मराठों का उत्थान

मराठों का उत्थान

मराठों का उत्थान

> 17वीं सदी में मराठों के राजनीतिक शक्ति के रूप में उदय के कारण
1. मराठों के उत्थान में सर्वप्रथम महाराष्ट्र की भौगोलिक स्थिति का महत्वपूर्ण स्थान महाराष्ट्र का सम्पूर्ण क्षेत्र पर्वतों से घिरा हुआ है, इसलिए यह क्षेत्र बांह्य आक्रमणों से अधिक सुरक्षित था. इस क्षेत्र में जीवन गुजारने के लिए कठिन श्रम करना पड़ता था. खेती करने में असुविधा तथा कम वर्षा के कारण मराठे साहसी एवं वीर बने तथा इनमें लूटमार की दक्षता उत्पन्न हो गई. पहाड़ी इलाकों में रहने के कारण वे छापामार युद्ध-पद्धति में प्रवीण हो गए.
2. इन्हीं सैनिक गुणों के कारण मराठों को प्रशासनिक एवं राजनीतिक अनुभव प्राप्त हुए. अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा आदि दक्षिण की रियासतों में मराठों को अनेक महत्वपूर्ण पद एवं जागीरें प्राप्त हुईं. इस प्रकार मराठों ने राजनीतिक स्थिति को समझने का अवसर पाया तथा इसका उपयोग मराठों को संगठित करने में किया.
3. महाराष्ट्र में 17वीं सदी में अनेक धर्म-सुधारकों का प्रादुर्भाव हुआ, जिसमें तुकाराम एवं रामदास का नाम अग्रणी है. इन्होंने मराठों में राष्ट्रीयता एवं स्वदेश-प्रेम की भावनाओं को जागृत किया. शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास ने अनेक मठों की स्थापना की. 'दसबोध' नामक ग्रन्थ की रचना कर उन्होंने मराठों में चेतना का प्रसार किया.
4. मराठा सन्तों ने बोलचाल की भाषा के माध्यम से अपना प्रचार-प्रसार किया. इस कारण उनके विचार मराठा समाज के प्रत्येक वर्ग तक आसानी से पहुँच गए.
5. मराठा-क्षेत्र की उस समय की सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक अवस्था ने मराठों के उत्थान में उल्लेखनीय योगदान दिया. छुआ-छूत, जाति व्यवस्था एवं ऊँच-नीच की भावना को महाराष्ट्र में धर्म-सुधारकों ने कमजोर कर दिया. उनकी आर्थिक स्थिति ने मराठों को आत्मनिर्भर एवं साहसी बनने के लिए विवश कर दिया. सामाजिक-आर्थिक एकता ने मराठों को संगठित करने में अग्रणी भूमिका का निर्वाह किया.
6. दक्षिण की शिया रियासतों का अधिकांश समय मुगलों से अपनी रक्षा करने में ही बीता था. अतः वे दक्षिण में इस्लाम का तेज गति से प्रसार करने एवं मराठों को संगठित होने से रोकने के लिए संगठित रूप से प्रयास नहीं कर सके.
7. ऐसी परिस्थितियों में मराठों को लखजी जाधव के दामाद और मालोजी के पुत्र शाहजी भौंसले जैसा वीर सेनानायक मिल गया. इन्होंने तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर मराठों को नेतृत्व प्रदान किया. उन्होंने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में प्रारम्भ किया था, किन्तु वे आगे बढ़ते-बढ़ते बंगलौर में एक अर्द्ध- स्वतन्त्र राज्य की स्थापना तक पहुँच गए. इस प्रकार उन्होंने शिवाजी के लिए एक स्वतन्त्र मराठा राज्य स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया.
> मराठा स्वराज के संस्थापक शिवाजी
शिवाजी का जन्म 20 अप्रैल, 1627 ई. को शिवनेर के दुर्ग में पूना के निकट हुआ था. उनकी माता का नाम जीजाबाई एवं पिता शाहजी भोंसले थे. जीजाबाई शाहजी की परित्यक्ता पत्नी थी, अतः उनमें स्वाभिमान एवं धार्मिकता बहुत अधिक थी. जीजाबाई के चरित्र का असर शिवाजी पर प्रशासनिक शिक्षा ग्रहण की. धर्म सुधारक रामदास से बहुत गहरा पड़ा था. गुरु कोण्डदेव से शिवाजी ने सैनिक एवं शिवाजी को राष्ट्र प्रेम एवं स्वाभिमान की शिक्षा प्राप्त हुई.
