पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, पाल, परमार, कलचुरि, प्रतिहार, गहड़वाल एवं चोलों का इतिहास एवं प्रशासन

पल्लव, चालुक्य, राष्ट्रकूट, पाल, परमार, कलचुरि, प्रतिहार, गहड़वाल एवं चोलों का इतिहास एवं प्रशासन
> पल्लव काल : धार्मिक आन्दोलन
पल्लव काल में धार्मिक आन्दोलन का सूत्रपात नयनार व अलवार संतों द्वारा किया गया. नयनार संत शैव धर्म के पोषक थे तथा अलवार वैष्णव के. पल्लव राजाओं का काल इन दोनों प्रकार के भक्ति आन्दोलनों का उल्लेखनीय काल रहा है. यह आन्दोलन छठी सदी से 9वीं सदी तक चलता रहा. इस काल में दोनों सम्प्रदायों में अनेक सन्त हुए जिनके प्रवचनों के प्रभाव में आकर पल्लव शासकों ने इनको संरक्षण प्रदान किया तथा इन्हें जनता ने अपनाया.
पल्लव शासनकाल में नयनार सन्तों द्वारा शैव धर्म का प्रचार-प्रसार किया गया. इन संतों की संख्या 63 बताई गई है जिनमें अप्पार, संबंदर, सुन्दरमूर्ति, मणिक्कवाचगर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं. इनके गीतों को 'देवारम' नामक पुस्तक में संगृहीत किया गया है. अप्पार, जोकि महेन्द्र वर्मन प्रथम के काल में हुए थे उन्होंने दास भाव से ईश्वर की सेवा की तथा एक निष्ठावान शैव बन गए. संबंदर ने बौद्ध आचार्यों को शास्त्रार्थ में पराजित किया. सुन्दर मूर्ति, जोकि अल्पायु थे, को उनकी अनन्य शैव भक्ति के कारण उन्हें ईश्वर मित्र की उपाधि प्रदान की गई. इसी प्रकार मणिक्वागचर ने श्रीलंका के बौद्धों को वाद-विवाद में हराया तथा अनेक भक्ति गीत लिखे. उनके गीतों का संकलन 'तिरुवाशगम' में किया गया है जिसमें प्रेम की प्रधानता है.
सभी शैव सन्तों ने भजन-कीर्तन, शास्त्रार्थ एवं उपदेशों आदि के माध्यम से जनता में शैव धर्म का जोरदार अभियान छेड़ा तथा जाति-पाँति को त्यागकर सभी वर्गों के लोगों को भक्ति का उपदेश दिया, जिसके फलस्वरूप लोगों व शासकों द्वारा शैव धर्म को इस काल में खूब प्रश्रय दिया गया.
नयनार सन्तों की भाँति ही इस काल में वैष्णव भक्ति की धारा को दक्षिण में प्रवाहित करने का कार्य अलवार सन्तों द्वारा किया गया. इनकी संख्या बारह थी जिनमें भूतयोगी, सरोयोगी, महायोगी, भक्तिसार, मधुर कवि आदि मुख्य थे. प्रारम्भिक अलवार सन्तों में पोडिय, पोगोई तथा पेय के नाम मिलते हैं, जो मल्लई, काँची व मामल्लपुरम् के निवासी थे. इनके उपदेश सीधे एवं सरल थे. महेन्द्र वर्मन प्रथम के समय तिरुमलिराई हुए जिन्होंने अपने भक्ति गीतों के माध्यम से बौद्ध एवं जैन धर्मों का खण्डन किया. एकमात्र स्त्री अलवार संत अंदाल का नाम हमें इस काल में मिलता है, जो मध्यकालीन मीरा की तरह कृष्ण की प्रेम दीवानी थी. अलवार सन्तों की अन्तिम कड़ी के रूप में नम्मालवार और उनके शिष्य मधुर कवि का नाम मिलता है. इन्होंने बड़ी संख्या में भक्ति गीत लिखे जिनमें दार्शनिक चिन्तन का स्पष्ट भाव दृष्टिगोचर होता है.
अलवार सन्तों ने प्रेम भक्ति द्वारा ही आत्मसमर्पण को ही सर्वाधिक महत्व प्रदान किया. अलवार सन्तों के प्रभाव में आकर ही कई पल्लव शासकों ने वैष्णव धर्म अपना लिया और उसे राजधर्म बनाकर अपना संरक्षण प्रदान किया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि पल्लवकालीन समाज में नयनार एवं अलवार सन्तों द्वारा छेड़ा गया भक्ति आन्दोलन बड़े तीव्र वेग से पूरे दक्षिण भारत में प्रवाहित हुआ और बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म को दक्षिण भारत में हिला दिया. इस काल में शैव तथा वैष्णव धर्म से सम्बन्धित अनेक मन्दिरों का निर्माण किया गया, जोकि उस काल की धार्मिक गतिविधियों के केन्द्र थे.
> पल्लव कौन थे ?
पल्लव कौन थे ? यह जानना इतिहास के शोधार्थी के लिए समस्या का विषय है. जहाँ तक प्राचीनता का प्रश्न है दक्षिण भारत के तीनों राजवंशों चेर, चोल और पाण्ड्य के इतिहास में इनका कोई उल्लेख नहीं है. कुछ इतिहासकारों के अनुसार पल्लव उत्तर-पश्चिम भारत के पहलवों की शाखा के वंशज थे. इस मत के समर्थन में केवल इतना ही है कि दोनों के नामों में समानता है. इसके अतिरिक्त कुछ नहीं. दूसरे मत के अनुसार पल्लव दक्षिण भारत के मूल निवासी थे और कुरुम्ब, कल्लर, मारवार और अन्य जनजातियों से सम्बन्धित थे. एक अन्य मत के अनुसार कीलीवलवन चोल और मनीपल्लवरम की नाग राजकुमारी पीलीवलाई से उत्पन्न पुत्र ईलम तिराईयम ने तोंडमण्डलम में पल्लव राजवंश की स्थापना की डॉ. कृष्णास्वामी अयंगर के अनुसार संगमकाल में पल्लवों को तोंडाय्यार के नाम से जाना जाता था, जो सातवाहनों के अधीनस्थ नागवंश की सन्तति थे. के. पी. जयसवाल के अनुसार न तो वे विदेशी थे और न ही द्रविड़ वे उत्तर भारत के किसी शाही परिवार से थे, जो दक्षिण में बस गया था. तालागुण्डा अभिलेख में पल्लवों को क्षत्रिय कहा गया है.
इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि पल्लवों के मूल स्रोत के विषय में निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता.
> पल्लव साहित्य
संस्कृत एवं तमिल दोनों भाषाओं की दृष्टि से पल्लव काल उल्लेखनीय उन्नति का काल रहा है. पल्लव नरेश स्वयं उच्चकोटि के विद्वान् थे एवं अपने दरबार में विद्वानों, कवियों को आश्रय प्रदान करते थे. 'मत्तविलास प्रहसन' नामक नाटक की रचना स्वयं पल्लव शासक महेन्द्र वर्मन प्रथम ने की थी. इस नाटक में कापालिकों एवं बौद्ध भिक्षुकों की हँसी उड़ाई गई है. महाकवि भारवि, जोकि 'किरातार्जुनीयम्' के रचयिता थे उसकी राजसभा की शोभा बढ़ाते थे. महेन्द्र बर्मन का उत्तराधिकारी नरसिंह वर्मा भी महान् विद्या-प्रेमी था उसकी राजसभा में दण्डी जिन्होंने 'दशकुमारचरित' एवं 'काव्यादर्श' की रचना की थी, निवास करते थे. पल्लव शासकों लेख विशुद्ध संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं.
संस्कृत के साथ-साथ इस काल में तमिल भाषा की भी उल्लेखनीय प्रगति हुई. अलवार तथा नयनार सन्तों ने तमिल भाषा में हजारों गीतों की रचना कर तमिल साहित्य की श्रीवृद्धि की.
पल्लव शासकों की राजधानी उस समय विद्या का प्रमुख केन्द्र थी, जहाँ एक संस्कृत महाविद्यालय (घटिका) था. महाभारत का नियमित पाठ यहाँ के एक मण्डप में होता था तथा ब्राह्मण परिवार वेदाध्ययन किया करते थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि पल्लवकाल में न केवल संस्कृत भाषा, बल्कि तमिल भाषा का उल्लेखनीय विकास हुआ. वस्तुतः पल्लव काल साहित्य समृद्धि का काल था. शै
> पल्लवकाल की कला लियाँ
प्रसिद्ध कलाविद् पर्सी ब्राउन ने पल्लव वास्तुकला के विकास की शैलियों को चार भागों में विभक्त किया है जिनका क्रमशः विवरण निम्नलिखित है
(1) महेन्द्र शैली (610–640 ई.) – इस शैली के मन्दिरों को ‘मण्डप' कहा जाता है, जो कठोर प्रस्तर को काटकर गुहा मन्दिर के रूप में बनाए गए हैं. ये मण्डप स्तम्भ युक्त बरामदे हैं जिनकी पिछली दीवार में एक या अधिक कक्ष बनाए गए हैं. मण्डप के बाहर बने मुख्य द्वार पर द्वारपालों की मूर्तियाँ बनी हैं, जो कलात्मक दृष्टि से उत्कृष्ट कोटि की हैं. मन्दिर के सामने स्तम्भों की एक पंक्ति मिलती है. प्रत्येक स्तम्भ 7 फीट ऊँचा है. स्तम्भ प्रायः चौकोर हैं जिनके ऊपर के शीर्ष सिंह आकार के हैं. महेन्द्र शैली के मण्डपों में महाबलीपुरम का त्रिमूर्ति मण्डप, पल्लवरम का पंच पाण्डव मण्डप, महेन्द्रवाड़ी का महेन्द्र विष्णु मण्डप, त्रिचनापल्ली का ललितांकुर पल्वेश्वर गृह मण्डप आदि विशेष उल्लेखनीय हैं. इस शैली के प्रारम्भिक मण्डप सादे तथा अलंकरण रहित हैं, किन्तु बाद के मण्डपों को अलंकृत करने की प्रवृत्ति दिखाई देती है. पञ्च पाण्डव मण्डप में छः अलंकृत स्तम्भ लगाए गए हैं. महेन्द्र वर्मा प्रथम के बाद भी कुछ समय तक इस शैली का विकास होता रहा.
(2) मामल्ल शैली – यह शैली नरसिंह वर्मा महामल्ल के काल में विकसित हुई तथा इसके अन्तर्गत मण्डप तथा एकाश्मक मन्दिर जिसे 'रथ' कहा गया, ये दो प्रकार के स्मारक बने. ये सभी स्मारक मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) में हैं. यहाँ मुख्य पर्वत पर दस मण्डप बनाए गए हैं. इनमें आदि वराह, महिषमर्दिनी, पंच पाण्डव, रामानुज मण्डप आदि विशेष उल्लेखनीय हैं. इन्हें विविध प्रकार से अलंकृत किया गया है. मण्डपों का आकार प्रकार बड़ा नहीं है तथा स्तम्भ क पतले व लम्बे बने हैं. इनके ऊपर पद्म, कुम्भ, फलक आदि अलंकरणों का निर्माण किया गया है. स्तम्भों को मण्डपों में अत्यन्त अलंकृत ढंग से संयोजित किया गया है. मण्डप अपनी मूर्तिकारी के लिए प्रसिद्ध हैं. इनमें महिषमर्दिनी, अनन्तशायी विष्णु, त्रिविक्रम आदि की मूर्तियाँ उल्लेखनीय हैं. आदि बाराह मण्डप में राजपरिवार के दो सदस्यों का जहाँ अंकन किया गया है वहीं पञ्च पाण्डप मन्दिर में गोवर्धनधारी कृष्ण का दृश्य अत्यन्त मनोहारी है.
मामल्ल शैली की दूसरी रचना रथ अथवा एकाश्मक मन्दिर इन्हें कठोर चट्टानों से काटकर एक ही पत्थर से बनाया गया है. रथ मन्दिरों का आकार-प्रकार अन्य कृतियों की अपेक्षा छोटा है. रथों का आकार 42' x 35' × 40' का है. प्रमुख रथ द्रोपदी, नकुल, सहदेव, अर्जुन, भीम, धर्मराज, गणेश, पिण्डारी आदि रथ मन्दिर हैं. 
इन रथ मन्दिरों में सर्वश्रेष्ठ रथ धर्मराज रथ है जिसमें पिरामिड के आकार का शिखर बनाया गया है. मध्य में वर्गाकार कक्ष तथा नीचे स्तम्भ युक्त बरामदा है. पर्सी ब्राउन के शब्दों में, इस प्रकार की योजना न केवल अपने में एक प्रभाव पूर्ण निर्माण है, अपितु शक्तियों से परिपूर्ण होने के साथ-साथ सुखद रूपों तथा अभिप्रायों का भण्डार है. भीम, सहदेव तथा गणेश रथों का निर्माण चेत्य ग्रहों जैसा है. वहीं द्रोपदी रथ नितान्त साधारण है. 
मामल्ल शैली के रथ अपनी मूर्ति कला के लिए प्रसिद्ध हैं, सभी रथों पर देवी-देवता, जैसे— दुर्गा, इन्द्र, शिव, गंगा, पार्वती आदि की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं. इन रथों को 'सप्त पैगोड़ा' कहा गया है. इन रथ मन्दिरों को द्राविड़ शैली का अग्रदूत कहा जा सकता है.
(3) राजसिंह शैली (674-800 ई.) – इस शैली का प्रारम्भ नरसिंह वर्मन द्वितीय राजसिंह द्वारा किया गया जिसमें पत्थर, ईंट आदि की सहायता से इमारती मन्दिरों का निर्माण किया गया. इस शैली के तीन मन्दिर महाबलीपुरम से प्राप्त होते हैं; यथा—शोर मन्दिर, ईश्वर मन्दिर तथा मुकन्द मन्दिर. शोर मन्दिर इस शैली का प्रथम उदाहरण है. काँची के कैलाश मन्दिर, बैकुण्ठ पेरुमाल का मन्दिर इस शैली के अन्य उदाहरण हैं.
महाबलीपुरम् के समुद्र तट पर स्थित शोर मन्दिर पल्लव कलाकारों की कारीगरी का अद्भुत नमूना प्रस्तुत करता है. मन्दिर का निर्माण एक विशाल प्रांगण में किया गया है. इसका गर्भगृह पश्चिम की ओर है तथा चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है. दीवारों पर गणेश स्कन्द, गज, शार्दूल आदि की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं. यह द्राविड़ वास्तु की सुन्दर रचना है.
काँची का कैलास मन्दिर राजसिंह शैली के चरम उत्कर्ष को व्यक्त करता है. इस मन्दिर की विशेषताएँ परिवेष्ठित प्रांगण, गोपुरम स्तम्भयुक्त मण्डप, विमान आदि का निर्माण एक साथ किया गया है. इसके निर्माण में ग्रेनाइट तथा बलुआ पत्थर दोनों का प्रयोग किया गया है. इस मन्दिर में शैव सम्प्रदाय एवं शिव लीलाओं से सम्बन्धित अनेक सुन्दरसुन्दर मूर्तियाँ अंकित हैं, जो उसकी शोभा को द्विगुणित करती हैं.
परमेश्वर वर्मन द्वितीय के समय में निर्मित बैकुण्ठ पेरुमाल का मन्दिर है. यह भगवान् विष्णु का मन्दिर है जिसमें प्रदक्षिणायुक्त गर्भगृह एवं सोपान युक्त मण्डप है. मन्दिर का विमान वर्गाकार एवं चार तल्ला है. मन्दिर की भीतरी दीवारों पर युद्ध, राज्याभिषेक, अश्वमेध, उत्तराधिकार चयन, नगर जीवन आदि दृश्यों का अत्यन्त सुन्दर ढंग से अंकन किया गया है. मन्दिर में भव्य एवं आकर्षक स्तम्भ लगे हैं. पल्लव वास्तुकला का विकसित स्वरूप इस मन्दिर में दिखाई देता है.
(4) नन्दि वर्मन शैली (800-900 ई.) — इस शैली के अन्तर्गत अपेक्षाकृत छोटे मन्दिरों का निर्माण किया गया. इसका उदाहरण काँची के मुक्तेश्वर एवं मातंगेश्वर मन्दिर, ओरगडम का बड़मल्लिश्वर मन्दिर, गुड्डिमल्लम का परशुरामेश्वर मन्दिर आदि हैं. काँची में इस शैली के प्राचीनतम नमूने मिलते हैं. इसमें प्रवेश द्वार पर स्तम्भ युक्त मण्डप बने हैं. इसके बाद के मन्दिर चोल शैली से प्रभावित एवं उसके निकट हैं.
इस प्रकार स्पष्ट है कि पल्लव राजाओं का शासनकाल एवं स्थापत्य की उन्नति के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध रहा. इस काल की कुछ कलात्मक कृतियाँ आज भी अपने निर्माताओं की महानता का परिचय दे रही हैं.
> पल्लव प्रशासन के अधिकारी 
1. रत्तिका - जिले का शासक 
2. मदम्बा - कस्टम अधिकारी 
3. देशाधिकत - स्थानीय अधिकारी 
4. गाम- गामभोजक - गाँव-गाँव विचरण करने वाले अधिकारी
5. अमच्च -  मन्त्री
6. अरखादिकत - रक्षक
7. गुमिक - जंगल का अधिकारी
8. दूतिक - दूत
9. संजरंतक - गुप्तचर
> बादामी के पश्चिमी चालुक्य
डॉ. डी. सी. सरकार ने चालुक्यों की उत्पत्ति कन्नड़ परिवार से बताई है और उन्हें क्षत्रिय माना है. s की शुरूआत जयसिंह से मानी जाती है, लेकिन बादामी का चालुक्य सत्ता " पहला चालुक्य शासक पुलकेशिन प्रथम (535-66 ई.) था. वह पहला चालुक्य शासक था जिसने महाराज की उपाधि : "धारण " की और अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया. उसने वातापी या बादामी को अपनी राजधानी बनाया. 
पुलकेशिन प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कीर्तिवर्मन बना, जिसने बंग, अंग, कलिंग, वटुरा, मगध आदि के शासकों को परास्त किया. उसने कदम्ब शासकों के संगठन को तोड़ दिया. कीर्तिवर्मन के बाद उसका भाई मंगलेश 598 ई. में गद्दी पर बैठा. उसने कलचुरियों को परास्त किया और रेवतीद्वीप पर अधिकार कर लिया. मंगलेश और उसके पुत्र पुलकेशिन द्वितीय के बीच गृहयुद्ध हुआ जिसमें विजय पुलकेशिन द्वितीय को मिली. 
पुलकेशिन द्वितीय ने 610-42 ई. तक शासन किया. उसने पृथ्वी वल्लभ, श्री पृथ्वी वल्लभ, परमेश्वर आदि उपाधियाँ धारण कीं. पुलकेशिन द्वितीय ने कदम्बों की राजधानी बनबासी पर अधिकार कर लिया और मैसूर के गंग और अलूपाओं को समर्पण करने के लिए बाध्य किया. गंग शासक ने अपनी पुत्री का विवाह पुलकेशिन द्वितीय के साथ कर दिया. अन्य अनेक शासकों को हराने के साथ-साथ पुलकेशिन द्वितीय ने 637-38 ई. में हर्षवर्धन को पराजित किया. पुलकेशिन द्वितीय ने महेन्द्रवर्मन को परास्त किया, लेकिन बाद में पल्लवों के हाथों पराजित हुआ. 
ऐसा कहा जाता है कि 642-55 ई. तक चालुक्य सिंहासन खाली पड़ा रहा. 655 ई. में विक्रमादित्य प्रथम ने पल्लवों से वातापी छीनकर पुनः चालुक्य सत्ता स्थापित की. विक्रमादित्य प्रथम ने 655-81 ई. तक, विनयादित्य ने 68196 ई. तक, विजयादित्य ने 696-733 ई तक शासन किया. कीर्तिवर्मन द्वितीय अन्तिम महान् चालुक्य शासक था. उसने 746-57 ई. तक शासन किया.
> चालुक्य प्रशासन
चालुक्यों का शासनकाल लगभग दो सदियों तक दक्षिण भारत में रहा और उन्होंने प्राचीन शास्त्रों में विहित राजतन्त्र प्रणाली के अनुसार शासन किया. समूचे प्रशासन तन्त्र का केन्द्र बिन्दु सम्राट था जिसका पद आनुवंशिक था जिसकी उपाधि परमेश्वर, महाराजाधिराज, परमभट्टारक, सत्याश्रय, श्री पृथ्वीबल्लभ आदि थी.
उत्तराधिकार प्रायः ज्येष्ठ पुत्र को अथवा उसके अल्पवयस्क होने पर भाई को दिया जाता था जैसा कि कीर्ति वर्मन की मृत्यु के बाद मंगलेश का राजपद का मिलना.
चालुक्य लेखों में किसी मन्त्रिपरिषद् का उल्लेख नहीं किया गया है. प्रशासन में राजपरिवार के सदस्य ही मुख्यतः सम्मिलित थे. महासंधिविग्रहिक, विषयपति, ग्रामकूट, महात्तरघिकारिन आदि पदाधिकारियों के नाम अभिलेखों में मिलते हैं.
इस युग में सामन्तवाद का अस्तित्व था. चालुक्य शासकों ने अपने विजित प्रदेशों को सामन्तों के अधीन रख छोड़ा था जहाँ उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता थी. वे समय-समय पर सम्राट को कर देते थे तथा युद्ध के समय सेना द्वारा राजा की सहायता करते थे. इस प्रकार प्रशासन उत्तरोत्तर विकेन्द्रित होता जा रहा था.
राजकुल के सदस्यों को विभिन्न प्रान्तों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता था. प्रायः युवराज केन्द्रीय प्रान्त का राज्यपाल होता था.
स्थानीय स्तर पर ग्राम ही प्रशासन की मुख्य इकाई थे जिसका अधिकारी 'गामुण्ड' कहलाता था. इसकी नियुक्ति केन्द्र द्वारा सीधे होती थी. इसके अतिरिक्त प्रत्येक गाँव में एक महाजन होता था जो ‘गामुण्ड' की सहायता करता था. विक्रमादित्य के समय के लक्ष्मेश्वर लेख से ज्ञात होता है कि स्थानीय संस्थाओं के शासन में सरकारी हस्तक्षेप बहुत अधिक होता था तथा उनका संचालन राजाज्ञाओं द्वारा ही होता था.
लक्ष्मेश्वर लेख के अनुसार कर प्रणाली के कुछ संकेत प्राप्त होते हैं जिनके पास अपने मकान एवं भूमि नहीं थी उन्हें भी अपनी व्यक्तिगत स्थिति के अनुसार कर देना पड़ता था. निधि, उपनिधि (निक्षेप), विलप्त (लगान का बन्दोबस्त ) तथा उपरिकर आदि करों का उल्लेख अभिलेखों में मिलता है. इन करों के अतिरिक्त विभिन्न प्रकार के धार्मिक कर भी लिए जाते थे.
साम्राज्य अनेक प्रान्तों में बँटा था, यहाँ के प्रशासक मण्डलेश्वर के नाम से जाने जाते थे तथा क्षेत्रीय विभाजन 'नाडु' कहलाता था, जिसे विषय कहा जाता था.
नगर का प्रशासन वाणिज्यिक संघों द्वारा चलाया जाता था. नगराध्यक्ष नगरों का प्रशासक होता था.
इस प्रकार स्पष्ट है कि चालुक्य प्रशासन में केन्द्रीयकरण के लक्षण होते हुए भी उसमें विकेन्द्रीकरण के पर्याप्त तत्व मौजूद थे.
> चालुक्य काल में शिक्षा एवं साहित्य
चालुक्य काल में शिक्षा एवं साहित्य की उल्लेखनीय प्रगति हुई. ह्वेनसांग चालुक्य राज्य के लोगों को विद्या का व्यसनी बताता है. चालुक्य लेखों में संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है और यह उसके अत्यधिक विकसित रूप को प्रकट करता है.
विद्यार्थियों को नियन्त्रित एवं शिक्षकों को प्रशिक्षित किए जाने चालुक्य काल में शिक्षा के प्रमुख केन्द्र मन्दिर थे, जहाँ के साथ कला का भी विस्तृत विकास किया जाता था. मन्दिरों को काफ़ी अनुदान दिया जाता था. 
कर्नाटक में शिक्षा के मुख्य केन्द्र ब्रह्मपुरी, घटिकामठ, अग्रहार एवं मठ थे. ब्रह्मपुरी ब्राह्मणों का पृथक् निवास स्थान था जहाँ बाद में विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान की जाती थी. अग्रहार उस ग्राम को कहा जाता था जो विद्वान् ब्राह्मणों को दान में दिया जाता था, ताकि शैक्षणिक एवं धार्मिक क्रियाकलाप सुचारु रूप से चल सके. तुलनात्मक रूप से घटिका स्थान एवं मठों की संख्या काफी कम थी.
चालुक्य काल में साहित्य का भी काफी विकास हुआ. पुलकेशियन द्वितीय के सामन्त गंजराज दुर्बिनिति ने 'शब्दावतार' नामक व्याकरण ग्रन्थ लिखा तथा किरातार्जुनीय के 15वें सर्ग पर टीका लिखी. उसने गुणाढ्य के 'वृहत्कथा' का संस्कृत भाषा में अनुवाद भी किया. इस चरण के अन्य विद्वानों में उदयदेव तथा सोमदेव सूरि भी थे. उदयदेव जैन मतानुयायी एवं प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य थे. उन्होंने 'जैनेन्द्र व्याकरण' की रचना की. सोमदेव सूरि ने 'यशस्तिलकचम्पू' तथा 'नीतिवाम्यामृत' नामक ग्रन्थों का प्रणयन किया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि चालुक्य काल में शिक्षा एवं साहित्य के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति हुई,
> चालुक्य काल : कला एवं स्थापत्य का विकास 
चालुक्य शासनकाल में कला एवं स्थापत्य के क्षेत्र में अत्यधिक उन्नति हुई. इस समय जैन एवं बौद्ध धर्म के अनुकरण पर हिन्दू देवी-देवताओं के लिए पर्वत गुफाओं को काटकर मन्दिर बनवाए गए. चालुक्य काल में बने मन्दिर बादामी एहोल व पत्तडकल से हमें प्राप्त होते हैं.
बादामी में पाषाण को काटकर चार स्तम्भ युक्त मण्डप बनाए गए हैं. इनमें से तीन हिन्दू तथा एक जैन धर्म से सम्बन्धित है. प्रत्येक में स्तम्भ युक्त बरामदा, मेहराब युक्त हाल, एक छोटा वर्गाकार गर्भगृह पाषाण में गहराई से काटकर बनाए गए हैं. इनमें से एक वैष्णव गुहा है जिसके बरामदे में विष्णु की दो मूर्तियाँ प्राप्त होती हैं. इन गुफाओं की भीतरी दीवारों पर विभिन्न प्रकार की सुन्दर-सुन्दर चित्रकारी है.
एहोल को मन्दिरों का नगर कहा जाता है. यहाँ कम-सेकम लगभग 70 मन्दिरों के अवशेष प्राप्त होते हैं. यहीं पर रविकीर्ति द्वारा बनवाया गया ‘मेंगुती का जैन मन्दिर' है. अधिकांश मन्दिर विष्णु तथा शिव के हैं. यहाँ का सबसे सुन्दर मन्दिर सूर्य का एक मन्दिर है जो 'लाढ़ खा' के नाम से प्रसिद्ध है. यह एक गुहा मन्दिर है, जो लगभग 50 वर्ग फुट में बना है. इसकी छत सपाट है. छत में एक छोटा गर्भगृह तथा द्वार मण्डप बने हुए हैं. गर्भगृह के सामने स्तम्भों पर टिका एक बरामदा तथा विशाल सभाकक्ष है. छत बड़े पत्थरों से निर्मित है. इसमें शिखर नहीं हैं. air use
एहोल में एक अत्यन्त अन्य सुन्दर मन्दिर दुर्गा का मन्दिर है. जो 60' x 36' के आकार में निर्मित है. इसका निर्माण एक ऊँचे चबूतरे पर किया गया है. इसकी चपटी छत जमीन से 30' ऊँची है. गर्भगृह के ऊपर एक शिखर है तथा बरामदे में प्रदक्षिणा पथ का निर्माण किया गया है. इस प्रकार यह मन्दिर बौद्ध गुहा चैत्यों के आधार पर बनाया गया है.
