मुगलकालीन अर्थव्यवस्था
> मुगलकाल में कृषि : टिप्पणी
मुगलकाल में जनता की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था. इस काल में भू-स्वामित्व, भू-राजस्व व्यवस्था में मुगल शासकों ने आवश्यकतानुसार अनेक परिवर्तन किये. परिणामस्वरूप सल्तनतकाल की अपेक्षा मुगलकाल में कृषि उपज में अधिक वृद्धि हुई तथा कृषि का विस्तार क्षेत्र भी बढ़ा.
मुगलकाल में विभिन्न प्रकार के अनाज व नकदी फसलें बोई जाती थीं; जैसे—गेहूँ, धान, चना, दलहन, बाजरा, सागसब्जी व गन्ना आदि. मुगल शासकों को बाग लगवाने का बहुत अधिक शौक था. अतः इनके आर्थिक महत्व के कारण भी अनेक बागों को लगवाया गया. मुगल साम्राज्य के कुछ इलाके विशेष प्रकार की फसलों के लिए प्रसिद्ध थे. उदाहरणस्वरूप गन्ना - बंगाल एवं बिहार में; गेहूँ – पंजाब तथा उत्तर प्रदेश और बिहार में; नील – यमुना घाटी में; कपास, तम्बाकू, चावल इत्यादि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उगाए जाते थे.
मुगलकाल का उल्लेखनीय पक्ष कृषि का विकास था, लेकिन इसके बावजूद भी उसके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं आया. इस समय कृषि का तरीका परम्परागत ही था तथा सिंचाई की पूर्ण व्यवस्था के अभाव में अधिकांश कृषि वर्षा के सहारे ही होती थी. वर्षा के अभाव में अनेकों बार अकाल पड़ता रहता था. बदायूँनी 1556-57 ई. के अकाल के विषय में लिखता है, जो आगरा व बयाना में पड़ा था. "मैंने स्वयं अपनी आँखों से अपने सगे-सम्बन्धियों को खाते हुए देखा." इस काल में गुजरात एवं दक्षिण भारत भी भयंकर अकाल पड़े. अकालों के बार-बार पड़ने के कारण कृषि एवं एवं सामान्य जनता पर इसका बहुत बुरा असर पड़ता था. यद्यपि राज्य की ओर से जनता को राहत पहुँचाने की व्यवस्था की जाती थी, परन्तु मुगल शासकों द्वारा बार-बार पड़ने वाले अकालों से निपटने के लिए कोई स्थायी रणनीति का निर्माण नहीं किया गया था.
इस प्रकार उपर्युक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि मुगलकाल में कृषि की दशा उन्नत थी तथा किसानों एवं आम जनता को अपने जीवनयापन के लिए पर्याप्त अनाज मिल जाता था, फिर भी अकाल के समय लोगों का जीवन नारकीय बन जाता था.
> मुगलकाल के उद्योग-धन्धों पर लेख लिखो.
मुगलकाल उद्योग-धन्धों की दृष्टि से काफी समृद्ध था. तथा इस समय बड़े एवं कुटीर उद्योगों की स्थापना बड़े पैमाने पर हुई. इस समय के उद्योगों को निम्नलिखित प्रमुख श्रेणियों में बाँटा जा सकता है—
(i) कृषि आधारित उद्योग - इस वर्ग के उद्योगों में प्रमुख रूप से चीनी एवं मिश्री, अफीम, नील, लकड़ी के कारीगर आदि आते थे. चीनी एवं मिश्री उद्योग पर इस काल में बंगाल, बिहार एवं पंजाब के क्षेत्रों में अधिक विकसित था. मिश्री का प्रयोग अधिकांश धनी वर्ग के लोग ही करते थे, क्योंकि उसका भाव बहुत अधिक था.
बिहार तथा मालवा का क्षेत्र अफीम का उत्पादन करता जिसका प्रयोग औषधियों के निर्माण में किया जाता था. अफीम की बड़ी मात्रा सामान्यतया विदेशों को निर्यात कर दी जाती थी. बयाना के पास नील का उत्पादन होता था, इसका उपयोग देश के अन्दर होने के साथ-साथ इसका विदेशों को निर्यात भी होता था. इस काल में बढ़ई उद्योग विकसित अवस्था में था. ये लोग कृषि पर आधारित यन्त्र; जैसेबैलगाड़ी, हल आदि के निर्माण के साथ-साथ नाव, चारपाई, सन्दूक, तख्त एवं इमारतों में काम करने वाली सामग्री का निर्माण करते थे. इस काल के शाही कारखानों में उच्च कोटि के कारीगर थे. वे सुन्दर मंजुषाएँ, काम की हुई चारपाइयाँ, सुन्दर बहलियाँ, नौकाएँ आदि तैयार करते थे.
