मुगलकालीन स्थापत्य कला

मुगलकालीन स्थापत्य कला

मुगलकालीन स्थापत्य कला

> बाबर के समय में मुगल वास्तुकला : टिप्पणी
बाबर स्थापत्य कला कारखी व्यक्ति था. उसे पूर्व मुगलकाल (सल्तनतकाल) में बनी इमारतें पसन्द नहीं आयीं. इसलिए जैसाकि अपनी आत्मकथा में उसने लिखा है कि, “मैंने आगरा, धौलपुर, बयाना, सीकरी, कोल और ग्वालियर में महल बनवाने के लिए 1491 मजदूर लगवाए.” परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि, उसने इन स्थानों पर केवल मण्डप, कुएँ, तालाब एवं फव्वारे ही लगवाए थे, महल या सार्वजनिक भवन नहीं बनवाए. यदि बनवाए भी तो वे इतने कमजोर बने थे कि समय के कारण होने वाली जर्जरता को वे सहन नहीं कर सके.
बाबर द्वारा बनवाई गई इमारतों में केवल दो ही इमारतें शेष बची हैं तथा यह दोनों ही मस्जिदें हैं. इनका निर्माण 1526 ई. में करवाया गया था. ये हैं – ( 1 ) पानीपत की काबुली बाग मस्जिद एवं ( 2 ) सम्भल की जामा मस्जिद. उसकी आज्ञा द्वारा बनवाई गई एक अन्य मस्जिद जो अयोध्या में थी, वर्तमान में नष्ट कर दी गई है.
ऊपर वर्णित तीनों ही इमारतों में कला का कोई लक्षण नहीं है. ये सभी साधारण इमारतें हैं. बाबर का इरादा या कुंस्तुनतुनिया के प्रसिद्ध कारीगर 'सिनान' को अपनी इमारतों का नक्शा बनाने के लिए बुलाया, परन्तु वह इसे मूर्त रूप न दे सका और इसी बीच 1530 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
> हुमायूँ के समय का स्थापत्य : टिप्पणी
हुमायूँ का जीवन निरन्तर संघर्षों में व्यतीत होने के कारण उसे भवन-निर्माण का समय नहीं मिल सका, फिर भी उसने कुछ इमारतों का निर्माण करवाया, जिसमें प्रथम नाम दीन-पनाह महल (दिल्ली) का आता है. यह महल अत्यन्त शीघ्रता में बनवाया गया था. अतः इसमें न तो सुन्दरता का ध्यान रखा गया और न हीं टिकाऊपन का.
इसके अतिरिक्त हुमायूँ ने आगरा तथा फतेहाबाद में मस्जिदों का निर्माण करवाया. वर्तमान में इनके खण्डहर हमें प्राप्त होते हैं. इन दोनों का निर्माण फारसी शैली के आधार पर किया गया है तथा इनमें मौलिकता एवं कला का पूर्णतः अभाव था.
स्थापत्य के क्षेत्र में बाबर और हुमायूँ का केवल मात्र परम्परा को प्रारम्भ कर दिया जिस पर कि आगे चलकर अनेक भव्य भवनों का निर्माण सम्भव हो सका. इतना ही योगदान है कि, इन्होंने इमारत बनवाने की उस
> अकबर के समय की वास्तुकला 
मुगलकाल की वास्तुकला का वास्तविक रूप से प्रारम्भ अकबर के समय में ही हुआ था. उसके द्वारा बनवाए गए भवनों में ईरानी तथा भारतीय तत्व दोनों का मिश्रण हुआ और एक नई शैली को जन्म मिला. इसी कारण से इस शैली को हम राष्ट्रीय शैली भी कह सकते हैं. देश में उसके समय में जितनी भी स्थापत्य निर्माण की शैलियाँ देश में प्रचलित थीं अकबर उन्हें बहुत बारीकी से समझता था और उनको कार्य रूप में परिणत करने के लिए कारीगरों की नई-नई बातें बताता रहता था.
अकबर के स्थापत्य को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है—
(1) किलों का निर्माण, (2) महलों का निर्माण व (3) मकबरों का निर्माण.
(1) किलों का निर्माण – अकबर ने अपने समय में तीन किलों का निर्माण करवाया, यथा - आगरा, लाहौर और इलाहाबाद.
इन किलों में आगरा का किला लाल पत्थर द्वारा निर्मित बड़ा भव्य है. इसका घेरा डेढ़ मील लम्बा है. इसमें दो द्वार हैं तथा इसमें 500 से अधिक इमारतें अकबर द्वारा बनवाई गई थीं जिनमें से कुछ को शाहजहाँ ने तुड़वा दिया था. अकबरकालीन बनी इमारतों में अकबरी महल और जहाँगीरी महल सर्वश्रेष्ठ हैं. जहाँगीरी महल हिन्दू स्थापत्य से प्रभावित है. इसकी बनावट एवं सजावट हिन्दू रीति से की गई है.