पत्तदकल में भी चालुक्यों द्वारा बनवाए हुए अनेक मन्दिरों के अवशेष प्राप्त होते हैं. यहाँ से 10 मन्दिरों के अवशेष जिनमें 4 नागर शैली में व 6 मन्दिर द्राविड़ शैली में निर्मित हैं. नागर शैली में 'पार्श्वनाथ का मन्दिर' तथा द्राविड़ शैली में ‘विरुपाक्ष’ व ‘संगमेश्वर' के मन्दिर उल्लेखनीय हैं. विरुपाक्ष मन्दिरों का निर्माण विक्रमादित्य द्वितीय की रानी ने 740 ई. के लगभग करवाया था. मन्दिर के सामने नंदि मण्डप बना है. इसके चारों ओर वेदिका तथा एक तोरण द्वार है. मन्दिर की बाहरी दीवार में स्तम्भ जोड़कर सुन्दर ताख बनाए गए हैं जिनमें मूर्तियाँ रखी गई हैं ये शिव, नाग, नागिन तथा रामायण से लिए गए दृश्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं. विख्यात कलाविद् पर्सी 'ब्राउन' के शब्दों में, 'विरुपाक्ष मन्दिर' प्राचीनकाल की उन दुर्लभ इमारतों में से एक है जिनमें उन मनुष्यों की भावना अब भी टिकी हुई है जिन्होंने इसकी कल्पना की तथा अपने हाथों से निर्मित किया.
अजन्ता तथा एलोरा दोनों ही चालुक्यों के राज्य में विद्यमान थे. सम्भवतः यहाँ की कुछ गुफाएँ इसी काल की हैं. अजन्ता के एक गुहा चित्र में पुलकेशियन द्वितीय को ईरानी मण्डल का स्वागत करते हुए दिखाया गया है.
इस प्रकार स्पष्ट है कि चालुक्य शासनकाल में न केवल शिक्षा साहित्य बल्कि कला विशेष रूप से स्थापत्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई.
> चालुक्यकालीन : धार्मिक स्थिति
चालुक्य शासक धर्मनिष्ठ हिन्दू थे तथा प्राचीन शास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार उन्होंने अपने जीवन का निर्वाह किया तथा उन्होंने हिन्दू धर्म को अपना संरक्षण प्रदान किया. ' उन्होंने अश्वमेध, वाजपेय आदि अनेक यज्ञों का अनुष्ठान अपने विजयों के फलस्वरूप किया. उन्होंने ब्राह्मणों को अतुल दान दिया. उनके कुल देवता विष्णु थे. इसके अतिरिक्त उन लोगों ने शिव की भी आराधना की. वराह चालुक्य शासकों का राजकीय चिह्न था. अधिकांश चालुक्य लेख विष्णु के वराह अवतार की आराधना से ही प्रारम्भ होते हैं. बादामी के चित्रों में शेष शय्या पर लक्ष्मी के साथ शयन करते हुए नरसिंह आदि रूपों को दिखाया गया है. कुछ चालुक्य शासकों की उपाधि ‘परम भागवत्' थी. विष्णु एवं शिव की आराधना के साथ-साथ पौराणिक देवी-देवताओं की पूजा के विधान भी प्रचलित थे.
चालुक्य शासक स्वयं ब्राह्मण होते हुए भी धर्म सहिष्णु थे. उन्होंने दक्षिणापथ में जैन एवं बौद्ध धर्मों के विकास को भी प्रोत्साहन दिया. चालुक्य लेखों से पता चलता है कि उन्होंने जैन शिक्षकों एवं साधुओं को भी ब्राह्मणों की ही भाँति दान दिए. एहोल अभिलेख का रचयिता रविकीर्ति जैन था, जिसके द्वारा 'मेगुति का मन्दिर बनवाया गया. बादामी तथा एहोल की गुफाओं में भी जैन मूर्तियाँ प्राप्त होती हैं.
चालुक्य शासनकाल में तुलनात्मक रूप से ब्राह्मण एवं जैन धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म हीन अवस्था में था, फिर भी चालुक्य राज्य में अनेक विहार तथा मठों का निर्माण किया गया था, जिसमें हीनयान एवं महायान दोनों ही सम्प्रदायों के मानने वाले निवास करते थे. ह्वेनसांग जो पुलकेशियन द्वितीय के समय महाराष्ट्र गया था, ने बादामी में पाँच अशोक स्तूप देखे थे. वह चालुक्य राज्य में मठों की संख्या 100 से अधिक बताता है, जिनमें 5 हजार से अधिक भिक्षुक निवास करते थे.
> कामरूप का वर्मन वंश
परिचय
इस वंश की प्रतिष्ठा का संस्थापक पुष्य वर्मन था. इसने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की जो इसकी स्वतन्त्र स्थिति का सूचक है. इसने अपनी राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर बसाई. पुष्य वर्मन ने पुण्ड्रवर्धन में गुप्तों के विरुद्ध अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर अश्वमेध यज्ञ किया. मिदनापुर ताम्रपत्र अभिलेख उसे समस्त कामरूप ( आधुनिक असम) का स्वामी कहता है.
पुष्य वर्मन के बाद चन्द्रमुख, स्थित वर्मन, सुस्थित वर्मन हुए, जिनके विषय में केवल यह पता चलता है कि उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किए थे.
सुस्थित वर्मन का पुत्र मृगांक उसका उत्तराधिकारी हुआ जिसे हर्षचरित में ‘महाराजाधिराज' कहा गया है. हर्षचरित में • मृगांक की वीरता की बड़ी प्रशंसा की गई है, परन्तु इसे उत्तर गुप्त वंश के शासक महासेन गुप्त ने पराजित कर मार डाला.
> भास्कर वर्म
भास्कर वर्मन, वर्मन वंश का सर्वाधिक प्रतापी शासक हुआ. इसमें सैनिक एवं प्रशासनिक दोनों तरह की पर्याप्त योग्यता थी. वह एक अत्यन्त कूटनीतिज्ञ व्यक्ति था. इसने गौड़ नरेश के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से कन्नौज के हर्षवर्द्धन से मित्रता की कुछ विद्वान् यह मानते हैं कि भास्कर वर्मन ने हर्ष की अधीनता स्वीकार कर ली थी.
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भास्कर वर्मन के राज्य की यात्रा की थी. भास्कर वर्मन ने हर्ष के कन्नौज सम्मेलन में भी भाग लिया था. हर्ष की मृत्यु के बाद भास्कर वर्मन ने अपने राज्य का विस्तार किया और सम्पूर्ण गौड़ प्रदेश पर अधिकार कर पूर्वी भारत का सबसे बड़ा शक्तिशाली शासक बन गया. इसने लगभग 650 ई. तक शासन किया.
भास्कर वर्मन की मृत्यु के बाद कामरूप के वर्मन वंश के इतिहास के विषय में हमें जानकारी नहीं मिलती. बाद में कामरूप पाल वंश के अधीन हो गया.
> पाल राजवंश
बंगाल के पाल वंश के इतिहास पर प्रकाश डालने के लिए हमें निम्नलिखित अभिलेखीय एवं साहित्यिक साक्ष्यों का सहारा लेना पड़ता है - 
1. धर्मपाल का खालिमपुर अभिलेख.
2. देवपाल का मुंगेर अभिलेख.
3. नारायण पाल का भागलपुर ताम्रपत्र अभिलेख.
4. नारायण पाल का बादल स्तम्भ लेख.
5. महिपाल प्रथम के बानगढ़, नालन्दा तथा मुजफ्फरपुर से प्राप्त अभिलेख.
इन लेखों के अतिरिक्त समकालीन गुर्जर प्रतिहार तथा राष्टकूटों के अभिलेखों से भी पाल शासकों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है. इस काल में लिखी गई संध्याकर नन्दी की पुस्तक 'रामचरित' में रामपाल की उपलब्धियों का वर्णन प्रामाणिक रूप से प्राप्त होता है.
पाल वंश के प्रथम शासक गोपाल–पाल वंश के संस्थापक शासक गोपाल के प्रारम्भिक जीवन के विषय में बहुत कम जानकारी प्राप्त होती है. उसका पितामह दयितविष्णु एक विद्वान् व्यक्ति था तथा उनका पिता बप्यत एक योग्य सैनिक था. धर्मपाल के खालिमपुर अभिलेख के अनुसार “मात्स्यन्याय से छुटकारा पाने के लिए प्रकृतियों ( सामान्य जनता) ने गोपाल को लक्ष्मी की बाँह ग्रहण कराई." तिब्बती इतिहासकार तारानाथ ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है.
गोपाल ने बंगाल में शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित की तथा अपने शासन के अन्त तक सम्पूर्ण बंगाल पर अपना अधिकार सुदृढ़ कर लिया. देवपाल के मुंगेर अभिलेख में विवरण है कि उसने समुद्र तक पृथ्वी की विजय की थी.
विहार का निर्माण करवाया तथा इसका शासनकाल 750वह बौद्ध मतानुयायी था तथा नालन्दा में उसने एक 770 ई. तक था.
धर्मपाल (770-810 ई.) – धर्मपाल के शासक बनने के समय पालों की प्रतिद्वन्द्विता कन्नौज को लेकर प्रतिहारों एवं राष्ट्रकूटों से थी. धर्मपाल को इन दोनों शक्तियों से संघर्ष करना पड़ा.
सर्वप्रथम प्रतिहार नरेश वत्सराज ने धर्मपाल को हराकर कन्नौज को अपने अधिकार में कर लिया. इस पर राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव ने वत्सराज व धर्मपाल दोनों को हराकर शीघ्र ही दक्षिण को लौट गया. इस आक्रमण का धर्मपाल पर बहुत कम प्रभाव पड़ा तथा उसने शीघ्रता से अपनी शक्ति का संगठन कर लिया.
अब धर्मपाल ने कन्नौज पर आक्रमण कर वत्सराज की ओर से मनोनीत इन्द्रायुद्ध को हटाकर चक्रायुद्ध को शासक बनाया और कन्नौज में एक बड़े दरबार का आयोजन किया जिसमें अनेक राज्यों के शासकों ने भाग लिया था. इसी से स्पष्ट होता है कि एक समय वह उत्तरी भारत का सार्वभौमिक शासक बन गया था इसकी पुष्टि गुजराती कवि सोढ़ढल ने भी की है.
वत्सराज की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नागभट्ट-II ने धर्मपाल की सत्ता को पुनः चुनौती दी तथा कन्नौज पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार में कर लिया तथा मुंगेर के समीप हुए युद्ध में धर्मपाल को बुरी तरह से हरा दिया, लेकिन इसी बीच धर्मपाल को अवसर मिल गया जब राष्ट्रकूट इन्द्र तृतीय ने नागभट्ट को हरा दिया और दक्षिण लौट गया. ऐसी स्थिति में धर्मपाल ने पुनः अपने खोए हुए प्रदेशों को जीत लिया.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि त्रिपक्षीय संघर्ष में हालांकि धर्मपाल को प्रारम्भ में पराजित होना पड़ा, लेकिन में उसे ही सफलता मिली. अन्त
देवपाल – धर्मपाल के उपरान्त उसका बेटा देवपाल सत्तासीन हुआ जो पाल वंश का सबसे शक्तिशाली शासक सिद्ध हुआ. अभिलेखों में अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा में कहा गया विस्तृत विजयों के उपरान्त उसका साम्राज्य हिमालय से एवं पूर्वी से पश्चिमी समुद्र तट तक फैला हुआ था. ऐसा कहा जाता है कि उसने गुर्जर एवं हूणों को परास्त किया और उत्कल एवं कामरूप पर अधिकार कर लिया जिन और कम्बोज राजाओं ने देवपाल के समक्ष घुटने टेके उनकी सही-सही पहचान नहीं की जा सकी है. गुर्जर प्रतिद्वन्द्वी मिहिर भोज को माना जा सकता है जिसने पूरब में अपने राज्य का विस्तार करने की कोशिश की, किन्तु देवपाल के हाथों पराजित हुआ. 
देवपाल का योगदान बौद्ध धर्म के प्रति अत्यन्त महत्वपूर्ण है. बलदेवपुत्र, जो उसके समय में जावा के बौद्ध शैलेन्द्रों का शासक था, ने देवपाल के पास दूत भेजकर पाँच गाँवों की माँग की, ताकि नालन्दा में एक मठ की स्थापना की जा सके. देवपाल ने इसे स्वीकार करते हुए वीरदेव को मठ का प्रधान नियुक्त किया.
> पाल शासकों का शिक्षा एवं साहित्य के प्रति योगदान
पालवंशी शासकों ने शिक्षा एवं साहित्य के विकास में अपना अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान दिया. सोमपुरी, ओदत्तपुरी तथा विक्रमशिला में इनके द्वारा शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की गई. इनमें विक्रमशिला कालान्तर में एक ख्याति प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय विद्यालय बन गया, जिसकी स्थापना धर्मपाल द्वारा की गई थी. पूर्व मध्य काल में शिक्षा केन्द्रों में इसकी ख्याति सर्वाधिक थी यहाँ अनेक विहारों एवं बौद्ध मन्दिरों का निर्माण पाल शासकों द्वारा करवाया गया था. उस समय यहाँ लगभग 3,000 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे. बौद्ध धर्म और दर्शन के अतिरिक्त यहाँ, व्याकरण, न्याय, तन्त्र आदि की शिक्षा दी जाती थी. यहाँ विद्वानों की एक मण्डली थी जिसमें दीपंकर का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है. उन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार किया. इस समय विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने नालन्दा विश्वविद्यालय का स्थान ग्रहण कर लिया था. 1203 ई. में मुस्लिम आक्रमणकारी ब खिलजी ने इसे नष्ट कर दिया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि पाल शासकों ने शिक्षा एवं साहित्य के प्रति अपना महती योगदान दिया था. इस काल में रामचरित के लेखक संध्याकर नन्दी हुए. अन्य विद्वान् हरिभद्र, चक्रपाणि दत्त, वज्रदत्त आदि के नाम प्रसिद्ध हैं.
