General Competition | History | (मध्यकालीन भारत का इतिहास) | मुगल काल (1526-1707)

मुगल शब्द की उत्पत्ति मंगोल एवं तुर्क के मिश्रण से हुआ है। भारत में मुगल साम्राज्य का संस्थापक बाबर को माना जाता है। बाबर में दो महान रक्तों का मिश्रण था। बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर का 5वाँ तथा माता की ओर से चंगेज खाँ का 14वाँ वंशज था ।

General Competition | History | (मध्यकालीन भारत का इतिहास) | मुगल काल (1526-1707)

General Competition | History | (मध्यकालीन भारत का इतिहास) | मुगल काल (1526-1707)

  • मुगल शब्द की उत्पत्ति मंगोल एवं तुर्क के मिश्रण से हुआ है। भारत में मुगल साम्राज्य का संस्थापक बाबर को माना जाता है। बाबर में दो महान रक्तों का मिश्रण था। बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर का 5वाँ तथा माता की ओर से चंगेज खाँ का 14वाँ वंशज था ।
  • बाबर का जन्म 14 फरवरी 1483 को फरगना में हुआ था, जो अब उज्बेकिस्तान में है।
  • बाबर का वास्तविक नाम "जहीरूद्दीन मुहम्मद" था । तुर्की भाषा में बाबर का अर्थ "बाघ" होता है।
  • बाबर के दादा का नाम सुल्तान अबुसेद था जबकि दादी ऐसान दौलत बेग थी। माता कुतलुगनिगार खाँ थी जबकि पिता उमरशेख मिर्जा (चगताई तुर्क ) फरगना का शासक था।
  • बाबर अपने पिता के मृत्यु के बाद 11 वर्ष की अल्पायु में 1494 ई. में फरगना की गद्दी पर बैठा ।
  • बाबर ने अपने फरगना के शासनकाल में 1501 ई. में समरकंद पर अधिकार किया, जो मात्र 8 महीने तक उसके कब्जे में रहा ।
  • 1504 ई. में काबूल विजय के उपरांत बाबर का काबुल और गजनी पर अधिकार हो गया।
  • 1507 ई. में बाबर ने "बादशाह" की उपाधि धारण की। "बादशाह" की उपाधि धारण करने से पूर्व बाबर "मिर्जा" की पैतृक उपाधि धारण करता था।
बाबर का भारत पर आक्रमण
  • बाबर ने भारत पर 5 बार आक्रमण किया। बाबर ने 1519 ई. में "युसूफजाई जाति" के विरूद्ध अभियान कर "बाजौर" और "भेरा" को अपने अधिकार में किया।
  • बाबर का कहना है कि उसने इस किले को जीतने के लिए बारूद एवं तोपों का प्रयोग किया। भारत को बारूद की जानकारी थी, लेकिन उत्तर भारत में इसका आम उपयोग बाबर के आगमन के समय ही शुरू हुआ ।
  • 1520-21 ई. में बाबर पुनः सिंधु नदी को पार कर "स्यालकोट" एवं "सैय्यदपुर" को भी अपने अधिकार में कर लिया ।
  • 1524 ई. में बाबर के पेशावर अभियान के समय, पंजाब के गर्वनर दौलत खाँ अपने पुत्र दिलावर खाँ को बाबर के पास भारत पर आक्रमण करने के लिए संदेश भेजवाया। संभवतः इसी समय राणा सांगा ने भी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए निमंत्रण भेजा था । (आलम खाँ लोदी - चाचा इब्राहिम का )

पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल 1526)

  • 1526 ई. में पानीपत के मैदान में दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी एवं बाबर के मध्य भीषण युद्ध हुआ जिसमें इब्राहिम लोदी की हार हुई और वह मारा गया ।
  • इस युद्ध में बाबर ने पहली बार "तुलगमा युद्ध पद्धति" का प्रयोग किया। बाबर ने तुलगमा युद्ध का प्रयोग उज्बेकों से ग्रहण किया ।
  • इस युद्ध में बाबर ने तोपों को सजाने में "उस्मानी पद्धति" ( रूमी विधि) का प्रयोग किया था। इस पद्धति में दो गाड़ियों के बीच व्यवस्थित जगह छोड़कर तोप को रखकर चलाया जाता था।
  • पानीपत के युद्ध में बाबर के तोपखाने का नेतृत्व उस्ताद अली और मुस्तफा खाँ नामक दो योग्य अधिकारियों ने किया था ।
  • भारत विजय के उपलक्ष्य में बाबर ने प्रत्येक काबुल वासी को एक-एक चाँदी का सिक्का उपहार स्वरूप प्रदान किया । इसी वजह से बाबर को कलंदर" की उपाधि दी गई।

खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527

  • खानवा युद्ध का मुख्य कारण बाबर का पानीपत युद्ध के पश्चात् भारत में रहने का निश्चय किया था । यह युद्ध चितौड़ के राजा राणा सांगा और बाबर के मध्य लड़ा गया। इस युद्ध में राणा सांगा की हार हुई। इसी युद्ध के दरम्यान् “जिहाद” (धर्मयुद्ध) का नारा दिया तथा शराब के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया ।
  • खानवा के युद्ध में अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए बाबर ने मुस्लमानों से वसूल किये जाने वाले "तमगा कर" को समाप्त कर दिया । 
  • खानवा के युद्ध को जीतने के बाद बाबर ने "गाजी" अर्थात काफीरों के हत्यारा (गैर-मुसलमान) का उपाधि धारण की ।

चंदेरी का युद्ध (29 जनवरी 1528, मध्यप्रदेश

  • यह युद्ध बाबर और मेदिनी राय के बीच हुआ जिसमें मेदिनी राय पराजित हुआ ।

घाघरा का युद्ध (6 मई 1529

  • इस युद्ध में बाबर ने बिहार और बंगाल की संयुक्त अफगान सेना को पराजित किया, जिसका नेतृत्व महमूद लोदी ने किया था ।
मृत्यु
  • 26 दिसम्बर 1530 ई. को बाबर की आगरा में मृत्यु हो गई । बाबर को पहले आगरा के आरामबाग में दफनाया गया परंतु बाबर के वसीयत को ध्यान में रखते हुए उन्हें काबूल में दफनाया गया। काबूल में ही बाबर का मकबरा है ।
मूल्यांकन
  • बाबर कुषाणों के बाद पहला ऐसा शासक था जिसने काबूल और कंधार को अपने पूर्ण नियंत्रण में रखा।
  • बाबर को "मुबइयान" पद्य शैली का जन्मदाता माना जाता है।
  • बाबर ने विभिन्न प्रकार के पत्रों का संकलन किया जिसे रिसाल-ए- उसज या खत - ए - बाबरी कहते हैं ।
  • बाबर ने अपनी मातृभाषा तुर्की भाषा में अपनी आत्मकथा लिखा जिसे तुजुक - ए - बाबरी कहते हैं। इसका फारसी में अनुवाद "पायन्दा खाँ" तथा अब्दुर्रहीम खानखाना ने "बाबरनामा' के नाम से किया और श्रीमति बेबरिज ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया ।
  • "बाबरनामा' में बाबर ने विजयनगर के शासक "कृष्णदेव राय" को समकालीनभारत का सबसे शक्तिशाली शासक बताया ।
  • बाबर बागों को लगाने का बड़ा शौकिन था । उसने आगरा में "ज्यामितीय विधि" से एक बाग लगवाया, जिसे “नूर–ए–अफगान” कहा जाता था, परंतु अब इसे "आरामबाग" कहा जाता है ।
  • बाबर के प्रधान सेनापति मीरबकी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया ।
  • बाबर के दरबार में दो महान निशानेबाज थें- (1) उस्ताद अली जो बंदूकची थें। (2) मुस्तफा खाँ - तोपची ।
  • बाबर बंदूक चलाने की कला ईरान से सीखा जबकि "तुगलमा पद्धति" शैबानी खाँ उज्बेग खाँ से सीखा ।

हुमायूँ (1530-40 & 1555-56 ई.)

