General Competition | Science | Physics (भौतिक विज्ञान) | Properties of Matter
विरूपक बल (Deforming Force):- वस्तु पर लगने वलो बाह्य बल को विरूपक बल कहते हैं तथा इस बल के कारण वस्तु में होने वाले परिवर्तन को विरूपण (Deformation) कहते हैं ।

General Competition | Science | Physics (भौतिक विज्ञान) | Properties of Matter
- विरूपक बल (Deforming Force):- वस्तु पर लगने वलो बाह्य बल को विरूपक बल कहते हैं तथा इस बल के कारण वस्तु में होने वाले परिवर्तन को विरूपण (Deformation) कहते हैं ।
- वैसा पदार्थ जिस पर से विरूपक बल हटा लेने पर वह अपने पूर्व आकार को पूर्णतः प्राप्त कर लेते हैं Perfectly elastic (पूर्णतः प्रत्यास्थ) पदार्थ कहलाते हैं।
- पैँसा पदार्थ जिस पर विरूपक बल हटाने पर वह अपने पूर्व स्थिति में नहीं लौटा यानि पूरी तरह विरूपित हो जाता है उसे अप्रत्यास्थ या प्लैस्टीक कहते हैं।
- प्रतिबल का cgs पद्धति में मात्रक dyne cm-2 होता है जबकि SI पद्धति में Nm-2 अथवा Pascal हाता है। इसकी विमा [ML-1 T-2] होता है।
- विकृति मात्रकहीन और विमाहीन भौतिक राशि है ।
- विकृति तीन प्रकार के होते हैं-
- अनुदैर्ध्य विकृति (longitudinal Strain) - अगर L लंबाई की वस्तु पर विरूपक बल लगाने से वस्तु के लंबाई में परिवर्त्तन 1 होता है तो l/L को अनुदैर्ध्य विकृति कहते हँ । अनुदैर्ध्य विकृति केवल ठोस पदार्थ में पाया जाता है।
- आयतन विकृति (Voluem Strain) - अगर किसी वस्तु का आयतन v है और उसपर बल लगाने से उसके आयतन में परिवर्त्तन v होता है तो v/V को आयतन विकृति कहते हैं । द्रव तथा गैस में भी आयतन विकृति पायी जाती है।
- अपरूपण विकृति (Shearing Strain) - अपरूपण विकृति में वस्तु की केवल आवृत्ति बदल जाती है, उसके आयतन में कोई परिवर्तन नहीं होता है ।
- अपरूपण विकृति केवल ठोस में पायी जाती है।
- आरोपित बल का मान अगर प्रत्यास्थता सीमा से अधिक हो जाता है तब वस्तु अपने पूर्व स्थिति में नहीं लौट पाती है I
- प्रतिबल तथा विकृति के अनुपात को प्रत्यास्था गुणांक (Modulus of elasticity) कहते हैं। इसे E के रूप में सूचित किया जाता है।
- कम विरूपण के अनुदैर्ध्य प्रतिबल तथा अनुदैर्ध्य विकृति के अनुपात को वस्तु के पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक कहते हैं।
- यंग प्रत्यास्थता गुणांक (Y) = अनुदैर्ध्य विकृति / अनुदैर्ध्य प्रतिबल
- यंग प्रत्यास्थता गुणांक SI मात्रक Nm2 तथा cgs मात्रक dyne / cm2 है। इसका विमा ML-1 T-2 है।
- कम विरूपण के लिए प्रतिबल और आयतन विकृति के अनुपात को आयतन प्रत्यास्थता गुणांक कहते हैं। इसे K से सूचि किया जाता है।
आयतन प्रत्यास्थता गुणांक (K) = प्रतिबल / आयतन विकृति = अनुदैर्ध्य प्रतिबल / अनुदैर्ध्य विकृति
- आयतन प्रत्यास्थता गुणांक का SI मात्रक Nm2 होता इसकी विमा [ML-1 T-2 ] होती है।
- आयतन गुणांक के व्युत्क्रम या I/K को पदार्थ की Compressibility (संपीड्यता) कहते हैं ।
- दृढ़ता गुणांक का SI मात्रक Nm2 तथा विमा ML-1 T-2 होता है ।
