केंद्रीय मंत्रिपरिषद

केंद्रीय मंत्रिपरिषद

केंद्रीय मंत्रिपरिषद

भारत के संविधान में सरकार की संसदीय व्यवस्था ब्रिटिश मॉडल पर आधारित है। हमारी राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की मुख्य कार्यकारी अधिकारी मंत्रिपरिषद होती है, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करता है।

संविधान में संसदीय व्यवस्था के सिद्धांत विस्तार से नहीं लिए गए हैं परंतु दो अनुच्छेदों ( 74 एवं 75) में इसके बारे में संक्षिप्त और सामान्य वर्णन है। अनुच्छेद 74 मंत्रिपरिषद से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 75 मंत्रियों की नियुक्ति, कार्यकाल, उत्तरदायित्व, अर्हताओं, शपथ एवं वेतन और भत्तों से संबंधित है।

संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद-74 राष्ट्रपति को सहायता एवं परामर्श और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद
  1. राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने हेतु एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा। राष्ट्रपति, मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार ही कार्य करेगा। तथापि यदि राष्ट्रपति चाहे तो वह एक बार मंत्रिपरिषद से पुनर्विचार के लिये कह सकता है लेकिन मंत्रिपरिषद द्वारा दुबारा भेजने पर राष्ट्रपति उसकी सलाह एवं अनुसार कार्य करेगा।
  2. मंत्रियों द्वारा राष्ट्रपति को दी गई सलाह की जांच किसी न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती।
अनुच्छेद 75 मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध
  1. प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर करेगा।
  2. प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या, लोकसभा की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। इस उपबंध का समावेश 91वें संविधान संशोधन विधेयक, 2003 द्वारा किया गया है।
  3. संसद के किसी भी सदन का किसी भी राजनीतिक दल का सदस्य, यदि दल-बदल के आधार पर ससद की सदस्यता के अयोग्य घोषित कर दिया जायेगा तो ऐसा सदस्य मंत्री पद के लिये भी अयोग्य होगा।
  4. मंत्री, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेंगे।
  5. मंत्रिपरिषद, लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी।
  6. राष्ट्रपति, मंत्रियों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलायेगा। 
  7. कोई मंत्री जो निरंतर छह मास की किसी अवधि तक संसद के किसी संदन का सदस्य नहीं है। उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।
  8. मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते, संसद द्वारा निर्धारित किये जायेंगे।
अनुच्छेद 77 - भारत सरकार द्वारा कार्यवाहियों का संचालन
  1. भारत सरकार की समस्त कार्यपालक कार्यवाहियां राष्ट्रपति के नाम से की जाएंगी और उसी प्रकार अभिव्यक्त होंगी।
  2. राष्ट्रपति के नाम से पारित आदेशों तथा अन्य दस्तावेजों को इस प्रकार अधिप्रमाणित किया जाएगा जैसा कि राष्ट्रपति द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में निर्दिष्ट हो। इसके अतिरिक्त इस प्रकार अधिप्रमाणित किए गए किसी आदेश अथवा प्रपत्र की वैधता पर इस आधार पर कोई प्रश्न नहीं किया जाएगा कि उक्त आदेश अथवा प्रपत्र राष्ट्रपति द्वारा निर्मित अथवा निष्पादित है।
  3. राष्ट्रपति भारत सरकार की कार्यवाहियों को और सुगम बनाने के लिए साथ ही मंत्रियों के बीच कार्यों का आवंटन करने के संबंध में नियम बनाएंगे।
अनुच्छेद 78 प्रधानमंत्री के कर्तव्य
प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य होगा:
  1. कि वह राष्ट्रपति को संघ के प्रशासन से संबंधित मामलों के बारे में मंत्रिपरिषद द्वारा लिए गए निर्णयों तथा विधायन के प्रस्तावों के बारे में सूचित करें।
  2. कि संघ के प्रशासन आदि के संबंधित मामलों तथा प्रस्तावित विधायनों के बारे में राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई सूचनाएं प्रेषित करे।
  3. यदि राष्ट्रपति चाहें तो किसी ऐसे मामले पर जिसमें कि किसी मंत्री द्वारा निर्णय लिया जा चुका है लेकिन जिस पर मंत्री परिषद ने विचार नहीं किया है, उसे मंत्रिपरिषद के विचारार्थ भेज दे।
अनुच्छेद 88सदन में मंत्रियों के अधिकार
प्रत्येक मंत्री को किसी भी सदन में बोलने तथा कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होगा उसे दोनों सदनों की संयुक्त बैठक तथा संसदीय समिति जिसका उसे सदस्य बनाया गया हो, की बैठक में भी भाग लेने का अधिकार होगा। लेकिन उसे मत देने का अधिकार नहीं होगा।

