अटल बिहारी बाजपेयी युग (1998-2004)
1. अटल बिहारी बाजपेयी युग
1996 ( एक गठबंधन सरकार के प्रणेता के रूप में भारत को परमाणु संपन्न बनाने तक का सफर ) (1998-2004)
1996 में तेरह दिन की सरकार में प्रधानमंत्री रहना अटल बिहारी बाजपेयी जैसे नेता की नेतृत्व शक्ति तथा परिपक्वता परखने के लिए काफी समय नहीं कहा जा सकता था। वैसे तो अटल जी प्रथम है जो स्वयं संघ के जुड़े हुए प्रखर तथा वक्ता थे। अपनी बेदाग छवि तथा साफ व्यक्तित्व से भारतीय राजनीति में सभी दलों के चहते थे। एक राष्ट्रीय छवि होने के कारण इनकी पूछ सभी दलों तथा भागों में होती थी।
वैसे 1990 में जब जनसंघ का भाजपा नामक दल में उत्परिवर्तन हुआ तो अटल जी इस पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। वे भाजपा के पहले संस्थापक अध्यक्ष भी बने। जब राम मंदिर के मुद्दे ने जोर पकड़ा तथा आडवाणी ने भाजपा की कमान संभाली तब अटल भी थोड़े बेफिक्र हो गए तथा अपनी पूरी भूमिका पार्टी के आंतरिक राजनीति बनाने के बदले संसद में विभिन्न भूमिका निभाने लगे। अटल जी का संसदीय अनुभव नेहरू काल से ही था। इन्होंने नेहरू के प्रधानमंत्री काल से लेकर गुजराल के काल तक के प्रधानमंत्री से संसद में प्रश्न पूछे थे । संसद की सभी बड़ी बहसों तथा बैठकों में इनकी उपस्थिति मात्र ही उस बहस को महत्वपूर्ण बना देती थी। इनकी भाषण कला तथा समर्पण देखकर नेहरू ने भाविष्यवाणी की थी कि भविष्य में यह युवक प्रधानमंत्री बनेगा।
अटल जी की नेतृत्व करने की भूमिका आगे आकर 1995 में देखने को मिलती है उस समय नरसिम्हा राव की सरकार थी। नरसिम्हा राव एक से बढ़कर एक ऐसे विवाद से जुड़ते जा रहे थे जिनकी चर्चा उस समय के प्रमुख विवादों अखबारों में छपती थीं। हवाला काण्ड उस समय के प्रमुख विवादों में एक था। इस हवाला काण्ड में राजनीति के बड़े-बड़े खिलाड़ियों को नामित किया गया था, जिनकी चर्चा पहले भी की जा चुकी है। अटल जी की एक साफ छवि थी कि हवाला के साजिशकर्ता उनके नाम को शामिल करने की हिम्मत न कर सके। यह अटल जी अधिक पार्टी रणनीति तथा आंदोलन में शामिल होने में कोई परहेज न रहते हुए भी किसी तिकड़म में नहीं पड़ना चाहते थे।
परंतु आडवाणी जो तत्कालीन अध्यक्ष थे, को हवाला काण्ड में नामित किया गया था। भाजपा अध्यक्ष के रूप में आडवाणी का इस तरह हवाला काण्ड में नाम आना आश्चर्यजनक था। आडवाणी ने भाजपा की अध्यक्षता से इस्तीफा देने तथा संसद की सदस्यता और विपक्ष के नेता के पद को छोड़ने की बात कही। यह भी प्रण किया कि जब तक हवाला काण्ड से दोष मुक्त नहीं हो जाता तब तक में संसद में नहीं जाऊंगा और न कोई चुनाव लडुंगा ।
भाजपा ने कभी भी आडवाणी को दोषी नहीं माना तथा उन्हें त्यागपत्र देने के अपने फैसले पर फिर से विचार करने की बात कही। आडवाणी जी किसी तरह भाजपा अध्यक्ष पर रहने पर राजी तो हुए परंतु संसद की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया तथा 1996 का लोकसभा चुनाव न लड़ने की बात कही। 1996 के आम चुनाव में गांधीनगर से अटल जी ने ही चुनाव लड़ा। वैसे अटल जी की सीट लखनऊ भी थी। अटल जी उस समय भी लखनऊ से ही सांसद रहे तथा गांधीनगर से त्याग पत्र दे दिया।
1995 के गर्मी में मुम्बई (तात्कालीन बम्बई) में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक हुई। भाजपा के देशभर के कार्य कर्ता वहां गए हुए थे। यह भाजपा के 13 वर्षों के इतिहास में ऐसा दूसरी बार था जब मुम्बई में भाजपा की यह सबसे बड़ी बैठक होने वाली थी। इससे पहले 1980 में स्थापना के समय अटल जी ने मुम्बई में ही भाषण दिया था तथा भाजपा के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि “अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।" यह उक्ति बार-बार चर्चा के केन्द्र में रही। फिर से वही जोश के साथ 1995 में भाजपा की बैठक बम्बई में शुरू हुई।
लाल कृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में इस होने वाली बैठक के बारे में किसी भी व्यक्ति या कार्यकर्ता को इस बात की कोई आशा नहीं थी कि यह बैठक आगे की राजनीति को एक नयी दिशा देने जा रही है। 1995 की बैठक के बाद भाजपा की रणनीति धारदार हो गयी ।
आडवाणी ने अपनी अधयक्षता में कार्यकर्त्ता को संबोधित करते हुए कहा कि जब भाजपा को बहुमत मिलेगा तो भाजपा की तरफ से 'अटल बिहारी बाजपेयी' प्रधानमंत्री बनेंगे। ऐसी घोषणा की उम्मीद किसी को नहीं थी। भारतीय राजनीति में ऐसा पहली बार हो रहा था कि किसी विपक्षी दल के तरफ से चुनाव के पहले ही अपना प्रधानमंत्री तय किया जा रहा हो। अटल जी यह घोषणा सुनकर कोई बड़ी प्रतिक्रिया न दे पाए।
भाजपा को यह उम्मीद थी कि अटल बिहारी बाजपेयी का व्यक्तित्व तथा उनकी करिश्माई वाकपटूता और पारदर्शी छवि भाजपा को कहीं सत्ता जरूर दिलाएगी। ऊपर से भाजपा के विभिन्न सिद्धांतो जैसे समान नागरिक संहिता तथा धारा 370, राम मंदिर के बारे में नीतियों ने लगभग इस पार्टी को अछूत बना दिया था। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को यह वास्तविकता भी अटल जी का व्यक्तित्व तथा सद्व्यवहार राजनीतिक साथी चुनने में मदद करेगा। इसका फौरन लाभ भी मिला। बिहार में जनता दल से अलग हुए दो महत्वपूर्ण नेता जॉर्ज फर्नांडीस तथा नीतिशकुमार ने समता पार्टी बनायी तथा 1995 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा (माले) से गठबंधन किया। हार हो गई। नीतिश और फर्नाडीस ने यह फैसला किया कि अटल जी के नेतृत्व को स्वीकारा जाए तथा भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा जाए। वैसे औपचारिक रूप से नीतिश कुमार ने इस कदम को लालू विरोधी मतों को बिखरने से रोकने का ही रास्ता बताया।
भाजपा जैसी पार्टी को समता जैसी समाजवादी विचारधारा वाली पार्टी का साथ मिलना महत्वपूर्ण था क्योकि अभी तक भाजपा के पास दो ही दल साथ थे जैसे:- शिवसेना तथा अकाली दल । इन दोनों दलों को भी कहीं-न-कहीं किसी सम्प्रदाय से जोड़ कर देखा जाता था।
समता पार्टी के आने से भाजपा की राजनैतिक अस्पृश्यता खत्म होने लगी तथा अटल जी का नेतृत्व आरम्भिक सत्ता पर स्वीकार्य होने लगा। 1996 के चुनाव के बाद भाजपा को 161 सीटें मिली जो 1991 में 119 थी। 13 दिनों की सरकार में भाजपा के सांसद सिर्फ मंत्री बने। 13 दिनों के बाद अटल जी को त्यागपत्र देना पड़ा।
अटल जी 1996-1998 तक लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे तथा अपनी शैली को बनाए रखा। गुजराल से कांग्रेस के समर्थन वापस लेने के बाद मार्च 1998 में अटल जी को 1996 की अपेक्षा अधिक समर्थन मिला। इस समय अटल जी के नेतृत्व में और भी दलों का विश्वास बढ़ने लगा। अब ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, चन्द्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी, नवीन पटनायक का 'बीजू जनता दल' तथा जयललिता की 'अन्ना द्रविड़ मुनेग कडञम' भी भाजपा को समर्थन देने को तैयार हो गए।
19 मार्च 1998 को अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में अटल जी की सरकार बनी। इस सरकार में सहयोगी दलों के नेताओं को भी शपथ दिलायी गयी। पहली बार किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेतृत्व में क्षेत्रीय दलों की केन्द्र सरकार का जन्म हुआ। इस सरकार में उत्तर से दक्षिण तथा पूरब से पश्चिम भारत के क्षेत्रीय दलो के नेताओं को स्थान मिला था। सबसे महत्वपूर्ण बात कि अटल बिहारी बाजपेयी ने रक्षा मंत्रालय जैसे संवेदनशील मंत्रालय को क्षेत्रीय पार्टी के नेता जॉर्ज फर्नाडीस को सौंपा था। अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने मित्र जगमोहन तथा जेठमलानी को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया जबकि भाजपा के सदस्य के रूप में इन दोनों की भूमिका कभी भी अधिक नहीं थी।
