> आपदा
> ऐसी दुर्घटनाएँ जो अचानक घटित हो तथा जिनके प्रभावस्वरूप जीवन एवं संपत्ति की व्यापक हानि होती हो, आपदा कहलाती है।
> आपदा को प्राकृतिक आपदा तथा मानवजनित आपदा में वर्गीकृत किया जाता है।
> प्राकृतिक पर्यावरण के अंतर्गत पर्यावरण के ऐसे घटकों को शामिल किया जाता है, जिनका निर्माण प्रकृति द्वारा किया गया है जैसे- वायु, जल, मिट्टी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु आदि । अर्थात् मानवीय क्रियाकलापों द्वारा अविक्षुब्ध पर्यावरण प्राकृतिक पर्यावरण कहलाता है।
> ऐसी आपदाएँ जो प्राकृतिक कारणों जैसे- भूकंप, ज्वालामुखी, चक्रवात, आँधी- तुफान, सुनामी, सूखा, बाढ़ आदि के कारण घटित हों, प्राकृतिक आपदाएँ हैं।
> मानवीय कारणों से उत्पन्न आपदाएँ जैसे- युद्ध, परमाणविक घटनाएँ, रासायनिक घटनाएँ आदि शामिल हैं। इसे सामाजिक आपदा भी कहा जाता है।
> आपदा की भयावहता को देखते हुए आपदाओं के घटित होने पर कार्रवाई करने की अपेक्षा आपदा के कुशल प्रबंधन पर अधिक जोर दिया जाता है। इसके तहत आपदा के पूर्व ही प्रबंधन उपायों द्वारा उनसे होने वाले नुकसान को कम करने की कोशिश की जाती है।
> झारखण्ड विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक एवं मानवजनित आपदाओं का शिकार होता रहा है तथा इनसे निपटने हेतु आपदा प्रबंधन को मजबूती प्रदान करना नितांत आवश्यक है। इन आपदाओं में भूकंप, बाढ़, सूखा, चक्रवात, सुनामी के प्रभाव, तड़ित, खनन दुर्घटना, रासायनिक दुर्घटना, औद्योगिक दुर्घटना, जंगलों में आग, हाथियों का आक्रमण आदि प्रमुख हैं।
> भूकंप
> भूकंप की दृष्टि से झारखण्ड राज्य को न्यून जोखिम वाले क्षेत्र में रखा जा सकता है।
> भूकंप संवदेनशीलता की दृष्टि से राज्य को जोन II, III एवं IV में रखा जा सकता है।
> जोन II के अंतर्गत राज्य के 7 जिले (राँची, लोहरदगा, खूँटी, रामगढ़, गुमला, पूर्वी सिंहभूम व पश्चिमी सिंहभूम) आते हैं।
> तथा जोन III के अंतर्गत राज्य के 15 जिले (पलामू, गढ़वा, लातेहार, चतरा, हजारीबाग, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, कोडरमा, देवघर, दुमका, जामताड़ा, गोड्डा, पाकुड़ व साहेबगंज) आते हैं।
> जोन IV में गोड्डा तथा साहेबगंज का उत्तरी भाग अवस्थित है, जो सर्वाधिक भूकंप प्रभावित क्षेत्र है।
> बाढ़
> झारखण्ड राज्य के 11 जिले बाढ़ की समस्या से प्रभावित हैं जिनमें साहेबगंज, गोड्डा, पाकुड़, दुमका, धनबाद, देवघर, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम तथा हजारीबाग प्रमुख हैं।
>>राज्य में बाढ़ का प्रमुख कारण मानसूनी वर्षा द्वारा नदी के जलस्तर में वृद्धि होना है।
> सोन तथा उत्तरी कोयल नदी के जलस्तर में वृद्धि के कारण पलामू, गढ़वा तथा लातेहार जिला में भी बाढ़ का प्रभाव होता है।
> बाढ़ के कारण राज्य में धान की फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसके फलस्वरूप राज्य की खाद्यान्न व्यवस्था नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।
> कुछ जिलों में बाढ़ आपदा का रूप ग्रहण कर लेती है जिसके कारण मकान, सड़क, पुल-पुलिया आदि क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।
> बाढ़ के कारण सर्वाधिक प्रभाव राज्य के उत्तरी - पूर्वी क्षेत्रों में पड़ता है जो गंगा नदी के अपवाह तंत्र से जुड़े हैं।
