Jaankari Rakho & : Jharkhand History https://m.jaankarirakho.com/rss/category/jharkhand-history Jaankari Rakho & : Jharkhand History hin Copyright 2022 & 24. Jaankari Rakho& All Rights Reserved. जनजातियों के वस्त्र – आभूषण और खान – पान https://m.jaankarirakho.com/जनजातियों-के-वस्त्र-आभूषण-और-खान-पान https://m.jaankarirakho.com/जनजातियों-के-वस्त्र-आभूषण-और-खान-पान > जनजाति
> संथाल
> वस्त्र
> कांचा, कुपनी, पड़हान, पाटका, दहड़ी, लुंगी
> खान - पान
> दिन में सामान्यतः तीन बार खाते हैं – बासक्याक (जलपान), माजवान (दोपहर के समय), कदोक (रात का भोजन )
> मुख्य भोजन – दाका - उरू (दाल-भात) एवं सब्जी, मडुए की दलिया, महुआ, कुर्थी दाल 
> आर्थिक रूप से कमजोर संथाल जोण्डरा-दाका ( मकई की दलिया) खाते हैं। 
> इनमें हड़िया का प्रचलन है, जिसे चावल, मडुआ या कोदो से बनाया जाता है।
> जनजाति
> उराँव
> वस्त्र
> पुरूषों के वस्त्र – तोलोङ, दुपट्टा (शरीर के ऊपरी भाग पर), केरया (त्योहार के अवसर पर पहने जाने वाला विशेष वस्त्र) 
> महिलाओं के वस्त्र – परेया (त्योहार के अवसर पर पहना जाने वाला विशेष वस्त्र)
> खान-पान
> इनका मुख्य भोजन दाल-भात है। इसके अलावा ये कन्द-मूल, मांस-मछली आदि का भी प्रयोग करते हैं।
> उराँव जनजाति के लोग हड़िया तथा तम्बाकू का भी सेवन करते हैं।
> जनजाति 
> मुण्डा
> वस्त्र
> पुरूषों के वस्त्र बटोई (शरीर के निचले भाग में), कमरधनी (युवकों द्वारा कमर में लपेटा जाता है), भगवा (वृद्धों द्वारा प्रयुक्त) बरखी, पिछाड़ी, कमरा ( ठंड में शीत से बचने हेतु प्रयुक्त कंबल), पगड़ी, खरपा (चमड़े से निर्मित पैरों में पहनने हेतु प्रयुक्त)
> महिलाओं के वस्त्र – परिया (साड़ी की तरह), लहंगा, खड़िया (किशोरियों द्वारा प्रयोग) 
> खान - पान
> मुण्डा जनजाति का प्रमुख भोजन दाल-भात है।
> आर्थिक रूप से कमजोर मुण्डाओं द्वारा गोंदली, मडुआ और मकई का प्रयोग खाद्य पदार्थ के रूप में किया जाता है।
> ये लोग मांस, हड़िया व रानू का भी सेवन करते हैं ।
> जनजाति
> खरवार
> वस्त्र
> पुरूष धोती, बंडी एवं सिर पर पगड़ी पहनते हैं तथा महिलाएँ साड़ी पहनती हैं।
> खान-पान
> इस जनजाति में ( बिरजिया में भी) सुबह के खाना को 'लुकमा', दोपहर के भोजन को 'कलेबा ' तथा रात के खाने को 'बियारी' कहा जाता है।
> जनजाति
> चेरो
> वस्त्र
> पुरूषों के वस्त्र - शरीर के ऊपरी भाग में गंजी व कमीज तथा निचले भाग में धोती 
> महिलाओं के वस्त्र - झूला ( शरीर के ऊपरी भाग में), साड़ी 
> बच्चे भगई तथा कमीज - फ्रॉक पहनते हैं । 
> खान-पान
> इनका प्रमुख भोजन दाल-भात, सब्जी आदि है।
> चेरो जनजाति के लोग मडुआ, जिनोरा, सावां, कोदो आदि से निर्मित खाद्य पदार्थ का भी सेवन करते हैं।
> जनजाति
> असुर
> खान-पान
> असुर जनजाति के लोग दिन में सामान्यतः दो बार भोजन करते हैं - लोलोघेटू जोमेंक ( दिन का भोजन) तथा छोटू जोमेंकू (रात का भोजन ) 
> इनके भोजन में कंद-मूल, फल-फूल, पीठा, खिचड़ी, महुआ का लाटा, मक्के का घाटा आदि प्रमुख रूप से शामिल है।
> इस जनजाति के लोग मुर्गा, भेड़, सुअर, हिरण आदि का मांस भी खाते हैं।
> आर्थिक रूप से कमजोर असुर महुआ, सखुआ के फूल व पत्तों का सेवन करते हैं। 
> पेय पदार्थ के रूप में हड़िया व ताड़ी अत्यंत लोकप्रिय है। साथ ही खैनी, हुक्का तथा सखुआ के पत्ते से निर्मित तम्बाकू (पिक्का) का भी प्रयोग असुरों में किया जाता है। 
> हड़िया के दो प्रकार पाये जाते हैं – बिरो हड़िया ( दवा के रूप में प्रयोग ) तथा भरूनी हड़िया । हड़िया को बोथा या झुरनई भी कहा जाता है। 
> जनजाति
> बेदिया
> वस्त्र
> पुरूषों का परंपरागत वस्त्र केरया, काच्छा - भगवा है, जबकि महिलाओं का परंपरागत वस्त्र ठेठी और पाचन है। 
> जनजाति
> बिरहोर
> खान-पान
>>उलूथ बिरहोर (घूमन्तु बिरहोर) का प्रमुख खान-पान कंद-मूल, फल, मांस आदि है जबकि जांघी बिरहोर (स्थायी बिरहोर) सामान्य खाद्य पदार्थों जैसे- चावल, दाल, सब्जी आदि का सेवन करते हैं।
अंग
आभूषण
बाल
खोगसो, सुर्रा-खोंगसो, उंडू, झीका, चिरो, चिलपों, खोखरी, बेरा (पुरूष)
सिर
कलगा, मोरपंख, टीका, जीनतो (सिलपट), बंडोपगड़ी (पुरूष)
ललाट
पटवारी
कान
तरकी, कर्णफूल, लवंगफूल, पानरा, तरकुला, बिडियो, ठिप्पी, पिपरपत्ता, तरपत, कुंडल (पुरूष)
नाक
नथ, नथुनी, छुछी, मकड़ी
गला
हंसुली, बेरनी, चन्दवा, हिसिर, सकड़ी, ठोसा, खंभिया, पुन, भुंडिया, सिकड़ी, ताबीज (पुरुष)
बांह
खागा, तार-साकोम
हाथ
सांखा, झुटिया, घुंघुर, सीली, बाईकल, राली, लहठी, साकोम, झुटिया, बटरिया, टीडोर (पुरूष)
कमर
कमरधनी
पैर 
बटरिया, बांक-बंकी
अन्य सांगा (गोदना)

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Wed, 12 Jul 2023 15:24:13 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के सदान के https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-के-सदान-के https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-के-सदान-के > झारखण्ड के गैर-जनजातीय मूल निवासियों को सदान कहा जाता है।
(नोट :- झारखण्ड में बाहर से आकर बसने वाले लोगों को आदिवासियों द्वारा 'दिकू ' कहा जाता है।) 
> झारखण्ड की कुल जनसंख्या में इनका हिस्सा लगभग 60% है।
> झारखण्ड की चीक बड़ाइक, करमाली एवं किसान जनजाति स्वयं को सदान मानते हैं।
> इनकी भाषा को सदानी या सादरी कहा जाता है।
> ये लोग खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया, करमाली आदि भाषा बोलते हैं।
> सदानों का मुख्य पेशा कृषि कार्य है।
> भोजन हेतु सदान मुख्य रूप से चावल, मक्का, दलहन, मडुआ आदि का प्रयोग करते हैं।
> धार्मिक दृष्टि से हिन्दुओं को सदान कहा जा सकता है। प्रजातीय दृष्टि से सदान आर्य हैं। 
> अंग्रेजों ने सदानों को ‘दिकू' (बाहरी) के नाम से पुकारा ताकि आदिवासियों को दिग्भ्रमित कर उन्हें सदानों के विरूद्ध किया जा सके।
> जातिगत दृष्टि से सदानों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है।
> पहले भाग में ऐसे सदानों को रखा जा सकता है जो झारखण्ड के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों में भी निवास करते हैं। जैसे- ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, माली, कुम्हार, कुर्मी, बनिया, सोनार, ठाकुर आदि। 
> दूसरे भाग में ऐसे सदानों को रखा जा सकता है जो केवल झारखण्ड में ही निवास करते हैं। जैसे- बड़ाइक,
देशावली, प्रामाणिक, भुईयाँ, पान, रौतिया, धानु, गोड़ाइत, पाइक, तांतिक, स्वांसी, रक्सैल, लोहड़िया आदि।
> इसके अतिरिक्त कुछ ऐसे सदान हैं जिनका मूल स्थान झारखण्ड न होकर झारखण्ड से बाहर है। जैसे- गौड़, तिरहुतिया, अवधिया, कनैजिया आदि ।
> सदानों पर जैन धर्म का प्रभाव देखने को मिलता है। जैनियों की ही भांति सदान सूर्यास्त के पश्चात् भोजन नहीं करते तथा मांस-मछली का सेवन नहीं करते हैं ।
> सदान लोग शिव, सूर्य एवं मंशा के उपासक हैं। कुछ सदान वैष्णव परंपरा से भी प्रभावित हैं।
> इनमें हिंदु देवी-देवताओं की पूजा के साथ-साथ कुल देवी-देवता की पूजा का भी प्रचलन है।
> सदान महामारियों (चेचक, हैजा आदि) को देवी का प्रकोप मानते हैं तथा इससे बचने हेतु शीतला देवी की पूजा करते हैं।
> धार्मिक रूप से सदान सहिष्णु होते हैं ।
> सदान लोग डायन, भूत-प्रेत तथा ओझा आदि में भी विश्वास करते हैं ।
> सदानों की शारीरिक संरचना में आर्य, द्रविड़ तथा आस्ट्रिक तीनों में लक्षण दिखाई पड़ते हैं। इनका रंगा गोरा, सांवला तथा काला तीनों प्रकार का है। साथ ही इनकी लंबाई नाटी, मध्यम तथा अधिक तीनों है।
> सदान परंपरागत वस्त्रों का प्रयोग करते हैं जिसमें धोती, कुरता, गमछा, चादर आदि सम्मिलित हैं। 
> सदानों के प्रमुख आभूषण पोला, कंगन, बिछिया, बुलाक, नथिया, बेसर, करन, कर्नाटिका आदि हैं। 
> सदान लोग मिट्टी का बरतन जैसे- हड़िया, गगरी, चूका, ढकनी आदि का प्रयोग करते हैं। पीतल तथा काँसा के बरतन को ये लोग समृद्धि का द्योतक मानते हैं।
> सामूहिक भोज में सदानों द्वारा पत्तल तथा दोने का प्रयोग किया जाता है।
> शिकार हेतु सदानों द्वारा जाल, बंसीडाग, पोलई, धनुष-तीर, तलवार, भाला, चोंगी आदि का प्रयोग किया जाता है। 
> सदानों का समाज पितृसत्तात्मक है तथा यहाँ मातृ एवं पितृ कुल में वैवाहिक संबंध वर्जित होता है। 
> सदानों द्वारा मुख्यतः होली, दिवाली, दशहरा, काली पूजा, मकर सक्रांति जैसे हिन्दु त्योंहार तथा सोहरई, करमा, टुसु आदि आदिवासी त्योहार मनाया जाता है।
> सदानों के गाँव में अखरा होती है जिसमें किसी उत्सव समारोह पर लड़कियों द्वारा सामूहिक नृत्य का आयोजन किया जाता है।
> डोमकच, झूमर, घटवारी, जामदा, चोकरा, संथाल नृत्य, राजपूत नृत्य आदि नृत्यों का प्रचलन सदान समाज में है। इसके अतिरिक्त गणेश नृत्य, कार्तिक नृत्य सदानों का शास्त्रीय नृत्य है।
सदान तथा आदिवासी में अंतर 
सदान
आदिवासी
सदान गैर-जनजातीय मूल निवासी हैं
आदिवासी जनजातीय मूल निवासी हैं।
सदान समुदायी होते हैं।
आदिवासी कबिलाई होते हैं।
सदान स्थायी स्वभाव के होते हैं।
आदिवासी घूमन्तू स्वभाव के होते हैं।
कई सदान जनजाति के रूप में अनुसूचित हैं।
कई आदिवासी अनुसूचित नहीं हैं।

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Wed, 12 Jul 2023 15:11:18 +0530 Jaankari Rakho
जनजातियों का सामान्य परिचय https://m.jaankarirakho.com/जनजातियों-का-सामान्य-परिचय https://m.jaankarirakho.com/जनजातियों-का-सामान्य-परिचय > झारखण्ड में जनजातियों का अधिवास पुरापाषाण काल से ही रहा है।
> विभिन्न पौराणिक ग्रंथों में भी जनजातियों की चर्चा मिलती है।
> झारखण्ड की जनजातियों को वनवासी, आदिवासी, आदिम जाति एवं गिरिजन जैसे शब्दों से पुकारा जाता है। 
> आदिवासी शब्द का शाब्दिक अर्थ 'आदिकाल से रहने वाले लोग' है।
> भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत् भारत के राष्ट्रपति द्वारा जनजातियों को अधिसूचित किया जाता है। 
> झारखण्ड राज्य में कुल 32 जनजातियाँ निवास करती हैं जिसमें सर्वाधिक जनसंख्या वाली जनजातियाँ क्रमशः संथाल, उराँव, मुण्डा एवं हो हैं।
> झारखण्ड में 24 जनजातियाँ प्रमुख श्रेणी में आती हैं। शेष 08 जनजातियों को आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा गया है जिसमें बिरहोर, कोरवा , असुर, पहरिया, माल पहाड़िया, सौरिया पहाड़िया, बिरजिया तथा सबर शामिल हैं।
> आदिम जनजातियों की अर्थव्यवस्था कृषि पूर्वकालीन है तथा इनका जीवन-यापन आखेट, शिखर और झूम कृषि पर आधारित है।
> झारखण्ड में खड़िया और बिरहोर जनजाति का आगमन कैमूर पहाड़यों की तरफ से माना जाता है। 
> मुण्डा जनजाति के बारे में मान्यता है कि इस जनजाति ने रोहतास क्षेत्र से होकर छोटानागपुर क्षेत्र में प्रवेश किया। 
> झारखण्ड में नागवंश की स्थापना में मुण्डा जनजाति का अहम योगदान रहा है।
> उराँव जनजाति दक्षिण भारत के निवासी थे जो विभिन्न स्थानों से होकर छोटानागपुर प्रदेश में आये। इनकी एक शाखा राजमहल क्षेत्र में जबकि दूसरी शाखा पलामू क्षेत्र में बस गयी।
> झारखण्ड राज्य की जनजातियाँ श्रीलंका की बेड्डा तथा आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों से साम्यता रखते हैं। 
> झारखण्ड के आदिवासी प्रोटो-आस्ट्रेलॉयड प्रजाति से संबंध रखते हैं। * जार्ज ग्रियर्सन ( भाषा वैज्ञानिक ) ने झारखण्ड क्षेत्र की जनजातियों को ऑस्ट्रिक एवं द्रविड़ दो समूहों में विभाजित किया है।
> भाषायी आधार पर झारखण्ड की अधिकांश जनजातियाँ ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार तथा द्रविड़ियन/ द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित हैं। ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार का संबंध ऑस्ट्रिक महाभाषा परिवार से है। ऑस्ट्रिक महाभाषा परिवार के अंतर्गत ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार के अलावा ऑस्ट्रोनेशियन भाषा परिवार (दक्षिण-पूर्व एशिया) शामिल हैं। द्रविड़ भाषा परिवार बोलने वाली अधिकांश जनसंख्या दक्षिणी एशिया में निवास करती है।
> भाषायी विविधता के आधार पर उराँव जनजाति का संबंध 'कुडुख' भाषा से है, जबकि माल पहाड़िया एवं सौरिया पहाड़िया जनजाति 'मालतो भाषा' (द्रविड़ समूह भाषा) संबंधित हैं। शेष जनजातियों का संबंध 'ऑस्ट्रिक' भाषा समूह से है ।
> 2011 की जनगणना के अनुसार झारखण्ड में जनजातियों की कुल संख्या 86,45,042 है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का 26.2% है।
> 2011 की जनगणना के अनुसार झारखण्ड में आदिम जनजातियों की कुल संख्या 1,92,425 है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का 0.72% है।
> झारखण्ड की कुल जनजातीय आबादी को लगभग 91% ग्रामीण क्षेत्र में तथा 9% शहरी क्षेत्र में निवास करती है। 
> झारखण्ड का जनजातीय समाज मुख्यतः पितृसत्तात्मक है।
> झारखण्ड की जनजातियों में प्राय: एकल परिवार की व्यवस्था पायी जाती है।
> झारखण्ड के जनजातीय समाज में लिंगभेद की इजाजत नहीं होती है।
> यहाँ की जनजातियों में विभिन्न गोत्र पाए जाते हैं। गोत्र को किली, कुंदा, पारी आदि नामों से जाना जाता है। 
> जनजातियों के प्रत्येक गोत्र का एक प्रतीक / गोत्रचिह्न होता है, जिसे टोटम कहा जाता है। प्रत्येक गोत्र से एक प्रतीक/गोत्रचिह्म (प्राणी, वृक्ष या पदार्थ) संबंधित होता है, जिसे हानि पहुँचाना या इसका प्रयोग सामाजिक नियमों द्वारा वर्जित होता है।
> जनजातियों के प्रत्येक गोत्र अपने आप को एक विशिष्ट पूर्वज की संतान मानते हैं।
> पहाड़िया जनजाति में गोत्र की व्यवस्था नहीं पायी जाती है। 
> जनजातियों में समगोत्रीय विवाह निषिद्ध होता है।
> विवाह पूर्व सगाई की रस्म केवल बंजारा जनजाति में ही प्रचलित है।
> सभी जनजातियों में वैवाहिक रस्म-रिवाज में सिंदूर लगाने की प्रथा है। केवल खोंड जनजाति में जयमाला की प्रथा प्रचलित है। 
> जनजातियों में विवाह संबंधी कर्मकाण्ड पुजारी द्वारा संपन्न कराया जाता है जिन्हें पाहन, देउरी, नाये आदि कहा जाता है। कुछ जनजातियों में ब्राह्मण द्वारा भी यह संपन्न कराया जाता है ।
> झारखण्ड की जनजातियों में सामान्यतः बाल विवाह की प्रथा नहीं पायी जाती है ।
झारखण्ड की जनजातियों में प्रचलित प्रमुख विवाह प्रकार
1. क्रय विवाह
  • इस विवाह के अंतर्गत वर पक्ष के द्वारा वधु के माता-पिता/अभिभावक को धन दिया जाता है। 
  • प्रमुख जनजातियाँ – संथाल, उराँव, हो, खड़िया, बिरहोर, कवर
  • संथाल जनजाति में इस विवाह को 'सादाई बापला', खड़िया जनजाति में 'असली विवाह' तथा बिरहोर जनजाति में 'सदर बापला' कहा जाता है। 
  • मुण्डा जनजाति में इस विवाह के दौरान दिए जाने वाले वधु मूल्य को 'कुरी गोनोंग' कहते हैं। 
 2. सेवा विवाह
  • इस विवाह के अंतर्गत वर द्वारा विवाह से पूर्व अपने सास-ससुर की सेवा की जाती है। 
  • प्रमुख जनजातियाँ - संथाल, उराँव, मुण्डा, बिरहोर, भूमिज, कवर 
  • संथाल जनजाति में इस विवाह को 'जावाय बापला' तथा बिरहोर जनजाति में 'किरींग जवाई बापला' कहा जाता है।
 3. विनिमय विवाह
इस विवाह को गोलट विवाह या अदला-बदली विवाह भी कहा जाता है। 
इस विवाह के अंतर्गत एक परिवार के लड़के तथा लड़की का विवाह दूसरे परिवार की लड़की तथा लड़के के साथ की जाती है। 
प्रमुख जनजातियाँ झारखण्ड की लगभग सभी जनजातियों में प्रचलित 
संथाल जनजाति में इस विवाह को 'गोलाइटी बापला' तथा बिरहोर जनजाति में 'गोलहट बापला' कहा जाता है। 
4. हठ विवाह
> इस विवाह के अंतर्गत एक लड़की जबरदस्ती अपने होने वाले पति के घर में आकर रहती है। 
> प्रमुख जनजातियाँ - संथाल, मुण्डा, हो, बिरहोर 
> हो जनजाति में इस विवाह को 'अनादर विवाह' तथा बिरहोर जनजाति में 'बोलो बापला' कहा जाता है। 
5. हरण विवाह
  • इस विवाह के अंतर्गत किसी लड़के द्वारा एक लड़की का अपहरण करके उससे विवाह किया जाता है। 
  • प्रमुख जनजातियाँ – उराँव, मुण्डा, हो, खड़िया, बिरहोर,
  • सौरिया पहाड़िया, भूमिज सौरिया पहाड़िया में इस विवाह का प्रचलन सर्वाधिक है। 
6. सह-पलायन विवाह 
  • इस विवाह में माता-पिता की अनुमति के बिना एक लड़का व लड़की भाग कर विवाह कर लेते हैं।
  • प्रमुख जनजातियाँ मुण्डा, खड़िया, बिरहोर
7. विधवा विवाह 
  • इस विवाह के अंतर्गत किसी विधवा लड़की का विवाह किया जाता है।
  • प्रमुख जनजातियाँ संथाल, उराँव, मुण्डा, बंजारा, बिरहोर
> झारखण्ड की जनजातियों में पायी जाने वाली कुछ प्रमुख संस्थाएँ अखरा (पंचायत स्थल/नृत्य का मैदान), सरना (पूजा स्थल) एवं युवागृह (शिक्षण-प्रशिक्षण हेतु संस्था) आदि हैं।
> ताना भगत तथा साफाहोड़ (सिंगबोंगा के प्रति निष्ठा रखने वाले) समूहों को छोड़कर शेष जनजातीय समाज प्राय: मांसाहारी होते हैं ।
> जनजातियों का प्राचीन धर्म सरना है जिसमें प्रकृति पूजा की जाती है।
> जनजातियों के पर्व-त्योहार सामान्यतः कृषि एवं प्रकृति से संबद्ध होते हैं।
> झारखण्ड की अधिकांश जनजातियों के प्रमुख देवता सूर्य हैं, जिन्हें विभिन्न जनजातियों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
> जनजातीय समाज में मृत्यु के बाद शवों को जलाने तथा दफनाने दोनों की प्रथा प्रचलित है। इसाई उराँव में शवों को अनिवार्यतः दफनाया जाता है।
> झारखण्ड की जनजातियों का प्रमुख आर्थिक क्रियाकलाप कृषि कार्य है। इसके अतिरिक्त जीविकोपार्जन हेतु पशुपालन, पशुओं का शिकार, वनोत्पादों का संग्रह, शिल्कारी कार्य व मजदूरी जैसी गतिविधियाँ भी अपनाते हैं। 
> वस्तुओं और सेवाओं की खरीद-बिक्री हेतु यहाँ की जनजातियों में हाट का महत्वपूर्ण स्थान है।
> राज्य की तुरी जनजाति एक स्थान से दूसरी स्थान पर घूमते रहते हैं तथा उस घर में पहुँचते हैं जहाँ हाल ही में किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई हो या एक शिशु का जन्म हुआ हो। यह जनजाति अपने घरों की नर्म, गीली मिट्टी को पेंट करने के लिए अपनी उंगलियों का प्रयोग करती है। ये अपने घरों की सजावट पौधों और पशु प्रजनन स्वरूपों में करते हैं ।
 
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Mon, 10 Jul 2023 14:26:17 +0530 Jaankari Rakho
अन्य प्रमुख नीतियाँ / अधिनियम https://m.jaankarirakho.com/अन्य-प्रमुख-नीतियाँ-अधिनियम https://m.jaankarirakho.com/अन्य-प्रमुख-नीतियाँ-अधिनियम सेवा का अधिकार अधिनियम - 2011
> वर्ष 2011 में राज्य में सेवा का अधिकार अधिकार अधिनियम लागू किया गया है।
> इस अधिनियम में राज्य के अधिकारियों/कर्मचारियों हेतु नागरिक सेवाओं को निश्चित समयसीमा के भीतर उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है ।
> इस अधिनियम में कुल 172 सेवाओं को शामिल किया गया है, जिसका निष्पादन निर्धारित समयसीमा के भीतर किया जाना आवश्यक है।
> निर्धारित समयसीमा के भीतर सेवा उपलब्ध नहीं कराये जाने पर दोषी अधिकारी / कर्मचारी हेतु 500 रूपये से 5000 रूपये तक के आर्थिक दण्ड का प्रावधान किया गया है।
> जुर्माने की राशि दोषी अधिकारी / कर्मचारी के वेतन से काट ली जाएगी ।
झारखण्ड में राज्य खाद्य सुरक्षा कानून – 2015
> केन्द्र सरकार के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के आलोक में 25 सितंबर, 2015 को राज्य में खाद्य सुरक्षा कानन को लागू किया गया।
> इस योजना के तहत राज्य के 2.33 लाख से अधिक व्यक्तियों हेतु खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। 
> इस योजना के तहत 37 लाख से अधिक व्यक्तियों को अंत्योदय के तहत खाद्य सुरक्षा का लाभ प्राप्त होगा।
> योजना के तहत अंत्योदय श्रेणी में शामिल परिवारों को 35 किलाग्राम अनाज प्रतिमाह उपलब्ध कराया जायेगा। 
> योजना के तहत जरूरतमंद लोगों के प्राथमिकता समूह के लोगों को प्रति व्यक्ति 5 किग्रा अनाज प्रतिमाह प्राप्त होगा।
> योजना के तहत लाभुकों को 1 रूपये प्रति किग्रा. की दर से चावल व गेहूँ का वितरण किया जायेगा। 
> लाभार्थियों की पहचान सामाजिक-आर्थिक व जातीय जनगणना 2011 के आधार पर की जायेगी।
> इस योजना के तहत 65 वर्ष से अधिक उम्र के बीपीएल श्रेणी के व्यक्ति को 10 किग्रा. चावल निःशुल्क प्रदान किया जायेगा।
> इस योजना के तहत गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली माताओं को बच्चे के जन्म से 6 माह तक आंगनबाड़ी केन्द्र के माध्यम से मुफ्त भोजन तथा मातृत्व लाभ के रूप में 6,000 रूपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जायेगी।
झारखण्ड क्रय नीति - 2014
> झारखण्ड राज्य में वर्ष 2007 में लागू क्रय नीति, जो स्थानीय सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों के विकास पर केन्द्रित थी, में संशोधन करते हुए वर्ष 2014 में नई झारखण्ड क्रय नीति को लागू किया गया है। नई झारखण्ड क्रय नीति का प्रमुख उद्देश्य स्थानीय सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को सुरक्षा प्रदान करना है। 
> इस नीति के प्रमुख प्रावधान निम्नवत् है -
1. सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों विकास एवं प्रोत्साहन हेतु इनके उत्पादों को राज्य सरकार के द्वारा प्राथमिकता के आधार पर क्रय किया जाएगा।
2. राज्य के सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को प्रतिस्पर्धी बनाने हेतु उचित प्रयास किया जाएगा। 3. सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों के उत्पादों को राज्य सरकार के विभागों, संस्थाओं एवं अनुदान प्राप्त एजेंसियों द्वारा खरीदा जाएगा।
4. राज्य सरकार के नियंत्रण में कार्यरत सभी प्रशासनिक विभागों, एजेंसियों, बोर्डो, निगमों, विकास प्राधिकरण, नगरपालिका, अधिसूचित क्षेत्र समिति, सहकारी निकाय व अन्य संस्थाओं, जो राज्य सरकार से अनुदान प्राप्त करते हैं अथवा जिस कंपनी में राज्य सरकार की 50% या अधिक हिस्सेदारी है, उन्हें वर्ष 2014-15 एवं उसके आगामी तीन वर्ष तक अपने कुल क्रय का न्यूनतम 20% सूक्ष्म एवं लघु उत्पादों के रूप में क्रय करना अनिवार्य है। 3 वर्ष बाद 1 अप्रैल, 2017 से इन्हें कुल क्रय लक्ष्य का न्यूनतम 20% उत्पाद एवं सेवा निर्माण करना भी अनिवार्य होगा।
5. इस नीति के तहत सूक्ष्म एवं लघु उत्पाद इकाईयों में निर्धारित वार्षिक 20% के क्रय लक्ष्य के 20% ( कुल का 4%) अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के स्वामित्व वाले इकाईयों हेतु नियत कर दिया गया है। 
6. राज्य के प्रत्येक विभाग, सहायता प्राप्त संस्थान एवं सार्वजनिक उपक्रम निर्धारित क्रय लक्ष्य से संबंधित वार्षिक प्रतिवेदन को वेबसाईट पर प्रदर्शित करेंगे।
7. राज्य की सार्वजनिक क्षेत्र की इकाईयों द्वारा जारी की जाने वाली वस्तुओं एवं सूची के लिए क्रय मूल्य दर को संविदा प्रणाली हेतु आरक्षित कर दिया गया है।
8. सूक्ष्म एवं लघु इकाईयों को भुगतान मे विलंब होने पर इसके समाधान हेतु MSMED Act, 2006 के तहत सूक्ष्म एवं लघु उद्योग सुविधा परिषद् का गठन किया गया है।
झारखण्ड राज्य की पर्यटन नीति – 2015
> झारखण्ड राज्य की पर्यटन नीति का प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् है -
1. रोजगार के अवसरों का निर्माण करना तथा पर्यटकों की संख्या को बढ़ाना।
2. उपलब्ध संसाधनों का समुचित प्रयोग करना ताकि अधिकाधिक संख्या में घरेलू तथा विदेशी पर्यटकों को लम्बे समय तक राज्य में पर्यटन हेतु आकर्षित किया जा सके।
3. प्रत्येक पर्यटन क्षेत्र को एक विशेष भ्रमण क्षेत्र के रूप में विकसित करना ।
4. पर्यटन क्षेत्रों के विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाना और उन्हें राज्य में मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
5. मास्टर प्लान तैयार कर उसे लागू करना तथा पर्यटन क्षेत्रों का एकीकृत विकास करना।
6. घरेलू एवं विदेशी पर्यटकों को गुणवत्तायुक्त सेवा उपलब्ध कराना।
7. पर्यटन संबंधी उत्पादों को प्रोत्साहित करना ।
8. राज्य के सांस्कृतिक स्मारकों को क्षय से बचाना
9. पर्यटन क्षेत्र में आम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना और सहयोगात्मक पर्यटन को प्रोत्साहित कर लोगों को आर्थिक लाभ पहुँचाना।
10. झारखण्ड को पर्यटन एडवेन्चर के विभिन्न क्षेत्रों जैसे-वायु, भूमि, जल आधारित एडवेंचर में प्रमुख स्थान दिलाना।
11. उचित सुविधाओं एवं सूचनाओं का विकास कर धार्मिक पर्यटन का विकास करना ।
12. झारखण्ड के समृद्ध हथकरघा उद्योग, सांस्कृतिक विरासत, परंपरा और रिवाजों को संरक्षित करना तथा इनके संवर्द्धन हेतु पर्याप्त कदम उठाना।
13. पर्यटन के क्षेत्र में प्रशासनिक व्यवस्था को सक्षम, सरल तथा पारदर्शी बनाना।
झारखण्ड राज्य की खाद्य प्रसंस्करण नीति –2015
> राज्य की खाद्य प्रसंस्करण नीति का प्रमुख लक्ष्य खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना के लिए मूलभूत सुविधाओं को बढ़ावा देना, निवेश को प्रोत्साहित करना, बाजार नेटवर्क को विकसित करना, तकनीकी सहायता प्रदान करना आदि है।
> सरकार का लक्ष्य कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्रों को विकसित करते हुए निवेशकों को लाभ पहुँचाना तथा खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में राज्य को अग्रणी स्थिति में लाना है।
> इस नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् हैं
1. प्रसंस्करण के स्तर को बढ़ाना, अनुपयोगी पदार्थों की मात्रा को कम करना, किसानों की आय में वृद्धि करना और निर्यात को बढ़ावा देना ताकि समग्र रूप से खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र को प्रोत्साहित किया जा सके। 2. लघु वनोत्पादों, जड़ी-बूटी संबंधी उत्पादों आदि को प्रोत्साहित कर जनजातीय समुदाय के लोगों की आय में वृद्धि करना ।
3. नए खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना हेतु वित्तीय मदद प्रदान करना । साथ ही तकनीकी स्तर में सुधार लाना और वर्तमान इकाईयों का विस्तार 
करना ।
4. उत्पादकों एवं निर्माताओं को बाजार प्रणाली से संबद्ध करना ।
5. तैयार खाद्य पदार्थों के लिए पूर्ण सरंक्षण की व्यवस्था करना और उत्पादक क्षेत्रों से उपभोक्ताओं एवं बाजारों तक खाद्य सामग्री की पहुँच सुनिश्चित करना ।
6. मांस एवं मछली के दुकानों में उचित सुविधाएँ उपलब्ध कराना ताकि स्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
> उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु झारखण्ड सरकार आधारभूत संरचनाओं के विकास, उचित वातावरण, पूंजी निवेश, तकनीकी एवं कौशल विकास, वित्तीय सहायता तथा अन्य दूसरी सुविधाएँ बहाल करने पर ध्यान केन्द्रित कर रही है।
झारखण्ड राज्य की निर्यात नीति –2015
> देश के कुल निर्यात में राज्य की हिस्सेदारी को 2019 तक 2 प्रतिशत * तक लाने के लक्ष्य के साथ राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2015 में झारखण्ड निर्यात नीति को स्वीकार किया गया है। इसी नीति के महत्वपूर्ण बिंदु निम्नवत् हैं
> निर्यात में शीघ्र वृद्धि करने हेतु सरल, प्रभावी, सहयोगात्मक एवं उत्तरदायी व्यवस्था को लागू करना। 
> खनिज आधारित उत्पाद, हस्तशिल्प, हस्तकरघा, कृषि, प्रोस्टेट खाद्य पदार्थ आदि पारंपरिक निर्यात को
बढ़ावा देना तथा इसके लिए कुशल एवं तकनीकी प्रणाली का विकास करना।
> निश्चित समय के अंदर विमानों द्वारा मौसमी फूलों, फलों एवं सब्जियों को निर्धारित स्थानों तक पहुँचाना। 
> वर्तमान में निर्यात करने वाली इकाईयों पर ध्यान देना तथा निर्यात को प्रोत्साहित करने हेतु उन्हें आवश्यक सहयोग प्रदान करना।
> गुणवत्तायुक्त प्रबंधन और पर्यावरण प्रबंधन की व्यवस्था को अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार विकसित करना ताकि निर्यात को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जा सके।
> अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में अधिकाधिक साझेदारी का विकास करने हेतु उचित प्रयास करना। 
> निर्यातकों के बीच वित्तीय सहायता पहुँचाना।
> समय-समय पर निर्यात जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करना ताकि निर्यातकों एवं अन्य लोगों में निर्यात संबंधी विषयों के संबंध में जागरूकता पैदा किया जा सके।
> उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा करने के लिए झारखण्ड सरकार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एकल खिड़की व्यवस्था, मजबूत एनालीटिकल डाटा, ई-गवर्नेस, सार्वजनिक-निजी भागीदारी, शोध एवं विकास कार्यक्रम आदि को प्रोत्साहित करने हेतु प्रयासरत है।
झारखण्ड फिल्म नीति – 2015
> राज्य में फिल्म निर्माण को प्रोत्साहन देने, लोक कला को बढ़ावा देने तथा राज्य की लोक भाषाओं में फिल्म निर्माण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से वर्ष 2015 में झारखण्ड फिल्म नीति को लागू किया गया है। 
> इस नीति के तहत राज्य में झारखण्ड फिल्म विकास निगम एवं राज्य स्तरीय फिल्म विकास परिषद् का गठन किया गया है।
> राज्य में ‘राज्य फिल्म टेलीविजन संस्थान' के रूप में संगीत नाट्य अकादमी का विकास प्रस्तावित है। इस संस्था द्वारा राज्य में झारखण्डी लोक संस्कृति पर आधारित फिल्म निर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा।
> राज्य में फिल्म सिटी का निर्माण किया जाएगा तथा इसके लिए निवेश को प्रोत्साहित किया जाएगा। साथ ही फिल्म सिटी के निर्माण हेतु औद्योगिक दरों पर सरकार द्वारा भूमि उपलब्ध कराया जाएगा।
> राज्य में फिल्म निर्माण से संबंधित अधिसंरचना के निर्माण हेतु आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जाएगा। 
> फिल्म निर्माण से संबंधित उपकरणों को किराये पर उपलब्ध कराया जाएगा।
> राज्य में मल्टीप्लेक्स के निर्माण हेतु प्रथम वर्ष में 100%, द्वितीय व तृतीय वर्ष में 75% तथा चतुर्थ व पंचम वर्ष में 50% अनुदान दिया जाएगा।
> राज्य में छोटे सिनेमाघरों को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ बंद सिनेमाघरों को पुनः शुरू किया जाएगा। 
> सौर ऊर्जा संचालित सिनेमाघरों को कुल निवेश की राशि के 50% के बराबर अनुदान दिया जाएगा।
> राज्य के सिनेमाघरों द्वारा मनोरंजन कर के अतिरिक्त प्रति टिकट 6 रूपये तथा 3 रूपये का उपयोग एयर कंडीशनर एवं अन्य सुविधाओं हेतु किया जा सकेगा।
> राज्य में जिन फिल्मों की शूटिंग 50% हुई है, उन्हें 6 माह हेतु मनोरंजन कर में 50% तक की छूट प्रदान की जाएगी। इसी प्रकार राज्य में 75% शूटिंग की गयी फिल्मों को 6 माह हेतु मनोरंजन कर में 75% तक की छूट प्रदान की जाएगी।
> सिनेमाघरों में कैप्टिव पावर प्लांट जेनरेटर की स्थापना हेतु 3 वर्षों तक विद्युत कर में छूट प्रदान की जाएगी। 
> राज्य में 75% निर्मित फिल्मों हेतु वित्तपोषण का प्रावधान इस नीति में किया गया है। इस हेतु फिल्म विकास निधि का गठन किया गया है। इस निधि हेतु फिल्म टिकट पर 2 रूपये के अधिभार का प्रावधान किया गया है।
> राज्य की क्षेत्रीय भाषा में निर्मित फिल्मों को 50% तथा हिन्दी व अन्य भाषाओं की क्षेत्रीय फिल्मों को 25% तक अनुदान देने का प्रावधान इस नीति में किया गया है। इसके लिए 10 करोड़ रूपये वार्षिक अनुदान की राशि का निर्धारण किया गया है।
> राज्य में पर्यटन स्थल को विशेष रूप से प्रसारित करने वाली फिल्मों को 50 लाख रूपये तक का अनुदान प्रदान किया जाएगा।
> राज्य में फिल्मोत्सव का आयोजन, पुरस्कारों का आयोजन, फिल्म सोसाइटीज को मजबूती आदि के द्वारा जनसाधारण की फिल्मों को लोकप्रिय बनाने हेतु प्रयास किया जाएगा।
झारखण्ड औद्योगिक पार्क नीति – 2015 
> झारखण्ड राज्य के निवासियों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राज्य में औद्योगिक पार्क नीति, 2015 का निर्माण किया गया है। 
> यह नीति अधिसूचना जारी करने की तारीख से अगले 5 वर्षों तक लागू रहेगी।
> इस नीति में प्रावधान किया गया है कि छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट-1908 की धारा-49 के तहत् औद्योगिक पार्क की स्थापना हेतु उपायुक्त द्वारा अनुमति प्रदान की जाएगी।
> इस नीति के तहत राज्य में निजी क्षेत्र, संयुक्त उद्यम एवं निजी - सार्वजनिक भागीदारी के माध्यम से औद्योगिक पार्क की स्थापना का प्रावधान किया गया है। इसका निर्माण 50 एकड़ भूमि पर किया जाएगा, जिसमें कम-से-कम 15 औद्योगिक इकाईयों की स्थापना की जाएगी।
> निजी क्षेत्र अथवा संयुक्त उद्यम (पीपीपी) में विशिष्ट औद्योगिक पार्क की स्थापना हेतु कमसे कम 10 एकड़ भूमि तथा 5 औद्योगिक इकाईयों की स्थापना किया जाना अनिवार्य है।
> निजी क्षेत्र में औद्योगिक पार्क की स्थापना हेतु भूमि की व्यवस्था स्वयं निजी क्षेत्र द्वारा की जाएगी। परंतु यदि राज्य सरकार के पास भूमि उपलब्ध है, तो सरकार द्वारा औद्योगिक पार्क हेतु निर्धारित कुल भूमि का अधिकतम 35% आवंटित किया जा सकता है। इस भूमि का आवंटन कम1-से-कम 30 वर्षों के लिए किया जाएगा।
> निजी औद्योगिक पार्क हेतु आवंटित कुल भूमि का 60% औद्योगिक इकाईयों हेतु तथा 40% सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम इकाईयों की स्थापना हेतु आरक्षित होगा। कुल आवंटित भूमि का 40% आधारभूत संरचना या हरित के रूप में विकसित किया जाना अनिवार्य होगा।
> निजी औद्योगिक पार्क को आधारभूत संरचना निर्माण हेतु राज्य सरकार द्वारा कुल परियोजना लागत का 50% या अधिकतम 10 करोड़ रूपये की वित्तीय सहायता उपलब्ध करायी जाएगी। इसी प्रकार विशिष्ट औद्योगिक पार्क हेतु कुल परियोजना लागत का 50% अथवा अधिकतम 7 करोड़ रूपये वित्तीय सहायता के रूप में उपलब्ध कराया जाएगा।
> औद्योगिक पार्क हेतु दी जाने वाली वित्तीय सहायता की अधिकतम अवधि 10 वर्ष होगी जिसका 5 वर्ष पर नवीकरण किया जाएगा।
>>निजी औद्योगिक पार्क को अनुमोदित किए जाने की तिथि से तीन वर्ष के अंदर पूरा करना होगा। निर्धारित अवधि में औद्योगिक पार्क का निर्माण नहीं किए जाने पर अथवा नियमों को तोड़ने पर राज्य सरकार मंत्रिपरिषद् की मंजूरी से राज्य सरकार द्वारा औद्योगिक पार्क का अधिग्रहण कर लिया जाएगा।
झारखण्ड ऑटोमोबाइल एवं ऑटो-कंपोनेंट नीति - 2015
> भारत विश्व में दोपहिया वाहनों का दूसरा सबसे बड़ा विनिर्माण करने वाला देश है तथा झारखण्ड राज्य ऑटोमोबाइल एवं ऑटो कंपोनेंट के विनिर्माण की दृष्टि से देश का अग्रणी राज्य है।
> देश के अन्य शहरों के साथ-साथ झारखण्ड राज्य में जमशेदपुर- आदित्यपुर शहर ऑटो कलस्टर के रूप में विकसित हुआ है।
> राज्य में ऑटो विनिर्माण की वृहद् संभावनाओं की दृष्टि से वर्ष 2015 में झारखण्ड ऑटोमोबाइल एवं ऑटो-कंपोनेंट नीति का निर्माण किया गया है। इस नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् हैं
> झारखण्ड राज्य को पूर्वी भारत में ऑटोमोबाइल एवं ऑटो- कंपोनेंट के विनिर्माण के प्रमुख केन्द्र के रूप में विकसित करना । 
> इस क्षेत्र में वर्ष 2020 तक अतिरिक्त 50,000 रोजगार अवसरों का सृजन करना ।
> राज्य में मेगा ऑटो परियोजनाओं को आकर्षित करना, नये ऑटो कलस्टर की स्थापना करना तथा वर्तमान ऑटो कलस्टर को मजबूत करना ।
> राज्य में टीयर - 1, टीयर -2 एवं टीयर - 3 ऑटो- कंपोनेंट की स्थापना हेतु विनिर्माताओं को प्रोत्साहित करना ।
> वर्तमान में स्थापित अवसंरचनाओं की खामियों की पहचान करना जो ऑटोमोबाइल एवं ऑटो- कंपोनेंट उद्योगों को प्रभावित करते हैं तथा इन कमियों को दूर करना ।
> राज्य में सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर आधारित कुशलता विकास को प्रोत्साहित करना ।
झारखण्ड सिंगल विंडो क्लीयरेंस एक्ट, 2015
> राज्य में औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करने हेतु वर्ष 2015 में झारखण्ड सिंगल विंडो क्लीयरेंस कानून को अधिनियमित किया गया है। 
नीति का उद्देश्य
> औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन प्रदान करना ।
> विभिन्न अनुज्ञप्तियों, अनुमतियों तथा स्वीकृतियों को त्वरित एवं समयबद्ध मंजूरी प्रदान करना ।
> नए निवेशों को सुगम एवं सरल बनाकर राज्य में निवेशोनुकूल माहौल तैयार करना ।
> विनियामक ढाँचे को सरल बनाना।
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
> अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करने हेतु एक शासी निकाय का गठन किया जाएगा जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री होंगे। इस निकाय के अन्य सदस्य उद्योग मंत्री, वित्त मंत्री, राजस्व व भूमि सुधार मंत्री तथा मुख्य सचिव होंगे। उद्योग सचिव इस निकाय के सदस्य सचिव होंगे।
> शासी निकाय का मुख्य कार्य सिंगल विंडो मंजूरी एवं उद्योग सरलीकरण हेतु रणनीति दिशा-निर्देश तय करना होगा।
> अधिनियम के तहत मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाएगा जिसका प्रमुख कार्य उद्योग सरलीकरण एवं एकल खिड़की मंजूरी हेतु एकल खिड़की मंजूरी समिति, एजेंसी, जिला स्तरीय नोडल एजेंसी एवं जिला कार्यकारिणी समिति के कार्यो का नियमित रूप से निरीक्षण, पर्यवेक्षण एवं समीक्षा करना होगा।
> उद्योग विभाग के प्रधान सचिव की अध्यक्षता में एक एकल खिड़की मंजूरी समिति का गठन किया जाएगा जिसका प्रमुख कार्य किसी उद्यम स्थापना या उसके संचालन की शुरूआत हेतु मंजूरी प्रदान करना होगा। 
> अधिनियम के प्रावधानों के तहत जिला के उपायुक्त की अध्यक्षता में एक जिला कार्यकारिणी समिति का गठन किया जाएगा जिसका प्रमुख कार्य नियमित रूप से जिला स्तरीय नोडल एजेंसी के कामकाज का अनुश्रवण, पर्यवेक्षण एवं समीक्षा करना होगा।
> जिला स्तरीय नोडल एजेंसी जिले में निवेश प्रोत्साहन गतिविधियों में सहायता प्रदान करेगी। यह उद्यमियों को विविध मंजूरियों हेतु उचित मार्गदर्शन प्रदान करेगा।
झारखण्ड खाद्य प्रसंस्करण उद्योग नीति - 2015
> झारखण्ड राज्य की लगभग आधी आबादी कृषि एंव प्राथमिक क्षेत्र में संलग्न है। राज्य की जलवायविक दशा भी कृषि कार्य के अनुकूल है। अतः राज्य में कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों के विकास की असीम संभावनाएँ मौजूद हैं। राज्य में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के विकास द्वारा जहाँ रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं, वहीं दूसरी ओर अन्य राज्यों की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आय के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं।
> राज्य में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के विकास की संभावनाओं के मद्देनजर ही वर्ष 2015 में झारखण्ड खाद्य प्रसंस्करण उद्योग नीति का निर्माण किया गया है।
> इस नीति का प्रमुख उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना हेतु राज्य में अनुकूल वातावरण का निर्माण करना, पूंजी निवेश को प्रोत्साहित करना, तकनीकी उन्नयन, विपणन नेटवर्क का विकास करना तथा अनुदान व रियायत प्रदान करना है।
> इस नीति के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं –
> प्लांट व संयंत्र व तकनीकी सिविल कार्य की कुल लागत का 35 प्रतिशत सहायता प्रदान किया जाएगा। परंतु सामान्य क्षेत्रों में सहायता की अधिकतम राशि ₹500 लाख तथा एकीकृत जनजाति विकास परियोजना (ITDP) क्षेत्र में सहायता की राशि 45 प्रतिशत तक होगी।
> ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक प्रसंस्करण केन्द्र / संग्रह केन्द्र की स्थापना हेतु बैंक द्वारा मूल्यांकित परियोजना लागत का 50 प्रतिशत (सामान्य क्षेत्र हेतु ) एवं 75 प्रतिशत ITDP क्षेत्र हेतु सहायता राशि के रूप में दी जाएगी, जिसकी अधिकतम सीमा 2.5 करोड़ रूपये होगी ।
> शीतगृह, मूल्य वर्धन एवं संरक्षण ढाँचे के निर्माण की कुल लागत का 35 प्रतिशत (अधिकतम 7 करोड़ रूपये) सहायता अनुदान के रूप में दिया जाएगा। ITDP क्षेत्र हेतु यह राशि कुल लागत का 50 प्रतिशत होगा।
> मांस एवं मछली के दुकान की स्थापना या आधुनिकीकरण हेतु परियोजना लागत का 50 प्रतिशत (अधिकतम 5 लाख रूपये) सहायता अनुदान के रूप में प्रदान किया जाएगा। ITDP क्षेत्र हेतु यह राशि कुल लागत का 75 प्रतिशत होगा।
> गढ़वा एवं पलामू जिले दाल के अधिक उत्पादन के मद्देनजर दाल प्रसंस्करण इकाई की स्थापना की जाएगी। 
> लातेहार जिले में टमाटर के वृहद उत्पादन के मद्देनजर टमाटर प्रसंस्करण इकाई की स्थापना की जाएगी।
झारखण्ड चारा प्रसंस्करण उद्योग नीति –2015 
> झारखण्ड राज्य में पशुपालन के विकास की असीम संभावनाएँ विद्यमान हैं, जिसमें मांस, डेयरी, सूअर पालन, बकरी पालन, कुक्कुट पालन एवं मत्स्यन शामिल है। इस क्षेत्र के विकास हेतु उपयुक्त चारे की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण शर्त है।
> राज्य में पशुपालन के विकास की संभावनओं के परिप्रेक्ष्य में ही झारखण्ड चारा प्रसंस्करण उद्योग नीति - 2015 का निर्माण किया गया है ।
> इस नीति का प्रमुख उद्देश्य राज्य में चारा उत्पादन संभावनाओं का दोहन करना है, कृषि उपउत्पादों की मांग में वृद्धि कर किसानों को भी इसका लाभ प्रदान किया जा सके।
> इस नीति का अन्य उद्देश्य चारा प्रसंस्करण इकाईयों की स्थापना हेतु राज्य में अनुकूल वातावरण का निर्माण करना, पूंजी निवेश को प्रोत्साहित करना, तकनीकी उन्नयन, विपणन नेटवर्क का विकास करना तथा अनुदान व रियायत प्रदान करना है ।
> इस नीति के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं –
> सामान्य क्षेत्रों में प्लांट व संयंत्र व तकनीकी सिविल कार्य की कुल लागत का 35 प्रतिशत (अधिकतम 500 लाख रूपये) सहायता प्रदान किया जाएगा।
> एकीकृत जनजाति विकास परियोजना (ITDP) क्षेत्र में सहायता की राशि 45 प्रतिशत (अधिकतम 500 लाख रूपये) तक होगी।
झारखण्ड राज्य सौर ऊर्जा नीति – 2015
> राज्य में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने तथा ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से वर्ष 2015 में झारखण्ड राज्य सौर ऊर्जा नीति लागू किया गया है। इस नीति के प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् हैं
> निजी क्षेत्र की सहायता से वर्ष 2020 तक 2,650 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन करना। 
> सौर ऊर्जा परियोजनाओं के निर्माण हेतु उपयुक्त वातावरण का निर्माण करना ।
> राज्य में पर्यावरण प्रदूषण मुक्त ऊर्जा का उत्पादन सुनिश्चित करना ।
> राज्य में सौर ऊर्जा के उत्पादन हेतु स्थानीय विनिर्माण इकाईयों को प्रोत्साहित करना तथा रोजगार सृजन करना । 
> इस नीति के तहत ऊर्जा उत्पादन हेतु आगामी वर्षों के संबंध में निम्न लक्ष्य निर्धारित किया गया है
> इस नीति के प्रमुख प्रावधान निम्नवत् हैं –
> राज्य सरकार के द्वारा सोलर पार्क की स्थापना हेतु प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा तथा इस हेतु राज्य में अनुत्पादक भूमि या अन्य परती भूमि को सोलर पार्क हेतु आवंटित किया जाएगा।
> सोलर पार्क की स्थापना हेतु झारखण्ड स्टेट इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेट्री कमीशन (JSERC) द्वारा आधारभूत संरचना का विकास किया जाएगा तथा इस हेतु राज्य सरकार द्वारा वित्तीय सहायता उपलब्ध करायी जाएगी।
> सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित करने हेतु जरेडा (JREDA - Jharkhand Renewable Energy Development Agency) को नोडल एजेंसी बनाया गया है।
> झारखण्ड सरकार द्वारा सरकारी और निजी भवनों पर रूफटॉप प्लांट लगाया जाएगा। इसके लिए 53 सरकारी भवनों का चयन किया गया है। >>>
> सौर ऊर्जा के क्षेत्र में स्थापित की जाने वाली परियोजनाओं पर 10 वर्ष तक विद्युत शुल्क में छूट प्रदान किया जाएगा।
> सौर ऊर्जा संयंत्र को डीम्ड उद्योग का दर्जा प्रदान किया जाएगा ताकि इस क्षेत्र पर झारखण्ड औद्योगिक नीति के नियम लागू न हों। 
> आवासीय उपभोक्ताओं द्वारा अपने छत पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने पर उन्हें वाणिज्यिक छूट प्रदान की जाएगी। 
> सौर संयंत्र में प्रयुक्त उपकरणों को मूल्य वर्धित कर के दायरे से बाहर रखा जाएगा । 
> सौर ऊर्जा इकाईयों को प्रदूषण क्लियरेंस से छूट प्रदान की जाएगी तथा इन्हें झारखण्ड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं होगी।
झारखण्ड मद्य निषेध नीति – 2016 
> वर्ष 2016 में राज्य में मद्य निषेध नीति को लागू करते हुए निम्न प्रावधान किया गया है। 
> शराब की सभी बोतलों पर अनिवार्य रूप से यह अंकित किया जाएगा कि 'मदिरापान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। '
> 21 वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को शराब की बिक्री करना प्रतिबंधित कर दिया गया है। 
> राज्य में शराब के प्रचार व प्रसार को प्रतिबंधित कर दिया गया है। 
> राज्य में 50% से अधिक अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या वाले अनुसूचित ग्राम पंचायतों में शराब की दुकान खोलना प्रतिबंधित कर दिया गया है। 
> राज्य में पचवई की दुकानों की बन्दोबस्ती नहीं की जाएगी तथा इसकी खुदरा विक्री को प्रतिबंधित कर दिया गया है। केवल जनजातीय त्योहारों व सामाजिक कार्यक्रम के अवसरों पर सीमित मात्रा में पचवई का निर्माण करना व उसे रखने की छूट होगी। >>>
> 15 अगस्त, 26 जनवरी, गाँधी जयंती, रामनवमी, दशहरा, होली, ईद व मुहर्रम पर्व के अवसर पर राज्य में शुष्क दिवस घोषित है तथा इस दिन शराब की बिक्री प्रतिबंधित होगी।
झारखण्ड राज्य की स्टार्टअप नीति – 2016
> राज्य सरकार द्वारा 6 अक्टूबर, 2016 को झारखण्ड स्टार्टअप नीति-2016 की घोषणा की गई है।
> इसका प्रमुख लक्ष्य 2021 तक स्टार्टअप के क्षेत्र में झारखण्ड को अग्रणी राज्यों में शामिल करना है।
> इसके लिए सरकार ने नवोन्मेष हेतु उचित वातावरण उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया है। 
> नीति के तहत 1000 सामान्य स्टार्टअप तथा 1500 कल्पना आधारित स्टार्टअप पर काम करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
> एक लौंख वर्ग फीट क्षेत्र में स्टार्टअप के तहत इन्क्यूबेशन सेंटर की स्थापना किये जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके तहत राज्य के 10 प्रतिष्ठित संस्थानों को इन्क्यूबेशन सेंटर खोलने हेतु 50-50 लाख रूपये की राशि का अनुदान प्रदान किया जाएगा। यह राशि प्रत्येक शिक्षण संस्थानों को पांच वर्ष तक मिलेगी। 
> अगले पांच वर्षों में सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने इसके लिए 250 करोड़ रूपये की व्यवस्था करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। साथ ही सार्वजनिक-निजी भागीदारी के आधार पर भी कोष की व्यवस्था की जाएगी।
झारखण्ड वस्त्र, परिधान और फुटवियर नीति - 2016
> झारखण्ड में उद्योग एवं प्रोत्साहन नीति-2016 * में टेक्सटाइल क्षेत्र को झारखण्ड में एक विशेष क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है। इसके अंतर्गत राज्य में झारखण्ड वस्त्र, परिधान और फुटवियर नीति-2016* का निर्माण किया गया है।
> रेशम क्षेत्र में झारखण्ड ने महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की है तथा झारखण्ड देश में सर्वाधिक तसर रेशम उत्पादित करने वाला राज्य है। यहाँ देश के कुल तसर रेशम का लगभग 40% उत्पादित किया जाता है।
> झारखण्ड राज्य में उत्पादित तसर रेशम अपनी गुणवत्ता के कारण वैश्विक स्तर पर जाना जाता है तथा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस जैसे विकसित देशों में इसकी बहुतायात में मांग है।
> राज्य में रेशम के डिजाइन, प्रशिक्षण, उद्यमिता, विपणन व उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा झारखण्ड सिल्क टेक्सटाइल एवं हैंडिक्रॉफ्ट विकास प्राधिकरण (झारक्रॉफ्ट) का गठन वर्ष 2006 में किया गया था। इसके माध्यम से राज्य में लगभग दो लाख रेशम कीट पालकों, सूत कातने वाले लोगों, बुनकरों एवं शिल्पकारों को रोजगार हेतु सहायता प्रदान किया जा रहा है।
> झारक्रॉफ्ट द्वारा राज्य एवं देश के विभिन्न शहरों में 18 आउटलेट का संचालन भी किया जा रहा है। इसनमें राँची, दिल्ली, कोलकाता, बेंगलुरू, अहमदाबाद एवं मुंबई प्रमुख हैं।
> झारखण्ड रेशम उत्पादन के साथ-साथ सूती धागों व हैन्डलूम वस्तुओं के उत्पादन में भी देश का अग्रणी राज्य है। इस परिप्रेक्ष्य में राज्य में कपास ऊन बुनाई, हैन्डलूम कपड़ों की बुनाई, ऊन व रेशमी धागा आदि को भी प्रोत्साहित करने हेतु गंभीर प्रयास किया जा रहा है।
> इस प्रकार की वस्तुओं के निर्माण की दृष्टि से राँची, लातेहार, पलामू, रामगढ़, धनबाद, बोकारो, गोड्डा, पाकुड़, साहेबगंज एवं खूँटी प्रमुख जिले हैं।
> राज्य में सरकार ने राजनगर ( सरायकेला-खरसावाँ) व इरबा (राँची) सिल्क पार्क तथा देवघर में मेगा टेक्सटाइल पार्क की स्थापना की है। साथ ही देवघर, दुमका, साहेबगंज, गोड्डा, पाकुड़ एवं जामताड़ा जिले को भारत सरकार की ओर से मेगा हैंडलूम कलस्टर योजना में शामिल किया गया है।
> झारखण्ड सरकार की वस्त्र, परिधान और फुटवियर नीति, 2016 के उद्देश्य निम्नवत् हैं
> समग्र टेक्सटाइल क्षेत्र में उच्च एवं सतत् वृद्धि दर प्राप्त करना ।
> टेक्सटाइल क्षेत्र की मूल्य श्रृंखला को मजबूती प्रदान करना ।
> सहकारी क्षेत्र की कताई मिलों को बेहतरी हेतु प्रोत्साहित करना।
> विद्युतकरघा क्षेत्र के आधुनिकीकरण द्वारा उन्हें मजबूती प्रदान करना ताकि वे उत्तम कोटि के वस्त्रों का निर्माण कर सकें। 
> टेक्सटाइल उत्पादन क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी का सदुपयोग करके उसकी गुणवत्ता, डिजाइन एवं विपणन को बढ़ावा देना ।
> आयात को प्रतिस्थापित करना।
> टेक्सटाइल उद्योगों के विनियमन संबंधी नियमों का उदारीकरण करना, ताकि इस क्षेत्र को अधिकाधिक प्रतिस्पर्द्धात्मक बनाया जा सके।
> इस क्षेत्र में कुशल कामगारों का निर्माण करना तथा इस नीति के तहत 5 लाख रोजगार सृजन करना।
झारखण्ड किफायती आवास नीति – 2016 
> इस नीति का निर्माण केन्द्र सरकार की 'प्रधानमंत्री आवास योजना - शहरी' के अंतर्गत 'सभी के लिए आवास' के तहत 2016 में की गयी है।
> इस नीति का प्रमुख लक्ष्य 'शहरी क्षेत्रों में सभी परिवारों के लिए किफायती आवास' प्रदान करने हेतु सक्षम वातावरण का निर्माण करना है।
> इस नीति के तहत आवास की कमी को दूर करने हेतु सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) पर बल दिया जायेगा।
> इस योजना के अंतर्गत कमजोर वर्गों यथा अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति/पिछड़े वर्ग/अल्पसंख्यकों के साथ-साथ वरिष्ठ नागरिकों व दिव्यांगों को लक्षित किया जायेगा।
> इस नीति के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी तथा प्राइवेट डेवलपर्स द्वज्ञरा निर्मित की जाने वाली कॉलनियों में तथा EWS के LIG लिए आवास को आरक्षित किया जायेगा। 4000 वर्ग मीटर की कॉलनियों में न्यूनतम 10% आरक्षित होगा। तथा 3000 वर्ग मीटर की कॉलनियों में न्यूनतम 15% आवास अति कमजोर वर्गों के लिए
> सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत निर्मित कॉलनियों हेतु सरकार द्वारा भूमि उपलब्ध कराया जायेगा। कुल उपलब्ध भूमि के 65% भाग पर कॉलोनी का निर्माण तथा 35% भाग पर व्यावसायिक कॉम्पलेक्स का निर्माण किया जायेगा। इस निर्मित कॉलोनी में 50% कमजोर वर्गों हेतु आरक्षित होगा।
> गंदी बस्ती के पुनर्वास में केन्द्र द्वारा 1 लाख रूपये तक की मदद की जायेगी। 
> इस नीति के तहत 100 सदस्यों वाली सहकारी समितियाँ सरकार द्वारा अनुदानित भूमि पर अपने सदस्यों हेतु आवासीय कॉलोनी का निर्माण कर सकेंगी।
> इस नीति के तहत 3 लाख रूपये वार्षिक आय वाले अति कमजोर वर्गों को 300 वर्गफीट तथा| 3-6 लाख रूपये आय वाले निम्न आय वर्गों को 600 वर्गफीट का आवास उपलब्ध कराया जायेगा।
> इस नीति के तहत शहरी क्षेत्रों में 1200 रूपये प्रति वर्गफीट की दर से आवास उपलब्ध कराया जायेगा। 
> EWS के LIG वर्ग के व्यक्तियों को आवास क्रय हेतु 6 लाख रूपये का ऋण 15 वर्षों हेतु उपलब्ध कराया जायेगा। इस पर 6.5% वार्षिक की दर से ब्याज लिया जायेगा। 
> व्यक्तिगत आवास के निर्माण हेतु केन्द्र की ओर से 1.5 लाख रूपये तथा राज्य सरकार की ओर से 75 हजार रूपये का अनुदान प्रति लाभुक प्रदान किया जायेगा।
> आवास का वितरण लॉटरी के माध्यम से किया जायेगा।
झारखण्ड इलेक्ट्रॉनिक्स डिजाइन एवं विनिर्माण नीति - 2016 
नीति का उद्देश्य
> राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मांग को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र को प्रतिस्पर्धी बनाना ।
> कच्चे माल व उपकरणों की आपूर्ति हेतु एक श्रृंखला का निर्माण करना ।
> 2020 तक इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों के निर्यात में झारखण्ड की भागीदार 2 बिलियन सुनिश्चित करना।
> अगले 10 वर्षों में राज्य में न्यूनतम 50 संबंधित इकाईयों का विकास करना ।
> इस उद्योग के विकास हेतु मानव संसाधन को प्रशिक्षित करना ।
> ग्रामीण आवश्कताओं को पूरा करने हेतु पर्याप्त उपकरणों का निर्माण करना । 
सरकार की रणनीति
> राँची, जमशेदपुर तथा धनबाद में न्यूनतम 200 एकड़ भूमि पर इएसडीएम (ESDM) नवाचार हब का निर्माण किया जायेगा।
> स्थानीय कच्चा माल का उपयोग करने वाली कंपनियों को वित्तीय अनुदान प्रदान किया जायेगा।
> निवेशकों को आवश्यकतानुसार भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित की जायेगी।
> सरकार द्वारा सड़क, बिजली, पानी आदि आधारभूत सुविधाओं का विकास किया जायेगा।
सरकार द्वारा प्रदत्त अनुदान
> कुल पूंजी लागत का अधिकतम 20% अनुदान दिया जायेगा ।
> सभी इएसडीएम (ESDM) इकाईयों को 5 वर्ष तक आयकर में छूट प्रदान किया जायेगा।
> सभी इएसडीएम (ESDM) इकाईयों को स्टाम्प शुल्क, स्थानांतरण कर एवं पंजीकरण कर में छूट प्रदान किया जायेगा।
> इएसडीएम (ESDM) इकाईयों द्वारा विदेशों से कच्चा माल लाने पर वाणिज्य कर में 50% की छूट दी जायेगी। 
> सौर ऊर्जा संयंत्रों को 10 वर्ष तक विद्युत कर से राहत प्रदान किया जायेगा।
> आवासीय उपभोक्ताओं द्वारा रूफटॉप सौर तकनीक का प्रयोग करने पर उन्हें विद्युत कर में छूट प्रदान किया जायेगा।
झारखण्ड बीपीएम / बीपीओ निति - 2016
नीति का लक्ष्य
> राज्य को बीपीओ तथा बीपीएम क्षेत्र में समग्र रूप से वरीयता राज्य के रूप में विकसित करना ताकि राज्य के लोगों हेतु रोजगार के नए अवसर सृजित किए जा सकें।
नीति का उद्देश्य
> वर्ष 2021 तक राज्रू के जिलों में संचालित बीपीओ व बीपीएम की सहायता से 15,000 लोगों को रोजगार उपलब्ध कराना।
> सभी जिलों के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में बीपीओ व बीपीएम इकाईयों की स्थापना को प्रोत्साहन देना। 
> आईटी व आईटीइ सेवाओं को प्रोत्साहन देने हेतु छोटे शहरों में विकास व बुनियादी सुविधाओं का विकास करना।
नीति की रणनीति
> सहायिकी तथा प्रोत्साहन - इस नीति के तहत सूचीबद्ध बीपीओ व बीपीएम व संबंधि गतिविधियों को सहायिकी तथा प्रोत्साहन प्रदान किया जायेगा।
1. भूमि लागत संबंधी प्रोत्साहन वैसे कर्मचारी जो झारखण्ड राज्य के रहने वाले हैं या झारखण्ड से 10वीं कक्षा से उपर की पढ़ाई किये हों, उन्हें 30,000 की दर से भूमि लागत की प्रतिपूर्ति की जायेगी। -
2. पूंजीगत प्रोत्साहन - ए टाइप शहरों में 5 वर्ष, बी टाइप शहरों में 7 वर्ष तथा सी टाइप शहरों में 9 वर्ष हेतु प्रति सीट अधिकतम 1 लाख रूपये तक का सब्सिडी प्रोत्साहन व पुनर्भुगतान किया जायेगा।
3. कार्यकारी भुगतान संबंधी प्रोत्साहन बीपीओ तथा बीपीएम इकाईयों को लीज या किराया पर अधिकतम 15,000 रूपये प्रति सीट प्रतिवर्ष 3 वर्षों तक के लिए प्रतिपूर्ति की जायेगी। इसके अंतर्गत प्रथम वर्ष में 100%, द्वितीय वर्ष में 75% तथा तीसरे वर्ष में 50% की प्रतिपूर्ति की जायेगी। -
4. अन्य प्रोत्साहन
> 3 वर्षों तक दूरसंचार लागत के 50% की प्रतिपूर्ति की जायेगी, जो अधिकतम 30,000 रूपये प्रति सीट प्रतिवर्ष होगी।
> इंटरनेट ब्रॉडबैंड की लागत की 50% प्रतिपूर्ति की जायेगी, जो अधिकतम 40,000 रूपये प्रति सीट होगी। 
> सौर ऊर्जा लागत के 15% तक की प्रतिपूर्ति की जायेगी।
> बीपीओ तथा बीपीएम इकाईयों को 3 वर्ष तक विद्युत शुल्क की प्रतिपूर्ति प्रदान की जायेगी।
> 4000 रूपये प्रतिमाह की दर से प्रशिक्षण संबंधी लागत की प्रतिपूर्ति की जायेगी। यह प्रतिपूर्ति प्रति
व्यक्ति 3 माह तक की जायेगी।
> राष्ट्रीय स्तर के प्रदर्शनी में भाग लेने हेतु 2 लाख रूपये तक की प्रतिपूर्ति की जायेगी।
> बीपीओ तथा बीपीएम प्रोफेशनलों को 3 वर्ष तक ईपीएफ में 500 रूपये का सहयोग दिया जायेगा। 
> बीपीओ तथा बीपीएम इकाईयों को पहली बार नियोजन में सहायता हेतु प्रति कर्मचारी 10,000 रूपये की सहायता प्रदान की जायेगी।
> दिव्यांग कर्मचारियों को 500 रूपये की अतिरिक्त सहायता दी जायेगी।
झारखण्ड की खेल नीति – 2020
> झारखण्ड खेल नीति की घोषणा 29 दिसंबर, 2020 को की गयी है। 
> इस नीति का उद्देश्य झारखण्ड राज्य में खेलकूद को प्रोत्साहित करना है।
> इसमें राज्य के खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों, विद्यालय स्तर पर खेलकूद की अनिवार्यता, पदक जीतने पर खिलाड़ियों को नकद पुरस्कार, प्रशिक्षकों को पुरस्कार, राज्य के पुराने खिलाड़ियों को सम्मान व पेंशन, दिव्यांग खिलाड़ियों को प्राथमिकता आदि महत्वपूर्ण प्रावधान किये गये हैं।
> राज्य के खिलाड़ियों व कोच को प्रोत्साहित करने हेतु 'जयपाल सिंह मुण्डा अवार्ड प्रदान किया जायेगा। 
> सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर तक के पाठ्यक्रम में शारीरिक शिक्षा एवं खेल को अनिवार्य बनाया जायेगा । 
> विद्यालय परिसर में प्रतिभाशाली बच्चों को उत्कृष्ट खिलाड़ी बनाने हेतु विशेष प्रशिक्षण दिया जायेगा। 
> सभी सरकारी व निजी विद्यालयों में कम-से-कम एक घंटे शारीरिक गतिविधियों व खेल के लिए निर्धारित होगा।
> कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में खेलों का विकास किया जायेगा।
> राज्य के प्रत्येक विधानसभा में कम-से-कम एक विद्यालय (जिसके पास खेल का मैदान या स्टेडियम हो) को चिन्हित करके उसमें खेल की सचुचित सुविधाएँ उपलब्ध करायी जायेंगी तथा उसे ग्रामीण खेल केन्द्र के रूप में विकसित किया जायेगा।
> ग्रामीण खेल केन्द्रों के लिए अनुबंध पर दो वर्ष हेतु एक खेल मित्र की बहाली की जायेगी, जो ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को पसंदीदा खेलों में भाग लेने हेतु प्रोत्साहित करेगा।
> राज्य में खेल अकादमी तथा खेल विश्वविद्यालय की स्थापना की जायेगी।
> राज्य के मेगा स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में खेल विश्वविद्यालय शुरू किया जायेगा।
> राज्य में उच्च प्राथमिकता वाले खेलों के लिए एक्सीलेंस सेंटर की स्थापना की जाएगी जिसमें खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया जायेगा।
> खेल निदेशालय द्वारा समय-समय पर तय मानदंडों के अनुसार खिलाड़ियों का चयन किया जायेगा। इन खिलाड़ियों को निःशुल्क आवास, बोर्डिंग, खेल किट, खेल उपकरण, प्रतियोगिता दर्शन और पोषण विशेषज्ञ का समर्थन व चिकित्सा सहायता प्रदान की जायेगी।
> खेल निदेशालय की ओर से प्रतिवर्ष 'खेल प्रतिभा खोज' का आयोजन किया जायेगा।
दिव्यांगों हेतु प्रावधान
> दिव्यांग खिलाड़ियों को समान अवसर प्रदान करते हुए उनके लिए जिला स्तरीय स्टेडियम की सुविधा प्रदान की जायेगी तथा पदक जीतने पर नकद पुरस्कार भी प्रदान किया जायेगा।
खेल संघों को अनुदान हेतु प्रावधान
> खेल विभाग से मान्यता प्राप्त खेल संघों को ही राज्य सरकार की ओर से अनुदान प्रदान किया जायेगा।
> खेल संघों को सोसाइटी एक्ट के तहत निबंधन कराना अनिवार्य होगा।
> अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजन हेतु अधिकतम 1 करोड़ रूपये की राशि अनुदान स्वरूप प्रदान की जायेगी। इसमें से 50 प्रतिशत राशि तत्काल तथा 50 प्रतिशत राशि ऑडिट रिपोर्ट आने के बाद दी जायेगी। 
> अन्य खेलों के आयोजन हेतु भी अनुदान प्रदान किया जायेगा।
झारखण्ड की पर्यटन नीति – 2020
> इस नीति को पर्यटन नीति-2015 के तर्ज पर तैयार किया गया है।
> इस नीति का उद्देश्य भारत के पर्यटन मानचित्र पर झारखण्ड को अनिवार्य गंतव्य के रूप में स्थापित करना है। 
> इस नीति में पर्यटन के क्षेत्र में 75,000 रोजगार सृजित करने का लक्ष्य रखा गया है। 
> इस नीति के तहत निवेशकों को निवेशित पूंजी का 30% या अधिकतम ₹10 करोड़ की सब्सिडी प्रदान की जायेगी। 
> अधिसूचित क्षेत्र में निवेश करने पर निवेशकों को 5% की अतिरिक्त सब्सिडी प्रदान की जायेगी।
> राज्य में पर्यटन इकाई शुरू करने पर बिजली की दरों में 30% की छूट प्रदान की जायेगी।
> पर्यटन इकाई की स्थापना हेतु निवेशकों द्वारा लिए गए ऋण पर ब्याज में 50% या अधिकतम ₹25 लाख तक की छूट (5 वर्षों के लिए) प्रदान की जायेगी।
> नये पर्यटन इकाई को 5 वर्षों तक राज्य वस्तु एवं सेवा कर (SGST) के भुगतान में 75% की छूट तथा स्टॉम्प शुल्क में 2% तक की छूट प्रदान की जायेगी ।
अन्य बातें
> मधुबन तथा पारसनाथ के प्रबंधन हेतु पारसनाथ विकास प्राधिकार की स्थापना की जायेगी।
> देवघर के तर्ज पर ईटखोरी तथा बासुकीनाथ का विकास किया जायेगा।
> लातेहार - नेतरहाट - चांडिल - बेतला - दालमा- मिरचईया-गेतलसूद सर्किट जैसे पारिस्थितिकी सर्किट का विकास किया जायेगा। 
> नेतरहाट के विकास पर विशेष बल प्रदान किया जायेगा।
> एकीकृत जनजातीय कॉम्प्लेक्स का विकास किया जायेगा ताकि जनजातीय संस्कृति को प्रदर्शित किया जा सके। 
> ग्रामीण पर्यटन समिति का गठन किया जायेगा।
> स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षण देने हेतु एडवेंचर पर्यटन संस्थान की स्थापना की जायेगी।
> राज्य में फिल्म सिटी की स्थापना की जायेगी तथा राज्य में किसी भी फिल्म की शूटिंग पर फिल्म निर्माण की कुल लागत का 15% सब्सिडी प्रदान किया जायेगा।
झारखण्ड की सीएसआर नीति – 2020
> यह झारखण्ड की पहली कॉरपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी पॉलिसी (सीएसआर नीति) है।
> इस नीति की घोषणा 4 फरवरी, 2021 को की गयी है।
नीति का उद्देश्य
> राज्य में सीएसआर निवेश को आकर्षित करने हेतु उचित वातावरण तैयार करना तथा विभिन्न विकासात्मक चुनौतियों से निपटने हेतु सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन व्यवहार अपनाना।
> राज्य सरकार, कॉरपोरेट एवं सिविल सोसाइटी के बीच साझेदारी का निर्मित करना तथा उनकी प्राथमिकताओं व गतिविधियों को सुगमता प्रदान करना।
> संसाधनों के समुचित उपयोग हेतु केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा संचालित योजनाओं के बीच तालमेल बैठाना व पारदर्शी वातावरण का निर्माण करना ।
> सीएसआर गतिविधियों को सही तरीके से लागू करने हेतु फ्रेमवर्क करना तथा सीएसआर कोष का प्रभावी उपयोग करना।
> समुदाय व वातावरण पर सतत् व दीर्घकालिक प्रभाव उत्पन्न करने हेतु सीएसआर परियोजनाओं की प्राथमिकता निर्धारित करना ।
सीएसआर को का स्रोत
> निजी व सार्वजनिक कॉरपोरेट
> सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम
> व्यक्तिगत व अन्य इकाईयां
> कॉरपोरेट सरकार के साथ प्रत्यक्ष साझेदारी में या किसी गैर-लाभकारी फाउंडेशन के द्वारा या अन्य किसी गैर-सरकारी संगठन के द्वारा या अन्य कॉरपोरेट के साथ मिलकर सीएसआर गतिविधियों में शामिल हो सकेंगे। 
अन्य तथ्य
> सीएसआर कोष की अनुमति दो स्तरों पर दी जायेगी –
> स्तर - 1 उपायुक्त की अध्यक्षता में गठित सीएसआर समिति द्वारा । इस स्तर पर कम राशि के कोष की अनुमति प्रदान की जा सकेगी।
> स्तर - 2 शासकीय निकाय/कार्यपालक परिषद् द्वारा। इस स्तर पर अधिक राशि के कोष की अनुमति दी जायेगी। इस स्तर पर सीएसआर राशि का निर्धारण उद्योग विभाग द्वारा किया जायेगा। 
> एक सीएसआर पोर्टल को संचालित किया जायेगा ताकि इस नीति को पारदर्शिता के साथ व प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किया जा सके। 
> एक झारखण्ड सीएसआर प्राधिकरण का गठन किया जायेगा। इस प्राधिकरण के गठन के साथ ही पूर्व में गठित झारखण्ड सीएसआर परिषद् स्वतः भंग हो जायेगी।
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Sun, 09 Jul 2023 10:51:08 +0530 Jaankari Rakho
स्थानीयता नीति https://m.jaankarirakho.com/स्थानीयता-नीति https://m.jaankarirakho.com/स्थानीयता-नीति झारखण्ड में स्थानीयता नीति
(Domicile Policy in Jharkhand)
> झारखण्ड सरकार द्वारा 7 अप्रैल, 2016 को राज्य गठन के 15 वर्षों के बाद स्थानीयता नीति की घोषणा की गई है।
> इस नीति के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में अगले 10 वर्षों तक राज्य के तृतीय एवं चतुर्थवर्गीय पदों की सरकारी नौकरियाँ स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित कर दी गयी हैं ।
> इस नीति के तहत् वैसे भारतीय नागरिकों को झारखण्ड का स्थानीय निवासी माना जाएगा, जो निम्नलिखित में से किसी एक शर्त को पूरा करता हो
1. झारखण्ड राज्य की भौगोलिक सीमा में निवास करता हो एवं स्वयं अथवा पूर्वज के नाम गत सर्वे खतियान में दर्ज हो। भूमिहीन के मामले में उसकी पहचान संबंधित ग्रामसभा द्वारा की जाएगी, जो झारखण्ड में प्रचलित भाषा, संस्कृति एवं परंपरा पर आधारित होगी ।
2. किसी व्यापार, नियोजन एवं अन्य कारणों से झारखण्ड की भौगोलिक सीमा में विगत 30 वर्षो या अधिक अवधि से निवास करता हो एवं अचल संपत्ति अर्जित की हो या ऐसे व्यक्ति की पत्नी / पति / संतान हो एवं झारखण्ड में निवास करने की प्रतिबद्धता रखने का प्रतिज्ञान करता हो ।
3. झारखण्ड राज्य सरकार / राज्य सरकार द्वारा संचालित / मान्यता प्राप्त संस्थानों, निगम आदि में नियुक्त एवं कार्यरत पदाधिकारी/कर्मचारी या उनकी पत्नी / संतान हो एवं झारखण्ड राज्य में निवास करने की प्रतिबद्धता रखने का प्रतिज्ञान करता हो ।
4. भारत सरकार का पदाधिकारी / कर्मचारी जो झारखण्ड राज्य में कार्यरत हो या उनकी पत्नी / पति / संतान हो एवं झारखण्ड राज्य में निवास करने की प्रतिबद्धता का प्रतिज्ञान करता हो ।
5. झारखण्ड राज्य में किसी संवैधानिक या विधिक पदों पर नियुक्त व्यक्ति उनकी पत्नी / पति / संतान हो एवं झारखण्ड राज्य में निवास करने की प्रतिबद्धता का प्रतिज्ञान करता हो ।
6. ऐसा व्यक्ति, जिसका जन्म झारखण्ड में हुआ हो तथा जिसने अपनी मैट्रिकुलेशन अथवा समकक्ष स्तर् तक की पूरी शिक्षा झारखण्ड स्थित मान्यता प्राप्त संस्थानों से प्राप्त की हो एवं झारखण्ड राज्य में निवास करने की प्रतिबद्धता का प्रतिज्ञान करता हो ।
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Sun, 09 Jul 2023 10:35:53 +0530 Jaankari Rakho
प्रत्यार्पण एवं पुनर्वास नीति https://m.jaankarirakho.com/प्रत्यार्पण-एवं-पुनर्वास-नीति https://m.jaankarirakho.com/प्रत्यार्पण-एवं-पुनर्वास-नीति प्रत्यार्पण एवं पुनर्वास नीति, 2009 
(Surrender Policy, 2009)
> इस नीति की घोषणा 2009 में की गयी थी।
> विधि व्यवस्था के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती वामपंथी उग्रवाद की समस्या है। उग्रवाद की समस्या विधि व्यवस्था के क्षेत्र में इस राज्य की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। झारखण्ड राज्य के राँची, गुमला, खूँटी, सिमडेगा, लोहरदगा, पलामू, लातेहार, गढ़वा, चतरा, हजारीबाग, गिरिडीह, कोडरमा, बोकारो, धनबाद, रामगढ़, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावाँ आदि जिले इस समस्या से गंभीर रूप से आक्रांत हैं। शेष जिलों में भी वामपंथी उग्रवादी अपनी जड़ जम रहा है तथा वहाँ भी उग्रवादी घटनाएँ, यदा-कदा होती रहती हैं।
> झारखण्ड राज्य के गठन के पश्चात् इस समस्या को चुनौती के रूप में लिया गया, जिसमें विशेष सफलताएँ मिलीं। जिससे उग्रवादियों का मनोबल गिरा है। विभिन्न माध्यमों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि बहुत से लोग बहकावे में आकर अथवा गलत धारणाओं के अंतर्गत वामपंथी उग्रवादियों के साथ मिल गए हैं, जिन्हें अब अपनी गलती का अहसास हो रहा है। वे समाज की मुख्य धारा में लौटने को आतुर हैं। 
> ऐसे तत्त्वों को एवं उनके परिवार को मुख्य धारा में वापस लाने के उद्देश्य से एक प्रत्यार्पण नीति का निर्धारण सन् 2001 में किया गया था, परन्तु उक्त प्रत्यार्पण नीति का प्रतिफल उत्साहवर्द्धक नहीं पाया गया। 
> इस पृष्ठभूमि में इस योजना को उत्साहवर्द्धक एवं आकर्षक बनाए जाने के लिए सम्यक् विचारोपरांत राज्य सरकार पूर्व की नीति के स्थान पर नई प्रत्यार्पण एवं पुनर्वास नीति का निरूपण निम्नवत करती है। 
उद्देश्य
> इस नीति का उद्देश्य वामपंथी उग्रवादियों के प्रत्यापर्ण को प्रोत्साहित करना तथा प्रत्यापर्ण कर चुके उग्रवादियों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ते हुए उनके लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था एवं आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है।
परिभाषा
> वामपंथी उग्रवाद का तात्पर्य ऐसे संगठनों के सदस्यों से है, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा भारतीय अपराध (संशोधन) अधिनियम, 1908 की धारा 16 के तहत अवैधानिक घोषित किया गया है।
योग्यता
> यह योजना केवल उन्हीं उग्रवादियों पर लागू होगी, जिन्हें उग्रवादी संगठन के दस्ते के सदस्य या उसके ऊपर के पदधारक के रूप में विशेष शाखा द्वारा पहचान की गई हो।
> प्रत्यार्पण करने वाले उग्रवादियों द्वारा संगठन के संबंध में सभी जानकारियों का खुलासा करने संबंधित आपराधिक मामलों के संबंध में सभी तथ्य उपलब्ध कराने की स्थिति में ही उन्हें विशेष प्रोत्साहन दिया जाएगा। प्रोत्साहन की राशि सरकार द्वारा अनुमोदित पैकेज के अधीन होगी।