शिवाजी के कुछ बड़े होने पर उनके पिता द्वारा उन्हें पूना की जागीर सौंप दी गई. इस समय शिवाजी ने अपनी जागीर - प्रबन्धन के साथ-साथ मावल प्रदेश के युवकों को संगठित करना प्रारम्भ कर दिया. क्योंकि शिवाजी का आरम्भ से ही उद्देश्य स्वतन्त्र मराठा राज्य की स्थापना करना था. शिवाजी समर्थ गुरु रामदास से प्रेरणा लेकर महाराष्ट्र को मुसलमान शासकों एवं मुगलों से स्वतन्त्र कराना चाहते थे. वे हिन्दू धर्म, सभ्यता एवं संस्कृति की स्थापना करना चाहते थे.
अतः अपने इस कार्य हेतु उन्होंने अपने प्रारम्भिक मावली युवकों की सहायता से 1643 ई. में सिंहगढ़ के दुर्ग पर अधिकार कर लिया. इस दुर्ग पर बीजापुर के सुल्तान का अधिकार था. इसके अतिरिक्त उन्होंने तोरण, चाकन, पुरन्दर, सूपां, जावली आदि दुर्गों को 1647 ई. तक जीत लिया. 1647 ई. से लेकर 1656 ई. तक शिवाजी ने अपनी आन्तरिक स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया, क्योंकि शिवाजी की लूटमार से तंग आकर बीजापुर के सुल्तान ने 1648-49 ई. तक शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले को गिरफ्तार कर लिया था.
1656 ई. में शिवाजी ने अपना विजय अभियान पुनः प्रारम्भ किया तथा चन्द्रराव मोरे से जावली का प्रसिद्ध किला धोखे से जीत लिया. इससे उनका पूरे मावल प्रदेश पर अधिकार हो गया. उन्होंने इसी दौरान रायगढ़ के दुर्ग को जीतकर अपनी सत्ता का इसे प्रमुख केन्द्र बनाया. 1657 ई. को शिवाजी ने बीजापुर के जुन्नार नगर को जीत लिया.
इस प्रकार शिवाजी की प्रारम्भिक विजयों ने उनके राज्य' स्थापना के कार्य को सरल बना दिया, क्योंकि इस समय बीजापुर अपनी कमजोरी के कारण शिवाजी पर अधिक ध्यान नहीं दे सका.
1657 ई. में बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने अफजल खाँ को शिवाजी को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के लिए भेजा जिसका शिवाजी ने पूर्व में इरादा भाँप लिया और उसकी अपने बघनखे से हत्या कर दी. इससे उसकी सेना में आतंक फैल गया और इसका लाभ उठाकर शिवाजी ने उसकी पूरी सेना नष्ट कर दी और शिवाजी ने पन्हाला के मजबूत दुर्ग पर अधिकार कर लिया.
अब मुगलों के बढ़ते दबाव के कारण तथा अपने पिताजी के समझाने के कारण शिवाजी ने बीजापुर से सन्धि कर ली और मुगलों से संघर्ष की तैयारी करने लगे.
नोट - शिवाजी और मुगल संघर्ष का विस्तृत विवेचन औरंगजेब एवं मराठा संघर्ष नामक शीर्षक में किया गया है.
इस प्रकार स्पष्ट है कि, शिवाजी ने अपने साहस और पराक्रम के बल पर एक शक्तिशाली मराठा राज्य की स्थापना कर ली. उनके राज्य में सम्पूर्ण महाराष्ट्र, कोंकण एवं कर्नाटक के कुछ भाग सम्मिलित थे, जिसे मराठा इतिहास में 'मराठा स्वराज्य' के नाम से जाना जाता है. शिवाजी की दक्षिण की रियासतों एवं मुगल साम्राज्य के विरुद्ध यह एक बहुत बड़ी सफलता थी.
> मराठा शासन-व्यवस्था शिवाजी की शासन-व्यवस्था
शिवाजी ने दक्षिण भारत में मुगल सम्राट औरंगजेब के समय कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए एक विस्तृत राज्य की स्थापना की, इसके साथ ही उन्होंने एक सुदृढ़ शासन व्यवस्था को अपने राज्य में लागू किया और उनकी ही प्रशासनिक व्यवस्था पूरे मराठा शासनकाल में लगभग 100 वर्षों तक चलती रही, उनके शासन-प्रबन्ध की रूपरेखा निम्नलिखित है
> केन्द्रीय शासन
केन्द्रीय शासन में शिवाजी व उनके मन्त्रीगण सम्मिलित थे, जिसमें सम्पूर्ण शक्तियों के स्रोत शिवाजी ही थे. वे शासन के प्रधान थे जिन्हें राज्य के समस्त पदाधिकारियों की नियुक्ति और पदच्युति का पूर्ण अधिकार था. निरंकुश शक्ति नहीं किया. उन्होंने अपनी शान स्वामी होते हुए भी शिवाजी ने अपनी सत्ता का दुरुपयोग सिद्धान्तों पर आधारित किया और प्रजा हित को सदैव के प्रधानता दी. उन्होंने हिन्दू जाति के उत्थान की हर सम्भव चेष्टा की.
