झारखण्ड में पर्यावरण संबंधी तथ्य

झारखण्ड में पर्यावरण संबंधी तथ्य
> हमारे चारों ओर जैविक तथा अजैविक घटकों से निर्मित वातावरण को पर्यावरण कहा जाता है। इसके जैविक घटकों में सूक्ष्म जीवों से लेकर सभी जीव-जन्तु तथा पेड़-पौधे शामिल हैं। अजैविक घटकों में सभी निर्जीव तत्व जैसे- वायु, जल, मृदा, पर्वत, पठार, चट्टान आदि और उनसे जुड़ी गतिविधियाँ शामिल हैं।
> पर्यावरण को मुख्यतः प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक/मानवनिर्मित पर्यावरण में वर्गीकृत किया जा सकता है।
> प्राकृतिक पर्यावरण के अंतर्गत पर्यावरण के ऐसे घटकों को शामिल किया जाता है, जिनका निर्माण प्रकृति द्वारा किया गया है जैसे- वायु, जल, मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु आदि । अर्थात् मानवीय क्रियाकलापों द्वारा अविक्षुब्ध पर्यावरण प्राकृतिक पर्यावरण कहलाता है।
> प्राकृतिक पर्यावरण में मानवीय हस्तक्षेप द्वारा होने वाले परिवर्तन को सांस्कृतिक पर्यावरण कहा जाता है। उद्योगों का विकास, नगरीकरण, परिवहन व्यवस्था, कृषि आदि सांस्कृतिक पर्यावरण के अंग हैं।
> मानव द्वारा प्राकृतिक पर्यावरण में लगातार हो रहे हस्तक्षेपों ने विश्व जगत के सामने प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास और विभिन्न प्राकृतिक आपदा की समस्या उत्पन्न कर दी है, जिसके समाधान हेतु उचित कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
> पर्यावरण प्रदूषण
> हमारे पर्यावरण में अवांछित तत्वों का प्रवेश पर्यावरण प्रदूषण कहलाता है। इन अवांछित तत्वों को प्रदूषक कहा जाता है। प्रदूषक ठोस, द्रव तथा गैस पदार्थ के रूप में अथवा ध्वनि, उष्मा, रेडियोधर्मिता आदि ऊर्जा के रूप में हो सकते हैं।
> प्रदूषक के प्रकार तथा स्रोत के आधार पर प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं, जैसे – 
1. वायु प्रदूषण
2. जल प्रदूषण
3. मृदा प्रदूषण
4. ध्वनि प्रदूषण
5. ताप प्रदूषण
1. वायु प्रदूषण
> वातावरण में विभिन्न प्रकार के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक तत्वों के मिश्रण के परिणामस्वरूप वायुमंडल में उपस्थित गैसों की मात्रा या अनुपात में असंतुलन होना वायु प्रदूषण कहलाता है। ।
> वर्तमान समय में मानवकृत विकास द्वारा उत्सर्जित प्रदूषकों ने वायु प्रदूषण में सर्वाधिक वृद्धि की है।
>  वायु प्रदूषण हेतु जिम्मेदार प्रमुख कारण निम्नवत् हैं
> मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जंगलों की अंधाधुंध कटाई, जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरण में ऑक्सीजन की मात्रा में कमी आती हैं, वहीं दूसरी ओर कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि होती है। 
> उद्योगों तथा वाहनों से निकलने वाले धुएँ एवं प्रदूषक, जिसमें सल्फर के ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, कार्बन मोनोक्साइड, कार्बन डाई आक्साइड जैसी हानिकारक गैसें शामिल हैं। 
> कृषि कार्य में दलदली भूमि से मिथेन का उत्सर्जन, जो एक प्रमुख हरित गृह गैस है। 
> हरित गृह प्रभाव में वृद्धि
> हरित गृह प्रभाव में वृद्धि के लिए कार्बन डाई ऑक्साइड गैस की बढ़ती मात्रा सर्वाधिक जिम्मेदार है। जलावन की लकड़ी को प्रयोग, जीवाश्म ईंधन का प्रयोग तथा अन्य कार्यों हेतु वृक्षों का कटाव इसके प्रमुख कारण हैं।
> इसके अतिरिक्त मिथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, हाइड्रोफ्लोरो कार्बन, सल्फर के ऑक्साइड व नाइट्रोजन के आ. क्साइड हरित गृह गैस में शामिल किए जाते हैं।
> हरित गृह गैसों के प्रभाव में वृद्धि परिणामस्वरूप पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि हुई है जिसने भूमण्डलीय उष्मण जैसी समस्या को जन्म दिया है।
> भूमण्डलीय उष्मण
