झारखण्ड के लोकनृत्य

झारखण्ड के लोकनृत्य
> लोकनृत्य
> छऊ नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रारंभ सरायकेला में हुआ तथा यहीं से यह मयूरभंज (उड़ीसा) व पुरुलिया ( प० बंगाल) में विस्तारित हुआ।
> अपनी विशिष्ट शैली के कारण छऊ नृत्य को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेष ख्याति प्राप्त है । 
> यह पुरूष प्रधान नृत्य है।
> इसका विदेश में सर्वप्रथम प्रदर्शन 1938 ई. में सुधेन्द्र नारायण सिंह द्वारा किया गया। 
> यह झारखण्ड का सबसे प्रसिद्ध लोकनृत्य है। इसकी तीन शैलियाँ सरायकेला (झारखण्ड), मयूरभंज (उड़ीसा) तथा पुरुलिया (प० बंगाल) हैं। ज्ञात हो कि छऊ की सबसे प्राचीन शैली ‘सरायकेला छऊ' है।
> झारखण्ड के खूँटी जिले में इसकी एक विशेष शैली का विकास हुआ है, जिसे 'सिंगुआ छऊ' कहा जाता है।
> यह एक ओजपूर्ण नृत्य है तथा इसमें विभिन्न मुखौटों को पहनकर पात्र पौराणिक व ऐतिहासिक है कथाओं का मंचन करते हैं। (इसके अतिरिक्ति कठोरवा नृत्य में भी पुरूष मुखौटा पहनकर नृत्य करते हैं)
> इस नृत्य में प्रयुक्त हथियार वीर रस के तथा कालिभंग श्रृंगार रस * को प्रतिबिंबित करते हैं।
> इस नृत्य में भावो की अभिव्यक्ति के साथ-साथ कथानक भी होता है जबकि झारखण्ड के अन्य लोकनृत्यों में केवल भावों की अभिव्यक्ति होती, कथानक नहीं।
> इसमें प्रशिक्षक/गुरू की उपस्थिति अनिवार्य होती है।
> वर्ष 2010 में छऊ नृत्य को यूनेस्को द्वारा 'विरासत नृत्य' में शामिल किया गया है।
> लोकनृत्य 
> जदुर नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य को नीर सुसंको भी कहा जाता है।
> यह नृत्य कोलोम सिंग - बोंगा पर्व (फागुन) के बाद प्रारंभ होकर सरहुल पर्व (चैत) तक चलता है। 
> इसका प्रदर्शन उराँव जनजाति द्वारा किया जाता है। 
> यह उत्पादकता, उर्जा तथा मातृभूमि के प्रति आदर का प्रतीक है।
> यह स्त्री-पुरूष का सामूहिक नृत्य है। 
> इसमें लय-ताल तथा राग के अनुरूप वृताकार पथ पर दौड़ते हुए महिलाएँ नृत्य करती हैं।
> लोकनृत्य  
> जपी नृत्य 
> विशेषता
> यह नृत्य शिकार से विजयी होकर लौटने के प्रतीक के रूप में किया जाता है। 
> यह सरहुल पर्व (चैत) में प्रारंभ होकर आषाढ़ी पर्व (आषाढ़) तक चलता है। 
> यह मध्यम गति का नृत्य है, जिसे स्त्री-पुरुष सामूहिक रूप से प्रदर्शित करते हैं। 
> इस नृत्य के दौरान महिलाएँ एक-दूसरे की कमर पकड़ कर नृत्य करती हैं तथा वादक, गायक व नर्तक पुरूष इन महिलाओं से घिरे होते हैं।
> लोकनृत्य
> करमा/लहुसा नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य में 8 पुरूष / 8 स्त्री भाग लेते हैं।
> यह नृत्य मुख्यतः करमा पर्व के अवसर पर सामूहिक रूप से किया जाता है।
> इस नृत्य में पुरूष व स्त्रियाँ गोलार्द्ध बनाकर आमने-सामने खड़े होते हैं तथा एक-दूसरे के आगे-पीछे चलते हुए नृत्य करते हैं ।
> यह नृत्य झुककर किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान ‘लहुसा गीत' गाया जाता है।
