नवाखानी), जिमतङ (गोशाला पूजा), गिडिड पूजा, पोनोमोसोर पूजा, भडनदा पूजा, दोरहो डुबोओ पूजा, पितरू पूजा आदि हैं।
> इस जनजाति में सभी लोगों द्वारा 'फागु शिकार' मनाते हैं तथा इस अवसर पर ‘पाट’ और ‘बोराम' की पूजा की जाती है तथा सरना में बलि चढ़ाई जाती है। यह जनजाति बीजारोपण के समय 'बा बिडि', नया अन्न ग्रहण करने से पूर्व ‘नयोदेम' या ‘धाननुआ खिया' पर्व मनाते हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> यह जनजाति कृषि कार्य तथा शिकार द्वारा अपना जीवन यापन करते हैं।
> पहाड़ी खड़िया आदिम तरीके से जीवन यापन करते हैं।
> इनका प्रमुख भोजन चावल है।
> इस जनजाति में फागो पर्व * के द्वारा इनकी आर्थिक स्थिति का पता लगाया
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता बेला भगवान या ठाकुर हैं जो सूर्य का प्रतिरूप हैं। 
> अन्य प्रमुख देवी-देवता हैं 
> पारदूबो – पहाड़ देवता
> बोराम – वन देवता 
> गुमी – सरना देवी 
> इस जनजाति के लोग अपनी भाषा में भगवान को गिरिंग बेरी या धर्मराजा कहते हैं।
> इस जनजाति का धार्मिक प्रधान कालो या पाहन कहलाता है। 
> पहाड़ी खड़िया का धार्मिक प्रधान दिहुरी व ढेलकी तथा दूध खड़िया का धार्मिक प्रधान पाहन कहलाता है।
> इस जनजाति में धर्म व जादुगरी का विशेष महत्व है।
> जनजाति
> लोहरा/लोहारा
> महत्वपूर्ण बातें
> इस जनजाति की प्रजाति प्रोटो ऑस्ट्रेलायड है।
> ये असुर के वंशज माने जाते हैं ।
> झारखण्ड में इस जनजाति का निवास राँची, गुमला, सिमडेगा, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, पलामू व संथाल परगना क्षेत्र में है। 
> इनकी भाषा सदानी है ।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति के सात गोत्र (सोन, साठ, तुतली, तिर्की, धान, मगहिया एवं कछुआ) हैं। 
> इनकी सामाजिक व्यवस्था पितृसत्तात्मक तथा पितृवंशीय है।
> इनके प्रमुख त्योहार विश्वकर्मा पूजा, सोहराय, फगुआ आदि हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका प्रमुख पेशा लौह उपकरण बनाना है। ये मुख्यतः कृषि संबंधी उपकरण बनाते हैं।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता सिंगबोंगा तथा धरती माई हैं।
> जनजाति
> भूमिज
> महत्वपूर्ण बातें
> झारखण्ड के हजारीबाग, राँची व धनबाद जिलों में इनका सर्वाधिक संकेन्द्रण पाया जाता है।
> इस जनजाति की प्रजाति प्रोटो ऑस्ट्रेलायड है।
> इनको 'धनबाद के सरदार' के नाम से भी जाना जाता है।
> घने जंगलों में रहने के कारण भुगल काल में भूमिज को चुहाड़ उपनाम से जाना जाता था।
> इनकी भाषा मुण्डारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक) है तथा इनकी भाषा पर बांग्ला व सदानी भाषा का प्रभाव है।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति का समाज पितृसत्तात्मक होता है।
> इस जनजाति में कुल चार गोत्र (पत्ती, जेयोला, गुल्गु, हेम्ब्रोम) पाए जाते हैं।
> इस जनजाति में सगोत्रीय विवाह निषिद्ध होता है।
> भूमिज जनजाति के 4 गोत्र एवं उनके प्रतीक
> इस जनजाति में सर्वाधिक प्रचलित विवाह आयोजित विवाह है। इसके अतिरिक्त इनमें अपहरण विवाह, गोलट विवाह, सेवा विवाह, राजी-खुशी विवाह आदि भी प्रचलित हैं।
> इस जनजाति में तलाक की प्रथा पायी जाती है तथा पति द्वारा पत्ते को फाड़कर टुकड़े करने पर तलाक हो जाता है।
> इस जनजाति की जातीय पंचायत का मुखिया प्रधान कहलाता है।
> इनके प्रमुख त्योहार धुला पूजा, चैत पूजा, काली पूजा, गोराई ठाकुर पूजा, ग्राम ठाकुर पूजा, करम पूजा आदि हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> इस जनजाति का प्रमुख पेशा कृषि कार्य है।
> यह जनजाति अच्छी काश्तकार है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके सर्वोच्च देवता ग्राम ठाकुर और गोराई ठाकुर हैं।
> इनके धार्मिक प्रधान को लाया कहा जाता है।
> इस जनजाति में श्राद्ध संस्कारों को 'कमावत' कहा जाता है।
> जनजाति
> माहली
> महत्वपूर्ण बातें
> इस जनजाति का संबंध द्रविड़ परिवार से है।
> इस जनजाति का झारखण्ड में संकेन्द्रण मुख्यतः सिंहभूम क्षेत्र, राँची, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, हजारीबाग, बोकारो, धनबाद व संथाल परगना क्षेत्र में है।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति की नातेदारी व्यवस्था हिन्दू समाज के समान है। 
> इस जनजाति की सामाजिक व्यवस्था पितृसत्तात्मक है।
> इस जनजाति में कुल 16 गोत्र पाये जाते हैं।
> रिजले द्वारा माहली जनजाति को निम्न पांच उपजातियों में विभक्त किया गया है:
बांस फोड़ माहली – बांस से टोकरी बनाने वाले (तुरी जनजाति भी टोकरी बनाने का कार्य करती है) 
पातर माहली – खेती कार्य (तमाड़ क्षेत्र में संकेन्द्रण) 
तांती माहली – पालकी ढोने वाले
सुलंकी माहली – मजदूरी व खेती कार्य
माहली मुण्डा – मजदूरी व खेती कार्य
> इनका विवाह टोटमवादी वंशों में होता है।
> माहली जनजाति में बाल विवाह प्रचलित है ।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को पोन टका * तथा जातीय पंचायत को परगनैत कहा जाता है।
> इनके प्रमुख त्योहार सूरजी देवी पूजा, मनसा पूजा, टुसू पर्व, दीवाली आदि हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> यह एक शिल्पी जनजाति है जो बांस कला में पारंगत है। 
> यह जनजाति बांस की टोकरी व ढोल बनाने में पारंगत है।
> इस जनजाति को सरल कारीगर / शिल्पकार के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनकी मुख्य देवी सूरजी देवी है। बड़ पहाड़ी तथा मनसा देवी इनके अन्य देवता हैं।
> इस जनजाति के लोग पुरखों की पूजा गोड़म साकी (बूढ़ा - बूढ़ी पर्व) के रूप में करते हैं।
> सिल्ली क्षेत्र में इस जनजाति द्वारा की जाने वाली विशेष पूजा को 'उलूर पूजा' कहा जाता है।
> जनजाति
> करमाली
> महत्वपूर्ण बातें
> यह जनजाति झारखण्ड के सदान समुदाय की जनजाति है।
