भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, विचारधाराएँ तथा कार्यक्रम

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, विचारधाराएँ तथा कार्यक्रम

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, विचारधाराएँ तथा कार्यक्रम

> भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्य 
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों में मतैक्य नहीं है. श्री अयोध्यासिंह ने लिखा है कि “कांग्रेस का जन्म इसलिए हुआ कि ब्रिटिश शासक और उसके पैरोकार इसकी जरूरत अनुभव करते थे. यह राष्ट्रवादी आन्दोलन के स्वाभाविक विकास का परिणाम नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी आन्दोलन में साम्राज्यवादियों और उपनिवेशवादियों के हस्तक्षेप का परिणाम था." यह सत्य है कि कांग्रेस की स्थापना एक अंग्रेज सेवानिवृत्त अधिकारी ए. ओ. ह्यूम द्वारा की गई और इन्हें रिपन व डफरिन का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त था.
ह्यूम भारत में बढ़ते आन्दोलन एवं अशान्ति से चिन्तित थे. उनके सामने यह प्रमुख प्रश्न था कि ब्रिटिश सरकार के विरोधी आन्दोलनों को कैसे टाला जाए. इसके लिए ह्यूम ने एक ऐसी व्यवस्था के लिए प्रयास किया जो अंग्रेजों के लिए सुरक्षा वाल्व की तरह कार्य करे और भारतीय राष्ट्रवादियों को संघर्ष के मार्ग से जाने से रोक सके.
कुछ विद्वानों के अनुसार रूसी आक्रमण के भय से ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना की योजना बनाई. इस मत के समर्थक डॉ. नन्दलाल चटर्जी हैं, परन्तु उनका यह मत इस कारण से सही प्रतीत नहीं होता है कि 1885 ई. में भारत पर रूस के आक्रमण का खतरा था.
वास्तव कांग्रेस की स्थापना के पीछे राजनैतिक कारण अत्यधिक महत्त्वपूर्ण थे. शासक वर्ग से सम्बन्ध रखते हुए भी ह्यूम भारतवासियों का सच्चा हमदर्द था और इनकी दयनीय दशा में वह सुधार लाना चाहता था. यही कारण था कि भारतीय नेताओं ने भी, जो राष्ट्रीयता की भावना और अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेत हो रहे थे, ह्यूम के कार्यों में सहयोग दिया.
ह्यूम को नेताओं द्वारा सहयोग दिए जाने का एक कारण यह भी था कि ये लोग नहीं चाहते थे कि कोई संगठन बनने से पूर्व ही समाप्त हो जाए. ह्यूम या अन्य कोई भी अंग्रेज यदि इस संगठन की स्थापना करता है, तो अंग्रेजी सरकार को उस पर सन्देह नहीं होता. इसलिए ह्यूम कांग्रेस की स्थापना करने में सफल रहा.
28 दिसम्बर, 1885 ई. को बम्बई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत विद्यालय में कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता व्योमेशचन्द्र बनर्जी ने की तथा उसमें भारत के विभिन्न भागों के लगभग 72 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए.
इस सम्मेलन में कांग्रेस के उद्देश्यों की घोषणा की गई जो निम्नलिखित हैं – 
1. देश के हित तथा उन्नति में लगे सभी व्यक्तियों के बीच व्यक्तिगत घनिष्ठता और मैत्री स्थापित करना.
2. जातिगत, प्रान्तगत या धर्मगत विभेदों को मिटाकर राष्ट्रीयता की भावना को विकसित करना.
3. राजनीतिक एवं सामाजिक प्रश्नों पर शिक्षित वर्गों के मतों को व्यक्त करना. 
4. आगामी राजनैतिक कार्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत करना.
इसमें कहीं भी सरकारी नीतियों की आलोचना या विरोध की बात नहीं कही गई तथा महारानी विक्टोरिया की खूब प्रशंसा की गई.
कूपलैण्ड ने इसी कारण से लिखा है कि “कांग्रेस की स्थापना दुश्मन के रूप में नहीं, अपितु मित्र के रूप में हुई थी. "
> 1885 से 1905 ई. तक के बीच कांग्रेस के कार्यों का मूल्यांकन
अथवा
कांग्रेस के उदारवादी युग की समीक्षा कीजिए.