- जब हम किसी तार को सिरों पर बल लगा कर खींचते हैं तो तार के लंबाई तथा तार के व्यास में परिवर्तन आता है। तार के लंबाई हुआ परिवर्त्तन अनुदैर्ध्य विकृति है जबकि तार के व्यास में हुआ परिवर्तन पार्श्वीय विकृति (lateral strain) है।
- प्वासो के अनुपात का न तो कोई मात्रक होता है और न ही कोई विमा ।
- दाब का SI मात्रक N/m2 (न्यूटन / मी2 ) होता है। N/m2 को वैज्ञानिक ब्लेज पास्कर (Blaise Pascal) के सम्मान में पास्कल भी कहते हैं।
- जितने क्षेत्रफल में दो वस्तु एक-दूसरे के संपर्क में रहती है वह क्षेत्रफल को संपर्क क्षेत्रफल (Contact Area) कहते हैं। संपर्क क्षेत्रफल को बढ़ाकर किसी वस्तु द्वारा लगाये जाने वाले दाब को घटाया जा सकता है। इस सिद्धान्त के उदाहरण निम्न हैं-
- दलदल वाली भूमि पर व्यक्ति तख्ता रखकर चलता है जिससे मनुष्य का भार बड़े क्षेत्रफल पर बैट जाता है और भूमि पर दाब कम पड़ता है और मनुष्य धंसने से बच जाता है।
- ऊँट के पैर फैले-फैले होते हैं जिसके कारण बालू पर ऊँट के पैर का दाब एक स्थान पर कम पड़ता है जिससे ऊँट बालू पर आसानी से चल पाता है।
- भारी बाहनों के टायर चौड़े होते हैं तथा पीछे के टायर जोड़े में होते हैं जिससे वाहन का भार बड़े क्षेत्रफल में वितरित हो जाता ..है और टायर पर कम दाब पड़ता है ।
- गीली मिट्टी पर ट्रैक्टर आसानी से गुजर जाते हैं क्योंकि ट्रैक्टर के पीछे टायर काफी चौड़ा होता है ।
- मकानों की दीवार का आधार भूमि के अंदर चौड़ा बनाया जाता है जिससे मकान का भार बड़े क्षेत्रफल में वितरित हो जाता है और दाब कम पड़ता है।
- संपर्क क्षेत्रफल को कम करके दाब को बढ़ाया जाता है। यही कारण है कि काटने वाले अथवा छेद करने वाले औजार (चाकू, आरी, कैंची, सूई) में बहुत कम क्षेत्रफल का धार या नोक होता है जिससे कम बल लगाने पर भी औजार द्वारा अधिक दाब डाला जाता है।
- घनत्व का SI मात्रक kg/m3 है। किसी पदार्थ का घनत्व पदार्थ की शुद्धता जाँचने में सहायक होता है ।
- सोना का घनत्व 19300 kg/m3 होता है तथा पानी घनत्व 1000 kg/m3 होता है।
- किसी द्रव द्वारा बरतन के पृष्ठ या सतह पर लगाये जाने वाले लंबवत बल को प्रणोद कहते हैं ।
- प्रणोद का बल वहीं होता है जो बल का होता है यानि प्रणोद का SI मात्रक न्यूटन होता है ।
- प्रणोद और दाब में निम्न अंतर है- किसी पृष्ठ के पूरे क्षेत्रफल पर लगे लंबवत बल को प्रणोद कहते हैं जबकि पृष्ठ के एकांक क्षेत्रफल पर लगनेवाले बल को दाब कहते हैं।
- द्रव को जिस बरतन में रखा जाता है द्रव उस बरतन के भीतरी सतह पर दाब डालता है ।
- द्रव के भीतर किसी बिंदु पर द्रव का दाब सभी दिशाओं में समान होता है।
- द्रव के भीतर किसी बिंदु पर द्रव का दाब गहराई के समानुपाती होता है ।
- द्रव में किसी बिंदु पर द्रव का दाब द्रव के घनत्व के समानुपाती होता है ।
- द्रव के दाब से संबंधित पास्कल के नियम-
किसी बंद द्रव के किसी भाग पर डाला गया दाब सभी दिशाओं में समान रूप से संचरित होता है। इसे ही पास्कल का नियम कहते हैं। पास्कल का यह नियम सभी तरल पदार्थ पर लागू होता है ।
- पास्कल के नियम के प्रयोग कर Hydraulic lift, Hydraulic Press तथा Hydraulic brake बनाये जाते हैं ।
