962 ई. में अल्पतगीन नामक व्यक्ति ने गजनी में एक स्वतन्त्र तुर्क राज्य की स्थापना की. उसके दामाद सुबुक्तगीन ने उसके वंश का अन्त कर 977 ई. में गद्दी हथिया ली तथा भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगा. पंजाब के हिन्दू शासक जयपाल ने 986-87 ई. के मध्य उसके आक्रमण को विफल करने के उद्देश्य एक बड़ी सेना के साथ उस पर आक्रमण कर दिया, लेकिन भारी वर्षा के कारण उसे हार का मुँह देखना पड़ा और अपमानजनक सन्धि करने के लिए विवश होना पड़ा, किन्तु लाहौर पहुँचने के बाद उसने सन्धि की शर्तों को स्वीकार करने से मना कर दिया. अतः सुबुक्तगीन ने उसके राज्य पर आक्रमण कर लूटपाट की तथा पेशावर तक के भूभाग को हथिया लिया. जयपाल ने कुछ मित्र राजाओं की सहायता से सुबुक्तगीन पर आक्रमण किया जिसमें सुबुक्तगीन को ही विजयश्री मिली, इस प्रकार से तुर्की को अपने प्रारम्भिक आक्रमणों से ही सफलता मिल गई. इन आक्रमणों की सफलता से यह विदित हुआ कि उत्तर-पश्चिम से आक्रमणकारियों का भारत में प्रवेश आसान है और भविष्य में मुस्लिम आक्रमणकारी इसी रास्ते भारत आए. भारत में मुसलमानों ने इस्लाम को फैलाया. मन्दिरों को नष्ट किया. भारी संख्या में नरसंहार किया और अपार सम्पदा लूटकर ले गए. भारत में इस्लाम के प्रवेश के कारण यहाँ की संस्कृति भी काफी प्रभावित हुई.
> महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण : लुटेरे के रूप में
सुबुक्तगीन की मृत्यु (997 ई.) के बाद उसका महत्वाकांक्षी पुत्र महमूद गजनी का शासक बना. उसे बगदाद के खलीफा द्वारा 'यामिनिउद्दौला' तथा 'अमीन- उल मिल्लाह' की उपाधि मिली हुई थी. उसने शासक बनते समय यह प्रतिज्ञा की थी कि वह प्रत्येक वर्ष भारत पर आक्रमण करेगा. उसे मध्य एशिया में अपने राज्य विस्तार के लिए धन भारत से ही उसे मिलना उस समय सम्भव था. अतः उसके आक्रमण का मूल उद्देश्य भारत में धन की लूटपाट तथा इस्लाम का प्रचार करना था. इस उद्देश्य हेतु उसने भारत पर अनेक आक्रमण किये, जिनमें प्रमुख आक्रमणों का विवरण निम्नलिखित है -
- महमूद का प्रथम भारतीय आक्रमण पश्चिमोत्तर के शाही राजा जयपाल के विरुद्ध हुआ जिसमें जयपाल की पराजय हुई और महमूद उसकी राजधानी उद्भाण्डपुर जीतने व लूटने के बाद अतुल सम्पत्ति लेकर गजनी वापस लौट गया. जयपाल ने आत्महत्या कर ली. ही जयपाल के पुत्र आनन्दपाल व त्रिलोचनपाल 1021 तक महमूद के विरुद्ध छुटपुट संघर्ष करते रहे, लेकिन उसके बाद शाहिया वंश का अन्त हो गया.
- महमूद ने दूसरा आक्रमण मुल्तान के शिया मतावलम्बी शासक फतेह दाऊद के विरुद्ध किया. 1006 ई. में उसने फतेह दाऊद को परास्त कर दिया तथा अपनी ओर से १. सुखपाल को वहाँ का शासक बनाया तथा 1008 में उसके विद्रोह करने के कारण, बन्दी बनाकर मुल्तान पर अधिकार कर लिया.
- महमूद ने 1005 ई. में भटिण्डा के मजबूत किले को जीतकर वहाँ के शासक विजयराय को भाग खड़े होने पर विवश कर दिया.
- 1009 में अलवर के नारायणपुर पर आक्रमण किया तथा 1014 ई. में थानेश्वर के चक्रस्वामी मन्दिर को तोड़ा, 1018 ई. में उसने मथुरा पर धावा बोला तथा वहाँ के अनेक मन्दिरों को ध्वस्त कर दिया तथा बहुत बड़ी धनराशि लेकर वह गजनी लौटा.
