स्वातंत्र्योत्तर भारत : महिलाओं की भूमिका

स्वातंत्र्योत्तर भारत : महिलाओं की भूमिका

स्वातंत्र्योत्तर भारत : महिलाओं की भूमिका

1. स्वतंत्रता के बाद "आधी आबादी की स्थिति" तथा 'भारत के विकास में महिलाओं की भूमिका”
स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति में काफी अंतर देखने को मिला है। महिलाओं की भूमिका सामाजिक रा. जनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में काफी गतिशील रही है। वैसे तो भारत में महिलाओं की स्थिति सुधार के लिए विभिन्न आंदोलन 19वीं शताब्दी में ही आरंभ हो गए थे। राजा राम मोहन राय ने महिलाओं की गरिमा के विषय को लेकर विभिन्न आंदोलन खड़े किये तथा कहा गया कि सती प्रथा जैसी परंपरा भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति के नाम पर एक कलंक है।
1857 में सिपाही विद्रोह को स्वतंत्रता संग्राम के रूप में परिवर्तन को हम रेखांकित कर सकते हैं क्योंकि यह संग्राम कहीं न कहीं महिलाओं की भागीदारी से ही अपनी गरिमा को यशस्वी बना सका। 'झांसी की रानी' ने इस संग्राम को स्त्रियों की शक्ति तथा सहभागिता से जोड़ दिया तथा महिलाओं की सक्रियता को इसमें पूर्ण कर दिया।
20वीं सदी में महिलाओं की स्थिति को रेखांकित करने में आजादी की लड़ाई के लिए विभिन्न संघर्षो की भूमिका अहम है। महात्मा गांधी ने बार-बार यह कहा कि स्वतंत्रता के बाद महिलाओं के विकास के लिए आवश्यक है कि अभी से ही महिलाओं को रसोई घर से निकलकर अपनी भूमिका को देश की भलाई में लगाना चाहिए।
महिलाओं की भूमिका काफी बढ़ी तथा स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाएं चढ़ - बढ़कर भाग लेनी लगी। भारत के राष्ट्रीय आंदोलन ने महिलाओं को राष्ट्रीय भावना रखने वाली राजनीतिक हस्तियां माना तथा यह कहा कि संघर्ष और बलिदान में पुरूषों से कहीं अधिक नहीं तो कम-से-कम बराबर तो जरूर साबित हुई हैं।
महिलाएं 20वीं सदी के दूसरे दशक के बाद विभिन्न जुलूसों के साथ आगे निकलीं तथा विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय कार्यकर्त्ता की भूमिका निभायी। वे जेल भी जाने लगी। इस दशक में महिलाओं द्वारा विशाल जन संघर्षो में राजनीतिक भागीदारी ने ऐसी संभावनाएं खोल दी जो सामाजिक सुधारों की पूरी सदी ने भी नहीं खोली थी। महिला की स्थिति अब संघर्षशील की हो गयी थी।
देखा जाए तो जहां पहले महिला की छवि न्याय की हकदार के रूप में थी वहीं 20वीं सदी के आरंभ में राष्ट्रवादी पुरूषों की समर्थक और 1930 के बाद महिलाएं अब प्रत्येक आंदोलन में सहयोग की सबसे बड़ी सहभागी हो गई।
महिलाओं ने राष्ट्रीय आंदोलन की सभी धाराओं में भाग लिया गाँधीवादी, समाजवादी, वामपंथी तथा क्रांतिकारी सभी तरह के आंदोलनों में एक महती भूमिका देखना को मिली। महिलाएं 19वीं सदी से 100 वर्ष की यात्रा कर राजनीति के हरेक क्षेत्र में अब महानतम योगदान को रेखांकित कर रही थी।
सबसे अधिक महत्वपूर्ण तो था कि महिलाओं ने ट्रेड यूनियन में भी हिस्सा लिया तथा महिलाएं किसान सम्मेलन का हिस्सा रहीं। इनमें आजादी के बाद पिछले कठिन संघर्षो के नतीजों को मजबूती प्रदान करने का समय अब आ चुका था। इसलिए महिलाओं के स्वतंत्रता संघर्ष में दिए योगदान को पुरस्कृत तथा वैधानिकता प्रदान करने की अब बारी थी। अब महिलाओं को शक्ति प्रदान करने के लिए नीतिगत निर्णय लेने की बारी थी।
संविधान में ऐसे प्रावधान करने का प्रस्ताव लाया गया जो महिलाओं को समानता, स्वतंत्रता तथा शिक्षा प्रदान कर सके। महिलाओं को इसके साथ मताधिकार संपत्ति में अधिकार तथा आय के लिए साधन जुटाने के अधिकार दिए गए। मताधिकार तो एक ऐसा अधिकार था जिसके लिए पश्चिमी देशों ने कई वर्षो तक महिलाओं के आंदोलन देखने के बाद प्रावधानित किए थे पर भारत ने अपनी स्वतंत्रता के पहले दिन से ही इसे हासिल कर लिया। सही रूप में देखे तो भारत की स्वतंत्रता के बाद महिलाओं को बराबर का हक प्रदान करने कोशिश की पहले दिन से ही आरंभ हो गई।