> कलचुरि का चेदिवंश
परिचय
मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में तेवर नामक स्थान जिसकी पहचान त्रिपुरी से की जाती है कलचुरि चेदि वंश की राजधानी था और उसके आसपास का क्षेत्र ही उनका राज्य था. उनके अभिलेखों में उन्हें हैह्यवंशी सहस्रार्जुनीय कीर्ति वीर्य का वंशज कहा गया है जिससे स्पष्ट है, कि वे चन्द्रवंशीय क्षत्रिय थे.
  1. इस वंश में प्रथम राजा कोक्कल प्रथम हुआ जिसने तुरुष्क, वंग, कोंकण आदि प्रदेशों को जीतकर अपने राज्य में मिलाया. इसने चंदेल राजकुमारी नंदा देवी से विवाह कर चन्देलों से मित्रता कायम की. उसने राष्ट्रकूट कृष्ण-II से अपनी पुत्री का विवाह कर उनसे भी मित्रता कायम कर अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार किया.
  2. कोक्कल के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र शंकरगण शासक बना तथा सोम वंशी शासक को हटांकर पाली पर अधिकार कर लिया. इसने अपनी पुत्री का विवाह कृष्ण-II (राष्ट्रकूट) के पुत्र जगतुंग से कर दिया.
  3. शंकरगण के बाद उसका पुत्र युवराज चेदि वंश का अगला शासक नियुक्त हुआ जिसने बंगाल के पाल तथा गंगों को पराजित किया. इसके राज्य पर राष्ट्रकूट कृष्णIII ने आक्रमण किया, जिसमें युवराज की बुरी तरह पराजय हुई, परन्तु शीघ्र ही उसने राष्ट्रकूट सेना को हराकर भगा दिया. ‘काव्य मीमांसा' तथा 'विद्धशाल भंजिका' के लेखक राजशेखर ने अपना प्रारम्भिक जीवन युवराज के दरबार में ही व्यतीत किया था.
  4. युवराज के बाद उसका पुत्र लक्ष्मण राज अगला शासक बना जिसने बंगाल, उड़ीसा तथा कौशल की विजय की. इसके बाद उसने पश्चिम की ओर बढ़कर गुर्जर लाट नरेशों को पराजित किया. लक्ष्मण राज ने अपनी पुत्री का विवाह चालुक्य नरेश विक्रमादित्य चतुर्थ के साथ किया. 
  5. लक्ष्मण राज के बाद शंकरगण व युवराज द्वितीय चेदि वंश में दो कमजोर उत्तराधिकारी हुए और इसी क्रम में तीसरा उत्तराधिकारी कोक्कल द्वितीय भी हुआ.
  6. लगभग 1019 ई. में इस वंश में एक प्रतापी शासक गांगेयदेव विकमादित्य हुआ जो प्रारम्भ में चन्देल विद्याधर के अधीन था. विद्याधर की मृत्यु के बाद वह स्वतन्त्र हो गया तथा उसने अंग, उत्कल, काशी व प्रयाग को विजित किया. इसके साथ ही उसने प्रयाग को अपनी द्वितीय राजधानी बनाया.
  7. गांगेयदेव के बाद कर्णदेव शासक बना, जोकि चेदि वंश का सर्वाधिक प्रतापी शासक था. उसने गुजरात के चालुक्य शासक भीम के साथ मिलकर मालवा के परमार वंशी भोज को पराजित कर दिया. कर्ण ने कलिंग को विजित कर 'त्रिकलिंगाधिपति' की उपाधि धारण की. पूर्व की ओर गौड़ व पाल शासकों को पराजित किया. पाल नरेश विग्रहपाल से अपनी पुत्री का विवाह किया.
चन्देल नरेश कीर्तिवर्मन ने कर्णदेव को पराजित कर दिया. कर्णदेव की मृत्यु के बाद कलचुरियों की शक्ति का हास हो गया और इनका स्थान चंदेलों ने ले लिया.
> राष्ट्रकूट - राजवंश
राष्ट्रकूटों के इतिहास को जानने का साधन
राष्ट्रकूट शासकों के अधिकांश अभिलेखों में तिथिक्रम, उनकी वंशावली, धार्मिक रुचियाँ, शासन व्यवस्था आदि के विषय में पर्याप्त जानकारी दी गई है, जो राष्ट्रकूट इतिहास जानने के प्रामाणिक साधन हैं. राष्ट्रकूट अभिलेखों का विवरण निम्नलिखित है-
1. गोविन्द तृतीय के राधनपुर, वनदिन्दोरी तथा बड़ौदा लेख.
2. अमोघवर्ष का एंजन लेख.
3. इन्द्र तृतीय का कमलपुर लेख.
4. दंतिदुर्ग के एलौरा तथा सामन्तगढ़ के ताम्रपत्र अभिलेख. 
5. कृष्ण तृतीय के कोल्हापुर, देवली तथा कर्नाट के लेख.
इनं अभिलेखों के अतिरिक्त राष्ट्रकूट काल में लिखे गए कन्नड़ तथा संस्कृत साहित्य से भी राष्ट्रकूटों के इतिहास के पुनर्निर्माण करने में सहायता मिलती है, जिनमें जिनसेन का 'आदिपुराण', महावीराचार्य का ‘गणित सार संग्रहण', अमोघवर्ष का 'कविराज मार्ग' आदि उल्लेखनीय हैं.
> राष्ट्रकूटों की उत्पत्ति तथा मूल निवास स्थान
अन्य राजपूत राजवंशों की भाँति ही राष्ट्रकूटों की उत्पत्ति सम्बन्धी अनेक विवाद हैं. अल्टेकर, नीलकण्ठ शास्त्री, हेमचन्द्र राय चौधरी, मजूमदार जैसे विद्वानों के अनुसार राष्टकूट वस्तुतः पहले प्रशासनिक अधिकारी थे. इस शब्द का अर्थ है 'राष्ट्र (प्रान्त) का कूट अर्थात् प्रधान' अतः राष्ट्रकूट जाति का सूचक न होकर पद का सूचक है. जिस प्रकार ग्राम का अधिकारी ग्राम कूट होता था, उसी प्रकार प्रान्त (राष्ट्र) का अधिकारी राष्ट्रकूट तथा इन्हीं अधिकारियों की कालान्तर में एक विशिष्ट जाति बन गई.
प्राचीनकाल में अशोक के अभिलेखों में रथिक नामक अधिकारियों का उल्लेख है. सातवाहनयुगीन नानाघाट के लेख में त्रणकारियों, महारथी का उल्लेख मिलता है. इसी प्रकार हाथीगुम्फा अभिलेख के अनुसार खारवेल ने रथिकों को पराजित किया था.
राष्ट्रकूट वंश के स्वयं के अभिलेखों में इन्हें राष्ट्रकूट का बताया गया है. इन्द्र तृतीय के नौसारी लेख के अनुसार ‘अमोघवर्ष ने रट्ट कुल लक्ष्मी' का उद्धार किया. कृष्ण तृतीय के देवली व अरहड़ अभिलेखों में रट्ट को आदि पुरुष बताया राष्ट्रकूट तुंग कुल का बताया है, लेकिन बाद के गया है, जो तुंग के वंशज थे. इस आधार पर भण्डारकर ने अभिलेखों में उन्हें यदुवंश से जोड़ा गया है. कुछ लेख इन्हें चन्द्रवंशी क्षत्रिय बताते हैं. गोविन्द तृतीय की तुलना यदुवंशी कृष्ण से की गई है. अतः उपर्युक्त आधारों को ध्यान में रखते हुए इन्हें क्षत्रिय माना जा सकता है. 
> राष्ट्रकूट साम्राज्य की स्थापना में दन्तिदुर्ग का योगदान
दन्तिदुर्ग के विषय में हमें उसके समय के दो अभिलेखों (1) दशावतार (742 ई.) तथा (2) समनगड (753 ई.) से जानकारी मिलती है, जिनके अनुसार दन्तिदुर्ग ने बादामी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य द्वितीय के सामन्त के रूप में अपना जीवन प्रारम्भ किया. इसी रूप में उसने कुछ विजयें कर अपनी शक्ति व प्रतिष्ठा को बढ़ाया. उसकी प्रारम्भिक सफलता पर उसके स्वामी ने उसे पृथ्वी वल्लभ' तथा ‘खड़वालोक' की उपाधियाँ प्रदान की. इसके उपरान्त उसने युवराज कीर्तिवर्मा द्वितीय के साथ काँची के पल्लवों को एक महत्वपूर्ण युद्ध में हरा दिया. वापसी करते समय उसने कर्नूल उत्साहित होकर 744 ई. में दन्तिदुर्ग ने स्वतन्त्र राज्य स्थापित में भी शैल के शासक को पराजित किया. इन विजयों से करने के उद्देश्य से अपना अभियान प्रारम्भ किया और इसी उत्तराधिकारियों की उपेक्षा कर उसने अपना विजय अभियान समय चालुक्य शासक की मृत्यु हो गई और उसके कमजोर पूर्व तथा पश्चिम दिशा से प्रारम्भ किया, ताकि चालुक्य सम्राट का कम-से-कम प्रतिरोध सहना पड़े. 
दन्तिदुर्ग ने सर्वप्रथम नन्दिपुर के गुर्जरों तथा नौसादी के चालुक्यों को पराजित कर मालवा के प्रतिहार राज्य पर आक्रमण कर दिया तथा उनकी राजधानी उज्जैन पर अधिकार कर लेने के बाद उसने 'हिरण्यगर्भदान' नामक यज्ञ सम्पादित किया, जिसमें कहा जाता है कि प्रतिहार राजा ने पाल का काम किया.
उल्लेखनीय है कि इसी अभियान के तुरन्त बाद उसने कोशल तथा कलिंग पर अपना अधिकार जमाया. इस प्रकार उसने अपना राज्य मध्य एवं दक्षिणी गुजरात तथा सम्पूर्ण मध्य प्रदेश तक विस्तृत कर लिया.
नौसारी के सामन्त के पुनः पदस्थापन करने के प्रयास के कारण कीर्ति वर्मा तथा दन्तिदुर्ग में युद्ध हुआ जिसमें कीर्ति वर्मा पराजित हुआ और उसके राज्य के एक बड़े भूभाग का स्वामी दन्तिदुर्ग बन गया.
स्पष्ट है कि दन्तिदुर्ग एक महान् विजेता तथा कूटनीतिज्ञ शासक था जिसने अपनी विजयों से स्वतन्त्र और विस्तृत राष्ट्रकूट साम्राज्य की स्थापना की.
> राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम की उपलब्धियाँ (756–773 ई.)
दन्तिदुर्ग के निःसंतान मर जाने के कारण राष्ट्रकूट वंश में उसका उत्तराधिकारी उसका चाचा कृष्ण प्रथम 756 ई. में बना. यह एक घोर साम्राज्यवादी शासक था जिसने सभी दिशाओं में अपने राज्य का विस्तार किया, जिसका विवरण निम्नलिखित है—
1. उसने अपने विद्रोही भतीजे कर्क द्वितीय, जोकि लाट प्रदेश का शासक था, पर आक्रमण कर उसके विद्रोह को विफल कर दिया.
 2. उसने राजाधिराज परमेश्वर की उपाधि 'राहप्पा' नामक किसी शासक को पराजित कर प्राप्त की, यह उसके ‘वेग्रमा' तथा 'सूरत' के दानपात्रों में उल्लिखित है.
3. उसके समय में चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन, जोकि कर्नाटक में शरण लिए हुए था, ने एक सेना तैयार कर कृष्ण प्रथम पर आक्रमण किया. लगभग 760 ई. में दोनों के मध्य भयंकर युद्ध हुआ जिसमें कृष्ण प्रथम ने उसकी शक्ति को पूर्ण रूप से विनिष्ट कर दिया. राधनपुर तथा वन दिन्दोरी अभिलेख में है. इसक उल्लेख
4. इसी अभिलेख के अनुसार कीर्तिवर्मन के समस्त पुत्र मार डाले गए तथा पूरे कर्नाटक पर उसका अधिकार हो गया.
5. शिलाहार वंश के संस्थापक 'सणफुल्ल' को उसने सह कोंकण को जीतकर उसका शासक नियुक्त किया.
6. गंग वंश के शासक श्री पुरुष को पराजित कर मैसूर का क्षेत्र उसने राष्ट्रकूटों की अधीनता में ला दिया,
7. कृष्ण प्रथम ने अपने पुत्र गोविन्द को युवराज बनाकर पूर्वी चालुक्यों आक्रमण का आदेश दिया जिसमें विष्णुवर्द्धन चतुर्थ ने बिना लड़े ही राष्ट्रकूटों की अधीनता स्वीकार कर ली तथा अपने राज्य का एक बड़ा भू-भाग राष्ट्रकूटों को युद्ध हर्जाना के रूप में दे दिया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि कृष्ण प्रथम ऐक योग्य शासक तथा कुशल योद्धा था जिसने अपनी विजयों के द्वारा दक्षिण में अपनी स्थिति सर्वोच्च बना दी. उसके राज्य में महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश का अधिकांश भाग सम्मिलित था. इस प्रकार उसने अपने उत्तराधिकारियों के लिए उत्तर की ओर आक्रमण करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया:
योद्धा होने के साथ-साथ कृष्ण प्रथम महान् निर्माता भी था. उसके द्वारा बनवाया गया एलोरा का कैलाश मन्दिर स्थापत्य कला के क्षेत्र में विश्व में अपना अद्वितीय स्थान रखता है. वह एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति भी था जिसने ब्राह्मणों को प्रभूत दान दिया. अतः कृष्ण प्रथम का राष्ट्रकूट वंश के इतिहास में विशेष स्थान है.