- महमूद गजनवी का सबसे प्रसिद्ध आक्रमण 1025-26 ई. में सोमनाथ के प्रसिद्ध मन्दिर पर हुआ, जोकि काठियावाड़ में स्थित था. यह मन्दिर पूरे भारत में अपनी । पवित्रता, गौरव व समृद्धि के लिए विख्यात था, महमूद ने सोमनाथ के किले का घेरा डाला तथा बिना किसी विशेष संघर्ष के उसमें प्रवेश करने में सफलता प्राप्त कर ली तथा लगभग 50000 ब्राह्मणों व पुजारियों का वध उसने कर दिया. सोमनाथ भगवान् की मूर्ति को तोड़कर उसे गजनी, मक्का और मदीना की मस्जिदों की सीढ़ियों में लोगों के पैरों की ठोकर खाने हेतु भेज दिया गया.
इस आक्रमण में महमूद को बहुत अधिक हीरे-जवाहरात और स्वर्ण हाथ लगा. यह कुल राशि लगभग 20 लाख दीनार के बराबर थी. इसे लेकर जब वह गजनी की ओर लौट रहा था तो मार्ग में जाटों ने उसकी कुछ सम्पत्ति लूट ली, लेकिन गजनी वहाँ सकुशल पहुँच गया.
जाटों से बदला लेने के लिए 1027 ई. में गजनवी ने पुनः सिन्ध पर आक्रमण किया तथा भयंकर कत्लेआम मचाया व उनके नगरों को जला दिया. 1030 ई. में उसकी मृत्यु से पूर्व यह उसका भारत पर अन्तिम आक्रमण था. उसने हर आक्रमण के दौरान भारत से अपार सम्पत्ति लूटी. उसने जितने भी आक्रमण भारत पर किए सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए किए. वह हर बार लुटेरे की भाँति आया और सम्पत्ति लूटकर ले गया.
> मुहम्मद गोरी का भारत पर आक्रमण
परिचय – महमूद गजनवी के बाद भारत पर दूसरे महत्वपूर्ण तुर्क विजेता का आक्रमण हुआ जो इतिहास में मुहम्मद गोरी के नाम से प्रसिद्ध है. गोर महमूद गजनवी के अधीन एक छोटा-सा राज्य था. महमूद की मृत्यु के बाद उसके कमजोर उत्तराधिकारियों के समय गोर के सरदारों ने अपनी शक्ति में काफी वृद्धि कर ली और राज्य का विस्तार प्रारम्भ कर दिया तथा यहाँ के शंसबनी शासकों ने गजनी पर अपना अधिकार कर लिया.
1173 ई. में शिहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी गजनी का शासक बना तथा इसने तीन वर्षों तक अपना सारा ध्यान गोर राज्य के उत्कर्ष में लगाया. 1175 ई. से उसने भारत पर आक्रमण करना प्रारम्भ कर दिया तथा 1205 ई. तक आतेआते उसने भारत के हृदय स्थल दिल्ली में तुर्क राज्य की स्थापना कर दी. उसके आक्रमणों का मूल उद्देश्य भारत में इस्लाम का प्रचार करना था.
> तुर्क आक्रमणकारियों के विरुद्ध राजपूतों की असफलता : कारण
राजपूत लोग अत्यन्त वीर, साहसी एवं योद्धा होते हुए तुर्क आक्रमणकारियों के विरुद्ध देश की रक्षा करने में कुछ कारणों से असफल रहे, जिनका विवरण निम्नलिखित है-
- राजपूतों की पराजय का सबसे बड़ा कारण उनमें राजनैतिक एकता की कमी थी. ये लोग छोटे-छोटे अनेक राज्यों में बँटे थे तथा आपस में सदैव संघर्षरत रहते थे. प्रत्येक शासक अपने पड़ोसी शासकों के राज्य को हथियाना चाहता था.
- राजपूत राज्यों का स्वरूप सामंतवादी था. इस कारण वास्तविक सत्ता सामंतों के पास होती थी और केन्द्रीय सत्ता के निर्बल होते ही सामंत लोग अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर देते थे. इस कारण जनता राजनैतिक कार्यों में उदासीन बनी रहती थी तथा ऐसी स्थिति में किसी भी राज्य का पतन होना अवश्यम्भावी था.