लाहौर के किले की इमारतें आगरा के जहाँगीरी महल के समान हो हैं और उनमें थोड़ा-सा अन्तर है एवं यह आगरा के किले से अधिक सघन सजावट वाला है. इस किले में जो चित्रकारी की गई है, वह हिन्दू रीति के अनुसार ही है.
इलाहाबाद का किला प्रायः नष्ट-सा हो चुका है. इसका केवल जनाना भाग शेष है. 
(2) महलों का निर्माण – अकबर ने अपनी नई राजधानी फतेहपुर सीकरी को बनाया तथा इसको अनेक सुन्दर इमारतों द्वारा उसने सजाया. यहाँ निम्नलिखित सुन्दर भवन बने हुए हैं - 
(i) जोधाबाई का महल – स्मिथ के अनुसार, अकबर के समय यहाँ बनी इमारतों में यह सर्वाधिक प्राचीन है. इस इमारत की स्थापत्य शैली न हिन्दू है और न ही मुस्लिम, बल्कि यह उस समय की सभी शैलियों का मिला-जुला रूप है. इसमें तराशे हुए पत्थर का प्रयोग किया गया है तथा इसकी बनावट जहाँगीर महल के समान है.
(ii) मरियम उस्जमानी का महल — इसका वास्तविक नाम सुनहरी कोठी है, क्योंकि इसके भीतरी एवं आन्तरिक भागों में सुनहरे रंग के पत्थर जुड़े हुए थे, इसमें संगतराशी का कार्य बहुत ही अच्छा हुआ है. इसकी दीवारों के भीतरी भागों पर सुन्दर चित्रों को उकेरा गया था.
(iii) तुर्की सुल्ताना का महल – सीकरी के महलों में इस महल को सर्वाधिक सुन्दर माना जाता है. इसकी निर्माण शैली तथा पत्थरों की बनावट सुन्दर व सजीव है तथा यह छोटी इमारत उससे बहुत ही सुन्दर बन गई है. सम्भवतः यह किसी राजकुमारी के रहने का महल रहा होगा.
(iv) बीरबल का महल – यह महल पत्थर की काफी ऊँची कुर्सी पर बना है तथा इसका गुम्बद अत्यन्त भव्य है. इस महल में भीतरी दीवारों पर अत्यन्त सुन्दर चित्रकारी की गई है, जिसमें एक ब्राह्मण को सोता हुए दिखाया गया है.
(v) पंच महल — यह फतेहपुर सीकरी की भव्यतम इमारतों में से एक है. यह पाँच मंजिली इमारत है, जिसमें यह क्रमशः ऊपर की ओर छोटी होती गई है. सबसे ऊपर एक सुन्दर छतरी है. इस इमारत का प्रयोग सम्राट अकबर सुबह- शाम सूर्योदय तथा सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए करता था. इसमें हिन्दू, मुस्लिम एवं जैन शैलियों के आधार पर नक्काशी की गई है.
(vi) दीवान-ए-खास – सीकरी में अकबर का दीवान-एखास एकदम सादा है, फिर भी यह अत्यन्त प्रभावशाली है. यह दो मंजिला होने का आभास देता है. इसका मध्य का सतून अत्यन्त सुन्दर ढंग से बना है, जिसकी नक्काशी देखने योग्य है. इसी सतून के ऊपर शाही सिंहासन रखा जाता था, जिसको रोकने के लिए बहुत-सी नक्काशीदार छतरियाँ बनी हैं. सिंहासन तक पहुँचने के लिए चारों कोनों से छज्जों के रूप में चार मार्ग बनाए गए हैं. इन छतरियों और सतून के मिलाने के बाद देखने से ऐसा लगता है जैसे सूर्य की किरणें फूट रही हैं और यह सतून न होकर सूरजमुखी का फूल हो.
(vii) जामा मस्जिद - अकबर ने दीन-ए-इलाही के अनुयायियों के लिए सीकरी में जामा मस्जिद का निर्माण करवाया था.
(viii) शेख सलीम चिश्ती की दरगाह-इस दरगाह का मध्य भाग अकबर ने बनवाया था. इसमें अनेक सुन्दर जालियों का निर्माण करवाया गया था. जहाँगीर ने इसे संगमरमर का बनवा दिया था.