> वर्षा के दिनों में जलस्तर में वृद्धि के कारण राँची तथा जमशेदपुर जैसे नगरों में सड़कों पर जल का प्रवाह प्रारंभ हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप परिवहन व्यवस्था पर दुष्प्रभाव पड़ता है। साथ ही विभिन्न बिमारियों के पनपने के कारण मानवीय स्वास्थ्य पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
> सूखा
> किसी क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा होने के आधार पर सूखा का वर्गीकरण किया जाता है। इसके तहत सामान्य से 25 प्रतिशत कम वर्षा होने पर सामान्य सूखा, 25-50 प्रतिशत कम वर्षा होने पर मध्यम सूखा तथा 50 प्रतिशत से कम वर्षा होने पर गंभीर सूखा कहा जाता है। यदि किसी क्षेत्र में सामान्य के 75 से कम वर्षा होती है, तो यह आपदा का रूप ले लेती है।
> राज्य के उत्तरी-पश्चिमी हिस्से में सूखा कई बार आपदा का रूप धारण कर लेती है, जिसके परिणामस्वरूप पलामू, गढ़वा, लातेहार, चतरा तथा लोहरदगा जिलों की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
> राज्य का पलामू जिला सूखा की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील जिला है।
> वर्ष 2010 में झारखण्ड राज्य गंभीर सूखे से प्रभावित रहा है । इस दौरान राज्य के 24 में से 12 जिले गंभीर सूखे की प्रकोप में रहे हैं। इन सभी जिलों में वर्षा का अनुपात औसत वर्षा के 50 प्रतिशत से भी कम रहा।
> सूखे जैसी आपदा से निपटने हेतु राज्य में बाँध, तालाब, डोभा, वाटर शेड प्रबंधन, उचित फसलों का चयन, मृदा संरक्षण, वृक्षों की कटाई पर नियंत्रण आदि उपाय अपनाये जाने की जरूरत है।
> इसके लिए संबंधित क्षेत्र के लोगों को जागरूक तथा प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है।
> तड़ित (लाइटनिंग )
> वर्षा के दिनों में चमकने वाली बिजली का जमीन पर गिरना तड़ित कहलाता है जिसके कारण झारखण्ड में प्रत्येक वर्ष अनेक लोगों की मृत्यु हो जाती है। साथ ही इस दुर्घटना में कई मवेशियों की भी मृत्यु हो जाती है।
> इस आपदा से राज्य के पलामू, चतरा, लातेहार, गुमला, राँची, गिरिडीह तथा कोडरमा जिला मुख्य रूप से प्रभावित हैं।
> राज्य के श्रीकृष्ण लोक प्रशासन संस्थान द्वारा इस समस्या से निपटने हेतु एक विशेष ट्रेनिंग माड्यूल का निर्माण किया गया है।
> इस समस्या से होनेवाली जानमाल की हानि को कम करने हेतु राज्य के लोगों को बचाव से संबंधित प्रशिक्षण दिये जाने की आवश्कता है जिसके तहत् वर्षा के समय घरों में रहना, पेड़ के नीचे नहीं खड़ा होना, बिजली एवं तार के खंबे से दूर रहना आदि शामिल हैं।
> खनन दुर्घटना
> झारखण्ड राज्य में देश के कुल खनिज का लगभग 40 प्रतिशत भंडार संचित है।
> राज्य की अर्थव्यवस्था में खनिजों का खनन एक प्रमुख गतिविधि है तथा इस दौरान प्राकृतिक तथा मानवीकृत दुर्घटनाएँ उत्पन्न होती हैं।
> राज्य के कई कोयला खदानों में आग लगी हुई है तथा तीव्रता से इसका प्रसार हो रहा है। इनमें झरिया, रामगढ़ आदि प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं।
> खनन के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में खानों का धंसना, मजदूरों को खनन से निर्मित गड्ढे में गिर जाना तथा खनन दौरान होने वाले प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ प्रमुख हैं।
