छत्रपति शिवाजी महाराज की जीवनी – Chhatrapati Shivaji Maharaj Biography Hindi
Shivaji Maharaj Biography in Hindi:-छत्रपति शिवाजी महाराज (Chhatrapati Shivaji Maharaj) एक महान भारतीय शासक थे, जिन्होंने मराठा साम्राज्य (Maratha Empire) खड़ा किया था। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, वे बहादुर, बुध्दिमान और दयावान राजा थे।

छत्रपति शिवाजी महाराज भारत के राजा और रणनीतिकार थे। उन्होंने 1674 में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी थी। उन्होंने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। 1674 में रायगढ़ में उनका राज्याभिषेक हुआ और छत्रपति बने। शिवाजी ने अपनी अनुशासित सेना तथा सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील शासन प्रदान किया। उन्होंने समर-विद्या में कई नवाचार किये और छापामार युद्ध की नयी शैली (शिवसूत्र) विकसित की। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को दोबारा जीवीत किया और फारसी के स्थान पर मराठी और संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया।
छत्रपति शिवाजी महाराज जीवन परिचय (Chhatrapati Shivaji Maharaj Biography)
जीवन परिचय बिंदु | शिवाजी जीवन परिचय |
पूरा नाम | शिवाजी शहाजी राजे भोसले |
जन्म | 19 फ़रवरी 1630 |
जन्म स्थान | शिवनेरी दुर्ग, पुणे |
जाति | कुर्मी |
गोत्र | कश्यप |
माता-पिता | जीजाबाई, शहाजी राजे |
पत्नी | साईंबाई, सकबारबाई, पुतलाबाई, सोयाराबाई |
बेटे-बेटी | संभाजी भोसले या शम्भू जी राजे, राजाराम, दिपाबाई, सखुबाई, राजकुंवरबाई, रानुबाई, कमलाबाई, अंबिकाबाई |
मृत्यु | 3 अप्रैल 1680 |
छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म, परिवार एवं आरंभिक जीवन (Birth, Family and Initial Life)
शिवाजी का जन्म पुणे जिले के जुन्नार गाँव के शिवनेरी किले में हुआ था. शिवाजी का नाम उनकी माता ने भगवान शिवाई के उपर रखा था, जिन्हें वो बहुत मानती थी. शिवाजी के पिता बीजापुर के जनरल थे, जो उस समय डेक्कन के सुल्तान के हाथों में था. शिवाजी अपनी माँ के बेहद करीब थे, उनकी माता बहुत धार्मिक प्रवत्ति की थी, यही प्रभाव शिवाजी पर भी पड़ा था. उन्होंने रामायण व महाभारत को बहुत ध्यान से पढ़ा था और उससे बहुत सारी बातें सीखी व अपने जीवन में उतारी थी. शिवाजी को हिंदुत्व का बहुत ज्ञान था, उन्होंने पुरे जीवन में हिन्दू धर्म को दिल से माना और हिन्दुओं के लिए बहुत से कार्य किये. शिवाजी के पिता ने दूसरी शादी कर ली और कर्नाटक चले गए, बेटे शिवा और पत्नी जिजाबाई को किले की देख रेख करने वाले दादोजी कोंडदेव के पास छोड़ गए थे.
छत्रपति शिवाजी महाराज की शिक्षा एवं विवाह, पत्नी (Shivaji Maharaj Education and Marriage, Wife)
शिवाजी को हिन्दू धर्म की शिक्षा कोंडदेव से भी मिली थी, साथ ही उनके कोंडाजी ने उन्हें सेना के बारे में, घुड़सवारी और राजनीती के बारे में भी बहुत सी बातें सिखाई थी.शिवाजी बचपन से ही बुद्धिमानी व तेज दिमाग के थे, उन्होंने बहुत अधिक शिक्षा तो ग्रहण नहीं की, लेकिन जितना भी उन्हें बताया सिखाया जाता था, वो वे बहुत मन लगाकर सीखते थे. 12 साल की उम्र में शिवाजी बंगलौर गए, जहाँ उन्होंने अपने भाई संभाजी और माँ के साथ शिक्षा ग्रहण की. यही उन्होंने 12 साल की उम्र में साईंबाई से विवाह किया.
