नीति आयोग

13 अगस्त, 2014 को मोदी सरकार ने 65 वर्ष पुराने योजना आयोग को भंग कर इसके स्थान पर एक नये निकाय की निकट भविष्य में स्थापना की घोषणा की।

नीति आयोग

नीति आयोग

स्थापना

13 अगस्त, 2014 को मोदी सरकार ने 65 वर्ष पुराने योजना आयोग को भंग कर इसके स्थान पर एक नये निकाय की निकट भविष्य में स्थापना की घोषणा की। उसी के अनुरूप 1 जनवरी, 2015 को नीति आयोग (NITI Aayog, National Institution for Transforming India) की स्थापना योजना आयोग के उत्तराधिकारी के रूप में की गई।
उल्लेखनीय है कि नीति आयोग योजना आयोग की ही तरह भारत सरकार के एक कार्यकालीय संकल्प (केन्द्रीय मंत्रिमंडल) द्वारा सृजित निकाय है। इस प्रकार यह न तो संवैधानिक, न ही वैधानिक निकाय है। दूसरे शब्दों में, यह एक गैर-संवैधानिक अथवा संविधानेत्तर निकाय है, साथ ही एक गैर-वैधानिक (संसद के किसी अधिनियम द्वारा अधिनियमित नहीं) निकाय भी है।
नीति आयोग भारत सरकार की नीति निर्माण का शीर्ष प्रबुद्ध मंडल अथवा 'थिंक टैंक' है, जो निदेशकीय एवं नीतिगत दोनों प्रकार के इनपुट प्रदान करता है। भारत सरकार के लिए रणनीतिक एवं दीर्घकालीन नीतियों एवं कार्यक्रमों का प्रकल्प तैयार करते हुए नीति आयोग केन्द्र एवं राज्यों को प्रासंगिक तकनीकी सलाह भी देता है।
योजना आयोग युग की पहचान है नीतियों का केन्द्र से राज्य को एकतरफा प्रवाह है, जो कि अब राज्यों के वास्तविक एवं सतत् भागीदारी से प्रतिस्थापित हो गया है।
पूर्व के आदेश एवं नियंत्रण दृष्टिकोण में परिप्रेक्ष्यात्मक बदलाव के रूप में नीति आयोग अब विविध वैचारिक दृष्टिकोणों को संघर्षवादी रुख नहीं अपनाकर सहयोगात्मक स्थिति में समायोजित करता है। संघवाद की भावना के अनुरूप 'नीति' की अपनी नीतिगत सोच भी 'आधार से शीर्ष' न होकर 'शीर्ष से आधार' दृष्टिकोण के आधार पर रूपायित हो गई है। "

तर्काधार

64 - योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना का कारण स्पष्ट करते हुए भारत सरकार ने निम्नलिखित राय व्यक्त की, 'भारत पिछले छह दशकों के अंदर एक परिप्रेक्ष्यात्मक बदलाव से गुजरा है- राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, प्रौद्योगिकीय, साथ ही जनसांख्यिकीय रूप में। इस बीच राष्ट्रीय विकास में सरकार की भूमिका भी समांतर रूप में विकसित या परिवर्तित होती गई है। बदलते समय के साथ संगति बैठाते हुए भारत सरकार ने पूर्ववर्ती योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना भारत की जनता की आवश्यकताओं एवं आकांक्षाओं की पूर्ति बेहतर ढंग से करने के उद्देश्य से की। "
नई संस्था विकासात्मक प्रक्रिया के लिए उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेगी। सार्वजनिक क्षेत्र तथा भारत सरकार के सीमित दायरे से बाहर जाकर विकास के प्रति एक समग्र दृष्टि अपनाते हुए एक सामर्थ्यपूर्ण वातावरण को निर्मित एवं पुष्ट करेगी। इसके निर्माण के आधार निम्न होंगे:
  1. राष्ट्र के विकास में राज्य की बराबर के भागीदारी के रूप में सशक्त भूमिका, सहकारी संघवाद के सिद्धांत को कार्यरूप में परिणत करेगा।
  2. आंतरिक एवं बाह्य संसाधनों के एक ज्ञान केन्द्र जो कि सुशासन के सर्वोत्तम प्रचलनों के कोष (या भंडार) के रूप में तथा एक प्रबुद्ध मंडल या 'थिंक टैंक' के रूप में कार्य करते हुए सरकार के सभी स्तरों पर ज्ञान तथा रणनीतिक विशेषज्ञता प्रदान करेगा।
  3. कार्यान्वयन संभव बनाने वाला एक सहयोगी मंच जो कि प्रगति का अनुश्रवण करके, अंतरों को पाटते हुए केन्द्र एवं राज्यों के विभिन्न मंत्रालयों को एक साथ लाकर विकासात्मक लक्ष्यों को साझे प्रयत्नों से पूर्ति करेगा।
इसी संदर्भ में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, "पैंसठ वर्ष पुराना योजना आयोग एक निरर्थक संगठन बन कर रह गया था। यह आदेशात्मक आर्थिक व्यवस्था के लिए तो प्रासंगिक था लेकिन अब नहीं। भारत एक विविधतापूर्ण देश है और इसके अनेक प्रांत अपनी ताकतों एवं कमजोरियों के साथ आर्थिक विकास के विभिन्न चरणों में हैं। इस संदर्भ में, 'सब के लिए समान' नीति वाला आर्थिक नियोजन अब हमारे लिए पुराना पड़ चुका है। यह भारत को आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धी नहीं बना सकता।"
संकल्प में कहा गया, "सबसे महत्वपूर्ण बात शायद यह है कि संस्था को इस सिद्धांत का ध्यान रखना चाहिए कि बाहर से सकारात्मक प्रभावों को अपनाते हुए भी कोई एक बाहरी मॉडल भारतीय परिदृश्य में प्रत्यारोपित नहीं किया जा सकता। हमें वृद्धि की अपनी रणनीति की खोज करनी है। नई संस्था को शून्य से शुरुआत कर यह तय करना है कि भारत में और भारत के लिए क्या उपयोगी होने वाला है। यही विकास के प्रति भारतीय दृष्टिकोण होगा।"