> इस नृत्य के दो प्रकार खेमटा और भिनुसारी  हैं।
> लोकनृत्य
> बुरू नृत्य
> विशेषता
> यह जदुर तथा करमा नृत्य का मिश्रण है।
> यह नृत्य मागे तथा गेना की ही भांति की जाती है।
> लोकनृत्य
> पाइका नृत्य
> विशेषता
> यह एक ओजपूर्ण नृत्य है।
> इसमें नर्तक सैनिक वेश धारण करके नृत्य करते हैं। नर्तकों को एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में शील्ड को संभालना होता है।
> इसमें नर्तक रंग-बिरंगी झिलमिलाती कलगी लगी या मोर पंख लगी पगड़ी ( टोपी) बाँधते हैं। इस नृत्य में पगड़ी पर कलगी अनिवार्य होता है।
> यह उत्तेजक, ओजस्वी, मनोरंजक व वीरतापरक गीत रहित नृत्य है |
> यह नृत्य पद के साथ मार्शल आर्ट तकनीक (मार्शिलय नृत्य / युद्ध नृत्य) का संयोजन भी है। 
> यह केवल पुरूष सदस्यों द्वारा किया जाता है तथा इस नृत्य में पाँच, सात या नौ के जोड़े होते हैं।
> यह एक युद्ध नृत्य है तथा यह आदिवासी व सदान दोनों में प्रचलित है।
> यह नृत्य मुण्डा जनजाति में सर्वाधिक प्रचलित है।
> डॉ. रामदयाल मुण्डा के नेतृत्व में इस नृत्य का मंचन भारत महोत्सव (रूस) में किया गया था जो रूस में अत्यंत लोकप्रिय हुआ था।
> लोकनृत्य
> जतरा नृत्य
> विशेषता 
> यह सामूहिक नृत्य है, जो उराँव जनजाति द्वारा किया जाता है। 
> इसमें स्त्री-पुरूष हाथ पकड़कर नृत्य करते हैं। 
> इसमें वृत्ताकार/अर्द्धवृत्ताकार घेरा बनाकर नृत्य किया जाता है। 
> लोकनृत्य  
> नचनी नृत्य 
> विशेषता
> यह पेशेवर नृत्य है।
> स्त्री और पुरूष कार्तिक पूर्णिमा के दिन विशेष रूप से यह नृत्य करते हैं।
> इस नृत्य में स्त्री नचनी एवं पुरूष रसिक के रूप में होते हैं। 
> लोकनृत्य
> नटुआ नृत्य
> विशेषता
> यह पुरुष प्रधान नृत्य है। 
> इसमें पुरुषों द्वारा स्त्री वेश धारण करके नृत्य किया जाता है। 
> लोकनृत्य  
> कली नृत्य 
> विशेषता
> यह पुरूष प्रधान नृत्य है, परंतु केन्द्र में नर्तकी (कली) रहती है।
> इसमें भाग लेने वाली नर्तकी श्रृंगार किए रहती है तथा सर पर मुकुट पहनती है।
> इसमें भाग लेने वाली नर्तकी (कली) फूल खिलने की सुंदरता को प्रतिबिंबित करती है।
> इस नृत्य में राधा-कृष्ण प्रेम-प्रसंग के गीतों की प्रधानता रहती है।
> इस नृत्य में नगाड़े, ढाँक, ढोल, मांदर, शहनाई आदि बजाया जाता है।
> लोकनृत्य
> अग्नि नृत्य
> विशेषता
> यह धार्मिक नृत्य है।
> इस नृत्य के द्वारा शील की पूजा की जाती है।
> यह नृत्य मण्डा या विपु पूजा के अवसर पर किया जाता है।
> लोकनृत्य
> मण्डा नृत्य या भगतिया नृत्य
> विशेषता
> यह पुरूषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है।
> इस नृत्य में बच्चे से बूढ़े तक शामिल होते हैं।
> इस नृत्य के दौरान महिलाएँ माथे पर लोटा में जल लेकर भगतिया नर्तकों के ऊपर आम्र पालवों से मार्जन करती हैं ।
> यह पुरूषों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान गीत नहीं गाए जाते बल्कि केवल ढाँक, नगाड़ा, शहनाई आदि वाद्य यंत्रों का वादन होता है।
