आचार्य चाणक्य का जीवन परिचय | Chanakya Biography In Hindi
Acharya Chanakya Biography in Hindi – आचार्य चाणक्य एक दार्शनिक, अर्थशास्त्री और राजनेता थे जिन्हे परंपरागत रूप से भारतीय राजनीतिक ग्रंथ “अर्थशास्त्र” (Economics) के लेखक के रूप में जाना जाता है.

भारतीय इतिहास का सर्वाधिक प्रखर कूटनीतिज्ञ कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति न होगा. चाणक्य जिन्हें लोग कौटिल्य या विष्णुगुप्त के नाम से भी जानते हैं. टनीति, अर्थशास्त्र, राजनीति के अपने महान ज्ञान का सदुपयोग कर उन्होंने जनकल्याण और अखंड भारत निर्माण जैसे रचनात्मक कार्य किए. वह एक विश्व प्रसिद्ध व्यक्तित्व हैं
आप सभी अर्थशास्त्र (Economics) से भलीभांति परिचित होंगे जिसका मतलब होता है धन का अध्ययन. यह संस्कृत भाषा के दो शब्दों को जोड़कर बना है – अर्थ+शास्त्र. निरंतर बढ़ते हुए समय के साथ-साथ अर्थ जगत में और इसके साथ ही अर्थशास्त्र के ज्ञान में भी वृद्धि हुई है. यह सामाजिक विज्ञान की एक ऐसी शाखा है जिसके बिना किसी सभ्यता की कल्पना भी करना मुश्किल है.
आचार्य चाणक्य का नाम इतना प्रसिद्ध है कि उनका नाम सभी ने सुना ही होगा. उनकी चाणक्य नीति विश्व प्रसिद्ध है. आचार्य चाणक्य के शिष्य चंद्रगुप्त ने उनके साथ मिलकर अखंड भारत का निर्माण किया था. कहा जाता है कि वह एक ऐसे शख्स थे जो अपनी बुद्धिमता से सामने वाले को हरा ही देते थे.
आचार्य चाणक्य का परिचय (Introduction to Acharya Chanakya)
पूरा नाम | आचार्य चाणक्य/कौटिल्य/विष्णुगुप्त |
जन्म | 375 ईसा पूर्व, तक्षशिला, भारत |
माता | चनेश्वरी |
पिता | ऋषि चणक |
गुरु | ऋषि चणक |
जाति | ब्राह्मण |
धर्म | हिंदू |
पेशा | अध्यापक, अर्थशास्त्री, लेखक, सलाहकार, मार्गदर्शक |
उपलब्धियां | मौर्य साम्राज्य के सह-संस्थापक, मौर्य साम्राज्य के प्रधानमंत्री, चाणक्य नीति, अर्थशास्त्र के रचयिता |
मृत्यु | 283 ईसा पूर्व, पाटलिपुत्र, भारत |
उम्र | 92 वर्ष |
चाणक्य का जीवन परिचय –
भारतीय अर्थशास्त्र के जनक एव महान विचारों के प्रणेता और महापंडित का जन्म साधारण ब्राह्मण परिवार में 350 ईसा पूर्व में हुआ था। उन्होंने तक्षशिला में अभ्यास किया था और बाद में चाणक्य ने तक्षशिला को उत्तर-पश्चिमी प्राचीन भारत का प्रमुख शिक्षा केंद्र बनाया था। चाणक्य को भारत का मैक्यावली के नाम से भी जाना जाता है। इतिहास और विद्धानो के कुछ मतभेद है। जिसके चलते इतिहास यह बताया जाता है। की कुटिल वंश में जन्म होने के कारन उन्हें कौटिल्य कहते है। दूसरी और विद्धान यह बताते है की गूढ़ और उग्र स्वभाव के कारन उन्हें कौटिल्य कहते थे। आचार्य चाणक्य का जन्म नेपाल की तराई में बताते है। तो जैन धर्म के अनुसार मैसूर राज्य का श्रवणबेलगोला जन्म स्थान बताया जाता है।
चाणक्य का जन्म –
आचार्य चाणक्य के जन्म स्थान को लेकर ‘मुद्राराक्षस‘ के मता अनुसार चाणक्य के पिता का नाम चमक था। उनके कारन पिता के नाम से ही उन्हें चाणक्य नाम प्रसिद्ध हुआ। उनका जन्म एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। चाणक्य ने बालयकाल में कंगाल परिस्थिति देखी ऐसी गरीबी की कई समय पर तो उन्हें खाना भी नहीं मिलता था। चाणक्य बाल्यावस्था से ही जिद्दी और क्रोधी स्वभाव के हुआ करते थे। वह अपने शुरुआती जीवन से ही साधारण जीवन जीना पसंद करते थे। उन्होंने अपने जीवन में बहुत उतर चढ़ाव देखे तब जाके एक महान विद्धान बन सके थे।
