विश्व इतिहास
> लिपि
लेखन की कला का आविष्कार प्राचीन मिस्र की महत्वपूर्ण उपलब्धि है. मिस्रियों की लिपि चित्रलिपि ही थी, जिसमें किसी वस्तु का बोध कराने के लिए उसका चित्र बना दिया जाता था. मिस्रवासी पेपीरस नामक पेड़ के पत्तों सरकण्डे की कलम से लिखते थे. मिस्र की लिपि हैरोग्लिफिक कहलाती है, जिसको पढ़ने का श्रेय शैम्पोल्यां को है. सुमेरिया के वासियों ने जिस लिपि का आविष्कार किया उसे 'कौलाक्षर पर लिपि' कहा जाता है. प्राचीनतम लिपि चित्रलिपि थी, जो बाद में ध्वनि-लेखन के रूप में परिवर्तित हो गई.
> मृत्यु के उपरान्त जीवन
मृत्यु के उपरान्त जीवन का विश्वास मिस्र के लोगों का ही था. उनका विश्वास था कि मृत्यु के बाद शरीर और आत्मा दोनों जीवित रहते हैं. इसलिए वे मृत व्यक्ति के शव को सुरक्षित रखते थे. मृत व्यक्ति के शव पर एक प्रकार के रसायन का प्रलेप कर उसे बढ़िया कपड़े में लपेटा जाता था. इस प्रकार के शव को 'ममी' कहा जाता है. ममी को मकबरे में दफना दिया जाता था. मकबरे के अन्दर वे सभी वस्तुएँ रखी जाती थीं, जो मृत व्यक्ति को पसन्द थीं और जिनका वह जीवित अवस्था में प्रयोग करता था.
> विधि संहिता
बेबीलोन के सम्राट तम्मुराबी ने अपनी प्रजा के लिए एक विधि संहिता बनाई थी, जो सबसे प्राचीन विधि संहिता है. इसमें जीवन के सभी पक्षों पर ध्यान दिया गया है और अनाथों, विधवाओं और गरीबों के प्रति सहानुभूति दर्शायी गई है. इसमें दण्ड-विधान बहुत कठोर है. यह संहिता, 'खून का बदला खून' के सिद्धान्त पर आधारित है. इस विधि संहिता की त्रुटि यह है कि इसमें सभी के लिए समान दण्ड की व्यवस्था नहीं थी.
> एथेन्सी लोकतन्त्र
एथेन्स यूनान का एक महान् नगर था, जहाँ पर विश्व में प्रथम बार लोकतन्त्र स्थापित हुआ था. एथेन्स में 20 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक पुरुष नागरिक वहाँ की सभा का सदस्य होता था. सभा कानून बनाने का अधिकार रखती थी जो कि असेम्बली कहलाती थी. वर्ष में 40 बार लगभग 5000 नागरिक कानून बनाने के लिए खुली सभा में उपस्थित हुआ करते थे. यहाँ पर 500 सदस्यों की एक राजनीतिक परिषद् होती थी, जो पचास-पचास व्यक्तियों की समितियों में बँटकर शासन् की समस्याओं का निपटारा करती थी. एथेन्स के लोकतन्त्र के प्रत्येक नागरिक को कभी-न-कभी सरकारी पद सँभालने का अवसर मिलता था और वह जूरी का सदस्य भी बनता था. सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी ‘आर्कन' कहलाते थे, जो नागरिकों के द्वारा सीधे चुने जाते थे.
एथेन्स के लोकतन्त्र की कुछ दुर्बलताएँ भी थीं. वहाँ के अधिकांश निवासियों को वहाँ की नागरिकता प्राप्त नहीं थी. एथेन्स का कानून दासता को मान्यता देता था. लोकतन्त्र के लाभ केवल पुरुषों तक ही सीमित थे. वहाँ की स्त्रियाँ इनसे पूर्णतया वंचित थीं.