(ix) बुलन्द दरवाजा—इस दरवाजे का निर्माण 1602 ई. में अकबर ने अपनी गुजरात विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था. यह भारतवर्ष का सबसे ऊँचा दरवाजा है. यह हिन्दू और मुस्लिम स्थापत्य कला का सुन्दर नमूना है. यह लाल पत्थर से निर्मित है जिस पर कोई रंग नहीं चढ़ाया गया है. इस पर बहुत ही सुन्दर नक्काशी का काम हुआ है तथा पच्चीकारी संगमरमर की है, जो बहुत ही सुन्दर व सजीव है.
(3) मकबरों का निर्माण– अकबर के समय में प्रमुख रूप से दो मकबरों का निर्माण किया गया यथा
(i) हुमायूँ का मकबरा, (ii) अकबर का मकबरा.
(i) हुमायूँ का मकबरा — अकबर के समय में हुमायूँ की विधवा पत्नी हाजी बेगम ने इस इमारत को बनवाया था. इसका निर्माण ईरानी कारीगरों व भारतीय मजदूरों द्वारा करवाया गया था. इसीलिए इमारत का नीचे का भाग हिन्दू शैली में बना है तथा ऊपरी भाग पूर्ण रूप से ईरानी शैली में बना है. इस मकबरे में समरूपता का विशेष ध्यान रखा गया है.
(ii) अकबर का मकबरा - अकबर का मकबरा सिकन्दरा में स्थित है, जो आगरा के समीप है. यह लगभग पूर्ण रूप से हिन्दू शैली का बना हुआ है. यह देखने में बौद्ध विहार जैसा है, जिसे अकबर ने स्वयं बनवाया था, लेकिन उसे जहाँगीर ने पूरा किया था.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, अकबर ने अपने समय में व्यापक निर्माण कार्य करवाये. उसके समय के भवन अपनी सादगी और विशालता के लिए प्रसिद्ध हैं.
> जहाँगीर के समय की वास्तुकला
जहाँगीर को स्थापत्य की अपेक्षा चित्रकला में अधिक रुचि थी. अतः उसके समय में इमारतों का निर्माण रुक-सा गया, लेकिन इसके बावजूद भी इस काल में कुछ विशेष सुन्दर इमारतों का निर्माण किया गया, जो निम्नलिखित हैं—
(i) ऐतमाद-उद्-दौला का मकबरा - नूरजहाँ द्वारा अपने पिता का बनवाया गया मकबरा जहाँगीर के समय की सर्वश्रेष्ठ इमारत है. यह श्वेत संगमरमर से बनाया गया है तथा इसमें पिट्रा-ड्यूरा का प्रयोग किया गया है. यह इस शैली की प्रथम मुगल इमारत है.
(ii) अकबर का मकबरा - हालांकि इस मकबरे का नक्शा जहाँगीर द्वारा बनाया गया था, परन्तु इसका निर्माण जहाँगीर ने करवाया. (देखें अकबर स्थापत्य कला).
(iii) जहाँगीर का मकबरा - लाहौर के समीप शाहदरा में जहाँगीर का मकबरा स्थित है. इस मकबरे के ऊपर सफेद संगमरमर का एक मण्डप था, जिसे सिखों ने उतार लिया था. मकबरे का भीतरी भाग संगमरमर की पच्चीकारी से सुशोभित है. चिकने और रंगीन खपरैल उसकी शोभा को बढ़ाते हैं. इस मकबरे को नूरजहाँ ने पूर्ण करवाया था.
इन इमारतों के अलावा जहाँगीर ने अनारकली का मकबरा (लाहौर) ख्वाबगाह तथा मोती मस्जिद का निर्माण करवाया.
> शाहजहाँ और वास्तुकला
शाहजहाँ का राज्यकाल मुगल स्थापत्य कला का स्वर्णयुग था और उसके समय में स्थापत्य कला अपने सौन्दर्य की चरम सीमा पर पहुँच गई थी. उसके द्वारा निर्मित भवनों में शान्ति, गौरव, सुषमा तथा सौन्दर्य मूर्तिमान होते दिखाई पड़ता है. उसके स्थापत्य के विषय में पर्सी ब्राउन ने लिखा है, “जिस प्रकार आगस्तस की यह दम्भपूर्ण उक्ति है कि, उसने रोम को ईंटों का बना हुआ पाया था और संगमरमर का बनाकर छोड़ दिया था, उसी प्रकार शाहजहाँ ने मुगल शहरों को पत्थर का बना हुआ पाया था और संगमरमर का बनाकर छोड़ गया.” शाहजहाँ के समय बने कुछ उत्कृष्ट भवनों का विवरण निम्नलिखित है—
> ताजमहल
शाहजहाँ के समय में निर्मित भवनों में सर्वोत्तम भवन ताजमहल है, जिसे उसने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था. इसके निर्माण के लिए एशिया एवं यूरोप के कारीगर बुलाए गए इसके मुख्य वास्तुकार 'ईसा खाँ' थे. ताजमहल 22 फुट ऊँचे चबूतरे पर स्थित है. इसमें अनेक इमारतें सम्मिलित हैं. दोनों ओर मस्जिदें हैं. मध्य में संगमरमर की समाधि बनी है, जो उद्यानों और तालाबों के बीच कमल के समान गौरवशाली दृष्टिगोचर होती है. इसके मुख्य गुम्बद की आकृति तैमूरी गुम्बद की आकृति से मिलती-जुलती है. इसके निर्माण में 22 वर्ष का समय और साढ़े चार करोड़ रुपए लगे थे. संगमरमर का इतना बढ़िया संयोजन इसमें है कि, कहीं कोई त्रुटि ही नहीं मिलती. इस पर टिप्पणी करते हुए मजूमदार ने लिखा है कि, "ताजमहल कविता, संगीत, चित्र, मूर्ति और स्थापत्य कला का पंचामृत जान पड़ता है. सोम, चारुतम, भव्यता, अपार्थिव दिव्यता उनकी सन्तुलन योजना और मूर्ति की पूर्णता का वचन अगोचर है."
