General Competition | History | (आधुनिक भारत का इतिहास) | काँग्रेस के पूर्व के राजनीतिक संस्था
18वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध तथा 19वीं का पूर्वार्द्ध भारत की जनमानस के लिए परिवर्तन एवं संघर्ष का दौर था । भारत की अति प्राचीन सभ्यता की समाज एवं राजनीति व्यवस्था प्रत्यक्ष पश्चिमी सभ्यता से टकरा रहा था।

General Competition | History | (आधुनिक भारत का इतिहास) | काँग्रेस के पूर्व के राजनीतिक संस्था
- 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध सभी राजनीतिक संगठनों की स्थापना तत्कालीन प्रभावशाली वर्ग के द्वारा किया गया।
- इन संस्थाओं का स्वरूप अंशत: क्षेत्रीय किंतु इसका प्रभाव भविष्य में पूर्णतः राष्ट्रीय हुआ।
- इन संस्थाओं का क्रियाविधि अपनी माँगों को याचिकाओं तथा प्रार्थनापत्रों के माध्यम से अपनी माँग को ब्रिटिश संसद तक पहुँचाना था।
- इन संगठनों का प्रमुख उद्देश्य प्रशासनिक सुधार, प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी तथा शिक्षा का प्रसार करना था।
- जबकि इसी क्रम में 19वीं शताब्दी उत्तरार्द्ध में स्थापित संस्थाओं की स्थापना
- राजा राममोहन भारतीयों में राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने वाले प्रथम व्यक्ति थे।
- 1828 ई॰ में उन्होंने ‘विद्याचर्चा ' एवं उनके अनुयायियों ने 1836 में 'बंग भाषा प्रकाशक सभा' नामक संस्था की स्थापना किया था।
- इस सभा का उद्देश्य धर्म, राजनीति तथा नैतिक सामाजिक विषयों पर विचार विमर्श करनी थी।
- इसी क्रम में हेनरी विवियन डेरोजियो ने 1830 के दशक में 'द ईस्ट इंडियन' नामक समाचार-पत्र भी प्रकाशित किया। इसका उद्देश्य भी भारत में राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ाना था ।
बंगाल के राजनीतिक संगठन
लैंडहोल्डर्स सोसाइटी (The Land Holders Society)
- यह भारत की प्रथम राजनीतिक संगठन थी। इसके दो सचिव थे। भारतीय सचिव प्रसन्न कुमार ठाकुर थे जबकि अंग्रेज सचिव विलियम काब्री थे।
- इस संस्था के एक प्रतिनिधि जॉन क्राफर्ड लंदन में इसका प्रतिनिधित्व करते थे ।
- इस संस्था को बंगाल जमींदार सभा की भी संज्ञा दी गई थी।
- इस संस्था के निम्न अंग्रेज सदस्य थे-
बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी (The Bengal British India Society)
- अंग्रेजी शासन के अधीन भारतीय कृषकों की वास्तविक दशा का अध्ययन करना तथा यथासंभव में परिवर्तन करना। इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य था।
- यह संस्था 1846 ई. तक निष्क्रिय हो गई थी।
- यह संस्था ब्रिटिश सोसाइटी का ही भारतीय रूप थी, जिसने लैंड होल्डर्स सोसाइटी को पीछे छोड़ दिया था।
ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (The British Indian Association)
- स्थापना - 31 अक्टूबर, 1851 ई०, कलकत्ता
- संस्थापक अध्यक्ष - राजा राधाकांत देव
- उपाध्यक्ष - राजा कालीकृष्णदेव
- इसके अन्य सदस्य
- भारत के जमींदारों को राजनैतिक संरक्षण प्रदान करना इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य था ।
- इस संस्था का निर्माण लैण्ड होल्डर्स सोसाइटी तथा बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी को मिलाकर किया गया था।
- बंगाल के बाहर भी इसकी शाखाएँ खोली गई थी। इसलिए इस संस्था को " भारतवर्षीय " सभा भी कहा जाता था।
- इस संगठन ने नील विद्रोह की जाँच के लिए आयोग बैठाने की माँग की थी।
