भगत सिंह की जीवनी | Bhagat Singh Biography in Hindi
भगत सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी थे। भगत सिंह ने साइमन कमीशन का विरोध किया था, उनके साथ लाला लाजपत राय थे। उन्होंने “साइमन वापस जाओ” का नारा लगाया। लगभग 23 साल की उम्र में ही उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया।

भारत की आजादी की लड़ाई के समय भगत सिंह सभी नौजवानों के लिए यूथ आइकॉन थे, जो उन्हें देश के लिए आगे आने को प्रोत्साहित करते थे. भगत सिंह सिख परिवार में जन्मे थे, बचपन से ही उन्होंने अपने आस पास अंग्रेजों को भारतियों पर अत्याचार करते देखा था, जिससे कम उम्र में ही देश के लिए कुछ कर गुजरने की बात उनके मन में बैठ चुकी थी. उनका सोचना था, कि देश के नौजवान देश की काया पलट सकते है, इसलिए उन्होंने सभी नौजवानों को एक नई दिशा दिखाने की कोशिश की. भगत सिंह का पूरा जीवन संघर्ष से भरा रहा, उनके जीवन से आज के नौजवान भी प्रेरणा ग्रहण करते है.
बिंदु (Point) | जानकारी (Information) |
नाम (Name) | भगत सिंह |
जन्म दिनांक(Birth Date) | 28 सितंबर 1907 |
जन्म स्थान (Birth Place) | ग्राम बंगा, तहसील जरनवाला, जिला लायलपुर, पंजाब |
पिता का नाम (Father Name) | किशन सिंह |
माता का नाम (Mother Name) | विद्यावती कौर |
शिक्षा (Education) | डी.ए.वी. हाई स्कूल, लाहौर, नेशनल कॉलेज, लाहौर |
संगठन | नौजवान भारत सभा, हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, कीर्ति किसान पार्टी, क्रांति दल |
राजनीतिक विचारधारा | समाजवाद, राष्ट्रवाद |
मृत्यु (Death) | 23 मार्च 1931 |
मृत्यु का स्थान (Death Place) | लाहौर |
स्मारक (Memorial) | द नेशनल शहीद मेमोरियल, हुसैनवाला, पंजाब |
भगत सिंह का जन्म, परिवार एवं आरंभिक जीवन (Birth, Family and Early Life)
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1960 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था जो पाकिस्तान में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह सिंधु था और माता का नाम श्रीमती विद्यावती जी था। यह 10 भाई बहन थे। भगत सिंह का नाम अमर शहीदों में लिया जाता है। उनका पैतृक गांव खटकड़ कलां है जो पंजाब में है।
शहीद भगत सिंह भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक है जिन्होंने हमें अपने देश के लिए मर मिटने की ताकत दी और यह बताया कि देश प्रेम क्या है। भगत सिंह का जन्म सिख परिवार में हुआ था। जब भगत सिंह का जन्म हुआ तो उनके पिता सरदार किशन सिंह जी जेल में थे। उनके चाचा श्री अजीत सिंह जी स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन भी बनाई थी।
भगत सिंह जी का दाखिला दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल में कराया था बाद में नेशनल कॉलेज BA की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने 1920 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोगआंदोलन में भाग लेने लगे गांधीजी विदेशी चीजों का बहिष्कार करते थे। 14 वर्ष की आयु में भगत सिंह ने सरकारी स्कूलों की किताबें और कपड़े जला दिए।
भगत सिंह क्रांतिकारी (Bhagat Singh Freedom Fighter)
प्रारंभ में भगत सिंह की गतिविधियाँ ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संक्षिप्त लेख लिखने, सरकार को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से एक हिंसक विद्रोह के सिद्धांतों को रेखांकित करने, मुद्रित करने और वितरित करने तक सीमित थीं. युवाओं पर उनके प्रभाव और अकाली आंदोलन के साथ उनके सहयोग को देखते हुए, वह सरकार के लिए एक रुचि के व्यक्ति बन गए. पुलिस ने उन्हें 1926 में लाहौर में हुए बमबारी मामले में गिरफ्तार किया. उन्हें 5 महीने बाद 60,000 रुपये के बॉन्ड पर रिहा कर दिया गया.