> प्रत्यार्पण पूर्ण रूपेण स्वैच्छिक तथा बिना किसी दबाव / उग्रवादी संगठन की प्रेरणा से होना आवश्यक है। 
> साधारणत: विशेष शाखा का प्रत्यार्पण संबंधित सभी पहलुओं का सत्यापन ही एकमात्र मानक होगा, किंतु विशेष परिस्थितियों में किसी भी प्रस्ताव के तथ्यों का सत्यापन सरकार अन्य स्रोतों से भी करा सकती है।
> उग्रवादियों द्वारा प्रत्यार्पण मंत्री /सांसद / विधायक / प्रमण्डलीय आयुक्त/प्रक्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक / पुलिस उप-महानिरीक्षक / जिला दंडाधिकारी / पुलिस अधीक्षक अथवा राज्य सरकार द्वारा मनोनीत पदाधिकारियों के समक्ष किया जा सकता है। ये पदाधिकारी समर्पणकर्ता उग्रवादियों को आवश्यक कानूनी कार्रवाई हेतु निकटवर्ती पुलिस स्टेशन या पुनर्वास केन्द्र कैंप / केन्द्र को सुपुर्द करेंगे, जहाँ उनके पुनर्वास योजना का सूत्रण / कार्यान्वयन किया जाएगा।
स्क्रीनिंग समिति
> प्रत्येक उग्रवादी के प्रत्यार्पण को स्वीकार करने के संबंध में निर्णय एक स्क्रीनिंग समिति द्वारा लिया जाएगा। इस समिति के अध्यक्ष जिला पुलिस अधीक्षक होंगे एवं अन्य सदस्य के रूप में जिला दण्डाधिकारी तथा पुलिस महानिदेशक, विशेष शाखा द्वारा एक एक पदाधिकारी मनोनीत किए जाएंगे।
पुनर्वास समिति
> प्रत्येक जिला में प्रत्यार्पण करने वाले उग्रवादियों के लिए जिला दण्डाधिकारी की अध्यक्षता में जिला पुनर्वास समिति गठित होगी, जिसके सदस्य सचिव, जिला पुलिस अधीक्षक होंगे तथा उप विकास आयुक्त, महाप्रबंधक, जिला उद्योग केन्द्र जिला के अग्रणी बैंक पदाधिकारी एवं समादेष्टा गृह रक्षावाहिनी के सदस्य होंगे। जिला पुनर्वास समिति द्वारा प्रत्येक प्रत्यार्पण कर चुके उग्रवादी के संबंध में निम्नांकित तथ्यों को ध्यान में रखकर पुनर्वास पैकेज तैयार किया जाएगा"
(क) उग्रवादी की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि।
(ख) उम्र ।
(ग) उनके सामान्य शैक्षणिक एवं तकनीकी योग्यता ।
(घ) पुनर्वासन हेतु उपलब्ध विकल्पों के संबंध में उसकी प्राथमिकता ।
(ड.) प्रस्तावित पुनर्वास पैकेज की संभाव्यता |
> पुनर्वास पैकेज के सूत्रण के संबंध में पुनर्वास समिति द्वारा पेशेवर सहायता एन.जी.ओ./ परामर्शी से प्राप्त की जा सकती है।
> जिला पुनर्वास समिति द्वारा सूत्रण किए गए प्रत्यार्पित उग्रवादी निर्दिष्ट, पुनर्वास पैकेज को पुलिस महानिदेशक के माध्यम से राज्य सरकार के पास अनुशंसा के साथ भेजा जाएगा।
पुनर्वास पैकेज
> पुनर्वास पैकेज के अवयव के रूप में नीचे अंकित सुविधाओं को अंकित किया जाएगा» पुनर्वास अनुदान 2,50,000/- रूपये (दो लाख पचास हजार रूपये) होगा, जिसमें से 50,000/- रूपये (पचास हजार) का भुगतान तत्काल प्रत्यार्पण के उपरांत किया जाएगा तथा शेष 2,00,000/- रूपये (दो लाख) का भुगतान दो बराबर किस्तों में होगा, जिसकी पहली किस्त एक वर्ष बाद तथा दूसरी किस्त दो वर्ष बाद प्रत्यार्पित उग्रवादी की गतिविधियों की छानबीन विशेष शाखा द्वारा किए जाने के पश्चात् देय होगी।
> पुनर्वास समिति द्वारा 3000/- रूपये प्रतिमाह की वृत्ति पर एक वर्ष तक के व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाएगी। विशेष परिस्थिति में व्यावसायिक प्रशिक्षण की अवधि एक अतिरिक्त वर्ष तक के लिए विस्तारित की जा सकेगी।
> अधिकतम 4 डिसमील जमीन गृह निर्माण हेतु आवंटित की जाएगी।
> प्रत्यार्पण करने वाले उग्रवादी को एक आवास निर्माण हेतु अधिकतम 50,000/- ( पचास हजार ) रूपये की राशि दी जाएगी।
> राज्यांतर्गत सरकारी चिकित्सा संस्थानों में उग्रवादी एवं उसके परिवार को निःशुल्क चिकित्सा की व्यवस्था की जाएगी। 
> सरकारी विद्यालयों में उग्रवादी स्वयं एवं उसके पुत्र तथा पुत्रियों को मैट्रिक तक की शिक्षा निःशुल्क प्रदान की जाएगी। 
> मुख्यमंत्री कन्यादान योजनांतर्गत महिला उग्रवादी एवं उग्रवादियों की पुत्रियों के वैवाहिक कार्यक्रम हेतु अनुदान राशि दी जाएगी।
> यदि प्रत्यार्पण करने वाले उग्रवादी से सिर पर उसके मारे जाने या गिरफ्तार होने पर कोई सरकारी इनाम घोषित हो, तो समर्पण के उपरांत घोषित इनाम राशि उन्हें ही प्रदान कर दी जाएगी। संगठन के विभिन्न पदाधिकारीयों के समर्पण करने पर घोषित इनाम की राशि परिशिष्ट- क के अनुरूप भुगतान की जाएगी। 
> समर्पण के उपरांत यदि समर्पणकर्ता को उग्रवादियों द्वारा मारा जाता है, तो उसके परिवार को सरकारी संकल्प सं.-423 दिनांक 16.02.2006 तथा 369 दिनांक 24.01.2008 के आलोक में लाभों का भुगतान किया जाएगा, यथा- 1,00,000/- (एक लाख) रूपये का अनुदान एवं उसके एक सुयोग्य आश्रित को सरकारी नौकरी दी जाएगी, भले ही मृतक का प्रत्यार्पण के पूर्व आपराधिक इतिहास रहा हो।
> राष्ट्रीय/सहकारी बैंक से स्वनियोजन हेतु 2,00,000/- (दो लाख) रूपये तक के लिए ऋण प्राप्ति में सहायता देगी। ऋण से प्राप्त राशि पर देय ब्याज के विरूद्ध सरकार 50 प्रतिशत की सीमा तक अधिकतम 50,000/- (पचास हजार ) रूपये की राशि की प्रतिपूर्ति करेगी।
> अथवा
> शारीरिक मापदण्डों को पूरा करने वाले प्रत्यार्पित उग्रवादियों को पुलिस / गृह रक्षक / विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में नियुक्ति पर विचार किया जा सकता है। महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक को विशेष परिस्थितियों में निर्धारित शारीरिक मापदण्ड को शिथिल करने की शक्ति होगी।
> राज्य सरकार द्वारा प्रत्यार्पित उग्रवादी को 5,00,000/- ( पांच लाख ) रूपये की जीवन बीमा कराई जाएगी एवं इसके लिए आवश्यक प्रीमियम का भुगतान किया जाएगा।
> प्रत्यार्पित उग्रवादी के आश्रितों के लिए ( परिवार के अ तर सदस्यों लिए) 1,00,000/- (एक लाख) रूपये का समूह जीवन बीमा भी कराया जाएगा।
> प्रत्यार्पित उग्रवादी की संपत्ति को उग्रवादियों द्वारा क्षतिग्रस्त किए जाने की स्थिति में क्षति का आकलन पुनर्वास समिति द्वारा कर क्षतिपूर्ति की जाएगी।
> पुनर्वास पैकेज को अंतिम रूप से गृह विभाग, झारखण्ड द्वारा अनुमोदित किया जाएगा।
> यदि प्रत्यार्पणकर्ता कालांतर में पुन: उग्रवादी गतिविधि में संलिप्त हो जाता है, तो पुनर्वास पैकेज के अंतर्गत भुगतेय सभी लाभ राज्य सरकार या बैंक (यदि ऋण का भुगतान नहीं किया गया हो) द्वारा स्वतः जब्त कर लिया जाएगा। परोक्ष रूप से प्रत्यार्पणकर्ता के उग्रवादी गतिविधि में संलिप्त होने या नहीं होने के बिन्दु पर अंतिम निर्णय राज्य सरकार के स्तर से होगा।
न्यायालय संबंधी मामले
> प्रत्यार्पित उग्रवादी के विरूद्ध लंबित जघन्य आपराधिक मामलों को विधि के अनुसार निष्पादित किया जाएगा। अन्य अपराधों के लिए समर्पणकर्ता को प्ली बारगेनिंग (Plea Bargaining) का विकल्प रहेगा। 
> प्रत्यार्पित उग्रवादी को अपना मुकदमा लड़ने के लिए सरकार की ओर से निःशुल्क वकील की व्यवस्था की जाएगी।
> न्यायिक प्रावधान के तहत आवश्यकता शर्त पूरा करने की स्थिति में सरकार द्वारा राजसाक्षी (Approver) बनाने/महिला एवं नाबालिग होने की स्थिति में प्रचलित विधि सम्मत कार्रवाई की जा सकती है। प्रत्यार्पित उग्रवादी के विरूद्ध लंबित मुकदमे के शीघ्रताशीघ्र निष्पादन हेतु विशेष न्यायालय (फास्ट ट्रैक कोर्ट) गठित किया जाएगा।
> प्रत्यार्पित उग्रवादी द्वारा उग्रवादी गतिविधि में सम्मिलित होने के पीछे लंबित भू-विवाद का कारण होने की स्थिति में संबंधित भूमि विवाद के मामलों का निपटारा प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध न्यायालयों से कराया जाएगा।
> समर्पण किए गए सक्रिय हथियारों, गोला-बारूद, विस्फोटक सामग्री आदि एवं संबंधित उग्रवादी के सिर पर घोषित सरकारी इनामों को छोड़कर समर्पणकर्ता यदि पति एवं पत्नी दोनों हों, तो पुनर्वास पैकेज के अंतर्गत उन्हें एक यूनिट ही माना जाएगा।
> राज्य सरकार प्रत्येक वर्ष इस योजना के कार्यान्वयन की समीक्षा करेगी तथा आवश्यकतानुसार संशोधन करेगी। 
> राज्य सरकार में आवश्कतानुसार विशेष परिस्थितियों में उपर्युक्त प्रावधानों में संशोधन की शक्ति निहित होगी।
नक्सलियों के प्रत्यार्पण एवं पुनर्वास हेतु नई नीति 2015 (New Surrender and Rehabilitation Policy for Naxals - 2015) 
> राज्य सरकार द्वारा वामपंथी उग्रवादियों के प्रत्यार्पण एवं पुनर्वास नीति को अधिक आकर्षक बनाने के उद्देश्य से 2009 की प्रत्यार्पण एवं पनुर्वास नीति में 2015 में संशोधन किया गया है, जो इस प्रकार हैं
1. नक्सलियों का श्रेणी- 'ए' एवं श्रेणी 'बी' में वर्गीकरण किया जाएगा। जोनल कमांडर एवं उससे ऊपर के स्तर के नक्सलियों को श्रेणी- 'ए' में रखा जाएगा तथा इन्हें पुनर्वास अनुदान के रूप में कुल ₹5,00,000 रूपये का भुगतान किया जाएगा। इसमें से ₹1,00,000 की राशि का भुगतान तत्काल प्रत्यार्पण के उपरांत किया जाएगा तथा शेष ₹4,00,000 की राशि का भुगतान दो बराबर किस्तों में होगा, जिसकी पहली किस्त 1 वर्ष के बाद तथा दूसरी किस्त 2 वर्ष के बाद विशेष शाखा द्वारा प्रत्यार्पित उग्रवादी की गतिविधियों की छानबीन के बाद की जाएगी।
इसी प्रकार श्रेणी - 'बी' में जोनल कमांडर से नीचे के स्तर के नक्सलियों को रखा जाएगा तथा इन्हीं पुनर्वास अनुदान के रूप में कुल ₹2,50,000 रूपये का भुगतान किया जाएगा। इसमें से ₹50,000 की राशि का भुगतान तत्काल प्रत्यार्पण के उपरांत किया जाएगा तथा शेष ₹2,00,000 की राशि का भुगतान दो बराबर किस्तों में होगा, जिसकी पहली किस्त 1 वर्ष के बाद तथा दूसरी किस्त 2 वर्ष के बाद विशेष शाखा द्वारा प्रत्यार्पित उग्रवादी की गतिविधियों की छानबीन के बाद की जाएगी।
2. नक्सलियों को पुनर्वास परिषद् द्वारा प्रतिमाह ₹5,000 की वृत्ति पर एक वर्ष हेतु व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा जिसकी अवधि को विशेष परिस्थिति में एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा। 
3. प्रत्यार्पित नक्सलियों अथवा उनके बच्चों को स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण करने हेतु अधिकतम ₹25,000 का वार्षिक भुगतान किया जाएगा। यह भुगतान प्रत्येक तिमाही में संबंधित शिक्षण संस्थानों को अग्रिम के रूप में किया जाएगा।
4. प्रत्यार्पित नक्सलियों के अच्छे आचरण के आधार पर उनके ऊपर चल रहे मुकदमें की पैरवी हेतु वकीलों पर उनके द्वारा किए जानेवाले व्यय की प्रतिपूर्ति/व्यय हेतु राशि के भुगतान हेतु पुलिस मुख्यालय, राँची द्व रा प्रस्ताव राज्य सरकार के गृह विभाग को उपलब्ध कराया जाएगा।
नक्सली हिंसा में मृत नागरिकों के आश्रितों हेतु अनुग्रह राशि से संबंधित संकल्प
> वर्ष 2006 में राज्य सरकार द्वारा उग्रवादी व आतंकवादी हिंसा में मारे जाने वाले सामान्य नागरिकों के आश्रितों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से अनुग्रह राशि प्रदान करने के संबंध में निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं
1. इस प्रकार की हिंसा में मारे जाने वाले सामान्य नागरिकों के आश्रितों को अनुग्रह राशि के तौर पर ₹1,00,000 रूपये प्रदान किया जाएगा।
2. इस प्रकार की हिंसा में स्थायी रूप से अपंग हुए व्यक्ति को ₹50,000 रूपये की अनुग्रह राशि प्रदान की जाएगी।
3. इस प्रकार की हिंसा में गंभीर रूप से घायल हुए व्यक्ति को अनुदान तथा सरकारी एवं सरकार द्वारा संचालित अनुसूचित अस्पतालों में नि:शुल्क चिकित्सा प्रदान की जाएगी।
कर्तव्य निर्वाह के दौरान उग्रवादी गतिविधियों में मारे गए पुलिसकर्मियों व सरकारी सेवकों हेतु अनुग्रह अनुदान
> कर्तव्य निर्वाह के दौरान उग्रवादी गतिविधियों में मारे गए पुलिसकर्मियों व सरकारी सेवकों के आश्रितों को सरकार द्वारा ₹10,00,000 रूपये की अनुग्रह राशि प्रदान की जाती है। 
> उग्रवादी गतिविधियों के दौरान मारे जाने वाले केन्द्रीय अर्द्धसैनिक बल के कर्मी के आश्रितों को केन्द्र सरकार द्वारा ₹7,50,000 की अनुग्रह राशि प्रदान की जाती है। राज्य में प्रतिनियुक्त ऐसे कर्मियों को झारखण्ड सरकार द्वारा ₹2,50,000 रूपये की अनुग्रह राशि प्रदान की जाती है ताकि उग्रवादी गतिविधियों में मारे जाने वाले राज्यकर्मियों की भांति ही इन्हें एकसमान अनुग्रह राशि के रूप में ₹10,00,000 लाख प्राप्त हो सके।
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Sun, 09 Jul 2023 10:32:58 +0530 Jaankari Rakho
विस्थापन एवं पुनर्वास नीति https://m.jaankarirakho.com/विस्थापन-एवं-पुनर्वास-नीति https://m.jaankarirakho.com/विस्थापन-एवं-पुनर्वास-नीति > झारखण्ड की विस्थापन एवं पुनर्वास नीति का प्रकाशन झारखण्ड सरकार के गजट में 25 जुलाई, 2008 को किया गया था।
> झारखण्ड की विस्थापन एवं पुनर्वास नीति कुल 9 अध्याय में विभाजित है। इस नीति के महत्वपूर्ण बिन्दुओं को यहाँ शामिल किया गया है।
अध्याय-1  प्रस्तावना
> झारखण्ड राज्य के ऐतिहासिक घटनाओं का पुनराविलोकन करने पर यह महसूस होता है कि झारखण्ड के लोगों विशेषकर आदिवासी प्रमुखों द्वारा कई विद्रोह किए गए, क्योंकि वे अपनी सभ्यता एवं रीति-रिवाजों में बाहरी हस्तक्षेप के विरूद्ध आक्रोशित थे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आदिवासियों एवं स्थानीय व्यक्तियों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए अलग राज्य की माँग की, जिसके लिए लंबा संघर्ष चलाया। परिणामस्वरूप अंततः 15 नवंबर, 2000 में अलग राज्य की परिकल्पना साकार हुई।
> प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण राज्य के लोगों की सोच थी कि राज्य के औद्योगिकीकरण से झारखण्ड के लोगों का भविष्य सुनहरा होगा। पूर्व में भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 एवं Coal Bearing Areas (A & D) Act, 1957 के अंतर्गत उद्योगों, डैमों एवं खानों की स्थापना हेतु काफी भूमि अर्जित की गई। भूमि अधिग्रहण से काफी बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए और अपनी वन, भूमि, जल संसाधन, सामुदायिक पहचान एवं जीविकोपार्जन खो बैठे।
> अतः औद्योगिकीकरण एवं उद्योग इत्यादि के लिए भूमि अधिग्रहण के परिप्रेक्ष्य में आवश्यक है कि वर्तमान स्थिति का आकलन करते हुए उपर्युक्त पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास नीति तैयार की जाय, जिससे पूँजी निवेशकों के साथ-साथ उससे प्रभावित लोगों का भी कल्याण सुनिश्चित हो सके।
> विगत 60-70 वर्षों में रोजगार के लिए झारखण्ड में आनेवाले लोगों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, जिससे झारखण्ड के लोगों की विशेषकर आदिवासी लोगों की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक पहचान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
> झारखण्ड राज्य की जनसंख्या में आदिवासियों की जनसंख्या वर्ष 1931 में 50 प्रतिशत से घटकर 2011 में लगभग 26.3 प्रतिशत हो गया है।
> राज्य में आदिवासियों की जनसंख्या घटने के कारण विधानसभा में अनुसूचित जनजाति के सदस्यों की आरक्षित सीटों की संख्या घटकर 1971 में 32 से 28 हो गई । इसी तरह लोकसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 7 से घटकर 5 हो गई।
> सार्वजनिक सुविधाओं एवं आधारभूत संरचना की व्यवस्था करते हुए निजी संपत्ति के अर्जन करते समय 'सर्वोपरि अधिकार' के सिद्धांत के अंतर्गत राज्य के द्वारा कभी-कभी विधिक शक्तियों का प्रयोग करना अपेक्षित होता है। इससे लोगों को भूमि, जीविका, आश्रयस्थल छोड़ना पड़ता है, जिसके कारण इन लागों पर मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव पड़ता है। इसका प्रभाव सबसे ज्यादा अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, सीमांत किसानों, महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों पर पड़ता है।
> पुनर्वास और पुनर्स्थापन संबंधी मुद्दों को बाह्य रूप से आरोपित आवश्यकताओं की अपेक्षा प्रभावित व्यक्तियों की सक्रिय भागीदारी के साथ तैयार की गई विकासात्मक प्रक्रिया के एक मूलभूत अंग के रूप में स्वीकार करना एक अनिवार्य आवश्यकता है। अनैच्छिक विस्थापन द्वारा प्रतिकूल रूप से प्रभावित परिवारों को आर्थिक मुआवजे के अलावा अतिरिक्त लाभ प्रदान करने होंगे। उन लोगों की स्थिति और भी खराब होती है, जो भूमि के संबंध में विधिक अथवा मान्यता प्राप्त अधिकार नहीं रखते हैं, जैसे- गैरमजरूआ एवं वनभूमि धारक, जिस पर वे अपने जीविकोपार्जन के लिए पूर्णतया आश्रित रहते हैं। इस प्रकार योजनाकर्त्ताओं के लिए विस्थापन एवं पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्रक्रिया में उन लागों को भी शामिल करने की आवश्यकता है, जो ऐसी संपत्तियों के अर्जन से प्रभावित होते हैं।
> उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में विगत वर्षों में झारखण्ड में पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास नीति की अधिक आवश्यकता महसूस हुई।
अध्याय-2 उद्देश्य
> झारखण्ड पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति के उद्देश्य निम्नवत् हैं
1. जहाँ तक संभव हो, न्यूनतम विस्थापन, विस्थापन न करने अथवा कम-से-कम विस्थापन करने के विकल्पों को बढ़ावा देना ।
2. प्रभावित व्यक्तियों की सक्रिय भागीदारी के पर्याप्त पुनर्वास पैकेज सुनिश्चित करना तथा पुनर्वास की प्रक्रिया का तेजी से कार्यान्वयन सुनश्चित करना।
3. समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के अधिकारों की सुरक्षा करने तथा उनके उपचार के संबंध में ध्यानपूर्वक तथा संवेदनशीलता के साथ कार्रवाई किए जाने पर विशेष ध्यान रखने को सुनिश्चित करना।
4. प्रभावित परिवारों के बेहतर जीवन स्तर उपलब्ध कराने तथा सतत् रूप से आय मुहैया कराने हेतु संयुक्त प्रयास करना।
5. पुनर्वास कार्यों को विकास योजनाओं तथा कार्यान्वयन प्रक्रिया के साथ एकीकृत करना ।
6. जहाँ तक विस्थापन भूमि-अर्जन के कारण होता है, वहाँ पर अर्जनकारी निकाय तथा प्रभावित परिवारों के बीच आपसी सहयोग के जरिये सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना ।
अध्याय - 3 परिभाषाएँ
> इस नीति में प्रयोग की गई विभिन्न अभिव्यक्तियों की प्रमुख परिभाषाएं निम्नानुसार हैं:
> प्रभावित परिवार - ऐसा परिवार जिसकी संपत्ति किसी परियोजना हेतु भूमि अर्जन किये जाने या अन्य कारण से अनैच्छिक विस्थापन द्वारा प्रभावित हुई है।
> प्रभावित क्षेत्र - ऐसा क्षेत्र जहाँ किसी परियोजना हेतु भूमि अर्जन या अन्य कारण से एक सौ अथवा अधिक परिवारों के विस्थापन की संभावना है।
> कृषि श्रमिक- ऐसा व्यक्ति जो प्रभावित क्षेत्र की घोषणा की तारीख से पूर्व कम से कम अनुसूचित क्षेत्र में 30 वर्षो से तथा गैर - अनुसूचित क्षेत्र में 15 वर्षों से निवास कर रहा हो तथा उस क्षेत्र में शारीरिक श्रम द्वारा कृषि भूमि अर्जित करता हो ।
> कृषि भूमि - ऐसी भूमि जिसका प्रयोग कृषि या बागवानी, डेयरी उद्योग, मुर्गी पालन, मत्स्यन, रेशम उत्पादन अथवा औषधीय जड़ी-बूटियों के उत्पादन हेतु नर्सरी के रूप में, पशुओं की चराई हेतु, घास उगाने आदि के लिए किया जाता है।
> विस्थापन- वास - भूमि अथवा आवासीय स्थान को खो देना ।
> परिवार - एक व्यक्ति, उसकी पत्नी या उसका पति, अविवाहित पुत्र, अविवाहित पुत्रियाँ, अविवाहित भाई, अविवाहित बहनें शामिल हैं। इसमें "एकल परिवार" के अंतर्गत एक व्यक्ति, उसकी पत्नी/उसका पति तथा अवयस्यक बच्चे शामिल हैं। "पृथक परिवार" के तहत 30 वर्ष से अधिक उम्र के अविवाहित पुरूष या महिला, शारीरिक या मानसिक रूप से 40 प्रतिशत से अधिक अपंग व्यक्ति, नाबालिग अनाथ जिसने माता-पिता दोनों खो दिया हो या विधवा होंगे।
> ग्राम-सभा- झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम, 2001 में परिभाषित ग्राम सभा ।
> जोत क्षेत्र - किसी एक व्यक्ति द्वारा दखलकार या काश्तकार के रूप में अथवा दोनों ही रूपों में धारित कुल भूमि।
> रैयत - ऐसा व्यक्ति जिसका नाम संदर्भित भूमि के खंड से संबंधित राजस्व अभिलेख में शामिल है। 
> भूमि अर्जन – भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 या राज्य सरकार के किसी अन्य कानून के अंतर्गत अर्जित भूमि। 
> निगम क्षेत्र - झारखण्ड नगर निगम अधिनियम, 2001 में परिभाषित निगम क्षेत्र । 
> अधिभोगीअनुसूचित जनजाति समुदाय एवं अन्य वनवासी समुदाय का ऐसा सदस्य जो 13 दिसम्बर, 2005 से पहले वन भूमि पर कब्जा रखता हो ।
> परियोजना - ऐसी परियोजना जिसमें भूमि अधिग्रहण के फलस्वरूप अनैच्छिक विस्थापन सम्मिलित हो । 
> अर्जनकारी निकाय- ऐसी कम्पनी, एक निगमित निकाय, एक संस्था अथवा कोई अन्य संगठन जिसके लिए राज्य सरकार द्वारा भूमि का अर्जन किया जाता है।
> पुनर्स्थापन क्षेत्र - ऐसा क्षेत्र जिसे राज्य सरकार द्वारा इस नीति के तहत् पुनर्स्थापन क्षेत्र घोषित किया गया हो। 
अध्याय - 4 परियोजनाओं का सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन
> जब भी कोई नई परियोजना शुरू करने अथवा किसी विद्यमान परियोजना का विस्तार करने की इच्छा की जाती है, जिसके अंतर्गत किसी भी क्षेत्र में सामूहिक रूप से एक सौ अथवा अधिक परिवारों का अनैच्छिक विस्थ ापन शामिल हो, तो प्रशासक, पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास में यह सुनिश्चित करेगा कि प्रस्तावित प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन किया जाए।
> सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन करते समय इस बात को ध्यान में रखा जाएगा कि परियोजना का सार्वजनिक व सामुदायिक संपत्तियों, परिसंपत्तियों और आधारिक ढांचे, सामुदायिक तालाब, चारागाह, भूमि, चारे के लिए भूमि, पौधारोपण, उचित दर की दुकानें, पंचायत घर, सहकारी समितियां, सार्वजनिक उपयोगिताओं जैसे- डाकघर, बीज भंडार, सिंचाई, बिजली, स्वास्थ्य केन्द्र, पार्क, प्रशिक्षण केन्द्र, सामुदायिक केन्द्र, पूजा स्थल, कब्रगाह, श्मशान आदि एवं जनजातीय संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
> ऐसे मामलों जिनमें पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) तथा सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (SIA) दोनों ही किए जाने अपेक्षित हों, उनमें पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के लिए परियोजना प्रभावित क्षेत्र में की गई जन-सुनवाई के अंतर्गत सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन से संबंधित मामलों को भी शामिल किया जाएगा। ऐसी जन-सुनवाई का कार्य 30 दिनों के अंदर पूरा कर लिया जाएगा।
> सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन (SIA) स्वीकृति उन सभी मामलों में अनिवार्य होगी, जिनमें सामूहिक रूप में किसी भी क्षेत्र में 100 या उससे अधिक परिवारों का अनैच्छिक विस्थापन होता है तथा सभी संबंधित पक्षों द्वारा SIA की स्वीकृति में निर्धारित की गई शर्तों का विधिवत रूप से पालन किया जाएगा। भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई के पूर्व अधियाची निकाय को इस पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति के प्रावधानों का विधिवत रूप से पालन करने की लिखित रूप से वचनबद्धता प्रमाण-पत्र देना होगा।
अध्याय-5 पुनर्स्थापन तथा पुनर्वास प्रशासक तथा आयुक्त की नियुक्ति तथा उनकी शक्तियाँ और कार्य
> जहाँ पर राज्य सरकार इस बात से संतुष्ट हो कि किसी परियोजना के लिए भूमि अर्जन अथवा किसी अन्य कारण से 100 या अधिक परिवारों का अनैच्छिक विस्थापन होने की संभावना है, तो राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा उपायुक्त के स्तर से अन्यून स्तर के किसी अधिकारी को पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक के रूप नियुक्त करेगी। सामूहिक रूप से 100 से कम परिवारों के विस्थापन वाली परियोजनाओं के मामले में उपायुक्त इस नीति के अधीन प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास के लिए जिम्मेदार होंगे।
> पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास प्रशासक की सहायता राज्य सरकार द्वारा निर्णीत अधिकारी एवं कर्मचारियों द्वारा की जाएगी।
> पुनर्वास आयुक्त के पर्यवेक्षण, निर्देशों तथा नियंत्रण के अध्ययीन पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक प्रभावित परिवारों के विस्थापन और पुनर्वास के लिए सभी उपाय करेगा।
> पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास योजना तैयार करने, निष्पादित करने और उसकी निगरानी करने के संबंध में समग्र नियंत्रण और पर्यवेक्षण की शक्ति पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासकों में निहित होगी।
> राज्य सरकार के किसी सामान्य अथवा विशेष आदेशों के अधीन पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक निम्नलिखित कार्य और कर्त्तव्य को संपन्न करेगा
1. अर्जनकारी निकाय के परामर्श से व्यक्तियों का न्यूनतम विस्थापन और ऐसे विकल्पों का पता लगाना, जिनसे विस्थापन न हो अथवा कम-से-कम विस्थापन हो ।
2. पुनर्वास और पुनर्स्थापन स्कीम तैयार करते समय प्रभावित व्यक्तियों एवं संबंधित ग्राम सभाओं के साथ परामर्श करना।
3. यह सुनिश्चित करना कि अनुसूचित जनजातियों और कमजोर वर्ग के प्रतिकूल रूप से प्रभावित व्यक्तियों के हितों का सर्वेक्षण हो ।
4. इस नीति के अंतर्गत पुनर्स्थापन और पुनर्वास स्कीम के लिए योजना का प्रारूप तैयार करना। 
5. प्रभावित परिवारों, संबंधित ग्रामसभा और अर्जनकारी निकाय के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श से भूमि अर्जन के विभिन्न घटकों, पुनर्स्थापन और पुनर्वास कार्यकलापों अथवा कार्यक्रमों के लिए अनुमानित व्यय सहित बजट तैयार करना ।
6. प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास के लिए पर्याप्त भूमि की व्यवस्था करना । 
7. प्रभावित परिवारों हेतु लाभ स्वीकृत करना ।
8. ऐसे अन्य कार्य निष्पादित करना जिन्हें राज्य सरकार लिखित में आदेश द्वारा समय-समय पर सौंपती है। 
> प्रशासक अपने कार्यों के सम्पादन के लिए किसी तकनीकी विशेषज्ञ/संस्थान से अपेक्षित सहयोग ले सकेगा जिस पर व्यय का वहन अधियायी निकाय द्वारा किया जाएगा।
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक लिखित रूप में आदेश के द्वारा उसे प्रदत्त ऐसी प्रशासनिक शक्तियों और सौंपे गए कर्त्तव्यों को अंचलाधिकारी से अन्यून पद के किसी अधिकारी अथवा समकक्ष अधिकारी को प्रत्यायोजित कर सकता है।
> इस नीति के तहत राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किए गए सभी अधिकारी और कर्मचारी पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक के अधीनस्थ होंगे।
> राज्य सरकार इस नीति के तहत पुनर्स्थापन और पुनर्वास के सभी मामलों के लिए सरकार के आयुक्त अथवा समकक्ष स्तर के किसी अधिकारी को नियुक्त करेगी जिसे पुनर्स्थापन और पुनर्वास आयुक्त कहा जाएगा। 
> इस नीति को लागू करने हेतु नियुक्त प्रशासनिक तथा अन्य अधिकारी और कर्मचारी पुनर्स्थापन और पुनर्वास आयुक्त के अधीन होंगे।
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास आयुक्त इस नीति के तहत स्कीमों को तैयार करने तथा योजनाओं के समुचित कार्यान्वयन का पर्यवेक्षण करने हेतु उत्तरदायी होगा।
अध्याय - 6 पुनर्स्थापन तथा पुनर्वास योजना
> इस अध्याय में उल्लिखित प्रक्रिया का प्रभावित क्षेत्रों की घोषणा करने, सर्वेक्षण करने, प्रभावित व्यक्तियों की गणना करने, उपलब्ध सरकारी भूमि तथा पुनर्स्थापन और पुनर्वास के लिए व्यवस्था की जाने वाली भूमि का आकलन करने, पुनर्स्थापन क्षेत्र की घोषणा करने, स्कीम या योजना तैयार करने तथा इसके अंतिम रूप से प्रकाशन करने संबंधित सभी मामलों में अनुसरण किया जाएगा।
> किसी परियोजना के लिए भूमि के अर्जन अथवा किसी अन्य कारणवश सामूहिक रूप से किसी भी क्षेत्र में एक सौ अथवा अधिक परिवारों के अनैच्छिक विस्थापन की संभावना है, तो वह एस. आई. ए. स्वीकृति के 15 दिनों के अंदर आदेश के माध्यम से गांवों के क्षेत्र अथवा स्थानों को प्रभावित क्षेत्र घोषित करेगी।
> इस नीति के अंतर्गत की गई प्रत्येक घोषणा को कमम-सेसे कम तीन दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित किया जाएगा जिनमें से कम-से-कम दो हिन्दी भाषा में होंगे, जिनका प्रचालन गांवों मे अथवा उन क्षेत्रों में होता हो, जिनके प्रभावित होने की संभावना है।
>>इस नीति के अंतर्गत घोषणा किए जाने पर पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक प्रभावित होने वाले व्यक्तियों तथा परिवारों की पहचान करने के लिए आधारमूलक (बेसलाइन) सर्वेक्षण और गणना आयोजित करेगा।
> इस सर्वेक्षण में प्रभावित परिवारों के बारे में निम्नानुसार ग्रामवार सूचना दी जाएगी
1. परिवार के वे सदस्य जो प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं, कब से रह रहे हैं, किस व्यापार या कारोबार या पेशे में लगे हुए हैं।
2. कृषि श्रमिक अथवा गैर कृषि श्रमिक।
3. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति, आदिम जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित परिवार । 
4. दिव्यांग, निराश्रित, अनाथ, विधवाएँ, अविवाहित लड़कियाँ, परित्यक्त महिलाएँ अथवा ऐसे व्यक्ति जिनकी आयु 50 वर्ष से अधिक है, जिन्हें वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध नहीं कराई गई है अथवा तत्काल उपलब्ध नहीं कराई जा सकती है और जो अन्यथा परिवार के भाग के रूप में शामिल नहीं होते हैं।
5. ऐसे परिवार, जो भूमिहीन हैं तथा गरीबी रेखा से नीचे रहनेवाले, किंतु प्रभावित क्षेत्र की घोषणा की तारीख से पहले प्रभावित क्षेत्र में कम-से-कम गैर- अनुसूचित क्षेत्र में 15 वर्ष एवं अनुसूचित क्षेत्र में 30 वर्षों से अन्यून अवधि से लगातार रह रहे हैं तथा जो संबंधित ग्रामसभा द्वारा प्रमाणित हों।
6. अनुसूचति जनजातियों / अनुसूचित जातियों तथा अन्य वन क्षेत्र में बसे लोगों के ऐसे परिवार जिनके कब्जे में प्रभावित क्षेत्र में 13 दिसम्बर, 2005 से पहले वन भूमि थी ।
> इसके अंतर्गत किए जाने वाले प्रत्येक सर्वेक्षण को घोषणा की तारीख से 60 दिन की अवधि के भीतर पूरा किया जाना चाहिए
> उपर्युक्त सर्वेक्षण के पूरा हो जाने पर सात दिनों के अन्दर पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक, आदेश द्वारा सर्वेक्षण के निष्कर्षों के विवरण का मसौदा ऐसे ढंग से प्रकाशित करेगा जिससे कि प्रभावित होने वाले व्यक्तियों को इसकी सूचना प्राप्त हो सके तथा उससे प्रभावित हो सकने वाले सभी व्यक्तियों से आपत्तियाँ और सुझाव आमंत्रित किये जा सकें।
> सर्वेक्षण और ब्यौरों के मसौदे के प्रकाशन की तारीख से 15 दिन की अवधि समाप्त हो जाने पर और इस संबंध में उसे प्राप्त आपत्तियों और सुझावों पर विचार कर अगले 15 दिनों के अंदर पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक, सर्वेक्षण के ब्यौरों के साथ उसके संबंध में अपनी सिफारिश राज्य सरकार को प्रस्तुत करेंगे तथा इसकी एक प्रति आम सूचना हेतु संबंधित ग्रामसभा तथा पंचायत को भेजी जाएगी।
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक के सर्वेक्षण और सिफारिशों के ब्यौरों के प्राप्त होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर राज्य सरकार सर्वेक्षण के अंतिम ब्यौरों को शासकीय राजपत्र में प्रकाशित करेगी।
> पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास आयुक्त प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास के लिए सर्वेक्षण के ब्यौरों के राजपत्र में प्रकाशन के 15 दिनों के अंदर आदेश के द्वारा किसी क्षेत्र अथवा क्षेत्रों को पुनर्स्थापन क्षेत्र के रूप में घोषित करेगा। पुनर्स्थापन क्षेत्र परियोजना टाउनशिप में अथवा उससे सटे हुए होंगे।
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास आयुक्त के द्वारा यथा अनुमोदित पुनर्स्थापन कार्य के पूरा होने के पूर्व कोई भौतिक विस्थापन नहीं किया जाएगा। पुनर्स्थापन के संपन्न होने का प्रमाण पत्र पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक द्वारा संबंधित ग्रामसभा से परामर्श कर निर्गत किया जाएगा। परन्तु प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन हेतु ऐसी भूमि का उपयोग किया जा सकेगा जहाँ भवन आदि अवस्थित न हों।
> पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास प्रशासक उन भूमि की एक सूची तैयार करेगा जो प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास के लिए उपलब्ध हो सके। तैयार भूमि की सूची में निम्नलिखित सम्मिलित होंगे
1. परियोजना के लिए उपलब्ध अथवा अर्जित भूमि और इस प्रयोजन के लिए निर्धारित भूमि ।
2. सरकारी बंजर भूमि और कोई अन्य भूमि, जो सरकार में विहित हो तथा प्रभावित परिवारों को आवंटन हेतु उपलब्ध हो ।
3. पुनर्स्थापन और पुनर्वास स्कीम अथवा योजना के प्रयोजनार्थ खरीद अथवा अर्जन के लिए उपलब्ध 
भूमि । 
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक राज्य सरकार की ओर से पुनर्स्थापन और पुनर्वास स्कीम के प्रयोजनों के लिए सहमति निर्णय के जरिए या तो किसी व्यक्ति से भूमि खरीद सकता है और इस प्रयोजन के लिए करार कर सकता है अथवा भूमि के अर्जन के लिए राज्य सरकार को कह सकता है।
> प्रभावित परिवारों के आधारिक सर्वेक्षण और गणना तथा पुनर्स्थापन के लिए भूमि की आवश्यकता के आकलन का कार्य पूरा होने के पश्चात् पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक महिलाओं सहित प्रभावित परिवारों के प्रतिनिधियों के साथ तथा अर्जनकारी निकाय के प्रतिनिधि के साथ परामर्श करने के पश्चात् प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास के लिए स्कीम या योजना का प्रारूप तैयार करेगा।
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास स्कीम या योजना के विवरण में निम्नलिखित विवरण होगा
(क) परियोजना के लिए अर्जित की जाने वाली भूमि का क्षेत्रफल और प्रभावित गांवों के नाम।
(ख) प्रभावित व्यक्तियों की ग्राम- वार, परिवार - वार सूची उम्र सहित प्रभावित क्षेत्र में उनके कब्जे में अथवा उनके स्वामित्व में भूमि और अचल संपत्ति की मात्रा और स्वरूप, जिसकी उनके द्वारा खोने की संभावना है। 
(ग) ऐसे क्षेत्र में कृषि श्रमि की सूची और ऐसे व्यक्तियों के नाम जिनकी आजीविका कृषि कार्यकलाप पर निर्भर है। 
(घ) ऐसे व्यक्तियों की सूची जिनका रोजगार अथवा आजीविका परियोजना के लिए भूमि अर्जन के फलस्वरूप समाप्त हो गई है।
(ड.) ऐसे शिल्पकारों सहित गैर-कृषि श्रमिकों की सूची ।
(च) बिना वास भूमि वाले और गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों सहित प्रभावित भूमिहीन परिवारों की सूची, जो ग्रामसभा से विमर्श कर पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक गरीबी रेखा से नीचे के सभी परिवारों की सूची में शामिल किया जाना सुनिश्चित करेगा।
(छ) भेद्द प्रभावित व्यक्तियों की सूची ।
(ज) अधिभोगियों की सूची, यदि कोई हो ।
(झ) जन-सुविधाओं और सरकारी भवनों की सूची जो प्रभावित है अथवा जिनके प्रभावित होने की संभावना है। 
(ञ) सार्वजनिक और सामुदायिक संपत्तियों और अवसंरचना का विवरण |
(ट) उन लाभों और पैकेजों की सूची, भूमि के आबंटन हेतु उपलब्ध भूमि की सूची, आधारभूत संरचनाओं का ब्यौरा जो प्रभावित परिवारों को प्रदान किया जाना है।
(ठ) विस्थापित व्यक्तियों को पुनर्स्थापन क्षेत्र में स्थानांतरित करने और बसाने की समय सूची, परियोजना क्षेत्र में पड़ने वाले सेवा भूमि जैसे- पहनई, महतो, मुण्डई, प्रधानी अथवा छोटानागपुर एवं संताल परगना काश्तकारी अधिनियम के अंतर्गत सेवा भूमि |
(ड) प्रभावित परिवारों के सदस्यों की शैक्षणिक योग्यता तथा परियोजना में उपलब्ध रोजगार के अवसर और उसकी पात्रता की योग्यता ।
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास संबंधी स्कीम या योजना के प्रारूप पर ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम सभाओं में और उन शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ पर ग्राम सभाएँ मौजूद न हों, जन सुनवाईयों में विचार-विमर्श किया जाएगा। 
> अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा अथवा पंचायतों के साथ समुचित स्तर पर परामर्श पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार) अधिनियम, 1996 के उपबंधों के अनुसार होगा।
> अनुसूचित क्षेत्रों में 100 या इससे अधिक अनुसूचित जनजातियों के परिवारों के अनैच्छिक विस्थापन के मामलों में जनजातीय सलाहकार परिषद् से परामर्श किया जाएगा।
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास लाभों पर होने वाला पूर्ण व्यय तथा प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास पर होने वाला अन्य व्यय अर्जनकारी निकाय द्वारा वहन किया जाएगा।
> संबंधित योजना या स्कीम की स्वीकृति दिये जाने से पूर्व राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी की स्वीकृति से पूर्व अर्जनकारी निकाय की सहमति हो गयी है तथा संबंधित लागत तथा अन्य व्यय वहन करने हेतु अर्जनकारी निकाय सहमत हो गया है।
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास स्कीम या योजना को स्वीकृति दिए जाने के पश्चात् राज्य सरकार इसे शासकीय राजपत्र में प्रकाशित करेगी। पुनर्स्थापन और पुनर्वास स्कीम या योजना की अंतिम अधिसूचना के पश्चात् यह लागू हो जाएगी।
> ऐसी परियोजनाओं के मामले में जिनमें अर्जनकारी निकाय की ओर से भूमि अर्जन शामिल है और यदि अर्जनकारी निकाय एक ऐसी कम्पनी है जिसे अंश और ऋणपत्र जारी करने का प्राधिकार प्राप्त है, तो ऐसे प्रभावित परिवारों, जो अर्जित की गई भूमि या संपत्ति के लिए प्रतिकर पाने के हकदार हैं, का अपने पुनर्वास अनुदान की राशि के पच्चीस प्रतिशत तक अर्जनकारी निकाय के अंश और ऋणपत्र अथवा दोनों को लेने का विकल्प दिया जाएगा।
> किसी परियोजना के लिए अनिवार्यतः अर्जित की गई भूमि को सार्वजनिक प्रयोजन के अलावा किसी अन्य प्रयोजन के लिए अंतरित नहीं किया जा सकता है और यह अंतरण राज्य सरकार के पूर्वानुमोदन के बाद किया जाएगा।
> यदि किसी परियोजना के लिए या उसके अंश के लिए अर्जित की गई भूमि अर्जनकारी निकाय द्वारा कब्जे में लेने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक परियोजना के लिए आंशिक रूप से तथा पंद्रह वर्षों की अवधि तक पूर्ण रूप से उपयोग में नहीं लायी जाती है, तो उस भूमि को उसके अर्जनकारी निकाय का कोई प्रतिकर या क्षतिपूर्ति की अदायगी किए बिना ही राज्य सरकार के कब्जे में और स्वामित्व में वापस कर दिया जाएगा। राज्य सरकार के द्वारा पश्चात् उस भूमि पर अन्य उपयोगी परियोजना स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा एवं ऐसा नहीं हो पाने की स्थिति में भूमि प्रभावित परिवारों को वापस कर दी जाएगी।
> अर्जनकारी निकाय को अधिग्रहीत भूमि के विक्रय का अधिकार नहीं होगा।
> यदि किसी सार्वजनिक प्रयोजन के लिए अर्जित भूमि को किसी व्यक्ति या संगठन को किसी प्रतिफल के बदले अंतरित किया जाता है, तो इससे प्राप्त राशि के अस्सी प्रतिशत भाग को उन व्यक्तियों के बीच वितरित किया जाएगा जिनसे भूमि का अर्जन किया गया था। राशि का वितरण उस अनुपात में किया जाएगा जिस पर भूमि अर्जित की गई थी।
अध्याय - 7 प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्स्थापन और पुनर्वास लाभ
> पुनर्स्थापन और पुनर्वास लाभ को सभी प्रभावित परिवारों के बीच वितरित किया जाएगा।
> ऐसे किसी भी प्रभावित परिवार, जिसके पास अपना घर हो और जिसका घर अधिग्रहीत कर लिया गया हो, को प्रत्येक एकल परिवार के लिए अर्जित किए गए भूमि के लिए ग्रामीण क्षेत्र में 10 डिसमील तथा शहरी क्षेत्र में 5 डिसमील तक आवास के लिए बिना किसी लागत के आवंटित की जाएगी।
> अर्जनकारी निकाय द्वारा आवंटित आवासीय स्थल में एक पक्का घर बनाया जाएगा जिसमें दो शयन कक्ष, एक ड्राइंग कक्ष, एक रसोईघर तथा एक शौचालय हो । इसका विस्तार शहरी क्षेत्र में 100 वर्गमीटर तथा ग्रामीण क्षेत्र में 150 वर्गमीटर होगा। यदि कोई व्यक्ति पुनर्वासित क्षेत्र में मकान न लेना चाहता हो, तो उसे एकमुश्त तीन लाख रूपये वित्तीय सहायता दी जाएगी।
> गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी के प्रत्येक परिवार जिनके पास वासभूमि नही हो और जो प्रभावित क्षेत्र की घोषणा की तारीख से पहले गैर-अनुसूचित क्षेत्र में 15 वर्षो से एवं अनुसूचित क्षेत्र में 30 वर्षों से लगातार रह रहा हो और अनैच्छिक रूप से विस्थापित हुआ हो, को पुनर्स्थापन क्षेत्र के ग्रामीण क्षेत्र में 55 वर्गमीटर विस्तार वाला क्षेत्र का मकान मुहैया कराया जा सकता है। ऐसे गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी के परिवारों के लिए बहुमंजिला भवनों का निर्माण कराया जा सकता है जिसमें भूतल पर आच्छादित क्षेत्रफल अधिकतम 50 प्रतिशत ही हो। परन्तु यदि कोई परिवार घर नहीं लेना चाहता है, तो उसे एकमुश्त दो लाख रूपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।
> प्रत्येक ऐसे प्रभावित परिवार जिसे सरकारी भूमि नहीं दी जा सके अथवा प्राप्त न करे, भूमि अर्जन के कारण खोई भूमि का 1/10वाँ अंश प्रस्तावित परियोजना या टाउनशिप अथवा इसके सटे हुए क्षेत्र में प्राप्त कर सकेगे। 
> प्रभावित परिवारों को आवंटित की गई भूमि अथवा घर के पंजीकरण के लिए अदा की जानेवाली स्टाम्प शुल्क तथा अन्य शुल्कों का वहन अर्जनकारी निकाय द्वारा किया जाएगा।
> इस नीति के अंतर्गत प्रभावित परिवारों को आवंटित भूमि या घर सभी प्रकार के ऋण भारों से मुक्त होंगे। 
> इस नीति के अंतर्गत प्रभावित परिवारों को आवंटित भूमि या घर प्रभावित परिवार के पति और पत्नी के संयुक्त नाम से होंगे। साथ ही मौद्रिक राशि का भुगतान पति और पत्नी के नाम से खोले गए संयुक्त खाते के माध्यम से किया जाएगा।
> विस्थापित परिवार के पास यदि पशु हो, तो पशुशाला के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता के रूप में पैंतीस हजार रूपये की राशि प्रदान की जाएगी।
> प्रत्येक विस्थापित परिवार अपने परिवार, भवन निर्माण सामग्री, अपने सामान तथा पशुओं के स्थानांतरण के लिए एक बार दी जाने वाली वित्तीय सहायता के रूप में पंद्रह हजार रूपये प्राप्त करेगा।
> प्रत्येक प्रभावित परिवार जिसकी पक्की दुकान या गुमटी है जिससे वह व्यवसाय करता है और विस्थापित हुआ है, कार्य शेड या दुकान के निर्माण हेतु एक बार में दी जाने वाली वित्तीय सहायता के रूप में पचास हजार रूपये प्राप्त करेगा।
> ऐसी परियोजना जिसमें अर्जनकारी निकाय की ओर भूमि का अर्जन शामिल हो, तो प्रभावित परिवारों के लिए निम्न व्यवस्थाएँ की जाएंगी
> वैसे प्रभावित परिवार जिनके भूमि का अधिग्रहण किया गया हो, अर्जनकारी निकाय निकाय एकल परिवार के कम-से-कम एक अहर्त्ता प्राप्त व्यक्ति को अनिवार्य रूप से परियोजना में रोजगार उपलब्ध कराना सुनिश्चित करेगा।
> अर्जनकारी निकाय प्रभावित व्यक्तियों के तकनीकी / व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए व्यवस्था करेगा ताकि ऐसे व्यक्तियों को प्राथमिकता के आधार पर परियोजना में उपर्युक्त कार्य के लिए सक्षम बनाया जा सके। 
> यदि प्रभावित परिवारों के नामित सदस्य अन्यथा नियोजन हेतु पात्र हों, तो आयु की ऊपरी सीमा दस वर्ष तक शिथिल कर दी जाएगी।
> उपलब्धता एवं उपयुक्तता के अधीन समस्त अकुशल नये रोजगार तथा परियोजना में सृजित अर्द्धकुशल नियोजन परियोजना प्रभावित परिवारों के सदस्यों को दी जाएगी।
> यदि प्रभावित परिवार के व्यक्ति की परियोजना में नौकरी के दौरान मृत्यु हो जाती है, तो उसके आश्रितों को परियोजना में अनुकंपा के आधार पर नौकरी दी जाएगी।
> यदि प्रभावित परिवार को परियोजना में रोजगार मुहैया नहीं कराया गया है अथवा कोई परिवार का सदस्य परियोजना में नियोजन का इच्छुक नहीं है, तो प्रभावित परिवार को प्रति एकड़ प्रति माह 1000 रूपये की राशि विस्थापन की तिथि से तीस वर्षों तक उपलब्ध कराई जाएगी। प्रत्येक दो वर्ष पर इस राशि में 500 रूपये की बढ़ोत्तरी की जाएगी।
> केन्द्र या राज्य सरकार के सार्वजनिक उपक्रम एजेंसी की परियोजनाओं को छोड़कर अन्य व्यावसायिक परियोजनाओं के मामले में परियोजना इकाई के वार्षिक शुद्ध आय का 1 प्रतिशत प्रभावित परिवारों के बीच मौद्रिक रूप में वितरित किया जाएगा। यह राशि वार्षिक वित्तीय परिणाम की घोषणा के तीन माह के अंदर वितरित किया जाएगा। 
> अर्जनकारी निकाय द्वारा अनैच्छिक रूप से विस्थापित परिवारों को विस्थापन की तारीख से एक वर्ष की अवधि के लिए प्रति माह 25 दिनों की न्यूनतम कृषि मजदूरी के बराबर मासिक जीविका भत्ता प्रदान किया जाएगा। 
> परियोजना प्राधिकारी अपनी लागत पर ऐसी वार्षिक पॉलिसियों की व्यवस्था करेंगे, जिसमें भेद्द प्रभावित व्यक्तियों को एक हजार पाँच सौ रूपये प्रति माह की राशि जीवनभर पेंशन के रूप में प्राप्त होंगे।
अनुसूचित जानजातियों और अनुसूचित जातियों से संबंधित परियोजना प्रभावित पुनर्स्थापन और पुनर्वास लाभ
> ऐसी परियोजना जिसमें 100 या इससे अधिक अनुसूचित जनजातियों के परिवारों का अनैच्छिक विस्थापन होता है, तो विशेष अभियान चलाकर प्राप्य भूमि अधिकारों को सुनिश्चित किया जाएगा तथा अंतरित भूमि पर जनजातीय लोगों के स्वामित्व अधिकार बहाल करने हेतु एक जनजातीय विकास योजना तैयार की जाएगी। इस योजना में पाँच वर्षों के भीतर उन जनजातीय समुदायों, जिन्हें वनों से प्राप्त होने वाले लाभों से वंचित रखा गया है, की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त वैकल्पिक ईंधन, चारा और गैर-इमारती लकड़ी जैसे वनोत्पाद संसाधनों के विकास हेतु कार्यक्रम भी शामिल होंगे।
> प्रभावित परिवारों से भूमि अर्जन किए जाने के किसी भी मामले में उन्हें प्राप्य प्रतिकर की राशि का कम-से-कम एकक-तिहाई प्रारंभ में प्रथम किस्त के रूप में अदा किया जाएगा और शेष राशि भूमि का कब्जा लेने के समय अदा की जाएगी।
> प्रभावित अनुसूचित जनजातीय परिवारों को जहाँ तक संभव हो, उसी अनुसूचित क्षेत्र में पुनः बसाया जाएगा। 
> ऐसे पुनर्स्थापन क्षेत्र जिनमें मुख्यतया अनुसूचित जनजाति के लोगों की बसावट हो, वहाँ पर सामुदायिक / धार्मिक सभाओं के लिए बिना लागत के भूमि उपलब्ध करायी जाएगी ।
> यदि प्रभावित अनुसूचित जनजाति / अनुसूचित जाति / अन्य पिछड़े वर्ग के परिवारों को जिले के बाहर पुनर्स्थापित किया गया है, तो पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास लाभ 25 प्रतिशत से अधिक मौद्रिक रूप में दिया जाएगा।
> जलविद्युत परियोजनाओं के मामले में प्रभावित परिवारों, जिन्हें प्रभावित क्षेत्र में नदी या तालाब या बाँध में मछली पकड़ने का अधिकार था, को जलविद्युत परियोजनाओं के क्षेत्र में स्थित जलाशयों में मछली पकड़ने के अधिकार दिए जाएंगे।
पुनर्स्थापन क्षेत्रों में उपलब्ध कराई जानेवाली उनमुक्तियाँ तथा अवसंरचनात्मक सुविधाएँ
> किसी भी क्षेत्र में 100 परिवारों या इससे अधिक परिवारों के सामूहिक रूप में अनैच्छिक विस्थापन के सभी मामलों में पुनर्स्थापन क्षेत्र में राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित विस्तृत आधारिक अवसंरचनात्मक सुविधाएँ तथा उनमुक्तियाँ उपलब्ध करायी जाएंगी।
> इस प्रकार की सुविधाओं और उनमुक्तियों में सड़कें, सार्वजनिक परिवहन, जल निकास, सफाई, पेयजल स्रोतों, पशुओं के लिए पेयजल स्रोतों, सामुदायिक तालाब, चारागाह भूमि पौधारोपण व सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी, उचित दर की दुकाने, पंचायत घर, सहकारी समितियाँ, डाकघर, बीज - सह - उर्वरक भंडार, सिंचाई, बिजली, स्वास्थ्य केन्द्र, शिशु - माता अनुपूरक पौषणिक सेवाएँ, बच्चों के लिए खेल मैदान, पार्क, सामुदायिक केन्द्र, प्रशिक्षण हेतु संस्थागत व्यवस्था, पूजा स्थल परंपरागत जनजातीय संस्थाओं के लिए भूमि कब्रगाह / श्मशान भूति तथा सुरक्षा व्यवस्थाएँ शामिल हैं। 
> राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी की पुनर्स्थापन क्षेत्र किसी ग्राम पंचायत अथवा किसी नगरपालिका का एक भाग बने।
> प्रभावित परिवारों को पुनर्स्थापन वासस्थल में जिला प्रशासन द्वारा आवंटित भूमि एवं आवास के स्वामित्व अधि. कार संबंधी कागजात हस्तगत करा दिए जाएंगे। जिला प्रशासन के द्वारा नए पुनर्स्थापन वासस्थल को राजस्व ग्राम के रूप में घोषित किया जाएगा, यदि वह पूर्व में किसी राजस्व ग्राम का हिस्सा न रहा हो ।
> भविष्य में आवासीय प्रमाण पत्र निर्गत करने के मामलों में प्रभावित परिवार द्वारा प्रभावित क्षेत्र में बिताई गई अवधि / राजस्व खतियान में अंकित नाम का उपयोग किया जा सकेगा।
पुनर्वास अनुदान तथा लाभों को सूचीबद्ध करना
> इस नीति के अंतर्गत मौद्रिक के रूप में अभिव्यक्त पुनर्वास अनुदान तथा अन्य लाभों को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के साथ सूचीबद्ध किया जाएगा और राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर इसे संशोधित किया जाएगा।
परियोजना के आस-पास के क्षेत्र का विकास
> अर्जनकारी निकाय राज्य सरकार द्वारा किए गए निर्णय के अनुसार परियोजना स्थल की परिधि के पंद्रह किलोमीटर के आस-पास के भौगोलिक क्षेत्र के विकास हेतु उत्तरदायी होगा तथा इसके कार्य क्षेत्र के साथ सटे हुए क्षेत्रों के सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान करेगा।
> अध्याय - 8 शिकायत निवारण तंत्र
परियोजना स्तर पर पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति
> प्रत्येक परियोजना जिसमें किसी क्षेत्र में सामूहिक रूप से 100 या इससे अधिक परिवारों का अनैच्छिक विस्थापन होता है, राज्य सरकार प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास योजना के कार्यान्वयन के निगरानी व समीक्षा के लिए अनुमंडल पदाधिकारी से अन्यून किसी सरकारी अधिकारी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन करेगी। इसे ‘पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति' कहा जाएगा। इस समिति में राज्य सरकार के अधिकारियों के अलावा निम्न सदस्य शामिल होंगे
> प्रभावित क्षेत्र में रहनेवाली महिलाओं का प्रतिनिधि 
> प्रभावित क्षेत्र में रहनेवाली अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों का एक-एक प्रतिनिधि।
> प्रमुख बैंक का एक प्रतिनिधि।
> प्रभावित क्षेत्र में अवस्थित पंचायतों और नगरपालिकाओं के अध्यक्ष या उनके द्वारा नामित व्यक्ति | 
> प्रभावित क्षेत्र में शामिल क्षेत्र के संसद् सदस्य और विधानसभा सदस्य ।
> परियोजना का भूमि अर्जन अधिकारी ।
> अर्जनकारी निकाय का एक प्रतिनिधि |
जिला स्तर पर पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास समिति
> प्रत्येक जिले में राज्य सरकार परियोजना स्तर पर पुनर्स्थापन और पुनर्वास समितियों के अंतर्गत आने वाले मामलों को छोड़कर जिले में प्रभावित परिवारों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास के कार्य की प्रगति की निगरानी व समीक्षा के लिए उपायुक्त की अध्यक्षता में एक स्थायी पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति गठित करेगी। इस समिति की शक्तियाँ, कार्य आदि राज्य सरकार द्वारा निर्धारित किए जाएंगे।
न्यायाधिकरण
> इस नीति के अंतर्गत शामिल मामलों से पैदा होने वाली शिकायतों का समयबद्ध निपटान करने हेतु राज्य सरकार द्वारा त्रिसदस्यीय न्यायाधिकरण की नियुक्ति की जाएगी।
> यदि किसी प्रभावित व्यक्ति को इस नीति के अंतर्गत उपलब्ध पुनर्स्थापन और पुनर्वास लाभों को मुहैया न कराने के प्रति कोई शिकायत हो, तो वह अपनी शिकायत के समाधान के लिए उपयुक्त याचिका संबंधित न्यायाधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है।
> न्यायाधिकरण को पुनर्स्थापन तथा पुनर्वास प्रशासक अथवा पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति के निर्णय के विरूद्ध पुनर्स्थापन और पुनर्वास से संबंधित सभी शिकायतों पर विचार करने एवं उनका निपटान करने की शक्ति प्राप्त होगी। साथ ही न्यायाधिकरण पुनर्वास प्रशासक या संबंधित अन्य अधिकारी को ऐसे निर्देश जारी कर सकता है जिन्हें वह इस नीति के कार्यान्वयन से संबंधित शिकायतों के निवारण हेतु उचित समझे।
> अर्जनकारी निकाय द्वारा अर्जित भूमि या अन्य सम्पत्ति के लिए प्रतिकर की राशि से संबंधित विवादों का समाधान भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 या उस समय संघ अथवा राज्य सरकार द्वारा लागू अधिनियम जिसके अंतर्गत भूमि अर्जन किया गया है, के उपबंधों के अंतर्गत किया जाएगा और यह न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र से बाहर होगा।
> अध्याय – 9 निगरानी तंत्र
> राज्य स्तरीय पुनर्स्थापन और पुनर्वास परिषद्
> राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एक परिषद् होगा, जो पुनर्स्थापन और पुनर्वास समिति के क्रियान्वयन के संबंध में परामर्श, समीक्षा एवं अनुश्रवण का कार्य करेगा। परिषद् में संबंधित विभाग के मंत्री, राज्य के मुख्य सचिव तथा संबंधित विभाग के सचिव होंगे। इस परिषद् में राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त विशेषज्ञ को सदस्य के रूप में रखा जा सकता है।
> राज्य स्तरीय पुनर्स्थापन और पुनर्वास परिषद की वर्ष में कम से कम दो बैठकें आयोजित की जाएंगी।
अनुश्रवण समिति 
> उन सभी मामालों, जिनके लिए यह नीति लागू होती है, से संबंधित पुनर्स्थापन और पुनर्वास स्कीमों या योजनाओं के कार्यान्वयन की प्रगति की समीक्षा तथा निगरानी करने के लिए विकास आयुक्त की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय अनुश्रवण समिति गठित की जाएगी।
> इस समिति में अध्यक्ष के अतिरिक्त सचिव के रूप में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव होंगे। इसके अतिरिक्त पथ निर्माण, जल संसाधन, उद्योग, कल्याण, स्वास्थ्य, मानव संसाधन, खान एवं भूतत्व, ऊर्जा, वन एवं पर्यावरण, श्रम एवं नियोजन, कृषि, विधि (न्याय विभाग) तथा नगर विकास विभाग के सचिव सदस्य होंगे। साथ ही पुनर्स्थापन और पुनर्वास आयुक्त इस समिति के संयोजक होंगे। इस समिति में प्रशासी मंत्रालय/विभाग के सचिव को, जिसकी परियोजना के लिए भूमि का अर्जन किया जाना है, सदस्य के रूप में आमंत्रित किया जाएगा।
> उत्पन्न होने वाले किसी भी मामले के त्वरित निष्पादन हेतु परियोजना से संबंधित पुनर्स्थापन और पुनर्वास प्रशासक तथा अधियाची निकाय के प्रतिनिधि को राज्य स्तरीय अनुश्रवण समिति में स्थायी रूप से आमंत्रित किया जाएगा।
> सूचना का आदान-प्रदान
> विस्थापन, पुनर्स्थापन और पुनर्वास के संबंधों में सभी सूचना प्रभावित व्यक्तियों के नाम और पुनर्स्थापन और पुनर्वास पैकेज के ब्यौरों को इंटरनेट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाएगा तथा परियोजना प्राधिकारियों द्वारा इस सूचना से संबंधित ग्राम सभाओं, पंचायतों आदि को अवगत कराया जाएगा।
> इस नीति के अंतर्गत शामिल प्रत्येक मुख्य परियोजना के पुनर्स्थापन और पुनर्वास के लिए राज्य सरकार के संबंधित विभाग में एक पर्यावलोकन समिति गठित होगी।
> राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, झारखण्ड सरकार इस नीति को प्रभावकारी बनाने एवं क्रियान्वयन करने हेतु नोडल विभाग होगा।
>>राज्य सरकार आवश्यकतानुसार इस नीति के प्रावधानों को समय-समय पर संशोधित कर सकेगी।
झारखण्ड भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार नियमावली, 2015
> अधिनियम की धारा-4 के अंतर्गत सामाजिक प्रभाव आकलन कराया जाएगा। सामाजिक प्रभाव आकलन का प्रतिवेदन हिंदी भाषा में तैयार किया जाएगा।
> सामाजिक प्रभाव आकलन, जन सुनवाई एवं पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन जन सुनवाई भूमि अर्जन क्षेत्र के सभी ग्रामसभा एवं वार्ड सभा में हिंदी भाषा के माध्यम से करायी जाएगी। आदिवासी बहुल वार्ड सभा/ग्रामसभा में अनुवादक के माध्यम से स्थानीय भाषा में समझाया जाएगा।
> भूमि अर्जन अधिनियम के अंतर्गत जमीन मालिकों से भूमि अर्जन हेतु सहमति ली जाएगी। अनुसूचित क्षेत्रों में भूस्वामी के साथ-साथ ग्रामसभा की सहमति भी ली जाएगी। अनुसूचित क्षेत्र में ग्रामसभा पेसा अधिनियम के तहत कराया जाएगा।
> भूमि अर्जन हेतु संबंधित अधियायी निकाय से जमीन का मुआवजा एवं पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन की सभी राशि संबंधित उपायुक्त कार्यालय में जमा की जाएगी, ताकि भूस्वामी को राशि ससमय मिल सके।
> वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत जिन लोगों को पट्टा दिया जा रहा है, उन परिवारों को भी जमीन का मुआवजा पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन दिया जाएगा।
> भू-अर्जन किए जानेवाले गांवों के व्यक्तियों को उपलब्ध प्रावधान के तहत् पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन सुविधा दी जाएगी।
> कृषि मजदूर, लघु व्यापारी व अन्य कारीगर को पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन हेतु 200 दिनों का वर्तमान दर से मजदूरी भुगतान किया जाएगा।
> भुगुत बंधक को 25000 रूपये प्रति एकड़ उस भूमि के लिए, जिस पर वे फसल पैदा करते हैं, एकमुश्त भुगतान किया जाएगा।
> संबंधित जिला के अपर समाहर्त्ता को पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन आयुक्त के रूप में अधिसूचित किया गया है।
> प्रमण्डलीय आयुक्त को पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन आयुक्त के रूप में अधिसूचित किया गया है। 
> सभी जिलों के उपायुक्तों की अध्यक्षता में परियोजना स्तर पर पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन समिति गठित किया गया है। इस समिति में जनप्रतिनिधि एवं प्रभावित परिवारों के प्रतिनिधि भी सदस्य होंगे, ताकि उनकी समस्या का समाधान जिला स्तर पर ही किया जा सके।
> राज्य सरकार स्तर पर पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन योजना की समीक्षा एवं अनुश्रवण करने हेतु विकास आयुक्त की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया है।
> सभी जिलों के उपायुक्तों की अध्यक्षता में परियोजना स्तर पर पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन समिति गठित किया गया है। इस समिति में जनप्रतिनिधि एवं प्रभावित परिवारों के प्रतिनिधि भी सदस्य होंगे, ताकि उनकी समस्या का समाधान जिला स्तर पर ही किया जा सके।
> राज्य सरकार स्तर पर पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन योजना की समीक्षा एवं अनुश्रवण करने हेतु विकास आयुक्त की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया है।
> सभी प्रमण्डलीय स्तर पर पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकार बनाया जाएगा ताकि उनका निष्पादन प्रमण्डल स्तर पर हो सके। तत्काल व्यवस्था के तहत माननीय उच्च न्यायालय की सहमति /परामर्श से कार्रवाई की जाएगी। 
> राज्य सरकार भूमि बैंक बनाने हेतु तत्पर है, ताकि भविष्य में भू-अर्जन की आवश्यकता कम हो सके। 
> किसी भी जिले में बहुफसलीय सिंचित क्षेत्र का दो प्रतिशत से ज्यादा जमीन अर्जित नहीं की जाएगी।
> किसी भी जिले में कुल शुद्ध बोए गए क्षेत्र का एक-चौथाई क्षेत्र से ज्यादा जमीन अर्जित नहीं की जाएगी। 
> ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि अर्जन करने पर भूस्वामियों को भूमि के बाजार मूल्य का चार गुणा एवं शहरी क्षेत्रों में बाजार मूल्य का दो गुणा मुआवजे का भुगतान किया जाएगा।
> विस्थापित परिवारों के लोक और सामुदायिक संपत्तियों, आस्तियों अथवा अवसंरचना विशिष्ट रूप से सड़क, लोक परिवहन, जल निकास, स्वच्छता, पेयजल की स्रोत, सामुदायिक जलाशय, चारागाह जैसी सुविधाएँ भूमि अर्जन प्रक्रिया के माध्यम से उपलब्ध करायी जाएगी।
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Sun, 09 Jul 2023 10:25:10 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड की औद्योगिक नीति https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-की-औद्योगिक-नीति https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-की-औद्योगिक-नीति झारखण्ड की औद्योगिक नीति, 2001
> झारखण्ड राज्य निर्माण के लगभग एक वर्ष पश्चात् राज्य की प्रथम औद्योगिक नीति की घोषणा अगस्त में की गई। इसे 1 मार्च, 2001 को अधिसूचित कर दिया गया था। 
> इस नीति का प्रमुख उद्देश्य राज्य में आधारभूत संरचनाओं का त्वरित विकास बेरोजगारी में कमी लाना निवेश को बढ़ावा देना, राज्य का संतुलित विकास करना, निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन, लघु एवं कुटीर उद्यान बढ़ावा देना, अनुसंधान एवं विकास द्वारा उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ावा देना आदि है। 
> इस नीति के लागू होने के बाद राज्य में कई मेगा उद्योग, वृहद उद्योग, मध्यम एवं लघु उद्योगों की स्थापना हुई। 
> इस नीति के सफल क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप राज्य के राजस्व में वृद्धि के साथ-साथ, औद्योगिक उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि तथा राज्य सकल घरेलू उत्पाद में भी वृद्धि हुई। 
> औद्योगिक नीति, 2001 के सफल क्रियान्वयन में राँची औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण, आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण, बोकारो औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण, आधारभूत संरचना विकास निगम राज्य खादी बोर्ड तथा झारक्रॅफ्ट जैसे संगठनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
> इस नीति की सफलता से उत्साहित होकर तथा इस नीति में समय के साथ परिवर्तन की आवश्यकता महसूस करते हुए राज्य सरकार ने औद्योगिक नीति, 2012 की घोषणा की। इस नीति का कार्यान्वयन अगले पाँच वर्षों तक किया जाएगा।' 
झारखण्ड की औद्योगिक नीति, 2012
> इस नीति के अंतर्गत राज्य में औद्योगीकरण सुनिश्चित करने हेतु कुल 16 उद्देश्यों / नीतियों को चिन्हित किया गया है। 
> औद्योगिक नीति, 2012 के प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् हैं
1. राज्य में निवेश को प्रोत्साहित करना तथा राज्य में औद्योगिक विकास को सतत् रूप से प्रोत्साहित करना।
2. विनिर्माण एवं प्रसंस्करण उद्योगों को प्रोत्साहित करना ।
3. रेशम, हथकरघा, खादी एवं ग्रामोद्योगों को प्रोत्साहित करना ताकि राज्य में रोजगार के पर्याप्त अवसरों का सृजन किया जा सके।
4. ग्रामीण क्षेत्रों में हस्तकला संबंधी क्रियाकलापों को प्रोत्साहन एवं उनका संरक्षण
5. वृहद्, लघु तथा सूक्ष्म उद्योगों के बीच समन्वय स्थापित करना।
6. राज्य के खनिज एवं अन्य प्राकृतिक संसाधनों का तार्किक दोहन एवं अनुकूल प्रयोग करना।
7. राज्य में बागवानी एवं खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देना।
8. पर्यावरण संरक्षण के अनुकूल उद्योगों को प्रोत्साहित करने वाले प्रौद्योगिकी एवं कौशल को बढ़ावा देना 
9. राज्य के अनुसूचित जाति, जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के लागों की औद्योगिक विकास में भागीदारी सुनिश्चित करना।
10. नवीनीकरण एवं प्रौद्योगिकी उन्नयन की दिशा में सार्थक प्रयास ताकि औद्योगिक उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ाया जा सके।
11. राज्य के भीतर क्षेत्रीय विषमता को दूर करना ।
12. पीपीपी (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) मॉडल पर आधारित औद्योगिक पार्कों का विकास करना । 
13. तकनीकी, चिकित्सा तथा प्रबंधन आदि के क्षेत्र में निजी निवेश से शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना को प्रोत्साहित करना ।
14. मानव संसाधन विकास तथा कौशल विकास के क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहित करना ।
15. राज्य में निवेश हेतु सुगम एवं भयमुक्त माहौल का निर्माण करना।
16. विकास को प्रोत्साहित करने हेतु विधि व्यवस्था को सुगम, संवेदनशील तथा पारदर्शी बनाना।
> औद्योगिक नीति, 2012 के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु सरकार की कार्यनीति निम्नवत् हैं
1. इस नीति में निजी उद्योग, औद्योगिक क्षेत्र प्राधिकार, औद्योगिक कलस्टर एवं उद्योग पार्क को विशेष रूप से प्रोत्साहित करने का प्रावधान किया गया है ।
2. कार्यों के समय से निपटारे के लिए "एकल खिड़की सुविधा " का विकास ।
3. राज्य में आधारभूत संरचनाओं के विकास के लिए सुगम वातावरण के निर्माण पर बल।
4. विभिन्न क्षेत्रों में निजी-सार्वजनिक भागीदारी को प्रोत्साहन ।
5. राज्य में लघु उद्योग, हस्तकला, कुटीर उद्योगों द्वारा निर्मित उत्पादों के लिए बाजार की व्यवस्था पर बल । 
6. इस्पात, ऑटोमोबाइल, सूचना एवं संचार तकनीकी, प्रसंस्करण आदि हेतु विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के निर्माण पर बल ।
7. रूग्ण इकाईयों की पहचान कर उनके संरक्षण एवं विकास हेतु जिला स्तरीय निगरानी प्रणाली का विकास। 
8. विस्थापन एवं पुनर्वास नीति, 2008 में सुधार करना।
9. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग, महिलाओं तथा दिव्यांग श्रेणी के व्यक्तियों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करना ।
10. जिला स्तर पर " भूमि बैंक" का निर्माण करना तथा इस पर आधारभूत संरचनाओं के विकास के साथ-साथ इस भूमि को औद्योगिक इकाईयों की स्थापना हेतु आवंटित करना ।
11. राज्य में औद्योगिक गलियारों का विकास कर इसमें बिजली, रेलवे संपर्क, कलस्टर जैसे आधारभूत संरचनाओं का निर्माण करना।
12. राज्य में वस्त्र औद्योगिक पार्क, सूचना प्रौद्योगिकी पार्क, जड़ी-बूटी पार्क, खाद्यान्न प्रसंस्करण पार्क, औषधीय पार्क आदि का निजी-सार्वजनिक मॉडल पर विकास करना।
13. राज्य में विशेष आर्थिक क्षेत्र का विकास करना ताकि औद्योगिक निवेश को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ निर्यात में भी वृद्धि हो । इसके अंतर्गत आदित्यपुर में ऑटोमोबाइल के विकास हेतु विशेष आर्थिक क्षेत्र प्रस्तावित है।
14. राज्य में औद्योगिक क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण की स्थापना करना ताकि भूमि अधिग्रहण, उसका आवंटन एवं नवीकरण से संबंधित गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा सके।
15. राज्य में विभिन्न तकनीकी संस्थानों, पॉलिटेक्निक कॉलेजों, अभियंत्रण कॉलेजों की स्थापना की जा रही है। इन संस्थाओं में राज्य के निवासियों हेतु 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं। साथ ही इनके निर्माण हेतु निजी निवेश को प्रोत्साहित किया जा रहा है ।
16. राँची तथा दुमका में मिनी टूल रूम की स्थापना की गयी है।
17. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देने हेतु राज्य सरकार द्वारा नई दिल्ली तथा राँची में अप्रवासी भारतीय सेल की स्थापना का प्रस्ताव है।
18. राज्य सरकार द्वारा इनवेस्टर्स मीट के आयोजन का प्रस्ताव । (इसी नीति के आलोक में 'मोमेंटम झारखण्ड' नामक गतिविधि का आयोजन किया गया।) 
झारखण्ड औद्योगिक एवं निवेश प्रोत्साहन नीति, 2016 
> झारखण्ड औद्योगिक एवं निवेश प्रोत्साहन नीति, 2016 स्टेट-ऑफ आर्ट अवसंरचना की स्थापना, विनिर्माण को प्रोत्साहन, समावेशिता में वृद्धि, नवोन्मेष को गति प्रदान करने तथा रोजगार अवसरों के सृजन पर लक्षित है। 
> इस नीति का प्रमुख उद्देश्य झारखण्ड राज्य को निवेशकों हेतु भरोसेमंद राज्य के रूप में परिणत करने के साथ-साथ राज्य में सतत् औद्योगिक वृद्धि को प्रोत्साहन प्रदान करने व परियोजनाओं के अनुमोदन हेतु वेब आधारित पारदर्शी कार्यशैली का विकास करना आदि है।
> इस नीति के क्रियान्यवन हेतु निम्न रणनीति अपनायी गयी है
1. संवृद्धि को गति प्रदान करने हेतु नवोन्मेष गतिविधियों को प्रोत्साहित करते हुए क्षेत्रीय मूल्य श्रृंखलाओं को आपस में जोड़ना होगा।
2. अवसंरचनाओं के विकास हेतु निजी निवेश एवं सार्वजनिक-निजी भागेदारी को प्रोत्साहित करना होगा। इसमें सड़क, ऊर्जा, औद्योगिक कलस्टर, औद्योगिक पार्क, ग्रामीण औद्योगीकरण (रेशमकीट पालन, खादी, हैंडीक्रॉफ्ट, खाद्य प्रसंस्करण, हैण्डलूम, बाँस, चमड़ा, लाह आदि) शामिल हैं।
3. ग्रामीण महिला स्वयं सहायता समूहों को रेशमकीट पालन, हैण्डलूम, हैण्डीक्रॉफ्ट आदि हेतु गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाएगी।
4. औद्योगिक क्षेत्र विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु व मध्यम उद्योगों को पर्याप्त व ससमय साख की व्यवस्था एगी।
5. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने हेतु अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सेवा प्रदाताओं का विकास किया जाएगा। 
6. निर्यात उद्योगों को सुविधाएँ प्रदान करने हेतु सिंगल विंडो प्रणाली को मजबूती प्रदान करना होगा। 
7. औद्योगिक क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण में नये निवेशकों हेतु भूमि का प्रबंधन एवं विकास करना होगा। 
8. महिला, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति उद्यमियों को विशेष प्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा। 
9. निगरानी, मूल्यांकन एवं शिकायत निवारण तंत्र को मजबूती प्रदान किया जाएगा।
10. राज्य में कौशल विकास कार्यक्रमों का संचालन किया जाएगा।
11. अवसंरचनात्मक विकास की गति को तीव्र किया जाएगा।
12. श्रम गहन उद्योगों को प्रोत्साहित किया जाएगा।
13. औद्योगिक दृष्टि से अल्प विकसित क्षेत्रों के विकास पर विशेष बल दिया जाएगा।
14. क्षेत्र - विशेष कौशल विकास एवं व्यावसायिक कुशलता को मजबूती प्रदान की जाएगी।
15. विविद्यालयों को स्टार्ट-अप एवं नवोन्मेष उत्पादों के विकास हेतु प्रोत्साहित किया जाएगा।