> भूमण्डलीय उष्मण के प्रभावस्वरूप जहाँ पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि हुई है, वहीं वायुमंडलीय आर्द्रता की अधिकता के कारण वर्षा की मात्रा में भी वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप उष्णकटिबंधीय चक्रवात की आवृत्ति एवं तीव्रता में वृद्धि के कारण तटीय तथा तटों से संबंधित क्षेत्रों में चक्रवातीय वर्षा होती है। लगभग प्रत्येक वर्ष बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न चक्रवातीय वर्षा का प्रभाव झारखण्ड राज्य में भी होता है, जिसके परिण मस्वरूप कई बार जानमाल की हानि तक हो जाती है।
> भूमंडलीय उष्मण के परिणामस्वरूप जलधाराओं के प्रतिरूप में परिर्वतन होता है। इसके कारण एल-नीनो की उत्पत्ति एवं समय अंतराल में कमी आयी है। इसका प्रभाव भारत की मानसूनी जलवायु पर पड़ा है तथा इसने भारत की कृषि व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।
> ओजोन क्षरण
> हमारे वायुमंडल में ओजोन परत सूर्य से आनेवाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर हमें चर्म कैंसर तथा अन्य गंभीर रोगों से बचाने हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है।
> हाल के वर्षों में क्लोरोफ्लोरो कार्बन की मात्रा में वृद्धि के परिणामस्वरूप ओजोन मंडल का ह्रास हुआ है, जिसे ओजोन क्षरण के नाम से जाना जाता है।
> ओजोन क्षरण के परिणामस्वरूप पराबैंगनी किरणों की तीव्रता में वृद्धि हुई है जिसने भूमण्डलीय उष्मण की दर को बढ़ाने के साथ-साथ वनस्पति जगत के प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है ।
> झारखण्ड जैसे वनस्पति बाहुल्य राज्य में भी इसके नकारात्मक प्रभाव परिलक्षित होते हैं। इसने वनस्पति की उत्पादकता को कम कर पारिस्थितिकी तंत्र को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है, जिसके परिणामस्वरूप जैव विविधता का ह्रास हुआ है।
> इसके अतिरिक्त ओजोन क्षरण जैविक घटकों की आनुवंशिक संरचना में परिवर्तन कर आनुवंशिक गुणों को ह्रास करता है जिसके परिणामस्वरूप जैविक समुदाय की प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
> वर्तमान समय में मानव समुदाय को त्वचा कैंसर, मोतियाबिंद तथा आँख व त्वचा से संबंधित अन्य बिमारियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिए ओजोन क्षरण प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। 
> अम्लीय वर्षा
> जीवाश्म ईंधन के बढ़ते प्रयोग से वायुमंडल में सल्फर तथा नाइट्रोजन के ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो अम्लीय वर्षा के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।
> झारखण्ड राज्य में वनों पर आधारित जनजातीय समुदाय तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन जैसे- जलावन के लिए लकड़ी का प्रयोग के प्रति जागरूकता का अभाव है।
> साथ ही नए राज्य के निर्माण के पश्चात् राज्य में वाहनों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई जिसमें जीवाश्म ईंधन यथा- डीजल व पेट्रोल का प्रयोग किया जाता है।
> अम्लीय वर्षा के दुष्परिणाम –
> मृदा की अम्लीयता में वृद्धि के कारण उर्वरता में कमी।
> जल प्रदूषण के कारण जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव तथा जैव विविधता का ह्रास। 
> ऐतिहासिक इमारतों में रासायनिक परिवर्तन के फलस्वरूप क्षरण ।
2. जल प्रदूषण
> जल में घुलनशील अथवा अघुलनशील पर्दाथों की मात्रा में वृद्धि के कारण जब जल की गुणवत्ता जैसे- रंग, स्वाद आदि में परिवर्तन आता है, तो उसे 'जल प्रदूषण' कहा जाता है। 
> जल प्रदूषण के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण निम्नवत् हैं
> विभिन्न जल स्रोतों में दैनिक जीवन में प्रयुक्त अपशिष्ट पदार्थो जैसे- मल-मूत्र, प्लास्टिक, कचरे, डिटर्जेंट आदि का प्रवाह । 
> जल स्रोतों में उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थो जैसे- रसायन, कचरे, अम्ल तथा क्षार आदि का प्रवाह ।
