आर्यभट की जीवनी | Aryabhatta Biography in Hindi
आर्यभट्ट (Aryabhata) का जन्म 476 ई. में बिहार के मगध, (आधुनिक पटना) के पाटलिपुत्र में हुआ था। वह भारतीय गणितज्ञ और भारतीय खगोल विज्ञान के शास्त्रीय युग के महान गणितज्ञ-खगोलशास्त्री थे। उन्होंने हिंदू और बौद्ध परंपरा दोनों का अध्ययन किया।

आर्यभट्ट (Aryabhata) का जन्म 476 ई. में बिहार के मगध, (आधुनिक पटना) के पाटलिपुत्र में हुआ था। वह भारतीय गणितज्ञ और भारतीय खगोल विज्ञान के शास्त्रीय युग के महान गणितज्ञ-खगोलशास्त्री थे। उन्होंने हिंदू और बौद्ध परंपरा दोनों का अध्ययन किया। आर्यभट्ट अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए नालंदा विश्वविद्यालय में आए थे। उस समय नालंदा शिक्षा का बहुत बड़ा केंद्र था। जब उनकी पुस्तक 'आर्यभटीय' (गणित की पुस्तक) को एक उत्कृष्ट रचना मान लिया गया तो तत्कालीन गुप्त शासक बुद्धगुप्त ने उन्हें विश्वविद्यालय का प्रधान बना दिया। आर्यभट्ट ने बिहार के तारेगना में सूर्य मंदिर में एक वेधशाला भी स्थापित की।
आर्यभट की जीवनी (Aryabhatta Biography in Hindi)
पूरा नाम | आर्यभट |
जन्म | दिसंबर, ई.स.476 |
मृत्यु | दिसंबर, ई.स. 550 [74 वर्ष ] |
जन्म स्थान | अश्मक, महाराष्ट्र, भारत |
कार्यक्षेत्र | गणितज्ञ, ज्योतिषविद एवं खगोलशास्त्री |
कार्यस्थल | नालंदा विश्वविद्यालय |
रचनायें | आर्यभटीय, आर्यभट सिद्धांत |
योगदान | पाई एवं शून्य की खोज |
आर्यभट का जन्म कब हुआ, शुरूआती जीवन (Aryabhatta Birth and Early Life)
आर्यभट्ट का जन्म 476 ईसवी अर्थात विक्रम संवत 533 में हुआ था। इस समय को भारत का स्वर्णिम युग कहा जाता था। मगध शासक गुप्त साम्राज्य के काल में, समूचा भारत प्रगति की ओर अग्रसर था। यह सम्राट विक्रमादित्य ।। के समय में हुए थे।
आर्यभट्ट का जन्म स्थान वर्तमान पटना अर्थात प्राचीन कालीन मगध की राजधानी पाटलिपुत्र के निकट स्थित कुसुमपुर नामक गांव में हुआ था। लेकिन कुछ इतिहासकार उनके जन्म स्थान में मतभेद रखते हैं। उनका मानना है कि आर्यभट्ट का जन्म अस्मक, महाराष्ट्र में हुआ था।
आर्यभट्ट अपने जीवन के किसी काल में, उच्च शिक्षा के लिए कुसुमपुर गए थे। वह कुछ समय वहां पर रहे भी थे। सातवीं शताब्दी के महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने, कुसुमपुरा की पहचान पाटलिपुत्र के रूप में की । जो कि आधुनिक समय में पटना के नाम से जाना जाता है।
यहां पर अध्ययन का एक महान केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय स्थापित था। संभव है कि आर्यभट्ट इससे जुड़े रहे होंगे। यह भी संभव है कि गुप्त साम्राज्य के अंतिम दिनों में आर्यभट्ट, वहां रहा करते थे। गुप्त काल को भारत के स्वर्णिम युग के रूप में जाना जाता है। बिहार में पटना का प्राचीन नाम कुसुमपुर था। जहां आज आर्यभट्ट का जन्म हुआ, वह दक्षिण में भी था।
इनके शिष्य प्रसिद्व खगोलविद वराहमिहिर थे। आर्यभट्ट ने नालंदा विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर, मात्र 23 वर्ष की आयु में, आर्यभटीय नामक एक ग्रंथ लिखा था। उनके इस ग्रंथ की प्रसिद्धि और स्वीकृति के चलते। राजा बुध गुप्त ने उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का प्रमुख बना दिया था।
इनके बाद 875 ईसवी में, आर्यभट्ट द्वितीय हुए। जिन्हें लघु आर्यभट्ट भी कहा जाता था। जो ज्योतिष और गणित विषयों मे पारंगत व उस समय के प्रसिद्ध आचार्य थे। आर्यभट्ट द्वितीय ने आगे चलकर ज्योतिष विज्ञान पर, महा सिद्धांत नाम का एक ग्रंथ भी लिखा।
आर्यभट के कार्य (Aryabhatta Work and Contribution)
आर्यभट ने गणित एवं खगोलशास्त्र पर अनेक रचनायें की, इसमें से कुछ रचनाये विलुप्त हो चुकी हैं. परन्तु आज भी कई रचनाओ का प्रयोग किया जाता हैं, जैसे -: आर्यभटीय.