> यह सात्विक भाव के साथ किया जाने वाला कलात्मक नृत्य है।
> यह भगवान शिव या महादेव पूजा का नृत्य है।
> लोकनृत्य
> माठा नृत्य
> विशेषता
> यह सोहराई पर्व के समय किया जाने वाला पुरूष प्रधान नृत्य है।
> यद्यपि उराँव जनजाति में पुरूषों के साथ-साथ महिलाएँ भी इस नृत्य में भाग लेती हैं।
> इस नृत्य आदिवासी व सदान दोनों में प्रचलित है।
> लोकनृत्य
> झूमर नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य मुख्यतः फसल की कटाई के अवसर पर
किया जाता है। 
> यह स्त्री प्रधान नृत्य है । 
> जनजातियों द्वारा विवाह तथा अन्य पर्व-त्योहारों के अवसर पर भी इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है। 
> यह नृत्य घेरा बनाकर समूह में किया जाता है। 
> झूमर नृत्य के प्रमुख प्रकार 
> लोकनृत्य 
> करिया झूमर नृत्य
> विशेषता
 > यह स्त्री प्रधान नृत्य है।
> इस नृत्य में महिलाएँ एक-दूसरे के हाथ में हाथ डालकर घूम-घूमकर नृत्य करती हैं। 
> लोकनृत्य
> मरदानी झूमर नृत्य
> विशेषता
> यह पुरूष प्रधान नृत्य है।
> इसमें नृत्य के साथ गायन भी होता है।
> इस नृत्य के दौरान एक गीत गाने वाला समूह ओजपूर्ण गीत गाते रहते हैं।
> लोकनृत्य
> ठड़िया नृत्य
> विशेषता
> यह झूमर की तरह का ही नृत्य है।
> इस नृत्य में सीधे खड़ी चाल में चलते हुए नृत्य किया जाता है। इसी कारण इसे ठड़िया (खड़ा) नृत्य कहा जाता है।
> यह स्त्री एवं पुरूष दोनों का नृत्य है।
> लोकनृत्य
> अंगनई नृत्य
> विशेषता
> यह महिला प्रधान नृत्य है, परंतु कभी-कभी इसमें पुरूष भी शामिल हो जाते हैं।
> अधिकांशतः करमा तथा जितिया के दौरान इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है।
> लोकनृत्य
> लुझरी नृत्य
> विशेषता
> इसमें लुझकते हुए नृत्य मंडली झूमर नृत्य करती
 है ।
> इसका प्रयोग स्त्री व पुरूष दोनों के द्वारा झूमर के दौरान किया जाता है।
> यह अंगनई की एक शैली है तथा इसे लुझकउआ नृत्य भी कहा जाता है।
> लोकनृत्य
> डंडुड़धरा नृत्य
> विशेषता
> यह पुरुष प्रधान झूमर नृत्य है जिसका प्रदर्शन मरदाना झूमर के दौरान किया जाता है।
> इस नृत्य में नर्तक एक-दूसरे की कमर पकड़ कर जुड़ जाते हैं तथा कतारबद्ध होकर हाथ, पैर व शरीर से विभिन्न प्रकार के लोच, लय, ताल व राग के अनुरूप नृत्य करते हैं।
> लोकनृत्य 
> कठोरवा नृत्य
> विशेषता
> यह पुरुष प्रधान नृत्य है।
> इसमें पुरुष मुखौटा पहनकर नृत्य करते हैं।
> लोकनृत्य
> मुण्डारी नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य मुण्डा जनजाति में प्रचलित है।
> इसमें रंग-बिरंगी पोशाक पहनकर नृत्य किया जाता है।
> इस नृत्य के प्रमुख प्रकार जदुर, ओरजदुर, नीरजदुर, चिटिद, जपी, गेना, छव, बरू, आदि हैं।
> लोकनृत्य
> गेना नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य में महिलाएँ एक-दूसरे की कमर पर हाथ रखकर कतार में जुड़कर नृत्य करती हैं।
> यह विजय के उत्साह का प्रतीक नृत्य है।
> लोकनृत्य
> जापी नृत्य
> विशेषता