- उत्प्लावन का गुण सभी तरल (द्रव तथा गैस) में होता है ।
- उत्प्लावकता का अध्ययन कर यूनानी वैज्ञानिक आर्किमीडिज ने एक नियम प्रतिपादित किया जिसे आर्किमीडिज का सिद्धान्त कहते हैं।
- आर्किमीडिज सिद्धान्त के अनुसार - "जब कोई वस्तु को किसी द्रव या गैस से पूर्णतः या अंशतः डुबायी जाती है तो उसके भार में अभासी कमी आ जाती है जो वस्तु के डूबे हुए भाग द्वारा हटाये गये द्रव या गैस के भार के बराबर होता है।'
- अगर किसी वस्तु को द्रव में डुबाया जाता है तो वस्तु पर दो बल कार्य करता है ।
- वस्तु का भार w1 जो वस्तु पर नीचे की ओर लगता है ।
- द्रव की उल्लावकता w2 जो वस्तु पर ऊपर की ओर लगता है ।
- इन दोनों बल के परिमाण से निम्न स्थिति बनती है-
- अगर w2 बडा हो w2 सेतो वस्तु द्रव में नीचे डूबती जाऐगी
Note : किसी द्रव में किसी वस्तु को डूबने के लिए वस्तु का घनत्व द्रव के घनत्व से अधिक होनी चाहिए।
- अगर W1 = w2 हो तो वस्तु द्रव में पूरी तरह डूबकर तैरती रहेगी।
Note : द्रव में पूर्णतः डूबकर तैरने के लिए वस्तु का घनत्व द्रव के घनत्व के बराबर होनी चाहिए ।
- अगर w1 < w1 तब वस्तु द्रब में अंशतः डूबकर तैरगी।
Note : द्रव में अंशतः डूबकर वस्तु के प्लवन करने के लिए वस्तु का घनत्व द्रव के घनत्व से कम होनी चाहिए ।
- अगर w2 बडा हो w2 सेतो वस्तु द्रव में नीचे डूबती जाऐगी
- लोहे का घनत्व पानी के घनत्व से अधिक होता है इसलिए लोहे की सूई या काँटी पानी में डूब जाती है परन्तु लोहे के टुकड़े को पीटकर नाव का आकार दे दिया जाए तो यह पानी में तैर सकता है। इसी सिद्धान्त पर लोहे के जहाज बनाये जाते हैं ।
- मनुष्य के शरीर का घनत्व पानी के घनत्व से कम होता है परन्तु सिर का घनत्व पानी के घनत्व से अधिक होता है इसलिए मनुष्य पानी में डूबने लगता है।
- समुद्र के पानी का घनत्व नदी अथवा झील के पानी के घनत्व से अधिक होता है अतः नदी के अपेक्षा समुद्र में तैरना आसान है ।
- बर्फ का घनत्व पानी के घनत्व से कम होता है इसी कारण बर्फ पानी पर तैरता है। बर्फ जब पानी पर तैरता तो बर्फ का 11/12 भाग पानी के भीतर डूबा रहता है और 1/12 भाग पानी के ऊपर रहता है।
- समुद्र के पानी का घनत्व साधारण पानी के घनत्व से अधिक रहता है जिसके कारण समुद्र के पानी में तैरते समय बर्फ का 8/9 भाग पानी के भीतर तथा 1/9 भाग पानी ऊपर रहता है।
- समुद्र में बड़े-बड़े बर्फ के चट्टान पानी में तैरता रहता है। चूँकि समुद्र में बर्फ का 1/9 भाग ही पानी के ऊपर रहता है जिसके कारण कोहरे वाली रात के समय जहाज का इनसे टकराने का खतरा बना रहता है। 1912 में टाइटैनिक जहाज इसी तरह बर्फ के चट्टान से टकराकर नष्ट हो गया था ।
- अगर प्रमाणिक पदार्थ के रूप में पानी को लिया जाए तब -
आपेक्षिक घनत्व = वस्तु का घनत्व / 4°C पर पानी का घनत्वअतः वस्तु का घनत्व = वस्तु का आपेक्षिक घनत्व × पानी का घनत्व
- आपेक्षिक घनत्व एक प्रकार के राशिओं का अनुपात है अतः इसकी कोई मात्रक नहीं होता है ।
- आपेक्षिक घनत्व को हाइड्रोमीटर यंत्र से मापा जाता है ।