  • हुमायूँ का जन्म “माहम बेगम" के गर्भ से 6 मार्च 1508 ई. को काबूल में हुआ था। बाबर के चार पुत्रों - हुमायूँ, कामरान, अस्करी और हिंदाल में हुमायूँ सबसे बड़ा था ।
  • हुमायूँ का शाब्दिक अर्थ भाग्यवान होता है।
  • हुमायूँ के विषय में विस्तार पूर्वक जानकारी हुमायूँ नामा से मिलती है। जिसकी रचना उसकी बहन गुलबदन बेगम ने की है।
  • हुमायूँ शासक बनने से पूर्व बदख्शाँ का सूबेदार था । (अफगान )
  • हुमायूँ का राज्याभिषेक 30 दिसम्बर 1530 ई. को आगरा में हुआ।
  • हुमायूँ एक मात्र शासक था जिसने अपने भाईयों में साम्राज्य का विभाजन किया । इन्होनें अपने पिता के इच्छा को ध्यान में रखते हुए अपने भाई कामरान को काबूल, कंधार, अस्करी को संम्भल का क्षेत्र (राजस्थान) जबकि हिंदाल को अलबर (राजस्थान) प्रदान दिया ।
  • हुमायूँ अपने चचेरा भाई सुलेमान मिर्जा को बदख्शाँ प्रदेश दिया।
  • 1533 ई. में हुमायूँ ने दिल्ली में दीनपनाह नामक नगर की स्थापना किया ।
सैन्य अभियान
  • हुमायूँ ने 1531 ई. में कालिंजर के शासक प्रताप रूद्रदेव पर अपना पहला आक्रमण किया । कालिंजर के किले पर आक्रमण के समय ही उसे यह सुचना मिली कि अफगान सरदार महमूद लोदी बिहार से जौनपूर की ओर बढ़ रहा है। अतः कालिंजर के राजा प्रताप रूद्रदेव से धन और सैनिकों की क्षतिपूर्ति लेकर हुमायूँ वापस आगरा लौट आया ।
  • 1532 में हुमायूँ एवं बिहार के शासक महमूद लोदी के बीच दोहारिया या दौरा का युद्ध हुआ । इस युद्ध में हुमायूँ की विजय हुई तथा महमूद लोदी को पीछे हटना पड़ा तथा वह राजनीति से अलग हो गया ।
  • हुमायूँ 1532 ई. चुनार के किला का घेरा डाला। यह किला शेर खाँ के अधिकार में था । लगभग 6 महिना तक, इस किला का घेरा रखने के बावजूद भी जब हुमायूँ को सफलता नहीं मिली तब उन्होनें शेर खाँ से एक समझौता कर लिया। इस समझौता के शर्त के मुताबिक हुमायूँ को शेरशाह एक मोटी रकम दिया। बदले में हुमायूँ ने शेरशाह को चुनार के किला का प्रधान स्वीकार कर लिया ।
  • हुमायूँ 1534 में बिहार में मुहम्मद जबान मिर्जा तथा मुहम्मद सुल्तान मिर्जा के विद्रोह को दबाया ।
  • 1535 ई. में हुमायूँ का संघर्ष गुजरात के शासक बहादुर शाह के साथ हुआ । वस्तुतः इसी वर्ष बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। चित्तौड़ का शासक विक्रमाजीत सिंह था जो अवयस्क था इसलिए संरक्षिका के रूप में रानी कर्णावती सत्ता को संभाली थी। कर्णावती बहादुरशाह से निपटने के लिए हुमायूँ के पास राखी भेजकर सहायता माँगी परंतु हुमायूँ सहायता देने से इन्कार कर दिया जो हुमायूँ की भूल थी । बहादुरशाह जब चित्तौड़ विजय कर लौट रहा था उसी समय हुमायूँ मध्यप्रदेश के मांडु नामक स्थान पर उसके रास्ता को रोका। बहादुरशाह को पराजित कर उसे गुजरात से भी बाहर निकाल दिया तथा वे गुजरात पर अपना अधिकार कर लिया एवं अपने भाई हिंदाल को गुजरात का सूबेंदार नियुक्त किया। हालाँकि अधिक दिनों तक हुमायूँ गुजरात को अपने अधिकार में नहीं रख सका। वे अपने तोपची खमी खाँ तथा पुर्तगालियों की सहायता से शीघ्र ही गुजरात पर अधिकार कर लिया ।
  • हुमायूँ 1538 ई. में बंगाल का विजय किया एवं उसका नाम जन्नताबाद रखा। हलांकि इससे पूर्व शेरशाह बंगाल को बुरी तरह से लूट चुका था । फिर भी हुमायूँ 9 महीना तक बंगाल में रहकर अपने जीत का जश्न मनाता रहा एवं बंगाल का पुर्ननिर्माण किया उनकी महान भूल थी ।
  • जून 1539 ई. में हुमायूँ एवं शेरशाह के बीच चौसा का युद्ध (बक्सर) हुआ। इस युद्ध में हुमायूँ की पराजय हुई | जब वह जान बचाकर भाग रहा था, उस समय उसे नदी पार करने में सर्वाधिक सहयोग शिहाबुद्दीन निजाम खाँ ने दिया। उस से खुश होकर जब हुमायूँ दोबारा हिन्दुस्तान का बादशाह बना उन्होनें निजाम खाँ को एक दिन के लिए हिन्दुस्तान का बादशाह बनाया। इसी दरम्यान् उन्होनें चमड़ा का सिक्का जारी किया। जो हिन्दुस्तान के इतिहास में एकमात्र उदाहरण है ।
  • मई1540 ई. में हुमायूँ और शेरशाह के बीच कन्नौज या बिलग्राम का युद्ध हुआ जिसमें हुमायूँ की पराजय हुई | उसे हिन्दुस्तान छोड़ना पड़ा तथा शेरशाह अपने को हिन्दुस्तान का सुल्तान घोषित किया ।