- राजपूतों के पतन का एक उल्लेखनीय कारण उनका सैनिक संगठन भी था. राजपूत सेना में पैदल सेना की संख्या अधिक थी तथा घुड़सवार सेना के पास अच्छे घोड़े नहीं थे, जबकि मुसलमान सेना के पास घुड़सवारों की संख्या अधिक व उन्नत किस्म के घोड़े थे. वे युद्ध करने की नई पद्धतियों से भी परिचित थे.
- तत्कालीन समाज का सामाजिक संगठन भी राजपूतों की पराजय का एक बड़ा कारण था. समाज में जाति-पाँति, छुआछूत एवं ऊँच-नीच की भावनाएँ अत्यन्त प्रबल थीं. देश की रक्षा का भार केवल राजपूतों पर ही निर्भर था. समाज का एक बड़ा भाग देश की रक्षा के प्रति उदासीन था. इस कारण से देश में राष्ट्रीयता की भावना लुप्त हो ग गई.
- राजपूतों की पराजय में उनके दुर्गुणों ने भी भरपूर योगदान दिया; जैसे— मदिरापान, द्यूतक्रीड़ा, बहु विवाह आदि. इन सबके कारण उनके नैतिक जीवन में गिरावट आ रही थी.
- राजपूतों पर अहिंसा के सिद्धान्तों का भी काफी असर पड़ा था. इसके साथ ही भाग्यवाद, कर्मवाद और अनेक अन्धविश्वासों का प्रचलन उनमें हो गया था. जिसने हिन्दू जनता की सैनिक शक्ति को कुण्ठित कर दिया था.
- राजपूतों के विरुद्ध मुसलमानों की सफलता का प्रधान कारण यह भी रहा कि तुर्क विजेता राजपूतों से अधिक योग्य और अनुभवी थे. सुबुक्तगीन, महमूद, कुतुबुद्दीन ऐबक आदि अपने समय के उच्चकोटि के सेनानायक थे. पृथ्वीराज ने तराइन के युद्ध में विजय पाने के बाद भी गोरी का वध न करके बहुत बड़ी भूल की, जिसका खामियाजा उसे अगले ही वर्ष भुगतना पड़ा.
- राजपूत लोग धर्म युद्ध करते थे जिसके अनुसार भागते शत्रु का पीछा न करना, शरण में आए हुए को अभयदान देना, घायल शत्रु पर वार न करना आदि उनका कर्तव्य था. इससे शत्रुओं को अधिक उत्साह के साथ दुबारा आक्रमण करने का मौका मिल जाता था.
उपर्युक्त विवेचऩ से स्पष्ट है कि राजपूतों की पराजय अनेक कारणों से सम्भव हुई तथा कभी भी उन्होंने आक्रामक रुख नहीं अपनाया. बार-बार तुर्कों के आक्रमण होने पर भी उन्होंने समस्त भारतीय राजाओं को संगठित कर उनके विरुद्ध स्थाई संयुक्त मोर्चा बनाने का प्रयास नहीं किया.
> होयसल मन्दिर स्थापत्य कला
होयसल राजाओं का काल कला एवं स्थापत्य की उन्नति के लिए इतिहास में प्रसिद्ध है. उनके काल में मन्दिर निर्माण की एक नई शैली का विकास हुआ. इन मन्दिरों का निर्माण भवनों के समान ऊँचे ठोस चबूतरे पर किया जाता था. चबूतरों तथा दीवारों पर हाथियों, अश्वारोहियों, हंसों, राक्षसों तथा पौराणिक कथाओं से सम्बन्धित अनेक मूर्तियों का निर्माण किया गया है.