सरंचना

नीति आयोग का गठन निम्नवत है:
  1. अध्यक्षः भारत के प्रधानमंत्री
  2. शासकीय परिषद (Governing Council): सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, केन्द्र शासित क्षेत्रों के मुख्यमंत्री एवं विधायिकाएं (जैसे- दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू एवं कश्मीर) तथा अन्य केन्द्रशासित क्षेत्रों के उप-राज्यपाल ।
  3. क्षेत्रीय परिषदें : इन परिषदों का गठन एक से अधिक राज्यों या क्षेत्रों से संबंधित विशिष्ट मुद्दों के समाधान के लिए किया जाता है। इनका एक निश्चित कार्यकाल होता है। इसका संयोजन प्रधानमंत्री करते हैं और राज्यों के मुख्यमंत्री एवं केन्द्रशासित क्षेत्रों के उप-राज्यपाल इसमें शामिल रहते हैं। इन परिषदों का सभापतित्व नीति आयोग के अध्यक्ष अथवा उनके द्वारा नामित व्यक्ति करते हैं।
  4. विशिष्ट आमंत्रितः विशेषज्ञ, सुविज्ञ एवं अभ्यासी, जिनके पास संबंधित क्षेत्र में विशेष ज्ञान एवं योग्यता हो, प्रधानमंत्री द्वारा नामित किए जाते हैं।
  5. पूर्णकालिक सांगठनिक ढांचा: प्रधानमंत्री के अध्यक्ष होने के अतिरिक्त निम्नलिखित द्वारा इसका गठन होता है:
    1. उपाध्यक्षः ये प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त होते हैं और इनका पद कैबिनेट मंत्री के समकक्ष होता है।
    2. सदस्य: पूर्णकालिक ये राज्यमंत्री के पद के समकक्ष होते हैं।
    3. अंशकालिक सदस्य: अधिकतम दो, जो कि प्रमुख विश्वविद्यालयों, शोध संगठनों तथा अन्य प्रासंगिक संस्थाओं से आते हैं और पदेन सदस्य के रूप में कार्य करते हैं। अंशकालिक सदस्यता चक्रानुमण पर आधारित होगी।
    4. पदेन सदस्य: प्रधानमंत्री द्वारा नामित केन्द्रीय मंत्रिपरिषद के अधिकतम चार सदस्य।
    5. मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी: एक निश्चित कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त भारत सरकार के सचिव पद के समकक्ष।
    6. सचिवालय: जैसा आवश्यक समझा जाए।

विशेषज्ञता प्राप्त शाखाएं

नीति आयोग के अंतर्गत अनेक विशेषज्ञता प्राप्त शाखाएं होती हैं:
  1. शोध शाखा: यह अपने क्षेत्र के विषय विशेषज्ञों एवं विद्व नों के समर्पित 'थिंक टैंक' के रूप में आतंरिक प्रक्षेत्रीय सुविज्ञता का विकास करती है।
  2. परामर्शदात्री शाखा: यह सुविज्ञता एवं निधियन के विशेषज्ञ पैनल की एक मंडी उपलब्ध कराता है जिसका उपयोग केन्द्र एवं राज्य सरकारें अपनी जरूरतों के अनुसार कर सकती है। यहां समस्या समाधानकर्ता उपलब्ध है सार्वजनिक एवं निजी, देशी एवं विदेशी। नीति आयोग कुल सेवाएं प्रदान करने के स्थान पर 'मैच मेकर' के रूप में कार्य करता है, जो प्राथमिकता वाले मामलों में अपने संसाधनों को एकाग्र करता है। शोध मामलों में मार्गदर्शक तथा एक समग्र गुणवत्ता जाँचकर्ता का कार्य करता है।
  3. टीम इंडिया शाखा: इसमें प्रत्येक राज्य एवं मंत्रालय के प्रतिनिधि होते हैं और यह राष्ट्रीय सहयोग एवं सहकार के एक स्थाई मंच के रूप में कार्य करता है। प्रत्येक प्रतिनिधिः
    1. सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक राज्य/मंत्रालय का मत नीति आयोग में सतत् रूप से सुना जाए।
    2. राज्य/मंत्रालय तथा नीति आयोग के बीच विकास संबंधी सभी मामलों पर समर्पित सम्पर्क अंतरापृष्ठ के रूप में प्रत्यक्ष संचार चैनल स्थापित करता है।
नीति आयोग केन्द्र सरकार के मंत्रालयों एवं राज्य सरकारों के नजदीकी सहयोग, परामर्श एवं समन्वय में कार्य करता है। यह केन्द्र एवं राज्य सरकारों के लिए अनुशंसाएं करता है लेकिन निर्णय लेने एवं लागू करने की जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है।