अटल बिहारी बाजपेयी के सामने एक ऐसी अर्थव्यवस्था थी जिसका राजकोषीय घाटा उफान पर था तथा मुद्रास्फीति भी अधिक थी। विदेशी निवेश मध्यम था तथा राजनीतिक अस्थिरता के कारण शेयर बाजार भी सुस्त था। उधर विदेशी संबंध भी शिथिल थे। पाकिस्तान की आक्रामक नीति सीमा पर क्लेश पैदा कर रही थी। अटल बिहारी बाजपेयी ने अपनी अनुभव शक्ति से यह कोशिश भी कि भारत को एक मजबूत देश बनाने के लिए इसकी समाजिक क्षमता को बढ़ाना आवश्यक है। दक्षिण एशिया की परिस्थिति तथा चीन का विकास भारत के लिए सोचने को मजबूर कर रहा था। अब अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के पास रणनीति बदलने तथा नयी दृष्टि लाने का भी सही समय मिला था। 19 मार्च 1998 से 10 मई 1998 तक अटल बिहारी बाजपेयी ने कोई बड़ा बयान जारी नहीं किया।
2. पोखरण 'द्वितीय' POKHARAN (II)
अटल जी के नेतृत्व में बनी सरकार की यह ऐसी उपलब्धि थी जिसने विश्व के लगभग सभी देशों में भारत को चर्चित कर दिया। 11 मई 1998 को भारत ने तीन परमाणु परीक्षण किए तथा 13 मई 1998 को 2 परीक्षण किए। यह परीक्षण राजस्थान के पोखरण रेंज में हुआ। इसके पहले भारत ने 1974 में इंदिरा गांधी के रिजिम में यह परीक्षण किया था वह पूर्ण नहीं हो सका था।
1998 का यह परीक्षण सफल योजना के अनुसार पूर्ण तथा शक्तिशाली था। अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के इस कदम ने भारत की सामरिक तथा वैश्विक रणनीति बदल कर रख दी। अधिकतर इतिहास लिखने वाले इस परीक्षण को कम कर आंकते हैं क्योंकि यह परीक्षण किसी ऐसे प्रधानमंत्री के काल में हुआ जिसे कभी सत्ता में रहकर अपनी भूमिका को इतिहास में लिखवाने के लिए पैरवी पुरस्कार देने की आवश्यकता नहीं हुई तथा अटल जी को इन सभी कदमों से कोई फर्क नहीं पड़ता था।
अटल बिहारी बाजपेयी ने इस परमाणु परीक्षण पर अपनी प्रतिक्रया में यह कहा कि 'यह न्यूनतम परमाणु प्रतिरोधक क्षमता है तथा भारत ने किसी दूसरे देश के लिए परीक्षण नहीं किया है बल्कि अपनी आत्मरक्षा के लिए परीक्षण किया है। वैसे भारतीय परमाणु कार्यक्रम 1948 में ही आरम्भ हो गये थे परंतु उस समय प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने जो लक्ष्य तय किए थे वह लक्ष्य उर्जा से संबंधित थे। इसके अलावा सभी प्रधानमंत्री ने निःशस्त्रीकरण की पैरवी के साथ ही परमाणु कार्यक्रमों को दृढ़ता से जारी रखा तथा नरसिम्हा राव ने इसे अधिक प्रासंगिक नहीं लिया।
भारत सरकार ने 1998 में परमाणु परीक्षण करने का निर्णय लिया वह एक दिन या महीने में लिया गया निर्णय नहीं था वरण् इसकी पृष्ठभूमि वर्षों की थी तथा ऐसे वातावरण से निर्मित हो रही थी कि वैश्विक परिदृश्य में परमाणु शक्ति संतुलन होना अनिवार्य था परंतु यह पूर्ण रूप से अन्यायपूर्ण था कि महाशक्तियों की प्रमुखता तथा प्रबलता ही बनी हुई थी।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद परमाणु शक्ति की दृष्टि से विश्व पूरी तरह से असंतुलित रहा। एन. पी. टी. का मुख्य उद्देश्य विश्व के सिर्फ चार देशों जैसे:- अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रांस को ही परमाणु शक्ति होने के योग्य मानना था। परंतु चीन ने 1960 के दशक में इसमें लगभग जबरन प्रवेश किया तथा 5 देशों की नाभिकीय शक्ति समूह बनाने की पैरवी की। 1960 के बाद सी. टी.बी. टी. जैसे प्रयोग भी हुए तथा यह भी देखा गया कि वह गैर नाभिकीय देशों को परमाणु शक्ति के लक्ष्य के विरोध में संकल्प लेने के लिए हस्ताक्षर लेने को कहा गया। इस संधि में यह साफ था कि परमाणु शक्ति संपन्न देश दूसरे गैर परमाणु शक्ति देशों को परमाणु शक्ति बनने के विरोध करने को कह रहे थे। इस संधि में परमाणु शक्ति देशों के द्वारा अपने परमाणु हथियारों को नष्ट करने का वादा एकदम नहीं था। यह संधि, असंतुलित, अन्यायपूर्ण तथा भेद-भावों से पूर्ण थी।
भारत कभी भी सी.टी.बी.टी. और एन. पी. टी. पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं हुआ। भारत की प्रवृत्ति निःशस्त्रीकरण की पैरवी करने की थी पर संतुलित विश्व के साथ यह हो ऐसा भी इसने कई बार दोहराया था। भारत का पक्ष हमेशा यह रहा कि विश्व के सभी शक्तिशाली देशों को अपने परमाणु परीक्षण पर रोक लगाने तथा नष्ट करने की घोषणा करनी चाहिए तब ही विश्व में शांतिकर वातावरण तैयार होगा। पर कभी भी विश्व के परमाणु शक्ति संपन्न देश इस ओर बढ़ने के इच्छुक नहीं दिखे। बुरे मन से सोवियत संघ (रूस) और अमेरिका ने कई बैठके भी की पर यह संभव नहीं हो सका। इधर भारत परमाणु शक्ति संपन्न देशों से घिर चुका था भारत की सुरक्षा की संवेदनशीलता सबसे अधिक थी। एक तरफ चीन जैसा विशाल देश भारत को 1962 में ठेस पहुंचा चुका था वहीं उसके पास परमाणु बम का जखीरा मौजूदा था।
चीन के पास 1998 में एक अनुमान के अनुसार 400 से 500 नाभिकीय बम हैं तथा दूर तक परमाणु ढोने वाली मिसाइलें हैं जिनमें अंर्तमहाद्वीपीय मिसाइल भी शामिल है। ऐसी सूचना मिली कि चीन तिब्बत में नाभिकीय स्टेशन भी तैयार किया था तथा उसके साथ पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश भी थे जो 1947 बाद से हमेशा पीठ में चाकू भौंकने की फिराक में थे। पाकिस्तान ने चीन की मदद से कई मिसायल तकनीक भी हासिल कर ली थी तथा 'गौरी' तथा 'गजनवी' नाम देकर भारत को गीदड़ धमकी जैसा कृत्य आरंभ कर दिया। ये मिसाइल विकसित थे। इधर आकर भारत नाभिकीय शक्ति संपन्न देशों के सामने अपनी इतनी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद एक कमजोर देश के रूप में जाना जाता था। उस समय युक्रेन, कजाकिस्तान, रूस इत्यादि के पास अच्छे खासे नाभिकीय हथियार थे । ऐसी खुफीया रिर्पोट भी थी कि परमाणु मामले में पाकिस्तान ने भी चीन की मदद से काफी विकास कर लिया था। पाकिस्तान के तत्कालीन नेताओं ने यह कहा और बार बार कहा कि पाकिस्तान के पास परमाणु शक्ति बनने की क्षमता है। पाकिस्तान के इन झूठे या सच्चे दावों ने भारत को अपनी रणनीति तथा सिद्धांत संबंधी नीति को बदलने पर मजबूर कर दिया।
पाकिस्तान भारत को तीन बार चुनौति दे चुका था चीन उसे आंख मूंदकर मदद भी पहुंचा रहा था। गौरी और गजनबी नामक मिसाइल बनाना एक इशारा था क्योंकि गौरी ने ही भारत पर हमला किया था तथा हिन्दू सम्राट पृथ्वी राज चौहान को उस ने मार गिराया था। यह भी सिर्फ कथित रूप से कहा गया है। गजनबी भी इसी उद्देश्य से पाकिस्तान ने अपने मिसाइल का नाम रखा था।
भारत के पास कोई भी रक्षात्मक विकल्प नहीं था । पी. वी. नरसिंहराव परीक्षण करना चाहते थे पर आन्तरिक तथा बाहरी दबाव के कारण उन्होंने अटल बिहारे बाजपेयी को इसकी प्राथमिकता के बारे में बताया। बाजपेयी ने ए.पी.जे. अब्द. मूल कलाम तथा आर. बनर्जी को परमाणु परीक्षण के लिए आदेश दे दिए । कहा जाता है कि सरकार के सबसे शुरूआती निर्णयों में से एक है।
11 मई और 13 मई को भारत ने परमाणु परीक्षण किए तथा प्रधानमंत्री ने विश्व के सामने इसकी घोषणा कर दी। इस परीक्षण में यह भी दावा किया गया कि 45 किलों तक के हाइड्रोजन बम का भी परीक्षण किया गया है। अटल जी ने 13 मई को यह घोषणा की कि भारत अब परमाणु शक्ति संपन्न देश बन गया है तथा अब देश में बने जमीन से जमीन पर मार करने वाने 'पृथ्वी' और 'अग्नि' मिसायल के द्वारा परमाणु बम को ढोया जा सकता है।
परमाणु परीक्षण की प्रतिक्रिया काफी मिली-जुली थी । वामपंथी दलों ने इसका विरोध किया। कांग्रेस ने वैज्ञानिकों को धन्यवाद दिया। दुर्भाग्यपूर्ण रूप से कई पत्रकार और इतिहासकार ने भी सरकार के इस परमाणु परीक्षण के फैसले के अच्छे तथा इच्छा शक्ति वाले फैसले को नहीं सराहा। इसकी खामियां ही निकालते रहे। विपिन चन्द्रा ने अपनी पुस्तक में लिखा कि ऐसा जनमानस बना कि यह परमाणु परीक्षण चुनाव में फायदे के लिए किए गए परंतु विनम्रतापूर्वक कह कह देना आवश्यक है कि चुनाव महीने पहले ही हुए थे तथा आगामी चुनाव 4 साल बाद होने थे। क्योंकि कोई नहीं जानता था कि अगले साल इस सरकार को अल्पमत की स्थिति भुगतनी पड़ेगी।