> यह स्त्री-पुरूष का सामूहिक नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान नर्तक, वादक तथा गायक पुरूष व स्त्रियों से घिरे रहते हैं।
> इस नृत्य के दौरान पुरूष गायकों के गीतों की अंतिम कड़ी को महिलाएँ गाती हैं।
> यह शिकार से विजयी होकर लौटने का प्रतीक गीत नृत्य है।
> लोकनृत्य
> चिटिद नृत्य
> विशेषता
> यह महिला प्रधान नृत्य है।
> लहसना, जुड़े हाथों की मुद्रा तथा कदमों की विशिष्टता इस नृत्य की विशेषता है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन करम व जरगा के अखरा में होता है ।
> इस नृत्य के दौरान गायन भी किया जाता है।
> यह नृत्य उपासना का नृत्य है।
> लोकनृत्य
> गौंग नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य हो जनजाति में प्रचलित है।
> लोकनृत्य
> मागे/माघे नृत्य
> यह नृत्य हो जनजाति में प्रचलित है।
> यह एक सामूहिक नृत्य है, जिसमें महिला व पुरूष दोनों भाग लेते हैं।
> यह नृत्य माघ पूर्णिमा को किया जाता है।
> इसमें नृत्य करने वालों के बीच गाने व बजाने वाले घिरे होते हैं।
> लोकनृत्य 
> लांगड़े नृत्य 
> विशेषता
> यह संथाली जनजाति का लोकनृत्य है।
> यह नृत्य किसी भी खुशी या उत्सव के अवसर पर किया जाता है।
> लोकनृत्य
> बाहा नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य संथाली जनजाति द्वारा बाहा पर्व (सरहुल) के समय किया जाता है।
> इस नृत्य में साल एवं महुआ फूलों का प्रयोग किया जाता है। 
> यह नृत्य जाहेर या सरना स्थल पर किया जाता है।
> लोकनृत्य
> बा नृत्य
> विशेषता
> यह हो जनजातियों का एक प्रमुख नृत्य है।
> यह नृत्य सरहुल के अवसर पर किया जाता है।
> इस नृत्य में स्त्री तथा पुरूष सम्मिलित होकर सरहुल पर्व के समय गायन व नृत्य करते हैं।
> लोकनृत्य
> डाहर नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य संथाली जनजाति द्वारा यह नृत्य सड़कों पर किया जाता है।
> इस नृत्य में पुरूष तथा महिला सामूहिक रूप से भाग लेते हैं।
> यह नृत्य माघ महीने में माघा बोंगा पर्व के अवसर पर किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान मांदर, नगाड़ा, तुरही, ढांक, घंटी आदि बजाया जाता है।
> यह नृत्य गांव के अखरा में ही किया जाता है।
> इसे लांगड़े नृत्य भी कहा जाता है।
> लोकनृत्य
> दसाई नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का आयोजन दशहरा से ठीक पहले पांच दिनों हेतु आदिवासी पुरूषों द्वारा किया है। नृत्य के दौरान नृतक के माथे पर मोर का पंख लगा होता है। जाता
> इस नृत्य में भाग लेने वाले पुरुष महिला के वेश में वाद्ययंत्रों पर नृत्य करते हैं।
> इस नृत्य के दौरान प्रयुक्त होने वाला वाद्ययंत्र सूखे कद्दू से बनाया जाता है, जिसे भुआंग कहते हैं।
> इसके अतिरिक्त इस नृत्य में थाली व घंटी का भी प्रयोग किया जाता है।
> इस नृत्य की शुरूआत बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा आदिवासी क्रांतिकारियों को बंदी बनाने के बाद उन आदिवासियों को ढूंढने हेतु हुआ था। इस दौरान पुरूष द्वारा महिला का रूप धारण करके बंदी बनाए गए क्रांतिकारियों को ढूंढने हेतु टोलियों में निकलते थे। 