चाणक्य की शिक्षा –
आचार्य चाणक्य के समय में नालंदा विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध थी। उसमे चाणक्य ने अपना विद्या अभ्यास पूर्ण किया था। चाणक्य बालयकाल से ही एक होनहार एव बुद्धिमान छात्र हुआ थे। उन्हें पढ़ने में बहुत लगाव रहता था। कुछ ग्रंथों के मतानुसार आचार्य चाणक्य ने तक्षशिला से अपनी शिक्षा प्राप्त की थी। तक्षशिला भी प्राचीन समय में भारत का प्रमुख शिक्षा केंद्र था। आचार्य चाणक्य को ज्योतिष , अर्थशास्त्र , युद्ध रणनीतियों, दवा और राजनीति जैसे विभिन्न विषयो की बहुत अच्छी जानकारी प्राप्त थी।
Chanakya Biography में आपको बतादे की वह साहित्य, उपनिषद और वेदों पुराणों के बहुत अच्छे ज्ञानी थे। वह फारसी और ग्रीक भाषाएँ भी बहुत अच्छे से बोल सकते थे। अपनी शिक्षा पूर्ण करके चाणक्य ने तक्षशिला विद्यालय में ही अर्थशास्त्र एव राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर की जोब शुरू की थी। उसके बाद सम्राट चंद्रगुप्त के बहुत नजदीकी महामंत्री बने थे।
वे घटनाएं जिन्होनें चाणक्य का जीवन ही बदल दिया – Chanakya Life Story
चाणक्य एक कुशल और महान चरित्र वाले व्यक्ति थे इसके साथ ही वे एक महान शिक्षक भी थे। अपने महान विचारों और महान नीतियों से वे काफी लोकप्रिय हो गए थे उनकी ख्याति सातवें आसमान पर थी लेकिन इस दौरान ऐसी दो घटनाएं घटी की आचार्य चाणक्य का पूरा जीवन ही बदल गया।
- पहली घटना – भारत पर सिकंदर का आक्रमण और तात्कालिक छोटे राज्यों की ह्रार।
- दूसरी घटना – मगध के शासक द्वारा कौटिल्य का किया गया अपमान।
ऊपर लिखी गईं ये दो घटनाएं उनके जीवन की ऐसी घटनाएं हैं जिनकी वजह से कौटिल्य ने देश की एकता और अखंडता की रक्षा करने का संकल्प लिया और उन्होनें शिक्षक बनकर बच्चों के पढ़ाने के बजाय देश के शासकों को शिक्षित करने और उचित नीतियों को सिखाने का फैसला लिया और वे अपने दृढ़ संकल्प के साथ घर से निकल पड़े।
आपको बता दें कि जब भारत पर सिकन्दर ने आक्रमण किया था उस समय चाणक्य तक्षशिला में प्रिंसिपल थे। ये उस समय की बात है जब तक्षशिला और गान्धार के सम्राट आम्भि ने सिकन्दर से समझौता कर लिया था।
चाणक्य ने भारत की संस्कृति को बचाने के लिए सभी राजाओं से आग्रह किया लेकिन उस समय सिकन्दर से लड़ने कोई नहीं आया। जिसके बाद पुरु ने सिकन्दर से युद्ध किया लेकिन वे हार गए।
उस समय मगध अच्छा खासा शक्तिशाली राज्य था और उसके पड़ोसी राज्यों की इस राज्य पर ही नजर थी। जिसको देखते हुए देशहित की रक्षा के लिए विष्णुगुप्त, मग्ध के तत्कालीन सम्राट धनानन्द से सिकंदर के प्रभाव को रोकने के लिए सहायता मांगने गए।
लेकिन भोग-विलास एवं शक्ति के घमंड में चूर धनानंद ने चाणक्य के इस प्रस्ताव ठुकरा दिया। और उनसे कहा कि –
”पंडित हो और अपनी चोटी का ही ध्यान रखो; युद्ध करना राजा का काम है तुम पंडित हो सिर्फ पंडिताई करो।”
तभी चाणक्य ने नंद साम्राज्य का विनाश करने की प्रतिज्ञा ली।
चाणक्य की कूटनीति
चाणक्य के बारे में पढने के बाद हमे पता चलता है की कौटिल्य नीति के अंतर्गत शत्रु को नाश करने के लिए अनुचित उपायों का वर्णन है, किन्तु किस परिपेक्ष्य में? इसे भी विस्तार से जानना जरुरी है. कौटिल्य के अनुसार कूटनीति का प्रयोग केवल दुष्ट और अधार्मिक लोगों पर ही करनी चाहिये. अधार्मिक शत्रुओं को नष्ट करने के लिए कूट विद्या का प्रयोग किया जा सकता है.