कई पत्रकारों ने यह कहकर देश में अवस्थिति उत्पन्न करने की कोशिश की कि यह कदम पाकिस्तान को परमाण परीक्षण करने के लिए बाध्य करेगा। यह संभव नहीं था क्योंकि जून 1998 में पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण किया। अटल बिहारी बाजपेयी ने संसद में अपने भाषण में इस मुद्दे पर यह कहते हुए सभी संदेहों को दूर करने की कोशिश की। उन्होंने कहा 'जब पाकिस्तान ने परमाणु परीक्षण कर ही लिया है तो इस पर चर्चा हो ही जानी चाहिए कि क्या कोई देश प्रतिक्रिया स्वरूप सिर्फ 40 दिनों में परमाणु विकास कर सकता है क्या इसलिए यह कहना पूर्णतः भ्रमित करने वाला है कि भारत के परमाणु परीक्षण की प्रतिक्रिया से ही पाकिस्तान परमाणु परीक्षण करने पर मजबूर हुआ।"
भारत की परमाणु नीति को अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार न्यूनतम तथा प्रतिरोधी बताया तथा इसकी जरूरत की विश्व के सामने बात रखी। जॉर्ज फर्नांडीस (तत्कालीन रक्षामंत्री) ने अपने वक्तव्य में यह कहा कि अब भारत के सामने बड़ा खतरा चीन है, न कि पाकिस्तान। इस बयान की काफी आलोचना भी हुई थी। चीन ने परमाणु पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। यहां तक कि अपने दूत को बुला लेने की भी धमकी दी मतलब राजदूत को। चीन जैसे पड़ोसी देश की तरफ से गलत तथा नकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं थी। सही रूप में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार की यह मंशा रही कि भारत अपनी नीति तथा सामरिक सहमति को पाकिस्तान केन्द्रित भाव से निकाले। इसमें चीन जैसे देश को गलत तरीके से सोचने की कोई आवश्यकता नहीं थी। भारत के ही तथाकथित महान इतिहासकारों तथा पत्रकारों ने भारतीय नीति में ऐसे बदलाव को टारगेट किया तथा पड़ोसी देशों के साथ संबंध खराब करने के नाम पर बाजपेयी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया।
अमेरिका ने भारतीय परमाणु परीक्षण के बाद उस पर प्रतिबंध लगा दिए तथा जापान ने भी रूस की भर्त्सना की। जापान के अलावा नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क, नीदरनलैंड और कनाडा में भारत की स्थिति कमजोर करने की कोशिश हुई तथा भारत को मिलने वाली मदद को खत्म करने की बात कही गयी। अमेरिका ने 5-8 देशों से यह आग्रह किया कि भारत के दस कदम का प्रतिबंध की प्रतिक्रिया के रूप में जवाब दिया जाए परंतु फ्रांस, रूस तथा जर्मनी ने भारत का साथ दिया तथा पहले की तरह आर्थिक संबंध बनाए रखे। इधर ब्रिटेन ने भी भारत का साथ नहीं छोड़ा तथा यूरोपीय संघ के द्वारा उठाए गए कदमों का उसके अध्यक्ष के तौर पर विरोध किया।
भारत के लिए अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का असर भारत पर अंश मात्र भी नहीं पड़ा। भारत की सफलता थी। धीरे-धीरे अधिकतर देशों से सामान्य संबंध बहाल किए तथा अब तो विभिन्न राष्ट्राध्यक्ष भी भारत की यात्रा कर भारत के रक्षा संबंधी विषयों के प्रति समर्थन देने लगे।
भारत ने अपने परीक्षण से वर्षों से चले आ रहे दोहरे वैश्विक मापदण्डों को गहरी चुनौति दी। परमाणु परीक्षण कर भारत ने अमेरिका जैसे देशों को यह समझा दिया कि अमेरिका दोहरी रणनीति तथा स्वयंभू दृष्टिकोण नहीं ला सकता। अमेरिका की दोहरी नीति के कारण ही सी. टी.बी.टी. का उद्देश्य पूरा नहीं हुआ तथा भारत जैसे देशों को यह मसला बार-बार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाना पड़ा।
भारत ने 11 मई को परीक्षण कर अपने विज्ञान दिवस को जीवित किया तथा इसे 'ऑपरेशन शक्ति' नाम देकर भारत की क्षमता को वैश्विक रूप देने की कोशिश की। परीक्षण के कुछ ही दिन बाद बिहार के बोधगया में प्रधानमंत्री अटल जी ने कहा 'भगवान बुध की धरती से में यह कहना चाहता हूँ कि 11 मई को बुद्ध मुस्कुराए क्योंकि हमने शांति के लिए परीक्षण किया। अब भारत को कोई डरा नहीं सकता पर यह भी सनद रहे कि भारत पहले किसी दूसरे देश पर परमाणु परीक्षण का प्रयोग विनाशकारी रूप के लिए नहीं करेगा।"
“सरकार की अस्थिरता तथा जयललिता जैसी सहयोगी का अलग होना"
परमाणु परीक्षण बाद धीरे-धीरे सभी देशों से रिश्ते समान होते गए तथा सरकार चलने लगी। अटल जी ने कुछ ऐसे फैसले इसी काल में लिए जो मील के पत्थर साबित हुए जैसे:- 'स्वर्ण चतुभुर्ज परियोजना' इस योजना के माध्यम से पूरे देश को चारों तरफ से विभिन्न शहरों से जोड़ना था जिसमें पूर्वी सिलयर से पश्चिमी पोरबन्दर तथा इधर श्रीनगर से कन्याकुमारी को सड़क के माध्यम से जोड़ना था। बड़े स्तर पर प्रधानमंत्री ने इसे अपनी रूचि से प्रारंभ कराया।
एक गठबंधन की सरकार की कुछ मजबूरी होती है तथा धारे-धीरे अलग-अलग सहयोगी अपने राज्यों को केन्द्र में रखकर अपने लाभ के लिए सरकार से मांग करने लगे। जहां एक तरफ जयललिता थी जो हमेशा कुछ-न-कुछ मांग रख देती थी। वे कई बार मंत्रालय बदलने के लिए अटल बिहारी बाजपेयी सरकार पर दबाव डालती थी।
जयललिता की पार्टी ए.आई.डी.एम.के. की प्रतिद्वंदिता करूणानिधि की पार्टी डी.एम.के. से थी। जयललिता उस समय तमिलनाडू में विपक्ष में थी। उन्होंने हमेशा बाजपेयी सरकार पर यह दबाव डाला कि तमिलनाडू की स्थिति पर समीक्षा करने के लिए केन्द्र से एक समूह भेजें। बाजपेयी राजनीतिक रूप से बिना मतलब के किसी विपक्षी सरकार को तंग नहीं करना चाहते थे। अटल जी बार-बार जॉर्ज फर्नाडीस को मद्रास भेजकर जयललिता से बात करने को कहते रहते थे तथा किसी भी तरह समर्थन मिलता रहता।
जय ललिता ने धीरे से अपनी रणनीति बदल ली। उन्होंने अब बार-बार दिल्ली आने का फैसला किया। यह रणनीति इसलिए बनी कि दिल्ली में सरकार के सहयोगी दलों को एकजुट कर सरकार पर दबाव डाला जाए। कितनी बार सरकार के सहयोगी एक साथ बुलाकर जयललिता बैठक करती थी। कभी कभी चाय के बहाने तो कभी भोज के बहाने यह क्रम चलता रहा।
अप्रैल 1999 में जयललिता ने एक चाय पार्टी दिल्ली में बुलायी। इसके मुख्य संयोजक सुब्रहमण्यम स्वामी थे। जयल. लिता ने इससे पहले बाजपेयी से सुब्रहमण्यम् स्वामी को वित्तमंत्री बनाने की मांग अनौपचारिक रूप से की थी पर अटल जी तैयार नहीं हुए। जयललिता की इस चाय पार्टी की सबसे बड़ी खासियत रही कि इसमें सोनिया गांधी भी आयीं तथा एक राजनीतिक भूचाल लाने की कोशिश की गई। कुछ ही दिनों बाद जयललिता ने अपने दल के मंत्रियों को त्यागपत्र देने के आदेश दे दिए तथा केन्द्र सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी।
17 अप्रैल 1999 को राष्ट्रपति के आदेश से बाजपेयी ने अपना विश्वास प्रस्ताव रखा तथा सिर्फ एक वोट से वह विश्वास प्रस्ताव हार गए। इसमें उड़ीसा के तत्कालीन कांग्रेसी मुख्यमंत्री गिरिधर गामांग का वोट देना चर्चित रहा। क्योंकि उन्होंने अभी संसद की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया था तथा एक मुख्यमंत्री के तौर पर लोकसभा में आकर सरकार के खिलाफ मतदान करना व्यावहारिक नहीं था। तत्कालीन लोक सभा अध्यक्ष ने उन्हें नैतिकता के आधार पर फैसला लेने को मजबूर कर दिया फिर भी वह नहीं माने तथा मतदान किया।
1 वोट से अटल जी की सरकार गिर गई तथा फिर एक बार राजनीतिक शून्य पैदा हो गया। यह एक कुठाराघात था। भारत के राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए यह खतरनाक भी था। राष्ट्रपति के. आर. नारायण ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया से गांधी सरकार बनाने के लिए प्रयास करने तथा बहुमत जुटाने को कहा। पहले तो सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति भवन में जाकर बहुमत होने की बात कही पर राष्ट्रपति ने उन्हें समर्थन देने वाले नेताओं की चिट्ठी लाकर देने की बात कही ।
सोनिया गांधी जी 272 सांसदों के समर्थन करने का दावा करने जाने वाली थीं, उसके पहले समाजवादी पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव ने राष्ट्रपति महोदय से मिलकर कांग्रेस को समर्थन नहीं देने की बात कह दी। उसके बाद राष्ट्रपति से मिलकर सोनिया गांधी ने यह कहा कि "मेरे पास सिर्फ 233 सांसदों का ही समर्थन है तथा जरूरी 272 सांसदों की संख्या नहीं है"।