उद्देश्य

नीति आयोग के उद्देश्य निम्नवत हैं:
  1. राष्ट्रीय उद्देश्यों के आलोक में राज्यों की सक्रिय सहभागिता से राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं, प्रक्षेत्रों एवं रणनीतियों के प्रति साझा दृष्टिकोण का विकास।
  2. सहकारी संघवाद स्थापित करने के लिए सतत् आधार पर राज्यों के साथ संरचित सहयोग पहलों एवं प्रक्रियाओं को बढ़ावा देना, यह मानते हुए कि मजबूत राज्य ही मजबूत देश का निर्माण कर सकते हैं।
  3. ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजनाओं के सूत्रण के लिए प्रक्रियाओं का विकास और इन्हें सरकार के उच्चतर स्तरों तक उत्तरोत्तर युक्त करते जाना।
  4. यह सुनिश्चित करना कि जो भी क्षेत्र / विषय इसे संदर्भित किए जाते हैं, आर्थिक रणनीति एवं नीति में राष्ट्रीय सुरक्षा हित शामिल रहें ।
  5. हमारे समाज के उन वर्गों का विशेष रूप से ध्यान रखना, जो कि आर्थिक प्रगति से पर्याप्त रूप से लाभान्वित नहीं हुए।
  6. रणनीतिक एवं दीर्घकालीन नीति एवं कार्यक्रम रूपरेखा एवं पहलों को डिजाइन करना और उनकी प्रगति एवं सक्षमता का अनुश्रवण करना। अनुश्रवण एवं फीडबैक से मिले सबकों के आधार पर नवाचारी सुधार के लिए तत्पर होना जिसमें 'मिड कोर्स करेक्शन' भी शामिल होगा।
  7. प्रमुख हितधारकों एवं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय समान सोच वाले ‘थिंक टैंक', साथ ही शैक्षिक एवं नीतिगत शोध संस्थानों के बीच साझेदारी को प्रोत्साहित करना एवं आवश्यक सलाह देना ।
  8. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों, अभ्यासियों एवं अन्य साझेदारों के सहयोगी समुदाय के माध्यम से ज्ञान, नवाचार एवं उद्यमितापूर्ण समर्थक (रक्षा) प्रणाली का सृजन करना।
  9. अंतर - प्रक्षेपीय एवं अंतर - विभागीय मुद्दों के समाधान के लिए एक मंच प्रदान करना ताकि विकास ऐजेंडा को लागू करने की गति तीव्र की जा सके।
  10. एक अत्याधुनिक संसाधन केन्द्र के रूप में कार्य करना, धरणीय एवं सतत् विकास के क्षेत्र में सुशासन एवं सर्वोत्तम प्रचलनों पर हुए शोध के निधान (कोष) के रूप में कार्य करना।
  11. कार्यक्रमों एवं पहलों के कार्यान्वयन का सक्रिय रूप से अनुश्रवण एवं समीक्षा करना, साथ ही जरूरी संसाधनों की पहचान करना जिससे कि वितरण की सफलता की संभाव्यता को मजबूती प्रदान की जा सके।
  12. प्रौद्योगिकी उन्नयन तथा कार्यक्रमों एवं पहलों के कार्यान्वयन के लिए क्षमता निर्माण पर एकाग्रता |
  13. राष्ट्रीय विकास एजेंडा तथा उपर्युक्त उद्देश्यों के कार्यान्वयन के लिए जरूरी अन्य गतिविधियों को हाथ में लेना ।
उपरोक्त के माध्यम से नीति आयोग निम्नलिखित उद्देश्यों एवं अवसरों को पूरा करने का लक्ष्य रखता है : '
  1. प्रशासनिक परिप्रेक्ष्य, जिसमें सरकार 'समर्थकारी' हो न कि 'प्राथमिक एवं अंतिम रूप से संभरक या प्रदायक।'
  2. 'खाद्य सुरक्षा' से आगे प्रगति कर कृषि उत्पादों के मिश्रण पर साथ ही किसानों को अपने उत्पादों से जो कुछ प्राप्ति होती है, उस पर एकाग्र होना।
  3. यह सुनिश्चित करना कि समान वैश्विक मुद्दों पर चल रही चर्चा एवं विचार-विमर्श में भारत एक सक्रिय देश है।
  4. यह सुनिश्चित करना कि आर्थिक रूप से जागृत मध्य वर्ग सक्रिय रहे, इसकी पूरी क्षमता का उपयोग हो।
  5. उद्यमिता, वैज्ञानिक एवं बौद्धिक मानक सम्पदा का लाभ उठाया जाए।
  6. अप्रवासी भारतीय समुदाय की भू-आर्थिक एवं भू-राजनीतिक सामर्थ्य का साथ लेना।
  7. नगरीकरण को एक अवसर के रूप में उपयोग कर एक परिपूर्ण एवं सुरक्षित आवासन का सृजन, जिसमें आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल हो ।
  8. प्रौद्योगिकी का उपयोग कर अभिशासन में अपारदर्शिता एवं दु:साहसपूर्ण कार्रवाई की संभावना को कम करना ।
नीति आयोग भारत को चुनौतियों से बेहतर ढंग से जूझने के लिए सक्षम बनाने का लक्ष्य रखता है, निम्नलिखित के माध्यम से '
  1. भारत के जनसंख्यात्मक लाभांश का उपयोग कर युवाओं, नर-नारियों की क्षमता का शिक्षा, कौशल विकास, लैंगिक भेदभाव की समाप्ति तथा रोजगार के माध्यम से पूरा लाभ उठाना।
  2. निर्धनता उन्मूलन तथा प्रत्येक भारतीय के लिए गरिमापूर्ण एवं आत्म-सम्मानयुक्त जीवन का अवसर |
  3. लैंगिक पूर्वाग्रह, जाति तथा आर्थिक विषमता के आधार पर उपजी असमानता का समाधान।
  4. विकास प्रक्रिया से गांवों को संस्थागत रूप से जोड़ना।
  5. 50 मिलियन छोटे व्यवसायियों को नीतिगत समर्थन जो कि रोजगार सृजन का वृहत स्रोत हैं।
  6. अपने पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय परिसम्पत्ति की सुरक्षा।

कार्य

नीति आयोग के विविध कार्यों को चार प्रमुख शीर्षकों में बांटा जा सकता है:
  1. नीति एवं कार्यक्रम फ्रेमवर्क का प्रकल्पन
  2. सहकारी संघवाद को प्रोत्साहन
  3. अनुश्रवण एवं मूल्यांकन
  4. विचार समूह एवं ज्ञान एवं नवाचार केन्द्र के रूप में कार्य करना
नीति आयोग कार्यात्मक रूप से अनेक उदग्र कोटियों में विभाजित है जो कि प्रक्षेत्र सम्बन्धी मुद्दों की जांच और उनके हल के साथ ही राष्ट्रीय विकास एवं आर्थिक वृद्धि के लिए प्राथमिकताएं निर्धारित करने के लिए उत्तरदायी हैं।
नीति आयोग की समस्त गतिविधियों को विभाजित करते हुए, टीम इंडिया तथा ज्ञान एवं नवाचार केन्द्रों (Knowledge and Innovation Hubs) का गठन हुआ। उसी अनुसार अधोलंबों एवं प्रमुख संभागों (Verticals and core Divisions) का सृजन किया गया। ये दोनों केन्द्र (Hubs) नीति आयोग के कुशल कामकाज के मूल में हैं। टीम इंडिया हब 'सहकारी संघवाद' को बढ़ावा देने तथा 'नीति एवं कार्यक्रम फ्रेमवर्क के प्रकल्पन (Designing Policy and Programme Framework) के लिए अधिदेशित है। यह नीति आयोग को राज्यों के साथ कार्य करने के लिए आवश्यक समन्वय एवं सहयोग प्रदान करता है। दूसरी ओर ज्ञान एवं नवाचार केन्द्र (Knowledge and Innovation Hub) स्वनिर्मित संसाधन केन्द्र का विकास एवं रखरखाव सुनिश्चित करता है। यह सुशासन एवं सर्वोत्तम प्रचलनों सम्बन्धी शोधों के भंडार गृह के रूप में कार्य करता हुआ हितधारकों - तक इनका वितरण भी सुनिश्चित करता है। साथ ही यह प्रमुख क्षेत्रों में भागीदारी को भी प्रोत्साहित करता है।
नीति आयोग ऐसे वैचारिक नीतिगत हस्तक्षेपों पर विशेष रूप से एकाग्र होता है जिससे सभी केन्द्रीय मंत्रालयों, विकास भागीदारों, प्रक्षेत्र विशेषज्ञों एवं पेशेवरों के बीच एक सायुज्यता को बढ़ावा मिलता है। अभिशासन के प्रति इसी दृष्टिकोण का नीति आयोग के उद्देश्यों को प्राप्त करने में उपयोग किया जाता है।
नीति आयोग के विभिन्न अधोलम्ब (Verticals) इसे अपने अधिदेश को आगे बढ़ाने में अपेक्षित समन्वय एवं सहयोग फ्रेमवर्क प्रदान करते हैं। ये अधोल प्व (Verticals) निम्नलिखित हैं:
1. कृषि
2. आंकड़ा प्रबंधन एवं विश्लेषण (Data Management and Analysis)
3. ऊर्जा
4. वित्तीय संसाधन
5. अभिशासन एवं शोध (Government and Research)
6. प्रशासकीय परिषद सचिवालय (Government Council Secretariat )
7. स्वास्थ्य
8. मानव संसाधन विकास
9. उद्योग
10. अधिरचना संपर्क (Infrastructure Connectivity)
11. भूमि एवं जल प्रबंधन
12. नगरीकरण का प्रबंधन
13. प्राकृतिक संसाधन एवं पर्यावरण
14. एनजीओ दर्पण
15. परियोजना मूल्यांकन एवं प्रबंधन संभाग (Project Appraisal & Management Division, PAMD)
16. सार्वजनिक निजी भागीदारी
17. ग्रामीण विकास
18. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
19. कौशल विकास एवं रोजगार
20. सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता
21. राज्य समन्वय एवं विकेन्द्रित नियोजन
22. धरणीय विकास लक्ष्य
23. स्वैच्छिक कार्य कोषांग (Voluntary Action call)
24. महिला एवं बाल विकास