कौटिल्य का राज्यनीति सिद्धांत
आचार्य चाणक्य और मक्यावली दोनों ही का उद्देश्य केवल राष्ट्र था. वे राष्ट्र को ही सब कुछ समझते थे. दोनों ही के द्वारा राष्ट्र की अभिवृद्धि करने के पक्ष पर जोर दिया गया अर्थात शत्रुओं को दमन (विभिन्न उपायों को अपनाकर) करके राज्य का विस्तार करना. उनके मतानुसार एक राजा का एकमात्र लक्ष्य अपने साध्य की सिद्धि करना तथा दृढ़तापूर्वक शासन करना चाहिये.
कौटिल्य का राज्यनीति सिद्धांत धर्मं का कभी विरोध नहीं करता लेकिन बहुत अधिक धार्मिकता की ओर झुका हुआ भी नहीं है. उनके राजनीति में सामान्य नैतिक बंधन नहीं है बल्कि उससे मुक्त है. सामान्य नैतिक बंधन नहीं होने के कारण ही उनके विचार मक्यावली से मिलते-जुलते प्रतीत होते हैं फलस्वरूप उन्हें भारत का मक्यावली कहा जाता है. चाणक्य का राजनीति सिद्धांत चिंतन हेतु एक महत्वपूर्ण विषय है.
चाणक्य और चन्द्रगुप्त – Chanakya and Chandragupta
चाणक्य और चंद्रगुप्त का गहरा संबंध है। चाणक्य चंद्रगुप्त के सम्राज्य के महामंत्री थे और उन्होनें ही चंद्रगुप्त का सम्राज्य स्थापित करने में उनकी मद्द की थी।
दरअसल नंद सम्राज्य के शासक द्धारा अपमान के बाद चाणक्य अपनी प्रतिज्ञा को सार्थक करने के निकल पड़े। इसके लिए उन्होनें चंद्रगुप्त को अपना शिष्य बनाया। चाणक्य उस समय चंद्रगुप्त की प्रतिभा को समझ गए थे इसलिए उन्होनें चंद्रगुप्त को नंद सम्राज्य के शासक से बदला लेने के लिए चुना।
जब चाणक्य की चंद्रगुप्त मौर्य से मुलाकात हुई तब चंद्रगुप्त महज 9 साल के थे। इसके बाद चाणक्य ने अपने विलक्षण ज्ञान से चंद्रगुप्त को अप्राविधिक विषयों और व्यावहारिक तथा प्राविधिक कलाओं की शिक्षा दी।
वहीं आपको बता दें कि चाणक्य ने चंद्रगुप्त को चुनने का फैसला इसलिए भी लिया क्योंकि उस समय कुछ मुख्य शासक जातियां ही थी जिसमे शाक्य, मौर्य का प्रभाव ज्यादा था। वहीं चन्द्रगुप्त उसी गण के प्रमुख का पुत्र था। जिसके बाद चाणक्य ने उसे अपना शिष्य बना लिया, और उनके साथ एक नए सम्राज्य की स्थापना की।
चाणक्य की नीतियों से नंद सम्राज्य का पतन और मौर्य सम्राज्य की स्थापना:
शक्तिशाली और घमंड में चूर नंद वंश का राजा धनानंद जो कि अपनी शक्ति का गलत इस्तेमाल करता था और जिसने यशस्वी और महान दार्शनिक चाणक्य का अपमान किया था जिसके बाद चाणक्य ने चंद्रगुप्त के साथ मिलकर अपनी नीतियों से नंद वंश के पतन किया था।
आचार्य चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद सम्राज्य के पतन के मकसद को लेकर कुछ अन्य शक्तिशाली शासकों के साथ गठबंधन बनाए थे।
आपको बता दें कि आचार्य चाणक्य विलक्षण प्रतिभा से भरे एक बेहद बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति थे। उन्होंनें अपनी चालाकी से कुछ मनोरंजक युद्ध रणनीतियों को तैयार किया और वे बाद में उन्होनें मगध क्षेत्र के पाटलिपुत्र में नंदा वंश का पतन किया और जीत हासिल की थी।