मंत्रियों द्वारा दी गई सलाह की प्रकृति

अनुच्छेद 74 में, प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद का उपबंध है। यह राष्ट्रपति को उसके कार्य करने हेतु सलाह देती है। 42वें एवं 44वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा उसके परामर्श को राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी बना दिया गया है।' मंत्रियों द्वारा राष्ट्रपति को दी गई सलाह की जांच किसी न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती। यह उपबंध राष्ट्रपति एवं मंत्रियों के बीच एक अंतरंग और गोपनीय संबंधों पर बल देता है।
1971 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि लोकसभा के विघटन होने के पश्चात् भी मंत्रिपरिषद् विघटित नहीं होगी। अनुच्छेद 74 अनिवार्य है अतः राष्ट्रपति अपनी कार्यकारी शक्ति का प्रयोग बिना मंत्रिमंडल की सहायता एवं सलाह के नहीं कर सकता। बिना सलाह एवं सहायता के कार्यकारी शक्ति द्वारा किया गया कोई भी कार्य असंवैधानिक होगा और यह अनुच्छेद 74 का उल्लंघन माना जाएगा। पुनः 1974 में न्यायालय ने कहा जब भी संविधान को राष्ट्रपति की संतुष्टि की आवश्यकता होगी, यह संतुष्टि राष्ट्रपति की व्यक्तिगत संतुष्टि न होकर मंत्रिपरिषद की संतुष्टि होगी, जिसकी सलाह और सहायता पर राष्ट्रपति अपनी शक्ति का प्रयोग और कार्य करता है।

मंत्रियों की नियुक्ति

प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है तथा प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। इसका अर्थ है कि राष्ट्रपति केवल उन्हीं व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त कर सकता है, जिनकी सिफारिश प्रधानमंत्री करता है।
सामान्यतः लोकसभा/राज्यसभा से ही संसद सदस्यों की मंत्रिपद पर नियुक्ति होती है। कोई व्यक्ति संसद की सदस्यता के बिना मंत्रिपद पर सुशोभित होता है तो उसे छह माह के भीतर संसद के किसी भी सदन की सदस्यता लेनी होगी (निर्वाचन से अथवा नामांकन से) नहीं तो उसका मंत्री पद रद्द कर दिया जाता है।
एक मंत्री को जो संसद के किसी एक सदन का सदस्य है, दूसरे सदन की कार्यवाही में भाग लेने और बोलने का अधिकार है परंतु वह उसी सदन में मत दे सकता है, जिसका कि वह सदस्य है।

