मुगलकाल में विदेशी आक्रमण – नादिरशाह एवं अहमदशाह अब्दाली
> नादिरशाह के आक्रमण के कारण, परिणाम तथा उसके स्वरूप
मुगल साम्राज्य औरंगजेब की मृत्यु के बाद पतनोन्मुख हो चला था. अतः इसका लाभ उठाकर विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत पर हमले करने प्रारम्भ कर दिए. इनका प्रमुख उद्देश्य भारत से धन की लूट था. इन आक्रमणकारियों में नादिरशाह का आक्रमण अत्यन्त महत्वपूर्ण था, इस आक्रमण के निम्नलिखित कारण थे
1. नादिरशाह एक महात्वाकांक्षी व्यक्ति था. अतः वह अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था और भारत की राजनैतिक स्थिति उसके आक्रमण के लिए अनुकूल थी, क्योंकि इस समय भारत के विभिन्न भागों जैसे— पंजाब, राजपूताना, महाराष्ट्र आदि क्षेत्रों में क्षेत्रीय स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष चल रहा था.
2. नादिरशाह ने भारत में अपार धन होने की बात सुन रखी थी. अतः यह स्वाभाविक था कि, वह भारत की दुर्बल राजनैतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर धन प्राप्ति के लिए भारत पर आक्रमण किए.
3. नादिरशाह के आक्रमण को सीमान्त प्रदेशों की असुरक्षा ने भी प्रेरित किया, क्योंकि इस क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया था.
4. मुगलों एवं ईरानियों के मध्य कान्धार को लेकर लम्बे समय तक संघर्ष हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद दोनों में कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित हो गए थे. जब नादिरशाह ने ईरान पर अधिकार कर लिया तब मुगलों ने उससे सम्बन्ध तोड़ लिए. इससे नादिरशाह क्रोधित हो गया और उसने मुगलों को एक सबक सिखाने की तैयारी प्रारम्भ कर दी.
5. मुगल नादिरशाह के विरुद्ध गानों की सहायता कर रहे थे, इस पर नादिरशाह ने मुगल बादशाह मुहम्मदशाह के पास अपना दूत भेजकर उसे अफगानों की सहायता बन्द करने को कहा जिसे मुहम्मदशाह ने ठुकरा दिया. इस पर क्रोधवश नादिरशाह ने मुगल राज्य पर आक्रमण कर दिया.
> नादिरशाह के आक्रमण का स्वरूप
नादिरशाह ने 1738 ई. में भारत पर आक्रमण करने के लिए ईरान से रवाना हुआ और तेजी से आगे बढ़कर काबुल पर अधिकार कर लिया और काबुल से उसने पुनः अपना दूत दिल्ली भेजा जिसकी हत्या कर दी गई. इस पर वह जलालाबाद होता हुआ लाहौर आया और उस पर बिना किसी विशेष प्रतिरोध का सामना किए अधिकार कर लिया. अब उसका अधिकार पूरे पंजाब पर हो गया और इसके बाद वह दिल्ली की ओर आगे बढ़ा.
मुहम्मदशाह ( मुगल बादशाह) स्वयं नादिरशाह का सामना करने के लिए सेना सहित आगे बढ़ा और करनाल के निकट (पंजाब में) फरवरी 1739 ई. में दोनों सेनाओं में संघर्ष हुआ, जिसमें मुहम्मदशाह पराजित हो गया तथा उसे गिरफ्तार कर दिल्ली लाया गया.