1956 में हिन्दू पुनर्विवाह अधिनियम पारित करके या 1951 में हिन्दू कोर्ट विवाह की स्थिति को वास्तविकता में बदलकर महिलाओं की स्थिति को ठीक करने की कोशिश की गई। हिन्दू कोड बिल को हिन्दू विवाह एक्ट, हिन्दू उत्त. राधिकार एक्ट, नाबालिग एवम् अभिभावक एक्ट और गोद लेने तथा खर्चे का कानून पारित किया गया।
1947 के बाद विभिन्न महिला आंदोलनों के द्वारा ही विभिन्न संगठनों की अपनी पहचान बनी जो अपने कार्यों के द्वारा महिलाओं के विकास में योगदान देते रहे ।
इन संगठनों ने कार्य तो काफी किए है पर महिलाओं के मामले में अभी भी समानता जस की तस है। महिलाओं पर शोषण, दहेज हत्या, बलात्कार घरेलू हिंसा इत्यादि ने लोक परंपरा के साथ अपनी जगह बिछाली थी जो लगातार चलती आ रही है।
कहा जाए तो उपरोक्त मामलों में विचार काफी हुए पर 1970-90 के बीच विभिन्न आंदोलनों ने इस मामले में जन-चेतना जगाई तथा जनांदोलनों का विकास किया। स्वतंत्रता के बाद विभिन्न राष्ट्रीय आंदोलनों की विभिन्न शक्तियां अपने-अपने रास्ते निकल पड़ी तथा महिला आंदोलन ने विभिन्न रूपों में अपना कार्य आरंभ किया। सबसे बड़ी घटना यह घटी कि विभिन्न महिला संगठनों तथा प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने आम जनता के बीच जाकर महिलाओं से संबंधित समस्याओं को उठाने की बात कही है।
स्वाभाविक है कि आधुनिक भारत में इन सभी संगठनों का ध्यान महिलाओं से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर गया है जिसमें ‘शोषण’ सब से प्रमुख घटना है। इसके अलावा दहेज हत्या, बालात्कार, घरेलू हिंसा इत्यादि ।
सबसे अधिक शोषण से संबंधित मुद्दों को लेकर 70 के दशक से 90 दशक के बीच आंदोलन हुए तथा 2011 समय में कुछ ऐसे आंदोलन हुए जो पूरी तरह महिलाओं की गरिमा से संबंधित थे।
ऐसा नहीं है कि महिलाओं ने सिर्फ विद्रोह या आंदोलन ही किए। बल्कि महिलाओं के कल्याण से संबंधित मुद्दों को संस्थागत रूप देने में सरकार की भूमिका के साथ महिलाओं की भूमिका भी अटल रही है।
स्वतंत्रता के बाद महिला नेताओं के द्वारा विभिन्न संस्थान आरंभ किए गए तथा महिला कल्याण संबंधी संस्थान से विकास के रास्ते पर ले जाने वाले संस्थाओं में महिला की भूमिका रही।
उदाहरण के लिए देश के विभाजन के समय दंगों और स्थानांतरण के फलस्वरूप छोड़ दी गई महिलाओं की खोज तथा पुनर्वास के काम, शहरों में कामकाजी महिलाओं के छात्रावास स्थापित करने और महिलाओं के वोकेशनल ट्रेनिंग केंद्र निर्मित किए गए थे। 1954 में वामपंथी महिलाओं ने अपना संगठन 'भारतीय राष्ट्रीय महिला फेडरेशन' बनाया।
यह फेडरेशन एक राजनीतिक संगठन बन गया तथा हमें कहने में तनिक संकोच नहीं करना चाहिए कि ऐसा होने के कारण 50-60 के दशक के बीच महिलाओं से संबंधित आंदोलन को संस्थागत रूप नहीं मिल सका।
1970 के बाद महिलाओं के मुद्दों को लेकर कई आंदोलन आरंभ हुए। महिलाओं ने किसान आदिवासी, ट्रेड यूनियन और पर्यावरण संबंधी आंदोलनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
इसके अलावा अलग-अलग भागों में बंगाल में भी महिलाओं ने अपने आंदोलन चलाए। 1946-47 में यहां महिलाओं ने ‘नारी वाहिनी' संगठित की। उन्होंने छिपने के स्थान तथा संचार व्यवस्था संगठित की। यह संगठन 'तेभागा किसान आंदोलन' के समय बनाया गया था । वामपंथी संगठनों ने महिलाओं को ग्रामीण स्तर पर संगठित किया। ग्रामीण स्तर पर इन संगठनों ने वित्त और संपत्ति में महिलाओं का अधिकार, ग्राम्य स्तर पर के आत्मरक्षा की स्थिति तथा घरेलू हिंसा के मुद्दों को उठाया।
लगभग इसी काम में हैदराबाद राज्य के तेलांगाना क्षेत्र में चलने वाला 'तेलंगाना आंदोलन' को उल्लेख करना महत्वपूर्ण f होगा। यह 1946-50 के बीच काफी लोक प्रिय हो गया था। इसकी प्रमुखता इस बात के लिए है कि यह आंदोलन पूरी तरह घरेलू हिंसा से संबंधित रहा था। सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात है कि इस आंदोलन में महिलाओं ने छापामार युद्ध सीख लिए तथा इन महिलाओं को कामरेड से शादी करने पर मजबूर किया गया जिससे कि एक प्रकार का बदलाव इस आंदोलन में देखन को मिला।