> इस जनजाति का संबंध प्रोटो-ऑस्ट्रेलायड समूह से है।
> इस जनजाति की मातृभाषा खोरठा है तथा बोलचाल हेतु करमाली भाषा (ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित) का प्रयोग किया जाता है। 
> झारखण्ड में इनका निवास मुख्यत: हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह, राँची, सिंहभूम व संथाल परगना में पाया जाता है।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति की नातेदारी व्यवस्था हिन्दू समाज के समान है।
> यह जनजाति सात गोत्रों (कछुवार, कैथवार, संढवार, खालखोहार, करहर, तिर्की व सोना) में विभाजित है।
> करमाली जनजाति के 7 गोत्र एवं उनके प्रतीक
 > इस जनजाति में आयोजित विवाह, गोलट विवाह, विनिमय विवाह, राजी-गी विवाह, ढुकू विवाह आदि अत्यंत प्रचलित हैं।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'पोन' या 'हदुआ' कहा जाता है।
> इनके पंचायत के प्रमुख को मालिक कहा जाता है।
> इस जनजाति में टूसु पर्व (अन्य नाम- मीठा परब या बड़का परब) प्रमुखता से मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त ये सरहुल, करमा, सोहराई, नवाखनी आदि पर्व मनाते हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> यह एक दस्तकार या शिल्पकार जनजाति है तथा इनका परंपरागत पेशा लोहा गलाना और औजार बनाना है।
> अस्त्र - शस्त्र के निर्माण में यह जनजाति अत्यंत दक्ष होती है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता सिंगबोंगा हैं।
> इनके पुजारी को पाहन या नाया कहा जाता है।
> इस जनजाति में ओझा भी पाया जाता है जिसके पवित्र स्थान को 'देउकरी' कहा जाता है।
> इस जनजाति के लोग दामोदर नदी को अत्यंत पवित्र मानते हैं।
> जनजाति
> बैगा
> महत्वपूर्ण बातें
> बैगा झारखण्ड की एक उपेक्षित जनजाति है।
> इस जनजाति का संबंध द्रविड़ परिवार से है।
> इनका संकेन्द्रण मुख्यतः पलामू प्रमण्डल, राँची, हजारीबाग व सिंहभूम क्षेत्र में है।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति के रीति-रिवाज खरवार जनजाति के समान हैं।
> इनमें संयुक्त परिवार की व्यवस्था पायी जाती है।
> बैगा की सामुदायिक पंचायत का मुखिया मुकद्दम  कहलाता है।
> करमा नृत्य इस जनजाति का प्रमुख नृत्य है। झरपुट, विमला आदि अन्य नृत्य हैं। इस जनजाति में पुरुषों द्वारा 'दशन' या 'सैला' नृत्य तथा स्त्रियों द्वारा 'रोना' नृत्य भी किया जाता है। 
> इनके वर्ष का प्रथम पर्व 'चरेता' है, जो बच्चों को बाल भोज देकर मनाया जाता है। 
> इस जनजाति में 9 वर्षो पर 'रसनावा' नामक पर्व का आयोजन किया जाता है। इसके अतिरिक्त सरहुल, दशहरा, दीवाली, होली आदि पर्व भी प्रचलित है।
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका प्रमुख पेशा वैद्य कार्य तथा तंत्र मंत्र है। इसके अतिरिक्त ये खाद्य संग्रह व मजदूरी का कार्य भी करते हैं।
> ये पेड़ - पौधों के अच्छे जानकार होते हैं।
> धार्मिक व्यवस्था 
> इस जनजाति का प्रधान देवता बड़ा देव है जिसका निवास साल वृक्ष में माना जाता है।
> यह जनजाति बाघ को पवित्र पशु मानती है। 
> जनजाति 
> खोंड
> महत्वपूर्ण बातें
> खोंड झारखण्ड की एक अल्पसंख्यक जनजाति है। 
> इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है। (Source - Britannica Encyclopaedia)
> यह झारखण्ड के संथाल परगना क्षेत्र में प्रमुखता से पाए जाते हैं। इसके अलावा उत्तरी व दक्षिणी छोटानागपुर, पलामू तथा कोल्हान प्रमण्डल में भी इनका निवास है।
>  इस जनजाति की भाषा कोंधी है।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति में वरमाला की प्रथा प्रचलित है।
> इनके ग्राम संगठन का मुखिया गौटिया कहलाता है।
> इनके प्रमुख पर्व-त्योहार सरहुल, सोहराई, करमा, दशहरा, दीपावली, रामनवमी, नबानंद आदि है। नबानंद त्योहर में नये चावल को पकाया जाता है।
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य तथा मजदूरी करना है।
> इस जनजाति में झूम खेती को पोड़चा कहा जाता है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता सूर्य हैं जिन्हें बेंलापून कहा जाता है।
> इस जनजाति में नरबलि की प्रथा प्रचलित है, जिसे मरियाह के नाम से जाना जाता है।
> जनजाति
> बथुड़ी
> महत्वपूर्ण बातें
> बथुड़ी झारखण्ड की एक अल्पसंख्यक जनजाति है जो स्वयं को जनजाति / आदिवासी नहीं मानती है।
> ये स्वयं को बाहुतुली या बाहुबली कहते हैं जिसका अर्थ है- बाहुओं से तौलने वाला अर्थात् क्षत्रिय।
> इस जनजाति को भुईया का पूर्वज माना जाता है।
> यह जनजाति झारखण्ड के सिंहभूम क्षेत्र व ढालभूम की पहाड़ी क्षेत्र में निवास करती है।
> इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति की नातेदारी व्यवस्था हिन्दू समाज के समान ही है।
> इस जनजाति में पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था प्रचलित है।
> इस जनजाति में पाँच गोत्र पाए जाते हैं।
> इस जनजाति में विवाह का सर्वाधिक प्रचलित रूप 'आयोजित विवाह' है ।
> इनके गांव का प्रमुख प्रधान कहलाता है।
> बथुड़ी जनजाति के लोग नृत्य संगीत के अत्यंत शौकीन होते हैं।
> इस जनजाति में कहंगु, वंशी, झाल और मांदर नामक वाद्य यंत्र अत्यंत प्रचलित है।
> इस जनजाति के लोग मुख्यतः आषाढ़ी पूजा, शीतला पूजा, वंदना पूजा, धूलिया पूजा, सरोल पूजा, रस पूर्णिमा, मकर सक्रांति आदि पर्व मनाते हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य, वनोत्पादों का संग्रह एवं मजदूरी कार्य है। 
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता ग्राम देवता हैं।
> इनके गांव का पुजारी दिहुरी कहलाता है।
> जनजाति 
> किसान
> महत्वपूर्ण बातें
> किसान जनजाति सदानों की एक जनजाति है जिन्हें नगेशर / नगेशिया भी कहा जाता है।
> यह जनजाति स्वयं को नागवंश का वंशज मानती है।
> डाल्टन ने इन्हें पांडवों का वंशज बताया है।
> इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है।
> इस जनजाति की भाषा मुण्डारी (ऑस्ट्रो-एशियाटिक) है।
> इनका संकेन्द्रण मुख्यतः पलामू, लातेहार, गढ़वा, लोहरदगा, गुमला व सिमडेगा जिले में है।
> समाज एवं संस्कृति
> विवाह की दृष्टि से इस जनजाति के दो वर्ग हैं- सिंदुरिया तथा तेलिया | सिंदुरिया लोगों का विवाह सिंदुर दान से होता है जबकि तेलिया लोगों के विवाह में तेल का प्रयोग होता है।
> इस जनजाति में परीक्षा विवाह का प्रचलन है।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'डाली' कहा जाता है।
> इनका प्रमुख त्योहार सोहराई, सरहुल, करमा, नवाखानी, जीतिया, फागुन, दीपावली आदि है।
> आर्थिक व्यवस्था 
> इस जनजाति के लोगों का प्रमुख पेशा कृषि कार्य तथा लकड़ी काटना है। 
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके सर्वप्रमुख देवता सिंगबोंगा हैं।
> इनका धार्मिक प्रधान बैगा कहलाता है।
> जनजाति
> बंजारा
> महत्वपूर्ण बातें
> बंजारा झारखण्ड की एक घुमक्कड़ किस्म की अल्पसंख्यक जनजाति है जो छोटे-छोटे गिरोहों में घूमती रहती है। इनका कोई गांव नहीं होता है।
> 1956 ई. में इन्हें जनजाति का दर्जा प्रदान किया गया था।
> इस जनजाति का सर्वाधिक संकेंद्रण संथाल परगना क्षेत्र में है।
> यह जनजाति अपनी भाषा को 'लंबाड़ी' कहते हैं।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति का समाज पितृसत्तात्मक होता है।
> इनका परिवार नाभिकीय होता है जिसमें माता-पिता और अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं।
> यह जनजाति चौहान, पवार, राठौर तथा उर्वा नामक चार वर्गों में विभाजित है। 
> इस जनजाति में राय की उपाधि काफी प्रचलित है।
> इस जनजाति में विधवा विवाह को नियोग कहा जाता है।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को हरजी कहा जाता है।
> इस जनजाति में विवाह पूर्व सगाई की रस्म प्रचलित है।
> इस जनजाति के लोग मुख्य रूप से होली, दशहरा, दीपावली, जन्माष्टमी, नाग पंचमी, रामनवमी आदि पर्व मनाते हैं। 
> इस जनजाति में 'आल्हा उदल' की लोककथा काफी प्रचलित है तथा ये " 'आल्हा उदल' को वीर पुरूष मानते हैं।
> इस जनजाति के गीतों में पृथ्वीराज चौहान का उल्लेख मिलता है।
> इस जनजाति का लोक नृत्य 'दंड-खेलना' अत्यंत प्रचलित है।
> आर्थिक व्यवस्था
> पेशेगत दृष्टि से इन्हें तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है, जिसमें गुलगुलिया (भिक्षुक वर्ग) एवं कंजर (आपराधिक वर्ग) प्रमुख हैं।
> यह जनजाति जड़ी-बूटी के अच्छे जानकार होते हैं।
> इस जनजाति के लोग संगीत प्रमी होते हैं तथा संगीत से जुड़ा हुआ पेशा भी अपनाते हैं।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनकी प्रमुख देवी बनजारी देवी है।
> जनजाति
> बिंझिया
> महत्वपूर्ण बातें
> बिंझिया जनजाति एक अल्पसंख्यक जनजाति है जो स्वयं को विंध्य निवासी कहती है।
> इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है।
> इनका सर्वाधिक संकेंद्रण राँची व सिमडेगा जिले में है।
> ये अपने को राजपूत मानते हैं तथा नाम के अंत में सिंह शब्द जोड़ते हैं।
> यह जनजाति ब्राह्मण तथा राजपूत को छोड़कर किसी के यहाँ भोजन नहीं करती है।
> इनकी भाषा सदानी है।
> समाज एवं संस्कृति
> यह जनजाति 7 गोत्रों में विभाजित है। इनका प्रमुख गोत्र कुलुमर्थी डाडुल, साहुल आदि है।
> इस जनजाति में सगोत्रीय विवाह निषिद्ध माना जाता है।
> इस जनजाति में गुलैची विवाह, ढुकु विवाह तथा सगाई संधा विवाह प्रचलित है।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'डाली कटारी' कहा जाता है।
> इस जनजाति में तलाक को 'छोड़ा-छोड़ी' कहा जाता है।
> इस जनजाति में युवागृह जैसी संस्था नहीं पायी जाती है।
> इस जनजाति में हड़िया पीना वर्जित है।
> इस जनजाति का प्रमुख त्योहार सरहुल, करमा, सोहराय, जगन्नाथ पूजा आदि है।
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य है।
> धार्मिक व्यवस्था 
> इनके सर्वाधिक प्रमुख देवता विंध्यवासिनी देवी हैं। इसके अतिरिक्त ये लोग चरदी देवी की पूजा करते हैं । 
> इस जनजाति में तुलसी पौधा को पूजनीय माना जाता है।
> ग्रामश्री इनकी ग्राम देवी है।
> इनके पुजारी को बैगा कहा जाता है।
> जनजाति
> गोंड
> महत्वपूर्ण बातें
> गोंड भारत की दूसरी सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजाति है तथा इनका मूल निवास मध्य प्रदेश व गोंडवाना क्षेत्र में है।
> झारखण्ड में इस जनजाति का मुख्य निवास क्षेत्र गुमला तथा सिमडेगा में है। इसके अतिरिक्त यह जनजाति राँची, पलामू व कोल्हान में भी निवास करती है। 
> इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है।
> इस जनजाति की भाषा गोंडी है, किन्तु ये लोग बोलचाल में सादरी-नागपुरी का प्रयोग करते हैं ।
> समाज एवं संस्कृति
> यह जनजाति निम्न तीन वर्गों में विभाजित है:
राजगोंड – अभिजात्य वर्ग
धुरंगोंड – सामान्य वर्ग
कमिया –  खेतिहर मजदूर
> गोंड लोग संयुक्त परिवार को भाई बंद तथा संयुक्त परिवार के विस्तृत रूप को भाई बिरादरी कहते हैं।
> यह जनजाति पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय है।
> इस जनजाति में युवागृह को गोटुल / घोटुल * कहा जाता है।
> इनका प्रमुख पर्व फरसा पेन, मतिया, बूढ़देव, करमा, सोहराय,सरहुल, जीतिया आदि है। 
> आर्थिक व्यवस्था
> इस जनजाति का प्रमुख पेशा कृषि कार्य है ।
> इस जनजाति द्वारा झूम खेती को दीपा या बेवार कहा जाता है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता ठाकुर देव (अन्य नाम - बुढ़ा देव) एवं ठाकुर देई हैं। ठाकुर देव सूर्य के तथा ठाकुर देई धरती के प्रतीक हैं।
> गोंड जनजाति में प्रत्येक गोत्र द्वारा 'परसापन' नामक कुल देवता की पूजा की जाती है। कुल देवता की पूजा करने वाले व्यक्ति को 'फरदंग' कहते हैं।