> रोम में गणराज्य
रोम में गणराज्य की स्थापना 600 ई. पू. हुई थी. रोम गणराज्य का विधान जनतन्त्रात्मक था और उसे 'रेस पब्लिका' कहा जाता था. गणराज्य के विधान में सीनेट, सभा तथा दो कौंसिल महत्वपूर्ण थे. कौंसिल सभा द्वारा दो वर्षों की अवधि के लिए चुने जाते थे, कानून लागू करना तथा न्यायव्यवस्था की देखभाल करना इन कौंसिलों का ही कार्य था. गणराज्य में सबसे शक्तिशाली संस्था सीनेट थी, जो सभा के निर्णय को भी रद्द कर सकती थी. सीनेट ही युद्ध का संचालन करती थी और विजित प्रान्तों के लिए नियम बनाती थी.
> कन्फ्यूसियसवाद
उसके मतानुसार शिक्षा का उद्देश्य चरित्र-निर्माण करना यह चीन के विचारक कन्फ्यूसियस की विचारधारा है. अर्थात् शिक्षा द्वारा सदाचार, देशभक्ति, ईमानदारी, न्याय, दयालुता आदि गुणों का विकास करना है. उसने राजनीति को नैतिक आधार प्रदान करने का प्रयास किया. उसने शिक्षा द्वारा शासकों को चरित्रवान तथा न्यायप्रिय बनाने का भरसक प्रयास किया. उसने जीवन के प्रत्येक अवसर के लिए उत्तम नियम बनाये तथा मनुष्य को शिष्ट पुरुष बनाने के उपदेश दिये.
> अभिजात्य वर्ग
यह वर्ग विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग था, जिसमें ज्यादातर भू-स्वामी सम्मिलित थे. ये लोग शासन के ऊँचे-ऊँचे पदों पर नियुक्त होते थे. इस वर्ग के लोगों का सरकारी पदों पर अधिकार था. प्राचीन रोम में अभिजात्य वर्ग को 'पेट्रिशियन' कहा जाता था.
> प्राचीन विश्व में दास प्रथा
प्राचीन विश्व में दासों की स्थिति बहुत शोचनीय थी. दिन के समय दास खेतों में काम करते, उन्हें जंजीर से एकदूसरे के साथ बाँधा जाता था. रात को उन्हें भूमि के नीचे बनी कोठरियों में जानवरों की तरह हाँक दिया जाता था. पहचान के लिए उन्हें गर्म लोहे से दागा जाता था. जानवरों की तरह उनका क्रय-विक्रय किया जाता था. प्राचीन विश्व में कृषक दासों का जीवन भी अत्यन्त दुःखमय था, उन्हें बेगार करनी पड़ती थी.
> मातृदेवी
प्राचीन सभ्यताओं में मातृदेवी की उपासना की जाती थी तथा मातृदेवी की उपासना स्त्रियों के महत्व को दर्शाती है.
> सामन्त शाही
सामन्तशाही ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें राजा सर्वोपरि था लेकिन शक्तिशाली नहीं था. उसके 'अधीश्वर' भी अपने क्षेत्रों में प्रभावी शक्ति का प्रयोग करते थे. अधीश्वर शक्तिशाली भूपति थे, जिन्हें सामन्त कहा जाता था. सामन्तों के दो प्रधान कर्त्तव्य थे
1. शान्तिकाल में अनुशासन बनाए रखना तथा लगान वसूलना.
2. युद्धकाल में राजा को सैनिक सहायता प्रदान करना.
मध्ययुग में सामन्तशाही व्यवस्था ने समाज को व्यवस्थित होने में सहयोग दिया. इस व्यवस्था के जरिए भूमि के मामले में उल्लेखनीय प्रगति हुई तथा राजा की शक्ति और भोगविलास पर नियन्त्रण रखा गया. सामन्ती प्रणाली ने शान्ति बनाये रखी, न्याय प्रदान किया व निर्बलों व स्त्रियों की रक्षा के आदर्श को विस्तृत किया.
सामन्तों के विलासमय जीवन, शोषण व करों के बोझ के बढ़ जाने से तथा कृषक दासों की दयनीय स्थिति के परिणामस्वरूप सामन्तशाही का अन्त हो गया.