(ii) लौह उद्योग (धातु आधारित उद्योग) - इस समय धातु आधारित उद्योगों में लोहे के उद्योग पर लुहारों का नियन्त्रण था. वे तीर, तलवार, कटार, बर्छे, भाले, बन्दूकें, तोप आदि का निर्माण करते थे.
मुगलकाल में पीतल, ताँबे, काँसे एवं कस्कुट आदि के बर्तन बड़े पैमाने पर बनाये जाते थे. दिल्ली ताँबे के कारीगरों का प्रमुख केन्द्र था. काशी पीतल के बर्तन और बंगाल काँसे के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध स्थल थे.
(iii) विलासिता की सामग्री — विलासिता की वस्तुएँ धनी लोगों में काफी प्रचलित थीं. अतः कुछ कारीगर उस काम में लगे थे. इससे उनकी आय अधिक होती थी. इसमें रत्न एवं आभूषण उद्योग, मोती, हाथीदाँत, मूँगा, सींग और चन्दन आदि द्वारा कई प्रकार की वस्तुओं का निर्माण होता था.
इस काल में मादक द्रव्यों का प्रचलन बहुत अधिक था. इसलिए अनेक लोग मदिरा एवं ताड़ी तैयार करने में लगे हुए थे. भारत में साधारणतया महुआ एवं शीरे से शराब बनाई जाती थी. अंगूरी शराब ईरान एवं यूरोप से मँगाई जाती थी.
(iv) चर्म उद्योग – इस काल में चर्म उद्योग के अन्तर्गत जूते, पानी के लिए मशक एवं कुओं से सिंचाई के लिए पुर ‘डोले’ तैयार किये जाते थे. इस युग में यह व्यवसाय बहुत अधिक उन्नत अवस्था में नहीं था.
(v) वस्त्र उद्योग– मुगलकाल में सर्वाधिक विकसित वस्त्र उद्योग था. इस समय रेशमी, सूती एवं ऊनी वस्त्रों का निर्माण किया जाता था.
(क) रेशमी वस्त्र उद्योग – रेशम का उत्पादन बंगाल व कश्मीर में होता था, चूँकि इसकी खपत बहुत अधिक थी. अतः चीन से इसका आयात भी किया जाता था. इस काल में अधिकांश कच्चा माल बंगाल में तैयार कर उसे गुजरात भेज दिया जाता था, जहाँ उत्कृष्ट कोटि के रेशमी वस्त्रों का उत्पादन किया जाता था. सम्राट ने स्वयं अपने कारखानों में विदेशी कारीगरों द्वारा रेशमी वस्त्र तैयार करवाये थे. कश्मीर में सुन्दर बूटेदार एवं भड़कीले रंगों वाले कपड़े बनते थे. रेशमी कपड़ों को सोने एवं चाँदी की दरदोजी एवं कढ़ाई से अलंकृत भी किया जाता था. यह सामान सामान्यतः उच्च वर्ग के लिए था.
(ख) ऊनी वस्त्र उद्योग– मुगलकाल में ऊनी वस्त्र उद्योग कश्मीर, पंजाब एवं पहाड़ी क्षेत्रों में मुख्य रूप से केन्द्रित था. सुन्दर शॉल लाहौर एवं कश्मीर में बनते थे. अबुल फजल लिखता है कि लाहौर में सम्राट ने एक हजार कारखाने स्थापित किये थे. इस काल में ऊनी कपड़ों के अतिरिक्त गलीचों का भी निर्माण किया जाता था तथा इसका व्यवसाय मुख्य रूप आगरा में केन्द्रित था. फिर भी भारतीय गलीचे फारस के गलीचों की अपेक्षा अधिक अच्छे नहीं थे.
(ग) सूती वस्त्र उद्योग - मुगलकाल में सूती कपड़े का उद्योग बहुत अधिक उन्नत अवस्था में था. बंगाल में सोनार गाँव; उत्तर प्रदेश में मऊ, काशी एवं आगरा; सिन्ध-पंजाब में लाहौर, मुल्तान, भक्खर और थट्टा; गुजरात में अहमदाबाद, पाटन, बड़ोदरा, भड़ौंच एवं सूरत, खानदेश में बुरहानपुर एवं दक्षिण में गोलकुण्डा इस उद्योग के प्रसिद्ध केन्द्र थे.
