राजीव गांधी : एक युवा प्रधानमंत्री : (सहानुभुति, संक्रमण तथा बोफोर्स का बवंडर)
1. राजीव गाँधी तथा सहानुभति की राजनीति तथा “भारतीय राजनीति के संक्रमण कार्य का आरम्भ "
31 अक्टूबर 1984 की सुबह की इंदिरा गांधी जी उस समय प्रधानमंत्री की पूर्वनिर्धारित एक टेलीविजन साक्षात्कार के रिकॉर्डिंग के लिए अपने आवास से कार्यालय की ओर पैदल चल पड़ी। कुछ दूर आगे बढ़ने पर उनके दो सुरक्षा गार्डों ने उनके ऊपर गोलियां बरसाई। यह जून 1984 में स्वर्ण मंदिर से सिख आतंकवादियों को निकालकर बाहर करने के लिए तथाकथित बदले के रूप में देखा गया। इंदिरा गांधी की कुछ ही घण्टों में ण्डै में मृत्यु हो गई। राजीव गांधी पश्चिम बंगाल में थे।
राजीव गांधी को प्रणव मुखर्जी के बदले (जो एक स्वाभाविक उम्मीदवार कहे जाते थे) प्रधानमंत्री बना दिया गया। ऐसे कहा जाता है कि तथाकथित रूप से राजीव गांधी की प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयारी नहीं थी उनकी पत्नी सोनिया गांधी भी इसके विरोध में थी क्योंकि उन्हें लगता था कि राजीव का जीवन अधिक महत्वपूर्ण है।
संजय गांधी की मृत्यु (1980) के बाद राजीव गांधी को राजनीति में लाया गया। जून 1981 में उन्हें अमेठी लोकसभा के उपचुनाव में संजय गांधी के द्वारा रिक्त हुई सीट पर खडा किया गया था। उन्हें जीत मिली तथा इंदिरा गांधी जी द्व ारा उन्हें 1982 में दिल्ली में एशियाई खेल संगठित करने के जिम्मेदारी सौंप गयी। 1983 में दो महासचिव बनाए गए थे। अब तो उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर विभिन्न समस्याओं से अवगत होना था।
31 अक्टूबर 1984 के बाद प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए ही राजीव गांधी को यह सलाह दी गई कि प्रधानमंत्री नए चुनाव की घोषणा कर दं, वैसे 1985 में चुनाव नियत था। 1984 कं दिसम्बर में ही चुनाव करवाने का फैसला किया गया। कांग्रेस को सहानुभूति लहर का लाभ मिला तथा 415 सीटें मिली।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद यानी 31 अक्टूबर 1984 से लेकर 3 नवम्बर 1984 तक दिल्ली में सिखों पर जो जुल्म हुए वह भारत के स्वतंत्र्योत्तर इतिहास की सबसे भयानक त्रासदी, अन्याय तथा सरकार की महान विफलता के रूप में याद किया जाता है। सिखों के घर भी जला दिए गए। दिल्ली की सड़कों पर हजारों सिखों की हत्या कर दी गई। कहा गया कि इसमें कई कांग्रेस नेताओं तथा कार्यकर्त्ताओं की जमात शामिल थी जो ये दंगे करवा रहे थे। इसमें एक नेता सज्जन कुमार का नाम प्रमुख रूप से था जिन्हें कुछ ही दिनों पहले न्यायपालिका के द्वारा उम्र कैद की सजा मिली है। पुलिस ने इन दंगों पर अपनी आंखें बंद कर दी तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव जी के इस बयान पर कि “जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है" की बहुत ही संदेहास्पद तथा विस्मयी मानकर आलोचना भी हुई। परन्तु यह पूरी तरह से साफ शब्दों में स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि राजीव गांधी का यह बयान सिख दंगों से संबंधित था। सिखों को पड़ोसी हिन्दुओं ने बचाया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 3 नवम्बर को इंदिरा गांधी का अंतिम संस्कार किया गया। राजीव गांधी कुछ पीड़ित जगह पर गए भी। भारत के कुछ और राज्यों जैसे कानपुर और बोकारों में अहिंसा कुछ कम स्तर पर दोहराई गई।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दूसरा जो सबसे बड़ा काण्ड हुआ उसे भोपाल गैस ट्रेजडी के रूप में जाना जाता है। करीब 6 हजार लोग मारे गए। इनमें अधिकतर मजदूर थे। यह घटना यूनयिन कार्बाइड कंपनी की एक Chemical plant से 'मिथायम आइसो साइनेट गैस' निकलने से हुई। मुख्य अभिकर्ता तथा कंपनी के मालिक एंडरसन को रातों-रात विशेष विमान से भगा दिया गया। लम्बे मुकदमों के बाद कोई भी परिणाम सामने नहीं आया तथा कोई न्याय नहीं मिला। तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने अपनी जीवनी में यह लिखा कि एंडरसन को भगाने का राज मेंरे चिता के जलने के साथ ही खाक हो जाएगा।
राजीव गांधी की प्रशासनिक कार्य की शुरूआत पंजाब और असम के साथ समझौते से हुई। राजीव गांधी ने अपने विजन में एक तकनीकी भारत को प्रमुखता देने की बात कही तथा यह कहा कि भारत को इक्कीसवी सदी का राष्ट्र बनाने के लिए तकनीकी साधन उपलब्ध कराना होगा तथा इसके लिए हमें कई योजनाएं आरंभ करनी होंगी। उन्होंने कई योजनाएं जैसे कि साक्षरता मिशन, ग्रामीण पेयजल अभियान, टीकाकरण जैसे अभियान की शुरूआत भी की। अब हमारी राजनैतिक बहस का आधार बदल गया था तथा केन्द्र में इन सारे अभियानों को लेकर चर्चा शुरू की गई थी।
राजीव गांधी ने अपने मित्र सैम पित्रोदा से मिलकर तकनीकी क्रांति को आरम्भ करने की बात की तथा उनसे संबंधित तकनीक आयात पर घरेलू कर खत्म या कम कर दिया। विद्यालयों में कम्प्यूटरों की शिक्षा को बढ़ाने की बात कही गयी इसके अलावा राजीव गांधी ने पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिलाने के लिए भी असफल प्रयास किए। जनवरी 1989 में 8000 प्रतिनिधियों के साथ एक पंचायती सभा का सम्मेलन किया।
सामाजिक योजनाओं में उन्होंने एक जवाहर रोजगार योजना की शुरूआत की। केन्द्र सरकार की तरफ से इन्होंने 80% पैसे देने की भी बात कही इस योजना में गरीब ग्रामीण परिवार के कम-से-कम एक सदस्य को साल में 50 से 100 दिनों के लिए रोजगार प्रदान करना था।
राजीव गांधी सरकार ने 1980 में एक नयी शिक्षा नीति बनायी तथा इसके अन्तर्गत साक्षरता अभियान ब्लैक बोर्ड अभियान दूर शिक्षा तथा नामांकन सुविधा जैसे कार्यक्रम को इसमें शामिल किया गया। महिलाओं को पंचायती राज में 30 फीसदी आरक्षण की बात भी कही गयी। महिलाओं से संबंधित राष्ट्रीय योजनाएं आरम्भ हुई जिनमें दहेज विरोधी दण्ड अधिनियम 1986 तथा महिलाओं के लिए नये आयोग को भी प्रस्तावित किया गया।