मार्गदर्शक सिद्धांत

उपरोक्त कार्यों के सम्पादन के लिए नीति आयोग निम्नलिखित सिद्धांतों द्वारा निदेशित होता है:
  1. अंत्योदय: गरीबों, हाशियाकृत लोगों तथा अभिवंचितों की सेवा एवं उत्थान पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय विचार के अनुसार।
  2. समावेशिताः असुरक्षित एवं हाशियाकृत वर्गों को सशक्त बनाना, पहचान आधारित हर प्रकार के भेदभाव - लिंग, क्षेत्र, धर्म, जाति अथवा वर्ग को समाप्त करना।
  3. ग्राम विकास प्रक्रिया से गांव को जोड़ना, हमारे नैतिक बोध, संस्कृति की ताकत और ऊर्जा अर्जित करना।
  4. जनसंख्यात्मक लाभांश: हमारी सबसे बड़ी परिसम्पत्ति, भारतीय जन का उपयोग करना, शिक्षा, कौशल विकास तथा उत्पादक आजीविका अवसरों के माध्यम से उनके सशक्तीकरण पर ध्यान देता।
  5. जन सहभागिता विकास प्रक्रिया को जन-चालित बनाकर जागृत एवं सहभागी नागरिकों को सुशासन का चालक या ड्राइवर बनाना।
  6. अभिशासन (सुशासन): खुले, पारदर्शी, उत्तरदायी, सक्रिय एवं सोद्देश्य अभिशासन शैली को प्रश्रय देते हुए 'लागत से उत्पाद से परिणाम' (from outlay to output to out come) की ओर प्रयासों का अंतरण।
  7. सतत्ता: पर्यावरण के प्रति सम्मान की प्राचीन परम्परा के अनुरूप अपने नियोजन एवं विकास प्रक्रिया में धारणीयता को केन्द्र में रखना।
इस प्रकार नीति आयोग प्रभावी अभिशासन के निम्नलिखित सात स्तंभों पर आधारित है:
  1. जन-समर्थक ऐजेंडा, जो कि समाज के साथ-साथ व्यक्ति की आकांक्षाओं की भी पूर्ति करता हो।
  2. नागरिकों की जरूरतों का अनुमान कर प्रत्युत्तर के प्रति आगे बढ़कर सक्रियता दिखाना।
  3. नागरिकों की संलग्नता के माध्यम से सहभागी होना।
  4. सभी पक्षों में महिला सशक्तीकरण
  5. सभी समूहों की समावेशिता, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यकों पर विशेष ध्यान।
  6. युवाओं के लिए अवसर की समानता।
  7. प्रौद्योगिकी के माध्यम से पारदर्शिता स्थापित कर सरकार को दृष्टव्य एवं उत्तरदायी अथवा अनुक्रियात्मक बनाना।
सहकारी संघवाद, नागरिक संलग्णता को प्रोत्साहन, अवसरों तक समत्वपूर्ण पहुंच, सहभागी एवं अनुकूली अभिशासन तथा तकनीक के अधिकाधिक उपयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के माध्यम से नीति आयोग विकास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण निदेशकीय एवं रणनीतिक इनपुट का समावेश करना चाहता है। इसके अलावा विकास संबंधी नये विचारों के 'इन्क्यूबेटर' (ऊष्मायित्र) के रूप में बने रहना नीति आयोग का प्रमुख लक्ष्य है।