16. तकनीकी उन्नयन एवं शोध व विकास को समर्थन प्रदान किया जाएगा।
17. व्यापार सुविधाओं व ई-गवर्नेस को प्रोत्साहित किया जाएगा।
18. महिलाओं को ध्यान में रखते हुए श्रम क्षेत्र में सुधार किया जाएगा।
19. मेक-इन-इण्डिया कार्यक्रम हेतु फोकस दृष्टिकोण अपनाया जाएगा तथा इसके लिए निम्न कदम उठाया जाएगा:
» ईज ऑफ डुइंग बिजनेस पर बल देते हुए व्यवसाय वातावरण में सुधार किया जाएगा।
» विनिर्माण प्रक्रिया को सक्षम बनाया जाएगा। जाएगा।
» शून्य प्रदूषण उत्सर्जन संयंत्रों की स्थापना की जाएगी।
झारखण्ड औद्योगिक एवं निवेश प्रोत्साहन नीति, 2021
> नीति का परिचय
> यह नीति राज्य में 1 अप्रैल, 2021 से लागू मानी जाएगी तथा यह अगले पांच वर्षों तक प्रभावी रहेगी। 
> इस नीति में टेक्सटाइल एंड अपेरल्स, ऑटोमोबाइल, ऑटो कंपोनेंट, एग्रो फूड एंड मीट प्रोसेसिंग, फार्मास्यूटिकल व इलेक्ट्रिॉनिक सिस्टम डिजाइन एंड मैन्युफैक्चरिंग को उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है। 
> इस नीति के तहत राज्य में उद्योग हेतु किए जाने वाले पूंजी निवेश का 25% या अधिकतम 6.25 करोड़ रूपये तक इंसेंटिव के रूप में प्रदान किया जायेगा। 
> इस नीति के तहत राज्य में लगने वाली सूक्ष्म उद्योगों के लिए 1 करोड़ रूपये, लघु उद्योगों के लिए 10 करोड़ रूपये तथा बड़े उद्योगों के लिए 25 करोड़ रूपये के अधिकतम निवेश पर इंसेंटिव प्रदान किया
जायेगा।
> सभी वर्ग की महिलाओं को निवेश पर 5% का अतिरिक्त इंसेंटिव प्रदान किया जायेगा।
> दृष्टिकोण व लक्ष्य
> राज्य में उचित व्यावसायिक वातावरण व उच्चस्तरीय संरचना का निर्माण करना ताकि निवेशकों को आकर्षित किया जा सके।
> राज्य में व्यावसायिक गतिविधियों में नवाचार तथा वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना। 
> राज्य के उद्योगों को चौथी पीढ़ी व आगे की नई तकनीकों को अपनाने हेतु दक्ष बनाना। 
> जमीनी स्तर पर क्षमता निर्माण ताकि सतत् औद्योगिक विकास पर बल दिया जा सके। 
> अगले दशक में औद्योगिक क्षेत्र में तीव्र व सतत् वृद्धि का लक्ष्य प्राप्त करना ताकि सकल राज्य घरेलू उत्पाद में इस क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाया जा सके। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु निम्न उपाय किये जायेंगे
1. एक प्रभावी, सक्रिय व सहायक संस्थागत तंत्र का निर्माण।
2. प्रचार रणनीतियों का निर्माण व कार्यान्वयन।
3. गोदाम, सामान्य सुविधा केन्द्र आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं का निर्माण।
4. विपणन विकास सहयोग, वैश्विक बाजार हेतु शोध व विकास तथा प्रयोगशाला सहयोग आदि।
> नीति के प्रमुख उद्देश्य
> राज्य में 1 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित करके 5 लाख रोजगार सृजित करना।
> झारखण्ड को निवेशकों के पसंदीदा गंतव्य के रूप में परिणत करना तथा सतत् औद्योगिक संवृद्धि को
प्रोत्साहित करना । 
> परियोजना को मंजूरी, उत्पादन घोषणा की तारीख तथा वित्तीय व गैर-वित्तीय सहायता व मंजूरी हेतु समयबद्ध, वेब आधारित पारदर्शी कार्यतंत्र निर्मित करना। 
> गोदामों, अंतर्देशीय कंटेनर डिपो, कोल्ड स्टोरेज, औद्योगिक समूहों से रेल-सड़क कनेक्टिविटी, टूल रूम आदि जैसे बुनियादी ढांचे को मजबूत करना। 
> निर्यात क्षमता वाले उद्योगों पर ध्यान केंद्रित करना।
> एमएसएमई क्षेत्र द्वारा 100% स्वदेशी आगतों से विनिर्मित निर्यात वस्तुओं पर ध्यान केन्द्रित करना।
> ओईएम तथा एमएसएमई / सहायक उद्योगों के बीच संबंध स्थापित करना ।
> सभी क्षेत्रों में विकास हेतु एक सरल, सक्रिय व सहायक तंत्र प्रदान करना ।
> औद्योगिक व निवेश प्रोत्साहन नीति, एमएसएमई अधिनियम-2006 तथा अन्य नीतिगत हस्तक्षेपों के तहत सुविधा प्रदान करके औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों में रोजगार सृजन को बढ़ावा देना।
> मूल्यवृद्धि और गुणवत्ता प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने हेतु खनिज आधारित उत्पादों, हस्तशिल्प, हथकरघा, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों जैसे पारंपरिक क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी और कौशल उन्नयन करना ।
> खाद्य व चारा प्रसंस्करण के समग्र विकास हेतु प्रसंस्करण के स्तर को बढ़ाना, अपव्यय में कमी करना, मूल्यवृद्धि करना तथा किसानों की आय में वृद्धि के साथ-साथ निर्यात में वृद्धि को बढ़ावा देना। 
> नवाचार, स्टार्ट-अप तथा तकनीकी हस्तांतरण को प्रोत्साहित करना।
> औद्योगिक विकास की रणनीति
> निजी निवेश व सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देना ताकि आधारभूत संरचनाओं सड़क, विद्युत, दूरसंचार, औद्योगिक संपदा, औद्योगिक कलस्टर व औद्योगिक पार्क का विकास किया जा सके। साथ ही ग्रामीण औद्योगीकरण हेतु रेशम कीट पालन, खादी, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्कण, हैण्डलूम, बांस, चमड़ा व लाह संबंधी उद्योगों पर ध्यान केन्द्रित करना।
> उद्योगों को (विशेष रूप से एमएसएमई क्षेत्र को) ससमय तथा उपयुक्त साख की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
> निर्यात संवर्द्धन परिषदों, आईटीपीओ, क्षेत्रीय संघों तथा एमएसएमई संघो के साथ मजबूत नेटवर्क का विकास करना।
> अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने हेतु अंतर्राष्ट्रीय व्यापार सेवा प्रदाताओं का विकास करना।
> निर्यात उद्योगों को सहायता प्रदान करने हेतु सिंगल विंडो सिस्टम के मजबूत करना।
> बेहतर भूमि प्रबंधन तथा नए निवेशकों हेतु प्लॉट/भूमि की उपलब्धता बढ़ाना।
> समावेशिता प्रोत्साहन हेतु महिला, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के उद्यमियों को विशेष प्रोत्साहन राशि प्रदान करना।
> निगरानी, मूल्यांकन व शिकायत निवारण तंत्र का संस्थानीकरण ।
> हितधारकों और औद्योगिक संघों के साथ परामर्श तंत्र का संस्थानीकरण।
> उद्यमिता व कौशल विकास कार्यक्रमों पर जोर।
> बुनियादी ढाँचों के विकास में तेजी लाना।
> श्रम प्रधान उद्योगों को बढ़ावा देना।
> औद्योगिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के लिए केन्द्रित दृष्किोण।
> प्रौद्योगिकी उन्नयन, अनुसंधान व विकास के सहयोग द्वारा विश्वविद्यालयों को स्टार्ट-अप और नवीन उत्पाद विकास हेतु प्रोत्साहित करना।
> व्यापार सुविधा और ई-शासन को बढ़ावा देना।
> राज्य में अनुकूल श्रम सुधार और व्यापार सुगमता को
> 'मेक इन इण्डिया' कार्यक्रम पर लक्षित दृष्टिकोण।
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Sun, 09 Jul 2023 10:10:35 +0530 Jaankari Rakho
पेसा ,1996 https://m.jaankarirakho.com/पेसा-1996 https://m.jaankarirakho.com/पेसा-1996 पंचायत ( अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 
Panchayats (Extension to Scheduled Area) Act, 1996
> राज्य विधान मण्डल द्वारा पंचायतों पर बनाये कानून पारंपरिक एवं रूढ़िवादी मान्यताओं, सामाजिक व सांस्कृतिक पद्धतियों और सामुदायिक संसाधनों की परंपरागत प्रबंधन प्रणाली के समरूप होगा।
> प्रत्येक ग्राम में एक ग्राम सभा होगी, जो ग्राम स्तर पर पंचायत के निर्वाचक नियमावली में नामांकित व्यक्तियों से मिलकर बनेगी।
> ग्राम सभा नागरिकों, परंपराओं और मान्यताओं उनकी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण और विवादों के पारंपरिक निपटारे में सक्षम होगी।
> प्रत्येक ग्राम सभा अपने क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं के अनुमोदन के बाद ही पंचायत द्वारा गांव के विकास कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करेगी।
> प्रत्येक ग्राम सभा अपने क्षेत्र में क्रियान्वित गरीबी उन्मूलन एवं अन्य लोकहित कार्यक्रमों के लिए लाभार्थियों की पहचान और चयन के लिए उत्तरदायी होगी।
> प्रत्येक ग्राम सभा अपने क्षेत्र में क्रियान्वित विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के उपरांत संबंधित ग्राम से उपयोगिता प्रमाण-पत्र प्राप्त करेगी।
> प्रत्येक पंचायत पर अनुसूचित क्षेत्रों में स्थानों का आरक्षण, संबंधित पंचायत में उन समुदायों की जनसंख्या के अनुपात में होगी, जिस समुदाय के लिए आरक्षण अपेक्षित है, परन्तु अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण, स्थानों के कुल संख्या के आधे से कम नहीं होगी और अध्यक्ष के सभी स्थान, सभी स्तरों पर अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित होगी।
> राज्य सरकार ऐसी अनुसूचित जनजाति जिनका प्रतिनिधित्व मध्यवर्ती स्तर या जिला स्तर के पंचायत में नहीं है, के व्यक्ति को सदस्य मनोनीत कर सकती है, लेकिन मनोनीत व्यक्तियों की संख्या एक दहाई से अधिक नहीं होनी चाहिए।
> ग्राम सभा या समुचित स्तर पर पंचायतों से विकास योजनाओं के लिए अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अर्जन करने से पूर्व और अनुसूचित क्षेत्रों, ऐसी परियोजनाओं द्वारा प्रभावित व्यक्तियों के पुनर्वास से पूर्व परामर्श किया जाएगा। अनुसूचित क्षेत्रों, परियोजनाओं का वास्तविक नियोजन और क्रियान्वयन राज्य स्तर पर समन्वित किया जाएगा। 
> पंचायत के समुचित स्तर को लघु जल निकायों का नियोजन एवं प्रबंधन कार्य सौंपा जाएगा।
> अनुसूचित क्षेत्रों में लघु खनिज के उत्खनन के लिए लाइसेंस देने का, लघु खनिज वाले क्षेत्र को लीज पर देने से पूर्व ग्राम सभा या पंचायत के समुचित स्तर से पूर्वानुमति आवश्यक है।
> लघु खनिज के उपयोग में किसी भी प्रकार के रियायत देने के लिए ग्राम सभा या पंचायत के उचित स्तर से पूर्वानुमति आवश्यक है।
> ग्राम सभा को अपने सीमा क्षेत्र में किसी भी प्रकार के मादक पदार्थों के विक्रय और सेवन के विनियमन, नियंत्रण करने का अधिकार होगा।
> ग्राम सभा का लघु वनोत्पाद में स्वामित्व होगा।
> ग्राम सभा को अनुसूचित क्षेत्र में भूमि हस्तान्तरण में नियंत्रण और अनुसूचित जनजातियों के अवैधानिक रूप से हस्तान्तरित भूमि की पुनर्वापसी के लिए आवश्यक कदम उठाने का अधिकार होगा। > ग्राम सभा को ग्राम स्तरीय हाटों / बाजारों के प्रबंधन का अधिकार होगा।
> ग्राम सभा को अनुसूचित जनजातियों को ऋण देने पर नियंत्रण का अधिकार होगा।
> ग्राम सभा को सामाजिक संस्थाओं और कार्यकर्त्ताओं के कार्यकलापों पर नियंत्रण का अधिकार होगा। 
> ग्राम सभा को स्थानीय स्वयोजनाओं (जनजातीय उप योजना सहित ) और उनके स्रोतों पर नियंत्रण का अधिकार होगा।
पेसा के बारे में
> पंचायती राज मंत्रालय का अधिदेश
> पंचायती राज मंत्रालय का अधिदेश संविधान के नौवें भाग, भाग IXक के अनुच्छेद 243 यघ के अनुसार जिला योजना समिति के संबंध में प्रावधान और पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए है। देश में पंचायती राज व्यवस्था के संबंध में संवैधानिक प्रावधान
> 24 अप्रैल, 1993 से प्रभावी, संविधान ( तिहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992, जो भारत के संविधान के नौंवें भाग में सन्निविष्ट किया गया है, पंचायतों को ग्रामीण भारत के लिए स्थानीय स्व-शासन की संस्थाओं के रूप में एक संवैधानिक दर्जा देता है।
> संविधान का अनुच्छेद 243ड (1), अनुच्छेद 244 के खंड (1) और (2) में निर्दिष्ट अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों में संविधान के नौंवे भाग के प्रावधानों को लागू करने से छूट देता है। हालांकि, अनुच्छेद 243ड (4)(ख) संसद को कानून बनाने और नौवें भाग के प्रावधानों को अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों में विस्तारित करने की शक्ति प्रदान करता है, बशर्ते कि ऐसे अपवादों और संशोधनों को ऐसे कानूनों में निर्दिष्ट किया गया हो और इस तरह का कोई भी कानून अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा।
> पांचवी अनुसूची का क्षेत्र
> संविधान पांचवीं अनुसूची किसी भी राज्य - असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के अलावा अन्य राज्य में रहने वाले अनुसूचित जनजाति के रूप में भी प्रशासन और अनुसूचित क्षेत्रों के नियंत्रण के साथ संबंधित है। 
‘‘पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996" (पेसा), कुछ संशोधनों और अपवादों को छोड़कर संविधान के नौवें भाग को, संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत अधिसूचित पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों के लिए विस्तारित करता है। वर्तमान में, 10 राज्यों अर्थात् आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, ओडिसा, राजस्थान और तेलंगाना में पांचवी अनुसूची क्षेत्र मौजूद हैं। 
> गांव और ग्राम सभा की परिभाषा
> पेसा अधिनियम के अंतर्गत, अनुच्छेद 4(ख), आमतौर पर एक बस्ती या बस्तियों के समूह या एक पुरवा या पुरवों के समूह को मिलाकर एक गांव का गठन होता है, जिसमें एक समुदाय के लोग रहते हैं और अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार अपने मामलों का प्रबंधन करते हैं।
> पेसा अधिनियम, अनुच्छेद 4 (ग) के अंतर्गत उन सभी व्यक्तियों को लेकर हर गांव में एक ग्राम सभा होगी, जिनके नाम ग्राम स्तर पर पंचायत के लिए मतदाता सूची में शामिल कर लिए गए हैं। पेसा ग्राम सभा को निम्न के लिए विशेष रूप से शक्ति प्रदान करती है :
(क) लोगों की परंपराओं और रिवाजों और उनकी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना 
(ख) समुदाय के संसाधन और विवाद समाधान के परंपरागत तरीके की रक्षा और संरक्षा 
(ग) निम्न कार्यकारी कार्यों को पूरा करना: –
1. सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं को मंजूरी देना।
2. गरीबी उन्मूलन और अन्य कार्यक्रमों के अंतर्गत लाभार्थियों के रूप में व्यक्तियों की पहचान करना। 
3. पंचायत द्वारा योजनाओं, कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिए धन के उपयोग का एक प्रमाण पत्र जारी करना ।
> पेसा उपयुक्त स्तर पर ग्राम सभा/पंचायतों को निम्नलिखित की शक्तियाँ प्रदान करती है - 
(i) भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में अनिवार्य परामर्श का अधिकार 
(ii) एक उचित स्तर पर पंचायत को लघु जल निकायों की योजना और प्रबंधन का कार्य सौंपा गया है 
(iii) एक उचित स्तर की ग्राम सभा या पंचायत द्वारा खान और खनिजों के लिए संभावित लाइसेंस पट्टा, रियायतें देने के लिए अनिवार्य सिफारिश करने का अधिकार 
(iv) मादक द्रव्यों की बिक्री/खपत को विनियमित करना 
(v) लघु वनोपजों का स्वामित्व 
(vi) भूमि हस्तान्तरण को रोकना और हस्तान्तरित भूमि की बहाली 
(vii) गांव बाजारों का प्रबंधन
(viii) अनुसूचित जनजाति को दिए जाने वाले ऋण पर नियंत्रण
(ix) सामाजिक क्षेत्र में कार्यकर्ताओं और संस्थानों, जनजातीय उप योजना और संसाधनों सहित स्थानीय योजनाओं पर नियंत्रण
> पेसा का महत्व
> पेसा का प्रभावी क्रियान्वयन न केवल विकास को प्रोत्साहित करेगा बल्कि इससे पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में लोकतंत्र भी और गहरा होगा। पेसा के कई फायदे हैं। इससे निर्णय लेने में लोगों की भागीदारी में वृद्धि होगी। पेसा आदिवासी क्षेत्रों में अलगाव की भावना को कम करेगा और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग पर बेहतर नियंत्रण होगा। पेसा से जनजातीय आबादी में गरीबी और बाहर पलायन कम हो जाएगा क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और प्रबंधन से उनकी आजीविका और आय में सुधार होगा। पेसा जनजातीय आबादी के शोषण को कम करेगा, क्योंकि वे ऋण देने, शराब की बिक्री खपत एवं गांव बाजारों का प्रबंधन करने में सक्षम होंगे। पेसा के प्रभावी कार्यान्वयन से भूमि के अवैध हस्तान्तरण पर रोक लगेगी और आदिवासियों की अवैध रूप से हस्तान्तरित जमीन को बहाल किया जा सकेगा और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि पेसा परंपराओं, रीति-रिवाजों और जनजातीय आबादी की सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण के माध्यम से सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देगा। 
> पंचायती राज मंत्रालय की पहल
> पेसा के महत्व को स्वीकार करते हुए भारत सरकार राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में पेसा का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है। कार्रवाई में शामिल कुछ बिंदु हैं:
(i) 21.5.2010 को पांचवी अनुसूची के क्षेत्रों वाले सभी राज्यों को पेसा के कार्यान्वयन पर समेकित दिशा निर्देश जारी किए गए थे।
(ii) राज्यों के दौरे, पत्राचार और बैठकों/कार्यशालाओं के माध्यम से अनुसूचित क्षेत्रों वाले राज्यों में पेसा अधिनियम के कार्यान्वयन की लगातार समीक्षा 
करना ।
(iii) राज्यों में पेसा के कार्यान्वयन की प्रगति और ऐसा करने में सामने आने वाले मुद्दों और चुनौतियों की समीक्षा करने और आगे का मार्ग तय करने के लिए 4-5 फरवरी, 2016 को नई दिल्ली में एक राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई थी।
(iv) आरजीपीएसए के अंतर्गत, पांचवी अनुसूची क्षेत्रों वाले राज्यों को ग्राम पंचायत स्तर पर ग्राम सभा संघटक और राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर पर पेसा समन्वयक तैनात करने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है।
(v) पांचवी अनुसूची के क्षेत्रों में “सामुदायिक लामबंदी " पर एक पुस्तिका का प्रकाश
(vi) पेसा से संबंधित विषयों पर विभिन्न शोध अध्ययन और कार्रवाई अनुसंधान प्रायोजित करना 
(vii) राज्यों को पेसा के प्रावधानों के कार्यान्वयन के लिए नियम बनाने और राज्य पंचायती राज अधिनियम और कानूनों में संशोधन कर उन्हें पेसा के अनुकूल बनाने के लिए सहमत करना। 
(viii) केन्द्र सरकार के मंत्रालयों / विभागों से केन्द्रीय कानूनों में पेसा के प्रावधानों के अनुरूप संशोधन के लिए अनुरोध ।
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Sun, 09 Jul 2023 10:05:33 +0530 Jaankari Rakho
संताल परगना काश्तकारी अधिनियम https://m.jaankarirakho.com/संताल-परगना-काश्तकारी-अधिनियम https://m.jaankarirakho.com/संताल-परगना-काश्तकारी-अधिनियम संताल परगना काश्तकारी ( अनुपूरक उपबंध) अधिनियम, 1949 Santal Pargana Tenancy (Supplementary Provisions) Act, 1949
> अध्याय - 1 प्राथमिकी
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  1. संक्षिप्त नाम, प्रारंभ तथा प्रसार
> यह अधिनियम संताल परगना काश्तकारी ( अनुपूरक उपबंध) अधिनियम, 1949 कहलाएगा। 
> यह उस तारीख को लागू होगा, जो राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा नियत करे। 
> यह समस्त संताल परगना प्रमण्डल में लागू होगा जिसके अंतर्गत दुमका, पाकुड़, साहेबगंज, | गोड्डा, देवघर तथा जामताड़ा जिले शामिल हैं। 
धारा  2.  विधान के स्थानीय विस्तार परिवर्तन के अधिकार या किसी क्षेत्र से वापसी
> राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा संताल परगना के किसी भाग से इस विधान या इसके किसी भाग को वापस ले सकती है। इसी प्रकार इस विधान या इसके किसी भाग को पुनः उसी भाग में लागू कर सकती है, जहां से इसे वापस लिया गया हो।
धारा  4. परिभाषायें
> आदिवासी - ऐसा व्यक्ति जो “अनुसूची ख" में निहित आदिवासी या अर्द्ध-आदिवासी जनजाति या जाति से है तथा जो समय-समय पर राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाय। 
> कृषि वर्ष
» जहाँ बँगला साल चलता है, प्रथम वैशाख के प्रारंभ होने वाले वर्ष से है। 
» जहाँ फसली साल चलता है, प्रथम अश्विन से प्रारंभ होने वाले वर्ष से है।
» जहाँ कृषि प्रयोजनों के लिए कोई अन्य वर्ष चलता है, उस वर्ष से है।
> भुगतबंध अथवा पूर्ण भोगबंधक - इसका तात्पर्य ऋण रूप में अग्रिम दी गई अथवा अग्रिम दी जाने वाली राशि के भुगतान के प्रयोजन के लिए रैयत की जोत या उसके आंशिक हित का इस शर्त के साथ हस्तांतरण से है कि कुल सूद सहित ऋण बंधक की अवधि में जोत अथवा आंशिक जोत से उद्भूत लाभ द्वारा चुकता समझा जाएगा।
> जोत- जोत से तात्पर्य भूखंड अथवा भूखंड समूह से है जो रैयत का हो । 
> खास ग्राम- इसका तात्पर्य किसी ग्राम से है जहाँ न तो मूल रैयत हो न उस समय के लिए कोई ग्राम प्रमुख हो ।
> जमींदार - ग्राम प्रमुख या मूल रैयत से भिन्न वह व्यक्ति जिसे लगान पाने का अधिकार है।
> गैर - आदिवासी - ऐसा व्यक्ति जो “अनुसूची ख" में उल्लिखित किसी आदिवासी अथवा अर्ध- आदिवासी जनजाति या जाति का सदस्य न हो।
> रैयत - जमींदार से भिन्न कोई व्यक्ति, जिसने स्वयं अथवा अपने पारिवारिक सदस्यों या भाड़े के मजदूरों द्वारा जोतने के लिए भू धारण करने का अधिकार प्राप्त किया हो। (Note- ग्राम प्रमुख अपनी निजी जोत का रैयत समझा जाएगा। )
> लगान- जो राशि खेवट- खतियान के अनुसार ग्राम प्रमुख या मूल रैयत द्वारा गाँव के जमींदार को विधि-सम्मत देय हो । इसे ही 'ग्राम-लगान' कहा गया है। 
> संताल सिविल रूल्स- इसका तात्पर्य संताल परगना अधिनियम, 1855 की धारा-1 के खंड ( 2 ) के अधीन नियुक्त अधिकारी द्वारा संताल परगना के नागरिक न्यायशासन-प्रबंध के पालन हेतु राज्य सरकार द्वारा जारी किए गये निर्देश से है ।
> लगान की बन्दोबस्ती दर- खेवट- खतियान में उल्लिखित लगान की दर ।
> खाली जोत- परित्यक्त जोत या ऐसी जोत जिसका रैयत बिना उत्तराधिकारी छोड़े मर गया हो।
> ग्राम समुदाय - ग्राम के जमाबंदी रैयतों के सभी व्यक्ति, उनके हिस्सेदार, बच्चे और उत्तराधि. कारी।
> ग्राम प्रमुख- ग्राम-प्रमुख का पद ग्रहण करने लिए इस विधान के तहत विधिवत् नियुक्त कोई व्यक्ति जिसे मुस्तजिर, माँझी अथवा किसी अन्य नाम से जाना जाता हो।
> अध्याय- 2 ग्राम-प्रमुख और मूल रैयत
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  5. ग्राम प्रधान की नियुक्ति
> किसी खास ग्राम के रैयत या जमींदार के आवेदन पत्र देने पर तथा ग्राम के जमाबंदी रैयतों में से कम से कम दो-तिहाई रैयतों की सहमति से उपायुक्त ग्राम प्रधान की नियुक्ति करेगा।
धारा  6. ग्राम प्रधान की मृत्यु का प्रतिवेदन
> यदि किसी ग्राम का, जो खास नहीं है, ग्राम प्रधान मर जाए तो ग्राम का जमींदार इस घटना तीन माह के भीतर नये ग्राम प्रधान की नियुक्ति हेतु उपायुक्त को आवेदन देगा।
धारा  7. ग्राम प्रधान का कबूलियत का लिखा जाना और जमानत देना
> नियुक्ति के पश्चात् ग्राम प्रधान को एक पट्टा दिया जाएगा तथा उसे विहित प्रपत्र में कबूलियत लिखना होगा कि अपने पद के कार्य संपादन में वह राज्य सरकार द्वारा बनाए गये नियमों से शासित होगा।
धारा  8. जमींदार द्वारा नये नियुक्त ग्राम प्रधान को जमाबंदी एवं खेवट-खतियान की प्रतियाँ दिया जाना 
> जब भी आखिरी ग्राम-प्रधान के उत्तराधिकारी के अतिरिक्त कोई अन्य ग्राम प्रधान नियुक्त किया जाय, तो ग्राम के जमींदार का यह कर्त्तव्य होगा कि वह नियुक्ति की तिथि से तीन महीने के भीतर नये ग्राम प्रधान को जमाबंदी एवं खेवट- खतियान की प्रतियाँ देगा।
धारा  9. ग्राम प्रधान को किसी प्रकार पदांतरण का अधिकार नहीं होगा।
धारा  10. किसी जमीन का मूल रैयती जोत समझा जाना 
> कोई बंजर भूमि जो मूल रैयत या सह - रैयत द्वारा आबाद लायक बनायी गई हो या कोई परती जोत जो मूल रैयत या सहरैयत के अधिकार में हो, इस विधान के प्रावधान द्वारा शासित अप. रावर्त्तनीय (non-transferable) रैयत होल्डिंग समझा जाएगा। 
धारा  11. ग्राम प्रधान की पुरस्कार निधि 
> ग्राम-प्रधान, मूल रैयतों तथा रैयतों पर लगाए गए तथा वसूले गए सभी जुर्माने, प्रधानों की पुरस्कार निधि में जमा किए जायेंगे तथा इससे व्यय उपायुक्त द्वारा नियमों के अनुसार किया जाएगा। 
> अध्याय - 3 रैयत
> धारा
> प्रमुख प्रावधान 
धारा  12. रैयतों के वर्ग
> इस विधान के अंतर्गत रैयतों के निम्न वर्ग होंगे:
» निवासी जमाबंदी रैयत- ये अभिलिखित जमाबंदी रैयत हैं जो गाँव में रहते हैं या जिनका पारिवारिक आवास अभिलिखित गाँव में हैं।
» गैर-निवासी जमाबंदी रैयत - जमाबंदी रैयत के रूप में अभिलिखित ऐसे व्यक्ति जो गाँव में नहीं रहते हैं।
» नये रैयत- वे व्यक्ति जो नये रैयत के रूप में अभिलिखित हैं ।
धारा  13. रैयतों के भूमि के उपयोग संबंधी अधिकार
> रैयत उस भूमि का जो उसके जोत में पड़ती है, स्थानीय रीति-रिवाज या किस अन्य रीति से जो भूमि के मूल्य विशेष रूप से नष्ट न करे या जिससे भूमि जोतने-कोड़ने के अयोग्य न हो जाए, उपयोग कर सकता है।
धारा  14. रैयत को बेदखल नहीं किया जाना
> जमींदार द्वारा, सिवा उपायुक्त के बेदखली के आदेश के किसी रैयत को अपने जोत से बेदखल नहीं किया जाएगा।
धारा  15. ईंट और खपड़े बनाने के संबंध में रैयत के अधिकार 
> किसी रैयत को अपने और अपने परिवार के घरेलू अथवा कृषि संबंधी प्रयोजनों के लिए अपने जोत में बिना किसी अधिकार शुल्क या अन्य प्रभार के ईंट और खपड़े बनाने का अधिकार होगा।
धारा  16. अपनी जोत में बाँध इत्यादि बनाने एवं मछली तथा अन्य उत्पादन के उपयोग संबंधी रैयत के अधिकार
> कोई रैयत बिना जमींदार की अनुमति के अपनी निजी जोत या बंदोबस्त भूमि में बाँध, आहर, तालाब, कुँआ एवं जलाशयों व स्रोतों का निर्माण व खुदाई बिना किसी को क्षति पहुँचाये कर सकता है।
> रैयत बिना किसी शुल्क के ऐसे जलाशयों या स्रोतों में मछली तथा अन्य उत्पादन भी कर सकता है। 
> यदि इस बात पर विवाद हो कि किसी को ऐसे निर्माण या खुदाई से क्षति पहुँची है तो उपायुक्त इसका निर्णय करते हुए उचित आदेश देगा।
धारा  17. अपनी निजी जोत के वृक्षों पर रैयत के अधिकार
> रैयत अपनी जोत में स्थित किन्हीं वृक्षों या बाँसों के फूल, फल तथा उत्पादनों का उपयोग कर सकता है। 
> रैयत को अपनी जोत में अपने द्वारा लगाए गए वृक्षों पर बिना शुल्क के लाह उपजाने या रेशम कीट पालन का अधिकार होगा। 
> रैयत अपनी जोत की किसी भूमि पर वृक्ष, उद्यान एवं बाँस लगा सकता है, उन्हें काटकर गिरा सकता है तथा उसका उपयोग कर सकता है।
> परन्तु रैयत अनुमंडल पदाधिकारी की अनुमति के बिना ऐसी जोत पर स्थित वृक्ष नहीं काट सकता है।
धारा  18. भवन निर्माण संबंधी रैयत के अधिकार
> रैयत स्वयं या अपने परिवार के घरेलू या कृषि प्रयोजनों के लिए अपनी जोत पर कच्चा या पक्का मकान बना सकता है।
धारा  19. जोत का विभाजन तथा लगान का वितरण
> जोत का विभाजन तथा उसके लगान का वितरण जमींदार तथा ग्राम प्रमुख या रैयत की सहमति से होगा।
> यदि न्यायालय के आदेश या अन्य प्रकार से जोत बंटवारा या उप-विभाजन का विषय हो और बंटवारा में शामिल पक्ष आपसी समझौते से तथा भूस्वामी, ग्राम प्रमुख या मूल रैयत की सहमति से जोत के लगान के वितरण में असमर्थ हों, तो पक्षों में कोई व्यक्ति लगान के वितरण हेतु उपायुक्त को आवेदन पत्र दे सकता है।
> उपायुक्त को किसी कार्यवाही के किसी पक्ष को खर्चा दिलाने का अधिकार होगा
> यदि जोत के किसी भाग का लगान तीन रूपये से कम होगा, तो किसी भी स्थिति में ऐसी जोत का उप-विभाजन नहीं होगा।
> यदि सरकारी जोत समेत ग्राम प्रमुख का हिस्सा ग्राम लगान के लिए अपर्याप्त जमानत हो, तो किसी भी स्थिति में जमानत के रूप में शपथ ली गई ग्राम प्रमुख की निजी जोत का खण्डीकरण न होगा।
धारा  20. रैयत के अधिकार का हस्तान्तरण
>  विक्रय, दान, बंधक, वसीयत या पट्टा या किसी अन्य संविदा द्वारा प्रकट अपने किसी जोत या उसके अंश के अधिकार का रैयत द्वारा हस्तान्तरण तब तक मान्य नहीं होगा जब तक कि हस्तान्तरण का अधिकार खेवट - खतियान में उल्लिखित नहीं है। किसी अनुमंडल में रैयती भूमि का पट्टा उपायुक्त की पूर्व लिखित अनुमति से एक वर्ष के लिए किया जा सकता है। जहाँ संताल विधान के तहत दर्ज रैयत द्वारा बहन और पुत्री को दान अनुज्ञेय है, वहाँ उपायुक्त की पूर्व लिखित अनुमति से रैयत दान स्वीकार कर सकता है। आदिवासी रैयत उपायुक्त की पूर्व लिखित अनुमति से अपनी भूमि के क्षेत्रफल का अधिकतम आधा जोत अपनी विधवा माँ को या अपनी मृत्यु के बाद निर्वाह हेतु अपनी स्त्री को दान स्वरूप दे सकता है। [ उप धारा ( 1 ) ]
> किसी आदिवासी रैयत का अपने जोत या उसके अंश का हस्तांतरण योग्य अधिकार किसी भी प्रकार उस परगना या तालुक में सचमुच खेती करने वाले आदिवासी रैयत के सिवा अन्य व्यक्ति के नाम हस्तांतरित नहीं किया जाएगा। परन्तु आदिवासी रैयत अपने जोत या उसके किसी भाग को अपने गरदी जमाई या घर जमाई के नाम कर सकता है। उप धारा ( 2 )]
> उप धारा (1) या (2) के विपरीत कोई भी हस्तान्तरण मान्य नहीं होगा या किसी न्यायालय द्वारा दीवानी, फौजदारी एवं राजस्व के अधिकार क्षेत्र के प्रयोग हेतु मान्य नहीं होगा। 
> किसी जोत या उसके किसी भाग में किसी रैयत के अधिकार के विक्रय के लिए किसी न्यायालय या अधिकारी द्वारा डिक्री या आदेश के निष्पादन में ऐसा अधिकार तभी बेचा जा सकता है, यदि हस्तांतरण का रैयत का अधिकार खेवट-खतियान में उल्लिखित हो।
> यदि किसी भी समय उपायुक्त को यह सूचना प्राप्त होती है कि उपधारा (1) या (2) के विपरीत कोई हस्तान्तरण हुआ है तो वह अपने विवेक से हस्तांतरण लेने वाले को निकाल सकता है और हस्तान्तरित भूमि को रैयत या उसके किसी उत्ताधिकारी को लौटा सकता है।
धारा  21. गैर-आदिवासी रैयत द्वारा रैयती भूमि का हस्तान्तरण
> धारा 20 में किसी बात के रहते हुए भी राज्य सरकार सरकारी गजट में अधिसूचना प्रकाशित करके, संपूर्ण संताल परगना या उसके किसी भाग को गैर-आदिवासी रैयत को सूचित तिथि से, अपने धान के खेतों और प्रथम श्रेणी के बारी भूमियों के चतुर्थांश का भुगतबंध या पूर्ण भोगबंधक द्वारा निम्न में से किसी के नाम हस्तान्तरित करने की स्वीकृति दे सकती है:
» राज्य सरकार द्वारा यथाविधि स्थापित भूमि बंधक रखने वाले बैंक को, 
» उपायुक्त द्वारा अभिस्वीकृत किसी अनाज गोला को,
» बिहार और ओडिसा सहकारी समिति अधिनियम, 1935 के अनुसार निबंधित किसी सोसाइटी को,
» संताल परगना के किसी रैयत को।
परन्तु ऐसा हस्तान्तरण निबंधित प्रलेख द्वारा होना आवश्यक है और इसकी रिपोर्ट निबंधन के एक मास के भीतर हस्तान्तरणकर्ता (transferor) और हस्तान्तरिति (transferee) द्वारा उपायुक्त और जमींदार को दे दी जानी चाहिए। साथ ही ऐसा हस्तान्तरण 6 वर्ष से अधिक की अवधि के लिए नहीं होगा।
> हस्तान्तरिति भूमि का लगान देने का उत्तरदायी होगा तथा लगान नहीं देने की स्थिति में उसे भूमि से निकाल दिया जाएगा और बंधक रद्द कर दिया जाएगा।
> बन्धक की समाप्ति पर उपायुक्त संबंधित पक्षों को बंधक की समाप्ति का नोटिस दिलायेगा तथा हस्तान्तरिति को निकाल कर हस्तान्तरणकर्ता को कब्जा वापस दिलाने की कार्यवाही करेगा।
> उपरोक्त धाराओं के अतिरिक्त अन्य प्रकार किया गया भूमि का हस्तान्तरण धारा 20 की उप धारा (1) के उल्लंघन में किया गया हस्तान्तरण समझा जाएगा।
> बन्धक की समाप्ति के बाद रैयत की भूमि के कब्जे में पाया जाने वाल बन्धकदार (mortgage) को जेल की सजा दी जाएगी। यह सजा तीन माह तक हो सकती तथा उसे पाँच सौ रूपये तक का अर्थदण्ड भी दिया जा सकता है। अपराध जारी रखने के प्रत्येक दिन के लिए अधिकतम दस रूपये का अर्थदण्ड दिया जायेगा।
धारा  22. रैयत द्वारा न्यास पर कृषि के लिए अस्थायी रूप से अपना क्षेत्र दिया जाना
> धारा 20 और 21 में निहित किसी बात के होते हुए भी विभिन्न परिस्थितियों में कोई रैयत अपनी भूमि रजिस्ट्री डाक द्वारा ग्राम प्रमुख, जमींदार और अनुमंडल पदाधिकारी को सूचना देकर न्यास पर जोतने के लिए अस्थायी रूप से दे सकता है। ये परिस्थितियाँ हैं:
» गाँव से रैयत की अस्थायी अनुपस्थिति, या
» उसकी बीमारी या शारीरिक अक्षमता,
» उसके नियंत्रण से बाहर किन्ही कारणों से हल - बैल की क्षति, या
» रैयत के नाबालिग या विधवा होने की दशा
> रैयत की गाँव से अस्थायी अनुपस्थिति या हल - बैल की क्षति की दशा में यदि कोई अवधि नहीं दी गई हो तो 10 वर्ष की अवधि के बाद जोत छोड़ दिया जायेगा।
> उपरोक्त प्रावधानों के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से खेती-बारी करने के लिए किसी जोत का स्थायी या अस्थायी रूप से हस्तान्तरण धारा-20 के उल्लंघन में किया गया हस्तान्तरण समझा जाएगा।
धारा  23. रैयती भूमि का बदलैन ( विनिमय )
> अपनी भूमि को बदलने की इच्छा रखने वाला कोई भी रैयत उपायुक्त को लिखित आवदेन दे सकता है तथा उपायुक्त अपने विवेकानुसार इसकी अनुमति दे सकते हैं। परन्तु उपायुक्त ऐसी अनुमति तब तक नहीं देंगे जब तक कि वे संतुष्ट नहीं हो जाते कि :
» बदलैन के पक्ष में बदली जाने वाली भूमि के सापेक्ष रैयत है,
» बदली जाने वाली भूमियाँ एक ही गाँव में या आस
-पास के गाँवों में है,
» यह गुप्त बिक्री द्वारा नहीं किया जा रहा बल्कि पक्षों की पारस्परिक सुविधा के लिए किया जा रहा हो,
» बदली जाने वाली भूमि समान मूल्य की है।
> यदि इस धारा के प्रावधानों के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार से तथा उपायुक्त की बिना लिखित पूर्व स्वीकृति के किसी भूमि को बदला जाता है, तो यह धारा - 20 के उल्लंघन में किया गया हस्तानांतरण समझा जाएगा।
धारा  24. रैयती जोत के कतिपय हस्तान्तरण का निबंधन
> जब कोई रैयती जोत या उसका कोई खेत बिक्री, दान, वसीयत या बदलैन द्वारा हस्तान्तरित किया जाय तो उसका उत्तराधिकारी हस्तान्तरण को गाँव के जमींदार के यहाँ निबंधित करा सकता है।
> जब संताल परगना के अंतर्गत विधिवत् प्रभाव रखने वाली किसी वस्तु में या खतियान में विपरीत किसी बात के होते हुए भी, ऐसे हस्तान्तरण को जमींदार स्वीकृत करेंगे। 
> बिक्री, दान या वसीयत के द्वारा हस्तान्तरण की दशा में निबंधन के लिए जमींदार द्वारा शुल्क तभी लगाया जा सकता है:
» यदि जोत या उसके खंड के लिए लगान दिया जाता है और ऐसा शुल्क वार्षिक लगान के दो प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। साथ ही यह शुल्क आठ आने से कम तथा पचास रूपये से अधिक नहीं होगा।
» यदि जोत का लगान नहीं लगता हो तो शुल्क एक रूपया लगाया जा सकता है। परन्तु यदि " दान करने वाले के पति या पत्नी को हिन्दू लॉ के अधीन गोद लिये गए पुत्र या पुत्री या बहन और संताल लॉ के अधीन गोद लिये गए पुत्र या पुत्री को या दान करने वाले के तीन पिढ़ी से संबंधित रक्त संबंधी को दान किया जाय तो शुल्क नहीं देना होगा।
> अध्याय - 4 - बंजर भूमियों तथा खाली जोतों की बन्दोबस्ती
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  27. बंजर भूमि की बन्दोबस्ती के लिए पट्टे के जरिये किया जाना 
> बंजर भूमि की बन्दोबस्ती निहित प्रपत्र में पट्टे के द्वारा की जाएगी। इसकी चार प्रतियाँ तैयार , होंगी जिसमें से एक उपायुक्त को एक रैयत को, एक भूस्वामी को तथा एक ग्राम प्रधान या मूल रैयत को दी जाएंगी।
धारा  28. बंजर भूमि या खाली भूमि की बन्दोबस्ती में अनुसरण किए जाने वाले सिद्धांत 
> बंजर भूमि या खाली भूमि के जोतों की बन्दोबस्ती में खतियान में दर्ज सिद्धांतों के अतिरिक्त निम्न बातों पर ध्यान दिया जाएगा:-
» प्रत्येक रैयत की आवश्यकताओं तथा उसकी आबाद लायक बनाने और आबाद करने की क्षमता के अनुसार भूमि का उचित वितरण,
» ग्राम जनता, समाज या राज्य के प्रति की गई सेवाओं हेतु कोई विशेष दावा,
» रैयत की जमाबन्दी भूमि से बंजर भूमि का सान्निध्य या साम्य,
» उन भूमिहीन श्रमजीवियों हेतु व्यवस्था जो गाँव के वास्तविक स्थायी निवासी हैं तथा जिनके संबंध में दर्ज है कि गाँव में रहने का घर है।
धारा  29. उपायुक्त की स्वीकृति के बिना जोत की बन्दोबस्ती नहीं किया जाना
> कोई मूल रैयत प्रधान या ग्राम-प्रमुख उपायुक्त की लिखित पूर्व स्वीकृति के बिना अपने साथ या किसी मूल रैयत के साथ कोई बंजर भूमि या खाली जोत बन्दोबस्त नहीं करेगा। 
धारा  30. बन्दोबस्ती के उद्देश्य से किसी खाली जोत का उप-विभाजन नहीं किया जाना
> जमींदार की सहमति तथा उपायुक्त के अनुमोदन के बिना बन्दोबस्ती के प्रयोजन के लिए जोत उप-विभाजन नहीं किया जायेगा।
धारा  31. जब दो या उससे अधिक ग्राम प्रमुख, सह मूल रैयत या जमींदारों द्वारा संयुक्त गाँव में किसी बंजर भूमि की बन्दोबस्ती यदि संयुक्त रूप से नहीं की गई, तो आपत्ति होने पर उपायुक्त उस बन्दोबस्ती को रद्द या संपरिवर्तित कर सकता है।
धारा  32. बंजर भूमि तथा खाली जोत की बन्दोबस्ती के विरूद्ध उपायुक्त के पास आपत्ति 
> यदि कोई व्यक्ति ग्राम-प्रमुख या मूल रैयत या जमींदार की, बंजर भूमि या खाली जोत को बन्दोबस्त करने या बन्दोबस्त अस्वीकार करने की क्रिया से क्षुब्ध हुआ हो, तो जिस तिथि को बन्दोबस्ती अस्वीकृत की गई, उसके एक वर्ष के भीतर उपायुक्त के यहाँ आवेदनन-पत्र दे सकता है।
धारा  33. बंजर भूमि की बन्दोबस्ती की रही, यदि पाँच वर्ष के भीतर आबाद न की जाय 
> यदि किसी बंजर भूमि की बन्दोबस्ती की तिथि से पाँच वर्ष के भीतर आबाद नहीं की गई हो, तो जमाबन्दी रैयत, ग्राम प्रमुख, मूल रैयत या जमींदार के आवेदन पत्र देने पर उपायुक्त को बन्दोबस्ती रद्द करने या उसकी पुनः बन्दोबस्ती करने का अधिकार होगा।
धारा  34. उपायुक्त द्वारा बंजर भूमि को जाहेरथान, श्मशान या कब्रिस्तान के लिए अलग करना 
> यदि जाहेरथान, श्मशान या कब्रिस्तान के रूप में दर्ज कोई क्षेत्र अनुपयुक्त हो तो, उपायुक्त गाँव में निवास करने वाले जमाबन्दी रैयतों तथा ग्राम प्रमुख या मूल रैयत की राय से गाँव की बंजर भूमि का भाग इस हेतु अलग कर सकता है। 
धारा  35. सिंचाई के लिए जलाशयों या धाराओं आदि का आबाद नहीं किया जाना
> बाँध, आहर, पोखर तथा अन्य जलाशय या धाराएँ जिनका व्यवहार या तो बाढ़ से रक्षा के कामों के लिए या सिंचाई, स्नान, धोने या पीने के लिए किया जाता हो, इसकी बन्दोबस्ती बिना ग्राम-प्रमुख तथा रैयतों या जमींदार की राय या उपायुक्त के अनुमोदन के बिना नहीं किया जाएगा।
> किसी भी जमींदार या मालिक को सिंचाई, स्नान, धोने या पीने के प्रयोजनों के लिए जलाशयों तथा धाराओं के पानी के प्रयोग के लिए कोई कर नहीं लगाएगा।
धारा  36. उन उप-धाराओं या नालों का बंदोबस्त नहीं किया जाएगा जो गाँवों की सीमाओं, श्मशानों तथा कब्रिस्तानों, शिविर स्थलों, सीमा चिन्ह स्थलों, सार्वजनिक पथों, ग्राम - मार्गो, जाहेरथन तथा अन्य पूजा स्थल पर हों ।
धारा  37. रैयत का मवेशी चराने का अधिकार
> गाँव के सभी रैयतों को अभिलेखांकित चारागाह, उपायुक्त द्वारा चिन्हित चारागाह, संताल परगना रेगुलेशन के अनुसार अलग की गई भूमि और वन- - वृद्धि के लिए रख छोड़ी गई भूमि में अपने मवेशी चराने का अधिकार होगा।
धारा  38. चारागाह आबाद नहीं किया जाना
> कोई भी ऐसी भूमि जो ग्राम चारागाह या गोचर के रूप में अभिलेखांकित हो, किसी व्यक्ति द्व रा बन्दोबस्त, आबाद या चराई से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए प्रयुक्त नहीं की जाएगी। 
> यदि चराई के लिए अभिलेखांकित क्षेत्र गाँव के कुल रकबे के पाँच प्रतिशत से कम हो, तो उपायुक्त, जमींदार, ग्राम प्रमुख या मूल रैयत तथा रैयतों की राय से गाँव की बंजर भूमि का समुचित क्षेत्र चराई के लिए अलग कर दे सकता है।
धारा  39. रैयतों को अपने जोतों से भिन्न भूमियों में पोखर इत्यादि खोदने का अधिकार 
> जमींदार की अनुमति से रैयत अपने जोतों से भिन्न भूमियों में पोखर तथा जलाशय खोद सकते हैं वे जमींदार के साथ किए गए प्रबंध के अनुसार उनकी मछलियों एवं अन्य उत्पादन का उपभोग कर सकते हैं।
धारा  40. खास पोखर संबंधी रैयत के मत्स्य- अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करना
> यदि किसी व्यक्ति को किसी पोखर या अन्य जलाशय में मछली मारने का अधिकार हो, तो जमींदार या भूस्वामी या मूल रैयत उसके अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
धारा  41.किसी पहाड़िया गाँव में खाली होल्डिंग तथा बंजर भूमि का गैर पहाड़िया के साथ बंदोबस्त नहीं किया जाना
> किसी पहाड़िया गाँव में कोई बंजर भूमि या खाली जोत की बन्दोबस्ती किसी गैर-पहाड़िया व्यक्ति के साथ नहीं की जा सकेगी।
(Note- पहाड़िया गाँव वह है जो आयुक्त द्वारा उस रूप में घोषित किया गया हो।)
धारा  42. उस व्यक्ति को बेदखल करना जो कृषि भूमि के अनधिकार पूर्ण दखल में हो 
> उपायुक्त अपनी इच्छा से या प्राप्त आवेदन के आधार पर किसी व्यक्ति को बेदखल कर सकता है। जिसने विधि का उल्लंघन करके कृषि भूमि में प्रवेश किया हो या उस पर कब्जा किया हो। 
> अध्याय-5 लगान
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  43 .जिन्स ( वस्तु के रूप ) में लगान नहीं वसूल किया जाना 
> जमींदार या ग्राम-प्रमुख या मूल रैयत को वस्तु के रूप में लगान पाने का अधिकार नहीं होगा।
धारा  44. किसी जमींदार या मूल रैयत का स्वत्व (हित) हस्तान्तरित होने पर कोई रैयत, ग्राम प्रमुख या मूल रैयत हस्तान्तरण के बाद देय और जिनका हित हस्तान्तरित हुआ हो, ऐसे भूस्वामी या मूल रैयत, को सद्भाव में दिए गए लगान के लिए दायी नहीं होगा, जब तक कि स्थानान्तरित लगान देने के पहले हस्तान्तरण की नोटिस रैयत, ग्राम प्रधान या मूल रैयत को न दे दें। 
धारा  45. डाक मनिआर्डर द्वारा लगान चुकती
>  रैयत द्वारा अपने जमींदार, ग्राम प्रमुख या मूल रैयत को डाक मनिआर्डर द्वारा जोत का लगान चुकाया जा सकता है। 
धारा  46. प्रत्येक रैयत के लगान का लेखा रखना अनिवार्य
> जमींदार, ग्राम-प्रमुख या मूल रैयत द्वारा प्रत्येक कृषि वर्ष में प्रत्येक रैयत द्वारा देय लगान, उसके द्वारा चुकाई गयी रकम, बकाया आदि का लेखा रखा जाएगा।
धारा  47. लगान और उसके ब्याज के लिए रसीद
> प्रत्येक रैयत लगान एवं उसका ब्याज चुकाने के बाद भूस्वामी या उसके अभिकर्ता से भुगतान करते समय निःशुल्क रसीद पाने का अधिकारी होगा। 
धारा  48. रसीदों एवं लेखों का प्रपत्र राज्य सरकार प्रस्तुत करेगी
> सभी उचित लेखों के विवरण एवं रसीदों का प्रपत्र राज्य सरकार तैयार कराएगी और इसे सभी अनुमंडल कार्यालय में रखेगी।
धारा  49. लगान होल्डिंगों पर प्रथम प्रभार होगा
> जहाँ रैयत का जोत हस्तान्तरण योग्य है, जोत का लगान जोत का प्रथम प्रभार होगा और ग्राम प्रधान या मूल रैयत की दशा में ग्राम लगान की चुकती के लिए जमींदार, ग्राम प्रमुख या मूल रैयत के जोत पर प्रथम प्रभार होगा।
धारा  50. विशिष्ट कारणों से लगान में कमी
> ऐसे गाँव या हल्के या भूमि का लगान जिनकी बन्दोबस्ती संताल परगना सेट्लमेंट रेगुलेशन के प्रावधानों के अधीन सेट्लमेंट अधिकारी द्वारा किया गया है, उपायुक्त निम्न कारणों से उसका लगान लिखित आदेश द्वारा कम कर सकता है:wwww
» किसी जोत या हल्के या उसके किसी भाग की मिट्टी में बालू पड़ जाने या किसी कारण से उपज में स्थायी रूप से उपज कम हो जाने के कारण।
» ऐसी जोत का जमींदार नोटिस देने पर भी नोटिस के 6 माह के अंदर सिंचाई संबंधी व्यवस्था करने में असमर्थ रहा हो।
» वर्तमान लगान के चालू रहने की अवधि के भीतर प्रमुख खाद्यान्नों के औसत स्थानीय मूल्य यदि किन्हीं अस्थायी कारणों से गिर गये हों।
धारा  51. लगान कमी की अवधि
> धारा 50 के अधीन लगान कम किये जाने पर लगान की और भी कमी उन्हीं कारणों से तब तक नहीं की जाएगी, जब तक कि संताल परगना बंदोबस्त विनियम के अधीन लगान की सूची प्रकाशित नहीं की जाती ।
धारा  52. देय लगान के अतिरिक्त वसूली पर जमींदार को दण्ड
> यदि कोई जमींदार या उसका अभिकर्ता अपने रैयत या ग्राम प्रधान या मूल रैयत से देय लगान के अतिरिक्त और कुछ वसूल करता है, तो उसे 6 माह का साधारण कैद या 500 रूपये का अर्थदण्ड या दोनों प्रकार के दण्ड दिए जा सकते हैं।
> अध्याय - 6 - कतिपय प्रयोजनों के लिए जमींदार द्वारा भूमि का अधिग्रहण
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  53. भवन निर्माण तथा अन्य प्रयोजनों से भूस्वामी द्वारा भूमि का अधिग्रहण
> यदि कोई जमींदार किसी पर्याप्त प्रयोजन से, जिसका संबंध जोत या जमींदार के हित में हो अथवा किसी धार्मिक या शैक्षिक प्रयोजन से अथवा सिंचाई, कृषि व औद्योगिक उन्नति हेतु अथवा सरकार की कोई राष्ट्रीय नीति प्रभावी करने हेतु, उस ग्राम के किसी जोत या उसके किसी भाग जिस पर ग्राम वासियों का समान अधिकार हो, का अधिग्रहण करना चाहे तो इसके लिए उपायुक्त के पास आवदेन दे सकता है।
> उपायुक्त उचित जाँच के पश्चात् ऐसे आवेदन पर अपनी अनुमति दे सकता है या अस्वीकार कर सकता है।
> उपायुक्त अनुमति देने से पूर्व रैयतों तथा जोत में हित रखने वाले अन्य व्यक्तियों को अपने समक्ष उपस्थित होकर आपत्ति लेख देने हेतु नोटिस जारी करेगा।
> उचित जाँच के बाद उपायुक्त जमींदार या ग्राम प्रमुख या मूल रैयत को यह आदेश दे सकता है कि रैयत या हित रखने वाले अन्य व्यक्ति को उपायुक्त द्वारा निर्धारित उचित क्षतिपूर्ति देकर वे जोत पर कब्जा प्राप्त कर सकते हैं ।
> यदि रैयत या हित रखने वाला व्यक्ति क्षतिपूर्ति सेना अस्वीकार कर दें, तो उपायुक्त ग्राम-प्रमुख या मूल रैयत को उसके (उपायुक्त के) पास उक्त रकम जमा कराने पर उसक का कब्जा दे सकता है।
> वह रैयत जिसकी भूमि अधिग्रहित की गई हो, क्षतिपूर्ति पाने के अतिरिक्त इस बात होअधिकारी होगा कि उसका लगान उसी अनुपात में घटा दिया जाय। 
> यदि कब्जा के पाँच वर्षों के भीतर अधिग्रहीत भूमि उस प्रयोजन हेतु प्रयुक्त नहीं किया गया जिसके लिए यह अपेक्षित थी, तो उपायुक्त आदेश देकर भूमि के मूल रैवत अथवा उसक उत्तराधिकारी अथवा हित रखने वाले व्यक्ति को भूमि वापस दे सकता है। यदि वह व्यक्ति उम भूमि को वापस न ले तो उपायुक्त गाँव की बंजर भूमि की तरह उस भूमि का बंदोबस्त का सकता है।
> अध्याय-7 न्यायिक प्रक्रिया
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  54. प्रक्रिया के संबंध में नियम बनाने का राज्य सरकार का अधिकार
> इस अधिनियम के अनुसार आवेदन पत्रों तथा अन्य कार्यवाहियों के संबंध में प्रक्रिया अथवा नियम की व्यवस्था न होने पर राज्य सरकार नियम बना सकती है।
> नियम न बने या बन जाने पर संताल सिविल रूल्स के प्रावधान इस संबंध में लागू होंगे। 
धारा  55. लगान वसूली के लिए रैयतों के विरूद्ध उत्तरोत्तर मुकदमें
> यदि लगान की वसूली हेतु किसी रैयत के विरुद्ध जमींदार ने कोई मुकदमा किया हो, तो उसके विरूद्ध पहले मुकदमे की तिथि के 6 माह के भीतर लगान की वसूली के लिए दूस मुकदमा दायर नहीं किया जाएगा।
धारा  56. बेदखली
> उपायुक्त के आदेश के बिना कृषि भूमि से कोई व्यक्ति नहीं निकाला जाएगा।
> यदि कोई रैयत संपूर्ण जोत से निकाल दिया गया हो तो उपायुक्त अपने विवेकानुसार उसे अपने निवास भवन पर कब्जा बनाए रखने हेतु अनुमति दे सकता है तथा लगान का निर्धारण कर सकता है।
धारा  57.अपील
> इस अधिनियम के अनुसार निम्नलिखित आदेश के विरूद्ध अपील की जा सकती है:
» यदि आदेश उपायुक्त के अधिकार का प्रयोग करने वाले उपसमाहर्ता द्वारा दिया गया हो, तो अनुमंडल पदाधिकारी के पास, जिसे इस संबंध में उपायुक्त ने अधिकार निहित किए हों। उपायुक्त अपील के संबंध में अपनी संचिका (फाइल) में या अधिकृत उपसमाहर्ता के फाइल में अंतरण करने के लिए आदेश दे सकता है।
» यदि आदेश उपायुक्त के अधिकारों का प्रयोग करने वाले अनुमंडल पदाधिकारी द्वारा दिया गया हो, तो उपायुक्त के पास अपील की जा सकती है।
» यदि आदेश उपायुक्त अथवा अवर उपायुक्त द्वारा गया हो, तो आयुक्त के पास अपील की जा सकती है।
» यदि आदेश आयुक्त द्वारा दिया गया हो, तो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त न्यायाधिकरण के पास अपील की जा सकती है।
धारा  58. दूसरी अपील
> पुनरीक्षण के संबंध में धारा-59 के प्रावधानों के अधीन रहकर सभी दशाओं में अपीलीय आदेश, जहाँ नीचे के न्यायालय के निर्णय का अभिपोषण किया गया हो, अंतिम होगा और दूसरी अपील की अनुमति नहीं दी जाएगी।
> यदि उपायुक्त या अपर उपायुक्त ने नीचे के न्यायालय के निर्णय को परिवर्तित किया हो, 
(क) पुनर्विचार अधिकार से निहित अनुमंडल पदाधिकारी ने यदि पुनर्विचार आदेश दिया हो, तो उपायुक्त के पास अपील की जाएगी।
(ख) यदि पुनर्विचार का आदेश उपायुक्त या अपर उपायुक्त ने दिया हो तो आयुक्त के पास अपील की जाएगी।
> अपील करने पर आयुक्त द्वारा अथवा धारा 57 के अनुसार नियुक्त न्यायाधिकरण द्वारा दिये गये आदेश के विरूद्ध दूसरी अपील नहीं की जाएगी।
धारा  59. पुनरीक्षण (Revision)
1. आयुक्त अथवा उपायुक्त अपने प्रेरणा से अथवा अन्य रूप से अपने नियंत्रण के अंतर्गत किसी न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय या किसी मुकदमें का अभिलेख मांग सकतें हैं जिस पर अपील न हो। परन्तु किसी पक्ष के आवदेन देने पर आयुक्त ऐसा आदेश नहीं देगा जब तक कि उपायुक्त अथवा अपर उपायुक्त ने अपील पर सुनवाई की हो और आदेश दिया हो ।
2. उपायुक्त लिखित आदेश द्वारा अपने नियंत्रण में कार्यरत किसी अनुमंडल पदाधिकारी को अधिकृत कर सकते हैं कि वह ऐसे उपसमाहर्त्ता जो उपायुक्त के नियंत्रण में किसी एक अनुमंडल का प्रभार रखता हो, के न्यायालयों के सभी निर्णयों के संबंध में उप धारा (1) के तहत उपायुक्त को प्रदत्त अधिकारों का प्रयोग करे।
धारा  60. पुनर्विलोकन (Review)
1. आयुक्त किसी ऐसे आदेश का पुनर्विलोकन कर सकते हैं जो उन्होनें स्वयं या उनके पूर्वाधिकारी ने इस अधिनियम के तहत प्रदत्त अधिकारों के प्रयोग में दिये हों। 
> आयुक्त के अधीनस्थ कोई अधिकारी किसी ऐसे आदेश का पुनर्विलोकन नहीं कर सकता है, जिसे उसने स्वयं या उसके पूर्वाधिकारी ने दिया हो । परन्तु लिपीकीय भूल अथवा अन्य किसी भूल-चूक का सुधार जो किसी असावधानी के कारण हो, निम्न के बिना पूर्वानुमति के कर सकता है :
(क) उप समाहर्त्ता अथवा अनुमंडल पदाधिकारी की दशा में उपायुक्त की बिना पूर्वानुमति के और
(ख) उपायुक्त अथवा अपर उपायुक्त की दशा में आयुक्त की बिना पूर्वानुमति के ।
धारा  61. केवल प्रावैधिक (Technical) आधार पर किसी आदेश का पुनरीक्षण नहीं किया जाएगा 
> उपायुक्त द्वारा दिया गया आदेश, अपील करने पर अथवा पुनरीक्षण की प्रक्रिया में अनियमितता के कारण परिवर्तित नहीं किया जाएगा, जब तक उस अनियमितता के कारण न्याय की हानि न हुई हो। 
धारा  62. उपायुक्त तथा उपसमाहर्त्ता पर नियंत्रण
> इस अधिनियम के तहत अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन और शक्तियों का प्रयोग करते हुए उपायुक्त, आयुक्त के सामान्य निर्देश एवं नियंत्रण के अधीन रहेंगे तथा अतिरिक्त उपायुक्त, अनुमंडल पदाधिकारी व उपसमाहर्त्ता, उपायुक्त के सामान्य निर्देश एवं नियंत्रण के अधीन रहेंगे।
धारा  63. मुकदमों पर रोक 
> इस अधिनियम के तहत उपायुक्त द्वारा दिये गये किसी भी आदेश को परिवर्तित या अपास्त करने के लिए कोई भी न्यायालय वाद ग्रहण नहीं करेगा।
> अध्याय - 8 परिसीमा (Limitation)
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  64. परिसीमा का सामान्य नियम
> इस अधिनियम के अधीन सभी आवेदन जिसके लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं हो, अधिनियम के अन्यत्र परिसीमा हेतु कोई अवधि नहीं है, वाद हेतु प्रावधान के दिन से एक वर्ष तक जमा होंगे।
> धारा 42 के लिए आवेदन में परिसीमा के लिए कोई समय सीमा नहीं होगी।
धारा  65. बेदखली के मुकदमों के लिए परिसीमा
> धारा 14 में उल्लिखित आधार पर रैयत की बेदखली का आवेदन उस परिवाद के दुरूपयोग की तारीख से दो वर्ष के भीतर देना होगा।
धारा  65. सरकार के द्वारा लगान का बकाया चुकता के वाद की समय सीमा
> राज्य सरकार के द्वारा बकाया लगान वसूल करने के वाद में जिस कृषि वर्ष के अन्त से लगान बकाया है, वाद की समयसीमा उस वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक होगी।
धारा  66. अपीलों के लिए परिसीमा
> इस अधिनियम के अधीन अपील: –
(क) धारा 57 के तहत नियुक्त न्यायाधिकरण या आयुक्त के समक्ष किसी आदेश के विरूद्ध अपील, आदेश की तारीख से 90 दिनों के भीतर की जाएगी।
(ख) उपायुक्त या अनुमंडल पदाधिकारी के समक्ष किसी आदेश के विरूद्ध अपील, आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर की जाएगी।
> अध्याय - 9  विविध प्रावधान (Miscellaneous Provisions)
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  67. अर्थदण्ड ( जुर्माना )
1. कोई व्यक्ति दो सौ रूपये जुर्माना तथा अपराध जारी रहने की दशा में प्रतिदिन पाँच रूपये तक यदि:
और जुर्माना का भागी होगा, यदि:–
(क) जमींदार होते हुए किसी बाँध, आहर, धारा, डैम, नाला, डून, तालाब या किसी अन्य जलाशयों व नहर की मरम्मत और रखरखाव से चूकता है जिसके लिए वह बाध्य है।
(ख) जमींदार या जमींदार का अभिकर्त्ता, ग्राम प्रधान या मूल रैयत होते हुए भी इस अधिनियम या किसी विधि के अधीन किसी प्रथा के पालन से चूकता है।
(ग) जमींदार या जमींदार का अभिकर्त्ता, ग्राम प्रधान या मूल रैयत, रैयतों की सहायता से किसी बाँध, आहर, डैम, धारा, नाला, तालाब और कोई अन्य जलाशय या सिंचाई नहर या गाँव के रास्ते या पड़ाव भूमि या चारागाह की मरम्मत से चूकता है।
(घ) जमींदार या जमींदार का अभिकर्त्ता, गाम- प्रधान या मूल रैयत धारा 20 के विपरीत गाँव की किसी भूमि का हस्तान्तरण करने पर समर्थ अधिकारी को इसका प्रतिवेदन देने से चूकता है।
(ड.) जमींदार या जमींदार का अभिकर्त्ता होते हुए ग्राम प्रमुख की मृत्यु का प्रतिवेदन उपायुक्त को देने से चूकता है।
(च) जमींदार या जमींदार का अभिकर्त्ता, ग्राम प्रमुख या मूल रैयत किसी गाँव की बंजर भूमि, खाली जोत या अन्य जोत की गैर-जमाबंदी रैयत के साथ बन्दोबस्ती करता है ।
(छ) जमींदार या जमींदार का अभिकर्त्ता होते हुए नवनियुक्त ग्राम-प्रमुख को जमाबंदी या अधिकार-अभिलेख की प्रति धारा 8 में निर्दिष्ट निर्धारित अवधि के भीतर देने से चूकता है। 
(ज) रैयत होते हुए – 
1. जमींदार या ग्राम-प्रमुख या मूल रैयत को गाँव के बाँधो, आहरों, मेड़ों, डांडों, नालियों, तालाबों या किन्हीं अन्य जलाशयों और सिंचाई के नालों, गाँव के रास्तों या सीमा- चिन्हों की मरम्मत में सहायता देने से चूकता है।
2. किसी अभिलिखित गाँव के रास्ते, पड़ावभूमि या चारागाह का अतिक्रमण करता है। 
3. धारा 20 के प्रावधानों के विपरीत अपनी भूमि को हस्तान्तरित करता है या इस प्रकार हस्तानांतरित किसी भूमि को जोतता है।
4. गाँव से कोई पेड़ काटता है या गाँव के जंगल का प्रयोग किसी विधि के विपरीत करता है।
2. ऐसा अर्थदण्ड उपायुक्त द्वारा जाँच-पड़ताल के बाद स्व-प्ररेणा से या सूचना पाने पर अपराध किये जाने की तारीख से तीन माह के भीतर परिक्षुब्ध पक्ष के अभियोग- पत्र देने पर लगाया जाएगा। 
3. उपायुक्त द्वारा अर्थदण्ड लगाने के किसी आदेश के विरूद्ध अपील आयुक्त के यहाँ होगी तथा अपील पर आयुक्त द्वारा दिया गया आदेश अंतिम होगा।
धारा  68. जमींदार पर नोटिस की तामीली 
> यदि जमींदार पर तामील की जाने वाली कोई भी नोटिस जमींदार की ओर से उसकी तामीली स्वीकार करने के लिए या उसे लेने हेतु जमींदार द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत किसी अभिकर्त्ता को तामील की जाए, तो ऐसा समझा जाएगा कि नोटिस स्वयं जमींदार को तामील की गई है।
धारा  69. कुछ भूमियों के अधिकार के अर्जन पर रोक
> इस विधि या संताल परगना में विधिवत् प्रभाव रखने वाली किसी वस्तु में किसी बात के होते हुए 
भी –
(क) धारा 20 के प्रावधानों में अधिग्रहित भूमि में, अथवा
(ख) सरकार के लिए या किसी स्थानीय प्राधिकार के लिए या रेलवे कम्पनी के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के अधीन अधिग्रहित भूमि में, जब तक कि ऐसी भूमि सरकार की या किसी स्थानीय प्राधिकार की या रेलवे कम्पनी की सम्पत्ति रहती है, अथवा 
(ग) सरकार या स्थानीय प्राधिकार के अधिकार में अभिलिखित या सीमांकित भूमि में, जो किसी सार्वजनिक कार्य हेतु प्रयोग में है, अथवा
(घ) ग्राम-प्रमुख, मूल रैयत और उनके परिवार के सदस्यों या जमींदार के द्वारा धारित परती जोत में, अथवा
(ड.) ग्राम प्रमुख की जोत, चारागाह, जाहेरथान तथा श्मशान और कब्रिस्तान में किसी व्यक्ति को कोई अधिकार प्रोद्भूत (accrue) नहीं होगा।
धारा  70. बकायों की वसूली
1. इस अधिनियम के अधीन सभी परिव्यय, ब्याज, हानि और क्षतिपूर्तियों की वसूली डिक्री के लिए बाकी धन की वसूली के लिए उपबंधित रीति से वसूल किए जाएंगे।
2. इस अधिनियम के तहत लगाए गए सभी जुर्माने और दण्ड की वसूली सार्वजनिक मांग वसूली के लिए उस समय लागू किसी विधि द्वारा उपबंधित रीति से वसूल किए जाएंगे।
धारा  71. नियम बनाने का अधिकार
1. राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के उद्देश्यों को क्रियान्वित करने के लिए नियम बना सकती है।
2. राज्य सरकार विशेष कर और पूर्व के अधिकार की सामान्यता को आघात पहुँचाए बिना ध. रा 5 के अधीन जमाबंदी रैयतों की सहमति निश्चित करने की रीति, ग्राम प्रमुखों द्वारा अपने कर्त्तव्यों के संपादन की रीति, जमाबंदी की प्रतियाँ प्रमाणित करने की रीति, ग्राम प्रमुख का पुरस्कार निर्धारित करने की रीति, रैयती भूमि का हस्तान्तरण प्रतिवेदित करने की रीति, धारा 25 के अधीन निबंधन अधिकारी को देय प्रक्रिया शुल्क (Process-fee) की राशि तथा जमींदार को सूचना तामील करने की रीति, धारा 32 के अधीन नोटिस तामील कराने की रीति, धारा 53 के अधीन भूमि के अधिग्रहण पर प्रतिबंध तथा ऐसी भूमि पर कब्जा देने की रीति, अन्य कार्यवाहियों में न्यायालयों द्वारा अनुसरणीय प्रक्रिया तथा अन्य कोई विषय जो अपेक्षित हो, के संबंध में नियम बना सकती है ।
धारा  72. विशिष्ट विधानों का व्यावृति
> इस अधिनियम की कोई बात संताल परगना में लागू किसी अन्य विधि को, जो द्वारा स्पष्टतः या आवश्यक विवक्षण द्वारा रद्द नहीं की गई है, प्रभावित नहीं करेगी। 
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Sat, 24 Jun 2023 13:02:02 +0530 Jaankari Rakho
छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 https://m.jaankarirakho.com/छोटानागपुर-काश्तकारी-अधिनियम-1908 https://m.jaankarirakho.com/छोटानागपुर-काश्तकारी-अधिनियम-1908 > धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा 1. संक्षिप्त नाम तथा प्रसार
> इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम 'छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908' है।
> इसका प्रसार उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर तथा पलामू प्रमण्डल में होगा।
धारा 3. परिभाषाएँ
> कृषि वर्ष - वह वर्ष जो किसी स्थानीय क्षेत्र में कृषि कार्य हेतु प्रचलित हो ।
> भुगतबंध बंधक - किसी काश्तकार के हित का उसकी काश्तकारी से - उधार स्वरूप दिये गए धन के भुगतान को बंधक रखने हेतु इस शर्त पर अंतरण, कि उस पर के ब्याजों के साथ उधार बंधक की कालावधि के दौरान काश्तकारी से होनेवाले लाभों से वंचित समझा जाएगा।
>  जोत - रैयत द्वारा धारित भूखंड
> कोड़कर / कोरकर - ऐसी बंजर या जंगली भूमि जिसे भूस्वामी के अतिरिक्त किसी कृषक द्वारा तैयार की गयी हो। इसे जलसासन, अरियत या बाभला खनवत के नाम से भी जाना जाता है। 
> भूस्वामी (Landlord ) - वह व्यक्ति जिसने किसी काश्तकार को अपनी जमीन दिया हो।
> काश्तकार - वह व्यक्ति जो किसी अन्य व्यक्ति के अधीन भूमि धारण करता हो तथा उसका लगान चुकाने का दायी हो । काश्तकार के अंतर्गत भूधारक, रैयत तथा खूँटकट्टीदार तीनों को शामिल किया गया 
है ।
> लगान- रैयत द्वारा धारित भूमि के उपयोग या अधिभोग के बदले अपने भूस्वामी को दिया जाने वाला धन या वस्तु ।
> चल संपत्ति के अंतर्गत खड़ी फसल भी आती है।
> मुण्डारी खूँटकट्टीदारी - काश्तकारी- मुण्डारी खूँटकट्टीदार का हित
> भूधृति (Tenures ) - भूधारक का हित । इसके अंतर्गत मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी नहीं आती है।
> स्थायी भूधृति - वंशगत भूधृति।
> पुनर्ग्राह्य भूधृत्ति- वैसी भूधृति जो परिवार के नर वारिस नहीं होने पर, रैयत के निधन के बाद पुनः भूस्वामी को वापस हो जाए।
> ग्राम मुखिया - किसी ग्राम या ग्राम समूह का मुखिया । चाहे इसे मानकी, प्रधान, माँझी या अन्य किसी भी नाम से जाना जाता हो ।
> स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) - 1793 ई० में बंगाल, बिहार और उड़ीसा के संबंध में किया गया स्थायी बंदोबस्त |
> डिक्री (Decree) - सिविल न्यायालय का आदेश ।
> अध्याय-2 काश्तकारों के वर्ग (Classes of tenants)
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा 4. - काश्तकारों के वर्ग
> काश्तकार के अंतर्गत भूधारक (Tenure Holders), रैयत (Raiyat), दर रैयत तथा मुण्डारी खूँटकट्टीदार को शामिल किया गया है।
> रैयत तीन प्रकार के हो सकते हैं
> अधिभोगी रैयत (Occupancy Raiyat) - वह व्यक्ति जिसे धारित भूमि पर अधिभोग का अधिकार प्राप्त हो।
> अनधिभोगी रैयत (Non-occupancy Raiyat) - वह व्यक्ति जिसे धारित भूमि पर अधिभोग का अधिकार प्राप्त न हो।
> खूँटकट्टी अधिकार प्राप्त रैयत (Occupancy raiyat)
(Note - ऐसा काश्तकार / रैयत जो किसी रैयत के अधीन हो, दर रैयत कहलाता है।) 
धारा 5. “भू-धारक" का अर्थ
भू-धारक (land holder) का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो अपनी या दूसरे की जमीन खेती कार्य के लिए धारण किए हुए है एवं उसका लगान चुकाता हो।
धारा 6. रैयत का अर्थ
> रैयत के अंतर्गत वैसे व्यक्ति शामिल हैं जिन्हें खेती करने के लिए भूमि धारण करने का अधिकार प्राप्त 
हो ।
धारा 7. खूँटकट्टी अधिकारयुक्त रैयत का अर्थ
> वैसे रैयत, जो वैसी भूमि पर अधिभोग का अधिकार रखते हों, जिसे उसके मूल प्रवर्तकों या उसकी पर परंपरा के वंशजों द्वारा जंगल में कृषि योग्य भूमि के रूप में विकसित किया गया हो, तो उसे खूँटकट्टी अधिकारयुक्त रैयत कहा जाता है ।
धारा 8. "मुण्डारी खूँटकट्टीदार" का अर्थ
> वह मुण्डारी जिसने जंगली भूमि के किसी हिस्से को जोत में लाने हेतु भूमि का अधिकार अर्जित किया हो, उसे मुण्डारी खूँटकट्टीदार कहा जाता है।
> अध्याय-3 भू-धारक
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा 9. भू-धारक लगान वृद्धि के लिए कब दायी न होगा
> यदि किसी भू-धारक के लगान में बंदोबस्त के समय से परिवर्तन न किया गया हो, उसके लगान में बढ़ोत्तरी नहीं की जाएगी।
धारा 9 क . भू-धारक या ग्राम मुखिया के लगान में वृद्धि
> भू-धारक या ग्राम मुखिया का लगान केवल उपायुक्त के पास दिये गये आवेदन पर पारित आदेश या राजस्व अधिकारी द्वारा पारित आदेश से ही बढ़ाया जा सकेगा 
धारा 11. भूधृत्तियों के कतिपय अंतरणों का रजिस्ट्रीकरण
इसमें भूधृत्ति/पट्टेदारी के अंतरणों के रजिस्ट्रीकरण से संबंधित प्रावधानों का वर्णन है।
धारा  13. भूधृत्ति का विभाजन या लगान का वितरण
> यदि किसी भूधृत्ति के विभाजन या वितरण की सूचना भूस्वामी को रजिस्ट्रीकृत डाक से भेज दिया गया हो, तो उस भूमि का लगान भू-स्वामी द्वारा देय होगा।
> यदि भूस्वामी ऐसे विभाजन या वितरण के लगान पर आपत्ति करता है तो, इसके लिए उपायुक्त के पास आवेदन कर सकता है।
धारा  14. पुनर्ग्रहणीय भूधृत्ति के पुनर्ग्रहण पर विल्लंगमों का वातिलीकरण
> कोई जमीन जो पुनर्ग्रहण योग्य हो, अपने पुनर्ग्रहण की तिथि पर पुनर्ग्रहित हो जाएगी।
> निम्न परिस्थितियों में पट्टे पर दी गयी भूमि का पुनर्ग्रहण नहीं किया जा सकेगा
» जहाँ निवासगृह, निर्माणशाला या अन्य स्थायी भवन निर्मित किया गया हो।
» जिस पर स्थायी उद्यान, बागान, हौज, नहर, पूजास्थल, श्मशान या कब्रिस्तान स्थापित किया गया हो।
» जहाँ किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्राधिकृत खदान बनाया गया हो।
अध्याय-4 - रैयत (Raiyat)
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा 16.  विद्यमान अधिभोगाधिकार का बना रहना 
> यदि किसी रैयत को इस अधिनियम के प्रारंभ होने के पूर्व कानूनी रूप से, किसी रूढ़ि या प्रथा द्वारा भूमि में अधिभोगाधिकार (occupancy rights ) प्राप्त हो, तो इस बात के होते हुए भी कि उसने 12 वर्षों तक भूमि पर न तो खेती की है और न ही उसे धारित किया है, भूमि पर उसका अधिभोगाधिकार समाप्त नहीं होगा। 
धारा  17. बंदोबस्त रैयत की परिभाषा
> इस धारा के अंतर्गत बंदोबस्त रैयत को परिभाषित किया गया है। इसके अंतर्गत:
» वह व्यक्ति जिसने इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् किसी ग्राम में स्थित भूमि को पूर्णतः या अंशतः पट्टे पर या रैयत के रूप में धारित किया हो, 12 वर्ष की अवधि समाप्त होने पर उस ग्राम का बंदोबस्त रैयत समझा जाएगा।
» कोई व्यक्ति जब तक रैयत के रूप में भूमि धारण करता है, वह रैयत की अवधि के तीन वर्ष पश्चात् तक ग्राम का बंदोबस्त रैयत समझा जाएगा।
» यदि कोई रैयत धारा - 71 के अधीन या बाद के जरिये भूमि का कब्जा वापस लेता है, तो जमीन के तीन वर्ष से अधिक समय तक बेकब्जा रहने के बावजूद वह बंदोबस्त रैयत समझा जाएगा।
धारा  18. भूईहरों तथा मुण्डारी खूँटकट्टीदारों का बंदोबस्त रैयत होना
> इस धारा में भुईहरों तथा मुण्डारी खूँटकट्टीदारों के बंदोबस्त रैयत होने से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख है। इसके अंतर्गत: – 
(क) यदि किसी ग्राम में मंझिहस या बढखेता के रूप में ज्ञात भूमि के अतिरिक्त कोई भूमि 'छोटानागपुर भूधृत्ति अधिनियम, 1869' के तहत तैयार रजिस्टर में शामिल हो और वहाँ किसी भूईहर परिवार के सदस्य लगातार 12 वर्षों तक भूमि धारण करते आये हों, तो वे ( भूईहर परिवार के सदस्य) बंदोबस्त रैयत समझे जाएंगे।
(ख) किसी गाँव की ऐसी भूमि जो मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी का भाग न हो, फिर भी इस अधिनियम या इसके प्रारंभ से पूर्व प्रवृत किसी विधि के अधीन किसी अभिलेख में मुण्डारी खूँटकट्टीदारी के रूप में दर्ज कर दी गयी हो, तो ऐसे ग्राम के मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी परिवार के सभी पुरूष सदस्य जो उस गाँव में लगातार 12 वर्षों से भूमि धारण करते हों, बंदोबस्त रैयत समझे जाएंगे।
धारा  19. बंदोबस्त रैयतों के अधिभोगाधिकार
> वैसा व्यक्ति जो धारा-17 या धारा -18 के अंतर्गत किसी गाँव का बंदोबस्त रैयत हो, उस गाँव में उसके द्वारा रैयत के रूप में धारित सभी भूमि में अधिभोगाधिकार होगा।
धारा  21. भूमि के उपयोग के संबंध में अधिभोगी रैयत के अधिकार 
> कोई भी रैयत जिसे किसी भूमि के बारे में अधिभोगाधिकार हो, वह अपनी भूमि का उपयोग स्थानीय रीति/प्रथा द्वारा या इसके बिना भी काश्तकारी के लिए कर सकता है।
> वह अपनी भूमि का प्रयोग कृषि कार्य हेतु, ईंट और खपड़ों के विनिर्माण हेतु, पेयजल, कृषि कार्य या मत्स्य पालन हेतु कुएं की खुदाई या बाँध व आहरों के निर्माण हेतु तथा व्यापार व कुटीर उद्योगों के संचालन के लिए भवन बनाने के संदर्भ में कर सकता है।
> यदि कोई रैयत अपनी जोत के लगान का भुगतान करता है, तो ऐसी जोत पर किसी भी प्रयोजन के लिए निर्मित तालाब के उत्पादों में भू-स्वामी का हिस्सा 9/20 तथा रैयत का हिस्सा 11/20 होगा।
धारा  21 क . वृक्षों में अधिभोगी रैयत का अधिकार
>कोई भी रैयत जिसे किसी भूमि के बारे में अधिभोगाधिकार हो और उस भूमि के लगान का भुगतान नकद किया जाता हो या भूमि लगान मुक्त हो तो :
> रैयत उस भूमि पर वृक्ष और बांस लगा सकता है, उसे काट सकता है तथा उसे ले सकता है।
> रैयत उस भूमि पर लगे बाँस (चाहे उसके द्वारा न लगाया गया हो) को काट सकता है और ले सकता है।
> रैयत ऐसी भूमि पर खड़े किसी वृक्ष के फूलों, फलों एवं अन्य उत्पादों का प्रयोग कर सकता है तथा वृक्षों पर लाह एवं कुसवारी उगा सकता है तथा उसका प्रयोग कर सकता है।
> यदि ऐसी भूमि के लगान का भुगतान धारा - 61 के अनुसार किया जा रहा हो तो इस भूमि पर उत्पादित काष्ठ में भूस्वामी और रैयत का हिस्सा बराबर होगा।
> इस भूमि पर उगने वाले सभी वृक्षों के उत्पादों (फल, फूल व अन्य उत्पादों) में भू-स्वामी का हिस्सा 9/20 तथा रैयत का हिस्सा 11/20 होगा।
धारा  22. रैयत की बेदखली
> यदि अधिभोगी रैयत अपनी जोत पर धारा 21 या 21क द्वारा प्राधिकृत रीति से तथा संविदा की शर्तों के अनुरूप खेती करता रहा हो तो, उसे भू-स्वामी द्वारा किसी विनिष्ट आधारों के सिवा बेदखल नहीं किया जा सकेगा। 
धारा  24. लगान के भुगतान हेतु रैयत की बाध्यता
> अधिभोगी रैयत अपनी जोत के लिए उचित एवं साम्यिक दर से लगान का भुगतान करेगा। 
धारा  27. रैयत के जोत का लगान बढ़ाने की रीतियाँ 
> यदि इस अधिनियम या इसके पूर्व प्रवृत्त किसी विधि के अधीन अधिकार-अभिलेख का प्रकाशन नहीं किया गया हो या ऐसे किसी अभिलेख की तैयारी के लिए आदेश निर्गत न किया गया हो तो अधिभोगी रैयत, जिसका लगान वृद्धि का दायी हो, तो केवल धारा 29 के अधीन उपायुक्त द्वारा पारित आदेश से ही लगान बढ़ाया जा सकेगा।
> यदि अधिकार अभिलेख प्रकाशित कर दिया गया हो या अभिलेख की तैयारी के लिए आदेश निर्गत कर दिया गया हो तो धारा 62, धारा 94 या धारा 99 में निर्दिष्ट दशाओं में धारा 29 के अधीन उपायुक्त के आदेश से तथा अन्य दशाओं में धारा 12 के अधीन राजस्व अधिकारी के पारित आदेश से ही लगान बढ़ाया जा सकेगा।
धारा  33 क . रैयत के जोत के लगान में कमी संबंधी प्रावधान
> रैयत के जोत का लगान निम्नांकित दशाओं में उपायुक्त द्वारा कम किया जा सकता है 
> यदि जोत का लगान धारा 29 के अधीन 1 जनवरी, 1911 और 31 दिसम्बर, 1936 के  बीच किसी समय बढ़ा दिया गया हो ।
> यदि जोत के किसी अंश या पूरी जोत की मिट्टी किसी आकस्मिक या क्रमिक कारणों से स्थायी या अस्थायी रूप से आकृष्ट (निम्नीकृत) हो गयी हो ।
> यदि जोत का स्वामी सिचांई का प्रबंध करने में असफल रहा है।
> यदि वर्तमान लगान के जारी रहने के दौरान मुख्य खाद्य फसलों के औसत स्थानीय मूल्य में गिरावट आ गया है।
> यदि रैयत द्वारा धारित भूमि का क्षेत्र उस क्षेत्र से कम है जिसके लिए उसके द्वारा पूर्व में लगान का भुगतान किया गया है।.
