मतदान व्यवहार

मतदान व्यवहार को निर्वाचक व्यवहार के रूप में भी जाना जाता है। यह राजनीतिक व्यवहार का ही एक रूप है। इसका आशय किसी लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली में चुनाव के संदर्भ में मतदाताओं के व्यवहार से है।

मतदान व्यवहार

मतदान व्यवहार

मतदान व्यवहार का अर्थ

मतदान व्यवहार को निर्वाचक व्यवहार के रूप में भी जाना जाता है। यह राजनीतिक व्यवहार का ही एक रूप है। इसका आशय किसी लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रणाली में चुनाव के संदर्भ में मतदाताओं के व्यवहार से है।
मतदान व्यवहार ( या मतदान व्यवहार का अध्ययन ) को निम्नलिखित तरीकों से परिभाषित किया जा सकता है:
प्लानो एण्ड रिग्स: "सार्वजनिक चुनाव में लोग किस प्रकार वोट देते हैं. इससे संबंधित अध्ययन क्षेत्र ही मतदान व्यवहार है और इसमें वे कारण भी शामिल हैं कि लोग मतदान उसी प्रकार क्यों करते हैं।" 
गार्डन मार्शल: “मतदान व्यवहार का अध्ययन उन निर्धारकों पर एकाग्र होता है कि लोग एक खास तरीके से क्यों मतदान करते हैं तथा इस बारे में लिए गए निर्णय तक कैसे पहुंचते हैं"।
ओइनम कुलाबिधु: "मतदान व्यवहार को ऐसे व्यवहार के रुप में परिभाषित किया जा सकता है जो कि मतदाता की पसंद, प्राथमिकता, विकल्पों, विचारधाराओं, चिंताओं, समझौतों तथा कार्यक्रमों को साफ-साफ प्रतिबिम्बित करता है जो कि विभिन्न मुद्दों से जुड़े होते हैं और समाज तथा राष्ट्र से संबंधित प्रश्नों से संबंधित होते हैं"।
स्टीफन वाजबाई: "मतदान व्यवहार के अंतर्गत वैयक्तिक मनोवैज्ञानिक निमिति तथा उसका राजनीतिक क्रिया के साथ-साथ सांस्कृतिक विन्यास जैसे कि संचार प्रक्रिया तथा चुनावों पर उसका प्रभाव शामिल होते हैं "|

मतदान व्यवहार का महत्व

सेफोलॉजी अर्थात् चुनाव विश्लेषण राजनीतिक विज्ञान की एक शाखा है जिसमें मतदान व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। यह एक नई शब्दावली है जिसे अमेरिकी राजनीति विज्ञानियों तथा राजनीतिक समाजशास्त्रियों ने लोकप्रिय बनाया है।
मतदान का अभिलेखित इतिहास ग्रीक पोलिस तक जाता है। मतदान व्यवहार के लिए आधुनिक शब्द सेफोलॉजी की उत्पति भी शास्त्री ग्रीक सेफ़स (Psephos) से हुई है जिसका अर्थ ऐसे मृदभांडों से है जिनपर कतिपय मत उत्कीर्णित रहते थे, विशेष तौर पर राज्य के लिए खतरनाक वस्तुओं से संबंधित। *
निम्नलिखित कारणों से मतदान व्यवहार का अध्ययन महत्वपूर्ण है:
  1. यह राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया को समझने में सहायक होता है।
  2. यह अभिजात्य के साथ-साथ आमजनों में भी लोकतंत्र के अंतस्थिकरण की जांच करने में सहायक होता है।
  3. यह क्रांतिकारी मत पेटी के वास्तविक प्रभाव का महत्व बताता है।
  4. यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि चुनावी राजनीति किस हद तक अतीत से जुड़ी है या विच्छेदित है।
  5. यह राजनीतिक विकास के संदर्भ में आधुनिकता अथवा प्राचीनता को मापने में सहायता करता है।
एनजीएस किनी के अनुसार मतदान व्यवहार को ऐसे समझ सकते हैं:
  1. लोकतांत्रिक शासन को वैधता प्रदान करने का एक तरीका। 
  2. राजनीतिक प्रक्रिया में सहभागिता का समावेश कर राजनीतिक समुदाय को एकजुट रखना।
  3. निर्णय निर्माण की क्रिया को दर्शाना।
  4. एक विशेष प्रकार की राजनीतिक संस्कृति में विनयस्त एक निश्चित राजनीतिक उन्मुखीकरण को संबद्ध करते हुए एक भूमिका अख्तियार करना, अथवा
  5. एकल नागरिक का औपचारिक सरकार से सीधे संबंध स्थापित होना।