> राष्ट्रकूट गोविन्द तृतीय के उत्तरी अभियान पर टिप्पणी लिखो 
जिस समय गोविन्द तृतीय ने उत्तरी भारत पर अभियान किया उस समय इस क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति बड़ी जटिल थी. कन्नौज को लेकर धर्मपाल (पाल नरेश) तथा नागभट्ट (प्रतिहार नरेश) के मध्य प्रतिद्वंद्विता थी. धर्मपाल तथा उसके संरक्षित कन्नौज नरेश चक्रायुद्ध को नागभट्ट ने बुरी तरह पराजित कर दिया था. अपनी पराजय का बदला लेने के लिए धर्मपाल ने गोविन्द तृतीय से सहायता माँगी जिसके फलस्वरूप वह उत्तर की ओर आक्रमण करने को उन्मुख हुआ. उसने सावधानी से अपनी योजना को क्रियान्वित करते हुए भोपाल-झाँसी मार्ग से कन्नौज के लिए प्रस्थान किया और नागभट्ट तथा गोविन्द तृतीय के मध्य सम्भवतः बुन्देलखण्ड के किसी स्थान पर संघर्ष हुआ. इस युद्ध में नागभट्ट बुरी तरह पराजित हुआ तथा भागकर राजपूताने में शरण लेने को विवश हुआ. इसके बाद धर्मपाल तथा चक्रायुद्ध ने स्वतः ही उसके सम्मुख हथियार डाल दिए.
उल्लेखनीय है कि नागभट्ट को पराजित करने तथा चक्रायुद्ध और धर्मपाल को आत्मसर्पण करवा लेने के बाद गोविन्द अपने गृह राज्य वापस लौट गया. उसके उत्तरी अभियान का मूल उद्देश्य राज्य का विस्तार करना न होकर, अपितु अपने यश मात्र की वृद्धि करना था. 
> इन्द्र तृतीय का उत्तरी अभियान
इन्द्र तृतीय के उत्तरी अभियान का मूल उद्देश्य कन्नौज पर अधिकार करना था, क्योंकि इसके समय में यह नगर उत्तरी भारत में सर्वप्रधान था. इस समय पाल नरेश महेन्द्रपाल की मृत्यु हो जाने के कारण कन्नौज की गद्दी के लिए उसके दो पुत्रों भोज द्वितीय तथा महीपाल के मध्य संघर्ष हो रहा था. इन्द्र ने महीपाल पर 916 ई. में आक्रमण किया. उसकी सेनाओं ने सम्भवतः भोपाल-झाँसी-कालपी मार्ग से होते हुए यमुना नदी पार कर कन्नौज पर आक्रमण कर प्रतिहार नरेश महीपाल को पराजित कर दिया तथा कन्नौज पर अपना अधिकार कर लिया. यह उसकी महान् सैनिक सफलता थी, क्योंकि अल्टेकर के शब्दों में ऐसे कम ही अवस़र आए हैं, जबकि दकन के किसी शासक ने उत्तर भारत की राजधानी पर कब्जा किया हो.
उल्लेखनीय है कि उसका यह अभियान एक धावा मात्र ही था और 916 ई. की ग्रीष्म ऋतु में वह स्वदेश लौट गया तथा 917 ई. में प्रतिहार महीपाल ने कन्नौज पर पुनः अधिकार कर लिया.
> राष्ट्रकूट : शासन-प्रबन्ध
राष्ट्रकूट शासन-प्रणाली में राजा का पद सर्वोच्च एवं आनुवंशिक था. महाराजाधिराज, परभट्टारक जैसी उपाधियों से वह सम्मानित था. राष्ट्रकूट शासक अपनी राजधानी में रहता था जहाँ उसकी राज सभा तथा केन्द्रीय प्रशासन के कर्मचारी रहते थे. सामन्त, राजदूत, मन्त्री, सैनिक तथा असैनिक अधिकारी, कवि, वैद्य, ज्योतिष आदि नियमित रूप से उसकी सभा में उपस्थित होते थे. हालांकि मन्त्रियों के विभागों का नाम अभिलेखों में उल्लिखित नहीं है फिर भी उसे राजा का दाहिना हाथ कहा गया है.
राष्ट्रकूट शासन में सामन्तवाद का महत्वपूर्ण स्थान था. उन्हें लगभग पूर्ण स्वायत्तता थी, वे अपने अधीन छोटे सामन्त रखते थे तथा समय-समय पर राजा को उपहार तथा सैनिक सहायता प्रदान करते थे.
सम्राट के सीधे नियन्त्रण वाले क्षेत्र को कई राष्ट्रों में बाँटा गया था, जिनका प्रधान राष्ट्रपति था जो आधुनिक कमिश्नर के समान था. वह नागरिक तथा सैनिक दोनों ही प्रकार के प्रशासन का प्रधान था. उसे वित्त तथा भू-राजस्व संग्रहण के भी अधिकार मिले हुए थे.
प्रत्येक राष्ट्र में कई विषय होते थे जो आधुनिक जिले के समान थे. इनमें 4 हजार तक गाँव थे. इसका प्रधान अधिकारी ‘विषयपति’ था. विषय भुक्तियों में बटे होते थे जिनके अधिकारी ‘भोगपति' कहलाते थे. प्रत्येक भुक्ति में 50 से लेकर 70 तक ग्राम होते थे. विषयपति तथा भोगपति ‘देशग्रामकूटक’ नामक वंशानुगत राजस्व अधिकारियों की सहायता से राजस्व प्रशासन चलाते थे इन्हें करमुक्त भूमि निर्वाह के लिए प्राप्त थी. ग्राम का शासन 'मुखिया द्वारा चलाया जाता था जिसकी सहायता के लिए लेखाकार होता था. मुखिया के अधीन एक सैन्य टुकड़ी रहती थी जो गाँव में शान्ति-व्यवस्था बनाए रखती थी. मुखिया का पद आनु' वंशिक था.
राष्ट्रकूट प्रशासन में नगरों तथा गाँवों को स्वायत्तता  प्राप्त थी. यहाँ प्रशासन के लिए जनसमितियों का गठन किया गया था जो स्थानीय शासन का संचालन करते थे. समिति में प्रत्येक परिवार का वयस्क सदस्य होता था. ग्राम के बड़े-बूढ़ों को 'महत्तर' कहा जाता था. 'महत्तर' मन्दिरों, सड़कों, पाठशालाओं, तालाबों आदि की देखभाल के लिए उपसमितियाँ गठित करते थे, जोकि मुखिया की सहायता करती थीं.
राज्य की आय का मुख्य साधन भू-राजस्व था जिसे उद्रंग अथवा भोग कर कहा जाता था. यह उपज का 1/4वाँ भाग था और यह अनाज के रूप में लिया जाता था. अकाल आदि के समय कर माफ कर दिया ज जाता था. इसके अतिरिक्त वन, खनिज, क्रय-विक्रय आदि से भी राज्य को बहुत अधिक आमदनी होती थी.
>>राष्ट्रकूटकालीन धार्मिक स्थिति
राष्ट्रकूट शासकों ने ब्राह्मण तथा जैन दोनों ही धर्मों को प्रश्रय प्रदान किया जो उनकी धार्मिक सहिष्णुता का परिचायक है. राष्ट्रकूटों के काल में मूल रूप से दक्षिण भारत में जैन धर्म का विकास हुआ. महान् राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष की जैन धर्म में गहरी रुचि थी. प्रसिद्ध जैन आचार्य जिनसेन उनके गुरु थे तथा उसने अपने पुत्र कृष्ण के लिए जैन आचार्य गुणभद्र को नियुक्त किया था. उसने बनबासी के जैन विहार का निर्माण करवाया.
इस समय ब्राह्मण धर्म की उन्नति भी काफी हुई. राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम द्वारा बनवाया गया एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मन्दिर सुविख्यात है. अमोघवर्ष ने जैन होते हुए भी महालक्ष्मी की पूजा की तथा एक बार महामारी से बचने के लिए उसने अपनी अंगुली काटकर महालक्ष्मी की प्रतिमा को भेंट कर दी. 
राष्ट्रकूट काल में दक्षिण में अपेक्षाकृत बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार कम रहा. कन्हेरी का बौद्ध विहार उस समय प्रसिद्ध था. मुस्लिम धर्म के प्रति लोगों में सहिष्णुता थी तथा मुस्लिम लेखकों के विवरण से पता चलता है कि राष्ट्रकूट राज्य में मुस्लिम व्यापारियों को मस्जिद बनवाने तथा अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतन्त्रता मिली हुई थी.
> राष्ट्रकूटकालीन साहित्य
राष्ट्रकूट शासकों के संरक्षण में साहित्य का विकास प्रचुर मात्रा में हुआ. उनके समय में मुख्य रूप से संस्कृत तथा कन्नड़ साहित्य का विकास हुआ, राष्ट्रकूट अभिलेखों में संस्कृत भाषा का प्रयोग किया गया है. अमोघवर्ष ने कन्नड़ भाषा में प्रसिद्ध काव्य ग्रन्थ 'कविराज मार्ग' लिखा था, उनकी राजसभा में 'आदिपुराण' के लेखक जिनसेन, गणितसार संग्रह' के रचयिता महावीराचार्य तथा 'अमोघवृत्ति के लेखक साक्तायन निवास करते थे. अकलंक एवं विद्यानन्द ने क्रमशः अष्टशती एवं अष्टसहस्त्री की रचना की. ये दोनों पुस्तकें मीमांशा पर भाष्य हैं.
एक अन्य कवि पोन्ना राष्ट्रकूट दरबार में रहते थे जिन्होंने ‘शांति पुराण’ की रचना कन्नड़ भाषा में की. तर्कशास्त्र के क्षेत्र में माणिक्यनंदिन ने आठवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ‘परीक्षामुखशास्त्र' लिखा.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राष्ट्रकूट काल के शासक विद्या तथा साहित्य के प्रेमी थे तथा उनके संरक्षण में प्रभूत साहित्य की रचना हुई.
> राष्ट्रकूटकालीन कला : एलोरा के कैलाश मन्दिर के सन्दर्भ में
रूप से राष्ट्रकूट काल के मन्दिर स्थापत्य के दर्शन हमें विशेष ऐलोरा में देखने को मिलता है. मन्दिरों में कैलाश मन्दिर अपनी आश्चर्यजनक शैली के लिए विश्व प्रसिद्ध है. इसका निर्माण कृष्ण प्रथम ने अत्यधिक धन व्यय करके करवाया था. यह प्राचीन भारतीय वास्तु एवं तक्षण कला का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है. यह सम्पूर्ण मन्दिर एक ही पाषाण को काटकर बनाया गया है. इसका विशाल प्रांगण 276 फुट लम्बा तथा 154 फुट चौड़ा है. इसमें विशाल स्तम्भ लगे हैं तथा छत मूर्तिकारी से भरी है. मन्दिर के ऊपर का विशाल शिखर 95 फुट ऊँचा है तथा यह चार तल्ला है. मन्दिर में प्रवेश द्वार तथा मण्डप बनाए गए हैं. इसकी चौकी 25 फुट ऊँची है. मन्दिर के समीप ही पाषाण काटकर एक लम्बी पंक्ति में हाथियों की मूर्ति बनाई गई है. मन्दिर की वीथियों में भी अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं. महिषासुर का वध करती दुर्गा, सीता-हरण आदि के 50 रावण दृश्य इनमें कृष्ण, भगवान् विष्णु, कैलाश पर्वत उठाए हुए बड़े ही मनोहारी हैं. समग्र रूप में यह ह एक अत्युत्कृष्ट रचना है. पाषाण काटकर बनाए गए मन्दिरों में इस मंदिर का स्थान अद्वितीय है. 
> प्रतिहार राजवंश
परिचय–अग्निकुल के राजपूतों में सर्वाधिक प्रसिद्ध वंश प्रतिहार वंश था, जो गुर्जरों की शाखा से सम्बन्धित होने के कारण इतिहास में गुर्जर प्रतिहार के नाम से जाना जाता है. इस वंश की प्राचीनता 5वीं सदी तक ज्ञात होती है. पुलकेशियन द्वितीय के एहोल अभिलेख में गुर्जर जाति का सर्वप्रथम उल्लेख हुआ है. बाण के हर्षचरित में भी गुर्जरों का लेख किया गया है. चीनी यात्री ह्वेनसांग 'कु-चे-लो' (गुर्जर) देश का उल्लेख करता है जिसकी राजधानी पि-लोमो-ली अर्थात् भीनमाल बताता है.
उत्पत्ति – विभिन्न राजपूतों की उत्पत्ति के समान ही गुर्जर प्रतिहार वंश की उत्पत्ति भी अत्यन्त विवादास्पद है. विदेशी इतिहासकारों ने उन्हें 'खजर' नामक जाति से उत्पन्न माना है, जो हूणों के साथ भारत आई थी. इस मत की पुष्टि केम्बेल, जेक्सन, भण्डारकर, त्रिपाठी आदि विद्वानों ने की है, जबकि गौरी शंकर ओझा, सी. वी. वैद्य, दशरथ शर्मा जैसे विद्वान् गुर्जरों को भारतीय ही मानते हैं. वे इस शब्द का अर्थ 'गुर्जर देश का प्रतिहार अर्थात् शासक' लगाते हैं. के. एम. मुन्शी ने विभिन्न उदाहरणों से यह सिद्ध किया है कि गुर्जर शब्द स्थानवाचक है न कि जातिवाचक. हूणों को इतिहास में मलेच्छ कहा गया है, जबकि गुर्जरों को ब्राह्मण. ह्वेनसांग गुर्जर नरेश को क्षत्रिय बताता है. साहित्य अथवा इतिहास में इन्हें कहीं भी विदेशियों से नहीं जोड़ा गया है. उनके लेखों से हम इन्हें ब्राह्मण मूल का स्वीकार कर सकते हैं जिन्होंने बाद में क्षत्रिय धर्म स्वीकार कर लिया.  
> प्रमुख शासक व उनकी उपलब्धियाँ
वत्सराज (775-800 ई.)
वत्सराज एक शक्तिशाली शासक था जिसे इस वंश का वास्तविक संस्थापक माना जा सकता है. इसने शासक बनने के बाद कन्नौज पर आक्रमण कर वहाँ के शासक इन्द्रायुध को हराया तथा उसे अपने अधीन कर लिया. ग्वालियर अभिलेख के अनुसार उसने भण्डीकुल को पराजित कर उसका राज्य छीन लिया. वत्सराज ने गौड़ देश के शासक धर्मपाल को भी हरा दिया था. ऐसी स्थिति में धर्मपाल ने राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव को उत्तर की ओर अभियान करने के लिए उकसाया जिसके अभियान के फलस्वरूप वत्सराज को पराजित होना पड़ा. बाद में पाल नरेश धर्मपाल ने भी उसे पराजित कर दिया. 