आर्यभटीय (Aryabhatiya)
यह आर्यभट की एक गणितीय रचना हैं, जिसमे अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोंमिति का विस्तृत वर्णन हैं. साथ ही इसमें सतत भिन्न [ Continued Fractions ], द्विघात समीकरण [ Quadratic Equations ], ज्याओं की तालिका [ Table of Sines ], घात श्रंखलाओ का योग [ Sums of Power Series ], आदि भी शामिल हैं.
आर्यभट के कार्यों का वर्णन मुख्यतः इसी रचना [आर्यभटीय] से मिलता हैं. संभवतः इसका यह नाम भी स्वयं आर्यभट ने नहीं, बल्कि बाद के समीक्षकों ने यह नाम दिया. भास्कर प्रथम, जो आर्यभट के शिष्य थे, वे इस रचना को अश्मक – तंत्र [ Treatise from the Ashmaka]कहते थे. सामान्य रूप से इसे आर्य – शत – अष्ट [ Aryabhat’s 108 ] भी कहा जाता हैं क्योंकि इसमें 108 छंद / श्लोक हैं. यह बहुत ही सार – गर्भित रूप में लिखा गया सूत्र – साहित्य हैं, जिसकी प्रत्येक पंक्ति प्राचीन जटिल प्रथाओ का वर्णन करती हैं. यह रचना, जो कि 108 छंदों एवं 13 परिचयात्मक छंदों से बनी हैं और यह 4 पदों अथवा अध्यायों में विभक्त हैं; वे अध्याय निम्न-लिखित हैं -:
- गीतिकापद [ 13 छंद ],
- गणितपद [ 33 छंद ],
- कालक्रियापद [ 25 छंद ],
- गोलपद [ 50 छंद ].
आर्य – सिद्धांत (Arya Siddhanta)
आर्यभट की यह रचना पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं हैं. परन्तु इसके अवशेषों में अनेक खगोलीय उपकरणों के उपयोग का वर्णन मिलता हैं, जैसे -: शंकु – यन्त्र [ Gnomon ], छाया – यन्त्र [ Shadow Instrument ], बेलनाकार यस्ती –यन्त्र [ Cylindrical Stick ], छत्र–यन्त्र [ Umbrella Shaped Device], जल – घडी [ Water Clock ], कोण – मापी उपकरण [ Angle Measuring Device ], धनुर – यंत्र / चक्र यंत्र [ Semi – Circular / Circular Instrument], आदि.
इस रचना में सूर्य सिद्धांत का प्रयोग किया गया हैं. सूर्य सिद्धांत में सूर्योदय की उपेक्षा की जाती हैं और इसमें अर्द्ध – रात्रि गणना [ Midnight Calculations ] का उपयोग किया जाता हैं.