ताजमहल के अतिरिक्त शाहजहाँ ने आगरा, दिल्ली, लाहौर, काबुल, कश्मीर, अजमेर, कान्धार, अहमदाबाद आदि स्थानों पर श्वेत संगमरमर द्वारा मस्जिद, मकबरे, महल और मण्डप आदि का निर्माण करवाया.
अकबर की बहुत-सी इमारतों को, जो लाल पत्थर द्वारा निर्मित थीं, को शाहजहाँ ने तुड़वा कर संगमरमर का बनवा दिया. आगरे के किले में शाहजहाँ ने जहाँगीर महल के उत्तर में अनेक भवनों का निर्माण किया जिनमें दीवाने-आम, दीवाने-खास, मच्छी भवन, मुसम्मम बुर्ज, मोती मस्जिद आदि हैं.
इन इमारतों में दीवान-ए-खास एक अत्यन्त सुन्दर इमारत है, इसमें दोहरे खम्बे लगे हुए हैं. मुसम्मम बुर्ज किले की लम्बी चौड़ी दीवार पर अप्सरा कुंज के समान शोभायमान है. मोती मस्जिद में सभी सामग्री बहुत ही उत्तम रूप से लगी होने के कारण यह अपने नाम को चरितार्थ करती है.
आगरा के किले के समान ही जहाँगीर ने लाहौर के किले में भी अनेक निर्माण कार्य करवाए. इस किले के उत्तरीपश्चिमी भाग में चालीस खम्भे का दीवान-ए-आम, मुसम्मम बुर्ज, शीश महल, नौलक्खा महल और ख्वाबगाह जैसी इमारतें हैं.
1638 ई. में शाहजहाँ ने दिल्ली के पास शाहजहाँनाबाद नामक नगर को बसाया तथा यहाँ किला बनवाया. आज यह किला 'लाल किले' के नाम से प्रसिद्ध है. किले के अन्दर श्वेत संगमरमर से निर्मित अनेक भव्य एवं सुन्दर इमारतें हैं. इन इमारतों में मोती महल, हीरा महल और रंग महल विशेष उल्लेखनीय हैं. दीवाने आम और दीवाने खास इत्यादि इमारतों के अतिरिक्त उसने संगीत भवन और अनेक दफ्तर तथा बाजार भी बनवाए. प्रत्येक महल के सम्मुख पुष्पों की क्यारियाँ, फुब्वारे तथा सुन्दर बाग थे. इमारतों के कंगूरों की कतारें, चमकते हुए गुम्बदों और हवाई गोखरों से सुसज्जित थीं और जाली के कटावों, खम्भों पर बने हुए मेहराबों और दीवारों पर बनी हुई चित्रकारी से इनकी सुन्दरता और भी बढ़ गई थी. महलों और अन्य इमारतों में संगमरमर का फर्श तथा नहरें बहिस्त (स्वर्ग गंगा) शाह बुर्ज से महल में आती थी और भवनों को जल देती हुई फुब्वारे का रूप धारण कर लेती थी. इन फुब्वारे में सर्वश्रेष्ठ फुब्वारा रंगमहल के मध्य के भवन में है. इसी महल की दीवार पर खुदा है : 
अगर फिरदौस वर रुए जमीं अस्त ।
हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्त ॥ 
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि, शाहजहाँ के शासनकाल में लाल पत्थर के स्थान पर ऐश्वर्य और गौरव के प्रतीक संगमरमर की अनेक भव्य एवं सुन्दरतम इमारतों का निर्माण किया गया था. उसके समय के स्थापत्य को देखकर आज भी आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहा जा सकता है.
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