- इस संगठन ने 1860 में अकाल पीड़ितों के लिए धन इकट्ठा किया था ।
- ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन ने कैनिंग द्वारा 1860 ई. में आयकर लगाने का भी विरोध किया था।
- यह एक राजनैतिक संस्था के रूप में 20वीं शताब्दी तक स्वतंत्र रूप से में रही थी।
- कालान्तर में इस संस्था का कांग्रेस में विलय कर लिया गया था।
- ज्ञातव्य है हिन्दू पैट्रियाट इस संस्था का प्रमुख पत्र था ।
इंडियन लीग (The Indian League )
- इसी संगठन से भविष्य में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी भी जुड़ गए थे।
- इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य लोगों के अंदर राष्ट्रवाद के भावना को बढ़ावा देना था।
- इस संस्था के अस्थायी अध्यक्ष शम्भूचंद्र मुखर्जी थे।
- कुछ दस्तावेजों में इसके संस्थापक के रूप में शिशिर कुमार घोष को भी दर्शाया गया है।
कलकत्ता स्टूडेण्ट्स एसोसिएशन
- इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य छात्रों के हितों का संवर्द्धन करना था।
- कालांतर में इस संगठन से सुरेन्द्र नाथ बनर्जी भी जुड़ गए थे।
इंडियन नेशनल एसोसिएशन
- इंडियन लीग की स्थापना के 1 वर्ष के भीतर ही 26 जुलाई एकेडमी 1876 को इसका स्थान इंडियन एसोसिएशन ने ले लिया था।
- इंडियन एसोसिएशन की स्थापना सुरेन्द्र नाथ बनर्जी तथा आनंद मोहन बोस ने किया था ।
- इसका प्रमुख उद्देश्य मध्यम वर्ग के साथ-साथ साधारण वर्ग को भी राष्ट्रवादी भावना को जागृत करना था ।
- इंडियन एसोसिएशन के संस्थापक सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे। परन्तु इसके सचिव आनंद मोहन बोस थे।
- कालांतर में इसके अध्यक्ष कलकत्ता प्रमुख बैरिस्टर मनमोहन घोष चुने गए थे।
- सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के अनुसार इसके निम्नलिखित उद्देश्य थे -
(a) देश की जनता की एक शक्तिशाली संस्था का गठन करना(b) सामान्य राजनीतिक स्वार्थों के आधार पर भारतीयों को सूत्रबद्ध करना(c) हिंदू एवं मुसलमानों के बीच मैत्री भाव बढ़ाना
- इस संस्था न जमींदारों के स्थान पर मध्यम वर्ग को बढ़ावा दिया था ।
- इस संगठन ने सिविल सर्विसेज आंदोलन चलाया था। जिसे 'भारती। जनपद सेवा आंदोलन' कहा गया था ।
भारतीय जनपद सेवा आंदोलन या सिविल सेवा आंदोलन
- ज्ञातव्य है कि भारत में सिविल सेवा का जन्मदाता कार्नवालिस था।
- वर्ष 1853 से प्रतियोगी परीक्षा का आयोजन होना प्रारंभ हुआ। इसी वर्ष से भारतीयों का चयन जनपद सेवा में प्रारंभ हुआ था।
- 1861 में इस परीक्षा में सम्मिलित होने की अधिकतम आयु 22 वर्ष थी तथा यह केवल लंदन में आयोजित होती थी ।
- 1863 में भारत कर्म प्रथम I.C.S. सत्येन्द्र नाथ टैगोर हुए थे।
- इसी क्रम में 1866 में इसकी आयु 21 वर्ष कर दिया गया था। वर्ष 1869 में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी तथा 4 अन्य भारतीयों ने परीक्षा पास किया था।
- सुरेन्द्र नाथ बनर्जी असम के कलेक्टर थे जब उनको बर्खास्त कर दिया गया था। वर्ष 1874 में बनर्जी को बर्खास्त किया गया था।
- 1877 में इस सेवा की आयु घटा कर 19 वर्ष कर दिया गया था।
- कलकत्ता में इंडियन एसोसिएशन ने इसके विरोध में 1877 में टाउन हॉल में एक सभा बुलाई थी।
- इस सभा में केशव चंद्र सेन भी उपस्थित हुए धं जो अपने समूचे जीवनकाल में कभी किसी राजनीतिक सभा में शामिल नहीं हुए थे।