- अगर AB की लंबाई | माना जाए तथा द्रव के पृष्ठ के तनाव के कारण 1 पर संकुचन बल का परिमाण F हो तो
- पृष्ठ तनाव अदिश राशि है जिसका मात्रक N/m (न्यूटन प्रति मीटर) है । पृष्ठ तनाव की विमा [MT-2] होता है।
- पानी का पृष्ठ तनाव 72.9 × 10-3 Nm-1 तथा पारा का पृष्ठ तनाव 486 × 10-3 Nm-1 होता है।
- पृष्ठ तनाव का cgs मात्रक dyne cm-1 होता है।
- ससंजन बल (Cohesive Force)- एक ही पदार्थ के दो अणुओं के मध्य लगने वाले आकर्षण बल को संसंजन बल कहते हैं । ठोस में संसंजन बल कहते हैं। ठोस में संसंजन बल का परिमाण सबसे अधिक द्रव में कम तथा गैसों में नगण्य होता है ।
- आसंजन बल (Adhesive Force)- भिन्न पदार्थों के दो अणुओं के बीच लगने वाले आकर्षण बल को आसंजन बल कहा जाता है।
- ब्लैक बोर्ड पर चॉक से लिखना, कागज पर पेंसिल से लिखना आसंजन बल के कारण ही संभव है।
- संसजन और आसंजन बल के परिमाण से होने वाला कुछ घटना-
- संसंजन बल के कारण ही द्रव की दो बूंद संपर्क में आते ही मिलकर एक हो जाता है।
- काँच के प्लेट पानी से भींग जाता है क्योंकि पानी और काँच के अणुओं के बीच आसंजन पानी के अणुओं के बीच संसंजन से अधिक होता है।
- पारा काँच को नहीं भिगोता क्योंकि पारा और कॉच के बीच आसंजन पारे के अणुओं के बीच संसंजन से काफी कम होता है।
- पृष्ठ फिल्म (Surface Film )- किसी द्रव के मुक्त पृष्ठ से आणविक परास (10-9 m) की मोटाई की पतली झिल्ली को पृष्ठ कहा जाता है।
- पृष्ठ फिल्म के प्रति एकांक क्षेत्रफल में निहित ऊर्जा (Surface Energy) कहा जाता है। Surface Energy का SI मात्रक Jm-2 होता है तथा इसकी विमा MT-2 होता है।
पृष्ठ ऊर्जा = पृष्ठ तनाव × पृष्ठ क्षेत्रफल
- स्पर्श कोण का मान न्यूनतम 0° तथा अधिकतम 180° होता है ।
- जो द्रव ठोस को भिगोती है उनके लिए स्पर्श कोण न्यून कोण होता है तथा यह आकृति अवतल (Concave Shape ) होता है।
- शुद्ध जल और काँच के लिए स्पर्श कोण 0° होता है परन्तु साधारण जल और काँच के लिए स्पर्श कोण 8° होता है ।
- जो द्रव ठोस को नहीं भिगोता है उसके लिए स्पर्श कोण समकोण से अधिक अर्थात् अधिककोण होता है ।
- पारे तथा काँच के लिए स्पर्श कोण का मान 135° होता है ।
- पानी के पृष्ठ पर सूई का तैरना पृष्ठ तनाव के कारण ही होता है ।
- साबुन के बुलबुले बनने का कारण पृष्ठ तनाव है। साबुन के बुलबुले के अंदर का दाब बाहर के वायुमंडलीय दाब से अधिक होता है।
- रंग लगानेवाला ब्रश को रंग में डुबाया जाता है तो उसके बाल बिखर जाते हैं, लेकिन जब ब्रश को बाहर निकाला जाता है तो पृष्ठ तनाव के कारण उसके बाल चिपक जाते हैं।
- काँच के पट्टियों के बीच अगर जल के पतली परत है तो पृष्ठ तनाव के कारण काँच के पट्टियों को लम्वत् अलग करने में अधिक बल लगाना पड़ता है ।
- काँच के सिरो को जब गर्म किया जाता है तो पिघला काँच गोल हो जाता है। इसका कारण पृष्ठ तनाव है।
- तालाब या गड्ढ़ों में भरे जल में मिट्टी तेल डालने पर जल का पृष्ठ तनाव घट जाता है जिससे मच्छर के लार्वा डूबकर मर जाते हैं।
- पिघला हुआ शीशा पृष्ठ तनाव के कारण ही गोल बूंदों के रूप में जमकर गोल छर्रे में बदल जाता है ।