> कृषि कार्यों में प्रयुक्त कीटनाशकों तथा रसायनों का वर्षा जल में घुलकर नदियों में मिलना।
> जल प्रदूषण के परिणामस्वरूप एक अशुद्ध पेयजल की समस्या उत्पन्न होती है, जो मानवीय स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। साथ ही अशुद्ध जल मृदा घुलकर उसकी उर्वरता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है, जिसके परिणामस्वरूप जैव विविधता का ह्रास होता है।
3. मृदा प्रदूषण
> मृदा के भौतिक, रासायनिक तथा जैविक गुणों में होने वाला अवांछनीय परिवर्तन 'मृदा प्रदूषण' कहलाता है।
> मृदा प्रदूषण के परिणामस्वरूप मृदा की गुणवत्ता में कमी होती है, जिसके परिणामस्वरूप वनस्पति की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
> मृदा प्रदूषण एक ओर जहाँ मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, वहीं दूसरी ओर इसका नकारात्मक प्रभाव जैव विविधता पर भी पड़ता है।
> मृदा प्रदूषण के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण हैं
>> प्लास्टिक की थैलियों का प्रयोग। 
>> रसायनों एवं कीटनाशकों का प्रयोग।
>> वन अपरोपण के कारण मृदा का ह्रास ।
>> जल प्रदूषण। 
4. ध्वनि प्रदूषण
> ध्वनि की ऐसी मात्रा जो अवांछनीय तरीके से जीव-जन्तुओं के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को दुष्प्रभावित करता है।
> वैश्विक स्तर पर दिन के समय 45 डेसीबल तथा रात में 35 डेसीबल से अधिक ध्वनि को मानवीय स्वास्थ्य हेतु अनुपयुक्त माना जाता है।
> ध्वनि प्रदूषण के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण निम्नवत् हैं –
>> मानव द्वारा उत्पन्न शोरगुल जिसमें उद्योगों, परिवहन, मनोरंजन के लिए निकाले गये ध्वनि शामिल हैं। 
>> प्राकृतिक रूप से आँधी - तुफान, वर्षा, बिजली, तुफान, चक्रवात आदि के कारण उत्पन्न ध्वनि। 
5. ताप प्रदूषण 
> जीवाश्म ईंधन तथा नाभिकीय ऊर्जा हेतु संचालित संयंत्रों को ठंडा रखने हेतु प्रयुक्त जल, जिसका तापमान अधिक होता है, के कारण ताप प्रदूषण उत्पन्न होता है। 
> इस प्रकार के प्रदूषण से पर्यावरण के साथ-साथ जीव-जन्तुओं के स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है।
> जलवायु परिवर्तन
> जलवायु परिवर्तन का तात्पर्य हमारी जलवायु में एक निश्चित समय के पश्चात् होने वाले परिवर्तन से है। सामान्यतः इसके लिए 15 वर्ष की समय सीमा का निर्धारण किया जाता है।
> वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन हमारे समक्ष एक गंभीर चुनौती के रूप में उभरा है, जिसने जैवमण्डल के अस्तित्व पर एक प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
> जलवायु परिवर्तन के लिए कई प्रमुख कारण जिम्मेदार हैं जिनमें हरित गृह गैसों की मात्रा में वृद्धि, ओजोन क्षरक की मात्रा में वृद्धि तथा अम्लीय वर्षा के लिए उत्तरदायी तत्वों की मात्रा में वृद्धि प्रमुख हैं।
> जलवायु परिवर्तन ने हमारे समक्ष निम्न समस्याओं को उत्पन्न किया है –
>> इसके परिणामस्वरूप निम्न अक्षांशीय क्षेत्रों के आर्द्र जलवायु प्रदेश में वायुमंडलीय आर्द्रता की मात्रा में वृद्धि के कारण वर्षा की मात्रा में वृद्धि होगी। साथ ही इस क्षेत्र में उष्णकटिबंधीय चक्रवात की आवृत्ति और तीव्रता में भी वृद्धि होगी। इसके फलस्वरूप अधिक वर्षा के कारण बाढ़ की समस्या उत्पन्न होगी। 
>> वहीं दूसरी ओर शुष्क और अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेशों में वाष्पीकरण का दर अधिक होने के कारण जलीय स्रोतों के सूख जाने की संभावना है जिसके कारण सूखा के प्रभाव नजर आ सकते हैं। 
>> मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में वाताग्री चक्रवात के विकास के कारण बाढ़ की समस्या तथा उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में हिमगलन से जलभराव तथा समुद्र जलस्तर में वृद्धि की समस्याएँ बढ़ जाएंगी।
> जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को देखते हुए वैश्विक स्तर पर निम्न प्रयास किए गए हैं – 
>> सन् 1979 में पहली बार स्वीट्जरलैंड के जेनेवा में जलवायु सम्मेलन का आयोजन किया गया। वर्ष 1990 में दूसरी बार जलवायु सम्मेलन का आयोजन किया गया।
>> सन् 1985 में आस्ट्रिया के वियना में वियना कन्वेंशन का आयोजन किया गया जिसमें ओजोन क्षरण हेतु उत्तरदायी पदार्थों (क्लोरोफ्लोरो कार्बन एवं मिथाइल ब्रोमाइड) के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का विचार किया गया। 
>> 16 सितम्बर, 1987 को कनाडा के मांट्रियल में क्लोरोफ्लोरो कार्बन पर प्रतिबंध लगाने हेतु एक बाध्यकारी समझौता किया गया ताकि ओजोन क्षरण को रोका जा सके। इसी कारण 16 सितंबर को प्रतिवर्ष ओजोन संरक्षण दिवस के रूप में मनाया जाता है। 
>> वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो में पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन किया गया इसमें 'यूनाइटेड नेशन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज' का गठन किया गया।
>> वर्ष 1994 से वैश्विक स्तर पर कोप सम्मेलन का आयोजन प्रारंभ किया गया।
>> वर्ष 1997 में जापान के क्योटो कार्बन उत्सर्जन की कटौती को लेकर एक बाध्यकारी समझौता किया गया जिसे ‘क्योटो प्रोटोकॉल' के नाम से जाना जाता है। 
> झारखण्ड राज्य में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की सहायता से एक राज्य जलवायु केन्द्र की स्थापना की गयी है।
> राज्य में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय योजना को 30 जून, 2008 को जारी किया गया था जबकि वर्ष 2013 * में राज्य में 'जलवायु परिवर्तन पर झारखण्ड कार्य योजना' (SAPCC) का प्रकाशन किया गया। इस रिपोर्ट के अनुसार राज्य का सरायकेला-खरसावां जिला सर्वाधिक संवेदनशील जिला * है।
> जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत (NAPCC) के तहत राज्य के सरायकेला-खरसावां  को ग्रीन इण्डिया मिशन हेतु चुना गया है।
> CCKN-IA
> भारतीय कृषि में जलवायु परिवर्तन नॉलेज नेटवर्क (CCKN-IA) की शुरूआत वर्ष 2013 में की गयी है। 
> इस पहल का प्रमुख उद्देश्य नवोन्मेष सूचना एवं संचार तकनीक आधारित प्लेटफार्म का प्रयोग करने हेतु कृषि मंत्रालय के साथ सहयोग करना है। 
> भारत में इसे झारखण्ड, महाराष्ट्र तथा ओडिसा तीन राज्यों में प्रारंभ किया गया है।
> जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से झारखण्ड राज्य भी अछूता नहीं है ।
> राज्य की कुल भूमि के 23 प्रतिशत भाग पर कृषि कार्य किया जाता है। राज्य की कृषि मूलतः मानसूनी जलवायु पर आधारित है।
> भारत के 15 कृषि जलवायु प्रदेशों में तीन कृषि जलवायु प्रदेश झारखण्ड राज्य में स्थित हैं। इनमें मध्य एवं उत्तरी-पूर्वी पठारी उप- कृषि जलवायु प्रदेश, पश्चिमी पठारी उप-कृषि जलवायु प्रदेश तथा दक्षिणी-पूर्वी पठारी प - कृषि जलवायु प्रदेश शामिल हैं। उप
> झारखण्ड राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान लगभग 17 प्रतिशत है तथा राज्य की 70 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आजीविका हेतु कृषि पर निर्भर है।
> राज्य में औसत वार्षिक वर्षा 1149.3 मिमी. है जिसका 83 प्रतिशत दक्षिणी-पश्चिमी मानसून से प्राप्त होता है। 6.5 प्रतिशत वर्षा की प्राप्ति लौटते हुए मानसून से, 4 प्रतिशत पश्चिमी विक्षोभ के कारण तथा शेष 6.5 प्रतिशत मानसून पूर्व की वर्षा द्वारा प्राप्त होती है।
> पिछले 100 वर्षों में झारखण्ड क्षेत्र में 150 मिमी. वर्षा की मात्रा में कमी आयी है जो जलवायु परिवर्तन का परिणाम है।
> जलवायु परिवर्तन ने राज्य की कृषि उत्पादकता, कृषि दक्षता तथा कृषि प्रतिरूप को प्रभावित किया है।
> झारखण्ड में पर्यावरण संरक्षण