सहकारी संघवाद

नीति आयोग की स्थापना वास्तव में सहकारी संघवाद के महत्वपूर्ण लक्ष्य को हासिल करने के लिए की गई है। सुशासन पर चलकर मजबूत राज्यों के माध्यम से समर्थ राष्ट्र का निर्माण इसको अभीष्ट है। एक वास्तविक संघीय राज्य में कतिपय लक्ष्य ऐसे हो सकते हैं जिन्हें हासिल करने की कोशिशों के देशव्यापी राजनीतिक प्रभाव हो । इसलिए बिना राज्यों के सक्रिय सहयोग के राष्ट्रीय उद्देश्यों को प्राप्त करना किसी भी संघीय सरकार के लिए संभव नहीं है। इसलिए यह अधिक महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक होगा कि केन्द्र और राज्य सरकारें बराबरी के स्तर पर मिल-जुलकर काम करें। 
सहकारी संघवाद की दो प्रमुख विशेषताएं हैं:
  1. केन्द्र एवं राज्यों द्वारा राष्ट्रीय विकास के एजेंडे पर संयुक्त रूप से एकाग्र होना, तथा;
  2. केन्द्रीय मंत्रालयों" के साथ राज्यों के दृष्टिकोण की पैरवी एवं अनुशंसा।
इसके लिए नीति आयोग राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं के लिए एक साझा दृष्टिकोण विकसित करने के लिए अधिदेशित है। इन प्राथमिकताओं में राष्ट्रीय उद्देश्य परिलक्षित होने चाहिए और इनसे राज्यों को निरंतरता के आधार पर विसंरचित समर्थन के माध्यम से सहकारी संघवाद का मार्ग प्रशस्त होना चाहिए। नीति आयोग राज्यों को ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजनाओं के सूत्रण के लिए प्रक्रियाएं विकसित करने में सहायता प्रदान करता है। इसका लक्ष्य उस स्तर या चरण से आगे बढ़ना है जबकि केन्द्र ने माना कि एक सच्ची संघीय सरकार के लिए विकास नीतियों में राज्य नियोजन प्रक्रिया में बराबर के हिस्सेदार हैं।
राज्य सरकारों को जोड़ने की सरकार की नीति आयोग की अंतःक्रिया के तरीके में प्रकट होती है। अपने अधिदेश के अनुरूप नीति आयोग ने यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण पहले की हैं कि नीति निर्माण एवं कार्यान्वयन प्रक्रिया में राज्य बराबर के भागीदार रहें। 8d
नीति आयोग की प्रशासी परिषद् (Governing Council) की बैठकों में प्रधानमंत्री ने नीति आयोग के महत्व को एक ऐसे मंच के रूप में रेखांकित किया है जो सहकारी संघवाद के लिए केन्द्र और राज्यों के बीच प्रभावी सहयोग की जरूरत पर बल देते हुए विकास लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ने और दोहरे अंकों की समावेशी वृद्धि के प्रति संकल्पित व कटिबद्ध है।
नीति आयोग का यह स्थायी और सतत् उपक्रम है कि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं, प्रक्षेत्रों तथा रणनीतियों का राज्यों के साथ मिलकर एक साझा दृष्टिकोण विकसित किया जाए। इस प्रक्रिया में राज्य न केवल बराबरी के भागीदार एवं हितधारक रहेंगे बल्कि नियोजित प्रक्रिया में भी वे शामिल रहेंगे। इसे ध्यान में रखकर नीति आयोग के उपाध्यक्ष सभी राज्यों का दौरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं ताकि अंतर्प्रक्षेत्रीय (inter-sectoral) तथा अंतर्विभागीय समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्हें एक मंच दिया जा सके और विकास के ऐजेंडे को सफलतापूर्वक लागू किया जा सके।
नीति आयोग ने अधिरचना विकास के आदर्श प्रतिरूप, मॉडल स्थापित किए हैं और कार्यक्रम भी बनाए हैं, जिनमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी को नए सिरे से प्रोत्साहित और स्थापित किया जा सके। कुछ उदाहरण हैं- केन्द्र-राज्य भागीदारी मॉडल: राज्यों को विकास समर्थित सेवाएं (Centre-State partnership Model Development Support Services to States, DSSS) तथा मानव पूंजी के रूपांतरण के लिए धरणीय कार्य (Sustainable Action for Transforming Human Capital, SATH) कार्यक्रम जिसका उद्देश्य राज्यों को सामाजिक क्षेत्र संकेतकों में सुधार के लिए तकनीकी सहयोग प्रदान करना है।
इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय असमानता को दूर करने के उद्देश्य से, नीति आयोग ने विशेष रूप से ध्यान दिए जाने योग्य क्षेत्रों के लिए विशेष कदम उठाए हैं, जैसे कि उत्तर- -पूर्वी राज्य, द्वीप राज्य तथा हिमालय के पहाड़ी राज्य। इन सबके लिए विशेष फोरम बनाए गए हैं ताकि उनके विकास की विशिष्ट बाधाओं को चिन्हित किया जा सके और उनके प्राकृतिक संसाधनों की संरक्षा करते हुए धारणीय विकास सुनिश्चित करने के लिए नीतियां बनाई जा सकें।
ऊपर की चर्चा से, हम संक्षेप में नीति आयोग की कार्यप्रणाली में सहकारी संघवाद के प्रकटीकरण को इस प्रकार लक्षित कर सकते हैं:
1. प्रशासी परिषद् की बैठकें (Meetings of Governing council)
2. विभिन्न विषयों पर मुख्यमंत्रियों के उप-समूह
3. विशिष्ट विषयों पर टास्क फोर्स
4. उत्तर:- पूर्व के लिए नीति फोरम (NITI Forum for North East)
5. हिमालयी क्षेत्र में धरणीय विकास
6. राज्यों को विकास समर्थित सेवाएं
7. मानव पूंजी के रूपांतरण के लिए धारणीय कार्य

आलोचना

योजना आयोग को भंग कर इसके स्थान पर 'नीति आयोग' के गठन के केन्द्र सरकार के निर्णय की आलोचना करते हुए विपक्ष ने कहा कि यह कदम मात्र एक शगूफा है। विपक्षी दलों ने आशंका व्यक्त की कि नये निकाय से भेदभाव की प्रवृत्ति बढ़ेगी क्योंकि कॉरपोरेट जगत का नीति निर्माण में दखल बढ़ेगा।
सीपीआई (एम) नेता सीताराम येचुरी ने नीति आयोग की स्थापना को 'अनीति और दुर्नीति' कहा।
श्री येचुरी ने कहा, "केवल संज्ञा बदलने तथा शोबाजी से कोई उद्देश्य नहीं सधेगा। देखना है सरकार की इस संस्था को लेकर क्या योजना है।'
''अगर सरकार वर्ष 2015 के पहले दिन लोगों को इस शगूफे का ही तोहफा देना चाहती है, तब तो अधिक कुछ कहने को नहीं है। यदि नॉर्थ ब्लॉक या वित्त मंत्रालय का राजकोषीय तथा मौद्रिक उद्देश्यों को लेकर सीमित दृष्टिकोण है और यह केन्द्र और राज्यों के बीच अंतिम मध्यस्थ रहने वाला है, तब मुझे डर है कि इस प्रक्रिया का एक हितधारक होने के नाते, राज्यों के साथ भेदभाव जरूर होगा।" कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा:
"आखिरकार योजना आयोग क्या काम कर रहा था? यह योजनाएं बनाता था। इसलिए केवल योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग कर के केन्द्र सरकार क्या संदेश देना चाहती है?" श्री तिवारी ने कहा, यह जोड़ते हुए कि कांग्रेस का योजना आयोग को पुनर्गठित करने का विरोध 'सिद्धांतों पर आधारित है।
"यह युद्ध लड़ने जैसा नहीं है, यह मामला सिद्धांत का है। भारतीय जनता पार्टी आगे बढ़कर संघवाद की बात करती रही है कि कैसे संघवाद की वैधता और पवित्रता को बनाए रखा जाए और अब ये लोग बिल्कुल उल्टा काम कर रहे हैं।" कांग्रेस नेता ने कहा।
वरिष्ठ सीपीआई नेता गुरुदास दासगुप्ता ने कहा, "योजना आयोग को भंग कर एक नई संस्था खड़ी करने से अर्थव्यवस्था अनियमितता की ओर जाएगी।" यह केवल नाम बदलना भर नहीं है। योजना आयोग इसलिए भंग किया जा रहा है कि उनका नियोजन में ही विश्वास नहीं है।" उन्होंने कहा।
'सरकार एक पूर्ण बाजार आधारित अर्थव्यवस्था चाहती है जो कि पूरी तरह अनियमित होगी।" श्री दासगुप्ता ने कहा। उन्होंने यह भी कहा कि, “यही सरकार की नीति बन जाती है कि देश को आगे नहीं बढ़ाया जाए, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण नहीं पाया जाए और रोजगार के अवसर सृजित न किए जाएं, तो यह देश के हित में नहीं होगा।'
“योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग कर देने पर कोई आपत्ति नहीं है अगर इसके साथ वास्तविक सुधार भी आए। अन्यथा यह पूर्व के नामकरण समारोहों की ही तरह सतही होगा।" कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु संघवी ने कहा कि, “कांग्रेस योजना आयोग में रचनात्मक सुधार का समर्थन करती लेकिन 'पहचान और मूल संरचना को बदलने का प्रयास हो रहा है और उसका कारण है- नेहरूवाद का विरोध और कांग्रेस का विरोध।''
सीपीआई(एम) सेंट्रल कमिटी के सदस्य मोहम्मद सलीम के अनुसार, “ योजना आयोग का नाम बदलने से कोई सार्थक उद्देश्य पूर्ति नहीं होगी।" उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने योजना आयोग को भंग करने का निर्णय 'नियोजन प्रक्रिया को शिथिल करने के लिए' किया है। उन्होंने कहा कि इसके स्थान पर सरकार को राष्ट्रीय विकास परिषद को और सक्षम बनाने का काम करना चाहिए था।"