> इस नृत्य के प्रारंभ में माँ दुर्गा की अराधना की जाती है ।
> इस नृत्य की शुरूआत हाय रे हाय... शब्द ( बंदी बनाने का दुःख) के साथ शुरू होता है तथा इसकी समाप्ति देहेल, देहेल शब्द (विजय का प्रतीक) के साथ होती है।
> लोकनृत्य
> दसंय नृत्य
> विशेषता
> यह संथाल जनजाति में प्रचलित दशहरा पर्व के समय किया जाने वाला पुरूष प्रधान नृत्य है ।
> इस नृत्य के दौरान पुरूष महिलाओं की वेश-भूषा धारण करके नृत्य करते हैं।
> इस नृत्य के दौरान नृतक लोगों के घर जाकर उनके आंगन में नाचते हैं तथा अन्न प्राप्त करते हैं।
> यह नृत्य दशहरा के प्रथम दिन से विजयादशमी तक किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान करताल बजाया जाता है।
> लोकनृत्य
> डोमकच नृत्य'
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन विवाह के अवसर पर किया जाता है तथा विवाह के पूर्व से ही वर व कन्या के घर के आंगन में रात्रि में किया जाता है।
> यह मूलतः स्त्री प्रधान नृत्य है तथा इसमें महिलाओं के दो दल होते हैं। एक दल गीत उठाता है तो दूसरा दल उन गीतों की कड़ियों को दोहराता है।
> यह नृत्य परिवार या पड़ोस के सदस्य मिलकर घर के आंगन में ही करते हैं।
> इस नृत्य में शहनाई, बाँसुरी, मांदर, ढोल, नगाड़ा, ठेचका, करताल, झाँझ आदि वाद्ययंत्रों का वादन किया जाता है।
> इस नृत्य के कई भेद हैं जैसे – जशपुरिया, असमिया,  झुमटा आदि।
> लोकनृत्य
> हेरो नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का आयोजन धान की बुआई के बाद किया जाता है।
> इसके दौरान महिला एवं पुरूष सम्मिलित रूप से पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ गायन व नृत्य करते हैं।
> लोकनृत्य
> घोड़ा नृत्
> विशेषता
> इस नृत्य का आयोजन मेले, त्योहारों व बारात के स्वागत के समय किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान नर्तक बांस के पहिए से बिना पैर के घोड़े की आकृति बनाकर नृत्य करता है।
> नृत्य के दौरान नर्तक बांए हाथ से घोड़े की लगाम तथा दांये हाथ में दोधारी तलवार पकड़े होते हैं।
> नागपुरी क्षेत्र में पाण्डे दुर्गानाथ राय घोड़ा नृत्य हेतु प्रसिद्ध थे।
> लोकनृत्य 
> जरगा नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य माघ माह में किया जाता है।
> इस नृत्य की प्रमुख विशेषता पद संचालन है ।
> इसमें महिलाएँ सामूहिक रूप से नृत्य करती हैं।
> लोकनृत्य
> ओरजरगा नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य जरगा नृत्य के साथ-साथ किया जाता है।
> इसमें महिलाएँ तीव्र गति से नृत्य करती हुयी वर्गाकार घुमती है तथा इनके मध्य गायक, वादक व नर्तक पुरूष होते हैं।
> लोकनृत्य 