हुमायूँ का निष्कासित जीवन

  • कन्नौज के युद्ध में शेरशाह द्वारा हुमायूँ को पराजित करने के बाद आगरा और दिल्ली पर शेरशाह का अधिकार हो जाने के पश्चात् हुमायूँ सिंध होते हुए ईरान के शाह के पास चला गया।
  • अपने निर्वासित जीवन के दौरान ही हुमायूँ ने मीरअली अकबर की पुत्री हमीदा बानो बेगम से 1541 ई. में निकाह किया, कलांतर में अमरकोट के शासक के पास शरण लेने के दौरान हमीदा बेगम बानो ने 1542 ई. में मुगल राजवंश के महान सम्राट अकबर को जन्म दिया।
  • निर्वासन के दौरान हुमायूँ काबुल में रहा। हुमायूँ ने पुनः 1545 ई. में ईरान के शासक की सहायता से कंधार एवं काबूल पर अधिकार कर लिया ।
  • 1553 ई. में शेरशाह के उत्तराधिकारी इस्लामशाह की मृत्यु के बाद अफगान साम्राज्य विघटित होने लगा। अतः ऐसी स्थिति में हुमायूँ को पुनः अपने राज्य प्राप्ति का अवसर मिला ।
  • 1554 ई. में हुमायूँ अपनी सेना के साथ पेशावर पहुँचा। 1555 ई. में उसने लाहौर पर कब्जा कर लिया ।
  • 1555 ई. में लुधियाना से लगभग 19 मील पूर्व में सतलज नदी के किनारे "मच्छीवाड़ा" नामक स्थान पर हुमायूँ एवं अफगान सरदार हैबत खाँ एवं तातार खाँ के बीच संघर्ष हुआ। जिसमें हुमायूँ की जीत हुई और संपुर्ण पंजाब पर मुगलों का अधिकार हो गया।
  • 22 जून 1555 ई. को हुमायूँ एवं सिकंदर सूर के बीच सरहिन्द (पंजाब) का युद्ध हुआ, इसमें हुमायूँ की विजय हुई तथा वह दिल्ली पहुँचकर जूलाई 1555 ई. में अपने को बादशाह घोषित किया। इस प्रकार मुगल साम्राज्य की पुर्नस्थापना हुई।
  • जनवरी 1556 में दिल्ली के दीनपनाह नामक पुस्तकालय से गिरने के कारण हुमायूँ की मृत्यु हो गई ।
  • हुमायूँ का मकबरा दिल्ली में है जिसका निर्माण उसकी पत्नी हमीदा बानों बेगम ने करवाया जो ईरानी संस्कृति से प्रभावित है। जिसका वास्तुकार मिर्जा ग्यास बेग था । इसे मुगलों का कब्रिस्तान कहा जाता है |
  • हुमायूँ की मृत्यु के बाद इतिहासकार लनपूल ने कहा है कि " हुमायूँ जीवन भर लड़खड़ाता रहा और लड़खड़ाते हुए ही मर गया ।”
  • ऐसा माना जाता है कि हुमायूँ ज्योतिष में विश्वास करता था, इसलिए उसने सप्ताह के सात दिन सात रंग के कपड़े पहनने के नियम बनाए ।
    • रविवार :- पीला रंग
    • शनिवार :- काला रंग
    • सोमवारः- सफेद रंग

शेरशाह सूरी (1540-1545)

  • शेरशाह का जन्म 1472 ई. में पंजाब के बाजौर (होशियारपुर) के नरनौल नामक स्थान पर हुआ ।
  • शेरशाह के बचपन का नाम फरीद खाँ था ।
  • पिता - हसन खाँ था जो जौनपुर राज्य के अंतर्गत सासाराम का जागीरदार था ।
  • शेरशाह का आरंभिक शिक्षा जौनपुर में हुई जहाँ उन्होनें अरबी और फारसी भाषा की शिक्षा लिया ।
  • 1522 ई. में शेरशाह दक्षिण बिहार के सूबेदार बहार खाँ लोहानी के यहाँ नियुक्त हुआ । यहीं पर शेरशाह द्वारा एक शेर को मार डालने के कारण बहार खाँ लोहानी ने उसे "शेर खाँ" की उपाधि दी तथा अपने पुत्र जलाल खाँ का संरक्षक नियुक्त हुआ ।
  • 1528 ई. के चंदेरी के युद्ध में वह बाबर की सेना में शामिल हुआ एवं मुगलों के साथ लड़ा।
  • 1529 में घाघरा के युद्ध में वह महमूद लोदी के साथ हो गया, इसी समय बाबर ने हुमायूँ को इससे सतर्क रहने की सलाह दी।
  • 1530 ई. में शेरशाह ने चुनार ( उत्तरप्रदेश) के किलेदार ताज खाँ की विधवा पत्नी लाड मलिका से विवाह कर चुनार के किले पर अधिकार प्राप्त किया ।
  • 1539 ई. में चौसा के युद्ध (बिहार) में मुगल सम्राट हुमायूँ को पराजित कर शेर खाँ "शेरशाह" की उपाधि धारण की ।
  • 1540 ई. में कन्नौज या बिलग्राम के युद्ध में पराजित कर हुमायूँ को भारत से निर्वासित कर दिया। शेरशाह ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार 68 वर्ष की उम्र में उत्तर भारत में "सूर वंश" अथवा "द्वितीय अफगान” साम्राज्य की स्थापना किया ।
  • राजधानी - आगरा
  • शेरशाह को अकबर का अग्रगामी माना जाता है । 
  • शेरशाह के विषय में जानकारी का सबसे प्रमुख स्त्रोत तारीख - ए - शेरशाही या तोहफा - ए - अकबरशाही है जिसकी रचना अब्बास खाँ शेरवानी ने किया ।
  • इनके समकालीन इतिहासकार "मलिक मुहम्मद जायसी" था जिन्होनें “पदमावती" नामक ग्रंथ की रचना किया।

सैन्य अभियान

(1) गक्खरो से युद्धः- 1541 ई. में शेरशाह का गक्खर जाति के लोगों से युद्ध हुआ, जिसमें शेरशाह उनकी शक्ति को खत्म तो न कर सका पर उनकी रोकथाम के लिए उसने पश्चिमोत्तर सीमा पर रोहतासगढ़ के किले का निर्माण करवाया । ( पंजाब )
(2) मालवा पर आक्रमण:- शेरशाह ने 1542 ई. में मालवा पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया । ( शासक- मल्लू खा) ।
(3) रायसीन अभियानः- 1543 ई. में शेरशाह ने रायसीन पर आक्रमण किया (मध्यप्रदेश)। माना जाता है कि शेरशाह ने इस अभियान में धोखे से राजपूत शासक पूरनमल को मार डाला। पूरनमल के मृत्यु के बाद राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर लिया। रायसीन की यह घटना शेरशाह के चरित्र पर एक कलंक माना जाता है।
(4) मारवाड़ का यह अभियान:- शेरशाह 1544 ई. में जोधपुर के खिलाफ अभियान किया। जोधपुर मारवाड़ की राजधानी थी । यहाँ का शासक मालदेव था । लंबे समय तक दोनों के बीच संघर्ष हुआ। मालदेव की ओर से "जयता" और "कुम्पा" नामक सेनापति शेरशाह को कड़ी टक्कर दी। हलांकि अंततः दोनों वीरगति को प्राप्त किए। मारवाड़ अभियान में शेरशाह बड़ी मुश्किल से विजय प्राप्त किया इसलिए शेरशाह ने कहा मैनें मुट्ठी भर बाजरा के लिए समस्त हिन्दुस्तान को खो दिया ।
(5) कालिंजर अभियानः- 1545 ई. में शेरशाह का अंतिम अभियान कालिंजर (बुंदेलखंड, मध्यप्रदेश) का अभियान था। कहा जाता है कि शेरशाह ने कालिंजर के शासक कीरत सिंह की एक नाचने-गाने वाली दासी को हथियाने के लिए कालिंजर पर आक्रमण किया था, जिसको कीरत सिंह ने देने से इंकार कर दिया था।
  • इस अभियान के दौरान शेरशाह ने किले की दीवार को गोला बारूद से उड़ा देने की आज्ञा दी। उसी दौरान “उक्का” नामक आग्नेयास्त्र दीवार से टकराकर लौट गया और शेरशाह के नजदीक आकर फट गया और उसमें आग लग जाने से 22 मई 1545 को शेरशाह की मृत्यु हो गई ।