यह कांग्रेस का शैशवकाल था. अतः उसके द्वारा उस समय तुरन्त किसी बड़े राजनैतिक आन्दोलन की शुरूआत करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी.
इस काल में कांग्रेस का मुख्य कार्य राजनैतिक जागरण उत्पन्न करना था, क्योंकि प्रारम्भ में यह क्रान्तिकारी संगठन नहीं था. इस समय में इसकी बागडोर नरम राष्ट्रवादियों के हाथ में थी, जो अंग्रेजों की न्यायप्रियता में अटूट विश्वास करते थे तथा राजनीतिक जागरण के लिए वे अंग्रेजों का आभार मानते थे. इसलिए वैधानिक आन्दोलन द्वारा उन्होंने अपनी माँगों को मनवाने का प्रयास किया. इसके लिए उन्होंने प्रार्थना-पत्रों, स्मरण-पत्रों तथा प्रतिनिधिमण्डलों द्वारा ब्रिटिश सरकार से अपनी न्याययुक्त माँगों को मानने का आग्रह किया. इस काल की कांग्रेस की प्रमुख माँगें निम्नलिखित थीं—
1. धारा सभा का विस्तार हो तथा उसके सदस्य जनता द्वारा चुने जाएँ.
2. केन्द्रीय एवं प्रान्तीय धारा संभाओं में भारतीय सदस्यों की संख्या में वृद्धि हो.
3. न्याय व्यवस्था में ज्यूरी का प्रयोग हो.
4. परिषदों एवं उच्च नौकरियों में भारतीयों को स्थान मिले तथा इन्हें भी उच्च सैनिक शिक्षा दी जाए.
5. 1905 ई. में गोपालकृष्ण गोखले के द्वारा ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत स्वायत्त शासन की माँग की गई, जिसे 1906 ई. में कलकत्ता में दादाभाई नौरोजी ने दोहराया.
6. भूमि-कर को कम किया जाए.
7. सिंचाई की उचित व्यवस्था हो.
8. भारत से बाहर भेजे जाने वाले अनाज पर प्रतिबन्ध लगे एवं देशी उद्योग-धन्धों को प्रोत्साहन प्रदान किया जाए.
9. शासन के व्यय में कमी की जाए.
10. नमक कर को समाप्त कर दिया जाए.
कांग्रेस की इन माँगों पर अत्यधिक जोर था, लेकिन उन्हें इन पर विशेष सफलता नहीं मिली. उदारवादी लोग खुलकर अंग्रेजों का सामना नहीं कर सके, क्योंकि वे तत्कालीन परिस्थितियों में विवश थे, फिर भी इतना अवश्य ही कहा जा सकता है कि उदारवादियों के प्रयासों से ही भारत में राष्ट्रीयता की लहर का विकास हुआ तथा औपनिवेशिक स्वशासन एवं प्रशासनिक सुधार की माँग उठी. भारत को राजनैतिक प्रशिक्षण दिलाने का उन्होंने महान् कार्य किया.
कांग्रेस के उदारवादियों के प्रयासों से ही 1892 ई. का ‘भारत परिषद् अधिनियम’ पारित हो सका, जिसने स्वायत्त - शासी संस्थाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त किया.
उदारवादी कांग्रेस के प्रभाव से ही राष्ट्रवादियों के हृदय में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की भावना जागृत हुई.
उदारवादियों के कार्यों की समीक्षा करते हुए पट्टाभिसीतारमैया ने लिखा है कि "प्रारम्भिक राष्ट्रवादियों ने ही आधुनिक स्वतन्त्रता की इमारत की नींव डाली. उनके प्रयत्नों से ही इस नींव पर एक-एक मंजिल करके इमारत बनती चली गई. पहले उपनिवेशों के ढंग का स्वशासन फिर साम्राज्य के अन्तर्गत होमरूल इसके ऊपर स्वराज्य और सबसे ऊपर पूर्ण स्वाधीनता की मंजिलें बन सकी हैं."