30 अक्टूबर 1928 को लाला लाजपत राय ने सभी दलों के जुलूस का नेतृत्व किया और साइमन कमीशन के आगमन के विरोध में लाहौर रेलवे स्टेशन की ओर मार्च किया. पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की प्रगति को विफल करने के लिए एक क्रूर लाठीचार्ज का सहारा लिया. टकराव ने लाला लाजपत राय को गंभीर चोटों के साथ छोड़ दिया और उन्होंने नवंबर 17, 1928 को अपनी चोटों के कारण दम तोड़ दिया. लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए, भगत सिंह और उनके सहयोगियों ने जेम्स ए स्कॉट की हत्या की साजिश रची, जो पुलिस अधीक्षक थे. माना जाता है कि लाठीचार्ज का आदेश दिया है. क्रांतिकारियों ने स्कॉट के रूप में सहायक पुलिस अधीक्षक जे.पी. सौन्डर्स को गलत तरीके से मार डाला. भगत सिंह ने अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए जल्दी से लाहौर छोड़ दिया. बचने के लिए उन्होंने अपनी दाढ़ी मुंडवा ली और अपने बाल काट दिए, जो सिख धर्म के पवित्र सिद्धांतों का उल्लंघन था.
डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के निर्माण के जवाब में, हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने विधानसभा परिसर के अंदर एक बम विस्फोट करने की योजना बनाई, जहां अध्यादेश पारित होने वाला था. 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली के गलियारों में बम फेंका, ‘इंकलाब ज़िंदाबाद!’ और हवा में अपनी मिसाइल को रेखांकित करते हुए पर्चे फेंके. बम किसी को मारने या घायल करने के लिए नहीं था और इसलिए इसे भीड़ वाली जगह से दूर फेंक दिया गया था, लेकिन फिर भी कई परिषद सदस्य हंगामे में घायल हो गए. धमाकों के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों ने गिरफ्तारी दी.
भगत सिंह ने शादी करने से किया इनकार
भगत सिंह ने 1923 में एफए की परीक्षा सोलह वर्ष की उम्र में पास कर ली थी वो बीए में दाखिल हुए। उस समय भारत मे कम उम्र में शादी करने कर दी जाती थी। इसलिए परिवार की तरफ से भगत सिंह को भी शादी की बात चलने लगी।
संभवतः मानांवाला गांव का एक समृद्ध परिवार भगत सिंह को देखने आया और सगाई के लिए तारीख भी निश्चित कर दी गई।” भगत सिंह इस बात से नाराज होकर घर छोड़कर भाग गए और पिताजी के नाम पत्र लिखकर कहा-
पिता जी, नमस्ते! मेरी जिंदगी भारत की आजादी के महान संकल्प के लिए दान कर दी गई है। इसलिए मेरी जिंदगी में आराम और सांसारिक सुखों का कोई आकर्षण नहीं है। आपको याद होगा कि जब मैं बहुत छोटा था, तो बापू जी (दादाजी) ने मेरे जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि मुझे वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है। लिहाजा मैं उस समय की उनकी प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूं। उम्मीद है आप मुझे माफ कर देंगे। ~ आपका ताबेदार
जलियाँवाला बाग हत्याकांड
भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी के दिन) रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी। करीब 5,000 लोग जलियांवाला बाग में इकट्ठे थे।
ब्रिटिश सरकार के कई अधिकारियों को यह 1857 के गदर की पुनरावृत्ति जैसी परिस्थिति लग रही थी जिसे न होने देने के लिए और कुचलने के लिए वो कुछ भी करने के लिए तैयार थे।
जिसमें जनरल डायर नामक एक अँग्रेज ऑफिसर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं। जनसमूह के लिए वहाँ से बचकर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। जिसमें 400 से अधिक व्यक्ति मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए।
जलियाँवाला बाग की मिट्टी घर ले आये भगत सिंह
भगत सिंह की उम्र उस समय मात्र बारह वर्ष की थी। इस घटना से उनका गहरा धक्का लगा। दूसरे दिन वह स्कूल बंद होने पर घर नहीं लौटे और वही से 12 मील पैदल चलकर जलियाँवाला बाग पहुँच गये।
वहाँ तैनातपहरेदारों के बीच से किसी तरह वे जलियाँवाला बाग के भीतर चले गये और भारतीयों के रक्त से सनी हुई गीली मिट्टी को एक बोतल में भर लाये।
जब भगत सिंह घर पहुंचे तो उनसे उनकी छोटी बहन ने पूछा-“तुम इतने समय तक कहाँ थे? माताजी तुम्हारे लिए भोजन रखकर कब से तुम्हारी राह देख रही हैं। भगत सिंह ने अपने हाथ की बोतल दिखाते हुए कहा- “यह देखो। यह हमारे भाई-बहनों का खून है, जिन्हें अंग्रेजों ने मार डाला है। इसे प्रणाम करो।”
