डॉ० मनमोहन युग ( UPA I, UPA II) सरकार (2004-2014)
1. डॉ. मनमोहन सिंह (2004-2014)
(UPA सरकार तथा सोनिया गांधी की भूमिका का ऐतिहासिक विश्लेषण)
2004 के आम चुनाव जो समय से 6 महीने पहले ही करवा लिये गय थे, इसके परिणाम के बारे में कोई भी संभावना ऐसी व्यक्त नहीं की जा रही थी जो सही तौर पर हुआ विपक्षी पार्टियों की अधिक सीटें आएंगी, या कोई भी सर्वे नहीं आंका जा रहा था बाजार से लेकर टी.वी. स्टूडियो के सर्वे ने भाजपा के नेतृत्व में एन.डी.ए. सरकार की वापसी की प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही थी।
चुनाव परिणाम में इसके उलट हुआ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन गई । इसे 145 सीटें मिलीं और सहयोगियों के साथ 222 सीटें आयीं। वहीं भाजपा को 138 सीटें मिलीं तथा छक्। को 192 सीटें मिलीं। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को वामपंथी दलों ने बिना शर्त समर्थन दे दिया तथा वामपंथी दलों के 56 सदस्य मिलाकर कांग्रेस के पूर्ण बहुमत का जुगाड़ हो गया।
मई 18 को रिजल्ट आ गया था अब लगने लगा कि सोनिया गाँधी (कांग्रेस अध्यक्ष) के नेतृत्य में सरकार बनने वाली है। इस परिस्थिति में भी वामपंथी दल सहयोग को तैयार था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी ने सोनिया गांधी को सरकार पर चर्चा करने के लिए बुलाया। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह तथा तत्कालीन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति से मिलने गए यह कांग्रेस को सरकार बनाने का औपचारिक निमंत्रण मिलन था।
इधर भाजपा ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दों को उठाना आरंभ किया सुषमा स्वराज जी ने राष्ट्रपति से मिलकर सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा उठाया तथा सार्वजनिक घोषणा की कि “अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन गयी तो वह अपने सारे बाल कटा लेंगी तथा जमीन पर सोयेंगी तथा सिर्फ आवश्यकता के अनुसार सुखे अनाज खाएंगी"। इसी प्रकार उमा भारती ने भी एक मुख्यमंत्री के तौर पर औपचारिक विरोध किया। फिर भी ऐसी बात नहीं लग रही थी जिससे लगे कि सोनिया गांधी के नेतृत्व करने में कोई अवरोध होने वाला है क्योंकि सहयोगी और वामपंथी दल लगातार उनका समर्थन कर रहे थे।
19 मई को संसद के केंद्रीय हॉल में कांग्रेस के चुने हुए सदस्य की बैठक बुलायी गयी तथा यह बैठक संसदीय दल में नेता चुनने के लिए एक बैठक है, ऐसा माना गया। मगर इस बैठक में ऐसा कुछ हुआ जिसकी कोई भी कल्पना नहीं कर सकता था। सोनिया गाँधी ने अपने सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि मुझे प्रधानमंत्री बनने में कोई दिलचस्पी नहीं तथा मैं कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में ही अपनी सेवा देती रहूंगी। सांसदों ने बहुत ही विरोध किया तथा बहुत देर तक अलग-अलग सदस्यों के भाषण चलते रहे। फिर भी सोनिया गांधी नहीं मानी इसे मीडिया के एक धडे के द्वारा त्याग माना गया तथा कांग्रेस इस त्याग को एक महान परंपरा के तौर पर प्रोजेक्ट करने लगी।
अब कांग्रेस संसदीय दल की बैठक हुई तथा डॉ. मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री चुना गया तथा सोनिया गांधी ने घोषणा की कि मनमोहन सिंह के हाथ में अब देश सुरक्षित है। मनमोहन सिंह वही नेता थे जो ठप के गवर्नर और वित्त मंत्री दोनों के रूप में सेवा दे चुके थे तथा आर्थिक उदारीकरण के प्रणेता के तौर पर माने जाते थे।
कांग्रेस और सहयोगी दलों की बैठक हुई तथा संयुक्त रूप से मनमोहन सिंह को नेता चुना गया वामपंथी दलों के साथ मिलकर एक संयुक्त सभा कार्यक्रम बनाया गया तथा वामपंथी दलों को सरकार के शामिल होने का निमंत्रण दिया गया पर वामपंथी समूह ने बाहर से ही समर्थन का वादा किया।
कांग्रेस और सहयोगी दलों ने साथ मिलकर अपने गठबंधन का नामकरण किया तथा तमिलनाडु में जो करूणानिधि की पार्टी ‘DMK' और कांग्रेस तथा साथी सहयोगी का जो संयुक्त समूह था उसी के नाम में इस गठबंधन का नाम ‘UPA' या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन रखा गया।
22 मई 2004 को डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपत ली तथा यह घोषणा की कि विदेशी संबंधों तथा पाकिस्तान के साथ बातचीत के सभी प्रयास बाजपेयी जी के बताये गए नीतियों के तहत ही होते रहेंगे।
डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह सोच उमड़ी कि सोनिया गांधी की भूमिका आखिर क्या होगी? क्या एक कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सरकार को सलाह देना तथा उसकी प्रशंसा प्राप्त करना एक अतिवादी कदम होता तथा प्रधानमंत्री पद तथा सरकार से ऊपर की यह संकल्पना बन जाती।
काफी सोच विचार के बाद यह फैसला किया गया कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनेगा तथा जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों के लोग होंगे तथा योजना आयोग के भी सदस्य होंगे तथा यह परिषद सरकार को विभिन्न सामाजिक-आर्थिक योजनाओं को शुरू करने या लागू करने के लिए सरकार को आदेश के बदले सलाह देगी।
निष्पक्ष भाव से देखा जाए तो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद बनने के पीछे कुछ विशेष कारण थे। सबसे पहला कारण था कि मनमोहन सिंह कोई राजनीतिक नेता के तौर पर कांग्रेस में जाने नहीं जाते थे। इस परिस्थिति में सरकार की योजनाओं के लाभ की प्रशंसा लेकर उनको वह लाभ नहीं होता। इधर सोनिया गांधी के नेतृत्व में ही कांग्रेस ने चुनाव जीता था। सोनिया गांधी को सरकार की विभिन्न अच्छी योजनाओं के लिए प्रशंसा प्राप्त करने का अधिकार नहीं होता। कम-से-कम सलाह देने के लिए परिषद को जरूर प्रशंसा मिलती तथा यश भी। राष्ट्रीय सलाह का परिषद बनाकर एक संतुलन कार्य किया गया, जिससे सरकार की संवैधानिकता पर भी प्रश्न न खड़ा हो तथा कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को इसका लाभ भी मिलता रहे।