वहीं नंदा सम्राज्य के आखिरी शासक की हार के बाद नंदा सम्राज्य का पतन हो गया इसके बाद उन्होनें चंदगुप्त मौर्य के साथ मिलकर एक नए सम्राज्य ‘मौर्य सम्राज्य‘ की स्थापना की। चंद्र गुप्त मौर्य के दरबार में उन्होनें राजनीतिक सलाहकार बनकर अपनी सेवाएं दी।
चाणक्य की मौर्य सम्राज्य के विस्तार में अहम भूमिका:
चाणक्य के मार्गदर्शन से मौर्य सम्राज्य के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य गंधरा में स्थित जो कि वर्तमान समय अफगानिस्तान में, अलेक्जेंडर द ग्रेट के जनरलों को हराने के लिए आगे बढ़े। बुद्धिमान और निर्मम, चाणक्य ने अपनी महान नीतियों से चंद्रगुप्त के मौर्य साम्राज्य को उस समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से बदलने में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चाणक्य की नीतियों से मौर्य सम्राज्य का विस्तार पश्चिम में सिंधु नदी से, पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक किया गया बाद में मौर्य साम्राज्य ने पंजाब पर भी अपना नियंत्रण कर लिया था इस तरह मौर्य सम्राज्य का विस्तार पूरे भारत में किया गया।
अनेक विषयों के जानकार और महान विद्धान चाणक्य ने भारतीय राजनैतक ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ लिखा जिसमें भारत की उस समय तक की आर्थिक, राजनीतिक और समाजिक नीतियों की व्याख्या समेत अन्य महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी दी गई है।
ये ग्रंथ चाणक्य ने इसलिए लिखा था ताकि राज्य के शासकों को इस बात की जानकारी हो सके कि युद्ध, अकाल और महामारी के समय राज्य का प्रबंधन कैसे किया जाए।
जैन ग्रंथों में वर्णित एक लोकप्रिय किंवदंती के अनुसार, चाणक्य सम्राट चंद्रगुप्त के भोजन में जहर की छोटी खुराक को मिलाते थे जिससे मौर्य वंश के सम्राट की दुश्मनों द्वारा संभावित जहरीले प्रयासों के खिलाफ मजबूती बन सके और वे अपने प्राणों की रक्षा कर सकें।
वहीं इस बात की जानकारी सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य को नहीं थी इसलिए उन्होनें अपना खाना अपनी गर्भवती रानी दुध्रा को खिला दीया। आपको बता दें कि उस समय रानी के गर्भ के आखिरी दिन चल रहे थे। वे कुछ दिन बाद ही बच्चे को जन्म देने के योग्य थी।
लेकिन रानी द्धारा खाए गए भोजन में जहर ने जैसे ही काम करना शुरु किया वैसे ही रानी बेहोश हो गई और थोडे़ समय बाद ही उनकी मौत हो गई। जब इस बात की जानकारी चाणक्य को हुई तो उन्होनें रानी के गर्भ में पल रहे नवजात बच्चे को बचाने के लिए अपनी बुद्धिमान नीति का इस्तेमाल कर अपना पेट खोल दिया और बच्चे को निकाला।
इस बच्चे का नाम बिंदुसारा रखा गया जिसे बड़ा होने पर मौर्य सम्राज्य का उत्तराधिकारी भी बनाया गया। वहीं चाणक्य ने कुछ सालों बाद बिंदुसारा के राजनैतिक सलाहकार के रूप में भी काम किया।
अर्थशास्त्र का महत्व
अर्थशास्त्र हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का एक अति महत्वपूर्ण विषय है जिसके ज्ञान के सहारे हमारा समाज निरंतर विकास कर रहा है. धन से ही समाज को आगे बढाया जा सकता है इसके लिए धन का अध्ययन अनिवार्य है.