यह भी कहा गया कि इस आंदोलन की विधा बदल दी गयी तथा कहीं न कहीं इसे नक्सली महिला प्रमाण से जोड़ दिया गया।
1960 के बाद देश की राजनीति में हवा बढ़ी। इस समय लगभग 1970 के आस पास विभिन्न विषय भारत के राजनीतिक वातावरण में तैर रहे थे। जैसे:- नक्सली पंथी आंदोलन, जे.पी, आंदोलन, चिपको आंदोलन और महंगाई विरोधी आंदोलन। इन सभी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका भी रही।
1973-75 के बीच जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी तो देश में बढ़ती महंगाई के विरोध में वामपंथी महिलाओं तथा सोशलिस्ट महिलाओं ने संयुक्त रूप से विदर्भ तथा महारष्ट्र के और भागों में आंदोलन चलाया। यह आंदोलन एक अति-सफल आंदोलन था जिन महिलाओं को घर से निकलने पर पाबंदी थी, वो इस आंदोलन में घूमने लगीं तथा रैलियां करने लगीं। इन्होंने थालियां बजाकर अपना विरोध प्रकट किया तथा सबसे बड़ी बात कि इनकी विशेष रैलियां आयोजित हुई जिसमें महिलाओं के तरफ से ही आयोजनकर्ता भी थे।
यह महंगाई विरोध आंदोलन 1973 के अंत में आरंभ हुआ था 1974 में यह जय प्रकाश आंदोलन के साथ गुजरात से मिल गया जो संपूर्ण क्रांति तथा नव निर्माण की ओर अग्रसर थे। वैसे संपूर्ण क्रांति में विशेषकर भ्रष्टाचार. तानाशाही तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया की फिर से स्थापना ही मुद्दा था तथा महिलाओं में योगदान बढ़ा तथा आत्मविश्वास भी बढ़ा।
1974 के बाद महिलाएं पुरूष दमन के निषेध में तथा अपने हक के लिए आगे बढ़कर अपनी बात रखने लगी। लगभग इसी समय गुजरात में कपड़ा मिल में काम करने वाली महिलाओं के असंगठित समूहों ने टेक्सटाइल 'लेबर एसोसियेशन' नामक संगठन की स्थापना की। इस महिला संगठन का नाम 'सेवा' रखा गया तथा यह एक गांधीवादी संगठन के तौर पर लोकप्रिय हुआ। यह अपने में अलग किस्म का संगठन था जो असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को संगठित करता था। यह संगठन छोटी-मोटी दुकान चलाने वाली महिला, चौका बरतन करने वाली तथा घर-घर जाकर सामान बेचने वाली महिलाओं का संगठन था। 'सेवा' ने इन्हें संगठित किया तथा सामूहिक तौर पर इनके प्रशिक्षण, कर्जा तथा तकनीकी स्तर पर सेवा मुहैया करवायी। सेवा का प्रसार इंदौर, भोपाल, दिल्ली और लखनऊ तक हो गया। आज भी वह इला भट्ट के नेतृत्व में भारतीय महिलाओं के सबसे महत्वपूर्ण संगठनों के रूप में काम कर रहा है। अभी तक ‘सेवा’ का कार्य विस्तारित हो रहा है। इला भटट को इनके कार्य के लिए ‘मैग्सेसे' पुरस्कार भी मिल चुका है।
इसी तरह उत्तराखंड के सत्तर के दशक के अंत में महिलाओं ने शराब खोरी के विरोध में सुंदरलाल बहुगुणा की मदद से आंदोलन चलाया। स्पष्ट तौर पर गांधी के समय से ही महिलाओं की सामाजिक जागरूकता बढ़ गयी थी तथा यह साफ दिखने लगा था कि महिला भारत की विकास श्रृंखला में एक अहम तत्व साबित होंगी।
1974 के बाद महिलाओं की चिपको आंदोलन में भी अहम भूमिका रही तथा पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें राखी बांधती थी तथा कोई ठेकेदार पेड़ को काटने आता था तो वह पेड़ से चिपट जाती थी।
1977 के आस-पास मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में खदान श्रमिक संघ में आदिवासी महिलाओं की भागीदारी काफी रही इस आंदोलन का उद्देश्य सिलाई, इस्पात कारखाने के मशीनीकरण नीति का विरोध करना था। यह कहा गया कि अगर मशीनीकरण हो गया तो महिलाओं के रोजगार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इससे प्रभाव में आकर महिलाओं ने 'महिला मुक्ति संगठन' नामक एक संगठन की स्थापना की। 1979 में इसी जगह इस संगठन ने मांग की जमीनी स्तर पर महिलाओं के नाम से भी संपत्ति विशेषकर जमीन लिखी जाएं। ऐसी मांगों में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी' की भूमिका सर्वाधिक रही। यह वाहिनी जय प्रकाश नारायण के विचारों से प्रभावित थी। यहां भी 'गया' क्षेत्र में महिलाओं के नाम से पैतृक संपत्ति लिखने या करने की मांग अधिक की गयी। बिहार में ऐसी मांगो को प्रभाव में लाया गया तथा इससे प्रभावित होकर कुछ राज्य जमीनी संबंधी पट्टे महिलाओं के नाम से दिए जाने लगे। यह एक प्रकार की सफल सक्रिय आंदोलन की कसौटी थी।