> खनन दुर्घटना से निपटने हेतु इन क्षेत्रों में कार्य करने वाले मजदूरों को प्रशिक्षित किए जाने के साथ-साथ खनन के धँसाव के समय त्वरित राहत प्रणाली को विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
> साथ ही मजदूरों को खनन के दौरान उत्पन्न प्रदूषकों के प्रति जागरूक करते हुए मॉस्क के प्रयोग हेतु प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है।
> जंगलों में आग
> जंगलों में आग जलवायु का एक प्रमुख घटक है, जो राज्य के वनक्षेत्र के जलवायु को प्रभावित करने में अहम् भूमिका अदा करता है।
> झारखण्ड राज्य में वनों की बहुलता है तथा इसमें शुष्क पतझड़ वन सर्वाधिक पाये जाते हैं। इन वनों में ग्रीष्म ऋतु में कई कारणों से लगने वाली आग कई बार भयावह हो जाती है तथा यह आपदा का रूप ग्रहण कर लेती है।
> जंगलों में आग लगने का प्रमुख कारण हवाओं के कारण पेड़ों के टकराने से उत्पन्न आग, मानव द्वारा महुआ व वृक्ष की लकड़ियों के संग्रहण के दौरान रोशनी के लिए आग जलाना तथा पर्यटकों की लापरवाही के कारण जलती हुई माचिस की तीली का जंगलों में फेंका जाना महत्वपूर्ण हैं।
> मार्च तथा अप्रैल के महीने में जंगलों में रहने वाले लोग आग जलाकार रातों में तथा प्रातः काल महुआ चुनने का कार्य करते हैं तथा इनके जलाए हुए आग कई बार विस्तारित होकर जंगली आग का कारण बनते हैं।
> झारखण्ड राज्य के उत्तर-पश्चिमी तथा दक्षिणी पश्चिमी भाग में जंगल में सर्वाधिक आग लगने की घटना होती है। इनमें पलामू, लातेहार, गढ़वा, चतरा, हजारीबाग, सिमडेगा, गुमला आदि जिले शामिल हैं।
> जंगलों में लगने वाले आग को रोकने हेतु कानूनी प्रशासनिक तथा जागरूकता के स्तर पर कार्य किया जाना आवश्यक है।
> इस संबंध में पर्यटन संबंधी कानूनों में कठोर प्रावधान तथा संग्राहकों के बीच जलाये हुए आग को बुझाने के संबंध में जागरूकता का प्रसार किया जाना चाहिए।
> साथ ही प्रशासनिक स्तर पर ऐसे वृक्ष जो अधिक आयु के हो गये हैं, उन्हें काटकर उनके स्थान पर नये वृक्ष लगाने का कार्य किया जाना चाहिए। इसके तहत् जंगलों में फायर टावर बाँध का निर्माण तथा वनों का सड़कों द्वारा विभाजन किए जाने की भी आवश्यकता है।
> हाथियों का आक्रमण
> हाथी झारखण्ड का राजकीय पशु है तथा राज्य में इनकी संख्या काफी अधिक है। राज्य के पलामू, दुमका, सारंडा, हजारीबाग, दालमा आदि के जंगलों में सर्वाधिक हाथी पाये जाते हैं।
> राज्य में आये दिन जंगली हाथी के आक्रमण की घटनाएँ सुनने को मिलती हैं, जो बसाव क्षेत्र के जन-जीवन की एक प्रमुख समस्या है।
> हाथियों के आक्रमण का प्रमुख कारण इनके प्राकृतिक आवासों में मानव का हस्तक्षेप है। जंगलों में मानव हस्तक्षेप में वृद्धि के कारण जहाँ एक ओर हाथियों को ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँचने का रास्ता उपलब्ध हुआ है वहीं वनों के कटाव ने इन्हें अपने प्राकृतिक आवास से पलायन हेतु मजबूर किया है।
> इसके अतिरिक्त सुगंधित महुआ फूलों की ओर आकर्षित होना हाथियों के आक्रमण का एक प्रमुख कारण है।
> हाथियों के आक्रमण की समस्या राज्य के खूँटी, सिमडेगा, गुमला, लातेहार, पलामू, चतरा, हजारीबाग आदि जिले में पायी जाती है।
> हाथियों के आक्रमण से बचाव हेतु सर्वप्रथम लोगों को जागरूक किये जाने की आवश्कता है ताकि लोग हाथियों के प्राकृतिक आवासों में हस्तक्षेप करना बंद करें।