शिवाजी के राज कार्य में सहायता देने के लिए मन्त्रिपरिषद् थी, जिसके 8 सदस्य थे. इसका नाम 'अष्टप्रधान' था. मन्त्रियों का पूर्ण उत्तरदायित्व शिवाजी के प्रति था तथा वे शिवाजी को परामर्श दे सकते थे, जिसे मानना शिवाजी के लिए बाध्यकारी नहीं था. शिवाजी के केन्द्रीय प्रशासन में 18 विभाग थे और प्रत्येक मन्त्री को एक से अधिक विभाग सौंपे गये थे, ये मन्त्री इस प्रकार थे -
(1) पेशवा ( प्रधानमन्त्री ) – राज्य के प्रधानमन्त्री को पेशवा कहा जाता था. शासन व्यवस्था की कार्यकुशलता, राज्य के विभिन्न अधिकारियों के कार्यों में सन्तुलन आदि का ध्यान रखना उसका मुख्य कर्त्तव्य था. सभी महत्वपूर्ण लेखों पर शिवाजी की मुहर लगती थी. शिवाजी की अनुपस्थिति में वही उनका प्रतिनिधित्व करता था.
(2) अमात्य (वित्तमन्त्री)— अमात्य अर्थात् वित्तमन्त्री का कार्य आय-व्यय का विवरण रखना और राज्य के विभिन्न क्षेत्रों (प्रान्तों) का हिसाब रखना था और उनकी जाँच करना था.
(3) मन्त्री – यह मन्त्री शिवाजी के गृह-प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी था. राजा के दैनिक कार्यों और दरबार की महत्वपूर्ण घटनाओं का विवरण रखना भी उसी का काम था. वही राजा के भोजन आदि का प्रबन्ध करता था तथा यह भी देखता था कि राजा के जीवन की सुरक्षा का पूरा प्रबन्ध है या नहीं. उसे प्रायः राजा के साथ ही रहना पड़ता था.
(4) सामन्त या विदेश मन्त्री – यह मन्त्री विदेशी राज्यों और शक्तियों के विषय में राजा को परामर्श देता था. विदेशी राजदूतों व प्रतिनिधियों के स्वागत, निवास तथा वापस लौटने के प्रबन्ध का भार इसी को करना था. वह अपने गुप्तचरों द्वारा शान्तिकाल और युद्धकाल में विदेशी राज्यों की गतिविधियों का पता लगाता रहता था.
(5) सचिव – यह राजा के पत्र व्यवहार का उत्तरदायित्व वहन करता था. परगनों आदि की आमदनी का भी यही हिसाब रखता था. केन्द्रीय शासन में इसकी स्थिति एक प्रकार से सुपरिन्टेण्डेण्ट. (आधुनिक अधीक्षक) के समान थी.
(6) सेनापति – सेनापति का दायित्व सेना की भर्ती, अनुशासन और संगठन का था. शान्ति और युद्ध के समय आवश्यकतानुसार सैन्य टुकड़ियों को नियत करना उसी का कार्य था. रण-क्षेत्र में युद्ध-योजना के लिए यही उत्तरदायी था.
(7) पण्डितराव — यह धार्मिक मामलों का अध्यक्ष था. राजा द्वारा दान में दी गई धनराशि को गरीब ब्राह्मणों में बाँटना और राज्य की ओर से दीन-दुःखियों की सहायता करना इसका प्रमुख कार्य था. यह लोगों के नैतिक आचरण पर भी ध्यान रखता था. धार्मिक रीति-रिवाजों के लिए नियम बनाना तथा जाति-पाँति के झगड़ों को दूर करना उसका कर्त्तव्य था.
(8) न्यायाधीश – इसके अधीन राज्य का न्याय विभाग था. दीवानी और फौजदारी दोनों ही प्रकार के मुकदमों का यह निर्णय करता था.