गणित के क्षेत्र में आर्यभट्ट के योगदान (Aryabhatta’s Work in Math)
शून्य की उत्पत्ति
आर्यभट्ट ने संख्याओं को आगे बढ़ाने तथा एक पूर्ण गणना करने के लिए दशमलव का उपयोग किया। इसी दशमलव को उन्होंने शून्य कहा।
अन्य संख्याओं के बराबर आकार देने के लिए उन्होंने इसकी आकृति बदलकर एक वृत्त की तरह बना दिया। वर्तमान समय का शून्य आर्यभट्ट की ही देन है जो उनके समय से ही चलता हुआ आ रहा है।
पाई का मान
आर्यभट्ट ने आर्यभटीय के दूसरे अध्याय के दसवें छंद में पाई का मान बताया है। उन्होंने इसके लिए सबसे पहले एक वृत्त के व्यास का निश्चित मान रखा। यह व्यास उन्होंने 20,000 रखा था।
इसमें बताया गया है कि 100 में चार जोड़कर उसे 8 से गुणा कर दीजिए तथा प्राप्त हुए परिणाम में एक बार फिर 62,000 जोड़ दीजिए। जो अंतिम परिणाम आया है उसे वृत्त के व्यास से विभाजित कर दीजिए।
आपके पास प्राप्त हुआ परिणाम ही पाई का मान है और यह मान 3.1416 आता है जो वर्तमान समय की पाई के मान के 3 दशमलव तक सत्य है।
उन्होंने इसकी गणना भी अपने ग्रंथ में करके दिखाई है।
कुछ गणितज्ञ मानते हैं कि उन्होंने पाई को अपरिमेय संख्या बताया था। परंतु उन्हें इस तथ्य का श्रेय नहीं मिला क्योंकि उनके ग्रंथ में इसका कहीं भी सबूत नहीं है। 1761 में लैंबर्ट ने पाई को अपरिमेय संख्या बताया था जिसकी वजह से उसे इस तथ्य का श्रेय मिला।
आज से हजार-बारह सौ वर्ष पहले उनके ग्रंथ को अन्य भाषाओं में अनुवादित किया गया। तो अनुवादित पुस्तकों में पाई को अपरिमेय संख्या लिखा गया जिससे पता चलता है कि संभवतः आर्यभट्ट ने पाई को अपरिमेय संख्या लिखा था।
बीजगणित व समीकरणें
आर्यभट्ट ने संख्याओं के वर्ग व घन की श्रेणी के लिए भी सूत्रों का प्रतिपादन किया।
प्राचीन भारत के गणितज्ञ हमेशा ही समीकरणों के अनिश्चित चरों का मान निकालने में बहुत ही रुचिकर रहे हैं। आर्यभट्ट ने चरों वाली साधारण समीकरणों का हल निकालने के लिए कुटुक सिद्धांत का प्रतिपादन किया। यह सिद्धांत बाद में मानक सिद्धांत बन गया।
उस समय में उन्होंने इस कुटुक सिद्धांत से ax+by=c जैसी समीकरणों का हल प्राप्त किया।
आर्यभट्ट ने ही सर्वप्रथम त्रिकोणमिति के ज्या (sine) तथा कोज्या (cosine) फलनों की रचना की थी। जब उनके ग्रंथ का अरब भाषा में अनुवाद किया गया था तब अनुवादक ने इन शब्दों को जैया (Jaiya) तथा कौज्या (Kojaiya) बदल दिया। और जब उन्हीं अरब किताबों को लेटिन भाषा में अनुवादित किया गया तो इनको स्थानिक शब्दों साइन व कोसाइन से प्रदर्शित किया। जिसे पता चलता है कि साइन व कोसाइन की रचना आर्यभट्ट ने ही की थी।
खगोल विज्ञान में आर्यभट्ट के योगदान (Aryabhatta’s Work in Astrology)
ग्रहों की गति
आर्यभट्ट ने यह परिकल्पना की कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और वह हमेशा ही इसी बात पर अड़े रहे। उन्होंने समझाया कि जिस तरह एक चलती हुई नाव में बैठे हुए व्यक्ति को लगता है कि पेड़ पौधे व स्थिर चीजें उसकी गति की विपरीत दिशा यानी किनारे की ओर जा रही हैं उसी तरह पृथ्वी के लोगों को तारे चलते हुए दिखाई देते हैं।
परंतु तारे स्थिर हैं तथा पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करती है जिसकी वजह से तारे पश्चिम की ओर जाते हुए दिखाई देते हैं।
उन्होंने बताया कि सूर्य, चंद्रमा सभी पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। यह दो ग्रहचक्कर में गति करते हैं जिसे मंद और तेज कहा गया था। उन्होंने सभी ग्रहों को पृथ्वी से दूरी के आधार पर व्यवस्थित किया, जिसका क्रम यह है – चंद्रमा, बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शनि व तारे।
सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण
सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में बताया था।
जब पृथ्वी और सूर्य के बीच में चंद्रमा आ जाता है तो चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर पड़ने लगती है जिसे सूर्यग्रहण कहते हैं।
इसी तरह जब सूर्य व चंद्रमा के बीच में पृथ्वी आ जाती है तब पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ने लगती है जिसे चंद्रग्रहण कहते हैं।
उन्होंने इन सिद्धांतों को राहु-केतु की मदद से समझाया। उन्होंने पृथ्वी के आकार की गणना करके ग्रहण के वक्त बनी छाया का मापन भी किया जिससे पता चलता है कि वह बहुत ही बुद्धिमान इंसान थे।
दिन-रात व वर्ष का होना
आर्यभट्ट ने बताया कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करती है जिसमें उसे 23 घंटे 56 मिनट 4.1 सेकंड का समय लगता है। वर्तमान वैज्ञानिकों के अनुसार यह समय 23 घंटे 56 मिनट 4.09 एक सेकंड है जिससे पता चलता है कि आर्यभट्ट की गणना में मात्र 0.01 सेकेंड का अंतर था।
उन्होंने यह भी बताया कि पृथ्वी को एक चक्कर तारों के चारों तरफ पूरा करने में 365 दिन 6 घंटे 12 मिनट तथा 30 सेकंड लगते हैं। वर्तमान वैज्ञानिकों की गणना के अनुसार इस समय में मात्र 3 मिनट की ही त्रुटि है तथा यह मात्र 3 मिनट ही ज्यादा है।
आर्यभट्ट की रचनाएं (Aryabhatta’s Creations)
आर्यभट्ट ने मुख्यतः गणित और खगोल विज्ञान में कार्य किया था। उनके कुछ खोज कार्य खत्म हो गए परंतु ज्यादातर खोज कार्य वर्तमान समय में भी जीवंत है। उनके ग्रंथ का नाम आर्यभटीय है जिसमें उनके सभी खोज कार्य उपलब्ध हैं।
आर्यभट्ट की मुख्य खोज कार्य/रचनाएँ –
- आर्यभटीय, भाग – गीतिकापद, गणितपद, कलाक्रियापद, गोला पद।
- पाई का मान
- शून्य की उत्पत्ति
- अनिश्चित समीकरणों के हल
- बीजगणितीय सूत्रों का प्रतिपादन
- त्रिकोणमिति व ज्या-कोज्या का प्रतिपादन
- ग्रहों की गति के सिद्धांत
- चंद्र ग्रहण व सूर्य ग्रहण का ज्ञान
- नक्षत्र काल
- अंकगणित
- आर्य सिद्धांत
आर्यभट्ट का ग्रंथ (Aryabhatta’s Grantha)
आर्यभट्ट ने आर्यभटीय ग्रंथ की रचना की जिसमें उनके खोज कार्यों का वर्णन किया गया है। हालांकि, इस ग्रंथ का नाम उनके शिष्यों व अन्य लोगों ने आर्यभटीय रखा था। उन्होंने खुद ने इस ग्रंथ का नाम कहीं उल्लेखित नहीं किया है।
ग्रंथ को छंद/पद्य तरीके में लिखा गया है जो इसे पढ़ने में थोड़ा-सा कठिन बनाता है। इसमें कुल 108 छंद/पद्य हैं तथा 13 अन्य परिचयात्मक छंद है।
शुरुआती 13 छंदों में आर्यभट्ट ने अपने जीवन (Aryabhatta Biography) तथा ग्रंथ के बारे में बताया है। ग्रंथ में कुल चार अध्याय हैं जिन्हें पद कहा गया है। इन अध्यायों को हमने एक सारणी के माध्यम से समझाने की कोशिश की है जो आप नीचे देख सकते हैं –
अध्याय का नाम
छंद की संख्या
अध्याय सामग्री
गीतिकापद
13
समय के मापन की इकाइयां – कल्प, मनवंत्र, युग, ज्या की सारणी।
गणितपद
33
मापन, अंकगणित, ज्यामिति, शंकु छाया, साधारण, द्विघाती तथा अनिश्चित समीकरणों के हल।
कलाक्रियापद
25
ग्रहों की स्थिति, मापन व उनकी इकाइयां, क्षया तिथि, 7 दिनों का सप्ताह तथा सप्ताह के 7 दिन इत्यादि।
गोलापद
50
त्रिकोणमिति, गोला, पृथ्वी की आकृति, भूमध्य रेखा, दिन रात होने का कारण, ग्रहण व नक्षत्र।