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि वत्सराज की प्रारम्भिक सफलताएँ अत्यधिक महत्वपूर्ण थीं, लेकिन एक से अधिक  संगठित शत्रुओं का मुकाबला करने की योग्यता उसमें नहीं थी जिसके कारण उसे राजपूताने में शरण लेने को विवश होना पड़ा.
> मिहिरभोज प्रथम : त्रिपक्षीय संघर्ष में भूमिका 
इसके विषय में हमें प्रामाणिक सूचनाएँ उसकी ग्वालियर प्रशस्ति से प्राप्त होती हैं. इनके अतिरिक्त कल्हण तथा अरब यात्री सुलेमान के यात्रा विवरणों द्वारा भी हमें इसके विषय में प्रामाणिक जानकारी प्राप्त होती है.
प्रारम्भ में भोज को अपने समय की दोनों प्रतिद्वन्द्वी शक्तियों पाल नरेश देवपाल तथा राष्ट्रकूट नरेश ध्रुव से पराजित होना पड़ा, परन्तु देवपाल की मृत्यु तथा राष्ट्रकूटों की आन्तरिक उलझन के कारण इसे राज्य विस्तार का सुनहरा अवसर प्राप्त हो गया.
वत्सराज ने अपने मित्र गोरखपुर के चेदि तथा गुहिलोत सरदारों की मदद से देवपाल के उत्तराधिकारी नारायण पाल को बुरी तरह से पराजित कर दिया और उसके राज्य के पश्चिमी भागों पर अपना अधिकार कर लिया.
नारायण पाल को पराजित करने के बाद वह राष्ट्रकूट शासक कृष्ण द्वितीय, जोकि उस समय चालुक्यों के साथ युद्ध में फँसा हुआ था, पर आक्रमण कर दिया तथा नर्मदा के तट पर उसे परास्त कर दिया. इस विजय के फलस्वरूप मालवा पर उसका अधिकार हो गया. इसके बाद उसने गुजरात की ओर बढ़कर खेड़ा के आसपास के भू-भाग को जीत लिया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि त्रिपक्षीय संघर्ष में अजेय राष्ट्रकूट शक्ति को उसने पराजित कर प्रतिहार वंश में अपना स्थान महत्वपूर्ण शासक के रूप में दर्ज करवा लिया.
> महेन्द्र पाल : साहित्यिक उपलब्धियाँ
महेन्द्र पाल ने केवल एक विजेता एवं साम्राज्य निर्माता था, बल्कि कुशल प्रशासक एवं विद्या तथा साहित्य का महान् संरक्षक भी था. उसकी राज सभा में प्रसिद्ध विद्वान् राजशेखर निवास करते थे, जो उसके राजगुरु थे. राजशेखर ने ‘कर्पूरमंञ्जरी', 'काव्य मीमांसा', 'विद्धशाल भंजिका', 'बालरामायण’, ‘भुवनकोश', 'हरविलाश' जैसे प्रसिद्ध ग्रन्थों की रचना की थी. उनकी रचनाओं से कन्नौज नगर के वैभव एवं समृद्धि का पता चलता है. महेन्द्र पाल के समय में कन्नौज नंगर हिन्दू सभ्यता एवं संस्कृति का केन्द्र बन गया तथा शक्ति और सौन्दर्य में इसकी बराबरी करने वाला कोई दूसरा नगर न रहा.
> मालवा का परमार वंश
परिचय - मालवा के परमार वंश का संस्थापक उपेन्द्र अथवा कृष्णराज था, जोकि प्रारम्भ में राष्ट्रकूटों के सामन्त के रूप में धारा में शासन करता था. धारा नामक नगरी परमारों की राजधानी थी. सीयक द्वितीय ने (945 ई.) में सर्वप्रथम राष्ट्रकूटों से स्वतन्त्रता प्राप्त की थी. इस वंश में सर्वाधिक प्रतापी शासक भोज हुआ था.
> भोज की उपलब्धियाँ : राजनैतिक (1011-1060 ई.)
भोज अपने पिता सिन्धुराज की मृत्यु (1011 ई.) के बाद परमार सिंहासन पर बैठा, जिसके विषय में सूचना देने के लिए हमें उसके 8 अभिलेख मिलते हैं. उदयपुर प्रशस्ति से हमें उसकी राजनैतिक उपलब्धियों का विवरण प्राप्त होता है, जिनका विवरण निम्नलिखित है
1. भोज का सर्वप्रथम संघर्ष कल्याणी के चालुक्यों से हुआ और उसने चालुक्यों से गोदावरी के आसपास का क्षेत्र जीत लिया.
2. भोज के सामन्त यशोवर्मा के लाट से प्राप्त अभिलेख के अनुसार उसने लाट प्रदेश के शासक कीर्तिवर्मा को हरा दिया.
3. लाट जीतने के बाद भोज ने शिलाहार वंश के शासक को हराकर कोंकण का प्रदेश जीत लिया.
4. भोज द्वारा उड़ीसा का प्रदेश भी जीता गया था. सम्भवतः उसके समय में वहाँ पर इन्द्ररथ शासन का था.
5. उदयपुर तथा कल्वन अभिलेखों के अनुसार उसने चेदि नरेश गांगेयदेव को भी पराजित किया था.
6. अपनी अनेक विजयों के बाद उसने अपने राज्य को अत्यन्त विस्तारित कर दिया, परन्तु विद्याधर ने भोज को जीवन के अन्तिम दिनों में पराजित कर दिया.
7. चालुक्य नरेश सोमेश्वर ने भोज की राजधानी धारा पर आक्रमण कर दिया जिसमें भोज पराजित होकर भाग खड़ा हुआ तथा चालुक्यों द्वारा राजधानी लूट ली उसकारा गई.
भोज का अन्त यद्यपि दुःखद रहा, तथापि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह अपने युग का एक पराक्रमी नरेश था. उसके उत्कर्ष काल में उत्तर तथा दक्षिण की सभी शक्तियों ने उसका लोहा माना था. उसने परमार सत्ता को चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया था. GEDA
> भोज की उपलब्धियाँ : सांस्कृतिक
भारतीय इतिहास में भोज की ख्याति उसकी विद्वता तथा विद्या एवं कला के उदार संरक्षक के रूप में अधिक है. उसने अपनी राजधानी को विद्या तथा कला का सुप्रसिद्ध केन्द्र बनाने के लिए यहाँ अनेक महल एवं मन्दिर बनवाए जिनमें सरस्वती मन्दिर सर्वप्रमुख था. 
भोज स्वयं विद्वान् था तथा उसकी उपाधि कविराज थी. उसने ज्योतिष, काव्यशास्त्र, वास्तु आदि पर महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की तथा धारा के सरस्वती मन्दिर में संस्कृत विद्यालय की स्थापना की.
उसकी रचनाओं में शृंगार प्रकाश, प्राकृत व्याकरण, कूर्मशतक, शृंगार मंजरी, भोज 1 चम्पू, कृत्यकल्पतरु आदि मुख्य हैं. उसके दरबारी कवियों एवं विद्वानों में भाष्करभट्ट, दामोदर मिश्र, धनपाल आदि मुख्य थे. 
भोज विद्वान् होने के साथ-साथ महान् निर्माता भी था. भोपाल के दक्षिण-पूर्व में उसने 250 वर्ग मील लम्बी एक झील का निर्माण भी करवाया था, जो आज भी 'भोजस' के नाम से जानी जाती है, धारा में उसने सरस्वती मन्दिर के समीप एक विजय स्तम्भ स्थापित किया था तथा भोजपुर नामक नगर की स्थापना करवायी. चित्तौड़ में उसके द्वारा त्रिभुवन नारायण के मन्दिर का निर्माण करवाया गया. मेवाड़ के नागोर क्षेत्र में भोज द्वारा अनेक भूमि दान दिए गए.
इस प्रकार स्पष्ट है कि भोज की प्रतिभा बहुमुखी थी. उसका शासनकाल राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टियों से परमार वंश के चरमोत्कर्ष को व्यक्त करता है.
> चाहमान वंश
परिचय–राजपूतों का चौहान (चाहमान) वंश अजमेर के उत्तर में साम्भर (शाकम्भरी) में राज्य करता था. इस वंश के प्रारम्भिक नरेश कन्नौज के प्रतिहार शासकों के सामन्त थे. दसवीं शदी ई. के मध्य इस वंश के सिंहराज ने अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दी. इस प्रकार शाकम्भरी के चाहमान राज्य का संस्थापक सिंहराज हुआ. इस वंश में अनेक प्रतापी शासक हुए जिनमें विग्रहराज चतुर्थ एवं पृथ्वीराज तृतीय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है.
विग्रहराज-IV (1153-1163 ई.) – चौहान वंशी राजाओं में विग्रहराज-IV सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था. उसने तोमर राजाओं को हराकर उनकी राजधानी दिल्ली पर अधिकार कर लिया. बिजोलिया लेख से ज्ञात होता है कि यहाँ का तोमर राजा तंवर था.
विग्रहराज ने अपने समकालीन चालुक्य शासक कुमारपाल को पराजित कर मेवाड़ तथा मारवाड़ पर अपना अधिकार कर लिया और उस कलंक को धो डाला, जो उसके पिता अर्णोराज की चालुक्यों के हाथों पराजय के रूप में मिला था.
विग्रहराज के शिवालिक अभिलेख से पता चलता है कि उसने तुर्क आक्रमणकारी, जोकि लाहौर का 'खुसरूशाह' था को पराजित कर देश की मलेच्छों से रक्षा की.
विजेता होने के साथ-साथ वह स्वयं एक विद्वान् तथा विद्वानों का आश्रयदाता था. उसे 'हरिकेली' नामक नाटक लिखने का श्रेय दिया जाता है. उसके दरबार में सोमदेव नामक कवि निवास करता था, जिसने ललितविग्रहराज' नामक ग्रन्थ लिखा, इतिहास में विग्रहराज-IV 'बीसलदेव' के नाम से प्रसिद्ध है.
पृथ्वीराज-III (1177-1192 ई.)- सोमेश्वर व कर्पूरी देवी से उत्पन्न पुत्र पृथ्वीराज-III चौहान वंश का सबसे प्रतापी राजा हुआ. इतिहास में वह राय पिथौरा के नाम से जाना जाता है.
अपने राज्य विस्तार एवं शक्ति को सुदृढ़ करने की प्रक्रिया में उसे सर्वप्रथम अपने चाचा नागार्जुन के विद्रोह का दमनं करना पड़ा. इसमें उसने उन्हें न केवल पराजित किया, बल्कि उसके सभी सहयोगियों को मौत के घाट उतार दिया .
इसके बाद पृथ्वीराज ने चन्देल शासक परमार्दीदेव को हराकर उसकी राजधानी महोबा पर अधिकार कर लिया जिसमें परमार्दीदेव के प्रसिद्ध सेनानायक आल्हा और ऊदल मारे गए और परमार्दीदेव ने आत्महत्या कर ली. पृथ्वीराज का मदनपुर अभिलेख इस तथ्य की पुष्टि करता है. पृथ्वीराज रासो के अनुसार पृथ्वीराज ने गुजरात पर आक्रमण कर वहाँ की कन्या संयोगिता का अपहरण कर उससे विवाह किया के चालुक्य शासक भीम को पराजित कर मार डाला. जयचन्द जिसके कारण उनसे पहले के बिगड़े सम्बन्ध और भी कड़वे हो गए.
  • पृथ्वीराज के समय में ही मुहम्मद गौरी के भारत पर आकमण हुए. 1191 ई. में तराइन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज ने गोरी की सेनाओं को पराजित कर दिया तथा भागती हुई तुर्क सेना का पीछा नहीं किया. मिन्हज-उस- शिराज लिखता है कि पराजित होने के बाद गोरी की सेना बिना किसी रुकावट के स्वदेश लौट गई और चौहानों ने उसे परेशान नहीं किया. पृथ्वीराज निश्चिन्त होकर रंगरेलियाँ मनाने में लग गया.
  • गोरी को शक्ति जुटाने का पूरा अवसर मिला और अगले ही वर्ष 1192 ई. में वह तराइन के मैदान में पुनः आ डटा. इस युद्ध में पृथ्वीराज की पराजय हुई तथा उसे निर्दयतापूर्वक कत्ल कर दिया गया. मुसलमानों ने राजपूत सेना का भीषण नरसंहार किया और चाहमान सत्ता के विभिन्न केन्द्रों पर गोरी का अधिकार हो गया "तथा इसके साथ ही चौहान सत्ता का अन्त. 
तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक युद्धों में से एक है, क्योंकि इस युद्ध ने भारत भूमि पर मुस्लिम सत्ता स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया.
> मूल्यांकन
यद्यपि तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज पराजित हुआ, फिर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि वह अपने समय का महान् योद्धा था. इस युद्ध के पहले तक वह अजेय बना रहा तथा उसने अपने समय की सभी प्रमुख शक्तियों को करारी मात दी थी. उसका शरीर बलिष्ठ, सुन्दर एवं आकर्षक था. तीरन्दाजी में वह अपने समय का श्रेष्ठ वीर था. मुस्लिम लेखक भी उसकी शक्ति की प्रशंसा करते हैं योद्धा होने के साथ-साथ वह विद्वान् एवं विद्वानों का महान संरक्षक था. उसकी राज्यसभा में लब्ध प्रतिष्ठित विद्वान् निवास करते थे जिनमें जयानक भट्ट, विद्यापति गौड़, पृथ्वी भट्ट, बागीश्वर, जनार्दन, विश्वरूप आदि उल्लेखनीय हैं. चन्दबरदाई उसका राजकवि था जिसकी रचना 'पृथ्वीराज रासो' को हिन्दी के प्रथम महाकाव्य के रूप में स्वीकार किया जाता है.