मन्त्रि-परिषद् के सदस्यों में से ‘पण्डितराव’ एवं ‘न्यायाधीश’ को छोड़कर शेष सभी सैनिक अभियानों में जाते थे और उनका संचालन करते थे. सेनापति व मन्त्री के अतिरिक्त अष्ट प्रधान के सदस्य प्रायः ब्राह्मण ही होते थे.
प्रत्येक प्रधान की सहायता के लिए और उसके अधीन विभाग को सुव्यवस्थित करने के लिए आठ व्यक्ति रहते थे, जिनका दर्जा लेखकों के तुल्य था. वे थे -
(i) दीवान.
(ii) मजूमदार – आय-व्यय निरीक्षक.
(iii) फड़नवीस – सहायक आय-व्यय निरीक्षक.
(iv) सबनीश –कागज-पत्र रखने वाला.
(v) कारखानिस — विभागीय आवश्यकता की वस्तुओं का प्रबन्ध करने वाला.
(vi) चिटनिस– पत्र व्यवहार करने वाला.
(vii) जमादार— कोषाध्यक्ष.
(viii) पोतनिस– सपोतनिस - दिन-प्रतिदिन के साधारण कार्यों के लिए पैसा रखने वाला.
> स्थानीय शासन प्रबन्ध
प्रशासन की सुविधा के लिए शिवाजी का राज्य प्रान्तों, परगनों और जिलों में विभक्त था. प्रान्त निम्नलिखित चार प्रकार के थे—
(1) उत्तरी प्रान्त – इसमें उत्तरी बम्बई, कोंकण, दक्षिणी सूरत, बगलान, पूना का दक्षिणी पठार, डाग तथा कोली के प्रदेश शामिल थे.
(2) दक्षिण प्रान्त – इसमें दक्षिण बम्बई, कोंकण, सावन्तबाड़ी तथा उत्तरी कनारा का समुद्र तटीय प्रदेश सम्मिलित थे.
(3) दक्षिण-पूर्वी प्रान्त — इसमें सतारा व कोल्हापुर के जिले, बेलगाँव, धरवार व कोपल के जिले सम्मिलित थे.
(4) चौथा प्रान्त सैनिक अधिकार में था, जिसमें आधुनिक मैसूर राज्य के उत्तरी, केन्द्रीय व पूर्वी भाग तथा मद्रास के कुछ भाग सम्मिलित थे. अपने शासन के अन्तिम वर्षों में जीत पाने के कारण इस प्रदेश को कुछ समय के लिए सैनिक नियन्त्रण में रखा गया था, जबकि शेष तीनों प्रान्तों को नागरिक अधिकारियों (प्रान्तपतियों) के हाथों में रखा गया था.
प्रान्तपतियों की नियुक्ति शिवाजी द्वारा होती थी, प्रत्येक प्रान्त में सेना रहती थी जिसका सेनापति ही प्रान्तपति होता इनके मुख्य कार्य प्रान्त में शान्ति व्यवस्था बनाये रखना, प्रान्तों की रक्षा करना, लगान तथा अन्य करों की वसूली कर केन्द्र सरकार को भेजना, प्रान्त परगनों में बँटे होते थे और परगने गाँवों में विभक्त थे. परगने का अधिकारी आधुनिक जिलाधीश की तरह का था, उसके अधीन एक सैनिक टुकड़ी रहती थी तथा राजस्व वसूली उसका प्रमुख कार्य था. शिवाजी ने ग्राम-प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं किया तथा उसका परम्परागत स्वरूप ही बनाये रखा.
> पेशवा के रूप में बालाजी विश्वनाथ (1713-1720 ई.)
साहू ने 1713 ई. में बालाजी विश्वनाथ को पेशवा के पद पर नियुक्त किया. पेशवा के रूप में कार्य करते हुए बालाजी विश्वनाथ ने मराठा राज्य एवं छत्रपति साहू के हितों की रक्षा की और उन्होंने अपनी सैनिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक प्रतिभा का परिचय दिया. उनके कार्यों को निम्नलिखित दो भागों में बाँटा जा सकता है—
(i) बालाजी विश्वनाथ ने पेशवा बनते ही शाहू के विरोधी मराठा सरदारों कान्होजी अंग्रिया, कृष्णाराव, धन्नाजी जाधव, जैसे अनेक प्रभावशाली सरदारों को साहू के पक्ष में मिला लिया. इससे छत्रपति के रूप में शाहू की स्थिति सुदृढ़ हो गई. बालाजी विश्वनाथ ने राजपूतों से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित किए. इनमें प्रमुख आमेर के कछवाहा नरेश जयसिंह व जोधपुर नरेश अजीतसिंह थे. इन मैत्री सम्बन्धों से उत्तरभारत में मराठों की स्थिति मजबूत हो गई. इसके बाद बालाजी ने पूना एवं कोल्हापुर पर अधिकार कर लिया तथा पूरे राज्य में शान्ति व्यवस्था कायम की. राज्य की आर्थिक स्थिति में सुधार करने के लिए उन्होंने लगान का पुननिर्धारण करवाया.
