मतदान व्यवहार
मतदान व्यवहार को निर्वाचक व्यवहार के रूप में भी जाना जाता है। यह राजनीतिक व्यवहार का ही एक रूप है। इसका आशय किसी लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली में चुनाव के संदर्भ में मतदाताओं के व्यवहार से है।

मतदान व्यवहार
मतदान व्यवहार का अर्थ
मतदान व्यवहार का महत्व
- यह राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया को समझने में सहायक होता है।
- यह अभिजात्य के साथ-साथ आमजनों में भी लोकतंत्र के अंतस्थिकरण की जांच करने में सहायक होता है।
- यह क्रांतिकारी मत पेटी के वास्तविक प्रभाव का महत्व बताता है।
- यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि चुनावी राजनीति किस हद तक अतीत से जुड़ी है या विच्छेदित है।
- यह राजनीतिक विकास के संदर्भ में आधुनिकता अथवा प्राचीनता को मापने में सहायता करता है।
- लोकतांत्रिक शासन को वैधता प्रदान करने का एक तरीका।
- राजनीतिक प्रक्रिया में सहभागिता का समावेश कर राजनीतिक समुदाय को एकजुट रखना।
- निर्णय निर्माण की क्रिया को दर्शाना।
- एक विशेष प्रकार की राजनीतिक संस्कृति में विनयस्त एक निश्चित राजनीतिक उन्मुखीकरण को संबद्ध करते हुए एक भूमिका अख्तियार करना, अथवा
- एकल नागरिक का औपचारिक सरकार से सीधे संबंध स्थापित होना।
मतदान व्यवहार के निर्धारक
- जाति: जाति मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। जातियों का राजनीतिकरण तथा राजनीति में जातिवाद भारतीय राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषता रही है। रजनी कोठारी के अनुसार, "भारतीय राजनीति जातिवादी है तथा जाति राजनीतिकृत है ।" राजनीतिक दल अपनी चुनावी रणनीति बनाते समय जाति के कारक को हमेशा ध्यान में रखते हैं। पॉल ब्रास ने भारतीय मतदान व्यवहार में जातीय कारक की भूमिका की व्याख्या करते हुए कहा है, "स्थानीय स्तर पर देहात में मतदान व्यवहार का सबसे महत्वपूर्ण कारक जातीय एकता है। बड़ी और महत्वपूर्ण जातियां अपने चुनाव क्षेत्र में अपनी ही जाति के किसी नामी-गिरामी सदस्य को समर्थन देती है या ऐसे राजनीतिक दल को समर्थन देती है जिनसे उनकी जाति के सदस्य अपनी पहचान स्थापित करते हैं। हालाँकि स्थानीय गुट तथा स्थानीय राज्यीय गुटीय गठबंधनों जिनमें अंतरजातीय गठबंधन भी महत्वपूर्ण कारक होते हैं, भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं।"
- धर्म: धर्म एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है जो मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है। राजनीतिक दल सांप्रदायिक प्रचार में शामिल होते हैं और मतदाताओं की धार्मिक भावनाओं का शोषण करते हैं। अनेक सांप्रदायिक पार्टियों के होने से धर्म का भी राजनीतिकरण हुआ है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होते हुए भी कोई दल चुनावी राजनीति में धर्म के प्रभाव की अवहेलना नहीं करता।
- भाषा: भाषायी विचार भी लोगों के मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है। चुनाव के दौरान राजनीतिक दल लोगों की भाषायी भावनाएं उभारकर उनके निर्णय को प्रभावित करते हैं। भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन (1965 में और उसके बाद) यह स्पष्ट रूप से भारतीय राजनीति में भाषायी कारक का महत्व दर्शाता है। तमिलनाडु में डीएमके तथा आंध्र प्रदेश में टीडीपी जैसे दलों का उदय निश्चित रूप से भाषावाद के आधार पर हुआ है।
- क्षेत्र: क्षेत्रवाद तथा उप-क्षेत्रवाद की भी मतदान व्यवहार में महत्वपूर्ण भूमिका है। उप राष्ट्रीयता की संकीर्ण भावनायें अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों के उदय का कारण बनी है। ये क्षेत्रीय दल क्षेत्रीय अस्मिताओं तथा भावनाओं के आधार पर मतदाताओं से मत की अपील करते हैं। कभी-कभी अलगाववादी दल चुनाव बहिष्कार की अपील भी करते हैं ।
- व्यक्तित्वः दल के नेता का करिश्माई व्यक्तित्व भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है। जिस प्रकार जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी तथा नरेन्द्र मोदी की ऊंची छवि ने मतदाताओं को उनके दलों अथवा उनके द्वारा समर्थित दलों के पक्ष में मत देने के लिए प्रभावित किया। उसी प्रकार राज्य स्तर पर भी क्षेत्रीय दल के नेता का करिश्माई व्यक्तित्व चुनावों में लोकप्रिय समर्थन का महत्वपूर्ण कारक रहा है।
