जनजाति आन्दोलन एवं किसान आन्दोलन

जनजाति आन्दोलन एवं किसान आन्दोलन

जनजाति आन्दोलन एवं किसान आन्दोलन

जनजाति आन्दोलन
> सरदार आन्दोलन (1858-95) को संक्षेप में स्पष्ट कीजिए.
1857 ई. के बाद छोटा नागपुर क्षेत्र में संरदार आन्दोलन बड़े व्यापक पैमाने पर मुण्डा, ऊराँव एवं ईसाइयों द्वारा किया गया. 'सरदार' वे लोग थे, जो आदिवासियों के परम्परागत अधिकारों को दिलाने के लिए प्रयासरत् थे.
कारण — इस आन्दोलन का सबसे प्रमुख कारण ईसाई मिशनरियों द्वारा धर्म प्रचार के कारण ईसाई बनने वाली मुण्डा एवं ऊराँवं जनजातियाँ थीं. इन लोगों ने मिशनरियों की सहायता से अपनी छीनी गयी जमीनें जमीदारों से वापस ले लीं. इससे जागीरदारों एवं जनजाति समुदायों के सम्बन्ध कटुता से भर गये. इसके अलावा ब्रिटिश कम्पनी ने 1860 ई. में जमीन का सर्वेक्षण कराकर आदिवासियों को 'भूइनहारी' जमीनें उन्हें वापस कर दी गयीं.
1867 ई. में असन्तुष्ट मुण्डा लोगों ने विरोध-प्रदर्शन कर लगभग 14,000 मुण्डाओं ने हस्ताक्षर युक्त एक आवेदन बंगाल सरकार के पास भेजा, जिसमें इस क्षेत्र के राजा पर उन्होंने उन्हें जमीन से बेदखल करने का आरोप लगाया. अतः ब्रिटिश सरकार ने 1869 ई. में छोटा नागपुर कास्तकारी अधिनियम पारित कर सर्वेक्षण की व्यवस्था पुनः लागू कर दी. यह कार्य 1880 ई. तक चला तथा बहुत से विवादास्पद मामले मुलझा लिये गये, परन्तु आदिवासी अब इसका लाभ उठाकर बहुत-सी जमीन भूइनहारी में परिवर्तित कराने लगे, क्योंकि इस जमीन का कर बहुत कम था.
इसी बीच लगान की राशि एवं जमींदारों को दिये जाने वाले करों को लेकर विवाद उठ खड़ा हो गया. ईसाई मिशनरियों ने अब आद्विवासियों के जमीन-सम्बन्धी मामलों में अधिक रुचि लेना प्रारम्भ कर दिया, जिससे सरदार अब उनकी सहायता से अधिक सुविधाओं की माँग करने लगे. फलतः जमींदारों और आदिवासियों में संघर्ष प्रारम्भ हो गया.
आन्दोलन का प्रारम्भ -- आन्दोलन के प्रारम्भ होते ही सरदारों ने नारा दिया 'आधा काम, आधा दाम' अर्थात् आदिवासी अपनी जमीन के आधे भाग के लिए 'बेगार' एवं आधे भाग के लिए 'लगान' (कर) देना चाहते थे. वे जंगल पर भी अपना अधिकार समझते थे. वे ब्रिटिश सरकार को कर देने को तैयार थे, परन्तु स्थानीय जमींदारों एवं राजा को कर देने को तैयार नहीं थे. वास्तव में यह आन्दोलन अहिंसात्मक था तथा सरदारों ने गवर्नर तथा अन्य ब्रिटिश अधिकारियों को अनेक आवेदन पत्र दिये. बाद में सरदारों के प्रभाव में आकर मुण्डा एवं ऊराँव के लोगों ने संघर्ष के रास्ते को अपनाकर जमीनों पर कब्जा किया और हिंसक संघर्ष भी. लेकिन इन्होंने कभी-भी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती नहीं दी, स्थानीय जमींदारों को इन्होंने लगान देना भी बन्द कर दिया. ईसाई आदिवासियों ने मिशन, चर्च एवं स्कूलों का बहिष्कार किया.