बंगाल की मलमल उस समय सारे विश्व में प्रसिद्ध थी. इसके साथ ही भारतीय सूती छींट और मोटे कपड़े की माँग भी सर्वाधिक थी. विदेशी व्यापारी भारतीय कपड़े के व्यापार के लिए सदा लालायित रहते थे. यूरोप की व्यापारिक कम्पनियों ने भारतीय कपड़े को यूरोप की मण्डियों में पहुँचाया.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मुगलकाल में उद्योगधन्धों में बहुत अधिक उन्नति हुई जिसके कारण भारतीय वस्तुओं की माँग विदेशों में बढ़ी, जिससे विदेशी धन भारत में आया तथा भारतीय समृद्धि के विकास में काम आया.
> मुगलकाल में विदेशी व्यापार : टिप्पणी
मुगलकाल में विदेशी व्यापार जल एवं थल दोनों मार्गों से होता था तथा स्वयं मुगल बादशाह विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित करते थे, क्योंकि जो सामान विदेशी व्यापारी भारत में लाते थे उनकी यहाँ पर बहुत अधिक आवश्यकता होती थी.
विदेशों से मुख्य रूप से सोना, चाँदी, ताँबा और शीशा तथा इस्पात मँगाया जाता था. इसमें सोना और चाँदी की देश में विशेष माँग थी, क्योंकि देश में इनका उत्पादन नहीं के बराबर होता था. अच्छी किस्म के ऊनी कपड़े फ्रांस से मँगवाये जाते थे. रेशम के कपड़े इटली, ईरान और तूरान से आते थे. ईरानी कॉलीनों की माँग बाजार में सदैव बनी रहती थी. सेना के लिए अच्छे घोड़े बाजार से ही प्राप्त किये जाते थे. घोड़ों का व्यापार जल एवं थल दोनों मार्गों से होता था. घोड़ों के साथ-साथ खच्चर की भी माँग बनी रहती थी.
इनके साथ-साथ विदेशों से फल, मेवे, शराब, दासदासियाँ, कस्तूरी, चीनी मिट्टी के बर्तन, लड़ाई का सामान, शृंगार की वस्तुएँ, विचित्र एवं कलापूर्ण सामग्री आदि आते थे.
यहाँ से निर्यात होने वाली वस्तुओं में वस्त्र (सूती) की मात्रा सर्वाधिक थी. गुजरात में निर्मित रेशमी वस्त्र भी निर्यात किया जाता था. इसके साथ काली मिर्च, मसाले, मोती, सुन्दर आभूषण एवं दर्शनीय वस्तुएँ, नील, अफीम, चीनी तथा मिश्री आदि थे.
फिर भी देश की जनसंख्या को देखते हुए विदेशी व्यापार की मात्रा काफी कम थी.
> मुगलकाल में शिल्प तथा व्यवसाय
हालांकि मुगलकाल में आम जनता का प्रधान व्यवसाय कृषि था, परन्तु इस समय में अनेक व्यवसायों एवं शिल्पों का भी विकास हुआ.
गुजरात के सूबे में कारीगर खुदाई का कार्य करते थे. वे सड़कों पर चित्र तथा नक्कासी का कार्य प्रमुखता से करते थे. बिहार के सूबे में अच्छा कागज तैयार होता था. बंगाल में नाव बनाने का कार्य उन्नति पर था.
अहमदाबाद मुगलकाल का हस्तकौशल का सबसे बड़ा केन्द्र था. यहाँ पर चित्रकार और भाँति-भाँति के कारीगर काम में लगे रहते थे. हाथी दाँत, आबनूस की लकड़ी, सोनेचाँदी इत्यादि की वस्तुएँ भी बनती थीं. नाना प्रकार की अलंकृत तश्तरियाँ, पेटियाँ, ट्रंक, कलमदान तथा छोटी सन्दूकचियाँ भी बनाई जाती थीं. लाहौर, आगरा, फतेहपुर और अहमदाबाद जैसे नगरों में सभी प्रकार के शिल्पी कार्य करते थे.
टैरी का कथन है कि, "मैंने बहुत से अनोखे सन्दूक, ट्रंक कलमदान तथा बड़े-बड़े चित्रों से परिपूर्ण कालीनों को बाजार में देखा था.” इस काल में कला चित्र तथा आभूषित डेस्कों, लिखे हुए केस तथा हाथी दाँत का कार्य बड़े पैमाने पर होता था.