होयसल शासकों द्वारा निर्मित अनेक सुन्दर मन्दिर आधुनिक हेलबिड, जोकि कर्नाटक में स्थित है, बेलूर तथा श्रवणबेलगोला से प्राप्त होते हैं. होयसलों की राजधानी द्वार समुद्र थी जो आजकल हेलबिड के नाम से जानी जाती है. यहाँ पर निर्मित मन्दिरों में होयसलेश्वर का प्राचीन मन्दिर सर्वाधिक प्रसिद्ध है. इस मन्दिर का निर्माण विष्णु वर्द्धन के शासनकाल में किया गया था. यह 160' लम्बा तथा 122' फुट चौड़ा है, इसमें शिखर का निर्माण नहीं किया गया है. इसकी दीवारों पर अद्भुत मूर्तियों का अंकन मिलता है. इसमें देवताओं, मनुष्यों एवं पशु-पक्षियों आदि सभी की मूर्तियाँ हैं. विष्णु वर्द्धन ने ही बेलूर में 'चेन्नाकेशव मन्दिर' का भी निर्माण करवाया था. यह 178' x 156' का है. मन्दिर के चारों ओर वेष्ठिनी (रलिंग) है तथा उसमें तीन तोरण बने हुए हैं. तोरण द्वारों पर रामायण तथा महाभारत से लिए गए अनेक सुन्दर दृश्यों का अंकन है. मन्दिर के भीतर बनी मूर्तियों में नाचती हुई सरस्वती की मूर्ति का सौन्दर्य अद्भुत है. होयसल मन्दिर अपनी निर्माण शैली, सुदृढ़ता एवं आकारप्रकार तथा सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है.
> चोल प्रशासन
एवं विशिष्ट स्वरूप स्थानीय ग्रामीण प्रशासन एवं शहरी चोल प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि प्रशासन था. चोलों की केन्द्रीय व प्रान्तीय प्रशासनिक मध्यकालीन भारतीय अन्य वंशों में शासन था. चालुक्यों एवं व्यवस्था में कोई खास अन्तर नहीं था जिस प्रकार पूर्व राष्ट्रकूटों के समान ही चोल प्रशासन काफी केन्द्रीयकृत था.
> केन्द्रीय प्रशासन
केन्द्रीय प्रशासन का केन्द्र बिन्दु राजा था तथा उसके कार्यों में सहायता देने के लिए मन्त्रिपरिषद् या उदनकुट्टम थी जो सभी प्रधान विभागों के प्रशासन में उसकी मदद करती थी.
चोल युग में विस्तृत एवं जटिल प्रशासनिक व्यवस्था थी जिसमें विभिन्न स्तर के कार्यालयों का प्रशासनिक उपबन्ध सम्मिलित था. सरकारी कर्मचारी, समाज में विशिष्ट स्थान रखता था तथा उसका एक अलग वर्ग था. उच्च कर्मचारी को ‘पेरुन्दरम' तथा निम्न स्तर के कर्मचारी को ‘शिरुतरम' कहा जाता था. अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार ये वर्ग भू-भाग से पदाधिकारियों को इनाम दिया जाता था तथा विभिन्न कर वसूलने के अधिकारी होते थे. लूट के माल में से उपाधियाँ भी प्रदान की जाती थीं.
साम्राज्य अनेक प्रान्तों में बँटा हुआ था जिन्हें ‘मण्डलम' कहा जाता था जिसका प्रधान प्रायः राजकुमार हुआ करते थे. प्रान्त या मण्डलम 'बेलनाडु' में बँटा हुआ था, तथा 'बेलनाडु', 'नाडु' में बँटे होते थे. नाडु आधुनिक जिले के समान था जो कुर्रम (ग्राम) में बँटे थे.
शहरों के लिए स्वायत्त प्रशासन था जिसे 'तंकरूरु' कहा जाता था. यह एक परिषद् के समान थी."
चोलों के अधीन स्थानीय शासन सर्वाधिक सुदृढ़ था. ग्राम का प्रशासन ग्राम सभाएँ करती थीं जो दो प्रकार की थीं— (1) उर, (2) सभा या महासभा के सदस्य मूल रूप से अग्रहार पाए ब्राह्मण थे जिसके सदस्य पेरुमक्कल कहे जाते थे. ये सभाएँ अनेक समितियों में विभक्त थीं जिन्हें 'वारियम' कहा जाता था. इनमें संवत्सर वारियम (वार्षिक समिति), तड़ाग समिति, उपवन समिति, स्थाई समिति आदि थी. इन समितियों में सदस्यों की संख्या अनिश्चित थी तथा इनके सदस्य अवैतनिक थे.
ग्राम सभाएँ गाँव की भूमिकर संग्रहण कर न देने वाले को दण्ड तथा भू-विवादों का निपटारा करती थीं. ग्राम के विकास का उत्तरदायित्व भी इन्हीं सभाओं के पास था.
समान्यतः चोल साम्राज्य के अन्तर्गत केन्द्र केवलं साम्राज्य की सुरक्षा, विदेश नीति, आन्तरिक शान्ति और लोक कल्याण के कार्यों को ही करता था शेष कार्य नगरों एवं प्रान्तों की संस्थाएँ ही करती थीं.