> हाथियों के आक्रमण के पश्चात् कई गाँवों में ढोल-नगाड़ों की आवाज, आग तथा मिर्च की गंध द्वारा उन्हें भगाने का प्रयास किया जाता है।
> झारखण्ड में आपदा प्रबंधन
> किसी भी प्रकार की आपदा से निपटने हेतु तीन चरणों में निपटने की व्यवस्था की जाती है - आपदा पूर्व व्यवस्था, आपदा के दौरान व्यवस्था तथा आपदा के बाद व्यवस्था ।
> आपदा पूर्व व्यवस्था में आपदा की तैयारी, इसका निवारण तथा इससे बचाव से संबंधित उपाय किए जाते हैं।
> आपदा के लिए की जाने वाली तैयारी में आपदा का स्तर एवं प्रकृति, इसका पूर्वानुमान, चेतावनी तंत्र तथा इसके प्रति लोगों में जागरूकता को शामिल किया जाता है।
> आपदा के दौरान बचाव कार्य, लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाना तथा उनके लिए मूलभूत व्यवस्थाएँ जैसेभोजन, पानी, दवा, वस्त्र आदि की आपूर्ति पर बल दिया जाता है।
> आपदा के बाद की व्यवस्था के अंतर्गत प्रभावित लोगों का पुनर्वास, आपदा से क्षतिग्रस्त क्षेत्रों का पुनर्निर्माण तथा सामान्य जन-जीवन का पुनः संचालन को शामिल किया जाता है।
> भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया है। इसी परिप्रेक्ष्य में राज्य स्तर पर मुख्यमंत्रियों की अध्यक्षता में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण तथा जिला स्तर पर जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया है।
> झारखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (JSDMA)
> झारखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन 28 मई, 2010 * को किया गया है। इस प्राधिकरण का गठन आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 की धारा 14 (1) के आलोक में किया गया है । इस धारा के तहत राज्य के राज्यपाल को एक राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का गठन करने की शक्ति * प्रदान की गयी है।
> राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है तथा इसमें अधिकतम नौ सदस्य हो सकते हैं।
> इस प्राधिकरण का प्रमुख उद्देश्य आपदा नियंत्रण हेतु भिन्न-भिन्न स्तरों पर योजना एवं रणनीति का निर्माण करना तथा आपदा के पश्चात् पुनर्निर्माण एवं सामान्य जन-जीवन की बहाली के लिए उपयुक्त परियोजना का निर्माण करना है।
> झारखण्ड राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की सहायता के लिए एक राज्य कार्यकारी समिति का गठन किया गया है। जिसके अध्यक्ष राज्य के मुख्य सचिव हैं। यह समिति आपदा के संबंध में राष्ट्रीय नीति, राष्ट्रीय योजना और राज्य योजना के क्रियान्वयन एवं उनके बीच समन्वय स्थापित करता है।
> जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का मुख्य कार्य जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिए योजना, समन्वय एवं क्रियान्वयन हेतु कार्य करना है।
> झारखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के प्रमुख कार्य निम्नवत् हैं
> आपदा पर त्वरित कार्रवाई हेतु योजना तैयार करना।
> राज्य में आपदा के न्यूनीकरण हेतु ढाँचागत क्षमता का विकास करना।
> राज्य, जिला, प्रखण्ड तथा पंचायत स्तर पर एक सूचना संपर्क नेटवर्क का विकास करना ताकि आपदा के दौरान जरूरी सूचनाओं को एकत्रित कर उस पर उचित कार्रवाई की जा सके।