अब राष्ट्रपति के सामने चुनाव में जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। यह चुनाव 1996 के बाद तीसरा चुनाव था जो एक लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं था। इसी बीच कुछ घटना घटी जिसमें सरकार के अल्पमत या बहुमत में होने के मायने खत्म हो गए। अब सभी के लिए देश की सुरक्षा महत्वपूर्ण हो गई।
3. कारगिल प्रकरण
फरवरी 1999 में अटल बिहारी बाजपेयी ने एक ऐतिहासिक कदम उठाकर दिल्ली से लाहौर की बस यात्रा की योजना को मूर्त रूप दिया। उनके द्वारा उठाया गया यह कदम भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने की यह गहरी कोशिश थी। अटल जी ने दिल्ली से लाहौर की बस यात्रा की तथा अपने साथ भारत के सांस्कृतिक क्षेत्र के कई प्रतिनिधियों को ले गए।
बाजपेयी की लाहौर यात्रा में लाहौर घोषणा पत्र की औपचारिक घोषणा हुई तथा इसे एक नया आरंभ माना गया। अटल जी ने लाहौर में ऐतिहासिक भाषण देते हुए कहा कि "भारत-पाकिस्तान आपसी संबंधों को प्रकृति की स्वीकार्यता के आधार पर विकसित करे क्योंकि हम इतिहास बदल सकते हैं पर भूगोल नहीं।" लाहौर घोषणा पत्र को एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा गया तथा यह उम्मीद जतायी जा रही थी कि अब सब कुछ सामान्य हो जाएगा। परंतु पाकिस्तान की सेना तथा आतंकवादी गठजोड़ ने पहले से ही एक बड़ी योजना पर कार्य को मंजूरी दी। फरवरी के महीने में ही धीरे-धीरे घुसपैठिये कश्मीर की कारगिल सीमा तक पहुंच चुके थे।
मई 1999 में खुफीया जानकारी मिली कि पाकिस्तान की सेना जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्र में घुसपैठियों के साथ अंदर आ चुकी है तथा वहां चोटियों पर कब्जा कर लिया है। यह महत्वपूर्ण चोटी की श्रृंखला कारगिल सेक्टर में थी। भारत को प्रतिक्रियात्मक कारवाई करनी पड़ी लगभग 70 दिनों तक जवाबी कारवाई होती रही। भारतीय सेना को भी अनगिनत जवानों की तिलांजलि देनी पड़ी तथा घुसपैठ वाले क्षेत्रों से पाकिस्तानियों को खदेड़ा गया। भारत में आंतरिक रूप से कारगिल मामले पर गजब एकता तथा उत्साह देखने को मिला।
कई हजार लोगों ने अपने वेतन तथा कई महिलाओं ने अपने जेवर सेना को दान किए तथा भारत के कोने-कोने से पाकिस्तान के विरोध में आवाज उठने लगी। भारत की सेना ने अपनी बहादुरी तथा वीरता से जुलाई तक सभी घुसपैठियों तथा उनका साथ दे रही पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया तथा चोटी पर फिर से कब्जा कर लिया।
देखा जाए तो कारगिल की शुरूआत में विश्व समुदाय ने भारत को शांत रहने की अपील की पर धीरे-धीरे वास्त. विकता से सामना होने के बाद भारत के पक्ष में बयान जारी करने लगा। एक बार तो तात्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव कॉकी अन्नान को अटल जी ने बहुत ही सधे तरीके से यह कहा कि आपका फोन नवाब शरीफ के बदले दिल्ली लग गया है महाशय क्योंकि श्री अन्नान अटल बिहारी बाजपेयी को फोन पर शांति की अपील कर रहे थे। श्री अन्नान ने तुरंत बयान जारी कर पाकिस्तान को सलाह दी कि वह अपनी सेना पीछे कर ले। भारतीय वायु सेना की मदद तथा कुशल नेतृत्व ने नवाज शरीफ को अमेरिका जाने पर मजबूर कर दिया तथा वाशिंगटन में ही नवाज शरीफ ने यह घोषणा की कि पाक सेना पीछे जाने को तैयार है।
अमेरिका, ब्रिटेन तथा चीन ने पाकिस्तान पर भारतीय क्षेत्र से हटने के लिए दबाव डाला पाकिस्तान की यह सिफारिश एक भी नहीं चली कि ये घुसपैठिये हैं तथा सिर्फ इसे पाक सरकार नैतिक समर्थन दे रही है।
भारत ने अपनी सीमा में रहते हुए ही विभिन्न कारवाई की तथा युद्ध को बड़े स्तर पर जाने नहीं दिया। भारत ने सधी हुई कूटनीति से पाकिस्तान को विदेश नीति पर भी पीछे धकेल दिया।
कारगिल का प्रभाव अपने आप में एक अलग प्रकार से भारत पर पड़ा। इसने यह सदा के लिए भारत को सामरिक रणनीति तथा खूफिया नीति को बदलने को मजबूर कर दिया। हम यह नहीं कह सकते कि इसमें कोई खूफिया विफलता नहीं थी। पर एक ऐसा विषय है जिस पर निष्पक्ष सोचना चाहिए। 1998 के दिसम्बर से ही यह घुसपैठ हो रही थी तथां खूफिया विभाग की यह विफलता ही थी कि मई में इसका पता लगा जब तक सैकड़ो आतंकवादी अंदर प्रवेश कर चुके थे।
अटल सरकार ने कारगिल की समीक्षा के लिए के. सुब्रहमण्यम की अध्यक्षता में एक कमिटि बनायी जो 29 जुलाई 1999 से निर्मित होकर 15 दिसंबर 1999 को संसद में रखी गयी। इस कमिटि ने कई मोर्चे पर विफलता को दर्शाया तथा खूफिया तंत्र की आलसी स्थिति को रेखांकित किया। भारत सरकार को अपनी कश्मीर नीति को प्रभावित करने वाली सभी स्थितियों की समीक्षा करनी पड़ी।
कई इतिहासकारों ने तथा पत्रकारों ने अपने पारंपरिक लेखों तथा किताबों में यह लिखकर भ्रम फैलाने की कोशिश की कि भाजपा सरकार ने जान बूझकर आतंकवादियों को अंदर आने दिया ताकि चुनाव के समय युद्ध कर इसे मुद्दा बनाया जाए। यह सही तौर पर नहीं कहा जा सकता कि कोई सरकार जान बुझकर महीनों अपनी जमीन से अपने लाभ के लिए आतंकवादियों को आने दे सकती है क्योंकि घुसपैठ, कब्जा, तथा युद्ध किसी सरकार के लिए अच्छी तस्वीर नहीं पेश करता और उसमें भी एक ऐसे व्यक्ति के नेतृत्व में सरकार चल रही थी जिसने देश के लिए अपनी जिंदगी लगा दी। किसी भी स्थिति में कारगिल घटना को उचित नहीं माना जा सकता पर किसी सरकार पर यह आरोप लगाना कि उसने आतंकवादियों को बुलाकर इस परिस्थिति को उत्पन्न होने दिया, कहीं से उचित नहीं है। अगर ऐसा होता तो 2004 से 2014 तक कांग्रेस की सरकार रही तथा वह बिना रोक टोक जांच करवा सकती थी। उसमें भी पहले 5 साल भाजपा के विपरीत प्रतिद्वन्दी वामपंथी उस सरकार को समर्थन दे रहे थे।
4. 1999 का आम चुनाव NDA की जीत
कारगिल युद्ध के बाद एक बार फिर आम चुनाव की बारी आयी। इसकी घोषणा और लोक सभा भंग करने की घोषणा पहले ही कर दी गई थी। इस बार भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने एक औपचारिक गठबंधन बनाकर उसका नामकरण किया तथा इसका नाम 'राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन' यानी छक् । ही रखा। इसके अध्यक्ष अटल बिहारी बाजपेयी बनाए गए तथा संयोजक 'श्री जॉर्ज फर्नाडीस' को बनाया गया। अब इस गठबंधन में कुछ नये दल भी आ गए थे जैसे:- 'द्रविड़ मुनेग कडगम' पूर्वोत्तर की कुछ पार्टियां तथा ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इत्यादि । यह एक व्यस्थित गठबंधन था जो विभिन्न क्षेत्रीय दलों के साथ पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता था।
इधर कांग्रेस पार्टी की स्थिति अलग थी। यह पार्टी अभी भी पूरी तरह अपने आंतरिक कलह से उबर नहीं पायी थी । वैसे सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को दिसम्बर 1998 में मध्यप्रदेश राजस्थान तथा दिल्ली में विधानसभा चुनाव में जीत मिली थी पर अभी भी सोनिया गांधी के विदेशी मूल को लेकर कुछ संदेह बने हुए थे । कांग्रेस पार्टी के नेता श्री शरद पवार तथा पी.ए. संगम ने कांग्रेस अध्यक्ष के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया तथा जीत नहीं होने का संदेह प्रसारित किया।
शरद पवार को कांग्रेस पार्टी से हटा दिया गया तथा शरद पवार ने 1999 में ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बना ली। यह एक ऐसी घटना थी जो कांग्रेस को चुनाव से पहले संकट में डालने वाली थी। सोनिया गांधी के विदेशी मूल के प्रश्न को विपक्ष ने भी काफी उछाला पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व तथा अटल बिहारी बाजपेयी ने व्यक्तिगत रूप से किसी भी भाषण में सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा नहीं उठाया।