- पृष्ठ तनाव के कारण ही वर्षा की बूंद गोलाकार होता है ।
- अशांत समुद्र को शांत करने के लिए जहाज तेल गिराता है क्योंकि तेल से समुद्र के पानी का पृष्ठ तनाव घट जाता है जिससे लहरों की ऊचाई घट जाती है।
- पृष्ठ तनाव के कारण कपूर को स्वच्छ जल पर छिड़कने पर उसके कण तेजी से इधर-उधर नाचते हैं।
- गर्म भोजन का पृष्ठ तनाव ठंडे भोजन के पृष्ठ तनाव से कम होते हैं जिसके कारण गर्म भोजन जीभ के अधिक क्षेत्रफल को घेरता है और भोजन स्वादिष्ट लगता है।
- किसी द्रव का पृष्ठ तनाव द्रव के पृष्ठ के सम्पर्क वाले माध्यम पर निर्भर करता है। अगर पानी के पृष्ठ का सम्पर्क हवा से है तो पृष्ठ तनाव 7.2 × 10-2 N/m होता है जबकि पानी के पृष्ठ का सम्पर्क जल वाष्प से है तो पृष्ठ तनाव 7.0 × 10-2 N/m होता है।
- द्रव अगर दूषित हो जाता है तो पृष्ठ तनाव घट जाता है।
- ताप बढ़ने से द्रव का पृष्ठ- तनाव घट जाता है और क्रांतिक ताप पर पृष्ठ तनाव का मान शून्य हो जाता है ।
- द्रव में विद्युत प्रवाहित करने पर द्रव का पृष्ठ तनाव घट जाता है |
- द्रव में किसी पदार्थ के घुलने से द्रव का पृष्ठ तनाव बदल जाता है । द्रव में अकार्बनिक पदार्थ घुलने से द्रव का पृष्ठ तनाव बढ़ बढ़ जाता है जबकि द्रव में कार्बनिक पदार्थ घुलने से द्रव का पृष्ठ तनाव घट जाता है।
- Note : नमक (अकार्बनिक) घुलने पर द्रव का पृष्ठ तनाव बढ़ता है जबकि डिटरजेन्ट (कार्बनिक) घुलने पर द्रव का पृष्ठ तनाव घट जाता है।
- द्रव का घनत्व बदलने से भी पृष्ठ तनाव बदल जाता है।
- जो द्रव काँच को भिगोता है (जैसे- जल) वह कोशनली के ऊपर चढ़ता है।
- जो द्रव काँच को नहीं भिगोता है (जैसे- पारा) वह केशनली के नीचे आता है।
- ऐसा द्रव जिसके लिए स्पर्श कोण का मान 90° से कम होता है वह केशनली के ऊपर चढ़ता है तथा जिस द्रव के लिए केशनली का मान 90° से अधिक होता है वह केशनली में नीचे खिसक जाता है।
- केशनली की त्रिज्या जितनी कम होगी द्रव कैशनली में उतना ही ऊपर चढ़ेगा।
- केशिका कर्षण के उदाहरण-
- लालटेन में मिट्टी का तेल बत्ती के धागे में बनी केशिकाओं के द्वारा ही ऊपर चढ़ता है।
- खेतों में दिया गया जल पौधों के तनों एवं जड़ों में बनी असंख्य केशनली से चढ़कर पत्ती तक पहुँचता है।
- मिट्टी का ढेला को पानी में रखने पर ढेला पूरा भीग जाता है।
- पेन की नींव बीच में चिरी (Slit) रहती है जिससे उसमें बारीक केशनली बन जाती है, नींव को इंक में दुबाने पर कुछ इंक केशनली बीच में चढ़ जाती हैं।
- नोट:- रीफिल से इंक नींव तक गुरुत्व बल के कारण आता है।
- जल से भरी बाल्टी में तौलिया का एक सिरा रखने पर पूरा तौलिया भींग जाता है I
- तरल का वह गुण जिससे वह अपनी भिन्न-भिन्न परतों के बीच आपेक्षिक गति का विरोध करता है, उस तरल की श्यानता कहलाता है ।
- जो द्रव जितना ज्यादा गाढ़ा होता है वह उतना ही ज्यादा श्यान होता हैं जल के तुलना में कोलतार, ग्लिसरीन, शहद आदि की श्यानता अधिक होती है।
- श्यानता का गुण द्रव तथा गैस दोनों में होता है । द्रव में श्यानता अणुओं के मध्य ससंजक बलों के कारण होता है जबकि गैस में श्यानता गैस के अणुओं की एक परत से दूसरी परत में विसरण के कारण होता है।