नादिरशाह के दिल्ली आने के बाद उसका भव्य स्वागत किया गया तथा बादशाह स्वयं उसकी सेवा में रहा. इसी बीच दिल्ली निवासियों ने नादिरशाह के कुछ सैनिकों की हत्या कर दी, जिस पर नादिरशाह ने कत्लेआम का आदेश दे दिया. इस पर ईरानी सिपाहियों ने दिल्ली में भयंकर लूटपाट एवं नागरिक मारे गए. नादिरशाह को दिल्ली की इस लूट में मारकाट मचा दी और हजारों की संख्या में दिल्ली के निर्दोष लगभग 3 करोड़ रुपए हाथ लगे. नादिरशाह लगभग एक माह तक दिल्ली में रुका रहा और वही इस समय वास्तविक मई, 1739 ई. को वह अफगानिस्तान के लिए रवाना हो गया शासक था. उसने अपने नाम से खुतबा पढ़वाया. अन्त में 5 तथा जाने से पूर्व उसने मुहम्मदशाह को पुनः मुगल ताज सौंप दिया तथा बदले में उसे मुहम्मदशाह ने कश्मीर, सिन्ध, थट्टा तथा सिन्धु नदी के पश्चिम का इलाका उसे सौंप दिया.
> नादिरशाह के आक्रमण का प्रभाव
नादिरशाह के आक्रमण के निम्नलिखित प्रभाव पड़े–
1. नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल साम्राज्य के विघटन को तय कर दिया.
2. मुगलों की विदेशियों में प्रतिष्ठा गिर गई.
3. मुगलों के इस आक्रमण से उनकी राजनीतिक, आर्थिक, प्रशासनिक, सामाजिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा.
4. ट्रांस सिन्धु क्षेत्र पर नादिरशाह का प्रभाव स्थापित हो गया, इसके साथ ही लाहौर पर से मुगलों का अधिकार समाप्त हो गया.
5. नादिरशाह के आक्रमण ने मुगल अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया. वह अपने साथ कोहिनूर, मयूर सिंहासन, 15 करोड़ रुपये नकद, हीरे, जवाहरात, हाथी, घोड़े, ऊँट और अन्य सामान भी ले गया.
6. नादिरशाह के आक्रमण ने दिल्ली को लाशों एवं राख के ढेर में बदल दिया तथा जनता की नजरों में मुगल सल्तनत की प्रतिष्ठा समाप्त हो गई और इसी आक्रमण से प्रेरणा लेकर अहमदशाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया.
> अहमदशाह अब्दाली के भारत पर आक्रमण के कारण या पानीपत के तृतीय युद्ध के कारण
पानीपत का तृतीय युद्ध भारत के निर्णायक युद्धों में से एक है. इसने भारतीय इतिहास की दिशा को बदल दिया. इस महत्वपूर्ण युद्ध के लिए उत्तरदायी कारण निम्नलिखित थे—
1. मुगलों की पतनोन्मुख स्थिति का लाभ उठाकर मराठों में अपनी शक्ति का विस्तार उत्तर की ओर कर लिया. उनकी सीमाएँ दिल्ली एवं पंजाब को छूने लगीं तथा वे इस समय तक मुगल राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे और अब उनका प्रयास दिल्ली में मुगलों की सत्ता को समाप्त कर उस पर अपना अधिकार जमाना था.
2. नांदिरशाह के बाद अहमदशाह अब्दाली ने अफगानिस्तान पर अपना अधिकार जमा लिया और अब वह मुगलों की दुर्बलता का लाभ उठाकर भारत पर आक्रमण कर इसके धन को लूटना चाहता था.
3. इसके अतिरिक्त अब्दाली बंगेश के पठानों की सहायता करना चाहता था, क्योंकि उन्होंने हिन्दुस्तानी मुसलमानों के विरुद्ध उससे सहायता की माँग की थी.
4. अहमदशाह अब्दाली ने 1756 ई. में भारत पर एक बड़ा आक्रमण किया और वह कश्मीर, पंजाब होता हुआ दिल्ली पहुँच गया तथा उसे जी भर कर लूटा तथा मुगल बादशाह से पंजाब, कश्मीर, सिन्ध और सरहिन्द के क्षेत्रों को ले लिया. उसने जाट राजा सूरजमल पर भी आक्रमण किया तथा उसने दिल्ली में अपना प्रतिनिधि मीरवख्शी नजीबुद्दौला को नियुक्त कर वापस चला गया.