सोनिया गांधी और कांग्रेस विदेशी मूल के प्रश्न पर रक्षात्मक हो गयी तथा यह लगने लगा कि अब कांग्रेस का नेतृत्व इस मुद्दे को जितना हल्का समझता था वह जनता के बीच उतना ही प्रसिद्ध तथा प्रभावी होता जा रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सोनिया गांधी का अमेठी के अलावा कर्नाटक के बेल्लारी से चुपचाप नामांकन करना था। यह एक ऐसी परिस्थिति थी जब भाजपा ने इसे एक नया मुद्दा बनाने की कोशिश करने की ठानी तथा अपनी तेजस्वी नेता सुषमा स्वराज को वहां मुकाबले के लिए भेज दिया। बेल्लारी एक ऐसी सीट थी जो सोनिया गांधी की तरफ से बेल्लारी में खड़ा होना कांग्रेस की रक्षात्मक स्थिति को दर्शाती थी।
1999 का चुनाव भाजपा ने राष्ट्र की स्मिता तथा राजनीतिक स्थिरता के नाम पर लड़ने का फैसला किया। यह कहा जा सकता है कि भाजपा के पास कारगिल, सरकार की सफलता तथा कुशल नेतृत्व दिखाने का अवसर था। उधर कांग्रेस को अभी भी गठबंधन पर विश्वास नहीं हुआ था। कांग्रेस ने औपचारिक रूप से गठबंधन न करने की बात कही तथा चुनाव लड़ने को तैयार हो गई।
चुनाव परिणाम आने के बाद यह पहली बार हुआ कि किसी चुनाव पूर्व गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला तथा अटल जी के नेतृत्व में छव। को पूर्ण विश्वास जनता के द्वारा प्राप्त हुआ यह एक ऐसा मोड़ था जब भारत की राजनीति गठबंधन के युग में प्रवेश करने वाली थी। भाजपा को 182 सीटें मिली तथा कांग्रेस को 134 सीटें मिली। भाजपा तथा उसके सहयोगी दल मतलब NDA को साथ में 296 सीटे मिली जो बहुमत से अधिक थी।
13 अक्टूबर 1999 को अटल बिहारी बाजपेयी को फिर से एक बार प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। अब ऐसी उम्मीद बंधी कि राजनीतिक स्थिरता तथा सर्वसम्मति से 5 साल तक सरकार नहीं बदलने वाली। अटल बिहारी बाजपेयी के सामने अब चुनौतियां भी कम नहीं थी। देखा जाए तो भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास तथा अन्तर्राष्ट्रीय नीति में कुछ बड़े बदलाव हो रहे थे तथा इस स्तर में इसे एक नये बदलाव की आवश्यकता थी। हमारी नीतियों को अब एक नया सार चाहिए था। जिसमें आने वाली शताब्दी में भारत को एक नये तरीके से विश्व के द्वारा देखा जा सके।
अटल बिहरी बाजपेयी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़े स्तर पर बदलाव भी किए। सार्वजनिक क्षेत्र में विनिवेश नीति को संतुलित स्तर पर बढ़ाना जिससे कि आमदनी हो सके तथा सरकारी खर्चा में भी कमी करना जिससे राजकोषीय घाटा कम हो सके जैसे लक्ष्य के लिए आगे बढ़ा गया तथा कुछ महत्वपूर्ण कठोर फैसले भी किए गए। वैसे देखा जाए तो ये फैसले दूरदर्शी थे पर तत्काल के लिए प्रायोगिक भी।
अर्थव्यवसथा में नयी जान फूंकने के लिए सरकार ने जो कदम उठाए वह भविष्य में अच्छे संकेत दे सकते थे पर उस समय जनता को उनकी नीतियां स्वीकार नहीं हो रहीं थी। देखा जाए तो सरकारी खर्च घटाने के लिए तथा राजकोषीय घाटा कम करने के लिए कुछ ऐसी नीति तथा फैसले लिये गए जो जनता को नागवार थे, उदाहरणस्वरूप 2004 के बाद सरकारी नौकरी में जाने वाले को पेंशन बंद करना, विभिन्न तरह के फंडों को नया रूप देना तथा उद्योग परिसर को बुनियादी सुधार के लिए आगे आने को कहना जैसी कई व्यावहारिक नीतियां बनीं। उधर कुछ फैसले भी लिए गए जो व्यावहारिक थे, जैसे:- प्रवासी भारतीयों के लिए बाण्ड स्कीम तथा देश में पैसे निवेश करने को प्रोत्साहन देना तथा विभिन्न मंत्रालयों को एकीकृत करना तथा इसमें प्रवासी भारतीय मंत्रालय तथा विनिवेश मंत्रालय को अधिक तवज्जों देना शामिल है।
सरकार की ऐसी नीतियां सकारात्मक प्रभाव के साथ परिणाम दे पायीं। 2004 में सरकार जब हट गई तो 8.3 प्रतिशत की विकास दर तथा 110 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा अंदर छोड़ कर गयी थी। यह खुद उन फैसलों की पैरवी करता है जो कड़े तौर पर लिये गए थे। राजकोषीय घाटा कम करने की इच्छा शक्ति इस सरकार में दिखाई दी तथा इसके अच्छे परिणाम भी मिले थे। इसके अलावा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, अंत्योदय योजना, स्वजल धारा योजना, इत्यादि जैसे कार्यक्रम ने जनता को बहुत ही सहुलियत प्रदान किया। यशवन्त सिन्हा तथा जसवंत सिंह इन दोनों वित्तमंत्रियों ने अपनी तरफ से बहुत सारे ऐसे प्रयास किए जो मील का पत्थर बने।
अटल बिहारी बाजपेयी ने संसद को यह बताया कि बिहार तथा उड़ीसा जैसे राज्यों को विशेष फंड जारी कर विकास करने के प्रयास किए जाएंगे पर योजना के अनुसार बिहार को कहा गया कि अपनी योजना बनाकर भेजे तथा फंड की सुविधा ले। बिहार जैसे पिछड़े राज्य का विकास कहीं न कहीं राज्य सरकार की कमी के कारण रुका था और वह तो योजना भी नहीं जानते थे। बाजपेयी सरकार ने एक नयी नीति के तहत राज्यों को विभिन्न योजना की लागत तथा आउटपुट के आधार पर पैसे देने लगी तथा इस कारण आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्य को लाभ हुआ तथा बिहार जैसे राज्य को भी जहां की सरकार भी सक्रिय नहीं थी, हानि हुई। वैसे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को अधिक सफलता मिली तथा विकास की रफ्तार इसके माध्यम से तेज हुए।
इसी सब के बीच दिसम्बर 1999 में एक अपहरण की घटना घटी तथा सरकार के सामने धर्म संकट खड़ा हो गया। काठमांडू से दिल्ली आने वाली उड़ान प्814 को पाकिस्तानी आतंकवादियों ने अपहरण कर लिया तथा इसे अमृतसर होते हुए कांधार (अफगानिस्तान) लेकर चले गए। सरकार की प्राथमिकता विमान में बैठे लगभग 250 यात्रियों की जान बचाने की थी।
उस समय भारत के पक्ष में उतनी बातें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नहीं होती थीं जितनी आज है। भारत सरकार उस देश में अपनी कोई राजनयिक कोशिश को परिणाम के स्तर पर पहुंचने में नाकाम रही थी क्योंकि उस समय अफगानिस्तान में तालिबानी सरकार थी जिसको सिर्फ पाकिस्तान ही ऐसा देश था जो मान्यता दिए हुए था। कई स्तरों पर देखा जाए तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो दवाव बनाए जा रहे थे, उससे कहीं अधिक सरकार के सामने आंतरिक दबाब थे। 250 यात्रियों के परिवार जन तथा विपक्षियों की तरफ से लगातार दबाव बनाए जा रहे थे यहां तक कि विदेश मंत्री जसवंत सिंह के प्रेस कांफ्रेस को भी घेर लिया गया था। विपक्षी समूहों ने सरकार पर 250 यात्रियों की सुरक्षा को सबसे अधिक प्राथमिकता देने की सलाह दी।
सरकार आतंकवादियों की शर्त को नहीं मानना चाहती थी जिसमें 4 आतंकवादियों को रिहा करने की शर्त भी मुख्य रूप से थी। लेकिन सर्वदलीय बैठक, खूफिया रिपोर्ट, आंतरिक दबाव के कारण सरकार को 'मजुद अजहर' जैसे आतंकी को छोड़ना पड़ा। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण समय था तथा जनता की सुरक्षा तथा सैकड़ों मानव संसाधन को बचाने के लिए लिया गया फैसला था। हालांकि तत्कालीन सरकार की आलोचना इस मुद्दे पर अभी भी होती है पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह फैसला सर्वदलीय आधार पर लिया गया फैसला था। इसके अलावा अफगानिस्तान जैसे देशों में जाकर कोई मिशन पूरे करने की (उस समय की स्थिति में) स्थिति संभव ही नहीं थी।
अटल बिहारी बाजपेयी ने इस घटना के बाद अपनी विदेश नीति में व्यवाहारिक परिवर्तन भी किए जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। सही तौर पर देखा जाए तो प्814 की घटना नेपाल में असुरक्षा तथा घोर लापरवाही रखने का खामियाजा था। सही स्तर पर जांच में पाया गया कि काठमांडू से उड़ाने पटना के लिए असुरक्षित है तथा पटना-काठमांडू की उड़ान को बंद कर दिया गया।
निष्पक्ष रूप में अपहरण की इस घटना का दूरदर्शी परिणाम नकारात्मक रूप से ही निकला। अपहरण होने पर मसूद को छोड़ना एक गलत फैसला था क्योंकि वह 'जैश-ए-मुहम्मद संगठन' नामक एक आतंकवादी समूह बनाकर लगातार कश्मीर में उपद्रव करवाता रहा है। तत्कालीन परिस्थितियों की सीख यही थी कि ऐसे मामलों तथा घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में अपनी नीति तथा अपनी आंतरिक सुरक्षा आक्रामक तथा पहले से अधिक परिपक्व होनी चाहिए।