सरकार ने पुलिस द्वारा इनका दमन किया तथा अनेक आदिवासियों को कैद कर लिया. 1890 ई. में लेफ्टिनेंट गवर्नर ने इस क्षेत्र की यात्रा की तथा अनेक प्रकार की सहूलियत देने का वादा किया, लेकिन उनको पूरा न करने पर बाद में मुण्डा आन्दोलन इस क्षेत्र में चला.
> मुण्डा आन्दोलन
आन्दोलन का उद्देश्य — यह आन्दोलन मुख्य रूप से तीन बातों को एक साथ लेकर चला था. यह आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन तथा धार्मिक पुनरुत्थान चाहता था. आर्थिक रूप से यह जमींदारों से अपनी करमुक्त भूमि वापस लेना चाहता था. राजनीतिक परिवर्तन के रूप में यह अंग्रेजी राज्य को समाप्त कर 'मुण्डाराज' स्थापित करना चाहता था तथा एक नये धर्म की स्थापना भी करना चाहता था. इस आन्दोलन का सूत्रपात 1899 ई. में बिरसा मुण्डा के नेतृत्व में हुआ.
बिरसा मुण्डा द्वारा आन्दोलन का संगठन
बिरसा मुण्डा (1874-1900) एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति था, जिसे अपने आदिवासी भाइयों की जमींदारों द्वारा शोषण के कारण उनकी दयनीय दशा ने आन्दोलन करने की प्रेरणा दी. इस हेतु उसने नवयुवकों को संगठित कर स्वयं को भगवान् घोषित कर दिया तथा अपने को उसने अलौकिक शक्तियों का स्वामी भी बताया.
बिरसा मुण्डा अब मुण्डा आदिवासियों के लिए भगवान् बन गया तथा उसका प्रत्येक वाक्य उनके लिए ब्रह्म वाक्य बन गया. उसने यह घोषणा की कि शीघ्र ही प्रलय होने वाली है. शीघ्र ही विक्टोरिया राज्य समाप्त हो जायेगा तथा मुण्डाराज स्थापित होगा. अतः मुण्डा लोग अब किसी को भी किसी प्रकार का कर न दें. अब मुण्डाओं ने कर देना बन्द कर दिया.
सरकार ने बिरसा पर विद्रोह फैलाने तथा राजद्रोह करने का आरोप लगाकर 1895 ई. में जेल में बन्द कर दिया तथा 1897 ई. में यह पुनः रिहा कर दिया गया. इसके बाद बिरसा घूम-घूमकर गुप्त सभाएँ करता तथा मुण्डाओं को संगठित करने का प्रयास करता. उसने तीरंदाजों की एक फौज भी तैयार कर ली. इसके बाद 1899 ई. में क्रिसमस के दिन मुण्डा लोगों ने विद्रोह कर दिया.
चर्च पर मुण्डा हमले किये. अनेक अधिकारियों की हत्या कर दी. लोगों ने राँची एवं सिंहभूमि जिलों में थानों एवं अंग्रेज सरकार समर्थक एवं ईसाई बने मुण्डाओं को भी समाप्त करने का प्रयास किया गया. इस प्रकार मुण्डा आन्दोलन ने पूरे छोटा नागपुर क्षेत्र में आतंक का राज्य स्थापित कर दिया.
अब अंग्रेज सरकार ने पुलिस एवं सेना की सहायता से विद्रोह का दमन करना प्रारम्भ कर दिया. 1900 ई. में बिरसा की गिरफ्तार कर लिया गया तथा मुकदमे के दौरान ही हैजा हो जाने के कारण उसकी 9 जून, 1908 ई. में मृत्यु हो गयी. इससे यह आन्दोलन लगभग समाप्त हो गया. बिरसा के तीन प्रमुख सहयोगियों को फाँसी व अन्य अनेक लोगों को काले पानी की सजा दी गयी.
इस आन्दोलन के कुछ समय बाद ही सरकार ने आदिवासियों की जमीनों का सर्वेक्षण करवाकर 1908 ई. में 'छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम' पारित किया, जिससे मुण्डा लोगों को जमीन सम्बन्धी अधिकार मिले तथा उन्हें बेगार से भी मुक्त कर दिया गया. मुण्डा लोगों में बिरसा भगवान् की तरह ही लोकप्रिय हो गया.