> इस जनजाति में पुजारी को बैगा कहा जाता है तथा इसके सहायक को मति कहा जाता है।
> इस जनजाति में शवों के दफनाने के स्थान को 'मसना' के नाम से जाना जाता है।
> जनजाति 
> चेरो
> महत्वपूर्ण बातें
> प्रजातीय दृष्टि से इस जनजाति का संबंध प्रोटो ऑस्ट्रेलायड समूह से है।
> इनका झारखण्ड में सर्वाधिक संकेन्द्रण पलामू व लातेहार जिले में है।
> यह जनजाति स्वयं को 'च्यवन ऋषि' का वंशज मानती है।
> यह जनजाति स्वयं को चौहान या राजपूत कहती है।
> यह झारखण्ड की एकमात्र जनजाति है जो जंगलों और पहाड़ों में रहना नहीं पसंद करती है।
> इनकी बोलचाल की भाषा सदानी है।
> समाज एवं संस्कृति
> इनका समाज पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है।
> यह जनजाति दो उपसमूहों बारह हजारी / बारह हजारिया और तेरह हजारी / वीरबंधिया में विभक्त है। बारह हजारी स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं।
> यह जनजाति 7 गोत्रों (पारी) में विभाजित है। इनके प्रमुख गोत्र (पारी) छोटा मठआर, बड़ा मठआर, छोटा कुँवर, बड़ा कुँवर, सोनहैत आदि है।
> इस जनजाति में विवाह के दो प्रकार ढोला विवाह (लड़के के घर लड़की लाकर विवाह) व चढ़ा विवाह ( लड़की के घर बारात ले जाकर विवाह) हैं। ढोला विवाह सामान्यतः गरीबों के यहाँ देखा जाता है।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'दस्तुरी' कहा जाता है। 
> चेरो लोग गाँव को डीह कहते हैं।
> इस जनजाति का प्रमुख त्योहार सोहराय, काली पूजा, छठ पूजा, होली आदि है। 
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इस जनजाति के धार्मिक प्रधान को बैगा कहा जाता है।
> इस जनजाति में जादू-टोना करने वाले व्यक्ति को माटी कहा जाता है।
> जनजाति
> चीक बड़ाइक
> महत्वपूर्ण बातें
> चीक बडाइक झारखण्ड की एक बुनकर जनजाति है जो झारखण्ड के लगभग सभी जिलों में पायी जाती है।
> हालांकि इस जनजाति का सर्वाधिक संकेंद्रण गुमला- सिमडेगा क्षेत्र में पाया जाता है।
>  इनकी भाषा नागपुरी है।
> समाज एवं संस्कृति
> इनका समाज पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है।
> यह जनजाति बड़ गोहड़ी (बड़ जात) तथा छोट गोहड़ी (छोट जात) नामक दो वर्गों में विभाजित है।
> इस जनजाति के प्रमुख गोत्र तनरिया, खम्बा एवं तजना हैं ।
> इस जनजाति में अन्य जनजातियों की तरह अखरा (नृत्य स्थल) तथा पंचायत व्यवस्था नहीं मिलती है।
> इस जनजाति में पुनर्विवाह को सगाई कहा जाता है।
> इनका प्रमुख त्योहार सरहुल, नवाखानी, करमा, जितिया बड़ पहाड़ी, सूर्याही पूजा, देवी माय, देवठान, होली, दीपावली आदि है। इस जनजाति में पहले नर बलि की प्रथा प्रचलित थी, जो अब समाप्त हो गया है। 
> आर्थिक व्यवस्था 
> इनका मुख्य पेशा कपड़ा बुनना है जिसके कारण इन्हें 'हाथ से बने कपड़ों का जनक' भी कहा जाता है।
> धार्मिक व्यवस्था  
> इस जनजाति के प्रमुख देवता सिंगबोंगा हैं। 
> देवी माई इनकी प्रमुख देवी है। 
> इस जनजाति में शवों के दफनाने के स्थान को 'मसना' कहा जाता है। 
> जनजाति
> बेदिया
> महत्वपूर्ण बातें
> यह जनजाति एक अल्पसंख्यक जनजाति है।
> प्रजातीय दृष्टि से यह जनजाति द्रविड़ समूह से संबंधित है।
> यह अपने को वेद निवस या वेदवाणी कहते हैं।
> इस जनजाति के लोग स्वयं को उच्च हिन्दू मानते हैं।
> अपने नाम के साथ ये लोग बेदिया और माँझी की उपाधि धारण करते हैं।
> इस जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यतः राँची, हजारीबाग व बोकारो जिले में है।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'डाली टका' के नाम से जाना जाता है।
> इनके गांव के मुखिया को प्रधान कहा जाता है। इसे महतो या ओहदार भी कहते हैं। 
> इनके नाच के मैदान को अखड़ा कहते हैं।
> बेदिया जनजाति के प्रमुख गोत्र एवं उनके प्रतीक 
> इस जनजाति में सबसे प्रचलित विवाह आयोजित विवाह है।
> इनमें विजातीय विवाह को 'ठुकुर ठेनी' कहा जाता है तथा यह सामाजिक रूप से निषिद्ध होता है।
> इस जनजाति में पुरूषों का परंपरागत वस्त्र केरया, काच्छा/भगवा है जबकि महिलाओं का परंपरागत वस्त्र ठेठी और पाचन है।
> इस जनजाति में दशहरा, दीपावली, छठ, सोहराई, करमा आदि पर्व धूमधाम से मनाया जाता है।
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इस जनजाति के प्रमुख देवता सूर्य हैं तथा इनमें सूर्याही पूजा का प्रचलन है।
> इस जनजाति के धार्मिक स्थल को सरना कहा जाता है।
> जनजाति 
> गोड़ाइत
> महत्वपूर्ण बातें
> गोड़ाइत झारखण्ड की एक अल्पसंख्यक जनजाति है जो प्रोटो-ऑस्ट्रेलायड समूह से संबंधित है। (Source- www.jharenvis.nic.in)
> झारखण्ड में मुख्यतः राँची, पलामू, हजारीबाग, धनबाद, लोहरगा, संथाल परगना व सिंहभूम क्षेत्र में यह जनजाति निवास करती है।
> इस जनजाति के लोग सदानी भाषा का प्रयोग करते
 हैं ।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति में पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था पायी जाती है।
> इस जनजाति में सगोत्र विवाह तथा विधवा विवाह निषिद्ध है।
> इस जनजाति के प्रमुख त्योहार देवी माय, पुरूबिया, मति आदि हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> यह जनजाति मुख्यतः कृषि कार्य में संलग्न है।
> प्राचीन समय में गोड़ाइत जनजाति के लोग पहरेदारी का कार्य करते थे।
> धार्मिक व्यवस्था
> इस जनजाति के लोग पुरूबिया तथा देवी माई की पूजा करते हैं।
> पुरूबिया एक जनजातीय भूतात्मा है, जिसे वर्ष में एक बार बकरे की बलि दी जाती है।
> इनके पुजारी को बैगा कहते हैं।
> इस जनजाति में जादू-टोना करने वाले व्यक्ति को माटी कहा जाता है।
> जनजाति  
> कोरा
> महत्वपूर्ण बातें
> कोरा जनजाति प्रजातीय दृष्टि से प्रोटो-आस्ट्रेलायड समूह से संबंधित हैं परन्तु रिजले ने इन्हें द्रविड़ प्रजाति समूह में वर्गीकृत किया है।
> इस जनजाति को कई स्थानों पर 'दांगर' भी कहा जाता है ।