शेरशाह के उत्तराधिकारी

  • शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका छोटा पुत्र जलाल खाँ, इस्लामशाह की उपाधि धारण कर शासक बना। (1545-1553)
  • इस्लामशाह के पश्चात् उसका पुत्र फिरोज खाँ सिंहासन पर बैठा, लेकिन जल्द ही उसकी हत्या मुबारिज खाँ ने कर दी ।
  • 1553 ई. में मुबारिज खाँ "मुहम्मद आदिल शाह" की उपाधि धारण कर शासक बना। इसी का प्रधानमंत्री “हैमू” था, जिसे 1556 में पानीपत के द्वितीय युद्ध में अकबर द्वारा हराया गया था ।
  • 22 जून 1555 ई. को सरहिन्द के युद्ध में हुमायूँ ने सूर वंश के अंतिम शासक सिकंदर शाह सूरी को पराजित कर भारत में मुगल सत्ता को पुर्नस्थापित किया ।

केंदीय शासन

  • शेरशाह पूर्णतः एकतंत्रात्मक शासन पद्धति में विश्वास रखता था तथा संपूर्ण शक्ति को अपने हाथों में केंद्रित रखता था। फिर भी इतने विशाल साम्राज्य पर शासन करने के लिए उसे कुछ लोगों के सहयोग की आवश्यकता थी । अतः उसने कुछ विभागों की स्थापना की, जो निम्नलिखित थें-
    • दीवान - ए - वजारतः- यह विभाग आर्थिक मामलों की देख-रेख करता था । इसका अध्यक्ष " वजीर" होता था। इसका पद प्रधानमंत्री के समान था ।
    • दीवान-ए-आरिज / अर्ज:- इस विभाग के अधिकारी को "आरिज - ए - मुमालिक" कहा जाता था। सैन्य संबंधी कार्य इस विभाग के अंतर्गत आते थें ।
    • दीवान - ए - रिसालतः-यह अन्य राज्यो के साथ पत्र-व्यवहार आदि के जरियें संपर्क रखता था ।
    • दीवान-ए-ईशा:- यह सामान्य प्रशासन विभाग था ।
    • दीवान - ए - कजाः- यह न्याय विभाग था, जिसके प्रमुख अधिकारी को "काजी" कहा जाता था।
    • दीवान - ए - बरीद:- यह गुप्तचर विभाग था। जिसके अधिकारी को बरीद-ए-मुमालिक कहा जाता था।
प्रांतीय प्रशासनिक व्यवस्थाः- शेरशाह सूरी का साम्राज्य काफी विस्तृत था । अतः उसने अपने साम्राज्य को अनेक प्रांतों में विभक्त कर रखा था। प्रत्येक सूबा का सर्वोच्च अधिकारी "सूबेदार" होता था ।
स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्थाः- शेरशाह का स्थानीय शासन तीन भागों में वर्गीकृत था- (1) सरकार (2) परगना (3) ग्राम 
  • इक्ताओं (सूबा) को “सरकार" (जिला) में विभक्त किया जाता था । प्रत्येक सरकार में दो प्रमुख अधिकारी होते थें जो हैं- 
    (1) शिकदार-ए-शिकदरान:- यह समान्य प्रशासन के कार्य को देखता था ।
    (2) मुंसिफ - ए - मुसिफान:- यह न्यायिक अधिकारी होता था ।
  • प्रत्येक सरकार कई "परगनों" में बँटा था । प्रत्येक परगने में एक शिकदार, एक मुसिफ, एक फोतदार और दो कारकुन ( कलर्क) होते थें ।
  • प्रशासन की सबसे छोटी इकाई "ग्राम" थी जिसके प्रमुख मुखिया होता था ।
राजस्व अधिकारी- भू-शेरशाह ने अपने विश्वसनीय अधिकारी “अहमद खाँ" के निरीक्षण में राज्य की भूमि की वास्तविक माप कराई।
  • शेरशाह ने भूमि की माप के लिए 'गज-ए-सिकंदरी का प्रयोग करवाया। इसमें मापन के लिए सन से बनी रस्सी का उपयोग किया जाता था ।
  • किसानों को शोषण से बचाने के लिए शेरशाह ने "पट्टा" और "कबूलियत" प्रथा का प्रचलन किया ।
  • "पट्टा" एक राजकीय पत्र होता था जिसमें उपज के क्षेत्र, उत्पादन एवं भू-राजस्व की जानकारी लिखी होती थी। किसानों से कबूलियत" के रूप में सहमति पत्र हासिल कर लिया जाता था।
  • शेरशाह की लगान व्यवस्था मुख्य रूप से 'रैय्यतवाड़ी' थी, जिसमें किसानों से प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित किया जाता था।
  • शेरशाह के काल में उत्पादन का 1/3 भाग कर के रूप में लिया जाता था।
  • लगान (कर) के अतिरिक्त किसानों को जरीबाना' (सर्वेक्षण शुल्क) एवं "महासिलाना (कर संग्रह शुल्क) नामक कर भी देने पड़ते थें, जो क्रमशः भू-राजस्व का 2.5 प्रतिशत एवं 5 प्रतिशत होता था।

सार्वजनिक कार्य

  • शेरशाह ने सड़को का निर्माण व्यापक स्तर पर करवाया साथ ही यात्रियों के ठहरने हेतु 1700 "सरायों' का निर्माण करवाया। प्रत्येक सराय की देख-रेख एक "शिकदार" करता था।
  • इतिहासकार कानूनगो ने इन सरायों को साम्राज्य रूपी शरीर की धमनियाँ” कहा है।
  • शेरशाह द्वारा बनाई गई चार सड़के प्रसिद्ध है जो है-
    1. पहली सड़क बंगाल में सोनार गाँव से शुरू होकर दिल्ली, लाहौर होती हुई पंजाब में अटक तक। जिसे “सड़क–ए–आजम” कहा जाता था। इसे ही आगे चलकर लॉर्ड ऑकलैंड ने जी.टी. रोड कह के पुकारा ।
    2. दूसरी सड़क आगरा से बुरहानपुर तक। 
    3. तीसरी सड़क आगरा से जोधपुर होती हुई चित्तौड़ तक ।
    4. चौथी सड़क लाहौर से मुल्तान तक ।

मुद्रा व्यवस्था

  • शेरशाह ने अत्यंत विकसित मुद्रा व्यवस्था प्रचलित की, उसने पुराने घिसे-पिटे सिक्कों के स्थान पर शुद्ध चाँदी का “रुपया” (180 ग्रेन) ओर ताँबे का “दाम” (380 ग्रेन) चलाया।
  • शेरशाह ने अपने सिक्कों पर अपना नाम, पद एवं टकसाल का नाम अरबी एंव देवनागरी लिपि में खुदवाया।
  • शेरशाह द्वारा जारी रुपये के बारें में "स्मिथ" ने लिखा है- "यह रुपया वर्तमान ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली का आधार है।"

भवन व इमारतें

  • शेरशाह के शासनकाल में चाँदी के रुपये एवं ताँबे के दाम का अनुपात 1:64 था ।
  • शेरशाह ने हुमायूँ द्वारा निर्मित "दीनपनाह" को तुड़वाकर उसके ध्वंसावशेषों से दिल्ली में "पुराने किले" का निर्माण करवाया। उसने दिल्ली के पुराना किला में "किला - ए - कुहना" नामक मस्जिद का निर्माण करवाया ।
  • शेरशाह ने अपने साम्राज्य की पश्चिमोत्तर सीमा पर " रोहतासगढ़ का किला" बनवाया ।
  • शेरशाह द्वारा निर्मित सासाराम के मकबरे को पूर्वकालीन स्थापत्य कला की पराकाष्ठा और नवीन शैली के प्रारंभ का द्योतक माना जाता है । कनिंघम ने शेरशाह के मकबरे को ताजमहल से भी सुंदर कहा है ।

अकबर (1556–1605 ई.)