मतदान व्यवहार के निर्धारक

भारतीय समाज अपने प्रकृति एवं रचना में अत्यंत विविध है। इसलिए भारत में मतदान व्यवहार को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं। ये कारक दो बड़ी कोटियों में बांटे जा सकते हैं- सामाजिक-आर्थिक कारक तथा राजनीतिक कारक। इनकी व्याख्या नीचे दी गई है।
  1. जाति: जाति मतदाताओं के व्यवहार को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है। जातियों का राजनीतिकरण तथा राजनीति में जातिवाद भारतीय राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषता रही है। रजनी कोठारी के अनुसार, "भारतीय राजनीति जातिवादी है तथा जाति राजनीतिकृत है ।" राजनीतिक दल अपनी चुनावी रणनीति बनाते समय जाति के कारक को हमेशा ध्यान में रखते हैं। पॉल ब्रास ने भारतीय मतदान व्यवहार में जातीय कारक की भूमिका की व्याख्या करते हुए कहा है, "स्थानीय स्तर पर देहात में मतदान व्यवहार का सबसे महत्वपूर्ण कारक जातीय एकता है। बड़ी और महत्वपूर्ण जातियां अपने चुनाव क्षेत्र में अपनी ही जाति के किसी नामी-गिरामी सदस्य को समर्थन देती है या ऐसे राजनीतिक दल को समर्थन देती है जिनसे उनकी जाति के सदस्य अपनी पहचान स्थापित करते हैं। हालाँकि स्थानीय गुट तथा स्थानीय राज्यीय गुटीय गठबंधनों जिनमें अंतरजातीय गठबंधन भी महत्वपूर्ण कारक होते हैं, भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करते हैं।"
  2. धर्म: धर्म एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है जो मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है। राजनीतिक दल सांप्रदायिक प्रचार में शामिल होते हैं और मतदाताओं की धार्मिक भावनाओं का शोषण करते हैं। अनेक सांप्रदायिक पार्टियों के होने से धर्म का भी राजनीतिकरण हुआ है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होते हुए भी कोई दल चुनावी राजनीति में धर्म के प्रभाव की अवहेलना नहीं करता।
  3. भाषा: भाषायी विचार भी लोगों के मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है। चुनाव के दौरान राजनीतिक दल लोगों की भाषायी भावनाएं उभारकर उनके निर्णय को प्रभावित करते हैं। भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन (1965 में और उसके बाद) यह स्पष्ट रूप से भारतीय राजनीति में भाषायी कारक का महत्व दर्शाता है। तमिलनाडु में डीएमके तथा आंध्र प्रदेश में टीडीपी जैसे दलों का उदय निश्चित रूप से भाषावाद के आधार पर हुआ है।
  4. क्षेत्र: क्षेत्रवाद तथा उप-क्षेत्रवाद की भी मतदान व्यवहार में महत्वपूर्ण भूमिका है। उप राष्ट्रीयता की संकीर्ण भावनायें अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों के उदय का कारण बनी है। ये क्षेत्रीय दल क्षेत्रीय अस्मिताओं तथा भावनाओं के आधार पर मतदाताओं से मत की अपील करते हैं। कभी-कभी अलगाववादी दल चुनाव बहिष्कार की अपील भी करते हैं ।
  5. व्यक्तित्वः दल के नेता का करिश्माई व्यक्तित्व भी मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है। जिस प्रकार जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी तथा नरेन्द्र मोदी की ऊंची छवि ने मतदाताओं को उनके दलों अथवा उनके द्वारा समर्थित दलों के पक्ष में मत देने के लिए प्रभावित किया। उसी प्रकार राज्य स्तर पर भी क्षेत्रीय दल के नेता का करिश्माई व्यक्तित्व चुनावों में लोकप्रिय समर्थन का महत्वपूर्ण कारक रहा है।