> आपदा न्यूनीकरण हेतु भौगोलिक सूचना प्रणाली का विकास करना।
> प्रशासनिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों, स्वैच्छिक संस्थाओं तथा अन्य संस्थाओं के बची समन्वय स्थापित करना।
> आपदा से बचाव हेतु उपयुक्त दिशा-निर्देशों का आम जनता के बीच जागरूकता का प्रचार-प्रसार करना।
> प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करना ।
> झारखण्ड आपदा प्रबधंन योजना
> इस योजना के अंतर्गत अक्टूबर, 2004 में झारखण्ड राज्य आपदा विभाग का गठन किया गया है। जिसका प्रमुख कार्य आपदा से प्रभावित व्यक्तिों को त्वरित राहत पहुँचाना है।
> आपदा के दौरान राहत कार्य के समुचित संचालन हेतु एक राज्य आपदा कार्रवाई कोष का गठन किया गया है जिसमें 75 प्रतिशत हिस्सेदारी केन्द्र तथा 25 प्रतिशत राज्य सरकार की होती है।
> वर्ष 2009 में आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा राज्य आपदा प्रबंधन योजना तैयार की गई है।
> राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत् राज्य एवं जिला स्तर पर सभी जिलों में आपातकालीन ऑपरेशन सेंटर का गठन किया जा रहा है तथा इसे वी-सैट उपग्रह से जोड़ा जा रहा है।
> वर्ष 2005 में देश में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 को लागू किया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकारों को आपदा प्रबंधन योजनाओं को तैयार करने, आपदा से बचाव हेतु समुचित उपाय करने, विकास योनाओं में आपदाओं के निवारण अथवा रोकने के उपायों पर विचार करने, निधियों को आवंटित करने, चेतावनी प्रणाली स्थापित करने तथा आपदा प्रबंधन से संबंधित विभिन्न एजेंसियों की सहायता करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया है।
> आपदा के दौरान राहत एवं बचाव कार्य हेतु राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2006 में राष्ट्रीय आपदा कार्रवाई बल ( NDRF) का गठन किया गया है। इसी प्रकार राज्यों द्वारा राज्य स्तर पर राज्य आपदा कार्रवाई बल (SDRF) का गठन किया जाता है।
> वर्ष 2005 से श्रीकृष्ण लोक प्रशासन संस्थान, राँची द्वारा आपदा केन्द्र प्रबंधन का संचालन किया जा रहा है जिसका प्रमुख कार्य आपदा के संबंधित विभिन्न पहलुओं के प्रति प्रशिक्षण प्रदान करना है। इस संस्थान को राज्य सरकार द्वारा प्रशिक्षण से संबंधित कार्यक्रमों के संचालन हेतु वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
> वर्ष 2015 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के सहयोग से राज्य में 'विद्यालय सुरक्षा कार्यक्रम का संचालन किया गया है।
> आपदा के समय दूर संवेदन, कार्टोग्राफी तथा अंतरिक्ष से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाओं को साझा करने हेतु सरकार द्वारा झारखण्ड स्पेस एप्लीकेशन सेंटर की स्थापना की गयी है।
> राज्य में आपदा की पूर्व जानकारी तथा इससे जुड़ी समस्याओं की जानकारी एवं उनके प्रभाव को न्यून करने हेतु 'आपदा प्रबंधन ज्ञान - सह-प्रदर्शन केन्द्र' ( सृजन) विभाग का विकास किया जा रहा है जिसके लिए बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (सूखा हेतु), भारतीय खनन स्कूल, धनबाद ( खनन आपदा हेतु), बी. आई.टी., मेसरा (भूकंप हेतु) तथा जे. सैक (बाढ़, सूखा एवं जंगल में आग हेतु) शैक्षणिक एवं तकनीकी कार्यों का संचालन कर रहे हैं।