छत्रपति शिवाजी महाराज का स्वर्णिम इतिहास–
साल 1645 में महज 15 साल की उम्र में छत्रपति शिवाजी ने तोरण किले पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। धीरे-धीरे शिवाजी महाराज अपना प्रभुत्व आगे बढ़ा दे गए और उन्होंने कोंडाना पर भी अपना आधिपत्य जमा लिया।
छत्रपति शिवाजी महाराज के बढ़ते प्रभुत्व को देखकर बीजापुर का सुल्तान भयभीत हो गया और उसने उनकी शक्तियों का दमन करने के लिए उनके पिता शाहजी भोंसले को बंदी बना लिया। पिता को मुक्त कराने शिवा जी महाराज ने कोंडाना का किला छोड़ दिया। 1645 में खराब स्वास्थ्य के कारण शिवाजी महाराज के पिता शाहजी की मृत्यु हो गई। पिता की मृत्यु के बाद 1656 के करीब छत्रपति शिवाजी महाराज ने जावेली पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया।
शिवाजी की बढ़ती शक्तियों और प्रभुत्व को देखते हुए आदिल शाह ने उनकी शक्तियों का दमन करने के लिए और उन्हें जान से मारने के लिए अपने सेनापति अफजल खान को शिवाजी महाराज के पास भेजा।
कहा जाता है कि प्रतापगढ़ के किले के पास अफजल खान ने शिवाजी महाराज से भेंट की और भेंट के दौरान गले मिलने पर उन पर आक्रमण कर दिया। लेकिन शिवाजी महाराज पहले से ही अफजल खान की नीतियों को समझ चुके थे इसीलिए शरीर पर कवच पहन कर गए थे और हाथों में बाघ नख लगा रखा था।
जब अफजल खान ने शिवाजी के ऊपर जानलेवा हमला किया तो जवाब में छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी अपने बाघ नख से उसका शरीर घायल कर दिया। कवच के कारण शिवाजी महाराज को कोई क्षति नहीं पहुंची लेकिन उनके भीषण प्रहार से अफजल खान की मौत हो गई।
घटना के तुरंत बाद शिवाजी के सैनिकों ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया। आखिरकार 10 नवंबर 1659 को छत्रपति शिवाजी महाराज ने बीजापुर के सुल्तान की सल्तनत को जड़ से उखाड़ फेंका।
छत्रपति शिवाजी महाराज की लडाइयां (Chhatrapati Shivaji Maharaj Fight)
शिवाजी का जब जन्म हुआ था, उस समय तक मुगलों का साम्राज्य भारत में फ़ैल चूका था, बाबर ने भारत में आकर मुग़ल एम्पायर खड़ा कर दिया था. शिवाजी ने मुगलों के खिलाफ जंग छेड़ दी और कुछ ही समय में समस्त महाराष्ट्र में मराठा साम्राज्य पुनः खड़ा कर दिया. शिवाजी ने मराठियों के लिए बहुत से कार्य किये, यही वजह है, कि उन्हें समस्त महाराष्ट्र में भगवान की तरह पूजा जाता है.
15 साल की उम्र में शिवाजी ने पहला युद्ध लड़ा, उन्होंने तोरना किले में हमला कर उसे जीत लिया. इसके बाद उन्होंने कोंडाना और राजगढ़ किले में भी जीत का झंडा फहराया. शिवाजी के बढ़ते पॉवर को देख बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी को कैद कर लिया, शिवाजी व उनके भाई संभाजी ने कोंडाना के किले को वापस कर दिया, जिसके बाद उनके पिताजी को छोड़ दिया गया. अपनी रिहाई के बाद शाहजी अस्वस्थ रहने लगे और 1964-65 के आस पास उनकी मौत हो गई. इसके बाद शिवाजी ने पुरंदर और जवेली की हवेली में भी मराठा का धव्ज लहराया. बीजापुर के सुल्तान ने 1659 में शिवाजी के खिलाफ अफजल खान की एक बहुत बड़ी सेना भेज दी और हिदायत दी की शिवाजी को जिंदा या मरा हुआ लेकर आये. अफजल खान ने शिवाजी को मारने की कोशिश कूटनीति से की, लेकिन शिवाजी ने अपनी चतुराई से अफजल खान को ही मार डाला. शिवाजी की सेना ने बीजापुर के सुल्तान को प्रतापगढ़ में हराया था. यहाँ शिवाजी की सेना को बहुत से शस्त्र, हथियार मिले जिससे मराठा की सेना और ज्यादा ताकतवर हो गई.
बीजापुर के सुल्तान ने एक बार फिर बड़ी सेना भेजी, जिसे इस बार रुस्तम ज़मान ने नेतृत्व किया, लेकिन इस बार भी शिवाजी की सेना ने उन्हें कोल्हापुर में हरा दिया.
छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लड़े गए युद्ध (Battles fought by Chhatrapati Shivaji Maharaj)
- प्रतापगढ़ की लड़ाई, जो की साल 1659 शिवाजी महाराज और आदिलशाही जनरल अफजल खान की सेनाओं के बीच महाराष्ट्र के सतारा शहर के पास प्रतापगढ़ के किले में लड़ी गई थी।
- फिर साल 1660 में किले के आसपास के एक पहाड़ी दर्रे पर “पवन” की लड़ाई लड़ी गई थी।
- सूरत की बर्खास्तगी, जों की साल 1664 में, गुजरात के सूरत शहर के पास शिवाजी महाराज और मुगल कप्तान इनायत खान के बीच हुई थी।
- पुरंदर की लड़ाई, जो साल 1665 में मुगल साम्राज्य और मराठा साम्राज्य के बीच लड़ी गई एक प्रमुख लड़ाई थी।
- सिंहगढ़ की लड़ाई, जो साल 1670 में, महाराष्ट्र के पुणे शहर के पास सिंहगढ़ के किले पर मराठा शासक Chhatrapati Shivaji Maharaj के सेनापति तानाजी मालुसरे और जय सिंह प्रथम के अधीन किले रक्षक उदयभान राठौड़ के बीच हुई थी, जो एक मुगल सेना प्रमुख थे।
- कल्याण की लड़ाई, जो साल 1682-83 के बिच हुई एक महत्वपूर्ण लड़ाई थी, क्योंकि मुगल साम्राज्य के बहादुर खान ने मराठा सेना को हराकर कल्याण पर अधिकार कर लिया था।
- संगमनेर की लड़ाई, जो साल 1679 में फिर से मुगल साम्राज्य और मराठा साम्राज्य के बीच लड़ी गई थी। यह Chhatrapati Shivaji Maharaj द्वारा लड़ा गया अंतिम युद्ध था।
मुगलों के साथ मराठों का संघर्ष (Conflict of Marathas with Mughals)
1657 : Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अहमदनगर के पास और जुन्नार में मुगल क्षेत्र पर छापा मारा, जिसके लिए औरंगजेब ने नसीरी खान को भेजकर छापेमारी का जवाब दिया, जिसने अहमदनगर में शिवाजी की सेना को हराया था।
1659 : शिवाजी ने पुणे में शाइस्ता खान (औरंगजेब के मामा) और बीजापुर सेना की एक बड़ी सेना को हराया।
1664 : Chhatrapati Shivaji Maharaj ने सूरत के धनी मुगल व्यापारिक बंदरगाह पर अधिकार कर लिया।
1665 : शिवाजी और राजा जय सिंह प्रथम के बीच पुरंदर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जो पुरंदर की लड़ाई में मराठों की हार के बाद औरंगजेब का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जिसके बाद मराठों को कई कई किलों को मुगलों के हाथो सौपना पड़ा और फिर शिवाजी महाराज और संभाजी आगरा में औरंगजेब से मिलने के लिए सहमत हुए।
1666 : Chhatrapati Shivaji Maharaj जब आगरा में मुगल सम्राट से मिलने गए, तो उन्हें वहा गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें बंदी बना लिया गया। फिर बाद में वह और उसका बेटा वहां से भेष बदलकर फरार हो गए। उसके बाद 1670 तक मराठों और मुगलों के बीच शांति रही।
साल 1670 के बाद शिवाजी ने मुगलों के खिलाफ चौतरफा हमला किया। उन्होंने चार महीने के भीतर ही मुगलों द्वारा घेर लिए गए अपने अधिकांश क्षेत्रों को पुनः प्राप्त कर लिया। अपनी सैन्य रणनीति के माध्यम से, Chhatrapati Shivaji Maharaj ने दक्कन और पश्चिमी भारत में भूमि का एक बड़ा हिस्सा भी हासिल कर लिया था।
अंग्रेजों के साथ शिवाजी महाराज के संबंध (Shivaji maharaj relations with the British)
- 1660 : शुरू में अंग्रेजों के साथ Chhatrapati Shivaji Maharaj के सौहार्दपूर्ण संबंध थे, लेकिन जब अंग्रेजों ने उनके खिलाफ बीजापुर सल्तनत का समर्थन किया, तो चीजें बिलकुल अलग हो गईं।
- 1670 : फिर शिवाजी महाराज ने अंग्रेजों के खिलाफ खिलाफ कार्रवाई की और उन्हें बंबई में अपनी युद्ध सामग्री नहीं बेचने दी। यह संघर्ष जारी रहा और दोनों पक्षों के बीच समझौते के लिए कई वार्ता विफल रही।