> गुजरात के चालुक्य
चालुक्यों अथवा सोलंकियों ने लगभग साढ़े तीन सदियों (950-1300 ई.) तक गुजरात और काठियावाड़ में शासन किया. उनकी राजधानी अन्हिलवाड़ थी. इस वंश के सभी शासक जैन धर्म के पोषक एवं संरक्षक थे. इस वंश के शासकों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है
> भीम प्रथम
यह अपने वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था. इसने धारा के परमार नरेश भोज के विरुद्ध कलचुरि नरेश कर्ण के साथ मिलकर एक संघ बनाया. इस संघ ने मालवा पर आक्रमण कर भोज की राजधानी धारा को लूट लिया.
भीम ने सिन्ध के राजा हम्मुक को पराजित कर उसे अपने अधीन कर लिया था. भीम प्रथम के समय की सर्वाधिक उल्लेखनीय घटना 1025 ई. में सोमनाथ पर महमूद गजनवी का आक्रमण थी जिसने सोमनाथ के मन्दिर को ध्वस्त कर दिया था. भीम ने उसका पुनर्निर्माण करवाया.
भीम महान् निर्माता भी था. पाटन में उसने भीमेश्वरदेव तथा भट्टारिका के मन्दिरों का निर्माण करवाया था. उसी के सामंत विमलशाह ने आबू का प्रसिद्ध दिलवाड़ा के जैन मन्दिर का निर्माण करवाया.
> कर्ण 
कर्ण की राजनैतिक क्षेत्र में विशेष उपलब्धि ज्ञात नहीं है, लेकिन उसके निर्माण कार्यों द्वारा उसे जाना जाता है. उसने कर्णावती नामक नगर की स्थापना की तथा वहाँ कर्णेश्वर नामक मन्दिर एवं कर्णसागर नामक तालाब का निर्माण करवाया. अन्हिलवाड़ के कर्णमेरु नामक मन्दिर के निर्माण का श्रेय भी उसे ही दिया जाता है.
> जयसिंह सिद्धराज
जयसिंह, जिसने सिद्धराज की उपाधि धारण की, अपने पिता कर्ण के उपरान्त गद्दी पर बैठा तथा लगभग 50 वर्षों तक शासन किया. अनेक विजयों द्वारा अपने राज्य को उसने विस्तृत किया. उत्तर में परमारों को हराकर उसने भीनमाल पर अधिकार कर लिया. इसके बाद उसने शाकम्भरी के चाहमानों को परास्त किया. उसने चन्देल राज्य पर भी आक्रमण किया तथा कालिंजर और महोबा तक पहुँच गया. दक्षिण में कल्याणी के चालुक्य विक्रमादित्य-VI पर भी विजय प्राप्त की.
जयसिंह विद्वानों का महान् संरक्षक था, उसके नेतृत्व में, गुजरात में ज्ञान और साहित्यिक गतिविधियों के अनेक केन्द्र थे. उसके दरबार में अनेक कवि एवं विद्वान् आश्रय पाते थे जिनमें हेमचन्द्र प्रमुख था. हेमचन्द्र ने 'सिद्ध-हेमचन्द्र' नामक व्याकरण एवं 'द्वयाश्रयनिकाय' नामक ग्रन्थों की रचना की. जयसिंह शैवधर्म का अनुयायी था और अनेक मन्दिरों का निर्माण उसके द्वारा करवाया गया जिनमें सर्वप्रमुख 'सिद्धपुर का रुद्रमहाकाल मन्दिर' था.
> कुमारपाल
सम्बन्धी जयसिंह सिद्धराज के बाद उसका दूर का कुमारपाल शासक बना. यह एक महत्वाकांक्षी शासक था. इसने अजमेर के चाहमान शासक अर्णोराज को हराकर उसकी पुत्री जाल्हणादेवी से अपना विवाह किया और उससे मैत्री सम्बन्ध कायम किया.
जैन ग्रन्थों के अनुसार कुमारपाल ने मालवा के शासक बल्लाल के ऊपर आक्रमण कर उसे मार डाला तथा कोंकण के शिलाहार वंशी शासक को भी जीत लिया. सम्भवतः यह शासक मल्लिकार्जुन था. 
हेमचन्द्र के प्रभाव में आकर इसने जैन धर्म स्वीकार कर लिया .
> भीमदेव-II  
अजयपाल का पुत्र भीमदेव 1172 ई. के आसपास गुजरात का शासक बना. इसके समय की उल्लेखनीय घटना है 1178 ई. ई. में उसके राज्य पर मुसलमानों के जिसका कि इसने सफलतापूर्वक प्रतिरोध लिया. आक्रमण किया. 
भीम-II गुजरात के चालुक्य राजपूतों का अन्तिम शासक था. 1197 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसके राज्य पर अधिकार कर लिया. 
इसके बाद उसके एक मन्त्री लवण प्रसाद ने गुजरात बघेल वंश की स्थापना की थी और यह वंश 1240 तक गुजरात में शासन करता रहा. बाद में गुजरात दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया.
> प्राचीन भारत में वैज्ञानिक विकास 
प्राचीन भारतीय साहित्य व्याकरण, व्युत्पत्तिशास्त्र, छन्द, अलंकारशास्त्र आदि में जितना समृद्ध था उतनी ही समृद्धता वैज्ञानिक साहित्य में भी थी. भैषज्य, शल्य चिकित्सा, गणित, ज्योतिष आदि वैज्ञानिक विषयों पर अनेक ग्रन्थ लिखे गए. इन ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि प्राचीन भारत में वैज्ञानिक ज्ञान कितना उन्नत था. गणित के क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने काफी उन्नति की. अंकों तथा दशमलव पद्धति के आविष्कारों से गणित का विकास हुआ. शुल्वसूत्र में वेदियों के निर्माण, ज्यामितीय आकृतियों और पाइथागोरस प्रमेय आदि का उल्लेख है. पाँचवीं सदी में बीजगणित और अंकगणित का काफी विकास हुआ. भारतीय ज्योतिष का आविष्कार पाँचवीं सदी में हुआ. आर्यभट्ट को भारतीय ज्योतिष का आविष्कारक माना जाता है. आर्यभट्टीय उनका सुप्रसिद्ध ग्रन्थ था. छठी शताब्दी में वराहमिहिर ने पंच सिद्धान्तक लिखकर व्यावहारिक ज्योतिष को नए आयाम दिए. ब्रह्मगुप्त का ब्रह्मस्फुटिक सिद्धान्त और भास्कराचार्य का सिद्धान्त शिरोमणि' ज्योतिषशास्त्र के अन्य प्रमुख ग्रन्थ थे.
चिकित्सा क्षेत्र में चरक और सुश्रुत का नाम उल्लेखनीय है. चरक ने भैषज्य और सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा पर क्रमशः चरक संहिता और सुश्रुत संहिता नामक ग्रन्थ लिखे. अथर्ववेद में भी अनेक रोगों का निदान बताया गया है. छठी सदी में वाग्भट्ट ने ‘अष्टांग हृदय' लिखा, जिसमें अनेक रोगों की चिकित्सा विधि का उल्लेख है.
मेहरौली का लौह स्तम्भ तत्कालीन धातुकर्म में उन्नतिशीलता को दर्शाता है.
> राजपूत काल की सामाजिक दशा का विवरण
राजपूतकालीन समाज वर्णों एवं जातियों के जटिल नियमों में बँधा हुआ था परम्परागत चार वर्णों— ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रों के अतिरिक्त समाज में अनेक जातियाँ एवं उपजातियाँ पैदा हो गई थीं. राजतरंगिणी में 64 उपजातियों का उल्लेख हमें प्राप्त होता है. सदा की भाँति इस काल में ब्राह्मण आदरणीय थे एवं राजपूत योद्धा वर्ग था. वैश्य लोग व्यापार के साथ-साथ धन उधार देने का कार्य करते थे. शूद्रों का कार्य इस युग में कृषि, शिल्पकारी व अन्य वर्णों की सेवा करना था. वैश्य तथा शूद्र जाति के लोगों को मन्त्रोच्चारण का अधिकार नहीं था. उल्लेखनीय है कि शूद्रों के साथ कृषि व्यवसाय के जुड़ जाने के उनकी सामाजिक स्थिति पहले से बेहतर हो गई थी. ग्यारहवींबारहवीं सदी तक आते-आते समाज में जाति प्रथा की रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज उठाई गई. जैन, शाक्त, तान्त्रिक सम्प्रदाय के अनुयायियों तथा चार्वाक मत के समर्थक लोगों ने कर्म की महत्ता को प्रतिपादित किया. बी. एन. यादव के अनुसार जाति प्रथा के विरोध के पीछे निम्न वर्ग की आर्थिक स्थिति में सुधार होना मुख्य कारण था. 
राजपूत युग में स्त्रियों को सम्मानित स्थान प्राप्त था. उनकी मान पर्यादा एवं सतीत्व की रक्षा के लिए वे अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए तैयार रहते थे. स्वयंवर प्रथा के भी उदाहरण मिलते हैं. सामान्य स्त्रियों को पढ़ने के अधिकार से वंचित रखा गया तथा विवाह करने की आयु और कम हो गई तथा पर्दा प्रथा प्रचलन में आ गई थी. सतीप्रथा का प्रचलन बढ़ गया था तथा कई बार जबरन भी सती होना पड़ता था.
किन्तु भूमि पर सम्पत्ति के अधिकार की वृद्धि होने से औरतों के भूमि सम्बन्धी अधिकारों में भी वृद्धि हुई. पारिवारिक सम्पत्ति की सुरक्षा के नाम पर औरतों को अपने पुरुष सम्बन्धियों की सम्पत्ति उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त करने का अधिकार था.
राजपूतों को घुड़सवारी तथा हाथियों की सवारी का विशेष शौक था. वे शिकार में भी रुचि रखते थे. मदिरापान, धूतक्रीड़ा, अफीम का सेवन आदि दुर्व्यसन भी उनमें प्रचलित थे.
  • उल्लेखनीय है कि इसी काल में कायस्थ वर्ग जो मुख्यतः लिपिकीय कार्य करता था, का जन्म हुआ.
  • इस काल में उत्तर भारत में शिक्षित वर्ग का दृष्टिकोण और भी अनम्य हो गया, वे किसी नवीन विचार को ग्रहण करने या सूत्रपात करने की बजाय पुराने ज्ञान को ही दुहराते रहे. उन लोगों ने भारत से बाहर के वैज्ञानिक विचारों से अपने को अलग रखा और यही कारण भारत के पिछड़ेपन का रहा जिसकी आगे चलकर भारत को बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.
इस प्रकार स्पष्ट है कि समाज का स्वरूप सामन्तशाही था तथा समाज में उन लोगों का प्रमुख स्थान था, जो बिना कार्य किये ही उस पर अधिकार रखते थे. इस काल में उत्तरी भारत में ऐसे समाज की स्थापना का व्यापक प्रभाव पड़ा.
> सामंतवाद
सातवाहन काल में सामंतवाद की शुरूआत भारत हुई. इसने गति पकड़ी गुप्तकाल में और यह अपने चर्मोत्कर्ष पर थी राजपूत काल में सामंतों की उत्पत्ति शासकों द्वारा दिए गए भूमि अनुदानों के कारण हुई. चाहे वे भूमि अनुदान वेतन के एवज में सरकारी कर्मचारियों को दिए गए हों या फिर विद्वानों एवं धर्म सम्बन्धी पुरुषों को दिए हो. सातवाहन और गुप्तकाल में ये राजनीति में ज्यादा प्रभावी नहीं रहे, लेकिन राजपूत काल के आते-आते ये राजनीति में अत्यन्त प्रभावी हो अतएव राजपूतों की राज पूर्णतः सामंतों पर हो गई. राजपूत काल में सामंतों की संख्या काफी अधिक हो गई थी. गुप्तकाल से ही सामंतों राजनीति में अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था. गुप्त राजनी साम्राज्य के पतन के लिए सामंतवादी व्यवस्था एक महत्वपूर्ण कारक थी. इस सामंतवादी व्यवस्था के कारण ही गुप्त शासन व्यवस्था का विकेन्द्रीयकरण हो गया था. 
सामंतवादी व्यवस्था में राजा के अधीन सामंत होते थे और बड़े सामंतों के अधीन छोटे सामंत सामंत अपने-अपने क्षेत्रों में निरंकुश शासक की भाँति कार्य करते थे. उनका प्रमुख कार्य अपने क्षेत्र से भू-राजस्व एकत्र करना और कानून व्यवस्था बनाए रखना था. ये अपने स्वामी राजा को प्रतिवर्ष भू-राजस्व का एक बड़ा हिस्सा पहुँचाते थे और जब कभी राजा को जरूरत पड़ती थी, तो सैन्य एवं आर्थिक सहायता क उपलब्ध कराते थे.
सामंतवादी व्यवस्था के अन्तर्गत राजा सम्पूर्ण सेना अपने नियन्त्रण में न रखकर सामंतों के अधीन रखता था और प्रत्येक सामंत को एक निश्चित संख्या में सैनिक रखना अनिवार्य था. सैनिकों की संख्या के हिसाब से ही सामंतों को जागीर दी जाती थी.
सामंतवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यह था कि अगर राजा थोड़ा-सा भी कमजोर हुआ, तो ये सामंत उसके खिलाफ ही विद्रोह कर देते थे और वक्त-वक्त पर अपनी निष्ठा बदलते रहते थे. राजा को सदैव उनकी सहायता पर निर्भर रहना पड़ता था. इन सामंतों में सदैव आपसी झगड़े होते रहते थे और उनमें फूट थी. इसी कारण जब कभी बाह्य आक्रमण हुए, राजपूतों की पराजय हुई.
> स्त्रियों की दशा
परिवार में स्त्रियों की स्थिति उनकी वैवाहिक स्थिति एवं आयु द्वारा निर्धारित होती थी. ये परिवार के मुखिया के नियन्त्रण में रहती थीं और कभी पूर्णतः स्वतन्त्र नहीं होती थीं. वैदिककाल में उनकी स्थिति परवर्ती काल के सापेक्ष काफी अच्छी थी. वैदिक काल में स्त्रियों को काफी स्वतन्त्रता प्राप्त थी, लेकिन राजपूतकाल तक आते-आते उनकी स्थिति में काफी परिवर्तन हो चुका था. अब उनका विवाह यौवनावस्था से पूर्व होने लगा. अनेक प्रकार के विवाहों में केवल चार प्रकार के विवाह ही मान्य थे – ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्रजापत्य विवाह विवाह की स्वयंवर प्रथा प्रचलित थी. कन्याओं को स्वयंवर में अपना पति चुनने का अधिकार था. उच्च जातियों में विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार नहीं था और न ही उनकी सामाजिक स्थिति अच्छी थी. विधवा का विवाह कुछ जातियों में देवर से मान्य था. सती प्रथा का प्रचलन हो चुका था.