  6. धनः मतदान व्यवहार की व्याख्या करते हुए धन या पैसा की अनदेखी नहीं की जा सकती है। चुनावी खर्चों पर सीमा बांधने के बावजूद करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। मतदाता अपने मत के बदले पैसा या शराब या कोई और वस्तु चाहता है। दूसरे शब्दों में वोट के बदले नोट' का खुलेआम प्रचलन होता है। हालांकि धन मतदाता के निर्णय को सामान्य परिस्थितियों में ही प्रभावित कर पाता है। चुनाव ज्वार की स्थिति में नहीं । पॉल ब्रास ने वेब इलेक्सन को इस प्रकार परिभाषित किया है, "वेब इलेक्सन वह है, जिसमें मतदाताओं के बीच एक ही दिशा में एक प्रवृत्ति बननी शुरू होती है जो कि किसी एक राष्ट्रीय दल अथवा उसके नेता के पक्ष में होती है। यह किसी एक मुद्दे पर अथवा अनेक मुद्दों पर आधारित होती है जो स्थानीय गणना तथा गठबंधनों का अतिक्रमण कर जाता है और बड़ी संख्या में प्रतिबद्ध मतदाताओं को एक ही दिशा में गांव दर गांव और चाय की दुकान तक खींचता जाता है । 
  7. सत्ताधारी दल का प्रदर्शन: चुनाव के मौके पर प्रत्येक राजनीतिक दल अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी करता है जिसमें मतदाताओं से अनेक प्रकार के वादे किये जाते हैं। इसी चुनावी घोषणा पत्र के आधार पर सत्ताधारी दल के प्रदर्शन का निर्णय किया जाता है। 1977 में कांग्रेस पार्टी की हार तथा 1980 में जनता पार्टी की हार यही दर्शाती है कि सत्ताधारी दल मतदाता व्यवहार को प्रभावित करता है। इस प्रकार एंटी-इंकम्बेन्सी फैक्टर (जिसका अर्थ है सत्ताधारी दल के कार्य प्रदर्शन से असंतोष) निर्वाचकीय व्यवहार का एक निर्धारक तत्व है।
  8. दलीय पहचानः राजनीतिक दलों के साथ निजी एवं भावनात्मक जुड़ाव की भी मतदान व्यवहार निर्धारित करने में एक भूमिका है। जो लोग किसी दल के साथ अपनी पहचान जोड़ते हैं, वे लाख कमियों एवं खूबियों के बावजूद उसी दल के लिए मतदान करेंगे। दलीय पहचान विशेषकर 1950 तथा 1960 के दशकों में बहुत मतबूत थी। हालाँकि 1970 के बाद इसमें गिरावट आई है।
  9. विचारधारा: किसी राजनीतिक दल द्वारा पोषित विचारधारा भी मतदाता के निर्णय को प्रभावित करती है। कुछ लोग समाज में कुछ विचारधाराओं, जैसे- साम्यवाद, पूंजीवाद, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, देशभक्ति तथा विकेन्द्रीकरण आदि के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। ऐसे लोग उन्हीं दलों के उम्मीदवारों को मत देते हैं जो उनकी विचारधारा को ही मानते हैं। लेकिन यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि ऐसे लोग गिनती के हैं।
  10. अन्य कारक: ऊपर प्रस्तुत कारकों के अतिरिक्त कुछ अन्य कारक भी हैं जो भारतीय मतदाता के मतदान व्यवहार को निर्धारित करते हैं। ये निम्नलिखित हैं:
    1. चुनाव पूर्व घटी कुछ राजनीतिक घटनाएं, जैसे- युद्ध, किसी नेता की हत्या, भ्रष्टाचार की अपकीर्ति आदि।
    2. चुनाव के समय की आर्थिक दशाएं, जैसे मुद्रास्फीति, खाद्य की कमी, बेरोजगारी आदि।
    3. गुटबाजी - भारतीय राजनीति में नख से शिख तक व्याप्त एक विशेषता
    4. आयु - वृद्ध या युवा
    5. लिंग - पुरुष या महिलाएं 
    6. शिक्षा - शिक्षित या अशिक्षित
    7. बसावट - ग्रामीण या नगरीय
    8. वर्ग (आय) - धनी या निर्धन
    9. परिवार एवं नातेदारी
    10. उम्मीदवार की उन्मुखता
    11. चुनाव अभियान
    12. राजनीतिक परिवार की पृष्ठभूमि
    13. मीडिया की भूमिका

