क्षेत्रीय दलों की भूमिका

भारतीय राजनीतिक प्रणाली की प्रमुख विशेषता है बड़ी संख्या में क्षेत्रीय दलों की उपस्थिति क्षेत्र, राज्य एवं राष्ट्रीय सभी स्तरों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए वे सक्रिय और प्रस्तुत हैं। गठबंधनराजनीति के युग के संदर्भ में तो यह तथ्य और भी स्पष्ट है।

क्षेत्रीय दलों की भूमिका

क्षेत्रीय दलों की भूमिका

भारतीय राजनीतिक प्रणाली की प्रमुख विशेषता है बड़ी संख्या में क्षेत्रीय दलों की उपस्थिति क्षेत्र, राज्य एवं राष्ट्रीय सभी स्तरों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए वे सक्रिय और प्रस्तुत हैं। गठबंधनराजनीति के युग के संदर्भ में तो यह तथ्य और भी स्पष्ट है।

क्षेत्रीय दलों की विशेषताएं

क्षेत्रीय दलों की विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
  1. ये विशेष राज्य अथवा क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं। इनका चुनावी आधार एक ही क्षेत्र तक सीमित होता है।
  2. ये क्षेत्रीय हितों की बात करते हैं और विशेष सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई अथवा नृजातीय समूह के साथ अपनी पहचान जोड़ते हैं।
  3. प्राथमिक रूप से ये स्थानीय असंतोष का लाभ उठाते हैं। अथवा भाषा, जाति अथवा समुदाय' या क्षेत्र पर आधारित विभिन्न प्रकार की मांगों या आकांक्षाओं का पोषण करते हैं।
  4. ये स्थानीय एवं क्षेत्रीय मुद्दों पर अपना स्थान केन्द्रित कर राज्य स्तर पर राजनीतिक सत्ता पर काबिज होने का लक्ष्य सामने रखकर कार्य करते हैं।
  5. भारतीय संघ के अंतर्गत राज्यों की क्षेत्रीय स्वायत्तता बढ़ाने की इनकी राजनीतिक आकांक्षा होती है।

क्षेत्रीय दलों का वर्गीकरण

भारत के क्षेत्रीय दलों को निम्नलिखित चार श्रेणियों में बांट सकते हैं:
  1. क्षेत्रीय दल जिनका आधार क्षेत्रीय संस्कृति अथवा नृजातीय पहचान है। इनके अंतर्गत शिरोमणि अकाली, नेशनल कॉन्फ्रेंस, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी आदि दलों को रखा जा सकता है।
  2. क्षेत्रीय दल जिनका अखिल भारतीय दृष्टिकोण तो है लेकिन राष्ट्र स्तरीय चुनावी आधार नहीं है। उदाहरण के लिए बांग्ला कांग्रेस, भारतीय क्रांति दल, उत्कल कांग्रेस, केरल कांग्रेस, तेलंगाना प्रजा समिति, बीजू जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल, जनता पार्टी, समाजवादी जनता पार्टी, समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, वाई.एस.आर. कांग्रेस आदि।
  3. क्षेत्रीय दल जिनकी स्थापना करिश्माई व्यक्तित्व के नेताओं ने की है। ऐसे दल व्यक्ति आधारित दल कहलाते हैं और इनकी आयु लम्बी नहीं होती। लोक जनशक्ति पार्टी, हरियाण विकास पार्टी, हिमाचल विकास कांग्रेस, कांग्रेस(जे) आदि दल इसी कोटि में आते हैं।

क्षेत्रीय दलों का उदय

क्षेत्रीय दलों के भारतीय राजनीति में उदय के अनेक कारण हैं, जो निम्नवत् हैं:
  1. भारतीय समाज में सांस्कृतिक एवं नृजातीय बहुलता।
  2. विकास प्रक्रिया में आर्थिक असमानता तथा क्षेत्रीय असंतुलन।
  3. किन्हीं ऐतिहासिक कारकों के चलते वर्गों अथवा क्षेत्रों की अपनी अलग पहचान बनाए रखने की आकांक्षा।
  4. सत्ताच्युत महाराजाओं तथा शक्तिहीन जमींदारों की स्वार्थपरकता।
  5. क्षेत्रीय आकांक्षाओं को तुष्ट करने में राष्ट्रीय राजनीति की विफलता।
  6. भाषाई आधार पर राज्यों का पुनर्गठन ।
  7. क्षेत्रीय नेताओं का करिश्माई नेतृत्व |
  8. बड़े दलों की आंतरिक कलह और संघर्ष
  9. कांग्रेस पार्टी की केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति ।
  10. राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विपक्षी दल की अनुपस्थिति।
  11. राजनीतिक प्रक्रिया में जाति और धर्म की भूमिका।
  12. जनजातीय समूहों में असंतोष और अलगाव की भावना।