> भील आन्दोलन
भील जनजाति पश्चिमी तट के खानदेश जिले के निवासी थे. 1812-19 ई. तक इन भीलों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. अंग्रेज अधिकारियों के अनुसार इस विद्रोह को पेशवा बाजीराव द्वितीय तथा उनके प्रतिनिधि त्रियम्बक जी दांगलिया ने उकसाया था. वास्तविकता यह थी कि भील लोग बढ़े हुए कृषि कर तथा नई अंग्रेज सरकार के भय से विद्रोह करने पर उतारू हुए थे.
अंग्रेज सेना की अनेक टुकड़ियों को इस विद्रोह को दबाने के लिए भेजा गया, जिससे भीलों में बहुत अधिक उत्तेजना फैल गयी और 1825 ई. में इन्होंने 'सेवरम' के नेतृत्व में पुनः विद्रोह कर दिया. यह आन्दोलन छिप-पुट रूप से 1846 ई. तक चलता रहा.
> संथाल विद्रोह पर प्रकाश डालिए.
संथाल लोग बिहार तथा बंगाल के सीमावर्ती इलाकों के निवासी थे. इस क्षेत्र में स्थाई बन्दोबस्त के कारण इनकी अधिकांश जमीन इनके हाथों से निकल गयी. अतः अब इन्हें अपनी आजीविका के लिए राजमहल की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी तथा यहाँ के जंगलों को काटकर इन्होंने भूमि को कृषि योग्य बनाया तथा इस क्षेत्र का नाम इन्होंने 'दमनीकोह' रखा.
ब्रिटिश सरकार ने इनके इस नये क्षेत्र दमनीकोह से भी लगान वसूलने के लिए व्यवस्था आरम्भ कर दी. इससे इस क्षेत्र में सरकारी कर्मचारियों, महाजनों आदि का प्रभाव बढ़ने लगा. ये लोग इन पर तरह-तरह के अत्याचार करते थे. इन लोगों के शोषण के कारण इनकी दशा अत्यन्त दयनीय हो गयी तथा अब इनका जीवन गुलामों के समान बन गया. इस क्षेत्र में जब रेलवे लाइन का विस्तार किया गया तब सरकारी कर्मचारी, पुलिस, थानेदार, जमींदार एवं महाजन सभी ने इनका शोषण प्रारम्भ कर दिया. फलस्वरूप विद्रोह अवश्यम्भावी हो गया.
1855 ई. में सिद्धू, कान्हू, चाँद और भैरव इन चार संथालों ने युवकों को संगठित कर उनकी धार्मिक भावनाओं को जगाया. सिद्धू ने स्वयं को सिद्ध पुरुष बताया और संथालों के भगवान् का अवतार घोषित कर दिया.
30 जून, 1855 ई. को 'भगताडीह' ग्राम में संथाल लोगों की एक सभा हुई तथा इस सभा में जमींदारों, महाजनों व अत्याचारों का विरोध करने को कहा गया व अंग्रेजी राज्य को समाप्त करने का संकल्प लिया गया.
जुलाई 1855 ई. में विद्रोह प्रारम्भ हो गया तथा अत्याचारी दरोगा 'महेशलाल' की हत्या संथालों द्वारा कर दी गयी. बाजार, दुकान आदि लूट लिये गये तथा थानों में आग लगा दी गयी. जगह-जगह सरकारी कार्यालयों, कर्मचारियों एवं महाजनों पर आक्रमण किये गये. भागलपुर एवं राजमहल के मध्य रेल, डाक और तार सेवा भंग कर दी गयी. संथालों ने अब अंग्रेजी राज की समाप्ति की घोषणा कर दी तथा अपना स्वतन्त्र शासन स्थापित कर लिया.
अब अंग्रेज सरकार ने विद्रोह को दबाने के लिए मेजर बरो के अधीन एक बड़ी सेना भेजी, जिसने क्रूरतापूर्वक संथालों का दमन करना प्रारम्भ कर दिया. संथाल लोग प्रशिक्षित अंग्रेज सेना के सम्मुख टिक नहीं सके और उनके नेता मारे गये, जिससे संथाल विद्रोह कमजोर पड़ गया और 1856 ई. तक समाप्त हो गया.