राजीव गांधी ने एक नया पर्यावरण मंत्रालय बनाया तथा बड़े पैमाने पर गंगा सफाई के लिए गंगा एक्शन प्लान की शुरूआत की। इसका परिणाम क्या हुआ ? पता नहीं पर यह एक अच्छी शुरूआत थी।
राजीव गांधी ने वैश्विक तौर भारत मेला आयोजित किया तथा अपने देश की विरासत तथा बहुमूल्य मूर्तियों तथा संग. हित वस्तुओं का प्रदर्शन भी बहुत सारे देशों में किया गया। आलोचक कहते हैं कि इस प्रदर्शन में हमारी बहुत प्राचीनतम धरोहर कभी देश नहीं लौट पाई। थोड़ा बहुत पर्यटन में इस मामले से लाभ मिला तथा बुनियादी तौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति की विविधता को सामने लाने में मदद मिली। भारत ने विश्व के विभिन्न विभागों में क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र कायम किए तथा हमारी परम्पराओं को विश्व के और भी देशों के नागरिकों से अवगत कराया।
राजीव गांधी ने अपने शासन काल में यह प्रयास किया कि कांग्रेस के अन्दर तथा नौकरशाही व्यवस्था में फैल रहे भ्रष्टाचार को समाप्त कर दिया गया जाए। इसके लिए उन्होंने कई स्तर के पारदर्शी रवैये अपनाने का सुझाव दिया। उन्होंने दल-बदल विरोधी एक्ट को लाने की सोची तथा 1985 में 52वें संविधान संशोधन को पास किया गया। इसमें यह कहा गया कि किसी भी पार्टी के संसदीय दल में से एक तिहाई सदस्य अगर चाहेंगे तभी ही दूसरे दल में जाकर किसी सरकार का समर्थन कर सकते हैं या नया दल बना सकते हैं। अगर एक तिहाई सदस्यों में से कम कोई भी ऐसी कोशिश करेगा तो उनकी सदन की सदस्यता खत्म हो जाएगी।
राजीव गांधी ने इसके अलावा लोक अदालतें उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विकास की रूपरेखा बनाने की कोशिश की। राजीव गांधी के कैबिनेट में वित्तमंत्री वी०पी० सिंह के रूप में एक ऐसा नेता था जिसने राजीव गांधी के सहयोग से कई बड़े घराने में छापे मरवाए तथा भ्रष्टाचार (विशेषकर वित्तीय अपराध) के विरोध में एक हवा बनी।
दिसम्बर 1985 में कांग्रेस के शताब्दी समारोह में राजीव गांधी ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि कांग्रेस के अन्दर सत्ता के दलालों की फौज भरी हुई है। यह एक ऐसी स्थिति थी जब किसी सबसे बड़ी पार्टी के मंच पर उसी के प्रध नमंत्री के द्वारा अपनी ही पार्टी का सामना दिखाया गया था। राजीव गांधी ने यह कहा कि मैं इन सत्ता के दलालों से कांग्रेस को मुक्त करूंगा। तथा कांग्रेस को नये रूप से जीवित करूंगा। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस भाषण तथा विशेष रूप से ऐसे विषय पर भाषण को पसंद नहीं किया। वरिष्ठ नेताओं ने यह कहा कि ऐसे मंच का प्रयोग अपनी विरासत को प्रशंसित करने के लिए होता है न कि अपनी नाकामी दिखाने का।
2. बोफोर्स का भूत और राजीव गांधी की हार