जेश-ए-मुहम्मद ने 2001 ई. में अपनी कायराना हरकत को अंजाम देना आरंभ कर दिया। कश्मीर विधान सभा पर हमला हो या चरार-ए-शरीफ पर। सभी हरकतों तथा हमलों का जिम्मेवार इसी उग्रवादी संगठन को माना गया। सबसे बड़ी घटना को इस आतंकवादी संगठन ने 2001 के दिसम्बर 13 को अंजाम दिया। संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था तथा सामान्य ढंग से कार्यक्रम हो रहे थे। अचानक आतंकवादियों ने संसद पर कुछ हथियारों के साथ घुस कर हमला कर दिया। 3 आतंकवादियों ने घुसकर हमला किया। उस समय 200 से अधिक सांसद संसद में मौजूद थे।
सांसद, गृहमंत्री आडवाणी तथा मीडिया कर्मी वहीं मौजूद थे। सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठा लिये गये थे तथा इसमें 4 आतंकवादी मारे गए तथा 1 आतंकवादी जो फिदायीन था उसने विस्फोट से अपने आपको उड़ा लिया। हमले के बाद जैश-ए-मुहम्मद तथा लश्कर-ए-तैयस्बा ने घटना की जिम्मेवारी ली तथा भारतीय संसद पर हमले को अपनी सफलता बताया। इस हमले में संसद के 9 सुरक्षाकर्मी भी शहीद हुए तथा इन्होंने अपनी जान पर खेलकर संसद की सम्मान तथा सांसदो की जान की रक्षा की। इस हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरू समेत चार आतंकवादियों को पकड़ा गया। अफजल गुरू को बाद में फांसी दे दी गयी।
2002 ई. में सरकार के सामने आंतरिक स्तर पर कई चुनौतियां आई। इससे पहले भाजपा आलाकमान ने गुजरात जैसे गढ़ में बढ़ रहे सरकार के प्रति आंतरिक कलह को मिटाने की भरपूर कोशिश की मगर केशू भाई पटेल के नेतृत्व में भाजपा सरकार के प्रति गुजरात के अंदर आवाजें खिलाफ थी । अंततः सरकार को बदलने का फैसला किया गया। भाजपा के संसदीय बोर्ड ने तत्कालीन महासचिव तथा पूर्व प्रखर संघ प्रचारक श्री नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा। मोदी लगातार पार्टी और संघ के लिए वर्षो से बिना कोई चर्चा के काम करते रहे थे। उन्होंने गुजरात में अपनी छवि तथा अनुभव से भाजपा की तथा सरकार की समस्याओं को दूर करने का भरसक प्रयास किया तथा सफल भी हुए।
27 फरवरी 2002 को गोधरा शहर में एक घटना घटी मुजफ्फरपुर से अयोध्या होते हुए अहमदाबाद जाने वाली रेलगाड़ी गोधरा स्टेशन पर रूकी थी। इस गाड़ी में एक डिब्बा पूरे कारसेवकों से भरा हुआ था जो अयोध्या से लौट रहे थे। गाड़ी का नाम साबरमती एक्सप्रेस था। संदेहास्पद स्थिति में उस गाड़ी में आग लग गई तथा 59 यात्री जिंदा जल गए। यह भयानक घटना भारतीय इतिहास के लिए दुर्भाग्यपूर्ण थी। इस घटना के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे।
28 फरवरी 2002 को पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे तथा लगभग 1200 लोग मारे गए। 3 मार्च को गोधरा ट्रेन से जुड़े हुए कुछ व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया तथा उन पर पोटा (आतंकवाद निरोधी अधिनियम) लगाया गया। 6 मार्च 2002 को गुजरात सरकार ने कमीशन ऑफ इन्कवॉयरी के तहत गोधरा कांड और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच के लिए एक आयेग की नियुक्ति की । ये दंगा पूरे भारतीय राजनीति को एक नया रूप दे गया। विपक्षी कांग्रेस ने इसे भाजपा के द्वारा पोषित बताया तथा सभी दल गुजरात के मुख्यमंत्री को टारगेट करने लगे। बाजपेयी सरकार की स्थिरता पर कोई सवाल नहीं उठा तथा भाजपा की आंतरिक राजनीति भी संतुलित रही। एक समय ऐसा लगा कि अटल बिहारी वाजपेयी मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जी को त्यागपत्र देने के लिए कहेंगे पर ऐसी कोई वजह नहीं पायी गई जिससे पता लगे कि मोदी तथा सरकार ने अपनी तरफ से दंगा रोकने में कोई कोताही की हो। 22 फरवरी 2011 को विशेष अदालत ने गोधरा कांड के लिए 31 लोगों को दोषी पाया तथा 63 को बरी कर दिया।
भारतीय सभ्य समाज में गोधरा जैसी घटना होना एक दुर्भाग्य था तथा दंगे कहीं भी उचित नहीं ठहराये जा सकते। इस गुजरात दंगों के पीछे ऐसी कोई बड़ी साजिश नहीं नजर आयी जिससे तत्कालीन राज्य सरकार को दोषी ठहराया जा सके।
कई याचिकाओं में प्रत्यक्ष रूप में नरेन्द्र मोदी जी को दोषी ठहराने की मांग की गई तथा कई बार इस पर सरकार के द्वारा कमिटि तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा एस. आई. टी. बनायी गई पर किसी ने नरेन्द्र मोदी को दोषी नहीं माना तथा बरी कर दिया।
बाजपेयी सरकार की भूमिका गुजरात दंगों में एक संतुलित तथा धैर्य वाली सरकार की रही तथा सरकार कभी भी कुछ ऐसे कदम नहीं उठाना चाहती थी कि इसकी चर्चा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो। दंगे को नियंत्रित किया गया तथा दिसम्बर 2002 में विधानसभा चुनाव नये रूप में कराए गए। एक बार फिर नरेन्द्र मोदी को समर्थन मिला तथा केन्द्रीय सरकार को भी राहत मिली क्योंकि नया जनादेश मिल चुका था।
5. अटल बिहारी बाजपेयी सरकार की लाहौर यात्रा
1998 के मार्च में जब बाजपेयी सरकार बनी तो डेढ़ महीने के अंदर परमाणु परीक्षण कर इस सरकार ने यहू जता दिया था कि अब भारत की विदेश नीति काम चलाऊ नहीं वरण् सक्रिय तथा प्रायोगिक के साथ व्यवहारिक भी होगी। अटल बिहारी बाजपेयी जी के पसंदीदा विषयों में विदेश विभाग तथा इनसे जुड़े मुद्दे थे। अटल जी वर्षों तक विपक्ष में रहते हुए विदेश विभाग की स्थायी समिति के अध्यक्ष रहे थे तथा कितनी बार सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इनसे मदद भी ली थी।
मौलिक रूप से अटल बिहारी बाजपेयी ऐसे रणनीतिकार थे जिन्होंने चीन, पाकिस्तान और इजरायल जैसे देशों के साथ संबंध अच्छे करने के लिए गंभीर प्रयास किया था। यहीं एक ऐसी वजह थी कि इस दिशा में किए गए उनके प्रयास और व्यवहारिक दृष्टिकोण ने पड़ोसी देशों को सकारात्मक प्रतिक्रिया देने को मजबूर कर दिया। बाजपेयी में किसी भी बात के लिए तथा किसी भी बिन्दू पर चर्चा के लिए अद्भुत प्रतिभा थी तथा वह अपनी बात बहुत ही अतुलनीय रूप से रखते थे। अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने प्रधानमंत्री काल में पाकिस्तान से लेकर इजरायल तक के साथ अपने संबंध बनाने की कोशिश की तथा अमेरिका जैसे देशों के साथ संबंध सुधारने की दिशा में सफलतम प्रयास किए। यह सही है कि भारत की विदेश नीति अब व्यावहारिक तथा 20वीं सदी की जरूरतों के अनुसार ढल रही थी ।
6. पाकिस्तान के साथ संबंध
अटल बिहारी बाजपेयी ने पाक के साथ संबंध सुधारने की दिशा में क्रांतिकारी प्रयास किए। 1999 के फरवरी में अटल जी का दिल्ली से बस लेकर लाहौर जाना एक महानतम तथा क्रांतिकारी प्रयास था। अटल बिहारी बाजपेयी के काल में पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर जितनी चर्चा मीडिया में हुई उतनी चर्चा विरले ही दूसरे प्रधानमंत्री के कार्यकाल में हुई। फरवरी 1999 में अटल जी के द्वारा लाहौर की यात्रा ने विश्वास का एक संक्षिप्त तथा महत्वपूर्ण धागा तैयार किया।
नवाज शरीफ के साथ मिलकर लाहौर घोषणा पत्र की घोषणा अटल बिहारी बाजपेयी ने की थी। 21 फरवरी 1999 को दोनों तरफ के राष्ट्राध्यक्षों के द्वारा इस पर हस्ताक्षर हुए थे तथा बाद में भारत और पाक की संसद द्वारा इस पर हस्ताक्षर कर दिए गए थे। लाहौर घोषण पत्र में दोनों देशों की संधि के तहत परमाणु शस्त्रागार के विकास और परमाण का प्रयोग पहले एक दूसरे के खिलाफ नहीं करने की शर्तें शामिल थी। इन घोषणा पत्र में दोनों देशों के द्वारा पहले लड़ाई न करने के लिए आपसी समझ कायम की गई थी तथा यह कहा गया कि द्विपक्षीय संबंधों के लिए किसी तीसरे देश की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है।
लाहौर घोषणा के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंध सामान्य हो ही रहे थे तथा विश्वास का पुल बन ही रहा था कि कारगिल प्रकरण हो गया जिसकी चर्चा हमने पहले ही की है। जब अक्टूबर 1999 में फिर अटल जी चुनकर आए तो लगभग उसी समय पाकिस्तान में नवाज शरीफ का तख्ता पलट हो गया तथा जनरल परवेज मुशर्रफ के हाथ में सत्ता आ गई। सेना के हाथ सत्ता आने से भारत-पाक संबंध अब और अधिक संशय पूर्ण तथा ठहराव से भर गए।