- धनः मतदान व्यवहार की व्याख्या करते हुए धन या पैसा की अनदेखी नहीं की जा सकती है। चुनावी खर्चों पर सीमा बांधने के बावजूद करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। मतदाता अपने मत के बदले पैसा या शराब या कोई और वस्तु चाहता है। दूसरे शब्दों में वोट के बदले नोट' का खुलेआम प्रचलन होता है। हालांकि धन मतदाता के निर्णय को सामान्य परिस्थितियों में ही प्रभावित कर पाता है। चुनाव ज्वार की स्थिति में नहीं । पॉल ब्रास ने वेब इलेक्सन को इस प्रकार परिभाषित किया है, "वेब इलेक्सन वह है, जिसमें मतदाताओं के बीच एक ही दिशा में एक प्रवृत्ति बननी शुरू होती है जो कि किसी एक राष्ट्रीय दल अथवा उसके नेता के पक्ष में होती है। यह किसी एक मुद्दे पर अथवा अनेक मुद्दों पर आधारित होती है जो स्थानीय गणना तथा गठबंधनों का अतिक्रमण कर जाता है और बड़ी संख्या में प्रतिबद्ध मतदाताओं को एक ही दिशा में गांव दर गांव और चाय की दुकान तक खींचता जाता है ।
- सत्ताधारी दल का प्रदर्शन: चुनाव के मौके पर प्रत्येक राजनीतिक दल अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी करता है जिसमें मतदाताओं से अनेक प्रकार के वादे किये जाते हैं। इसी चुनावी घोषणा पत्र के आधार पर सत्ताधारी दल के प्रदर्शन का निर्णय किया जाता है। 1977 में कांग्रेस पार्टी की हार तथा 1980 में जनता पार्टी की हार यही दर्शाती है कि सत्ताधारी दल मतदाता व्यवहार को प्रभावित करता है। इस प्रकार एंटी-इंकम्बेन्सी फैक्टर (जिसका अर्थ है सत्ताधारी दल के कार्य प्रदर्शन से असंतोष) निर्वाचकीय व्यवहार का एक निर्धारक तत्व है।
- दलीय पहचानः राजनीतिक दलों के साथ निजी एवं भावनात्मक जुड़ाव की भी मतदान व्यवहार निर्धारित करने में एक भूमिका है। जो लोग किसी दल के साथ अपनी पहचान जोड़ते हैं, वे लाख कमियों एवं खूबियों के बावजूद उसी दल के लिए मतदान करेंगे। दलीय पहचान विशेषकर 1950 तथा 1960 के दशकों में बहुत मतबूत थी। हालाँकि 1970 के बाद इसमें गिरावट आई है।
- विचारधारा: किसी राजनीतिक दल द्वारा पोषित विचारधारा भी मतदाता के निर्णय को प्रभावित करती है। कुछ लोग समाज में कुछ विचारधाराओं, जैसे- साम्यवाद, पूंजीवाद, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, देशभक्ति तथा विकेन्द्रीकरण आदि के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। ऐसे लोग उन्हीं दलों के उम्मीदवारों को मत देते हैं जो उनकी विचारधारा को ही मानते हैं। लेकिन यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि ऐसे लोग गिनती के हैं।
- अन्य कारक: ऊपर प्रस्तुत कारकों के अतिरिक्त कुछ अन्य कारक भी हैं जो भारतीय मतदाता के मतदान व्यवहार को निर्धारित करते हैं। ये निम्नलिखित हैं:
- चुनाव पूर्व घटी कुछ राजनीतिक घटनाएं, जैसे- युद्ध, किसी नेता की हत्या, भ्रष्टाचार की अपकीर्ति आदि।
- चुनाव के समय की आर्थिक दशाएं, जैसे मुद्रास्फीति, खाद्य की कमी, बेरोजगारी आदि।
- गुटबाजी - भारतीय राजनीति में नख से शिख तक व्याप्त एक विशेषता
- आयु - वृद्ध या युवा
- लिंग - पुरुष या महिलाएं
- शिक्षा - शिक्षित या अशिक्षित
- बसावट - ग्रामीण या नगरीय
- वर्ग (आय) - धनी या निर्धन
- परिवार एवं नातेदारी
- उम्मीदवार की उन्मुखता
- चुनाव अभियान
- राजनीतिक परिवार की पृष्ठभूमि
- मीडिया की भूमिका
चुनाव एवं मतदान व्यवहार में मीडिया की भूमिका
- जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126: यह धारा चुनाव सामग्री के सिनेमैटोग्राफी, टेलीविजन या अन्य ऐसे ही उपकरणों के माध्यम से चुनाव सम्पन्न होने के 46 घंटों के अंदर प्रदर्शित करने से रोकती है।
- जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126ए: यह एक्जिट पोल तथा उनके परिणामों के प्रसार पर प्रथम चरण के चुनाव शुरु होने के पहले और अंतिम चरण के चुनाव सम्पन्न होने के आधा घंटा बाद तक की अवधि पर रोक लगाता है। यह सभी राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए है।
- जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 127ए: चुनाव संबंधी पंपलेट, पोस्टर आदि का मुद्रण एवं प्रकाशन आदि इसके द्वारा शासित होता है, जिसके अंतर्गत ऐसी मुद्रित सामग्री पर मुद्रक एवं प्रकाशन का नाम पता मुद्रित रहेगा।
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 171एच: यह चुनाब लड़ रहे उम्मीदवार की अनुमति के बिना विज्ञापन आदि खर्चों पर रोक लगाता है।
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