राजीव गांधी ने रक्षा के क्षेत्र में काफी अधिक मात्रा में नये प्रयास किए तथा इस क्षेत्र ने सशस्त्र सेनाओं के आध · निकीकरण की इजाजत दे दी। जिसमें प्रतिरक्षा खर्चा दो गुना हो गया। श्रीमति इंदिरा गांधी ने 1938 में ही अब्दुल कलाम जी के ओजस्वी नेतृत्व में मिसाइल कार्यक्रम विकास का आरम्भ करवा दिया गया था। राजीव ने इसे आगे बढ़ाया तथा त्रिशुल अग्नि फोर्स जैसी मिसाइलों के विकास ए०पी० जे० अब्दुल कलाम ने सरकार के निर्देश में पूरे किए। भारतीय नौसेना का भी काफी विस्तार किया गया। सोवियत संघ से लीज पर पनडुब्बी ली गयी तथा ब्रिटेन में हवाई जहाज की खेप ली गयी। स्वीडन से होविट्जर गन मिले और अर्जुन टैंक विकसित किया गया। राजीव गांधी के शासन के अंतिम दो वर्षों में सरकारी खर्चे का 5 वां हिस्सा प्रतिरक्षा पर खर्च हो रहा था। इसी बीच बोफोर्स का जिन्न निकला तथा भारत की राजनीति सदा के लिए बदल गयी। बोफोर्स के आरम्भ में फेयर फैक्स तथा भ्वॅ पनडुब्बी खरीददारी हुई। फेयर फैक्स विवाद राजीव गांधी जी के वित्तमंत्री वी०पी० सिंह द्वारा एक अमरिकी डिटेक्टिव एजेंसी फेयरफैक्स की नियुक्ति में खड़ा हुआ। फेयरफैक्स को भारत के नागरिको के द्वारा विदेशी बैंकों में विदेशी मुद्रा के गैर कानूनी रूप से जमा करने की जाँच का काम सौंपा गया था।
एक पेपर इसी एजेंसी को मिला जिससे पता लगता था कि प्रधानमंत्री के गहरे मित्र अभिताभ बच्चन भी इसमें शामिल थे। इसके विरोध में अंबानी वाडिया परिवार भी आ गए। वी० पी० सिंह का मंत्रालय बदल गया। जहां एक तरफ प्रध कानमंत्री ने इस बदलाव को एक समय की मांग बताया वहीं विपक्ष ने राजीव जी का यह कहकर घेराव किया कि राजीव ने अपने मित्र अभिताभ को बचाने के लिए वी०पी० सिंह को वित्त मंत्रालय से हटा दिया है। वी० पी० सिंह चुपचाप अपना काम करते रहे। इसी बीच एक और मामला चर्चा में आ गया। भारत ने पश्चिम जर्मनी से 1981 में 4 पनडुब्बीयां खरीदी थी। वह दो और खरीदना चाहता था और कीमतों में कुछ कटौती की मांग की। लेकिन जहाज यार्ड ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उसे बिक्री पर 7 फीसदी की भारी ड्यूटी देनी पड़ती है। वी०पी० सिंह ने, जो उस समय रक्षा मंत्री थे, बिना राजीव से पूछे जांच का आदेश दे दिया। राजीव गांधी आंतरिक रूप से इसे एक गैर जिम्मेदार कदम मान गए क्योंकि 1981 में यह 7 फीसदी की नई ड्यूटी वाली स्थिति इंदिया गांधी के रक्षा मंत्री बनते हुए की गई थी। वी०पी० सिंह को आंतरिक रूप से अकेलापन का सामना करना पड़ा ( कैबिनेट के आंतरिक स्तर पर) विरोधी पक्ष एवं मीडिया ने इसे वी०पी० सिंह की बहादुरी और शासन पद्धति में एक इमानदार नेता की छवि पेश की तथा जल्द ही उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। अब राजीव गांधी और वी०पी० सिंह की तुलना होने लगी। राजीव गांधी को मीडिया को भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने वाले एक व्यक्ति के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया था वहीं वी०पी० सिंह को एक महान इमानदार नेता के तौर पर दिखाया गया जिसे भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सजा दी गई थी।