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद सभी कल्याणकारी योजनाएं बनाती थी तथा सरकार जो सलाह देती थी कि इसे लागू करे। मनरेगा, सूचना का अधिकार तथा खाद्य सुरक्षा योजना ऐसी योजनाएं थी जो सीधी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद से स्वीकृत होकर सरकार को भेजी गई थी कि इसे लागू किया जाए। इसके अलावा राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने 2005 राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन तथा टाज शुरू करने की सलाह दी।
दिसम्बर 2004 में दक्षिणी तृतीय राज्यों में भयंकर सुनामी आई तथा हजारों लोग मारे गए। अपार जन धन की हानि हुई प्रधानमंत्री को विश्व के अधिकतर देशों की तरफ से मदद की पेशकश की गई। इस परिस्थिति में यह पाया गया कि देश में किसी भी आपदा का मुकाबला करने के संसाधन उपलब्ध हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विश्व समुदाय को यह कहा कि 'भारत के पास इस आपदा से मुकाबला करने के लिए प्रर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं। "
मनमोहन सिंह की सरकार को सूचना का अधिकार देने के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए। 2005 में सरकार ने सूचना के अधिकार को देशव्यापी स्तर लागू किया तथा यह भावना प्रकट की कि प्रत्येक लोक-अधिकारी के कार्यकाल में पारदर्शिता के लिए तथा जनता के कल्याण के लिए संवैधानिक तौर पर एक केंद्रीय सूचना आयोग तथा राज्य सूचना आयोग का प्रावधान, ‘सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में किया जा रहा है।
सूचना के अधिकार अधिनियम में यह कहा गया था कि इस कानून का प्रयोग करने हेतु कोई व्यक्ति किसी सरकारी संस्था से जानकारी के लिए अपना आवेदन दे सकता है जिस का जवाब उस सरकारी संस्थान को केवल 30 दिनों के अन्दर देना होता है।
सूचना के अधिकार की बात अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने ही की थी तथा इस पर एक कमिटी भी बनायी गयी थी तथा इसकी रिपोर्ट भी प्राप्त की थी। मनमोहन सिंह की सरकार में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के द्वारा इसी रिपोर्ट पर चर्चा कर सरकार को सलाह दी गयी कि इस पर कानून बनाया जाए।
उस वर्ष यानी 2005 में सूचना का अधिकार देना एक अहम कदम था। इस अधिकार के द्वारा जनता को सरकार के विभिन्न कार्य के लिए जानने को एक कानूनी अधिकार मिल गया था यह पारदर्शिता तथा व्यवस्था लाने के लिए एक जरूरी कदम था जो अनुशासन तथा व्यावहारिकता को आत्मा दे सकता था।
मनमोहन सिंह सरकार की दूसरी सबसे बड़ी कल्याणकारी योजना मनरेगा को कहा जा सकता है। तत्कालीन राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने इस रोजगार कार्यक्रम को एक अधिनियम के तौर पर लागू करने की सलाह दी। यह पहले भी कुछ राज्यों में अपना काम कर रही थी परंतु विधायिका की तरफ से अधिनियम बनाकर इसे पहली बार लागू करने की योजना पेश हुई।
मनमोहन सिंह सरकार ने 100 दिनों की रोजगार गारंटी योजना को पेश किया तथा इसके प्रभाव को फैलाने की बात दी। यह योजना राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तौर पर जानी गयी तथा इसे आरंभ में 100 जिलों में लागू किया गया बाद में इसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना कहा गया। कुछ दिनों बाद इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया था।
मनरेगा ग्राम विकास के क्षेत्र में जनता के स्तर पर एक कल्याणकारी योजना थी इसमें गांव के गरीबी से जूझ रहे लोगों को आमदनी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की शक्ति थी। परंतु इस योजना में कई प्रकार जी जांच की प्रक्रिया तथा सही आदमी के पास पैसे जाने की प्रयोजना पर ध्यान नहीं दिया गया।
सामाजिक अंकेक्षण में कई बार गडबड़ियां पायी गयीं तथा इसका कारण था कि लाभान्वितों की पहचान के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं था यह योजना उस काल के परिप्रेक्ष्य में एक काल्याणकारी योजना थी पर ऐसा कोई माध्यम नहीं था जिससे भ्रष्टाचार इसमें नहीं हो।
सरकार मनरेगा के तहत किए जाने वाले कामों की देखरेख के लिए कोई विशेष टास्क फोर्स या समूह का निर्माण भी नहीं करा पायी तथा सभी कुछ ग्राम पंचायत के स्तर पर छोड़ दिया गया तथा धीरे-धीरे मनरेगा में पंचायत स्तर पर लगातार भ्रष्टाचार बढ़ता चला गया।
तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने मनरेगा योजना में सामाजिक अंकेक्षण को प्रोत्साहित किया तथा कार्य के आउटपुट प्राप्त करने के लिए कई समूह का भी निर्माण किया धीरे-धीरे कुछ सुधार देखने को मिले तथा इस योजना में तालाब निर्माण, पौधा रोपण, मेड़ बनाने तथा बांध निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य को सम्मिलित किया गया।
मनमोहन सिंह संदेह को दूर करते रहे जिससे यह लगे कि कांग्रेस वामपंथी के विचार से कुछ अलग कार्य कर रही है। वामपंथी दलों के समर्थन का ही नतीजा था कि मनमोहन सिंह सरकार ने उन मुद्दों को अभी नहीं छोड़ा जिस पर वामपंथी दलों से अलग राय रखी जाती थी।
वैसे मनमोहन सिंह ने वामपंथी दलों को सोनिया के साथ मिलकर यह आग्रह किया था कि सरकार में शामिल हो जाएं पर मार्क्सवादी इस बात पर सहमत नहीं थे। हालांकि भाकपा जिसके नेता ए. बी. वर्धन थे, उन्होंने कहा था कि अगर भाकपा तैयार होगी तो हम विचार का सकते है। पर भाकपा तैयार नहीं थी ।