मंत्रियों द्वारा ली जाने वाली शपथ एवं उनका वेतन

मंत्रिपद ग्रहण करने से पूर्व राष्ट्रपति उसे पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाता है। अपनी शपथ में वह कहता है मैं;
  1. भारत के संविधान में सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा।
  2. भारत की अखंडता और संप्रभुता को अक्षुण्ण रखूंगा।
  3. अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंत:करण से निर्वहन् करूंगा।
  4. भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि अनुसार न्याय करूंगा।
अपनी गोपनीयता की शपथ में मंत्री शपथ लेते हैं कि जो विषय संघ के मंत्री के रूप में मेरे विचार के लिए लाया जाएगा अथवा मुझे ज्ञात होगा उसे किसी व्यक्ति था व्यक्तियों को तब तक के सिवाए जबकि ऐसे मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों के सम्यक, निर्वहन के लिए ऐसा करना अपेक्षित हो, मैं प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संसूचित या प्रकट नहीं करूंगा।
सन 1990 में देवीलाल द्वारा उप-प्रधानमंत्री की शपथ को इस आधार पर चुनौती दी गई कि यह असंवैधानिक है और संविधान में केवल प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों का उपबंध है। उच्चतम न्यायालय ने इस शपथ को वैध ठहराया और कहा- किसी व्यक्ति की उप-प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्ति केवल व्याख्यात्मक है और ऐसी व्याख्या उसे प्रधानमंत्री की कोई शक्ति प्रदान नहीं करती। इसमें कहा गया कि किसी मंत्री की उप प्रधानमंत्री अथवा अन्य किसी प्रकार के मंत्री जैसे राज्यमंत्री अथवा उपमंत्री के रूप में व्याख्या जो कि संविधान में वर्णित नहीं है, उसके द्वारा ली गई शपथ को अवैध घोषित नहीं करती यदि उसके द्वारा ली गई शपथ का वास्तविक भाग सही है।
मंत्रियों के वेतन व भत्ते संसद समय-समय पर निर्धारित करती है। एक मंत्री एक संसद सदस्य को दिए जाने वाले वेतन व भत्ते प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त वह व्यय विषय भत्ते ( उसके पद के अनुसार), मुफ्त आवास, यात्रा भत्ता, स्वास्थ्य सुविधा आदि प्राप्त करता है। सन 2001 में प्रधानमंत्री का व्यय विषय भत्ता बढ़ाकर 1500 से 3000 रु. प्रति माह, केंद्रीय मंत्री के लिए 1000 से 2000 रु. प्रतिमाह राज्यमंत्री के लिए 500 से 1000 रु. और उपमंत्री के लिए 300 से 600रु. प्रतिमाह कर दिया गया है।