हम आर्थिक विश्लेसन करके ही वर्तमान और भविष्य का निति निर्धारण कर सकते हैं. अनेक अर्थशास्त्री जैसे – हेन्स, लियोनेल रोबिनसन, जोयल डीन, एडम स्मिथ इत्यादि ने अर्थशास्त्र को अपनी – अपनी भाषा से परिभाषित किया है.
अर्थशास्त्र और चाणक्य
आपने पढ़ा या सुना होगा की एडम स्मिथ को अर्थशास्त्र का पिता कहा जाता है जो बेशक वो हैं क्योंकि आधुनिक अर्थशास्त्र के विकास में उनका योगदान अविश्वसनीय है. दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों और इतिहासकारों को उन्होंने अपने ज्ञान से प्रभावित किया, मुख्य रूप से उनकी पुस्तक ” The Theory of Moral Sentiments” ने अनेक बुद्धिजीवियों का ध्यान आकृष्ट किया है.
दुनिया आज भी एडम स्मिथ से प्रेरणा लेती है. अठारहवीं सदी में उनका योगदान महत्वपूर्ण है जिसके कारण ही उन्हें अर्थशास्त्र का पिता कहा जाता है. किन्तु इनके योगदान से बहुत पहले एक ऐसा नीतिज्ञ या ज्ञानी जिसे दुनिया चाणक्य, कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नामों से जानती है और उसी चाणक्य के द्वारा अर्थशास्त्र जैसे महान ग्रन्थ की रचना मौर्यकाल में ही किया जा चूका था जो आज भी प्रभावपूर्ण है.
चाणक्य के विभिन्न नाम
उनकी कृति जिन्हें लोग आज भी याद करते हैं कि वो महान चाणक्य ही थे जिन्होंने नन्द वंश का नाश करके मौर्य वंश की नीव रखी और चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया. इनके पिता का नाम चणक था जो की एक गरीब ब्राम्हण थे. कुछ विद्वानों का मत यह भी है की चणक का पुत्र होने के कारण ही वे चाणक्य कहलाये. एक मत के अनुसार उनका जन्म पंजाब के चणक क्षेत्र में हुआ था इसलिए चाणक्य नाम पड़ा.
कुटिल वंश में जन्म लेने के कारण वे कौटिल्य कहलाये. उनके जन्मतिथि, जन्मस्थान और नाम ये तीनो ही विवाद का विषय रहा है. इस विषय को लेकर विद्वानो के बीच हमेशा मतभेद रहा है. कुछ विद्वान् उनका मूल नाम विष्णुगुप्त ही मानते है किन्तु जो भी हो, चाणक्य, कौटिल्य और विष्णुगुप्त ये तीनो नाम एक ही व्यक्ति के हैं. कथासरित्सागर, भागवत, विष्णुपुराण, बौध आदि ग्रंथों में चाणक्य का नाम आया है.
भारत का मक्यावली किसे कहा जाता है?
आज के लेख में मैं केवल चाणक्य के उन गुणों को प्रकाशित करने का प्रयास कर रहा हूँ जिसके कारण संसार आज भी उनसे प्रेरणा लेती है . विभिन्न सूत्रों से हमें पता चलता है की चाणक्य एक यथार्थवादी पुरुष थे. एक अत्यंत ही स्वाभिमानी और क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति, शारीर से मजबूत और काला रंग. उनकी प्रतिभा का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है, केवल कहा जा सकता है.
बहुआयामी व्यक्तित्व वाले व्यक्ति जिनकी दूरदर्शिता का आभाष उनके कृतियों को अवलोकन करने से प्राप्त होता है. क्या आप जानते हैं की चाणक्य को भारत का मक्यावली क्यों कहा जाता है? चाणक्य को भारत का मक्यावली क्यों कहा जाता है इसे विस्तार से समझना जरुरी है.
मक्यावली कौन थे?