मनमोहन सिंह ने जुलाई 2004 में पत्रकार परिषद में वामपंथी को महान देश भक्त बताया तथा उनके साथ मिलकर कार्य करने की बात कही। इधर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद तथा योजना आयोग में वामपंथी रूझान वाले बुद्धिजीवियों तथा सामाजिक कार्यकत्ताओं की नियुक्ति की गई । वामपंथी विचार के समर्थन से चलने वाली सरकार के साथ मुख्य विपक्षी भाजपा की दूरी - बढ़ती जा रही थी।
दिक्कत अधिक उस समय देखी गयी जब भाजपा के द्वारा नियुक्त सभी राज्यपालों को एक ही दिन में बर्खास्त कर दिया गया। इसमें वामपंथी रूझान तथा कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेताओं को उस पद पर भरे जाने के लिए प्रयोग के तौर पर देखा गया। इस कदम का सिर्फ विपक्ष ही नहीं बल्कि मीडिया के कई पक्षकारों ने भी विरोध किया तथा इंडिया टुडे ने लगातार तीन अंक में इस पर आवरण कथा छापकर इस कदम की समीक्षा की तथा नैतिक रूप से गलत कदम बताया हालांकि मनमोहन सिंह व्यक्तिगत रूप से किये भी प्रतिद्वंदी से मतभेद नहीं रखते थे पर अफसोस था कि वह एक चुने हुए प्रधानमंत्री नहीं थे। कही-न-कहीं पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मनमोहन सिंह को चुना था।
2005 ई. के अंत में मनमोहन सिंह सरकार ने कुछ ऐसा आर्थिक कदम उठाया जिससे आने वाले समय में ये अच्छे कमद साबित हो सकते थे। 2005 में इन्होंने आउटकम बजट की उपयोगिता पर चर्चा कर सभी योजनाओं के आउटपुट की सफलता का लेखा जोखा पेश करने की कोशिश की।
मनरेगा तथा सूचना के अधिकार के कारण मिलती लोकप्रियता ने मनमोहन सिंह सरकार को आर्थिक क्षेत्र में निवेश तथा कुछ और कल्याणकारी कार्यक्रम न करके ऐसी योजनाओं को अलीजामा पहनाना था जिससे राज कोषीय घाटा कम हो तथा सरकारी परिस्थिति में कम घाटा नजर आए।
सरकार ने गैस सब्सिडी पर पुनर्विचार करने की बात कही राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने यह सुझाव दिया कि गैस सब्सिडी जारी रखनी चाहिए पर सब्सिडी वाले सिलिंडर की सीमितता बना देनी चाहिए यानी प्रत्येक साल एक सीमा तक ही गैस सिलिंडर सब्सिडी से मिलेंगे। मनमोहन सिंह केबिनेट ने 8 सिलिंडर प्रत्येक साल सब्सिडी में देने की घोषणा की तथा बाद में इसे 12 कर दिया गया।
मनमोहन सिंह सरकार की प्राथमिकताएँ 2006 से बदलने लगीं। क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर परिस्थितियां बदल रही थीं। अब मनमोहन सिंह की सरकार के साथ यह प्राथमिकता थी कि 2005 ई में जो घरेलू स्तर पर कल्याणकारी योजनाएं आरंभ हुई थी तथा जिससे लोक प्रियता मिली थी वहीं परिपक्वता तथा रणनीति अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी दिखानी चाहिए। मनमोहन सिंह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की नीतियों तथा द्विपक्षीय संबंधों को बाजपेयी के नक्शे-कदम पर ही ले जाना चाहते थे।
देखा जाए तो पाकिस्तान के साथ जिस संबंध की आधारशिला बाजपेयी ने तैयार की वही मनमोहन सिंह ने बढ़ाई। मनमोहन सिंह सरकार ने पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने के लिए श्रीनगर मुजफ्फराबाद बस सेवा की शुरूआत की तथा इसे अमन सेतु नाम दिया। देखा जाए तो मनमोहन सिंह के अपने शब्दों में इसे Confidence Building Measures ( विश्वास निर्माण उपाय) का नाम दिया गया।
इस उपायों में मनमोहन सिंह की सरकार ने उच्च स्तरीय वार्ता, वीजा प्रतिबंधों में ढील तथा दोनों देशों के बीच क्रिकेट मेचों को फिर से आरंभ करना शामिल है। श्री नगर और मुजफ्फराबाद के बीच नई बस सेवा ने भी दोनों पक्षों को करीब लाने में मदद की है। पाकिस्तान और भारत ने भी आर्थिक मोर्चों पर सहयोग करने का फैसला किया। क्रिकेट कूटनीति एक अहम प्रयोग था ऐसे इस कदम का कोई बहुत बड़ा लाभ नहीं मिला। लेकिन परवेज मुशर्रफ की पाकिस्तान की पारी क्रिकेट को उत्साहित करने के लिए भारत की यात्रा एक महत्वपूर्ण घटना थी यह यात्रा राजनैतिक से अधिक सांस्कृतिक थी यह आमंत्रण डॉ. मनमोहन सिंह ने ही दिया था।
यह 2004 में आरंभ हुए विश्वास बहाली के उपायों का ही कदम था। यह एक सदभावना पैदा करने के लिए महान कदम था मुशर्रफ से मनमोहन सिंह की द्विपक्षीय संधि हुई तथा मुशर्रफ ने बाजपेयी से किये वायदे को दोहराया। परवेज मुशर्रफ बाजपेयी से ही मिले तथा उन्होंने बाजपेयी को भारत पाकिस्तान संबंध के बीच सक्रिय भूमिका निर्माण की अपील की। भारत-पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया को लगातार बनाए रखने के लिए यात्रा, क्रिकेट तथा वार्ता तीनों को मनमोहन सिंह ने अहम माना।
UPA सरकार ने अमेरिका के साथ संबंधों को एक नया रूप दिया। बाजपेयी के काल में जो यह ठोस प्रक्रिया आरंभ हुई थी उसको मनमोहन सिंह ने आगे बढ़ाया। बाजपेयी ने बुश को भारत आने का आमंत्रण दिया था। इसीलिए मनमोहन सिंह ने अमेरिका के राष्ट्रपति की भारत यात्रा को अधिक महत्व देकर फिर से बुश को निमंत्रण देकर भारत की यात्रा की अपील की।
2006 के मार्च में जॉर्ज बुश ने भारत की यात्रा की। यह यात्रा तीन दिनों की थी। इस यात्रा को बुश ने अपने जीवन की एक अतुलनीय यात्रा बताया तथा कहा कि हम सभी मुद्दों पर बात करेंगे तथा दो महान लोकतंत्र के लिए सामजिक संबंधों की जरूरतों को पूरा करेंगे।
भारत के साथ अमेरिका ने इस यात्रा में ऊर्जा, पर्यावरण, व्यापार तथा आतंकवाद के मुद्दों पर विभिन्न समझौते किए। भारत को अमेरिका के द्वारा परमाणु ऊर्जा तकनीक देने की वार्ता यही से आरंभ हुई तथा इस मुद्दे को प्राथमिकता देने की चर्चा की गई।
बुश की यात्रा के बाद भारत - अमेरिका असैन्य परमाणु करार पर बात आरंभ हुई वैसे 2005 में मनमोहन सिंह की अमेरिका की यात्रा के समय वॉशिंगटन में संयुक्त वक्तव्य पर चर्चा हुई तथा यह बयान दिया गया था कि अमेरिका भारत को असैनिक परमाणु ऊर्जा में सहयोग देगा।