1984 ई. में भोपाल गैस कांड में राहत मुआवजा दिलाने में महिलाओं की भूमिका सर्वाधिक रही है। महिला उद्योग संगठन ने गैस रिसने के शिकार व्यक्तियों को मुआवजा दिलाने के लिए कई प्रयास किए। ये प्रयास सफल भी हुए। एक और घटना जो उसी के आस-पास घटी थी वह थी शेतकरी की घटना। शेतकरी संघटना में इस बात की सबसे अधिक प्रशंसा की गई कि इसमें पंचायत स्तर पर तथा जिला परिषद् स्तर पर सिर्फ महिलाओं को ही चुनाव लड़ने की बात कही गई।
महिला आंदोलन की एक और धारा को 'स्वायत्त महिला दलों का आंदोलन' कहा गया है। इन आंदोलनों का प्रसार सत्तर के दशक के मध्य में शहरी इलाके में हुआ। इसमें संदेह व्यक्त किया गया कि इसका कुछ धड़ा नक्सल तथा माओवादी विचार धारा से प्रभावित था।
वैश्विक स्तर पर भी 1974-75 के आस-पास का समय महिलाओं के लिए काफी महत्वपूर्ण था। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1975 को महिला वर्ष घोषित किया तथा यह इतना प्रभाव डालने वाला था कि महाराष्ट्र में बहुत सारी गतिविधियों होने लगी। 8 मार्च को विश्व महिला दिवस मनाया जाने लगा। उसी साल अक्टूबर में पुणे में एक महिला सम्मेलन आयेजित किया गया जिसमें सारे राज्य भर से माओवादी समूह, समाजवादी और रिपब्लिकन पार्टियां, मा.क.पा. इत्यादि शामिल हुए तथा विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की।
आपातकाल के बाद महिला पत्रकारिता के क्षेत्र में भी काफी विकास देखने को मिला। इस समय ऐसी पत्रकार मा. हलाओं के लेख तथा पत्रिकाएं छपी जो महिलाएं अभी भी काफी सक्रिय है तथा महत्व रखती है जैसे:- मधु किश्वर, तवलीन - सिंह, मृणाल पाण्डेय तथा नलिनी सिंह । इत्यादि ।
उपरोक्त महिलाओं में किसी विषय को समझने तथा निष्पक्ष तरीके से अपनी बात लिखने में बड़ा अनुभव रहा । वास्तव में मधु किश्वर ने मानुषी नामक पत्रिका का नेतृत्व कर भारत की महिलाओं से संबंधित मुद्दों को उठाया है। दूरदर्शन के लोकप्रिय होने के बाद 80 के दशक में महिलाओं ने अपने काम से टी.वी. पत्रकारिता की भी स्थिति बदल दी। वो आज और अधिक महिलाओं की लोकप्रियता तथा दक्षता को बढ़ा रहा है।
विभिन्न पाटियों की महिलाओं ने पार्टी के अंदर रहकर ही विभिन्न सामाजिक समाचारों को सामने लाया तथा इसके लिए आंदोलन भी किए। जनता पार्टी के अंदर महिलाओं ने अपनी समाजवादी विचारधारा को दहेज प्रथा के विरोध में प्रेरित किया तथा 1919 में इसके लिए बड़े आंदोलन किए गए। इस दिशा में विभिन्न रैलियां तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम किए गए। इन आंदोलनों की सबसे बड़ी विशेषता इसको विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा दिया गया समर्थन था। इन महिलाओं ने दहेज प्रथा के खिलाफ कानून को सुधारने की मांग की। 'दहेज पाबंदी एक्ट' (1961) में इस आंदोलन के प्रभाव से संसद में पेश संशोधन को शक्ति मिली तथा संयुक्त विशेष समिति को मांजा गया।
इस संयुक्त समिति ने अपने स्तर पर पूरे देश का दौरा किया। 1981 और 1982 में इस समिति ने विभिन्न जगह जाकर महिलाओं के बयान को रिकॉर्ड किया तथा 1984 में दहेज संबंधी अपराधियों को दंड देने के कानून पेश तथा पास किए गए। कुछ अन्य साधारण कानून भी बाद में लागू किए गए। लेकिन इसके बाद ऐसे आंदोलन का पतन आरंभ हो गया। दहेज प्रथा को सूक्ष्म स्तर पर कोई आंदोलन रोक नहीं पाया तथा लगातार यह कुप्रथा जोर ही पकड़ती चली गयी।
सामाजिक समस्याओं में महिला के साथ बलात्कार का भी मुद्दा काफी महत्वपूर्ण रहा। 2011 में निर्भया के साथ घटना के बाद जो उबाल आया उसके कई सालों पहले ऐसे उबाल आ जो चुके थे। जैसे- हैदराबाद में रमीजा- बी. का मामला, महाराष्ट्र में मथुरा का मामला, पश्चिमी उत्तरर प्रदेश में 1980 में आया-त्यागी का मामला इत्यादि ।