वी० पी० सिंह के इस्तीफे के बाद एक और घटना घटी जो सबसे सूचित तथा अब तक के सबसे चर्चित 'बोफोर्स घोटाला' के नाम से जाना जाता है।
वी० पी० सिंह त्याग पत्र देकर निकल चुके थे। कुछ दिनों बाद 16 अप्रैल 1987 को स्वीडिश रेडियो पर एक खबर प्रसारित की गई कि फ्रांसीसी तोप के मुकाबले स्वीडन की बोफोर्स कंपनी की 410 तोपे खरीदने के लिए भारतीय अफसरों एवम् कांग्रेस पार्टी के सदस्यों को 60 करोड़ रूपयों की बराबरी की राशि घूस के रूप में दी गयी। इन सभी आरोपों को भारतीय समाचारों पत्रों ने बहुत ही रूचि से प्रकाशित किया। खासकर अंग्रेजी समाचार पत्र जैम भ्पदकन तथा जैम प्दकपंद माचतमे ने। जैम भ्पदकन के सम्पादक छण् त्ड तो ल्वनदह ठतंअम श्रवनतदंसपेज कहलाने लगे। राजीव गांधी की प्रखर आलोचना होने लगी इधर दूसरे मुद्दे ने एक बडा बवंडर का रूप ले लिया। विपक्षी दल राजीव गांधी तथा गांधी परिवार पर पैसे लाने का आरोप लगाने लगे। इटालियन व्यापारी तथा रक्षा एजेंट क्वात्रोची को लेकर विपक्ष लगातार राजीव गांधी परिवार को घेरने लगा। राजीव गांधी अब रक्षात्मक भाव में थे तथा उन्हें कोई भी जबाब देते बन नहीं रहा था। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को भी राजीव गांधी के तत्कालीन व्यवहार से परेशानी रहती थी। हमेशा वह कहा करते थे कि एक प्रध नमंत्री के रूप में महामहिम से नियमित मिलने से हिचक है। अब इस स्थिति में राष्ट्रपति भी अधिक से अधिक राजीव गांधी पर दवाब देने की कोशिश करने लगे। इसके अलावा पंजाब तथा मिजो समझौते की जानकारी देने की परम्परा का निर्वाह भी राजीव के द्वारा वही देने से वे काफी नाराज थे।
अब राष्ट्रपति राजीव गांधी के कैबिनेट को बर्खास्त करने की सोचने लगे। विरोधी पार्टी के समूचे तथा राजीव गांधी के कुछ निजी दुश्मनों ने भी राष्ट्रपति को पत्र लिखकर बर्खास्तगी की मांग की। लेकिन वी०पी० सिंह ने ऐसी किसी भी स्थिति में प्रधानमंत्री पद पर जाने से इन्कार कर दिया।
जैसे तैसे डेढ़ साल बीता तथा 1989 के वर्ष जो एक चुनावी वर्ष था, फिर से मुद्दे उभर आए। नियंत्रक एवम् महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट ने तोपों के चुनाव तथा अन्य कई मुद्दों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। ऐसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने राजीव को बरी कर दिया था। लेकिन बैकी रिपोर्ट को लेकर विपक्षी दलों ने राजीव गांधी को आड़े हाथों ले लिया तथा इस रिपोर्ट को सबूत बनाकर पेश करने लगी। तथा इनके इस्तीफे की मांग करने लगी। इसके बाद तो ये मांग बहुत ही अधिक आक्रामक हो गयी लोकसभा में सामूहिक रूप से सदस्यों इस्तीफे दिए जाने लगे तथा यह कहा गया था कि एक भ्रष्टाचारी सरकार अब नहीं चल सकती वैसे चुनाव बहुत नजदीक था इसलिए इन सांसदों के त्यागपत्र को बहुत बड़े त्याग के रूप में नहीं देखा जा सकता है। अब चुनाव आ चुका था तथा प्रधानमंत्री अपनी जिम्मेदारी के 5 वर्ष पूरे करने वाले थे।