यह कहा गया था कि अमेरिका अपने नियमों में तथा नीतियों में समायोजन करेगा तथा भारत के साथ पूर्ण असैनिक परमाणु ऊर्जा सहयोग और व्यापार के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को समायोजित करने के उद्देश्य से मिलेगा और सहयोगियों के साथ मिलकर काम करेगा।
इसी प्रकार भारत ने भी चरणबद्ध तरीके से असैनिक और सैनिक परमाणु सुविधाओं की पहचान और उन्हें अलग. -अलग करके स्वेच्छा से अपनी सुसैनिक पूर्ण परमाणु सुविधाओं को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसियों की देखरेख के अन्तर्गत रखने तथा परमाणु परीक्षण पर भारत की एकतरफा रोक को जारी रखने की प्रति अपनी बचनबद्धता व्यक्त की।
मार्च 2006 में राष्ट्रपति बुश की भारत यात्रा के समय एक पृथकचरण योजना पर सहमति हुई थी तथा इसके बाद भारत के साथ असैनिक परमाणु सहयोग की एक शर्त के तौर पर पूर्ण रक्षोपायों की आवश्यकता से छूट देते हुए अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 (क) (2) के तहत अमेरिकी कांग्रेस में समर्थन के लिए विधेयक पारित किया गया था।
अमेरिकी कांग्रेस में दोनों दलों यानी डेमोक्रेट्स और रिपब्लिक के बहुमत से 123 विधेयक पारित हुआ। इससे भा. रत-अमेरिका परमाणु समझौते का मार्ग प्रशस्त हो गया। जून 2006 और जुलाई 2007 के बीच वार्ता के 5 दौर हुए। इन वार्त्ताओं का उद्देश्य राजनीतिक समझ बुनना और जुलाई 2005 एवम् मार्च 2006 की बचनबद्धताओं और 17 अगस्त 2006 को संसद में प्रधानमंत्री के वक्तव्य में अलेखित शर्तो और मौखिक सिद्धांतो की एक कानूनी समझौते में शामिल करना था।
समझौते की विशेषताओं को देखें तो यह समझौता ऐसे दो देशों के बीच है जिनके पास उन्नत परमाणु प्रौद्यौगिकी है और दोनों पक्षकारों के समाज हित और लाभ को दर्शाते हैं। इसके अलावा इस समझौते का उद्देश्य भारत और अमेरिका के बीच पूर्ण असैनिक परमाणु ऊर्जा सहयोग में सहयोग करना है। इस समझौते में पूर्ण असैनिक परमाणु ऊर्जा सहयोग का प्रावधान है जिसमें परमाणु रिएक्टर तथा सवंर्द्धन और पुनर्संसाधन सहित परमाणु ऊर्जा ईंधन चक्र के मुद्दे शामिल हैं।
इस समझौते में मार्च 2006 के आपूर्ति आश्वासन और सुधारात्मक उपायों के प्रावधान का पूर्ण समावेश है। यह समझौता भारत के रिएक्टरों के जीवन काल में आपूर्ति में किसी बाधा से सुरक्षा के लिए परमाणु ऊर्जा के सामरिक भंडार के विकास का प्रावधान करता है।
यह समझौता परमाणु व्यापार, परमाणु सामग्री, उपकरणों, पुर्जो से संबंधित सामग्री और प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण तथा परमाणु ईंधन चक्र क्रियाकलापों में सहयोग का प्रावधान करता है।
यह समझौता हस्तांतरित सामग्री और उपकरणों के लिए अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अनुप्रयोग का प्रावधान करता है।
इस समझौते के महत्त्व को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 17 अगस्त 2006 को संसद में भाषण देते हुए कहा कि इस समझौते में तीन मौलिक प्रावधान शामिल हैं। इसमें विशेष रूप से प्रावधान होगा कि भारत का सामरिक परमाणु कार्यक्रम, त्रिस्तरीय परमाणु कार्यक्रम तथा अनुसंधान और विकास कार्य निर्बाध और अप्रभावित रहेंगे।
दोनो सरकारों की पारस्परिक संतुष्टि के अनुरूप समझौता होना, भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों के बदलते स्वरूप के प्रतीक के रूप हैं तथा इसमें विभिन्न क्षेत्रों का विकास शामिल है। ऐसा माना गया।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु डील पर बहस का जवाब देते हुए कहा कि यह समझौता ऊर्जा की कमी का समाधान करेगा तथा भारत को 2020 तक 20,000 डॅ ऊर्जा के उत्पादन में इसका प्रत्यक्ष योगदान होगा। 2006 में यह 3700 डॅ था। भारत के ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा का बढ़ता हिस्सा जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता समाप्त करेगा और भारत के उत्सर्जन में कमी लाएगा।
डॉ. मनमोहन सिंह के जवाब के बाद भारतीय राजनीति में 1 साल तक लगातार भारत-अमेरिका परमाणु डील छाया रहा तथा लगातार इस बात की नकारात्मकता तथा सकरात्मकता को जगह मिलती रही ।
मनमोहन सिंह की सरकार को समर्थन दे रहे वाम दलों को यह समझौता एकदम मंजूर नहीं था। लेफ्ट की आपत्ति कुछ प्रावधानों को लेकर थी । लेफ्ट परमाणु समझौते से जुडे. हाइड एक्ट के खिलाफ था । हाइड एक्ट को एक मुद्दा बना दिया गया। यह हाइड एक्ट भारत की संबंधित कोई अमेरिकी नीति नहीं थी पर इसे परमाणु समझौते का स्रोत जरूर कह सकते हैं।
हाइड एफ्ट अमेरिका का राष्ट्रीय कानून था जबकि 123 समझौते से भारत का लेना-देना था। 123 समझौता जिस अमेरिकी अधिनियम के तहत होता वह हाइड एक्ट में वर्णित था। हाइड एक्ट कांग्रेस सदस्य का नाम था जिसने अपने विधेयक में यह प्रावधान पारित करवा लिया कि अमेरिका अगर भारत के साथ द्विपक्षीय समझौते को रद्द करता है तो भारत को तकनीक और दूसरे उपकरणों की आपूर्ति बंद कर दी जाएगी।
वाम दलों को इसी बात से नाराजगी थी तथा इसके लिए भी लेफ्ट नाराज था कि दो साल पहले अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में भारत ने इरान के खिलाफ वोट दे दिया था। लेफ्ट ने इसे भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से जोड़कर देखा तथा यह कहा कि मनमोहन सरकार अमेरिका को खुश करने के लिए विदेश नीति की स्वतंत्रता को खत्म कर रही है ।