आर्यभट्ट ने गति की सापेक्षता के बारे में बताया था कि एक चलती हुई नाव में बैठे हुए व्यक्ति को पेड़ पौधे व स्थिर चीजें चलती हुई दिखाई देती है, उसी तरह स्थिर तारे भी पृथ्वी के लोगों को पश्चिम की ओर चलते हुए दिखाई देते हैं।
आर्यभट्ट उपग्रह एवं आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान – Aryabhatta Satellite
19 अप्रैल, 1975 को भारत सरकार ने अपने पहला उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा था, जिसका नाम उन्होंने महान गणितज्ञ और खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी के नाम पर रखा था। यही नहीं इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (ISRO) द्धारा वायुमंडल के संताप मंडल में जीवाणुओं की खोज की गई थी।
जिनमें से एक प्रजाति का नाम बैसिलस आर्यभट्ट रखा गया था, जबकि भारत के उत्तराखंड राज्य के नैनीताल में आर्यभट्ट के सम्मान में एक वैज्ञानिक संस्थान का नाम ”आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान अनुसंधान” रखा गया है।
आर्यभट्ट जी की मृत्यु – Aryabhatta Death
गणित और विज्ञान के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले आर्यभट्ट जी ने लगभग 550 ईसा पूर्व में अपने जीवन की अंतिम सांस ली थी।
आर्यभट्ट जी के बारे में रोचक तथ्य – Facts About Aryabhatta
- आर्यभट्ट दुनिया के सबसे बुद्दिमान व्यक्तियों में शुमार है, जिन्होंने गणित और विज्ञान के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था,उन्होंने वर्तमान वैज्ञानिक दुनिया के लिए एक आश्चर्य प्रकट किया था। वहीं उनकी रचनाओं का इस्तेमाल ग्रीक और अरब देशों द्धारा और अधिक विकसित करने के लिए किया गया था।
- आर्यभट्ट जी ने खगोलशास्त्र, गोलीय त्रिकोणमिति से संबंधित अपनी प्रसिद्ध रचना ‘आर्यभाटिया’ को कविता के रुप में लिखा है। यह प्राचीन भारत की सबसे लोकप्रिय और पसंदीदा किताबों में से एक है। आपको बता दें कि उन्होंने अपनी इस प्रसिद्ध रचना में अंकगणित, बीजगणित और त्रिकोणमिति के 33 महत्वपूर्ण नियम बताए हैं।
- महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट ने पाई का मान (3.1416) को दशमलव के चार अंकों तक ही सही बताया था।
- महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी ने दशगीतिका हिस्से में पहले पांच ग्रहों की गणना एवं हिन्दू कालगणना और त्रिकोणमिति की चर्चा की है।
- कालक्रिया में आर्यभट्ट जी ने हिन्दुकाल की गणना समेत ग्रहों की जानकारी दी थी।
- गणितपाद में उन्होंने अंकगणित, बीजगणित और रेखागणित पर संपूर्ण जानकारी प्रदान की थी।
- आज पूरी दुनिया में पढ़ी जाने वाली त्रिकोणमिति की खोज आर्यभट्ट ने की थी।
- आर्यभट्ट दुनिया के एक ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्होंने सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण लगने की भी खोज की थी। इसके साथ-साथ ग्रहण लगने का समय निकलने का फॉर्मूला और ग्रहण कितनी देर तक रहेगा, इसके बारे में भी बताया था।
- शून्य की खोज करने वाले महान गणितज्ञ आर्यभट्ट जी का मानना था कि सौर मंडल के केन्द्र में स्थित है, पृथ्वी समेत अन्य ग्र्ह इसके परिक्रमा करते हैं।
महान वैज्ञानिक आर्यभट्ट जी ब्रम्हांड को अनादि-अनंत मानते थे। वहीं भारतीय दर्शन के मुताबिक इस सृष्टि का निर्माण वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी और आकाश इन पांच तत्वों को मिलकर हुआ है, जबकि आर्यभट्ट जी आकाश को इन पंचतत्व में शामिल नहीं करते थे।