> किसान आन्दोलन
19वीं शदी के अन्तिम दशकों व 20वीं शदी के प्रारम्भिक दशकों में अपनी दयनीय दशा से क्षुब्ध होकर किसानों ने अनेक बार आन्दोलन किए. इनमें प्रमुख आन्दोलन निम्नलिखित हैं – 
(1) नील आन्दोलन
(2) मराठा विद्रोह
(3) पबना व मोपला विद्रोह
(4) चम्पारण व खेड़ा विद्रोह
> नील आन्दोलन क्यों प्रारम्भ हुआ ? तथा इसके स्वरूप व परिणामों की समीक्षा कीजिए.
कारण— नील ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापार का प्रमुख माल था. अतः अंग्रेजों ने प्रारम्भ में इसकी खेती को बढ़ावा यूरोपियन दिया, परन्तु धीरे-धीरे इसकी खेती का जिम्मा बागान मालिकों के हाथों में चला गया और इन्होंने शोषण के नए-नए उपायों को अपनाकर कृषकों की दशा को दयनीय बना दिया.
अंग्रेज बागान मालिकों ने किसानों को 2 रुपए प्रति बीघा की दर से अग्रिम राशि का भुगतान कर उन्हें नील की खेती करने को बाध्य किया. यह प्रथा उस समय ददनी प्रथा कहलाती थी. इस व्यवस्था में जमीन की माप तथा नील की कीमत का उल्लेख रहता था. इस व्यवस्था में किसानों द्वारा अग्रिम धन ले लेने से उन्हें नील की खेती से छुटकारा कभी भी नहीं मिल पाता था और उन्हें पुश्त-दर- पुश्त नील की खेती करनी पड़ती थी.
इस नील की खेती का एक अन्य महत्त्वपूर्ण हानिकर पक्ष यह था कि किसी खेत में यदि एक बार नील पैदा की जाती थी, तो उसमें कोई दूसरी खेती (फसल) नहीं की जा सकती थी. इस प्रकार किसानों की जमीनें नील की खेती से बर्बाद होने लगीं.
नील विद्रोह का अन्य उल्लेखनीय कारण यह भी था कि सरकार द्वारा निलहे साहबों को संरक्षण प्रदान किया गया था. 1830 ई. के एक कानून के अनुसार नील की खेती न करने वाले किसानों को गिरफ्तार कर लिया जाता था. नीलहे अफसर किसानों पर चाहे कितना भी अत्याचार करते उसकी अदालत में सुनवाई नहीं होती थी. अतः किसानों को भयंकर शोषण व अत्याचारों का सामना करना पड़ा, जिसके कारण नील किसानों ने विद्रोह कर दिया.
नील विद्रोह का स्वरूप – 1859-60 ई. में नील उगाने वाले किसानों का असन्तोष बहुत अधिक बढ़ गया और उन्होंने अग्रिम धन व नील की खेती करने से मना कर दिया. गाँव-गाँव में किसानों को संगठित कर उन्हें विद्रोह के लिए उकसाया. बागान मालिकों के नौकरों को नौकरी छोड़ने के लिए उकसाया गया. इसके साथ ही किसानों ने नीलामी में विरुद्ध मुकदमे में गवाही नहीं देता था. इससे किसानों में भाग लेना बन्द कर दिया. एक किसान, दूसरे किसान के एकता स्थापित हो गई और इससे किसानों को अपार जनसमर्थन मिलने लगा. दीनबन्धु मित्र ने 'नील दर्पण' नामक नाटक लिखा, जिसमें किसानों की दुर्दशा का वर्णन किया गया, इसी प्रकार 'हिन्दू पेट्रियाट' ने नीलहों के अत्याचारों की अनेक कहानियाँ प्रकाशित कीं.
इस विद्रोह का नेतृत्व भी किसानों द्वारा ही किया गया. दिगम्बर विश्वास और उनके भाई विष्णुचरण विश्वास तथा मालदा के रफीक मण्डल ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया.
नील विद्रोह का परिणाम – नील विद्रोह की उग्रता एवं उसकी व्यापकता के कारण सरकार ने समाधान निकालने के लिए 1860 ई. में नील आयोग का गठन किया गया, जिसके सम्मुख किसानों ने कहा कि “वे प्राण देकर भी नील की खेती नहीं करेंगे." इसने नीलहों के अत्याचारों का पर्दाफाश कर दिया. 'एकादश कानून बनाया गया जिसमें नील की खेती को जबरदस्ती नहीं करवाया जा सकता था. इस प्रकार यह किसानों की एक बहुत बड़ी विजय थी.