> मानवतावाद
यह लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'उन्नत ज्ञान' से है. जिसमें मानवता, माधुर्य और जीवन की वास्तविकता निहित है. इसके सामने आध्यात्मिक एवं धर्मशास्त्र का महत्व गौण है. मानवतावादी जन-साधारण को सभ्य बनाने के लिए प्राचीन साहित्य पर जोर देते हैं.. मानववादियों की धारणा है कि इस जीवन को आनन्द से बिताना चाहिए और दूसरे जन्म के लिए चिन्तित नहीं होना चाहिए. पेट्रोक उसके शिष्य बुक़ैशियों ने मानवतावाद का खूब प्रचार किया. उन्होंने व्यक्ति के पूर्ण विकास को मानवजीवन का लक्ष्य माना तथा मानव समाज का लौकिक जीवन की ओर अधिक ध्यान आकर्षित किया.
> पुनर्जागरण
बौद्धिक आन्दोलन था जो इटली से 14वीं शदी में प्रारम्भ पुनर्जागरण का अर्थ है – 'फिर से जागना'. यह एक होकर 1600 ई. में सम्पूर्ण यूरोप में फैल गया. यह एक उदार सांस्कृतिक आन्दोलन था जो मानसिक स्थिति का द्योतक पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप कला, साहित्य, विज्ञान आदि में अभूतपूर्व उन्नति हुई तथा इसी से मानव-जीवन में व्यक्ति की था. सोच में भी परिवर्तन आया.
> धर्म-सुधार
धर्माधिका की चारित्रिक बुराइयों को दूर करने के लिए कुछ प्रतिभावान एवं आध्यात्मिक पुरुषों के नेतृत्व में यूरोप के जनसमाज ने जो सामूहिक आन्दोलन किया वही आन्दोलन इतिहास में 'धर्म सुधार' कहलाता है. इसका मुख्य उदेश्य चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करना तथा पोप के जीवन में नैतिक सुधार लाना था. बाइक्लिफ, वालडेन्सेन्स, जॉन हस, सेवोनारोला, इरासमस, मार्टिन लूथर आदि का इसमें महत्वपूर्ण योगदान रहा.
> चर्च की सर्वोच्चता
मध्य-युग में चर्च की सर्वोच्चता स्थापित हो गई. इसे न्याय का अधिकार मिल गया और वे अपने मामलों में अपने ही न्यायालयों में निर्णय करने लगे. धर्म-विरोधियों और नास्तिकों को दण्डित करने का अधिकार मिला. वह जन्म से मृत्यु तक अनेक संस्कारों के लिए उत्तरदायी था. इसने अपने कानून और बन्दीगृह बनाये. यह चर्च - विवाह, तलाक, वसीयत आदि विषयों में निर्णय देने लगा. उसने अनेक समाजोपयोगी कार्यों को भी अपने हाथों में लिया तथा रोगी, अनाथ व निर्धनों की सेवा की.
> दैवी अधिकार
मध्यकालीन विश्व में राजा का दैवी अधिकार प्रचलित था. उनका मानना था कि राजा का पद ईश्वर द्वारा प्रदान किया हुआ है और उसके अधिकार भी ईश्वर द्वारा ही प्रदत्त होते हैं. राजा के पास दैवी शक्ति होती है, जिससे वह दूसरों पर शासन कर सके.
> प्रबुद्ध स्वेच्छाचारी शासन
यह निरंकुश तन्त्र का रूप था, जिसमें राजा ही सर्वोच्च था. वह बड़े अफसरों की सहायता से शासन करता था किन्तु सामान्यतः उस पर कोई अंकुश नहीं था. शासक अन्तिम कानून निर्माता था. इसमें शासक पर कोई कानून लागू नहीं होता था. इसके विरोध का किसी को भी अधिकार नहीं था. इसमें कई बार जनता के अधिकारों की खुलेआम उपेक्षा की जाती थी.
> राष्ट्र राज्य
राष्ट्र राज्य वे राज्य थे जिन्होंने मध्ययुगीन सामन्तवाद का अन्त करके अव्यवस्था व अराजकता को समाप्त कर दिया तथा आर्थिक विकास में बड़ा योगदान दिया. इन्होंने प्रति एक संस्कृति के व्यक्तियों को संगठित करके राष्ट्र के निष्ठा का विकास किया. इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस, स्पेन और प्रशा का राष्ट्रीय राज्यों के रूप में उदय हुआ, जिन्होंने अपने देश के लोगों में राष्ट्रीयता तथा देशभक्ति पैदा की.