विभिन्न महिला संगठनों तथा राजनीतिक दलों ने बलात्कार के मामले को कई स्तर पर उठाया तथा यह कोशिश की कि सरकार बलात्कार के दोषों को कड़ी सजा देने के लिए संसद में कानून बनाए। 1980 में इसका असर हुआ तथा में सरकार ने बलात्कार के विरोध में मौजूदा कानून के संशोधन के लिए बिल पेश किए। 3 साल बाद यानी 1983 में यह बिल पास हो गया। इसमें यह कहा गया कि बलात्कारी अगर हिरासत में हो तो इस जघन्य अपराध के लिए सबूत पेश करने की जिम्मेदारी अब अपराधी पर आ गयी तथा इससे गरिमा बनी रही कि महिला जो पीड़ित रहती हो उसे ऊपर से मानसिक यातना सहना न पड़े। अब अपराधियों को दण्ड मिलने की संभावना काफी बढ़ गयी तथा इसके लिए सरकार को प्रशंसा भी मिली। इससे महिला आंदोलन कर्ताओं को लगा कि सरकार ने ऐजेंडे को ही बदल दिया तथा यह स्पष्ट हो गया कि आंदोलन में सुधार को स्वीकार करने की इच्छा नहीं थी। इसी तरह 1985-86 में शाहबानो मामले में सरकार ने गलती कर दी। एक मजबूत विज्ञापन के पक्ष में खड़े दिखने वाले प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने वोट बैंक के कारण शाहबानों के पक्ष में हलफनामा न दायर कर शरियत के साथ खड़े हो गए तथा इस समय भी इसका विरोध खड़ा हो गया। राजीव गांधी की सरकार को महिला गरिमा के सामने मुस्लिमों की पहचान का प्रश्न अधिक प्राथमिक हो गया।
शाहबानो मामले के समय भारत सरकार की नीति असमंजस की रही। पहले तो शाहबानो का साथ दिया गया तथा बाद में चलकर इसे साम्प्रदायिक रंग में रंगता देख मुसलमानों के सामने छद्म निरपेक्ष बने रहने की जुगत में इस सरकार ने गलती कर दी।
इसके बाद राजस्थान में कहीं दूर ग्रामीण क्षेत्र में सती प्रथा के खिलाफ माहौल बनाया गया तथा यह देखा गया कि राजस्थान के अभी भी अति पिछड़े इलाके में सती प्रथा चल रही है। 1990 के आस-पास महिला आंदोलनों के बर्ताव में काफी परिवर्तन देखने को मिला। अब रैलियां, धरना प्रदर्शन के बदले महिला सेलों की स्थापना, सलाह देना, दस्तावेज इकट्ठे करना, शोध कार्य करना तथा प्रकाशन कार्य इत्यादि जैसे कदम आवश्यक हो गए थे।
आंशिक रूप से यह देखा गया कि कानून में सुधार को लेकर धरना-प्रदर्शन करने वाले सुधार होने के समय पर भी इसे स्वीकार नहीं कर पाते थे। दिल्ली स्थित बहुत सारी ऐसी संस्थाएं थी जो महिलाओं की समस्या ही नहीं वरण् इनकी खुशियों पर भी विचार करती थी। उन्होंने महिलाओं की रूचि जैसे :- संगीत, नृत्य, लोककला, जैसे मुद्दों पर भी अपने विचार प्रकट किए। इनमें विभिन्न पत्रिकाओं का भी योगदान काफी रहा। जैसे:- सहेली, सरिता, फेमिना, तेजस्विनी इत्यादि।
1990 के दशक में फिल्मों में भी महिलाओं की समस्या तथा विभिन्न सामाजिक मामले जो महिलाओं से सीधे जुड़े थे को दिखाया गया तथा इस विषय पर फिल्म भी बनाई गई। इसमें मिर्च-मसाला, मंडी, रूदाली, इत्यादि जैसी फिल्में हैं।
सरकार ने 1988 में विस्तृत रूप से महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना तैयार की। इसमें महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और राजनीतिक हिस्सेदारी की विस्तृत बातें की गई। 1989 में पंचायती राज बिल पेश किया गया तथा 1993 में पास कर दिया गया।
इन पंचायतों में 33 प्रतिशत महिलाओं की सीट आरक्षित हो गई। इस समय स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं के लिए कई योजनाएं आरम्भ की गयी। इसमें ग्रामीण इलाकों में महिला मंडलों या संघों का सुझाव दिया गया जिसने स्वास्थ्य तथा शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रयास किए।
इसने महिला मंडलों के सदस्यों की क्षमताएं एवम् जीवन स्तर बेहतर बनाने के लिए उन्हें कर्ज दिए। यह स्थानीय स्तर पर उपयोग की क्षमता के अनुरूप ही प्रभावशाली हो सकता था और इससे राजनीतिकरण के स्तर और महिला प्रश्नो की चेतना के अनुसार अंतर दिखाई देता है। कई संगठन सरकारी स्कीमों के संरक्षण और वैधता का प्रयोग करके सामान्य गरीब महिलाओं तक पहुंच सके, अन्यथा यह काम उनके लिए कठिन था।