> झारखण्ड राज्य अपनी जलवायु तथा जैव-विविधता हेतु राष्ट्रीय स्तर पर प्रख्यात है। राज्य के जंगलों में विभिन्न प्रकार के पेड़, औषधीय पौधे, जड़ी-बूटी तथा फल-फूल के वृक्ष-पौधे पाये जाते हैं।
 > राज्य के नेतरहाट, पिठोरिया घाटी, सारंडा के जंगल, पारसनाथ पहाड़ी, दालमा पहाड़ी, हजारीबाग के वन, पलामू के वन आदि जैव विविधता की दृष्टि से अत्यंत संपन्न हैं।
> पिछले वर्षों में लगातार बढ़ते प्रदूषण ने राज्य की जैव विविधता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। राज्य में जानवरों की विलुप्त होती प्रजातियाँ तथा महत्वपूर्ण पेड़-पौधों की संख्या में कमी इसके उदाहरण हैं।
> राज्य में विकास कार्यक्रमों को गति देने हेतु उद्योगों की स्थापना, सड़कों का निर्माण, कृषि कार्य का विस्तार आदि के कारण वृक्षों की व्यापक पैमाने पर कटाई की जा रही है। परिणामतः पर्यावरण प्रदूषण के साथ-साथ जैव विविधता का भी ह्रास हुआ है।
> राज्य में वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा प्राकृतिक संसाधनों, वन्य जीव तथा जैव विविधता के संरक्षण हेतु तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। विभाग द्वारा इस हेतु व्यापक पैमाने पर वनरोपण, वन संरक्षण हेतु जागरूकता अभियान तथा प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु विधिक उपाय किए जा रहे हैं।
> पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न होने के कारण विलुप्त होने वाले जीव-जंतुओं में गिद्धों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। राज्य में गिद्ध की तीन प्रजातियाँ जिप्स बेंगलेंसिस, जिप्स इंडिकस तथा आजिप्शियन पायी जाती है। इनकी विलुप्ति का प्रमुख कारण डाईक्लोफेनेक नामक दर्द निवारक दवा है, जिसका प्रयोग पशुओं के इलाज में किया जाता है। साथ ही गिद्धों के प्राकृतिक आवास मुख्यतः पेड़ों की कटाई भी इनकी संख्या में कमी का एक महत्वपूर्ण कारक है।
> राज्य में वनाच्छादित क्षेत्रों की वृद्धि हेतु वर्ष 2015 मे 'मुख्यमंत्री जन वन योजना' की शुरूआत की गई है। इसके माध्यम से निजी भूमि पर वृक्षारोपण हेतु लोगों को प्रोत्साहित किया जाता है। इस योजना के तहत लोगों को प्रोत्साहन राशि के रूप में वृक्षारोपण एवं उसके रख-रखाव पर हुए व्यय का 75 प्रतिशत हिस्से की प्रतिपूर्ति वन विभाग द्वारा की जाती है।
> राज्य सरकार द्वारा इको-फ्रेंडली तरीकों को प्रोत्साहित करने हेतु 'इको-टूरिज्म नीति (2015) ' को अधिसूचित किया गया है। इसके तहत राज्य सरकार द्वारा प्रथम चरण में साहेबगंज में फॉसिल पार्क, गिरिडीह में पारसनाथ, हजारीबाग में कैनहरी हिल, देवघर में त्रिकुट पर्वत, कोडरमा में तिलैया डैम, पलामू में व्याघ्र परियोजना, लातेहार में नेतरहाट तथा जमशेदपुर में दालमा गज अभ्यारण्य को विकसित किया जा रहा है।
> साथ ही राज्य में इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने हेतु स्थानीय गाँवों में लोगों को 'नेचर गाइड' के रूप में प्रशिक्षित किया जाएगा ताकि पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आय में भी वृद्धि की जा सके।
> राज्य सरकार ने सूखे की समस्या से निपटने हेतु मनरेगा के तहत डोभा निर्माण कार्य प्रारंभ किया है, जिसमें वर्षा जल को संचित किया जा सकेगा। इस कार्य हेतु वर्ष 2016-17 के बजट में 200 करोड़ रूपये का विशेष प्रावधान किया गया है। पूरे राज्य में इस वित्तीय वर्ष में 6 लाख डोभा निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
> राज्य सरकार द्वारा ठोस कचरा प्रबंधन हेतु राँची, पाकुड़, धनबाद तथा चाकुलिया में पीपीपी मोड पर सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट योजना को मंजूरी प्रदान की गई है।
> वन अधिकार अधिनियम के तहत वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति तथा वनवासी को वन भूमि का पट्टा वितरित किया जा रहा है। यह पट्टा 2006 से पूर्व से वनों में रह रहे वनवासियों को प्रदान किया जाएगा।