5. 1757 ई. में मराठा सरदार रघुनाथ राव ने मराठा सेना सहित दिल्ली में प्रवेश किया तथा दादशाह ने मराठों से सन्धि कर ली और मीरवख्शी नजीबुद्दौला को उसके पद से हटा दिया गया. नजीदुद्दौला ने दिल्ली छोड़कर शुकरताल में शरण ली तथा इस घटना की सूचना उसने अब्दाली को भेज दी. मराठों ने नजीवुद्दौला के स्थान पर अहमद वंगेश को मीरवख्शी नियुक्त करवा दिया.
6. मराठों ने अब दिल्ली से आगे बढ़कर पंजाब के सरहिन्द और लाहौर पर अधिकार कर लिया तथा अब्दाली के पुत्र तैमूर को भागने पर मजबूर कर दिया. मराठों ने अदिनाबेग को पंजाब का सूबेदार नियुक्त कर दिया और 1758 ई. को मराठे वापस लौट गए.
7. 1759 ई. को अहमदशाह अब्दाली ने मराठों को नष्ट करने तथा मुगल बजीर को सबक सिखाने के उद्देश्य से दोआब और दिल्ली की ओर आगे बढ़ा, जिसे रोकने के लिए मराठों को आगे आना पड़ा और इसी का परिणाम था— पानीपत का तृतीय युद्ध.
> युद्ध का स्वरूप
अब्दाली पंजाव पर अधिकार करके जव दोआब की ओर आगे बढ़ा तब उसका मार्ग मराठा सेनापति दत्ताजी सिन्धिया ने रोका, लेकिन वे बरारी घाट के निकट हुए युद्ध में 1760 ई. में मारे गए. अव्दाली का मार्ग रोकने में मल्हारराव होल्कर एवं जानकोजी सिन्धिया भी असफल रहे तथा अब्दाली दिल्ली की ओर बढ़ता रहा.
ऐसी स्थिति में पेशवा ने सदाशिवराव भाऊ के नेतृतव में अब्दाली का मुकाबला करने के लिए एक बड़ी सेना भेजी जिसने दिल्ली पर अधिकार कर लिया. इस समय तक अब्दाली पानीपत तक पहुँच गया था. अतः मराठों ने दिल्ली छोड़कर उसका मुकाबला पानीपत के मैदान में करना उचित समझा.
लगभग एक माह तक दोनों सेनाएँ आमने-सामने डटी रहीं तथा छोटी-मोटी झड़पें होती रहीं, लेकिन 14 जनवरी, 1761 के दिन दोनों सेनाओं में भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें मराठे बुरी तरह पराजित हो गए उनके सभी महत्वपूर्ण सेनानायक मारे गए तथा हजारों सैनिकों को जान से हाथ धोना पड़ा. इस युद्ध में मराठों की शक्ति एवं देश में मराठा राज्य स्थापित करने का स्वप्न भंग कर दिया. सरदेसाई ने इस युद्ध के विषय में लिखा है कि, "मराठा देश में ऐसा कोई घर नहीं था, जिसमें किसी-न-किसी का शोक न मनाया गया हो. वास्तव में मराठों के लिए यह युद्ध राष्ट्रीय विपत्ति के समान था. "
> युद्ध का परिणाम एवं महत्व
पानीपत का तृतीय युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धों में से एक है. इस युद्ध के अनेक दूरगामी परिणाम निकले. इस युद्ध ने मराठा शक्ति को नष्ट कर दिया. उनके सभी योग्य सेनापति इस युद्ध में मारे गए. पेशवा बालाजी इस पराजय को बरदाश्त नहीं कर सके और सदमे के कारण उनकी मृत्यु हो गई. इसका एक परिणाम यह रहा कि, मराठा संघ छिन्न-भिन्न हो गया तथा पेशवा की प्रतिष्ठा कम हो गई. बचे हुए मराठा सरदारों ने अपनी स्वतन्त्र सत्ता की स्थापना कर ली.