> सोहराई नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का आयोजन पालतू पशुओं के लिए किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान गोशाला में पूजा की जाती है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन सामान्यतः दीपावली के दूसरे दिन किया जाता है।
> नृत्य के दौरान महिलाओं के द्वारा चुमावड़ी गीत गाया जाता है। 
> इस नृत्य के दौरान पुरूष गाँव-जमाव गीत गाकर नाचते हैं।
> इस नृत्य के दौरान नर्तकों का दल घर-घर जाकर आंगन या चौरावे व रास्ते पर नृत्य करते हैं। 
> लोकनृत्य
> अंगनाई नृत्य 
> विशेषता 
> यह पूजा के अवसर पर किया जाने वाला एक धार्मिक नृत्य है।
> यह नृत्य मुख्यतः सदानों में प्रचलित है।
> इस नृत्य के प्रमुख प्रकार चढ़नतरी, रसक्रीड़ा, थडिया तथा खेमटा हैं।
> लोकनृत्य
> जोमनमा नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य नया अन्न ग्रहण करने की खुशी में किया जाता है।
> इसमें महिला तथा पुरूष सामूहिक रूप से नृत्य करते हैं ।
> इस नृत्य के दौरान मांदर, नगाड़े, बनम आदि बजाया जाता है।
> लोकनृत्य
> गेना और जापिद नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य के दौरान महिलाएँ कतार जुड़कर नृत्य करती हैं तथा पुरुष स्वतंत्र रूप से नृत्य. करते हैं। पुरूषों द्वारा वाद्ययंत्र भी बजाया जाता है।
> लोकनृत्य
> टुसू नृत्य
> विशेषता
> यह महिला प्रधान नृत्य है।
> महिलाएँ मकर सक्रांति के अवसर पर टुसू के प्रतीक 'चौड़ाल' को प्रवाहित करती हैं। इस अवसर पर वे सामूहिक रूप से यह नृत्य करती हैं।
> लोकनृत्य
> रास नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान पुरूष नर्तक, वादक एवं गायकों के बीच महिलाएँ नृत्य करती हैं।
> लोकनृत्य
> राचा नृत्य
> विशेषता
> इसे बरया खेलना, नाचना या खड़िया नाच भी कहा जाता है।
> यह नृत्य विशेष रूप से खूँटी जिले के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में प्रचलित है।
> इस नृत्य के पहले चरण में महिला नर्तकियाँ पुरुष नर्तकों की ओर बढ़ती हैं तथा पुरुष पीछे हटते हैं, जबकि इसे दूसरे चरण में पुरूष गीत गाते हुए महिलाओं को नृत्य करते हुए पीछे की ओर भेजते हैं।
> इस नृत्य में मांदर तथा घंटी का प्रयोग किया जाता है।
> लोकनृत्य
> धुड़िया नृत्य 
> विशेषता
> यह नृत्य उराँव जनजाति में विशेष रूप से प्रचलित है। 
> खेतों में बीज बोने के पश्चात् मौसमी परिवर्तन के बाद जब खेतों से धूल उड़ती है, तब
धूल उड़ाते हुए यह नृत्य किया जाता है। 
> इस नृत्य के दौरान मांदर बजाकर लोग नाचते हैं। 
> लोकनृत्य
> कली नृत्य
 > विशेषता
> यह नृत्य महिलाओं द्वारा किया जाता है। 
> नृत्य करने वाली महिलाएँ श्रृंगार से सजकर मुकुट पहनकर नृत्य करती हैं। 
> इस नृत्य में राधा-कृष्ण के प्रेम प्रसंग की प्रमुखता होती है।
> इसे नचनी-खेलड़ी नाच भी कहा जाता है।
 > लोकनृत्य 
> दोहा नृत्य
> विशेषता 
> यह नृत्य मुख्यतः संथाल जनजाति में प्रचलित है। 
> यह नृत्य विवाह संस्कार के अवसर पर वर एवं कन्या दोनों के घर में किया जाता है।
> इसे दराम-दाः नृत्य भी कहा जाता है। 
> लोकनृत्य 
> दोंगेड़ नृत्य