स्थानीय तथा राष्ट्रीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने की कोशिशें अभी भी जारी है। स्थानीय स्तर पर महिलाओं को पंचायती राज तथा जिला परिषद् में 50 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। यह स्थान कई मायनों में विकास की गाथा लिख रहें हैं।
स्वतंत्रता के बाद महिलाओं ने हरेक क्षेत्र में अपनी पहचान बनायी है। प्रत्येक दशकों में महिलाओं की स्थिति विक. सशील तथा सफलता से भरपूर रही है। 1950 के दशक में जहां महिलाओं की शिक्षा का स्तर 10 प्रतिशत से भी कम था वह अब लगभग 70 प्रतिशति के आस पास है। महिलाओं के विकास में स्वास्थ्य का योगदान बहुत अधिक रहता है। स्वतंत्रता के तुरंत बाद जहां महिलाओं की स्थिति बहुत ही खराब थी मातृत्व दर के मामले में वहीं अब गुणवत्ता तथा आंकड़ों के आकार में भी सुधरी है।
लिगांनुपात के मामले में भारत की स्थिति पहले से बहुत ही बेहतर हुई है। जहां पहले यानी 1990 के दशक में यह 860-70 के बीच थी वहीं अब बढ़कर 940 हो गयी है। अगर हम 2001 तथा 2011 की गणना की तुलना करेंगे तो निम्नानुसार विभिन्न राज्यों की स्थिति के बारे में पता चलेगा कि कितना गुणात्मक सुधार आया है जैसे:- जहां केरल में लिंगानुपात 1058 था अब 2011 के अनुसार 1084 हो गया है। पुडुचेरी में यह तो पुरूषों से अधिक है। जहां पुडुचेरी में 2001 में 1001 लिंगानुपात था वहीं 2011 में यह 1037 हो गया।
जहां 2001 में पूर्ण अनुपात - 933 था। 
वहां 2011 में पूर्ण अनुपात - 943 था।
विभिन्न मामलों में देखने को मिलता है कि महिला सशक्तिकरण की स्थिति अच्छी हुई है फिर भी कई ऐसी समस्याएं हैं जो कहीं-न-कहीं सोचने पर मजबूर करती हैं। अभी भी बहुत आगे जाना है। सरकार के प्रयास है तो सही पर स्वयं भी इसके लिए तैयार रहना आवश्यक है।
साक्षरता के मामले में स्वतंत्रता के बाद पश्चिमी राज्यों से अधिक अच्छी स्थिति दक्षिणी राज्यों की रही। तमिलनाडू और केरल राज्य ने साक्षरता के मामले में विशेष कर महिला साक्षरता के मामले में स्वतंत्रता कि बाद लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। जहां साक्षरता के मामले में पूरे भारत में 10 से 14 वर्ष की आयु श्रेणी में महिला साक्षरता दर शहरी इलाकों में 86 प्रतिशत थी ( नामांकन स्तर के हिसाब से) वहीं अब नामांकन दर 98.9 प्रतिशत हो गयी है।
जहां स्वतंत्रता के बाद महिला विश्वविद्यालयों की संख्या 1950 में मात्र एक थी वहीं अब औपचारिक रूप से 14 महिला विश्वविद्यालयों की संख्या है। महिलाओं की तकनीकी शिक्षा समय के साथ बढ़ती जा रही है।
स्वतंत्रता के तुरंत बाद महिलाओं को इंजीनियर बनने का अनुपात 0.8 प्रतिशत था वहीं अब लगभग 42 प्रतिशत के आस पास है। ITI में महिला पुरूष का अनुपात भी बढ़ा है। हरेक 100 लड़के पर पहले सिर्फ 2 लड़कियों का ही प्रवेश ITI में सुनिश्चित हो पाता था वहीं अब हरेक 14 छात्र पर एक छात्रा का अनुपात है। किंतु अगर 50:50 की स्थिति प्राप्त हो जाती है तब ही महिलाओं के सशक्तिकरण को प्राप्त किया जा सकता है।
स्वतंत्रता के बाद से ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रशिक्षण, त्याग तथा सहभागिता बढ़ाने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है। महिलाओं ने भी इस क्षेत्र में अपनी भूमिका से प्रशंसा पायी है। सरकार के द्वारा चिकित्सा शिक्षा में काफी बड़े स्तर पर महिलाओं का प्रवेश सुनिश्चित किया जा रहा है।
अब छोटे-छोटे शहरों में भी महिलाओं के अपने क्लिनिक तथा जिला अस्पताल में चिकित्सा सेवा में अपने योगदान को देते देखा जा सकता है। आशा, जननी, सहायिका जैसी योजनाएं स्वास्थ्य के क्षेत्र में महिलाओं को सशक्कत कर रही है। यह अपने आप में एक उदाहरण है।