> राजस्व प्रशासन
चोल राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमि कर था जिसका निर्धारण भूमि सर्वेक्षण के आधार पर किया जाता था. अकाल तथा अन्य प्राकृतिक विपदाओं के समय कर में छूट दी जाती थी. कर के अन्य साधनों में वन सम्पदा, खानें, आयात और निर्यात कर तथा स्थानीय शुल्क थे. सार्वजनिक कार्यों हेतु बेगार भी ली जाती थी.
चोल नरेशों ने अपनी आय के साधनों को बढ़ाने और विभिन्न स्रोतों से कर एकत्रित करने के अनेक प्रयास किए थे. भूमि कर तथा भवन कर, राजस्व के प्रमुख स्रोत थे. इसलिए चोल शासकों ने भूमि कर वृद्धि और लगान वसूली में भी अधिक सक्रियता दिखाई. राजराज प्रथम ने तो भूमि का सर्वेक्षण कराकर पुनर्मूल्यांकन भी करवाया था. राजराज प्रथम के समय भूमि कर उपज का 1/3 से 1/6 6 तक लिया जाता था, किन्तु गाँव की कुछ भूमि कर मुक्त भी थी जिसे ‘इरैयिल’ (कर मुक्त) कहा जाता था. एक अभिलेख में अनेक व्यवसायों के ऊपर लगने वाले करों का उल्लेख है जिनमें कर, करघों, कोल्हुओं, व्यापार, सुनारों, नमक चुंगी, बाँटों, बाजारों आदि पर कर लगाए जाते थे. इनका अर्थ स्पष्ट नहीं है.
करों को वसूलते समय कभी-कभी जनता के साथ अत्यन्त कठोरतापूर्ण व्यवहार भी किया जाता था. लोगों को पानी में डुबो देने अथवा धूप में डुबो देने का भी उल्लेख मिलता है.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि चोलकालीन राजस्व प्रशासन पूर्ण रूप से संगठित था तथा उसमें जनकल्याण के काफी तत्व समाहित थे.
> चोल सैन्य प्रशासन
चोल राजाओं ने एक विशाल संगठित सेना का गठन किया था जिसमें लगभग एक लाख 50 हजार सैनिकों के अतिरिक्त एक विशाल नौसेना (Navy) भी थी.
चोल सेना 'मुनरुकई-महासेना' कहलाती थी जिसमें पैदल, अश्वारोही, गजारोही तीन मुख्य अंग थे. राजा सेना का प्रधान होता था. चोल अभिलेखों में सेना के 70 रेजिमेण्टों का उल्लेख किया गया है जिनमें प्रत्येक का सामूहिक जीवन होता था तथा इन्हें मन्दिर बनवाने तथा दान देने की स्वतन्त्रता होती थी. सेना समूचे प्रदेश में छोटे-छोटे गुल्मों एवं छावनियों में रहती थी जिसे 'कडगम' कहा जाता था.
सेना में भर्ती के तरीकों और स्थाई सेना के कुछ निश्चित प्रमाण नहीं हैं. सेनाओं में अनेक ब्राह्मण सेनापतियों का उल्लेख अभिलेखों में है. सेना नागरिक कार्यों को भी सम्पादित करती थी और इसके हिस्से कई प्रकार के स्थानीय निगमों आदि का कार्य था. युद्ध भूमि में महत्वपूर्ण सेनापतियों को 'क्षत्रिय शिखमणि' की उपाधि प्रदान की जाती थी.
चोल सेना की एक प्रमुख विशेषता उनके पास एक शक्तिशाली नौसेना का होना था. इसी सेना की सहायता से चोल शासकों ने लंका, जावा, सुमात्रा आदि द्वीपों तक अपनी विजय पताका फहराई थी. लड़ाकू जहाजों के अतिरिक्त इस सेना में व्यापारिक जहाज भी सम्मिलित थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि चोलों का सैन्य संगठन अत्यधिक उत्कृष्ट एवं विशाल था जिसके कारण उन्होंने एक विशाल साम्राज्य का गठन किया जो अपने समय में सबसे बड़ा साम्राज्य था.