मुगलकाल में देश में लकड़ी के कारखाने, पिटारियों, सन्दूकों, स्टूलों और अलमारियों तथा चमड़े का सामान बनाने, बर्तन बनाने तथा ईंटें बनाने के व्यवसाय थे. अकबर के दरबार में नाना प्रकार की सुगन्धित वस्तुएँ सुलगती रहती थीं. महलों में भी यह सोने तथा चाँदी के पात्रों में प्रत्येक कमरे में सुलगती रहती थीं.
जहाँगीर के समय में नूरजहाँ की माता, 'अस्मत बेगम' द्वारा गुलाब के इत्र का आविष्कार किया गया, जिसकी दरबार में अत्यधिक माँग रहती थी.
> राज्य की शिल्प एवं व्यवसायों के प्रति नीति ( मुगलकाल )
मुगल सरकार बहुत-सी वस्तुओं का उत्पादन स्वयं करती थी, क्योंकि बड़े पैमाने पर वस्तुओं का उत्पादन जनता द्वारा सम्भव नहीं था. इसलिए राज्य की ओर से बड़े-बड़े शिल्प केन्द्र स्थापित किये गये थे जिन्हें इस काल में 'कारखाना' कहा जाता था.
राज्य की ओर से खोले गये कारखाने गुजरात, लाहौर आगरा, फतेहपुर सीकरी एवं अहमदाबाद में मुख्य रूप से स्थित थे. अबुल फजल 'आइने अकबरी' में 36 प्रकार के कारखानों की सूचना हमें देता है. वह लिखता है कि, 'बादशाह बढ़िया से बढ़िया कारीगरों को प्रोत्साहित करता है कि वे नये एवं बढ़िया कारीगर शिक्षित करें. लाहौर, आगरा, फतेहपुर, गुजरात और अहमदाबाद में सहस्त्रों व्यक्ति काम करते हैं” मछलीपट्टम में भी हजारों व्यक्ति कैलिकों की छपाई में लगे हुए थे.
मुगल सम्राट अकबर एवं रेशम तथा ऊनी उद्योगों को प्रोत्साहन दिया. जहाँगीर ने अमृतसर में ऊनी शाल तथा ऊनी कालीन का उद्योग स्थापित किया था. जहाँगीर इत्र तथा सुगन्धित वस्तुओं का अत्यधिक प्रेमी था. अम्बर, सन्दल, गुलाब का इत्र, गुलाब जल इत्यादि खींचे जाते थे. शाहजहाँ ने सोने की कढ़ाई का काम रेशमी वस्त्रों पर करने को प्रोत्साहित किया. उसके समय में हीरे-जवाहरातों का बाजार जोरों पर था.
प्रान्तीय गवर्नरों (सूबेदारों) का स्थानान्तरण होता रहा था. अतः वे कारखाने स्थापित नहीं करते थे, परन्तु वे अपने सूत्रों के अध्ययन से उनकी देखभाल किया करते थे.
मुगलकाल में अधिकतर छोटी-छोटी वस्तुएँ भारतीय ग्रामीण अपने-अपने घरों में बनाते थे. उनके पास धन की कमी होने के कारण वस्तुओं का उत्पादन कम होता था, जो अच्छे कारीगर होते थे, उनको सरकार अपने केन्द्रों तथा दरबार में नौकर रख लेती थी. जो वस्तुएँ कारीगर बनाते थे उनको सबसे पहले खरीदने का अधिकार सम्राट को था. इसके बाद दरबारियों का, दरबारी लोग सम्राट के नाम से बाजार से वस्तुएँ खरीद लेते थे.
मुगलकाल में शिल्प व्यवसायियों और उपभोक्ताओं के मध्य आर्थिक रूप से चौड़ी खाईं थी. यह खाईं अकबर के समय से प्रारम्भ हुई और धीरे-धीरे बढ़ती गई. किसान, कारीगर, व्यवसायी, मजदूर, चपरासी एवं छोटे दुकानदारों की स्थिति अच्छी नहीं थी. उस समय आज की भाँति ट्रेड यूनियन नहीं थीं और न ही उनकी माँगें कोई सुनने वाला था.
मौरलैण्ड ने लिखा है कि, “जुलाहे स्वयं नंगे रहकर दूसरों के लिए शरीर को ढकने के लिए प्रबन्ध करते थे. किसान स्वयं भूखे रहकर नगरों एवं गाँवों का पोषण करने के लिए परिश्रम करते थे." वास्तव में कारीगरों तथा मजदूरों की दशा गुलामों से कुछ ही अच्छी थी.