> मेकॉन, राँची औद्योगिक आपदा जोखिम प्रबंधन से संबंधित गविविधियों को संचालित करती है ।
> आपदा प्रबंधन ज्ञान-सह-सूचना प्रदर्शन केन्द्र (सृजन)
> इसकी स्थापना झारखण्ड आपदा प्रबंधन योजना के तहत की गयी है।
> इसका प्रमुख कार्य समुदाय एवं आम जनता को विभिन्न प्रकार के संभावित आपदाओं एवं उनसे होने वाली हानी के संबंध में जागरूक करना है। साथ ही इसके माध्यम से आपदा के प्रभावों को कम करने हेतु विभिन्न तकनीकों एवं उपकरणों से भी अवगत कराया जाता है।
> इन केन्द्रों का विकास विशेष आपदाओं यथा- बाढ़, सूखा, खनन आपदा, जंगलों में आग आदि के अनुरूप पर किया गया है।
> ये केन्द्र स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर सूचना प्रदान करने, संचार, प्रसार प्रविधियों तथा जागरूकता के प्रसार के उपकरण के रूप में कार्य करते हैं।
> जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन (DDMA)
> जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन हेतु राज्य के सभी 24 जिलों में जिला दंडाधिकारी (District Magistrate) या जिला समाहर्त्ता (District Collector) या उपायुक्त (Deputy Commissioner ) की अध्यक्षता में जिला आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया गया है। अन्य सदस्यों में मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जल एवं सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता, पशु चिकित्सा पदाधिकारी और गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि सदस्य शामिल हैं।
> इस समिति का प्रमुख कार्य जिला की आवश्यकता के अनुसार जिला आपदा योजना तैयार करना तथा आपदा के दौरान इसका क्रियान्वयन करना है।
> यह समिति जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन टीम को प्रशिक्षित करने में मदद करती है तथा विभिन्न माध्यमों से आम जनता में आपदा से बचने के उपायों का प्रचार-प्रसार करती है ।
> प्रखण्ड (ब्लॉक) स्तर पर आपदा प्रबंधन
> ब्लॉक स्तर पर एक आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया जाता है जिसका अध्यक्ष प्रखण्ड विकास पदाधिकारी होता है। अन्य सदस्यों में समाज कल्याण पदाधिकारी, स्वास्थ्य अधिकारी, ग्रामीण जलापूर्ति अधिकारी, पुलिस अग्निशमन सेवाओं के अधिकारी, गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि तथा वरिष्ठ नागरिक शामिल होते हैं।
> यह समिति प्रखण्ड की जरूरतों के अनुरूप आपदा प्रबंधन की योजना का निर्माण तथा उसके क्रियान्वयन में जिला प्रशासन को मदद करती है।
> यह समिति आपदा से बचने हेतु आम लोगों को कृत्रिम तरीके से पूर्वाभ्यास (मॉक ड्रिल) कराती है तथा आम जनता के बीच आपदा से निपटने के उपायों का प्रचार-प्रसार करती है ।
> ग्राम स्तर पर आपदा प्रबंधन
> ग्राम स्तर पर एक आपदा प्रबंधन समिति का गठन किया जाता है जिसका अध्यक्ष ग्रामसभा का मुखिया होता है।
> यह समिति गाँव के स्तर पर आपदा प्रबंधन की योजना के निर्माण तथा उसके क्रियान्वयन का कार्य करती है ।
> यह समिति आपदा से बचने हेतु आम लोगों को कृत्रिम तरीके से पूर्वाभ्यास (मॉक ड्रिल) कराती है तथा आम जनता के आपदा से निपटने के उपायों का प्रचार-प्रसार करती है ।
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