> चोल स्थानीय प्रशासन : लेख
चोल शासन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता वह असाधारण शक्ति तथा क्षमता है, जो स्वायत्तशासी ग्रामीण संस्थाओं के संचालन में परिलक्षित होती है. उत्तरमेरुर से प्राप्त 919 तथा 929 ई. के दो अभिलेखों के आधार पर हम ग्राम सभा की कार्यकारिणी समितियों की कार्य प्रणाली का विस्तृत ज्ञान प्राप्त करते हैं. ग्रामों में मुख्यतः दो प्रकार की संस्थाएँ कार्यरत थीं—(1) उर, (2) सभा.
(1) ‘उर’—नीलकण्ठ शास्त्री के अनुसार, 'उर' का अर्थ 'पुर' है, जो गाँव और नगर दोनों के लिए प्रयुक्त है. इसमें सभी ग्रामवासी बैठकों में शामिल होते थे और यह सामान्य लोगों की संस्था थी. इसकी कार्यसमिति को 'आलुंगणम' कहा जाता था. इसके सदस्यों के चुनाव के विषय में हमें कोई जानकारी नह नहीं मिलती. ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ सभाओं के लिए एक ही कार्यसमिति होती थी जो सभी कार्यों के लिए उत्तरदायी थी. कहीं-कहीं एक ही गाँव में दो उर संगठन कार्य करते थे.
(2) सभा अथवा महासभा– यह संस्था उन गाँवों में होती थी जिसमें ब्राह्मणों को अग्रहार दिए गए थे. इन गाँवों में मुख्यतः विद्वान् ब्राह्मण निवास करते थे. ये मुख्यतः कांची तथा मद्रास के क्षेत्रों में थीं. 'सभा' मुख्यतः समितियों (बारियम) के माध्यम से कार्य करती थी. बारियम का तमिल में अर्थ 'आय' है. एक लेख में सभा की कार्यसमिति को 'वरणम्' कहा गया है. सभा द्वारा किसी कार्य विशेष के लिए नियुक्त व्यक्तियों को 'वारियर' कहा जाता था. बारियम के सदस्यों को कोई पारिश्रमिक कअथवा पुरस्कार नहीं दिया जाता था.
संस्था के सदस्यों का निर्वाचन समय-समय पर किया जाता था, जो मतपत्र के आधार पर होता था. सभी चुनने योग्य उम्मीदवारों के नाम अलग-अलग ताड़-पत्रों पर लिख दिए जाते थे तथा एक बर्तन में डालकर एक बालक से उन पत्तियों को निकलवाया जाता था जिनकी पत्ती निकलती थी वे निर्वाचित माने जाते थे. निर्वाचन के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ थीं
योग्यताएँ :
1. उनकी आयु 35-70 वर्ष हो.
2. वेद अथवा ब्राह्मण ग्रन्थों का ज्ञान के स्वामी हों तथा एक वेद एवं भाष्य का ज्ञान हो.
3. निजी घर हो.
अयोग्यताएँ :
1. यदि वह तीन वर्ष से किसी समिति का सदस्य रहा हो.
2. व्यभिचारी, चोर अथवा अपराधी हो.
3. शूद्रों के सम्पर्क से अपवित्र हो गया हो.
मन्दिरों में इन समितियों की बैठक हुआ करती थी तथा विचारणीय विषयों पर बहस कर सर्वोत्तम व्यवसायी ( प्रस्ताव ) पारित कर दिए जाने के उल्लेख मिलते हैं.
सभा के कार्य—ग्राम सभा के पास राज्य के प्रायः सभी अधिकार मिले हुए थे. उनके पास सामूहिक सम्पत्ति होती थी, जिसे वह जनहित में बेच सकती थी. ग्रामवासियों के सामान्य झगड़ों का फैसला करती थी. ग्राम सभा के पास बैंक भी होते थे तथा वह धन, भूमि तथा धान्य के रूप में जमा राशि प्राप्त करती और फिर ब्याज पर उन्हें वापस लौटा देती थी. गाँव की सभी अक्षय निधियाँ ग्राम सभा के अधीन होती थीं. सभा को ग्रामवासियों पर कर लगाने, वसूलने तथा उनसे बेगार लेने का भी अधिकार था. पीने के पानी, उपवनों, सिंचाई तथा आवागमन के साधनों की व्यवस्था करना ग्राम सभा के मुख्य कार्य थे.