> कांग्रेस में उग्रवादी आन्दोलन के उदय के कारण लिखिए. 
1892 से 1906 ई. तक इंग्लैण्ड में प्रतिक्रियावादी टोरी दल की सरकार के कारण किसी भी प्रकार के सुधार कार्य की आशा नहीं की जा सकती थी. 1892 ई. के सुधार कार्य अपर्याप्त एवं असन्तोषजनक थे. इसमें केन्द्रीय विधान-सभा की सदस्य संख्या की वृद्धि के बावजूद भी गैर-सरकारी सदस्य जनता द्वारा नहीं चुने जाते थे.
कांग्रेस अपनी माँगें निरन्तर माँगती रहती थी, जबकि सरकार उस पर कोई ध्यान नहीं देती थी. इसके कारण कांग्रेस को अपनी नीति बदलने के लिए विवश होना पड़ा. तिलक ने तो यहाँ तक कह दिया था कि माँगने से कोई चीज नहीं मिलती, उसके लिए तो कठोर दबाव ही डालने पड़ते हैं "
इस काल में अनेक बार भयंकर सूखे एवं अकाल पड़े, जिसमें लाखों लोग भूख से मारे गए. इससे भारतीय जनता का क्षुब्ध होना स्वाभाविक था. ठीक इसी समय पूना तथा बम्बई में प्लेग फैल गया. प्लेग कमिश्नर रैण्ड ने अधिक बहुत अत्याचार किए, जिस पर चापेकर बन्धुओं ने उसकी हत्या कर दी. तिलक षड्यन्त्र करने के आरोप में जेल में डाल दिये गये, जिससे सारा राष्ट्र उत्तेजित हो गया.
इस समय देश में भयंकर गरीबी थी तथा जनता में आर्थिक असन्तोष व्याप्त था. अंग्रेजों ने देशी उद्योगों को नष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यहाँ के धन को लूटकर वे इंगलैण्ड लेकर चले जाते. अतः युवकों द्वारा व कांग्रेस की नई पीढ़ी द्वारा इसका विरोध करना स्वाभाविक था.
भारत में उग्रवादी आन्दोलन के उदय के लिए हिन्दू-धर्म का पुनरुत्थान भी उत्तरदायी है. तिलक, विवेकानन्द, दयानन्द आदि नेताओं ने भारतीय हिन्दू धर्म की प्राचीनता और उसके गौरव को स्थापित कर देश के युवकों में जागृति ला दी, जिससे सारा राष्ट्र शोषण के विरुद्ध उठकर खड़ा हो गया.
1905 ई. में अंग्रेजों ने साम्प्रदायिकता के आधार पर बंगाल का विभाजन कर आग में घी का काम किया. इससे समूचा राष्ट्र असन्तोष के तूफान में घिर गया और लोग आन्दोलन पर उतारू हो गए.
उग्रवाद को उभारने में इस समय के अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रम ने भी योगदान दिया. अफ्रीका के देश अबीसीनिया ने 1896 ई. में इटली को हरा दिया तथा 1905 ई. में छोटे से एशियाई देश जापान ने रूस जैसी शक्ति को पराजित कर यूरोपीय अजेयता का मिथक तोड़ दिया. इससे अब को भी विश्वास हो गया कि यूरोपीय अंग्रेज अजेय नहीं हैं.
इस प्रकार स्पष्ट है कि उपर्युक्त कारणों से भारतीय राजनीति में उग्रवाद का जन्म हुआ तथा कांग्रेस में एक नए दल का गठन हुआ जो गरम दल कहलाया. इस दल की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती चली गई.
> स्वदेशी आन्दोलन क्या था ? स्पष्ट कीजिए.
1905 ई. में लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल का विभाजन कर दिए जाने पर भारत में चारों तरफ इसके विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई. इस विभाजन के लिए प्रशासनिक सुविधा के नाम पर कर्जन द्वारा बहाना बनाया गया था, परन्तु उसका वास्तविक उद्देश्य हिन्दू एवं मुसलमानों को आपस में लड़ाना था व मुसलमानों के लिए एक पृथक् राज्य का निर्माण करना था.