चुनाव एवं मतदान व्यवहार में मीडिया की भूमिका

निम्नलिखित बिन्दु चुनाव एवं मतदान व्यवहार में मीडिया की भूमिका दर्शाते हैं:
1. सूचना प्रसार
चुनाव से संबंधित सूचना प्रसार, विशेषकर चुनाव प्रक्रिया के दौरान, सभी हितधारकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। चुनाव की घोषणा, नामांकन, जांच, चुनाव अभियान, सुरक्षा व्यवस्था, मतगण ना तथा परिणाम की घोषणा आदि। इन सबको व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार की जरूरत होती है। मतदाताओं को कुछ बुनियादी बातों की जानकारी, जैसे- चुनाव कब, कहां व कैसे की जानकारी मीडिया से ही मिलती है। यहां तक कि अंतिम समय में हुए परिवर्तनों, मतदान आयोजनों, आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन, चुनावी खर्च सीमा का उल्लंघन, किसी प्रकार की कोई दुर्घटना अथवा अशांति आदि की सूचना न केवल आम लोगों को, बल्कि चुनाव आयोग को भी मीडिया से ही मिलती है।
समाचार पत्रों एवं समाचार चैनलों ने उत्साहपूर्वक उम्मीदवारों की शैक्षणिक एवं आर्थिक स्थिति तथा उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि संबंधी सूचनाओं का भरपूर उपयोग किया है, जो कि उनके द्वारा दायर शपथ-पत्र में होती है और जिन्हें चुनाव आयोग तत्काल ही अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित कर देता है। चुनाव प्रणाली में ईमानदारी एवं पारदर्शिता को यह और बढ़ा देता है।
2. आदर्श आचार संहिता तथा अन्य कानून
आज के लोकतांत्रिक एवं राजनीतिक भूदृश्य में एक 'वाच डॉग' या प्रहरी के रूप में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मीडिया पेशी बल एवं धन-बल की घटनाओं को फौरन उभारता है तथा मतदाता को नैतिक एवं प्रलोभनरहित मतदान के लिए शिक्षित करता है। यह आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों को भी ला सकता है, जैसे - घृणा प्रसार वाले भाषण, तथा मतदाताओं को प्रभावित करने वाले आधारहीन या अप्रत्याशित आरोप, आदि। मीडिया के इन उल्लंघन संबंधी रिपोर्टों का चुनाव आयोग उसी प्रकार संज्ञान लेता है जैसे कि औपचारिक शिकायतों का।
मीडिया राजनीतिक कार्यकर्ताओं तथा मतदाताओं को आदर्श आचार संहिता के प्रति संवेदित करता है, बल्कि उन कानून के प्रति भी जो चुनाव का प्रशासन करते हैं।
3. चुनाव कानूनों का पालन
चुनाव आयोग मीडिया का नियमन नहीं करता, लेकिन उस पर कानूनी प्रावधानों एवं न्यायालय के आदेशों का पालन करने का दायित्व होता है और इसका संबंध मीडिया से अथवा उसके कामकाज के कुछ पक्षों से अवश्य होता है। चुनाव के दौरान मीडिया उपस्थित और हर स्तर पर सक्रिय रहता है और इसका मतलब है कि मीडिया को भी चुनाव कानूनों का पालन करना पड़ता है। ये कानून निम्नवत् हैं:
  1. जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126: यह धारा चुनाव सामग्री के सिनेमैटोग्राफी, टेलीविजन या अन्य ऐसे ही उपकरणों के माध्यम से चुनाव सम्पन्न होने के 46 घंटों के अंदर प्रदर्शित करने से रोकती है।
  2. जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126ए: यह एक्जिट पोल तथा उनके परिणामों के प्रसार पर प्रथम चरण के चुनाव शुरु होने के पहले और अंतिम चरण के चुनाव सम्पन्न होने के आधा घंटा बाद तक की अवधि पर रोक लगाता है। यह सभी राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए है।