> इस जनजाति की बोली का नाम भी कोरा है जो मुण्डारी परिवार (ऑस्ट्रो-एशियाटिक) से संबंधित है।
> इस जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यतः हजारीबाग, धनबाद, बोकारो, सिंहभूम एवं संथाल परगना क्षेत्र में है।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति का परिवार पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है।
> रिजले के अनुसार इस जनजाति की 7 उपजातियाँ हैं।
> यह जनजाति मुख्यतः ठोलो, मोलो, सिखरिया और बदमिया नामक वर्गों में विभाजित है।
> कोरा लोग अपने घर को ओड़ा तथा गोत्र को गुष्टी कहते हैं ।
> इस जनजाति के युवागृह को 'गितिओड़ा' कहा जाता है ।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'पोन' कहा जाता है।
> इस जनजाति में समगोत्रीय विवाह निषिद्ध माना जाता है।
> इस जनजाति में गोदना की प्रथा पायी जाती है तथा ये गोदना को स्वर्ग या नरक में अपने संबंधियों को पहचानने हेतु आवश्यक चिह्न मानते हैं ।
> इनके गांव के प्रधान को महतो कहा जाता है।
> कोग जनजाति के प्रमुख गोत्र एवं उनके प्रतीक
> इनके गोत्रों में सबसे ऊपर 'कच' तथा सबसे नीचे 'बुटकोई' हैं।
> इस जनजाति के प्रमुख त्योहार सवा लाख की पूजा (सवा लाख देवी-देवताओं की पूजा), नवाखानी, भगवती दाय, काली माय पूजा, बागेश्वर पूजा, सोहराय आदि हैं।
> इस जनजाति के प्रमुख नृत्य खेमटा, गोलवारी, दोहरी, झिंगफुलिया आदि हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> इस जनजाति का परंपरागत पेशा मिट्टी कोड़ना था, जिसके कारण ही इनका नाम 'कोड़ा' पड़ा।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके पुजारी को बैगा कहा जाता है।
> जनजाति
> कवर
> महत्वपूर्ण बातें
> यह जनजाति कौरवों के वंशज हैं।
> इस जनजाति का संबंध प्रोटो-आस्ट्रेलायड प्रजाति समूह से है।
> इनकी भाषा कवराती (कवरासी) या सादरी है।
> कवर झारखण्ड की 31वीं जनजाति है जिसे भारत सरकार ने 8 जनवरी, 2003 में जनजाति की श्रेणी में शामिल किया है।
> यह जनजाति पलामू, गुमला व सिमडेगा जिले में निवास करती है। 
> समाज एवं संस्कृति
> इनका परिवार पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है।
> इस जनजाति में कुल 7 गोत्र पाए जाते हैं, जिनके नाम प्रह्लाद, अभिआर्य, शुकदेव, तुण्डक, वशिष्ठ, विश्वामित्र व पराशर हैं ।
> इनका समाज बहिर्विवाही होता है। अर्थात् विवाह हेतु अपने वंश या गोत्र के बाहर की कन्या को ढूंढा जाता है, जिसे 'कुटमैती प्रथा' कहते हैं।
> इस जनजाति में चार प्रकार के विवाह प्रचलित हैं जिसमें क्रय विवाह सर्वाधिक प्रचलित है। इसके अतिरिक्त इनमें सेवा विवाह, ढुकू विवाह व जिया विवाह का प्रचलन पाया जाता है।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को सुक-दाम कहा जाता है। वधु मूल्य रूप में नकद के अतिरिक्त 10 खंडी चावल दिये जाने पर इसे 'सुक - मोल' कहा जाता है। 
> इस जनजाति का पंचायत प्रधान सयान कहलाता है तथा इनकी ग्राम पंचायत का संचालन प्रधान या पटेल करता है।
> इस जनजाति के लोग मुख्यतः करम, तीज, जयाखानी, हरेली, पर्व मनाते हैं। पितर-पूजा आदि
> आर्थिक व्यवस्था
> इस जनजाति का प्रमुख पेशा कृषि कार्य है।
> धार्मिक व्यवस्था 
> कवर सरना धर्मावलंबी हैं तथा इस जनजाति का सर्वोच्च देवता भगवान है, जो सूर्य का प्रतिरूप है। 
> इनके ग्राम देवता को खूँट देवता कहा जाता है। 
> इनके गांव का पुजारी पाहन या बैगा कहलाता है।
> जनजाति 
> कोल
> महत्वपूर्ण बातें
> यह जनजाति प्रोटो- आस्ट्रेलायड समूह से संबंधित है।
> इनकी भाषा का नाम भी कोल है तथा भाषायी रूप से इनका संबंध कोलेरियन समूह से है।
> कोल झारखण्ड की 32वीं जनजाति है जिसे भारत सरकार ने 2003 में जनजाति की श्रेणी में शामिल किया है।
> झारखण्ड में इस जनजाति का संकेन्द्रण मुख्यत: देवघर, दुमका व गिरिडीह जिले में है।
> समाज एवं संस्कृति
> इनका परिवार पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है।
> यह जनजाति 12 गोत्रों में विभक्त है, जिनके नाम हांसदा, सोरेन, किस्कू, मरांडी, हेम्ब्रम, बेसरा, मुर्मू, टुडू, चाउंडे, बास्के, चुनिआर व किसनोव हैं।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'पोटे' कहा जाता है।
> इनके गांव के प्रधान को माँझी कहा जाता है।
> आर्थिक व्यवस्था
> इस जनजाति का परंपरागत पेशा लोहा गलाना तथा उनसे सामान बनाना है।
> वर्तमान में इस जनजाति के लोग तीव्रता से कृषि को अपना व्यवसाय बना रहे हैं। 
> धार्मिक व्यवस्था
> कोल जनजाति के लोग सरना धर्म के अनुयायी हैं तथा इनका प्रमुख देवता सिंगबोंगा है।
> इस जनजाति में शंकर भगवान, बजरंगबली, दुर्गा एवं काली की भी पूजा की जाती है।
> इस जनजाति पर हिन्दू धर्म का सर्वाधिक प्रभाव है।
> जनजाति 
> माल पहाड़िया
> महत्वपूर्ण बातें
> माल पहाड़िया एक आदिम जनजाति है जिनका संबंध प्रोटो ऑस्ट्रेलायड समूह से है। 
> रिजले के अनुसार इस जनजाति का संबंध द्रविड़ समूह से है
> रसेल और हीरालाल के अनुसार यह जनजाति पहाड़ों में रहने वाले सकरा जाति के वंशज हैं।
> बुचानन हैमिल्टन ने इस जनजाति का संबंध मलेर से बताया है।
> इनका संकेंद्रण मुख्यत संथाल परगना क्षेत्र में पाया जाता है, परन्तु यह जनजाति संथाल क्षेत्र के साहेबगंज को छोड़कर शेष क्षेत्रों में पायी जाती है। 
> इनकी भाषा मालतो है जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति में पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय सामाजिक व्यवस्था पायी जाती है। 
> इस जनजाति में गोत्र नहीं होता है ।
> इस जनजाति में अंतर्विवाह की व्यवस्था पायी जाती है।
> इस जनजाति में वधु - मूल्य ( पोन या बंदी ) के रूप मे सूअर देने की प्रथा है क्योंकि सूअर इनके आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
> इस जनजाति में अगुवा (विवाह हेतु कन्या ढूंढने वाला व्यक्ति) को 'सिथू या सिथूदार' कहा जाता है।