इसके विरोध के लिए 7 अगस्त, 1905 ई. को कलकत्ता के टाउन हाल में एक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें लोगों ने एक प्रस्ताव पास करके विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की शपथ ली. उसके बाद इस बहिष्कार में प्रत्येक वर्ग के लोग सम्मिलित हो गए व विदेशी कपड़ों की होली जलाई जाने लगी. विदेशी जूते, कागज, दवाइयाँ, चीनी, सिगरेट और यहाँ तक कि नमक को भी लोगों ने छूने से इनकार कर दिया. विद्यार्थियों ने विदेशी माल की दुकानों पर धरना दिया. श्रमिकों ने बहिष्कार के समर्थन में हड़ताल की बंगाल में रेल-कर्मचारियों तथा मजदूरों (पट्सन उद्योग ) और सरकारी प्रेस के कर्मचारियों ने भी हड़ताल की. 1906 ई. तक यह आन्दोलन पूरे बंगाल में फैल चुका था.
इस आन्दोलन का दूसरा पक्ष यह था कि उसमें बहिष्कार के साथ-साथ स्वदेशी का भी प्रचार किया गया. इसके प्रमुख नेता अरविन्द घोष, रबीन्द्रनाथ टैगोर, विपिनचन्द्र पाल आदि थे. कपड़ा उद्योग को इस आन्दोलन द्वारा विशेष गति मिली. हथकरघा उद्योग एवं वस्त्रों के कारखानों में वृद्धि हुई. 1905 ई. में प्रथम औद्योगिक सम्मेलन रमेशचंद्र दत्त के नेतृत्व में बनारस में हुआ. पी. सी. राय ने प्रसिद्ध 'बंगाल केमिकल स्वदेशी स्टोर' खोला. अनेक बीमा कम्पनियाँ व बैंक स्थानीय जमींदारों व जागीरदारों के सहयोग से खोले गए. इससे देशी अर्थव्यवस्था की प्रगति हुई तथा विदेशी वस्तुओं के आयात में भारी गिरावट आई.
इस आन्दोलन ने सामाजिक उत्थान के लिए गाँवों के पुनरुद्धार का आह्वान किया. अश्विनी कुमार दत्त ने अपनी संस्था 'स्वदेश-बान्धव समिति द्वारा बारीसाल में गाँवों में विकास का कार्यक्रम चलाया तथा मुकदमों का निपटारा पंचायत के द्वारा करवाया गया. समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को भी दूर करने का प्रयास किया गया.
स्वदेशी आन्दोलन ने राष्ट्रीय शिक्षा के विकास को भी बढ़ावा दिया. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राष्ट्रीय स्कूल व कॉलेज खोले गए तथा पहला राष्ट्रीय स्कूल रंगपुर में 1905 ई. में खोला गया. छात्रों पर की जा रही दमनात्मक कार्यवाही के विरुद्ध शचीन्द्रनाथ बसु ने एण्टी-सेक्यूलर सोसाइटी की स्थापना की. इसी प्रकार डॉन सोसायटी बनी. 1906 ई. में बंगाल नेशनल स्कूल खोला गया. देशी भाषाओं में अनेक समाचार पत्र प्रकाशित किए गए.
यह आन्दोलन बंगाल के अलावा महाराष्ट्र में भी बड़ी उग्रता के साथ चला. उसके अलावा बर्मा एवं रावलपिण्डी में भी इसका असर हुआ. आर्य समाज ने पंजाब में इस आन्दोलन को चलाया.
सरकार ने जिस आन्दोलन को पहले गम्भीरता से नहीं लिया था, उसने अब विद्रोहियों के खिलाफ दमनात्मक कार्यवाही प्रारम्भ की. छात्रों को इस आन्दोलन से पृथक् रखने के लिए कार्लाइल-सरक्यूलर निकाला गया. सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों को चेतावनी दी गई कि वे अपने छात्रों को आन्दोलन से दूर रखें, अन्यथा उनकी सहायता बन्द कर दी जाएगी.