टामस रो ने लिखा है कि, “भारतीय उसी प्रकार रहते हैं जैसे समुद्र में मछलियाँ, बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, उसी प्रकार बड़े छोटे को लूटते हैं और सम्राट सभी को.”
इस प्रकार उपर्युक्त विवचेन से स्पष्ट है कि मुगलकाल में विभिन्न प्रकार के शिल्पों को प्रोत्साहन दिया गया, किन्तु ये शिल्प धनी वर्गों की पहुँच में ही थे तथा इसका हानिकर पक्ष यह था कि शिल्पियों की दशा की ओर ध्यान न देकर उनका बुरी तरह शोषण किया गया.
> विदेशी व्यापार (यूरोपीय कम्पनियों के विशेष सन्दर्भ में)
मुगलकाल में यूरोपीय देशों से व्यापार प्रारम्भ हुआ. हालांकि उससे पूर्व ही भारत का माल सल्तनतकाल में अरबों के माध्यम से यूरोप पहुँचता था, जिसकी माँग यूरोप में अत्यधिक थी. इस कारण यूरोपीय व्यापारी भारत से अब सीधे माल मँगाने तथा अरबों से अधिक महँगा माल खरीदने की अपेक्षा उन्होंने भारत से प्रत्यक्ष सम्पर्क स्थापित करने के लिए नये भारत व यूरोप के मध्य समुद्री मार्ग की खोज की. इस काल में पुर्तगालियों ने सबसे पहले बाजी मारी, उसके बाद धीरे-धीरे डचों एवं अंग्रेजों ने अपना व्यापार भारत में जमा लिया. डच लोग भारत के पूर्वी तट पर डटे हुए थे, उनकी फैक्टरियाँ पुलीकट, मसुलीपट्टम तथा अन्य स्थानों पर बसी हुई थीं. अंग्रेजों ने सूरत को अपना अड्डा बनाया तथा पुर्तगालियों के प्रमुख केन्द्र गोआ और बम्बई थे.
(i) पुर्तगालियों का व्यापार – डचों व अंग्रेजों के समक्ष पुर्तगाली व्यापार धीमा पड़ गया था. वे नील, बहुमूल्य पत्थर, लोहा, ताँबा, गेहूँ, तरकारी, दवाइयाँ, मक्खन, तेल, साबुनं, शक्कर, कागज, मोम, रेशम, अफीम, सूती वस्त्र, दरियाँ, हाथी दाँत, सोना-चाँदी और सन्दूकें गोआ में ले जाते थे.
चाँदी, ऊनी वस्त्र, तलवारें, शीशा, लोहा, शराबें, फल, पनीर, छपी हुई पुस्तकें आदि गोआ कैम्बे को पुर्तगाल से लाकर देता था.
गोआ लिस्बन को काली मिर्च, शराब, नील, हीरेजवाहरात भेजता था.
(ii) डचों का व्यापार – डच मसाले के द्वीपों से मसाला लाकर उसे उत्तरी भारत में बेचते थे और बदले में जापान और श्याम को भारत से रेशम एवं खालें भेजते थे. अन्त में वे सोना-चाँदी खरीदने लगे. डच लोग अपने देश हॉलैण्ड से मसुलीपट्टम को ऊनी वस्त्र, हाथी दाँत, टीन, तलवारें और चाकू भेजते थे.
(iii) अंग्रेजी व्यापार - अंग्रेजों के दो राजदूत टामस रो एवं हॉकिन्स इंगलैण्ड से भारत व्यापार की अनुमति प्राप्त करने के उद्देश्य से जहाँगीर के समय भारत में आये, जिसमें से टामस रो को सफलता प्राप्त हुई और उन्हें स्वतन्त्र व्यापार करने की अनुमति प्राप्त हो गई.
1620 ई. तक अंग्रेज नील के व्यापार में लगे रहे. 1620–1630 ई. के मध्य कैलिको में व्यापारिक विकास हुआ तथा जहाँगीर की मृत्यु तक अंग्रेजों का पश्चिम तट पर लगभग आधिपत्य स्थापित हो गया तथा धीरे-धीरे उनका व्यापार बढ़ता चला गया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि मुगलकाल में यूरोपीय देशों से प्रत्यक्ष व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुआ जिसका प्रारम्भ, तो भारतीयों के लिए लाभकारी रहा, लेकिन धीरे-धीरे अंग्रेजों ने भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना प्रारम्भ कर अन्त में उस पर पूर्ण रूप से अधिकार कर लिया.
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