लेफ्ट ने यह आशंका व्यक्त की कि 123 समझौते लागू हो जाने के बाद ऐसे कई कदम मजबूरी में उठाने पड़ेंगे तथा भारत अमेरिका की हाथ की कठपुतली हो जाएगा। वामदलों का मानना था कि हाइड एक्ट में भारत की विदेश नीति और सुरक्षा से जुड़े मानकों को लेकर कई निर्देश हैं। क्योंकि यह एक्ट अमेरिका के लिए बाध्यकारी है, इसीलिए वह अपना हर कदम इन निर्देशों के अनुसार ही उठाएगा और इस तरह भारत की संप्रभुता खतरे में पड़ जाएगी।
हाइड एक्ट के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को हर साल कांग्रेस को यह रिपोर्ट देनी थी कि भारत एक्ट के प्रावधानों का पालन कर रहा है या नहीं। वाम दल इसे भारत के लिए फंदा समझ रहे थे । मनमोहन सरकार ने वामदलों को समझाने के लिए एक समन्वय समिति बनायी जिसका अध्यक्ष डॉ. प्रणव मुखर्जी को बनाया गया था। इस समन्वय समिति में यह तय हुआ कि अमेरिका तथा अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ जो भी बातचीत होगी वामदल तथा सरकार के बीच की समन्वय समीति को बताया जाएगा।
सरकार वामदलों के रवैये के कारण इन समझौते को जितनी तेजी से डील करने की सोच रही थी, उसमें थोड़ी सुस्ती कर दी।
वामदलों ने कई महीने पहले यह कह दिया था कि वह भारत - अमेरिका परमाणु समझौते के खिलाफ है और यदि इस दिशा में भारत सरकार अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेन्सी के साथ अंतिम दौर की बातचीत शुरू करती है तो हम समर्थन वापस ले लेंगे।
2008 के जुलाई में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 9-8 की बैठक में भाग लेने के लिए जापान गए। उन्होंने अपने साथ गए पत्रकारों को यह कहा कि हमारी प्राथमिकता अमेरिका के साथ परमाणु समझौता लागू करने में है। अगर वाम दलों को समर्थन वापसी में रूचि है तो वो ले सकते हैं। भारत सरकार को वर्तमान में कोई खतरा नहीं है। हमारी सरकार को चलाने के लिए हमारे पास पर्याप्त संसाधन हैं।
डॉ. मनमोहन सिंह के वापस आने के पहले ही वामदलों से बैठक की तथा समर्थन वापसी पर चर्चा की। पोलित ब्यूरो की बैठक के बाद भाजपा के तात्कालीन महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि “वाम मोर्चे ने बुधवार को राष्ट्रपति से समय मांगा है ताकि औपचारिक रूप से उन्हें संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार से समर्थन वापसी के बारे में कहा जा सके।"
प्रकाश करात ने कहा कि हमने प्रणव मुखर्जी को पत्र लिखकर यह सूचित कर दिया है कि पिछले साल 16 नवम्बर 2007 की समन्वय समिति की बैठक में फैसला हुआ था कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ बातचीत के बाद समिति को बताया जाएगा कि वहां क्या तय हुआ है? लेकिन सरकार की तरफ से ऐसा नहीं हुआ।
उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य पर कि "10 जुलाई 2008 को वामदलों को समझा दिया जाएगा" को हास्यपद बताया तथा कहा कि अब यह कहना हास्यपद है जब मनमोहन सिंह अपनी विदेश यात्रा में अंतर्राष्ट्रीय परमाण तु ऊर्जा एजेंसी के Board of Government के साथ बैठक करने वाले हैं।
10 जुलाई को प्रस्तावित समन्वय समिति की बैठक पर वामदलों का भरोसा अब नहीं रह गया तथा 9 जुलाई को ही वामदलों ने राष्ट्रपति से मिलकर समर्थन वापसी की घोषणा कर दी।
मनमोहन सिंह तथा कांग्रेस पार्टी इस घटना को भांप गयी थी तथा मुलायम सिंह यादव की पार्टी सपा से समर्थन का आश्वासन ले लिया था। सपा के तात्कालीन महासचिव अमर सिंह ने राष्ट्रपति (पूर्व) कलाम साहब से मिलकर यह सलाह ली थी कि परमाणु समझौते पर समर्थन करना चाहिए या नहीं।
कलाम साहब से हां सुनने पर मुलायम सिंह को एक नैतिक हथियार मिल गया था। 14 जुलाई को मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ विश्वास पर बहस हुई। न्च. 1 ने तब तक लोकदल तेलंगाना पर राष्ट्र समिति तथा निर्दलीय से समर्थन की बात की थी।
लोकसभा में विश्वास मत पर बहस के दौरान एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी। भाजपा के कुछ सांसद अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के सामने बैगों को ले आए जिसमें नोट (पैसे) भरे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की तरफ से विश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मत देने के लिए पैसे बांटे जा रहे है। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने उन सांसदों को निलंबित कर दिया।
मनमोहन सरकार सपा, लोकदल, जै, निदर्लीय के समर्थन से सरकार बचा ले जाने में सफल हो गयी। यह मनमोहन सिंह सरकार को एक मौका देना हुआ तथा परमाणु करार का रास्ता साफ हो गया। मनमोहन सिंह को अब बढ़त मिल चुकी थी। सामाजिक योजनाओं तथा भारत निर्माण जैसी परियोजनाओं में कार्य करने की ललक ने इस सरकार को बढ़त दिला दी थी लेकिन सही रूप में आगे की चुनौतियों का अंदाजा इस सरकार की नजर में नहीं था।
नवम्बर 2008 में यह एक ऐसी चुनौती थी जिसने पूरे सरकारी सुरक्षा तंत्र को हिला कर रख दिया। इस चुनौती का नाम 26, 11 का मुम्बई हमला था। इस हमले में 26 विदेशी नागरिक सहित 166 लोगों की मौत हो गई थी। पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने भयानक तबाही मचायी थी तथा यह मुठभेड़ 60 घंटे तक लगातार चलती रही।
ये हमलावर कराची से नाव के द्वारा मुम्बई में घुसे थे । इस नाव पर चार भारतीय सवार थे। जिन्हें किनारे तक पहुंचते पहुंचते खत्म कर दिया गया। रात के तकरीबन 8 बजे ये हमलावर कोलाबा के पास कफ परेड के मछली बाजार पर उतरे। वहां से वे 4 गुटों में बंट गए और टैक्सी लेकर अपनी मंजिलों की ओर रुख किया।
लोकल मराठी बोलने वाले मछुआरों को इन लोगों की आपाधापी को देखकर शक हुआ और उन्होंने पुलिस को जानकारी भी दी। लेकिन इलाके की पुलिस ने इस पर कोई खास ध्यान नहीं दिया। पुलिस ने इसे गंभीरता से ही नहीं लिया। ये हमलावर जो तीन समूह में बँटे थे, वो अलग-अलग अपने मिशन को अंजाम देने लगे।