मक्यावली इटली का एक दार्शनिक था जिसका जन्म 1469 में यूरोप के फ्लोरेंस में हुआ था. दार्शनिक होने के साथ-साथ वे एक कवी, नाटककार, राजनितिक विश्लेषक और कूटनीतिज्ञ थे. अपने समय के वे एक प्रमुख व्यक्तित्व थे जो वहां के गणराज्य यानि फ्लोरिडा चांसलेरी के सचिव चुने गए. जब किसी भी व्यक्ति में कुछ अनोखापन होता है, कुछ नया करने की शक्ति होती है जो क्रांति ला दे तो संसार उसका अनुसरण जरूर करती है.
मक्यावली की रचना ‘द प्रिंस‘ क्या है?
मक्यावली को प्रसिद्ध होने का मुख्य कारण उनकी रचना ‘द प्रिंस‘ है जो कि एक राजनितिक व्यवहार की एक छोटी सी पुष्तक है जिसमे राजनितिक गुर बताये गए हैं. जैसे सत्ता को हासिल करने से लेकर उसे कैसे कायम रखा जाये, एक शासक को अपने सत्ता में बने रहने के लिए क्या करना चाहिये, मुद्राकोष को कैसे संतुलित रखा जाये, एक राजा का गुण कैसा होना चाहिये, इत्यादि.
चाणक्य को भारत का मक्यावाली क्यों कहा जाता है?
इसप्रकार ‘द प्रिंस’ राजनितिक विज्ञान का एक अनूठी पुष्तक माना जाता है. उन्हें पुनर्जागरण का नायक माना जा सकता है. मक्यावली का मुख्य सिद्धांत था की राज्य को कायम रखने के लिए उचित या अनुचित किसी भी प्रकार का उपाय करना चाहिये. यदि दूसरों को हानि पहुंचाकर राज्य की वृद्धि होती है तो उसे करना चाहिये क्यूंकि वे राष्ट्र को ही सब कुछ मानते थे.
अपने साध्य की सिद्धि के लिए नैतिक या अनैतिक आश्रयों का सहारा लेकर भी अपने प्रयोजन को सिद्ध करना एक राजा का कर्तव्य है. देश की सीमा वृद्धि करने के लिए वे युद्ध का भी पक्षधर थे जो उनके अनुसार राष्ट्र नीति का एक आवश्यक अंग है. एक राजा को दृढ़तापूर्वक अपने प्रजा के ऊपर शासन करना चाहिये.
अब बात करते हैं आचार्य चाणक्य की कि उनमे ऐसी कौन सी सामानताएं थी जो उनको भारत का मक्यावाली कहा जाता है. एक बात मैं यहाँ पर स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि दोनों के सिद्धांतों में समानताएं हो सकती है किन्तु दोनों के प्रयोजनों में भिन्नताएं जरुर है.
चाणक्य नीति के मतानुसार राज्य की रचना – राज्य का कार्य
- राजा – शासक और राजा और राज्य का पहला नागरिक होता हैं। उन्हें युद्ध में आगे ,कुलीन, बुद्दिमान और बलवान होना बहुत जरुरी है।
- मंत्री – मंत्री राजा और राज्य की आँख हुआ करते है। उन्हें चरित्रवान, साफ और ईमानदार होना आवश्यक है।
- जनपद – जनपद साम्राज्य के पैर और जांघ होते है। जिनकी वजह से साम्राज्य का अस्तित्व हुआ करता हैं। जिसमे भूमि, जंगल, तालाबो, पशुधन और नदियो को बताया गया है।
- दुर्ग – साम्राज्य के दुर्ग यानि किले को साम्राज्य की बाहें बताते है। उनका काम साम्राज्य की रक्षा के लिये किया जाना चाहिए। और लड़ाई में साम्राज्य को बचाने में योगदान देता है।
- राजकोष –राजकोष साम्राज्य के महाराजा के मुख के बराबर होता हैं। जिनके कारन साम्राज्य चलता है। लेकिन उनके बिना राज की सोच ही नहीं की जाती है।
- सैनिक – सेना को साम्राज्य का सिर कहते है। क्योकि साम्राज्य की रक्षा में बल होना बहुत जरुरी होता है।
- मित्र – दोस्त और मित्र साम्राज्य के कान हुआ करते हैं। क्योकि ख़राब समय और युद्ध दोने वक्त में सहायता करते है।
चाणक्य की विदेश नीति –
- संधि – देश एव राज्य में शांति के लिये अन्य देश के शासक या राजा के साथ कुछ करार किये जाते है। जो ताकतवर हो उसका फायदा यह की शत्रु को कमजोर करना है।
- विग्रह – शत्रु के विरुद्ध उचित रणनीति बना के युद्ध करना जिससे अपने राज्य में शांति बनी रहे।
- यान – कोई भी राज्य से युद्ध घोषणा किये बिना युद्ध की तैयारी करना मुख्य माना जाता है।
- आसन – तटस्थता की नीति हमेशा बनाये रखना और उनका पालन करना।