संलग्न कार्यालय

नीति आयोग से दो कार्यालय जुड़े हुए हैं:
  1. राष्ट्रीय श्रम अर्थशास्त्र शोध एवं विकास संस्थान (National Institute of labour Economics Research and Development): यह संस्थान पहले इंस्टीट्यूट ऑफ अप्लायड मैनपॉवर रिसर्च (LAMR) के नाम से जाना जाता था। यह नीति आयोग से संलग्न एक केन्द्रीय स्वशासी संगठन है। इसके प्राथमिक उद्देश्य हैं- शोध आंकड़ा संग्रह, मानव पूंजी नियोजन के सभी पक्षों में शिक्षण एवं प्रशिक्षण, मानव संसाधन विकास तथा अनुश्रवण एवं मूल्यांकन। 
    इंस्टीट्यूट ऑफ अप्लायड मैन पॉवर रिसर्च (IAMR) की स्थापना सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के अंतर्गत 1962 में हुई थी। यह विचारों के 'क्लियरिंग हाउस' के रूप में कार्य करता था और मानव पूँजी विकास पर नीतिगत शोध आयोजित करता था ताकि परिप्रेक्ष्यगत योजना तथा नीतिगत ऐक्य को प्रोत्साहित किया जा सके। इस संस्थान का मुख्य उद्देश्य मानव संसाधन की की प्रकृति, विशेषताओं एवं उपयोग के बारे में शोध, शिक्षा, प्रशिक्षण परामर्शिता के माध्यम से ज्ञान बढ़ाना है।
    2014 में आइएएमआर का नाम बदलकर एनआइएलईआरडी (National Institute of Labour Economics Research and Development) कर दिया गया है। एनआइएलईआरडी को नीति आयोग (पूर्व के योजना आयोग) द्वारा अनुदान सहायता के रूप में निधि प्राप्त होती है, साथ ही इसके शोध परियोजनाओं तथा शैक्षिक एवं प्रशिक्षकीय गतिविधियों आदि से भी इसे राजस्व की प्राप्ति होती है। एनआइएलईआरडी का मुख्य उद्देश्य एक ऐसे संस्थागत ढाँचे का निर्माण करना रहा है, जिसमें कि व्यावहारिक मानव संसाधन नियोजन शोध प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से स्थायी आधार पर चलाया जा सके।
    अपनी शुरुआत से ही संस्थान ने अकादमिक ऊँचाई हासिल करने के लिए अपने प्रक्षेप-पथ का निर्माण स्वयं किया है और इस प्रक्रिया में ने केवल मानव संसाधन नियोजन एवं विकास बल्कि सार्वजनिक नीति एवं कार्यक्रम के अनुश्रवण एवं मूल्यांकन के क्षेत्र में भी अनेक प्रकार की अकादमिक गतिविधियाँ का विकास किया है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान संस्थान ने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से जुड़े मामलों में उल्लेखनीय गतिशीलता का परिचय दिया है। संस्थान मानव संसाधन नियोजन एवं विकास के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय एवं देश के अंदर के प्रतिभागियों को अकादमिक प्रशिक्षण प्रदान करने वाले अग्रणी संस्थान के रूप में उभरा है।
    संस्थान 2002 में अपने नरेला स्थित परिसर में आ गया। नरेला एक विकासशील शहरी एवं सांस्कृतिक केन्द्र है, जो कि विशेष आर्थिक क्षेत्र के रूप में घोषित है और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
  2. विकास अनुश्रचण एवं मूल्यांकन कार्यालय (Development Monitoring and Evaluation office): योजनाकारों एवं नीति निर्माताओं ने देश में नियोजन प्रक्रिया की शुरुआत से ही एक कार्यकुशल तथा स्वतंत्र मूल्यांकन प्रविधि की जरूरत पर बल दिया है। परिणामस्वरूप भारत सरकार ने 1954 में केन्द्र सरकार द्वारा वित्त पोषित कार्यक्रमों के स्वतंत्र एवं वस्तुनिष्ठ प्रभाव मूल्यांकन के लिए कार्यक्रम मूल्यांकन संगठन (Programme Evaluation Organization) की स्थापना की।
    विकास अनुश्रवण एवं मूल्यांकन कार्यालय (DMEO) की स्थापना सरकार ने 2015 में नीति आयोग के एक संलग्न कार्यालय के रूप में की, और इसके लिए कार्यक्रम मूल्यांकन संगठन तथा स्वतंत्र मूल्यांकन कार्यालय का विलय कर दिया। डीएमईओ के शीर्ष पर महानिदेशक का पद हैं जो कि भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव (Additional Secretary to GoI) के समकक्ष है। इसे स्वतंत्र रूप से कार्य करने देने के लिए इसके लिए अलग आवंटन तथा मानव शक्ति की व्यवस्था की गई है, सम्पूर्ण प्रकार्यात्मक स्वशासन के अलावा।
    विकास अनुश्रवण एवं मूल्यांकन संगठन, यानी डीएमईओ को भारत सरकार के कार्यक्रमों एवं पहलों के कार्यान्वयन का सक्रिय अनुश्रवण एवं मूल्यांकन के लिए अधिदेशित किया गया है। इसमें उन संसाधनों की चिन्हित करना शामिल है, • जिनसे वितरण या सुपुर्दगी की सफलता तथा परिधि-विस्तार की संभाव्यता को मजबूती दी जा सके।
डीएमईओ के कार्यों में सम्मिलित हैं:
  1. सरकार प्रायोजित कार्यक्रमों के कार्यान्वयन का अनुश्रवण ।
  2. मंत्रालयों को मूल्यांकन अध्ययनों के लिए विचारार्थ विषयों (TORs) के प्रकल्पन में सहायता देना।
  3. एसडीओ (SDO) की प्रगति और कार्यान्वयन का अनुश्रवण।
  4. सहकारी संघवाद की भावना को प्रोत्साहित करना ।
  5. सरकारी कार्यक्रमों का मूल्यांकन संचालित करना।
नीति आयोग के स्तर पर कार्यक्रम मूल्यांकन का कार्य उपाध्यक्ष के मार्गदर्शन तथा देखरेख में किया जाता है। इसके अतिरिक्त महानिदेशक, डीएमईओ के अधीन चार उप-महानिदेशक (एस. ए. जी. स्तर) के अतिरिक्त संयुक्त सचिव (प्रशासन एवं वित्त) पदस्थापित किए गए हैं। ये सभी पदाधिकारी प्रशासनिक एवं रसद आदि से संबंधित मामलों में सहयोग करते हैं। डीएमईओ का मुख्यालय नीति आयोग दिल्ली में ही स्थित है।
डीएमईओ के अंतर्गत 15 क्षेत्रीय विकास अनुश्रवण एवं मूल्यांकन संगठन (RDMEOs) कार्यरत थे। प्रत्येक आरडीएमईओ एक निदेशक स्तर के अधिकारी के अधीन कार्य करता था। आरडीएमईओ क्षेत्रीय सर्वेक्षण तथा आंकड़ा/सूचना संग्रहण का कार्य मूल्यांकन अध्ययनों के लिए करता था। इनकी राज्यों एवं संघशासित क्षेत्रों के साथ लगातार सम्पर्क एवं अंतःक्रिया के कारण सहकारी संघवाद की भावना को प्रोत्साहित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालांकि प्रकार्यात्मक आवश्यकताओं में बदलाव के कारण 2017 में इन्हें बंद कर दिया गया और सभी कर्मचारी डीएमईओ मुख्यालय दिल्ली स्थानांतरित कर दिए गए।