राजीव ने कुछ ऐसे संकल्प लिये थे जिनमें आधुनिकीकरण तथा वैज्ञानिकता शामिल है, के लिए प्रशंसा भी की गई लेकिन अपने विचार को बदल लेने की बार-बार की आदत ने उन्हें अपनी माँ तथा नेहरू से थोड़े अलग रूप में देखा। वह भावावेश में आकर बयान दे देते थे।
एक बार तो उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेस में अपने विदेश सचिव को पत्रकारों के सामने ही खूब खरी-खरी सुनायी तथा बर्खास्त कर दिया। ऐसी घटनाओं से उनके बारे में एक पक्ष की धारणा ऐसी बन गयी थी कि वे एक कठोर तथा अनुभवहीन प्रधानमंत्री है।
नवम्बर 1989 में चुनाव की घोषणा कर दी गयी। इस बार कांग्रेस के खिलाफ हवा थी । वी०पी० सिंह एक विकल्प के रूप में उभर चुके थे। 1987 में कांग्रेस से निकाले जाने के बाद वी. पी. सिंह के द्वारा चलाया गया अभियान जनता के मूड को छू गया। भ्रष्टाचार का मुद्दा तो गावं- गांव में पहुंच गया था। खासकर हिन्दी भाषी राज्यों में वी. पी. सिंह ने बहुत मेहनत की तथा व्यापक समर्थन हासिल करने की दहलीज पर खड़े हो गए।
वी.पी. सिंह ने राजीव गांधी को निजी तौर पर न पसंद करने वाले नेताओं को अपने पक्ष में किया जैसे आरिफ मो. हम्मद खान अरूण नेहरू वी. सी. शुक्ला सातपाल मलिक इत्यादि । असंतुष्टों ने 2 अक्टूबर 1987 को 'जन मोर्चा' बनाया।
वी.पी. सिंह ने अपने सिद्धांत को वामपंथी दलों के नजदीक बताया तथा सबसे से भी विनम्र संबंध बनाकर रखा। उनके संबंध आडवाणी जी और अटल जी से काफी व्यक्तिगत थे । वी. पी. सिंह की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा ही थी कि वामपंथ और दक्षिणपंथ साथ आकर वी. पी. सिंह का समर्थन करने लगे। 1998 में इलाहाबाद में उपचुनाव हुए जब से अमिताभ जी ने इस्तीफा देकर राजनीति से सन्यास ले लिया था वहां वी. पी. सिंह खड़े हुए तथा भाजपा ने अपना कोई उम्मीदावार नहीं दिया।
वी.पी. सिंह जीत गए तथा अटल जी के साथ उन्होंने जीत की खुशी में मंच भी साझा किया। उस मंच पर ज्योति बसु भी उपस्थित थे। यह एक बड़ी घटना थी तथा आने वाले समय का एक दृश्य भी।
भाजपा को एक अवसर मिला जिससे अपने अछूत वाले दाग को वह धो सके। राजनीति की मुख्यधारा में उनकी भूमिका बढ़ गयी। 1989 में चुनाव हुए तथा भाजपा को 86 सीटें मिली। 6 अगस्त 1988 को राष्ट्रीय मोर्चा बन गया तथा 11 अक्टूबर 1988 को जनता दल का निर्माण हुआ तथा भाजपा से 85 सीटों पर चुनावी तालमेल तथा अन्य सीटों पर वामपंथी पार्टियों से तालमेल बना।
1989 के चुनाव में राष्ट्रीय मोर्चे को 146 सीटें मिली तथा भाजपा को 86 सीटें मिली तथा बामदलों को 52 सीटें मिली। वामपार्टी तथा भाजपा ने वी. पी. सिंह को समर्थन दे दिया तथा राजीव गांधी की हार हो गई। वी.पी.सिंह प्रधानमंत्री बन गए।
3. राजीव गांधी की विदेश नीति संबंधी कुछ महत्वपूर्ण पहल