> दक्षिण की धार्मिक दशा या चोल काल : धार्मिक दशा
चोल काल में शैव तथा वैष्णव धर्मों की उन्नति का काल था. नयनार ( शैव) व अलवार (वैष्णव) सन्तों के द्वारा इन धर्मों के प्रचार-प्रसार के लिए आन्दोलन चलाया गया. इन दोनों में भी शैव धर्म की लोकप्रियता कहीं अधिक थी. अधिकांश चोल शासक कट्टर शैव धर्म के उपासक थे. उन्होंने शिव के अनेक विशाल मन्दिरों की स्थापना की कुलोतुंग प्रथम तो इतना अधिक शिवभक्त था कि चिदम्बरम मन्दिर के नटराज मन्दिर में रखी विष्णु प्रतिमा को उखाड़कर समुद्र में फिकवा दिया. चोल शासकों ने शैव सन्तों को ही अपना राजगुरु नियुक्त किया: फलस्वरूप शासकों की देखा-देखी जनता में भी यह धर्म अधिक लोकप्रिय हो गया.
शैव धर्म के साथ-साथ वैष्णव धर्म भी इस समय उन्नति पर था. अलवार संतों का स्थान अब वैष्णव आचार्यों ने ग्रहण कर इस धर्म को दार्शनिक आधार प्रदान किया. इस समय शिव की तरह ही विष्णु के सम्मान में मन्दिर बनवाए गए व मठों की स्थापना की गई. मन्दिर तथा मठ चोलयुगीन धार्मिक जीवन के केन्द्र बिन्दु थे.
चोल शासक पर्याप्त रूप से धार्मिक सहिष्णु थे. उनके काल में जैन धर्म का विकास बौद्ध धर्म की अपेक्षा अधिक हुआ. इस काल में जैन मन्दिरों से भूमि कर माफ कर दिया गया. राजराज प्रथम की बहन कुन्दवे ने एक ही स्थान पर शैव, वैष्णव, जैन मन्दिरों का निर्माण करवाया. बौद्ध धर्म के प्रमुख केन्द्र इस काल में नेगापट्टम, कांची व श्रीनिवास में थे. इन्हें भी चोल शासकों द्वारा प्रभूत दान दिया गया था.
चोलकालीन धार्मिक जीवन की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इस समय आस्तिक धर्मों का बोलबाला अधिक था फलस्वरूप मूर्ति पूजा पर विशेष जोर रहा जिसके कारण वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान बन्द हो गया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि चोलकाल में शैव तथा वैष्णव धमों का ही उत्थान अत्यधिक हुआ तथा नास्तिक सम्प्रदायों का प्रभाव क्रमशः समाप्त हो गया.
> चोलकालीन कला एवं स्थापत्य
चोल काल में कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई. इस समय के कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन मन्दिर स्थापत्य में किया है. चोल शासकों द्वारा बड़ी संख्या में विभिन्न स्थानों पर मन्दिरों का निर्माण किया गया.
प्रथम चरण- चोलयुगीन प्रारम्भिक मन्दिर हमें पुदक्कोटै जिले से प्राप्त होते हैं. इनमें विजयालय द्वारा निर्मित चोलेश्वर का मन्दिर अत्यधिक प्रसिद्ध है. यह मन्दिर एक वर्गाकार आकार में गोलाकार गर्भगृह लिए निर्मित है तथा चार मंजिला है जिसमें क्रमशः ऊपर की मंजिलें छोटी होती गई हैं. शिखर के ऊपरी भाग पर गोल कलश है. मुख्य द्वार तथा ताखों में मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं. इसी प्रकार का एक अन्य मन्दिर कन्तूर का 'बाल सुब्रह्मण्यम मन्दिर' है, जो आदित्य प्रथम द्वारा बनवाया गया था. इस मन्दिर के चारों कोनों पर हाथियों की मूर्तियाँ हैं. इसी समय का एक अन्य मन्दिर 'नागेश्वर मन्दिर' है. इसमें गर्भगृह के चारों ओर अर्द्ध-नारी, ब्रह्मा, दक्षिणामूर्ति के साथ मनुष्यों की अनेक मूर्तियाँ बनी हैं.