> पवित्र रोमन साम्राज्य
पवित्र रोमन साम्राज्य की राजधानी रोम नगर था. रोम ईसाई जगत का मुख्य धर्माधिकारी था. यही पोप कहलाया जो दुनिया के ईसाइयों का सर्वोच्च धर्मगुरू बन गया. पोप का वाक्य ब्रह्म वाक्य समझा जाने लगा तथा उसकी आज्ञाओं का पालन करना अनिवार्य हो गया. पवित्र रोमन साम्राज्य ईसाई धर्म का केन्द्र था जो विश्व में ईसाइयों का प्रतिनिधित्व करता था.
> सामाजिक संविदा तथा जनइच्छा
सामाजिक संविदा रूसो का ग्रन्थ था, जिसमें उसने इस बात पर जोर दिया कि सभी व्यक्ति स्वतन्त्र एवं समान हैं तथा सरकार का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना है. उसने इस बात पर जोर दिया कि शासन सभाओं की उत्पत्ति एक संविदा द्वारा हुई है.
> गुटनिरपेक्षता
में यूगोस्लाविया की स्वतन्त्र राजधानी बेलग्रेड में 1961 ई. स्थापना, विश्व के गुटों की राजनीति से अलग रहना और किसी गुट में शामिल नहीं होना गुटनिरपेक्षता कहलाती है. यह एक सुविचारित अवधारणा थी, जिसका उद्देश्य नवोदित राष्ट्रों की स्वाधीनता की रक्षा करना एवं युद्ध की सम्भावनाओं को रोकना था. इस अवधारणा के उदय के पीछे मूल धारणा यह थी कि साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने वाले देशों को शक्तिशाली गुटों से अलग रखकर उनकी स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखा जाये. इस आन्दोलन के संस्थापकों में नेहरू, मार्शल टीटो, अब्दुल नासिर आदि का महत्वपूर्ण योगदान है.
> राष्ट्रमण्डल
राष्ट्रमण्डल उन देशों का संगठन है, जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन थे और जिन्होंने स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद ब्रिटेन के साथ लगभग बराबरी के सम्बन्ध स्थापित रखते हुए ब्रिटिश परम्परा से एक परिवार जैसा सम्बन्ध रखने का निश्चय किया है. राष्ट्रमण्डल का उदेश्य–अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और सदस्य राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाना, अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक और मानव कल्याण सम्बन्धी समस्याओं को हल करना है.
> गोरों पर बोझ
यह सिद्धान्त मुख्यतः इंगलैण्ड ने दिया. उसके अनुसार उपनिवेशों की जनता असभ्य है और हमें उनको सभ्य बनाना है और यह भार हमने अपने कन्धों पर लिया है. अर्द्ध-नग्न तथा असभ्य लोगों को ईसाई धर्म में दीक्षित कर उन्हें सभ्य बनाना ही ‘गोरों' पर 'बोझ' या 'श्वेत जाति का भार' है. इटली ने इस कार्य को 'पुनीति कर्त्तव्य' माना है.
> समाजवाद
व्यक्तिवाद तथा पूँजीवाद के विपरीत व्यवस्था समाजवाद है. इसके अन्तर्गत व्यक्ति की अपेक्षा समाज पर जोर दिया जाता है. इसका उद्देश्य समाज में समानता उत्पन्न करना है परन्तु फिर भी यह वर्गों के अस्तित्व पर विश्वास करता है. इस व्यवस्था में कोई किसी का शोषण नहीं कर सकेगा, समाज का उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व होगा. आर्थिक समानता होगी तथा सभी को सामाजिक न्याय प्राप्त होगा.
> सर्वसत्तावाद
जिस राज्य में मानव जीवन की समस्त क्रियाएँ राज्य द्वारा संचालित एवं नियन्त्रित होती हैं, वह 'सर्वसत्तावाद' कहलाता है. ऐसे राज्य में एक व्यक्ति या एक दल की तानाशाही होती है तथा लोकतन्त्र और मौलिक अधिकारों का कोई महत्व नहीं होता. इसमें लोगों की स्वतन्त्रता का भी कोई महत्व नहीं रहता. मुसोलिनी के नेतृत्व में इटली में तथा हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी में 'सर्वसत्तावाद' का उदय हुआ.