राजीव गांधी ने भारतीय विदेश नीति को एक अलग रूप देने के लिए कई गंभीर प्रयास किए तथा यह कहा गया कि वह गुटनिरपेक्षता तथा सार्वभौमिक सहअस्तिव की भावना को साथ में ले चलना चाहते हैं।
1984 में राजीव गांधी ने 6 देशों के शिखर सम्मेलन बुलाने की घोषणा की। उन्होंने निःशस्त्रीकरण के प्रयास को गंभीर रूप से आगे बढ़ाने की कोशिश की तथा तत्कालीन सोवियत संघ के नेता गोर्वाचोव से भी मिले। नवम्बर 1986 गोर्वाचोव ने भारत की यात्रा की तथा एक अहिंसक विश्व की अवधारणा प्रस्तुत की। दिल्ली की यह घोषणा न्छ० तक पहुंच गयी तथा जून 1988 में यह वैश्विक लक्ष्य रखा गया कि 2010 तक विश्व के सभी देशों को नाभिकीय हथियार समाप्त कर देना चाहिए।
राजीव गांधी ने महाशक्तियों के साथ संबंध बेहतर करने का प्रयत्न किया तथा यह कहा कि एक प्रयोगात्कम नीति के तहत वैश्वीकरण उचित है। लोगों ने एक युवा प्रधानमंत्री के तौर पर राजीव गांधी को विपक्षी के निशाने पर रहने वाला अमेरिका के मुक्त व्यापार नीति के सामने झुकने वाला बताया। 1985 में उन्होंने अमेरिका की यात्रा की तथा यह यात्रा सफल रही रीगन ने राजीव गांधी की यह बात मान ली कि मौसम संबंधी आंकड़े देने के लिए अमेरिका भारत को सुपर कम्प्यूटर देगा। वैसे अमेरिका पाकिस्तान का उस समय सबसे अच्छा मित्र होता था।
1988 में राजीव गांधी ने चीन की यात्रा की तथा यह स्वतंत्रता के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की दूसरी यात्रा थी या फिर यह कह ले कि 1962 के विश्वासघात के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। संबंध अच्छे हुए और इतने अच्छे कि एक सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत, चीन में लोकतंत्र की मांग करने वाले छात्रों की जून 1989 को तिएन-ऑन-चौक पर की गई हत्या की आलोचना भी न कर सका। यह एक नयी मित्रता की प्रतिष्ठा कहिए या लोकतंत्र का दुर्भाग्य परंतु भारत अपनी नई मित्रता को किसी कीमत पर बर्बाद नहीं करना चाहता था।
राजीव गांधी की विदेश नीति का सबसे असफल भाग पड़ोसियों के साथ संबंध को लेकर कहा जाता है। राजीव गांधी के काल में बांगलादेश एक प्रकार के इस्लामी संस्कार में उलझ गया था। पानी को लेकर भारत के साथ उनके संबंध ऐसे ही खराब हो गए थे पाकिस्तान की स्थिति भी ठीक नहीं थी । नेपाल के साथ अलग से समस्या उत्पन्न हो गई नेपाल की सरकार ने भारतरीय माल पर भारी टैक्स लगा दिए तथा चीनी सामान पर टैक्स में कटौती कर दी। 1988 में नेपाल-चीन संबंध अपने उफान पर था। 1988 में ही नेपाल को चीन से भारी मात्रा में हथियार भी मिले । नेपाल ने भारतीय निवासियों को परमिट लेकर रहने को कहा जबकि भारत में लाखों नेपाली नागरिक बिना परमिट के रह रहे थे। भारत सरकार ने मार्च में (1989 में) आर्थिक नाकेबंदी कर दी।