पिता से स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने की अनुमति मांगी
नवीं कक्षा में प्रवेश करने के पूर्व ही भगत सिंह ने निश्चय कर लिया कि स्वाधीनता-संग्राम में कूदकर अपने देश की खातिर काम करेंगे। उस समय उसकी उम्र केवल तेरह वर्ष की थी।
भगत सिंह ने अपने निश्चय के बारे में पिता जी को बताया। किशन सिंह स्वयं एक क्रांतिकारी थे, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को सहर्ष अनुमति दे दी।
विदेशी वस्त्रों की होली जलाई
वह समय था, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस देश की आजादी के लिए लड़ रही थी। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार भी उन दिनों जोरो पर था। नेता गण लोगो को समझाते थे कि यदि विदेशी वस्त्र खरीदेंगे तो इससे दूसरे देशों को लाभ होगा। इसलिए हमें स्वदेशी वस्त्र ही पहनने चाहिए।
भगत सिंह बचपन से केवल खादी वस्त्र ही पहनते थे। भगत सिंह ने भी इस आन्दोलन में बड़े उत्साह से भाग लिया। भगत सिंह देशी वस्त्रों को पहनने का लोगों से आग्रह करते और हर हफ्ते विदेशी वस्त्रों को एकत्रित करके उनकी होली जलाया करते थे।
गांधी जी द्वारा अहसयोग आंदोलन वापस लेना
सन् 1922 में कांग्रेस ने गोरखपुर जिले के चोरीचौरा नामक कस्बे में एक जुलूस निकाला। उसी वक्त कुछ उपद्रवी लोगों ने 22 पुलिस सिपाहियों को एक मकान में बन्द करके उसमें आग लगा दी। ऐसी ही हिंसात्मक घटना बम्बई और मद्रास में भी हो चुकी थी, इससे महात्मा गांधी ने आघात होकर असहयोग आंदोलन बीच मे ही रोक दिया।
उस समय वह आन्दोलन देशभर में पूरे जोर-शोर से चल रहा था।महात्मा गांधी के इस निर्णय से देश भर के आन्दोलनकरियो समेत नौजवान भगत सिंह को गहरी निराशा हुई। क्या सिर्फ 22 व्यक्तियों के मर जाने से इतने विशाल महत्वपूर्ण आंदोलन को रोका जा सकता है?
जब जलियावाला बाग में निहत्ते हज़ारों लोगों पर गोलियां चला दी गयी तो क्या वह हिंसा नही थी? कुछ ही समय पूर्व जब एक उन्नीस वर्षीय क्रांतिकारी करतार सिंह को अंग्रेज सरकार ने फांसी पर लटकाया था। तब अहिंसा समर्थक किसी ने भी कोई आपत्ति क्यों नहीं उठाई? फिर अब क्यों अहिंसा इतनी महत्वपूर्ण बन गई?
सशस्त्र क्रांति में प्रवेश
इस तरह के विचारों ने अहिंसा और असहयोग आंदोलनों के प्रति भगत सिंह की निष्ठा को कम कर दिया। फलस्वरूप भगत सिंह ने आयरलैंड, इटली और रूस के क्रांतिकारियों का अध्ययन करने लगें।
इससे उनके मन में यह आस्था जोर पकड़ती गई कि देश की आजादी को प्राप्त करने का एकमात्र व्यावहारिक तरीका सशस्त्र क्रांति ही है। ऐसा सोचकर उन्होंने जुलूसों में भाग लेना प्रारम्भ किया तथा कई क्रान्तिकारी दलों के सदस्य बने।
अपने अध्ययन को जारी रखने के लिए भगत सिंह नेशनल कॉलेज मैं भर्ती हो गये। भगत सिंह दिन में क्लास में बैठकर पढ़ते और शाम को कई मित्रों को एकत्रित करके उनसे क्रांति के बारे में चर्चा करते थे। इससे उन्हें देश भर की क्रांतिकारी गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती।
उस समय बंगाल क्रांतिकारियों का प्रान्त था, भगत सिंह को इस बात ने अपनी ओर आकर्षित किया। उन्होंने किसी तरह बंगाल प्रांत के क्रांतिकारियों से सम्पर्क स्थापित किया।
मैं जोर देकर कहता हूँ कि मेरे अंदर भी अच्छा जीवन जीने की महत्वकांक्षा और आशाएं हैं लेकिन मैं समय की माँग पर सब कुछ छोड़ने को तैयार हूँ यही सबसे बड़ा त्याग है ~ शहीद भगत सिंह
बंगाल के क्रांतिकारी पार्टी के नेता शचीन्द्रनाथ सान्याल थे। वह प्रत्येक क्रांतिकारी की जांच पड़ताल के पश्चात ही अपने दल में स्वीकार करते थे। औऱ प्रत्येक सदस्य को एक शर्त स्वीकार करनी पड़ती थी कि अपने नेता के आह्वान पर क्रांतिकारी सदस्य को तुरंत शामिल होना आवश्यक है। भगत सिंह ने यह शर्त मंजूर कर ली।
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना
काकोरी काण्ड में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि सन 1928 में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन।
लाला लाजपत राय जी की हत्या का प्रतिशोध