- एसोसिएशन ने 1879 में ब्रिटिश सरकार के समक्ष स्मृति पत्र पेश करने के लिए लाल मोहन घोष को ब्रिटेन भेजा था।
- 1923 में सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन भारत तथा ब्रिटेन दोनों स्थानों पर एक साथ होना प्रारंभ हो गया था।
बंबई के राजनीतिक संगठन
बंबई एसोसिएशन
- कलकत्ता के ब्रिटिश इंडिया एसोसिएशन के नमूने पर दादाभाई नौरोजी ने 26 अगस्त, 1852 ई० बंबई में 'बंबई एसोसिएशन' बनाई।
- इस संगठन का मुख्य उद्देश्य सरकार को समय-समय पर ज्ञापन देना था ताकि हानिकारक समझे जाने वाले नियमों तथा सरकारी नीतियों के लिए सुझाव दिया जा सके।
बम्बई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन
- बंबई के चार बड़े नेताओं के प्रयासों से इस संगठन की स्थापना हुआ था।
- जनवरी 1885 ई. को बंबई में नागरिकों की एक सभा गई इसकी अध्यक्षता जमशेदजी जीजाभाई ने किया था।
- इस संगठन का उद्देश्य राजनीतिक व सामाजिक दृष्टिकोण से राष्ट्रवादी भावना का प्रचार प्रसार करना था।
- बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन को पूर्व में बम्बे एसोसिएशन के नाम से जाना जाता था।
- ज्ञातव्य है यह बंबई की प्रथम राजनीतिक संस्था थी ।
पूना सार्वजनिक सभा
- इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य जनता को सरकार की वास्तविकता से परिचित करना था और अधिकारों के प्रति सचेत करना था।
- इस संस्था ने जनता और सरकार के मध्य सेतु का कार्य किया।
- पूना सार्वजनिक सभा मुख्यतः स्त्रोदित मध्यवर्ग, जमींदारों तथा व्यापारियों के स्वार्थों की प्रतिनिधित्व करती थी।
- इसके सदस्यों में अधिकांश ब्राह्मण तथा वैरव थे।
मद्रास की राजनीतिक संस्थाएँ
मद्रास नेटिव एसोसिएशन
- इस संस्था का उद्देश्य कानूनी तथा सरकारी नियमों के साथ जनता की समस्या का वकालत करना था।
- ज्ञातव्य है इसी संस्था ने 1857 के विद्रोह की आलोचना किया था ।
- ज्ञातव्य है कि कलकत्ता के ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन की एक सभा 26 जनवरी, 1852 को मद्रास में आयोजित किया गया।
- इस सभा के अध्यक्ष सी. वाई. मुदलियार तथा सचिव पी. रामानुजाचारी थे।
- 13 जुलाई, 1852 को संस्था ने अपना नाम बदलकर मद्रास नेटिव एसोसिएशन रख दिया था।
- इस संस्था ने अपने प्रतिनिधि माल्कन लेविन को नियुक्त किया था।
मद्रास महाजन सभा
- इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य स्थानीय संगठनों के कार्यों को समन्वित करना तथा महाजनों एवं किसानों के बीच के संघर्ष को रोकना था।
- ध्यातव्य है कि इस संस्था के अध्यक्ष बी. राघवाचारी तथा सचिव आनन्द चालू चुने गए थे।
- इस संस्था का प्रथम सम्मेलन 29 दिसम्बर, 1884 से 2 जनवरी, 1885 तक मद्रास में हुआ था।
विदेशी राजनीतिक संगठन
लंदन इंडिया सोसाइटी
- इस संस्था का उद्देश्य ब्रिटिश की जनता को भारतीय समस्याओं और कष्टों से परिचित करना था।
- कांग्रेस के पूर्व के राजनीतिक संस्थाओं का आंदोलन एवं अभियान
- 1875 में कपास पर आयात आरोपित करने में विरोध में
- सरकारी सेवाओं के भारतीयकरण हेतू (1878-79) में
- लार्ड लिंटन की अफगान नीति का विरोध 1878-79 से विरोध में
- शस्त्र अधिनियम ( 1878 ) के विरोध में
- वर्नाकुलर प्रेस एक्ट ( 1878) के विरोध में
- 'प्लांटेशन लेवर' एवं 'इंग्लैंड इमिग्रेशन एक्ट' के विरोध में
- स्वयंसेवक सेना के प्रदेश के अधिकार के समर्थन में
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