  • अकबर का शाब्दिक अर्थ "महान" होता है।
  • अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 ई. (रविवार) को अमरकोट के राजपूत राजा वीरसाल के राजमहल में हुआ ।
  • अकबर के पिता हुमायूँ थें जबकि माता हमीदा बानो बेगम थी और धाया माँ (परिचायक ) माहम अनगा थी।
  • 3 वर्ष की आयू में अकबर की भेंट अपने पिता से पुनः हुई जब हुमायूँ ने 1545 में काबूल और कंधार का विजय किया। यहीं उसका नाम "जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर" रखा गया ।
  • अकबर जब 9 वर्ष की आयु का था, उस समय पहली बार उसे गजनी का सूबेदार नियुक्त किया गया तथा मुनीम खाँ को अकबर का संरक्षण नियुक्त किया गया ।
  • हुमायूँ जब 1555 ई. में हिन्दुस्तान का पुर्नविजय किया तब उन्होनें अकबर को लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया एवं बैरम खाँ को अकबर का संरक्षक नियुक्त किया गया।
  • अकबर जब लगभग 14 वर्ष का था तब उसके पिता हुमायूँ का निधन हो गया तत्पश्चात् फरवरी 1556 ई. को पंजाब के गुरूदासपुर के कलानौर नामक स्थान पर ईट के चबूतरा के ऊपर अपना राज्याभिषेक करवाया तथा अपना नाम "जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर बादशाह गाजी" रखा ।
  • अकबर के बचपन का नाम जलाल था ।
  • अकबर का शिक्षक अब्दुल लतीफ ईरानी विद्वान था ।
  • हुमायूँ की मृत्यु के बाद दिल्ली और आगरा में पुनः सूर वंशी आदिलशाह के प्रधानमंत्री हेमू ने अधिकार कर लिया ।

पानीपत का द्वितीय युद्ध (5 नवंबर 1556

  • अकबर और हेमू के सेनाओं के बीच पानीपत (हरियाणा) के मैदान में भीषण युद्ध हुआ जिसमें हेमू की हार हुई और पुनः अकबर ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर विशाल साम्राज्य की स्थापना किया ।

हेमू

  • हेमू रेवाड़ी का निवासी था जो वैश्य (बनिया) कुल में पैदा हुआ था। इसका मूल नाम हेमचंद्र था।
  • सूरवंशी शासक आदिलशाह के शासनकाल में हेमू प्रधानमंत्री बनाया गया ।
  • मुस्लिम शासन में मात्र दो हिन्दु टोडरमल एवं हेमू ही प्रधानमंत्री के पद पर पहुँच सकें थें, जबकि मात्र एक ही हिंदु “दिल्ली” के सिंहासन पर बैठा ।
  • हेमू 22 युद्ध लड़ चुका था और उसमें से एक में भी उसे हार का मुँह नहीं देखना पड़ा था। इसलिए “आदिलशाह” ने इसे "विक्रमादित्य" की उपाधि प्रदान किया । "विक्रमादित्य की उपाधि करने वाला 14वाँ अंतिम शासक था ।
  • हेमू दिल्ली के गद्दी पर बैठने वाला अंतिम हिंदु सम्राट था।

बैरम खाँ का संरक्षण काल (1556-60)

  • हुमायूँ ने जब अकबर को लाहौर का सूबेदार नियुक्त किया, उसी समय उसने अपने वफादार बैरम खाँ को अकबर का संरक्षक नियुक्त किया था ।
  • बैरम खाँ फारस के शिया संप्रदाय से संबंधित था ।
  • 1556 ई. में जब अकबर शासक नियुक्त हुआ, वह अल्पवयस्क था । अतः 1556 से 1560 तक बैरम खाँ द्वारा शासन संबंधी महत्वपूर्ण गतिविधियाँ करने के कारण इस काल को बैरम खाँ का संरक्षण काल कहा जाता है।
  • बैरम खाँ की ईमानदारी के कारण उसे “खान-ए-खाना" की उपाधि से सम्मानित किया गयां
  • बैरम खाँ का बढ़ रहा प्रभाव अकबर के संबंधियों तथा राजपरिवार से जुड़े हुए लोगों को रास नहीं आया । राजपरिवार में बैरम खाँ के खिलाफ एकगुट का निर्माण हुआ जिसे "अतखा" खेल गुट कहते हैं। इसमें माहम अनगा, जीजी अनगा, अद्यम खाँ जैसे लोग शामिल थें। इन लोगों ने बैरम खाँ के खिलाफ षड्यंत्र करना तथा अकबर का कान भरना आरंभ किया। अकबर स्वयं भी 1560 आते-आते वयस्क हो चुका था वह प्रशासन में किसी का हस्तक्षेप स्वीकार करना नहीं चाहता था । अतः उन्होनें भी बैरम खाँ से छुटकारा पाने की चेष्टा की ।
  • बैरम खाँ अपने प्रति हो रहें षड्यंत्रों से निराश होकर विद्रोह कर दिया। जिसके बाद पंजाब के तिलवाड़ा नामक स्थान पर बैरम खाँ एवं मुगल शाही सेना के बीच युद्ध हुआ जिसमें बैरम खाँ पराजित हो गया। उसे बंदी बनाकर अकबर के समक्ष प्रस्तुत किया गया। अकबर ने बैरम खाँ के प्रति सम्मान दिखाते हुए उदारता पूर्ण व्यवहार किया तथा बैरम खाँ के समक्ष तीन प्रस्ताव रखा-
    1. बैरम खाँ बादशाह का व्यक्तिगत सलाहकार बन जायें ।
    2. बैरम खाँ काल्पी और चन्देरी (मध्यप्रदेश) का सूबेदार बन जायें ।
    3. बैरम खाँ मक्का चले जायें।
  • बैरम खाँ मक्का जाने की बात को स्वीकार किया। जब बैरम खाँ मक्का जा रहा था उसी समय गुजरात के पाटन नामक स्थान पर 1560 ई. में मुबारक खाँ नामक युवक ने बैरम खाँ की हत्या कर दिया क्योंकि मुबारक खाँ के पिता की हत्या बैरम खाँ ने मच्छीवाड़ा के युद्ध में किया। वही पर बैरम खाँ को दफना दिया गया।
  • बैरम खाँ की हत्या के बाद अकबर ने उसकी विधवा पत्नी सलीमा बेगम से निकाह कर लिया, तथा उसके पुत्र अब्दुर्रहीम को गोद ले लिया। आगे चलकर इसे भी " खान - ए - खाना" की उपाधि प्रदान किया गया ।

पेटीकोट शासन/पर्दा शासन (1550-62/64)