सन 1928 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के लिये प्रदर्शन हुए। राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय के शांतिपूर्ण विरोध करने पर भी पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट जेम्स स्कॉट द्वारा लाठीचार्ज करा दिया गया। जिसमे लाल लालजपात राय घायल हो गए और उनकी मृत्यु हो गयी।
इस घटना का बदला लेने के लिए भगत सिंह, शिवराम राजगुरु, सुखदेव थापर और चंद्रशेखर आज़ाद ने जेम्स स्कॉट को मारने की योजना बनाई गयी। योजना के अनुसार भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे।
जयगोपाल अपनी साइकिल को लेकर ऐसे बैठ गये जैसे कि वो ख़राब हो गयी हो। गोपाल के इशारे पर दोनों सचेत हो गये। उधर चन्द्रशेखर आज़ाद पास के डी० ए० वी० स्कूल की चहार दीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में रक्षक का काम कर रहे थे।
17 दिसंबर 1928 को करीब सवा चार बजे, ए० एस० पी० सॉण्डर्स के आते ही राजगुरु ने एक गोली सीधी उसके सर में मारी। इसके बाद भगत सिंह ने भी 3-4 गोली दाग दी।
इस प्रकार योजना को सफलता पूर्वक अंजाम दे दिया गया, किंतु उन्होंने जेम्स स्कॉट की बजाय एक अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी। इस घटना को अंजाम देने के बाद सभी क्रांतिकारी घटना स्थल से अज्ञात जगह चले गये।
भगत सिंह और सुखदेव का असेंबली में बम फेकना
अंग्रेज सरकार दिल्ली की असेम्बली में ‘पब्लिक सेफ़्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ पास करवाने जा रही थी। इससे भारतीयों पर अंग्रेजों का दबाव और अधिक बढ़ जाता।
ऐसा करने से रोकने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में बम फेंकने का बीड़ा उठाया। इस बम विस्फ़ोट का उद्देश्य किसी को भी चोट पहुंचाना नहीं था। बल्कि दुनिया को ये दिखाना था कि देश के युवा जाग गए है और अब उन्हें स्वतंत्रता चाहते है।
8 अप्रैल 1929 को, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सत्र के दौरान दो बमों फेेंके। बम फटने के बाद उन्होंने “इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!” का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। पर्चे पर लिखा था – ‘बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊंचे शब्द की आवश्यकता होती है.’
बम फोड़ने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहां से भागे नहीं बल्कि स्वयं को पुलिस के हवाले कर दिया उनका प्लान ही ये था। योजना के अनुसार विस्फोट में कोई भी नहीं मारा गया, हालांकि कुछ लोग घायल जरूर हो गए थे। इसी काण्ड को अंग्रेजों ने “लाहौर षडयंत्र केस” नाम दिया।
भगत सिंह के जेल में दिन
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को बम विस्फोट मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। कुछ समय पश्चात पुलिस ने सुखदेव सहित अन्य क्रांतिकारियों को भी गिरफ्तार कर लिया। जिससे सॉन्डर्स की हत्या का राज भी खुल गया जिसमें भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव फांसी की सजा सुनाई गई।
जेल में भगत सिंह करीब 2 साल रहे। जेल में रहते हुए भी उनका अध्ययन लगातार जारी रहा। इस दौरान वे लेखो के माध्यम से अपने क्रान्तिकारी विचार व्यक्त करते रहते थे।
उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ?
शहीद भगत सिंह की फांसी (Bhagat Singh Death Reason)
भगत सिंह खुद अपने आप को शहीद कहा करते थे, जिसके बाद उनके नाम के आगे ये जुड़ गया. भगत सिंह, शिवराम राजगुरु व सुखदेव पर मुकदमा चला, जिसके बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई, कोर्ट में भी तीनों इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते रहे. भगत सिंह ने जेल में रहकर भी बहुत यातनाएं सहन की, उस समय भारतीय कैदियों के साथ अच्छा व्यव्हार नहीं किया जाता था, उन्हें ना अच्छा खाना मिलता था, ना कपड़े. कैदियों की स्थिति को सुधार के लिए भगत सिंह ने जेल के अंदर भी आन्दोलन शुरू कर दिया, उन्होंने अपनी मांग पूरी करवाने के लिए कई दिनों तक ना पानी पिया, ना अन्न का एक दाना ग्रहण किया. अंग्रेज पुलिस उन्हें बहुत मारा करती थी, तरह तरह की यातनाएं देती थी, जिससे भगत सिंह परेशान होकर हार जाएँ, लेकिन उन्होंने अंत तक हार नहीं मानी. 1930 में भगत जी ने Why I Am Atheist नाम की किताब लिखी.