(Note- अधिनियम की धारा 24 से 36 तक लगान एवं उससे संबंधित पहलुओं के बारे में प्रावधान किया गया है ।)
धारा  37. अध्याय-5 खूँटकट्टी अधिकार प्राप्त रैयत
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
> खूँटकट्टी अधिकार प्राप्त रैयत
> इस अधिनियम के अधिभोगी रैयत संबंधी प्रावधान उन रैयतों पर भी लागू होंगे, जिन्हें खूँटकट्टी अधिकार प्राप्त हों, लेकिन:-
» यदि रैयत द्वारा इस अधिनियम के प्रारंभ के बीस वर्षों से अधिक पूर्व भूमि की काश्तकारी सृजित की गयी हो, तो भूमि का लगान नहीं बढ़ाया जाएगा।
» यदि भूमि के लगान में वृद्धि हेतु कोई आदेश पारित किया गया हो तो, लगान में वृद्धि उसी गाँव में समरूप भूमि के अधिभोगी रैयत पर लगाए गए लगान के आधे से अधिक नहीं होगी।
> अध्याय - 6 अनधिभोगी रैयत
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  38. अनधिभोगी रैयत का प्रारंभिक लगान और पट्टा
> अनधिभोगी रैयत की भूमि का लगान उसके और भूस्वामी के बीच किये गए करार के आधार पर तय किया जाएगा।
धारा  39. अनधिभोगी रैयत को अपनी जोत का लगान उसी प्रकार देना होगा जिस प्रकार अधिभोगी रैयत देते हैं।
धारा  40. अनधिभोगी रैयत के लगान की वृद्धि
> लगान में वृद्धि रजिस्ट्रीकृत करार तथा धारा 42 के अधीन करार के सिवाय नहीं बढ़ाया जा सकता है।
धारा  41. अनधिभोगी रैयत की बेदखली का आधार
> किसी भी अनधिभोगी रैयत को निम्नांकित आधारों में से किसी एक या अधिक के आधार पर ही बेदखल किया जा सकता है :
» तीसरे कृषि वर्ष के प्रारंभ के बाद 90 दिनों के अंदर पिछले दो कृषि वर्षों का लगान देने में असमर्थ रहा हो।
» जोत की भूमि का अनुपयुक्त प्रयोग जिसके कारण भूमि का मूल्य हासित हुआ हो अथवा इसे काश्तकारी प्रयोग के अनुपयुक्त बना देता हो ।
» यदि रैयत ने अपने और भूस्वामी के बीच हुए संविदा के किसी प्रावधान का उल्लंघन किया हो। » रजिस्ट्रीकृत पटट्टे की अवधि समाप्त हो गयी हो ।
» रैयत ने उचित लगान का भुगतान करने से इनकार कर दिया हो।
धारा  42. यदि रैयत ने उचित एवं साम्यिक लगान का भुगतान करने से इनकार कर दिया हो तो भूस्वामी रैयत को बेदखल करने हेतु उपायुक्त के कार्यालय में आवेदन देगा। उपायुक्त द्वारा विभिन्न पक्षों | को सुनने के पश्चात् ही बेदखली होने या न होने का निर्णय दिया जायेगा।
> अध्याय-7 अध्याय 4 तथा अध्याय 6 से छूट प्राप्त भूमी 
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  43. > भूस्वामी की विशेषाधिकारयुक्त भूमियों तथा अन्य भूमियों को अध्याय 4 और 6 के प्रावधानों से छूट 
> निम्नलिखित प्रकार के भूमियों पर न तो अधिभोगाधिकार (Occupancy rights) अर्जित
किया जा सकता और न ही इन पर अनधिभोगी रैयत (Non occupancy raiyat) संबधी प्रावधान लागू होंगे। अर्थात् इस प्रकार की भूमि लगान मुक्त होगी। ये हैं:
» अधिनियम की धारा 118 के अंतर्गत भूस्वामी की विशेषाधिकारयुक्त भूमि, जिसे अभिधारी (Tenant) ने एक वर्ष से अधिक अवधि के लिए रजिस्ट्रीकृत पट्टे पर अथवा एक वर्ष या कम समय के लिए लिखित या मौखिक पट्टे पर धारित किया हो।
» सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकार या रेलवे कम्पनी के लिए अर्जित भूमि ।
» किसी छावनी (Cantonment ) के भीतर सरकार की भूमि ।
» ऐसी भूमि जिसका उपयोग किसी विधिसम्मत प्राधिकारी द्वारा सड़क, नहर, तटबंध बाँध या जलाशय जैसे लोक कार्यों के लिए किया जा रहा हो ।
> अध्याय-8 जोतों और भूधृत्तियों के पट्टे और अंतरण
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  44 . रैयत का पट्टे का हकदार होना होगा। 
> प्रत्येक रैयत अपने भूस्वामी से एक पट्टा पाने का हकदार होगा जिसमें उसकी जोत की भूमि का परिमाप और सीमाएं, भूमि के लिए देय लगान की रकम, लगान की किस्तें, उपज के रूप में लगान दिये जाने की दशा में उपज का अनुपात तथा पट्टे की कोई विशेष शर्त का उल्लेख होगा।
धारा  45. जब कोई भूस्वामी किसी काश्तकार को कोई पट्टा देगा तो भूस्वामी पट्टे की शर्तों के अनुरूप एक प्रतिलेख पाने का हकदार होगा।
धारा  46. रैयतों द्वारा अपने अधिकारों के अंतरण पर प्रतिबंध
> रैयत द्वारा अपनी जोत या उसके किसी भाग पर अधिकार का 5 वर्ष से अधिक अवधि के लिए तथा विक्रय, दान या किसी अन्य संविदा द्वारा अंतरण नहीं किया जा सकता है।
> कोई रैयत अपनी जोत या उसके किसी भाग को 7 वर्षो से कम किसी भी अवधि के लिए भुगतबंध बंधक कर सकता है।
> कोई रैयत अपनी जोत या उसके किसी भाग को 15 वर्षो से कम किसी अवधि के लिए ऐसे बंधकदार को भुगतबंध बंधक कर सकता है, जो बिहार और उड़ीसा सहकारी समितियाँ अधिनियम, 1935 के अधीन रजिस्ट्रीकृत हो ।
(Note - भुगतबंध बंधक के तहत बंधक लेने वाला एक तय अवधि के लिए बंधक में दी गई भूमि के उत्पादन का उपभोग कर सकता है।)
> ऐसा अधिभोगी रैयत जो किसी अनुसूचित जनजाति का सदस्य हो, उपायुक्त की पूर्व मंजूरी से अपनी जोत या उसके किसी भाग का अधिकार विक्रय, विनिमय, दान या विल द्वारा अनुसूचित जनजाति के किसी व्यक्ति को अंतरित कर सकता है, जो उसी पुलिस थाने के क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर का निवासी हो जिसके भीतर यह जोत स्थित हो।
> ऐसा अधिभोगी रैयत जो किसी अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्गों का सदस्य हो, उपायुक्त की पूर्व मंजूरी से अपनी जोत या उसके किसी भाग का अधिकार विक्रय, विनिमय, दान या विल द्वारा अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्गों के किसी व्यक्ति को अंतरित कर सकता है, जो उसी जिले के क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर का निवासी हो जिसके भीतर यह जोत स्थित हो ।
> कोई अधिभोगी रैयत अपने जोत या उसके किसी भाग का अधिकार निम्न को अंतरित कर सकता है:
» बिहार एवं उड़ीसा सहकारी समिति अधिनियम, 1935 के तहत रजिस्ट्रीकृत किसी समिति को, किसी बैंक या कम्पनी या निगम को जिसका स्वामित्व केन्द्र या राज्य सरकार के पास है अथवा जिसमें अंश पूंजी का 51 प्रतिशत या अधिक केन्द्र या राज्य सरकार या दोनों मिलकर धारण करते हैं और जिसे कृषकों का कृषि के लिए उधार देने की दृष्टि से स्थापित किया गया हो।
> कोई अधिभोगी रैयत, जो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं है, अपनी जोत या उसके किसी भाग में अपने अधिकार का अंतरण विक्रय, विनिमय, दान, वसीयत, बंधक द्वारा अथवा अन्यथा किसी भी अन्य व्यक्ति को कर सकेगा।
> किसी जोत या उसके किसी भाग के संबंध में ऐसे वाद (मामले) जिनमें एक पक्षकार अनुसूचित जनजाति का सदस्य है और दूसरा पक्षकार अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है, ऐसे वादों में उपायुक्त आवश्यक पक्षकार होगा। / धारा 46 (3क)]
> यदि रैयत ने उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन अपनी जोत या उसके किसी भाग के अपने अधिकार को किसी समयावधि के लिए अंतरित किया है, तो उस समयावधि की समाप्ति के तीन वर्षों के भीतर रैयत के आवेदन करने पर उपायुक्त किसी भी समय ऐसे जोत या भाग को उस रैयत के कब्जे में दे देगा। / धारा 46 ( 4 ) ]
> उपायुक्त स्वप्ररेणा से या यदि कोई अनुसूचित जाति का अधिभोगी रैयत इस आधार पर अंतरण के निरसन का आवेदन उपायुक्त को देता है कि अंतरण उपधारा-1 (क) के उल्लंघन में किया गया था, तो उपायुक्त ऐसे आवेदन के संबंध में नियम से जाँच करेगा। परन्तु ऐसा कोई आवेदन उपायुक्त द्वारा तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा, जब अधिभोगी अभिदारी ने अपने जोत या उसके किसी भाग के अंतरण की तारीख से 12 वर्षों की समयावधि के भीतर उसे फाइल किया हो । / धारा 46 (4क )] 
> यदि उपायुक्त जाँच के पश्चात् यह पाता है कि अंतरण में उपधारा-1 (क) का उल्लंघन नहीं हुआ है तो आवेदन को रद्द कर देगा और अंतरक (जिसने जोत अंतरित किया था) द्वारा अंतरीति (जिसे भूमि अंतरित की गयी थी) को मामले के अनुसार खर्च का भुगतान करने हेतु आदेश देगा। / धारा 46 (4ख ) ]
> यदि जाँच के बाद उपायुक्त यह पाता है कि उपधारा - 1 (क) का उल्लंघन किया गया हो, तो वह अंतरण को समाप्त कर देगा तथा अंतरीति (जिसे जोत अंतरित किया गया था) को ऐसे जोत या उसके भाग से बेदखल कर देगा और अंतरक (जिसने जोत अंतरित किया था) को उसका कब्जा दिला देगा।
परन्तु यदि अंतरीति ने ऐसे जोत पर किसी भवन या संरचना का निर्माण कर लिया हो और अंतरक उसके मूल्य का भुगतान नहीं करना चाहता हो, तो उपायुक्त अंतरीति को ऐसी संरचना को 02 वर्ष के अंदर हटाने का आदेश देगा तथा नहीं हटने पर उपायुक्त हटवा सकेगा। 
परन्तु यदि उपायुक्त को यह समाधान हो जाए कि अंतरीति ने ऐसे जोत या उसके भाग पर संरचना का निर्माण छोटानागपुर काश्तकारी संशोधन अधिनियम, 1969 के आरंभ से पूर्व किया है, तो उपायुक्त उपधारा-1 (क) के उल्लंघन के बावजूद वह ऐसे अंतरण को उस दशा में विधिमान्य कर सकेगा, जब अंतरीति समतुल्य मूल्य की समीप की कोई वैकल्पिक जोत या भाग उपलब्ध करा दे या उपायुक्त द्वारा अभिधारित प्रतिकर का भुगतान कर दे । [धारा 46 ( 4ग )] 
धारा  47. न्यायालय के आदेश के अधीन रैयती अधिकार के विक्रय पर प्रतिबंध
> किसी न्यायालय द्वारा किसी रैयत के जोत या उसके किसी भाग में अधिकार के विक्रय के लिए कोई आदेश पारित नहीं किया जाएगा।
> परन्तु निम्न स्थितियों में न्यायालय द्वारा जोत के अधिकार के विक्रय का आदेश पारित किया जा सकता है: –
» जोत के संबंध में बकाया लगान की वसूली के
 लिए ।
» किसी उधार या बैंक ऋण की वसूली के लिए
» बिहार उड़ीसा लोक मांग वसूली अधिनियम द्वारा उपबंधित प्रक्रिया के अधीन ।
परन्तु यदि किसी जोत या उसका भाग अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य का है तो उसे किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य को ही बेचा जा सकता है। 
धारा  48. भुईहरी भूधृत्ति के अंतरण पर प्रतिबंध
> किसी र्भुइहरी कुटुंब का कोई सदस्य अपने द्वारा धारित भुईहरी भृधृत्ति या उसके किसी भाग को उसी रीति और उसी परिमाण तक अंतरित कर सकता है, जैसे कोई आदिवासी रैयत अपने जोत या उसके भाग के अधिकार को अंतरित करता है ।
> राज्य सरकार भुईहरी कुटुंब के किसी व्यक्ति को उसके भूधृत्ति का विक्रय, दान, विनिमय, विल द्वारा अंतरित करने का नियम बना सकती है।
> उपरोक्त रीतियों के अतिरिक्त अन्य किसी भी रीति द्वारा भुईहरी भूधृत्ति का अंतरण नहीं किया जा सकता है।
> यदि किसी भुईहरी भूधृत्ति या उसके भाग का अंतरण उपरोक्त रीतियों का उल्लंघन करके किया गया हो तो, उपायुक्त स्वप्ररेणा से या ऐसे सदस्य के आवेदन पर अंतरीति (जिसे जमीन अंतरित किया गया हो) को बेदखल कर सकेगा।
(Note - भुईहरी कुटुंब का कोई सदस्य किसी कृषि प्रयोजन के लिए कर्ज जुटाने हेतु बिहार उड़ीसा सहकारी समिति अधिनियम, 1935 के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी सोसायटी या बैंक को अथवा राज्य या केन्द्र सरकार की स्वामित्व वाली किसी कंपनी या निगम को अपनी भृधृति या उसके भाग का अधिकार सादा बंधक द्वारा अंतरित कर सकता है। ) 
> यदि भुईहरी कुटुंब का कोई सदस्य छोटानागपुर भृधृति अधिनियम, 1869 के तहत परिभाषित किसी ग्राम में भुईहरी भूधृति धारण करता है, तो वह अपनी भूधृत्ति या उसके किसी भाग को उसी रीति से और उसी सीमा तक अंतरित कर सकता है जैसा कोई अधिभोगी रैयत धारा 46 की उपधारा (3) के अधीन अपनी जोत में अपने अधिकार का अंतरण करता है। 
> यदि किसी भुईहरी भूधृत्ति का कोई सदस्य अपनी भुईहरी भूधृत्ति या उसके किसी भाग को पट्टे द्वारा अंतरित करे तो पट्टेदार उसमें अधिभोगाधिकार अर्जित नहीं करेगा।
धारा  48 क . भुईहरी भूधृत्ति के विक्रय पर प्रतिबंध
> कोई भी न्यायालय किसी भुईंहरी भूधृत्ति के अधिकार के विक्रय हेतु कोई आदेश पारित नहीं कर सकेगा।
> किसी भुईंहरी कुटुंब द्वारा धारित किसी भुईहरी भूधृत्ति के संबंध में बकाया लगान की वसूली हेतु भुईहरी भूधृत्ति की बिक्री का आदेश पारित नहीं किया जाएगा। ऐसे लगान की वसूली भूधृति में शामिल भूमि की उपज की कुर्की या विक्रय द्वारा या ऋणी की किसी अन्य जंगम संपत्ति के विक्रय द्वारा ही किया जा सकेगा।
धारा  49. कतिपय प्रयोजनों के लिए भुईहरी भूधृत्ति का अंतरण
> धारा 46, 47 एवं 48 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी अधिभोगी रैयत या भुईहरी कुटुंब का कोई सदस्य अपनी जोत या उसके किसी भाग को निम्न प्रयोजनों के लिए अंतरित कर सकेगा: – 
» किसी औद्योगिक उद्देश्यों के लिए या कोई ऐसा प्रयोजन जो राज्य सरकार उसके सहायक प्रयोजन के लिए अधिसूचित करे, या इनमें से किसी प्रयोजन के लिए अपेक्षित भूमि में गम्य पथ के प्रयोजन हेतु।
» किसी खनन कार्य के उद्देश्य से या कोई ऐसा प्रयोजन जो राज्य सरकार उसके सहायक प्रयोजन के लिए अधिसूचित करे, या इनमें से किसी प्रयोजन के लिए अपेक्षित भूमि में गम्य पथ के प्रयोजन हेतु ।
धारा  50. भूस्वामी द्वारा भूधृत्ति या जोत का अर्जन
> धारा 46 और 47 में किसी बात के होते हुए भी उपायुक्त भूस्वामी द्वारा आवेदन देने पर निम्न प्रयोजनों के लिए भूधृत्ति के अर्जन की अनुमति प्रदान कर सकेगा:-
» खैराती, धार्मिक या शैक्षणिक प्रयोजनों के लिए।
» राज्य सरकार द्वारा खनन के प्रयोजनों के लिए।
> उपायुक्त अभिनिश्चित भूमि के बाजार मूल्य के अतिरिक्त अर्जित हितों के धारक को बाजार मूल्य पर 20 प्रतिशत की रकम अधिनिर्णित करेगा।
> यदि जोत के किसी भाग पर मंदिर, मस्जिद या पूजा के अन्य स्थान, पवित्र उपवन, कब्र या श्मशान हों, तो उपायुक्त भूमि के अर्जन को प्राधिकृत नहीं करेगा।
> अध्याय - 9  लगान के बारे में साधारण उपबंध
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  52. किस्त
> अभिधारी (tenant) द्वारा लगान का भुगतान कृषि वर्ष की प्रत्येक तिमाही के अंत पर चार किस्तों में किया जाएगा।
धारा  53. लगान भुगतान की रीतियाँ
> लगान का भुगतान माल कचहरी में या डाक मुद्रादेश (money order) द्वारा उपायुक्त के माध्यम से किया जा सकता है।
धारा  54. लगान तथा उसके ब्याज के लिए रसीद
> भूस्वामी द्वारा लगान या उस पर ब्याज या दोनों का भुगतान प्राप्त होने पर एक हस्ताक्षरित रसीद अभिधारी का दिया जाये ।
> लगान के भुगतान की रसीद देने में असफल होने पर भुस्वामी या उसके अभिकर्ता को एक माह का सादा कारावास या एक सौ रूपये जुर्माना या दोनों का दण्ड दिया जा सकता है।
धारा  58. लगान का बकाया एवं उस पर ब्याज
> यदि देय तिथि को सूर्यास्त के पूर्व लगान का भुगतान नहीं किया जाता है, तो उसे लगान का बकाया समझा जाएगा। 
> यदि भूस्वामी राज्य सरकार है तो कृषि वर्ष के अंत में लगान का भुगतान नहीं किए जाने पर उसे लगान का बकाया समझा जाएगा।
> लगान की बकाया राशि पर अधिकतम 6.25 प्रतिशत वार्षिक की दर से साधारण ब्याज प्रभारित किया जाएगा।
> यदि अभिधारी किसी कृषि वर्ष में बकाया लगान की राशि का भुगतान अगले कृषि वर्ष के भीतर कर दे तो संदेय लगान की राशि पर अधिकतम तीन प्रतिशत की दर से ब्याज लगेगा। 
धारा  59. भूधारक की बेदखली एवं बकाया के कारण पट्टे का रद्द किया जाना
> यदि भूधारक का लगान बकाया हो तो उसका पट्टा रद्द करते हुए उसे बेदखल किया जा सकता है।
धारा  60. लगान के बकाये का काश्तकारी पर प्रथम भार होना
> काश्तकारी का लगान काश्तकारी पर प्रथम भार होगा। परन्तु यदि लगान के बकाये के भुगतान हेतु काश्तकारी का विक्रय कर दिया जाये, तो खरीददार उस काश्तकारी का विक्रय की तारीख के पूर्व के लगान के भार से मुक्त होगा।
धारा  61. वस्तुरूप में देय लगान का रूपांतरण
> यदि भूधारक द्वारा लगान वस्तुरूप में दिया जाता रहा हो, तो वह इसे धन लगान के रूप में रूपांतरित करने हेतु उपायुक्त या किसी राजस्व अधिकारी के पास आवेदन देगा। 
> उपायुक्त या राजस्व अधिकारी उचित जाँच के पश्चात् वस्तु लगान के बदले धन लगान के रूप में दी जाने वाली राशि का निर्धारण करेगा। 
धारा  61 क . अधिभोग जोत के लगान का रूपांतरण
> यदि किसी अधिभोग जोत का लगान वस्तुरूप में भुगतान किया जाता रहा हो और राज्यपाल उसे रूपांतरित करने हेतु अधिसूचना जारी करता है तो उपायुक्त स्वप्रेरणा से या रैयत अथवा भूस्वामी के आवेदन करने पर धन लगान के रूप में भुगतान की जाने वाली राशि का निर्धारण कर सकेगा।
धारा  62. रूपांतरित लगान के अपरिवर्तित रहने की कालावधि
> यदि धारा 61 के अधीन किसी जोत का लगान रूपांतरित किया गया हो तो अगले 15 वर्षो तक वहाँ लगान बढ़ाया या घटाया नहीं जाएगा।
> इसे भूस्वामी द्वारा की गयी अभिवृद्धि अथवा जोत के क्षेत्र में परिवर्तन तथा उपायुक्त या राजस्व अधिकारी के आदेश से ही 15 वर्ष पूर्व बढ़ाया जा सकता है।
> इसे राजस्व अधिकारी द्वारा पारित आदेश के आधार पर ही 15 वर्ष पूर्व घटाया जा सकता है।
धारा  63. भूस्वामी द्वारा लगान के अतिरिक्त अवैध रकम वसूलने पर दण्ड
> यदि कोई भूस्वामी काश्तकार से विधिपूर्वक देय लगान एवं बकाया ब्याज के अतिरिक्त कोई धनराशि या वस्तु वसूलता है या अतिरिक्त भुगतान की शर्त रखता है, तो भूस्वामी छह माह के साधारण कारावास या पाँच सौ रूपये जुर्माना या दोनों के दण्ड का भागी होगा। 
> अध्याय - 9 क बंजर भूमि का बंदोबस्त
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  63 क . बंजर भूमि का बंदोबस्त पट्टे पर किया जाना
> राज्य सरकार की बंजर भूमि का बंदोबस्त विहित प्रारूप में पट्टे पर किया जाएगा। पट्टा दो प्रतियों में तैयार किया जाएगा, जिनमें से एक प्रति संबंधित रैयत को दी जाएगी तथा एक प्रति जिले के उपायुक्त को भेज दी जाएगी। 
धारा  63 ख . बंदोबस्त को अपास्त ( रद्द ) किया जाना
> यदि उपरोक्त रीति से बंदोबस्त किसी भूमि पर बंदोबस्त की तारीख से पाँच वर्षों की समयावधि में खेती न की गयी हो अथवा उसका संक्रमण किया गया हो, तो जिले का उपायुक्त बंदोबस्त को अपास्त करने तथा ऐसी भूमि का पुन: बंदोबस्त करने हेतु स्वतंत्र होगा।
अध्याय - 10 - भूस्वामी तथा काश्तकार के लिए प्रकीर्ण उपबंध
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  64. उपायुक्त के आदेश से भूमि का कोड़कर में परिवर्तन
> किसी गाँव के कृषक या भूमिहीन श्रमिक उपायुक्त की पूर्व अनुज्ञा से भूमि को कोड़कर में परिवर्तित कर सकते हैं।
(Note- रैयत द्वारा परती भूमि या टाँड को कोड़ कर तैयार किया गया धान का खेत, कोड़कर कहलाता है। इस प्रकार तैयार खेत प्रारंभ में लगान से मुक्त होता है तथा बाद में लगान का निर्धारण किया जाता है जो सामान्य लगान दर से कम होता है। )
धारा  66. भूमी को कोड़कर में परिवर्तित करने पर प्रतिषेध
>>कोई कृषक किसी अन्य व्यक्ति के प्रत्यक्ष कब्जे वाले बगीचे, कृष्य भूमि (cultivated land) या वास भूमि (homestead) को कोड़कर में परिवर्तित नहीं कर सकता है।
धारा  67. कोड़कर में अधिभोगाधिकार
> ऐसा रैयत जो किसी भूमि को जोतता या धारित करता हो और उस जोत को उसने या उसके परिवार के किसी सदस्य ने कोड़कर में परिवर्तित कर दिया है, तो इस बात के होते हुए भी की उसने उस भूमि पर बारह वर्षों तक खेती नहीं की है या उसे धारण नहीं किया है, उस भूमि पर अधिभोगाधिकार होगा।
धारा  67 क . कोड़कर में संपरिवर्तित भूमि के लगान का निर्धारण
> कोड़कर में बदले जाने के बाद प्रथम कृषि वर्ष की फसल की कटाई के चार वर्ष बाद तक लगान देय नहीं होगा। चार वर्ष की अवधि के उपरांत कोड़कर भूमि पर लगान की दर गाँव में तृतीय वर्ग की धनहर भूमि के लिए प्रचलित दर से अनधिक या रूढ़ि के अनुसार इस दर के आधे से अधिक नहीं होगी।
धारा  68. काश्तकार को बेदखल किया जाना
> किसी भी काश्तकार को किसी डिक्री या उपायुक्त के आदेश के सिवाय उसकी काश्तकारी से बेदखल नहीं किया जा सकता है।
धारा  69 . यदि किसी अधिभोगी या अनधिभोगी रैयत द्वारा उचित तरीके से भूमि का उपयोग नहीं किया जाता है या उसने अधिनियम के किसी शर्त का उल्लंघन किया हो, तो उसे बेदखल किया जा सकता है। परन्तु यदि उसने निर्धारित समयवाधि में आदेश द्वारा निर्धारित प्रतिकर की रकम चुका दी हो, तो उसकी बेदखली रद्द की जा सकती है।
धारा  71. कोई बेदखल काश्तकार बेदखली की तिथि से एक वर्ष (अधिभोगी रैयत की दशा में 3 वर्ष) के भीतर काश्तकारी के कब्जे में प्रतिस्थापित कर दिये जाने की प्रार्थना करते हुए उपायुक्त को आवेदन दे सकता है।
धारा  71 क . विधिविरूद्ध अंतरित भूमि पर अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को पुनः कब्जा वापस दिलाना 
> यदि किसी समय उपायुक्त को पता चल जाये कि अनुसूचित जनजाति के रैयत की जमीन का अंतरण धारा 46 का उल्लंघन करके या कपटपूर्ण तरीके से कराया गया है, तो वह अंतरीति को सफाई देने का उपयुक्त समय प्रदान करेगा तथा अंतरीति को प्रतिकर का भुगतान किए बिना ही जमीन से बेदखल करके अंतरक को भूमि वापस दे सकेगा। 
> अंतरक या उसका कोई वारिस उपलब्ध नहीं होने या ऐसे प्रत्यावर्तन के लिए सहमत न होने की दशा में, उस भूमि को स्थानीय नियम के अनुसार अनुसूचित जनजाति के दूसरे रैयत के साथ पुनर्बदोबस्त कर सकेगा।
> यदि अंतरीति ने अंतरण की तारीख से 30 वर्षों के भीतर ऐसी जोत या उसके किसी भाग पर किसी भवन का निर्माण कर लिया हो और अंतरक उसका मूल्य चुकाने को रजामंद न हो, तो उपायुक्त अंतरीति को 2 वर्ष के भीतर उस भवन को हटाने का आदेश देगा। ऐसा नहीं करने पर उपायुक्त उस भवन को हटवा सकेगा।
> यदि उपायुक्त को यह समाधान हो जाए कि अंतरीति ने बिहार अनुसूचित क्षेत्र विनियम, 1969 लागू होने के पूर्व ही ऐसी जोत पर भवन का निर्माण कर लिया है, तो वह अंतरीति | को आदेश देगा कि वह अंतरक को उसके आस-पास समतुल्य का कोई जोत उपलब्ध करा दे या अंतरक के पुनर्वास के लिए उपायुक्त द्वारा निर्धारित प्रतिकर चुका दे। अंतरीति द्वारा ऐसी शर्तों पर सहमत हो जाने पर वह अंतरण को विधिमान्यता प्रदान कर सकेगा।
> यदि उपायुक्त को यह समाधान हो जाए कि अंतरीति ने कब्जा द्वारा भूमि पर हक अर्जित किया है तथा अंतरित भूमि को अंतरक को पुनर्बंदोबस्त कर देना चाहिए तो अंतरक को उपायुक्त के पास उतनी धनराशि जमा करानी होगी जितनी रकम में भूमि का अंतरण किया गया था अथवा उपायुक्त उस भूमि के बाजार मूल्य तथा भूमि में किए गए सुधारों को ध्यान में रखते हुए प्रतिकर का निर्धारण कर सकेगा।
धारा  71 ख . विधिविरूद्ध अंतरित भूमि के संबंध में दण्ड
> यदि इस अधिनियम की धारा 46 का उल्लंघन करके या कपटपूर्ण तरीके से किसी भूमि का अंतरण किया जाय और अंतरीति को इसकी जानकारी हो, तो अंतरीति तीन वर्ष तक के कारावास या एक हजार रूपये तक जुर्माना या दोनों से दण्डित होगा। अपराध जारी रहने की दशा में, अपराध की अवधि तक अंतरीति को प्रत्येक दिन अधिकतम पचास रूपये अतिरिक्त जुर्माना देना होगा।
धारा  72. रैयत द्वारा भूमि का अभ्यर्पण (surrender)
> यदि कोई रैयत किसी पट्टे या करार से आबद्ध न हो, तो वह किसी कृषि वर्ष के अंत में उपायुक्त की पूर्व मंजूरी से अपने जोत को अभ्यर्पित कर सकता है। परन्तु इस बात की सूचना रैयत द्वारा भूस्वामी को अभ्यर्पण के चार माह पूर्व देनी होगी। यदि वह ऐसी सूचना नहीं देता है तो अभ्यपर्ण के पश्चात् अगले कृषि वर्ष के लिए जोत के लगान का भुगतान भूस्वामी को करना होगा। 
> रैयत द्वारा पट्टे को अभ्यर्पित करने के पश्चात् भूस्वामी उस जोत का पट्टा किसी अन्य काश्तकार को दे सकता है या स्वयं उस पर खेती कर सकता है।
धारा  73. रैयत द्वारा भूमि का परित्याग
> यदि कोई रैयत भूस्वामी को बिना कोई सूचना दिए पट्टे का परित्याग कर दे तथा उस पर स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा खेती करना बंद कर दे। साथ ही उस पर देय लगान का भुगतान भुगतान भी न करे, तो भूस्वामी चालू कृषि वर्ष की समाप्ति के बाद किसी दूसरे रैयत को पट्टा दे सकता है या स्वयं उस पर खेती कर सकता है । 
> कोई अधिभोगी रैयत तीन वर्ष के भीतर तथा अनधिभोगी रैयत एक वर्ष के भीतर उपरोक्त भूमि पर कब्जा वापस करने का आवेदन दे सकता है। यदि उपायुक्त को यह समाधान हो जाए कि रैयत ने जोत का परित्याग स्वेच्छा से नहीं किया है, तो वह बकाया लगान के भुगतान के पश्चात रैयत को भूमि का कब्जा वापस करने हेतु आदेश दे सकता है।
75. भूमि की माप
> किसी संपदा, भूधृत्ति या मुण्डारी खूँटकट्टीदार - काश्तकारी के प्रत्येक भूस्वामी को भूमि का सामान्य सर्वेक्षण तथा इसकी माप करने का अधिकार होगा।
> यदि भूमि के अधिभोगी द्वारा सर्वेक्षण या माप का विरोध किया जाता है, तो भूस्वामी उपायुक्त के पास एक आवेदन देगा तथा उपायुक्त उचित जाँच के पश्चात् इस संबंध मे आवश्यक दिशा-निर्देश देगा।
> अध्याय-11 रूढ़ि और संविदा 
> धारा 
> प्रमुख प्रावधान
धारा  76-79 . इस भाग में रूढ़ि एवं संविदा से संबंधित कई प्रावधान हैं। परीक्षा के दृष्टिकोण से संबंधित प्रावधान अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं। 
> अध्याय-12 अधिकार-अभिलेख (Record of Rights) और लगानों का निर्धारण 
> धारा
> प्रमुख प्रावधान 
धारा  80. सर्वेक्षण करने और अधिकार –अभिलेख तैयार करने का आदेश देने की शक्ति 
> राज्य सरकार किसी राजस्व अधिकारी द्वारा किसी स्थानीय क्षेत्र, संपदा या भृधृत्ति का सर्वेक्षण कराने तथा उसका अधिकार अभिलेख तैयार करने का आदेश दे सकती है।
धारा  81. अभिलिखित की जाने वाली विशिष्टियाँ
> धारा 80 के द्वारा पारित आदेश में काश्तकार का नाम, उसका वर्ग, भूमि की स्थिति व सीमाएं, भूस्वामी का नाम, भुगतेय लगान, लगान निर्धारण की प्रक्रिया तथा अन्य शर्तों का वर्णन होगा। 
धारा  82. जल के विषय में सर्वेक्षण करने तथा अधिकार अभिलेख तैयार करने का आदेश
> राज्य सरकार भूस्वामी, काश्तकारों या अन्य व्यक्तियों के बीच जल के उपयोग या बहाव से संबंधित विवादों का समाधान करने तथा उसका सर्वेक्षण करने का आदेश राजस्व अधिकारी को दे सकती है।
धारा  85. उचित लगान का परिनिर्धारण (settlement of rent)
> किसी क्षेत्र में सर्वेक्षण या अधिकार अभिलेख के आधार पर राजस्व अधिकारी किसी काश्तकार द्वारा धारित भूमि का उचित लगान परिनिर्धारित कर सकेगा।
धारा  86.  लगान परिनिर्धारण के दौरान उठने वाले विवाद / मामले
> लगान के परिनिर्धारण के दौरान उठने वाले किसी विवाद पर राजस्व अधिकारी विचार करते हुए धारा 85 के तहत लगान का परिनिर्धारण करेगा।
धारा  87. राजस्व अधिकारी के समक्ष वादों का संस्थित किया जाना (institution of suits before reveue officer)
> अधिकार अभिलेख के अंतिम प्रकाशन के बाद विभिन्न पक्षों के बीच उत्पन्न किसी वाद को राजस्व अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जायेगा। राजस्व अधिकारी संबंधित मामले को किसी सक्षम न्यायालय को अंतरित कर सकता है।
धारा  89. राजस्व अधिकारी द्वारा पुनरीक्षण (revision by revenue officer)
> राज्य सरकार द्वारा नामित कोई राजस्व अधिकारी आवेदन करने पर या स्वप्रेरणा से अधिकार-अभिलेख के प्रारूप में दी गई किसी प्रविष्टि या आदेश के 12 महीनों के भीतर उसका पुनरीक्षण कर सकेगा।
धारा  90. अधिकार अभिलेखों की भूलों की राजस्व अधिकारी द्वारा शुद्धि
> अधिकार अभिलेख के अंतिम प्रकाशन के प्रमाण पत्र की तारीख से 5 वर्षों के भीतर शुद्धि का आदेश दे सकेगा।
धारा  91. अधिकार अभिलेख के आदेश का रोका जाना
> अधिकार अभिलेख की तैयारी के किसी आदेश को अधिकार अभिलेख के अंतिम प्रकाशन के पश्चात् छ: माह तक उपायुक्त या सिविल न्यायालय द्वारा रोका नहीं जा सकेगा। 
92. अधिकार अभिलेख संबंधी विषयों में न्यायालयों की अधिकारिता का वर्जन
> अधिकार अभिलेख की तैयारी से संबंधित कोई वाद किसी न्यायालय में नहीं लाया जाएगा। 
धारा  93. अधिकार अभिलेख के अंतिम प्रकाशन तक उपायुक्त या सिविल न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों पर रोक 
> अधिकार अभिलेख के अंतिम प्रकाशन से छः माह तक संबंधित भूमि या उसके किसी काश्तकार को प्रभावित करने वाला कोई आवेदन न तो उपायुक्त को दिया जाएगा और न ही सिविल न्यायालय में कोई वाद दायर किया जाएगा।
धारा  96. करार या समझौते को लागू कराने की राजस्व अधिकारी की शक्ति
> इस अध्याय के अधीन अधिकार अभिलेख तैयार करने और विवादों का विनिश्चय करने में राजस्व अधिकारी किसी भूस्वामी और उसके अभिधारी के बीच किए गये किसी वैध करार या समझौते को कार्यान्वित करेगा।
> अध्याय-13 भूमि संबंधी शर्ते एवं उनका रूपांतरण और अभिलेख
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  101. नयी भूमि संबंधी शर्तों के विरूद्ध प्रतिषेध
> इस अधिनियम के प्रारंभ से और उसके बाद व्यक्तिगत सेवा करने की एकमात्र शर्त पर लगानमुक्त काश्तकारी के अतिरिक्त किसी अन्य भूमि संबंधी शर्त के साथ काश्तकारी का सृजन नहीं किया जाएगा।
धारा  103. भूमि संबंधी शर्त के वर्तमान मूल्य का निर्धारण
> यदि किसी न्यायालय के लिए किसी भूमि संबंधी शर्त के मूल्य का निर्धारण आवश्यक हो, तो यह पिछले दस वर्षों या उससे कम अवधि का औसत मूल्य माना जाएगा।
धारा  104. लगान तथा भूमि संबंधी शर्तों के मूल्य के लिए वाद की प्रक्रिया
> यदि लगान की वसूली के किसी वाद में, काश्तकारी की भूमि संबंधी शर्तों के मूल्य की वसूली की मांग भी की जाय, तो देखा जाएगा कि भूमि संबंधी शर्तों का मूल्य और देय लगान का योग उचित लगान से अधिक हो जाता है या नहीं। यदि यह राशि उचित लगान से अधिक है तो न्यायालय उचित लगान के संबंध में निर्णय देगा।
धारा  105. भूमि संबंधी शर्तों का स्वेच्छा से रूपांतरण
> यदि कोई भूमि किसी भूमि संबंधी शर्त के अधीन धारित की जाती है तो अभिधारी या भूस्वामी राजस्व अधिकारी के पास उन शर्तों के रूपांतरण हेतु लिखित आवेदन कर सकता है।
> राजस्व अधिकारी इस संबंध में अपने विवेक से रूपांतरण के लिए उचित राशि का निर्धारण कर शर्तों का रूपांतरण कराएगा।
धारा 106 से 117. तक भूमि संबंधी शर्तों, उनके रूपांतरण तथा अभिलेख के संबंध में प्रावधान हैं, जो परीक्षा की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं।
>अध्याय-14 भूस्वामियों की विशेषाधिकारयुक्त भूमि का अभिलेख
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  118. भूस्वामी की विशेषाधिकारयुक्त भूमि की परिभाषा
> इस धारा के अंतर्गत निम्न प्रकार की भूमियों को भूस्वामी की विशेषाधिकारयुक्त भूमि माना जाएगा, वैसी भूमि :
» जिसे भूस्वामी अपने स्टॉक (उपकरणों यथा - हल, बैल, ट्रैक्टर आदि) से या अपने सेवकों द्वारा या भाड़े के मजदूरों द्वारा जोतता हो या
» जो किसी अभिधारी द्वारा एक वर्ष से अधिक अवधि के पट्टे पर अथवा एक वर्ष या उससे कम अवधि के लिखित या मौखिक पट्टे पर धारित हो व रूढ़ि द्वारा विशेषाधिकार भूमि माना जाता हो ।
» वैसी भूमि जो राँची और धनबाद जिलों को छोड़कर तथा सिंहभूम जिले के पटमदा, इचागढ़ तथा चांडिल थानों को छोड़कर छोटानागपुर प्रमण्डल में जिरात के रूप में ज्ञात हैं और
» जो धनबाद जिले में एवं सिंहभूम जिले के पटमदा, इचागढ़ और चांडिल थानों में "मान" के रूप में ज्ञात हैं और
» जो छोटानागपुर भूधृति अधिनियम, 1869 के अधीन तैयार किसी रजिस्टर में मंझिहस या बठखेता हैं।
धारा 119 से 123 .  तक भूस्वामी की विशेषाधिकारयुक्त भूमि के सर्वेक्षण तथा अभिलेख से संबंधित प्रावधान हैं।
धारा  124. कुछ भूमि को भूस्वामी के विशेषाधिकारयुक्त भूमि के रूप में अभिलिखित नहीं किया जाना
> जहाँ किसी गाँव में कोई भूमि छोटानागपुर भूधृत्ति अधिनियम, 1869 के अधीन तैयार रजिस्टर में मंझिहस या बठखेता के रूप में दर्ज हो, उस गाँव की अन्य भूमि को भूस्वामी की विशेषाधिकार भूमि के रूप में अभिलिखित नहीं किया जाएगा।
> अध्याय-15 अधिकार अभिलेख तथा खूँटकट्टी अधिकार वाले रैयत, ग्राम मुखिया तथा अभिधारियों के अन्य वर्गों की बाध्यताएँ
> धारा 
> प्रमुख प्रावधान
धारा  127. राज्य सरकार के आदेश से राजस्व अधिकारी द्वारा किसी स्थानीय क्षेत्र में खूँटकट्टी अधिकार प्राप्त रैयत, ग्राम मुखिया, अभिधारियों के किसी वर्ग के अधिकारों या बाध्यताओं का एक अभिलेख तैयार किया जाएगा।
धारा  130. अभिलेख की प्रविष्टि या उसके लोप के संबंध में विवादों के विनिश्चय हेतु वाद 
> यदि इस अध्याय के तहत तैयार अभिलेख की किसी प्रविष्टि की शुद्धता या उसमें से किसी गलत लोप के संबंध में कोई विवाद उठे, तो अभिलेख के अंतिम प्रकाशन के प्रमाण पत्र के तीन माह के भीतर राजस्व पदाधिकारी के समक्ष वाद किया जा सकेगा।
धारा  134. अनभिलिखित भूमि (unrecorded land) का खूँटकट्टी भूमि के वर्ग से अपवर्जन (exclusion) 
> जब किसी स्थानीय क्षेत्र के लिए खूँटकट्टीदार अधिकारयुक्त अभिधारियों के अधिकार तथा बाध्यताओं का अभिलेख तैयार कर लिया जाय, तो उस क्षेत्र की अनभिलिखित भूमि ( ऐसी भूमि जिसे अभिलेख में दर्ज न किया गया हो) के संबंध में खूँटकट्टी अधिकार अर्जित किया जा सकता है।
> अध्याय-16 उपायुक्त द्वारा संज्ञेय विषयों की न्यायिक प्रक्रिया
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  135. उपायुक्त के न्यायालय का स्थान
> इस अधिनियम के अधीन वादों तथा आवेदनों की सुनवाई हेतु उपायुक्त अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर किसी भी स्थान पर न्यायालय लगा सकेगा तथा प्रत्येक सुनवाई और विनिश्चय (फैसला) खुले न्यायालय में होगा।
धारा  136. वाद या आवेदन देने का कार्यालय
> उपायुक्त के समक्ष वाद या आवेदन जिले के राजस्व कार्यालय में, उप-कलक्टर के कार्यालय में तथा सक्षम राजस्व अधिकारी के कार्यालय में दिया जा सकेगा।
धारा  138. भूमि के एक से अधिक जिले या अनुमंडल में स्थित होने पर अधिकारिता
> यदि भूमि एक से अधिक जिले या अनुमंडल में स्थित हो, तो संबंधित वाद का निर्णय उस जिले या अनुमंडल में किया जाएगा जहाँ भूमि का ज्यादा भाग स्थित हो।
धारा  139. कतिपय वादों और आवेदनों का उपायुक्त द्वारा संज्ञान लिया जाना
> पट्टों के प्रदान या वचनबंध के प्रतिलेख, अभिधारी द्वारा देय लगान का निर्धारण, कृषि भूमि से किसी काश्तकार को बेदखल करने या कृषि के किसी पट्टे को रद्द करने से संबंधित सभी वादों पर केवल उपायुक्त द्वारा संज्ञान लिया जा सकता है।
धारा  139 क. उपायुक्त की अनन्य अधिकारिता
> अध्याय - 12 के अधीन रहते हुए कोई भी न्यायालय किसी ऐसे वाद को ग्रहण नहीं करेगा जिस पर आवेदन धारा 139 के अधीन उपायुक्त द्वारा संज्ञेय हो और ऐसे किसी आवेदन पर उपायुक्त का निर्णय अंतिम होगा।
धारा  140. सामूहिक वाद या आवेदन
> एक ही ग्राम में भूमि धारण करने वाले अभिधारियों की किसी भी संख्या द्वारा या उनके विरूद्ध कोई वाद या आवेदन सामूहिक रूप से उपायुक्त के पास किया जा सकेगा तथा इसे किसी भी आधार पर उपायुक्त द्वारा खारिज नहीं किया जा सकेगा।
धारा  142. सह- अंशधारी द्वारा लगान के लिए वाद
> सह-अंशधारी भूस्वामी, अभिधारी से लगान के अपने शेयर की वसूली के लिए वाद दे सकेगा। 
धारा  143-168.  धारा 143 से 168 तक वादों के निपटारे, पक्षकारों की पेशी, गवाही, वादों पर निर्णय आदि से संबंधी प्रक्रियाओं का वर्णन है।
धारा  169. अंतिम सुनवाई में पक्षकार का हाजिर न होना
> यदि वाद की अंतिम सुनवाई के दिन दोनों में से कोई पक्षकार हाजिर न हो तो मामले को खारिज कर दिया जायेगा। यदि दोनों में से कोई एक ही पक्षकार हाजिर हो तो, सबूतों के आधार पर निर्णय कर दिया जायेगा। 
धारा  170. निर्णय
> उपायुक्त द्वारा खुले न्यायालय में निर्णय सुनाया जाएगा तथा निर्णय अंग्रेजी में लिखा जाएगा।  
धारा  171. स्थानीय जांच 
> इस अधिनियम के अधीन किसी वाद के संबंध में उपायुक्त किसी पदाधिकारी से स्थानीय जांच कराकर प्रतिवेदन (Report) ले सकेगा। 
धारा  172–176. धारा 172 से 176 तक वादी को प्रतिवादी द्वारा भुगतान से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख है। 
धारा  177. लगान के अधिकार का दावा अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाना 
> यदि उपायुक्त के समक्ष अभिधारी या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यह अभिवचन किया जाता है कि धारित भूमि पर लगान पाने का अधिकार भूस्वामी के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को है, तो ऐसे अन्य व्यक्ति को वाद का पक्षकार बना दिया जायेगा।
धारा  178. अनधिभोगी रैयत की बेदखली के लिए वाद
> किसी अनधिभोगी रैयत द्वारा लगान का भुगतान न किये जाने पर इच्छुक भूस्वामी एक ही वाद में पट्टा रद्द करने या बेदखली तथा बकाए की वसूली का वाद ला सकेगा। 
धारा  178क. कब्जा के पूर्व जोत की उपज में अनधिभोगी रैयत का अधिकार
> यदि किसी अनधिभोगी रैयत के विरूद्ध धारा 178 के तहत बेदखली का आदेश जारी किया गया हो, तो न्यायालय द्वारा कब्जा देने के पूर्व अनधिभोगी रैयत को संबंधित जोत पर अपने द्वारा उपजायी गई फसल को काटने का अधिकार होगा।
धारा  179. भूस्वामी द्वारा पट्टा नहीं देने पर उपायुक्त की रैयत को पट्टा देने की शक्ति
> यदि किसी रैयत को पट्टा देने का आदेश जारी कर दिया जाय और भूस्वामी आदेश की तारीख के पश्चात् तीन माह तक रैयत को पटा देने में असफल रहे, तो उपायुक्त अपने हस्ताक्षर से रैयत को पट्टा दे सकेगा।
धारा  180. उपायुक्त की डिक्रियों और आदेशों का लागू किया जाना
> उपायुक्त द्वारा पारित डिक्री या आदेश के निष्पादन के लिए कोई भी आवेदन आदेश की तारीख से तीन माह के भीतर ही लिया जा सकेगा।
धारा  181-185.  धारा 181 से 185 तक उपायुक्त की डिक्री और आदेशों के निष्पादन से संबंधित प्रावधान हैं, जो परीक्षा की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं।
धारा  186. कुर्की और विक्रय से छूट
> उपायुक्त द्वारा जारी किसी आदेश को लागू करने में निम्नलिखित को कुर्की तथा विक्रय से छूट प्राप्त होगी:–
(क) निर्णीत-ऋणी एवं उसकी पत्नी व बच्चों के पहनने के वस्त्र और बिस्तर
(ख) निर्णीत-ऋणी की आजीविका के लिए आवश्यक कृषि कर्म के औजार व उपकरण, उसके मवेशी तथा बीज ।
(ग) कृषक के घर की सामग्री तथा भवन
(घ) लेखा-बही।
(ड.) श्रमिकों तथा घरेलू सेवकों की मजदूरी ।
(च) भावी भरण-पोषण का अधिकार |
धारा  186क. डिक्रियों के निष्पादन पर प्रतिबंध
> किसी डिक्री के निष्पादन में किसी रैयत या दर रैयत को कारागार में निरूद्ध नहीं किया जाएगा। साथ ही उसके दखल घर तथा अन्य भवन एवं उनकी सामग्रियों तथा उनसे सटी और उपभाग के लिए आवश्यक भूमि की बिक्री नहीं की जा सकेगी।
धारा  188. निष्पादन वारंट के प्रभाव की समयावधि
> किसी निष्पादन वारंट का प्रभाव उपायुक्त द्वारा निश्चित अवधि तक ही होगा। यह अवधि वारंट पर उपायुक्त के हस्ताक्षर से अधिकतम साठ दिन तक होगी।
धारा  191. निर्णीतऋणी को गिरफ्तार कर लिये जाने पर प्रक्रिया
> किसी धन के भुगतान संबंधी डिक्री के निष्पादन में किसी निर्णीत- ऋणी को गिरफ्तार किया जा सकता है यदि:
» वह तुरंत पूरी राशि न्यायालय में जमा न कर दे या
» लेनदार को भुगतान की राशि का इंतजाम न कर दे या
» उपायुक्त को यह समाधान न करा दे कि उसके पास भुगतान का कोई वर्तमान साधन नहीं है। 
> गिरफ्तार ऋणी को पचास रूपये तक की धनराशि के भुगतान हेतु अधिकतम छह सप्ताह तक तथा इससे अधिक की धनराशि के भुगतान हेतु अधिकतम छह माह तक ही जेल में रखा जा सकता है।
धारा  192. जेल से मुक्त होने पर आगे की कार्यवाहियां
> जब कोई निर्णीत ऋणी सिविल जेल से मुक्त कर दिया गया हो, तो उसे उसी डिक्री या आदेश के लिए दोबारा गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा।
> यदि डिक्री अधिकतम पचास रूपये के लिए हो जेल से मुक्त व्यक्ति को उपायुक्त उसके दायित्व से मुक्त घोषित कर सकता है।
> पचास रूपये से अधिक रूपये की डिक्री के संबंध में डिक्री के निष्पादन हेतु जेल से मुक्त व्यक्ति की संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है।
धारा  193. बंदियों के निर्वाह के लिए आहार - धन
> जिस व्यक्ति ने निर्णीत ऋणी के वारंट हेतु आवेदन दिया हो, वह वारंट जारी किये जाने के समय बंदी के जीवन-निर्वाह हेतु न्यायालय में तीस दिनों के लिए उपायुक्त द्वारा निर्धारित दर से आहार - धन जमा करायेगा।
> जब तक ऋणी को जेल में बंद रखा जाता है तब तक वह व्यक्ति माह के प्रारंभ में उसी दर से आहार-धन का भुगतान करेगा।
> किसी बंदी के निर्वाह हेतु व्यय किए गये आहार - धन को वाद खर्चों में जोड़ा जाएगा। 
धारा  194. कृषक की बेदखली या कब्जा दिलाने के आदेश का निष्पादन
> किसी कृषक को किसी भूमि से बेदखल करने या उसको भूमि का कब्जा दिलाने से संबंधित आदेश का निष्पादन हकदार व्यक्ति को भूमि का कब्जा या दखल दिलाकर किया जायेगा। 
> यदि कोई व्यक्ति जिसके विरूद्ध आदेश पारित किया गया हो, इस आदेश के निष्पादन का विरोध करता है, तो उपायुक्त अपनी मजिस्ट्रेट की शक्तियों का प्रयोग करते हुए आदेश को लागू कराएगा।
धारा  195. वास्तविक कृषक से भिन्न अभिधारी के पट्टे का रद्दकरण, बेदखली या पुनःस्थापन 
> यदि किसी वास्तविक कृषक से भिन्न अभिधारी के विरूद्ध पटट् को रद्द करने या अभिधारी की बेदखली या किसी अभिधारी को उस भूमि का कब्जा दिलाने का आदेश हो तो :
» इसकी उदघोषणा संबंधित कृषकों या अभिधारियों में डोंगी पिटवाकर की जाएगी या 
» आदेश की अधिसूचना संबंधित भूमि के भीतर या अन्य किसी सहज स्थान पर चिपकाया जाएगा।
धारा  196. अविभक्त सपंदा या भूधृत्ति के अंशधारी के पक्ष में दी गयी लगान की डिक्री का निष्पादन 
> यदि उपायुक्त द्वारा किसे अविभक्त संपदा या भूधृत्ति के अंशधारी के पक्ष में लगान की डिक्री हेतु आदेश दिया जाता है, तो ऐसी भूधृत्ति की बिक्री के लिए आवेदन तब तक प्राप्त नहीं किया जाएगा जब तक कि उसका निष्पादन, उस जिले के भीतर जहां वाद दिया गया हो, निर्णीत-ऋणी की जंगम संपत्ति (movable property) के विरूद्ध न कर लिया जाय। 
धारा  198. कतिपय दशाओं में स्थावर संपत्ति (immovable property) के विरूद्ध निष्पादन 
> किसी ऐसे धन के भुगतान के लिए, जो लगान के बकाये के रूप में वसूलनीय हो तथा ऋणी के शरीर या जंगम संपत्ति (movable property ) के द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती हो, तो निर्णीत-लेनदार ऐसे ऋणी की किसी स्थावर संपत्ति (immovable property) के विरूद्ध निष्पादन का आवेदन कर सकेगा।
धारा  200. अभिग्रहण (acquisition) और विक्रय के बीच अंतराल
> इस अध्याय के अधीन किसी जंगम संपत्ति (movable property) के अभिग्रहण (acquisition) तथा उसकी बिक्री के बीच कम से कम 10 दिनों का अंतराल अवश्य होना चाहिए । 
धारा  202. अधिकारियों द्वारा खरीद का प्रतिषेध
> इस अध्याय के अधीन बिक्री की जाने वाली संपत्तियों की खरीद वारंट का निष्पादन करने वाले अधिकारी और उसके किसी अधीनस्थ द्वारा प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः नहीं किया जाएगा।
धारा  206.अभिगृहीत संपत्ति में अन्य व्यक्ति द्वारा हित का दावा किया जाना
> यदि किसी अभिगृहीत किए जाने वाले जंगम संपत्ति (movable property) में कोई अन्य व्यक्ति हित का दावा करे, तो उपायुक्त इस संबंध में जाँच करेगा तथा संपत्ति का विक्रय रोक देगा, यदि उसे ऐसा करने का पर्याप्त कारण दिखाई पड़े ।
> यदि दावेदार निष्पादन की जाने वाली संपत्ति पर अपना अधिकार सिद्ध करने में असफल रहे तो उपायुक्त दावेदार को कार्यवाहियों का खर्च वहन करने का आदेश देगा।
धारा  208. लगान के बकाये की डिक्री के निष्पादन में भूधृत्ति या जोत की बिक्री
> जब किसी जोत के बकाये लगान हेतु उपायुक्त द्वारा कोई डिक्री पारित की जाय, तो डिक्रीदार ऐसी जोत की बिक्री हेतु आवेदन कर सकेगा और इसे बेचा जा सकेगा।
> इस बिक्री की प्रक्रिया में जब किसी आदिवासी या अनुसूचित जाति के रैयत की जोत की बिक्री की जाय, तो ऐसी भूमि की बिक्री सबसे उंची बोली लगाने वाले ऐसे व्यक्ति को बेची जाएगी, जो आदिवासी या अनुसूचित जाति का सदस्य हो । आदिवासी या अनुसूचित जाति से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति को तब तक जोत की बिक्री नहीं की जा सकेगी, जब तक कि बोली लगाने वाले आदिवासी या अनुसूचित जाति के सदस्य ने उद्घोषणा में उल्लिखित राशि से कम की बोली न लगायी हो ।
धारा  210. जोत के लगान के बकाये हेतु अन्य संपत्ति का विक्रय
> यदि किसी भूधृत्ति या जोत के विक्रय के बाद भी डिक्री की गई रकम का कोई अंश देय रह जाए, तो निर्णीत ऋणी की किसी अन्य जंगम (movable) या स्थावर (immovable) संपत्ति का विक्रय कर बकाया रकम का भुगतान किया जाएगा। 
धारा  211. जब अन्य व्यक्ति भूधृत्ति या जोत पर विधिपूर्ण कब्जा रखने का दावा करे
> यदि किसी भूधृत्ति या जोत की बिक्री के नियत दिन के पूर्व, कोई व्यक्ति उपायुक्त के समक्ष यह दावा करे कि डिक्री की प्राप्ति के समय उस व्यक्ति का जोत पर विधिपूर्ण कब्जा था, तो उपायुक्त ऐसे पक्षकार का परीक्षण करेगा। यदि ऐसा पक्षकार डिक्री की रकम न्यायालय में जमा कर दे तो उपायुक्त बिक्री रोक देगा और साक्ष्य लेने के बाद दावे का न्याय निर्णय करेगा।
धारा  212. ऋण की राशि तथा क्रेता को दिये जाने वाले प्रतिकर की राशि जमा कर देने पर स्थावर संपत्ति के विक्रय को अपास्त करने का आवेदन
> यदि किसी डिक्री के निष्पादन में किसी स्थावर संपत्ति (immovable assets) का विक्रय कर दिया गया हो, तो कोई ऐसा व्यक्ति जो विक्रय के ठीक पहले ऐसी संपत्ति पर स्वामित्व रखता हो या विक्रय के पूर्व विधिपूर्वक अर्जित किसी हक के अधीन उसमें दावा करता हो, विक्रय की तारीख के 90 दिनों के भीतर उपायुक्त के न्यायालय में उक्त विक्रय को अपास्त करने हेतु आवेदन दे सकेगा।
धारा  213. अनियमितता या कपट के आधार पर स्थावर संपत्ति के विक्रय को अपास्त करने हेतु आवेदन
> यदि किसी डिक्री के निष्पादन में किसी संपत्ति का विक्रय कर दिया गया हो, तो विक्रय के तुरंत पूर्व ऐसी संपत्ति पर स्वामित्व रखनेवाला व्यक्ति विक्रय की तारीख से तीस दिनों के भीतर उपायुक्त के पास इसके प्रकाशन या संचालन में अनियमितता या कपट के आधार पर विक्रय को अपास्त करने हेतु आवेदन दे सकेगा।
धारा  215. उपायुक्त के आदेश के विरूद्ध अपील
> धारा 139 के अधीन उपायुक्त द्वारा विचारित वादों में एक सौ रूपये तक की वादग्रस्त राशि हेतु उपायुक्त का आदेश अंतिम होगा।
> सौ रूपये से अधिक तथा पांच हजार रूपये से कम रकम के वाद में उपायुक्त के आदेश के विरूद्ध अपील न्यायिक आयुक्त के पास की जा सकेगी तथा पांच हजार से अधिक की वादग्रस्त राशि से संबंधित निर्णय के विरूद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकेगी। 
धारा  217. बोर्ड या आयुक्त द्वारा पुनरीक्षण को छोड़कर और अपीलों का वर्जन
> धारा 215 के अधीन की गयी अपील में आयुक्त या उपायुक्त द्वारा पारित आदेश पर आगे कोई अपील नहीं की जाएगी। उपायुक्त द्वारा पारित आदेश पर आयुक्त या बोर्ड कोई ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा वह उचित समझे।
धारा  220. अपील कब सुनी जाएगी
> उपायुक्त या आयुक्त द्वारा अपील की सुनवाई के लिए एक तारीख नियत की जाएगी। 
> यदि अपील की सुनवाई की तारीख को अपीलकर्ता स्वयं या उसका अभिकर्ता (agent) हाजिर न हो, तो अपील खारिज कर दी जाएगी।
> यदि सुनवाई की तारीख को अपीलकर्ता हाजिर हो तथा दूसरा पक्ष हाजिर न हो, तो अपील की एकपक्षीय सुनवाई कर दी जाएगी ।
धारा  221. अपील का पुनर्गहण
> यदि अपील खारिज किये जाने के तीस दिनों के भीतर अपीलार्थी यह साबित कर दे कि अपील की सुनवाई के समय वह किसी पर्याप्त कारण से हाजिर नहीं हो पाया था, तो उपायुक्त या आयुक्त अपील की पुनः सुनवाई कर सकेगा। 
धारा  222. एकपक्षीय डिक्री पारित किये जाने पर अपील की पुनः सुनवाई
> यदि प्रत्यार्थी (दूसरा पक्ष) की अनुपस्थिति में अपील पर एकपक्षीय सुनवाई कर दी जाए तो प्रत्यार्थी अपीली न्यायालय में पुनः सुनवाई के लिए आवेदन दे सकता है। 
> यदि प्रत्यार्थी अपीली न्यायालय का यह समाधान करा दे कि उसे सुनवाई की सूचना नहीं दी गयी थी अथवा किन्हीं पर्याप्त कारणों से वह सुनवाई में हाजिर नही हो पाया था, तो न्यायालय अपील की पुनः सुनवाई कर सकेगा। 
धारा  224. न्यायिक आयुक्त या उच्च न्यायालय के पास अपील
> न्यायिक आयुक्त द्वारा पारित किसी डिक्री या धारा 215 के अधीन अपील पर पारित किसी आदेश के विरूद्ध इस आधार पर द्वितीय अपील की जा सकेगी कि विनिश्चय (निर्णय) किसी विधि के प्रतिकूल है।
धारा  225. उपायुक्त के बदले न्यायिक आयुक्त द्वारा अपीलों पर सुनवाई
> जहाँ कुछ अपील उपायुक्त तथा कुछ अपील न्यायिक आयुक्त के समक्ष रखी गयी हो तो न्यायिक आयुक्त पक्षकारों में से किसी के आवेदन करने पर, उपायुक्त के न्यायालय में लंबित अपीलों को अपने न्यायालय में अंतरित कर सकेगा।
धारा  229. सिविल प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची के आदेश 41 के नियम 22 का लागू होना 
> सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की प्रथम अनुसूची के आदेश 41 के नियम 22 के उपबंध, जहां तक लागू हो सकें, इस अधिनियम के अधीन उपायुक्त या राजस्व पदाधिकारी के विनिश्चयों पर सभी अपील में लागू होंगे।
> अध्याय-16 क बिहार और उड़ीसा लोक मांग वसूली अधिनियम, 1914 के अधीन लगानों के वूसली की संक्षिप्त प्रक्रिया
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  229 क . कतिपय दशाओं में प्रमाण पत्र प्रक्रिया के अधीन लगान के बकाये की वसूली
> सरकार से भिन्न कोई भूस्वामी बकाया लगान की वसूली के लिए बिहार और उड़ीसा लोक मांग वसूली अधिनियम, 1914 द्वारा विहित प्रक्रिया को लागू करने के लिए आवेदन कर सकेगा तथा राज्य सरकार ऐसे किसी आवेदन को स्वीकृत या अस्वीकृत कर सकेगी। 
> अध्याय - 17 परिसीमा (Limitation)
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  230. भारतीय परिसीमा अधिनियम, 1908 का लागू होना
> भारतीय परिसीमा अधिनियम, 1908 के उपबंध, जहां तक वे इस अधिनियम से असंगत न हों, इस अधिनियम के अधीन सभी वादों, अपीलों और आवेदनों पर लागू होंगे।
धारा  231. परिसीमा का साधारण नियम
> इस अधिनियम के अधीन संस्थित सभी वाद या आवेदन, जिनके लिए अधिनियम में परिसीमा की कोई समयावधि उपबंधित नहीं हैं, वाद के प्रोद्भूत होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर संस्थित और दाखिल किये जायेंगे।
धारा  232. पट्टों आदि के अनुदान के लिए वादों और आवेदनों की परिसीमा
> पट्टे आदि के अनुदान हेतु वाद या आवेदन किसी भी समय संस्थित और दाखिल किये जायेंगे। 
धारा  233. बेदखली के लिए वादों की परिसीमा
> किसी आधार पर अधिभोगी या अनधिभोगी रैयत की बेदखली के लिए वाद, दुरूपयोग या भंग की तारीख से दो वर्षों के भीतर संस्थित किये जायेंगे।
धारा  234. लगान के बकाये के लिए वादों और आवेदनों की परिसीमा
> लगान के बकाये की वसूली के लिए वाद और आवेदन बकाया से संबंधित कृषि वर्ष के तीन वर्षों के भीतर संस्थित किये जायेंगे।
धारा  236. धन, लेखा या कागज पत्र के लिए एजेंटों के विरूद्ध वादों की परिसीमा
> किसी एजेंट के जिम्मे धन वसूली या लेखा अथवा कागज-पत्र के परिदान के लिए वाद, ऐसे एजेंट के पर्यवसान के एक के वर्ष भीतर लाया जा सकता है।
धारा  237. जोत का कब्जा वापस पाने के लिए आवेदन की परिसीमा
> यदि किसी जोत से अधिभोगी रैयत को बेदखल कर दिया गया हो, तो उसका कब्जा वापस पाने हेतु आवेदन बेदखली की तारीख से तीन वर्षों के भीतर अवश्य दे दिया जाएगा।
धारा  238.  ग्राम मुखिया द्वारा कब्जे की वापसी के लिए वादों या आवेदनों की परिसीमा
> किसी कृषि भूमि का कब्जा वापस पाने हेतु किसी ग्राम मुखिया द्वारा वाद या आवेदन बेकब्जा की तारीख से तीन वर्ष के भीतर अवश्य दे दिया जाएगा।
> अध्याय-18 मुण्डारी खूँटकट्टीदारों के विषय में विशेष उपबंध '
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  239.  मुण्डारी खूँटकट्टीदार काश्तकारियों पर पूर्ववर्त्ती धाराओं का लागू होना
> वे पूर्ववर्त्ती धाराएं जो मुण्डारी खूँटकट्टीदारों पर लागू होने योग्य हैं, उन व्यक्तियों और उनकी काश्तकारियों पर लागू करने में, इस अध्याय की अगली धाराओं के अधीन गठित की जायेगी।
धारा  240.  मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारियों के अंतरण पर प्रतिबंध
> कोई मुण्डारी खूँटकट्टीदारी अभिधृत्ति या उसका भाग न्यायालय की डिक्री या आदेश के निष्पादन में विक्रय द्वारा हस्तान्तरणीय नहीं होगा। परन्तु, छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1903 के प्रारंभ के पूर्व रजिस्ट्रीकृत किसी बंधक (भोगबंधक से भिन्न ) के अधीन देय ऋण के समाधान में किसी काश्तकारी या उसके भाग के विक्रय के लिए किसी न्यायालय द्वारा डिक्री या आदेश किया गया हो, तो विक्रय उपायुक्त की पूर्व मंजूरी से किया जा सकेगा। 
> यदि उपायुक्त ऐसी किसी अभिधृत्ति या उसके भाग के विक्रय की मंजूरी देने से इंकार कर दे, तो वह उस भूमि को कुर्क कर लेगा तथा ऋण के समापन के लिए उचित इंतजाम करेगा। 
> मुण्डारी खूँटकट्टीदारी अभिधृत्ति या उसके किसी भाग का कोई बंधक जो भुगतबंध बंधक के रूप में सात वर्षों से अधिक न हो, विधिमान्य नहीं होगा।
> परती भूमि के मुकर्ररी पट्टे, जो मुण्डारी या मुण्डारियों के किसी समुदाय को भूमि के उपयुक्त भागों पर खेती करने हेतु दिये गए हों या किसी मुण्डारी खेतिहर को रैयत के रूप में खेती करने हेतु दिया गया हो, इसके सिवाय मुण्डारी खूँटकट्टीदारी अभिधृत्ति या उसके किसी भाग का कोई पट्टा विधिमान्य नहीं होगा।
( स्पष्टीकरण "परती भूमि" का तात्पर्य ऐसी भूमि से है, जो पहले जोत में थी, फिर भी जिस समय पट्टा दिया गया, उस समय न तो जोत में थी या न खेती के लिए पट्टेदार के अधिभोग में थी। )
> यदि कोई अभिधृत्ति मुण्डारी खूँटकट्टीदारों के समुदाय द्वारा धारित हो, तो अभिधृत्ति का कोई भुगतबंध बंधक या मुकर्ररी पट्टा तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि यह सभी मुण्डारी खूँटकट्टीदारों की सहमति से न किया जाय।
> किसी मुण्डारी खूँटकट्टीदारी अभिधृत्ति या उसके किसी भाग का, पूर्ववर्ती उपधाराओं में उप. बंधित से अन्यथा किए गए किसी करार द्वारा कोई अंतरण विधिमान्य नहीं होगा। 
> पूर्ववर्ती उप-धाराओं की किसी बात से किसी विक्रय पर, उप-धारा (1) के परन्तुक में यथाघोषित के सिवाय, छोटानागपुर काश्तकारी (संशोधन) अधिनियम, 1903 के प्रारंभ के पूर्व किये गये किसी विक्रय या बंधक पटट्टे पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।
धारा  241. कतिपय प्रयोजनों के लिए अंतरण
> धारा 240 में अंतर्विष्ट किसी बात के होने पर भी, कोई मुण्डारी खूँटकट्टीदार अपने भूस्वामी की सहमति के बिना भी काश्तकारी या संपदा की भलाई हेतु निम्न प्रयोजनों से अंतरित कर सकेगा: –
» किसी खैराती, धार्मिक या शैक्षिक प्रयोजनों से अथवा
» विनिर्माण या सिंचाई के प्रयोजनों से अथवा
» ऐसे किसी प्रयोजन के लिए प्रयुक्त भूमि तक पहुंच के लिए
> इस प्रकार के अंतरण हेतु सहमति देने से पूर्व उपायुक्त यह समाधान कर लेगा कि अंतरण द्वारा हुई हानि के लिए भूस्वामी या सह अंशधारियों को पर्याप्त प्रतिकर दे दिया गया है।
धारा  242. ऐसी काश्तकारी का विधि विरूद्ध कब्जा प्राप्त करने वाले व्यक्तियों की बेदखली
> यदि कोई व्यक्ति किसी मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी या उसके किसी भाग का कब्जा धारा 240 के उपबंधों का उल्लंघन करके प्राप्त कर ले तो उपायुक्त उसे वहां से बेदखल कर सकेगा।
धारा  243. लगान में वृद्धि
> किसी मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी का लगान केवल निम्नलिखित दशाओं में ही बढ़ाया जा सकेगा:
» उपायुक्त के आदेश से, तथा
» यदि उपायुक्त के समय यह साबित कर दिया जाय कि लगान वृद्धि की अर्जी के ठीक पहले के बीस वर्षों की अवधि के भीतर काश्तकारी सृजित की गयी थी।
> उपायुक्त के आदेश से ऐसी काश्तकारी का लगान देय लगान के आधे से अधिक नहीं बढ़ाया जाएगा।
धारा  244. प्रमाण पत्र प्रक्रिया के अधीन लगान के बकाये की वसूली
> अधिकार अभिलेख तैयार होने के बाद यदि किसी मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी का लगान बकाया हो तो ऐसी बकाये की वसूली के लिए किसी न्यायालय में वाद नहीं चल सकता। परन्तु भूस्वामी लिखित रूप में उपायुक्त के पास यह आवेदन कर सकेगा कि 12.50 प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज के साथ उसकी वसूली करने वाला प्रमाण-पत्र हस्ताक्षरित किया जाय।
धारा  245. स्वत्व के प्रश्न का सिविल न्यायालय में निर्देश
> यदि धारा 244 के अधीन किसी कार्यवाही में कोई स्वत्व का प्रश्न उठाया जाय और उपायुक्त की राय में इसका अवधारण सिविल न्यायालय में अधिक उचित ढंग से किया जा सकता हो, तो उपायुक्त ऐसे प्रश्न को अवधारण के लिए जिले के प्रधान सिविल न्यायालय में निर्दिष्ट कर देगा।
धारा  246. अधिकार अभिलेख के अभाव में लगान बकाये की वसूली वाद द्वारा किया जाना
> यदि किसी मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी के बकाये लगान के संबंध में अधिकार अभिलेख तैयार नहीं किया गया हो, तो भूस्वामी बकाये की वसूली हेतु वाद दे सकेगा। 
> ऐसे किसी वाद में दी गयी डिक्री या आदेश का प्रवर्तन केवल प्रतिवादी की जंगम संपत्ति की कुर्की व बिक्री द्वारा या अन्य ऋणों की कुर्की व वसूली द्वारा या प्रतिवादी के शरीर के विरूद्ध निष्पादन द्वारा किया जा सकेगा।
धारा  247. धारा 244 या 246 के अधीन कार्यवाहियों का संयोजन 
> यदि कोई मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी खूँटकट्टीदारों के समूह द्वारा संयुक्त रूप से धारित हो और धारा 244 के अधीन प्रमाण-पत्र दिये जाने पर अथवा धारा 246 के अधीन वाद चलाये जाने पर इस आधार पर आपत्ति की जाती है कि सभी खूँटकट्टीदारों को कार्यवाही का पक्षकार नहीं बनाया गया है, तो आपत्ति नहीं मानी जाएगी ।
धारा  248. सरकार को देय धन या भूस्वामी को देय लगान की वसूली
> जहां किसी मुण्डारी खुँटकट्टीदार के विरूद्ध सरकार को देय किसी धन अथवा किसी भूस्वामी को देय लगान के लिए बिहार - उड़ीसा लोक मांग वसूली अधिनियम, 1914 के अधीन डिक्री या प्रमाण-पत्र दिया जाए वहां उपायुक्त उसके द्वारा दखल की हुई ऐसी भूमि की कुर्की कर सकेगा।
धारा  249. सह- अंशधारी काश्तकारों से अंशदान की वसूली
> यदि किसी मुण्डारी खूँटकट्टीदार ने अपनी काश्तकारी का लगान सह- अंशधारियों के अं सहित चुका दिया हो, तो सह-अंशधारियों से ब्याज सहित उक्त अंश की वसूली की जाएगी।
धारा  250. अधिकार अभिलेख में मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारियों की प्रविष्टि 
> सभी मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारियों की प्रविष्टि अध्याय 12 के अधीन तैयार अभिलेख में इसी प्रकार वर्णित रहेंगी।
धारा  251. धारा 87 के अधीन वादों का वर्जन
> अधिकार-अभिलेख में मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी के संबंध में किसी प्रविष्टि के संबंध में कोई वाद विनिश्चय के लिए धारा 87 के अधीन ग्रहण नहीं किया जाएगा। 
धारा  252. अधिकार-अभिलेख में प्रविष्टि या लुप्ति विषयक विवादों का विनिश्चय 
> इस अधिनियम के अधीन अधिकार - अभिलेख के अंतिम प्रकाशन की तारीख से तीन माह के भीतर मुण्डारी खूँटकट्टीदारी काश्तकारी की किसी प्रविष्टि या किसी लुप्ति से संबंधित कोई वाद निर्णय हेतु राजस्व पदाधिकारी के समक्ष लाया जा सकेगा।
धारा  253. विनिश्चयों के विरूद्ध अपील
> धारा 252 के अधीन राजस्व पदाधिकारी के विनिश्चय ( निर्णय) की अपील विहित रीति से विहित पदाधिकारी के पास हो सकेगी।
धारा  254. अधिकार अभिलेख में विनिश्चयों की प्रविष्टि
> जब धारा 252 के अधीन लाये गये वाद का अंतिम रूप से विनिश्चय हो जाय तब उसे राजस्व पदाधिकारी द्वारा अंतिम रूप से प्रकाशित अधिकार अभिलेख में शामिल किया जाएगा। 
धारा  255. अधिकार अभिलेख तैयार करने में वाद के निर्णय आदि को साक्ष्य के रूप में ग्रहण नहीं किया जाना
> बंगाल काश्तकारी अधिनियम, 1885 के अधीन किसी स्थानीय क्षेत्र, संपदा, भूधृत्ति या उसके किसी भाग से संबंधित आदेश निकाला जाय, तो अधिकार - अभिलेख की तैयारी में लगे राजस्व अधिकारी द्वारा इस दावे के बारे में की गयी किसी जाँच में साक्ष्य के रूप में नहीं लिया जाएगा | कि उक्त क्षेत्र, संपदा, भूधृत्ति या भाग मुण्डारी खूँटकट्टीदारी है या नहीं। 
> अध्याय - 19 अनुपूरक उपबंध
> धारा
> प्रमुख प्रावधान
धारा  257. संयुक्त भूस्वामी
> जब दो या दो से अधिक भूस्वामी हों, तो भूस्वामी से अपेक्षित सभी कार्य उन सभी व्यक्तियों द्वारा या प्राधिकृत अभिकर्ता (agent) द्वारा किया जायेगा।
धारा  258. कतिपय दशाओं में वादों का वर्जन 
> इस अधिनियम में स्पष्ट रूप से उपबंधित धाराओं के सिवाय, धारा 20, 32, 35, 42, 46, 49, 50, 54, 61, 63, 65, 73, 74क, 75, 85 86 87 89, 91 या अध्याय 13, 14, 15, 16, 18 के अधीन किसी वाद में उपायुक्त या किसी राजस्व पदाधिकारी के आदेश को परिवर्तित या अपास्त करने के लिए कोई वाद ग्रहण नहीं किया जाएगा।
धारा  263. साक्षियों या दस्तावेजों का पेश किया जाना
> इस अधिनियम के अधीन किसी उपायुक्त या राजस्व पदाधिकारी को सम्मन करने एवं साक्ष्यों को हाजिर करने की वही शक्ति प्राप्त है, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत न्यायालय को है।
धारा  264. अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए नियम बनाने की शक्ति
> राज्य सरकार इस अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न नियम बना सकेगी। 
धारा  265. सिविल प्रक्रिया संहिता की प्रक्रिया लागू करने के संबंध में नियम बनाने की शक्ति 
> राज्य सरकार इस अधिनियम के अधीन उन बातों के संबंध में जिनके लिए इसके द्वारा कोई प्रक्रिया उपबंधित नहीं की गई है, उपायुक्त की प्रक्रिया विनियमित करने के लिए नियम बना सकेगी।
धारा  268. देय धन की वसूली
> लगान के वादों में अधिनिर्णित खर्चे और ब्याज लगान के बकाये की भांति वसूल किये जाएंगे। 
धारा  269. एक राजस्व अधिकारी से अन्य राजस्व अधिकारी के पास वादों का अंतरण
> कोई राजस्व पदाधिकारी इस अधिनियम के अधीन लंबित किसी वाद, आवेदन या कार्यवाही को इस अधिनियम में अधीन कार्य करने वाले किसी अन्य प्राधिकृत राजस्व अधिकारी की संचिका में किसी भी समय अंतरित कर सकेगा।
धारा  270. उपायुक्तों और उप-कलक्टरों पर नियंत्रण
> इस अधिनियम के तहत अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले उपायुक्त, आयुक्त तथा बोर्ड के निदेश और नियंत्रण के अधीन रहेंगे तथा उपायुक्त के कृत्यों का निर्वहन करने वाले उप-कलक्टर भी उपायुक्त के निदेश और नियंत्रण के अधीन रहेंगे। 
धारा  271. विशेष अधिनियमितियों की व्यावृत्ति (Exclusiveness)
> इस अधिनियम की कोई बात किसी विधि द्वारा परिभाषित बंदोबस्त पदाधिकारियों की शक्तियों एवं कर्त्तव्यों को प्रभावित नहीं करेगी।
> अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
> 11 नवंबर, 1908 * को छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम को लागू कर दिया गया। इस अधिनियम को भारतीय परिषद् अधिनियम, 1892 की धारा-5 के अधीन गवर्नर जनरल की मंजूरी से अधिनियमित किया गया।
> छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम का खाका (Blueprint) एक अंग्रेज जॉन एच. हॉफमैन ने तैयार किया था। 
> छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम मुख्यतः बंगाल काश्तकारी अधिनियम से प्रभावित है। 
> इसे सबसे पहले कलकत्ता गजट में प्रकाशित किया गया था।
> यह अधिनियम कुल 19 अध्यायों में विभाजित है तथा इसमें 271 धाराएँ हैं।
> CNTAct का उद्देश्य 
1. छोटानागपुर में भूमि संबंधी विवादों को समाप्त करना। 
2. जनजाति विद्रोहों को नियंत्रित करना । 
3. जनजाति समुदायों के भूमि संबंधी अधिकारों की रक्षा करना।
4. जनजातियों को भूमि संबंधी मालिकाना हक प्रदान करना।
> भारतीय संविधान के 66वें संशोधन (1990) के द्वारा छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की कुछ धाराओं को भारतीय संविधान की नवीं अनुसूची में शामिल किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप न्यायपालिका इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती तथा संसद को ही इसमें संशोधन करने का अधिकार है। 
> इस अधिनियम की धारा 49 के तहत जनजातीय भूमि का हस्तांतरण या विक्रय उद्योग, खनन एवं कृषि कार्य हेतु गैर-जनजाति को किया जा सकता है।
> झारखण्ड सरकार द्वारा वर्ष 2016 में इस अधिनियम की धारा 49 में संशोधन प्रस्तावित है, जिसके आलोक में अब उद्योग और खनन कार्यों के अतिरिक्त आधारभूत संरचना, रेल परियोजना, कॉलेज, ट्रांसमिशन लाइन आदि कार्यों के लिए भी सरकार जमीन ले सकेगी। साथ ही सरकार अब विकास हेतु निगम कंपनियों के लिए भी जमीन का अधिग्रहण कर सकेगी।
> इस अधिनियम की धारा 71 (क) के अनुसार किसी जनजातीय भूमि का किसी गैर-जनजाति को अंतरण किये जाने पर′उसे वापस दिलाने का प्रावधान किया गया है। इस धारा के तहत क्षतिपूर्ति के द्वारा किसी जनजातीय जमीन को गैर-जनजाति को अंतरित किया जा सकता था । परन्तु झारखण्ड सरकार द्वारा वर्ष 2016 में प्रस्तावित संशोधन के द्वारा अब क्षतिपूर्ति के आधार पर ऐसा नहीं किया जा सकेगा। साथ ही जमीन वापसी के मुकदमे एस. ए. आर. कोर्ट में दायर होंगे।
> 1969 में अवैध भूमि हस्तांतरण की रोकथाम व वैधीकरण हेतु बिहार अधिसूचित क्षेत्र विनियमन अधिनियम पारित किया गया। इसके तहत एक विशेष कोर्ट की स्थापना की गयी तथा आदिवासी जमीन के हस्तातंरण एवं विक्रय के संबंध में उपायुक्त को विशेष शक्तियाँ प्रदान की गयी। इस प्रावधान के तहत उपायुक्त की अनुमति के बिना एक आदिवासी द्वारा दूसरे आदिवासी भूमि का हस्तांतरण या विक्रय नहीं किया जा सकता है। 
> 1947 में इस कानून में अहम संशोधन किया गया ताकि नगरीकरण, औद्योगीकरण तथा विकास परियोजनाओं की स्थापना की जा सके।
> वर्ष 2005 में भारत सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् का गठन किया गया जिसने सरकार को सिफारिश की कि किसी भी परियोजना (खनन, विद्युत व अन्य ) की स्थापना हेतु अधिसूचित क्षेत्रों में आदिवासी लोगों का विस्थापन न हो।
> सन् 1894 में ‘सार्वजनिक हित' के आधार पर भूमि का अधिग्रहण करने हेतु 'भूमि अधिग्रहण अधिनियम' पारित किया गया। इस कानून में सन् 2013 में महत्वपूर्ण संशोधन किया गया तथा इस नामकरण 'भूमि अधि ग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013' कर दिया गया। इस अधिनियम में रक्षा व रक्षा उत्पादन, ग्रामीण अवसंरचना विकास (ऊर्जा, आवास, औद्योगिक गलियारा) तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत विकास परियोजनाओं हेतु भूमि अधिग्रहण हेतु 70-80 प्रतिशत भूस्वामियों की सहमति का प्रावधान किया गया। 
> भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापण अधिनियम, 2013 के तहत ऐसे व्यक्ति को भूमि का स्वामी माना गया है जिसका नाम भूस्वामी के रूप में दर्ज हो, वह व्यक्ति जिसे वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत वन अधिकार प्राप्त हो तथा वह व्यक्ति जिसे पट्टा जारी करने का अधिकार प्राप्त हो ।
> सन् 1982 तथा 1986 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 की धारा 7, 8 और 76 की वैधानिकता को सर्वोच्च न्यायालय में इस आधार पर चुनौती दी गयी कि इन धाराओं के अंतर्गत महिलाओं की समानता के अधिकार तथा जीवन के अधिकार का अतिक्रमण हो रहा है। यह चुनौती इस आधार पर दी गयी कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 के अंतर्गत एक कन्या खूँटकट्टीदार को पैतृक संपत्ति पर उत्तराधिकार के अधिकार से वंचित कर दिया गया है, जो संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
> छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 में अभी तक 26 संशोधन किये जा चुके हैं। इसमें प्रथम संशोधन 1920 ई. में तथा अंतिम संशोधन 1995 में किया गया था। 
> छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 झारखण्ड के उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर तथा पलामू प्रमण्डल में प्रभावी है।
> छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम द्वारा ठेठ बेकारी (बंधुआ मजदूरी) पर प्रतिबंध लगाया गया तथा लगान की दरें कम की गई ।
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Wed, 21 Jun 2023 13:21:29 +0530 Jaankari Rakho
छोटानागपुर भूधृत्ति अधिनियम, 1869 https://m.jaankarirakho.com/छोटानागपुर-भूधृत्ति-अधिनियम-1869 https://m.jaankarirakho.com/छोटानागपुर-भूधृत्ति-अधिनियम-1869 > छोटानागपुर में भुईंहरी के नाम भूधृत्तियाँ विद्यमान हैं। इसे ऐसे लोग धारण करते हैं जो स्वयं को उन गाँवों को स्थापित करने वाले मूलवासियों के वंशज मानते हैं, जहाँ ऐसी भूमि अवस्थित है।
> गाँवों में कुछ भूधृत्तियों को 'भूतखेत', 'डलीकटारी' एवं 'पहनई' के नाम से जाना जाता है। इस जमीन को ‘पाहन' या पुजारी के लिए अलग से रखी जाती है, ताकि वह अपने कर्त्तव्यों का पालन कर सके।
> गाँव के ‘महतो' के लिए भी अलग से जमीन रखी जाती है जिसे 'महतोई' के नाम से जाना जाता है।
> गाँव में ‘मंझिहस' नाम से कुछ जमीनें अलग से रखी जाती हैं, जिसे उन गाँवों के अपने-अपने स्वत्वधारियों के उपयोग के लिए आरक्षित किया जाता है। साथ ही 'बठखेत' नाम से ऐसी जमीनें हैं, जिसे मंझिहस जमीनों पर काम करने वाले गाँव के पारिश्रमिकों के लिए नियत किया जाता है।
> इस अधिनियम के शब्दविन्यास के अंतर्गत 'भुईंहरी' शब्द में 'भूतखेत''डलीकटारी', 'पहनई' तथा " 'महतोई' शब्द परिभाषित हैं। 
> विशिष्ट कमिश्नर के कार्य :- प्रत्येक नियुक्त विशिष्ट कमिश्नर का यह कर्त्तव्य होगा कि वह उसकी अधि कारिता की सीमाओं में यदि कोई व्यक्ति 'भुईंहरी' या 'मंझिहस' धृत्तियों पर अगर दावा करता है, तो कमिश्नर उसके स्वत्व की जाँच-पड़ताल तथा उसका सीमांकन करेगा।
> विशिष्ट कमिश्नर की शक्तियाँ : विशिष्ट कमिश्नर इस अधिनियम द्वारा उन शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो कलेक्टर को भूराजस्व की बन्दोबस्ती करने की शक्ति देता है ।
> रिकार्ड के विषय वस्तु :- विशिष्ट कमिश्नर 'भुईहरी' एवं 'मंझिहस' की श्रेणी में आने वाली जमीनों का एक रजिस्टर तैयार करेगा।
> जिन व्यक्तियों का बेजा कब्जा हरण हो गया हो, उन्हें पुनः प्रतिष्ठित करने की शक्ति :- विशिष्ट कमिश्नर के समक्ष यदि यह साबित हो जाता है कि किसी 'भुईहरी' या 'मंझिहस' धृत्ति धारण करने वाले व्यक्ति की जमीन पर कब्जा हो गया है, तो विशिष्ट कमिश्नर उस व्यक्ति या उसके वारिस को जमीन वापस दिलवाएगा।
> विशिष्ट कमिश्नर द्वारा निर्णय :- कर निर्धारक अपने विचार विशिष्ट कमिश्नर के सामने रखेंगे तथा निर्णय करने का अधिकार केवल विशिष्ट कमिश्नर को होगा।
> निर्णयों का पुनर्विलोकन:- निर्णयों के पुनर्विलोकन का अधिकार केवल विशिष्ट कमिश्नर हो होगा। 
> अपील की शक्ति :- विशिष्ट कमिश्नर के द्वारा पारित किसी निर्णय या आदेश के विरूद्ध प्रमण्डल के कमिश्नर के पास अपील की जा सकेगी।
> मुख्तार एवं वकील की सुनवाई नहीं :- विशिष्ट कमिश्नर की सहमति के बिना विशिष्ट कमिश्नर के समक्ष लाये गये किसी भी मामले में 'मुख्तार' या 'वकील' की सुनवाई नहीं की जा सकेगी।
> राज्य सरकार नियम बना सकती है: –राज्य सरकार आवश्यकतानुसार कोई नियम बना सकती है या आदेश पारित कर सकती है।
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Wed, 21 Jun 2023 12:49:54 +0530 Jaankari Rakho
भूमि संबंधी अधिनियम : परिचय https://m.jaankarirakho.com/भूमि-संबंधी-अधिनियम-परिचय https://m.jaankarirakho.com/भूमि-संबंधी-अधिनियम-परिचय > ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न प्रकार के कानून बनाकर अंग्रेजों ने प्रशासनिक व्यवस्था को अपने अधीन लाने का षड़यंत्र किया। ब्रिटिश सरकार का मुख्य उद्देश्य अपने राजस्व में वृद्धि करना था। इसी क्रम में न्यायालयों का उपयोग कर स्थानीय जमींदारों, जागीरदारों एवं रैयतों की भूमि की निलामी करना प्रारंभ कर दिया। निलामी से बचने हेतु जमींदारों एवं जागीरदारों ने कठोरता से लगान वसूलना शुरू कर दिया। परिणामतः रैयतों की स्थिति खराब होती गयी। इस स्थिति में रैयतों ने अन्य किसी विकल्प के अभाव में अंग्रेजों एवं जमींदारों के विरूद्ध कई विद्रोह किये।
> ब्रिटिश शासनकाल में जमींदारों की नियुक्ति तथा उन्हें हटाने का अधिकार जिला कलक्टर को दिया गया था। 
> 1765 ई. में छोटानागपुर का क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अंतर्गत आया था।
> 1765 ई. में झारखण्ड क्षेत्र में सबसे पहले मालगुजारी व्यवस्था लागू की गयी ।
> 1793 ई. में रामगढ़ के पहाड़ी क्षेत्रों में स्थायी बंदोबस्त रेग्यूलेशन एक्ट लागू किया गया था। झारखण्ड में 1824 ई. में पहली बार रैयतों के अधिकारों को परिभाषित करते हुए उनकी सुरक्षा का प्रावधान किया गया।
> इन विद्रोहों में 1831-32 ई० का कोल विद्रोह तथा 1895-1900 ई० का बिरसा उलगुलान प्रमुख हैं। इन विद्रोहों के परिणामस्वरूप अंग्रेजी शासन द्वारा यह महसूस किया जाने लगा कि जनजातीय समस्याओं का निराकरण किये बिना शांतिपूर्वक ढंग से प्रशासन चलाना संभव नहीं है।
> जनजातियों की इन समस्याओं (जिसमें भूमि संबंधी समस्याएँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं) के समाधान हेतु सरकार ने समय-समय पर कई सुधार करने के प्रयास किये। इस क्रम में सन् 1862 में बाबू राखलदास हलधर के नेतृत्व में भुईहरी भूमि एवं स्थानीय जमींदारों की मझियस भूमि को चिन्हित करने के लिए भुईहरी सर्वे प्रारंभ किया गया, जो 1869 ई० तक चला। जनजातियों की भूमि को संरक्षित करने हेतु सरकार की ओर से उठाया गया यह प्रथम सराहनीय व प्रभावी कदम था।
> 1834 ई. में छोटानगपुर क्षेत्र में विल्किंसन कानून लागू किया गया था।
> राँची के आसपास 1869 ई. में बाबू राखलदास हलधर के नेतृत्व में 2,482 गाँवों का भुईहरी सर्वे किया गया। 
> ट्रवर्स सर्वे, थाकवस्त सर्वे एवं कैडस्ट्रल सर्वे का संबंध भूमि सर्वेक्षण से है। 
> छोटानागपुर भूधृति अधिनियम, 1869 के द्वारा लगान संबंधी विवादों की सुनवाई का अधिकार जिला कलक्टर के स्थान पर दीवानी अदालतों को दे दिया गया।
> चुटिया नागपुर के क्षेत्र में 1879 ई. में छोटानागपुर एवं काश्तकारी प्रक्रिया अधिनियम को लागू किया गया।
> ब्रिटिश सरकार ने छोटानागपुर के तत्कालीन कमिश्नर फारबेस (फोर्बस) की सिफारिश पर लिस्टर एवं जॉन रीड को राँची जिले में भूमि की पैमाईश और 1902 में बन्दोबस्ती का काम सौंपा। यह कार्य 1902 से 1910 ई. तक चला, जिसके बाद मुण्डा जनजातियों की जमीन से संबंधित खतियान ( रिकार्ड ऑफ राइट्स) तैयार किया गया।
> मुण्डारी खूँटकट्टीदारी प्रथा को 1903 ई. में मान्यता प्रदान की गयी।
> बिहार भूमि सुधार अधिनियम को 1950 ई. में लागू किया गया था। 
> इस प्रक्रिया में सरकार द्वारा उठाये गये कुछ अन्य महत्वपूर्ण कदम निम्नवत् हैं
>> छोटानागपुर भूधृति अधिनियम – 1869 
(Chhotanagpur Tenures Act )
>> छोटानागपुर भूस्वामी एवं काश्तकारी प्रक्रिया अधिनियम – 1879 
(Chota Nagpur Landlord and Tenant Procedures Act)
>> बंगाल काश्तकारी अधिनियम –1897 
(Bengal Tenancy Act )
>> 1902 में छोटानागपुर में मौजावार सर्वे का प्रारंभ । इसके अंतर्गत खेवट एवं खतियान का निर्माण किया जाना था।
>>1903 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम के प्रारूप का निर्माण।
>> छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम – 1908
(Chotanagpur Tenancy Act )
>> संताल परगना काश्तकारी अधिनियम  1949
(Santal Pargana Tenancy Act)
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Wed, 21 Jun 2023 12:47:23 +0530 Jaankari Rakho
अन्य जनजातीय शासन व्यवस्थाएँ https://m.jaankarirakho.com/अन्य-जनजातीय-शासन-व्यवस्थाएँ https://m.jaankarirakho.com/अन्य-जनजातीय-शासन-व्यवस्थाएँ > झारखण्ड के अन्य जनजातियों की स्वशासन व्यवस्था / जातीय पंचायत से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य
> झारखण्ड में कुल 32 जनजातियाँ पायी जाती हैं तथा इन सभी जनजातियों में स्वशासन की व्यवस्था विद्यमान है। इनमें से प्रमुख जनजातियों की स्वशासन व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों का विवरण पीछे के अध्यायों में दिया जा चुका है। अन्य जनजातियों की व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान में रखना परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी होगा। इसका संक्षिप्त व सारणीवार विवरण आगे दिया जा रहा है।
> जनजाति
> स्वशासन व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य 
> लोहरा/लोहार
> इस जनजाति की कोई संगठित शासन व्यवस्था नहीं है। परन्तु अपनी जातिगत समस्याओं को सुलझाने हेतु इनकी जाति पंचायत होती है। 
> दो गाँवों के बीच के विवादों का निपटारा किसी खास मौके पर निर्मित अंतर्ग्रामीण परिषद् के द्वारा किया जाता है।
> भूमिज
> इस जनजाति की जातीय पंचायत का मुखिया प्रधान कहलाता है तथा यह वंशानुगत होता है।
> इस जनजाति में पैतृक संपत्ति का बंटवारा भाईयों में बराबर किया जाता है। यदि किसी परिवार में पुत्र नहीं है तो संपत्ति पर पुत्री का अधिकार होता है।
> इस जनजाति में सगोत्रीय विवाह को मान्यता प्राप्त नहीं है।
> महली
> इस जनजाति की कोई संगठित शासन व्यवस्था नहीं है। परन्तु गाँव स्तर पर पंचायत का गठन किया जाता है तथा इसी के माध्यम से आपसी विवादों का समाधान किया जाता है ।
> अपराधी को आर्थिक तथा शारीरिक दोनों प्रकार के दण्ड दिये जाते हैं।
> गंभीर अपराध के दोषी को सामूहिक भोज देने की सजा सुनायी जाती है।
> माल पहाड़िया
> इस जनजाति की स्वशासन व्यवस्था में ग्राम पंचायत का प्रधान माँझी कहलाता है। 
> माँझी की सहायता गोड़ाइत तथा दीवान करते हैं।
> पंचायत का फैसला सभी को मानना होता है तथा निर्णय की अवहेलना करने वाले व्यक्ति को गाँव से बहिष्कृत कर दिया जाता है।
> दो या अधिक गाँवों के विवाद को एक अंतर्ग्रामीण पंचायत द्वारा सुलझाया जाता है जिसका मुखिया सरदार कहलाता है।
> इस जनजाति में बिटलाहा जैसी सजा का प्रावधान नहीं है ।
> सौरिया पहाड़िया
> माल पहाड़िया की ही भांति इस जनजाति की स्वशासन व्यवस्था में ग्राम पंचायत का प्रधान माँझी कहलाता है ।
> माँझी का मुख्य कार्य सभी प्रकार के झगड़ों का निपटारा करना होता है। साथ ही वह धार्मिक क्रियाकलापों का संपादन भी करता है।
> माँझी के कार्यों में गोड़ाइत उसकी सहायता करता है।
> इस व्यवस्था में 15-20 गाँवों पर एक नायक तथा 78-80 गाँवों पर एक सरदार की व्यवस्था होती है। इन दोनों का कार्य अंतग्रमीण विवादों का निपटारा करना होता है।
> करमाली
> इस शासन व्यवस्था में सभी पद वंशानुगत होते हैं।
> इस जनजाति में कोई व्यवस्थित राजनीतिक संगठन नहीं पाया जाता है।
> गाँव में जातीय पंचायत का प्रधान मालिक कहलाता है। यह पद वंशानुगत होता है।
> मालिक गाँव के विवाह, गोत्र, यौन अपराध आदि मामलों का निष्पादन करता है। 
> परगना स्तर पर सतगंवइया नामक पंचायत होती है जिसका प्रमुख कार्य अंतग्रमीण विवादों का निपटारा करना होता है।
> परगना से ऊपर 20-22 गाँवों की एक पंचायत होती है जिसे बाईसी कहा जाता है। 
> इस जनजाति में शारीरिक के साथ-साथ आर्थिक दण्ड का भी प्रावधान है।
> गोड़ाइत द्वारा पंचायत की बैठक की सूचना गाँव के लोगों तक पहुँचाया जाता है।
> परहिया