> इस जनजाति में वर द्वारा सभी वैवाहिक खर्चों का भुगतान किया जाता है। 
> इनके गांव का मुखिया माँझी कहलाता है, जो ग्राम पंचायत का प्रधान भी होता है। 
> इस जनजाति ने माघ माह में माघी पूजा तथा अगहन माह में घंघरा पूजा की जाती है।
> यह जनजाति कृषि कार्य के दौरान खेतों में बीज बोते समय बीचे आड़या नामक पूजा (ज्येष्ठ माह में) तथा फसल की कटाई के समय गांगी आड़या पूजा करती है। बाजरा के फसल की कटाई के समय पुनु आड़या पूजा की जाती है। 
> करमा, फागु व नवाखानी इस जनजाति के प्रमुख त्योहार हैं ।
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका मुख्य पेशा झूम कृषि, खाद्य संग्रहण एवं शिकार करना है।
> इस जनजाति मे झूम खेती को कुरवा कहा जाता है।
> इस जनजाति में भूमि को चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता है। ये हैं- सेम.भूमि (सर्वाधिक उपजाऊ), टिकुर भूमि (सबसे कम उपजाऊ), डेम भूमि (सेम
व टिकुर के बीच) तथा बाड़ी भूमि (सब्जी उगाने हेतु प्रयुक्त ) ।
> इस जनजाति में उपजाऊ भूमि को सेम कहा जाता है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता सूर्य एवं धरती गोरासी गोंसाई हैं।
> धरती गोरासी गोंसाई को वसुमति गोंसाई या वीरू गोंसाई भी कहा जाता है।
> इस जनजाति में पूर्वजों की पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है।
> इनके गांव का पुजारी देहरी कहलाता है।
> जनजाति 
> सौरिया पहाड़िया
> महत्वपूर्ण बातें
> सौरिया पहाड़िया प्रोटो-ऑस्ट्रेलायड प्रजाति समूह से संबंधित है।
> इन्हें संथाल परगना का आदि निवासी माना जाता है।
> इनका प्रमुख संकेन्द्रण राजमहल क्षेत्र के 'दामिन-ए-कोह' में है।
> इस जनजाति ने अंग्रेजी शासन के पूर्व कभी भी अपनी स्वतंत्रता को मुगलों या मराठों के हाथ में नहीं सौंपा।
> यह जनजाति स्वयं को मलेर कहती है।
> इनकी भाषा मालतो है जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है।
> यह जनजाति बोलचाल हेतु बांग्ला भाषा का भी प्रयोग करती है।
> समाज एवं संस्कृति
> यह जनजाति मुख्यतः पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करती है तथा इनके आवास को 'अड्डा' कहा जाता है।
> इस जनजाति की सामाजिक व्यवस्था पितृसत्तात्मक है।
> इस जनजाति में विवाह में लड़की की सहमति आवश्यक मानी जाती है।
> इस जनजाति में आयोजित विवाह सर्वाधिक प्रचलित विवाह है।
> इनमें विवाह संस्कार संपन्न कराने वाले व्यक्ति को 'वेद सीढू' कहा जाता है।
> इनमें बहिर्जातीय विवाह निषिद्ध है।
> इस जनजाति में विवाह विच्छेद तथा पुनर्विवाह की प्रथा पायी जाती है। 
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'पोन' कहा जाता है।
> इस जनजाति के युवागृह को 'कोड़वाह' कहा जाता है। युवकों के युवागृह को ‘मर्समक कोड़वाह' तथा युवतियों के युवागृह को 'पेलमक कोड़वाह' कहा जाता है। 
> इस जनजाति में गोत्र नहीं पाया जाता है।
> इनके गांव का मुखिया व पुजारी माँझी कहलाता है। यह ग्राम पंचायत की अध्यक्षता भी करता है ।
> इनके गांव के प्रमुख अधिकारी सियनार (मुखिया), भंडारी ( संदेशवाहक), गिरि तथा कोतवार हैं।
>  इस जनजाति के प्रमुख त्योहार फसलों पर आधारित होते हैं जिसे आड़या कहा जाता है। इनके प्रमुख त्योहार निम्न हैं:–
गांगी आड़या – भादो में नई फसल कटने पर
ओसरा आड़या – कार्तिक में घघरा फसल कटने पर
पुनु आड़या – पूस में बाजरे की फसल कटने पर 
सलियानी पूजा –  माघ या चैत में होती है
> इस जनजाति में पिता की मृत्यु हो जाने पर बड़ा पुत्र का संपत्ति पर अधिकार होता है। यदि कोई पुत्र नहीं है तो संपत्ति पर परिवार के साथ रहने वाले घर जमाई का अधिकार होता है।
> आर्थिक व्यवस्था
> ललित प्रसाद विद्यार्थी के वर्गीकरण के अनुसार इस जनजाति द्वारा स्थानांतरणशील कृषि किया जाता है, जिसे कुरवा कहा जाता है। (ललित प्रसाद विद्यार्थी ने सांस्कृतिक आधार पर झारखण्ड की जनजातियों का वर्गीकरण किया है।)
> पहाड़ी ढाल पर रहने वाले लोग जोत को कोड़कर कृषि कार्य करते हैं, जिसे 'भीठा' या 'धामी' कहा जाता है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इस जनजाति के प्रमुख देवता 'लैहू गोंसाई' हैं।
> इस जनजाति में सूर्य देवता को 'बैरू गोसाई' *, चांद देवता को 'विल्प गा. ¨साई', काल देवता को 'काल गोंसाई', राजमार्ग देवता को 'पो गोंसाई', सत्य देवता को 'दरमारे गोंसाई', जन्म देवता को 'जरमात्रे गोंसाई' तथा शिकार के देवता को 'औटगा' कहा जाता है। 
> इस जनजाति में पूर्वज पूजा का विशेष महत्व है।
> धार्मिक कार्यों का संपादन 'कान्दो माँझी' द्वारा किया जाता है तथा इसके सहायक को ‘कोतवार' व ‘चालवे' कहा जाता है।
> रिजले के अनुसार इस जनजाति का धार्मिक संबंध 'जीववाद' से है।
> जनजाति
> असुर
> महत्वपूर्ण बातें
> असुर जनजाति झारखण्ड की प्राचीनतम एवं आदिम जनजाति है जिनका प्रजातीय संबंध प्रोटो ऑस्ट्रेलायड समूह से है।
> इस जनजाति को 'पूर्वादेवा' भी कहा जाता है।
> इस जनजाति को सिंधु घाटी सभ्यता का प्रतिष्ठापक माना जाता है।
> झारखण्ड में इस जनजाति का प्रवेश मध्य प्रदेश से हुआ था ।
> इनकी भाषा असुरी है जो आस्ट्रो-एशियाटिक भाषा समूह से संबंधित है। 
> इनकी भाषा को मालेय भाषा भी कहा जाता है।
> इस जनजाति का उल्लेख ऋगवेद, अरण्यक, उपनिषद्, महाभारत आदि ग्रंथों मे मिलता है। ऋगवेद में इनका वर्णन निम्न नामों से किया गया है :
अनासहः – चिपटी नाक वाले
अव्रत – भिन्न आचरण करने वाले
मृर्ध: वाचः – अस्पष्ट बोलने वाले
सुदृढ़ – लौह दुर्ग अथवा अटूट दुर्ग निवासी
> झारखण्ड में इनका संकेन्द्रण मुख्यतः लातेहार ( नेतरहाट के पाट क्षेत्र में सर्वाधिक), गुमला तथा लोहरदगा जिले में है।
> समाज एवं संस्कृति 
> यह जनजाति वीर, बिरजिया तथा अगारिया नामक तीन उपजातियों में विभाजित है। 
> असुर गोत्र को पारस कहते हैं। इनके युवागृह को 'गितिओड़ा' कहा जाता है। 