एक समूह ने सबसे पहले दक्षिणी मुम्बई स्थित कोलाबा के लियोपोल्ड कैफ को निशाना बनाया तथा दो आतंकियों ने नरीमन हाउस को बनाया तो बाकी दो-दो की टोली छत्रपति शिवाजी टर्मिनल को तथा होटल ओबेरॉय तथा ताज होटल की तरफ बढ़ने लगे।
रात के करीब 9 बजे मुम्बई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर गोलीबारी की खबर मिली। मुम्बई के इस ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन के मेन हॉल में दो हमलावर घुसे और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इनमें एक 'अजमल कसाब' पकड़ा गया तथा जिसे फांसी दी गयी। दोनों के हाथ ।ज्ञ 47 राइफल थी तथा 15 मिनट में ही इन्होंने 52 लोगों को मार दिया तथा 109 लोगों को जख्मी कर दिया।
आतंकियों का यह खौफ सिर्फ छत्रपति शिवाजी टर्मिनल तक सीमित नहीं था। दक्षिणी मुम्बई की लियोपोल्ड कैफे भी उन जगहों में शामिल था जहां हमले हुए। वहां 10 लोग मारे गए जिसमें विदेशी भी थे।
10 बजकर 40 मिनट रात्रि में एक टैक्सी बम को उड़ाने की सूचना मिली तथा छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर 58 लोग मारे गए। ताज होटल में 6 धमाके किए गए तथा पहली ही रात अग्निशमन के अधिकारियों के करीब 200 बंदी वहां से निकाले गए।
होटल ओबेरॉय के ऑपरेशन खत्म करने में तीन दिन लग गये। यह 28 नवंबर की दोपहर को समाप्त हुआ तथा उसी दिन शाम को नरीमन हाउस खाली करा दिया गया। ताज होटल में 29 नवंबर को मुठभेड़ खत्म हुई तथा 9 आतंकवादियों को मार गिराया गया। एक आतंकवादी पकड़ा गया।
इन मुठभेड़ों में मुम्बई पुलिस के बहादुर अफसरों हेमंत करकरे, विजय सालस्कर तथा अशोक काम्टे जैसे अतुलनीय कर्मठों ने शहीदी दी।
यह हमला भारत की संप्रभुता के लिए शर्म वाली बात थी। तत्कालीन मोहन सरकार ने इस हमले को रक्षात्मक तरीके से झेला। इस कदम की आलोचना भी की गई पर सरकार की यहीं मंशा थी कि अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति को ध्यान में रखकर कोई निर्णय लिये जाए।
सरकार ने 26/11 के बाद राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन किया तथा गैर कानूनी गतिविधि निरोधक कानून बनाए । तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम की सलाह थी कि एन.आई.ए. को खुली छूट दी जाए।
सरकार के लिए यह हमला एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। सरकार ने कोई आक्रामक रुख नहीं अपनाया तथा आंतरिक रूप से खूफिया जांच तथा सुरक्षा को ही पुख्ता करने पर डटी रही। सरकार की आलोचना अभी तक इस बात के लिए होती है कि 26/11 के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहिए था।
इस हमले की दुनिया भर में निंदा की गई तथा तत्कालीन विपक्ष के नेता आडवाणी ने इसे भारत के लिए चुनौति बताया। अमेरिका के तत्कानीन नव निर्वाचित राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस हमल को कायराना हमला कहा तथा यह भी कहा कि अमेरिका और भारत जैसे देशों को मिलकर एक मजबूत प्रयास करना चाहिए जिससे आतंकवादी घटनाओं तथा आतंक के खिलाफ एक पक्ष का निर्माण हो सके।
मुम्बई हमले के कुछ दिनों बाद ही 2009 आया जब लोग इस हमले को भूलकर आम चुनाव की चर्चा करने लगे। 2009 का आम चुनाव एक प्रकार के न्च1 की 5 साल की कार्यशैली और मनमोहन सिंह के नेतृत्व के लिए अति संवेदनशील चुनाव था।
2009 का आमचुनाव फिर से मुख्य रूप से NDA और UPA के बीच ही मुकाबले के रूप में घटित होना था। इस चुनाव में ऐसी घटना नहीं घटी जिसे चुनाव के लिए मुद्दे बनाए जाएं। मुम्बई हमले को लेकर चर्चा होती थी पर सामान्य रूप से आक्रमकता खत्म हो गयी थी तथा अब फोकस UPA की कार्यशैली तथा भाजपा नीत छक। के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार आडवाणी के लिए ही लोग वोट डालने वाले थे।
कांग्रेस ने न्। में अपने दलों को समन्वित करके रखा ही थी। इसने तृणमूल कांग्रेस के नेता ममता बनर्जी से गठबंधन कर लिया था वामदल अब विपक्षी था। अधिकतर जगह मुकाबले त्रिकोणीय होने वाले थे। लेकिन मुख्य रूप से छ। और न्च के बीच मुकाबला रहा। भाजपानीत एन. डी. ए. की तरफ से इस पर आडवाणी जी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। भाजपा के पास ऐसे कई मुद्दे थे जिससे वह बढ़त ले सकती थी परंतु मनमोहन सरकार की मनरेगा तथा भारत निर्माण जैसी योजनाओं ने लोगों में एक विश्वास पैदा कर दिया था। यह चुनाव भाजपा के नेता आडवाणी के नेतृत्व में अंतिम चुनाव था।
2009 का आम चुनाव बेहद अच्छे तरीके से चुनाव आयोग के द्वारा कराया गया। चुनाव परिणाम लगभग आवश्यकता के तथा संभावना के मेल से आया। संभावना यह जतायी जा रही थी कि मनमोहन सिंह सरकार को एक बार और अवसर मिलने वाला है। संभावना सच साबित हुई तथा 1991 के बाद पहली बार कांग्रेस की 200 के ऊपर लगभग 206 सीटें आयी। वास्तविकता में यह जीत मनमोहन सिंह की जीत थी पर अफसोस कि इस जीत को सोनिया गांधी तथा युवा उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जीत बताए जाने के प्रत्यन होने लगे। मनमोहन सिंह को इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह चुपचाप काम करने वाले प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते थे पर यह एक कमजोर कड़ी के रूप में मीडिया में प्रसारित हुआ तथा यह कहा जाने लगा कि मनमोहन सिंह एक कठपुतली प्रधानमंत्री हैं। असली पद सोनिया गांधी तथा कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के पास है।
2009 की सरकार बनी तथा मनमोहन सिंह फिर एक बार प्रधानमंत्री बने । वह नेहरू, अटल जी, और इंदिरा गांधी के बाद चौथे प्रधानमंत्री बने। 2009 की सरकार में कुछ नये गठबंधन सहयोगी को कांग्रेस के साथ सरकार में शामिल देखा जा सकता था। ममता बनर्जी को रेल मंत्री बनाया गया। जिस पद पर 2004 से 2009 तक लालू प्रसाद रहे थे। 2009 वाली UPA II सरकार में लालू प्रसाद और राम विलास पासवान जैसी पार्टियों की हार हुई थी। इसीलिए मंत्रिमंडल में इन्हें शामिल नहीं किया गया।