> विशेषता  
> यह संथाल जनजाति में प्रचलित पुरुष प्रधान नृत्य है। 
> सामूहिक शिकार के अवसर पर यह नृत्य जंगल में किया जाता है जिसमें वाद्य यंत्रों का भी प्रयोग किया जाता है।
> लोकनृत्य
> दंसय नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन दशहरे के अवसर पर गुरू - गृह में गुरू - चेलों द्वारा किया जाता है। 
> यह नृत्य मूलतः मंत्र विद्या की सिद्धि प्राप्ति के प्रशिक्षण अवसर पर किया जाने वाला नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान पुरूष ही महिलाओं की वेशषभूषा व आभूषण का धारण करके नृत्य करते हैं।
> इस नृत्य के दौरान भुआंग, नगाड़ा, ढांक, बांसुरी, तुरही, बनम आदि बजाना अनिवार्य होता है। 
> लोकनृत्य 
> दोसमी नृत्य 
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन अगहन के महीने में किया जाता है।
> इस नृत्य का आयोजन जाहेर स्थल पर किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान मांदर, नगाड़ा, टमक, घंटी आदि बजाया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान लांगड़े गीत गाया जाता है।
> लोकनृत्य
> सकरात नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य मुख्यतः संथाल जनजाति में प्रचलित है।
> यह नृत्य पूस माह में किया जाता है तथा नृत्य से पूर्व घर के चौखट की पूजा की जाती है।
> इस नृत्य में पुरुष तथा महिला दोनों भाग लेते हैं।
> लोकनृत्य
> हलका नृत्य
> विशेषता 
> इस नृत्य में महिला तथा पुरुष दोनों भाग लेते हैं, परंतु दोनों अलग-अलग दल बनाकर नृत्य करते हैं। 
> इस नृत्य के दौरान एक दल के नृत्य की समाप्ति के बाद ही दूसरा दल नृत्य करता है। 
> इस नृत्य के दौरान ‘पाडू' गीत गाया जाता है। 
> लोकनृत्य  
> डोयोर नृत्य 
> विशेषता
> यह हलका का ही एक रूप है जिसमें नर्तक / नर्तकी अपने कंधे पर एक-एक डंडा रखकर नृत्य करते हैं । 
> इसमें सर्पाकार गति से नृत्य किया जाता है। 
> लोकनृत्य 
> डोडोंग नृत्य 
> विशेषता
> इस नृत्य में दो कतार बनाकर तथा अगल-बगल खड़े होकर नृत्य किया जाता है। 
> नृत्य के दौरान मांदर बजाया जाता है। 
> इसे जदिरा नृत्य भी कहा जाता है। 
> लोकनृत्य  
> फगुआ नृत्य
> विशेषता
> यह फाल्गुन और चैत के संधिकाल का पुरुष प्रधान नृत्य है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन बसंत उत्सव या होली के अवसर पर किया जाता है। 
 > इस नृत्य में शहनाई, बाँसुरी, मुरली, ढोल, नगाड़ा, करह, ढाँक और मांदर जैसे वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
> इस नृत्य के कई प्रकार हैं। पंचरंगी फगुआ नृत्य में हर कड़ी पर राग बदलते जाते हैं, जबकि फगुआ पुछारी नृत्य दो दलों के बीच रागों में ही प्रश्नोत्तर चलते रहते हैं।
> लोकनृत्य 
> कदसा नृत्य
> विशेषता 
> इस नृत्य का प्रदर्शन 'कलश' ले जाने के दौरान किया जाता है।
> यह महिला प्रधान नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान महिलाएँ अपने सिर या कंधे पर कलश रखकर ले जाती हैं।