> इस जनजाति में गाँव पंचायत का मुखिया महतो कहलाता है तथा इसका सहायक कहतो या खतो कहलाता है। महतो द्वारा प्रथागत नियमों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
> प्रत्येक गाँव में एक जाति पंचायत होती है जिसे भैयारी या जातिगोठ कहा जाता है।
> 8-10 गाँवों को मिलाकर एक अंतग्रमीण पंचायत का गठन किया जाता है, जिसे कारा भैयारी कहा जाता है। यह एक या अधिक गाँवों के विवादों का निपटारा करता है।
> गाँव के धार्मिक क्रियाकलापों का संपादन महतो द्वारा ही किया जाता है। 
> गाँव के कल्याण हेतु बैगा द्वारा पूजा-पाठ आदि संबंधित क्रियाकलापों का संपादन किया जाता है।
> कोरबा / कोरवा
> कोरबा जनजाति की अपनी जातीय पंचायत पायी जाती है। इसके माध्यम से शादी-विवाह, यौन अपराध, जमीन-जायदाद, संपत्ति का बँटवारा, तलाक, डायन-बिसाही आदि से संबंधित मामलों का निष्पादन किया जाता है।
> ग्राम पंचायत का प्रधान मुखिया कहलाता है।
> अंतर्ग्रामीण विवादों के निपटारे हेतु बड़ा मुखिया नामक पद का प्रावधान है।
> इस जनजाति में गवाहों को शपथ दिलाकर आरोपों की सत्यता का पता लगाया जाता है।
> जाति से बाहर विवाह करने पर व्यक्ति को बिटलाहा की ही भांति समाज से निष्कासित किया जा सकता है।
> समाज से निष्कासित व्यक्ति भोज भात के द्वारा पुनः समाज में शामिल किया जा सकता है। इस प्रथा को भात - भीतर कहा जाता है।
> असुर
> असुर पंचायत के प्रमुख अधिकारी महतो, बैगा, पुजार तथा गोड़ाइत होते हैं। असुर पंचायत में गाँव के सभी व्यस्क पुरूष सदस्य भाग लेते हैं।
> पांच गाँवों के वरिष्ठ नागरिक मिलकर पंच का निर्माण करते हैं। गाँव के सभी विवादों का निपटारा पंच द्वारा ही किया जाता है। पंच द्वारा शारीरिक तथा आर्थिक दोनों प्रकार के दण्ड दिये जाते हैं।
> बिरहोर
> बिरहोर जनजाति के लोग शिकार समूह के रूप में बँटे होते हैं जिसे ठंडा कहा जाता है। यह टंडा ही बिरहोरों का सर्वोच्च संगठन है। इसका मुखिया नाये कहलाता है।
> नाये का सहयोगी दिगुआर या कोतवार कहलाता है।
> गाँव के विवादों को सुलझाने हेतु टंडा तथा नाये के साथ सभी परिवारों के मुखिया की सभा होती है जिसमें विवादों का निपटारा किया जाता है।
> बिरजिया
> इस जनजाति में जातीय पंचायत की व्यवस्था पायी जाती है जिसका मुखिया कोई गणमान्य व्यक्ति होता है।
> जातीय पंचायत द्वारा ही सभी प्रकार के मामलों का निपटारा किया जाता है।
> इनकी जातीय पंचायत में बैगा, बेसरा, धावक तथा गाँव के बुजुर्ग व सम्मानित लोग शामिल होते हैं।
> सबर
> सबर जनजाति की अपनी जातीय पंचायत होती है जिसका प्रमुख प्रधान कहलाता है।
> प्रधान की सहायता गोड़ाइत करता है जो प्रधान के सभी आदेशों एवं संदेशों को गाँव के लोगों तक पहुँचाने का कार्य करता है।
> जातीय पंचायत द्वारा ही गाँव के सभी विवादों का निपटारा किया जाता है।
> जातीय पंचायत के सभी पद वंशानुगत होते हैं।
> खोंड
> खोंड जनजाति में गाँव के मुखिया को गौटिया कहा जाता था जो गाँव के सभी विवादों का समाधान करता था। वर्तमान समय में इस जनजाति में यह पद विद्यमान नहीं है। में सर्वसम्मति से सरपंच का चयन किया जाता
> वर्तमान समय में इस जनजाति है जो ग्राम पंचायत का प्रधान होता है।
> बथुड़ी
> बथुड़ी जनजाति में परंपरागत पंचायत व्यवस्था पायी जाती है जिसका प्रधान दोहर कहलाता है। यह पद वंशानुगत होता है तथा यह धार्मिक क्रियाकलापों का भी संपादन करता है।
> इस जनजाति में सभी विवादों का निराकरण पंचायत द्वारा ही किया जाता है। 
> अंतर्ग्रामीण पंचायत का मुखिया प्रधान कहलाता है।
> सगोत्र विवाह को गंभीर अपराध माना जाता है।
> किसान
> इस जनजाति में जातीय पंचायत की व्यवस्था पायी जाती है जो गाँव के विवादों का निपटाने का कार्य करती है।
> कई गाँवो को मिलाकर परगना पंचायत की स्थापना होती है जो अंतर्ग्रामीण विवादों का निपटारा करती है।
> पंचायत के प्रमुख अधिकारी महतो, कोतवार तथा सरदार होते हैं।
> पंचायत की बैठक बुलाने वाले व्यक्ति को पंचायत के संचालन का सारा खर्च वहन करना होता है।
> बंजारा
> इस जनजाति में कोई व्यवस्थित स्वशासन प्रणाली नहीं पायी जाती है।
> गाँव की समस्याओं के निवारण हेतु एक सामुदायिक परिषद् का गठन किया जाता है जिसका प्रमुख नायक होता है ।
> नायक का चुनाव बंजारा जनजाति के सदस्यों द्वारा ही किया जाता है।
> बिंझिया
> इस जनजाति की अपनी जातीय पंचायत होती है जिसके प्रधान मादी तथा गद्दी होते हैं। जातीय मामलों का निराकरण जातीय पंचायत में ही किया जाता है। 
> इस जनजाति में प्रत्येक घर के प्रतिनिधि सदस्य मिलकर एक प्रतिनिधि समिति का गठन करते हैं, जिसका प्रमुख करटाहा कहलाता है।
> करटाहा ही सभी प्रकार के विवादों का निराकरण करता है तथा इसका फैसला अंतिम व सभी को मान्य होता है।
> इस जनजाति में गोमांस का भक्षण वर्जित है तथा गोमांस का भक्षण करने पर समाज से बहिष्कृत करने का प्रावधान है।
>>कुछ अपराधों के मामले में गाँव को सामूहिक भोज देने पर समाज से बहिष्कृत लोगों को पुनः समाज में शामिल कर लिया जाता है।
> गोंड
> इस जनजाति में जातीय पंचायत की व्यवस्था पायी जाती है जिसका मुखिया बैगा होता है जिसे सयाना भी कहा जाता है।
> गाँव के सभी विवादों का निपटारा जातीय पंचायत में ही किया जाता है जहाँ सर्वसम्मति से निर्णय लिये जाते हैं।
> पंचायत द्वारा सुनाये गये फैसले की अवहेलना करने पर व्यक्ति को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है।
> क्षमा मांगने एवं जाति भोज देने पर बहिष्कृत व्यक्ति को पुनः समाज में शामिल किया जा सकता है।
> चेरो
> चेरो जनजाति में स्वशासन की व्यवस्था विद्यमान है जिसकी अपनी पंचायत होती है। इसी पंचायत में गाँव के विभिन्न विवादों का समाधान किया जाता है। 
> इस जनजाति में गाँव, अंचल तथा जिला स्तर पर पंचायत की व्यवस्था होती है ।.गाँव तथा अंचल स्तर के पंचायत का प्रधान मुखिया तथा जिला स्तर के पंचायत का प्रधान सभापति कहलाता है।
> पंचायत के निर्णय का उल्लंघन करने पर दोषी को जाति व समाज से बहिष्कृत करने का भी प्रावधान है।
> चीक बड़ाइक
> इस जनजाति में कोई व्यवस्थित स्वशासन की प्रणाली विद्यमान नहीं है ।
> कई गाँव मिलकर अंतग्रमीण पंचायत का गठन करते हैं जिसका प्रमुख राजा कहलाता है। राजा की सहायता दीवान, पानरे आदि द्वारा की जाती है।
> इस जनजाति की शासन व्यवस्था में सभी पद वंशानुगत होते हैं।
> सभी विवादों का निपटारा अंतग्रमीण पंचायत द्वारा प्रथागत नियमों के आधार पर किया जाता है।
> बेदिया
> इस जनजाति में व्यवस्थित स्वशासन प्रणाली पायी जाती है।
> गाँव स्तर पर निर्मित पंचायत का मुखिया 'प्रधान' कहलाता है। इसे महतो भी कहा जाता है।
> गाँव के स्तर पर सभी मामलों का निपटारा प्रधान ही करता है तथा इसका सहयोगी गड़ौत कहलाता है।
> कई गाँवों को आपस में मिलाकर अंतग्रमीण पंचायत का गठन किया जाता है, जिसका मुखिया सरकार कहलाता है।
> संपूर्ण समाज के स्तर पर अवस्थित पंचायत के प्रमुख को परगनैत कहा जाता है। 
> इस व्यवस्था में सभी पद वंशानुगत होते हैं।
> कोरा
> कोरा जनजाति की अपनी परंपरागत ग्राम पंचायत होती है जिसका मुखिया 'महतो' कहलाता है।
> महतो की सहायता के लिए प्रामाणिक तथा जोगमाँझी दो पद हैं।
> ग्राम पंचायत में प्रचलित रीति-रिवाजों के आधार पर निर्णय लिये जाते हैं।
> गोड़ाइत
> इस जनजाति में विभिन्न मामलों का निपटारा जातीय पंचायत के माध्यम से किया जाता है।
> इस जनजाति में पिता की संपत्ति पुत्रों में बराबर-बराबर विभाजित की जाती है तथा पुत्री को पिता की संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता है।
> तलाक एवं विधवा विवाह के मामले जातीय पंचायत के पास सुनवाई के लिए जाते हैं।
> कवर
> इस जनजाति में जातीय पंचायत की व्यवस्था पायी जाती है जिसका मुखिया ‘सयाना' कहलाता है।
> जातीय पंचायत के अतिरिक्त इनकी ग्राम पंचायत भी होती है जिसका मुखिया पटेल या प्रधान कहलाता है ।
> कई गाँवों को मिलाकर अंचल स्तरीय पंचायत का भी गठन किया जाता है, जो अंतर्ग्रामीण विवादों का निपटारा करता है।
> कई अंचलों को आपस में मिलाकर एक केन्द्रीय पंचायत का गठन किया जाता है, जो संपूर्ण क्षेत्र से संबंधित विवादों का निवारण करता है।
> कोल
> इस जनजाति में परंपरागत पंचायत की व्यवस्था पायी जाती है जिसका मुखिया ‘माँझी' कहलाता है।
> इसी पंचायत में गाँव के सभी मामलों का निपटारा किया जाता है तथा पंचायत का फैसला सभी को मान्य होता है।
> खरवार
> खरवार जनजाति में जातीय पंचायत की व्यवस्था पायी जाती है तथा इसका प्रमुख 'मुखिया' कहलाता है।
> गाँव के प्रायः सभी मामले जातीय पंचायत द्वारा ही सुलझाये जाते हैं। 
> दो या अधिक गाँवों के विवादों का निराकरण अंतग्रमीण पंचायत द्वारा किया जाता है। चार गाँव के पंचायत को चट्टी, पांच गाँव के पंचायत को पचौरा तथा सात गांव के पंचायत को सतौरा कहा जाता है।
> किसी व्यक्ति द्वारा पंचायतों का निर्णय नहीं मानने पर उसे गाँव से बहिष्कृत कर दिया जाता है।
> बैगा
> इस जनजाति में परंपरागत रूप से जातीय पंचायत की व्यवस्था विद्यमान रही जिसका प्रमुख 'मुकद्दम' कहलाता है। यह पद वंशानुगत होता है।
> मुकद्दम की सहायता के लिए ग्रामीणों द्वारा निर्वाचित दो पद सयाना तथा सिख होते हैं। 
> पंचायत के फैसले को गाँव के लोगों तक पहुँचाने का कार्य एक संदेशवाहक करता है जिसे चारिदार कहा जाता है है।
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Mon, 19 Jun 2023 20:03:41 +0530 Jaankari Rakho
ढोकले सोहोर शासन व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/ढोकले-सोहोर-शासन-व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/ढोकले-सोहोर-शासन-व्यवस्था > खड़िया जनजाति की पारपरिक शासक व्यवस्था को  ढोकले सोहोर या ढोकलो सोहोर शासन व्यवस्था 
के नाम से जाना जाता है।
> खड़िया जनजाति मुण्डा समाज की ही एक उपशाखा है। अतः इनके स्वशासन पद्धति में मुण्डा समाज की व्यवस्था की छाप दिखाई पड़ती है।
> ढोकलो का अर्थ है - बैठक तथा सोहोर का अर्थ है
– अध्यक्ष।
> खड़िया जनजाति मुख्यतः तीन प्रकार हैं- दूध खड़िया, ढेलकी खड़िया तथा पहाड़ी या शबर खड़िया। इन तीनों की स्वशासन पद्धति में थोड़ा बहुत अंतर पाया जाता है।
> सन् 1934-35 ई. के लगभग खड़िया जनजाति के लोगों ने अपने समाज के सशक्तिकरण हेतु एक अखिल भारतीय महासभा का गठन किया जिसे ढोकलो के नाम से जाना गया।
> ढोकलो सोहोर महासभा द्वारा जाति प्रथा का समर्थन किया गया जबकि इस समिति ने पंचायती राज व्यवस्था का विरोध किया। 
> ढोकलो सोहोर शासन व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण पदों, संगठनों एवं संबंधित तथ्यों का विवरण निम्नवत् है:
> महत्वपूर्ण पद / शब्द
> संबंधित तथ्य
> महतो
> परंपरागत रूप से जिन लोगों ने गाँव बसाया था उन्हें महतो कह कर संबोधित किया जाता है।
> महतो को गाँव का मुख्य व्यक्ति माना जाता है। यह पद सामान्यतः वंशानुगात होता है।
> गाँववालों की सहमति से महतो को बदला भी जा सकता है।
(नोट- पहाड़ी खड़िया गाँव के प्रधान को डंडिया तथा धार्मिक प्रधान को दिहुरी कहा जाता है। दिहुरी धार्मिक कार्यों के साथ-साथ इंडिया के कार्यों में भी सहयोग करता है । )
> करटाहा
> यह शासन व्यवस्था के संचालन में प्रमुख भूमिका निभाता है।
> 20-25 गाँवों के लोग पंचायत में किसी योग्य व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करते हैं।
> इस पद पर किसी ईमानदार, न्यायप्रिय, बुद्धिमान एवं सामाजिक रीति-रिवाजों के जानकार व्यक्ति को ही नियुक्त किया जाता है।
> यह पद वंशानुगत नहीं होता है तथा करटाहा को किसी प्रकार का वेतन प्रदान नहीं किया जाता है।
> यह गाँव की शासन व्यवस्था को संचालित करता है तथा गाँव के विवादों तथा अन्य समस्याओं का समाधान करता है।
> प्रत्येक गाँव का करटाहा अपने गाँव से संबंधित घटनाओं तथा समस्याओं की सूचना सोहोर को देने का कार्य करता है। यह विभिन्न विवादों के फैसले से राजा को अवगत भी कराता है।
> यह पूजा-पाठ द्वारा उन परिवारों के शुद्धिकरण (भात-भितार) का कार्य भी करता है, जिन्हें अशुद्ध घोषित किया गया है।
> नियमों की अवहेलना करने पर इसे पद से हटाया जा सकता है।
> खूट
> अंतर्ग्रामीण (दो या अधिक गाँव से संबंधित) विवादों के निपटारे हेतु सभी गोत्र के गाँवों द्वारा मिलकर एक क्षेत्रीय प्रशासन तंत्र निर्मित किया जाता है, जिसे खूट कहा जाता है।
> खड़िया घाट
> खूट (अंतग्रमीण पंचायत) का अध्यक्ष किसी करटाहा को आपस में ही चुना जाता है तथा इस पद को खड़िया घाट कहा जाता है।
> ढोकलो
> संपूर्ण खड़िया समाज की बैठक को ढोकलो के नाम से जाना जाता है। 
> खड़िया जनजाति द्वारा वार्षिक रूप से ढोकलो का आयोजन किया जाता है जिसमें सभी गाँवों के प्रमुख प्रतिनिधि जैसे- महतो, पाहन तथा करटाहा शामिल होते हैं। 
> इस बैठक के आयोजन से संबंधित सभी तैयारियों की जिम्मेदारी करटाहा की होती है। प्रत्येक 3 वर्ष में ढोकलो सोहोर ( संपूर्ण खड़िया समाज के राजा) का चुनाव लोगों द्वारा इसी सभा के माध्यम से किया जाता है।
> ढोकलो सोहोर
> ढोकलो का सभापति संपूर्ण खड़िया समाज का राजा होता है, जिसे ढोकलो सोहोर कहा जाता है। इसका चयन ढोकलो में लोगों द्वारा किया जाता है।
> बड़े मुकदमों का निर्णय राजा द्वारा स्वयं अपने मंत्रियों की सहायता से किया जाता है।
> लिखाकड़
> यह राजा का सचिव या मंत्री होता है तथा राजा को सामाजिक, राजनैतिक व प्रशासनिक कार्यों में सहयोग प्रदान करता है।
> तिंजौकड़
> यह राजा का खजांची होता है तथा आय-व्ययों का विवरण तैयार करता है ।
> देवान
> यह राजा का सलाहकार होता है तथा विभिन्न प्रशासकीय मामलों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
> पाहन/कालो
> यह गाँव का धार्मिक प्रधान होता है।
> इसे विभिन्न पर्व-त्योहारों (करमा, फागु पूजा, शादी विवाह आदि) के अवसर पर पूजा-पाठ हेतु बुलाया जाता है।
> यह वंशानुगत पद है लेकिन गाँववालों की सहमति से इसे भी हटाया जा सकता है।
> पाहन को गाँव वालों की ओर से पहनई जमीन प्रदान की जाती है।
> अन्य तथ्य
> इस समाज में गाँव के झगड़ों का निपटारा महतो, पाहन, करटाहा तथा अन्य बुजुर्गों द्वारा सामूहिक रूप से एकत्रित होकर किया जाता है। विवादों के निवारण संबंधी सभा में महतो की उपस्थिति अनिवार्य होती है। सर्वसम्मति से दण्ड आदि का निर्णय किया जाता है।
> इस समाज में यौन संबंधी अपराधी को माँझी परगना शासन व्यवस्था की सजा (बिटलाहा) की भांति समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है।
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Mon, 19 Jun 2023 19:59:38 +0530 Jaankari Rakho
मुण्डा & मानकी शासन व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/मुण्डा-मानकी-शासन-व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/मुण्डा-मानकी-शासन-व्यवस्था > हो जनजाति की पारंपरिक शासन व्यवस्था को मुण्डा-मानकी शासन व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। 
> इस शासन व्यवस्था को भारत की प्रथम गणतांत्रिक शासन व्यवस्था के रूप में देखा जाता है।
> इस शासन व्यवस्था को एक अंग्रेज अधिकारी थॉमस विल्किंसन द्वारा मंजूरी प्रदान की गयी थी। 
> हो जनजाति मुण्डा समाज की ही एक उपशाखा है। मुण्डा जनजाति के अंतर्गत ग्राम पंचायत के प्रमुख को
जिसका मुण्डा कहा जाता था। ऐसे कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर एक पट्टी निर्मित की जाती थी, प्रमुख मानकी होता था। इसी शासन व्यवस्था को मुण्डा मानकी शासन व्यवस्था के नाम से जाना जाता है।
> मुण्डा मानकी शासन व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण पदों, संगठनों एवं संबंधित तथ्यों का विवरण निम्नवत् है:| 
> महत्वपूर्ण पद / 
> शब्द संबंधित तथ्य
> मुण्डा
  • > इस शासन व्यवस्था में किसी गाँव के को मुण्डा कहा जाता है।
  • > यह प्रशासनिक, न्यायिक तथा लगान एकत्रित करने का कार्य करता है।
> डाकुआ
  • > यह मुण्डा का सहयोगी होता है तथा मुण्डा के निर्णयों एवं आदेशों को गाँव के लोगों तक पहुंचाता है।
> मानकी
  • > 7 - 12 गांवों को मिलाकर एक पड़हा का निर्माण होता है, जिसका प्रमुख मानकी कहलाता है।
  • > मानकी द्वारा आयोजित सभा में सभी मुण्डा तथा डाकुआ की उपस्थिति होते हैं जिसमें सर्वसम्मति से किसी मामले का निपटारा किया जाता है।
> पीरपंच
  • > पड़हा का न्यायिक प्रधान पीरपंच कहलाता है।
> तहसीलदार
  • > यह गाँव का राजस्व अधिकारी होता है जो मुख्यतः लगान वसूली का कार्य करता है।
> दिउरी
  • > यह गाँव का धार्मिक प्रधान है तथा पूजा-पाठ, पर्व-त्योहारों, शादि विवाह आदि में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करता है ।
  • > यह धार्मिक विवादों के मामलों को सुलझाने का भी कार्य करता है।
> यात्रा दिउरी
  • > यह दिउरी का सहयोगी होता है।
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Fri, 16 Jun 2023 19:51:20 +0530 Jaankari Rakho
माँझी परगना शासन व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/माँझी-परगना-शासन-व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/माँझी-परगना-शासन-व्यवस्था > संथाल जनजाति की शासन व्यवस्था को माँझी परगना शासन व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। 
> अन्य सामाजिक व्यवस्था की ही भांति इस व्यवस्था में भी शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने हेतु सामूहिक एवं पारिवारिक जीवन में बचपन से ही नियमों एवं उपनियमों की सीख प्रदान की जाती है। इसकी अवहेलना करने पर पंचायतों द्वारा विभिन्न प्रकार के दण्ड प्रदान किये जाते हैं। इसमें शारीरिक तथा आर्थिक दोनों प्रकार के दण्ड सम्मिलित हैं। 
> संथालों ने इस शासन व्यवस्था को सौरिया पहाड़िया जनजाति से ग्रहण किया है, जिसकी राजनीतिक शासन व्यवस्था अत्यंत लोकतांत्रिक थी।
> माँझी परगना शासन व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण पदों, संगठनों एवं संबंधित तथ्यों का विवरण निम्नवत् है:
> महत्वपूर्ण पद / शब्द 
> संबंधित तथ्य
माँझी
  • > इस शासन व्यवस्था में प्रत्येक गाँव की एक पंचायत होती है जिसका प्रधान माँझी कहलाता है। 
  • > यह गाँव की शासन व्यवस्था के संचालन हेतु प्रमुख रूप से उत्तरदायी होता है। माँझी को सफलतापूर्वक शासन संचालित करने हेतु विभिन्न प्रशासनिक एवं न्यायिक अधिकार प्राप्त होते हैं।
  • > यह ग्राम पंचायत के माध्यम से जमीन-जायदाद, तलाक, आपसी झगड़े आदि समस्याओं का समाधान करता है। माँझी हत्या जैसे गंभीर अपराध को छोड़कर गाँव के लगभग सभी मामलों का निपटारा करता है। हत्या के मामले में सरकारी हस्तक्षेप अनिवार्य होता है।
  • > माँझी को लगान वसूलने से लेकर विवाह संबंध स्थापित कराने तक का अधिकार प्राप्त होता है।
> प्रमाणिक/प्रानीक
  • > माँझी की अनुपस्थिति में उसके कार्यों का संचालन प्रमाणिक द्वारा किया जाता है। इसे उप-माँझी भी कहा जाता है। 
> गुड़ैत /गोड़ाइत
  • > यह माँझी के सचिव के रूप में कार्य करता है।
  • > ग्रामीणों को किसी उत्सव या कार्यक्रम की जानकारी पहुँचाने का कार्य गुड़ैत द्वारा ही किया जाता है। यह लोगों को विभिन्न अवसरों पर एक स्थान पर एकत्रित करता है।
  • > यह गाँव के परिवारों से संबंधित सूचनाएँ भी एकत्रित करता है।
> जोगमाँझी
  • > शासन संबंधी कार्यों को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए माँझी की सहायता करने हेतु एक सहायक होता है, जिसे जोगमाँझी कहा जाता है।
  • > यह जन्म तथा विवाह संबंधी मामलों पर महत्वपूर्ण सलाह देने का कार्य करता है। साथ ही यह विवाह संबंधी मामलों को सुलझाता है।
> जोग प्रानीक 
  • > यह जोगमाँझी की अनुपस्थिति में उसके दायित्वों का संचालन करता है।
> परगनैत
  • > इस व्यवस्था में 15-20 गाँवों को आपस में मिलाकर परगना निर्मित होता है। जिसका प्रधान परगनैत कहलाता है।
  • > विभिन्न गाँवों के बीच के विवादों का निपटारा परगना में किया जाता है।
> देशमाँझी/मोड़े माँझी
  • > यह परगनैत का सहायक होता है, जो 5-8 गाँवों का प्रधान होता है। इस प्रकार एक परगनैत के एक से अधिक सहायक होते हैं।
  • > जो मामला माँझी द्वारा नहीं सुलझ पाता है उसे देशमाँझी को भेज दिया जाता है। तथा देशमाँझी की पंचायत में अनसुलझे मामलों को परगनैत को स्थानांतरित कर दिया जाता है।
  • > इस प्रकार यह व्यवस्था लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली के समरूप प्रतीत होती है। 
> दिशुम परगना
  • > यह परगनैत से उच्च स्तर पर अवस्थित होता है। जिन मामलों का निवारण परगनैत की सभा में नहीं होती है उसे दिशुम परगना को हस्तांतरित कर दिया जाता है। 
  • > यह सभी क्षेत्रों में नहीं पाया जाता है।
> भग्दो प्रजा
  • > झगड़ो के निपटारे में गाँव के कुछ वरिष्ठ लोगों से विचार-विमर्श किया जाता है, जिन्हें भग्दो प्रजा कहा जाता है।
> लासेर टंगाय
  • > यह गाँव के प्रहरी की भांति कार्य करता है जो बाहरी आक्रमण से गाँव की सुरक्षा करता है।
> चौकीदार
  • > यह पुलिस की भांति कार्य करता है। यह माँझी के आदेशानुसार किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करता है।
> नायके
  • > गाँव का धार्मिक प्रधान नायके कहलाता है। धार्मिक अपराधों पर फैसला नायके द्वारा ही दिया जाता है।
> कुडाम नायके
  • > यह उप नायके की भांति कार्य करता है। यह गाँव से बाहर देवी-देवताओं की पूजा-पाठ संपन्न कराता है।
> करेला दण्ड
  • > यह सबसे हल्का दण्ड है जिसके तहत अपराधी पर ₹5 से ₹150 का दण्ड लगाया जाता है।
> बिटलाहा
  • > बिटलाहा इस शासन व्यवस्था की सबसे कठोर सजा है, जो यौन अपराधों के दोषी को दिया जाता है।
  • > बिटलाहा के तहत यौन अपराधी का पूर्ण बहिष्कार करते हुये उसे गाँव से निकाल दिया जाता है।
  • > दोषी द्वारा क्षमा याचना करते हुए पूरे गाँव को जाति भोज देने पर बिटलाहा की सजा को समाप्त करने का भी प्रावधान है।
> लोबीर सेंदरा
  • > यह इस शासन व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायिक संस्था होती है।
> सेंदरा बैंसी 
  • > यह इस शासन व्यवस्था में शिकार परिषद् होता है।
> अन्य तथ्य
> भग्दो प्रजा को छोड़कर शेष सभी पदधारियों को इस शासन व्यवस्था में भूमि प्रदान की जाती है।
> इस शासन व्यवस्था में माग सिम के अवसर पर अधिकारियों का चुनाव किया जाता है।
> यूल रूल्स (1856) के नियम के आधार पर माँझी परगना शासन व्यवस्था को कानूनी मान्यता प्रदान की गयी है।
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Fri, 16 Jun 2023 19:46:50 +0530 Jaankari Rakho
पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/पड़हा-पंचायत-शासन-व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/पड़हा-पंचायत-शासन-व्यवस्था > यह मुख्यतः उराँव जनजाति की शासन व्यवस्था से संबंधित है। यह शासन व्यवस्था मुण्डा जनजाति की शासन व्यवस्था से मिलती-जुलती है।
> पड़हा पंचायत शासन व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण पदों, संगठनों एवं संबंधित तथ्यों का विवरण निम्नवत् है:
> महत्वपूर्ण पद / शब्द
> महतो
  • > इस शासन व्यवस्था में प्रत्येक गाँव का एक प्रधान होता है, जिसे महतो कहा जाता है।
  • > यह गाँव के स्तर के मामलों का निपटारा करता है। इस कार्य में गाँव के अनुभवी व बुजुर्ग लोग ग्राम प्रधान की सहायता करते हैं।
  • > महतो के पास प्रशासनिक तथा न्यायिक दोनों प्रकार के अधिकार होते हैं।
> माँझी
  • > यह महतो का सहयोगी होता है, जो महतो के पंचायती आदशों को लोगों तक पहुँचाने का कार्य करता है ।
> परहा/पड़हा
  • > कई गाँवो ( 5, 7, 11, 21 या 22 ) से मिलकर बनी पंचायत (अंतग्रामीण पंचायत) को परहा / पड़हा कहा जाता है ।
  • > पड़हा पंचायत का प्रमुख कार्य दो या अधिक गाँवों के बीच विवादों का निपटारा करना है।
  • > यह निम्न, मध्य तथा उच्च तीन स्तरों में विभक्त होता है। निम्न तथा मध्य स्तर के पंचायत में फैसले का निपटारा न होने पर उच्च पंचायत द्वारा निर्णय लिया जाता है।
  • > पंचायत की कार्यवाही में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं की भी सहभागिता होती है।
> पड़हा राजा
  • > यह पड़हा पंचायत का प्रमुख होता है। वैसे मामले जिनका निपटारा ग्रामीण स्तर पर महतो द्वारा नहीं किया जा सका, उसे पड़हा राजा को हस्तांतरित कर दिया जाता है।
> पड़हा दीवान
  • > यह सर्वोच्च पदधारी है जो सर्वोच्च न्यायालय की तरह कार्य करता है। यह सभी पड़हा राजाओं से ऊपर होता है तथा इनके बीच समन्वय बनाता है।
  • > पड़हा राजा द्वारा अनिर्णित मामलों को पड़हा दीवान को हस्तांतरित किया जाता है।
> पाहन
  • > यह गाँव का धार्मिक प्रधान होता है। गाँव के सभी धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ, पर्व-त्योहार, शादी विवाह आदि से संबंधित कार्यक्रमों का संचालन पाहन द्वारा ही किया जाता है।
  • > यह पद किसी शादी-शुदा व्यक्ति को ही मिलता है।
  • > पाहन को दी जाने वाली भूमि पहनई भूमि कहलाती है।
> बैगा
  • > इसे वैद्या भी कहा जाता है। यह पाहन को सहयोग करता है।
  • > यह सामान्यतः ग्रामीण देवताओं की पूजा कर उन्हें शांत करने का कार्य करता है।
  • > महतो के कार्यभार पूर्व बैगा ही गाँव का पुरोहित एवं लौकिक प्रधान था।
> डाडा पड़हा 
  • > यह कई गाँवों को मिलाकर बनाया गया संगठन है। 
  • > इसमें पड़हा के प्रत्येक गाँव को सदस्यता के रूप में अधिकार और दर्जा दिया जाता है।
  • > इसमें पदों के अनुरूप सदस्यों को अधिकार, कर्त्तव्य और पहचान चिह्न प्रदान किया जाता है। frete
> पड़हा पंच 
  • > आश्विन पूर्णिमा के दिन इसका आयोजन किया जाता है। 
> अन्य तथ्य 
>>इस शासन व्यवस्था के अंतर्गत पड़हा में शामिल एक गाँव को पड़हा राजा गाँव, दूसरे को दीवान गाँव, तीसरे को पनेरे गाँव, चौथे को कोटवार गाँव तथा शेष को प्रजा गाँव कहा जाता है। 
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Fri, 16 Jun 2023 19:35:47 +0530 Jaankari Rakho
नागवंशी शासन व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/नागवंशी-शासन-व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/नागवंशी-शासन-व्यवस्था > नागवंशी शासन व्यवस्था
> नागवंशी शासन व्यवस्था का प्रारंभ प्रथम शताब्दी (64 ई.) में हुआ तथा राजा फणी मुकूट राय इस शासन व्यवस्था के प्रथम शासक थे।
> यह शासन व्यवस्था मुण्डा राज के बाद स्थापित किया गया। फणी मुकुट राय ने सुतियाम्बे को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया।
> नागवंशी शासकों ने मुण्डा शासन व्यवस्था में अनुकूल परिवर्तन करते हुये इसे अधिक विस्तारित करने का प्रयास किया। इसके शासनकाल में पूर्व की भू-व्यवस्था, कर व्यवस्था तथा शासन व्यवस्था का संचालन होता रहा। 
> लंबे समयांतराल के पश्चात् मुगलों के आक्रमण के कारण नागवंशी शासन व्यवस्था में परिवर्तन परिलक्षित होता है। इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप मुगल सेना द्वारा नागवंशी राजाओं से नजराना (एक प्रकार का कर) लिया जाने लगा जो बाद में एक नियमित व्यवस्था के रूप में स्थापित हो गयी तथा इसे मालगुजारी के नाम से जाना जाने लगा।
> इस शासन व्यवस्था में आम रैयतों से कर वसूली नहीं की जाती थी। परिणामतः संपूर्ण राज्य के कर का भार नागवंशी शासन पर पड़ने लगा। इस भार को कम करने हेतु नागवंशी राजाओं ने आम जनता से कर (मालगुजारी) वसूलना प्रारंभ किया तथा इसे वसूलने की जिम्मेदारी पड़हा के प्रमुख मानकी को दिया गया। इन मानकियों को नागवंशी शासन में भूईहर कहा जाने लगा।
> बाद में नागवंशी राजाओं द्वारा मालगुजारी वसूलने के लिए अलग से जागीरदार रखे गये। इनके द्वारा मुगल बादशाहों द्वारा मांगे जाने पर ही मालगुजारी दी जाती थी। इस अनियमित मालगुजारी को नजराना / पेशकश कहा जाता था।
> नियमित मालगुजारी नहीं देने के कारण नागवंशी शासक दुर्जनशाल को मुगलों द्वारा कैद कर लिया गया था। 
> 1765 ई. में ईस्ट इण्डिया कंपनी को बिहार, बंगाल एवं उड़ीसा की दीवानी मिलने के बाद नागवंशी शासक पटना काउंसिल के प्रति उत्तरदायी हो गए।
> अंगेजी शासनकाल में कर की नियमित वसूली के लिए 1793 ई० में स्थायी बंदोबस्त प्रणाली लागू की गयी तथा नागवंशी राजाओं को जमींदार बना दिया गया। इस प्रकार पूर्व की जागीरदारी व्यवस्था जमींदारी व्यवस्था में परिणत हो गयी।
> इस व्यवस्था के लागू होने के साथ ही नागवंशी शासन व्यवस्था समाप्त हो गयी तथा इसके स्थान पर नवीन प्रकार की अंग्रेजी शासन व्यवस्था स्थापित हुयी।
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Fri, 16 Jun 2023 19:28:12 +0530 Jaankari Rakho
मुण्डा शासन व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/मुण्डा-शासन-व्यवस्था https://m.jaankarirakho.com/मुण्डा-शासन-व्यवस्था > मुण्डा जनजाति की शासन व्यवस्था को 'मुण्डा शासन व्यवस्था' कहा जाता है।
> मुण्डा शब्द का सामान्य अर्थ विशिष्ट व्यक्ति तथा विशिष्ट अर्थ गाँव का राजनीतिक प्रमुख होता है। 
> मुण्डा शासन व्यवस्था से संबंधित महत्वपूर्ण पदों, संगठनों एवं संबंधित तथ्यों का विवरण निम्नवत् है:- 
> मुण्डा
  • > यह मुण्डा गाँव का प्रधान होता है।
  • > यह पद वंशानुगत होता है।
  • > इसका प्रमुख कार्य ग्रामीणों से लगान वसूलना, गाँव की विधि व्यवस्था बनाये रखना तथा गाँवों के विवादों का निपटारा करना होता है।
  • > मुण्डाओं द्वारा निर्मित खेत को खूँटकट्टी भूमि कहा जाता है तथा इस भूमि को निर्मित करने वाला खूँटकट्टीदार कहलाता है।
  • > मुण्डा शासन व्यवस्था में खूँट का अर्थ 'परिवार' होता है।
> हातू मुण्डा
  • > यह ग्राम पंचायत का प्रधान होता है। मुण्डा ग्राम पंचायत को 'हातू' कहा जाता है।
> परहा/पड़हा
  • > कई गाँवों से मिलकर बनी पंचायत (अंतग्रामीण पंचायत) को परहा / पड़हा कहा जाता है।
  • > पड़हा पंचायत का प्रमुख कार्य दो या अधिक गाँवों के बीच विवादों का निपटारा करना है। यह मुण्डा जनजाति की शासन व्यवस्था के सर्वोच्च पर अवस्थित है। 
  • > इसे मुण्डा जनजाति की सर्वोच्च न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा विधायिका की संज्ञा दी जा सकती है।
  • > पड़हा पंचायत का सर्वोच्च अधिकारी पड़हा राजा होता है।
  • > पड़हा के अन्य प्रमुख अधिकारी कुवर, लाल तथा कार्तो होते हैं। 
  • >  विभिन्न अधिकारियों का विवरण निम्नवत् है
  • > ठाकुर - पड़हा राजा का सहायक
  • > दीवान- पड़हा राजा का मंत्री
  • > पाण्डेय - दस्तावेजों का रखरखाव करने वाला अधिकारी
  • > बरकंदाज गाँव का सिपाही
  • > दारोगा - सभा की कार्यवाही का नियंत्रक
  • > लाल – सभा का वकील
  • > परंपरागत मुण्डा प्रशासन में महिलाओं को उच्च स्थान प्रदान नहीं किया जाता है।
> अखड़ा/अखरा
  • > पड़हा पंचायत स्थल को अखड़ा भी होता है।यह गाँव का सांस्कृतिक केन्द्र भी होता है।
  • > मुण्डा गाँव में पंचायत की बैठकों का आयोजन अखड़ा/अखरा में ही किया जाता है।
> मानकी
  • > पड़हा पंचायत के प्रधान को मानकी कहा जाता है तथा यह पद वंशानुगत होता है।
> पाहन
  • > मुण्डा गाँव का धार्मिक प्रधान पाहन कहलाता है।  
  • > पाहन गाँव में शांति बनाये रखने हेतु पूजा-पाठ तथा बलि चढ़ाने का कार्य करता है। इन कार्यों के संचालन हेतु पाहन को लगान मुक्त भूमि प्रदान की जाती है जिसे डाली-कटारी भूमि कहा जाता है।
> महतो
  • > यह पाहन का सहायक होता है ।
  • > यह मुख्यतः गाँव में संदेशवाहक का कार्य करता है।
> भूत-खेता
  • > गाँव को भूत-प्रेत के प्रकोप से बचाने हेतु पाहन द्वारा विशेष पूजा की जाती है। इस हेतु पाहन को अतिरिक्त भूमि प्रदान की जाती है जिसे भूत खेता कहा जाता है। इसकी उपज या आय से भूत-प्रेत की पूजा व्यवस्था का संचालन किया जाता है।
> पुजार/पनभरा
  • > पाहन का सहायक पुजार / पनभरा कहलाता है।
> पड़हा राजा
  • > यह पड़हा पंचायत का सर्वोच्च अधिकारी होता है।
> अन्य तथ्य
> इस जनजाति की शासन व्यवस्था में दीवान, ठाकुर, कोतवार, पांडे, कर्ता तथा लाल आदि नामक अधिकारी होते हैं, जो पड़हा राजा को शासन संचालन में सहयोग प्रदान करते हैं।
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Fri, 16 Jun 2023 19:24:50 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड राज्य निर्माण आंदोलन https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-राज्य-निर्माण-आंदोलन https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-राज्य-निर्माण-आंदोलन > झारखण्ड राज्य में ब्रिटिश शासनकाल से ही अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों के विरूद्ध विभिन्न आंदोलन संचालित होते रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में झारखण्डियों द्वारा अलग राज्य की मांग की जाती रही है।
> ब्रिटिश शासनकाल के दौरान झारखण्ड, बंगाल प्रांत का तथा बाद में बिहार प्रांत का (1912 में पृथक बिहार के निर्माण के बाद) अंग बना।
> ढाका विद्यार्थी परिषद् की राँची शाखा के संचालक जे. बार्थोलमन को झारखण्ड आंदोलन का जनक माना जाता है।
> क्रिश्चियन स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन (1912 ई.)
> चाईबासा के निवासी व एंग्लिकन मिशन से जुड़े जे. बार्थोलमन ने 1912 ई. में ढाका विद्यार्थी परिषद् (ढाका में आयोजित) से लौटने के बाद 'क्रिश्चियन स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन' की स्थापना की थी। 
> इस संगठन का प्रारंभिक उद्देश्य गरीब इसाई विद्यार्थियों को मदद था। बाद में यह संगठन झारखण्ड राज्य के सभी आदिवासियों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान में संलग्न हो गया।
> जे. बार्थोलमन संत कोलंबा महाविद्यालय, हजारीबाग के छात्र थे। बाद में वे संत पॉल स्कूल राँची के प्राध्यापक भी रहे।
> क्रिश्चियन स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन में बाद में शामिल लोगों ने ही जे. बार्थोलमन को इस संगठन से अलग कर दिया तथा इस संगठन का नाम परिवर्तित करके 'छोटानागपुर उन्नति समाज' कर दिया।
> छोटानागपुर उन्नति समाज (1915 ई.)
> 1915 ई. में एंग्लिकन मिशन के बिशप केनेडी की सलाह पर 'क्रिश्चियन स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन' का नाम परिवर्तित करके 'छोटानागपुर उन्नति समाज' कर दिया गया।
‘छोटानागपुर उन्नति समाज' की स्थापना जुएल लकड़ा, पॉल दयाल, बंदीराम उराँव व ठेबले उराँव  के नेतृत्व में की गयी थी।
> यह झारखण्ड का प्रथम अंतर्जातीय आदिवासी संगठन था तथा इसके सदस्य केवल आदिवासी ही हो सकते थे। 
> इस संगठन की स्थापना का मूल उद्देश्य छोटानागपुर की प्रगति एवं आदिवासियों की सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक स्थिति में सुधार करना था।
> 1915 ई. में छोटानागपुर उन्नति समाज द्वारा मुण्डारी भाषा में आदिवासी नामक पत्रिका का प्रकाशन किया गया था।
> 1928 ई. में छोटानागपुर उन्नति समाज द्वारा बिशप बॉन ह्यूक एवं जुएल लकड़ा के नेतृत्व में साइमन कमीशन को एक मांग पत्र सौंपा गया था। इस मांग पत्र में इस क्षेत्र के आदिवासियों हेतु विशेष सुविधाएँ प्रदान करने तथा इनके लिए एक पृथक प्रशासनिक इकाई के गठन की मांग की गयी थी।
> किसान सभा (1930 ई.)
> 1930 ई. में छोटानागपुर उन्नति समाज से ही अलग होकर कुछ सदस्यों ने किसान सभा का गठन किया था। 
> इसके प्रथम अध्यक्ष ठेबले उराँव तथा प्रथम सचिव पॉल दयाल थे।
> इस संगठन की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य झारखण्ड के किसानों को शोषण करने वाले जमींदारों के विरूद्ध संगठित करना था।
> 1935 में छोटानागपुर उन्नति समाज तथा किसान सभा का विलय किया गया तथा राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति की जा सके।
> छोटानागपुर कैथोलिक सभा (1933 ई.)
> 1933 ई. में आर्च बिशप सेबरिन की प्रेरणा से छोटानागपुर कैथोलिक सभा का गठन किया गया था।
> छोटानागपुर कैथोलिक सभा के प्रथम अध्यक्ष बोनिफेस लकड़ा थे तथा प्रथम महासचिव इग्नेस बेक थे। 
> इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य कैथोलिकों के हितों की रक्षा करना था।
> आदिवासी महासभा (1938 ई.)
> 1936 ई. में उड़ीसा के बिहार से अलग होने के बाद झारखण्ड आंदोलन से जुड़े संगठनों को पृथक झारखण्ड बनने की उम्मीद जगी, परंतु ऐसा नहीं होने पर वे निराश हो गये। साथ ही 1937 ई. में हुए प्रांतीय चुनाव के बाद गठित बिहार के मंत्रिमंडल में दक्षिणी बिहार से किसी भी कांग्रेसी नेता को शामिल न किये जाने से झारखण्ड के लोगों को अपनी उपेक्षा का एहसास हुआ।
> इन्हीं घटनाओं से प्रेरित होकर इग्नेस बेक ने झारखण्ड के सभी आदिवासी संगठनों को एकजुट करने का प्रयास किया जिसके परिणामस्वरूप 1938 ई. में आदिवासी संगठनों ने मिलकर राँची नगरपालिका के चुनाव में 5 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा किया व सभी पर विजयी हुए।
> इसी पृष्ठभूमि में 31 मई, 1938 को राँची में आयोजित 'छोटानागपुर उन्नति समाज' की वार्षिक सभा में 5 आदिवासी संगठनों (छोटानागपुर उन्नति समाज, किसान सभा, छोटानागपुर कैथोलिक सभा, मुण्डा सभा एवं हो मालटो सभा) को मिलाकर 'छोटानागपुर - संथाल परगना आदिवासी महासभा' की स्थापना की गयी। 
> इस नवगठित संगठन का प्रथम अध्यक्ष थियोडोर सुरीन, उपाध्यक्ष बंदराम उराँव तथा सचिव पॉल दयाल को चुना गया।
> जनवरी, 1939 में इसका नाम परिवर्तित करके 'आदिवासी महासभा' कर दिया गया। 
> आदिवासी महासभा के प्रमुख नेताओं के आग्रह पर जयपाल सिंह मुण्डा 1939 ई. में आदिवासी महासभा के अध्यक्ष पद पर आसीन हुए।
> जयपाल सिंह मुण्डा अध्यक्षता में ही 20-21 जनवरी, 1939 को राँची में आदिवासी महासभा का दूसरा अधिवेशन आयोजित किया गया।   इस अधिवेशन के स्वागत समिति के अध्यक्ष सैम्यूल पूर्ति थे । 
> इसी अधिवेशन के दौरान आदिवासियों द्वारा जयपाल सिंह मुण्डा को 'मरंङ गोमके' ( बड़े गुरूजी ) की उपाधि दी गयी थी।
> इसी अधिवेशन के दौरान जयपाल सिंह मुण्डा ने ही पहली बार एक प्रस्ताव के द्वारा सरकार से भारत शासन अधिनियम की धारा-46 के तहत छोटानागपुर - संथाल परगना क्षेत्र के रूप में एक पृथक गवर्नर के प्रांत का निर्माण करने का आग्रह किया था | जमशेदपुर के एन. एन. दीक्षित ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया था तथा सर्वसम्मति से प्रस्ताव को पारित कर दिया गया था।
> प्रस्तुत प्रस्ताव के आलोक में देवकी नंदन सिंह की अध्यक्षता में एक 'पृथक्करण संघ' के गठन का निर्णय लिया गया जिसका प्रमुख कार्य नवीन प्रांत के निर्माण हेतु सुझाव देना था।
> फरवरी, 1939 में आदिवासी महासभा की मांग पर रायबहादुर सतीश चंद्र सिन्हा द्वारा बिहार विधानसभा में बिहार से पृथक करके छोटानागपुर - संथाल परगना प्रांत के गठन का एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, जिसे बिहार प्रांत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ( मुख्यमंत्री का उस समय पदनाम ) श्रीकृष्ण सिंह ने अस्वीकृत कर दिया।
> मई, 1939 ई. में राँची एवं सिंहभूम के जिला बोर्ड के चुनाव में आदिवासी महासभा ने कांग्रेस को पराजित कर दिया। आदिवासी महासभा ने राँची के 25 में 16 सीटों पर तथा सिंहभूम के 25 में से 22 सीटों पर जीत दर्ज की।
> झारखण्ड कांग्रेस के घटते प्रभुत्व के कारणों का पता लगाने हेतु डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने जयपाल सिंह से मुलाकात करके आदिवासियों की शिकायतों को दूर करने हेतु सुझाव मांगे। 5 जुलाई, 1939 को आदिवासी महासभा के प्रतिनिधिमंडल ने डॉ. श्रीकृष्ण सिंह से मिलकर अपनी मांगे उनके समक्ष रखीं जिस पर श्रीकृष्ण सिंह ने कोई कार्रवाई नहीं की।
> 31 अक्टूबर, 1939 ई. को द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने के बाद बिहार के कांग्रेसी मंत्रिमण्डल ने इस्तीफा दे दिया जिसे आदिवासी महासभा ने 'मुक्ति दिवस' के रूप में मनाकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।
> आदिवासी महासभा ने द्वितीय विश्वयुद्ध में खुलकर ब्रिटेन का साथ दिया जिसके परिणामस्वरूप युद्ध के बाद जयपाल सिंह मुण्डा को राँची का चीफ वार्डेन तथा बाद में ईस्टर्न कमाण्ड सर्विसेज सेलेक्शन बोर्ड का सला. हकार बनाया गया।
> दिसंबर, 1939 ई. में झारखण्ड प्रवास पर आये सुभाष चंद्र बोस ने जयपाल सिंह से कांग्रेस का समर्थन करने की अपील की।
> मार्च, 1940 में आदिवासी महासभा का तीसरा अधिवेशन राँची में आयोजित किया गया जिसमें जयपाल सिंह मुण्डा ने ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी की घोषणा की तथा पृथक छोटानागपुर - संथाल परगना प्रांत के गठन की मांग की।
> 8-10 मार्च, 1940 को राँची में आदिवासी महासभा का चौथा अधिवेशन आयोजित किया गया जिसमें मुस्लिम लीग के नेताओं को भी आमंत्रित किया।
> 8-9 मार्च, 1942 को राँची में आदिवासी महासभा का पाँचवा अधिवेशन आयोजित किया गया जिसमें बंगाल मुस्लिम लीग के नेताओं को भी आमंत्रित किया गया तथा ब्रिटिश सरकार को समर्थन देने का संकल्प लिया गया। 
> मार्च, 1943 में राँची में आदिवासी महासभा का छठा अधिवेशन आयोजित किया गया जिसमें जयपाल सिंह मुण्डा ने ब्रिटिश सरकार द्वारा आदिवासियों की मांगों की उपेक्षा करने का आरोप लगाया। उन्होनें ब्रिटिश सरकार से कहा कि "यदि आदिवासियों की मांगों को नजरअंदाज किया गया तो आदिवासी महासभा का कांग्रेस में विलय कर दिया जाएगा, जो सरकार के लिए नुकसानदायक होगा।"
> अगस्त, 1944 में मुस्लिम लीग के नेता रगीब एहसान ने पूर्वी पाकिस्तान एवं आदिवासिस्तान (छोटानागपुर - संथाल परगना व आसपास के आदिवासी बहुल क्षेत्र को मिलाकर) बंगेइस्लाम नामक एक परिसंघ बनाने का सुझाव दिया। 
> 30 दिसंबर से 1 जनवरी, 1946 के बीच राँची में 'झारखण्ड - छोटानागपुर पाकिस्तान' कांफ्रेंस का आयोजन किया गया जिसे मुस्लिम लीग के कई प्रमुख नेताओं ने संबोधित किया।
> 2-3 फरवरी, 1946 को राँची में आयोजित 'आदिवासी महासभा' में जयपाल सिंह ने घोषणा की कि 'मुसलमानों ने उनकी मांग का बिना शर्त समर्थन कर दिया है। '
> 1946 ई. के संसदीय चुनाव में आदिवासी महासभा ने भी भाग लिया तथा 3 सीटों पर विजय प्राप्त की। यद्यपि जयपाल सिंह खूँटी से चुनाव लड़े, परन्तु गांधीवादी नेता व कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. पूर्णचंद्र मित्र से पराजित हो गये। इस चुनाव के दौरान आदिवासी महासभा एवं कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच 2 मार्च, 1946 को हिंसक संघर्ष हो गया जिसमें आदिवासी महासभा के पांच आदिवासी मारे गये।
> चुनाव हारने के बाद 1946 में जयपाल सिंह मुस्लिम लीग के सहयोग से संविधान सभा के सदस्य निर्वाचित हुए। इस प्रकार जयपाल सिंह मुण्डा ने संविधान सभा में छोटानागपुर के आदिवासी नेता के रूप में प्रतिनिधत्व किया था ।
> 16 अगस्त, 1946 को मुस्लिम लीग द्वारा आयोजित प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस के बाद जयपाल सिंह ने मुस्लिम लीग से संबंध तोड़ लिये ।
> 13 अप्रैल, 1946 को राँची में आयोजित आदिवासी महासभा के वार्षिक अधिवेशन में जयपाल सिंह ने पाकिस्तान के निर्माण का विरोध करने के साथ ही संविधान सभा का समर्थन किया। साथ ही उन्होनें पृथक झारखण्ड राज्य के गठन तक आंदोलन जारी रखने की घोषणा भी की।
> सरदार पटेल की अध्यक्षता में अल्पसंख्यकों व आदिवासियों के लिए गठित मूलाधिकार समिति की एक आदिवासी उपसमिति में जयपाल सिंह को सदस्य बनाया गया। इस उपसमिति के अध्यक्ष ए. बी. ठक्कर थे।
> खरसावां गोलीकांड
> देश की आजादी के बाद छोटानागपुर कमिश्नर के अंतर्गत शामिल सरायकेला एवं खरसावां देशी रियासतों को 1 जनवरी, 1948 को उड़ीसा में मिलाने की घोषणा की गयी जिसके बाद इसका व्यापक विरोध प्रारंभ हो गया। 
> आदिवासी महासभा ने 1 जनवरी, 1948 को इसके खिलाफ सिंहभूम के खरसावां हाट मैदान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया। 
> इस जनसभा में 'झारखण्ड अबुआ, उड़ीसा जारी कबुआ' (झारखण्ड अपना है, उड़ीसा शासन नहीं चाहिए) का नारा लगाकर विरोध प्रदर्शन किया गया। 
> जनसभा में उड़ीसा पुलिस द्वारा इस भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया गया जिसमें 100 से अधिक लोग मारे गए तथा 400 से अधिक लोग घायल हुए। 
> इस घटना को खरसावां गोलीकांड के नाम से जाना जाता है। 
> बाद में भारत सरकार ने सरायकेला व खरसावां के उड़ीसा में विलय का प्रस्ताव खारिज कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 1 जनवरी, 1948 से 18 मई, 1948 तक (139 दिन) यह क्षेत्र उड़ीसा के अधीन रहने के बाद बिहार प्रांत में मिला दिया गया। 
> सरायकेला-खरसावां को सिंहभूम जिला के अंतर्गत अनुमंडल का दर्जा प्रदान किया गया।
> देश की आजादी के बाद आदिवासी महासभा का पहला वार्षिक अधिवेशन 28 फरवरी, 1948 को राँची में आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता जयपाल सिंह ने की। इस सम्मेलन में जयपाल सिंह ने खरसावां गोली कांड के लिए उड़ीसा सरकार को दोषी माना।
> यूनाइटेड झारखण्ड पार्टी (1948 ई.)
> 1948 ई. में जस्टिन रिचर्ड तथा जयपाल सिंह मुण्डा द्वारा यूनाइटेड पार्टी का गठन किया गया था। 
> बाद में जयपाल सिंह मुण्डा द्वारा झारखण्ड पार्टी का गठन किया गया।
> झारखण्ड पार्टी (1950 ई.)
> 31 दिसंबर से 1 जनवरी, 1950 को जमशेदपुर में आयोजित आदिवासी महासभा के संयुक्त सम्मेलन में जयपाल सिंह मुण्डा द्वारा आदिवासी महासभा का नाम परिवर्तित करके झारखण्ड पार्टी कर दिया गया। 
> इस पार्टी के पहले अध्यक्ष जयपाल सिंह मुण्डा को बनाया गया।
> बाद में झारखण्ड पार्टी में आदिवासियों के साथ-साथ गैर-आदिवासियों को भी शामिल किया गया। 
> 2 जुलाई, 1951 को झारखण्ड के दौरे पर आए जयप्रकाश नारायण से मिलकर झारखण्ड पार्टी के नेताओं ने छोटानागपुर-संथाल परगना प्रांत के गठन हेतु सहयोग मांगा जिसका जयप्रकाश नारायण ने समर्थन किया।
> 2 जनवरी, 1952 को देश के पहले आम चुनाव हेतु राँची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित एक जनसभा में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पृथक झारखण्ड राज्य के गठन का पुरजोर विरोध किया था।
> 1952 ई. के एकीकृत बिहार विधानसभा चुनाव में झारखण्ड पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में सामने आयी। इस पार्टी का चुनाव चिह्न 'मुर्गा' था। इसे 33 सीटें प्राप्त हुई थी। (1957 के चुनाव में झारखण्ड पार्टी को 32 जबकि 1962 के चुनाव में 20 सीटों पर विजय मिली थी ।)
> 1952 ई. के आम चुनावों में इस पार्टी का नारा था “झारखण्ड अबुआ, डाकु दिकु सेनुआ"(झारखण्ड हमारा है, डकैत दिकुओं को जाना होगा)। 
> 1952 तथा 1957 के चुनाव में विपक्षी दल का दर्जा पाने वाली झारखण्ड पार्टी के नेता सुशील कुमार बागे बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता बने।
> 1957 के चुनाव में जयपाल सिंह कहने पर बांबे के एक पारसी मीनू मसानी ने राँची से चुनाव लड़ा तथा विजयी हुए।
> झारखण्ड पार्टी द्वारा अलग राज्य निर्माण संबंधी अपनी मांग को लोकसभा तथा बिहार विधान सभा के समक्ष उठाया गया।
> 5 फरवरी, 1955 को राँची आए राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष भी इस पार्टी ने पृथक राज्य निर्माण हेतु अपनी सिफारिशें रखी थीं।
> राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष 16 जिलों ( बिहार - 7, उड़ीसा - 4, बंगाल - 3 एवं मध्य प्रदेश - 2 ) को मिलाकर झारखण्ड राज्य के गठन का प्रस्ताव रखा गया था।
> झारखण्ड राज्य निर्माण आंदोलन हेतु इस पार्टी को आदिवासियों के साथ-साथ गैर आदिवासियों का भी समर्थन प्राप्त था।
> 10 फरवरी, 1961 को बिहार विधानसभा में सीताराम जगतराम द्वारा पहली बार पृथक झारखण्ड राज्य के गठन हेतु एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। परन्तु यह प्रस्ताव विभिन्न चर्चाओं के बाद निरस्त हो गया। 
> 20 जून, 1963 ई. में बिहार के मुख्यमंत्री विनोदानंद झा की पहल पर झारखण्ड पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया।
> विनोदानंद झा की सरकार में जयपाल सिंह सामुदायिक विकास विभाग के मंत्री थे, परंतु मात्र एक माह बाद ही उन्होनें इस्तीफा दे दिया। (जयपाल सिंह मुण्डा की पत्नी जहाँआरा इंदिरा गाँधी की मंत्रिपरिषद् में परिवहन एवं विमानन विभाग की उपमंत्री थीं।)
> 30 मई, 1969 को जयपाल सिंह मुण्डा ने झारखण्ड पार्टी को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया।
> छोटानागपुर संयुक्त संघ (1954 ई.)
 > छोटानागपुर संयुक्त संघ का गठन 7 फरवरी, 1954 को किया गया था।
> इसके प्रथम अध्यक्ष सुखदेव सिंह थे। बाद में राम नारायण सिंह इस संगठन के अध्यक्ष बने। (राम नारायण सिंह को 'शेर-ए-छोटानागपुर' भी कहा जाता है। कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन- 1940 के दौरान महात्मा गाँधी ने इन्हें 'छोटानागपुर केसरी' की उपाधि दी थी।)
> छोटानागपुर संयुक्त संघ के गठन से पूर्व 11 नवंबर, 1953 को लोहरदगा में 'छोटानागपुर संयुक्त मोर्चा' की एक सभा का आयोजन किया गया। परंतु 10 नवंबर, 1953 को ही इसके प्रमुख नेता राम नारायण खलखो, सत्यदेव साहु व मधुसूदन अग्रवाल सहित कई लोगों को सुरक्षा कारणों से गिरफ्तार कर लिया गया था।
> छोटानागपुर संयुक्त संघ द्वारा 7 अप्रैल, 1954 को 'छोटानागपुर सेपरेशन: दि वनली सॉल्यूशन' नामक 36 पृष्ठों की एक पुस्तिका का प्रकाशन किया गया था, जिसमें पृथक राज्य के गठन का समर्थन किया गया था। 
> बिरसा सेवा दल (1965 ई.)
> 1965 ई. में आदिवासियों के आंदोलन को मुखरता प्रदान करने हेतु ललित कुजुर द्वारा बिरसा सेवा दल का गठन किया गया।
> यह झारखण्ड का पहला छात्र संगठन था।
> इसका गठन झारखण्ड पार्टी से विभाजित होकर किया गया था।
> अखिल भारतीय झारखण्ड पार्टी (1967 ई.)
> 1967 ई. में इस आंदोलन को तीव्रता प्रदान करने हेतु बागुन सुम्ब्रई द्वारा अखिल भारतीय झारखण्ड पार्टी का गठन किया गया।
> 1969 ई. में अखिल भारतीय झारखण्ड पार्टी का विभाजन हो गया तथा इससे टूटकर 'झारखण्ड पार्टी' नामक एक अलग पार्टी का गठन किया गया।
> झारखण्ड पार्टी (1969 ई.)
> इस पार्टी का गठन 1969 में अखिल भारतीय झारखण्ड पार्टी से टूटकर हुआ था ।
> इस पार्टी के प्रथम अध्यक्ष एन. ई. होरो थे।
> हुल झारखण्ड पार्टी (1969 ई.)
> सन् 1969 में हुल झारखण्ड पार्टी का गठन जस्टिन रिचर्ड द्वारा किया गया।
> इसे 'क्रांतिकारी झारखण्ड पार्टी' भी कहा जाता है।
> यह पार्टी संथाल परगना क्षेत्र में सक्रिय थी।
> 1970 ई. में इस पार्टी का विभाजन हो गया।
> सोनोत (शुद्ध) संथाल समाज (1970 ई.)
> सोनोत संथाल समाज की स्थापना सन् 1970 ई. में शिबू सोरेन द्वारा की गयी थी।
> झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (1973 ई.)
4 फरवरी, 1973 को विनोद बिहारी महतो तथा शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा नामक पार्टी का गठन किया गया। इसका गठन धनबाद के गोल्फ मैदान में किया गया था।
> विनोद बिहारी महतो को इस संगठन का अध्यक्ष तथा शिबू सोरेन को इसका महासचिव नियुक्त किया गया। 
> झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के गठन में ए. के. राय ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।
> झामुमो के गठन से पूर्व विनोद बिहारी महतो ने शिवाजी समाज (1969 ई. में), शिबू सोरेन ने.सोनोत संथाल समाज (1970 ई. में) तथा ए. के. राय ने मार्क्सवादी समन्वय समिति (1971 ई. में) का गठन किया था। 
> झारखण्ड मुक्ति मोर्चा द्वारा अलग राज्य निर्माण हेतु संघर्ष, महाजनी प्रथा की खिलाफत, विस्थापितों के पुनर्वास जैसे आंदोलन का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
> 1978 ई. में शिबू सोरेन एवं ए. के. राय ने झारखण्ड के समर्थन में शक्ति प्रदर्शन हेतु पटना में आदिवासियों का एक जुलूस निकाला।
> 6-7 मई, 1978 को राँची में झारखण्ड क्षेत्रीय बुद्धिजीवी सम्मेलन की गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो, डॉ. निर्मल मिंज, डॉ. रामदयाल मुण्डा समेत कई लोगों ने भाग लिया। 
> 1978 ई. में झामुमो द्वारा वन कानून के विरोध में जंगल काटो अभियान का संचालन किया गया।
> राँची के कांग्रेसी नेता ज्ञानरंजन की पहल पर 1980 का बिहार विधानसभा चुनाव में झामुमो ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया जिसमें झामुमो को 13 सीटों पर जीत मिली ।
> ऑल झारखण्ड स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन (1986 ई.)
> 22 जून, 1986 को झामुमो के निर्मल महतो एवं शिबू सोरेन के नेतृत्व में जमशेदपुर में ऑल झारखण्ड स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन (आजसू) नामक संगठन की स्थापना की गयी। सूर्यसिंह बेसरा ने 'खून के बदले खून' की रणनीति की घोषणा की थी।
> आजसू का गठन असम के आसू की तर्ज पर किया गया था।
> आजसू पार्टी के प्रथम अध्यक्ष प्रभाकर तिर्की थे।
> इस पार्टी के प्रथम महासचिव सूर्यसिंह बेसरा थे।
> इस पार्टी का गठन झारखण्ड मुक्ति मोर्चा की छत्रछाया में किया गया था।
> 1987 ई. में आजसू पार्टी ने खुद को झामुमो से पूरी तरह अलग कर लिया।
> 1991 ई. में आजसू के सहयोगी पार्टी के रूप में 'झारखण्ड पीपुल्स पार्टी' का गठन किया गया था।
> झारखण्ड समन्वय समिति (1987 ई.)
> पृथक झारखण्ड का समर्थन करने वाले 53 दलों को आपस में संगठित करने के उद्देश्य से 11-13 सितम्बर, 1987 ई. को रामगढ़ में एक संयुक्त सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसी सम्मेलन के दौरान 'झारखण्ड समन्वय समिति' (जेसीसी) का गठन किया गया।
> डॉ० बिशेश्वर प्रसाद केसरी ( बी. पी. केसरी) को इस समिति का संयोजक मनोनीत किया गया था। 
> 10 दिसम्बर, 1987 में झारखण्ड समन्वय समिति ने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण को बिहार, प० बंगाल, उड़ीसा तथा मध्य प्रदेश के 21 जिलों को मिलाकर झारखण्ड राज्य के निर्माण सहित 23 सूत्री एक मांगपत्र सौंपा।
> झारखण्ड विषयक समिति (1989 ई.)
> केन्द्र सरकार द्वारा 23 अगस्त, 1989 को 24 सदस्यीय झारखण्ड विषयक समिति का गठन किया गया जिसका संयोजक बी. एस. लाली (केन्द्रीय गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव) को बनाया गया।
> इस समिति के सदस्यों में केन्द्र और बिहार सरकार के 9 अधिकारी तथा झारखण्ड आंदोलन से जुड़े 14 प्रति. निधि शामिल थे।
> इस समिति द्वारा ‘झारखण्ड क्षेत्र विकास परिषद्' के गठन की सिफारिश की गयी थी।
> झारखण्ड क्षेत्र स्वशासी परिषद् (1995 ई.)
> इसके गठन से पूर्व 20 दिसंबर, 1994 को बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों में 'झारखण्ड क्षेत्र स्वशासी परिषद् विधेयक' पारित किया गया था।
> 7 अगस्त, 1995 को झारखण्ड क्षेत्र स्वशासी परिषद् (JAAC - जैक) के गठन की राजकीय अधिसूचना जारी की गयी तथा 9 अगस्त, 1995 * को औपचारिक रूप से इसका गठन किया गया।
> शिबू सोरेन को जैक का अध्यक्ष तथा सूरज मंडल को इस परिषद् का उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया। 
> झारखण्ड क्षेत्र स्वायत्त परिषद् का गठन संथाल परगना तथा छोटानागपुर क्षेत्र के 18 जिलों को मिलाकर किया गया था।
> राज्य गठन – अंतिम चरण 
> 22 जुलाई, 1997 को बिहार विधानसभा द्वारा अलग झारखण्ड राज्य गठन हेतु संकल्प पारित कर उसे केन्द्र सरकार को भेजा गया।
> 1998 में केन्द्र सरकार ने बिहार विधानसभा द्वारा पारित संकल्प के आधार पर वनांचल राज्य से संबंधित बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक तैयार कर उसकी स्वीकृति हेतु बिहार सरकार को भेजा जिसे बिहार विधानसभा से नामंजूर कर दिया गया।
> 25 अप्रैल, 2000 को बिहार सरकार द्वारा अलग झारखण्ड राज्य हेतु बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक, 2000 को स्वीकृति प्रदान की गई।
> 2 अगस्त, 2000 को लोकसभा तथा 11 अगस्त, 2000 को राज्यसभा द्वारा बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक को पारित कर दिया गया।
> 25 अगस्त, 2000 को राष्ट्रपति के. आर. नारायणन ने बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक, 2000 पर हस्ताक्षर कर उसे अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी ।
> 15 नवंबर, 2000 को (बिरसा मुण्डा के जन्मदिवस के अवसर पर) देश के 28वें राज्य के रूप में भारत के मानचित्र पर झारखण्ड नामक पृथक राज्य का चित्र अंकित हो गया। इसमें बिहार के 18 जिलों को शामिल किया गया था।
> अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
> झारखण्ड संयुक्त बिहार का 46 प्रतिशत भू-भाग है।
> 1928 ई. में साइमन कमीशन द्वारा झारखण्ड को पृथक राज्य बनाने की अनुशंसा की गयी थी जिसे कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई। वर्ष 1929 में साइमन कमीशन द्वारा पृथक झारखण्ड राज्य के गठन हेतु एक ज्ञापन प्रस्तुत किया गया था। 
> झारखण्ड राज्य गठन के समय भारत के राष्ट्रपति श्री के. आर. नारायणन थे।
> राज्य गठन के समय केन्द्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार थी तथा भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थी।
> राज्य गठन के समय बिहार राज्य की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी थीं ।
> धनबाद के कोयला क्षेत्र में ए. के. राय ( अरूण कुमार राय) ने श्रमिक संघ आंदोलन का नेतृत्व किया था। 
> 1968 ई. में कार्तिक उराँव द्वारा अखिल भारतीय विकास परिषद् का गठन किया गया था। विनोद बिहारी महतो ने शिवाजी समाज की स्थापना की थी।
> 1971 ई. में मार्क्सवादी को-आर्डिनेशन कमिटी के द्वारा अलग राज्य की मांग रखी गयी थी। इस कमिटी के अध्यक्ष ए. के. राय थे।
> 1988 ई. में भारतीय जनता पार्टी द्वारा वनांचल ( वर्तमान झारखण्ड) प्रदेश की मांग की गयी थी।
झारखण्ड राज्य निर्माण आंदोलन : प्रमुख संगठन
संगठन का नाम
स्थापना
संस्थापक / अन्य तथ्य
क्रिश्चियन स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन 1912
जे. बार्थोलमन
छोटानागपुर उन्नति समाज
1915
जुएल लकड़ा, पॉल दयाल, बंदीराम उराँव व ठेबले उराँव *
किसान सभा
1930
ठेबले उराँव
छोटनागपुर कैथोलिक सभा
1933
बोनिफेस लकड़ा
छोटानागपुर-संथाल परगना आदिवासी महासभा
1938
थियोडोर सुरीन
आदिवासी महासभा
1939
छोटानागपुर-संथाल परगना आदिवासी महासभा का नाम परिवर्तित किया गया
यूनाइटेड झारखण्ड पार्टी
1948
जस्टिन रिचर्ड एवं जयपाल सिंह
झारखण्ड पार्टी
1950
जयपाल सिंह (1963 में कांग्रेस में विलय)
छोटानागपुर संयुक्त संघ
1954
सुखदेव महतो
बिरसा सेवा दल
1965
ललित कुजूर
अखिल भारतीय झारखण्ड पार्टी
1967
बागुन सुम्ब्रई
झारखण्ड पार्टी
1969
एन. ई. होरो (अखिल भारतीय झाखण्ड पार्टी से अलग होकर निर्मित)
अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद्
1968
कार्तिक उराँव
हुल झारखण्ड पार्टी
1969
जस्टिन रिचर्ड
शिवाजी समाज
1969
विनोद बिहारी महतो
सोनोत संथाल समाज
1970
शिबू सोरेन
मार्क्सवादी समन्वय समिति
1971
ए. के. राय
झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो)
1973
विनोद बिहारी महतो व शिबू सोरेन
ऑल झारखण्ड स्टूडेन्ट्स यूनियन (आजसू)
1986
निर्मल महतो / शिबू सोरेन
झारखण्ड समन्वयक समिति
1987
53 संगठनों का संयुक्त संगठन
झारखण्ड विषयक समिति
1989
भारत सरकार द्वारा गठित
झारखण्ड स्वशासी परिषद्
1995 बिहार सरकार द्वारा गठित
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Thu, 15 Jun 2023 20:46:59 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में इसाईयों का प्रवेश https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-इसाईयों-का-प्रवेश https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-इसाईयों-का-प्रवेश > गॉस्सनर मिशन
> झारखण्ड में सर्वप्रथम जर्मनी के फादर रेवरेंड जे. एस. गॉस्सनर द्वारा 2 नवंबर, 1845 को इसाई धर्म के प्रचार हेतु चार इसाई प्रचारकों के दल को राँची भेजा गया।
> इस दल में 4 निम्न लोग शामिल थे –
» एमिलो स्कॉच – धर्मशास्त्री
» थियोडोर जैक - अर्थशास्त्री
» फ्रेडरिक वाच – शिक्षक 
» कैल्सर अगस्ट ब्रांट - शिक्षक
> झारखण्ड का प्रथम इसाई मिशन गॉस्सनर मिशन था। इसकी स्थापना जर्मनी के इसाई दल द्वारा छोटानागपुर के कमिश्नर कर्नल आउस्ले तथा डिप्टी कमिश्नर हेन्निंगटन के सहयोग से की गई । 
> गॉस्सनर मिशन के वास्तविक संस्थापक डॉ० हेकरलिन थे।
> छोटानागपुर के तत्कालीन उपायुक्त कैप्टन जॉन कोलफील्ड के प्रयास से मिशन को छोटानागपुर के राजा ने भूमि प्रदान की।
> राजा से मिली उसी भूमि पर गॉस्सनर मिशन ने अनाथों, विधवाओं एवं निर्धनों के लिए 1 दिसंबर, 1845 को 'बेथे सदा' (दया / पवित्रता का घर) की स्थापना की।
> इस मिशन द्वारा 9 जून, 1845 ई. को राँची के चार कबीरपंथी आदिवासियों केशव, नवीन, घुरन तथा बंधु का धर्मान्तरण कराकर उन्हें इसाई बनाया गया।
> 1855 ई. में गोस्सनर मिशन का राँची में पहला चर्च बना।
> 1869 ई. में गॉस्सनर मिशन का विभाजन हो गया। विभाजन के पश्चात् मूल मिशन का नामकरण एस. पी.जी. मिशन के रूप में किया गया जिसके प्रमुख रे. जे. सी. ह्विटली बनाये गये। 
> 1890 ई. में एस. पी. जी. मिशन को बिशपी का दर्जा दिया गया था तथा इसके प्रथम बिशप रे. जे. सी. ह्विटली को बनाया गया।
> जुलाई, 1919 ई. में गॉस्सनर मिशन ( एस. पी. जी. मिशन) चर्च में परिवर्तित हो गया। 
> चाईबासा मिशन
> 1851 ई. में चाईबासा मिशन की स्थापना की गयी थी।
> जी. ई. एल. चर्च, राँची
> यह झारखण्ड का सबसे पुराना चर्च है जिसका शिलान्यास 18 नवंबर, 1851 ई. को किया गया था तथा इसका निर्माण 1855 ई. में पूरा हुआ।
> इस चर्च का निर्माण जर्मन पादरियों ने करवाया था।
> इस चर्च का निर्माण गोथिक शैली में किया गया है।
> 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस चर्च पर तोप के चार गोले दागे गये थे।
> ऐंग्लिकन मिशन
> अप्रैल, 1869 ई. में ऐंग्लिकन मिशन (चर्च ऑफ इंग्लैण्ड मिशन) का झारखण्ड में प्रवेश हुआ।
> संत कैथेडरल चर्च, राँची
> यह चर्च राँची में बहु बाजार के पास स्थित है।
> इस चर्च का निर्माण 1870-73 ई. के बीच यहाँ के न्यायिक आयुक्त जेनरल रौलेट की देखरेख में किया गया था।
> इस चर्च का निर्माण गोथिक शैली में किया गया है।
> द यूनाइटेड फ्री चर्च ऑफ स्कॉटलैण्ड मिशन
> 1871 ई. में कुछ डॉक्टरों ने मिलकर पचंबा (गिरिडीह) में द यूनाइटेड फ्री चर्च ऑफ स्कॉटलैण्ड नामक मिशन की शुरूआत की।
> इसे स्टीवेंशन मेमोरियल चर्च भी कहा जाता है।
> 1929 ई. में द यूनाइटेड फ्री चर्च ऑफ स्कॉटलैण्ड का नाम परिवर्तित कर संथाल मिशन ऑफ द चर्च ऑफ स्कॉटलैण्ड कर दिया गया।
> संत मेरी चर्च, राँची
> यह चर्च राँची में डॉ. कामिल बुल्के पथ पर स्थित है।
> इस चर्च का उद्घाटन 3 अक्टूबर, 1909 ई. को ढाका के बिशप हार्ट द्वारा किया गया था।
> इसे महा गिरिजाघर भी कहा जाता है।
> अन्य प्रमुख तथ्य
> झारखण्ड में 1850 ई. में गोविंदपुर, 1851 ई. में चाईबासा, 1854 ई. में हजारीबाग तथा 1855 ई. में पिठोरिया में मिशन की स्थापना की गयी थी।
> संथालों के बीच उत्कृष्ट कार्य करने हेतु डॉ० एण्डू कैम्पबेल को कैसर-ए-हिन्द की उपाधि से नवाजा गया है ।
 > डॉ० एण्डू कैम्पबेल को 'संथालों का देवदूत' कहा जाता है।
> झारखण्ड में रोमन कैथोलिक मिशन का प्रारंभ 1869 ई. में हुआ। 'इनसाइक्लोपेडिया मुण्डारिका' के लेखक फादर हॉफमैन का संबंध इसी मिशन से है।
> 1899 ई. में डबलिन यूनिवर्सिटी मिशन द्वारा झारखण्ड के हजारीबाग में संत कोलम्बा महाविद्यालय की स्थापना की गई। आर. जे. एच. मर्रे इसके पहले प्राचार्य थे। यह झारखण्ड का प्रथम महाविद्यालय है। 
> गणपत नामक व्यक्ति ने डबलिन यूनिवर्सिटी मिशन के प्रयास से सबसे पहले इसाई धर्म को अपनाया था।
> राँची में कैथोलिक गिरिजाघर (Mother of God Counsel) की स्थापना 1909 ई. * में की गई। 1927 में इसका पुनर्निर्माण किया गया। 
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Thu, 15 Jun 2023 20:14:09 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-भारतीय-राष्ट्रीय-आंदोलन https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-भारतीय-राष्ट्रीय-आंदोलन

> झारखण्ड में 1857 के विद्रोह की शुरूआत 12 जून, 1857 को रोहिणी गाँव (देवघर) से हुयी थी। यह गाँव अजय नदी के किनारे अवस्थित है।
> 12 जून, 1857 को रोहिणी गाँव में मेजर मैक्डोनाल्ड के नेतृत्व में पदस्थापित 32वीं रेजिमेंट के सैनिकों द्वारा लेफ्टिनेंट नॉर्मन लेस्ली की हत्या के बाद यह विद्रोह प्रारंभ हुआ। सैनिकों के इस हमले में मेजर मैकडोनाल्ड तथा सर्जन डॉ. ग्राण्ट घायल हो गये।
> इमाम खाँ नामक व्यक्ति पहचाने गए हमलावरों पर मुकदमा चलाकर उन्हें फाँसी दी गयी तथा रेजीमेंट का मुख्यालय रोहिणी से भागलपुर स्थानांतरित कर दिया गया।
> इसके बाद यह इस विद्रोह का प्रसार हजारीबाग व रामगढ़ ( 30 जुलाई), राँची (2 अगस्त), सिंहभूम ( 3 सितंबर) तथा पलामू (26 सितंबर) में भी हो गया।
> हजारीबाग में विद्रोह का प्रसार
> 25 जुलाई, 1857 को दानापुर रेजिमेंट के सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। इसकी सूचना पाकर हजारीबाग स्थित रामगढ़ बटालियन के सैनिक उत्साहित हो गए तथा 30 जुलाई, 1857 को इन्होनें भी विद्रोह कर दिया।।इस विद्रोह के समय रामगढ़ बटालियन का मुख्यालय राँची में अवस्थित था। 
> हजारीबाग में सैनिकों के विद्रोह के पश्चात् मेजर सिम्पसन ( उपायुक्त) सहित विभिन्न अंग्रेज अधिकारी कलकत्ता भाग गए तथा विद्रोहियों ने अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों व दफ्तरों को जलाकर सरकारी खजाने को लूट लिया।
> रामगढ़ के राजा शम्भु नारायण सिंह द्वारा तार के माध्यम से इस विद्रोह की सूचना गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग को भेजी गयी।
> विद्रोहियों ने जेल से कैदियों को भी छुड़ा लिया तथा संबलपुर के सुरेन्द्र शाही के नेतृत्व में ये कैदी राँची की ओर चले गये।
> राँची के कमिश्नर ने विद्रोह को दबाने हेतु लेफ्टिनेंट ग्राहम के नेतृत्व में सैनिकों के एक दल को रामगढ़ भेजा, परंतु रामगढ़ के जमादार माधव सिंह एवं डोरंडा के सूबेदार नादिर अली खाँ व सूबेदार जयमंगल पाण्डेय ने विद्रोह कर दिया जिसके बाद लेफ्टिनेंट ग्राहम अपनी जान बचाने हेतु भाग गया।
> राँची में विद्रोह का प्रसार
> 2 अगस्त, 1857 को हजारीबाग के विद्रोही सैनिक राँची आ गये तथा जमादार माधव सिंह, सूबेदार नादिर अली व जयमंगल पाण्डेय के नेतृत्व में यहाँ के सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। इन सैनिकों ने राँची में अधिकारियों की कोठियाँ जला दी, गॉस्नर चर्च को तोप के गोले से उड़ा दिया तथा जेल से कैदियों को छुड़ा लिया।
> विद्रोह के प्रसार को देखते हुए राँची के कमिश्नर डाल्टन की सलाह पर अगस्त में पूरे छोटानागपुर में मार्शल कानून लागू कर दिया गया।
> विद्रोहियों ने बढ़कागढ़ के नागवंशी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव (विद्रोहियों के नेता) के नेतृत्व में डोरंडा स्थित अंग्रेज अधिकारियों के सभी बंगले व कचहरी को जला दिया तथा खजाना लूट लिया। साथ ही इन्होनें जेल से सभी कैदियों को भी छुड़ा लिया। इसमें पाण्डेय गणपत राय (विद्रोहियों के सेनापति), टिकैत उमरांव सिंह, शेख भिखारी, रामरूप सिंह, जगन्नाथ शाही तथा दुखु ने विद्रोहियों का भरपूर साथ दिया।
> विश्वनाथ शाहदेव (झारखण्ड में 1857 के विद्रोह के प्रेरक) ने मुक्तवाहिनी सेना की स्थापना की और इस सेना ने 1857 के विद्रोह में अविस्मरणीय योगदान दिया। विश्वनाथ शाहदेव के अतिरिक्त गणपत राय (सेनापति) व शेख भिखारी * इस सेना के प्रमुख सैनिक थे।
> मुक्तवाहिनी सेना को 1857 के विद्रोह में बाबु कुँवर सिंह का मार्गदर्शन प्राप्त था जो बिहार में 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान कर रहे थे।
> चतरा में विद्रोह का प्रसार
> राँची के बाद विद्रोही चतरा पहुँच गए जहाँ 2 अक्टूबर, 1857 को मेजर इंग्लिश मेजर सिम्पसन, लेफ्टिनेंट अर्ल, सार्जेंट डाइनन आदि के नेतृत्व वाले अंग्रेज सैनिकों व जयमंगल पाण्डेय के नेतृत्व वाले विद्रोहियों के बीच चतरा का ऐतिहासिक युद्ध हुआ । इस लड़ाई में सूबेदार नादिर अली खाँ घायल हो गए तथा जमादार माधव सिंह भाग गया। अंग्रेजों ने जमादार माधव सिंह पर 1,000 रूपये इनाम की घोषणा की। 
> 3 अक्टूबर, 1857 को सूबेदार नादिर अली खाँ व जयमंगल पाण्डेय को गिरफ्तार कर लिया गया तथा कमिश्नर सिम्पसन के आदेश पर 4 अक्टूबर को उन्हें चतरा के 'पंसीहारी तालाब' के निकट आम के पेड़ से लटकाकर फाँसी दे दी गयी।
> विद्रोहियों के नेता ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव एवं सेनापति पाण्डेय गणपत राय भागकर लोहरदगा के जंगलों में छिप गए तथा वहीं से अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध छापामार युद्ध करते रहे।
> राँची का कमिश्नर डाल्टन ओरमांझी के 12 गाँवों के जमींदार उमराव सिंह एवं उसके दीवान शेख भिखारी को गिरफ्तार कर राँची ले आया तथा 8 जनवरी, 1858 को टैगोर हिल के पास इन्हें फाँसी दे दी। इस फाँसी स्थल को ‘टुंगरी फाँसी' के नाम से जाना जाता है।
> बाद में विश्वनाथ दुबे तथा महेश नारायण शाही नामक व्यक्तियों की गद्दारी से कैप्टन ओक्स ने कैप्टन नेशन के साथ मिलकर विद्रोह के प्रमुख नेता विश्वनाथ शाहदेव एवं गणपत राय को गिरफ्तार कर लिया।
> 16 अप्रैल 1858 को विश्वनाथ शाहदेव और 21 अप्रैल 1858 को गणपत राय को राँची जिला स्कूल के मुख्य द्वार के समीप कदम्ब के पेड़ पर छोटानागपुर के आयुक्त कमिश्नर डाल्टन के आदेशानुसार फाँसी दे दी गई।
> मानभूम में विद्रोह का प्रसार
> 5 अगस्त, 1857 ई. को सैनिकों ने पुरूलिया में भी विद्रोह कर दिया जिससे घबराकर उपायुक्त जी. एन. ओकस समेत कई अंग्रेज अधिकारी रानीगंज भाग गये। इसके बाद विद्रोहियों ने पूरे जिले पर कब्जा कर भारी लूटपाट मचाया व कैदियों को जेल से छुड़ा कर राँची की ओर जाने लगे।
> मानभूम के संथाल भी इस विद्रोह में शामिल हो गये तथा आसपास के गाँवों में लूटपाट करने लगे। पुरूलिया के असिस्टेंट कमिश्नर ओक्स को सितंबर में वापस लौटने पर इसकी जानकारी मिली। 
> ओक्स ने विद्रोहियों को नियंत्रित करने हेतु पंचेत के राजा नीलमणि सिंह से मदद मांगी। परंतु नीलमणि सिंह सरकार की मदद करने के बजाय संथालों को ही भड़काने लगा।
> ओक्स ने कैप्टेन माउंट गोमरी के नेतृत्व में सैनिकों का एक दल संथालों को नियंत्रित करने हेतु भेजा तथा संथालों पर कार्रवाई के बाद अक्टूबर तक पुरूलिया में शांति स्थापित हो गयी ।
> पुलिस कार्रवाई के बाद संथाल विद्रोही मानभूम से हजारीबाग की ओर चले गये। इसी बीच नवंबर में राजा नीलमणि सिंह को अंग्रेजों ने गिरफ्तार करके अलीपुर जेल भेज दिया जिसके बाद मानभूम में विद्रोह समाप्त हो गया।
> सिंहभूम में विद्रोह का प्रसार
> सिंहभूम में यह विद्रोह भगवान सिंह एवं रामनाथ सिंह ने प्रारंभ किया गया, परंतु संपूर्ण सिंहभूम क्षेत्र में क्रांतिकारियों का नेतृत्व राजा अर्जुन सिंह ने किया।
> 3 सिंतबर, 1857 को चाईबासा के सैनिकों ने भगवान सिंह एवं रामनाथ सिंह के नेतृत्व में विद्रोह करके सरकारी खजाने को लूट लिया तथा कैदियों को जेल से छुड़ा लिया।
> सिंहभूम का असिस्टेंट कमिश्नर मेजर शिशमोर विद्रोह के प्रारंभ होने से पूर्व ही अंग्रेज समर्थक सरायकेला नरेश चक्रधर सिंह को चाईबासा का दायित्व सौंपकर कलकत्ता भाग गया।
> लूटपाट करने के बाद विद्रोही राँची की ओर रवाना हो गये, परंतु संजय नदी के पास सरायकेला नरेश चक्रधर सिंह एवं खरसावां नरेश हरि सिंह ने विद्रोहियों को रोक दिया।
> इस स्थिति में अंग्रेज विरोधी पोरहाट नरेश अर्जुन सिंह ने विद्रोहियों की सहायता करने का निर्णय लिया तथा अपने दीवान जग्गू की सहायता से विद्रोहियों को 7 सितंबर, 1857 को संजय नदी पार करवाया। 
> अर्जुन सिंह के प्रति विद्रोहियों के मन में शंका थी जिसके बाद अर्जुन सिंह द्वारा पौरी देवी को साक्षी मानकर विश्वासघात नहीं करने की कसम खाने पर विद्रोहियों ने अर्जुन सिंह को नेतृत्व सौंपना स्वीकार कर लिया
> 13 सितंबर, 1857 को आर. सी. बर्च ने सिंहभूम के नये जिलाधीश के रूप में कार्यभार संभाला तथा 16 सितंबर, 1857 को कैप्टन ओक्स की सेना ने चाईबासा शहर पर अधिकार कर लिया।
> आर. सी. बर्च ने अर्जुन सिंह को चाईबासा आकर आत्मसमर्पण करने का संदेश भेजा जिसे अस्वीकृत करते हुए अर्जुन सिंह ने स्वयं को 'सिंहभूम का राजा' घोषित कर दिया। बर्च द्वारा अर्जुन सिंह को बागी करार देते हुए उसके राज्य पर कब्जा करने तथा उसकी गिरफ्तारी पर 1,000 रूपये इनाम की घोषणा की गयी।
> अर्जुन सिंह राँची के कमिश्नर डाल्टन के समक्ष आत्मसमर्पण करना स्वीकार करते हुए अपने समर्थकों के साथ राँची आ गया। परंतु 17 अक्टूबर, 1857 को अर्जुन सिंह के साथ राँची पहुँचे विद्रोहियों को कमिश्नर डाल्टन के आदेशानुसार गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया गया।
> इन गिरफ्तार सैनिकों पर कोर्ट मार्शल चलाकर उनकी सजा तय की गयी तथा 20 अक्टूबर, 1857 को 'शहीद चौक' के पास फांसी की सजा प्राप्त विद्रोहियों को फांसी पर लटका दिया गया।
> अर्जुन सिंह विद्रोहियों की फांसी से अत्यंत दुःखी हो गया तथा पोरहाट आकर फिर से अंग्रेजों के विरूद्ध अभियान प्रारंभ कर दिया।
> 20 नवंबर, 1857 को अंग्रेज अधिकारी कैप्टेन हेल ने चक्रधरपुर पर कब्जा कर लिया तथा अर्जुन सिंह के दीवान जग्गू को गिरफ्तार कर उसी दिन फांसी पर लटका दिया।
> 21 नवंबर, 1857 को आर. सी. बर्च ने पोरहाट पर कब्जा करके राजा अर्जुन सिंह के महल को जला दिया। परंतु अर्जुन सिंह यहाँ से बचकर भाग गया।
> अर्जुन सिंह ने अंग्रेजों के विरूद्ध अपना अभियान तेज कर दिया। उसने पहले मुण्डा - मानकी को तथा दिसंबर, 1857 तक लगभग सभी जनजातियों को अपने साथ विद्रोह में शामिल कर लिया।
> इसके बाद विद्रोहियों ने जमकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया तथा आसपास के बाजारों को लूटने के अलावा अंग्रेजी सैनिकों पर हमला करने लगे। विद्रोहियों के ऐसे ही एक हमले में कई अंग्रेज अधिकारी घायल हो गये जिसके बाद कर्नल फास्टर ने विद्रोहियों को दबाने हेतु शेखावती बटालियन को रानीगंज से चाईबासा भेजा। 
> 17 जनवरी, 1858 को चाईबासा पहुँचने पर शेखावती बटालियन ने चक्रधरपुर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया तथा कई विद्रोहियों को मार दिया।
> अंग्रेजों के दमनपूर्वक किए गए कार्रवाई से विद्रोह को कमजोर पड़ गया। लगभग एक वर्ष तक विद्रोह को शांत देख अर्जुन सिंह ने मयूरभंज के राजा (अर्जुन सिंह के श्वसुर ) की सलाह पर राँची के कमिश्नर डाल्टन के समक्ष 16 फरवरी, 1859 को आत्मसमर्पण कर दिया। 
> पलामू में विद्रोह का प्रसार
> भोगता जनजाति के नीलांबर-पीतांबर (दोनों भाई थे) ने पलामू क्षेत्र में 1857 के विद्रोह को नेतृत्व प्रदान किया। 
> इन्होनें चेरो, खरवार तथा भोगता को एकत्र कर सैन्य दल का गठन किया तथा स्वयं को स्वतंत्र शासक के रूप में घोषित कर दिया।
> चकला के भवानी बख्श राय के नेतृत्व में 26 सितंबर, 1857 को चेरो जनजाति के लोग इस विद्रोह में शामिल हो गये।
> विद्रोहियों ने 21 अक्टूबर, 1857 ई. को शाहपुर पर धावा बोल दिया तथा अंतिम चेरो राजा चूड़ामन राय की विधवा से चार तो छीन कर ले गये ।
> विद्रोहियों ने इस विद्रोह के दौरान शाहपुर थाना एवं लेस्लीगंज थाना के साथ-साथ चैनपुर गढ़ पर भी भीषण हमला किया परंतु चैनपुर गढ़ का रघुवर दयाल सिंह इस हमले से बचने में सफल रहा।
> विद्रोह की खबर मिलने पर 5 नवंबर, 1857 लेफ्टिनेंट ग्राहम एक सैन्य दल के साथ लेस्लीगंज तथा 7 नवंबर,1857 को चैनपुर पहुँचा। परंतु विद्रोहियों द्वारा घेरे जाने के बाद ग्राहम वहाँ से जान बचाकर भाग गया। 
> विद्रोहियों ने इसके बाद रंकागढ़ एवं 27 नवंबर, 1857 को बंगाल कोल कंपनी के राजहरा कोयला खान पर धावा बोल दिया।
> विद्रोहियों का प्रभाव बढ़ने पर लेफ्टिनेंट ग्राहम की सहायता के लिए 8 दिसंबर, 1857 को मेजर काटर के नेतृत्व में एक सैन्य दल को सासाराम से शाहपुर भेजा गया जहाँ मेजर काटर ने एक विद्रोही नेता देवी बख्श राय को गिरफ्तार कर लिया।
> राँची के कमिश्नर डाल्टन के आदेश पर ले. ग्राहम की सहायता हेतु एक सैन्य टुकड़ी के साथ मेजर मेकडोनेल पलामू पहुँचा जिसके परिणामस्वरूप विद्रोहियों को पलामू किला से भागना पड़ा।
> 3 फरवरी, 1858 को कमिश्नर डाल्टन खुद पलामू आया तथा 6 फरवरी, 1858 को वापस लौटा। डाल्टन के आदेश पर विभिन्न स्थानों (पलामू किला, लेस्लीगंज, हरणामांड गाँव, बाघमारा घाट आदि) से विद्रोहियों को खदेड़ने पर जोर दिया गया।
> नवंबर, 1858 में सीधा सिंह और राम बहादुर सिंह के नेतृत्व में विद्रोहियों की संख्या 1000 से अधिक हो गयी जिसके बाद विद्रोहियों ने पलामू पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। 
> जनवरी, 1859 तक विद्रोहियों ने पुनः पलामू पर नियंत्रण स्थापित करने में सफलता प्राप्त कर ली। इसके लिए विद्रोहियों ने गुरिल्ला युद्ध का प्रयोग किया।
> लेफ्टिनेंट की सहायता के लिए जनवरी, 1859 में कैप्टेन नेशन को भेजा गया जिसके बाद विद्रोहियों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई प्रारंभ की गयी तथा इसमें चेरो जागीरदारों का भी सहयोग लिया गया। इसके परिणामस्वरूप भोगता प्रदेश से नीलांबर-पीतांबर को भागना पड़ा।
> चेरो जागीरदारों द्वारा अंग्रेजों का साथ देने के कारण भोगता कमजोर पड़ने लगे जिसका फायदा उठाकर अंग्रेजों ने नीलांबर-पीतांबर को पकड़ने का भरपूर प्रयास किया। साथ ही इनको पकड़वाने पर जागीर व इनाम देने की भी घोषणा की गयी।
> अंग्रेजों ने एक गुप्तचर की सूचना पर नीलांबर-पीतांबर को एक गुप्त स्थान पर भोजन करते समय चारों ओर से घेर लिया तथा उन्हें आत्समर्पण हेतु विवश कर दिया ।
> 28 मार्च, 1859 को नीलांबर-पीतांबर को लेस्लीगंज (पलामू) में एक आम के पेड़ पर फाँसी दे दी गई । 
> अन्य तथ्य
> 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों की सहायता करने वाले राजाओं, जमींदारों आदि को पुरस्कृत किया गया। इनमें नागवंशी राजा जगन्नथ शाहदेव, पाण्डेय गणपत राय को पकड़वाने वाले विश्वनाथ दुबे तथा नारायण शाही, जगतपाल सिंह (पिठोरिया), जनक सिंह, शिवचरण राय ( नावागढ़), कुंवर भिखारी सिंह (मनिका) आदि प्रमुख थे। 
> अंग्रेजों की सहायता हेतु किशनु दयाल सिंह (रंका) तथा रघुवर दयाल सिंह ( चैनपुर) को 'राय बहादुर' की उपाधि प्रदान की गयी।
> अंग्रेजी सेना में शामिल कुछ भारतीय सैनिकों को उनकी सेवा हेतु 'ऑर्डर ऑफ मेरिट' दिया गया।
इनमें सूबेदार शेख पंचकौड़ी, हवलदार आरजू एवं नायक तारा सिंह प्रमुख थे। ये तीनों चतरा की लड़ाई में शामिल थे। 
> लफ्टिनेंट डौंट एवं सार्जेन्ट डाइनन (मरणोपरांत) को 'विक्टोरिया क्रॉस' से सम्मानित किया गया। 
> सैन्य व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए छोटानागपुर के कोल, संथाल आदि लोगों को सेना में शामिल किया गया। 
> रामगढ़ बटालियन में गोरखा एवं सिक्खों के साथ-साथ दुसाधों की भी भर्ती की जाने लगी।
1857 के विद्रोह का प्रारंभ - प्रमुख स्थान
क्र.सं.