सम्पूर्ण प्राचीनकाल में स्त्रियों की स्थिति सदैव एकसी नहीं रही. वह लगातार गिरती रही. राजपूतकाल में पर्दा प्रथा का प्रचलन हो चुका था. उच्च परिवार की स्त्रियाँ घर से बाहर नहीं निकलती थीं, जबकि निम्न जाति की स्त्रियाँ घर से बाहर काम पर जाती थीं. स्त्री के सतीत्व और पतिभक्ति पर काफी बल दिया जाता था.
वैश्यावृत्ति राजपूतों में प्रचलित थी. अनेक वैश्याओं को राजकीय संरक्षण प्राप्त था. बहुपत्नी प्रथा उच्च वर्ग में प्रचलित थी. जहाँ अनेक पत्नियाँ होती थीं वहाँ उपेक्षिता पत्नी के प्रति प्रेम और ध्यान का अभाव रहता था. पत्नियों को पति की शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकताओं को पूरा करना पड़ता था.
स्त्रियों की दशा पुरुषों के बराबर नहीं थी, उनकी स्थिति शूद्रों से कुछ ही बेहतर थी. 
> शैक्षिक संस्थान
गुरु आश्रम शिक्षा के केन्द्र थे. उच्च शिक्षा के जो केन्द्र गुप्तकाल या उसके बाद स्थापित किए गए थे, वे मुख्यतः धार्मिक केन्द्र थे. प्राचीन भारत के शिक्षा केन्द्रों में तक्षशिला और नालन्दा विश्वविद्यालय का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है. तक्षशिला विश्वविद्यालय मौर्यकाल में अपने चर्मोत्कर्ष पर था. इसके पतन के बाद नालन्दा विश्वविद्यालय ने इसका स्थान ले लिया. हर्ष के समय में इसकी ख्याति दूरदूर तक फैली हुई थी. ह्वनेसांग जब नालन्दा पहुँचा उस समय उसने वहाँ छः विहार देखे, जिन्हें छः राजाओं ने बनवाया था. इस विश्वविद्यालय में विभिन्न देशों से विशेषकर दक्षिण-पूर्वी एवं पूर्वी एशिया से विद्यार्थी पढ़ने आते थे. यह बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था. इत्सिंग के अनुसार मंगोलिया, चीन, कोरिया, तिब्बत और बुखारा जैसे सुदूरवर्ती देशों से भी विद्यार्थी यहाँ अध्ययन के लिए आते थे. विश्वविद्यालय में प्रवेश केवल प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने पर ही मिलता था. इत्सिंग के समय में विद्वान् शीलभद्र यहाँ के कुलपति थे. इत्सिंग के अनुसार इस विश्वविद्यालय में ब्राह्मण एवं बौद्ध साहित्य, धार्मिक तथा लौकिक, दार्शनिक एवं व्यावहारिक साहित्य, विज्ञान एवं कला सम्बन्धी साहित्य का अकृत भण्डार था. असंग, वसुबन्धु, दिग्नाग, धर्मपाल आदि यहाँ के प्रमुख शिक्षक थे. यह विश्वविद्यालय तेरहवीं शताब्दी में बख्तियार खलजी द्वारा नष्ट कर दिया गया.
काठियावाढ़ का वल्लभी विश्वविद्यालय, उत्तरी मगध का विक्रमशिला विश्वविद्यालय, ओदन्तपुरी और मिथिला विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के अन्य प्रमुख केन्द्र थे. ह्वेनसांग ने जब वल्लभी का भ्रमण किया था, तब वहाँ लगभग 6,000 भिक्षु थे, जो 1,000 संघारामों में रहते थे और यहाँ के अध्यक्ष स्थिरमति और गुणमति थे. यहाँ राजनीति, छन्दशास्त्र और चिकित्साशास्त्र के अध्ययन की व्यवस्था थी. विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना पालशासक धर्मपाल ने नवीं शताब्दी में की.
ये विद्यालय वैदिककाल की परिषदी के समान थे. वैदिककाल की प्रमुख परिषदियों में पांचाल परिषदी थी जिसका संरक्षक जाबालि था. इन विद्यालयों में दूर-दूर से विद्यार्थी पढ़ने आते थे. प्राचीनकाल में भारत शिक्षा के लिए सम्पूर्ण विश्व में अग्रणी माना जाता था.
> राजपूत काल की मन्दिर स्थापत्य शैलियाँ
राजपूत शासक बड़े उत्साही निर्माता थे. अतः इस काल में अनेक भव्य मन्दिर, मूर्तियाँ एवं सुदृढ़ दुर्गों का निर्माण किया गया. राजपूतकालीन मन्दिरों के भव्य नमूने भुवनेश्वर खजुराहो, आबू पर्वत तथा गुजरात से प्राप्त होते हैं, इनका विवरण निम्नलिखित है, Bhair
> उड़ीसा के मन्दिर 
उड़ीसा के मन्दिर मुख्यतः भुवनेश्वर, पुरी तथा कोणार्क में हैं, जिनका निर्माण 8वीं से 13वीं सदी के मध्य किया गया. भुवनेश्वर के मन्दिरों के मुख्य भाग के आगे एक चौकोर कक्ष का निर्माण किया गया है जिसके अन्दर का भाग बिल्कुल सादा है, परन्तु बाहरी भाग को अनेक प्रतिमाओं और अलंकरणों से सजाया गया है. यहाँ के मन्दिरों में स्तम्भों का प्रयोग बहुत कम मिलता है. स्तम्भों के स्थान पर लोहे की शहतीरों का प्रयोग किया गया है.
यहाँ के मन्दिरों में सर्वश्रेष्ठ मन्दिर लिंगराज का मन्दिर' है, जोकि उड़ीसा शैली के मन्दिरों का श्रेष्ठतम उदाहरण है. इसमें चार विशाल कमरे हैं तथा मुख्य कक्ष के ऊपर विशाल गगनचुम्बी शिखर है. इसकी गोलाकार चोटी के ऊपर पत्थर का आमलक तथा कलश रखा गया है, इस मन्दिर का शिखर अपने में पूर्णरूप में सुरक्षित है.
इस लिंगराज मन्दिर के अतिरिक्त पुरी का जगन्नाथ मन्दिर एवं कोणार्क का सूर्य मन्दिर भी उड़ीसा शैली का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं. कोणार्क के सूर्य मन्दिर की वास्तुकला अपने आपमें अनुपम है. इसे रथ का आकार दिया गया है. इसका विशाल प्रांगण 865' x 540' के आकार का है. मन्दिर का शिखर 225' ऊँचा है, जो गिर गया है, किन्तु इसका • सभा भवन आज भी सुरक्षित है. सभा भवन तथा शिखर का निर्माण एक चौड़े तथा ऊँचे चबूतरे पर हुआ है जिसके चारों ओर 12 पहिये बनाये गये हैं. प्रवेश द्वार तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हैं तथा इसके दोनों ओर उछलती अश्व प्रतिमाएँ उस रथ का आभास कराती हैं जिस पर चढ़कर भगवान् सूर्य आकाश में विचरण करते हैं. मन्दिर के बाहरी भाग पर विविध प्रकार की मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गई हैं. कुछ मूर्तियाँ अत्यन्त अश्लील हैं जिन पर तान्त्रिक विचारधारा का प्रभाव माना जा सकता है. सौन्दर्य तथा सम्भोग का मुक्त प्रदर्शन इस शैली की प्रधान विशेषता है.
> गुजरात तथा राजस्थान शैली
गुजरात तथा राजस्थान में चालुक्य शासकों के काल में अनेक भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया गया. ये मन्दिर मुख्यतः जैन धर्म से सम्बन्धित हैं.
गुजरात के प्रमुख मन्दिरों में मेहसाना जिले में स्थित 'मांडेहरा का सूर्य मन्दिर' उल्लेखनीय है. इसका निर्माण 11वीं सदी में किया गया. अब वर्तमान में यह मन्दिर ध्वस्त हो है तथा केवल अवशेष ही प्राप्य हैं. इसमें गर्भगृह, प्रदक्षिणा पथ, मण्डप आदि हैं; इसका निर्माण ऊँचे चबूतरे पर किया गया है. पाटन स्थित सोमनाथ के मन्दिर का भी उल्लेख किया जा सकता है जिसका पुनर्निर्माण स्वतन्त्रता के समय किया गया था. चालुक्य वंश के शासक कर्ण ने अन्हिलवाड़ में कर्णमेरु नामक मन्दिर बनवाया. सिद्धपुर स्थित में रुद्रमाल का मन्दिर भी स्थापत्य कला का सुन्दर उदाहरण है.
राजस्थान के आबू पर्वत पर कई मन्दिरों का निर्माण इस समय करवाया गया जिनमें संगमरमर के दो प्रसिद्ध मन्दिर जिन्हें दिलवाड़ा कहा जाता है, अत्यन्त प्रसिद्ध हैं. पहला मन्दिर तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है जिनकी आँखें हीरे की हैं. प्रवेश द्वार पर छः स्तम्भ तथा 10 गज प्रतिमाएँ हैं. इसमें 128' x 75' के आकार का एक विशाल प्रांगण है. यह मन्दिर अपनी बारीक नक्कासी तथा अद्भुत मूर्तिकारी के लिए प्रसिद्ध है. पाषाण शिल्पकला का इससे बेहतर उदाहरण कहीं नहीं मिलता. दूसरा मन्दिर जो तेजपाल कहा जाता है, इसी के पास स्थित है यह भी भव्य तथा सुन्दर है. पहाड़ी पर तीन अन्य जैन मन्दिर भी बने हुए हैं.
पश्चिमी भारत के मन्दिरों का निर्माण सामान्यतः ऊँचे चबूतरे पर किया गया है. इनके शिखर छोटी मीनारों से अलंकृत हैं. मन्दिर की भीतरी छतों पर खोदकर चित्रकारी की गई है. सभी मन्दिर अपनी सूक्ष्म एवं सुन्दर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं तथा इनमें श्वेत संगमरमर का भरपूर प्रयोग किया गया है.
> खजुराहो या बुन्देलखण्ड शैली
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में खजुराहो नामक स्थान पर चन्देल शासकों ने अनेक मन्दिरों का निर्माण करवाया जोकि पूर्व मध्यकालीन वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं.
खजुराहो में आज भी लगभग 25 मन्दिर विद्यमान हैं जिनका निर्माण ग्रेनाइट व लाल बलुआ पत्थर से किया गया है. ये मन्दिर शैव, वैष्णव तथा जैन धर्मों से सम्बन्धित हैं. मन्दिरों का निर्माण ऊँचे चबूतरे पर किया गया है जिसके ऊपरी भाग को अनेक अलंकरणों से सजाया गया है. दीवारों में बनी खिड़कियों में अनेक छोटी-छोटी मूर्तियाँ रखी गई हैं. गर्भगृह के ऊपर सीधा शिखर है. मन्दिर आकार में बहुत बड़े नहीं हैं तथा उनके चारों ओर दीवार भी नहीं बनाई गई है. प्रत्येक मन्दिर में मण्डप, अर्द्धमण्डप तथा अन्तराल मिलते हैं. कुछ मन्दिरों के मण्डप अत्यन्त विशाल है जिन्हें महामण्डप नाम दिया गया है. मन्दिरों के प्रवेश द्वार को मकर तोरण कहा गया है, क्योंकि उसके ऊपर मकर मुख के तोरण की आकृति बनी हुई है. कुछ मन्दिरों में गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा मार्ग भी बनाये गये हैं.
खजुराहो के मन्दिरों में 'कन्दरिया महादेव का मन्दिर' सर्वश्रेष्ठ मन्दिर है. यह 109′ × 60 × 116' के आकार में बना है. इसका ऊँचा शिखर तथा इसमें कई छोटे-छोटे शिखर बनाये गये हैं. इनकी दीवारों पर बहुसंख्यक मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं. इसके गर्भगृह में संगमरमर का शिवलिंग स्थापित किया गया है.
जैन मन्दिरों में 'पार्श्वनाथ का मन्दिर' विशेष रूप से उल्लेखनीय है जो 62' x 31' के आकार में निर्मित है.. इसकी बाहरी दीवारों पर तीन पंक्तियाँ मूर्तियों की खोदी गई हैं. वैष्णव मन्दिरों में 'चतुर्भुज मन्दिर' उल्लेखनीय है जो 85' x 44' के आकार का है. इसका वास्तु-विन्यास कन्दरिया महादेव मन्दिर के जैसा ही है, यहाँ कुछ अन्य मन्दिर जैसे चौसठ योगिनि, ब्रह्मा, लालगुंवा महादेव, लक्ष्मण, विश्वनाथ मन्दिर आदि हैं.
वास्तुकला के समान खजुराहो के मन्दिर अपनी तक्षण कला के लिए भी प्रसिद्ध हैं. गुम्बददार छतों के ऊपर अनेक चित्र उत्खचित हैं. खजुराहो के मन्दिरों में देवी-देवताओं के साथ-साथ कई दिग्पालों, गणों, अप्सराओं, पशु-पक्षियों आदि की बहुसंख्यक मूर्तियाँ प्राप्त होती हैं. कुछ मूर्तियाँ अत्यन्त अश्लील हैं जिन पर सम्भवतः तान्त्रिक प्रभाव लगता है. इनमें भोग और जोग का अद्भुत मिश्रण है.
इस प्रकार समग्र रूप से खजुराहो के मन्दिर अपनी वास्तु तथा तक्षण दोनों कलाओं के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध हैं. के. डी. वाजपेयी के शब्दों में, प्रकृति तथा मानव जीवन की ऐहिक सौन्दर्य राशि को यहाँ के मन्दिरों में शाश्वत रूप प्रदान कर दिया गया है. शिल्प शृंगार का इतना प्रचुर तथा व्यापक आयाम भारत के किसी अन्य कला केन्द्र में शायद ही देखने को मिले.
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