अब UPA II में कांग्रेस के साथ सबसे बड़ी पार्टी दूसरे स्थान पर तृणमूल कांग्रेस तथा डी. एम.के. थी। डी.एम. केको संचार विभाग मिला तथा पी.मे.के को स्वास्थ्य विभाग मिला। 2009 के बाद भारत में अन्तर्राष्ट्रीय तौर पर कुछ बड़े आयोजन होने थे।
इधर भाजपा को सिर्फ 114 सीटें आयी थी जो 1991 की राम लहर से भी कम थी। भाजपा के कई सहयोगी पहले ही चले गए थे फिर भी अकाली दल, बीजद, शिवसेना तथा पद (यू) जैसे दलों का विश्वास भाजपा में अभी भी था। 2004 की सरकार से यह मनमोहन सरकार कुछ भिन्न सरकार थी। 2010 के राष्ट्रमण्डल खेल का आयोजन एवं महाआयोजन था तथा दिल्ली सरकार की जिम्मेवारी प्रत्यक्ष रूप से इससे जुड़ी हुई थी। राष्ट्रमण्डल खेल के लिए भारत की तरफ से सुरेश कलमाड़ी (जो कांग्रेस के नेता थे) को आयोजन समिति का प्रमुख बनाया गया था।
यह आयोजन विभिन्न तरीके से एक तरह की परीक्षा थी कि सरकार जैसे इसका प्रबंध करती है। 2010 के अक्टूबर महीने में राष्ट्रमण्डल खेल का आयोजन हुआ। परंतु जब कैग रिपोर्ट आयी तो इस आयोजन में कई वित्तीय अनियमितताएं विश्व स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा कम करने वाली थी।
इधर 2010 में ही अमेरिकी राष्ट्रपति (तत्कालीन) बराक ओबामा की भारत यात्रा हुई तथा मनमोहन सिंह के साथ द्विपक्षी वार्ता में विभिन्न मुद्दों पर कई फैसले लिए गए तथा परमाणु संधि पर एक बार फिर विश्वास जताया गया। बराक ओबामा ने मुम्बई की भी यात्रा की तथा भारत-अमेरिका संबंध को एक नयी दिशा दी।
UPA II सरकार को घरेलू चुनौतियों से अधिक मुकाबला करने की चुनौती थी बनिस्पत किसी बाहरी चुनौती के। 2010 के बाद सरकार का पतन आरंभ हो गया।
2011 एक ऐसा साल था जो मनमोहन सरकार के लिए एक फैसले वाला साल साबित हुआ। यह साल देश के जनमानस को बदलने वाला साल साबित हुआ। 2010 की कैग रिपोर्ट ने कुछ ऐसी रिपोर्ट सार्वजनिक की जिनसे जनता में एक नयी लहर तथा नकारात्मक सोच भी मनमोहन सरकार के खिलाफ बनी। कैग रिपोर्ट में यह दर्शाया गया था कि 25 स्पैकट्रम निलामी में घोर अनियमितता बरती गयी है और जहां सरकार को 1.30 लाख करोड़ से 2.5 लाख करोड़ के बीच लाभ होना चाहिए था, वह औने-पौने में निलाम कर दिया गया। उसी तरह कोयला खदान आवंटन में भी किसी नफा-नुकसान को आँका नहीं गया तथा अपनी पैरवी तथा पहुंच से इसमें लूट हुई ।
राष्ट्रमंडल घोटाला तो पहले से था ही। 2ळ, कोयला तथा कॉमन वेल्थ घोटाले ने सरकार की छवि को ठेस पहुंचायी। इन घोटालों के बाद जनता की व्यग्रता को तथा गुस्से को झते हुए सरकार विपक्ष की 25 मामले में JPC (Jointn parliamentry commitee) की मांग को मंजूर कर लिया तथा यह कहा कि कोई भी अनियमितता की जाँच निष्पक्ष रूप से की जाएगी। सरकार के खिलाफ माहौल को देखते हुए प्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे ने अगस्त 2011 में जनलोकपाल विधेयक की मांग करते हुए रामलीला मैदान में अनशन शुरू कर दिया। सरकार को कतई संभावना नहीं थी कि अन्ना आंदोलन इतना विशाल हो जाएगा। अन्ना हजारे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध समाजसेवी के तौर पर जाने जाते थे तथा उन्होंने सेना में भी काम किया था। अतः इनकी पहचान एक इमानदार तथा कर्मठ समाज सेवी की थी। अन्ना हजारे का साथ देने में अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, संतोष हेगडे, प्रशांत भूषण कुमार विश्वास जैसे अनेक क्षेत्रों के विद्व न तथा सक्रिय सदस्य थे।
अन्ना हजारे का आंदोलन भ्रष्टाचार तथा सड़े तंत्र के खिलाफ एक आंदोलन था। अन्ना ने 14 दिनों तक अनशन किया तथा सरकार तथा संसद तक अपनी बात पहुंचा दी। सरकार ने 14 दिनों में उनकी बात मान ली तथा जन लोक पाल विधेयक को प्रस्तावित कर पास कर दिया। यह आंदोलन एक मोड़ साबित हुआ जिसने न्च की नींव हिला दी। मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ पूरे देश में एक नया आवेग उत्पन्न हो गया तथा सबसे बड़ी बात की इसका नेतृत्व समाज सेवी कर रहे थे जो चुनाव में नहीं जीतना चाहते थे। लोगों को इस कारण अधिक विश्वास हुआ।
अन्ना आंदोलन के शांत होने के बाद दिसम्बर 2011 में दिल्ली में एक और हृदय विदारक घटना घटी जिसमें एक बच्ची जो घर लौट रही थी उसके साथ कुकर्म किया गया तथा हत्या करने की कोशिश की गई। पूरे देश में निर्भया केस के रूप में यह फैल गया तथा लोगों में एक गुस्सा उत्पन्न हो गया।
निर्भया काण्ड के कारण सरकार को इसी साल एक बार और बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा तथा यह एक प्रकार की नकारात्मक घटना ही हुई मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ । अन्ना हजारे और निर्भया काण्ड के बाद जनता के बीच एक नयी सोच मगर न्च पर सरकार के विरोध में विकसित होने लगी तथा कुछ और लोग इसका लाभ उठाने की कोशिश करने लगे। देखा जाए तो सरकार के अंदर भी इन परिस्थितियों को डील करने की कोई इच्छा शक्ति नहीं दिखी तथा मंत्री स्तर पर एक दूसरे से समन्वय नहीं बन पा रहा था।
बाबा रामदेव ने अपने संस्था स्वाभिमान मंच की तरफ से रामलीला मैदान में फिर से एक आंदोलन आरंभ करने की सोची तथा सरकार ने अपने सुरक्षा बलों के द्वारा एक रात में ही इसे समाप्त करवा दिया। ऐसा नहीं था कि सरकार ने इन वर्षो में कुछ अच्छा नहीं किया। सरकार अपने स्तर से कुछ अच्छे विधेयक लाई जो जनता के कल्याण से जुड़े हुए थे जिसमें जनलोककल्याण विधेयक तथा महिला आरक्षण विधेयक को आंका जा सकता है।