  • बैरम खाँ का संरक्षण समाप्त होने के बाद अकबर के ऊपर राजपरिवार की कुछ महिलाएँ और अकबर के संबंधी (अतखा खेल) से जुड़े हुए लोगों का नियंत्रण स्थापित हुआं लगभग 1560-62 / 64 तक इस गुट का प्रभाव अकबर के ऊपर रहा इसीलिए इस काल को पर्दा शासन सा पेटीकोट शासन के नाम से जाना जाता है ।

साम्राज्य विस्तार उत्तर भारत अभियान

(1) मालवा:- अकबर 1561 ई. में आधम खाँ के नेतृत्व में मालवा का अभियान किया। इस समय यहाँ के शासक बाज बहादुर था । जो पराजित होकर भाग गया तत्पश्चात् उसकी पत्नी रूपमती आत्महत्या कर ली ।
1562 में पीर मुहम्मद खाँ को मालवा का सूबेदार बनाया गया तथा ढक्कनी राज्यों की मदद से बाजबहादुर पुनः आक्रमण कर पीर मुहम्मद खाँ की हत्या कर कब्जा कर लिया। अब्दुल्ला खाँ उज्बेग ने पुनः मुगल कब्जा स्थापित किया और बाजबहादुर मुगल मनसबदार बना दिया गया।
नोट- बाजबहादुर और रूपमति की समाधि उज्जैन में है ।
(2) चुनार:- यहाँ अफगानों का शासन था। 1562 ई. में अब्दुल्ला खाँ के नेतृत्व में इसे जीतकर मुगल साम्राज्य में मिलाया गया ।
(3) आमेर (1562) :- आमेर के राजा भारमल (बिहारीमल ) ने राजपूत शासको में सबसे पहले अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा अपनी पुत्री हरखाबाई का विवाह अकबर से किया। इसी से पुत्र सलीम उत्पन्न हुआ। अकबर ने भारमल के पुत्र भगवानदास और पौत्र मानसिंह को उच्च मनसबदार प्रदान किया । ( हरखाबाई / जोधाबाई / मरियम उज्जमानी)
(4) मेड़ता (1562 ) :- इस समय यहाँ के शासक जयमल थें जिसे मुगल सेनापति सरफुद्दीन ने पराजित कर इस पर अधिकार कर लिया। जयमल भागकर मेवाड़ के राणा उदय सिंह के यहाँ शरण ली ।
(5) गोंडवाना या गढ़कटंगा (1564):- मध्य भारत में गोंडवाना एक स्वतंत्र राज्य था । इस राज्य पर संग्रामशाह की विधवा रानी दुर्गावती के संरक्षण में उसके अल्पायु पुत्र वीर नारायण का शासन था। रानी दुर्गावती महोबा के चंदेल वंश से संबंधित थी ।
  • 1564 में आसफ खाँ ने रानी दुर्गावती को पराजित कर गोंडवाना को जीत लिया ।
(6) मेवाड़ (1567):- 1567 ई. में अकबर ने स्वयं मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ का अभियान किया ।
एकमात्र राजपूत राज मेवाड़ अंत तक अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं किया । यहाँ पर सिसोदिया राजपूत वंश का शासन था । यहाँ के शासक उदय सिंह था । 1568 ई. में चित्तौड़ पर मुगलों द्वारा अधिकार कर लिया गया। हलांकि फिर भी राजा उदयसिंह ने अपनी नई राजधानी उदयपुर से मुगलों से प्रतिरोध जारी रखा। उदयसिंह के तरफ से जयमल और फतेहसिंह अकबर के खिलाफ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया। अकबर चित्तौड़ में हजारों राजपूतों की हत्या की तथा महिलाएँ जौहर कर ली । अकबर के इस अभियान को उसके चरित्र पर काला धब्बा माना जाता है । इसे मिटाने के लिए अकबर आगरा के किला के मुख्य द्वार पर जयमल और फतेहसिंह की मूर्ति लगवाया ।

हल्दीघाटी का युद्ध (1576 ई)

  • 1572 ई. में उदयसिंह के मृत्यु के बाद उसका पुत्र महाराणा प्रताप मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। उसने गोगुंडा नामक स्थान पर राज्याभिषेक कराया । महराणा प्रताप ने उदयपुर के बाद मेवाड़ की राजधानी कुंभलगढ़ स्थानांतरित की ।
  • 18 जून 1576 ई. को अरावली की पहाड़ी में स्थित हल्दीघाटी नामक स्थान पर महाराणा प्रताप और मुगल सेना के बीच युद्ध हुआ जिसे हल्दीघाटी का युद्ध कहा जाता है। महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम चेतक था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की हार हुई। वह राणा झाला की सहायता से जान बचाकर भागने में सफल रहा। महाराणा प्रताप मृत्युपर्यन्त ( 1597) अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं किया ।
  • इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व आसफ खाँ एवं मानसिंह ने किया था ।
  • महाराणा प्रताप के बाद उनका पुत्र अमरसिंह ने भी अकबर और जहाँगीर के खिलाफ अपना विद्रोह जारी रखा। अंततः 1615 ई. में जहाँगीर एवं अमरसिंह के बीच सशर्त समझौता हुआ जिसके तहत् अमरसिंह जहाँगीर की अधीनता स्वीकार कर लिया ।
(7) रणथंभौर (1569):- यहाँ पर सूरजनराय का शासन था।
(8) कालिंजर (1569):- यहाँ बद्येल राजा रामचंद्र का शासन था । उसनें इसे मुगलों को सौंप दिया था । यहाँ का राज्यपाल मजनू खाँ को बनाया गया ।
(9) मारवाड़, बीकानेर एवं जैसलमेर (1570):- मारवाड़, बीकानेर एवं जैसलमेर के शासक क्रमश: चंद्रसेन, कल्याणमल एवं हरराय ने स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार किया।
(10) गुजरात की विजय (1572-73 ) :- गुजरात आक्रमण के लिए अकबर को राजकुमार इतमाद खाँ द्वारा आमंत्रित किया गया। अकबर 1572 ई. गुजरात के खिलाफ अभियान किया। इस समय यहाँ के शासक मुजफ्फर खाँ तृतीय था ।
  • गुजरात विजय के बाद अकबर ने उसे एक प्रांत के रूप में संगठित किया और मिर्जा अजीज कोका के अधीन कर स्वयं राजधानी लौट गया।
  • आगरा में अकबर ने विद्रोह का समाचार पाकर पुन: अहमदाबाद की ओर प्रस्थान किया। फलत: 1573 ई. में अकबर शीघ्र ही 9 दिनों के भीतर गुजरात पहुँचकर उसका विजय किया । इतिहासकार "स्मिथ" ने अकबर के इस अभियान को संसार के इतिहास का सबसे द्रुतगामी (तेजगति वाला) अभियान बताया।
  • अकबर ने अपनी गुजरात विजय की स्मृति में राजधानी फतेहपुर सीकरी में एक बुलंद दरवाजा बनवाया था।
  • अकबर ने पहली बार खंभात में समुद्र को देखा और पुर्तगालियों से भी पहली मुलाकात हुई।
  • गुजरात विजय के उपरांत अब्दुर्रहीम को खान-ए-खाना की उपाधि दी गई।
  • टोडरमल द्वारा गुजरात में प्रथम भूमि बंदोबस्त लागू किया गया ।
(11) बंगाल एवं बिहार का विजय ( 1574-76):- यह अभियान मुनीम खाँ खानखाना के नेतृत्व में हुआ । यहाँ का शासक दाउद खॉ था।
(12) काबुल (1581 ) :- अकबर के काबूल अभियान के समय यहाँ का शासक मिर्जा हकीम था जो अकबर का सौतेला भाई था, वह बार-बार विद्रोह कर स्वयं को बादशाह घोषित किया। अंततः मानसिंह के नेतृत्व में काबूल पर कब्जा कर लिया गया। अकबर ने बख्तुन्निसा वेगम को काबूल का सूवेदार बनाया। बाद में यहाँ का सूबेदार मानसिंह को बनाया गया ।
  • उल्लेख मिलता है कि पुर्तगाली विद्वान मान्सरेट भी इसी अभियान पर अकबर के साथ गया था।
(13) कश्मीर (1585-86 ) :- 1585-86 ई. में अकबर ने कश्मीर को विजीत करने के लिए राजा भगवानदास तथा कासीम खाँ के नेतृत्व में सेना भेजी, जिसमें कश्मीर का राजा युसूफ खाँ पराजित हुआ और मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। किंतु बाद में उसके पुत्र याकूब ने विद्रोह कर दिया, जिसे कुचलने के बाद कश्मीर को मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया ।
नोट- कश्मीर के युसूफाजाई कबीले के विद्रोह को दबाने के क्रम में ही बीरबल मारा गया ।
(14) सिंध ( थट्टा ) 1591:- इस यहाँ के शासक जानीवेग था । 1591 में अब्दुर्रहीम के नेतृत्व में सिंघ को जीतकर मुगल साम्राज्य में मिलाया गया ।
  • 1592 ई. में उड़ीसा के शासक निसार खाँ को पराजित कर मानसिंह ने उड़ीसा को मुगल साम्राज्य में मिलाया ।
  • 1595 ई. में ब्लूचिस्तान के शासक पन्नी अफगान को मीर मासूम ने पराजित कर मुगल साम्राज्य में मिलाया।
  • 1595 में कंधार के शासक मुज्फ्फर हुसैन को शाह बेग ने पराजित कर मुगल साम्राज्य में मिलाया ।