आगरा यात्रा
अपनी सुरक्षा का पूर्ण आश्वासन प्राप्त होने के बाद शिवाजी आगरा के दरबार में औरंगज़ेब से मिलने के लिए तैयार हो गये। छत्रपति 9 मई, 1666 को अपने पुत्र शम्भाजी और 4000 मराठा सैनिकों के साथ मुग़ल दरबार में उपस्थित हुए, लेकिन औरंगज़ेब द्वारा उचित सम्मान नही होने पर शिवाजी ने भरे हुए दरबार में औरंगज़ेब को ‘विश्वासघाती’ कहा, जिसके फलस्वरूप औरंगज़ेब ने शिवाजी एवं उनके पुत्र को ‘जयपुर भवन’ में क़ैद कर दिया। वहाँ से शिवाजी 19 अगस्त, 1666 को फलों की टोकरी में छिपकर फ़रार हो गये और 22 सितम्बर, 1666 को रायगढ़ पहुँचे। कुछ दिनों के बाद शिवाजी ने मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब को पत्र लिखकर कहा कि “यदि सम्राट उसे (शिवाजी) को क्षमा कर दें तो वह अपने पुत्र शम्भाजी को दोबारा मुग़ल सेवा में भेज सकते हैं।” औरंगज़ेब ने शिवाजी की इन शर्तों को स्वीकार कर उसे ‘राजा’ की उपाधि प्रदान की।
छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक (Chhatrapati Shivaji Maharaj Coronation)
महाराष्ट्र में हिन्दू राज्य की स्थापना शिवाजी ने 1674 में की, जिसके बाद उन्होंने अपना राज्याभिषेक कराया. शिवाजी कुर्मी जाति के थे, जिन्हें उस समय शुद्र ही माना जाता था, इस वजह से सभी ब्राह्मण ने उनका विरोध किया और राज्याभिषेक करने से मना कर दिया. शिवाजी ने बनारस के भी ब्राह्मणों को न्योता भेजा, लेकिन वे भी नहीं माने, तब शिवाजी ने उन्हें घूस देकर मनाया और फिर उनका राज्याभिषेक हो पाया. यही पर उन्हें छत्रपति की उपाधि से सम्मानित किया गया. इसके 12 दिन के बाद उनकी माता जिजाभाई का देहांत हो गया, जिससे शिवाजी ने शोक मनाया और कुछ समय बाद फिर से अपना राज्याभिषेक कराया. इसमें दूर दूर से राजा पंडितों को बुलाया गया. जिसमें बहुत खर्चा हुआ. शिवाजी ने इसके बाद अपने नाम का सिक्का भी चलाया.
सभी धर्मो का आदर :
शिवाजी धार्मिक विचारधाराओं मान्यताओं के घनी थे. अपने धर्म की उपासना वो जिस तरह से करते थे, उसी तरह से वो सभी धर्मो का आदर भी करते थे, जिसका उदहारण उनके मन में समर्थ रामदास के लिए जो भावना थी, उससे उजागर होता हैं. उन्होंने रामदास जी को पराली का किला दे दिया था, जिसे बाद में सज्जनगड के नाम से जाना गया . स्वामी राम दास एवम शिवाजी महाराज के संबंधो का बखान कई कविताओं के शब्दों में मिलता हैं . धर्म की रक्षा की विचारधारा से शिवाजी ने धर्म परिवर्तन का कड़ा विरोध किया .
शिवाजी ने अपना राष्ट्रीय ध्वज नारंगी रखा था, जो हिंदुत्व का प्रतीक हैं. इसके पीछे एक कथा है, शिवाजी रामदास जी से बहुत प्रेम करते थे, जिनसे शिवाजी ने बहुत सी शिक्षा ग्रहण की थी. एक बार उनके ही साम्राज्य में रामदास जी भीख मांग रहे थे, तभी उन्हें शिवाजी ने देखा और वे इससे बहुत दुखी हुए, वे उन्हें अपने महल में ले गए और उनके चरणों में गिर उनसे आग्रह करने लगे, कि वे भीख ना मांगे, बल्कि ये सारा साम्राज्य ले लें. स्वामी रामदास जी शिवाजी की भक्ति देख बहुत खुश हुए, लेकिन वे सांसारिक जीवन से दूर रहना चाहते थे, जिससे उन्होंने साम्राज्य का हिस्सा बनने से तो इंकार कर दिया, लेकिन शिवाजी को कहा, कि वे अच्छे से अपने साम्राज्य को संचालित करें और उन्हें अपने वस्त्र का एक टुकड़ा फाड़ कर दिया और बोला इसे अपना राष्ट्रीय ध्वज बनाओ, ये सदेव मेरी याद तुम्हे दिलाएगा और मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा.
छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना (Chhatrapati Shivaji Maharaj Army)
शिवाजी के पास एक बहुत बड़ी विशाल सेना थी, शिवाजी अपनी सेना का ध्यान एक पिता की तरह रखते थे. शिवाजी सक्षम लोगों को ही अपनी सेना में भरती करते थे, उनके पास इतनी समझ थी, कि वे विशाल सेना को अच्छे से चला पायें. उन्होंने पूरी सेना को बहुत अच्छे से ट्रेनिंग दी थी, शिवाजी के एक इशारे पर वे सब समझ जाते थे. उस समय तरह तरह के टैक्स लिए जाते थे, लेकिन शिवाजी बहुत दयालु राजा थे, वे जबरजस्ती किसी से टैक्स नहीं लेते थे. उन्होंने बच्चों, ब्राह्मणों व औरतों के लिए बहुत कार्य किये. बहुत सी प्रथाओं को बंद किया. उस समय मुग़ल हिंदुओ पर बहुत अत्याचार करते थे, जबरजस्ती इस्लाम धर्म अपनाने को बोलते थे, ऐसे समय में शिवाजी मसीहा बनकर आये थे. शिवाजी ने एक मजबूत नेवी की स्थापना की थी, जो समुद्र के अंदर भी तैनात होती और दुश्मनों से रक्षा करती थी, उस समय अंग्रेज, मुग़ल दोनों ही शिवाजी के किलों में बुरी नजर डाले बैठे थे, इसलिए उन्हें इंडियन नेवी का पिता कहा जाता है.
मराठा शक्ति की स्थापना (establishing Maratha’s power)
राज्याभिषेक के बाद, मराठों ने अपनी संप्रभुता के तहत दक्कन के अधिकांश राज्यों को मजबूत करने के लिए आक्रामक विजय प्रयास शुरू किए। फिर उन्होंने खानदेश, बीजापुर, कारवार, कोल्हापुर, जंजीरा, रामनगर और बेलगाम पर विजय प्राप्त की और आदिल शाही शासकों द्वारा नियंत्रित वेल्लोर और गिंगी में मौजूद किलों पर भी कब्जा कर लिया।
Chhatrapati Shivaji Maharaj को अपने सौतेले भाई वेंकोजी के साथ तंजावुर और मैसूर पर अपनी पकड़ को लेकर भी समझौता हुआ। तब उनका उद्देश्य दक्कन राज्यों को एक देशी हिंदू शासक के शासन के तहत एकजुट करना और मुसलमानों और मुगलों जैसे बाहरी लोगों से इसकी रक्षा करना था।
शिवाजी महाराज के अधीन प्रशासन (Chhatrapati Shivaji Maharaj administration)
केंद्रीय प्रशासन (Central administration)
मराठा प्रशासन के पास सर्वोच्च संप्रभु के रूप में Chhatrapati Shivaji Maharaj थे, और इसके साथ विभिन्न नीतियों के प्रवर्तन की निगरानी के लिए आठ मंत्रियों (अष्टप्रधान) की एक टीम की भी नियुक्त की गई थी। इन आठ मंत्रियों ने सीधे शिवाजी महाराज को सारी सूचना दी और राजा द्वारा तैयार की गई नीतियों के निष्पादन के संदर्भ में उन्हें बहुत अधिक शक्ति दी गई। ये आठ मंत्री थे –
- पेशवा या प्रधान मंत्री जो की सामान्य प्रशासन के प्रमुख थे और उनकी अनुपस्थिति में राजा का प्रतिनिधित्व करते थे।
- मजूमदार या लेखा परीक्षक राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए जिम्मेदार था।
- पंडित राव या मुख्य आध्यात्मिक प्रमुख राज्य की आध्यात्मिक भलाई की देखरेख, धार्मिक समारोहों की तारीखें तय करने और राजा द्वारा किए गए धर्मार्थ कार्यक्रमों की देखरेख के लिए जिम्मेदार थे।
- दबीर या विदेश सचिव को विदेश नीतियों के मामलों में राजा को सलाह देने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
- सेनापति या सैन्य जनरल सैनिकों के संगठन, भर्ती और प्रशिक्षण सहित सेना के हर पहलू की देखरेख के प्रभारी थे। साथ ही वह युद्ध के समय राजा के सामरिक सलाहकार भी थे।