- ताप बढ़ने पर गैस की श्यानता बढ़ती है जबकि द्रव की श्यानता घटती है।
- किसी तरल का श्यानता का मापन श्यानता गुणांक (Coefficient of Viscocity) से किया जाता है ।
- श्यानता गुणांक (η) का SI मात्रक kg m-1 s-1 या Nsm-2 होता है तथा इसे Pas (Pascal Second) से भी व्यक्त किया जाता है। श्यानता गुणांक की विमा (ML-1 T-1 ) होता है।
- श्यानता गुणांक cgs मात्रक Poise होता है।
1 Nsm-2 = 1 Pas = 10 Poise
- विक्षुब्ध गति (Trubulent motion) :- जब किसी तरल की गति ऐसी होती है कि उनमें प्रत्येक बिनदु पर वेग का परिणाम और दिशा हमेशा समय के साथ बदलता रहता है तो वैसी गति को विक्षुब्ध गति कहते हैं।
- क्रांतिक वेग (Critical Velocity) :- किसी तरल की गति की वह निश्चित मान जिससे कम मान पर तरल की गत धारारेखीय हो तथा जिससे अधिक पर तरल की गति विक्षुब्ध हो, क्रांतिक वेग कहलाता है ।
- Stoke's Formula:- जब कोई वस्तु श्यान द्रव में गुरूत्व के अधीन गिरती है तो श्यान द्रव जिसकी परत श्यानता के कारण स्थिर रहती है उसमें गति उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण तरल में श्यान बल उत्पन्न होता है जो वस्तु के गति का विरोध करता है। इस विरोधी बल का मान वस्तु के वेग के साथ बढ़ता जाता है और अन्त में इस बल का मान वस्तु के भारत के बराबर हो जाता है। इसके बाद वस्तु प्राप्त वेग से समरूप गति से गिरती है और यह वेग नियत होता हैं इस नियत वेग को सीमान्त वेग (Terminal Velocity) कहते हैं।
- अगर r त्रिज्या वाले कोई वस्तु (η) श्यानता गुणांक वाले तरल में सीमान्त वेग v से गिरती है तो वस्तु के सम्पर्क वाली हो के बीच श्यान बल |F = 6πηrv होगा। इसे Stroke's law कहते हैं ।
- किसी वस्तु का सीमान्त वेग वस्तु के त्रिज्या के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होता है यानि त्रिज्या जितना अधिक होता है सीमान्त वेग उतना ही अधिक होता है ।
- श्यानता तथा सीमांत वेग का उदाहरण:-
- बादल का बननाः- वायु में उपस्थित जलवाष्प जब धूलकण पर संघनित होता है तो बहुत छोटी-छोटी बूँदे बनती है। इन बूँदों का वायु में भार बहुत कम होता है। जिसके वायु के श्यान बल के कारण ये कण शीघ्र ही सीमांत वेग को प्राप्त कर लेते हैं जिसका मान बहुत कम होता है। इनके कम वेग के कारण ये आकाश में तैरती प्रतीत होती है। इसे बादल कहा जाता है ।
- जल वाष्प के छोटी-छोटी बूँदे वायु के श्यान बल के कारण शीघ्र ही सीमांत वेग प्राप्त कर लेती है। चूँकि सीमांत वेग का मान त्रिज्या के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होता है यही कारण छोटी बूँद कम चाल से और बड़ी बूंद अधिक चाल से नीचे गिरती है।
- पैरासूट से गिरता व्यक्ति पहले बहुत तेजी से गिरता है परन्तु वायु के श्यामता के कारण वह शीघ्र ही सीमांत वेग को प्राप्त कर लेता है अतः वह पृथ्वी पर सुरक्षित उतर जाता है।
Note:- स्टोक के सूत्र का महत्वपूर्ण उपयोग इलेक्ट्रॉन के आवेश को निर्धारित करने के लिए मिलिकन विधि में होता है।
अभ्यास प्रश्न
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