स्थान
विद्रोह आरंभ की तिथि
नेतृत्वकर्त्ता
1.
रोहिणी (देवघर)
12 जून, 1857
-
2.
हजारीबाग
30 जुलाई, 1857
माधव सिंह व नादिर अली
3.
राँची
2 अगस्त, 1857
-
4.
डोरंडा (राँची)
-
जयमंगल पाण्डेय
5.
मानभूम
5 अगस्त, 1857
संथालों द्वारा
6.
सिंहभूम
3 सितम्बर, 1857
अर्जुन सिंह
7.
पलामू
सितम्बर, 1857
नीलांबर-पीतांबर
> झारखण्ड में वहाबी आंदोलन 
> शाह मोहम्मद हुसैन ने झारखण्ड में वहाबी आंदोलन का प्रसार किया था। 
> झारखण्ड के राजमहल में वहाबी आंदोलन की शाखा खोली गयी थी।
> संथाल परगना क्षेत्र में पीर हुसैन ने वहाबी आंदोलन का प्रचार-प्रसार किया।
> पाकुड़ क्षेत्र के इब्राहिम मंडल को वहाबी आंदोलन के दौरान आजीवन कारावास की सजा दी गयी थी।
> झारखण्ड में उग्र राष्ट्रीयता का प्रसार
> देवघर 
> उग्र राष्ट्रवाद के दौर में झारखण्ड में क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र देवघर था। 
> देवघर में ‘शीलेर बाड़ी' नामक मकान में 1908 के अलीपुर बम कांड से जुड़े कई बंगाली क्रांतिकारी छुपकर रहते थे तथा इस मकान का प्रयोग बन बनाने एवं प्रशिक्षण हेतु किया जाता था।
> 1915 ई. में देवघर के 'शीलेर बाड़ी' नामक मकान से बम बनाने की सामग्रियाँ प्राप्त की गयी थी।
> क्रांतिकारियों गतिविधियों के प्रसार हेतु वारीन्द्र कुमार घोष द्वारा देवघर में स्वर्ण संघ ( गोल्डेन लीग ) नामक संस्था का गठन किया गया था।
> झारखण्ड के देवघर में स्थित मित्रा उच्च विद्यालय के प्राचार्य शांति कुमार बख्शी द्वारा युवकों को क्रांतिकारी प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था।
> वर्ष 1927 ई. में देवघर षड़यंत्र केस में वीरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य के घर छापा मारकर हथियार तथा क्रांतिकारी साहित्य बरामद किया गया था। 
> देवघर षड़यंत्र केस में वीरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य, सुरेन्द्र नाथ भट्टाचार्य तथा तेजेश चंद्र घोष सहित कुल 20 व्यक्तियों की गिरफ्तारी की गयी थी।
> झारखण्ड के दुमका निवासी क्रांतिकारी प्रभुदयाल हिम्मद सिंह एवं वैद्यनाथ विश्वास को 'रोड्डा आर्म्स केस' में अभियुक्त बनाया गया था। यह कलकत्ता के रोड्डा एंड कंपनी नामक बंदूक निर्माण कंपनी की दुकान से माउजर पिस्तौल की चोरी से संबंधित मामला था।
> राँची
> राँची में क्रांतिकारियों का नेतृत्व गणेश चंद्र घोष ने किया था।
> बंगाल से लगातार क्रांतिकारियों का राँची आगमन होता रहता था । हावड़ा के वेलूर मठ के शचिन्द्र कुमार सेन इस दौरान डोरंडा आकर अपने पिता के पास ठहरे थे।
> नवंबर 1913 में हेमंत कुमार बोस (अंग्रेजों के संदिग्ध) राँची आकर पी. एन. बोस के घर रूके थे। 
> हजारीबाग
> निर्मल बनर्जी ने 1913 ई. में हजारीबाग जिले के गिरिडीह नगर में एक खंबे पर 'आवर स्वाधीन भारत' शीर्षक से परचे चिपकाए थे। * ये पर्चे चौबीस परगना के क्रिस्टो राय बंगाल से लेकर आये थे।
> गिरिडीह के मनोरंजन गुहा  (उपनाम – ठाकुर दा) तथा दुमका के हेमेन्द्र नाथ घोष द्वारा क्रांतिकारियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराया जाता था। 
> हजारीबाग के संत कोलंबा महाविद्यालय के छात्र राम विनोद सिंह को 'हजारीबाग का जतिन बाघा' कहा जाता है।
> राम विनोद सिंह को 14 सितंबर, 1918 को गिरफ्तार किया गया था जिसके खिलाफ हजारीबाग में छात्रों द्वारा प्रदर्शन किया गया था।
> सिंहभूम
> ढाका, मैमनसिंह तथा कलकत्ता से कई क्रांतिकारी आकर सिंहभूम के जमशेदपुर एवं चाईबासा में छुपते थे तथा क्रांति का गुप्त प्रचार करते थे।
> 1908 ई. में टाटा कम्पनी के कर्मचारी गिरीन्द्रनाथ मुखर्जी ने न्यूयार्क से घोषणा की थी कि 'रक्तरंजित क्रांति से ही भारत को मुक्त किया जा सकता है।' इनके भाई अमरनाथ मुखर्जी भी क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थे। 
> क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल दुर्गादास बनर्जी, सुरंन्द्र कुमार राय आदि का संबंध टाटा कंपनी से है।
> सुधांषु भूषण मुखर्जी अप्रैल, 1916 में अलीपुर जेल से रिहा होने के बाद सिंहभूम के सोनुआ ग्राम में रहने लगे तथा बाद में हजारीबाग चले गये।
> आनंद कमल चक्रवर्ती ने चाईबासा से प्रकाशित 'तरूण शक्ति' नामक क्रांतिकारी पत्रिका का संपादन किया था। इस पत्रिका में ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध लिखने हेतु उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। 
> अन्य तथ्य
> काकोरी कांड के मुख्य आरोपी अशफाकउल्ला खाँ, कलकत्ता के प्रफुल्ल चंद्र घोष व जयोति पंत राय जैसे क्रांतिकारियों ने भी कुछ दिनों तक छुपने हेतु झारखण्ड में शरण ली थी।
> छोटानागपुर क्षेत्र डॉ. यदुगोपाल मुखर्जी एवं बसावन सिंह के नेतृत्व में 1931-32 के आसपास भी क्रांतिकारी आंदोलन संचालित था।
> बिहार के गया में राजनैतिक डकैती के मामले में गिरफ्तार 18 क्रांतिकारियों में डाल्टगंज के परमथ नाथ मुखर्जी तथा गणेश प्रसाद वर्मा भी शामिल थे।
> गाँधी युग
> गाँधीजी का झारखण्ड आगमन (1917-1940 के बीच)
> महात्मा गाँधी 1917 से 1940 के बीच विभिन्न कारणों से कई बार झारखण्ड की यात्रा पर आए। इनमें से गाँधीजी की झारखण्ड की प्रथम 4 यात्राओं का संबंध चंपारण आंदोलन से है। 
> गाँधीजी पहली बार 3 जून, 1917 को झारखण्ड आए थे। गाँधीजी अंतिम बार रामगढ़ के कांग्रेस अधिवेशन के सिलसिले में झारखण्ड आए थे।
> चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (पहली बार )
> महात्मा गाँधी को 29 मई, 1917 को सरकार की तरफ से एक पत्र मिला जिसमें उन्हें 4 जून को बिहार - ओडिशा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर एडवर्ड अलबर्ट गेट से मिलने हेतु आग्रह किया गया था। इसके अतिरिक्त श्याम कृष्ण सहाय ने भी 1917 में गाँधी जी को राँची आने का निमंत्रण दिया था।
> इन्हीं संदर्भों में 3 जून, 1917 को ब्रजकिशोर बाबू के साथ पहली बार महात्मा गाँधी का राँची आगमन हुआ। इस दौरान गाँधीजी श्याम कृष्ण सहाय के घर पर ही रूके। 4 जून को महात्मा गाँधी की पत्नी कस्तूरबा गाँधी तथा उनके पुत्र देवदास गाँधी भी राँची आए।
> 4 जून से 6 जून तक तीन दिन बिहार के लेफ्टिनेंट गवर्नर अल्बर्ट गेट से उनकी वार्ता चली तथा 7 जून को वे पटना लौट गए। इस दौरान गांधीजी श्यामकृष्ण सहाय के घर पर रूके थे।
> चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (दूसरी बार )
> गाँधीजी 5 जुलाई को मोतिहारी से चलकर 7 जुलाई को दूसरी बार राँची पहुंचे। इस यात्रा का उद्देश्य 11 जुलाई, 1917 को चंपारण जांच समिति की एक बैठक में भाग लेना था। बैठक संपन्न होने के बाद गाँधीजी 13 जुलाई को पुनः मोतिहारी लौट गए।
> चंपारण आंदोलन के सिलसिले में (तीसरी बार )
> 18 सितंबर को पूना से चलकर 22 सितंबर, 1917 को चंपारण आंदोलन के सिलसिले में पुनः राँची पहुंचे। इस उन्होनें ब्रजकिशोर प्रसाद को भी राँची बुला लिया। इस संदर्भ में 23 सितंबर को राँची के पते से मगनलाल गांधी को लिखा एक पत्र भी मिला है। 24 सितंबर, 1917 को राँची में चंपारण समिति की बैठक आयोजित की गयी जिसमें आंदोलन को लेकर काफी विचार-विमर्श किया गया।
> गांधीजी 24 सितंबर से 28 सितंबर, 1917 तक चंपारण जांच समिति की बैठक में शामिल हुए जिसमें चंपारण आंदोलन की रूपरेखा तैयार की गयी ।
> 3 अक्टूबर, 1917 को गांधीजी ने सरकार को चुनौती देते हुए अपना एक रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किया तथा 4 अक्टूबर, 1917 को गांधीजी चंपारण हेतु निकल गए।
> चंपारण आंदोलन के सिलसिले में ( चौथी बार )
> असहयोग आंदोलन (1920-21) के दौरान महात्मा गाँधी 1920 में राँची आए थे। इस दौरान वे भीमराज वंशीधर मोदी धर्मशाला में रूके थे। गांधीजी की उपस्थिति में ही इसी धर्मशाला के बाहर विदेशी कपड़ों की होली जलाई गयी थी। इस दौरान गाँधीजी टाना भगतों से भी मिले जिसके बाद टाना भगत गाँधीजी के प्रिय शिष्य बन गए।
> गाँधीजी का पाँचवी बार झारखण्ड आगमन
> गाँधीजी 5 फरवरी, 1921 में पहली बार धनबाद आए तथा यहाँ से झरिया गए। गाँधीजी के इस दौरे का उद्देश्य राष्ट्रीय विद्यालय हेतु कोष एकत्रित करना था । झारिया में कार्यक्रम समाप्त होने के बाद गाँधीजी पटना लौट गए। 
> गाँधीजी का छठी बार झारखण्ड आगमन
> 8 अगस्त, 1925 गाँधीजी सी. एफ. एण्डूज के आग्रह पर गाँधीजी पहली बार जमशेदपुर आए । गाँधीजी की इस यात्रा का उद्देश्य टाटा प्रबंधन एवं मजदूर यूनियन के बीच 1921 से चल रहे हड़ताल के कारण उत्पन्न तनाव के मामले में समझौता कराना था।
> जमशेदपुर में आर. डी. टाटा ने गाँधीजी का भव्य स्वागत किया तथा इस प्रवास के दौरान गाँधीजी डायरेक्स बंग्ला में रूके।
> इसी दौरान जमशेदपुर की एक सभा में देशबंधु स्मृति कोष हेतु गाँधीजी को 5000 रूपये प्रदान किए गए। 
> गाँधीजी 1934 में दूसरी बार तथा 1940 में तीसरी बार जमशेदपुर आए थे।
> गाँधीजी का सातवीं बार झारखण्ड आगमन
> 15 सितंबर, 1925 को गाँधीजी पहली बार पुरूलिया से चक्रधरपुर आए तथा यहाँ राष्ट्रीय विद्यालय में जाकर छात्रों को संबोधित किया (1934 में दूसरी बार चक्रधरपुर की यात्रा की ) ।
> चक्रधरपुर से चाईबासा व खूँटी होते हुए गांधीजी 16 सितंबर, 1925 को राँची पहुंच गए। राँची जाने के क्रम में गाँधीजी चाईबासा में हो आदिवासियों से तथा खूँटी में मुण्डाओं से बातचीत की।
> गाँधीजी ने राँची में 17 सितंबर, 1925 को संत पॉल स्कूल में एक सभा को संबोधित किया। इस सभा में गाँधीजी को देशबंधु स्मारक कोष हेतु 1,000 रूपये की थैली भेंट मिली। इस सभा के बाद गाँधीजी योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय भी गए (1 मई, 1934 को दूसरी बार योगदा सत्संग विद्यालय आए थे)।
> गाँधीजी से टाना भगतों की मुलाकात व प्रभाव
> 1925 के राँची दौरे गाँधीजी से मिलने बड़ी संख्या में झारखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों से टाना भगत राँची आए। गाँधीजी के विचारों से ही प्रभावित होकर टाना भगतों ने अहिंसा का व्रत लेकर आजादी के आंदोलन में भागीदारी की थी।
> टाना भगतों ने अंग्रेजों को जमीन का लगान देना बंद कर दिया था जिसके बाद इनकी जमीनें नीलाम कर दी गयी।
> टाना भगत गाँधी टोपी पहनते थे तथा हाथ में घंटा लेकर आजादी का प्रचार करते थे।
> टाना भगतों ने कांग्रेस के कई अधिवेशनों (रामगढ़ सहित) में भाग लिया था।
> नमक आंदोलन के दौरान नमक नहीं बना पाने के कारण इन्होनें नमक खाना ही छोड़ दिया था।
> 1928 ई. में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में टाना भगत एक सप्ताह की पैदल यात्रा करके कोलकाता पहुँचे थे (कारण- अंग्रेजों ने इनके कोलकाता जाने पर पाबंदी लगा दी थी)। लेकिन यहाँ डेलिगेट व्यवस्था के कारण गाँधीजी से मिलने में असफल हो गए।
> इसके बाद इन्होनें एक उपाय निकाला और जोर-जोर से 'गाँधीजी की जय, भारत माता की जय, वंदे मातरम्' जैसे नारे लगाने लगे। इन्हें विश्वास था कि गाँधीजी इनकी आवाज सुनकर इनसे जरूर मिलेंगे।  
> कुछ लोगों द्वारा इस प्रकार नारे लगाने की सूचना गाँधीजी को दी गयी जिसके बाद गाँधीजी ने इनके लिए निःशुल्क पास भेजकर टाना भगतों को अधिवेशन में शामिल कराया।
> राँची के बाद गाँधीजी रामगढ़ होते हुए 18 सितंबर, 1925 को हजारीबाग पहुँचे तथा यहाँ कर्जन ग्राउंड ( वर्तमान नाम- वीर कुँवर सिंह स्टेडियम) में एक सभा को संबोधित किया। सभा में गाँधीजी को 1,300 रूपये की एक थैली भेंट की गयी।
> 19 सितंबर, 1925 को गाँधीजी ने हजारीबाग के संत कोलंबा महाविद्यालय में छात्रों को संबोधित किया। हजारीबाग में कार्यक्रम की समाप्ति के बाद गाँधीजी ट्रेन से पटना के लिए रवाना होगा। ट्रेन से पटना जाने के क्रम में ट्रेन जब कोडरमा स्टेशन पर रूकी तो हजारों लोगों की भीड़ गांधीजी के दर्शनार्थ खड़ी थी। यहाँ होरिल राम नामक एक व्यक्ति ने गाँधीजी को देशबंधु स्मारक कोष हेतु 350 रूपये की एक थैली भेंट की। 
> गाँधीजी का आठवीं बार झारखण्ड आगमन
> 3 अक्टूबर, 1925 को भागलपुर से बांका होते हुए पहली बार देवघर की यात्रा पर आए । यहाँ गाँधीजी का भव्य स्वागत किया गया। गाँधीजी इस यात्रा के दौरान देवघर में सेठ गोवर्धनदास के मकान में रूके थे। इस दौरे में गाँधीजी कुछ समय के लिए नौलखा मंदिर के पास स्थित कोलकाता व्यवसायी हरगोविंद डालमिया के मकान में भी रहे।
> कोलकाता उच्च न्यायालय के सॉलिसीटर कृष्ण कुमार दत्ता के आमंत्रण पर गाँधीजी देवघर के रिखिया गाँव में भी गए। (रिखिया गाँव में स्वामी सत्यानंद सरस्वती जी द्वारा निर्मित आश्रम भी है।)
> 7 अक्टूबर, 1925 को देवघर से खड़गडीहा जाते समय गाँधीजी गिरिडीह भी पहुंचे थे। यहाँ गाँधीजी ने एक सार्वजनिक सभा तथा महिलाओं की एक सभा को संबोधित किया।
> 8 अक्टूबर, 1925 को गाँधीजी गिरिडीह से मधुपुर पहुँचे। यहाँ रेलवे स्टेशन के पास ही गाँधीजी का भव्य स्वागत किया गया। मधुपुर में गाँधीजी चंपा कोठी में ठहरे थे। यहाँ गाँधीजी ने मधुपुर नगरपालिका के नये भवन का उद्घाटन भी किया ( पुराने भवन का उद्घाटन 1909 में हुआ था ) | इस भवन के दरवाजे पर चाँदी का ताला लगा था जिसे गाँधीजी ने चाँदी की चाबी से खोला।
> 1925 की अपनी देवघर यात्रा के बारे में लिखते हुए गाँधीजी ने 'यंग इण्डिया' में देवघर के पंडों और देवघर की परंपरा की तारीफ की। गाँधीजी के अनुसार “अन्य मंदिरों के विपरीत यहां छुआछूत नहीं माना जाता है तथा मंदिर सबके लिए खुले हैं। "
> गाँधीजी का नवीं बार झारखण्ड आगमन
> 11 जनवरी, 1927 को गाँधीजी ने डाल्टनगंज (मेदिनीनगर) की यात्रा की। वे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के साथ काशी से रेलगाड़ी द्वारा यहां आए थे। यहाँ शिवाजी मैदान में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया। इस सभा के बाद गाँधीजी मारवाड़ी सार्वजनिक पुस्तकालय भी गये। यहां के लोगों ने गाँधीजी को 525 रूपये एकत्र करके दिया। डाल्टनगंज के दौरे के बाद गाँधीजी धनबाद व झरिया के लिए रवाना हो गए।
> डाल्टनगंज की सभा के बाद गाँधीजी 12 जनवरी, 1927 को दूसरी बार धनबाद पहुँचे। यहाँ पहुँचकर उन्होनें खादी की दुकानों पर जाकर खादी की बिक्री का जायजा लिया। 12 जनवरी, 1927 को ही शाम में झरिया में आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए गाँधीजी ने खादी की कम बिक्री पर निराशा जाहिर की। 
> 13 जनवरी, 1927 को गाँधीजी कतरास आ गए। यहाँ एक विशाल पंडाल में गाँधीजी की सभा का आयोजन किया गया। इसके अलावा गाँधीजी ने यहाँ महिलाओं की एक सभा को भी संबोधित किया।
> गाँधीजी का दसवीं बार झारखण्ड आगमन
> 1934 में गाँधीजी ने छोटानागपुर का बड़ा व लंबा दौरा किया। 26 अप्रैल, 1934 को गाँधीजी दूसरी बार देवघर आए। यहाँ जसीडीह स्टेशन पहुँचन पर ही गाँधीजी की कार पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया। इसमें कार के शीशे टुट गए परंतु गाँधीजी को स्वयंसेवकों ने बचा लिया। गाँधीजी पर इस हमले की पूरे देश में कड़ी निंदा की गयी।
> 28 अप्रैल, 1934 को गाँधीजी ने गोमिया के करमाटांड़ गाँव के गोबीटांड़ मैदान में एक सभा की। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संथाल आदिवासी गांधीजी को सुनने आए थे। इस सभा के आयोजन में होपन माझी का प्रमुख योगदान था। सभा के बाद गाँधीजी होपन माझी के घर भी गए। होपन माझी को 23 अगस्त, 1930 को 2,000 रूपया जुर्माना नहीं चुकाने के बाद हजारीबाग जेल में एक वर्ष कारावास की सजा दी गयी थी। परंतु हजारीबाग के उपायुक्त की अनुशंसा पर उसे सजा से पूर्व ही रिहा कर दिया गया था।
> गोमिया की सभा के बाद गाँधीजी ने 28 अप्रैल, 1934 को ही बेरमो में एक सभा एवं महिलाओं की एक बैठक को भी संबोधित किया। यहाँ से गाँधीजी कतरासगढ़ होते हुए झरिया चले गए। यहाँ गाँधीजी ने एक सभा को संबोधित किया तथा हरिजन कल्याण कोष हेतु लोगों से सहयोग मांगा। रात्रि में गाँधीजी ने झरिया में ही विश्राम किया।
> 29 अप्रैल, 1934 को गाँधीजी ने जामाडोबा कोलियरी में टाटा कोलियरी वर्कर्स एवं हरिजन वर्कर्स को संबोधित किया तथा पुरूलिया व झालदा होते हुए राँची आए। इसी यात्रा के दौरान 1 मई, 1934 को गाँधीजी दूसरी बार राँची स्थित योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय भी गये।
> 1 मई को गाँधीजी ने स्वराजवादी नेताओं के साथ बैठक किया। इस बैठक में चक्रवर्ती राजगोपालचारी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, अरूणा आसफ अली, सरोजिनी नायडू, भूलाभाई देसाई, जमनालाल बजाज आदि ने भाग लिया। 
> 3 मई, 1934 को गाँधीजी ने राँची में हरिजन छात्र संघ को संबोधित किया।
> 4 मई, 1934 को गाँधीजी राँची से कार द्वारा चक्रधरपुर होते हुए जमशेदपुर ( उद्देश्य हरिजन आंदोलन) के लिए रवाना हो गये। लेकिन इस यात्रा के दौरान चक्रधरपुर के पास गाँधीजी की कार दुर्घटनाग्रस्त हो गयी जिसमें वे बाल-बाल बच गए।
> इस दुर्घटना के बावजूद गाँधीजी ने 4 मई, 1934 को चक्रधरपुर जाकर रेलवे कर्मचारियों की एक सभा एवं महिलाओं की एक सभा को संबोधित किया।
> गाँधीजी का ग्यारहवीं बार झारखण्ड आगमन
> गाँधीजी 1940 ई. में कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में भाग लेने हेतु झारखण्ड आए । वे 12 मार्च, 1940 को सेवाग्राम से चलकर 14 मार्च को रामगढ़ पहुँचे। 14 मार्च को रामगढ़ में उन्होनें खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया।
> रामगढ़ अधिवेशन के बीच में ही 19 मार्च को गाँधीजी कार द्वारा राँची आए तथा यहाँ ठक्कर भवन और हरिजनों-आदिवासियों के लिए एक औद्योगिक गृह का उद्घाटन किया।
> गांधीजी इस दौरान राँची के निवारणपुर में अस्वस्थ निवारण बाबू से मिलने भी गये । यहाँ गाँधीजी ने एक जनसभा को भी संबोधित किया। शाम में गाँधीजी पुनः रामगढ़ लौट गए।
> रामगढ़ अधिवेशन की समाप्ति पर गाँधीजी 21 मार्च, 1940 को जमशेदपुर चले गए। इस दौरान जमशेदपुर में वे जहाँगीर मोदी के घर पर रूके थे | जमशेदपुर से गाँधीजी वर्धा के लिए रवाना हो गए। यह उनकी अंतिम झारखण्ड यात्रा थी।
(विशेष नोट- महात्मा गांधी की विभिन्न झारखण्ड यात्राओं से संबंधित तथ्यों एवं विवरण हेतु अनुज कुमार सिन्हा की पुस्तक 'महात्मा गाँधी की झारखण्ड यात्रा', महात्मा गाँधी के विभिन्न पत्र, समाचार पत्र एवं सरकारी दस्तावेजों का स्रोत के रूप में उपयोग किया गया है ।) 
> रॉलेट एक्ट का विरोध ( 1919 )
> ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों द्वारा सरकार विरोधी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से सिडनी रॉलेट रिपोर्ट के आधार पर एक कानून पारित किया जिसका पूरे देश भर में व्यापक विरोध किया गया।  
> झारखण्ड में इस कानून का विरोध किया। राँची में बारेश्वर सहाय एवं गुलाब तिवारी ने इस कानून के विरोध में सत्याग्रह का नेतृत्व किया।
> 6 अप्रैल, 1919 को पलामू के जिला स्कूल के शिक्षक रामदीन पाण्डेय ने 6 छात्रों के साथ उपवास भी रखा।
> झारखण्ड में कांग्रेस कमिटी की स्थापना (1919-20)
> 1919 ई. में पलामू में जिला कांग्रेस कमिटी की स्थापना बिन्देश्वरी और भागवत पाण्डेय ने की थी।
> 1920 ई. में राँची तथा हजारीबाग में कांग्रेस कमिटी का गठन किया गया।
> असहयोग आंदोलन (1920-22)
> 1920 में कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में अहिंसक आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया गया जिसका नेतृत्व गाँधी जी को सौंपा गया।
> यह आंदोलन तब तक चलाया जाना था जब तक खिलाफत व पंजाब संबंधी गलतियाँ सुधार नहीं ली जाती व स्वराज स्थापित नहीं हो जाता।
> 1920 में ही झारखण्ड में भी असहयोग आंदोलन प्रारंभ हुआ।
> असहयोग आंदोलन के समय गाँधी जी पुनः झारखण्ड आये । इसके अतिरिक्त मोतीलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मजहरूल हक आदि प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं ने भी झारखण्ड की यात्रा की तथा विभिन्न स्थानों पर सभाओं को संबोधित किया।
> 1921 ई. में इस आंदोलन में टाना / ताना भगतों ने भी उल्लेखनीय योगदान दिया जिसकी गाँधी जी द्वारा कोटि-कोटि प्रशंसा की गयी। इस दौरान ताना भगतों ने ब्रिटिश सरकार को कर देना बंद कर दिया, जिसके बाद उनकी जमीनें नीलाम कर दी गयी ।
> पहाड़िया जनजाति ने भी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इनका नेतृत्व जबरा पहाड़िया ने किया था। जाबरा पहाड़िया को गिरफ्तार कर उन्हें सश्रम कारावास की सजा दी गयी तथा उनके घर को कुर्क कर दिया गया।
> इस आंदोलन के दौरान राँची, चतरा, गिरिडीह, धनबाद, पलामू व लोहरदगा में राष्ट्रीय विद्यालय खोला गया।
> झारखण्ड में असहयोग आंदोलन का केन्द्र राँची था। लेकिन राज्य के अन्य भागों में भी (पलामू, हजारीबाग, सिंहभूम आदि) में इस दौरान लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
> राँची
> असहयोग आंदोलन के दौरान राँची एवं इसके आसपास के क्षेत्रों में कई सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया गया। इस आंदोलन में आदिवासियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
> 1921 में राँची में आयोजित वार्षिक पिंजरापोल समारोह में भोलानाथ बर्मन, अब्दुर रज्जाक, पद्मराज जैन आदि ने भाषण दिया।
> इस आंदोलन के दौरान राँची एवं लोहरदगा में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की गयी। 
> पलामू
> पलामू के आदिवासी नेता धनी सिंह खरवार के नेतृत्व में इस आंदोलन के दौरान जंगलों को काटकर कपास की खेती शुरू की गयी (ऐसा करने को 1920 के कलकत्ता अधिवेशन में गाँधीजी ने कहा था) तथा धनी सिंह खरवार को पलामू का राजा घोषित कर दिया गया।
> धनी सिंह खरवार के नेतृत्व में आदिवासियों का एक विशाल जुलूस डाल्टनगंज पहुंचा जिसे लाठी चार्ज करके खदेड़ दिया गया।
> इसी दौरान बिहार स्टूडेंट कांफ्रेंस का 15वाँ अधिवेशन 10 अक्टूबर, 1920 ई. को सी. एफ. एण्ड्रयूज की अध्यक्षता में डाल्टनगंज में संपन्न हुआ। इस अधिवेशन में मजहरूल हक, अब्दुल बारी, जी. इमाम, हसर आरजू, चंद्रवंशी सहाय एवं कृष्ण प्रसन्न सेन आदि ने भाग लिया।
> इसी आंदोलन के दौरान पलामू कांग्रेस ने डाल्टनगंज में राष्ट्रीय विद्यालय खोला गया जिसका प्रधानाध्यापक बिन्देश्वरी पाठक को बनाया गया।
> इस आंदोलन के दौरान पलामू में शेख साहब ने अपनी वकालत छोड़ दी थी।
> हजारीबाग
> इस आंदोलन के दौरान हजारीबाग में कई छात्रों ने अपनी पढ़ाई तथा राम नारायण सिंह के साथ-साथ कई वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी।
> हजारीबाग में आंदोलन के व्यापक होने पर आंदोलन के नेता बजरंग सहाय, कृष्ण वल्लभ सहाय, सिंह, त्रिवेणी प्रसाद एवं सरस्वती देवी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
> बिहार स्टूडेंट कॉफ्रेंस का 16वां अधिवेशन 5-6 अक्टूबर, 1921 को हजारीबाग में सरला देवी की अध्यक्षता में हुआ। इस कॉफ्रेंस को बजरंग सहाय, कृष्ण वल्लभ सहाय, राम नारायण सिंह आदि ने संबोधित किया।
> सिंहभूम
> इस आंदोलन के दौरान सिंहभूम के चक्रधरपुर में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की गयी।
> जमशेदपुर के गोलमुरी मैदान में 5-9 फरवरी के बीच कई सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया गया। इन सभाओं की अध्यक्षता बी. जी. साठे (5 फरवरी), प्रभास चंद्र मित्र (6 फरवरी), के. के भट्ट (8 फरवरी) तथा अब्दुल गनी (9 फरवरी) ने की।
> इसी दौरान 8 मार्च को जमशेदपुर के गोलमुरी मैदान में एवं 13 मार्च को चाईबासा में जनसभा का आयोजन किया गया।
> 15 मार्च, 1921 को पूरे जमशेदपुर में हड़ताल का आयोजन किया गया।
>>जून, 1921 में मजरूल हक का आगमन चक्रधरपुर में हुआ।
> अन्य तथ्य
> पचम्बा के बाबू बजरंग सहाय ने गिरिडीह में असहयोग आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया। 
> असहयोग आंदोलन के दौरान जनवरी, 1922 में साहेबगंज को अशांत क्षेत्र घोषित किया गया।
> 'देशेर कथा' की रचना इसी दौरान सखाराम गणेश देउस्कर द्वारा की गयी थी।
> असहयोग आंदोलन के बाद कांग्रेस के गया अधिवेशन (37वाँ अधिवशेन) से लौटकर राँची के पी. सी. मित्रा एवं देवकी प्रसाद ने 'तिलक स्वराज्य कोष' हेतु धन एकत्र करना प्रारंभ कर दिया।
> इस आंदोलन के बाद 6 अप्रैल से 13 अप्रैल, 1923 के बीच 'राष्ट्रीय सप्ताह' के रूप में मनाया गया। 
> 1 मई से 18 अगस्त, 1923 के बीच राष्ट्रीय ध्वज की रक्षा हेतु आयोजित नागपुर झण्डा सत्याग्रह में बड़ी संख्या में झारखण्ड के टाना भगतों ने भी भाग लिया।
> स्वराज पार्टी
> झारखण्ड के छोटानागपुर क्षेत्र में राम नारायण सिंह एवं देवकी प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में स्वराज पार्टी की प्रचार समितियों का गठन किया गया था।
> 1923 ई. में हुए विधान परिषद् के चुनाव में कृष्ण वल्लभ सहाय को हजारीबाग में स्वराज पार्टी का प्रतिनिधि चुना गया।
> कृष्ण वल्लभ सहाय को बिहार प्रांतीय स्वराज पार्टी में सचिव का पद प्रदान किया गया।
> सोनार सिंह खरवार को संथाल पगरना क्षेत्र में स्वराज पार्टी का कार्यभार दिया गया।
> 1923 ई. में रामेश्वर लाल को दक्षिणी संथाल परगना में स्वराज पार्टी का प्रतिनिधि चुना गया।
> खादी आंदोलन
> झारखण्ड क्षेत्र से विधायक नीलकांत चटर्जी ने 1924 ई. में बिहार विधान परिषद् में खादी से संबंधित एक प्रस्ताव रखा था।
> सिंहभूम के आदिवासियों ने 1924 ई. में विष्णु माहुरी के नेतृत्व में हाट कर न देने हेतु आंदोलन चलाया था। झारखण्ड में विभिन्न स्थानों पर चरखा आंदोलन को प्रसारित करने हेतु सरला देवी के नेतृत्व में खादी डीपो की स्थापना की गयी।
> अखिल भारतीय खादी बोर्ड के अध्यक्ष जमनालाल बजाज ने देवघर में खादी मेला का शुभारंभ किया था।
> जमशेदपुर में टम्पल नामक अंग्रेज द्वारा खादी प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया था।
> साइमन कमीशन
> साइमन कमीशन 1928 ई. में झारखण्ड आया था।
> 1928 में श्याम कृष्ण सहाय की अध्यक्षता में एक सभा का आयोजन किया गया जिसमें साइमन कमीशन के विरोध का प्रस्ताव पारित किया गया था।
> राँची में साइमन कमीशन का मजबूती के साथ विरोध किया गया था। श्याम कृष्ण सहाय के नेतृत्व में राँची में 'साइमन कमीशन वापस जाओ' के नारे लगाए गए थे।
> पलामू निवासी कोहड़ा पाण्डेय के नेतृत्व में भी राँची में साइमन कमीशन का व्यापक विरोध किया गया था। 
> हजारीबाग में देवकी नंदन लाल एवं पी. सी. मित्रा के नेतृत्व में लोगों ने काला झंडा दिखाकर साइमन कमीशन का विरोध किया था।
> 1928 ई. में छोटानागपुर उन्नति समाज द्वारा छोटानागपुर राज्य के गठन हेतु साइमन कमीशन को मांग पत्र सौंपा गया था।
> मजदूर आंदोलन
> राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान समय-समय पर मजदूरों द्वारा भी अपनी दयनीय स्थिति से बाहर निकलने तथा स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु व्यापक स्तर पर प्रयास किया गया जिसकी झलक झारखण्ड राज्य में भी दृष्टिगत होती है। 
> इस क्रम में 1920 ई. में जमशेदपुर वर्कर्स एसोसिएशन की स्थापना की गयी जिसे एस. एन. हलधर तथा व्योमेश चक्रवर्ती ने नेतृत्व प्रदान किया।
> वर्ष 1920-22, 1925 तथा 1928 में टाटा आयरन एण्ड स्टील वर्कर्स तथा अन्य कई मिलों में व्यापक हड़ताल किया गया।
> 1928 ई. की टाटा आयरन एण्ड स्टील वर्कर्स की हड़ताल को समाप्त कराने में सुभाष चंद्र बोस का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होनें मजदूरों तथा मिल प्रबंधक के बीच समझौता कराने में अग्रणी भूमिका अदा की।
> 18 अगस्त, 1928 को सुभाष चंद्र बोस का जमशेदपुर आगमन हुआ तथा 20 अगस्त, 1928 को उन्हें जमशेदपुर / टाटा लेबर एसोसिएशन का अध्यक्ष चुना गया। वे 9 वर्षों तक इस यूनियन के अध्यक्ष पद पर रहे। 
>  सुभाष चंद्र बोस के प्रयास से ही 12 सितंबर को टाटा यूनियन के मजदूरों ने अपनी हड़ताल वापस ली तथा कंपनी के प्रबंधक और मजदूरों के बीच समझौता संभव हो पाया।
> वर्ष 1929 में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में झरिया में भारतीय ट्रेड यूनियम कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया।
> 1929 ई. में जमशेदपुर स्थित गोलमुरी के एक टिन प्लेट कंपनी के मजदूरों ने हड़ताल की थी। यह हड़ताल 1938 ई. में समाप्त हुयी।
> 1929 ई. में जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में झरिया में भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस' का अधिवेशन आयोजित किया गया था।
> 1938 ई. में अब्दुल बारी सिद्दिकी द्वारा 'टाटा वर्कर्स यूनियन' (टाटा वर्कर्स एसोसिएशन 1920) की स्थापना की गयी थी। 
> सविनय अवज्ञा आंदोलन
> गाँधी जी ने प्रसिद्ध दांडी यात्रा से 12 मार्च, 1930 को सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया। इस क्रम में गाँधी जी अपने अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी गाँव पहुँचे । 6 अप्रैल, 1930 को दांडी में सांकेतिक रूप से नमक कानून भंग किया गया।
> 26 जनवरी, 1930 को कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (1929) में पारित पूर्ण स्वाधीनता प्रस्ताव के आलोक में पूरे देश में स्वाधीनता दिवस मनाया गया | झारखण्ड में भी पूरे उल्लास के साथ स्वाधीनता दिवस का आयोजन किया गया।
> झारखण्ड के लोगों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
> गांधीजी द्वारा 6 अप्रैल, 1930 को प्रारंभ नमक आंदोलन में भी झारखण्ड के लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया तथा 13 अप्रैल, 1930 झारखण्ड के लगभग 50 स्थानों पर नमक बनाया गया।
> झारखण्ड में सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रमुख केन्द्र राँची था। लेकिन राज्य के अन्य भागों में भी ( हजारीबाग, पलामू, सिंहभूम, संथाल परगना आदि) में इस दौरान लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
> राँची
> राँची में तरूण संघ द्वारा स्वाधीनता दिवस का आयोजन किया गया।
> 26 जनवरी, 1930 को डॉ. पूर्णचंद्र मित्रा ने राँची में स्वाधीनता दिवस मनाने के अवसर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया था। इस कार्यक्रम का आयोजन तरूण संघ नामक संगठन द्वारा किया गया था। 
> इस आंदोलन के दौरान राँची व उसके आसपास के क्षेत्रों में कई सार्वजनिक सभाओं का आयोजन किया गया
> 8 अप्रैल, 1930 को चुटिया में नागरमल मोदी की अध्यक्षता में एक सभा का आयोजन किया गया जिसे पी. सी. मित्रा व देवकी नंदन लाल समेत कई व्यक्तियों ने संबोधित किया।
> 10 अप्रैल, 1930 को राँची में 1000 से अधिक लोगों की तथा हिनू में 100 बंगाली महिलाओं की सभा का आयोजन किया गया।
> 15 अप्रैल, 1930 को जिला स्कूल के छात्राओं ने विद्यालय का बहिष्कार किया तथा 16 अप्रैल, 1930 को बुण्डू में पूर्ण हड़ताल का आयोजन किया गया।
> 17 अप्रैल, 1930 को सिल्ली में तथा 18 अप्रैल, 1930 को कुंडु में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया। कुंडु की सभा में सरस्वती देवी एवं मीरा देवी ने भाषण भी दिया।
> 3 मई, 1930 को राँची बार एसोशियन की एक बैठक आयोजित की गयी जिसमें विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार एवं खादी के उपयोग का प्रस्ताव पारित किया गया।
> 4 मई, 1930 को मांडर में महादेव स्वर्णकार ने गिरफ्तारी दी तथा 12 मई, 1930 को पी. सी. मित्रा, नागरमल मोदी व देवकी नंदन लाल और 31 मई, 1930 को रवीन्द्र चंद्र व रामधनी दूबे को गिरफ्तार किया गया।
> 2 जून, 1930 को लगभग 40 टाना भगतों ने राँची में एक जुलूस निकाला जिसके बाद 8 टाना भगतों को गिरफ्तार कर लिया गया।
> ब्रिटिश हुकुमत से अपनी बातें मनवाने के लिए जगह-जगह पर व्यापक हड़ताल एवं प्रदर्शनों का आयोजन किया गया जिसके तहत 'स्वदेशी सप्ताह' (सितंबर, 1930) में तथा 'जवाहर सप्ताह' (नवंबर, 1930 में) मनाया गया।
> सविनय अवज्ञा आंदोलन का दूसरा चरण प्रारंभ होने के बाद 3 मार्च, 1932 को राँची के तरूण संघ नामक संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
> 27 जुलाई, 1932 को नागरमल मोदी, बुलु साहु व ख्वाजा नसिरूद्दीन को गिरफ्तार कर लिया गया। 
> सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण के दौरान भी महात्मा गाँधी राँची आये थे। 
> हजारीबाग
> हजारीबाग में भी सविनय अवज्ञा आंदोलन में लोगों ने पूरे उत्साह के साथ सहभागिता दर्ज की थी।
> 26 जनवरी, 1930 को हजारीबाग में लाठी चार्ज होने के बावजूद कृष्ण वल्लभ सहाय ने कचहरी पर झंडा फहराया था।
> झारखण्ड के कृष्ण बल्लभ सहाय ने भी हजारीबाग में खजांची तालाब के निकट नमक बनाकर इस आंदोलन को प्रसारित किया जिसके लिए उन्हें एक वर्ष के कारावास की सजा मिली।
> हजारीबाग में नमक सत्याग्रह में सीताराम दुबे, चक्र सिंह, मथुरा प्रसाद, सरस्वती देवी, मीरा देवी आदि ने भाग लिया। सरस्वती देवी हजारीबाग जिला कांग्रेस कमिटी की अध्यक्षा थीं।
> सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान कई पुरुषों के साथ-साथ सरस्वती देवी, मीरा देवी एवं साधना देवी को गिरफ्तार कर लिया गया। सितंबर, 1930 के तक हजारीबाग के 137 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। 
> बंगम माड़े ( बंगम माँझी) के नेतृत्व में हजारीबाग में संथालों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में अपनी सहभागिता दर्ज की।
> आंदोलन के प्रचार-प्रसार के लिए हजारीबाग जेल में बंद रामवृक्ष बेनीपुरी ने 'कैदी' नामक हस्तलिखित पत्रिका निकाली।
> इसी क्रम में महामाया प्रसाद सिन्हा तथा भवानी दयाल सन्यासी ने भी हजारीबाग जेल में रहकर 'कारागार' नामक हस्तलिखित पत्रिका निकाली।
> इस आंदोलन के दौरान डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में सूत कातकर कपड़ा तैयार किया था। 
> सिंहभूम
> नमक सत्याग्रह का नेतृत्व जमशेदपुर में ननी गोपाल मुखर्जी तथा पलामू में सोनार सिंह खरवार व चंद्रिका 
प्रसाद वर्मा ने किया।
> इस आंदोलन के दौरान सिंहभूम के आदिवासियों ने हाट कर देना बंद कर दिया।
> सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान 6 अगस्त, 1930 को चक्रधरपुर में कांग्रेसियों ने जंगल काटकर सरकार के प्रति अपना विरोध प्रकट किया। इसे जंगल सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। इसका नेतृत्व हरिसिंह, हरिहर महतो तथा लालबाबू कर रहे थे। इन्हें सरकार ने गिरफ्तार कर लिया।
> 16 नवंबर को जमशेदपुर के गोलमुरी मैदान में झंडा फहराकर 'जवाहर दिवस' मनाया गया। इस कार्यक्रम के दौरान अंग्रेजों ने लाठी चार्ज कर दिया तथा कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
> 19 नवंबर, 1930 को गोलमुरी में 3000 लोगों की एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया जिसमें सरकार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित किया गया।
> भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरू को दी गयी फांसी के विरोध में 5 मार्च, 1931 को जमशेदपुर में हड़ताल किया गया।
> सविनय अवज्ञा आंदोलन के दूसरे चरण के शुरू होने के बाद महात्मा गाँधी व अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में 5 जनवरी, 1932 को गोलमुरी में एक सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में 500 से अधिक महिला-पुरूषों ने भाग लिया। सभा की समाप्ति के बाद कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। 
> 24 जनवरी, 1930 को जी. महंती के घर से स्वाधीनता दिवस से संबंधित एक परचा मिलने के बाद 4 लोगों साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
> 26 जनवरी, 1930 को लोगों ने गोलमुरी मैदान में झंडा फहराने का प्रयास किया। पुलिस ने लाठी चार्ज किया तथा कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
> पलामू
> पलामू में चंद्रिका प्रसाद वर्मा एवं सोनार सिंह खरवार ने नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया। 
> इस आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी की गिरफ्तारी की खबर मिलने पर डाल्टनगंज एवं गढ़वा में 8 मई, 1930 को तथा लातेहार में 11 मई, 1930 को लोगों ने हड़ताल की।
> डाल्टनगंज में कांग्रेस का दफ्तर बंद करवाने में सरकार की मदद करने हेतु भोला नाथ सिंह नामक व्यक्ति को सरकार द्वारा 'राय बहादुर' की उपाधि दी गयी ।
> यदुवंश सहाय के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान झारखण्ड में संपूर्ण किसान आंदोलन चलाया गया। ( स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने संथाल परगना क्षेत्र में किसानों की दशा सुधारने के लिए आंदोलन चलाया। वे 1938 में संथाल परगना आए थे । )
> संथाल परगना
> सविनय अवज्ञा आंदोलन में राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। इसी क्रम में संथाल परगना में शैलबाला राय * के नेतृत्व में महिलाओं ने इस आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। 
> संथाल परगना के कांग्रेसी नेता शशि भूषण राय को इस आंदोलन के सिलसिले में मुंगेर जाने के बाद वहाँ से गिरफ्तार कर लिया गया।
> अन्य तथ्य
> इस आंदोलन के दौरान झारखण्ड में चौकीदारी कर न देने हेतु आंदोलन चलाया गया, जिसका नेतृत्व निम्न लोगों ने किया – 
> जे. एल साव
> सीता राम दुबे
> महादेव पाण्डेय
> मथुरा सिंह
> सरस्वती देवी
> चमन लाल
> 1935-39 के बीच झारखण्ड में प्रमुख गतिविधियाँ 
> 1935 में पारित भारत शासन अधिनियम के अंतर्गत गवर्नरों को जनजातीय क्षेत्रों में बेहतर शासन प्रबंधन हेतु अधिक अधिकार प्रदान किये गये।
> 1936 ई. में उड़ीसा को बिहार - उड़ीसा संयुक्त प्रांत से अलग कर दिया गया तथा इसमें छोटानागपुर के कुछ हिस्से (जैसे - गांगपुर क्षेत्र आदि) को भी मिलाया गया।
> भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत जनवरी, 1937 में झारखण्ड में स्थित क्षेत्रीय विधायिका हेतु चुनाव कराये गये। इसमें आदिवासियों हेतु 6 सीट सुरक्षित थे । इस चुनाव में कांग्रेस, छोटानागपुर उन्नति समाज एवं किसान सभा ने भाग लिया, परंतु कांग्रेस के उम्मीदवारों की ही जीत हुई।
> इन चुनावों में इग्नेस बेक, बोनिफस लकड़ा तथा देवेन्द्र प्रसाद सामंता (तीनों आदिवासी) को सामान्य सीटों पर विजय प्राप्त हुयी । इग्नेस बेक दिल्ली की संघीय विधायिका के जबकि बोनिफस लकड़ा पटना की प्रांतीय विधानसभा के सदस्य बने।
> 30 मई, 1938 को राँची में छोटानागपुर उन्नति समाज की वार्षिक बैठक आयोजित हुयी, जिसमें छोटानागपुर उन्नति समाज के अलावा किसान सभा, छोटानागपुर कैथोलिक सभा, मुण्डा सभा एवं हो - मालतो मारंग सभा का एकीकरण करके छोटानागपुर - संथाल परगना आदिवासी सभा का गठन किया गया। 1939 में इस संगठन का नाम परिवर्तित करके छोटानागपुर आदिवासी सभा कर दिया गया। इस संस्था का गठन दिकुओं के खिलाफ संघर्ष करने तथा आदिवासियों के लिए पृथक राज्य की स्थापना के उद्देश्य के साथ किया गया था।
> 1939 ई. में गांगपुर क्षेत्र (1936 में इसे छोटानागपुर से उड़ीसा में शामिल कर लिया गया था) में भू-बंदोबस्त कानून व मालगुजारी बढ़ाने के खिलाफ निर्मल मुण्डा नामक आदिवासी के नेतृत्व में आंदोलन शुरू हो गया।
> निर्मल मुण्डा के नेतृत्व में 25 अप्रैल, 1939 को उड़ीसा के सुंदरगढ़ जिले के रायबोगा थानान्तर्गत आमको-सिमको गांव में आदिवासियों की एक विशाल जनसभा आयोजित की गयी। गांगपुर के पालिटिकल एजेंट के आदेश पर ईस्ट इण्डिया कंपनी के सैनिकों द्वारा इस जनसमूह पर जांलियावाला बाग की तर्ज पर गोलियां चलायी गयी जिसमें लगभग 65 आदिवासियों की मौत हो गयी तथा 90 से अधिक लोग जख्मी हो गए। इस घटना को ‘सिमको हत्याकांड' या 'दूसरा जांलियावाला बाग हत्याकांड' भी कहा जाता है। इस हत्याकांड के विरूद्ध छोटानागपुर में भी व्यापक प्रतिक्रिया हुयी।
> कांग्रेस का रामगढ़ अधिवेशन
> भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 53वें अधिवेशन का आयोजन झारखण्ड के रामगढ़ में 19-20 मार्च, 1940  को संपन्न हुआ। 
> यह झारखण्ड में कांग्रेस का पहला तथा एकमात्र अधिवशेन था।
> इस अधिवेशन के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद थे। इस अधिवेशन के बाद 1941-45 तक कांग्रेस का कोई अधिवेशन आयोजित नहीं हुआ जिसके कारण मौलाना अबुल कलाम आजाद ही लगातार 6 वर्षो तक (आजादी से पूर्व सबसे लंबे समय तक) कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहे।
> अधिवेशन के दौरान रामगढ़ में कांग्रेस के मुख्य द्वार का नाम बिरसा मुंडा द्वार (बिरसा मुण्डा के नाम पर) तथा सभास्थल का नाम मजहर नगर (मजहर-उल-हक के नाम पर) रखा गया था।
> इस अधिवेशन से पूर्व गाँधी जी द्वारा 14 मार्च, 1940 को रामगढ़ में खादी ग्रामोद्योग का शुभारंभ किया गया।
> 15-18 मार्च, 1940 को रामगढ़ में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक संपन्न हुयी।
> 17-19 मार्च तक कांग्रेस विषय निर्वाचनी समिति की बैठक आयोजित हुई। इस बैठक के पहले दिन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा भारत तथा विश्व संकट पर मुख्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। पं. जवाहर लाल नेहरू ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया।
> इस अधिवेशन में जवाहर लाल नेहरू द्वारा सत्याग्रह का प्रस्ताव (कांग्रेस का एकमात्र प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया जिसका अनुमोदन जे. बी. कृपलानी द्वारा किया गया। जवाहर लाल नेहरू द्वारा प्रस्तावित इस प्रस्ताव में 27 संशोधन प्रस्तुत किये गए जिसमें से 14 संशोधनों को वापस ले लिया गया तथा 13 संशोधन भारी बहुमत
से गिर गए।
> स्वागत भाषण डॉ. राजेन्द्र प्रसाद द्वारा प्रस्तुत किया गया जिसका अनुमोदन जे. बी. कृपलानी द्वारा किया गया। अधिवेशन को महात्मा गाँधी ने भी संबोधित किया तथा अपने संबोधन में उन्होनें रचनात्मक कार्यक्रम एवं अहिंसात्मक संघर्ष पर बल दिया।
> अबुल कलाम आजाद द्वारा अध्यक्षीय भाषण प्रस्तुत किया गया।
> इस अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की प्राप्ति का लक्ष्य तय किया गया तथा वयस्क मताधिकार पर आधारित निर्वाचित संविधान सभा द्वारा देश के संविधान निर्माण पर बल दिया गया।
> इस अधिवेशन में भाग लेने हेतु राज्य के विभिन्न भागों से टाना भगत पैदल चलकर रामगढ़ गये थे तथा इन्होनें महात्मा गाँधी को 400 रूपये की एक थैली भेंट की थी।
सम्मेलन के प्रमुख व्यक्तित्व:-
अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद
स्वागत समिति के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
स्वागत समिति के उपाध्यक्ष श्री कृष्ण सिंह एवं डॉ. सैयद महमूद
स्वागत समिति के महासचिव श्री अनुग्रह नारायण सिंह
स्वागत समिति के पदाधिकारी श्री अंबिका कान्त सिंह
प्रचार पदाधिकारी श्री ज्ञानचंद्र सोधी
प्रमुख स्वयं सेविकाएँ
सरला देवी, कुमारी इन्द्रमति जुनाज, कुमारी तारा पटवर्धन,
कुमारी प्रेमा कण्टक, भ्योजो भटवरकर
> इस सम्मेलन में अन्य प्रमुख लोगों ने भागीदारी की। इनके प्रमुख योगदान इस प्रकार हैं -
» बिजली का प्रबंध - गया कॉटन मिल्स द्वारा
» अभियंत्रण का कार्य - रामजी प्रसाद वर्मा द्वारा
» खादी प्रदर्शनी का आयोजन - लक्ष्मी नारायण (चर्खा संघ के सचिव)
» बिहार की प्राचीन धरोहर पर आधारित स्मारिका का वितरण - जयचंद्र विद्यालंकर द्वारा बिहार की ऐतिहासिक घटनाओं पर केन्द्रित चित्रावली का वितरण, जिसका चित्रांकन - ईश्वरी प्रसाद वर्मा द्वारा
> अखिल भारतीय समझौता विरोधी सम्मेलन
> रामगढ़ के कांग्रेस अधिवेशन के दौरान ही सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में अखिल भारतीय समझौता विरोधी सम्मेलन का आयोजन रामगढ़ के निकट बिहिटा में किया गया। इस सम्मेलन में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने मुख्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसका अनुमोदन सरदार शार्दूल सिंह कवीश्वर ने किया।
> अखिल भारतीय समझौता विरोधी सम्मेलन में कांग्रेस की नीतियों की कड़ी आलोचना की गयी तथा पूर्ण स्वराज की प्राप्ति हेतु जनता के अधिकार को प्रमुखता प्रदान की गयी।
> फारवर्ड ब्लाक का निर्माण इसी अधिवेशन के दौरान सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में किया गया। 
> प्रसिद्ध नेता एम. एन. राय ( मानवेंद्र नाथ राय ) ने इसी अधिवेशन में रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की आधारशिला रखी।
> व्यक्तिगत सत्याग्रह
> भारत की आजादी के लिए गाँधी जी द्वारा ब्रिटेन पर नैतिक दबाव बनाने हेतु व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ किया गया जिसमें विनोबा भावे प्रथम सत्याग्रही तथा जवाहर लाल नेहरू दूसरे चुने गये ।
 > इसी सत्याग्रह के दौरान गाँधी जी का अंतिम बार 1940 ई. में झारखण्ड आगमन हुआ। 
> इस सत्याग्रह के दौरान कई लोगों को झारखण्ड में गिरफ्तार किया गया।
> जमशेदपुर में माइकल जॉन के साथ कुछ अन्य लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया गया जिसके बाद जय प्रकाश नारायण, बसावन सिंह एवं शिवनाथ बनर्जी ने जमशेदपुर के गोलमुरी मैदान में एक जनसभा को संबोधित किया। इस सभा के बाद जय प्रकाश नारायण को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
> इस सत्याग्रह के दौरान संथाल परगना में महादेवी केजरीवाल ( जिला कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष मोतीलाल केजरीवाल की पत्नी) ने स्वयं को गिरफ्तार करने हेतु प्रस्तुत किया, परंतु उपायुक्त ने उन्हें गिरफ्तार न करके उनकी गतिविधियों पर नजर रखने का आदेश जारी किया।
> भारत छोड़ो आंदोलन
> 8 अगस्त, 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में 'भारत छोड़ो' प्रस्ताव पारित किया गया जिसके बाद गाँधी जी के नेतृत्व में एक अहिंसक आंदोलन चलाने का निर्णय लिया गया। 
> झारखण्ड में भी भारत छोड़ो आंदोलन में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस आंदोलन के दौरान विभिन्न स्थानों पर सभाओं का आयोजन, जुलूस प्रदर्शन, आवागमन व संचार साधनों को बाधा पहुँचाने जैसी गतिविधियाँ संचालित की गयीं।
> राँची
> 9 अगस्त, 1942 को राँची में हड़ताल रखा गया तथा 10 अगस्त, 1942 को नारायण चंद्र लाहिरी को राँची में गिरफ्तार कर लिया गया।
> 14 अगस्त, 1942 को राँची जिला स्कूल के पास जुलूस निकाल रहे छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके अतिरिक्त राँची के प्रमुख नेता जानकी बाबू, गणपत खंडेलवाल, मथुरा प्रसाद सहित कई नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया।
> 17 अगस्त, 1942 को राँची में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया गया जिसे अंग्रेज सैनिकों ने खदेड़ दिया तथा जिला कांग्रेस कमिटी के कोषाध्यक्ष शिवनारायण मोदी को गिरफ्तार कर लिया गया। 
> 18 अगस्त, 1942 को टाना भगतों ने विशुनपुर के निकट एक थाने को जला दिया।
> 22 अगस्त, 1942 को राहे में हड़ताल आयोजित किया गया तथा इटकी व टांगरबसली के बीच रेल पटरी को लोगों ने उखाड़ दिया। अंग्रेजों ने 22 अगस्त को पी. सी. मित्रा को गिरफ्तार कर लिया। 
> 28 अगस्त, 1942 को राँची की बिजली काट दी गयी तथा 30 अगस्त, 1942 को बालकृष्ण विद्यालय के रजिस्टर जला दिए गये ।
> इस आंदोलन के दौरान नवंबर, 1942 तक राँची में 200 से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था जिनमें आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले विमल दास गुप्ता, केशव दास गुप्ता, सत्यदेव साहू, किशोर भगत आदि शामिल थे।
> आंदोलन के दौरान लोहरदगा के नदिया उच्च विद्यालय में छात्रों द्वारा राष्ट्रीय झंडा फहराया गया था तथा गुमला में हड़ताल का आयोजन व जुलूस प्रदर्शन किया गया।
> हजारीबाग
> भारत छोड़ो आंदोलन के प्रारंभ होते ही 10 अगस्त, 1942 को हजारीबाग के नेता राम नारायण सिंह व सुखलाल सिंह को बंदी बना लिया गया। इन दोनों को हजारीबाग जेल में रखा गया था। 
> 11 अगस्त को हजारीबाग में सरस्वती देवी के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला गया। सरस्वती देवी को अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया।
> इस आंदोलन के दौरान सरस्वती देवी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके गिरफ्तारी के बाद विद्यार्थियों ने 12 अगस्त, 1942 को हजारीबाग से भागलपुर जेल ले जाते समय धावा बोलकर उन्हें पुलिस के हिरासत से मुक्त करा लिया। परन्तु 14 अगस्त, 1942 को एक जनसभा को संबोधित करने के दौरान पुनः गिरफ्तार की गयीं।
> 14 अगस्त को हजारीबाग के उपायुक्त कार्यालय पर से यूनियन जैक उतारकर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया। 
> इस आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण 9 नवंबर, 1942 को हजारीबाग सेन्ट्रल जेल से अपने पांच साथियों ( शालीग्राम सिंह, गुलाबी सोनार, रामानन्द मिश्र, सुरज नारायण सिंह तथा योगेन्द्र शुक्ल ) के साथ फरार हो गये।
> हजारीबाग जेल से जयप्रकाश नारायण व उनके साथियों के फरार होने के बाद जेल में बंद राम नारायण सिंह, कृष्ण वल्लभ सहाय तथा सुखलाल सिंह को भागलपुर जेल स्थानांतरित कर दिया गया। 
> पलामू
> 10 अगस्त, 1942 को ब्रिटिश सरकार ने डाल्टनगंज (मेदिनीनगर) स्थित कांग्रेस कार्यालय पर कब्जा कर लिया। 
> 11 अगस्त, 1942 को लोगों ने पलामू में जुलूस निकाला तथा जपला मजदूर संघ के सचिव मिथिलेश कुमार सिंह के नेतृत्व में जपला में मजदूरों ने हड़ताल रखी।
> 13 अगस्त, 1942 को पलामू में छात्रों ने एक विशाल जुलूस निकाला जिसके बाद नंदलाल प्रसाद व दशरथ राम समेत कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
> 17 अगस्त, 1942 को डाल्टनगंज डाकघर के निकट तोड़फोड़ की गयी जिसके बाद तोड़फोड़ में शामिल कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
> 18 अगस्त, 1942 को लातेहार में एक जुलूस निकाला गया तथा डाल्टेनगंज में विष्णु प्रसाद एवं गनौरी सिंह को एक वर्ष की सजा दी गयी।
> 19 अगस्त, 1942 को लेस्लीगंज थाने में कई लोगों ने धनुष प्रसाद सिंह के नेतृत्व में पहुँचकर तोड़फोड़ की जिसके बाद धनुष प्रसाद सिंह के साथ कई लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
> इस आंदोलन के दौरान अक्टूबर, 1942 तक पलामू के विभिन्न क्षेत्रों में लोगों ने व्यापक स्तर पर उत्पात मचाया जिसके बाद कई नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
> पलामू में कुमारी राजेश्वरी सरोज दास भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की तथा उन्होनें मजदूरों एवं किसानों को संगठित किया।
> सिंहभूम
> 10 अगस्त, 1942 को जमशेदपुर में पूर्ण हड़ताल रखा गया । 14 एवं 16 अगस्त को चक्रधरपुर एवं चाईबासा में ही हड़ताल का आयोजन किया गया।
> 15 अगस्त, 1942 को जमशेदपुर के प्रमुख नेता एम. के. घोष, एन. एन. बनर्जी, त्रेता सिंह सहित कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। 17 अगस्त को यहाँ एम. डी. मदन को गिरफ्तार किया गया।
> 30 अगस्त, 1942 की रात को कई लोगों को गिरफ्तार करने के साथ-साथ लोगों पर गोलियाँ चलायी गयी, जिसके विरोध में 31 अगस्त, 1942 को पूर्ण हड़ताल का आयोजन किया गया।
> रामानंद तिवारी के नेतृत्व में सिपाहियों ने जमशेदपुर में विद्रोह किया तथा इन्होनें जमशेदपुर में 60 सदस्यों की 'इन्कलाबी सिपाही दल' का गठन किया। ब्रिटिश सरकार ने कई लोगों व विद्रोह करने वाले 33 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार करके हजारीबाग जेल भेज दिया।
> 3 से 11 सितंबर, 1942 तक रामचंद्र पालिवाल तथा नैयर के नेतृत्व में सफाईकर्मियों ने हड़ताल की। 
> 15 सितंगर, 1942 को मुसाबनी में सी. पी. राजू, कमलानंदन व बस्टिन सहित कई मजदूर नेताओं को बंदी बना लिया गया।
> 17 सितंबर, 1942 को घाटशिला में मद्रासी व उड़िया मजदूरों द्वारा जुलूस निकाला गया। 
> मानभूम
> 9 अगस्त, 1942 को मानभूम क्षेत्र के नेता विभूति भूषण दासगुप्ता, वीर राघवाचार्य तथा पूर्णेन्दु भूषण मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया।
> 10 अगस्तर, 1942 को पी. सी. बोस, बैजनाथ प्रसाद व मुकुटधारी सिंह समेत कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
> 13 अगस्त, 1942 को अतुल चंद्र घोष को तथा 16 अगस्त, 1942 को समरेन्द्र मोहन राय सहित कई लोगों को गिरफ्तार किया गया।
> इस आंदोलन के दौरान मानभूम क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन, सभाओं का आयोजन, जुलूस प्रदर्शन, यातायात व संचार साधनों को अवरूद्ध करने जैसी गतिविधियाँ आंदोलनकारियों द्वारा की गयी। सरकार द्वारा स्थिति को नियंत्रित करने हेतु कतरास, झरिया व धनबाद में कर्फ्यू लगाने का निर्णय भी लिया गया। 
> संथाल परगना
> 11 अगस्त, 1942 को विनोदानन्द झा के नेतृत्व में देवघर में जुलूस निकाला गया। पुलिस ने इन्हें भिखना पहाड़ी से गिरफ्तार करके भागलपुर केन्द्रीय कारागार भेज दिया। 
> 13 अगस्त को गोड्डा कचहरी पर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया।
> 13-14 अगस्त, 1942 को आंदोलनकारियों ने विभिन्न स्थानों पर आवागमन व संचार साधनों को नष्ट कर दिया तथा सरकारी भवनों को नुकसान पहुँचाया। इसके बाद भारत सुरक्षा अधिनियम के तहत मोतीलाल केजरीवाल, रामजीवन व हिम्मत सिंह सहित कई नेताओं को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया।
> इस आंदोलन के दौरान देवघर के सरवण में आंदोलनकारियों द्वारा समानान्तर सरकार बनायी गयी। 
> दुमका में जांबवती देवी एवं प्रेमा देवी के नेतृत्व में 19 अगस्त, 1942 को विशाल जुलूस का आयोजन किया गया। 
> दुमका में कृष्णा प्रसाद ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया तथा इनके नेतृत्व में यहां 'पहाड़िया जत्था' का गठन किया गया। यह पहाड़िया जत्था 5 भागों में विभाजित था।
> 21 अगस्त, 1942 को गोड्डा जेल से लगभग 60 कैदी भाग गए।
> इस आंदोलन के दौरान प्रफुल्ल चंद्र पटनायक ने पहाड़िया सरदारों के सहयोग से आदिवासियों को बड़ी संख्या में आंदोलन में शामिल किया। इन्होनें गोड्डा, पाकुड़ व दुमका के बीच स्थित डांगपारा को अपना मुख्यालय बनाया।
> प्रफुल्ल चंद्र पटनायक से प्रभावित होकर एक परिवार का एकमात्र पुरुष सदस्य बादलमल पहाड़िया नामक एक युवा इस आंदोलन में शामिल हो गया। उसे पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया तथा गोड्डा जेल में दी गयी यातनाओं के कारण उसकी मृत्यु हो गयी ।
> 25 अगस्त, 1942 को संथाल एवं पहाड़िया जनजातियों ने अलुवेरा स्थित डाक बंगला तथा वन विभाग के भवनों को जला दिया, जिसके बाद सरकार द्वारा विभिन्न स्थानों पर सैनिकों को भेजा गया।
> इस आंदोलन के दौरान अंगेजी सरकार ने प्रफुल्ल चंद्र पटनायक और उनके तीन साथियों के ऊपर 200 रूपये  का इनाम घोषित किया था। 7 नवंबर, 1942 को प्रफुल्ल चंद्र पटनायक को गिरफ्तार करके अगले दिन राज. महल जेल भेज दिया गया। इन्हें 16 वर्ष कैद की सजा सुनायी गयी थी।
> इस आंदोलन के दौरान संथाल परगना में लगभग 900 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
> इस आंदोलन के दौरान हरिराम गुटगुनिया ने देवघर से 'साइक्लोस्टाइल बुलेटिन' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया गया।
> इस आंदोलन के दौरान वाचस्पति त्रिपाठी गिरफ्तार होने वाले संभवतः अंतिम नेता थे। इनकी गिरफ्तारी 22 अगस्त, 1943 को की गयी थी ।
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान झारखण्ड में प्रमुख महिलाएँ
महिला का नाम
आंदोलन
गतिविधि / अन्य तथ्य
• सरस्वती देवी
असहयोग आंदोलन
• सविनय अवज्ञा आंदोलन
• भारत छोड़ो आंदोलन
• जेल गयीं।
• गिरफ्तार की गयीं तथा 6 माह का कारावास मिला।
• हजारीबाग में जुलूस का नेतृत्व किया और जेल गयीं।
• शैलबाला राय
• सविनय अवज्ञा आंदोलन
• संथाल परगना क्षेत्र में आंदोलन का नेतृत्व किया।
• महादेवी केजरीवाल
• व्यक्तिगत सत्याग्रह
• दुमका में सत्याग्रह किया।
• प्रमा देवी व
• जांबवंती देवी
• भारत छोड़ो आंदोलन
• 14 अगस्त, 1942 को जुलूस का नेतृत्व किया व गिरफ्तार की गयीं।
• बिरजी देवी
• राजेश्वरी सरोज
• भारत छोड़ो आंदोलन
• 19 अगस्त, 1942 को पुलिस ने गोली मार दी।
• पलामू में मजदूरों का नेतृत्व किया तथा अंग्रेजों ने भारत रक्षा
कानून के तहत इन पर कार्रवाई की।
> अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
> अबुल कलाम आजाद की नजरबंदी
> ब्रिटिश सरकार ने होमरूल आंदोलन के दौरान मौलाना अबुल कलाम आजाद को राँची में नजरबंद करके रखा था। 
> ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता से अबुल कलाम आजाद को लाकर 31 मार्च, 1916 ई. से 27 दिसंबर, 1919 ई. तक राँची में नजरबंद रखा।
> प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार पर सरकारी जश्न के विरोध में मौलाना अबुल कलाम आजाद ने लोगों से काला बिल्ला लगाने की अपील की थी।
> 8 जुलाई, 1916 को ब्रिटिश प्रशासन की ओर से मौलाना आजाद को प्रतिदिन थाने में हाजिरी लगाने का आदेश दिया गया था।
> मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 1917 में राँची में अंजुमन इस्लामिया और मदरसा इस्लामिया की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
> मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपने अलबेलाग प्रेस को बेचकरप्राप्त राशि को मदरसा की स्थापना में लगा दिया था।
> पटना से राँची आने पर महात्मा गाँधी ने मौलाना अबुल कलाम आजाद से मिलने हेतु सरकार से इजाजत मांगी थी जिसे सरकार ने अस्वीकृत कर दिया था।
> 27 दिसंबर, 1919 को मौलाना आजाद को रिहा कर दिया गया जिसके बाद 3 जनवरी, 1920 को वे राँची से कलकत्ता के लिए प्रस्थान कर गए।
> रवीन्द्रनाथ टैगोर की नोबेल पुरस्कार प्राप्त रचना 'गीतांजली' में झारखण्ड की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक पृष्ठभूमि का भी चित्रण किया गया है। साथ ही इस पुस्तक के कुछ हिस्सों की रचना राँची में की गयी थी। 
> समग्र देश के साथ-साथ झारखण्ड में भी रॉलेट एक्ट तथा जालियांवाला बाग हत्याकांड का व्यापक विरोध किया गया। झारखण्ड में इसको गुलाब तिवारी ने नेतृत्व प्रदान किया।
> कृष्ण बल्लभ सहाय को 1923 में प्रांतीय लेजिस्लेटिव काउंसिल के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। 
> राष्ट्रीय आंदोलन के दो प्रमुख नेताओं - विनोदानन्द झा (1961-63 तक बिहार के मुख्यमंत्री) तथा कृष्ण वल्लभ सहाय (1963-67 तक बिहार के मुख्यमंत्री ) को भारतीय स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात बिहार के मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने का अवसर प्राप्त हुआ।
> मानभूम झण्डा सत्याग्रह
> 6-13 अप्रैल, 1945 को राष्ट्रीय सप्ताह घोषित किया गया था। मानभूम में कांग्रेस के नेता अतुल चंद्र घोष को राष्ट्रीय सप्ताह के दौरान कांग्रेसी झण्डा फहराने का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया। इसके परिणामस्वरूप लोगों ने झण्डा सत्याग्रह शुरू कर दिया।
> इसी प्रकार मई, 1945 में कांग्रेसी झण्डा फहराने का आरोप लगाकर 3 महिलाओं सहित 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
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Thu, 15 Jun 2023 19:51:08 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में जनजातीय विद्रोह https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-जनजातीय-विद्रोह https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-जनजातीय-विद्रोह

> ढाल विद्रोह (1767-1777)
> ढाल विद्रोह झारखण्ड प्रदेश में अंग्रेजों के विरूद्ध प्रथम विद्रोह था।
> ढाल विद्रोह का अर्थ है - 'ढाल राजा के नेतृत्व में संपूर्ण ढाल राज्य की जनता का विद्रोह । 
> अंग्रेजों ने सिंहभूम की दीवानी प्राप्त कर सिंहभूम के क्षेत्र को अपने अधिकार में ले लिया जिसके प्रतिक्रिया स्वरूप वहाँ के लोगों ने विद्रोह कर दिया।
> इस विद्रोह का प्रारंभ 1767 ई. में सिंहभूम क्षेत्र में हुआ जो 1777 ई. तक (10 वर्ष) चला।
> इस विद्रोह को ढालभूम के अपदस्थ राजा जगन्नाथ ढाल ने नेतृत्व प्रदान कर व्यापक स्वरूप प्रदान किया। 
> जगन्नाथ ढाल को अपदस्थ कर अंग्रेजों ने नीमू ढाल को ढालभूम का राजा बनाया था। इस विद्रोह का दमन करने के लिए कंपनी ने लेफ्टिनेंट रूक तथा चार्ल्स मैगन को भेजा, परन्तु ये अधिकारी विद्रोह का दमन करने में असफल रहे।
> 1777 ई. में कंपनी शासन द्वारा जगन्नाथ ढाल को राजा स्वीकार किए जाने के बाद यह विद्रोह समाप्त हो गया। 
> ढालभूम का राजा बनाये जाने के एवज में जगन्नाथ ढाल द्वारा अंग्रेजों को अधिकतम 4000 रूपये कर देना स्वीकार किया गया। 1780 ई. में इस राशि को बढ़ाकर 4267 रूपये कर दिया गया। 
> झारखण्ड में अंग्रेजों का प्रथम प्रवेश सिंहभूम की ओर से हुआ था ।
> चुआर विद्रोह (1769-1805)
> अंग्रेज जंगलमहल के भूमिजों को चुआर / चुआड़ (नीची जाति के लोग) कहते थे जिसके कारण इनके विद्रोह का नाम चुआर विद्रोह पड़ा।
> सामान्यतः चुआर लोग पशु-पक्षियों के शिकार, जंगलों में खेती व वनोत्पादों के व्यापार द्वारा अपना भरण-पोषण करते थे। इसके अलावा ये लोग स्थानीय जमींदारों के यहां सिपाही (पाइक) के रूप में कार्यरत थे। 
> अंग्रेजों द्वारा चुआरों की भूमि पर अवैध कब्जा कर जमींदारों को ब्रिकी करने, जमींदारों के लगान में अप्रत्याशित वृद्धि व लगान नहीं देने पर जमीन की नीलामी करने, बाहरी लोगों को इनके इलाके में बसाने, स्थानीय चुआरों के स्थान पर बाहरी पुलिस को उनके स्थान पर नियुक्त करने तथा अन्य आर्थिक मुद्दों के विरूद्ध यह विद्रोह किया गया।
> यह विद्रोह सिंहभूम, मानभूम, बाड़भूम एवं पंचेत राज्य में हुआ।
> घटवाल, पाइक एवं जमींदार समुदायों के समर्थन कारण इस विद्रोह में भूमिज जनजाति ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया
> इस विद्रोह ने व्यपाक रूप धारण कर लिया। 
> इस विद्रोह में श्याम गंजम, रघुनाथ महतो, सुबल सिंह, जगन्नाथ पातर (1769-71 तक); मंगल सिंह (1782-84 तक), लाल सिंह, दुर्जन सिंह व मोहन सिंह ( 1798-99 तक) ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। 
> दुर्जन सिंह मानभूम तथा बाड़भूम में इस विद्रोह के प्रमुख नेता थे।
> इस विद्रोह का प्रमुख नारा था – 'अपना गाँव अपना राज, दूर भगाओ विदेशी राज |
> ले. गुडयार, कैप्टन फोर्ब्स एवं मेजर क्रॉफ्ड को इस विद्रोह के दमन हेतु भेजा गया था।
> लगभग 30 वर्ष से अधिक समय तक इस अशांत क्षेत्र में शांति बहाल करने हेतु अंग्रेजों ने इस क्षेत्र के लोगों को कुछ सुविधाएँ देने का निर्णय लिया।
> 6 मार्च, 1800 ई. को एक प्रस्ताव द्वारा जमींदारी - घटवारी पुलिस व्यवस्था को पुर्नस्थापित किया गया जिसके तहत स्थानीय लोगों को पुलिस अधिकारियों के रूप में नियुक्ति की व्यवस्था की गयी। साथ ही पइकों की जब्त भूमि की वापसी व जमींदारों की भूमि की अवैध निलामी पर रोक का भी निर्णय लिया गया। 
> 1805 ई. में जंगलमहल जिला के निर्माण के बाद इस क्षेत्र में पुनः शांति व्यवस्था बहाल हुयी । 
> चेरो विद्रोह (1770-1819)
> प्रथम चरण (1770-71)
> उत्तराधिकार की इस लड़ाई में पलामू के चेरो राजा चित्रजीत राय ने अपने दीवान जयनाथ सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह कर दिया
> इस विद्रोह का मूल कारण अंग्रेजों द्वारा पलामू की राजगद्दी के दावेदार गोपाल राय को सर्मथन प्रदान करना था। 
> इस विद्रोह के प्रथम चरण का दमन जैकब कैमक द्वारा किया गया। चेरो विद्रोहियों को पराजित करने के बाद अंग्रेजों ने पलामू किले पर कब्जा कर लिया तथा 1 जुलाई, 1771 ई. को गोपाल राय को पलामू का राजा घोषित कर दिया।
> द्वितीय चरण ( 1800-19)
> इस विद्रोह का दूसरा चरण सन् 1800 में भुखन सिंह के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ।
> इसका कारण चेरो जनजाति के लोगों में ज्यादा कर वसूली तथा पट्टों के पुनः अधिग्रहण के खिलाफ व्याप्त असंतोष था।
> 1802 ई. में कर्नल जोंस के नेतृत्व में राजा भुखन सिंह को गिरफ्तार करके फाँसी दे दी गयी, जिसके बाद यह विद्रोह कमजोर पड़ने लगा।
> 1809 ई. में अंग्रेजों द्वारा इस विद्रोह का पूरी तरह दमन करने हेतु जमींदारी पुलिस बल का गठन किया गया। 
> 1813 ई. में चेरो राजा चूड़ामन राय द्वारा बकाया चुकाने में असमर्थता के कारण अंग्रेजों ने उसके राज्य को नीलाम कर दिया।
> 1815 ई. में अंग्रेजों ने नीलाम किये गए राज्य को देव के राजा धनश्याम सिंह से बेच दिया जिसके परिणामस्वरूप ऐतिहासिक चेरो राजवंश समाप्त हो गया। साथ ही धनश्याम सिंह ने जागीरदारों की जागीरदारी को भी राजस्व बढ़ाने के उद्देश्य से बेचना प्रारंभ कर दिया।
> उपरोक्त घटनाओं के परिणामस्वरूप चेरो जनजाति के लोग, जागीरदार एवं पूर्व के राजा व उनके समर्थकों ने सामूहिक रूप से अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह करने का निर्णय लिया तथा 1817 में अंग्रेजों के विरूद्ध पुनः एक व्यापक विरोध प्रारंभ हो गया।