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी दे दी गई. कहते है तीनों की फांसी की तारीख 24 मार्च थी, लेकिन उस समय पुरे देश में उनकी रिहाई के लिए प्रदर्शन हो रहे थे, जिसके चलते ब्रिटिश सरकार को डर था, कि कहीं फैसला बदल ना जाये, जिससे उन लोगों ने 23 व 24 की मध्यरात्रि में ही तीनों को फांसी दे दी और अंतिम संस्कार भी कर दिया.
अंग्रेज़ों द्वारा शव को छुपाकर जलाने की कोशिश
फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर जेल की पिछली दीवार के एक छेद से उनके शवों को बाहर निकाला गया।
फिर लाहौर से लगभग 80 किलोमीटर दूर हुसैनीवाला में सतलुज नदी के तट पर ले गये। जहाँ मिट्टी का तेल डालकर शव को नष्ट करने की कोशिश की गई। जलती आग को देखकर गाँव के लोगों को कुछ संदेह हुआ।
इसी दौरान वहां लाला लाजपत राय की बेटी पार्वती देवी और भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर समेत हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा हो गए। इतनी बड़ी भीड़ को वहां देख अंग्रेज लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंककर भाग गये।
लाहौर में सम्मान के साथ निकाली गई शव यात्रा
अंग्रेजों के वहां भागने के बाद तीनों शहीदों के अधजले शवों को बाहर निकाला गया और लाहौर में आकर तीनों शहीदों की बेहद सम्मान के साथ अर्थियां बनाई गईं।
उसके बाद 24 मार्च की शाम हजारों की भीड़ ने पूरे सम्मान के साथ उनकी शव यात्रा निकाली और फिर उनका विधिवत तरिके से रावी नदी के किनारे किया अंतिम संस्कार किया।
शहीद दिवस (Shahid Diwas)
शहीद भगत सिंह के बलिदान को व्यर्थ न जाने देने के कारण हर साल उनके मुत्यु तिथि को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है. इन दिन उन्हें देश के सभी लोग श्रद्धांजलि देते हैं.
शहीद भगत सिंह कविता (Bhagat Singh Kavita or Poem)
“इतिहास में गूँजता एक नाम हैं भगत सिंह
शेर की दहाड़ सा जोश था जिसमे वे थे भगत सिंह
छोटी सी उम्र में देश के लिए शहीद हुए जवान थे भगत सिंह
आज भी जो रोंगटे खड़े करदे ऐसे विचारो के धनि थे भगत सिंह ..”
भगत सिंह की लोकप्रियता और विरासत (Popularity and legacy of Bhagat Singh)
भगत सिंह उनकी प्रखर देशभक्ति, जो कि आदर्शवाद से जुडी थी. जिसने उन्हें अपनी पीढ़ी के युवाओं के लिए एक आदर्श आइकन बना दिया. ब्रिटिश इंपीरियल सरकार के अपने लिखित और मुखर आह्वान के माध्यम से वह अपनी पीढ़ी की आवाज बन गए. गांधीवादी अहिंसक मार्ग से स्वराज की ओर जाने की उनकी आलोचना अक्सर कई लोगों द्वारा आलोचना की गई है फिर भी शहादत के निडर होकर उन्होंने सैकड़ों किशोर और युवाओं को पूरे स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. वर्तमान समय में उनकी प्रतिष्ठा इस तथ्य से स्पष्ट है कि भगत सिंह को 2008 में इंडिया टुडे द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में, सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी से आगे महान भारतीय के रूप में वोट दिया गया था.
भगत सिंह के लोकप्रिय नारे (Bhagat Singh Quotes, Slogans in Hindi)
- इंकलाब जिंदाबाद।
- साम्राज्यवाद का नाश हो।
- प्रेमी, पागल, और कवी एक ही चीज से बने होते हैं।
- मैं एक ऐसा पागल हूँ जो जेल में भी आजाद है, राख का हर कण मेरी गर्मी से गतिमान है।
- क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है? गरीबी एक अभिषाप है, यह एक सज़ा है।
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