मंत्रियों के उत्तरदायित्व

सामूहिक उत्तरदायित्व
सरकार की संसदीय व्यवस्था की कार्य प्रणाली का मौलिक सिद्धांत उसके सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत है। अनुच्छेद 75 स्पष्ट रूप से कहता है कि मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी। इसका अर्थ है कि सभी मंत्रियों की उनके सभी कार्यों के लिए लोकसभा के प्रति संयुक्त जिम्मेदारी होगी। वे एक दल की तरह कार्य करेंगे और समान रूप से उत्तरदायी होंगे। जब लोकसभा मंत्रिपरिषद के विरुद्ध एक अविश्वास प्रस्ताव पारित करती है तो सभी मंत्रियों को जिसमें कि राज्यसभा के मंत्री भी शामिल हों त्याग-पत्र देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को इस आधार पर लोकसभा को विघटित करने की सलाह दे सकती है कि सदन जनमत का निष्ठापूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करता है और नए चुनाव की मांग करता है। राष्ट्रपति, लोकसभा में विश्वास मत खोए हुए मंत्रिपरिषद की सलाह मानने हेतु बाध्य नहीं है।
सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत यह भी है कि मंत्रिमंडल के निर्णय सभी केंद्रीय मंत्रियों (अन्य मंत्रियों) के लिए बाध्यकारी हैं। यहां तक कि यदि मंत्रिमण्डल की बैठक में उनके विचार इसके विरूद्ध हों। सभी मंत्रियों का यह कर्तव्य है कि वो मंत्रिमंडल के निर्णयों को माने तथा संसद के बाहर और भीतर उसका समर्थन करें। यदि कोई मंत्री मंत्रिमंडल के किसी निर्णय से असहमत है और उसके लिए तैयार नहीं है, तो उसे त्याग-पत्र देना होगा। पूर्व में कई मंत्रियों ने मंत्रिमंडल के साथ अपने मतभेद के चलते कई बार त्यागपत्र दिए हैं। उदाहरण के लिए 1953 में डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल पर अपने साथियों के साथ मतभेद के चलते त्याग-पत्र दे दिया था। सी.डी. देशमुख ने राज्यों के पुनर्गठन की नीति पर मतभेद के कारण त्याग-पत्र दे दिया था। आरिफ मोहम्मद ने मुस्लिम महिला (तलाक से बचाव का अधिकार) अधिनियम, 1986 के विरोध में त्याग-पत्र दे दिया था।
व्यक्तिगत उत्तरदायित्व
अनुच्छेद 75 में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का सिद्धांत भी वर्णित है। यह कहता है कि मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बने रहेंगे जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति किसी मंत्री को उस समय भी हटा सकता है जब मंत्रिपरिषद को लोकसभा में विश्वास मत प्राप्त है। हालांकि राष्ट्रपति किसी मंत्री को केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर ही हटा सकता है। विचारों में मतभेद के कारण अथवा किसी मंत्री के कार्यों से संतुष्ट न होने के कारण प्रधानमंत्री उसे त्याग-पत्र देने के लिए कह सकता है अथवा राष्ट्रपति को उसे बर्खास्त करने की सलाह दे सकता है। इस शक्ति के प्रयोग द्वारा प्रधानमंत्री सामूहिक उत्तरदायित्व के नियम की सिद्धि कर सकता है। इस संदर्भ में डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने पाया;
"सामूहिक उत्तरदायित्व केवल प्रधानमंत्री की सहायता से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए जब तक कि हम ऐसे कार्यालय को निर्मित न करे और उसे मंत्रियों को नामित और बर्खास्त करने की शक्तियां प्रदान न करें सामूहिक उत्तरदायित्व नहीं हो सकता।'
कोई विधिक उत्तरदायित्व नही
ब्रिटेन में, सार्वजनिक कार्य के लिए राजा का प्रत्येक आदेश मंत्री द्वारा हस्ताक्षरित होता है। यदि वह आदेश किसी कानून का उल्लंघन करता है तो उसका उत्तरदायित्व मंत्री पर होता है तथा वह न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। ब्रिटेन में यह मुहावरा विधिक रूप से मान्य है कि “राजा कभी गलत नहीं हो सकता।' अतः उस पर न्यायालय में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। 
दूसरी ओर भारत में, संविधान में किसी भी मंत्री के लिए, किसी भी प्रकार की विधिक जिम्मेदारी का कोई उपबंध नहीं है। यह आवश्यक नहीं है कि राष्ट्रपति द्वारा जनहित में जारी किसी आदेश पर कोई मंत्री प्रति हस्ताक्षर करे। यहां तक कि मंत्री द्वारा राष्ट्रपति को दी गई किसी सलाह की जांच भी न्यायालय के क्षेत्र से बाहर है।

