अनुवाद कैसे करें ?
जिस गद्यांश या वाक्य का संस्कृत में अनुवाद किया जाए उसे पहले सावधानी से पढ़कर काल, पुरुष, कारक, वचन, क्रिया आदि की पूरी जानकारी कर लेनी चाहिए । कर्तृवाच्य में कर्ता के पुरुष और वचन के अनुसार ही क्रिया के पुरुष और वचन होते हैं।
कर्ता यदि प्रथम पुरुष, एकवचन हो, तो उसकी क्रिया भी प्रथम पुरुष, एकवचन की होगी। इसी तरह, कर्ता यदि द्विवचन हो, तो क्रिया भी द्विवचन तथा कर्ता यदि बहुवचन हो, तो क्रिया भी बहुवचनान्त होगी। जैसे-
1. लड़का जाता है— बालकः गच्छति।
2. दो लड़के जाते हैं — बालकौः गच्छतः।
3. लड़के जाते हैं - बालकाः गच्छन्ति।
उपर्युक्त प्रथम वाक्य में 'लड़का (बालकः ) ' प्रथम पुरुष, कर्ताकारक, एकवचन है, इसलिए उसकी क्रिया ‘गच्छति' प्रथम पुरुष एकवचन की हुई। दूसरे वाक्य में ‘दो लड़के (बालकौ) ' प्रथम पुरुष, द्विवचन रहने के लिए उसकी 'गच्छतः ' क्रिया भी प्रथम पुरुष, द्विवचन में हुई। इसी प्रकार, तीसरे वाक्य में 'लड़के (बालकाः)' प्रथम पुरुष, बहुवचन रहने से उसकी ‘गच्छन्ति' क्रिया भी प्रथम पुरुष, बहुवचन में हुई।
यदि मध्यम पुरुष का कर्ता रहे तो क्रिया भी मध्यम पुरुष की होगी तथा कर्ता के वचन के अनुसार ही क्रिया का भी वचन होगा। जैसे—
1. तुम जाते हो – त्वं गच्छसि ।
2. तुम दोनों जाते हो— युवाम् गच्छथः ।
3. तुमलोग जाते हो— यूयम् गच्छथ।
उपर्युक्त प्रथम वाक्य में 'तुम ( त्वम् ) ' मध्यम पुरुष, कर्ताकारक एकवचन है। इसलिए उसकी ‘गच्छसि क्रिया भी मध्यम पुरुष एकवचन में हुई। दूसरे वाक्य में 'तुम दोनों (युवाम्)' मध्यम पुरुष, द्विवचन है, इसलिए उसकी 'गच्छथः’ क्रिया भी मध्यम पुरुष, द्विवचन की हुई । इसी तरह, तीसरे वाक्य में 'तुमलोग (यूयम्) ' मध्यम पुरुष, बहुवचन है, अतः उसकी 'गच्छथ' क्रिया भी मध्यम पुरुष, बहुवचन की हुई ।
कर्ता यदि उत्तम पुरुष का हो, तो उसकी क्रिया भी उत्तम पुरुष की होगी और कर्ता के वचन के अनुसार ही क्रिया का वचन होगा। जैसे -
1. मैं जाता हूँ — अहं गच्छामि।
2. हम दोनों जाते हैं- -आवाम् गच्छावः ।
3. हमलोग जाते हैं — वयम् गच्छामः ।
उपर्युक्त प्रथम वाक्य में 'मैं (अहम् ) ' उत्तम पुरुष, कर्ताकारक, एकवचन है, इसलिए उसके अनुकूल 'गच्छामि' क्रिया भी उत्तम पुरुष एकवचन की हुई। दूसरे वाक्य में 'हम दोनों (आवाम्)’ उत्तम पुरुष, द्विवचन है। अतः उसकी क्रिया 'गच्छावः' भी उत्तम पुरुष, द्विवचन में हुई। इसी प्रकार, तीसरे वाक्य में 'हमलोग (वयम्)' उत्तम पुरुष, बहुवचनान्त कर्ता की क्रिया ‘गच्छामः' भी उत्तम पुरुष, बहुवचन में हुई ।
सामान्य नियमानुसार वाक्य के आदि में कर्तृ- पद मध्य में द्वितीयादि तथा अन्त में क्रिया-पद देना चाहिए। जैसे— रामः पुस्तकं पठति- - राम पुस्तक पढ़ता है। संस्कृत वाक्य में यदि उलट-फेर भी हो जाए, तो किसी तरह की गड़बड़ी नहीं होगी। जैसेपुस्तकम् पठति रामः ।
'राम और श्याम घर जाते हैं — ऐसे द्विवचनान्त वाक्य का अनुवाद 'राम-श्यामौ गृहं गच्छतः’ अथवा ‘रामः श्यामश्च गृहं गच्छतः' ऐसा होगा। इसका एक अन्य प्रकार भी है, रामः गृहं गच्छति श्यामश्चापि — राम घर जाता है और श्याम भी।
अनुवाद करते समय यह देखना चाहिए कि मूल वाक्य का भाव पूर्ण रूप से स्पष्ट हुआ है या नहीं। कोरे शब्दानुवाद से सब जगह काम नहीं चलता। उदाहरणार्थदिनेश और महेश में दाँतकटी रोटी है। इसका 'दिनेश महेशयोः दन्तैश्छिन्ना रोटिका चलति' ऐसा शाब्दिक अनुवाद न होकर 'दिनेश- महेशयोः घनिष्ठतमा मैत्री विद्यते' ऐसा भावानुवाद होना चाहिए । 'गाँधीजी महापुरुष और महात्मा थे' इसका अनुवाद 'गाँधी महोदयः महात्मा महापुरुषश्चासीत् ' ऐसा करना चाहिए । यहाँ 'जी' सम्मानसूचक है, इसलिए इसका भावानुवाद 'महोदयः' के रूप में हुआ है।
एक वाक्य में यदि प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष और उत्तम पुरुष के कर्ता रहें, तो क्रिया उत्तम पुरुष के बहुवचन की होगी। जैसे– 'हम, तुम और राम चलेंगे' -अहञ्च त्वञ्च रामश्च गमिष्यामः ।
यदि मध्यम पुरुष और उत्तम पुरुष के कर्ता एकसाथ रहें, तो क्रिया द्विवचनान्त उत्तम 'तुम और हम चलेंगे' – त्वञ्च अहञ्च गमिष्यावः । पुरुष की होगी। जैसे-
यदि प्रथम पुरुष और मध्यम पुरुष के कर्ता एकसाथ रहें, तो क्रिया द्विवचनान्त मध्यम पुरुष की होगी। जैसे– 'राम और तुम जाओगे'– रामश्चत्वञ्च
गमिष्यथः ।
क्रिया-पद में क्रिया के अनुकूल अर्थ वाले धातु के प्रयोग से अनुवाद सुन्दर समझा ‘जाता है। जैसे—'वह भोजन करता है' – इसका अनुवाद 'स भोजनं करोति' से अच्छा ‘स खादति' होगा।
यहाँ कुछ संकेतमात्र दिए गए हैं। जहाँ तक हो सके, अनुवाद की भाषा सरल, सुबोध, सुन्दर एवं मूल भाव को स्पष्ट करनेवाली होनी चाहिए, तभी अनुवाद सफल
समझा जाएगा।
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