द्वितीय चरण - श्रीनिवासनल्लूर का कोरंगनाथ मन्दिर चोलयुगीन मन्दिर निर्माण के द्वितीय चरण का प्रतिनिधित्व करता है. इस मन्दिर का आकार प्रकार अत्यन्त सुन्दर है. मन्दिर का शिखर 50' ऊँचा है तथा गर्भगृह 20' x 25' का है. गर्भगृह के बाहरी ताखों पर बनी भक्तों, सिंहों तथा गणों के साथ बैठी हुई दुर्गा की दक्षिणा मूर्ति तथा विष्णु एवं ब्रह्मा की खड़ी हुई उत्कीर्ण मूर्तियाँ मिलती हैं.
तृतीय चरण - इस चरण में चोल मन्दिर स्थापत्य कला का चर्मोत्कर्ष देखने को मिलता है. इस काल में बने मन्दिरों के श्रेष्ठ उदाहरण त्रिचनापल्ली जिले में निर्मित दो मन्दिरों तंजौर तथा गंगकोण्ड चोलपुरम के मन्दिर हैं. राज राजेश्वर अथवा वृहदीश्वर का मन्दिर भारत का सबसे बड़ा एवं भव्य मन्दिर है जो तंजौर में स्थित है. यह दक्षिण भारतीय शैली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. इसके निर्माण में ग्रेनाइट प्रस्तर का प्रयोग किया गया है. इसकी दीवारों को सुन्दर भित्ति चित्रों से सजाया गया है. गर्भगृह में विशाल वृहदीश्वर का शिवलिंग है. मन्दिर की दीवारों एवं ताखों पर सुन्दर मूर्तियाँ बनी हैं. पर्सी ब्राउन के शब्दों में, “इसका विमान न केवल द्राविड़ शैली की सर्वोत्तम रचना है अपितु इसे समस्त भारतीय स्थापत्य की कसौटी भी कहा जा सकता है." इंसी मन्दिर की तर्ज पर राजेन्द्र-I ने गंगैकोण्ड चोलपुर का मन्दिर बनवाया.
गंगैकोण्ड चोलपुर तथा तंजौर के मन्दिर चोल स्थापत्य के चरमोत्कर्ष को व्यक्त करते हैं तथा साथ ही ये चोल सम्राटों की महानता एवं गौरवगाथा को आज भी सूचित करते हैं. इन मन्दिरों का आकार एवं भव्यता इतनी विस्तृत है, तभी तो फर्ग्युसन ने लिखा है कि "चोल कलाकारों ने दैत्यों के समान कल्पना की तथा उसे जौहरियों के समान पूरा किया."
> चोलयुगीन वृहदीश्वर मन्दिर पर टिप्पणी
वृहदीश्वर के शिव मन्दिर की स्थापना राजराजा प्रथम द्वारा की गई थी. यह मन्दिर दक्षिण भारतीय द्राविड़ शैली का सम्पूर्ण भारत में श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करता है. यह भारत के मन्दिरों में सबसे बड़ा एवं भव्य है. इसका विशाल प्रांगण 500 फुट लम्बा तथा 250 फुट चौड़ा है. इसके निर्माण में ग्रेनाइट प्रस्तर का प्रयोग किया गया है. इस मन्दिर को चारों ओर ऊँची दीवारों से घेरकर सुरक्षित किया गया है. इस मन्दिर का सर्वश्रेष्ठ आकर्षण पश्चिम में गर्भगृह के ऊपर बना लगभग दो सौ फुट ऊँचा विमान है जिसका आधार 82 वर्ग फुट है. आधार के ऊपर तेरह मंजिलों वाला पिरामिड के आकार का 190 फुट ऊँचा शिखर है. मन्दिर का गर्भगृह 44 वर्ग फुट का है जिसके चारों ओर 9 फुट चौड़ा प्रदक्षिणा पथ है. इसमें सुन्दर भित्तिचित्र बने हैं. गर्भगृह के भीतर एक विशाल शिवलिंग है जो वृहदीश्वर के नाम से जाना जाता है. इसके दोनों ओर दो द्वारपालों की आकृतियाँ बनी हैं. मन्दिर के बहिर्भाग में विशाल नन्दि स्थापित है जिसे एकाश्म प्रस्तर द्वारा बनाया गया है. मन्दिर की दीवारों एवं ताखों में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनी हैं. इस प्रकार यह मन्दिर भव्यता एवं कलात्मकता का अद्भुत नमूना है. पर्सी ब्राउन के शब्दों में, "इसका विमान न केवल द्राविड़ शैली की सर्वोत्तम रचना है, अपितु भारतीय स्थापत्य कला की कसौटी भी कहा जा सकता है. "
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