(ii) मुगलों से सम्बन्ध – बालाजी विश्वनाथ ने मुगल बादशाहों बहादुरशाह एवं जहाँदारशाह से शाहू को छत्रपति के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया, लेकिन निजाम के प्रभाव के कारण शाहू को मान्यता नहीं मिली. 
इसी बीच सैयद बन्धु शक्तिशाली हो गए और उन्होंने फर्रुखसियर को बादशाह बनाया. अतः वह अब अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए सैयद बन्धुओं के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगा. इस पर सैयद हुसैनअली ने 1718 ई. में दक्षिण के सूबेदार की हैसियत से विश्वनाथ से सन्धि कर ली. इस सन्धि के अनुसार, शिवाजी का स्वराज वाला प्रदेश शाहू के अधिकार में स्वीकार कर लिया गया तथा दक्षिण के राज्यों से मराठों को ‘चौथ’ एवं 'सरदेशमुखी' वसूल करने का 6 अधिकार दिया गया तथा बदले में यह तय किया गया कि 15000 मराठा सवार शाहू मुगल सेवा में रखेगा. इसके साथसाथ शाहू को 10 लाख रुपया वार्षिक कर देने का तथा ताराबाई के राज्य कोल्हापुर को परेशान नहीं करने का वादा करना पड़ा.
इस मराठा-मुगल सन्धि ने शाहू को छत्रपति के रूप में स्वीकार कर लिया तथा दक्षिण के सभी राज्यों पर मराठों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया गया. इस सन्धि को मुगल बादशाह फर्रूखशियर से मान्यता प्राप्त कराने के लिए बालाजी विश्वनाथ स्वयं दिल्ली गए हुसैन अली ने मराठा सरदारों की मदद से फर्रूखशियर को गद्दी से उतार दिया तथा रफी-उद्दाराजत को बादशाह बनाया जिसने इस सन्धि को स्वीकार कर लिया. इससे शाहू को वैधानिक रूप से छत्रपति की मान्यता प्राप्त हो गई.
इस सन्धि के बाद बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु अप्रैल, 1720 ई. में हो गई, लेकिन उन्होंने अल्पकाल में ही अपनी प्रशासनिक क्षमता एवं कूटनीतिज्ञता का परिचय देकर मराठा राज्य को एक शक्तिशाली राज्य बना दिया तथा पूरे दक्षिणभारत में उसको चुनौती देने वाला कोई नहीं रहा तथा उन्होंने मराठा साम्राज्यवाद के विकास का नया मार्ग खोल दिया.
> पेशवा बाजीराव के काल में मराठा राज्य का विकास 
पेशवा बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उनके पुत्र बाजीराव पेशवा बने, जिन्होंने अपने अदम्य साहस और धर्म के बल पर पूरा मराठा साम्राज्य का निर्माण किया. अपनी आन्तरिक स्थिति को सुदृढ़ कर उन्होंने सर्वप्रथम निजाम से निपटने का कार्य अपने हाथ में लिया.
(1) हैदराबाद का निजाम- हैदराबाद के निजाम-उलमुल्क ने मुगल मराठा सन्धि (1719) को अस्वीकार कर ‘चौथ' एवं 'सरदेशमुखी' की वसूली पर रोक लगा दी. अतः शाहू ने वार्ता द्वारा इस गतिरोध को दूर करने का प्रयास किया, लेकिन वह विफल रहा. इसी बीच निजाम वजीर बनकर दो वर्ष के लिए दिल्ली चला गया. इसके जाने के बाद मुबारिज खाँ को दक्षिण का सूबेदार बनाया गया, जो निजाम का विरोधी था. अतः निजाम एवं मुबारिज में संघर्ष प्रारम्भ हो गया. इसका लाभ उठाकर पेशवा बाजीराव ने 'बुरहानपुर’ पर अधिकार कर लिया.
दिल्ली से निजाम ने लौटकर मुबारिज खाँ को पराजित कर हैदराबाद में स्वतन्त्र निजाम राज्य की स्थापना की और दक्षिण के मुगल क्षेत्रों पर अपना अधिकार जमा लिया और अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए उसने मराठों को चौथ एवं सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दे दिया.