- आत्मरक्षा – दुसरे साम्राज्य के राजा से मदद मांगना।
- दौदिभाव – मित्र राजा से शांति का करार करके अन्य राजाओ के साथ युद्ध करने की नीति अपनाना।
चाणक्य की मृत्यु का रहस्य – Chanakya’s death mystery
चाणक्य की मृत्यु 283 ईसा पूर्व में 92 वर्ष की आयु में हुई थी. लेकिन आज भी चाणक्य की मृत्यु के बारे में विवरण स्पष्ट नहीं है. यह तो ज्ञात है कि उन्होंने एक लंबा जीवन जिया लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी मृत्यु कैसे हुई थी.
चाणक्य की मृत्यु को लेकर कई तरह के कयास लगाए गए हैं और उनकी मृत्यु रहस्य से घिरी हुई है और विद्वानों की लाख कोशिशों के बावजूद अभी तक इसका खुलासा नहीं हो पाया है.
एक पौराणिक कथा के अनुसार, चाणक्य राजकीय सेवाओं को छोड़ कर जंगल में चले गए और अन्नजल त्याग कर मृत्य को प्राप्त हो गए थे.
एक अन्य किंवदंती के अनुसार, बिन्दुसार के शासनकाल के दौरान एक राजनीतिक साजिश के परिणामस्वरूप उनकी हत्या कर दी गई और उनकी मृत्यु हो गई.
चाणक्य नीति के विचार :–
ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।
• वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते है।
• शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।
• सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।
• एक ही देश के दो शत्रु परस्पर मित्र होते है।
• आपातकाल में स्नेह करने वाला ही मित्र होता है।
• एक बिगड़ैल गाय सौ कुत्तों से ज्यादा श्रेष्ठ है। अर्थात एक विपरीत स्वाभाव का परम हितैषी व्यक्ति, उन सौ लोगों से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते है।
• आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।
• अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।
• सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।
• सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।
• ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है। अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते है।
• जो जिस कार्ये में कुशल हो उसे उसी कार्ये में लगना चाहिए।
• कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।
• शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करे।
• चाणक्य ने कभी भी अग्नि, गुरू, ब्राह्मण, गौ, कुमारी कन्या, वृद्ध और बालक पर पैर न लगाने को कहा है. इन्हें पैर से छूने से आप पर बदकिस्मती का पहाड़ टूट सकता है.
• कहा जा सकता है कि ऋण मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यदि जीवन में खुशहाल रहना है तो ऋण की एक फूटी कौड़ी भी पास नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य सबसे दुखी भूतकाल और भविष्यकाल की बातों को सोचकर होता है। केवल वर्तमान के विषय में सोचकर अपने जीवन को सफल बनाया जा सकता
• आचार्य चाणक्य कहते हैं कि शिक्षा ही मनुष्य की सबसे अच्छी और सच्ची दोस्त होती है क्योंकि एक दिन सुंदरता और जवानी छोड़कर चली जाती है परन्तु शिक्षा एक मात्र ऐसी धरोहर है जो हमेशा उसके साथ रहती है।
• व्यवसाय में लाभ से जुड़े अपने राज किसी भी व्यक्ति के साथ साझा करना आर्थिक दृष्टी से हानिकारक हो सकती है। अत: व्यवसाय की वास्तविक ज्ञान को अपने तक ही सिमित रखें तो उत्तम होगा।
• किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर अपने आप से जरुर कर लें कि- क्या तुम सचमुच यह कार्य करना चाहते हैं? आप यह काम क्यों करना चाहते हैं? यदि इन सब का जवाब सकारात्मक मिलता है तभी उस काम की शुरुआत करनी चाहिए।
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