भारत सरकार ने इस तख्तापलट को पाकिस्तान की आंतरिक समस्या बताया पर लोकतंत्र की असफलता के लिए पाकिस्तान की नीति को दोषी बताया। सेना के सत्ता में आने के बाद कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी घटनाएं अधिक होने लगी तथा आई.एस.आई के द्वारा भारत विरोधी कारवाई करने में भी तेजी आ गई।
परवेज मुशर्रफ ने जब 2001 के आरंभ में सेना से अवकाश लिया तो उसने पिछले दरवाजे से राष्ट्रपति पद हासिल कर लिया तथा अपने चहेतो को प्रधानमंत्री बना दिया। परंतु सत्ता की चाभी अपने पास रखने लगे। पाकिस्तान की तरफ से भारत को कई बार वार्ता के लिए निमंत्रण दिया जाने लगा परंतु भारत ने पहले आतंकवाद खत्म करने की बात कही। जुलाई 2001 में भारत ने पाकिस्तान को एक और मौका दिया। अटल बिहारी बाजपेयी ने मुशर्रफ को आगरा आने को निमंत्रण दिया तथा एक नये दौर की शुरूआत करने की कोशिश की। परवेज मुशर्रफ और बाजपेयी के बीच आगरा शिखर वार्ता हुई तथा इस वार्ता में भी पाकिस्तान ने अपनी आदत के अनुसार भ्रम पैदा करने की कोशिश की।
पाकिस्तान की यह रणनीति थी कि आगरा सम्मेलन को एक जरिया बनाकर कश्मीर मुद्दे को अंतर्राष्ट्रीय कर दिया जाए। बाजपेयी को इसकी भनक लग गयी। बाजपेयी ने अपनी तत्कालीन सूचना मंत्री सुषमा स्वराज जी को मीडिया में यह बताने को कहा कि 'भारत-पाक' के बीच वार्ता का केन्द्र आतंकवाद है तथा और भी मद्दे साथ में बातचीत से हल किये जा रहे हैं। इसी बिन्दू पर पाकिस्तान को ऐतराज हो गया। भारत ने पाकिस्तान की चाल नाकाम कर दी थी। मुशर्रफ ने बैठक में इसी का मुद्दा उठाया। ऐसी स्थिति आयी कि मुशर्रफ एक संयुक्त बयान पर भी सहमत नहीं हुए तथा आगरा सम्मेलन असफल हो गया।
आगरा के बाद भारत-पाकिस्तान के संबंध और भी खराब हो गये पर वह स्थिति नहीं आयी जो 2001 में दिसम्बर में भारतीय संसद के हमले के बाद आयी थी जिसमें भारत अपनी सेना को सीमा पर मजबूत कर रहा था। भारत-पाक के रिश्ते सबसे अधिक तल्ख दिसम्बर 2001 में संसद पर हमले के बाद हुए। 13 दिसम्बर 2001 को पाक परस्त आंतकियों ने संसद पर हमला करने की कोशिश की तथा इसमें 5 आतंकी सहित 14 लोग मारे गए जिसमें 9 सुरक्षाकर्मी शहीद थे। जिसकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं। 25 दिनों तक सीमा पर तनाव रहने के बाद मुशर्रफ को मजबूर होकर कुछ संगठनों पर रोक लगाने पड़े थे तथा उसके बाद संबंध अधिक खराब होने से रूक गए। अटल बिहारी बाजपेयी ने पाकिस्तान को बार-बार यह संदेश देने की कोशिश की कि वह सभी मुद्दों पर बात करने को राजी है बर्शते पाकिस्तान कश्मीर में चल रहे आतंकवाद के विरुद्ध भारत की सहायता करे। मुशर्रफ और बाजपेयी के बीच आगरा के बाद काठमांडू में एक बार फिर मुलाकात हुई लेकिन इसमें कोई बातचीत नहीं हुई। भारत-पाकिस्तान के बीच सांस्कृतिक संबंध जारी रहा।
2003 के उत्तर्राद्ध में भारत-पाकिस्तान के बीच संबंध एक बार और सामान्य होना आरंभ हुए जब भारत सरकार ने इस्लामाबाद में होने वाले जनवरी 2004 को आयोजित सार्क सम्मेलन में शामिल होने के लिए हामी भरी। जनवरी 2004 में अटल बिहारी जी ने इस्लामाबाद की यात्रा की। हालांकि यह यात्रा द्विपक्षीय यात्रा के तौर पर नहीं थी पर मुशर्रफ के साथ बैठक होना तय हुआ जो महत्वपूर्ण था। अटल बिहारी बाजपेयी तथा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने सार्क सम्मेलन में द्वि पक्षीय विवादों की चर्चा नहीं की तथा इससे एक विश्वास का माहौल बना चाहे वह कुछ दिनों के लिए क्यों न हो? अटल बिहारी बाजपेयी और मुशर्रफ के बीच इस्लामाबाद में बैठक हुई तथा इस बैठक में मुशर्रफ ने काफी लचीला रुख अपनाया तथा एक संयुक्त बयान जारी हुआ इसमें पाकिस्तान के तरफ से घोषणा की गई थी कि "पाकिस्तान अपनी धरती का उपयोग भारत के खिलाफ नहीं होने देगा" यह भारत की जीत थी। यह भारत की तरफ से उन प्रयासों का नतीजा था जो लगातार किये जा रहे थे।
अटल बिहारी बाजपेयी की दूरदर्शिता तथा अनुभव पाकिस्तान के साथ संबंधों में काफी काम आये तथा 1999 से चली यात्रा इस्लामाबाद घोषणा पर जाकर रुकी। अब एक नये दौर की शुरूआत होने वाली थी जब अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता से हट गए तथा मनमोहन सिंह ने बाजपेयी की पाकिस्तान नीति को आगे बढ़ाने की बात कही।
7. अमेरिका के साथ संबंध (Relations with USA)
मई 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिया तथा भारत को एक परमाण्विक रूप से गैर जिम्मेदार देश कहा। सही रूप में भारत अमेरिका संबंध उस काल में आपसी विश्वास की कमी से पीड़ित थे। वैसे तो भारत आरंभ से ही अमेरिका से दूरी बनाकर चल रहा था लेकिन गुटनिरपेक्षता की नीति में अमेरिका को पाकिस्तान के नजदीक जाने का अवसर दे दिया। ऐसे कई अवसर आए जब अमेरिका ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया।
1998 के बाद कुद दिनों के लिए भारत-अमेरिका संबंधों में संक्रमण काल आया। यह काल एक नयी शुरूआत का ही आरंभ था। संबंधों में मोड़ उस समय आया जब दिसंबर 1999 में कांधार कांड हुआ तथा भारत को आतंकवादियों के बदले अपने नागरिकों की जान का सौदा करना पड़ा था। वैश्विक स्तर पर यह परिलक्षित हो गया था कि पाकिस्तान कहीं-न-कहीं आतंकवादियों को आश्रय दे रहा है।
मार्च 2000 में तत्कालीन राष्ट्रपति क्लिंटन ने भारत की यात्रा की तथा एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण दोनों देशों के बीच पैदा हुए। दोनों देशों ने 'भारत-अमेरिका संयुक्त दृष्टिपत्र' (Indo-USA Combined vision for 21st century ) पर हस्ताक्षर किए तथा कहा कि “21वीं शताब्दी की एक परिकल्पना पर हस्ताक्षर किए एवम् विगत शंकाओं को दूर करने तथा विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच अपेक्षाकृत अधिक घनिष्ठ और गुणात्मक रूप से नये संबंध बनाने के लिए द्विपक्षीय संबंधों में नई दिशा देने की आवश्यकता है। " अब भारत - अमेरिका संबंध एक नये वैश्विक सामयिक सहयोग की ओर चल पड़े।
2000 ई. से 2004 जनवरी के बीच अमेरिका विदेश उपमंत्री स्ट्रॉब टॉलबोट तथा भारतीय विदेश मंत्री श्री जसवंत सिंह के बीच कई दौर की द्विपक्षीय बातचीत हुई तथा भारत-अमेरिका संबंधों की एक नयी इबारत लिखी गयी। भारत-अमेरिका संबंध अब अधिक परिपक्व तथा सुलझे हुए थे। अटल बिहारी बाजपेयी की उसके बाद अमेरिका की यात्रा तथा अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करने की उनकी यात्रा ने अमेरिका में भारत की प्रतिष्ठा को कई आगे किया। यह कहना सही होगा कि यह संबंध रूस की कीमत पर नहीं विकसित हो रहा था।
8. रूस के साथ संबंध
बाजपेयी युग में रूस के साथ संबंधों में और भी गहराई आई। परमाणु परीक्षण के बाद रूस उन देशों में था जिसने भारत के इस कदम का विरोध नहीं किया था। रूस भारत की स्थिति को अच्छी तरह जानता था । बाजपेयी के काल में रूस के साथ ‘वार्षिक शिखर सम्मेलन' करने की प्रतिज्ञा ली गई तथा बारी बारी से भारत-रूस के नेता एक दूसरे के यहां जाकर द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने पर सहमत हुए।
रूस के साथ व्यापारिक सामयिक तथा सांस्कृतिक संबंध और भी मजबूत हुए तथा ब्रह्मोस जैसे मिसाइलों तथा लड़ाकू पनडुब्बी के विकास पर समझौते किए गए। भारत ने रूस को अपना सबसे नजदीकी मित्र बनाए रखा। अटल जी की यह प्रखर कूटनीति थी कि उन्होंने यह कोशिश की कि अमेरिका तथा रूस के साथ संबंध प्रगाढ़ रहे तथा इसमें अमेरिका या रूस किसी को संदेह का भाव पैदा न हो।
रूस भारत संबंधों की यह ताकत ही थी कि स्लादिमीर पुतीन ने बाजपेयी की अमेरिका नीति को एक परिपक्व तथा निष्पक्ष कोशिश बताया।
9. इजरायल के साथ संबंध