> मराठा विद्रोह : कारण, स्वरूप व परिणाम
कारण - महाराष्ट्र में रैयतवाड़ी भू-व्यवस्था के लागू होने से सरकार का जमीन के मालिकों से लगान के लिए सीधा सम्पर्क बनाया गया था तथा लगान न देने की स्थिति में किसान को अपनी जमीन छोड़ देनी पड़ती थी अथवा वह स्वयं इस जमीन को गिरवीं रखकर या बेचकर टैक्स (Tax) चुकाता था, चूँकि इस व्यवस्था में 'कर' की मात्रा बहुत अधिक होने के कारण वह इसे चुका नहीं पाता था. अतः किसान अक्सर सूदखोरों एवं महाजनों से ऋण लेते थे, जो बढ़ता ही चला जाता था. अतः सूदखोरों एवं महाजनों के अत्याचारों से बचने के लिए मराठों द्वारा यह विद्रोह किया गया.
1875 ई. तक इस व्यवस्था के चलते किसानों की दशा बहुत खराब हो गई थी तथा इसी समय इस इलाके में भयंकर अकाल पड़ गया और कपास तथा अन्य वस्तुओं की कीमतों में अधिक कमी आ जाने के कारण किसान उधार लिया गया, ऋण चुकाने की स्थिति में नहीं रहे. अब महाजनों ने उनकी जमीनें तथा घर तक बेचना प्रारम्भ कर दिया, जिससे उनके लिए अब विद्रोह के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं बचा.
विद्रोह का स्वरूप– महाजनों के अत्याचारों के विरुद्ध किसान 1874 ई. से ही संगठित होना प्रारम्भ हो गए थे तथा उनका सामाजिक बहिष्कार कर उन्हें गाँवों से बाहर खदेड़ने लगे थे. 1875 ई. में पूना जिले के सूपा नामक स्थान पर किसानों ने बड़ी संख्या में एकत्र होकर महाजनों को केवल भय दिखाकर उनसे अपने जमीन सम्बन्धी कागजात पर अधिकार करने का संकल्प लिया तथा अब किसानों ने महाजनों से अपने कागजात छीनकर उन्हें नष्ट करना प्रारम्भ कर दिया. उनके गोदामों व पशुओं के चारे में आग लगा दी. महाजन ऐसी स्थिति का सामना नहीं कर सके और वे गाँवों से पलायन कर गए.
ऐसी परिस्थिति में सरकार ने किसानों के विरुद्ध पुलिस बल का प्रयोग महाजनों के समर्थन में करना प्रारम्भ किया, लेकिन जन-आन्दोलन के सम्मुख पुलिस विफल रही. अतः सरकार ने सेना द्वारा किसानों का दमन करना शुरू किया. गाँवों पर सामूहिक जुर्माना किया गया और सैकड़ों किसानों को गिरफ्तार कर लिया गया.
> परिणाम
किसानों के इस विद्रोह के कारण सरकार को उनकी स्थिति पर ध्यान देने के लिए बाध्य कर दिया, जिससे 1878 ई. में 'दक्कन-उपद्रव आयोग का गठन किया गया, जिसने किसानों की दशा सुधारने एवं महाजनों के अत्याचारों को रोकने का सुझाव दिया और इस सुझाव पर 1879 ई. में ‘कृषक राहत अधिनियम’ बना, जिसमें किसानों की जमीनों को छीनने पर प्रतिबन्ध तथा कर्ज नहीं लौटाने पर गिरफ्तारी व्यवस्था की समाप्ति की.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, कृषकों ने अपने संगठित प्रयासों के द्वारा अपने लिए कुछ राहत पाने में सफलता पाई और यह उनकी विजय थी.
> पबना किसान आन्दोलन
यह आन्दोलन पबना क्षेत्र ( आधुनिक बांग्ला देश) में 1870-80 ई. में मुख्य रूप से स्थानीय जमींदारों एवं महाजनों के विरुद्ध हुआ.