मराठों ने अब कर्नाटक पर अधिकार करने के लिए आक्रमण किया, तो निजाम ने उनमें फूट डालने के लिए 1727 ई. में शिवाजी द्वितीय से शाहू के विरुद्ध सन्धि कर ली तथा शाहू के क्षेत्रों पर आक्रमण प्रारम्भ कर दिए.
इस पर बाजीराव ने कर्नाटक से तुरन्त वापस लौटकर 1728 ई. में 'पालखेद' में निजाम को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया और 1719 ई. की सन्धि की सभी शर्तों को मानने पर विवश कर दिया.
लेकिन निजाम ने हार न मानते हुए 1731 ई. में मालवा के शासक मुहम्मदशाह बंगेश को साथ लेकर मराठों पर आक्रमण कर दिया. इस संघर्ष में भी उसे पराजित होना पड़ा और उसे पुनः सन्धि करनी पड़ी तथा यह वायदा करना पड़ा कि वह मराठों के उत्तर के अभियानों के समय तटस्थ रहेगा. इस प्रकार दोनों शक्तियों में मित्रता हो गई.
(2) मालवा और बुन्देलखण्ड–मालवा का प्रान्त अत्यन्त समृद्ध था और यह मराठा राज्य की सीमा से सटा हुआ था. अतः इसका लाभ उठाने के लिए मालवा के प्रान्तपति गिरधर बहादुर को 1728 ई. में अमझेरा के युद्ध में बुरी तरह से पराजित कर दिया और आमेर के राजा को यहाँ का प्रान्तपति नियुक्त किया. जयसिंह ने मराठों से गुप्त सन्धि कर ली.
मालवा से सटा हुआ प्रदेश बुन्देलखण्ड था. अतः बाजीराव ने यहाँ भी अपना प्रभाव जमाने के उद्देश्य से छत्रशाल की सहायता से मुहम्मद खाँ बंगेश को परास्त कर दिया, इसके बदले में छत्रशाल ने पेशवा को झाँसी, कालपी, सागर व भाटा के प्रदेश दिए.
इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए मुगल बादशाह मुहम्मद शाह 'रंगीला' ने जयसिंह को हटाकर मुहम्मद खाँ बंगेश को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया, जिसे बाजीराव ने 1736 ई. में निर्णायक रूप से हरा दिया. अब मुगल बादशाह ने स्वयं बाजीराव को मालवा का सूबेदार बना दिया तथा शाहू के खर्च के लिए 12 लाख रुपए वार्षिक निश्चित कर दिए गए तथा बाजीराव के भाई चिमनाजी अप्पा को क्रमशः 7 हजारी एवं 5 हजारी का मनसब भी दिया गया. उससे मालवा और बुन्देलखण्ड मराठों के प्रभावशाली नियन्त्रण में आ गए.
(3) गुजरात - गुजरात में मराठा चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करने का कार्य त्रियम्बक राव दामेड़ के पास था, जो बाजीराव का विरोधी था, इस पर बाजीराव ने शाहू को बिना बताए मारवाड़ के शासक एवं गुजरात के सूबेदार अभयसिंह से मित्रता कर दामेड़ के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही की, जिसमें त्रियम्बक राव मार डाला गया और पेशवा समर्थक गायकवाड़ को गुजरात में स्थापित कर दिया गया, लेकिन अभयसिंह ने इसकी हत्या करवा दी. अंतः 1738 ई. में पेशवा ने गुजरात पर आक्रमण कर उसे मराठा राज्य में मिला लिया.
> दिल्ली पर आक्रमण
पेशवा ने अब अपने प्रभाव को और अधिक विस्तार देने के उद्देश्य से अवध पर आक्रमण कर उसे लूट लिया और दिल्ली पर आक्रमण कर दिया. उसने बादशाह को खुली चुनौती दी तथा वह कुछ नहीं कर सका. बाजीराव आगे बढ़ा और राजपूताने को लूटता हुआ वापस पूना लौट गया.
बादशाह ने मराठों को दबाने के लिए निजाम का एक बार पुनः सहारा लिया जिसे बाजीराव ने भोपाल के निकट 1737 ई. में पराजित कर उसे 'दोराहा सराय की सन्धि' (1738 ई.) करने पर विवश कर दिया. जिसके अनुसार, शाहू को मालवा एवं नर्मदा के साथ चम्बल नदी के मध्यवर्ती इलाके व 50 लाख रुपए हर्जाने के रूप में निजाम को देना स्वीकार करना पड़ा जिसे बाद में मुगल बादशाह ने भी स्वीकार कर लिया.