पूर्ववर्ती योजना आयोग

पूर्ववर्ती योजना आयोग की स्थापना मार्च 1950 में भारत सरकार के एक कार्यपालिका संकल्प द्वारा की गई थी, जो कि 1946 में गठित सलाहकार योजना बोर्ड की सिफारिश के अनुरूप थी। इस बोर्ड के अध्यक्ष के. सी. नियोगी थे। इस प्रकार योजना आयोग भी न तो संवैधानिक न ही वैधानिक निकाय था। भारत में यह सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए नियोजन का शीर्ष अंग था।
कार्य
पूर्ववर्ती योजना आयोग के निम्नलिखित कार्य थे:
  1. देश के भौतिक पूंजी एवं मानव संसाधन का आकलन कर उनकी संवृद्धि की संभावना तलाश करना।
  2. देश के संसाधनों का सबसे प्रभावी एवं संतुलित उपयोग के लिए योजना का सूत्रण करना।
  3. प्राथमिकताओं का निर्धारण और उन चरणों को परिभाषित करना जिनमें योजनाओं को कार्यान्वित करना है।
  4. आर्थिक विकास को धीमा करने वाले कारकों की पहचान करना।
  5. योजना के प्रत्येक चरण के सफल कार्यान्वयन के लिए जरूरी मशीनरी की प्रकृति का निर्धारण।
  6. योजना को लागू करने में हुई प्रगति का समय-समय पर मूल्यांकन करना तथा जरूरी समायोजनाओं की अनुशंसा करना।
  7. अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए उपयुक्त अनुशंसा करना और ऐसे मामलों पर अनुशंसा देना जो इसकी सलाह के लिए केन्द्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा संदर्भित किए गए हैं।
कार्यवाही नियमावली आवंटन (Allocation of Business Rules) ने पूर्ववर्ती योजना आयोग को निम्नलिखित मामले (उपरोक्त के अतिरिक्त) सौंपे थे:
  1. राष्ट्रीय विकास में जन-सहयोग
  2. समय-समय पर अधिसूचित क्षेत्र विकास के विशेष कार्यक्रम
  3. परिप्रेक्ष्य नियोजन (Perspective Planning)
  4. इंस्टीट्यूट ऑफ अपलॉयड मैनपॉवर रिसर्च (Institute of Applied Manpower Research)
  5. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (Unique Identificaton Authority of India)
  6. राष्ट्रीय वर्षा 1 संचित क्षेत्र प्राधिकरण (National Rainfed Area Authority, NRAA) से संबंधित सभी मामले।
पहले नेशलन इनफॉर्मेटिक्स सेंटर भी योजना आयोग के अधीन था। बाद में इसे सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि, पहले योजना आयोग एक 'स्टाफ ऐजेंसी' था - एक सलाहकार निकाय जिसके पास कोई कार्यपालिका दायित्व नहीं था। यह निर्णय लेने और उसको लागू करवाने के लिए जिम्मेदार नहीं था। यह जिम्मेदारी केन्द्र और राज्य सरकारों पर थी |
गठन
पूर्ववर्ती योजना आयोग के गठन (सदस्यता) के संदर्भ में निम्न बिन्दुओं का उल्लेख किया जा सकता है:
  1. भारत के प्रधानमंत्री योजना आयोग के अध्यक्ष थे। वही आयोग की बैठकों की अध्यक्षता करते थे।
  2. आयोग का एक उपाध्यक्ष होता था, जो कि आयोग का वास्तविक प्रमुख था (अर्थात् पूर्णकालिक कार्यात्मक प्रमुख) पंचवर्षीय योजना को तैयार कर उसका प्रारूप केन्द्रीय मंत्रिमंडल को सौंपने की जिम्मेदारी उसी की थी। उसकी नियुक्ति एक निश्चित कार्यकाल के लिए केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा की जाती थी और उसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त था, हालांकि वह मंत्रिमंडल का सदस्य नहीं थ, वह मंत्रिमंडल की बैठकों में आमंत्रित किया जाता था (बिना मत देने के अधिकार के ) ।
  3. कुछ केन्द्रीय मंत्री आयोग के अंशकालिक सदस्य के रूप में नियुक्त होते थे। वैसे वित्त मंत्री एवं योजना मंत्री आयोग के पदेन सदस्य होते थे।
  4. आयोग के चार से सात पूर्णकालिक विशेषज्ञ सदस्य होते थे। उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त था।
  5. आयोग का एक सदस्य सचिव होता था जो कि एक वरिष्ठ आइ.ए.एस. पदाधिकारी होता था।
आयोग में राज्यों का किसी भी तरह का प्रतिनिधित्व नहीं था। इसलिए योजना आयोग पूर्णतया केन्द्र द्वारा गठित एक संस्था थी ।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
योजना आयोग की स्थापना सलाहकार भूमिका वाली एक स्टाफ एजेंसी के रूप में की गई थी। बाद में यह एक मजबूत और निदेशकीय प्राधिकार के रूप में उभरा और इसकी अनुशंसाओं पर संघ और राज्य दोनों विचार करते थे। यहां तक कि आलोचकों ने इसे 'सुपर कैबिनेट' की संज्ञा दी, या फिर 'इकोनोमिक कैबिनेट' अथवा 'पैरेलेल कैबिनेट' इसे 'फिफ्थ व्हील ऑफ दि कोच' भी कहा गया।
योजना आयोग की प्रभुत्वपूर्ण भूमिका के बारे में निम्नलिखित विचार सामने आए:
  1. भारत का प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC): इसके अनुसार, “संविधान के अंतर्गत मंत्री, चाहे वे केन्द्र के हों या राज्य के अंतिम कार्यपालिका अधिकारी हैं। दुर्भाग्यवश, योजना आयोग कुछ अंशों में पैरेलेल कैबिनेट, यानी समानांतर मंत्रिमंडल, बल्कि कभी-कभी 'सुपर कैबिनेट' के रूप में जाना जा रहा है। 
  2. के. संथानम्: इन संविधानवेत्ता ने कहा, "योजना ने संघ का स्थान ले लिया है और हमारा देश अनेक अर्थों में एकल प्रणाली की तरह कार्य कर रहा है।"
  3. पी. वी. राजामन्नार: चतुर्थ वित्त आयोग के अध्यक्ष राजामन्नार ने संघीय राजकोषीय अंतरणों में योजना आयोग और वित्त आयोग के परस्पर व्यापी प्रकार्यों एवं उत्तरदायित्वों को उजागर किया | 