> इस जनजाति में बहिर्गोत्रीय विवाह का प्रचलन पाया जाता है ।
> असुर जनजाति के प्रमुख गोत्र एवं उनके प्रतीक
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'डाली टका' कहा जाता है।
> इस जनजाति में 'इदी मी' नामक एक विशेष परंपरा है, जिसके तहत बिना विवाह किए लड़का-लड़की पति-पत्नी की भांति साथ में रहते हैं। परंतु इन्हें कभी-न-कभी आपस में विवाह करना अनिवार्य होता है।
> इनका परिवार मातृसत्तात्मक होता है तथा इनमें संयुक्त परिवार की प्रणाली पायी जाती है।
> इस जनजाति में कुंवारे लड़के या लड़कियों द्वारा केले का पौधा लगाना वर्जित होता है।
> इस जनजाति में गर्भवती स्त्री द्वारा ग्रहण देखना निषिद्ध है।
> इस जनजाति में सुरक्षा हेतु बच्चे को चमड़े का धागा पहनाने की परंपरा है, जो विवाह के समय खोला धाता है। इसे 'चामबंदी संस्कार' कहा जाता है। 
> इस जनजाति में दिन के भोजन को 'लोलोघेटू जोमेंकू' तथा रात के भोजन को 'छोटू जोमेंकू' कहा जाता है।
> हड़िया इनका प्रमुख पेय है जिसे 'बोथा' या 'झरनुई' भी कहा जाता है।
> इनके प्रमुख त्योहार सरहुल, सोहराई, कथडेली, सरही, कुटसी (लोहा गलाने के उद्योग की उन्नति हेतु), नवाखानी आदि हैं।
> इनकी संस्कृति को ‘मय संस्कृति' कहा जाता है।
> इनके नृत्य स्थल को अखरा कहा जाता है।
> आर्थिक व्यवस्था
> इस जनजाति का प्रमुख पेशा परंपरागत रूप से लोहा गलाना है। 
> वर्तमान समय में यह जनजाति स्थायी कृषि भी करने लगी है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इस जनजाति के सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा हैं तथा इनके धार्मिक प्रधान को बैगा कहा जाता है।
> बैगा का सहायक 'सुबारी' कहलाता है ।
> इस जनजाति में जादू- टोना करने वाले व्यक्ति को माटी कहा जाता है।
> जनजाति
> बिरजिया
> महत्वपूर्ण बातें
> बिरजिया जनजाति सदान समुदाय की आदिम जनजाति है जिनका प्रजातीय संबंध प्रोटो ऑस्ट्रेलायड समूह से है ।
> इस जनजाति के लोग स्वयं को पुंडरिक नाग के वंशज मानते हैं।
> इस जनजाति को असुर जनजाति का ही हिस्सा माना जाता है।
> झारखण्ड के लातेहार, गुमला व लोहरदगा जिले में इस जनजाति का सर्वाधिक संकेंद्रण है।
> बिरजिया शब्द का अर्थ 'जंगल की मछली' (बिरहोर का अर्थ - जंगल का आदमी) होता है।
> समाज एवं संस्कृति
> इनका परिवार पितृसत्तात्मक पितृवंशीय होता है।
> यह जनजाति सिंदुरिया तथा तेलिया नामक वर्गों में विभाजित है। विवाह के दौरान 'सिंदुरिया' द्वारा सिंदुर का तथा 'तेलिया' द्वारा तेल का प्रयोग किया जाता है। 
> तेलिया वर्ग पुनः दूध बिरजिया तथा रस बिरजिया नामक उपवर्गों में विभाजित हैं। दूध बिरजिया गाय का दूध पीते हैं व मांस नहीं खाते हैं जबकि रस बिरजिया दूध पीन के साथ-साथ मांस भी खाते हैं।
> इस जनजाति में बहुविवाह की प्रथा पायी जाती है।
> इस जनजाति में सुबह के खाना को 'लुकमा', दोपहर के भोजन को 'बियारी' तथा रात के खाने को 'कलेबा ' कहा जाता है।
> इनके प्रमुख त्योहार सरहुल, सोहराई, आषाढ़ी पूजा, करम, फगुआ आदि हैं। इनके पंचायत का प्रमुख बैगा कहलाता है ।
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य है।
> पाट क्षेत्र में रहने वाले बिरजिया स्थानांतरणशील कृषि करते हैं।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता सिंगबोंगा, मरांङ बुरू आदि हैं।
> जनजाति 
> परहिया
> महत्वपूर्ण बातें
> परहिया जनजाति का संबंध प्रोटो ऑस्ट्रेलायड प्रजातीय समूह से है।
> रिजले ने इस जनजाति को लघु द्रविड़ जनजाति कहा है।
> ये मूलत: पलामू प्रमण्डल में निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त राँची, चतरा. हजारीबाग व संथाल परगना क्षेत्र में भी ये निवास करते हैं ।
> समाज एवं संस्कृति
> इस जनजाति में नातेदारी प्रथा बिल्कुल हिन्दुओं की तरह है।
> इस जनजाति में नातेदारी की व्यवस्था 'धैयानिया' तथा 'सनाही' में विभाजित होता है। ‘धैयानिया’ जन्म से जुड़ा नातेदारी संबंध है जिसके सदस्य को 'कुल कुटुंब' कहा जाता है जबकि 'सनाही' विवाह द्वारा जुड़ा संबंध है जिसके सदस्य को ‘हित कुटुंब' कहा जाता है।
> इस जनजाति में गोत्र नहीं पाया जाता है।
> इस जनजाति में साक्षी प्रथा का प्रचलन पाया जाता है।
> इस जनजाति में माँ के वंशज को प्राथमिकता दी जाती है।
> इस जनजाति में 'आयोजित विवाह' सर्वाधिक प्रचलित है। 
> इनके घर को 'सासन' के नाम से जाना जाता है तथा इनके द्वारा निर्मित झोपड़ीनुमा घर को 'झाला' कहा जाता है।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'डाली' कहा जाता है।
> इनमें परिवार की गिनती कुराला (चूल्हे) से होती है।
> इनकी पंचायत को भैयारी या जातिगोढ़ तथा ग्राम पंचायत का मुखिया महतो/ प्रधान कहलाता है। 
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'डाली' के नाम से जाना जाता है। 
> इनका प्रमुख त्योहार सरहुल, करमा, धरती पूजा, सोहराय आदि है।
> आर्थिक व्यवस्था 
> इस जनजाति का मुख्य पेशा बांस की टोकरी बनाना तथा ढोल बनाना है। 
> पारंपरिक रूप से यह जनजाति स्थानांतरणशील कृषि करती थी जिसे 'बिथोड़ा ' या 'झूम' कहा जाता है। 
> धार्मिक व्यवस्था 
> इनके सर्वाधिक प्रमुख देवता 'धरती' हैं। 
> इस जनजाति में 'मुआ पूजा' (पूर्वजों की पूजा) का सर्वाधिक महत्व है। 
> इस जनजाति में अलौकिक शक्तियों पर अत्यधिक बल दिया जाता है। 
> इनके धार्मिक प्रधान को 'दिहुरी' कहा जाता है।
> जनजाति 
> बिरहोर
> महत्वपूर्ण बातें
> बिरहोर जनजाति घूमन्तू जीवन व्यतीत करते हैं।
> प्रजातीय रूप से यह जनजाति प्रोटो ऑस्ट्रेलायड समूह से संबंधित है, जबकि भाषायी रूप से इनका संबंध ऑस्ट्रो एशियाटिक समूह से है। इनकी भाषा बिरहारी है।
> यह जनजाति स्वयं को सूर्यवंशी मानती है।
> यह जनजाति मूलतः झारखण्ड राज्य में ही पायी जाती है।