पबना के इलाके में जमींदारों ने मनमाने ढंग से करों में वृद्धि की, जिससे किसानों की दशा निरन्तर दयनीय होती गई. इसके अतिरिक्त अन्य उपायों से भी इस क्षेत्र के किसानों का शोषण होता था. 1873 ई. में इस शोषण के विरुद्ध पबना के किसानों ने एक संघ का निर्माण किया तथा किसानों को संगठित करने के लिए किसानों ने गाँव-गाँव में सभाएँ कीं. जमींदारों से मुकदमे लड़ने के लिए उन्होंने धनराशि एकत्र की तथा कुछ समय के लिए किसानों ने जमींदारों को लगान देना बन्द कर दिया.
कुछ ही समय में पबना के किसानों के आन्दोलन से प्रेरित होकर ढाका, मैमनसिंह, फरीदपुर, राजशाही एवं त्रिपुरा के किसान भी संगठित होने लगे. जागीरदारों ने भी किसानों का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया, लेकिन उल्लेखनीय बात इस आन्दोलन में यह रही कि इससे कभी भी शांति भंग नहीं हुई तथा दोनों ही पक्षों से कोई हिंसात्मक कार्यवाही नहीं हुई
इस आन्दोलन की एक अन्य प्रमुख बात यह थी कि यह सरकार विरोधी न होने के कारण इसे सरकार का अप्रत्यक्ष समर्थन प्राप्त था. 1873 ई. में बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने किसान संगठनों को जायज ठहराया.
इस आन्दोलन को हिन्दू एवं मुसलमान दोनों वर्गों के मल्लाह एवं इशानचन्द्र राय थे. इस आन्दोलन के परिणामकिसानों का नेतृत्व मिला. इसके प्रमुख नेता शम्भू पाल, खुदी स्वरूप कृषकों को राहत देने के उद्देश्य से 1885 ई. में 'बंगाल कास्तकारी कानून' बना.
> मोपला विद्रोह
मद्रास के मालाबार तट पर बसे अधिकांश कृषक मुसलमान थे जिन्हें मोपला कहा जाता था. ये लोग अधिकतर मजदूर-वर्ग से थे व चाय-कॉफी के बागानों में काम करते थे.
मोपला लोग हिन्दू शासकों, जमींदारों एवं विदेशी अंग्रेजी सरकार तीनों से शोषित होते थे. 1857 ई. से पूर्व इन्होंने 22 बार आन्दोलन किया था. इसी प्रकार 1882-85, 1896, 1921 ई. में भी इन लोगों ने विद्रोह किया. बार-बार इस क्षेत्र में विद्रोह होने के कारणों का पता लगाने के लिए सरकार ने 1870 ई. में एक जाँच समिति गठित की, जिसने बताया कि 1862-80 ई. के मध्य इस क्षेत्र के किसानों पर जमींदारों द्वारा अतः जमीन बेदखली के मुकदमों एवं करों में वृद्धि हुई है. इसी शोषण के विरुद्ध मोपला लोगों का विद्रोह करना स्वभाविक था.
मोपला विद्रोह जब प्रारम्भ हुआ तब इसने बड़ा उग्र रूप धारण कर लिया. इन विद्रोहियों ने जमींदारों की सम्पत्ति लूट ली एवं जमींदारों की महिलाओं, बच्चों आदि तक की हत्या कर दी. इन लोगों में धार्मिक उन्माद भी व्याप्त हो गया तथा उन्हें उनके नेताओं ने भड़काया कि, इस आन्दोलन में मरने पर उन्हें सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होगी. मोपला पुलिस से भी नहीं डरते थे और मरने के लिए तैयार हो गए. उन्होंने छोटेछोटे गुटों में बँटकर इस क्षेत्र में भयंकर उत्पात एवं मारकाट मचा दी.
मोपला विद्रोहियों की उग्रता को देखते हुए सरकार ने भी क्रूरता का परिचय देकर इस विद्रोह को दबा दिया. इस आन्दोलन में संगठन सम्बन्धी कमजोरियों के कारण इसे बड़े किसानों का सहयोग एवं जन समर्थन प्राप्त नहीं हो सका, लेकिन कुछ समय बाद 1921 ई. में मोपलाओं ने पहले से भी अधिक भयंकर तरीके से विद्रोह किया, परन्तु सरकार ने सेना की सहायता से उनके विद्रोह को कुचल दिया.
यह मोपला विद्रोह की खास बात यह रही कि, आन्दोलन अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सका.