क्षेत्रीय दलों की भूमिका

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका को निम्न बिन्दुओं द्वारा रेखांकित किया जा सकता है:
  1. क्षेत्रीय स्तर पर उन्होंने बेहतर अभिशासन के साथ ही स्थिर सरकारें दी हैं।
  2. उनके चलते देश में एकदलीय वर्चस्व को चुनौती मिली है और ये कांग्रेस पार्टी के पराभव का ही कारण बनी हैं।
  3. उन्होंने केन्द्र राज्य सम्बन्धों की प्रवृति और प्रक्रिया पर जबरदस्त प्रभाव डाला है। केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में तनाव के मुद्दों तथा राज्यों के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग ने केन्द्रीय नेतृत्व को क्षेत्रीय कारकों के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाया है।
  4. उन्होंने राजनीति को और प्रतिस्पर्द्धा बनाने के साथ ही जमीनी स्तर पर राजनीतिक प्रक्रिया को विस्तार दिया। 
  5. उनके चलते मतदाता को चुनाव में अधिक विकल्प सुलभ हुए- संसदीय एवं विधानसभा चुनावों में। अब मतदाता उस दल को अपना मत दे सकता है जो उसकी दृष्टि में उसके क्षेत्र या राज्य के हितों का संवर्द्धन कर सके।
  6. उन्होंने लोगों की राजनीतिक चेतना और उनकी राजनीति में रुचि बढ़ा दी है। वे स्थानीय या क्षेत्रीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कराते हैं, परन्तु आम जनता उनका ध्यान तुरंत केंद्रित करती है।
  7. उनके चलते केन्द्र सरकार के तानाशाही रवैये पर रोक लगती है। उन्होंने कतिपय मुद्दों पर कांग्रेस पार्टी का विरोध किया और इस प्रभुत्वशाली दल को सुलह-सफाई के रास्ते पर चलने के लिए बाध्य किया। 
  8. क्षेत्रीय दलों में देश में संसदीय लोकतंत्र को चलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। संसदीय लोकतंत्र में अल्पमत को भी सुना जाना चाहिए और बहुत को अपने रास्ते चलने देना चाहिए। क्षेत्रीय दलों ने इस प्रक्रिया को चलाने में कुछ राज्यों में शासक दल और केन्द्र में विरोधी दल के रूप में अपनी भूमिका निभाई है।
  9. उन्होंने राज्यों के मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति एवं बर्खास्तगी में राज्यपालों की भूमिका को उजागर किया है जिसके तहत उन्होंने राष्ट्रपति के विचारार्थ अध्यादेश जारी किए तथा विधेयकों को आरक्षित किया।
  10. गठबंधन की राजनीति का दौर शुरू होने के पश्चात्, क्षेत्रीय दलों की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी है। वे केन्द्र की गठबंधन सरकारों में शामिल हुए और राष्ट्रीय दलों के साथ सत्ता में हिस्सेदारी की।'

क्षेत्रीय दलों की अंकार्यता

उपरोक्त सकारात्मक भूमिकाओं के रहते भी क्षेत्रीय दलों की कुछ नकारात्मक भूमिकाएं हैं, जो निम्नलिखित हैं:
  1. उन्होंने राष्ट्रीय हितों के ऊपर क्षेत्रीय हितों को रखा, वरीयता दी, राष्ट्रीय मुद्दों और समस्याओं के हल के प्रति अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के चलते वे लापरवाह रहे ।
  2. उनके कारण क्षेत्रवाद, जातिवाद, भाषावाद, सम्प्रदायवाद तथा जातिवाद को बढ़ावा मिला और राष्ट्रीय एकता में रुकावटें आयीं।
  3. अन्तर - राज्य जलविवादों, अन्तर- राज्य सीमा विवादों का समाधान नहीं होने देने के लिए वे ही उत्तरदायी हैं।
  4. उनकी भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, पक्षपात तथा सत्ता के अन्य प्रकार के दुरुपयोगों में संलिप्तता रही और इन सबके पीछे उनकी अपनी स्वार्थपरता ही कारण रही।
  5. उन्होंने लोकलुभावन मुद्दों पर ही अधिक ध्यान दिया ताकि वे अपना जनाधार बढ़ा सकें, मजबूत कर सकें। इसके चलते राज्य की अर्थव्यवस्था और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
  6. वे केंद्र में गठबंधन सरकार द्वारा निर्णय लेने और नीति निर्माण में क्षेत्रीय कारक लाते हैं। वे केंद्रीय नेतृत्व को अपनी मांगों के लिए बाध्य करते हैं। वे केन्द्रीय नेतृत्व को अपनी मांगों पर झुकाने और उन्हें पूरा करने को बाध्य करते हैं।
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