राष्ट्रीय विकास परिषद्

1 जनवरी, 2016 को यह समाचार 5 मिला कि मोदी सरकार ने राष्ट्रीय विकास परिषद को भंग करने या समाप्त करने तथा इसकी शक्तियों को नीति आयोग की शासी परिषद को अंतरित करने का निर्णय लिया है। लेकिन अक्टूबर 2019 तक इस आशय का कोई संकल्प पारित नहीं हुआ है।
यह भी अनिवार्य रूप से उल्लेखनीय है कि, एनडीसी की आखिरी बैठक (57वीं) 27 दिसम्बर, 2012 को 12वीं योजना (2012-17) को स्वीकृत करने के लिए हुई थी ।
एनडीसी की स्थापना अगस्त 1954 में भारत सरकार के एक कार्यपालकीय संकल्प द्वारा की गई थी जिसकी अनुशंसा प्रथम पंचवर्षीय योजना (ड्राफ्ट आउटलाइन) में की गई थी। पूर्ववर्ती योजना आयोग की तरह न तो यह संवैधानिक निकाय है, न वैधानिक निकाय | 
गठन
एनडीसी का गठन निम्नलिखित से होता है:
  1. भारत के प्रधानमंत्री (इसके अध्यक्ष/प्रमुख)
  2. समस्त संघीय कैबिनेट मंत्री (1967 से) 
  3. सभी राज्यों के मुख्यमंत्री
  4. सभी संघीय क्षेत्रों के मुख्यमंत्री / प्रशासक
  5. योजना आयोग (नीति आयोग) के सदस्य
योजना आयोग (नीति आयोग) के सचिव ही एनडीसी के सचिव के रूप में कार्य करते हैं। इसे प्रशासनिक एवं अन्य सहायता योजना आयोग (नीति आयोग) द्वारा प्रदान की जाती है।
उद्देश्य
एनडीसी की स्थापना निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए की गई थी :
  1. योजना के कार्यान्वयन में राज्यों का सहयोग प्राप्त करने के लिए।
  2. योजना को सहायता देने के लिए राष्ट्र के प्रयासों एवं संसाधनों को मजबूती प्रदान करने के लिए।
  3. महत्वपूर्ण क्षेत्रों में समान आर्थिक नीतियों को बढ़ावा देने के लिए।
  4. देश के सभी भागों का संतुलित एवं द्रुत विकास सुनिश्चित करने के लिए।
कार्य
उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एनडीसी के निम्नलिखित कार्य निश्चित किए गए थे:
  1. राष्ट्रीय योजना की तैयारी के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित करना।
  2. योजना आयोग द्वारा तैयार राष्ट्रीय योजना पर विचार करना।
  3. योजना को कार्यान्वित करने के लिए जरूरी संसाधनों का आकलन करना और इनकी संवृद्धि के उपाय सुझाना।
  4. राष्ट्रीय विकास को प्रभावित करने वाले सामाजिक एवं आर्थिक नीतियों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करना।
  5. राष्ट्रीय योजना के कामकाज की समय-समय पर समीक्षा करना।
  6. राष्ट्रीय योजना में निश्चित किए लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उपायों की अनुशंसा करना।
प्रारूप पंचवर्षीय योजना, योजना आयोग (अब नीति आयोग) द्वारा सर्वप्रथम केन्द्रीय मंत्रिमंडल को भेजा जाता है। इसकी स्वीकृति के पश्चात् इसे एनडीसी के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है इसकी स्वीकृति के लिए। इसके बाद प्रारूप योजना संसद के समक्ष प्रस्तुत की जाती है। संसद की स्वीकृति के बाद इसे आधिकारिक योजना मान लिया जाता है और सरकारी गजट में इसे प्रकाशित किया जाता है।
इस प्रकार, संसद के नीचे एनडीसी उच्चतम निकाय है, नीतिगत मामलों को लेकर जिनमें सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं। हालांकि इसे योजना आयोग के एक सलाहकार अंग के रूप में माना गया है और इसकी अनुशंसाएं बाध्यकारी नहीं होतीं। यह केन्द्र एवं राज्य सरकारों को अपनी अनुशंसाएं भेजता है और प्रतिवर्ष कम-से-कम इसकी दो बैठकें अनिवार्य है।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
एनडीसी का सर्वप्रमुख कार्य केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों एवं योजना आयोग के बीच एक सेतु एवं कड़ी के रूप में कार्य करना है, विशेषकर नियोजन के क्षेत्र में, जिससे कि योजना संबंधी नीतियों एवं कार्यक्रमों में समन्वय स्थापित किया जा सके। इस कार्य में कुल मिलाकर यह सफल रहा है। इसके अलावा, यह राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर केन्द्र-राज्य विचार-विमर्श के एक मंच के रूप में भी कार्य करता रहा है, साथ ही संघीय ढांचे में उनके बीच उत्तरदायित्वों के बंटवारे के एक उपकरण के रूप में भी प्रयुक्त होता है।
हालांकि दो विपरीत विचार इसके कार्यकरण को लेकर व्यक्त किए गए हैं। एक ओर तो इसे 'सुपर कैबिनेट' के रूप में वर्णित किया गया है। इसकी व्यापक और शक्तिशाली संरचना के कारण, जबकि इसकी अनुशंसाएं सलाहकारी हैं बाध्यकारी नहीं लेकिन तब भी इनके पीछे राष्ट्रीय जनमत होने के कारण इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती और दूसरी ओर इसे मात्र एक 'रबड़ सील' के रूप में मान्यता दी जाती है, क्योंकि मुद्दों पर निर्णय केन्द्र सरकार द्वारा पहले ही लिए जा चुके होते हैं। इस सोच के पीछे कारण केन्द्र और राज्यों में लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी का शासन रहा है । तथापि बाद में क्षेत्रीय दलों के उदय के पश्चात् राष्ट्रीय योजनाओं के निर्माण में राज्यों को ज्यादा तरजीह मिलने लगी।
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