> मानव अधिकार
मानव द्वारा जो नैतिक, मौलिक एवं असंक्राम्य अधिकार धारण किये जाते हैं. उन्हें मानव अधिकार कहा जाता है. यह सभी समाजों में अन्तर्निहित वह व्यवस्था है, जिसमें जाति, धर्म, लिंग, वर्ण तथा राष्ट्रीयता के आधार पर प्रभेद नहीं किया जाता है. मानव अधिकारों को चार्टर का रूप देने का श्रेय रेन कासिम को जाता है. मानव अधिकारों का पहला सम्मेलन तेहरान में हुआ. एशिया वॉच, एमनेस्टी इण्टरनेशनल आदि अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन हैं. भारत ने भी 1993 ई. में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया. मानव अधिकारों का हनन वर्तमान विश्व की प्रमुख समस्या है.
> संसदीय लोकतन्त्र
संसदीय लोकतन्त्र ऐसा लोकतन्त्र है, जिसमें संसद सर्वोच्च होती है और वही कानून बनाने की सर्वोच्च संस्था होती है. का निर्माण जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा होता है. संसदीय लोकतन्त्र में जनता की प्रत्यक्ष भागदारी होती है तथा उनका प्रतिनिधि प्रधानमन्त्री होता है, जो शासन का सर्वोच्च अधिकारी होता है. संसदीय लोकतन्त्र ब्रिटेन की देन है.
> प्रभाव क्षेत्र
साम्राज्यवादी देशों ने (जिनमें ब्रिटेन, रूस, जर्मनी अमेरिका तथा फ्रांस मुख्य थे) एशिया और अफ्रीका महाद्वीप में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित किये और उन्हें अपने नियन्त्रण में रखा. ये क्षेत्र ही प्रभाव क्षेत्र कहलाते थे. इन क्षेत्रों का इन देशों ने आर्थिक शोषण किया तथा इन पर अपना राजनीतिक व प्रशासनिक नियन्त्रण स्थापित किया.
> राष्ट्रवाद
किसी भी राष्ट्र की स्वतन्त्रता, सम्प्रभुता व समानता का विचार राष्ट्रवाद कहलाता है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद गुलाम व परतन्त्र देशों में राष्ट्रवाद का बहुत प्रचार हुआ और उन्होंने स्वतन्त्रता प्राप्त की राष्ट्र के प्रति देशभक्ति भी राष्ट्रवादी विचारधारा का एक महत्वपूर्ण अंग है.
> अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति
विश्व में सैनिकवाद, शस्त्रीकरण व युद्धों की सम्भावनाओं व प्रयासों पर प्रतिबन्ध लगाने तथा उनको रोकने का प्रयास करना अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित करना है. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति वर्तमान विश्व की महत्वपूर्ण समस्या है, जिसको प्रथम विश्व-युद्ध के बाद 'राष्ट्रसंघ' व द्वितीय विश्व - युद्ध के बाद 'संयुक्त राष्ट्रसंघ' की स्थापना अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित करने के लिए की गई.
> प्रजातिवाद
किसी विशेष जाति या प्रजाति के हितों का संरक्षण करना प्रजातिवाद है. इसमें किसी भी देश द्वारा अपनी प्रजाति का अन्य देशों में भी संरक्षण किया जाता है. इसमें अपने राजनीतिक हितों की भी पूर्ति की जाती है. 19वीं सदी अखिल स्लाव आन्दोलन प्रजातिवाद का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसमें रूस ने स्लाव जाति का बहाना लेकर अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति की थी.
> विश्वव्यापी मन्दी (1929) (Great Depression 1929)
प्रथम विश्व युद्ध के बाद बर्बाद राष्ट्रों ने तेजी से अपने विकास के प्रयास किये, जिसके कारण उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि हो गयी और व्यापारियों का मुनाफा बढ़ता गया, लेकिन दूसरी ओर अधिकांश लोग गरीबी और अभाव में पिसते रहे. प्रौद्योगिकी प्रगति तथा बढ़ते मुनाफों के कारण ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी कि जो कुछ भी उत्पादित किया जाता था, उसे खरीद सकने वाले लोग बहुत कम थे. इससे शेयरों की कीमतों में गिरावट आयी और लोग शेयर धड़ाधड़ बेचने लगे, जिससे बैंकों का दिवाला निकल गया. विश्वव्यापी आर्थिक मन्दी का दौर शुरू हो गया. वस्तुओं की कीमतें गिर गईं, अनेक व्यवसाय बन्द हो गए, लोगों की नौकरियाँ छूट गईं और बेरोजगारी काफी बढ़ गई. केवल सोवियत संघ को छोड़कर सम्पूर्ण विश्व आर्थिक मन्दी के दौर से गुजर रहा था. यह दौर 1933 ई. तक रहा.