> चम्पारण किसान आन्दोलन
चम्पारण किसान आन्दोलन अंग्रेज निलहों के अत्याचारों एवं शोषण के विरुद्ध आन्दोलन था. अंग्रेज निलहों को इस क्षेत्र में जमीन ठेकेदारी पर दी गई थी, जिससे उन्होंने इस क्षेत्र के किसानों पर 'तीन कठिया' व्यवस्था लागू कर रखी थी. 'तीन कठिया' व्यवस्था में किसान को अपनी भूमि के 15% भाग पर नील की खेती करनी आवश्यक थी. इसके साथ ही वे अपनी उत्पादित नील निलहों के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं बेच सकते थे. अगर कोई इस व्यवस्था से मुक्त होना चाहता था, तो निलहों को एक बहुत बड़ी राशि 'तवान' के रूप में देनी पड़ती थी और उन्हें निलहों के यहाँ बेगार भी करनी पड़ती थी.
चम्पारण के किसानों ने 1905-08 ई. के मध्य पहली बार व्यापक तौर पर हिंसात्मक आन्दोलन का सहारा लिया, लेकिन सरकार के दमन के आगे उनकी चल न सकी और उनका यह प्रथम आन्दोलन कमजोर हो गया, परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी और उनका संघर्ष धीरे-धीरे चलता रहा.
इस क्षेत्र के कुछ सम्पन्न किसानों जैसे राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी को चम्पारण आने का निमन्त्रण भेजा. इस पर गांधीजी 1917 ई. में चम्पारण आए. उनके साथ डॉ. राजेन्द्र प्रसाद व अन्य कांग्रेसी कार्यकर्त्ता भी थे. गांधीजी ने किसानों की दुर्दशा को देखकर अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन चलाने का निश्चय किया. इससे उस क्षेत्र के किसानों में जोश एवं एकता की भावना उत्पन्न हो गई.
गांधीजी को अंग्रेजी सरकार ने तुरन्त गिरफ्तार कर लिया, परन्तु कुछ समय बाद उनकी लोकप्रियता को देखकर उन्हें रिहा करना पड़ा तथा किसानों की शिकायतों की जाँच करने के लिए सरकार ने जून 1917 ई. में एक समिति गठित कर गांधीजी को उसका सदस्य बनाया और इस समिति के सुझावों पर 'चम्पारण कृषि अधिनियम' बना, जिससे इस क्षेत्र की 'तीन कठिया' प्रणाली समाप्त कर दी गई. यह किसानों की बहुत बड़ी विजय थी और इसी विजय ने इस क्षेत्र के किसानों को राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने की प्रेरणा दी.
इस आन्दोलन का बहुत अधिक महत्त्व इसलिए हो जाता है कि इस आन्दोलन के माध्यम से गांधीजी ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया था तथा इस आन्दोलन की सफलता ने गांधीजी की लोकप्रियता में बहुत अधिक वृद्धि कर दी.
> खेड़ा किसान आन्दोलन 
खेड़ा का किसान आन्दोलन मुख्यतः बढ़ी हुई लगान ( राजस्व कर) के विरुद्ध था. इस क्षेत्र के किसान लगान रोककर अपने आक्रोश को व्यक्त करते थे, परन्तु 1918 ई. में जिससे उस क्षेत्र में भयंकर सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गई, किसानों ने करों में छूट की माँग की, लेकिन अंग्रेज राजस्व अधिकारी किसानों की इस माँग को मानने के लिए तैयार नहीं थे और कर देने के लिए उन्होंने किसानों को विवश करना प्रारम्भ कर दिया.
इस आन्दोलन में गांधीजी ने 1918 ई. में प्रवेश कर किसानों को संगठित कर सरकार के विरुद्ध सत्याग्रह करने को कहा. इस पर गांधीजी के प्रभाव के कारण किसानों ने सरकार को लगान देना बन्द कर दिया. किसी भी प्रकार की दमनात्मक कार्यवाही से यहाँ के किसान नहीं डरे. इससे सरकार को किसानों के समक्ष झुकना पड़ा और किसानों को करों में छूट दे दी गई. इस आन्दोलन का महत्त्व यह है कि गांधीजी के 'सत्याग्रह' का प्रयोग चम्पारण के बाद यहाँ भी सफल रहा.
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