> विद्रोह के इस दूसरे चरण का नेतृत्व चैनपुर के ठाकुर रामबख्श सिंह एवं रंका के शिव प्रसाद सिंह ने किया। 
> इसका विद्रोह का दमन करने हेतु अंग्रेजों ने रफसेज को नियुक्त किया जिसने कई जागीरदारों एवं विद्रोही नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद भी विद्रोह को दबाया नहीं जा सका।
> अंततः 1819 ई. में अंग्रेजों ने पलामू को नीलाम करने के नाम पर अपने अधिकार में ले लिया। 
> पलामू की निलामी के बाद अंग्रेजों ने इसके शासन की जिम्मेदारी भरदेव के राजा धनश्याम सिंह को सौंप दी।
> 1819 ई. में चेरों ने धनश्याम सिंह व अंग्रेजों के विरूद्ध पुनः विद्रोह कर दिया।
> भोगता विद्रोह (1770-1771)
>>यह विद्रोह चेरो विद्रोह के प्रथम चरण के समानान्तर प्रारंभ हुआ तथा उसके पूरक के रूप में संचालित हुआ।
> इस विद्रोह का नेतृत्व जयनाथ सिंह भोगता (चित्रजीत राय का दीवान) ने किया।
> विद्रोह का मुख्य कारण कंपनी द्वारा जयनाथ सिंह को पलामू किला छोड़ने संबंधी दिया जाने वाला आदेश था।
> यद्यपि जयनाथ सिंह कुछ शर्तों के साथ किला छोड़ने को तैयार था, परन्तु अंग्रेज इसे अनैतिक करार दे रहे थे। परिणामतः जयनाथ सिंह ने कंपनी के विरूद्ध विद्रोह कर दिया।
> इस विद्रोह में भोगता एवं चेरो ने साथ मिलकर अंग्रेजों से लोहा लिया।
> जयनाथ सिंह पराजित होकर सरगुजा भाग गया जिसके बाद अंग्रेजों द्वारा गोपाल राय को राजा घोषित कर दिया गया और विद्रोह समाप्त हो गया।
> घटवाल विद्रोह (1772-1773)
> घटवाल विद्रोह रामगढ़ के घटवालों द्वारा किया गया।
> रामगढ़ के राजा मुकुंद सिंह के राज्य पर उसके एक संबंधी तेज द्वारा अधिकार जताने पर अंग्रेजों ने तेज सिंह का समर्थन किया। परिणामतः अपने राजा मुकुंद सिंह के प्रति अंग्रेजों द्वारा किये गये इस दुर्व्यवहार के विरूद्ध घटवालों ने विद्रोह कर दिया।
> यह विद्रोह 25 अक्टूबर, 1772 को तब प्रारंभ हुआ जब रामगढ़ के राजा मुकुंद सिंह के राज्य पर कैप्टन कैमक की सेना ने दक्षिण की ओर से तथा उत्तर की ओर से तेज सिंह ने एक साथ धावा बोल दिया। इस आक्रमण में मुकुंद सिंह वहां से भाग निकला तथा घटवाल के लोगों से समर्थन की मांग की।
> घटवाल के लोगों ने मुकुंद सिंह का साथ दिया और कैमक का विरोध करने लगे। परन्तु जब घटवालों ने यह महसूस किया कि मुकुंद सिंह पुनः राजा नहीं बन सकता, तब उन्होनें मुकुंद सिंह का साथ छोड़ दिया। इस प्रकार यह विरोध बिना किसी विस्फोटक स्थिति उत्पन्न किये ही समाप्त हो गया।
> इस विद्रोह में छै व चंपा के राजा ने भी मुकुद सिंह का साथ दिया था।
> अंग्रेजों ने ठाकुर तेज सिंह को रामगढ़ का शासक घोषित कर दिया।
> तेज सिंह की मृत्यु के बाद पारसनाथ सिंह रामगढ़ का राजा बना।
> मुकुंद सिंह अपनी गद्दी खोने के बाद से कभी शांत नहीं रहा तथा वह लगातार अंग्रेजों का विरोध करता रहा। 
> रघुनाथ सिंह मुकुंद सिंह का समर्थक था । अंग्रेजों ने रघुनाथ सिंह से समझौता करना चाहा। परन्तु उसने इन्कार कर दिया जिसके परिणामस्वरूप एकरमेन और डेनियल के संयुक्त प्रयास से रघुनाथ सिंह गिरफ्तार कर चटगाँव भेज दिया गया।
> रामगढ़ में अशांत माहौल के कारण कैप्टन क्रॉफर्ड को रामगढ़ की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गयी। 
> रामगढ़ में अशांत माहौल के कारण रैयत पलायन करने लगे जिसे देखते हुए उपकलेक्टर जी. डलास ने सरकार से विनती की कि रामगढ़ के राजा को राजस्व वसूली से मुक्त कर दिया जाय और राजस्व वसूली के लिए प्रत्यक्ष बंदोबस्त की व्यवस्था की जाय।
> पहाड़िया विद्रोह (1772-1782)
> पहाड़िया जनजाति की तीन उपजातियाँ हैं
> माल पहाड़िया
> सौरिया पहाड़िया 
> कुमारभाग पहाड़िया
> सौरिया पहाड़िया मुख्यतः राजमहल, गोड्डा और पाकुड़ क्षेत्र में निवास करती है। पहाड़िया विद्रोह चार चरणों ( 1772, 1778, 1779, 1781-82) में घटित हुआ तथा सभी चरणों में इस विद्रोह के कारण भिन्न-भिन्न थे।
> 1772 ई. में यह विद्रोह तब प्रारंभ हुआ जब पहाड़िया जनजाति के प्रधान की नृशंस एवं विश्वासघाती हत्या मनसबदारों ने कर दी, जबकि पहाड़िया जनजाति के लोग राजमहल क्षेत्र में मनसबदारों के अधीन थे और मनसबदारों से उनके अच्छे संबंध थे। विद्रोह के इस चरण का नेतृत्व रमना आहड़ी ने किया।
> 1778 ई. में यह आंदोलन जगन्नाथ देव के नेतृत्व में प्रारंभ किया गया। जगन्नाथ देव ने पहाड़िया जनजाति
को अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त नकदी भत्ता को साजिश करार देते हुए उन्हें अंग्रेजों के विरूद्ध संगठित करने का प्रयास किया। अंग्रेजी सरकार के क्लीवलैंड द्वारा पहाड़िया जनजाति के लोगों को विश्वास में लेने हेतु इस प्रकार का नकदी भत्ता देने की घोषणा की गयी थी।
> 1779 ई. में इस विद्रोह का तीसरा चरण प्रारंभ हुआ।
> 1781-82 ई. में यह विद्रोह महेशपुर की रानी सर्वेश्वरी के नेतृत्व में प्रारंभ किया गया। यह विद्रोह 'दामिन-ए-कोह' के विरोध में किया गया था।
> 1790-1810 के बीच अंग्रेजों द्वारा इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में संथालों को आश्रय दिया गया तथा 1824 ई. में अंग्रेजों द्वारा पहाड़िया जनजाति की भूमि को 'दामिन-ए-कोह' का नाम देकर सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया गया। 
> तमाड़ विद्रोह (1782-1821)
> इस विद्रोह का प्रारंभ मुण्डा आदिवासियों ने अंग्रेजों द्वारा बाहरी लोगों को प्राथमिकता देने तथा नागवंशी शासकों के शोषण के विरूद्ध तमाड़ क्षेत्र में किया।
> यह अंग्रेजों के विरूद्ध सबसे लम्बा, वृहत्तम और सबसे खूनी आदिवासी विद्रोह था। 
> यह विद्रोह छः चरणों में संचालित हुआ।
> प्रथम चरण (1782-83)
> सन् 1782 में रामगढ़, पंचेत तथा वीरभूम के लोग भी तमाड़ में संगठित होने लगे तथा इस विद्रोह को मजबूती प्रदान की। इसका नेतृत्व ठाकुर भोलानाथ सिंह ने किया था।
> नागवंशी शासकों द्वारा इस विद्रोह को दबाने का प्रयास किया गया जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप विद्रोहियों ने अधिक आक्रामक रूख अख्तियार कर लिया। साथ ही इस विद्रोह को कुछ जमींदारों का भी समर्थन मिलना प्रारंभ हो गया।
> सन् 1783 के अंत में अंग्रेजी अधिकारी जेम्स क्रॉफर्ड द्वारा विद्रोहियों को आत्मसमर्पण हेतु विवश किये जाने के बाद यह विद्रोह अगले पांच वर्षों के लिए शांत हो गया।
> द्वितीय चरण (1789)
> पांच वर्षों बाद 1789 ई. में मुण्डाओं ने विष्णु मानकी तथा मौजी मानकी के नेतृत्व में कर देने से इंकार कर दिया जिसके बाद यह विद्रोह पुनः प्रारंभ हो गया।
> इस विद्रोह को दबाने हेतु कैप्टन होगन को भेजा गया जो असफल रहा।
> पुनः अन्य अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट कुपर को विद्रोह को शांत करने का दायित्व सौंपा गया तथा कुपर के प्रयासों के परिणामस्वरूप विद्रोह अगले चार वर्षों तक शांत रहा। 
> तृतीय चरण (1794-98)
> 1794 ई. में यह विद्रोह पुनः प्रारंभ हो गया तथा 1796 ई. में इसने व्यापक स्वरूप धारण कर लिया। 
> 1796 ई. में राहे के राजा नरेन्द्र शाही द्वारा अंग्रेजों का साथ दिये जाने के कारण सोनाहतू गाँव में आदिवासियों द्वारा नरेन्द्र शाही का विरोध किया गया।
> यह विद्रोह तमाड़ के ठाकुर भोलानाथ सिंह के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ था। इसके अतिरिक्त सिल्ली के ठाकुर विश्वनाथ सिंह, विशुनपुर के ठाकुर हीरानाथ सिंह, बुंडू के ठाकुर शिवनाथ सिंह एवं आदिवासी नेता रामशाही मुंडा ने भी इस विद्रोह में प्रमुखता से भाग लिया।
> विद्रोहियों द्वारा रिश्तेदार की हत्या किये जाने के बाद राहे के राजा नरेन्द्र शाही फरार हो गये। 
> 1798 ई. में कैप्टेन लिमण्ड द्वारा कई विद्रोहियों तथा कैप्टेन बेन द्वारा भोलानाथ सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया जिसके परिणामस्वरूप तमाड़ विद्रोह कमजोर पड़ गया। 
> चतुर्थ चरण (1807-08)
> 1807 ई. में दुखन मानकी के नेतृत्व में मुण्डा जनजाति के लोगों ने पुनः विद्रोह प्रारंभ कर दिया। 
> 1808 ई. में कैप्टन रफसीज के नेतृत्व में दुखन मानकी को गिरफ्तार किये जाने के बाद यह विद्रोह शांत पड़ गया। 
> पांचवां चरण (1810-12)
> 1810 ई. में नावागढ़ क्षेत्र के जागीरदार बख्तर शाह के नेतृत्व में यह विद्रोह पुनः प्रारंभ हो गया।
> इस विद्रोह के दमन हेतु अंग्रेजी सरकार द्वारा लेफ्टिनेंट एच. ओडोनेल को भेजा गया जिसने 1812 ई. में नावागढ़ पर हमला कर दिया। बख्तर शाह इस हमले से बचकर सरगुजा भाग गया जिसके बाद यह विद्रोह मंद पड़ गया।
> छठा चरण (1819-21)
> 1819 ई. में यह विद्रोह पुनः भड़क उठा जिसके सबसे प्रमुख नेता रूदन मुण्डा तथा कुंटा मुण्डा थे। इसके अतिरिक्त इसमें दौलतराय मुण्डा, मंगलराय मुण्डा, गाजीराय मुण्डा, मुचिराय मुण्डा, भदरा मुण्डा, झुलकारी मुण्डा, टेपा मानकी, शंकर मानकी, चंदन सिंह, घुन्सा सरदार आदि ने भी भाग लिया।
> तमाड़ के राजा गोविंद शाही द्वारा सहायता मांगे जाने पर अंगेज अधिकारी ई. रफसेज ने ए. जे. कोलविन के साथ मिलकर विद्रोह को दबाने का प्रयास किया। इस अभियान के फलस्वरूप रूदन मुण्डा व कुंटा मुण्डा को छोड़कर सभी प्रमुख विद्रोही नेता गिरफ्तार हो गये ।
> जुलाई, 1820 में रूदन मुण्डा तथा मार्च, 1821 में कुंटा मुण्डा के गिरफ्तार होने के साथ ही यह विद्रोह समाप्त हो गया।
तमाड़ विद्रोह के विभिन्न चरणों का संक्षिप्त विवरण
चरण अवधि
प्रमुख नेता
दमनकर्ता
1. 1782 - 83
ठाकुर भोलानाथ सिंह व मुण्डा समुह
मेजर जेम्स क्रॉफर्ड
2. 1789
विष्णु मानकी व मौजी मानकी
लेफ्टिनेंट कुपर
3. 1794 - 1798
ठाकुर भोलानाथ सिंह
कैप्टन लिमण्ड व बेन
4. 1807 - 1808
दुखन मानकी
कैप्टन रफसीज
5. 1810 - 1812
बख्तर शाह
ले० एच. ओडोनेल
6. 1819 - 1821
रूदन मुण्डा व कुंटा मुण्डा
रफसेज व कोलविन
> तिलका आंदोलन (1783-1785)
> तिलका आंदोलन की शुरूआत 1783 ई. में तिलका माँझी और उनके समर्थकों द्वारा की गयी थी । 
> यह आंदोलन अंग्रेजों के दमन व फूट डालो की नीति के विरोध में तथा अपने जमीन पर अधिकार प्राप्त करने हेतु किया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य था
» आदिवासी अधिकारों की रक्षा करना ।
» अंग्रेजों के विरूद्ध लड़ना ।
» सामंतवाद से मुक्ति प्राप्त करना ।
> इस आंदोलन का प्रमुख केन्द्र वनचरीजोर था, जो वर्तमान समय में भागलपुर के नाम से जाना जाता है। 
> झारखण्ड के संथाल परगना क्षेत्र में इस युद्ध का व्यापक प्रसार हुआ। 
> तिलका माँझी उर्फ जाबरा पहाड़िया ने इस आंदोलन को जन आंदोलन का स्वरूप दिया और अपने आंदोलन के प्रचार-प्रसार हेतु 'साल के पत्तों' का प्रयोग किया।
> इस आंदोलन के दौरान आपसी एकता को मजबूत बनाए रखने पर विशेष बल दिया गया। 
> इस विद्रोह में महिलाओं ने भी भाग लिया था।
> इस विद्रोह के दौरान 13 जनवरी, 1784 को तिलका माँझी ने तीर मारकर क्लीवलैंड * की हत्या कर दी। 
> क्लीवलैंड की हत्या के उपरांत अंग्रेज अधिकारी आयरकूट ने तिलका माँझी को पकड़ने हेतु व्यापक अभियान चलाया।
> अंग्रेजों द्वारा तिलका माँझी के खिलाफ कार्रवाई किए जाने पर तिलका माँझी ने छापामारी युद्ध ( गुरिल्ला युद्ध) का प्रयोग किया। छापामार युद्ध की शुरूआत तिलका माँझी द्वारा सुल्तानगंज पहाड़ी से की गयी थी।
> संसाधनों की कमी होने के कारण तिलका माँझी कमजोर पड़ गया तथा अंग्रेजों ने उसे धोखे से पकड़ लिया। पहाड़िया सरदार जउराह ने तिलका माँझी को पकड़वाने में अंग्रेजों का सहयोग किया। 1785 ई. में अंग्रेजों द्वारा तिलका माँझी को गिरफ्तार कर लिया गया।
> तिलका माँझी को 1785 में भागलपुर में बरगद के पेड़ से फाँसी पर लटका दिया गया। इस स्थान को उनकी की याद में बाबा तिलका माँझी चौक के नाम से जाना जाता है।
> झारखण्ड के स्वतंत्रता सेनानियों में सर्वप्रथम शहीद होने वाले सेनानी तिलका माँझी हैं।' (नोट:- तिलका माँझी अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह करने वाले प्रथम आदिवासी थे तथा इनके आंदोलन में महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण सहभागिता दर्ज की थी । )
> मुण्डा विद्रोह (1793-1832)
> झारखण्ड के इतिहास में मुण्डाओं के विद्रोहों की संख्या अनेक है, किन्तु बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में संचालित 'मुण्डा उलगुलान' इनमें सर्वाधिक संगठित और व्यापक स्वरूप का था।
> बिरसा मुण्डा के आंदोलन के पूर्व मुण्डाओं द्वारा अलग-अलग उद्देश्यों से निम्न विद्रोहों का संचालन किया गया: – 
1. 1793 ई. का बुण्डू एवं राहे का मुण्डा विद्रोह
2. 1796 का सिल्ली एवं राहे का मुण्डा विद्रोह
3. 1807 का तमाड़ का मुण्डा विद्रोह
4. 1819-20 में पलामू का मुण्डा विद्रोह
5. 1832 में बुद्ध भगत का विद्रोह
> 1793 ई. का बुण्डू एवं राहे का मुण्डा विद्रोह
> 1793 ई. का मुण्डा विद्रोह वास्तव में 1789 ई. में विष्णु मानकी * के नेतृत्व में संचालित तमाड़ विद्रोह का विस्तार था जिसका विस्तार बुण्डू और राहे में हुआ।
> इस विद्रोह का कारण बुण्डू और राहे के जमींदारों द्वारा नागवंशी राजाओं की अधीनस्थता को अस्वीकार करना था। 
> इस विद्रोह का दमन मेजर फॉलर द्वारा किया गया।
>1796 ई. का सिल्ली एवं राहे का मुण्डा विद्रोह
> 1796 ई. में सिल्ली एवं राहे के मुण्डा विद्रोह को रामशाही मुण्डा और ठाकुरदास मुण्डा ने नेतृत्व प्रदान किया। 
> इस विद्रोह के दौरान मुण्डाओं ने नरेन्द्र शाही तथा कुँवर लक्ष्मण शाही गढ़ों पर अधिकार कर लिया।
> 1807 ई. का तमाड़ का मुण्डा विद्रोह
>1807 ई. में तमाड़ में मुण्डा विद्रोह का नेतृत्व दुखन मानकी ने किया।
> इस विद्रोह का मुख्य उद्देश्य बन्दोबस्ती व्यवस्था का विरोध करना था।
> 1819-20 ई. का पलामू का मुण्डा विद्रोह
> पलामू में 1819-20 में भूकन सिंह के नेतृत्व में मुण्डा विद्रोह का संचालन हुआ।
> 1832 ई. में बुद्ध भगत का मुण्डा विद्रोह
> 1832 ई. के मुण्डा विद्रोह का नेतृत्व बुद्ध भगत ने किया।
> हो विद्रोह (1820-1821)
> 'हो देशम' (हो लोगों का निवास स्थान) पर कभी मुगलों या मराठों का प्रभाव स्थापित नहीं हो सका। 
> पोरहाट के राजाओं का इन पर कुछ प्रभाव होता था तथा वह हो जनजाति से नियमित कर की अपेक्षा करता था । 
> हो जनजाति के लोग स्वतंत्रता प्रिय व लड़ाका स्वभाव के थे तथा ये राजा को नियमित कर का भुगतान नहीं करते थे।
> पोरहाट के राजा जगन्नाथ सिंह ने हो जनजाति के लोगों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से 1820 ई. में मेजर रफसेज की एक सेना के साथ हो देशम में प्रवेश किया। जिसके परिणामस्वरूप हो जनजाति के लोगों ने पोरहाट के राजा व अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह कर दिया।
> चाईबासा के निकट 1820 में रोरो नदी के किनारे अंग्रेजों व हो लोगों के विरूद्ध एक युद्ध हुआ जिसमें मेजर रफसेज की सेना ने हो जनजाति के विद्रोह का दमन कर दिया।
> इस दमन के बाद ‘हो देशम' के उत्तरी क्षेत्र के लोगों ने पोरहाट के राजा को कर देना स्वीकार कर लिया, परंतु दक्षिणी भाग के लागों ने कर देने से मना कर दिया व उपद्रव मचाना शुरू कर दिया। 
> विवश होकर पोरहाट के राजा ने पुनः मेजर रफसेज से सहायता मांगी।
> रफसेज ने 1821 में कर्नल रिचर्ड के नेतृत्व में एक बड़ी सेना दक्षिणी भाग के हो लोगों को नियंत्रित करने हेतु भेजा जिसका एक माह तक हो लागों ने सामाना किया।
> अंग्रेजों के विरूद्ध सफलता सुनिश्चित होने की संभावना क्षीण देखकर हो लोगों ने अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने तथा राजा व जमींदारों को प्रति हल आठ आना वार्षिक कर देना स्वीकार किया।
> बाद में पुनः हो लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला तथा 1831-32 के कोल विद्रोह में ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।
> कोल विद्रोह (1831-1832)
> कोल विद्रोह झारखण्ड का प्रथम सुसंगठित तथा व्यापक जनजातीय आंदोलन था। अतः झारखण्ड में हुए विभिन्न जनजातीय विद्रोहों में इसका विशेष स्थान है।
> इस विद्रोह के प्रमुख कारण निम्नलिखत थे
» लगान की ऊँची दरें तथा लगान नहीं चुका पाने की स्थिति में भूमि से मालिकाना हक की समाप्ति » अंग्रेजों द्वारा अफीम की खेती हेतु आदिवासियों को प्रताड़ित किया जाना।
» जमींदारों व जागीरदारों द्वारा कोलों का अमानवीय शोषण और उत्पीड़न।
» दिकुओं (अंग्रेजों द्वारा नियुक्त बाहरी गैर आदिवासी कर्मचारी), ठेकेदारों व व्यापारियों द्वारा आदिवासियों का आर्थिक शोषण |
» अंग्रेजों द्वारा आरोपित विभिन्न प्रकार के कर ( उदाहरणस्वरूप 1824 में हड़िया पर लगाया गया 'पतचुई ' नामक कर ) ।
» विभिन्न मामलों के निपटारे हेतु आदिवासियों के परंपरागत 'पड़हा पंचायत व्यवस्था' के स्थान पर अंग्रेजी कानून को लागू किया जाना।
> इस विद्रोह के प्रारंभ से पूर्व सोनपुर परगना के सिंदराय मानकी के बारह गाँवों की जमीन छीनकर सिक्खों को दे दी गई तथा सिक्खों ने सिंगरई की दो बहनों का अपहरण कर उनकी इज्जत लूट ली। 
> इसी प्रकार सिंहभूम के बंदगाँव में जफर अली नामक मुसलमान ने सुर्गा मुण्डा की पत्नी का अपहरण कर उसकी इज्जत लूट ली।
> इन घटनाओं के परिणामस्वरूप सिंदराय मानकी व सुर्गा मुण्डा के नेतृत्व में 700 आदिवासियों ने उन गाँवों पर हमला कर दिया जो सिंदराय से छीन लिये गये थे।
> इस हमले की योजना बनाने हेतु तमाड़ के लंका गाँव में एक सभा का आयोजन किया गया था जिसकी व्यवस्था बंदगाँव के बिंदराय मानकी ने की थी। 
> इस हमले के दौरान विद्रोहियों ने जफर अली के गाँव पर हमला कर दिया तथा जफर अली व उसके दस आदमियों को मार डाला।
> यह विद्रोह 1831 ई. में प्रारंभ होने के अत्यंत तीव्रता से छोटानागपुर खास, पलामू, सिंहभूम एवं मानभूम क्षेत्र तक प्रसारित हो गया।
कोल विद्रोह के विभिन्न क्षेत्रों के प्रमुख नेता व दमनकर्ता
क्षेत्र
प्रमुख नेता
दमनकर्त्ता
छोटानागपुर खास
सिंदराय मानकी (सोनपुर परगना), बुद्ध भगत (सिल्ली)
बहादुर सिंह मुंडा (सिंदरी), लक्खी दास (कांची),
मोहन सिंह, गोठुल मुण्डा, जीत राय मुण्डा आदि
कै. विल्किंसन, कै. इम्पे
कै. माल्टवी, कै. जानसन
कै. हार्सबर्ग, मेजर ब्लैकॉल आदि
पलामू
दुखन शाही, चंवर सिंह (बरिआतू), सुरजन सिंह,
हारिल सिंह व हुक्म सिंह (जेरूआ) आदि
ले. कर्नल हॉटे, ले. मार्श,
कै. एण्डूज, ले. हैमिल्टन आदि
सिंहभूम
सुर्गा मुण्डा व बिंदराय मानकी (बंदगांव), दसई
मुण्डा व कार्तिक सरदार (कोचांग), मोहन मानकी,
सुइया मुण्डा (गोदरपिरी), सुगा मानकी आदि
कर्नल बोवेन, मेजर ब्लैकॉल आदि
मानभूम
विभिन्न भूमिज सरदार
एच. पी. रसेल, हार्सबर्ग आदि
> इस विद्रोह को मुण्डा, हो, चेरो, खरवार आदि जनजातियों का भी व्यापक समर्थन प्राप्त था। 
> इस विद्रोह में हो जनजाति के लोगों के समर्थन के कारण एस. आर. टिकेल ने इन्हें 'लरका कोल' से संबोधित किया।
> हजारीबाग में बड़ी संख्या में अंग्रेज सेना की मौजूदगी के कारण यह क्षेत्र इस विद्रोह से पूर्णतः अछूता रहा। 
> इस विद्रोह के प्रसार हेतु प्रतीक चिह्न के रूप में तीर का प्रयोग किया गया। 
> इस विद्रोह के प्रमुख नेता बुद्ध भगत (सिल्ली निवासी) अपने भाई, पुत्र व 150 साथियों के साथ विद्रोह के दौरान मारे गये। बुद्धु भगत को कैप्टन इम्पे ने मारा था।
> अंग्रेज अधिकारी कैप्टन विल्किंसन ने रामगढ़, बनारस, बैरकपुर, दानापुर तथा गोरखपुर की अंग्रेजी सेना की सहायता से इस विद्रोह का दमन करने का प्रयास किया।
> विभिन्न हथियारों व सुविधाओं से लैस अंग्रेजी सेना के विरूद्ध केवल तीर-धनुष से लैस विद्रोहियों ने दो महीने तक डटकर अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया।
> इस विद्रोह को दबाने में पिठोरिया के तत्कालीन राजा जगतपाल सिंह ने अंग्रेजों की मदद की थी जिसके बदले में तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम बेंटिक ने उन्हें 313 रूपये प्रतिमाह आजीवन पेंशन देने की घोषणा की। 
> 1832 ई. में सिंदराय मानकी तथा सुर्गा मुण्डा ( बंदगाँव, सिंहभूम निवासी) ने आत्मसमर्पण कर दिया जिसके पश्चात विद्रोह कमजोर पड़ गया।
> इस विद्रोह के बाद छोटानागपुर क्षेत्र में बंगाल के सामान्य कानून के स्थान पर 1833 ई. का रेगुलेशन - III लागू किया गया। साथ ही जंगलमहल जिला को समाप्त कर नन- रेगुलेशन प्रांत के रूप में संगठित किया गया। इसे बाद में दक्षिण-पश्चिम सीमा एजेंसी का नाम दिया गया।
> इस क्षेत्र के प्रशासन के संचालन की जिम्मेदारी गवर्नर जनरल के एजेंट के माध्यम से की जाने की व्यवस्था की गयी तथा इसका पहला एजेंट थॉमस विल्किंसन को बनाया गया।
> इस विद्रोह के बाद मुण्डा - मानकी शासन प्रणाली को भी वित्तीय व न्यायिक अधिकार भी प्रदान किए गये। 
> भूमिज विद्रोह (1832-1833)
> भूमिजों द्वारा जंगलमहल के क्षेत्र में लूटपाट करने के कारण उन्हें अंग्रेजों द्वारा चुआड़ कहा जाता था। 
> भूमिजों द्वारा संचालित ढालभूम के इस विद्रोह को गंगा नारायण द्वारा नेतृत्व प्रदान किया गया। अतः इस विद्रोह को ‘गंगा नारायण का हंगामा' की संज्ञा दी जाती है
> आदिवासियों में अत्यंत लोकप्रिय होने के कारण इस विद्रोह में गंगा नारायण को कोल विद्रोह के नेता बिंदराय मानकी का भी समर्थन प्राप्त हुआ।
> 1798 ई. में अंग्रेजों द्वारा उत्तराधिकार के नियमों की उपेक्षा कर गलत तरीके से गंगा गोविंद सिंह को बाड़भूम का राजा नियुक्ति किया। पूर्व में भी अंग्रेजों ने उत्तराधिकार के नियमों की उपेक्षा करके लक्ष्मण सिंह के स्थान पर रघुनाथ सिंह को राजा नियुक्त किया था व लक्ष्मण सिंह को जेल में डाल दिया था जहां उसकी मृत्यु हो गयी थी।
> नवनियुक्त राजा ने जनता पर विभिन्न अनैतिक कर आरोपित कर दिये, जिससे जनता में राजा के प्रति असंतोष फैलने लगा।
> इसके अतिरिक्त बाड़भूम के दीवान माधव सिंह ( राजा गंगा गोविंद सिंह का सौतेला भाई) ने चालाकी से अपने चचेरे भाई गंगा नारायण (लक्ष्मण सिंह का पुत्र ) को मिलने वाली जागीर बंद करवा दी। गंगा नारायण ने अपनी जागीर प्राप्ति हेतु कंपनी शासन से बार-बार आग्रह किया जिसकी हर बार अनदेखी की गयी।
> इस प्रकार विद्रोह का प्रमुख कारण उत्तराधिकार के नियमों की अनदेखी जनता पर अनैतिक कर, दिकुओं द्वारा जनता का शोषण व गंगा नारायण के साथ हुआ अत्याचार था।
> गंगा नारायण ने बदला लेने के उद्देश्य से भूमिजों को संगठित किया तथा दीवान माधव सिंह की 26 अप्रैल, 1832 ई. को हत्या कर दी जिसके परिणामस्वरूप भूमिज विद्रोह का आगाज हो गया।
> इसके बाद गंगा नारायण ने घटवालों की एक बड़ी सेना के साथ संपूर्ण राज्य पर कब्जा करने के उद्देश्य से बाड़भूम पर चढ़ाई कर दी। इस अभियान में सूरा नायक, बुली महतो, गर्दी सरदार आदि गंगा नारायण के प्रमुख सहयोगी थे।
> इस अभियान के दौरान गंगा नारायण ने बड़े पैमाने पर उपद्रव मचाया तथा मई, 1832 में रसेल के नेतृत्ववाली तथा नवंबर, 1832 में ब्रैडन व ट्रिमर के नेतृत्ववाली अंग्रेजी सेना पर सफलतापूर्वक हमला कर दिया। 
> गंगा नारायण द्वारा अंग्रेजों पर इस सफल हमले के बाद नवंबर, 1832 में ही अंग्रेज अधिकारी डेन्ट ने एक विशाल सेना के साथ गंगा नारायण व उनके साथियों के विरुद्ध अभियान चलाया तथा इनके कई गढ़ों को
नष्ट कर दिया। इसके परिणामस्वरूप भूमिज विद्रोह कमजोर पड़ गया।
> गंगा नारायण अपने समर्थकों के साथ सिंहभूम चला गया तथा कोल लड़ाकों के साथ मिलकर उसने खरसावां के चेतन सिंह के राज्य पर धावा बोल दिया। 
> 7 फरवरी, 1833 को खरसावां के ठाकुर चेतन सिंह के विरूद्ध लड़ते समय गंगा नारायण की मृत्यु हो गयी जिसके बाद यह विद्रोह कमजोर पड़ गया।
> खरसावां के ठाकुर चेतन सिंह ने गंगा नारायण का सर काटकर कैप्टन विल्किंसन को भेज दिया जिसके बदले ठाकुर चेतन सिंह को इनामस्वरूप 5,000 रूपये मिले। गंगा नारायण की मृत्यु के साथ ही इस विद्रोह का अंत हो गया।
> इस विद्रोह का प्रसार मुख्यतः सिंहभूम व वीरभूम क्षेत्र में था।
> इस विद्रोह के बाद जंगलमहल क्षेत्र में व्यापक प्रशासनिक परिवर्तन किया गया। 1833 ई. के रगुलेशन-XIII के तहत राजस्व नीति में परिवर्तन किया गया तथा जंगलमहल जिला को समाप्त कर दिया गया।
> संथाल विद्रोह  (1855-1856)
> इस विद्रोह को हूल विद्रोह, संथाल हूल, सिद्धू - कान्हू  का विद्रोह आदि नामों से भी जाना जाता है। 
> जनजातीय भाषा में हूल का अर्थ क्रांति / बगावत  होता है।
> इस विद्रोह को संथाल परगना की प्रथम जनक्रांति भी कहा जाता है।
> काल मार्क्स ने संथाल विद्रोह को भारत की प्रथम जनक्रांति की संज्ञा दी है।
> इसे मुक्ति आंदोलन के नाम भी जाना जाता है।
> इस विद्रोह को सिद्धू-कान्हू , चांद - भैरव तथा फूलो-झानों ने प्रारंभ किया। ये सभी आपस में भाई-बहन थे। 
> संथाल परगना क्षेत्र में 1790 ई. तक संथालों का निवास नहीं था । विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे शोषण से मुक्ति हेतु इन्होनें संथाल परगना के क्षेत्र को अपना निवास स्थान बनाया। 1815-30 के बीच सर्वाधिक संख्या में संथालों का इस क्षेत्र में आगमन हुआ।
> इस क्षेत्र में बसे संथालों का धीरे-धीरे विभिन्न प्रकार से शोषण प्रारंभ हो गया। जमींदारों द्वारा लगान की ऊँची दरें, महाजनों द्वारा अत्यधिक ब्याज दर पर ऋण, संथाल महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, ब्रिटिश सरकार (पुलिस व न्याय व्यवस्था) द्वारा संथालों का शोषण आदि इसके विभिन्न स्वरूप थे।
> इसके अतिरिक्त भागलपुर से वर्द्धमान के बीच रेल लाइन बिछाने हेतु संथालों को बेगार करने हेतु विवश किया गया तथा बेगार करने से मना करने पर इन्हें शारीरिक दण्ड दिया जाने लगा।
> इस विद्रोह का प्रारंभ 1855 ई. * में तब प्रारंभ हुआ जब संथालों ने अंग्रेजी उपनिवेशवाद तथा अंग्रेजों व गैर-आदिवासियों के शोषण के खिलाफ संघर्ष छेड़ने का निर्णय लिया।
> विद्रोह के प्रारंभ से पूर्व एक स्थानीय साहूकार ने अपने घर में मामूली चोरी के आरोप में दिधी थाने के दारोगा महेशलाल दत्त की सहायता से संथालों को गिरफ्तार करवा दिया तथा जेल में विजय माँझी नामक एक संथाल की मौत हो गयी। एक संथाल ने आक्रामक रूख दिखाते हुए दारोगा की हत्या कर दी जिसका सभी संथालों ने समर्थन किया।
> इसके बाद 30 जून, 1855 को भोगनाडीह गाँव में लगभग 400 गाँवों के 6,000 से अधिक आदिवासियों ने एक सभा की जिसमें 'अपना देश, अपना राज' का नारा दिया गया तथा विद्रोह का बिगुल फूंका गया। ( 30 जून को 'हूल दिवस' के रूप में मनाया जाता है।)
> इस सभा में सिद्धू को राजा, कान्हू को मंत्री, चांद को प्रशासक तथा भैरव को सेनापति नियुक्त किया गया। 
> इस सभा में सिद्धू-कान्हू ने यह घोषणा की कि 'भगवान ने उन्हें निर्देश दिया है कि आजादी के लिए अब हथियार उठा लो।' इसके साथ ही उन्होनें भविष्यवाणी की कि 'अब विदेशी शासन का अंत होने वाला है तथा अंग्रेज व उनके समर्थक गंगा पार लौटकर आपस में लड़ मरेंगे।'
> इस विद्रोह का प्रारंभ संथाल परगना क्षेत्र से हुआ तथा यह धीरे-धीरे हजारीबाग, वीरभूम एवं छोटानागपुर आदि क्षेत्रों तक विस्तृत हो गया।
> हजारीबाग में इस विद्रोह का नेतृत्व लुबाई माँझी एवं अर्जुन माँझी ने तथा वीरभूम में गोरा माँझी ने किया। 
> इस विद्रोह के दौरान 'जमींदार, महाजन, पुलिस एवं सरकारी कर्मचारी का नाश' नामक नारा भी दिया गया।
> इस विद्रोह का दमन करने हेतु 7 जुलाई, 1855 को जनरल लायड के नेतृत्व में सेना की एक टुकड़ी भेजी गयी, परन्तु सेना का मेजर बारो संथालों के साथ युद्ध में पराजित हो गया।
> 16-17 सितंबर, 1855 को सुंदरा व रामा माँझी तथा मुचिया कोमनाजेला के नेतृत्व में लगभग 3000 विद्रोहियों ने कई थानों व गांवों पर कब्जा कर लिया। करहरिया थाने के दरोगा प्रताप नारायण की हत्या कर दी गई। 
> इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने 13 नवंबर, 1855 को उपद्रव वाले इलाकों में मार्शल लॉ लागू कर दिया तथा विद्रोही नेता को पकड़ने पर 10,000 रूपये का इनाम घोषित कर दिया।
> अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबाने हेतु क्रूरतापूर्ण कदम उठाया तथा दिसंबर, 1855 में सिद्धू मुर्मू को गिरफ्तार कर लिया। भागलपुर न्यायालय में उस पर मुकदमा चलाने के बाद 5 दिसंबर, 1855 को फाँसी की सजा दे दी गयी ।
> इसके बाद चाँद व भैरव को बड़हैत में अंग्रेजों ने गोली मार दी। फरवरी, 1856 में कान्हु भी पकड़ा गया तथा उसे 23 फरवरी, 1856 को अपने ही भोगनाडीह गाँव के ठाकुरबाड़ी परिसर में फाँसी पर लटका दिया गया। 
> इस विद्रोह को दबाने में अंग्रेजी अधिकारी कैप्टन अलेक्जेंडर, लफ्टिनेंट थामसन एवं लफ्टिनेंट रीड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
> इस विद्रोह में 50 हजार से अधिक संथाली पुरूष - महिलाओं ने भागीदारी की जिसमें से 15 हजार से अधिक लोग मारे गये।
> इस विद्रोह का प्रसार संथाल परगना के अलावा हजारीबाग ( नेतृत्वकर्ता - जुबाई माँझी व अर्जुन माँझी) व वीरभूम (नेतृत्वकर्त्ता - गोरा माँझी) क्षेत्र में भी था।
> अंग्रेजों ने इस विद्रोह के दौरान संथाल विद्रोहियों से बचाव हेतु पाकुड़ में मार्टिलो टावर का निर्माण कराया था।
> संथाल विद्रोहियों ने पाकुड़ की रानी क्षेमा सुंदरी से इस विद्रोह के दौरान सहायता मांगी थी।
> इस विद्रोह के दमन के उपरांत संथाल क्षेत्र को 30 नवंबर, 1856 को नान- रेगुलेशन नामक अलग जिला बना दिया गया, जिसमें यूरोपीय मिशनरियों के अलावा किसी भी बाहरी को प्रवेश की इजाजत नहीं थी। 
> संथाल परगना जिला का प्रथम जिलाधीश एशली एडेन था।
> एलिस एडम्स की रिपोर्ट के आधार पर 1855 के एक्ट-37 के अनुसार 'दामिन-ए- कोह' का नाम परिवर्तित करके संथाल परगना कर दिया गया तथा इसकी नयी सीमाओं का निर्धारण करते हुए दुमका, देवघर, गोड्डा व राजमहल नामक चार उपजिले बनाए गये।
> 1856 ई. में संथाल परगना में भागलपुर के कमिश्नर जार्ज यूल की सहायता से 'यूल रूल' नामक नए पुलिस कानून की व्यवस्था की गयी। इसके तहत पारंपरिक ग्राम प्रधान की व्यवस्था लागू करते हुए ग्राम प्रमुख को पुलिस की शक्तियाँ प्रदान की गयी ।
> इस विद्रोह में व्यापक नरसंहार होने के कारण इसे 'खूनी विद्रोह' भी कहा जाता है।
> सरदारी आंदोलन (1858-1895)
> इस आंदोलन को 'मुल्की व मिल्की (मातृभूमि व जमीन) का आंदोलन' भी कहा जाता है।
> 1831-32 के कोल विद्रोह के समय कोल सरदार असम के चाय बगानों में काम करने हेतु चले आए थे। काम करने के बाद जब वे अपने गाँव लौटे तो पाया कि उनकी जमीनों को दूसरे लोगों ने हड़प लिया है तथा वे जमीन वापस करने से इनकार कर रहे थे।
> इसी हड़पे गये जमीन को वापस पाने हेतु कोल सरदारों ने लगभग 40 वर्षों तक आंदोलन किया। साथ ही बलात् श्रम लागू करना तथा बिचौलियों द्वारा गैर-कानूनी ढंग से किराये में वृद्धि करना भी इस आंदोलन के कारणों में शामिल था। 
> इस आंदोलन में कोल सरदारों को उराँव व मुण्डा जनजाति का भी समर्थन प्राप्त हुआ।
> अलग-अलग उद्देश्यों के आधार पर इस आंदोलन के तीन चरण परिलक्षित होते हैं प्रथम चरण भूमि आंदोलन के रूप में (1858-81 ई. तक), द्वितीय चरण पुनर्स्थापना आंदोलन के रूप में (1881-90 ई. तक) तथा तीसरा चरण राजनैतिक आंदोलन के रूप में (1890-95 ई. तक ) ।
>  प्रथम चरण (1858-81 ई.)
> आंदोलन का यह चरण अपनी हड़पी गयी भूमि को वापस पाने से संबंधित था। अतः इसे भूमि आंदोलन कहा जाता है।
> यह आंदोलन छोटानागपुर खास से शुरू हुआ तथा दोइसा, खुखरा, सोनपुर और वसिया इसके प्रमुख केन्द्र थे।
> इस आंदोलन का तेजी से प्रसार होने के परिणामस्वरूप सरकार द्वारा भुईहरी ( उराँवों की जमीन) काश्त के सर्वेक्षण हेतु लाल लोकनाथ को जिम्मेदारी प्रदान की गयी। L
> इस सर्वेक्षण के आधार पर सरकार ने भूमि की पुनः वापसी हेतु 1869 ई. में छोटानागपुर टेन्यूर्स एक्ट लागू किया। इस कानून में पिछले 20 वर्षों में रैयतों से छीनी गयी भुईहरी व मंझियस भूमि ( जमींदारों की भूमि ) को वापस लौटाने का प्रावधान था।
> इस कानून को लागू करते हुए 1869-80 तक भूमि वापसी की प्रक्रिया संचालित रही जिससे कई गांवों के रैयतों को अपनी जमीनें वापस मिल गयीं। परंतु राजहंस (राजाओं की जमीन), कोड़कर (सदानों की जमीन) व खूँटकट्टी (मुण्डाओं की जमीन) की बन्दोबस्ती का प्रावधान इस कानून में नहीं होने के कारण सरदारी लोग पूर्णत: संतुष्ट नहीं हो सके।
> द्वितीय चरण (1881-90 ई.)
> आंदोलन के इस चरण का मूल उद्देश्य अपने पारंपरिक मूल्यों को फिर से स्थापित करना था। अतः इसे पुनर्स्थापना आंदोलन कहा जाता है।
> तृतीय चरण ( 1890-95 ई.)
> इस चरण में आंदोलन का स्वरूप राजनैतिक हो गया।
> आदिवासियों ने अपनी हड़पी गयी जमीनें वापस पाने हेतु विभिन्न इसाई मिशनरियों, वकीलों आदि से बार-बार सहायता मांगी। परंतु सहायता के नाम पर इन्हें हर बार झूठा आश्वासन दिया गया। परिणामत: आदिवासी इनसे चिढ़ने लगे।
> ब्रिटिश शासन द्वारा दिकुओं व जमींदारों का साथ देने के कारण आदिवासियों का अंग्रेजी सरकार पर भी भरोसा नहीं रहा।
> परिणामतः आदिवासियों ने 1892 ई. में मिशनरियों व ठेकेदारों को मारने का निर्णय लिया। परंतु मजबूत नेतृत्व के अभाव में वे इस कार्य में सफल नहीं हो सके।
> बाद में बिरसा मुण्डा का सफल नेतृत्व की चर्चा होने के बाद सरदारी आंदोलन का विलय बिरसा आंदोलन में हो गया।
> साफाहोड़ आंदोलन (1870 )
> साफाहोड़ का अर्थ होता है - 'सिंगबोंगा के प्रति समर्पण । '
> इस विद्रोह के अंतर्गत लाल हेम्ब्रम उर्फ लाल बाबा ने आदिवासियों के धार्मिक व चारित्रिक उत्थान पर बल दिया।
> लाल बाबा ने इस आंदोलन में शामिल लोगों को 'राम-नाम' का मंत्र दिया तथा मांस-मदिरा के सेवन से रोका।
> इस आंदोलन के दौरान लाल बाबा ने संथाल परगना में 'देशोद्धारक दल' की स्थापना की।
> इस आंदोलन में लाल बाबा को पैका मुर्मू, पगान मरांडी, रसिक लाल सोरेन तथा भतू सोरेन का सहयोग प्राप्त था। बंगम माँझी * भी इस विद्रोह के एक प्रमुख नेता थे।
> इस आंदोलन का संबंध मूलतः संथाल जनजाति * से है। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य संथालों में धार्मिक पवित्रता पर बल देना था।
> खरवार आंदोलन (1874)
> खरवार, संथालों की ही एक उपजाति है तथा ये प्राचीन काल को अपना स्वर्ण युग मानते थे एवं अपने प्राचीन मूल्यों को पुनः स्थापित करना चाहते थे।
> इस प्रकार परंपरागत मूल्यों की पुनर्स्थापना हेतु यह एक जनजातीय सुधारवादी आंदोलन था। इस आंदोलन के दौरान एकेश्वरवाद व सामाजिक सुधार पर विशेष जोर दिया गया।
> इस आंदोलन की भागीरथ माँझी * उर्फ बाबा के नेतृत्व में शुरूआत 1874 * ई. में संथाल परगना क्षेत्र में हुई। भागीरथ माँझी का जन्म गोड्डा के तलडीहा गाँव में हुआ था।
> भागीरथ माँझी द्वारा नेतृत्व प्रदान किए जाने के कारण इसे 'भागीरथ माँझी का आंदोलन' भी कहा जाता है। 
> आंदोलन के दौरान भागीरथ माँझी ने स्वयं को बौंसी गाँव का राजा घोषित किया तथा ब्रिटिश सरकार/जमींदारों को कर नहीं देने की अपील करते हुए खुद लगान प्राप्त करने की व्यवस्था प्रारंभ की।
> इस आंदोलन के दौरान जनजातीय लोगों में सुधार हेतु निम्न विचारों का प्रचार-प्रसार किया गया
» सूर्य एवं दुर्गा की उपासना के अतिरिक्त अन्य किसी भी देवी-देवता की उपासना का परित्याग। 
» सुअर, मुर्गा, हड़िया व नाचने-गाने का परित्याग ।
» सिद्धू-कान्हू (संथाल विद्रोह के नेता) के जन्म स्थल को तीर्थ स्थल के रूप में मान्यता।
» संथाल विरोधियों का प्रतिकार तथा उपपंथो की संख्या को बारह तक सीमित करना।
» उपासकों का साफाहोड़ (समर्पण के साथ उपासना करने वाले), भिक्षुक / बाबाजिया (उदासीनता के साथ उपासना करने वाले) तथा मेल बरागर ( बेमन से उपासना करने वाले) में वर्गीकरण |
> इस आंदोलन की व्यापकता को देखते हुए अंग्रेज सरकार ने भागीरथ माँझी एव उनके सहयोगी ज्ञान परगनैत को गिरफ्तार कर लिया।
> नवंबर, 1877 में दोनों को रिहा कर दिया गया जिसके बाद यह आंदोलन संथाल परगना से होते हुए हजारीबाग तक फैल गया। हजारीबाग में इस आंदोलन का नेतृत्व दुबु बाबा ने किया।
> खरवार आंदोलन का दूसरा चरण दुविधा गोसांई के नेतृत्व में 1881 ई. की जनगणना के खिलाफ प्रारंभ किया गया। परंतु ब्रिटिश सरकार द्वारा दुविधा गोसांई की गिरफ्तारी के बाद यह आंदोलन समाप्त हो गया।
> बिरसा आंदोलन (1895-1900)
> इस आंदोलन को 'मुण्डा उलगुलान * भी कहा जाता है। उलगुलान का तात्पर्य है  हलचल। विद्रोह या महान
>19वीं सदी में हुए सभी आदिवासी आंदोलनों में यह सर्वाधिक व्यापक तथा संगठित आंदोलन था।
> इस आंदोलन का प्रारंभ 1895 ई. में बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में हुआ।
> इस विद्रोह का प्रारंभिक स्वरूप सुधारवादी था। यद्यपि यह आंदोलन राजनीतिक (स्वतंत्र मुण्डा राज की स्थापना), धार्मिक (इसाई मुण्डाओं को वापस अपने धर्म में लाना) एवं आर्थिक (मुण्डाओं की जमीन पर पुनः अधिकार स्थापित करना) उद्देश्यों से भी प्रेरित था।
> इस आंदोलन का प्रमुख कारण निम्नलिखित थे
>> खूँटकट्टी व्यवस्था की समाप्ति से उत्पन्न बेरोजगारी की समस्या |
>> मिशनरियों द्वारा भूमि सुधार संबंधी झूठे आश्वासन।
>> मुण्डाओं की समस्याओं की समस्या के प्रति अदालतों की उदासीनता ।
>> 1894 ई. का छोटानागपुर वन सुरक्षा कानून के लागू होने से आदिवासियों के जीवन निर्वाह साधनों पर संकट ।
> 1895 ई. में बिरसा मुण्डा ने 'सिंगबोंगा धर्म' का प्रतिपादन करते हुए लोगों को धार्मिक स्तर पर संगठित करने का प्रयास किया तथा विभिन्न बोंगाओं (देवताओं) के स्थान पर सिंगबोंगा की अराधना करने पर जोर दिया। 
> बिरसा मुण्डा ने स्वयं को 'सिंगबोंगा का दूत' घोषित किया और इस बात का प्रचार किया कि सिंगबोंगा द्वारा उन्हें किसी भी रोग को ठीक करने की चमत्कारिक शक्ति प्राप्त है।
> इस प्रकार प्रारंभ में इस विद्रोह का प्रमुख उद्देश्य सिंगबोंगा देवता की अराधना एवं उनके प्रति समर्पण के रूप में एकेश्वरवाद का विकास था।
> बिरसा आंदोलन का मुख्यालय खूँटी था।
> इस विद्रोह के समय राँची का उपायुक्त स्ट्रेटफील्ड था।
> इस आंदोलन में गया मुण्डा (सेनापति), दोन्का मुण्डा ( राजनीतिक शाखा प्रमुख ) तथा सोमा मुण्डा ( धार्मिक-सामाजिक शाखा प्रमुख) ने प्रमुख सहयोगी बनकर इस आंदोलन को विस्तारित किया।
> बिरसा मुण्डा के आंदोलन में गया मुण्डा की पत्नी मनकी मुण्डा ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। 
> मुण्डा आंदोलन के समय 'कटोंग बाबा कटोंग' नामक गीत प्रमुख था। साथ ही इस आंदोलन के दौरान 'अबुआ राज एटेजाना, महारानी राज टुंडू (अब मुण्डा राज प्रारंभ हो गया है तथा महारानी का राज समाप्त हो गया है)' का ऐलान भी किया।
> इस विद्रोह के दौरान बिरसा मुण्डा को दो बार डोरंडा कारागार (राँची) में बंदी बनाकर रखा गया:–
1. पहली बार 24.08.1895 से 30.11.1897 तक (अंग्रेज अधिकारी मेयर्स द्वारा गिरफ्तारी ) ब्रिटिश सरकार के खिलाफ षड्यंत्र के आरोप में गिरफ्तारी । -
2. दूसरी बार 03.02.1900 से 09.06.1900 तक
> पहली बार गिरफ्तार किए जाने के बाद 30 नवंबर, 1897 को महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती के अवसर पर बिरसा मुण्डा को रिहा कर दिया गया था।
> रिहा होने के पश्चात् बिरसा मुण्डा ने पुनः लोगों को संगठित करना शुरू किया तथा गाँव-गाँव घूमकर लोगों को हथियारबंद करना प्रारंभ कर दिया।
> 24 दिसंबर, 1899 को बिरसा मुण्डा ने डुंबारू मुरू में आयोजित एक सभा में अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह करने का ऐलान किया तथा 25 दिसंबर, 1899 को वास्तविक रूप से विद्रोह प्रारंभ हो गया।
> इस बार बिरसा मुण्डा ने ठेकेदारों, हाकिमों, जागीरदारों व इसाईयों को मारने की अपील की। बिरसा मुण्डा ने घोषणा की कि ‘दिकुओं से अब हमारी लड़ाई होगी तथा उनके खून से जमीन इस तरह लाल होगी जैसे लाल झंडा' ।
> इसके बाद इनके अनुयायियों ने आक्रमकता दिखाते हुए गिरिजाघरों में आग लगाना प्रारंभ कर दिया। 
> देश के विभिन्न समाचार-पत्रों ने बिरसा मुण्डा के आंदोलन का समर्थन किया तथा इसके संबंध में समाचारों का प्रकाशन किया। इसमें सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का 'बंगाली' नामक समाचार-पत्र प्रमुख था।
> बिरसा के विद्रोहियों ने 1900 ई. में डोम्बारी पहाड़ी (सैल रकब पहाड़ी) पर स्थित पुलिस पर हमला कर दिया, परंतु अंग्रेज अधिकारी फारबेस व स्ट्रीट फील्ड के नेतृत्व में पुलिस ने विद्रोहियों पर जांति की तर्ज पर भयंकर गोलीबारी की एवं विद्रोहियों को पराजित कर दिया। 
> बिरसा मुण्डा को पकड़वाने हेतु अंग्रेजों ने 500 रूपये का ईनाम घोषित किया था। 
> बंदगांव के जगमोहन सिंह के शागिर्द वीर सिंह महली के कहने पर अंग्रेजों द्वारा 3 मार्च, 1900 को चक्रधरपुर के जमकोपाई जंगल में सोते समय बिरसा मुण्डा को गिरफ्तारी कर लिया गया। *
> 9 जून, 1900 ई. को राँची जेल में हैजा की बीमारी से बिरसा मुण्डा की मृत्यु हो गयी।
> इस आंदोलन में शामिल 300 मुण्डा विद्रोहियों पर ब्रिटिश सरकार ने मुकदमा चलाया जिसमें से 3 को फाँसी दी गयी एवं 44 को आजीवन कारावास की सजा दी गयी। इसके अलावा 47 लोगों को कड़ी सजा दी गयी , जिसमें गया मुण्डा की पत्नी मनकी मुण्डा को 2 वर्ष जेल की सजा सुनायी गयी।
> इसी आंदोलन के परिणामस्वरूप 1902 ई. में गुमला को एवं 1903 ई. में खूँटी को अलग अनुमंडल बनाया गया व नये न्यायालय की स्थापना की गई।
> इसके अतिरिक्त राँची जिले का सर्वेक्षण कराया गया एवं बेगारी पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था की गयी। 
> इसी विद्रोह के प्रभावस्वरूप 11 नवंबर, 1908 ई. को छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) पारित किया गया। इस कानून के तहत सामूहिक काश्तकारी व्यवस्था (खूँटकट्टी) को पुनः लागू किया गया तथा बंधुआ मजदूरी पर प्रतिबंध के साथ-साथ लगान की दरों में कटौती की गयी।
> बिरसा मुण्डा के आंदोलन अपने मूल उद्देश्य ( मुण्डा राज की स्थापना) को पाने में तो असफल रहा, परंतु इसने पृथक झारखण्ड के निर्माण हेतु आधारशिला तैयार कर दी। 
> ताना/टाना भगत आंदोलन (1914)
> ताना भगत आंदोलन का प्रारंभ जतरा भगत * के नेतृत्व में 21 अप्रैल, 1914 ई. * में गुमला से हुआ। 
> इस आंदोलन को बिरसा मुण्डा के आंदोलन का विस्तार माना जाता है।
> यह एक प्रकार का संस्कृतिकरण आंदोलन था जिसमें एकेश्वरवाद को अपनाने, मांस-मदिरा के त्याग, आदिवासी नृत्य पर पाबंदी तथा झूम खेती की वापसी पर विशेष बल दिया गया।
> इस आंदोलन को प्रसारित करने में मांडर में शिबू भगत, घाघरा में बलराम भगत, विशुनपुर में भिखू भगत तथा सिसई में देवमनिया नामक महिला ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
> इस आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य स्वशासन की स्थापना करना था।
> इस आंदोलन को प्रारंभ में कुरूख धरम आंदोलन * के नाम से जाना गया, जो कुरूख या उराँव जनजाति का मूल धर्म है।
> 1916 में जतरा भगत को गिरफ्तार करके एक वर्ष की सजा दे दी गयी। परंतु बाद में उसे शांति बनाए रखने की शर्त पर रिहा कर दिया गया।
> जेल से रिहा होने के दो माह बाद ही जतरा भगत की मृत्यु हो गयी। इनकी मृत्यु का कारण जेल में उनको दी गयी प्रताड़ना थी।
> मांडर में इस आंदोलन के नेतृत्वकर्त्ता शिबू भगत द्वारा टाना भगतों को मांस खाने की स्वीकृति प्रदान की गयी, जिसके परिणामस्वरूप टाना भगत दो भागों में विभक्त हो गये। इनमें मांस खाने वाले वर्ग को ‘जुलाहा भगत' तथा शाकाहारी वर्ग को 'अरूवा भगत' (अरवा चावल खाने वाले) का नाम दिया गया। 
> धार्मिक आंदोलन के रूप में प्रारंभ यह आंदोलन बाद में राजनीतिक आंदोलन में परिवर्तित हो गया।
> 1916 ई. के अंत तक इस आंदोलन का विस्तार राँची के साथ-साथ पलामू तक फैल गया।
> टाना भगतों ने पलामू के राजा के समक्ष स्वशासन प्रदान करने, राजा का पद समाप्त करने, भूमि कर को समाप्त करने तथा समानता की स्थापना की मांग रखी। राजा ने इन मांगो को अस्वीकृत कर दिया जिसके कारण टाना भगतो व राजा के समक्ष तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी।
> इस आंदोलन का विस्तार सरगुजा तक हो गया था।
> 1919 ई. में छोटानागपुर प्रमण्डल में टाना भगत आंदोलन से जुड़े शिबू भगत, देविया भगत, सिंहा भगत, माया भगत व सुकरा भगत को गिरफ्तार कर उन्हें सजा दी गयी, परंतु आंदोलन जारी रहा।
> दिसंबर, 1919 ई. में तुरिया भगत एवं जीतु भगत ने चौकीदारी कर एवं जमींदारों को मालगुजारी नहीं देने का आह्वान किया।
> यह आंदोलन पूर्णतः अहिंसक था तथा ताना भगतों ने इस आंदोलन के तृतीय चरण में महात्मा गाँधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
> 1921 ई. के सविनय अवज्ञा आंदोलन में ताना भगतों ने 'सिद्धू भगत' के नेतृत्व में भाग लिया था। इस दौरान टाना भगतों ने शराब की दुकानों पर धरना, सत्याग्रह एवं प्रदर्शनों में अपनी भागीदारी आदि द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन को मजबूत किया।
> महात्मा गाँधी से प्रभावित होकर टाना भगतों ने चरख व खादी वस्त्रों का अनुसरण किया। महात्मा गांधी के अनुसार टाना भगत उनके सबसे प्रिय अनुयायी थे।
> ताना भगतों नेकांग्रेस के 1922 के गया अधिवेशन 1923 के नागपुर अधिवेशन में भाग लिया था।
> यह विशुद्ध गाँधीवादी तरीके से लड़ा गया पहला आदिवासी अहिंसक आंदोलन था।
> 1930 ई. में सरदार पटेल द्वारा बारदोली में कर न देने का आंदोलन चलाया गया था जिससे प्रभावित होकर टाना भगतों ने भी सरकार को कर देना बंद कर दिया।
> 1940 के रामगढ़ अधिवेशन में ताना भगतों ने महात्मा गाँधी को 400 रूपये उपहारस्वरूप प्रदान किए थे। 
> 1948 ई. में 'राँची जिला ताना भगत पुनर्वास परिषद्' अधिनियम पारित किया गया था। 
> हरिबाबा आंदोलन (1931)
> यह आंदोलन हरिबाबा उर्फ दुका हो के नेतृत्व में सिंहभूम क्षेत्र में चलाया गया।
> यह एक प्रकार का शुद्धि आंदोलन था।
> इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य हो जनजाति के लोगों को बाहरी अत्याचारों से बचाने हेतु संगठित करना था। 
> इस आंदोलन में बारकेला क्षेत्र के भूतागाँव निवासी सिंगराई हो, भड़ाहातू क्षेत्र के बामिया हो तथा गाड़िया क्षेत्र के हरि, दुला व बिरजो हो ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
> इस आंदोलन के दौरान सरना धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार किया गया।
> यह आंदोलन भी गांधीजी के विचारों से प्रभावित था।
जनजातीय आंदोलन : एक नजर में
आंदोलन का नाम
संबंधित क्षेत्र
अवधि
नेतृत्वकर्त्ता
दमनकर्त्ता
ढाल विद्रोह
ढालभूम
1767 - 77
जगन्नाथ ढाल
ले. रूक, कै. मार्गन
चुआर विद्रोह
सिंहभूम
1769 - 1805
रघुनाथ महतो, श्याम गंजम
ले. गुडयार, मे. क्रॉफर्ड
चेरो विद्रोह
पलामू
1770 - 1818
चित्रजीत राय, जयनाथ सिंह
कै. जैकब कैमक
भोगता विद्रोह
पलामू
1770 - 71
जयनाथ सिंह
कै. जैकब कैमक
घटवाल विद्रोह
रामगढ़
1772 -73
विभिन्न घटवाल सरदार
कै. जैकब कैमक
पहाड़िया विद्रोह
संथाल परगना
1772 - 82
जगन्नाथ देव, सर्वेश्वरी
क्लिवलैंड
तमाड़ विद्रोह
राँची, पंचेत, वीरभूम
1782 - 1821
अलग-अलग चरणों में विभिन्न नेता
विभिन्न अंग्रेज अधिकारी
तिलका आंदोलन
भागलपूर
1783 - 85
तिलका माँझी
क्लिवलैंड व आयरकूट
मुण्डा विद्रोह
- 1793 - 1832
विभिन्न नेतृत्वकर्त्ता
हो विद्रोह
कोल्हान
1820 - 21
पोटो सरदार
मेजर रफ्सेज
कोल विद्रोह
हजारीबाग को छोड़ सभी क्षेत्र
1831 - 32
विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न नेता
विभिन्न अंग्रेज अधिकारी
भूमिज विद्रोह
बाड़भूम, सिंहभूम
1832 - 33
गंगा नारायण *
कै. विलकिन्सन
संथाल विद्रोह
संथाल परगना
1855 - 56
सिद्धू-कान्हू *
कै. अलेक्जेंडर
सरदारी आंदोलन
- 1858 - 95
विभिन्न कोल सरदार
-
साफाहोड़ आंदोलन - 1870
लाल हेम्ब्रम
-
खरवार आंदोलन
संथाल परगना
1874
भागीरथ माँझी *
-
मुण्डा उलगुलान
राँची-खूँटी
1895 - 1900
बिरसा मुण्डा *
कै. फारबेस व स्ट्रीट फील्ड
ताना भगत आंदोलन
- 1914
जतरा भगत
-
हरिबाबा आंदोलन
सिंहभूम 1931
हरिबाबा उर्फ दुका हो
-
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Wed, 14 Jun 2023 15:47:01 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में अंग्रेजों का प्रवेश https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-अंग्रेजों-का-प्रवेश https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-अंग्रेजों-का-प्रवेश > सिंहभूम क्षेत्र
> ढालभूम
> झारखण्ड में 1767 ई. में पहली बार अंग्रेजों का प्रवेश हुआ।
> अंग्रेजों का झारखण्ड में पहली बार सिंहभूम क्षेत्र में प्रवेश हुआ ।
> अंग्रेजों के झारखण्ड में पहली बार प्रवेश के समय झारखण्ड के कोल्हान क्षेत्र में हो शासक, पोरहाट क्षेत्र में सिंह शासक तथा धालभूम / ढालभूम क्षेत्र में ढाल शासकों का शासन था।
> 1760 ई. में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने मिदनापुर क्षेत्र में अधिकार स्थापित किया।
> जनवरी, 1767 ई. में अंग्रेजों ने फरगुसन को सिंहभूम पर आक्रमण हेतु भेजा था।
> 22 मार्च, 1767 ई. में अंग्रेजों ने घाटशिला के महल पर कब्जा किया था।
> 1767 ई. में जगन्नाथ ढाल के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरूद्ध ढाल विद्रोह किया गया था। इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने जगन्नाथ ढाल को ढालभूम का राजा बनाना स्वीकार किया तथा जगन्नाथ ढाल ने अंग्रेजों को 5,500 रूपये सालाना कर देना मंजूर किया।
> 1768 में ढालभूम क्षेत्र में गड़बड़ी फैलने लगी जिसे रोकने हेतु अंग्रेजों ने लेफ्टिनेंट रूक के नेतृत्व में विद्रोही जगन्नाथ ढाल को पकड़ने का असफल प्रयास किया, जिसके बाद जगन्नाथ ढाल के भाई नीमू ढाल को बंदी बना लिया गया।
> अंग्रेजों ने जगन्नाथ ढाल के स्थान पर नीमू ढाल को ढालभूम का राजा घोषित कर दिया। 
> जगन्नाथ ढाल ने अपना विरोध जारी रखते हुए ढालभूम के अधिकांश क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया जिसके बाद 1777 ई. में अंग्रेजों ने जगन्नाथ ढाल को पुनः ढालभूम का राजा घोषित किया। 
> 1783 ई. में लेफ्टिनेंट रूक ने ढालभूम क्षेत्र में सैनिक अभियान चलाया था।
> 1800 ई. में ढालभूम का वार्षिक कर 4,267 रूपया तय किया गया।
> पोरहाट
> 1767 ई. में पोरहाट के राजा जगन्नाथ सिंह चतुर्थ ने मिदनापुर के अंग्रेज रेजिडेन्ट से अपने भाई शिवनाथ सिंह के विरूद्ध सहायता मांगी। परंतु कटक के मामले में उलझे होने के कारण अंग्रेजों ने सहायता से इनकार कर दिया। 
> 1773 ई. में अंग्रेज अधिकारी कैप्टन फोरबिस ने कंपनी के व्यापारिक लाभ हेतु पोरहाट के राजा से एक समझौता किया कि पोरहाट का राजा कंपनी क्षेत्र के व्यापारियों को अपने राज्य में शरण प्रदान नहीं करेगा।
> 1793 ई. में अंग्रेजों ने सरायकेला के कुँवर तथा खरसावां के ठाकुर के साथ भी इसी प्रकार की संधि की । 
> 1809 ई. में पोरहाट के राजा ने सरायकेला व खरसावां के बढ़ते प्रभुत्व को संतुलित करने के उद्देश्य से कंपनी से अपने राज्य को संरक्षण में लेने का आग्रह किया जिसे कंपनी ने अस्वीकृत कर दिया।
> 1818 ई. में तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के पश्चात् कंपनी ने सिंहभूम को कंपनी के नियंत्रण में लाने का निर्णय लिया।
> 1 फरवरी, 1820 ई. को अंग्रेज एजेंट कैप्टन रसेल से बातचीत के बाद पोरहाट के राजा घनश्याम सिंह ने कंपनी की अधीनता स्वीकार करते हुए एक संधि पर हस्ताक्षर किया। कंपनी ने घनश्याम सिंह को संरक्षण प्रदान करने तथा संपत्ति पर अधिकार बनाए रखने का आश्वासन दिया। इस संधि को लेकर कंपनी तथा घनश्याम सिंह दोनों के अपने-अपने उद्देश्य थे
> कंपनी का उद्देश्य –
> संबलपुर (उड़ीसा) व बंगाल के बीच सीधा संपर्क स्थापित करना । 
>  कटक व बनारस के बीच सीधा संपर्क स्थापित करना ।
> विरोधियों द्वारा संरक्षण हेतु सिंहभूम क्षेत्र को नियंत्रित करना ।
> विद्रोही कोलों पर नियंत्रण स्थापित करना ।
> घनश्याम सिंह का उद्देश्य -
> कंपनी के सहयोग से सरायकेला-खरसावां पर प्रभाव स्थापित करना ।
> सरायकेला के शासक से अपनी कुल देवी 'पौरी देवी' की मूर्ति वापस पाना।
> कंपनी के सहयोग से हो लोगों पर सत्ता स्थापित करना ।
> इस संधि के पश्चात् अंग्रेजों ने घनश्याम सिंह के पहले प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, परंतु अन्य दोनों उद्देश्यों को पूरा करने में सहायता की। मेजर डब्ल्यू. आर. गिलबर्ट की ने सरायकेला के कुँवर अजम्बर सिंह को पौरी देवी की मूर्ति पोरहाट के राजा को वापस लौटाने हेतु बाध्य किया तथा 1821 ई. में अंग्रेजों ने हो लोगों का दमन कर उन्हें पोरहाट के राजा के अधीन आने हेतु विवश कर दिया। 
> कोल्हान
> सरायकेला राज्य की स्थापना विक्रम सिंह के द्वारा की गयी थी।
> 1793 ई. में सरायकेला तथा खरसावां के साथ अंग्रेजों ने एक संधि की थी ।
> 1820 ई. में कोल्हान क्षेत्र में मेजर रफसेज के कोल्हान क्षेत्र में प्रवेश के बाद रोरो नदी के तट पर अंग्रेज सेना तथा हो जनजाति के बीच युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेज विजयी हुए। 
> 1821 ई. में कर्नल रिचर्ड के नेतृत्व में अंग्रेजों ने 'हो क्षेत्र' में प्रवेश किया तथा हो लोगों को अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने हेतु विवश कर दिया।
> 1831-32 के कोल विद्रोह को हो जनजाति का भी समर्थन प्राप्त था।
> 1836 ई. में टी. एस. विल्किंसन की सलाह पर कंपनी द्वारा अंग्रेजी सेना को कोल्हान क्षेत्र में भेजा गया, जहाँ ‘हो जनजाति' से इनका संघर्ष हुआ। फरवरी, 1837 ई. में 'हो जनजाति के लोगों ने आत्मसमर्पण करते हुए कंपनी को सीधे कर देना स्वीकार किया।
> 1837 ई. में कोल्हान क्षेत्र को एक प्रशासनिक इकाई बनाकर उसे एक अंग्रेज अधिकारी के अधीन कर दिया गया तथा क्लीवलैंड नामक अंग्रेज अधिकारी द्वारा पहाड़ी एसेंबली की स्थापना की गयी थी। 
> अंग्रेजों को कोल्हान क्षेत्र पर अधिकार करने में लगभग 70 वर्षों का समय लगा, जबकि शेष झारखण्ड पर उन्होनें 45 वर्षों में अधिकार स्थापित कर लिया था।
> झारखण्ड में देशी रियासतें - सरायकेला एवं खरसावां
> ब्रिटिश शासनकाल में भारत में 560 से अधिक देशी रियासतें थीं। इनमें से संयुक्त बिहार (झारखण्ड विभाजन से पूर्व) में मात्र दो देशी रियासतें सरायकेला एवं खरसावां थे।
> सरायकेला रियासत
> सरायकेला रियासत की स्थापना पोरहाट के सिंहवंशी राजा अर्जुन सिंह के पुत्र विक्रम सिंह ने की थी जिसमें 10 गाँव शामिल थे।
> सरायकेला रियासत का अंग्रेजों के साथ सबसे पहले 1770 ई. में संपर्क स्थापित हुआ।
> 1793 ई. में सराकेला के राजा एवं अंग्रेजों के बीच एक संधि की गयी थी।
> अंग्रेजों ने 1803 ई. के आंग्ल-मराठा युद्ध में सरायकेला के राजा अभिराम सिंह को अंग्रेजों की सहायता करने पर वार्षिक कर माफ करने का प्रस्ताव दिया था।
> 1820 ई. में सरायकेला के राजा की सहायता से तमाड़ के विद्रोही नेता रूदन सिंह को गिरफ्तार किया गया। 
> 1857 ई. के संग्राम में सरायकेला के राजा ने अंग्रेजों की सहायता की थी। इसके बदले अंग्रेजों ने सरायकेला के राजा को पोरहाट राज्य का एक हिस्सा 'सरायकेला' प्रदान किया।
> 1899 ई. में अंग्रेजों ने सरायकेला को रियासत के रूप में मान्यता प्रदान की।
> 1939 ई. में सरायकेला रियासत के राजा आदित्य प्रताप सिंह देव ने शासन व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन किया।
> 1947 ई. में देश की स्वतंत्रता के बाद सरायकेला भारत संघ का अंग बन गया।
> 1956 ई. में राज्यों के पुनर्गठन के बाद सरायकेला बिहार राज्य में शामिल किया गया।
> 2000 ई. से सरायकेला झारखण्ड राज्य का भाग है तथा वर्तमान में यह कोल्हान प्रमण्डल के अंतर्गत आता है।
> खरसावां रियासत
> खरसावां रियासत की स्थापना विक्रम सिंह (सरायकेला के संस्थापक) के द्वितीय पुत्र द्वारा की गयी थी। 
> 1793 ई. में खरसावां रियासत एवं अंग्रेजों के बीच एक संधि की गयी थी। 
> 1899 ई. में अंग्रेजों ने खरसावां को रियासत के रूप में मान्यता प्रदान की ।
> 1947 ई. में देश की स्वतंत्रता के बाद खरसावा भारत संघ का अंग बन गया। 
> 1956 ई. में राज्यों के पुनर्गठन के बाद खरसावां बिहार राज्य में शामिल किया गया। 
> 2000 ई. से खरसावां झारखण्ड राज्य का भाग है तथा वर्तमान में यह कोल्हान प्रमण्डल के अंतर्गत आता है।
> पलामू क्षेत्र
> पलामू में अंग्रेंजों के प्रवेश का प्रमुख कारण यहाँ राजनीतिक अस्थिरता एवं अराजकता का वातावरण था।
> 1770 ई. में पलामू के शासक जयकृष्ण राय ने रंका के ठकुराई सयनाथ की हत्या करवा दी जिसका प्रतिशोध लेने हेतु सयनाथ सिंह के भतीजे जयनाथ सिंह ने चित्रजीत राय (पलामू के पूर्ववर्ती शासक रणजीत राय का पौत्र) से सहयोग मांगा।
> 1770 ई. में पलामू के सतबरवा में चेतमा की लड़ाई में जयनाथ सिंह ने चित्रजीत राय के सहयोग से चेरो राजा जयकृष्ण राय को पराजित कर उसकी हत्या कर दी व पलामू किला पर अधिकार कर लिया ।
> इस विजय के बाद जयनाथ सिंह ने चित्रजीत राय को पलामू का शासक बनाया तथा स्वयं उसका दीवान बन गया।
> उदवंत राय अखौरी (चित्रजीत राय का समर्थक) ने पटना जाकर कंपनी से जयकृष्ण राय के पौत्र गोपाल राय को पलामू का शासक बनाने की अपील की जिसका कंपनी ने समर्थन किया। यद्यपि इस समर्थन के पीछे कंपनी का प्रमुख उद्देश्य पलामू किले पर अधिकार करना था।
> 1771 ई. में अंग्रेज अधिकारी कैमक ने चेरो राजा चित्रजीत राय को पराजित करके पलामू किले पर अधिकार स्थापित कर लिया। इसके बाद चित्रजीत राय तथा जयनाथ सिंह रामगढ़ चले गए।
> कंपनी ने गोपाल राय को पलामू का राजा घोषित किया तथा पलामू पर 4,000 रूपये वार्षिक मालगुजारी तय कर दिया।
> 1772 ई. में अंग्रेज अधिकारी टॉमस स्कॉट व चेरो राजा जयनाथ सिंह के बीच युद्ध हुआ जिसमें अंग्रेजों की हार हुई। इस युद्ध के दौरान टॉमस स्कॉट पैर में गोली लगने के कारण घायल हो गया जबकि पेलविन नामक अंग्रेज सार्जेंट की मृत्यु हो गयी।
> जयनाथ सिंह ने 1772 ई. में रंका के किले पर अधिकार कर लिया।
> अंग्रेज अधिकारी कैमक एक बड़ी सेना के साथ पुनः पलामू पहुँचा। जयनाथ सिंह पलामू छोड़कर किसी अज्ञात स्थान पर भाग गया।
> 1773-74 ई. में अंग्रेजों ने पलामू पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। 
> छोटानागपुर खास क्षेत्र
> 1771 ई. में अंग्रेजों के छोटानागपुर में प्रवेश के समय दर्पनाथ सिंह यहां का राजा था।
> 1771 ई. में छोटानागपुर के राजा दर्पनाथ सिंह ने अंग्रेजों के साथ मित्रता करने के पश्चात् पटना कौंसिल को 12,000 रूपये सालाना कर देना स्वीकार किया।
> हजारीबाग क्षेत्र
> 1771 ई. में हजारीबाग के रामगढ़ राज्य का शासक मुकुंद सिंह था । मुकुंद सिंह अंग्रेजों का विरोधी तथा इसने अंग्रेजों के पलामू अभियान के समय पलामू नरेश को भरपूर सहायता दी थी।
> अंग्रेजों ने रामगढ़ नरेश को 20,000 वार्षिक मालगुजारी तथा अंग्रेजों के पक्ष में उचित आचरण करने की शर्त पर उसे गद्दी पर बनाये रखने का आश्वासन दिया अन्यथा उसके राज्य पर कब्जा करने की चेतावनी दी। 
> मुकुंद सिंह ने अंग्रेजो के इस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया जिसके बाद अंग्रेज अधिकारी कैमक ने हजारीब क्षेत्र में प्रवेश करने का निर्णय लिया।
> इसी बीच मुकुंद सिंह के एक रिश्तेदार तेज सिंह ने स्वयं को रामगढ़ की गद्दी का दावेदार होने का दावा किया ।
> 1772 ई. में रामगढ़ राज्य पर एक तरफ से तेज सिंह तथा दूसरी तरफ से कैप्टन कैमक ने आक्रमण कर दिया।
> यद्यपि इस लड़ाई में मुकुंद सिंह पराजित हुआ परंतु उसके एक समर्थक ने कैमक के सहयोगी कैप्टन इवेंस की हत्या कर दी।
> मुकुंद सिंह बंदी बनाये जाने के डर से रामगढ़ से भागकर पंचेत चला गया जहाँ उसे कलेक्टर हिटली ने संरक्षण प्रदान किया। बाद में कंपनी के आदेश पर मुकुंद सिंह को बंदी बनाकर पटना भेज दिया गया।
> कैमक ने 30,000 वार्षिक मालगुजारी तय करते हुए तेज सिंह को रामगढ़ का राजा घोषित किया गया। 
> 1773 ई. में रामगढ़, पलामू और छोटानागपुर खास को मिलाकर रामगढ़ जिले का गठन किया गया था। 
> 1774 ई. में तेज सिंह को रामगढ़ का विधिवत् राजा घोषित कर दिया गया।
> मानभूम (धनबाद)
> मानभूम क्षेत्र में अंग्रेजों को प्रवेश करने में लगभग 20 वर्ष (1763 से 83) लग गया। 
> 1763 ई. में फरग्युसन ने मानभूम क्षेत्र में जमींदारों से सालाना बंदोबस्त की प्रक्रिया प्रारंभ की।
> 1783-84 ई. मेजर क्रॉफोर्ड ने झालदा के राजा मंगल सिंह को गिरफ्तार कर झरिया में शांति स्थापित किया। 
> संथाल परगना क्षेत्र
> संथाल परगना प्राचीन अंग राज्य का हिस्सा था जिसे 'जंगल तराई' के नाम से जाना जाता था। 
> 1592 ई. से 1660 ई. तक यह क्षेत्र बंगाल की राजधानी रहा ।
> 1676 ई. में अंग्रेजों द्वारा इस क्षेत्र में एक व्यापारिक कंपनी की स्थापना की गयी थी। इसके बाद यहाँ के शाही टकसाल में कंपनी के सिक्के ढाले जाने लगे।
> 1702 ई. में मुगलों से संबंध खराब होने पर औरंगजेब ने राजमहल स्थित कंपनी के अधिकारियों को बंदी बनाने का आदेश दिया।
> 1708 ई. में मुगलों के दीवान मुर्शिद कुली खाँ एवं अंग्रेजों के बीच पुनः मतभेद हो गया, परंतु 1710 ई. में संबंध ठीक हो गये।
> 1742 ई. में मराठों ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर 
लिया ।
> 1757 ई. में प्लासी की लड़ाई में पराजित होने के बाद सिराजुद्दौला राजमहल पहुँचा तथा उसने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था।
> सन् 1763 ई. में मेजर एडम्स के नेतृत्व में मीर कासिम के विरूद्ध विजय के पश्चात् अंग्रेजों ने राजमहल क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
> मीर कासिम ने राजमहल के उधवानाला में अंग्रेजों के साथ युद्ध किया था।
> अन्य तथ्य
> 1778 ई. में राबर्ट ब्राउन ने झारखण्ड में प्रशासन हेतु एक वृहद् योजना प्रस्तुत की थी। 
> झारखण्ड क्षेत्र का प्रथम नागरिक प्रशासक चैपमैन था ।
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Wed, 14 Jun 2023 14:46:03 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड के क्षेत्रीय राजवंश https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-के-क्षेत्रीय-राजवंश https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-के-क्षेत्रीय-राजवंश

> झारखण्ड का मुण्डा राज 
> झारखण्ड की जनजातियों में मुण्डाओं ने ही सर्वप्रथम राज्य निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की। रिता मुण्डा / ऋषा मुण्डा को ही सर्वप्रथम झारखण्ड में राज्य निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने का श्रेय जाता है। 
> ऋषा मुण्डा ने सुतिया पाहन को मुण्डाओं का शासक नियुक्त किया और इस नवस्थापित राज्य का नाम सुतिया पाहन के नाम पर सुतिया नागखण्ड पड़ा।
> सुतिया नागखण्ड नामक इस राज्य को सुतिया पाहन ने सात गढ़ों और 21 परगना में विभक्त किया।
> सात गढ़ों व 21 परगना के नाम इस प्रकार हैं:–
7 गढ़ का नाम
नया नाम
21 परगना के नाम
लोहागढ़
लोहरदगा
ओमदंडा
दोईसा
खुखरा
पालुनगढ़
पलामू
सुरगुजा
जसपुर
गंगपुर
हजारीबाग
हजारीबाग
गीरगा
बिरूआ
लचरा
सिंहगढ़
सिंहभूम
बिरना
सोनपुर
बेलखादर
मानगढ़
मानभूम
बेलसिंग तमाड़
लोहारडीह
सुरगुमगढ़
सुरगुजा
खरसिंग
उदयपुर
बोनाई
केसलगढ़ केसलगढ़
कोरया
पोड़हाट
चंगमंगलकर
> यह राज्य अधिक दिनों तक स्थायी नहीं रह सका तथा इस राज्य का अंतिम राजा मदरा मुण्डा था।
> छोटानागपुर खास का नाग वंश
> फणी मुकुट राय
> मुण्डा राज के बाद नाग वंश द्वारा अपना राज्य स्थापित किया गया। 
> अंतिम मुण्डा राजा मदरा मुण्डा व अन्य नेताओं की सर्वसम्मति से 64 ई. में फणी मुकुट राय को राजा चुना गया जिसने नागवंशी राज्य की स्थापना की थी तथा सुतियांबे को अपनी राजधानी बनाया।
> जे. रीड के अनुसार 10वीं सदी ई. में नागवंशी राज्य की स्थापना हुई थी। 
> फणी मुकुट राय पुण्डरीक नाग एवं वाराणसी की ब्राह्मण कन्या पार्वती का पुत्र था। 
> फणी मुकुट राय को नाग वंश का 'आदि पुरूष' भी कहा जाता है।
> फणी मुकुट राय का विवाह पंचेत राज्य (नागवंशी राज्य के पूर्व में स्थित) के राजघराने में हुआ था।
> फणी मुकुट राय ने पंचेत के राजा की मदद से क्योंझोर राज्य (नागवंशी राज्य के दक्षिण में स्थित) को पराजित किया था।
> फणी मुकुट राय का राज्य 66 परगना में विभाजित था।
> फणी मुकुट राय ने अपनी राजधानी सुतियाम्बे को बनाया तथा वहाँ एक सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। फणी मुकुट राय ने अपने राज्य में गैर-आदिवासियों को भी आश्रय दिया और आश्रय पाने वाले गैर-आदिवासियों में भवराय श्रीवास्तव को अपना दीवान बनाया |
> बाघदेव सिंह ने फणी मुकुट राय की हत्या की थी।
> फणी मुकुट राय के बाद मुकुट राय, मदन राय तथा प्रताप राय शासक बने ।
> प्रताप राय के शासनकाल में पलामू किला का निर्माण कराया गया था।
> प्रताप राय ने अपनी राजधानी सुतियाम्बे से चुटिया स्थानांतरित की तथा काशी तक के लोगों को चुटिया में बसाया। 
> भीम कर्ण (1095-1184 ई.)