- न्यायधीश या मुख्य न्यायाधीश ने कानून के निर्माण और उनके बाद के प्रवर्तन, नागरिक, न्यायिक और साथ ही सैन्य को देखा।
- राजा अपने दैनिक जीवन में जो कुछ भी करता था उसका विस्तृत रिकॉर्ड रखने के लिए मंत्री या क्रॉनिकलर जिम्मेदार था।
- सचिव या अधीक्षक शाही पत्राचार के प्रभारी थे।
Chhatrapati Shivaji Maharaj ने अपने राज्य को चार प्रांतों में विभाजित किया, जिनमें से प्रत्येक का नेतृत्व एक मामलातदार करता था। एक ग्राम इस प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थी और इसके मुखिया को देशपांडे कहा जाता था, जो ग्राम पंचायत का नेतृत्व करता था।
शिवाजी महाराज ने अपने दरबार में फारसी के स्थान पर मराठी और संस्कृत के प्रयोग को भी बढ़ावा दिया। हालाँकि वह सभी धर्मों के प्रति सहिष्णु थे और किसी भी जातिगत भेदभाव के सख्त खिलाफ थे।
राजस्व प्रशासन (Revenue administration)
Chhatrapati Shivaji Maharaj ने जागीरदारी प्रणाली को समाप्त कर दिया और इसे रैयतवाड़ी प्रणाली से बदल दिया, जिससे किसानों और राज्य के बीच बिचौलियों की आवश्यकता समाप्त हो गई।
शिवाजी महाराज उन मीरासदारों का कड़ाई से पर्यवेक्षण करते थे जिनके पास अंतर्देशीय वंशानुगत अधिकार थे। राजस्व प्रणाली मलिक अंबर की काठी प्रणाली पर आधारित थी, जिसमें भूमि के प्रत्येक टुकड़े को रॉड या काठी द्वारा मापा जाता था।
फिर शिवाजी महाराज ने चौथ और सरदेशमुखी करों की शुरुआत की।
- चौथ की राशि उस मानक के 1/4 भाग के बराबर थी जो मराठों को गैर-मराठा क्षेत्रों पर हमला करने वाली शिवाजी की सेना के खिलाफ सुरक्षा के रूप में दी जाती थी।
- साथ ही सरदेशमुखी राज्य के बाहर के क्षेत्रों से 10% अतिरिक्त टैक्स की मांग की गई थी।
सैन्य प्रशासन (Military administration)
- Chhatrapati Shivaji Maharaj ने एक मजबूत सैन्य बल बनाए रखा, साथ ही अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए कई रणनीतिक किलों का भी निर्माण किया, और कोंकण और गोवा के तटों पर एक मजबूत नौसैनिक उपस्थिति विकसित की।
- यहाँ सामान्य सैनिकों को नकद में भुगतान किया जाता था, लेकिन प्रमुख और सैन्य कमांडर को जागीर अनुदान (सरंजम या मोकासा) के माध्यम से भुगतान किया जाता था।
- सेना में इन्फैंट्री (मावली पैदल सैनिक), कैवलरी (घुड़सवार और उपकरण धारक), और नौसेना शामिल थे।
छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु–
3 अप्रैल 1680 को महज 50 साल की उम्र में छत्रपति शिवाजी महाराज की मौत हो गई। आज भी शिवाजी महाराज की मृत्यु एक पहेली बनी हुई है। जिसके बारे में कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उनकी मौत एक स्वाभाविक मौत थी जबकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उन्हें जहर दिया गया था।
निष्कर्ष–
भारत का इतिहास बेहद समृद्धि इतिहास है। भारतीय इतिहास की समृद्धि का सबसे बड़ा कारण है भारतीय वीर सपूतों की शौर्य गाथा जिनका देश प्रेम आज भी भारतीय मिट्टी में सना हुआ है।
छत्रपति शिवाजी महाराज को हिंदू हृदय सम्राट माना जाता है। वह अपने धर्म और राष्ट्र से बेहद प्रेम करते थे। मुगल संघर्ष के दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज ने ही हिंदुओं के साथ होने वाले उत्पीड़नो का बदला लिया और भगवा पताका लहरा दिया।
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