> रंगभेद (Apartheid)
गोरे एवं काले रंग के दोनों लोगों के मध्य असमानता को ही रंगभेद की संज्ञा दी जाती है. 1930 ई. के दशक में अमरीका में रंगभेद ने बहुत अधिक जोर पकड़ा तथा काले रंग के लोगों को नीग्रो तथा हब्सी कहकर पुकारा गया. उनके ऊपर तरह-तरह की निर्योग्यताएँ लाद दी गयीं. ठीक इसी प्रकार अंग्रेजों ने दक्षिण अफ्रीका रंगभेद नीति का अनुसरण किया, जिससे यहाँ के मूल निवासी सभी प्रकार के नागरिक अधिकारों से वंचित रहे.
> शीतयुद्ध (Cold War)
शीतयुद्ध का जन्म मुख्य रूप से रूस में साम्यवादी सरकार की स्थापना के बाद विश्व के अन्य पूँजीवादी देशों अमरीका, ब्रिटेन आदि के द्वारा इसका विरोध करने के कारण हुआ. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व स्पष्टतः दो खेमों में बँट गया. एक खेमे का नेतृत्वकर्ता सोवियत संघ था, जबकि दूसरे का अमरीका. दोनों देश अपने को विश्व में सर्वश्रेष्ठ बनाये रखने तथा राजनैतिक वर्चस्व बनाने के लिए हथियारों की होड़ में लगे रहे. इस काल को शान्तिपूर्ण शस्त्र सज्जीकरण का काल भी कहा जाता है.
> शक्ति सन्तुलन (Balance of Power)
अमरीका व सोवियत संघ के मध्य शीतयुद्ध के कारण विश्व स्पष्टतः दो खेमों में विभाजित था, जिसके कारण विश्व में यह व्यवस्था द्वितीय महायुद्ध के बाद अब तक बनी रही है, परन्तु सोवियत संघ में विघटन के बाद तथा रूस में 'लोकतन्त्र के आ जाने से अमरीकी संगठन की भूमिका अब विश्व में प्रभावशाली हो गयी है. इससे अब यह कहा जाता है कि दोनों शक्तियाँ जो एक-दूसरे के प्रभाव को कम करती थीं. समाप्त हो गयी हैं और शक्ति सन्तुलन अमेरिका की ओर झुक गया है.
> नाजीवाद (Nazism)
नाजीवाद अधिनायकतन्त्र का एक रूप है, जो जर्मनी में प्रथम विश्व युद्ध के हिटलर के नेतृत्व में उदित हुआ. यह राजनैतिक लोकतन्त्र एवं नागरिक स्वतन्त्रता को हीनता की नजर से देखता था. युद्ध की महिमा का गुणगान करना इसकी एक अन्य प्रमुख विशेषता थी. इसका उद्देश्य प्राचीन जर्मनी के ट्योतनी साम्राज्य की महानता को जर्मनी में पुनः स्थापित करना था. इसके साथ ही जर्मन नस्ल को विश्व की अन्य नस्लों से श्रेष्ठ मानता था तथा महान् जर्मनी के निर्माण का पोषक था.
> नारी अधिकारवाद (Feminism)
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–45) के मध्य जान-माल एवं घायल सैनिकों की सेवा करने के लिए बहुत अधिक चिकित्सकों, नर्सों आदि की आवश्यकता पड़ी, जिसे इस युद्ध के दौरान नारियों द्वारा पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर सेवा कार्य किया गया. इससे नारियों के सम्मान में अत्यधिक वृद्धि हुई और इनके महत्व को समझा गया. इस कारण से अनेक नारी संगठनों का जन्म हुआ और इन्होंने पुरुषों के समान ही नारियों के अधिकारों की माँग की. इसे ही नारी अधिकारवाद कहा जाता है.
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