सरकार ने राजद्रोहात्मक बहिष्कार सभाओं को रोकने, विस्फोटक पदार्थों के उपयोग को बन्द करने, अखबारों पर प्रतिबन्ध लगाने तथा अभियुक्तों की जमानत न होने देने के लिए कानून बनाए. इसके अलावा सरकार ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को उभारने का प्रयत्न किया और 1906 ई. में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना करवा दी. धीरे-धीरे मुसलमान इस आन्दोलन से पृथक् होने लगे और अंग्रेज सरकार ने सुधार कार्यों को करने का नाटक किया.
अंग्रेजों की इस कार्यवाही से कांग्रेस में स्पष्टतया दो दल बन गए –(i) नरम दल, (ii) गरम दल.
इन दोनों दलों में स्पष्टतया विभाजन सूरत अधिवेशन (1907 ई.) में हो गया.
> गरम दल व नरम दल के मध्य हुए संघर्ष को निरूपित कीजिए : टिप्पणी
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन के 1905-06 ई. के समय में कांग्रेस के युवा वर्ग का कांग्रेस की हाथ पसारने व उसकी भिक्षावृत्ति की नीति एवं अंग्रेजों की न्याय-निष्ठा में थोड़ा-सा भी विश्वास नहीं रहा. अतः उसने कांग्रेस के लिए उग्र कार्यक्रम जैसे स्वदेशी, बहिष्कार आदि रखे. इस दल के प्रमुख नेता बालगंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय एवं विपिनचन्द्र पाल थे.
1905 ई. के बनारस अधिवेशन में गरम दल के नेताओं ने विद्रोह का झण्डा उठा दिया. 1906 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में कांग्रेस में विभाजन लगभग तय हो गया, परन्तु दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता के कारण तथा उनके द्वारा कांग्रेस का लक्ष्य स्वराज्य घोषित कर देने से गरम दल के लोग शान्त हो गए.
1907 ई. के सूरत के कांग्रेस अधिवेशन में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक अध्यक्ष बनना चाहते थे, परन्तु उदारवादियों ने अपने बहुमत में होने के कारण रासबिहारी बोस को अध्यक्ष बना दिया. बोस के भाषण देने से पूर्व ही कांग्रेस के इस अधिवेशन में जूते-चप्पल चलने लगे तथा मारपीट हो गई, जिसके कारण यह अधिवेशन स्थगित हो गया व उग्रवादी लोग कांग्रेस से पृथक् हो गए. दोनों दलों में यह पृथक्ता 1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन तक चलती रही.
> क्रान्तिकारी आन्दोलन क्या था ? स्पष्ट कीजिए.
कांग्रेस के उग्रवादी एवं उदारवादी लोगों से पृथकू एक अन्य विचारधारा का उदय बंगाल विभाजन व अंग्रेजों की दमनात्मक नीति के विरुद्ध हुआ, जिसे हम आतंकवादी विचारधारा कह सकते हैं, जिनका विश्वास था कि तलवार हाथ में लो और सरकार को मिटा दो, ये लोग बम व गोली की राजनीति में विश्वास करते थे.
आन्दोलन का प्रारम्भ एवं विस्तार – इस क्रान्तिकारी आन्दोलन के प्रमुख क्षेत्र पंजाब, बंगाल एवं महाराष्ट्र थे. बंगाल में इसके नेता बारीन्द्र कुमार घोष व विवेकानन्द के छोटे भाई भूपेन्द्रनाथ दत्त थे. इन लोगों ने 'युगान्तर' एवं 'संध्या' नामक पत्रिका द्वारा उग्रवाद का प्रचार किया और इससे कई और गुप्त क्रान्तिकारी संस्थाएँ स्थापित होने लगीं. ऐसी ही एक संस्था अनुशीलन समिति बनी, जिसकी शाखाएँ पूरे बंगाल में फैल गई. श्यामजी कृष्ण वर्मा तथा लाला हरदयाल ने लन्दन में भी क्रान्तिकारी संस्थाएँ स्थापित की.
इसी प्रकार 'साधना-समाज' नाम से पुलिन बिहारी दास ने एक गुप्त संस्था स्थापित की.