> राज्य के शहरी क्षेत्रों में मनोरंजन पार्क का निर्माण कराया जा रहा है तथा इसके माध्यम से शहरी क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन के विभिन्न पहलुओं से लोगों को परिचित कराकर उनमें इन विषयों के प्रति जागरूकता का प्रसार किया जा रहा है।
> राज्य में अधिकाधिक लोगों को लाह की खेती से संबद्ध करने की सरकार की योजना है। इसके लिए लाह के उत्पादन एवं इस पर आधारित स्वरोजगार हेतु राज्य के कई जिलों यथा - राँची, खूँटी, पश्चिमी सिंहभूम, सिमडेगा, गुमला, लातेहार, पलामू आदि का चयन किया गया है। इन जिलों में वन प्रबधंन समिति तथा स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लाह की खेती को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है ।
> जापान की हिताची कंपनी को राज्य में ठोस कचरा पर आधारित बिजली उत्पादन हेतु संयंत्र लगाने हेतु सहमति प्रदान की गई है।
> राँची नगर निगम द्वारा सफाई व्यवस्था का कार्य अगले 25 वर्षों के लिए निजी कंपनी 'एस्सेल इंफ्रा' को सौंपा गया है।
> भारत सरकार द्वारा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के नियंत्रण हेतु आठ मिशनों की घोषणा की गई है। इस हेतु राज्य सरकार ने विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय बनाने के लिए 'झारखण्ड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य इकाई' की स्थापना करने का निर्णय लिया है।
> झारखण्ड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य इकाई राज्य में पर्यावरण संतुलन को बनाए रखते हुए आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन तथा जीविका के साधनों की उपलब्धता पर बल दे रहा है। यह इकाई राज्य में जलवायु परिवर्तन से संबंधित मुद्दों को ध्यान में रखते हुए कार्य करेगी ।
> राज्य में तापमान एवं वर्षा में परिवर्तनशीलता के कारण कृषि तथा अन्य क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक राज्य में 2020 से 2050 के बीच राज्य में ग्रीष्म ऋतु में अधिकतम तापमान 2-3 डिग्री तक तथा शीत ऋतु में 4-5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने की संभावना है।
> इस संदर्भ में झारखण्ड राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य इकाई ने जलवायु परिवर्तन से प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने, अति संवेदनशील क्षेत्रों के मानचित्र तैयार करने, कोयला एवं खनन उद्योग द्वारा होने वाले पर्यावरण प्रदूषण की मात्रा को नियंत्रित करने तथा प्रभावित क्षेत्रों को संबंधित नीतियों एवं योजनाओं में शामिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
> राज्य में प्रदूषण नियंत्रण तथा इससे संबंधित मामलों पर नियंत्रण रखने हेतु झारखण्ड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (JSPCB) की स्थापना 2001 में की गई है।
> यह एक नियामक निकाय है, जो उद्योगों को पर्यावरण सरंक्षण हेतु उच्च तकनीकों के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करता है।
> राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2012 में झारखण्ड ऊर्जा नीति की घोषणा की गई है जिसका मुख्य उद्देश्य गैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों के विकास को प्रोत्साहित करना है ।
> नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के विकास को प्रोत्साहित करने हेतु राज्य में 2001 में 'झारखण्ड नवीकरणीय ऊर्जा विकास एजेंसी' (JREDA - Jharkhand Renewable Energy Development Agency) का गठन किया गया है। 
> राज्य सरकार द्वारा जल संसाधनों के उचित प्रबंधन हेतु वर्ष 2011 में झारखण्ड राज्य जल नीति-2011 लागू की गई है। इस नीति का निर्माण राज्य में प्राकृतिक आपदा के प्रति भेद्यता को कम करने के उद्देश्य से बनाया गया है।
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