मंत्रिपरिषद की संरचना

मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की तीन श्रेणियां होती हैं- कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री व उपमंत्री। उनके बीच का अंतर है- उनका पदक्रम, वेतन तथा राजनैतिक महत्व। इन सभी मंत्रियों का प्रमुख प्रधानमंत्री है, जो सरकार का उच्चतम कार्यकारी है।
कैबिनेट मंत्रियों के पास केंद्र सरकार के महत्वपूर्ण मंत्रालय, जैसे- गृह, रक्षा, वित्त, विदेश व अन्य मंत्रालय होते हैं। वे कैबिनेट के सदस्य होते हैं और इसकी बैठकों में भाग लेते हैं तथा नीति-निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अत: इनके उत्तरदायित्व की परिधि संपूर्ण केन्द्र सरकार पर है।
राज्य मंत्रियों को मंत्रालय/विभागों का स्वतंत्र प्रभार दिया जा सकता है अथवा उन्हें कैबिनेट मंत्री के साथ सहयोगी बनाया जा सकता है। सहयोग के मामलों में, उन्हें कैबिनेट मंत्री के मंत्रालय के विभागों का प्रभार दिया जा सकता है अथवा मंत्रालय से संबंधित कोई विशेष कार्य सौंपा जा सकता है। दोनों ही मामलों में वे कैबिनेट मंत्री की देखरेख, सलाह तथा उसकी जिम्मेदारी पर कार्य करते हैं। स्वतंत्र प्रभार के मामले में वे अपने मंत्रालय का कार्य, कैबिनेट मंत्री की तरह ही पूरी शक्ति व स्वतंत्रता से करते हैं। हालांकि वे कैबिनेट के सदस्य नहीं होते है तथा उनकी बैठकों में भाग नहीं लेते। वे तब तक बैठक में भाग नहीं लेते, जब तक उन्हें उनके मंत्रालय से संबंधित किसी कार्य हेतु विशेष रूप से आमंत्रित नहीं किया जाए।
इस क्रम में अगला क्रम उपमंत्रियों का है। उन्हें मंत्रालयों का स्वतंत्र प्रभार नहीं दिया जाता है। उन्हें कैबिनेट अथवा राज्य मंत्रियों को उनके प्रशासनिक, राजनैतिक और संसदीय कार्यों में सहायता के लिए नियुक्त किया जाता है। वे कैबिनेट के सदस्य नहीं होते तथा कैबिनेट की बैठक में भाग नहीं लेते हैं।
यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि मंत्रियों की एक और श्रेणी भी है, जिन्हें संसदीय सचिव कहा जाता है। वे मंत्रिपरिषद की अंतिम श्रेणी में आते हैं (जिसे मंत्रालय भी कहा जाता है)। उनके पास कोई विभाग नहीं होता है। वे वरिष्ठ मंत्रियों के साथ उनके संसदीय कार्यों में सहायता के लिए नियुक्त होते हैं हालांकि 1967 से, राजीव गांधी की सरकार के प्रथम विस्तार को छोड़कर, कोई भी संसदीय सचिव नियुक्त नहीं किया गया है।
कई बार पर, मंत्रिपरिषद में उपप्रधानमंत्री को भी शामिल किया जा सकता है। उप-प्रधानमंत्री मुख्यतः राजनैतिक कारणों से नियुक्त किया जाता है।

मंत्रिपरिषद बनाम मंत्रिमंडल

'मंत्रिपरिषद' तथा ' मंत्रिमंडल' ये दोनों शब्द अक्सर एक-दूसरे के लिए प्रयोग किए जाते हैं परंतु इनमें एक निश्चित अंतर है। ये एक दूसरे से अपनी संरचना, कार्यों व भूमिकाओं के कारण भिन्न हैं। ये अंतर तालिका 20.1 में दिए गए हैं।

मंत्रिमंडल की भूमिका

  1. यह हमारी राजनैतिक - प्रशासनिक व्यवस्था में उच्चतम निर्णय लेने वाली संस्था है।
  2. यह केंद्र सरकार की मुख्य नीति निर्धारक अंग है।
  3. यह केंद्र सरकार की उच्च कार्यकारिणी है।
  4. यह केंद्रीय प्रशासन की मुख्य समन्वयक है।
  5. यह राष्ट्रपति की सलाहकारी संस्था है तथा इसका परामर्श उस पर बाध्यकारी है।
  6. यह मुख्य आपदा प्रबंधक है और सभी आपातकालीन स्थितियों से निपटती है।
  7. यह सभी बड़े विधायी और वित्तीय मामलों से निपटती है।
  8. यह उच्चतम स्तर पर, जैसे संवैधानिक अधिकारियों और वरिष्ठ सचिवालय प्रशासकों की नियुक्ति को नियंत्रित करती है।
  9. यह विदेश नीतियों और विदेश मामलों को देखती हैं।