इन आतंकवादी लोगों का प्रमुख कार्य बदनाम एवं दमनकारी अंग्रेज अफसरों की हत्या करना था तथा इसके साथ ही धन के लिए सरकारी खजाने को लूटना भी था.
क्रान्तिकारियों ने 1907 ई. के दिसम्बर माह में मिदनापुर के उप-गवर्नर की रेलगाड़ी को बम से उड़ाने का प्रयास किया. इसी वर्ष फरीदपुर के मजिस्ट्रेट को गोली मारकर घायल कर दिया गया. मुजफ्फरपुर के मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड की हत्या करने का कार्य खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ल चाको को सौंपा गया. इन लोगों ने 30 अप्रैल, 1908 ई. को किंग्सफोर्ड के बंगले की ओर से आती हुई एक बग्गी पर बम फेंका, परन्तु दुर्भाग्य से उसमें किंग्सफोर्ड नहीं था. उसमें मिस्टर एवं मिसेज केनेडी थे, जिनकी मृत्यु हो गई. इस घटना के दो माह बाद ही अरविन्द घोष, बारीन्द्र कुमार घोष और कई अन्य लोग गिरफ्तार कर लिए गए और उन पर अलीपुर षड्यन्त्र केस का मुकदमा चलाकर कन्हाई लाल एवं सत्येन्द्र को फाँसी दे दी गई तथा बारीन्द्र को काले पानी की सजा, अरविन्द घोष को छोड़ दिया गया. इसके कुछ दिनों बाद इस मुकदमे की पैरवी करने वाले वकील आशुतोष विश्वास को गोली मार दी गई. नन्दलाल नामक पुलिस दरोगा और शमशुल आलम नामक डिप्टी- पुलिस सुपरिटेण्डेट को भी क्रान्तिकारियों ने सजा के तौर पर गोली मार दी.
पंजाब में 1907 ई. में सरदार अजीतसिंह, भाई परमानन्द, बालमुकुन्द और लाला हरदयाल ने क्रान्तिकारियों को संगठित किया, 1912 ई. में रासबिहारी बोस ने वायसराय लॉर्ड हार्डिग्स पर बम फेंका, जिससे वह घायल हो गया. इसी प्रकार महाराष्ट्र में श्यामजी कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर और गणेश सावरकर ने संगठन बनाया. बिनायक सावरकर ने 'अभिनव भारत' की स्थापना कर उसके माध्यम से क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन किया. 1909 ई. में गणेश सावरकर को आजीवन कारावास की सजा मिली तथा इसी वर्ष इस मुकदमे के जज को गोली मारकर हत्या कर दी गई.
दमन कार्य – सरकार ने आतंकवाद से घबराकर जबरदस्त दमनकारी उपायों का सहारा लिया. लाला लाजपतराय तथा सरदार अजीत को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. तिलक को बर्मा में मॉडले जेल में डाल दिया गया. सभी प्रकार की सभाओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. इसी प्रकार समाचार पत्र अधिनियम बनाया गया. इन कानूनों की कठोरता को लॉर्ड मार्ले ने वीभत्स, अत्यन्त उग्र और अनुचित बताया. सरकार की दमनकारी नीति का परिणाम उल्टा हुआ और क्रान्तिकारी गतिविधियाँ बढ़ती ही गईं.
अंग्रेजी सरकार ने दमन नीति के अलावा सुधार कार्य भी किए और 1909 ई. का मिण्टो-मार्ले सुधार लाया गया, जिसका नरम दलीय राजनीतिज्ञों ने हृदय से स्वागत किया, परन्तु जब यह क्रियान्वित किया गया तब चारों ओर निराशा व्याप्त हो गई तथा क्रान्तिकारी आन्दोलन बढ़ता गया. राजनैतिक हत्या, डकैतियाँ आम हो गईं. 1913 ई. में जब जर्मन-बंगाली षड्यन्त्र का पता चला, तो गरम दल के कुछ नेता गिरफ्तार कर लिए गए तथा कुछ लोग विदेश चले गए. इस प्रकार क्रान्तिकारी आन्दोलन कुछ समय के लिए निस्तेज हो गया.
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