  3. जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 127ए: चुनाव संबंधी पंपलेट, पोस्टर आदि का मुद्रण एवं प्रकाशन आदि इसके द्वारा शासित होता है, जिसके अंतर्गत ऐसी मुद्रित सामग्री पर मुद्रक एवं प्रकाशन का नाम पता मुद्रित रहेगा।
  4. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 171एच: यह चुनाब लड़ रहे उम्मीदवार की अनुमति के बिना विज्ञापन आदि खर्चों पर रोक लगाता है।
4. मतदाता शिक्षण एवं सहभागिता
मतदाता जागरूकता एवं सहभागिता सुनिश्चित करने की मीडिया की प्रतिबद्धतापूर्ण साझेदारी की बहुत बड़ी गुंजाइश है। यह चुनाव आयोग मीडिया के बीच संबंधों का बहुत संभावनाशील क्षेत्र है।
मतदाता को जो जानना चाहिए और जो कानून को जानते हैं - इन दोनों के बीच हमेशा से एक अंतर रहा है; विशेषत: निबंधन, ईपीआईसी पहचान प्रमाण, मतदान केन्द्र की परिस्थिति, ईवीएम के उपयोग, चुनाब का समय, घन-बल/बाहुबल का उम्मीदवारों द्वारा उपयोग। मतदाता को इस बारे में पूर्ण जानकारी होनी चाहिए जब वह मतदान के दिन अपने मताधिकार का उपयोग करने जाता है/जाती है।
मतदाता शिक्षण एक ऐसा वातावरण बनाने में सहायक है जिससे लोग लोकतांत्रिक मूल्यों को ग्रहण करते हैं। मीडिया एवं नागरिक समाज की ऐसे बातावरण को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका है। समाज के सभी वर्गों के मतदाताओं की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए उनमें जागरुकता बढ़ाना जरूरी है, विशेषकर नवयुवकों, बेरोजगारों, दूर-दराज के इलाकों के लोगों, तथा सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को जागरूक बनाना आवश्यक है। समाज के ऐसे हिस्सों के सम्पर्क मीडिया के माध्यम से संभव है। इसके अलावा नागरिक समाज तथा क्षेत्र आधारित संगठनों की भी इसमें जरूरी भूमिका है। चुनाव आयोग के पास आयोग एवं मीडिया घरानों/ संस्थाओं के बीच परस्पर सहयोग के लिए आपसी संलग्नता का एक फ्रेमवर्क अथवा खाका मौजूद है। आयोग मीडिया से यह उम्मीद करता है कि वह लोगों को लोकतांत्रिक चुनावों में भाग लेने के लिए स्वैच्छिक रूप से सूचित व प्रेरित करें और एक संविधा प्रदायक की भी भूमिका निभाए।
5. सरकारी मीडिया का दायित्व
चुनाव संबंधी समाचारों एवं विश्लेषणों के प्रसारण में सार्वजनिक प्रसारक या पब्लिक ब्रोडकास्टर से अपेक्षा की जाती है कि वे तटस्थता व वस्तुपरकता के उदाहरण प्रस्तुत करें एवं विभिन्न दिशा-निर्देशों का पालन करें,
चुनाव आयोग का प्रसार भारती के साथ अच्छा तालमेल है जिसके अंतर्गत मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय एवं राज्यस्तरीय दलों को निःशुल्क प्रसारण समय प्रदान किया जाता है ताकि चुनाव प्रचार-प्रसार के मामले में बराबरी के आधार पर लड़ा जा सके। इस तरीके से राजनीतिक दल देश के किसी भी कोने तक पहुंच सकती है। यही नहीं मतदाता जागरूकता प्रसार तथा आम लोगों को उनके मताधिकार के बारे में शिक्षित करने के प्रसार भारती का महत्वपूर्ण योगदान है जिससे चुनाव प्रक्रिया में सबको शामिल करता संभव हो सका।
चुनाव आयोग पीआईबी, डीएवीपी, राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम, क्षेत्रीय प्रचार निदेशालय, सांग एंड ड्रामा डिविजन सहित अनेक केन्द्रीय एवं राज्य स्तरीय सूचना निदेशालययों/ विभागों को इस दायित्व में हिस्सेदारी के लिए आगे आने का आह्वान करता है।
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