> झारखण्ड में इनका संकेंद्रण मुख्यतः हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, बोकारो, धनबाद गिरिडीह, राँची, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, गढ़वा, पलामू, लातेहार व सिंहभूम क्षेत्र में है।
> बिरहोर शब्द की उत्पत्ति मुण्डारी भाषा से हुयी है जिसका शाब्दिक अर्थ 'जंगल का आदमी' होता है।
> समाज एवं संस्कृति
> इनका परिवार पितृसत्तात्मक व पितृवंशीय होता है।
> इनके बस्ती/निवास स्थान को टंडा  तथा इनकी झोपड़ी को कुम्बा / कुरहर कहा जाता है। इसमें भी बड़ी झोपड़ी को 'ओड़ा कुम्बा' व छोटी झोपड़ी को 'चू कुम्बा' कहा जाता है।
> इस जनजाति में 13 गोत्र पाए जाते हैं।
> इस जनजाति में युवागृह को 'गितिजोरी, गत्योरा या गितिओड़ा' कहा जाता है। लड़कों के गितिओड़ा को 'डोंडा कांठा' तथा लड़कियों के गितिओड़ा को 'डींडी कुंडी' कहा जाता है।
> इस जनजाति में 10 प्रकार के विवाहों का प्रचलन है।
> क्रय विवाह इस जनजाति में सर्वाधिक प्रचलित विवाह है, जिसे 'सदर बापला ' कहा जाता है।
> इनमें सेवा विवाह को 'किरिंग जवाई बापला', पलायन विवाह को 'उदरा उदरी बापला', विनिमय विवाह को 'गुआ बापला', हठ विवाह को 'बोलो बापला' तथा विधवा विवाह को 'सांगा बापला' कहा जाता है।
> इनका प्रमुख त्योहार करमा, सोहराई, नवाजोम, जीतिया, दलई आदि है। 
> इस जनजाति में डांग लागरी तथा मुतकर नामक नृत्य अत्यंत प्रचलित हैं।
> तुमदा (मांदर या ढोल), तमक (नगाड़ा) तथा तिरियों (बांस की बांसुरी) इनके प्रमुख वाद्ययंत्र हैं।
> आर्थिक व्यवस्था
> इस जनजाति का प्रमुख पेशा लकड़ी काटना, शिकार करना एवं खाद्य संग्रहण करना है।
> घूमन्तू जीवन जीने वाले बिरहोरों को उलथू या भुलियास तथा स्थायी जीवन जीने वाले बिरहोरों को जांघी या थानिया कहा जाता है।
> इनकी भूमि को तीन प्रकारों में विभाजित किया जाता है। नीची भूमि को 'बेरा', बीच की भूमि को ‘बाद' तथा उच्च भूमि को 'गोड़ा' कहा जाता है।
> इस जनजाति में भूमि को सामुदायिक संपत्ति माना जाता है  जिसे बेचना निषिद्ध होता है।
> बिरहोर जनजाति के लोग पीतल, तांबे व कांसे के कार्य में दक्ष होते हैं।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता सिंगबोंगा, ओरा बोंगा, कांदो बोंगा, होपरोम बोंगा, टण्डा बोंगा एवं देवी माई हैं।
> इनके धार्मिक प्रधान को 'नाये' कहते हैं ।
> जनजाति 
> कोरवा
> महत्वपूर्ण बातें
> इस जनजाति को कोलेरियन जनजाति समूह का जनक माना जाता है।
> यह जनजाति प्रजातीय दृष्टि से प्रोटो ऑस्ट्रेलायड समूह से तथा भाषायी दृष्टि से आस्ट्रो एशियाटिक समूह से संबंधित है।
> इन्हें झारखण्ड सरकार द्वारा शिकारी - संग्रहकर्त्ता माना जाता है। 
> यह जनजाति मूलत: पलामू प्रमण्डल में पायी जाती है तथा झारखण्ड में इनका आगमन मध्य प्रदेश से हुआ था।
> समाज एवं संस्कृति
> इनकी दो उपजातियाँ पहाड़ी कोरवा ( पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले) तथा डीहा/ डिहारिया कोरवा (नीचे गाँव में रहने वाले) है।
> इस जनजाति में 6 गोत्र पाए जाते हैं। जो हुटरटियें, खरपो, सूइया, कासी, कोकट तथा बुचुंग है।
> इस जनजाति में एकल विवाह का प्रचलन है तथा सगोत्र विवाह निषिद्ध है। 
> इस जनजाति में चढ़के विवाह में कन्या के यहाँ तथा डोला विवाह में वर के यहाँ विवाह होता है।
> इनका प्रमुख त्योहार करमा है।
> इस जनजाति में सर्प पूजा का विशेष महत्व है।
> इस जनजाति में विधवा विवाह को मैयारी कहा जाता है।
> आर्थिक व्यवस्था 
> यह जनजाति कृषि, शिकार, पशुपालन, शिल्प निर्माण, मजदूरी आदि आर्थिक क्रियाकलाप करते हैं। 
> इस जनजाति में स्थानांतरणशील कृषि को 'बियोड़ा' कहा जाता है। 
> धार्मिक व्यवस्था  
> इनके प्रमुख देवता सिंगबाँगा, ग्रामरक्षक देवता 'गर्मल्ह' तथा पशुरक्षक देवता 'रक्सेल' हैं। 
> इनके पुजारी को बैगा कहा जाता है।
> जनजाति
> सबर
> महत्वपूर्ण बातें
> सबर जनजाति का संबंध प्रोटो ऑस्ट्रेलायड समूह से है।
> इनका संबंध मुण्डा जनजातीय समूह से है।
> यह झारखण्ड की अल्पसंख्यक आदिम जनजाति है।
> इस जनजाति के अस्तित्व का पहला उल्लेख त्रेता युग में मिलता है। इसके अलावा इनका उल्लेख महाभारत महाकाव्य में भी मिलता है।
> इनकी तीन प्रमुख शाखाएँ है- झारा, बासु एवं जायतापति। इसमें से केवल झारा सबर झारखण्ड में पायी जाती है, शेष सबर उड़ीसा में पाये जाते हैं।
> ब्रिटिश शासन काल में 'आपराधिक जनजाति अधिनियम, 1871' के तहत इन्हें आपराधिक जनजातियों में से एक के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
> प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी ने विशेष रूप से सबर जनजाति पर काम किया है।
> झारखण्ड में इनका संकेंद्रण मुख्यतः सिंहभूम क्षेत्र में है। इसके अतिरिक्त यह जनजाति राँची, हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, गिरिडीह, पलामू तथा संथाल परगना में भी निवास करती है।
> इनकी भाषा उड़िया, बांग्ला तथा हिन्दी है।
> समाज एवं संस्कृति
> इनका समाज पितृसत्तात्मक होता है।
> इस जनजाति में गोत्र एवं बहुविवाह की प्रथा नहीं पायी जाती है।
> इस जनजाति में वधु मूल्य को 'पोटे' कहा जाता है।
> इस जनजाति में युवागृह नहीं पाया जाता है।
> इस जनजाति में डोमकच तथा पंता साल्या नृत्य लोकप्रिय है।
> इनके परंपरागत पंचायत का प्रमुख 'प्रधान' कहलाता है।
> इनका प्रमुख त्योहार मनसा पूजा, दुर्गा पूजा, काली पूजा आदि है।
> आर्थिक व्यवस्था
> इनका प्रमुख पेशा कृषि कार्य, वनोत्पादों का संग्रह तथा मजदूरी है।
> धार्मिक व्यवस्था
> इनके प्रमुख देवता काली हैं।
> इस जनजाति में पूर्वज पूजा का विशेष महत्व है।
> मृत पूर्वज को 'मसीहमान' या 'बूढ़ा बूढ़ी' कहा जाता है तथा इन्हें मुर्गा की बलि चढ़ाई जाती है।
> इनके गांव का पुजारी दिहुरी कहलाता हैं
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Sat, 09 Sep 2023 09:25:27 +0530 Jaankari Rakho