दक्षिण भारत का सैन्य अभियान

  • मुगलों में अकबर प्रथम शासक था, जिसने दक्षिण भारत का अभियान किया।
  • अकबर के समकलीन दक्षिण भारत में चार राज्य थें- खानदेश, अहमदनगर, बीजापुर तथा गोलकुंडा। इसमें एकमात्र खानदेश जिसे दक्षिण का प्रवेश द्वार कहा जाता है, ने अकबर की अधीनता स्वीकार किया ।
  • अकबर दक्षिण विजय के लिए अब्दुर्रहीम तथा उसके पुत्र मुराद के नेतृत्व में एक विशाल फौज भेजा। अकबर के अहमदनगर अभियान के समय वहाँ का शासक बहादुरशाह था जो अवयस्क था । इस समय शासन की बाँगडोर उसकी बुआ तथा वीजापुर की शासिका चाँदबीबी के हाथ में था । चाँदबीबी परिस्थिति की नाजूकता को समझते हुए मुगल सेना से समझौता कर लिया जिसके तहत् मुगलों को "बरार" का क्षेत्र दे दिया। कुछ ही दिनों के पश्चात् अहमदनगर प्रशासन से जुड़े लोगों ने चाँदबीबी को प्रशासन से अलग कर दिया एवं मुगलों के साथ हुए समझौते का उल्लंघन करना शुरू कर दिया। इसके चले अकबर 1599 में अब्दुर्रहीम तथा दानियाल के नेतृत्व में एक विशाल फौज अहमदनगर के खिलाफ भेजा स्वयं अकबर भी इस अभियान पर गया। मुगल फौज पूरे अहमदनगर का विजय कर अपने अधिकार में ले लिया ।
  • खानदेश के शासक मलिक राजा फारूकी के मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र मीरन बहादुर शासक बना जिन्होनें मुगलो की अधीनता त्याग दी। फलतः अकबर खानदेश के खिलाफ अभियान किया तथा उस पर विजय प्राप्त की । इसी राज्य स्थित असीरगढ़ का किला अकबर का अंतिम विजय अभियान था जिसे उन्होनें जनवरी 1601 ई. में जीता ।
नोट- दक्षिण विजय के बाद ही अकबर ने "सम्राट" की उपाधि धारण की।

प्रशासनिक व्यवस्था

  • मुगलकालीन सैन्य व्यवस्था पुर्णतः मनसबदारी प्रथा पर आधारित थी। इसे अकबर ने आरंभ किया था।
  • 1577 में अकबर ने इसे एकल प्रणाली के रूप में आरंभ किया किंतु बाद में 1592 ई. में इसे "जात" व "सवार" के द्विवर्गीकरण से युक्त कर दिया, जिसमें "जात" मनसबदार की हैसियत व "सवार" घुड़सवारों की संख्या को निर्देर्शित करता था ।
  • अबुल फजल ने “आइने -ए-अकबरी" में मनसब के 66 वर्गों का उल्लेख किया है।

धार्मिक नीति

  • अकबर की धार्मिक नीति "सुलह - ए - कुल" की नीति पर आधारित थी, जो सार्वभौमिक समन्वय की बात करता है। अकबर ने यह सिद्धांत अपने गुरू अब्दुल लतीफ से सीखा था।
  • 1562 ई. में दास प्रथा का अंत किया ।
  • 1563 ई. में तीर्थ यात्रा कर की समाप्ति कर दी ।
  • 1564 ई. में जजिया कर को समाप्त कर दिया ।
  • 1575 ई. में फतेहपुर सिकरी में इबादत खाने का निर्माण कर प्रत्येक वृहस्पतिवार को धार्मिक चर्चा का आयोजन सुनिश्चित किया ।
  • 1578 ई. में इबादत खाने में सभी धर्मो के लोगों को प्रवेश की अनुमति दी ।
क्र. सं. धर्म गुरू
1. हिन्दु देवी तथा पुरूषोत्तम
2. पारसी मेहरजी राणा, दस्तूरजी राणा (अकबर ने सूर्य नमस्कार इन्हीं से सीखा था ।)
3. ईसाई / पुर्तगाली अकाबीवा और मॉन्सरेट
4. जैन
हरिविजय सूरी (जगत गुरू)
जिन चंद्र सूरी (युग प्रधान)
नोट- अकबर ने इसी दौरान पुर्तगालियों / ईसाईयों को लाहौर और आगरा में चर्च बनवाने की अनुमति दी ।
  • अकबर 1579 ई में मजहर की घोषण किया । इसकी प्रेरणा उन्हें शेख मुबारक, फैजी एवं अबुल फजल से मिली थी।
  • अकबर 1582 ई. में दीन-ए-इलाही या तोहिद-ए-इलाही या तहकीक-ए-इलाही नामक एक नयें धर्म की स्थापना किया। जिसे दैवीय एकेश्वरवाद के नाम से जाना जाता है ।
  • दीन-ए-इलाही धर्म स्वीकार करने वाला प्रथम एवं अंतिम हिंदु बीरवल था ।
  • अबुल फजल दीन-ए-इलाही धर्म का मुख्य पुरोहित था ।
  • अकबर के धार्मिक जीवन पर सर्वाधिक प्रभाव उनके धार्मिक गुरू अब्दुल लतीफ का था ।
  • अकबर हिन्दु धर्म से काफी प्रभावित था । वह सूर्यपासना करता था । अकबर हिन्दु पर्व त्योहारों को राजदरबार में मनाना आरंभ किया। अकबर हिन्दु राजा के सिर पर तिलक चंदन लगाने, झरोखा दर्शन, तुलादान जैसी हिन्दु प्रथाओं को लागू किया ।
  • 1583 ई. में अकबर ने "हिजरी संवत्" की जगह एक नए संवत् के रूप में "इलाही संवत्" को अपनाया ।