भूमिका का वर्णन

कई प्रसिद्ध राजनीतिशास्त्रियों एवं संविधान विशेषज्ञों ने कैबिनेट की भूमिका की, विशेष रूप से ब्रिटिश कैबिनेट की भूमिका की व्याख्या की है। जो भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी सही है। इनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं:
रैम्जे म्योर ने इसे “राज्य रूपी जहाज की स्टियरिंग व्हील " बताया है।
लोवेल: ‘‘कैबिनेट राजनीतिक वास्तु का आधार है । ' ""
सर जान मैरियट: “कैबिनेट वह धुरी है, जिसके चारों ओर पूरी राजनीतिक मशीनरी घूमती है।"
ग्लैडस्टोन: ‘‘कैबिनेट सूर्य के समान है, जिसके चारों ओर अन्य निकाय परिभ्रमण करते हैं।' "
बार्कर: “कैबिनेट नीतियों का चुंबक है।"
बेगेहाट: "कैबिनेट हाइफन है, जो कार्यपालक एवं विधायी विभाग, दोनों के साथ जुड़ी होती है । "
सर आइवर जेनिंग्स: "कैबिनेट ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था का केंद्र बिंदु है। यह ब्रिटिश सरकार को एकता प्रदान करता है। "
एल.एस. एमरी: “कैबिनेट सरकार को निर्देशित करने वाला मुख्य उपकरण है। "
ब्रिटिश सरकार में कैबिनेट की भूमिका इतनी सशक्त प्रतीत होती है कि रेमजे म्योर इसे 'कैबिनेट की तानाशाही' कहते हैं। अपनी पुस्तक हाउ ब्रिटेन इज गवर्नड में वे लिखते हैं कि, "यह एक ऐसा निकाय है, जो अत्यधिक शक्तिशाली है तथा इसका वर्णन सर्वशक्तिमान निकाय के रूप में किया जा सकता है। जब भी यह बहुमत द्वारा इस स्थिति को प्राप्त करती है तो यह स्थिति प्रसार द्वारा प्राप्त अर्हक निरंकुशता जैसी होती है। यह निरंकुशत् पिछली दो पीढियों की तुलना में अधिक पूर्ण है।" यह विवरण भारतीय संदर्भ में भी काफी हद तक सही है।

आंतरिक (किचेन) कैबिनेट

यह कैबिनेट 15 या 20 महत्वपूर्ण मंत्रियों को मिलाकर बनती है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है। यह औपचारिक रूप से निर्णय लेने वाली उच्चतम संस्था होती है। 'आंतरिक कैबिनेट' या किचन कैबिनेट कहलाने वाला यह छोटा निकाय सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया है। इस अनौपचारिक निकाय में प्रधानमंत्री अपने दो से चार प्रभावशाली, पूर्ण विश्वासी सहयोगी रखता है जिनसे वह हर समस्या की चर्चा करता है। यह प्रधानमंत्री को महत्वपूर्ण राजनैतिक तथा प्रशासनिक मुद्दों पर सलाह देती है और महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सहायता करती है। इसमें न केवल कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं अपितु इसके बाहर के भी, जैसे प्रधानमंत्री के मित्र व पारिवारिक सदस्य भी शामिल होते हैं।
भारत में प्रत्येक प्रधानमंत्री की एक 'आंतरिक कैबिनेट' होती है - एक घेरे के अंदर घेरा। इंदिरा गांधी के जमाने में' आंतरिक कैबिनेट' अति शक्तिशाली थी, जिसे किचन कैबिनेट भी कहा जाने लगा।
प्रधानमंत्री ने 'आंतरिक कैबिनेट' (संविधानेत्तर) का आश्रय निम्न कारणों से लिया:
  1. यह एक छोटा अंग है और निर्णय लेने के मामले में कैबिनेट के विशाल आकार से अधिक प्रभावशाली है।
  2. इसकी बैठकें होती रहती हैं और यह सरकार के कार्यों को बड़ी कैबिनेट की अपेक्षा अधिक तत्परता से निपटती है।
  3. यह प्रधानमंत्री को महत्वपूर्ण राजनैतिक मामलों के मुद्दों पर निर्णय लेने में गोपनीयता बरतने में सहायता करती है ।
हालांकि इसके कई दोष भी हैं, जैसे :
  1. यह एक उच्चतम निर्णय करने वाले अंग के रूप में कैबिनेट के महत्ता व अधिकारों को कम करती है।
  2. बाहरी व्यक्तियों का इसमें प्रवेश और सरकार के कार्यों में उनकी प्रभावशाली भूमिका, कानूनी प्रक्रिया को उलझा देती है।
आंतरिक या किचन कैबिनेट का सिद्धांत (जहां पहले से तय निर्णयों को कैबिनेट की आपैचारिक मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाता है) भारत में अनोखा नहीं है। अमेरिका और ब्रिटेन में यह प्रचलन में है तथा सरकार के निर्णयों को प्रभावित करने में काफी शक्तिशाली है।
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