वित्तीय क्षेत्र में भी महिलाओं को योगदान स्वतंत्रता के बाद से ही बढ़ता गया है। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए भारत की वित्तमंत्री भी रही थी। यह कहना उचित है कि 2000 ई. के बाद बैंकिंग क्षेत्र में महिलाओं का प्रभुत्व बना। चंपा कोचर, शिखा शर्मा, उषा किरण, अरुंधती भट्टाचार्य जैसी महिलाओं ने इस क्षेत्र को महिलाओं के लिए काफी खास बना दिया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में भी महिलाओं ने काफी अच्छा विकास किया है। इंदिरा नुयी, जैसी महिलाओ ने अपने काम से लोगों को महिलाओ के विकास के प्रति अपना ध्यान खींचा।
किरण मजमूदार ने एक बार यह कहा कि अगर हम भारत के गांव में जाकर देखें तो हम जैसी कई महिलाएं मिल जाएंगी जिसे अवसर मिले तो वह कुछ भी कर सकती हैं। किरण मजमूदार Biotech India' की प्रमुख बनी। 
राजनीति में स्वतंत्रता के बाद महिलाओं के योगदान की चर्चा हम पहले भी आंदोलन से संबंधित मुद्दों पर करते रहे हैं। राजनीतिक क्षेत्र में स्वतंत्रता के बाद महिलाओं ने अपने कार्य से एक नया उदाहरण पेश किया है। यह सही है कि संसद में महिलाओं की प्रतिशतता अभी 12 प्रतिशत ही है तथा आरक्षण पर सिर्फ भाषण ही दिया जाता है पर महिलाएं जो करना चाहती हैं, अपनी इच्छा शक्ति से उन्होंने राजनीति में वो कर दिखाया है ।
स्वतंत्रता के बाद से ही संसद में जहां तारकेश्वरी सिन्हा जैसी शख्सियत बिहार जैसे राज्य से आकर महिला की आवाज बनीं वहीं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में सुचेता कृपलानी ने अपनी भूमिका को विस्तृत किया तथा विभिन्न उदाहरण पेश किए।
इंदिरा गांधी को विरासत में स्थान जरूर मिला था पर उन्होंने अपनी मेहनत तथा प्रतिभा से एक व्हाइट नेता की भूमिका में बेहतर कार्य किए तथा उदाहरण पेश किए। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में भारत ने बहुत सारे कीर्तिमान स्थापित किए।
इंदिरा गांधी के बाद भी राजनीति के क्षेत्र में भारतीय महिलाओं ने अपने उच्च मुकाम हासिल किए। भारत की पूर्व विदेश मंत्री स्व. सुषमा स्वराज हो या रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण इत्यादि। ये महिलाएं आज भारत की सबसे संवेदनशीन सुरक्षा मामलों के समिति की सदस्य है। यह एक ही दिन में नहीं हो गया है। इसके लिए इन्होंने अपनी मेहनत से महिला समुदाय के हितों को राष्ट्र के पटल पर रख दिया है।
महिलाओं ने भारतीय राजनीति को एक अलग पहचान दी है तथा पंचायत सत्ता से लेकर संसद तक उन्होंने एक अलग स्थान हासिल किया है। इनकी उपस्थिति संसद तथा विधानसभा में कम है पर भविष्य उज्जवल है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता।
आजकल महिलाएं हर जगह हैं। फिल्मों में भी स्वतंत्रता के बाद से महिलाएं अपने कामों से विशेष योगदान देती आ रही है। जहां स्वतंत्रता के समय देविका रानी, मधुबाला, वैजयंती माला तथा नरगिस जैसी अभिनेत्रियों ने अपनी प्रतिभा से भारतीय फिल्मों को एक नयी उड़ान दी वहीं नरगिस तथा बैजयंती माला ने राजनीति में भी अपना परचम लहराया। नरगिस को तो राज्यसभा सदस्य भी बनाया गया था।
फिल्मों के द्वारा भारतीय महिलाओं ने भारत की विभिन्न भाषाओं की दीवारों को तोड़ा तथा तमिल, तेलगु, मलयालम, कन्नड़, हिन्दी जैसी भाषाओं को एक करने की कोशिश की। इस भूमिका में प्रसिद्ध अभिनेत्री स्वर्गीय श्री देवी को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होनें 70 के दशक में तमिल फिल्मों से अपना कैरियर आरंभ कर लगभग 50 सालों तक तमिल, तेलूगु, मलयालम, कन्नड़ हिन्दी फिल्मों में अपना राज कायम किया। श्री देवी ने भाषा की दीवारों को तोड़कर हिन्दी फिल्मों की पुरूषवादी मानसिकता को बदल डाला तथा अभिनेत्रियों के आदर भाव को जगा दिया।
महिलाओं ने स्वतंत्रता के बाद वैश्विक स्तर पर सौंदर्य के क्षेत्र में भी अपना अहम योगदान दिया है। जहां 60 के दशक में रीता फारिया ने मिस वर्ल्ड की प्रतियोगिता को जीत कर भारत का नाम रौशन किया था वहीं 1990 के दशक के बाद तो इस क्षेत्र में गजब का ही सकारात्मक परिवर्तन आया।
1994 में सुष्मिता सेन तथा ऐश्वर्या राय ने क्रमशः मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड का टाइटल जीतकर भारत का दुनिया के मानचित्र पर गौरव बढ़ाया। उसके बाद युक्ता मुखी, डायना हेडेन, लारा दत्ता, प्रियंका चोपड़ा जैसी महिलाओं ने भी ये पदक जीते। आज भारत की मलिाओं को इनसे बहुत बड़ी प्रेरणा मिल रही है।