इसके अलावा ध्क्क में निवेश को लेकर भी विधेयक था जो आर्थिक क्षेत्र में एक नयी कोशिश कहा जा सकता है। सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम तथा 'आधार' के लिए कदम उठाए । सरकार की तरफ से भरसक यह दिखाने की कोशिश हुई कि काम करने में कोई कोताही नहीं बरती जा रही है। मनमोहन सिंह ने 2011 के अगस्त में पत्रकार परिषद से मिलते हुए कहा कि मेरी सरकार अपना कार्य कर रही है तथा मेरे प्रधानमंत्री काल की गणना करने की जिम्मेदारी हम आनेवाले इतिहास पर छोड़ते हैं।
वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने 2013 में एक लेख के जरिये मनमोहन सरकार की छवि को लेकर सवाल पैदा किए। कुलदीप नैयर ने यह कहा कि कहीं न कहीं मनमोहन सिंह की UPAII सरकार की सरकार ‘Policy Paralysis' हो गई है। इसमें नीति बनाने को लेकर कोई अंतर विभागीय समन्वयन नहीं है और हो सकता है कि इसका सबसे बड़ा कारण मंत्रियों के प्रधानमंत्री को रिपोर्ट के बदले कांग्रेस नेतृत्व को रिपोर्ट करने में अधिक दिलचस्पी हो।
इस लेख की वास्तविकता के कारण भी थे। मीडिया जगत में यह बात फैल गयी थी कि मनमोहन सिंह की सरकार में वरिष्ठ मंत्रियों के बीच अहंकार युद्ध है तथा एक दूसरे के विभाग का कोई आदर नहीं करना चाहता। यह बात तब और साबित हो गई जब 2012 में वरिष्ठ नेता तथा मंत्री जिन्हें सरकार के संकट मोचक के तौर पर जाना जाता था यानी प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति बना दिया गया।
2012 के जुलाई के बाद समन्वयक के रूप में काम करने वाले प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति भवन चले गए थे। अब मनमोहन सिंह सरकार में सब कुछ ठीक नहीं था। घोटालों, फाइलों के पास होने में देरी तथा समन्वय की कमी को लेकर कई सवाल उठाए जाने लगे।
इधर कांग्रेस भी 2007 के समझौता ब्लास्ट के बाद अपनी राजनीति को एक नयी धार देनी शुरू कर दी तथा सच्चर कमिटी के बाद मुसलमानों को खुश करने के लिए 'भगवा आतंकवाद' का राग छेड़ा तथा ध्रुवीकरण के प्रयास आरम्भ कर दिए। कई हिन्दूवादी नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया तथा एक नये राजनीतिक प्रयोग करने की कोशिश आरंभ हो गयी थी।
इधर पर्यटन मंत्रालय के द्वारा एक हलफनामे में अयोध्या के मामले को लेकर एक नया शिगुफा छेड़ दिया गया कि “राम एक मिथक है।" इस परिवर्तन से विपक्ष को एक नया मुद्दा मिल गया। 2013 में एक नयी राजनीति की शुरूआत हुई। मनमोहन सिंह को यह पता था कि 2014 के बाद वह प्रधानमंत्री नहीं रहने वाले। मनमोहन सिंह ने कभी अपनी सीमा नहीं लांघी तथा खुलकर नकारात्मक भाषा का प्रयोग किसी मामले में नहीं किया।
2013 में मनमोहन सिंह सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम खाद्यान्न के मामले में पारित किया तथा इसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम कहा। इसमें गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए 1 रूपये किलो का अनाज, 2 रूपये किलो गेहूँ तथा 3 रूपये किलो चावल देने की बात कही गई थी। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा प्रावधान में गरीब परिवार को प्रत्येक व्यक्ति पर 5 किलो अनाज प्रति महीने देने की स्थिति को रेखांकित किया गया था।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम की स्थिति एक गेमचेंजर हो सकती थी पर इन घोटालों की चर्चा ने भारत के मध्यम वर्ग की सोच को बदल दिया था। अब जनता सोचने लगी कि मनमोहन सिंह सरकार के विपक्ष में बहुत मजबूत लहर है। इधर मुख्य विपक्षी भाजपा में भी विभिन्न सक्रियताएं देखी जा रही थी। 2013 के जून में गोवा में हुए सम्मेलन में राजनाथ सिंह जो तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष थे, ने कहा कि “2014 में आम चुनाव जो होंगे, उसके प्रचार प्रमुख भाजपा की तरफ से नरेन्द्र मोदी बनाए जाएंगे। नरेन्द्र मोदी तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री थे।
यह भाजपा की तरफ से दूसरी पीढ़ी के नेताओं को शीर्ष सत्ता सौपने की सबसे बड़ी पहल थी। इस घोषणा के बाद छक्। के बिहार में सहयोगी तथा जनता दल (यू) के नेता मुख्यमंत्री, बिहार नीतिश कुमार ने छक् । छोड़ने का फैसला लिया। BJP ने अपनी नीति नहीं बदली तथा नरेन्द्र मोदी जी को और भी महत्वपूर्ण पद देने का मन बना चुकी थी। सितम्बर 2013 में भाजपा ने घोषणा कर दी कि 2014 के आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होंगे।
अब भाजपा की तरफ से एक नयी शुरूआत कर दी गयी थी। उधर न्। पट की सरकार में एक तरह से सक्रियता कम हो गयी थी। 2011 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन गई थी। उधर प्रणव मुखर्जी राष्ट्रपति बन गए थे। कोई यह नहीं कह सकता कि 2014 में भाजपा के नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने न्च की तरफ से कौन नेता होगा? 2014 के चुनाव हुए तथा भाजपा की जीत हुई जिसकी चर्चा हम अगले अध्याय में करेंगे। मनमोहन सिंह की पहचान एक महान अर्थशास्त्री की रही तथा उन्होंने एक नये भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाई।
एक निर्वाचित प्रधानमंत्री न होने के बावजूद उन्होंने 2004 से 2009 के बीच एक काम करने वाली सरकार का नेतृत्व किया। उन्होंने एक गरीब परिवार से आगे आकर देश का नेतृत्व किया पर यह भी वास्तविकता है कि उनका दूसरा कार्यकाल कई विवादों तथा घोटालों के कारण चर्चित रहा। अटल जी के बाद मनमोहन सिंह को गठगंधन की सरकार को दो कार्यकाल पूर्ण करने के लिए हमेशा याद किया जाएगा। सभी सरकारों की अपनी कार्यक्षमता है तथा इतिहास में सबकी अलग-अलग भूमिका होती है।
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