मराठों की इस स्थिति का लाभ उठाकर सिख, जाट एवं राजपूताना के राज्य स्वतन्त्र हो गए. दक्षिण में हैदराबाद के निजाम एवं मैसूर में हैदरअली ने अपनी शक्ति का विस्तार किया.
पंजाब एवं सिन्ध से मुगलों का अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो गया. स्वयं मुगल बादशाह शाहआलम द्वितीय की हालत इतनी खराब हो गई कि, वह 12 वर्षों तक निर्वासित जीवन व्यतीत करने पर विवश हो गया. दिल्ली में बजीर ही बादशाह की तरह शासन करता रहा.
इसी बीच अंग्रेजों ने मुगलों एवं मराठों की कमजोरियों का लाभ उठाकर बंगाल एवं कर्नाटक में अपनी सत्ता स्थापित कर ली और उत्तर भारत की ओर अपना प्रभाव बढ़ाने लगे. इस युद्ध ने यह भी प्रमाणित कर दिया कि, मुगल राज्य के पतन के बाद कम-से-कम मराठे उनका स्थान नहीं लेंगे. इस प्रकार मुसलमानों एवं मराठों की प्रतिद्वन्द्विता ने अंग्रेजों को भारत पर अधिकार जमाने का सुनहरा अवसर प्रदान कर दिया.
> मराठों के पराजय के कारण पानीपत का तृतीय युद्ध
पानीपत के तृतीय युद्ध (1761 ई.) में मराठों की पराजय के निम्नलिखित कारण थे
(1) मराठा साम्राज्य विस्तार ने मराठों को अहंकारी बना दिया तथा उनमें आपसी विद्वेष की भावना घर करने लग गई. पेशवा अपने स्वार्थों की पूर्ति में ही लगा रहता था. फलतः उनके आपसी मतभेदी ने मराठों की शक्ति को कमजोर कर दिया.
(2) मराठों ने इस युद्ध से पूर्व अनेक सैनिक भूलें की. उन्होंने अब्दाली की सेना पर तुरन्त आक्रमण नहीं किया इससे अब्दाली को अपनी व्यूह रचना बनाने का अवसर मिल गया. मराठा सेना छापामार युद्ध-प्रणाली में प्रवीण थी, जबकि उन्होंने इस नीति का सहारा न लेकर अब्दाली के विरुद्ध मैदानी युद्ध लड़ा.
(3) मराठा सेना संख्या बल की दृष्टि में भी अब्दाली की सेना से कम थी. उनके पास तोपची एवं कुशल घुड़सवारों की संख्या भी अब्दाली की संख्या से कम थी. मराठा सैनिक, विभिन्न सरदारों के अधीन कार्य करते थे. अतः उनमें सामंजस्य का अभाव सदैव बना रहता था.
(4) अफगानों ने मराठा सेना के रसद पहुँचाने के मार्ग को बन्द कर दिया, जिससे उनकी स्थिति दुर्बल हो गई. इसके साथ ही उन्हें किसी भी शक्ति का समर्थन प्राप्त नहीं हो सका. मुगल बादशाह इस समय बिहार में था तथा रुहेले अवध के सूबेदार अब्दाली के समर्थक बन गए थे. राजपूत मराठों से नाराज थे. मराठों की लूटमार की नीति के कारण उन्होंने अपना जन-समर्थन भी खो दिया था.
(5) अहमदशाह अब्दाली इस सभी के विपरीत अपनी कुशल सेना और सेनापतित्व, उचित रणनीति एवं व्यूह रचना तथा अपने मित्रों के सहयोग से मराठों जैसी दुर्जेय शक्ति को कुचलने में सफल हो सका.
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