> कोंकण क्षेत्र व मराठा
कोंकण क्षेत्र में मराठों के तीन प्रमुख विरोधी शक्तियाँ थीं – (1) कोलाबा के आंग्रे, (2) जंजीरा के सीदी व (3) गोआ के पुर्तगाली.
1737 ई. में बाजीराव ने पुर्तगालियों के विरुद्ध कार्यवाही करते हुए उनके क्षेत्र थाना, सालसेट व बेसीन पर अधिकार कर लिया. इस पर अंग्रेजों ने भी भयभीत होकर मराठों से बम्बई में सन्धि कर ली. बाजीराव ने मध्यस्थता कर कान्होजी आंग्रे के दो पौत्रों के मध्य कोंकण का राज्य बाँट दिया. 1733 ई. में जंजीरा के सीदियों के विरुद्ध अभियान कर उन्हें सन्धि करने पर विवश कर दिया तथा उनका आधा राज्य हड़प लिया. इस प्रकार बाजीराव ने अपने पश्चिमी समुद्र तट को भी अपने अधिकार में कर लिया.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि 1720 से 1740 ई. के मध्य अपने 20 वर्षों के शासनकाल में बाजीराव ने मराठों का प्रभाव क्षेत्र लगभग पूरे भारत में स्थापित कर दिया और दिल्ली पर आक्रमण कर मुगल सत्ता को मराठों के सम्मुख निस्तेज कर दिया तथा मराठों का गौरव एवं सम्मान चहुँ ओर फैला दिया.
> पेशवा बालाजी बाजीराव के समय में हुए मराठा राज्य का विस्तार
पेशवा बाजीराव (1720-40 ई.) की मृत्यु के बाद शाहू का नया पेशवा बालाजी बाजीराव बना जो पेशवा बाजीराव का ज्येष्ठ पुत्र था. इसने अपने कार्यकाल में मराठा शक्ति को पूरे भारत में सर्वोच्च बना दिया, लेकिन मराठों का पतन भी इसी के कार्यकाल में प्रारम्भ हुआ. पानीपत के तृतीय युद्ध ने मराठा शक्ति को नष्ट कर दिया फिर भी बालाजी बाजीराव के कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, जो निम्नलिखित प्रकार से 
हैं—
मालवा – मराठों एवं मुगलों के मध्य 1736 ई. की सन्धि ढंग से स्थापित नहीं हो पाया था. अतः बालाजी बाजीराव ने के बावजूद भी मालवा पर मराठों का आधिपत्य प्रभावशाली जयसिंह से सम्पर्क स्थापित कर मुगल बादशाह मुहम्मदशाह लिया और 400 मराठा सैनिक मुगल दरबार की सेवा में से मालवा का नायब सूबेदार का पद अपने लिए प्राप्त कर रखने का आश्वासन दिया तथा आवश्यकता होने पर 4000 सिपाहियों द्वारा बादशाह की सहायता करने को तैयार हो गया. इससे मराठों का मुगल दरबार में प्रभाव बढ़ा.
कर्नाटक – मराठा सरदार रघुजी भोंसले ने कर्नाटक के नवाब दोस्तअली की आक्रमण कर हत्या कर दी तथा उसके दामाद चाँदा साहब को गिरफ्तार कर पूना भेज दिया, इससे बालाजी बाजीराव का अधिकार कर्नाटक पर भी हो गया.
भौंसले से सम्बन्ध – रघुजी ने कर्नाटक पर अधिकार जमाने के बाद 1744-51 ई. के मध्य बंगाल पर अनेक आक्रमण किए तथा अलीवर्दी खाँ से उसका प्रान्त उड़ीसा छीन लिया तथा बंगाल एवं बिहार के बदले 12 लाख रघुजी को देना स्वीकार कर लिया. इससे रघुजी एवं पेशवा में प्रतिद्वन्द्विता उत्पन्न हो गई, जिसे छत्रपति ने मध्यस्थता कर समाप्त किया, लेकिन इसका बुरा प्रभाव यह पड़ा कि मराठों की एकता समाप्त हो गई.
गुजरात पर अधिकार - बालाजी बाजीराव ने ताराबाई के समर्थक दामाजी गायकवाड़ को पराजित कर दिया तथा 25 लाख रुपए हर्जाने के रूप में वसूले, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने दामाजी को पुत्र सहित गिरफ्तार कर लिया तथा पूरे गुजरात पर अपना अधिकार जमा किया. इस घटना से ताराबाई ने सबक सीखा और बालाजी से सन्धि कर ली.