वैसे तो भारत के साथ इजरायल के संबंध 1992 तक नहीं थे पर इसके पीछे भारत के कोई अपने कारण नहीं थे। भारत फिलीस्तीन की स्वतंत्रता का पक्षकार रहा तथा गुटनिरपेक्षता के कारण संबंध विकसित होने में कठिनाई थी। 1990 के दशक में कश्मीर में आतंकवाद तथा रूस की स्थिति विखण्डन के बाद खराब होने से नये राजनीतिक वातावरण में इजरायल भारत के लिए एक अहम देश बन गया। 1992 में भारत ने इजरायल के साथ राजनीतिक संबंध बनाए तथा एक शुरूआत की। बाजपेयी के सत्ता में आने के बाद भारत-इजरायल संबंध ने एक नये दौर में प्रवेश किया।
बाजपेयी ने इजरायल के साथ रूस के बाद सबसे बड़ा सामयिक संबंध स्थापित किया। इस समय तत्कालीन इजरायली राष्ट्रपति ने (एरियल रोटोन) भारत की यात्रा की तथा यह यात्रा किसी इजरायली राष्ट्रपति की पहली भारत यात्रा थी। इस यात्रा में कृषि सहित 9 मुद्दों पर सहमति बनी तथा अंतरिक्ष क्षेत्र के भी संबंध विकसित करने की बात कही गयी। इसके पहले 2000 ई. में तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह इजरायल की यात्रा कर चुके थे।
इजरायली तत्कालीन राष्ट्रपति भारत को विश्व का एक मजबूत तथा महत्वपूर्ण देश बताया तथा सबसे अधिक भाव देने की बात की। अटल जी ने इजरायल के साथ संबंधों को महत्व दिया तथा कहा कि हमारे पुराने संबंध हैं तथा हम नया करने की अब कोशिश कर रहे हैं। अब इजरायल एक अहम देश के रूप में भारत के साथ अब संबंध कायम कर चुका है तथा हाल ही में दोनों देशों के प्रधानमंत्री एक दूसरे के यहीं आ चुके हैं। 21वीं सदी की जरूरतों के अनुसार भारत-इजरायल संबंधों को आधार देने में अटल बिहारी बाजपेयी का योगदान सबसे बढ़कर रहा।
10. चीन के साथ संबंध
1998 में परमाणु परीक्षण के बाद तथा जॉर्ज फर्नांडीस के बयान जिसमें तत्कानीन रक्षा मंत्री ने यह कहा था कि चीन भारत के लिए पाकिस्तान से अधिक खतरे का विषय है, के बाद चीन थोड़ा निराश था तथा भारत के साथ संबंध ों में खुला नहीं था। वैसे 1962 के बाद से ही चीन, पाकिस्तान को अपनी नीतियों में प्रोत्साहित करता रहा तथा वैश्विक स्तर पर भी भारत के पक्ष के खिलाफ ही रहा।
अटल बिहारी बाजपेयी के शासन काल में चीन-भारत का द्विपक्षीय संबंध पुरानी बातों को लेकर आगे बढ़ा। बाजपेयी चीन के साथ व्यापार सीमा विवाद तथा वैश्विक विषयों सहित सभी सामयिक मुद्दों के साथ बात कर संबंध विकसित करना चाहते थे।
बाजपेयी ने विदेश मंत्री जसवंत सिंह को चीन भेजकर एक नये संबंध के दौर की शुरूआत की कोशिश की जिसमें यह निर्णय लिया गया कि विदेश सचिव स्तर की वार्ता नियमित रूप से चलती रहेगी तथा इस वार्ता में प्रमुख रूप से सीमा विवाद के मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा।
वर्ष 2003 में अटल बिहारी बाजपेयी की ऐतिहासिक चीन यात्रा हुई तथा इसमें अनेक द्विपक्षीय फैसले लिए गए। अटल बिहारी बाजपेयी की इस यात्रा में 23 जून 2003 को दोनों देशों के बीच संयुक्त घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए गए तथा यह उल्लेख किया गया कि “आपसी समझ और विश्वास को बढ़ाया जाएगा तथा रक्षा आदान प्रदान के साथ सामयिक संबंध भी स्थापित किए जाएंगे।'
इसके अलावा तिब्बत पर भारत का दृष्टिकोण साफ किया गया तथा चीन को यह भरोसा बाजपेयी ने दिया कि अन्त. र्राष्ट्रीय स्तर पर भारत तिब्बत को विवादित विषय नहीं बनाएगा वहीं चीन ने सिक्किम को भारत का अंग माना बाजपेयी की इस यात्रा के बाद व्यापक तथा आदान प्रदान के मामले में संबंध और भी विकसित हुए।
11. अटल बिहारी बाजपेयी की कश्मीर नीति
बाजपेयी सरकार की कश्मीर नीति को किसी भी सरकार के लिए एक प्रेरणा माना जा सकता है। बाजपेयी कश्मीर की परिस्थितियों को प्रेम से तथा दिल में जगह बनाकर सुलझाना चाहते थे। उन्होंने कश्मीर के मामले में एक सूत्र दिया जिसमें तीन महत्वपूर्ण शब्द थे:- 'जम्हूरियत', 'कश्मीरियत', 'इंसानियत ।'
अटल बिहारी बाजपेयी अपने व्यवहार के अनुसार कश्मीर के विभिन्न राजनीतिक दलों और अलगाववादी समूहों सभी के साथ बातचीत के द्वारा सभी मसलों पर सुलझाव की कोशिश भी करते रहे। बाजपेयी ने यह कहा कि आम सहमति तथा व्यवहारिक रूप से कश्मीर के भले के लिए सभी को काम करना चाहिए।
बाजपेयी ने रमजान के महीने में सीज फायर की घोषणा करके एक नयी स्थिति को न्यौता दिया। हिजबुल मुजाहिदीन ने इसका रिसपौंड (जवाब) दिया तथा उसने भी सीजफायर की घोषणा की। बाजपेयी ने कई दौर में कॉन्फ्रेंस के साथ भी बातचीत का दरवाजा खोला तथा कई नेताओं को रिहा भी किया। नेशनल कॉन्फ्रेंस एक सहयोगी के रूप में बाजपेयी सरकार के कदमों का स्वागत करती रही।
सबसे सफल कदम बाजपेयी जी ने कश्मीर में चुनाव कराकर उठाया। 2002 में आतंकवाद के साये में बाजपेयी सरकार ने चुनाव करवाया तथा यह एक बहादुरी का कदम था। कश्मीरी लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। चुनाव के बाद नेशनल कांफ्रेस की हार हुई तथा कांग्रेस- पी डी पी गठबंधन सत्ता में आया तथा मुफ्ती मुहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने। सईद को भी बाजपेयी ने कश्मीर के विकास में आखिर तक योगदान दिया
12. 'भारत उदय' अभियान तथा एन.डी.ए. की हार
दिसंबर 2003 में तीन राज्यों के विधान सभा चुनावों में भाजपा की जीत हुई। राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में भाजपा की जीत का मतलब था कि "केन्द्र सरकार के कार्यों की स्वीकारोक्ति तथा लोक प्रियता" ऐसा माना गया भाजपा के आंतरिक राजनैतिक थिंक टैंक ने यही गलती कर दी तथा अपने आपको गलत रूप में आंका। ऐसा नहीं था कि सरकार के खिलाफ बहुत ही आक्रोश था। एक अच्छा नेतृत्व तथा कैटर वाली पार्टी ने यह सोचा कि जल्दी चुनाव करा लिये जाएंगे तो इसका लाभ मिलेगा। भाजपा ने चुनाव को ध्यान में रखकर ही 'भारत उदय' अभियान चलाया।
विपक्षी खेमा जहां 1999 में बिखरा था वहीं 2004 में यह साथ हो गए थे। कांग्रेस को यह समझ आ गया था कि बिना गठबंधन के अब वह एक पार्टी के रूप में पूर्ण बहुमत नहीं ला सकती। जहां कांग्रेस लचीला रूप अपनाकर आगे बढ़ रही थी तथा दक्षिण में डी. एम. के. तथा बिहार में लालू जी, पासवान जी की पार्टियों से चुनाव पूर्व गठबंधन कर लिया। वहीं एन.डी.ए. के अच्छे सहयोगियों ने रिश्ता खत्म कर लिया।
अक्टूबर 2004 में चुनाव होने थे, अब सरकार ने फैसला किया कि राजस्थान मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ की जीत को मनाया जाए तथा जल्दी चुनाव करवा लिये जाए हालांकि कहा जाता है कि अटल जी व्यक्तिगत रूप से इसके लिए राजी नहीं थे। प्रमोद महाजन तथा वैंकेया नायडू जो उस समय पार्टी के काम देखते थे, उन्होंने चुनाव करवाने की सलाह दी। अप्रैल-मई 2004 में चुनाव हुए तथा भाजपा और छक् । को कांग्रेस से 7 सीटे कम मिली। कांग्रेस को वामपंथी दलों की मदद से सरकार बनाने का अवसर मिल गया। अटल बिहारी बाजपेयी की हार आश्चर्यजनक थी। भारत उदय अभियान को इसका कारण माना गया। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व परीक्षण कर इस हार के लिए जल्दी चुनाव को भी एक अहम कारक माना।
अटल बिहारी के 6 साल के कार्यकाल में भारत को हरेक क्षेत्र में एक मजबूत आधार मिला। 2004 में जब बाजपेयी सत्ता से हटे तो उस समय भारत की विकास दर 8.10 प्रतिशत थी। मुद्रा स्फीती 3 प्रतिशत थी तथा विदेशी मुद्रा भंडार 100 अरब डॉलर के ऊपर पहुंच चुका था। विदेशी निवेश अच्छा हो रहा था तथा बुनियादी संरचना में सड़को का जाल बिछ रहा था। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसे कार्यो की सफलता उल्लेखनीय थी।
सबसे बढ़कर अटल बिहारी बाजपेयी एक ऐसे नेता बने जिसने भारत में पहली बार गठबंधन की सरकार को पूरे 6 साल चलाया। विभिन्न समीक्षक अटल बिहारी बाजपेयी को भारत के सफलतम प्रधानमंत्री के रूप में याद करते हैं। उनकी पहचान अपनी पार्टी से ऊपर, पार्टी से अलग तथा सब दलों में एक महान नेता की रही। 16 अगस्त 2018 को अटल जी का देहान्त हो गया। आज उनकी पार्टी सत्ता में है तथा उनके देखे सपने जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा देश के हरेक कोने में होगी का सपना पूरा कर रही है।
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