वैसे तो संविधान में महिलाओं को बहुत सारे अधिकार प्रदान किए गए है पर ये उपलब्धियां महिलाओं के द्वारा ली गयी अपनी उपलब्धियां है। इसमें सबसे अधिक योगदान उनके स्वयं का है। सबसे बढ़कर तो हरेक दशक में इनकी जाग. रूकता का बढ़ना तथा विकास तथा शिक्षा के प्रति इनका उत्साह प्रशंसनीय है। आज भारतीय महिलाएं अंतरिक्ष विकास से लेकर भूगर्भीय विज्ञान तक अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं।
महिलाओं की विकसित स्थिति को प्राप्त करने का समय अब नजदीक आ गया है पर चुनौतियां भी कम नहीं है। भारतीय महिलाओं के सामने विभिन्न चुनौतियों की बात की जाए तो सबसे पहले आता है पुरूषों के मुकाबले शिक्षा का अनुपात कम होना।
साक्षरता की दर के मामले में भारत की उपस्थिति स्वतंत्रता के बाद से काफी अच्छी हुई है। जहां 1951 में साक्षरता दर सिर्फ 18.33 थी, वहीं 2011 में यह 74.04 हो गई। महिला साक्षरता दर जहां 1991 में 9 प्रतिशत थी, वहीं 2011 में 65 प्रतिशत थी। महिला साक्षरता दर में वृद्धि होने के बावजूद अभी भी पुरूषों के मुकाबले काफी पीछे हैं। सरकारी सुविधाओं तथा ग्रामीण स्तर पर विभिन्न योजनाओं के द्वारा इसमें सुधार की कोशिश की जा रही है।
दूसरी चुनौति लिंगानुपात है। 2011 में लिंगानुपात 940 था वहीं 1951 में लिंगानुपात 865 था। किंतु अभी भी ऐसे राज्य है जहां लिंगानुपात में अधिक अंतर है हरियाणा जैसे राज्यों में तो इसमें 150 से थोड़ा कम का अंतर है। सरकार की तरफ से 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' योजना के द्वारा इसे विकसित करने की बात की जा रही है कि लड़कियां लड़कों से कम नहीं होंगी तथा इस मामले में सफलता भी मिल रही है।
तीसरी चुनौती सुरक्षा की है। शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की सुरक्षा अभी भी कई प्रकार से मुद्दा बन जाती है। यह मुद्दा शहरी क्षेत्र में अधिक है। काम करने वाली महिलाओं को कार्य स्थल पर तथा यात्रा करने वाली महिलाओं को अपने साथ किसी स्थान पर चलते हुए विभिन्न नैतिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई कार्य किए हैं। डिजिटल युग में विशाखा जैसी योजना या कानून-व्यवस्था के स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए विभिन्न योजना आरंभ करवाना एक नई प्रकार की शुरूआत है। घरेलू हिंसा की पीड़ित तथा तेजाब पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाने की भी कोशिश सरकार तथा न्यायापालिका के स्तर पर की जा रही है।
सबसे आवश्यक यह है कि महिला सशक्तिकरण के लिए स्वयं महिला को ही जगना होगा तथा हम सभी को इसमें इनका योगदान करना होगा। विभिन्न महिला आंदोलन तथा रैलियां इसमें अस्थायी रूप से ही मदद कर सकती हैं लेकिन जागरुकता तथा शिक्षा और इसके अलावा इच्छा शक्ति इन्हें आगे बढ़ा सकती है। आने वाला कल महिलाओं का ही है।
आजादी के बाद सरकार के द्वारा महिलाओं के लिए उठाए गए कदम तथा विभिन्न योजनाएं :
1. महिला साक्षरता योजना
2. दहेज प्रथा विरोधी अधिनियम 
3. हिन्दू पुनर्विवाह अधिनियम
4. प्रसुति सहायता कार्यक्रम
5. पंचायती राज विधेयक
6. स्वयं सिद्धा योजना
7. बाल विवाह विरोधी अधिनियम
8. वृद्धा पेंशन तथा विधवा पेंशन योजना
9. जननी-सहायता योजना
10. सबला योजना
11. स्वयं सहायता समूह
12. आंगनबाड़ी योजना
13. उज्जवला योजना
14. कस्तूरबा गांधी बालिका शिक्षा योजना
15. महिला प्रशिक्षण योजना
16. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना
17. घरेलू हिंसा विरोधी कानून
18. अहिल्या बाई सहायता योजना
19. राष्ट्रीय महिला आयोग इत्यादि ।
हमसे जुड़ें, हमें फॉलो करे ..
  • Telegram ग्रुप ज्वाइन करे – Click Here
  • Facebook पर फॉलो करे – Click Here
  • Facebook ग्रुप ज्वाइन करे – Click Here
  • Google News ज्वाइन करे – Click Here