> पुरूष इस नृत्य में भाग नहीं लेते बल्कि वे केवल वाद्ययंत्र बजाते हैं।
> इस नृत्य का प्रदर्शन विभिन्न त्योहारों के दौरान या अतिथि के स्वागत में किया जाता है।
> लोकनृत्य 
> मइटकोड़ तथा पइनकाटन नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य विवाह के पूर्व मिटटी काटने एवं पानी काटने के नेग के दौरान किया जाता है। 
> इस नृत्य में दो-दो महिलाएँ एक-दूसरे की कमर दाएँ-बाएँ पकड़कर नृत्य करती हैं।
> इस नृत्य के दौरान गीत नहीं गाया जाता, बल्कि केवल बाजा बजाया जाता है। 
> लोकनृत्य 
> हरियो नृत्य 
> विशेषता
> यह युवाओं का जतरा नृत्य है। 
> यह महिला-पुरूषों का सामूहिक नृत्य है।
> इस नृत्य के दौरान नर्तक-नर्तकी वृत्ताकार दौड़ते हुए तीव्र गति का नृत्य करते हैं। 
> लोकनृत्य
> किनभर नृत्य
> विशेषता
> यह नृत्य फाल्गुन से बैशाख तक किया जाता है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन घर के आंगन में किया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान 'हो हरे है रे' बोलते हुए कलात्मक नृत्य किया जाता है।
> लोकनृत्य
> हल्का नृत्य
> विशेषता
> इस महिला तथा पुरूषों का सामूहिक नृत्य है।
> इस नृत्य के साथ-साथ गीत भी गाया जाता है तथा गीत की अंतिम कड़ी की समाप्ति पर नर्तक - नर्तकी पैरों को उछालकर पटकते हुए तन को हल्का कर लेते हैं।
> इस नृत्य के दौरान गीत गाया जाता है। पाडू
> लोकनृत्य
> जेठ लहसुआ नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन जेठ मास की रात्रि में अखरा स्थल पर किया जाता है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन खड़िया जनजाति के युवा-युवतियों द्वारा किया जाता है।
> लोकनृत्य
> फग्गू खद्दी नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन सरहुल की प्रतीक्षा में की जाती है।
> इस नृत्य का प्रारंभ फाल्गुन मास से ही हो जाता है।
> इस नृत्य के अंत में 'हुर्रे' की ध्वनि निकाली जाती है।
> लोकनृत्य
> डोडोंग नृत्य
> विशेषता
> यह जदुरा नृत्य का ही उरांव रूप है।
> इस नृत्य का प्रदर्शन मुण्डा तथा सदानों में भी होता है।
> इस नृत्य में मांदर बजाने का विशेष महत्व होता है ।
> इस नृत्य में 'खेइल लझेर लझेर' की ध्वनि निकाली जाती है। में
> लोकनृत्य
> धुड़िया नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य की पहचान धूल उड़ाने वाले नृत्य के रूप में होती है।
> जब सरहुल के उपरांत खेत जोत दिये जाते हैं तो जुते हुए खेत से धूल उड़ते हैं। इसी दौरान इस नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है।
> लोकनृत्य
> तुसगो नृत्य
> विशेषता
> इस नृत्य का प्रदर्शन करम पर्व के बीत जाने के बाद किया जाता है ।
> इस नृत्य में सभी उम्र के लोग शामिल होते हैं ।
> इस नृत्य के दौरान मांदर बजाया जाता है।
> इस नृत्य के दौरान नर्तक 'चला हैरे हैरे' कहते हुए एक-दूसरे की बांह पकड़कर नृत्य करते हुए आगे बढ़ते हैं।
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