निजाम और बालाजी – निजाम ने 1743 ई. में रघुजी को हराकर कर्नाटक पर अपना अधिकार जमा लिया और बादशाह की सहायता से मालवा पर भी वह अधिकार करना चाहता था, लेकिन 1748 ई. में उसकी मृत्यु हो जाने से गद्दी के लिए हैदराबाद में संघर्ष हो गया. इस स्थिति में बालाजी ने मौके का लाभ उठाकर सलावतजंग को समर्थन देने के बदले उससे बगलाना एवं खानदेश का इलाका प्राप्त कर लिया.
थोड़े समय बाद हैदराबाद में पुनः गृहयुद्ध प्रारम्भ हो गया. अतः बालाजी ने हैदराबाद पर आक्रमण कर 'उदगीर के युद्ध' में 1759 ई. में निजाम को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया और बीजापुर, बीदर, औरंगाबाद, असीरगढ़, बुरहानपुर, अहमदनगर, बीजापुर तथा दौलताबाद के दुर्ग उससे हथिया लिए. इससे दक्षिण में बालाजी की धाक जम गई.
बुन्देलखण्ड पर आक्रमण – बालाजी ने बुन्देलखण्ड पर 1741-47 ई. के मध्य आक्रमण कर सारे बुन्देलखण्ड को मराठा राज्य में मिला लिया तथा झाँसी को मराठों की शक्ति का केन्द्र बना दिया.
राजपूताना में हस्तक्षेप — आमेर के राजा जयसिंह की मृत्यु के बाद ईश्वरसिंह व माधोसिंह के बीच चले उत्तराधिकार के संघर्ष में सिन्धिया और होल्कर में प्रतिद्वन्द्विता उत्पन्न हो जाने के कारण पेशवा को हस्तक्षेप करना पड़ा और माधवसिंह के पक्ष में समझौता करवा दिया, लेकिन शीघ्र ही माधवसिंह मराठों का विरोधी बन गया तथा उसने मल्हार राव होल्कर की हत्या का षड्यन्त्र रचा और हजारों मराठा सैनिकों की हत्या करवा दी. इसी प्रकार मारवाड़ की गद्दी के लिए संघर्ष में मराठों ने भाग लिया, जिसमें सिन्धिया की हत्या हो गई. इससे मराठा राजपूत सम्बन्धों में कटुता आ गई.
जाटों से सम्बन्ध – पेशवा बालाजी बाजीराव आगरा और अजमेर पर अधिकार करने का प्रयास करने लगा. इस पर जाट राजा सूरजमल ने मुगल बादशाह की अनुमति पाकर मराठों पर आक्रमण कर उन्हें पराजित कर दिया, जिससे मराठों को सन्धि करनी पड़ी एवं हर्जाना भी देना पड़ा. इससे उनकी प्रतिष्ठा को आघात लगा और उन्होंने जाटों से अपनी पुरानी मित्रता खो दी.
पंजाब और दिल्ली की राजनीति में हस्तक्षेप – बालाजी बाजीराव ने पंजाब व दिल्ली की राजनीति में भी हस्तक्षेप किया. उन्होंने अहमदशाह अब्दाली द्वारा बनाए गए मुगलों के मीरबख्शी को उसके पद से हटा दिया तथा पंजाब पर अधिकार कर लिया. इससे अब्दाली ने मराठों को नष्ट करने के लिए भारत की ओर प्रस्थान किया और 14 जनवरी, 1761 ई. को मराठों एवं अब्दाली के मध्य घमासान पानीपत के तृतीय युद्ध के रूप में हुआ, जिसमें मराठे बुरी तरह परास्त हो गए तथा उनके सभी प्रमुख सेनानायक मारे गए. बालाजी बाजीराव इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर सके और थोड़े ही दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, बालाजी बाजीराव ने मराठों की शक्ति को उनके चरम पर पहुँचा दिया तथा उत्तर एवं दक्षिण भारत पर अपना पूर्ण नियन्त्रण स्थापित कर लिया. वे इससे आगे पश्चिमोत्तर के प्रदेशों पर अधिकार करने के लिए भी प्रयासरत् थे, परन्तु वे इसे पूरा नहीं कर सके. उन्होंने जन कल्याण के लिए भी अनेक कार्य किए, परन्तु अतिशय महात्वाकांक्षा के कारण उन्होंने मराठों की शक्ति को नष्ट कर दिया.
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