> भीम कर्ण प्रथम प्रतापी शासक था जिसने राय के स्थान पर कर्ण की उपाधि धारण की । कर्ण की उपाधि कल्चुरि राजवंश की उपाधि से प्रभावित थी।
> भीम कर्ण के काल में सरगुजा के रक्सेल राजा ने 12,000 घुड़सवारों तथा विशाल पैदल सेना के साथ नागवंशी राज्य पर आक्रमण कर दिया जिसे 'बरवा की लड़ाई' के नाम से जाना जाता है।
> भीम कर्ण ने सरगुजा के हेहयवंशी रक्सेल राजा को बरवा की लड़ाई में पराजित किया । इस विजय के बाद भीम कर्ण ने रक्सेलों को लूटा व बरवा तथा पलामू के टोरी ( वर्तमान समय में लातेहार जिले में स्थित) पर कब्जा कर लिया। इस लड़ाई में भीम कर्ण को वासुदेव की एक मूर्ति भी प्राप्त हुयी।
> इस लड़ाई में विजय के बाद नागवंशियों का राज्य गढ़वाल राज्य की सीमा तक विस्तारित हो गया। 
> भीम कर्ण ने भीम सागर का निर्माण कराया।
> नागवंशी राज्य की राजधानी चुटिया, बंगाल पर आक्रमण करने वाले तुर्क आक्रमणकारियों के मार्ग के अत्यंत निकट था। अत: नागवंशी राज्य पर मुस्लिम आक्रमण से बचने हेतु भीम कर्ण ने 1122 ई. में अपनी राजधानी चुटिया से खुखरा स्थानांतरित कर 
दी ।
> शिवदास कर्ण
> शिवदास कर्ण नागवंशी राज्य का एक प्रमुख शासक था।
> शिवदास कर्ण ने हापामुनि मंदिर (घाघरा, गुमला) में सियानाथ देव के हाथों 1401 ई. में भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित करवायी।
> प्रताप कर्ण (1451-1469 ई.)
> सल्तनत काल के लोदी वंश के समकालीन नागवंशी राजा - प्रताप कर्ण, छत्र कर्ण एवं विराट कर्ण थे। 
> प्रताप कर्ण के समय नागवंशी राज्य घटवार राजाओं के विद्रोह से त्रस्त था ।
> इस समय तमाड़ के राजा ने नागवंशी राज्य की राजधानी खुखरागढ़ की घेराबंदी कर प्रताप कर्ण को किले में बंदी बना दिया।
> प्रताप कर्ण को इस बंदी से मुक्ति पाने हेतु खैरागढ़ के खरवार राजा बाघदेव की सहायता लेनी पड़ी।
> बाघदेव ने तमाड़ के राजा को पराजित किया जिसके परिणामस्वरूप इसे कर्णपुरा का क्षेत्र पुरस्कार के रूप में मिला।
> छत्र कर्ण ( 1469-1496 ई.)
> छत्र कर्ण लोदी वंश के समकालीन एक प्रतापी नागवंशी राजा था।
> छत्र कर्ण के काल में विष्णु की मूर्ति कोराम्बे में स्थापित की गयी।
> इसी मूर्ति से प्रभावित होकर बंगाल के प्रख्यात वैष्णव संत चैतन्य महाप्रभु मथुरा जाते समय 16वीं सदी के आरंभ में पंचपरगना क्षेत्र में रूके थे। इन्होनें चैतन्य चरितामृत में झारखण्ड के भौगोलिक आकार का वर्णन किया है।
> चैतन्य चरितामृत के अनुसार चैतन्य महाप्रभु ने संथाल परगना के कई गांवों में ठाकुरबाड़ी की स्थापना की थी। 
> चैतन्य महाप्रभु ने झारखण्ड क्षेत्र में वैष्णव मत का प्रचार-प्रसार किया ।
> रामशाह (1690-1715 ई.)
> राम शाह मुगल शासक बहादुर शाह प्रथम के समकालीन था।
> यदुनाथ शाह (1715-24 ई.)
> यह राम शाह के बाद नागवंशी शासक बना।
> नागवंशी शासक यदुनाथ शाह फरूर्खशियर के समकालीन था।
> 1717 ई. में बिहार के मुगल सूबेदार सरबुलंद खाँ ने यदुनाथ शाह पर आक्रमण कर दिया जिसके परिणामस्वरूप यदुनाथ शाह ने 1 लाख रूपये मालगुजारी देना स्वीकार किया।
> सरबुलंद खाँ के आक्रमण के पश्चात अपने राज्य को सुरक्षित रखने हेतु यदुनाथ शाह ने अपनी राजधानी दोइसा से पालकोट स्थानांतरित कर दी।
> 1719-22 ई. तक टोरी परगना पर पलामू के चेरो राजा रणजीत राय का कब्जा रहा। 
> शिवनाथ शाह (1724-33 ई.)
> यह यदुनाथ शाह का उत्तराधिकारी था।
> 1730 ई. में बिहार के सूबेदार फखरूद्दौला ने छोटानागपुर पर आक्रमण किया। इस समय यहाँ शिवनाथ शाह का शासन था।
> इस आक्रमण के परिणामस्वरूप शिवनाथ शाह ने फखरूद्दौला को 12,000 रूपये मालगुजारी देना स्वीकार किया।
> उदयनाथ शाह (1733-40 ई.)
> यह शिवनाथ शाह का उत्तराधिकारी था। 
> इस समय बिहार का मुगल सूबेदार अलीवर्दी खाँ था।
> टेकारी के जमींदार सुंदर सिंह तथा रामगढ़ के शासक विष्णु सिंह से अलीवर्दी खाँ वार्षिक मालगुजारी वसूलता था। 
> नागवंशी शासक उदयनाथ शाह द्वारा रामगढ़ के शासक विष्णु सिंह के माध्यम से ही अलीवर्दी खाँ को मालगुजारी का भुगतान किया जाता था।
> श्यामसुंदर शाह (1740-45 ई.) 
> यह उदयनाथ शाह का उत्तराधिकारी था।
> श्यामसुंदर शाह के शासनकाल में बंगाल पर आक्रमण करने हेतु मराठों ने झारखण्ड का कई बार प्रयोग किया। 
> 1742 ई. में भास्कर राव पंडित ने झारखण्ड से होकर बंगाल पर आक्रमण किया, परन्तु बंगाल का तत्कालीन सूबेदार अलीवर्दी खाँ ने इसे खदेड़ दिया।
> 1743 ई. में मराठा रघुजी भोंसले ने भी बंगाल पर आक्रमण किया जिसकी शिकायत अलीवर्दी खाँ ने मराठा पेशवा बालाजी राव से की। इस शिकायत पर पेशवा बालाजी राव राजमहल के वामनागाँव होते हुए बंगाल पहुंचा जिसकी खबर पाकर रघुजी भोंसले मानभूम (धनबाद) होकर वापस अपने राज्य लौट गया।
> मराठों द्वारा बार-बार बंगाल पर आक्रमण हेतु झारखण्ड का प्रयोग करने के परिणामस्वरूप झारखण्ड से मुगलों का प्रभाव समाप्त हो गया तथा मराठों का प्रभुत्व स्थापित हुआ।
> 31 अगस्त, 1743 को पेशवा बालाजी राव व रघुजी भोंसले के बीच हुए एक समझौते के अनुसार झारखण्ड क्षेत्र पर रघुजी भोंसले का प्रभाव स्थापित हुआ।
> 1745 ई. में रघुजी भोंसेले संथाल परगना से होकर बंगाल में प्रविष्ट हुआ।
> कालांतर में मराठों ने छोटानागपुर खास, पलामू, मानभूम आदि क्षेत्रों का जमकर शोषण किया। 
> नागवंशी शासक – अन्य तथ्य 
> 1498 ई. में संध्या के राजा ने नागवंशी राज्य पर आक्रमण कर कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया जिसे नागवंशी राजा ने खैरागढ़ के राजा लक्ष्मीनिधि कर्ण की सहायता से मुक्त कराया।
> शरणनाथ शाह के समय जमींदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया था।
> ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव बड़कागढ़ के ठाकुर महाराज रामशाह के चौथे पुत्र थे। इन्होनें अपनी राजधानी डोयसागढ़ से स्वर्णरेखा नदी के नजदीक सतरंजी में स्थापित की थी। नागवंशी शासक ऐनीनाथ शाहदेव ने 1691 ई. में राँची में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कराया था।
> हटिया बाजार को ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने ही बसाया था।
> ठाकुर ऐनीनाथ शाह की पाँच पत्नियाँ तथा 21 पुत्र थे जिसका उल्लेख नागवंशावली में भी किया गया है। 
> नागवंशी शासक मणिनाथ शाह ने सिल्ली, बुंडू, तमाड़, बरवा आदि के स्थानीय जमींदारों का दमन किया था।
> नागवंशी राज्य की राजधानियाँ
> नागवंशी राजा अपने राज्य को बनाये रखने के लिए अपनी राजधानियाँ समय-समय पर स्थानांतरित करते रहे। 
> नाग वंश की प्रथम राजधानी सुतियाम्बे तथा अंतिम राजधानी रातूगढ़ थी । 
> नाग वंश की राजधानियों तथा उसके संस्थापकों का क्रम निम्न प्रकार है:– 
क्र.सं.
राजधानी
संस्थापक
1.
सुतियाम्बे
फणी मुकुट राय
2. चुटिया
प्रताप राय
3.
खुखरा
भीम कर्ण
4.
दोइसा / डोइसा
दुर्जन शाह
5.
पालकोट
यदुनाथ शाह
6.
पालकोट भौंरो
जगन्नाथ शाह
7.
रातूगढ़
उदयनाथ शाह
> पलामू का रक्सेल वंश
> प्रारंभ में पलामू रक्सेलों के प्रभाव में था।
> रक्सेल स्वयं को राजपूत कहते थे।
> रक्सेलों का पलामू क्षेत्र में आगमन राजपूताना क्षेत्र से रोहतासगढ़ होते हुए हुआ था । रक्सेलों की दो शाखाएँ थी- देवगन ( हरहरगंज व महाराजगंज से होकर आए) एवं कुंडेलवा (चतरा व पांकी से होकर आए) ।
> रक्सेलों की दोनों शाखाओं ने क्रमशः देवगन एवं कुंडेलवा में किले का निर्माण कराया तथा उसे अपनी राजधानी घोषित किया।
> कोरवा, गोंड, पहाड़िया, किसान और खरवार रक्सेलों के समय की महत्वपूवर्ण जनजातियाँ थी। इनमें खरवार सर्वाधिक संख्या में थे जिनके शासक प्रताप धवल थे।
> रक्सेलों ने पलामू में लम्बे समय तक शासन किया तथा 16वीं सदी में चेरों ने इन्हें अपदस्थ किया।
> पलामू का चेरो वंश
> चेरों ने रक्सेलों को पराजित कर अपने राज्य की स्थापना की।
> इस वंश की स्थापना 1572 ई. में भागवत् राय ने की थी । 
> साहेब राय (1697-1716 ई.)
> ये बहादुरशाह, जहाँदार शाह तथा फर्रुखसियर के समकालीन थे।
> रणजीत राय (1716-22 ई.)
> यह साहेब राय का उत्तराधिकारी था।
> इनके शासन काल में बिहार का मुगल सूबेदार सरबुलंद खाँ पलामू आया था।
> इन्होनें सरबुलंद खाँ से टोरी परगना पर कब्जा करके 1722 ई. तक अपने अधिकार क्षेत्र में रखा।
> जयकृष्ण राय (1722-70 ई.)
> जयकृष्ण राय ने रणजीत राय की हत्या करके पलामू राज्य पर कब्जा कर लिया।
> 1730 ई. में बिहार के सूबेदार फखरूद्दौला ने चेरो राजा जयकृष्ण राय से 5,000 रूपये सालाना कर वसूल किया। 
> 1733 ई. में अलीवर्दी खाँ को बिहार का मुगल सूबेदार बनाया गया तथा इसने जयकृष्ण राय पर 5,000 रूपये वार्षिक कर निर्धारित किया और इसे वसूलने का अधिकार टेकारी के राजा सुंदर सिंह को दिया।
> 1740 ई. में बिहार के मुगल सूबेदार जैनुद्दीन खाँ ने भी जयकृष्ण राय पर 5,000 रूपये वार्षिक कर का निर्धारण किया। 
> जैनुद्दीन खाँ के सैन्य अधिकारी हिदायत अली खाँ ने पलामू के चेरो राजा पर आक्रमण भी किया था। यह मुगलों द्वारा पलामू के चेरो राजाओं पर अंतिम आक्रमण था।
> 1750-65 ई. के दौरान पलामू में राजनीतिक सत्ता का ध्रुवीकरण हुआ और जयकृष्ण के दरबार में षड़यंत्र प्रारंभ हो गया। इस दौरान दक्षिणी पलामू पर चेरो राजाओं का अधिकार रहा जबकि उत्तरी पलामू पर राजपूत व मुस्लिम जमींदारों का प्रभुत्व स्थापित हो गया।
> 1765 ई. में बिहार, बंगाल और उड़ीसा की दीवानी ईस्ट इण्डिया कंपनी को मिल गयी तथा इन्होनें पलामू में इसका भरपूर लाभ उठाया।
> सिंहभूम का सिंह वंश
> हो जनजाति के अनुसार सिंहभूम का नामकरण उनके कुल देवता सिंगबोंगा के नाम पर हुआ है।
> सिंह वंश के ग्रंथ 'वंशप्रभा लेखन' में सिंह वंश की दो शाखाओं का वर्णन मिलता है- पहली शाखा तथा दूसरी शाखा ।
> पहली शाखा
> 7वीं सदी के अंत में सिंह लोग सिंहभूम के भुइयों व सरकों के संपर्क में आए एवं इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया तथा 8वीं सदी ई. के आरंभ में सिंह वंश की पहली शाखा की स्थापना हुयी। 
> इस शाखा का संस्थापक काशीनाथ सिंह था।
> इस शाखा में तेरह राजाओं ने शासन किया।
> प्रारंभ में इन राजाओं ने छोटानागपुर के नागवंशियों के प्रभुत्व को स्वीकार करते हुए शासन किया, परन्तु बाद में वे स्वतंत्र रूप से शासन करने लगे।
> पहली शाखा का शासन 13वीं सदी के प्रारंभ तक विद्यमान रहा। 
> दूसरी शाखा
> दर्प नारायण सिंह (1205-62 ई.) ने 1205 ई. में सिंह वंश की दूसरी शाखा की स्थापना की। 
> इस वंश का दूसरा शासक युधिष्ठिर (1262-71 ई.) था जिसकी मृत्यु के बाद काशीराम सिंह शासक बना। 
> काशीराम सिंह महिपाल सिंह का उत्तराधिकारी था। यह परवर्ती मुगल शासक बहादुरशाह प्रथम का समकालीन था। 
> काशीराम सिंह ने बनाई क्षेत्र में पोरहाट नामक नयी राजधानी बनायी।
> काशीराम सिंह के बाद शासक अच्युत सिंह ने शासन किया। अच्युत सिंह के शासन काल में सिंह वंश की कुलदेवी के रूप में पौरी देवी की प्राण प्रतिष्ठा की गयी।
> अच्युत सिंह के बाद क्रमशः त्रिलोचन सिंह एवं अर्जुन सिंह प्रथम इस वंश का शासक बना
> अर्जुन सिंह प्रथम एक बार जब बनारस की तीर्थ यात्रा से लौट रहे थे तब रास्ते में मुसलमान उन्हें पकड़कर कटक (उड़ीसा) ले गये । परन्तु कुछ ही समय बाद अपने 32 अनुयायियों के साथ इन्हें वापस राज्य लौटने की अनुमति दे दी गयी।
> अर्जुन सिंह प्रथम के बाद जगन्नाथ सिंह द्वितीय शासक बना जो इस वंश का 13वाँ शासक था। इसके उत्पीड़न से तंग आकर भुईयाँ जनजाति के लोगों ने विद्रोह कर दिया था।
> जगन्नाथ सिंह द्वितीय के बाद उसका पुत्र पुरूषोत्तम सिंह सिंहभूम का शासक बना तथा इसके बाद इसका पुत्र अर्जुन सिंह द्वितीय शासक बना।
> अर्जुन सिंह द्वितीय
> अर्जुन सिंह द्वितीय ने अपने चाचा विक्रम सिंह को 12 गाँवों वाला एक जागीर दिया था, जिसे 'सिंहभूम पीर' कहा जाता था।
> विक्रम सिंह ने अन्य क्षेत्रों को इसमें मिलाकर इसका विस्तार किया तथा इसकी राजधानी सरायकेला को बनाया। बाद में यही सरायकेला राज्य बना।
> विक्रम सिंह ने पटकुम राजा के शासित क्षेत्र कांडू तथा बंकसाई पीर पर कब्जा कर अपनी उत्तरी सीमा को विस्तारित किया। इसी प्रकार उसने उत्तर-पूर्व में गम्हरिया व खरसावां पर भी कब्जा किया।
> अर्जुन सिंह द्वितीय का उत्तराधिकारी अमर सिंह था तथा अमर सिंह के बाद जगन्नाथ सिंह चतुर्थ सिंहवंश की गद्दी पर बैठा।
> जगन्नाथ सिंह चतुर्थ
> जगन्नाथ सिंह चतुर्थ के शासनकाल के समय पोरहाट क्षेत्र में हो एवं कोल जनजातियों द्वारा उपद्रव मचाया जा रहा था।
> हो आदिवासियों के उपद्रव को काबू करने हेतु जगन्नाथ सिंह चतुर्थ ने छोटानागपुर खास के नागवंशी राजा दर्पनाथ सिंह की मदद ली, परंतु हो आदिवासियों ने इनकी संयुक्त सेना को भी पराजित कर दिया। 
> हो जनजातियों के साथ-साथ कोल जनजाति के द्वारा भी इस क्षेत्र में लगातार उपद्रव किया जा रहा था। कोल लड़ाका सिंहभूम क्षेत्र से बाहर जाकर भी लूटपाट करते थे। 
> जगन्नाथ सिंह चतुर्थ ने स्थिति को नियंत्रित करने हेतु अंग्रेजों की सहायता ली तथा 1767 ई. में पहली बार
सिंहभूम क्षेत्र में अंग्रेजो ने प्रवेश किया।
> अन्य महत्वपूर्ण राजवंश
> मानभूम के मान वंश
> 8 वीं सदी के दूधपानी शिलालेख (हजारीबाग) और 14वीं सदी में कवि गंगाधर द्वारा निर्मित गोविन्दपुर शिलालेख (धनबाद) से मानभूम के मान वंश की जानकारी प्राप्त होती है।
> इनका शासन हजारीबाग एवं मानभूम क्षेत्र (धनबाद) में विस्तारित था।
> मानवंश के शासक अत्यंत अत्याचारी थे।
> 10वीं सदी में प्रसिद्ध भूमिज स्वराज्य आंदोलन इसी राजवंश के अत्याचार के कारण उभरा।
> मान राजाओं ने सबर जनजाति पर ( विशेषकर महिलाओं पर ) घोर अत्याचार किया जिसके जनजाति ने मानभूम क्षेत्र छोड़कर पंचेत क्षेत्र को अपना आश्रय बना लिया।
> पंचेत मानभूम का सबसे शक्तिशाली राज्य था। 
> रामगढ़ राज्य
> रामगढ़ राज्य की स्थापना 1368 ई. के लगभग बाघदेव सिंह ने की थी।
> बाघदेव सिंह अपने बड़े भाई सिंहदेव के साथ नागवंशी शासकों के दरबार में थे, परन्तु नागवंशी शासकों से इनका मतभेद हो गया।
> इस मतभेद के बाद वे बड़कागांव क्षेत्र में कर्णपुरा आ गये तथा यहाँ के स्थानीय शासक को पराजित कर इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया।
> धीरे-धीरे उन्होनें अन्य 21 परगना पर भी अधिकार प्राप्त कर लिया तथा इनको मिलाकर रामगढ़ राज्य की स्थापना की।
> बाघदेव सिंह ने अपने शासन को स्थायित्व प्रदान करने हेतु समय-समय पर अपनी राजधानी को हस्तानांतरित किया।
> रामगढ़ राज्य का सर्वाधिक उत्कर्ष दलेल सिंह के शासनकाल में हुआ। 
> दलेल सिंह 1667 से 1724 ई. तक रामगढ़ का शासक रहा।
> 1718 ई. में दलेल सिंह ने छै राज्य के राजा मगर सिंह की हत्या कर उसके कई क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। हालांकि 1724 ई. में मगर सिंह के पुत्र रणभस्त खाँ ने दलेल सिंह को पराजित कर अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।
> दलेल सिंह के बाद विष्णु सिंह 1724 से 1763 ई. तक रामगढ़ का शासक रहा ।
> विष्णु सिंह ने छै राज्य पर पुनः कब्जा कर लिया तथा 1747 ई. में रामगढ़ राज्य पर भास्कर राव के नेतृत्व में मराठों के आक्रमण तक यह विष्णु सिंह के अधिकार में ही रहा । 
> 1740 ई. में बंगाल के नवाब अलीवर्दी खाँ ने हिदायत अली खाँ को रामगढ़ से वार्षिक कर वसूलने हेतु भेजा। हिदायत अली खाँ ने रामगढ़ का वार्षिक कर 12,000 रूपये तय किया।
>  1751-52 ई. में नरहत समया के जमींदार कामगार खाँ ने विष्णु सिंह पर आक्रमण कर विष्णु सिंह को समझौता करने हेतु विवश कर दिया।
> बंगाल के नवाब मीर कासिम को सूचना मिली की विष्णु सिंह नवाब विरोधी गतिविधियों में संलिप्त है, जिसके बाद 1763 ई. में मीर कासिम द्वारा मरकत खाँ और असदुल्लाह खाँ के नेतृत्व में भेजी गयी सेना ने विष्णु सिंह को पराजित कर उसके द्वारा अवैध रूप से हड़पे गए क्षेत्रों को उनके मूल मालिकों को सौंप दिया। इसके बदले में मीर कासिम को मुआवजा प्राप्त हुआ।
> विष्णु सिंह के बाद उसका भाई मुकुंद सिंह रामगढ़ का शासक बना तथा उसने छै राज्य को रामगढ़ राज्य में मिला लिया।
> रामगढ़ राज्य की प्रथम राजधानी सिसिया थी तथा अंतिम राजधानी पद्मा थी । 
> रामगढ़ राज्य की राजधानियों का क्रम निम्न प्रकार है:–
क्र.सं.
राजधानी
संस्थापक
1.
सिसिया
बाघदेव सिंह
2. उरदा बाघदेव सिंह
3.
बादम
हेमन्त सिंह
4.
रामगढ़
दलेल सिंह
5.
इचाक
तेज सिंह
6.
पद्मा
ब्रह्मदेव नारायण सिंह
> 1937 ई. में रामगढ़ राज्य के शासक कामाख्या नारायण सिंह बने । 
> 26 जनवरी, 1955 को बिहार राज्य भूमि सुधार अधिनियम की धारा-3 के द्वारा बाघदेव सिंह द्वारा स्थापित रामगढ़ राज्य को समाप्त कर दिया गया।
> खड़गडीहा राज्य
> इस राज्य की स्थापना 15वीं सदी में हंसराज देव ने की थी ।
> हंसराज देव ने बंदावत जाति के शासक को पराजित कर हजारीबाग पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
> इस राज्य का विस्तार वर्तमान गिरिडीह जिला क्षेत्र तक था। 
> हंसराज देव मूलत: दक्षिण भारत का रहने वाला था तथा उसने उत्तर भारत के ब्राह्मणों से वैवाहिक संबंध स्थापित किया।
> खड़गडीहा राज्य के अन्य राजा शिवनाथ सिंह, मोद नारायण, गिरिवर नारायण देव आदि थे। 
> ढालभूम का ढाल वंश
> ढालभूम क्षेत्र का विस्तार सिंहभूम में था।
> ढाल वंश के शासनकाल में नरबलि प्रथा का प्रचलन था।
> पंचेत राज्य
> पंचेत राज्य मानभूम का सर्वाधिक शक्तिशाली राज्य था।
> इस राज्य का राजचिह्न कपिला गाय का पूँछ या चँवर था। इसी कारण इस राज्य के राजाओं को गोमुखी राजा कहा गया।
> विभिन्न काल से संबंधित झारखण्ड के कुछ प्रमुख स्मारक / स्थान
क्र.स. स्मारक /स्थान का नाम
अवस्थिति
विशेषता
1.
हाराडीह मंदिर समूह
तमाड़ (राँची)
दुर्गा व काली के प्राचीन मंदिर
2.
शाहपुर किला
मेदिनीनगर (पलामू)
मुगलकालीन स्थापत्यकला
3.
कोल्हुआ पहाड़ी
चतरा
दंतकथाओं की पेंटिंग प्राप्त
4.
तेलियागढ़ किला
राजमहल (साहेबगंज)
मुगल सरदारों द्वारा निर्मित
5.
नवरत्नगढ़ किला
गुमला
दुर्जन शाल द्वारा निर्मित
6.
प्राचीन स्थल तथा टैंक
बेनीसागर (प० सिंहभूम)
5वीं-6ठी सदी से संबंधित
7.
शिव मंदिर
शेकपरता (लोहरदगा)
मध्यकाल से संबंधित
8.
जामी मस्जिद
हदफ (साहेबगंज)
16वीं सदी से संबंधित
9.
बारादरी
अर्जीमुखीपुर (साहेबगंज)
16वीं सदी से संबंधित
10.
असुर स्थल
कुजला (खूँटी)
ऐतिहासिक स्थल
11.
असुर स्थल
खूँटीटोला (खूँटी)
ऐतिहासिक स्थल
12.
असुर स्थल
सारिदकेल (खूँटी)
ऐतिहासिक स्थल
13.
असुर स्थल
कथरटोली (खूँटी)
ऐतिहासिक स्थल
14.
असुर स्थल
हंसा (खूँटी)
ऐतिहासिक स्थल
15.
पुराना किला
रूआम (पू० सिंहभूम)
ऐतिहासिक स्थल
16.
पुराना टीला, कुलगढ़ा
इटागढ़ (स०-खरसावां)
ऐतिहासिक स्थल
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Tue, 13 Jun 2023 21:03:42 +0530 Jaankari Rakho
मध्य काल में झारखण्ड https://m.jaankarirakho.com/मध्य-काल-में-झारखण्ड https://m.jaankarirakho.com/मध्य-काल-में-झारखण्ड मध्य काल 
> पूर्व मध्य काल 
> उत्तर मध्य काल 
> पूर्व मध्य काल 
> हर्षवर्धन की मृत्यु और दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बीच की अवधि को पूर्व मध्यकाल कहा जाता है 
> झारखण्ड राज्य का संबंध पूर्व मध्यकाल से भी रहा है।
> महामाया मंदिर ( गुमला )
> हापामुनि गाँव में स्थित महामाया मंदिर इस बात का प्रमाण है कि झारखण्ड राज्य का संबंध पूर्व मध्यकाल से रहा है।
> महामाया मंदिर का निर्माण नागवंशी शासक गजघंट राय ने 908 ई. में कराया था।
> सियानाथ देव के द्वारा इसमें विष्णु की प्रतिमा स्थापित की गयी थी।
> इस मंदिर का प्रथम पुरोहित द्विज हरिनाथ नामक मराठा ब्राह्मण था। यह गजघंट राय का धार्मिक गुरू था। 
> टांगीनाथ का मंदिर
> यह मंदिर गुमला में अवस्थित है।
> इस मंदिर का निर्माण भी इसी काल में हुआ है।
> छिन्नमस्तिका शक्तिपीठ
> रजरप्पा (रामगढ़) का अष्ठभुजी छिन्नमस्तिका शक्तिपीठ भी पूर्व मध्यकाल की पुष्टि करता है। 
> छिन्नमस्तिका बौद्ध ब्रजयोगिनी का ही हिन्दू प्रतिरूप है।
> ईटखोरी ( चतरा )
> झारखण्ड के ईटखोरी (चतरा) से पाल शासक महेन्द्रपाल के शिलालेख मिले हैं। 
> पाल काल में ही ईटखोरी में माँ भद्रकाली की मूर्ति का निर्माण किया गया।
> उत्तर मध्यकाल
> बख्तियार खिलजी
> 1206 ई. (13वीं शताब्दी) में बख्तियार खिलजी ने झारखण्ड होकर बंगाल के सेन वंशी शासक लक्ष्मण सेन की राजधानी नादिया पर आक्रमण किया था।
> गुलाम वंश के इल्तुतमिश और बलबन के समय झारखण्ड इनके प्रभाव से मुक्त था, क्योंकि उस समय का नागवंशी राजा हरिकर्ण प्रभावशाली और शक्तिशाली था।
> अलाउद्दीन खिलजी
> अलाउद्दीन खिलजी ने 1310 ई. में अपने सेनापति छज्जू मलिक को नागवंशी राज्य पर विजय प्राप्त करने हेतु भेजा था।
> अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति छज्जू मलिक ने नागवंशी शासक को कर देने के लिए विवश किया। अलाउद्दीन खिलजी का सेनापति मलिक काफूर दक्षिण भारत के विजय अभियान पर जाते समय झारखण्ड से गुजरा था।
> नागवंशी राजा बेणु कर्ण ने अलाउद्दीन खिलजी की अधीनता स्वीकार की थी।
> मोहम्मद बिन तुगलक
> तुगलक वंश के शासक मोहम्मद बिन तुगलक का सेनापति मलिक बया हजारीबाग क्षेत्र में चाई-चांपा तक आ पहुंचा था जबकि संथाली स्रोत के अनुसार यह आक्रमण इब्राहिम अली के नेतृत्व में हुआ। इस आक्रमण के दौरान इब्राहिम अली द्वारा बीघा के किले पर अधिकार के बाद संथाल लोग अपने सरदार के साथ यहां से भाग गए।
> मलिक बया ने हजारीबाग के चाई किला को जीतकर फतेहखान दौरा के हवाले कर दिया था। 
> मोहम्मद बिन तुगलक ने छज्जुदीन आजमुल मुल्क को सतगावां का शासक नियुक्त किया था। 
> तुगलक के काल में नागवंशी राजा हरि कर्ण था। 
> फिरोजशाह तुगलक
> फिरोजशाह तुगलक ने बंगाल के शासक शम्सीउद्दीन शाह को पराजित कर हजारीबाग के सतगाँवा क्षेत्र पर विजय प्राप्त किया था इसे अपने जीते हुए क्षेत्रों की राजधानी बनाया।
> लोदी वंश
> लोदी वंश के सुल्तानों के प्रभाव से झारखण्ड लगभग मुक्त था। इस काल में छोटानागपुर पर शासन करने वाले नागवंशी राजा प्रतापकर्ण, छत्रकर्ण एवं विराटकर्ण थे।
> लोदी वंश के समकालीन उड़ीसा के गजपति वंश का सामना झारखण्ड को करना पड़ा।
> कपिलेन्द्र गजपति (गजपति वंश का संस्थापक) उस समय दक्षिण-पूर्वी भारत एक शक्तिशाली शासक था। उसने संथाल परगना तथा हजारीबाग को छोड़कर नागवंशी राज्य के बहुत बड़े भू-भाग पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।
> 1494 ई. में सिकंदर लोदी के भय से जौनपुर के शासक हुसैन शाह सर्की ने झारखण्ड के साहेबगंज में शरण ली थी। 
> आदिल शाह द्वितीय
> खान देश का शक्तिशाली शासक आदिलशाह द्वितीय / आदिल खान द्वितीय ने अपने सैन्य दल को झारखण्ड भेजा था। अतः उसे झारखण्डी सुल्तान के नाम से भी जाना जाता है।
> शेरशाह
> शेरशाह ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष के अपने विभिन्न अभियानों में झारखण्ड क्षेत्र का प्रयोग किया था। 
> 1534-37 ई. के अपने बंगाल अभियान के दौरान शेरशाह झारखण्ड से होकर गुजरा था । इस अभियान के दौरान शेरशाह के पुत्र जलाल खाँ ने तेलियागढ़ी (राजमहल क्षेत्र) की नाकाबंदी की थी। 
> शेरशाह बंगाल अभियान के बाद मुगलों को चकमा देकर राजमहल (झारखण्ड) के रास्ते ही रोहतासगढ़ पहुँचा तथा 1538 ई. में रोहतासगढ़ के किले पर अधिकार कर लिया।
> शेरशाह के शासनकाल में झारखण्ड में शाही सिक्कों का प्रचलन तेज हुआ।
> झारखण्ड में मुस्लिमों के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करने का श्रेय शेरशाह को जाता है।
> 1538 ई. में शेरशाह के सेनापति खवास खाँ ने दरिया खाँ के साथ मिलकर चेरो महाराजा महारथ चेरो को परास्त कर श्याम सुंदर नामक एक हाथी प्राप्त किया।
> 1539 में चौसा के युद्ध में शेरशाह ने मुगल शासक हुमायूँ को पराजित कर रोहतास से वीरभूम तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। इसके बाद लगभग 35 वर्षों तक राजमहल क्षेत्र पर शेरशाह व उनके वंशजों का अधिकार रहा।
> हुमायूँ
> मुगल-अफगान संघर्ष (1530-40 ई.) के दौरान एक बार हुमायूँ भुरकुंडा (हज़ारीबाग) तक पहुँच गया था। 
> अकबर
> झारखण्ड के संदर्भ में अकबर के शासनकाल को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है शासनकाल का पूर्वार्द्ध (1556-76 ई.) एवं शासनकाल का उत्तरार्द्ध (1576-1605 ई.)। अकबर ने अपने शासनकाल के पूर्वार्द्ध में झारखण्ड क्षेत्र में सक्रिय अफगानों पर विजय प्राप्त किया तथा उत्तरार्द्ध में क्षेत्रीय राजवंशों पर शासन स्थापित किया। 
> अकबर के शासनकाल का पूर्वार्द्ध - अफगानों पर विजय
> अकबर के विरूद्ध अभियान में अफगानों ने झारखण्ड के क्षेत्र का उपयोग किया।
> 1575 ई. के टकरोई की लड़ाई के बाद जुनैद कर्रानी ने बिहार जाने के क्रम में रामपुर ( वर्तमान ) रामगढ़ में रूका, जहाँ इसका पीछा करते हुए मुगलों की सेना भी आ गयी । यहाँ जुनैद कर्रानी व मुगलों की सेना के बीच हुए रामपुर की लड़ाई में मुगलों की जीत हुई।
> अकबर के शासनकाल का उत्तरार्द्ध - क्षेत्रीय राजवंशों पर शासन
1. छोटानागपुर खास का नागवंश
> अकबर नागवंशों की राजधानी कोकरह/खुखरा को अपने नियंत्रण में लेना चाहता था। इसका प्रमुख कारण दक्षिण भारत जाने हेतु या युद्ध में इस क्षेत्र का उपयोग (सामरिक कारण), साम्राज्य विस्तार ( राजनीतिक कारण), इस क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि (आर्थिक कारण) आदि थे।
> अकबर ने 1585 ई. में शाहबाज खाँ को झारखण्ड पर विजय प्राप्त करने हेतु भेजा। इस युद्ध में नागवंशी शासक मधुकरण शाह की पराजय हुयी तथा मधुकरण शाह ने वार्षिक मालगुजारी देना स्वीकार किया।
> बाद में मधुकरण शाह ने उड़ीसा के शासक कुतुल खाँ एवं उसके पुत्र निसार खाँ के विरूद्ध मुगल मनसबदार मान सिंह के अभियान (1590-92 ई.) में मुगलों का साथ दिया।
2. पलामू का चेरो वंश
> 1589 ई. में राजा मानसिंह को अकबर ने बिहार-झारखण्ड का सूबेदार नियुक्त किया।
> मान सिंह ने 1590 ई. में पलामू के चेरो राजा भागवत राय को पराजित कर मुगलों की अधीनता स्वीकार करने हेतु विवश कर दिया।
> पलामू में मुगलों की सेना नियुक्त करके भगवत राय को राजा बने रहने दिया।
> 1605 ई. में अकबर की मृत्यु के बाद चेरों ने मुगलों की सेना को मार भगाया तथा पलामू पर पुनः अपनी सत्ता स्थापित कर ली।
3. सिंहभूम का सिंह वंश
> 1592 ई. में उड़ीसा अभियान हेतु जाते समय मानसिंह सिंहभूम क्षेत्र से होकर गुजरा। इस समय सिंहभूम के पोरहाट में सिंहवंशी राजा रणजीत सिंह का शासन था।
> मानसिंह ने इस दौरान रणजीत सिंह को मुगलों की अधीनता स्वीकारने हेतु विवश कर दिया तथा उसे अपने अंगरक्षक दल में शामिल कर लिया।
> 1592 ई. में ही मानसिंह ने राजमहल ( साहेबगंज) को बंगाल की राजधानी बनाया।
> मानसिंह ने परकोटा व महल वाले नगरों का संयुक्त रूप से 'अकबर नगर' नामकरण किया। 
4. मानभूम व हजारीबाग के राजवंश 
> 1590-91 ई. में मानसिंह मिदनापुर के अभियान पर जाते समय मानभूम से गुजरा। इस दौरान उसने परा तथा तेलकुप्पी के मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया।
> 'आइन-ए-अकबरी' के अनुसार हजारीबाग के 'छै' और 'चम्पा' परगना बिहार सूबा में शामिल थे जिसकी वार्षिक मालगुजारी 15,500 रूपये निर्धारित की गयी। 
> जहाँगीर
> झारखण्ड के संदर्भ में जहाँगीर के शासनकाल का संबंध छोटानागपुर खास के नागवंश, पलामू के चेरो वंश, विष्णुपुर व पंचेत पर आक्रमण तथा शाहजहाँ (शाहजादा खुर्रम) के राजमहल आगमन से है। 
1. छोटानागपुर खास का नागवंश
> जहांगीर की आत्मकथा 'तुजुक-ए-जहांगीरी' में छोटानागपुर क्षेत्र से सोने की प्राप्ति का उल्लेख मिलता है। 
> अपनी आत्मकथा 'तुजुक-ए-जहाँगीरी' में जहाँगीर ने स्थानीय लोगों द्वारा शंख नदी से हीरे प्राप्त करने के तरीकों का वर्णन किया है। जहाँगीर इस क्षेत्र की नदियों में मिलने वाले हीरों के कारण इन पर अधिकार करना चाहता था।
> जहाँगीर के समय कोकरह का शासक दुर्जनशाल (मधुकरण शाह का उत्तराधिकारी) था जिसने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने तथा मालगुजारी देने से मना कर दिया।
> जहाँगीर ने 1612 ई. में जफर खाँ को बिहार का नया सूबेदार नियुक्त किया तथा उसे कोकरह क्षेत्र पर अधिकार करने का आदेश दिया। परन्तु बीमारी के कारण जफर खाँ की मृत्यु हो गयी तथा जहाँगीर की इच्छा अधूरी रह गयी।
> जहाँगीर ने 1615 ई. में इब्राहिम खाँ को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया तथा उसे कोकरह (झारखण्ड) पर विजय प्राप्त करने हेतु भेजा।
> इस दौरान इब्राहिम खाँ ने इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त कर लिया तथा हीरों के लिए प्रसिद्ध 'शंख नदी' को अपने अधिकार में ले लिया।
> इब्राहिम खाँ ने नागवंशी राजा दुर्जनशाल * को मुगलों की अधीनता स्वीकार करने का आदेश दिया तथा इससे मना करने पर दुर्जनशाल को 12 वर्षों तक (1615-27) ग्वालियर के किले में बंदी बनाकर रखा गया था। 
> इस अभियान से जुड़े सभी व्यक्तियों को पुरस्कृत किया गया तथा इब्राहिम खाँ को 'फाथ जंग' की उपाधि प्रदान करते हुए चार हजारी मनसबदार बनाया गया।
> 1627 ई. में जहाँगीर के दरबार में एक हीरे की असलियत को लेकर विवाद हो गया। इन हीरों को परखने हेतु दुर्जनशाल को ग्वालियर से शाही दरबार में बुला लिया गया। दुर्जनशाल द्वारा हीरे की पहचान कर लेने के बाद जहाँगीर ने खुश होकर दुर्जनशाल को शाह की पदवी प्रदान करते हुए मुक्त कर दिया तथा उसका राज्य वापस कर दिया। इसके बदले दुर्जनशाल ने मुगल शासक जहाँगीर को 6,000 रूपये वार्षिक कर देना स्वीकार किया। 
2. पलामू का चेरो वंश
> 1607 ई. में अबुल फजल के पुत्र अफजल खाँ को जहाँगीर ने बिहार का सूबेदार नियुक्त किया। 
> अफजल खाँ ने जहाँगीर के आदेश से पलामू के चेरो राजाओं के विरूद्ध एक सैन्य अभियान चलाया। उसके आक्रमण के समय पलामू का चेरवंशी शासक अनंत राय था । परन्तु आक्रमण के दो सप्ताह के भीतर ही बीमारी से अफजल खाँ की मृत्यु हो गयी तथा यह अभियान असफल हो गया।
> 1612 ई. में अनंत राय की मृत्यु के पश्चात सहबल राय पलामू का शासक बना। इसने अपने राज्य का विस्तार सड़क-ए-आजम (जी.टी. रोड) पर चौपारण (हजारीबाग) तक कर लिया।
> सहबल राय बंगाल की ओर जाने वाले मुगल काफिलों को लूट लिया करता था। इससे शाहजहाँ नाराज हो गया तथा उसने सहबल राय को बंदी बनाकर दिल्ली लाने का आदेश दिया। 
> जहाँगीर ने अपने मनोरंजन हेतु सहबल राय को एक बाघ से लड़ने का आदेश दिया। इस लड़ाई में सहबल राय की मृत्यु हो गयी।
> सहबल राय की मृत्यु का समाचार मिलते ही चेरों ने सीमावर्ती मुगल क्षेत्रों में उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया जिसका मुगल अधिकारियों ने दमन कर दिया।
3. विष्णुपुर व पंचेत पर आक्रमण
> जहाँगीर के शासन काल में मुगल सेना ने मानभूम के विष्णुपुर पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। 
> जहाँगीर द्वारा 1607 ई. में अफजल खाँ को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया गया था। अफजल खाँ ने बंगाल के मुगल सूबेदार इस्लाम खाँ के साथ मिलकर पंचेत के जमींदार वीर हमीर को पराजित किया।
4. खुर्रम (शाहजहाँ) का राजमहल आगमन
> खुर्रम जहाँगीर का पुत्र तथा दक्षिण भारत का मुगल सूबेदार था।
> खुर्रम ने 1622 ई. में मुगल बादशाह जहाँगीर के विरूद्ध विद्रोह कर दिया तथा बर्दमान होते हुए राजमहल आ पहुँचा। 
> खुर्रम ने राजमहल क्षेत्र में बंगाल के मुगल सूबेदार इब्राहिम खाँ को एक लड़ाई में मार दिया तथा राजमहल पर अधिकार कर लिया।
> बाद में मुगल बादशाह से सुलह होने के पश्चात खुर्रम पुनः दक्षिण भारत लौट गया। 
> शाहजहाँ
> झारखण्ड के संदर्भ में शाहजहाँ के शासनकाल का संबंध छोटानागपुर खास के नाग वंश, पलामू के चेरो वंश, सिंहभूम के सिंह वंश तथा अन्य क्षेत्रीय राजवंशों से है।
1. छोटानागपुर खास का नागवंश
> जहाँगीर की बंदी से मुक्त होकर दुर्जनशाल 1627 ई. में अपनी राजधानी कोकरह आया तथा 1640 ई. तक यहाँ शासन किया।
> दुर्जनशाल ने सुरक्षा की दृष्टि से अपनी राजधानी कोकरह से दोइसा स्थानांतरित कर दी जो लगभग 100 वर्ष तक नागवंशियों की राजधानी रहा ।
> दुर्जनशाल ने दोइसा में अनेक सुंदर भवनों का निर्माण करवाया जिस पर मुगल स्थापत्य कला का स्पष्ट प्रभाव था। इन भवनों में नवरतनगढ़ नामक महल सर्वाधिक महत्वपूर्ण भवन था । इस भवन में मुगलों से प्रभावित झरोखा दर्शन की भी व्यवस्था थी।
> दुर्जनशाल की मृत्यु के उपरांत 1640 ई. में रघुनाथ शाह (1640-90 ई.) तक नागवंशी शासक रहा। रघुनाथ शाह के शासनकाल में खानजादा ( मुगल सैन्य अधिकारी) ने आक्रमण किया जिसके परिणामस्वरूप रघुनाथ शाह ने मुगल बादशाह को मालगुजारी देना स्वीकार करके संधि कर ली। 
2. पलामू का चेरो वंश
> शाहजहाँ के शासनकाल के समय पलामू का शासक प्रताप राय (सहबल राय का उत्तराधिकारी) था। यह अत्यंत शक्तिशाली एवं समृद्ध शासक था।
> 1632 ई. में बिहार के मुगल सुबेदार अब्दुल्ला खाँ ने पलामू क्षेत्र की मालगुजारी को 1,36,000 रूपये कर दिया जिसे देने हेतु प्रताप राय ने लोगों से अधिकाधिक धन वसूलने का प्रयास किया।
> मुगलों द्वारा मालगुजारी की राशि को निरंतर बढ़ाया जाता रहा जिसके परिणामस्वरूप प्रताप राय ने कर देना ही बंद कर दिया।
> शाहजहाँ ने शाइस्ता खाँ को बिहार का नया सूबेदार नियुक्त किया तथा पलामू पर अधिकार करने का आदेश दिया। 
> शाइस्ता खाँ ने 1641 में पलामू के चेरो राज्य पर आक्रमण किया। प्रताप राय ने इस आक्रमण के बाद शाइस्ता खाँ से संधि करते हुए 80,000 रूपये देने व पटना में हाजिरी लगाना स्वीकार किया। 
> 80,000 रूपये प्राप्त करके शाइस्ता खाँ 1642 ई. में पटना लौट गया।
> 1642 ई. प्रताप राय ने मुगल शासक को वार्षिक मालगुजारी नहीं दिया।
> 1643 ई. में शाहजहाँ ने इतिकाद खाँ को बिहार का सूबेदार नियुक्त किया तथा पलामू के शासक के विरूद्ध कार्रवाई करने का आदेश दिया।
> इतिकाद खाँ ने जबरदस्त खाँ को पलामू पर आक्रमण करने हेतु भेजा। परंतु मुगलों की सेना को पलामू की ओर आता देख प्रताप राय ने संधि करने हेतु प्रस्ताव भेजा। इस प्रस्ताव में प्रताप राय ने 1 लाख रूपये व 1 हाथी देने के अतिरिक्त साथ पटना चलने की स्वीकृति प्रदान की।
> इतिकाद खाँ की सिफारिश पर 1644 ई. में शाहजहाँ ने प्रताप राय को 1,000 मनसब प्रदान किया तथा पलामू को उसी के अधिकार में देते हुए 1 करोड़ रूपये की सालाना मालगुजारी तय कर दी। ENGEY पलामू पर आक्रमण कर प्रताप राय को संधि हेतु विव करने वाले जबरदस्त खाँ को दो हजारी मनसबदार नियुक्त किया गया।
> प्रताप राय की मृत्यु के बाद पलामू पर कुछ समय तक भूपाल राय तथा उसके बाद मेदिनी राय का शासन रहा। 
> पुराना पलामू किला का निर्माण प्रताप राय के शासन काल में हुआ था। बाद में मेदिनी राय ने यहाँ पर नया किला का निर्माण कराया था।
3. सिंहभूम का सिंह वंश
> शाहजहाँ के समय सिंहवंशी शासक उड़ीसा के मुगल सूबेदार के माध्यम से मालगुजारी देते थे।
4. अन्य क्षेत्रीय राजवंश
> शाहजहाँ के शासनकाल में पंचेत के राजा वीर नारायण सिंह ने मुगलों से पराजित होने के बाद अपनी राजधानी को परिवर्तित कर दिया।
> 1639 ई. में बंगाल की राजधानी राजमहल थी । यहाँ पर मुगलों का एक टकसाल भी था। 
> औरंगजेब के शासनकाल में बंगाल की राजधानी को राजमहल से परिवर्तित करके ढाका कर दिया गया।
> शाह शूजा
> शाह शूजा शाहजहाँ का पुत्र था।
> यह बंगाल और उड़ीसा का गवर्नर था।
> इसने भी राजमहल को अपनी राजधानी बनाया था । 
> औरंगजेब
> झारखण्ड के संदर्भ में औरंगजेब के शासनकाल का संबंध छोटानागपुर खास के नाग वंश, पलामू के चेरो वंश, सिंहभूम के सिंह वंश तथा अन्य क्षेत्रीय राजवंशों से है।
1. छोटानागपुर खास का नागवंश
> नागवंशी शासक रघुनाथ शाह (1640-90 ई.) और रामशाह (1690-1715 ई.) औरंगजेब के समकालीन थे। 
> औरंगजेब के शासनकाल में अधिकांश समय तक कोकरा का नागवंशी राजा रघुनाथ शाह था। रघुनाथ शाह का धर्मगुरु ब्रह्मचारि हरिनाथ था।
> रघुनाथ शाह अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति और दानी स्वभाव का था। रघुनाथ शाह के शासन काल में लक्ष्मीनारायण तिवारी ने मदन मोहन मंदिर (बोड़ेया, राँची) का निर्माण कराया। रघुनाथ शाह के शासनकाल में हरि ब्रह्मचारी ने राँची के चुटिया नामक स्थान पर राम-सीता मंदिर का निर्माण कराया।
> फ्रांसीसी यात्री टैवरनियर के अनुसार रघुनाथ शाह के राज्य पर केवल एक बार ही मुगल आक्रमण हुआ जिससे रघुनाथ शाह को अधिक क्षति नहीं हुयी ।
> औरंगजेब के शासनकाल में ही पलामू के चेरोवंशी राजा मेदिनी राय ने रघुनाथ शाह की राजधानी दोइसा पर आक्रमण कर व्यापक लूटपाट किया।
> इस लूटपाट में मेदिनी राय को पत्थर का एक विशाल फाटक प्राप्त हुआ।
> मेदिनी राय ने पलामू के पुराने किले के समीप एक पहाड़ पर नया किला का निर्माण कराया तथा इसमें दोयसा से प्राप्त पत्थर का विशाल फाटक लगवाया। इस फाटक को नागपुर दरवाजा कहा जाता है। 
> रघुनाथ शाह के बाद रामशाह नागवंश का शासक बना जिसका मुगल बादशाह औरंगजेब के साथ सौहार्द्रपूर्ण संबंध था।
> 1692 ई. में रामशाह ने औरंगजेब को 9,705 रूपये मालगुजारी के रूप में प्रदान किया।
> रामशाह ने पलामू, रीवा एवं सिंहभूम राज्यों पर आक्रमण किया था। इसने रीवा व सिंहभूम के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किया था।
> रामशाह ने अपने पुत्र ऐनी शाह का विवाह रीवा नरेश की पुत्री से किया तथा अपनी दो बहनों का विवाह सिंहभूम के राजा जगन्नाथ सिंह के साथ किया था।
2. पलामू का चेरो वंश
> औरंगजेब के शासन के प्रारंभिक काल में पलामू में चेरो राजा मेदिनी राय का शासन था।
> मेदिनी राय (1658-74 ई.) सर्वाधिक शक्तिशाली चेरोवंशी शासक था।
> मेदिनी राय ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने तथा उन्हें कर देने से मना कर दिया था। इसके साथ ही वह सीमावर्ती मुगल राज्यों पर आक्रमण कर लूटपाट भी करता था ।
> औरंगजेब ने अपने सूबेदार दाउद खाँ को 1660 ई. में पलामू पर आक्रमण करने व मेदिनी राय से कर वसूलने हेतु भेजा।
> 23 अप्रैल, 1660 को दाउद खाँ पटना से चला तथा सबसे पहले दाउद खाँ ने 5 मई, 1660 को कोठी के किले तथा इसके बाद 3 जून, 1660 को कुंडा के किले पर अधिकार कर लिया।
> कुंडा के शासक चुनराय ने पराजित होने के बाद इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। इससे नाराज होकर मेदिनी राय के कहने पर सुरवर राय ( चुनराय के भाई) ने चुनराय की हत्या कर दी।
> 25 अक्टूबर, 1660 को दाउद खाँ चेरो राज्य की राजधानी की ओर आक्रमण हेतु बढ़ा तथा 3 नवंबर, 1660 को तरहसी पहुँचा। मेदिनी राय ने अपने मंत्री सूरत सिंह के माध्यम से तरहसी पहुँचे दाउद खाँ को संधि का प्रस्ताव भेजा।
> दाउद खाँ ने संधि के इस प्रस्ताव की सूचना औरंगजेब को भेजी तथा बादशाह का उत्तर आने तक युद्ध विराम की घोषणा कर दी।
> इसी बीच पलामू के राजा के कुछ लोगों ने मुगलों के एक काफिले को लूट लिया। इससे नाराज होकर दाउद खाँ पलामू पर आक्रमण करने हेतु राजधानी तक आ गया।
> मेदिनी राय युद्ध की तैयारी करने लगा। इसी दौरान औरंगजेब ने मेदिनी राय को इस्लाम धर्म स्वीकारने और एक निश्चित दर से कर देने हेतु प्रस्ताव भेजा। इसे स्वीकार करने पर मेदिनी राय को उसके पद पर बने रहने देने का प्रस्ताव था।
> मेदिनी राय ने औरंगजेगब का यह प्रस्ताव ठुकरा दिया तथा युद्ध की घोषणा कर दी।
> औरंगा नदी के तट पर स्थित नये किले के समीप मुगलों की सेना तथा मेदिनी राय के बीच गया। इसमें अंग्रेजो की सेना भारी पड़ी तथा मेदिनी राय की सेना कमजोर पड़ने लगी। 
> मेदिनी राय ने किले से किमती सामान देकर महिलाओं व बच्चों को जंगल में भेज दिया तथा स्वयं नये किले में ही रूक गया। 
> मुगल सेना द्वारा नये किले पर आक्रमण करने के बाद मेदिनी राय भी जंगल की ओर भाग गया। बाद में मेदिनी राय ने सरगुजा में शरण ली थी।
> इस प्रकार पुराने व नये किले सहित चेरो राज्य पर मुगलों ने अधिकार कर लिया। 
> कुछ समय बाद साहसी चेरों ने पुनः देवगन के किले के पास मुगलों से युद्ध किया, परंतु दाउद खाँ के एक सेनापति शेख शफी ने उन्हें पराजित कर इस किले पर भी कब्जा कर लिया।
> दाउद खाँ ने पलामू पर विजय प्राप्त करने के बाद यहाँ प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करके मनकली खाँ को यहाँ का फौजदार नियुक्त कर दिया तथा स्वयं पटना लौट गया।
> दाउद खाँ ने पलामू विजय स्मृति में पलामू किला में एक मस्जिद का निर्माण कराया था। दाउद खाँ पटना लौटते समय पलामू किले का 'सिंह द्वार' अपने साथ ले गया तथा उसे दाउदनगर की अपनी गढ़ी में लगवा दिया।
> इस अभियान की सफलता से खुश होकर मुगल बादशाह औरंगजेब ने दाउद खाँ को पुरस्कार के रूप में 50,000 रूपये की मोतियों की माला दी तथा औरंगाबाद स्थित अमछा, मनोस व गोह नामक स्थान उसके अधीन कर दिया। 
> 22 अगस्त, 1966 को पलामू को बिहार के सूबेदार के अधीन करते हुए मनकली खाँ को स्थानांतरित कर दिया गया।
> मनकली खाँ के जाने के बाद मेदिनी राय सरगुजा से पुनः पलामू लौट गया तथा अपने राज्य पर अधिकार कर लिया। 
> मेदिनी राय ने अपनी बुद्धिमतापूर्ण नीति के द्वारा शीघ्र ही पलामू राज्य की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर दिया। 
> मेदिनी राय को ‘न्यासी राजा' की संज्ञा दी जाती है तथा मेदिनी राय के शासनकाल को 'चेरो शासन का स्वर्ण युग' की संज्ञा दी जाती है ।
> 1674 ई. में मेदिनी राय की मृत्यु हो गयी जिसके बाद पलामू पर क्रमशः रूद्र राय (1674-80 ई.), दिकपाल राय (1680–97 ई.) एवं साहेब राय (1697-1716 ई.) का शासन रहा। 
3. अन्य क्षेत्रीय राजवंश
> औरंगजेब के शासनकाल में हजारीबाग क्षेत्र में पाँच प्रमुख राज्य रामगढ़, कुंडा, छै, केंदी एवं खड़गडीहा थे। 
> इनमें रामगढ़ सर्वाधिक महत्वपूर्ण था । इस समय व इसके बाद (1667-1724 तक) रामगढ़ का राजा दलेल सिंह था ।
> 1670 ई. में दलेल सिंह ने अपनी राजधानी को बादम से हटाकर रामगढ़ में स्थापित कर दी, क्योंकि बादम मुस्लिम आक्रमणकारियों के मार्ग के बीच में स्थित था।
> दलेल सिंह ने चाय के शासक मगर खान को पराजित कर उसकी हत्या कर दी थी ।
> रामगढ़ राज्य के उत्तर-पूर्वी भाग में खड़गडीहा अवस्थित था तथा यह हमेशा औरंगजेब के आक्रमण से बचा रहा। 
> कुंडा राज्य की स्थापना औरंगजेब के एक अधिकारी राम सिंह ने की थी। 1669 ई. में औरंगजेब ने राम सिंह को मराठों-पिंडारियों से रक्षा हेतु बाबलतार, पिंभुरी, बरवाडीह व नाग दर्रा की जिम्मेदारी प्रदान की।
> केंदी राज्य वर्तमान चतरा जिले में स्थित था जिसके पूर्व में छै राज्य अवस्थित था।
> औरंगजेब द्वारा बंगाल की राजधानी को राजमहल से ढाका स्थानांतरित करने के बाद 1695-96 में मिदनापुर (बंगाल) के शोभा सिंह व उड़ीसा के अफगान रहीम खाँ ने राजमहल क्षेत्र में लूटपाट की तथा इस पर कब्जा कर लिया। 1697 ई. में जबरदस्त खाँ ने इसे पुनः मुक्त कराया।
> मराठा के आक्रमण के परिणामस्वरूप झारखण्ड पर से मुगलों का प्रभाव समाप्त हो गया। 
> झारखण्ड में धनबाद एकमात्र ऐसा क्षेत्र था जो मुस्लिम आक्रमणों से पूर्णतः बचा रहा था।
> अन्य तथ्य
> पाल शासकों के काल में झारखण्ड में बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा का विस्तार हुआ। 
> उड़ीसा के राजा नरसिंहदेव द्वितीय ने 12वीं सदी में स्वयं को झारखण्ड का राजा घोषित कर दिया।
> गुलाम वंश के समय झारखण्ड की सीमा में मुस्लिम सेनाओं की छावनियाँ स्थापित की गयी थी। 
> इल्तुतमिश तथा बलबन के शासनकाल में झारखण्ड गुलाम वंश के प्रभाव से मुक्त रहा था। 
> इल्तुतमिश तथा बलबन के समय झारखण्ड में शक्तिशाली नागवंशी राजा हरि कर्ण का शासन था। 
> कोकरह के नागवंशी शासकों को मुगलकालीन ग्रंथों में 'जमींदार - ए - खाँ - अलामा' (हीरों के खान का मालिक) से संबोधित किया गया है।
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Tue, 13 Jun 2023 19:56:42 +0530 Jaankari Rakho
प्राचीन काल में झारखण्ड https://m.jaankarirakho.com/प्राचीन-काल-में-झारखण्ड https://m.jaankarirakho.com/प्राचीन-काल-में-झारखण्ड प्राचीन काल 
> मौर्य काल 
> मौर्योत्तर काल
> गुप्त काल 
> गुप्तोत्तर काल
> मौर्य काल 
> मगध से दक्षिण भारत की ओर जाने वाला व्यापारिक मार्ग झारखण्ड से होकर जाता था। अतः मौर्यकालीन झारखण्ड का अपना राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक महत्व था।
> कौटिल्य का अर्थशास्त्र
> कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस क्षेत्र को कुकुट / कुकुटदेश नाम से इंगित किया गया है।
> कौटिल्य के अनुसार कुकुटदेश में गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली स्थापित थी।
> कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य ने आटविक नामक एक पदाधिकारी की नियुक्ति की थी, जिसका उद्देश्य जनजातियों का नियंत्रण, मगध साम्राज्य हेतु इनका उपयोग तथा शत्रुओं से इनके गठबंधन को रोकना था।
> इन्द्रनावक नदियों की चर्चा करते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि इन्द्रनावक की नदियों से हीरे प्राप्त किये जाते थे। इन्द्रनावक संभवतः ईब और शंख नदियों का इलाका था।
> चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में सेना के प्रयोग हेतु झारखण्ड से हाथी मंगाया जाता था।
> अशोक
> अशोक के 13वें शिलालेख में समीपवर्ती राज्यों की सूची मिलती है, जिसमें से एक आटविक/आटव/आटवी प्रदेश (बघेलखण्ड से उड़ीसा के समुद्र तट तक विस्तृत) भी था और झारखण्ड क्षेत्र इस प्रदेश में शामिल था।
> अशोक का झारखण्ड की जनजातियों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण था।
> अशोक के पृथक कलिंग शिलालेख - II में वर्णित है कि 'इस क्षेत्र की अविजित जनजातियों को मेरे धम्म का आचरण करना चाहिए, ताकि वे लोक व परलोक प्राप्त कर सकें।' 
> अशोक ने झारखण्ड में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु रक्षित नामक अधिकारी को भेजा था।
> मौर्योत्तर काल
> मौर्योत्तर काल में विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में अपने-अपने राज्य स्थापित किये। इसके अलावा भारत का विदेशों से व्यापारिक संबंध भी स्थापित हुआ जिसके प्रभाव झारखण्ड में भी दिखाई देते हैं। 
> सिंहभूम
> सिंहभूम से रोमन साम्राज्य के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिससे झारखण्ड के वैदेशिक संबंधों की पुष्टि होती है 
> चाईबासा
> चाईबासा से इण्डो-सीथियन सिक्के प्राप्त हुए हैं।
> राँची
> राँची से कुषाणकालीन सिक्के प्राप्त हुए हैं जिससे यह ज्ञात होता है कि यह क्षेत्र कनिष्क के प्रभाव में था।
> गुप्त काल 
> गुप्त काल में अभूतपूर्व सांस्कृतिक विकास हुआ। अतः इस काल को भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग कहा जाता है। 
> हजारीबाग के मदुही पहाड़ से गुप्तकालीन पत्थरों को काटकर निर्मित मंदिर प्राप्त हुए हैं।
> झारखण्ड में मुण्डा, पाहन, महतो तथा भंडारी प्रथा गुप्तकाल की देन माना जाता है। 
> समुद्रगुप्त
> गुप्त वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक समुद्रगुप्त था। इसे भारत का नेपोलियन भी कहा जाता है। 
> इसके विजयों का वर्णन प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद प्रशस्ति) में मिलता है। प्रयाग प्रशस्ति के लेखक हरिसेण हैं। इन विजयों में से एक आटविक विजय भी था।
> झारखण्ड प्रदेश इसी आटविक प्रदेश का हिस्सा था। इससे स्पष्ट होता है कि समुद्रगुप्त के शासनकाल में झारखण्ड क्षेत्र उसके अधीन था।
> समुद्रगुप्त ने पुण्डवर्धन को अपने राज्य में मिला लिया, जिसमें झारखण्ड का विस्तृत क्षेत्र शामिल था। 
> समुद्रगुप्त के शासनकाल में छोटानागपुर को मुरूण्ड देश कहा गया है।
> समुद्रगुप्त के प्रवेश के पश्चात् झारखण्ड क्षेत्र में बौद्ध धर्म का पतन प्रारंभ हो गया। 
> चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य'
> चन्द्रगुप्त द्वितीय का प्रभाव झारखण्ड प्रदेश में भी था।
> इसके काल में चीनी यात्री फाह्यान 405 ई. में भारत आया था जिसने झारखण्ड क्षेत्र को कुक्कुटलाड कहा है।
क्र.सं.
स्थान
जिला
प्राप्त अवशेष
1.
मदुही पहाड़
हजारीबाग
पत्थरों को काटकर बनाये गये चार मंदिर
2.
सतगावां
कोडरमा
मंदिरों के अवशेष (उत्तर गुप्त काल से संबंधित)
3.
पिठोरिया
राँची
पहाड़ी पर स्थित कुआँ
> गुप्तोत्तर काल 
शशांक
> गौड़ (पश्चिम बंगाल) का शासक शशांक इस काल में एक प्रतापी शासक था।
> शशांक के साम्राज्य का विस्तार सम्पूर्ण झारखण्ड, उड़ीसा तथा बंगाल तक था।
> शशांक ने अपने विस्तृत साम्राज्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए दो राजधानियाँ स्थापित की:
1. संथाल परगना का बड़ा बाजार
2. दुलमी
> प्राचीन काल के शासकों में यह प्रथम शासक था जिसकी राजधानी झारखण्ड क्षेत्र में थी।
> शशांक शैव धर्म का अनुयायी था तथा इसने झारखण्ड में अनेक शिव मंदिरों का निर्माण कराया। 
> शशांक के काल का प्रसिद्ध मंदिर वेणुसागर है जो कि एक शिव मंदिर है। यह मंदिर सिंहभूम और मयूरभंज की सीमा क्षेत्र पर अवस्थित कोचांग में स्थित है।
> शशांक ने बौद्ध धर्म के प्रति असहिष्णुता की नीति अपनायी, जिसका उल्लेख ह्वेनसांग ने किया है। 
> शशांक ने झारखण्ड के सभी बौद्ध केन्द्रों को नष्ट कर दिया। इस तरह झारखण्ड में बौद्ध - जैन धर्म के स्थान पर हिन्दू धर्म की महत्ता स्थापित हो गयी।
> हर्षवर्धन
> वर्धन वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक हर्षवर्धन था।
> इसके साम्राज्य में काजांगल ( राजमहल ) का कुछ भाग शामिल था।
> काजांगल (राजमहल) में ही हर्षवर्धन ह्वेनसांग से मिला । ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत में राजमहल की चर्चा की है।
> अन्य तथ्य
> हर्यक वंश का शासक बिंबिसार झारखण्ड क्षेत्र में बौद्ध धर्म का प्रचार करना चाहता था।
> नंद वंश के समय झारखण्ड मगध साम्राज्य का हिस्सा था।
> नंद वंश की सेना में झारखण्ड से हाथी की आपूर्ति की जाती थी। इस सेना में जनजातीय लोग भी शामिल थे।
> झारखण्ड में दामोदर नदी के उद्गम स्थल तक मगध की सीमा का विस्तार माना जाता है।
> झारखण्ड के 'पलामू' में चंद्रगुप्त प्रथम द्वारा निर्मित मंदिर के अवशेष प्राप्त हुए हैं। 
> कन्नौज के राजा यशोवर्मन के विजय अभियान के दौरान मगध के राजा जीवगुप्त द्वितीय ने झारखण्ड में शरण ली थी।
> 13वीं सदी में उड़ीसा के राजा जय सिंह ने स्वयं को झारखण्ड का शासक घोषित कर दिया था।
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Tue, 13 Jun 2023 19:43:08 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड में धार्मिक आंदोलन https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-धार्मिक-आंदोलन https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-में-धार्मिक-आंदोलन > बौद्ध तथा जैन धर्म का झारखण्ड राज्य पर गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है।
धार्मिक आंदोलन – जैन धर्म , बौद्ध धर्म
> जैन धर्म
> जैन ग्रंथों में भगवान महावीर के 'लोरे - ए - यदगा' की यात्रा का संदर्भ है जिसका मुण्डारी में अर्थ 'आंसुओं की नदी' होता है।
> पारसनाथ पहाड़ी (1365 मी. * / 4478 फीट )
> यह गिरिडीह जिला में अवस्थित है।
> यहाँ जैनियों के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ का निर्वाण 717 ई.पू. में हुआ था। ये पारसनाथ की पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त करने वाले अंतिम तीर्थकर थे।
> जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थकरों ने इसी पहाड़ी पर निर्वाण प्राप्त किया।
> पारसनाथ में निर्वाण प्राप्त करने वाले तीर्थकर 
1. अजीत नाथ 
2. संभव नाथ 
3. अभिनंदन नाथ
4. सुमति नाथ 
5. पद्म प्रभु 
6. सुपार्श्वनाथ 
7. चंद्र प्रभू 
8. सुविधि नाथ 
9. शीतल नाथ 
10. श्रेयांस नाथ 
11. विमल नाथ 
12. अनंत नाथ 
13. धर्म नाथ 
14. शांति नाथ 
15. कुथु नाथ 
16. अर्हनाथ 
17. मल्लिनाथ 
18. मुनि सुव्रतनाथ 
19. नेमिनाथ 
20. पार्श्वनाथ
> यह पहाड़ जैन धर्मावलंबियों का प्रमुख तीर्थ स्थल है।
> इसे 'जैन धर्म का मक्का' कहा जाता है।
> छोटानागपुर का मानभूम ( वर्तमान में धनबाद )
> यह जैन सभ्यता व संस्कृति का केन्द्र था।
> दामोदर व कसाई नदी
> दामोदर व कसाई नदियों की घाटी से जैन धर्म संबंधी अवशेष प्राप्त हुए हैं।
> हनुमांड गाँव
> हनुमांड गाँव पलामू में अवस्थित है।
> यहाँ से जैनियों के कुछ पूजास्थल प्राप्त हुए हैं।
> सिंहभूम
> सिंहभूम के बेनूसागर से 7वीं शताब्दी की जैन मूर्त्तियाँ प्राप्त हुई हैं। 
> सिंहभूम के आरंभिक निवासी जैन धर्म को मानने वाले थे जिन्हें 'सरक' कहा जाता था। ये गृहस्थ जैन मतावलंबी थे।
> सरक, श्रावक का बिगड़ा हुआ रूप है। हो जनजाति के लोगों ने इन्हें सिंहभूम से बाहर निकाल दिया था। 
> कोल्हुआ पहाड़
> यह चतरा जिले में अवस्थित है।
> इसका संबंध बौद्ध एवं जैन धर्म दोनों से है।
> यहाँ पर जैन व बौद्ध धर्म की अनेकों मूर्तियों के अवशेष विद्यमान हैं।
> इस पहाड़ पर 10 वें तीर्थंकर शीतनाथ को ज्ञान की प्राप्ति हुयी थी।
> यहाँ पर नौ जैन तीर्थंकरों की प्रतिमा है।
> इस पहाड़ के पत्थर पर एक पद्चिन्ह् हैं जिसे जैन धर्म के अनुयायी पार्श्वनाथ का पदचिन्ह् मानते हैं।
> बौद्ध धर्म
> मूर्तिया गाँव
> यह पलामू में अवस्थित है।
> यहाँ से एक सिंह शीर्ष मिला है जो सांची स्तूप के द्वार पर उत्कीर्ण सिंह शीर्ष से मेल खाता है। 
> करूआ गाँव
> यहाँ से बौद्ध स्तूप की प्राप्ति हुई है।
> सूर्यकुण्ड
> यह हजारीबाग जिला में अवस्थित है।
> यहाँ से बुद्ध की प्रस्तर मूर्ति मिली है।
> बहोरनपुर
> यह हजारीबाग जिला में अवस्थित है।
> यहाँ से भगवान बुद्ध की 1200 वर्ष पुराने पालकालीन मूर्तियाँ प्राप्त हुयी हैं। 
> बेलवादाग
> यह खूँटी जिला में अवस्थित है।
> यहाँ से बौद्ध विहार के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
> कटुंगा गाँव
> यह गुमला जिले में अवस्थित है।
> यहाँ से बुद्ध की एक प्रतिमा मिली है।
> पटम्बा गाँव
> यह जमशेदपुर में अवस्थित है।
> यहाँ से बुद्ध की दो प्रतिमाएँ मिली है। 
> दियापुर - दालमी
> यह धनबाद जिला में अवस्थित है।
> यहाँ से बौद्ध स्मारक प्राप्त हुए हैं।
> बुद्धपुर में बुद्धेश्वर मंदिर निर्मित है।
> यह बौद्ध स्थल दामोदर नदी के किनारे अवस्थित है। 
> घोलमारा
> यहाँ से प्रस्तर की एक खण्डित बुद्ध मूर्ति मिली है। 
> ईचागढ़
> यह सरायकेला-खरसावां जिला में स्थित है।
> यहाँ से तारा की मूर्ति मिली है जो एक बौद्ध देवी हैं।
> इस मूर्ति को राँची संग्रहालय में रखा गया है।
> सीतागढ़ पहाड़
> यह हजारीबाग जिले में अवस्थित है।
> यहाँ से प्राप्त बौद्ध विहार का उल्लेख फाह्ययान द्वारा किया गया है। 
> यहाँ से भगवान बुद्ध की चार आकृतियों वाला एक स्तूप मिला है।
> अन्य तथ्य
> बंगाल में पाल शासकों के शासन के दौरान झारखण्ड में बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा विकसित हुयी। 
> झारखण्ड में 'कुमार गुप्त' के प्रवेश के उपरांत बौद्ध धर्म का ह्रास प्रारंभ हो गया।
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Tue, 13 Jun 2023 19:06:45 +0530 Jaankari Rakho
प्रागैतिहासिक काल में झारखण्ड https://m.jaankarirakho.com/प्रागैतिहासिक-काल-में-झारखण्ड https://m.jaankarirakho.com/प्रागैतिहासिक-काल-में-झारखण्ड > वह काल जिसके लिए कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, बल्कि पूर्णतः पुरातात्विक साक्ष्यों पर निर्भर रहना पड़ता है, उसे प्रागैतिहासिक काल कहते हैं।

1. पुरापाषाण काल
> इसका कालक्रम 25 लाख ई.पू. से 10 हजार ई.पू. तक माना जाता है।
> इस काल के लोग आखेटक (शिकारी) एवं खाद्य संग्राहक थे। इस काल में कृषि का ज्ञान नहीं था तथा पशुपालन का प्रारंभ नहीं हुआ था।
> इस काल में आग की जानकारी हो चुकी थी, परन्तु उसके उपयोग का ज्ञान नहीं था। 
> झारखण्ड में इस काल के अवशेष हजारीबाग, बोकारो, राँची, देवघर, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम आदि क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं।
> हजारीबाग से पाषाणकालीन मानव द्वारा निर्मित पत्थर के औजार मिले हैं।
2. मध्यपाषाण काल
> इसका कालक्रम 10,000 ई.पू. से 4,000 ई.पू. तक माना जाता है।
> इस काल में पशुपालन की शुरूआत हो चुकी थी।
> झारखण्ड में इस काल के अवशेष दुमका, पलामू, धनबाद, राँची, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम आदि क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं।
3. नवपाषाण काल
> इसका कालक्रम 10,000 ई.पू. से 1,000 ई.पू. तक माना जाता है।
> इस काल में कृषि की शुरूआत हो चुकी थी।
> इस काल में आग के उपयोग तथा कुम्भकारी का प्रारंभ हो चुका था। 
> झारखण्ड में इस काल के अवशेष राँची, लोहरदगा, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम आदि क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं। 
> छोटानागपुर प्रदेश में इस काल के 12 हस्त कुठार पाए गए हैं।
4. ताम्रपाषाण काल
> इसका कालक्रम 4,000 ई.पू. से 1,000 ई.पू. तक माना जाता है।
> यह काल हड़प्पा पूर्व काल, हड़प्पा काल तथा हड़प्पा पश्चात् काल तीनों से संबंधित है।
नोट :- झारखण्ड राज्य में आयोजित विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गये तथ्यों को तारांकित (*) कर दिया गया है।
> पत्थर के साथ-साथ तांबे का प्रयोग प्रारंभ होने के कारण इस काल को ताम्रपाषाण काल कहा जाता है। 
> मानव द्वारा प्रयोग की गई प्रथम धातु तांबा ही थी।
> झारखण्ड में इस काल का केन्द्रबिन्दु सिंहभूम था।
> इस काल में असुर, बिरजिया तथा बिरहोर जनजातियाँ तांबा गलाने तथा उससे संबंधित उपकरण बनाने की कला से परिचित थे।
> झारखण्ड के कई स्थानों से तांबा की कुल्हाड़ी तथा हजारीबाग के बाहरगंडा से तांबे की 49 खानों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
5. ताम्र / तांबा युग
> इस युग में तांबा से निर्मित उपकरणों का प्रयोग प्रारंभ हुआ।
> इस युग में असुर, बिरजिया, बिरहोर जनजाति के द्वारा तांबा के खानों से अयस्क निकालकर व उसे गलाकर विभिन्न उपकरणों का निर्माण किया जाता था।
6. कांस्य युग
> इस युग में तांबे में टिन मिलाकर कांसा निर्मित किया जाता था तथा उससे बने उपकरणों का प्रयोग किया जाता था।
> छोटानागपुर क्षेत्र के असुर (झारखण्ड की प्राचीनतम जनजाति) तथा बिरजिया जनजाति को कांस्ययुगीन औजारों का प्रारंभकर्ता माना जाता है।
7. लौह युग
> इस युग में लोहा से बने उपकरणों का प्रयोग किया जाता था।
> झारखण्ड के असुर तथा बिरजिया जनजाति को ही लौह युग से निर्मित औजारों का प्रारंभकर्ता माना जाता है। 
> असुर तथा बिरजिया जनजातियों ने उत्कृष्ट में इस युग में झारखण्ड का संपर्क सुदूर विदेशी राज्यों से भी था। 
>  इस युग में झारखण्ड का संपर्क सुदूर विदेशी राज्यों से भी था। झारखण्ड में निर्मित लोहे को इस युग में मेसोपोटामिया तक भेजा जाता था, जहाँ दश्मिक में इस लोहे से तलवार का निर्माण किया जाता था।
विभिन्न स्थानों से प्राप्त पुरातात्विक अवशेष
स्थान
पुरातात्विक अवशेष
इस्को (हजारीबाग)
पूर्व बड़े पत्थरों पर आदिमानव द्वारा निर्मित चित्र, खुला सूर्य मंदिर, शैल चित्र
दीर्घा
सीतागढ़ा पहाड़ (हजारीबाग)
1. छठी शताब्दी में निर्मित बौद्ध-मठ के अवशेष (विशेष रूप से बुद्ध की चार
आकृतियों से युक्त एक स्तूप तथा काले-भूरे बलुआ पत्थर की सुन्दर स्त्री
की खण्डित प्रतिमा)
2. चीनी यात्री फाह्यान द्वारा भी इसका उल्लेख मिलता है।
दूधपानी (हजारीबाग)
आठवीं शताब्दी के अभिलेख
दुमदुमा (हजारीबाग)
शिवलिंग
भवनाथपुर ( गढ़वा)
आखेट (शिकार) के चित्र जिनमें हिरण, भैंसा आदि पशुओं के चित्र हैं
प्रागैतिहासिक काल की गुफाएँ व शैल चित्र भी मिले हैं।
पाण्डु (पलामू)
* चार पाये वाली पत्थर की चौकी (इसे पटना संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है)
* मिट्टी की दीवार, मिट्टी के कलश व तांबे के औजार
पलामू किला (लातेहार )
भगवान बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में एक मूर्ति
पलामू प्रमण्डल
तीनों पाषाण कालों के औजार
बारूडीह (सिंहभूम)
पाषाणकालीन मृदुभाण्ड के टुकड़े, पत्थर की हथौड़ी, पक्की मिट्टी के मटके
बेनूसागर (सिंहभूम)
सातवीं शताब्दी की जैन मूर्तियाँ
बोनगरा (सिंहभूम)
हाथ से बने मृदुभाण्ड, पत्थर के मनके, कुल्हाड़ी, वलय-प्रस्तर (Ring-stone)
बानाघाट (सिंहभूम)
नवपाषाणकालीन पत्थर, काले रंग का मृदुभाण्ड
लोहरदगा
प्रागैतिहासिक कालीन कांसे का प्याला
नामकुम (राँची)
तांबे एवं लोहे के औजार तथा बाण के फलक
मुरद
तांबे की सिकड़ी (चैन) तथा कांसे की अंगुठी
लूपगढ़ी
कब्रगाह के अवशेष, कब्रगाह के अंदर से तांबे के आभूषण व पत्थर के मनके
छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र
आदिमानव के निवास के साक्ष्य
( नोट:- इस्को के शैल चित्र दीर्घा में नक्षत्र मंडल, अंतरिक्ष यान एवं अंतरिक्ष मानव के चित्र अंकित हैं। इस्को गाँव में बर्फ आयु की गहरी भूमिगत गुफा स्थित है। * )

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Mon, 12 Jun 2023 14:10:19 +0530 Jaankari Rakho
झारखण्ड का ऐतिहासिक परिचय https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-का-ऐतिहासिक-परिचय https://m.jaankarirakho.com/झारखण्ड-का-ऐतिहासिक-परिचय > झाड़ियों एवं वनों की बहुलता' के कारण इस राज्य का नाम झारखण्ड पड़ा है। 
> विभिन्न कालों में झारखण्ड प्रदेश को विभिन्न नामों से जाना जाता था: – 
काल  नामकरण 
ऐतरेय ब्राह्मण
पुण्ड्र या पुण्ड
ऋगवेद
कीकट प्रदेश
अथर्ववेद
व्रात्य प्रदेश
वायु पुराण
मुरण्ड
समुद्रगुप्त का प्रयाग प्रशस्ति
मुरुंड
विष्णु पुराण
मुण्ड
भागवत पुराण
किक्कट प्रदेश
महाभारत (दिग्विजय पर्व में)
पुण्डरीक* / पशुभूमि / कर्क खण्ड / अर्क खण्ड
पूर्वमध्यकालीन संस्कृत साहित्य
कलिंद देश
13वीं सदी के ताम्रपत्र में
झारखण्ड
तारीख-ए-फिरोजशाही
झारखण्ड
तारीख-ए-बंग्ला
झारखण्ड
सियार-उल-मुतखरीन
झारखण्ड
कबीर के दोहे में
झारखण्ड
जायसी द्वारा (पद्मावत में)
झारखण्ड
अकबरनामा
झारखण्ड
नरसिंहदेव द्वितीय के ताम्रपत्र में
झारखण्ड
आइने-अकबरी
कोकरा / खंकराह
कौटिल्य का अर्थशास्त्र
कुकुट / कुकुटदेश
टॉलमी द्वारा
मुण्डल
फह्यान द्वारा
कुक्कुट लाड
ह्वेनसांग द्वारा
की-लो-ना-सु-का-ला-ना / कर्ण-सुवर्ण
मुगल काल
खुखरा / कुकरा / कोकराह
तुजुक-ए-जहाँगीरी
खोखरा
ईस्ट इण्डिया कंपनी के शासनकाल में
छोटानागपुर
(नोट :- 'झारखण्ड प्रदेश का सर्वप्रथम साहित्यिक उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है ) 
(नोट :- 'झारखण्ड' शब्द का प्रथम पुरातात्विक प्रमाण 13वीं सदी के तामपत्र में मिलता है)
नोट:- झारखण्ड राज्य में आयोजित विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गये तथ्यों को तारांकित (*) कर दिया गया है।
> प्राचीन काल में गुप्त शासकों एवं गौड़ शासक शशांक ने झारखण्ड क्षेत्र में सर्वाधिक समय तक शासन किया। 
> मध्यकाल में झारखण्ड में क्षेत्रीय राजवंशों का शासन स्थापित था। 
> ह्वेनसांग ने राजमहल क्षेत्र के लिए 'कि चिंग-काई-लॉ' तथा इसके पहाड़ी क्षेत्र के लिए 'दामिन-ए - कोह' शब्द का प्रयोग किया है।
> कैप्टन टैनर के सर्वेक्षण के आधार पर 1824 ई. में दामिन-ए- कोह की स्थापना हुयी थी। 
> प्राचीन काल में संथाल परगना क्षेत्र को नरीखंड * तथा बाद में कांकजोल नाम से संबोधित किया गया है। 
> 1833 ई. में दक्षिण-पश्चिमी फ्रंटियर एजेंसी की स्थापना के बाद इस एजेंसी का मुख्यालय विल्किंसनगंज या किसुनपुर के नाम से जाना जाता था जिसे बाद में राँची के नाम से जाना गया।
क्रम सं  जनजाति  महत्वपूर्ण बातें 
1.
असुर
झारखण्ड की प्राचीनतम जनजाति (राँची, लोहरदगा, गुमला)
2.
बिरजिया, बिरहोर तथा खड़िया
संभवतः कैमूर की पहाड़ियों से होकर छोटानागपुर में प्रवेश
3. कोरवा  - 
4.
मुण्डा, उराँव, हो
1. मुण्डाओं ने नागवंश की स्थापना में योगदान दिया था।
2. उराँव झारखण्ड में राजमहल तथा पलामू नामक दो शाखाओं में बसे थे।
5.
चेरो, खरवार, संथाल
1. 1000 ई.पू. तक चेरो, खरवारों एवं संथालों को छोड़कर झारखण्ड में पायी जाने वाली सभी जनजातियाँ छोटानागपुर क्षेत्र में बस चुकी थी।
2. पूर्व मध्यकाल में संथाल हजारीबाग में बसे और ब्रिटिश काल में संथालों का विस्तार संथाल परगना क्षेत्र में हुआ।
> वैदिक साहित्य में झारखण्ड की जनजातियों के लिए असुर शब्द का प्रयोग किया गया है। वेदों में असुरों की वीरता और करतब का उल्लेख किया गया है।
> ऋगवेद् में असुरों को 'लिंगपूजक' या 'शिशनों का देव' कहा गया है। 
> इतिहासकार बुकानन ने बनारस से लेकर वीरभूम तक के पठारी क्षेत्र को झारखण्ड के रूप में वर्णित किया है।
> महाभारत काल में झारखण्ड वृहद्रथवंशी सम्राट जरासध के अधिकार क्षेत्र में था। 
> जनजातियों की अधिकता के कारण झारखण्ड को 'कर्कखण्ड' भी कहा जाता है। 
> झारखण्ड के छोटानागपुर क्षेत्र को 'कर्ण सुवर्ण' के नाम से भी संबोधित किया गया है।
नोट:- झारखण्ड राज्य में आयोजित विभिन्न परीक्षाओं में पूछे गये तथ्यों को तारांकित (*) कर दिया गया है।
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Sun, 11 Jun 2023 20:43:10 +0530 Jaankari Rakho