सबसे अधिक चर्चा करनी आवश्यक है श्रीलंका, भारत तथा राजीव गांधी की स्थिति यहीं आकर बहुत गलत तरीके से फंस गई। 1983 में हजारों तमिल भागकर श्रीलंका से तमिलनाडु आ गए। तथा जापान में लिट्टे के आधार क्षेत्र में श्रीलंका की सेना ने इन पर काफी दमनात्मक कारवाई आरंभ कर दी। लिट्टे तमिल स्वायत्ता की लड़ाई लड़ रहा था। तमिलनाडु की अधिकांश जनता इन तमिल शरणार्थियों की भावनात्मक मदद कर रही थी क्योंकि भाषा के आधार पर एक प्राकृतिक जुड़ाव था। तमिल जनता की मांग का समर्थन तमिलनाडु की जनता कर रही थी। जाफना पर श्रीलंका सरकार ने नाकेबंदी कर दी तथा दैनिक जरूरतों की चीजें भी जाफना में पहुंचना मुश्किल हो गया तथा भारत ने मछली मारने वाले से सहायता पहुंचाना आरंभ किया जिसका भी श्रीलंका की नौसेना ने विरोध किया तथा रोक लगा दी।
इसके बाद भारत ने मालवाहक हवाई जहाजों से वहां जरूरतों का सामान भेजना आरंभ किया मतलब गिराना आरंभ किया। श्रीलंका ने यहां से सामान जाने की इजाजत दे दी। लेकिन विद्रोह जारी रहा तथा श्रीलंका सरकार ने यह महसूस किया कि भारत की सहायता के बिना इस समस्या से निजात पाना संभव नहीं है। श्रीलंका के राष्ट्रपति जयबर्द्धने तथा राजीव गांधी के बीच बातचीत आरंभ होने शुरू हुई तथा जुलाई 1987 में एक समझौते पर पहुंचा गया। इस समझौते के तहत श्रीलंका के उत्तरी और पूर्वी प्रदेश एक ही प्रदेश का हिस्सा होंगे, अधिकारों का वितरण होगा तथा लिट्टे को भंग कर दिया जाएगा। हथियार जमा करने की एक समय सीमा दी जाएगी। यदि लंका की सरकार आग्रह करती है तो भारतीय सेना सहायता को पहुंचेगी। स्ण्ज्ज्ज्यम् इस समझौते से खुश नहीं था। श्रीलंका सरकार पर उसे एकदम विश्वास नहीं था तथा उसने आत्म समर्पण से इनकार कर दिया। इस बीच अब श्रीलंका के राष्ट्रपति को यह महसूस हुआ कि अब भारत से मदद मांग लेनी चाहिए। फौज की सहायता देने के लिए भारत तैयार हो गया। तमिल नाराज़ थे । जनगणना की स्थानीय परिस्थति के लिट्टे के लिए अनुकूल थी । श्रीलंका की जनता भी भारतीय फौज से बड़े स्तर पर खुश नहीं थी। प्रेमदासा जब राष्ट्रपति बने तो परिस्थति और भी जटिल हो गई तथा भारतीय फौज से देश से चले जाने को कहा। इसी बीच जब राजीव गांधी श्रीलंका की यात्रा कर रहे थे तो 'स्वागत सम्मेलन' में ही एक श्रीलंका के जवान ने उन पर हमला कर दिया। राजीव गांधी चरणबद्ध रूप से सेना को वापस करने पर राजी हो गए। 1989 के मध्य से फौज वापस होने लगी तथा 1989 के आम चुनाव के बाद फौज पूरी तरह वापस आ गयी।
श्रीलंका के इस संकट से भारत को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी तथा राजीव गांधी की मानव बम से हत्या कर दी गई।
राजीव गांधी की चर्चा ळ.15 के लिए भी की जाती है तथा यह उपर्युक्त है कि उनके प्रयास ने ळ.15 को खड़ा किया तथा ळ.7 का इसे विकल्प कहा गया। राजीव गांधी ने अपने 5 वर्ष के कार्यकाल को बहुत ही स्पष्ट तरीके से पेश किया तथा लगभग 62 देशों की यात्रा की । सही तौर पर कहा जाए तो भारत को विश्व पटल पर रखने की क्षमता सही रूप से राजीव गांधी के समय ही भारत की तरफ से उभरी।
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