अकबर के नवरत्न 

  • अकबर के दरबार में नौ विशेष दरबारी थें, जिन्हें "अकबर के नवरत्न" के नाम से जाना जाता है-
(1) बीरबल:-
बीरबल का जन्म कालपी में 1528 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, इसके बचपन का नाम महेशदास था। वह एक कुशल वक्ता, कहानीकार एवं कवि था । सम्राट ने इन्हें "कविराज" व "राजा" की उपाधि प्रदान किया। अकबर ने बीरबल को न्याय विभाग के प्रधान का पद दिया । बीरबल एकमात्र हिन्दु था जिन्होनें दीन-ए-इलाही धर्म को अपनाया । 1586 ई. में कश्मीर के युसूफजाई विद्रोह को दबाने के क्रम में वह मारा गया ।
(2) अबुल फजल:-
ये सूफी शेख मुबारक का पुत्र था जिनका जन्म 1550 ई. में हुआ था। इन्होनें “आइने–अकबरी” और “अकबरनामा” जैसे पुस्तकों की रचना किया। ये दीन-ए-इलाही धर्म के मुख्य पुरोहित थें। अबुल फजल की हत्या 1602 ई. में जहाँगीर के आदेश पर वीर सिंह बुंदेला ने किया जब वे दक्षिण से आगरा की ओर आ रहें थें ।
(3) टोडरमल:-
इनका जन्म अवध के जिला सीतापुर के तहसील लहरपुर में हुआ था । अकबर के यहाँ आने से पूर्व ये शेरशाह सूरी के यहाँ नौकरी करते थे। 1572 ई. इन्हें गुजरात का दीवान बनाया गया। इनकी प्रसिद्धि का मुख्य कारण इनके द्वारा किये गये भूमि सुधार था । टोडरमल को अकबर ने दीवान-ए-अशरफ का पद दिया । टोडरमल भागवत् पुराण का फारसी में अनुवाद किया । निधन- 1589 |
  • अकबर के दीवान राजा टोडरमल (खत्री जाति) ने 1580 ई. में दहसाल बन्दोबस्त व्यवस्था लागू की ।
(4) तानसेनः-
इनका जन्म 1506 ई. में ग्वालियर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका असली नाम रामतनु था। तानसेन अकबर के दरबार में आने से पूर्व रीवाँ के राजा रामचंद्र के दरबार में रहते थें। ये अकबर के दरबार का प्रसिद्ध संगीतकार था। इन्हें संगीत सम्राट के नाम से भी जाना जाता है । अकबर ने इन्हें कण्ठाभरण वाणी विलास की उपाधि दिया । तानसेन ध्रुपद गायन शैली के विशेषज्ञ थें। इनकी प्रमुख कृतियाँ- मियाँ की टोड़ी, मियाँ का मल्हार, मियाँ का सारंग, दरबारी कान्हरा आदि थी।
(5) मानसिंहः-
ये आमेर के राजा भारमल के पौत्र तथा भगवानदास का पुत्र था । इन्होनें मुगल साम्राज्य विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। मानसिंह के प्रभाव में आकर अकबर धार्मिक रूप से काफी उदार हुआ एवं अकबर पर हिन्दु धर्म का व्यापक प्रभाव पड़ा।
  • अकबर ने भगवान दास को अमीर-उल-ऊमरा की उपाधि दी।
(6) अब्दुर्रहीम खानखानाः-
यह बैरम खाँ का पुत्र था, जिसे गुजरात विजय के बाद अकबर ने "खान खाना" की उपाधि से सम्मानित किया था। ये जहाँगीर के अध्यात्मिक गुरू थें। इन्होनें बाबर की आत्मकथा तुजुक—ए-बाबरी का फारसी भाषा में बाबरनामा के नाम से अनुवाद किया ।
(7) फैजी:-
यह अबुल फजल का बड़ा भाई था । यह अकबर के दरबार में राजकवि के पद पर आसीन था । अकबर ने इन्हीं के नेतृत्व में “अनुवाद विभाग" की स्थापना किया ।
  • फैजी ने लीलावती का फारसी में अनुवाद किया । इन्होनें सूरदास द्वारा रचित नलदमयन्ति का फारसी में अनुवाद "सहेली" नाम से किया ।
  • पंचतंत्र का फारसी भाषा में अनुवाद अबुल फजल ने अनवर - ए - सादात नाम से तथा हुसैन फैज ने यार-ए-दानिश नाम से किया।
  • हाजी इब्राहिम सरहदी ने अथर्ववेद का, मुल्लाशाह मोहम्म्द ने राजतरंगिनी का फारसी में अनुवाद किया ।
  • नकीब खाँ, अब्दुल कादिर बदायूँनी तथा शेख सुल्तान ने रामायण एवं महाभारत का फारसी में अनुवाद किया । महाभारत का नाम रज्मनामा (युद्धों की पुस्तक) रखा ।
  • अकबर के काल को हिन्दी साहित्य का स्वर्ण काल कहा जाता है।
  • दसवंत एवं बसावन अकबर के दरबार के चित्रकार थें ।
  • अकबर ने शीरी कलम की उपाधि अब्दुस्समद को एवं जड़ी कलम की उपाधि मुहम्मद हुसैन कश्मीरी को दिया ।
(8) मुल्ला दो प्याजा:-
यह अरबी मूल का था और इन्हें भोजन में दो प्याज बहुत पसंद थें इसलिये अकबर ने इनका नाम मुल्ला दो प्याजा रख दिया । यह व्यंगकार था । (हँसी-मजाक )
(9) हकीम - हुकामः -
यह अकबर के पाकशाला (भोजनालय) का प्रधान था ।
  • अकबर ने सर्वप्रथम आगरा को पुनः फतेहपुर सिकरी को अपना राजधानी बनाया तत्पश्चात् जल संकट के कारण उन्होनें लाहौर को कुछ समय के लिए राजधानी बनाया।
  • अकबर नगाड़ा नामक वाद्ययंत्र बजाता था ।
  • राजस्व प्राप्ति के लिए अकबर ने जब्ती प्रणाली को अपनाया था।
  • स्थापत्य कला के क्षेत्र में अकबर की महत्वपूर्ण कृतियाँ है- आगरा का लाल किला, फतेहपुर सीकरी में शाही महल, दीवाने खास, पंच महल, बुलंद दरवाजा, इबादतखाना, इलाहाबाद का किला और लाहौर का किला ।
  • इलाहाबाद नामक नगर की स्थापना अकबर ने किया ।
  • अकबर ने सत्ती प्रथा पर अंकुश लगाने की चेष्टा किया ।
  • मुगल शासकों में अकबर निरक्षर था ।
  • अकबर की शासन प्रणाली की प्रमुख विशेषता मनसबदारी प्रथा थी ।
  • अकबर के समकालीन प्रसिद्ध सूफी संत शेख सलीम चिश्ती थें ।
  • अकबर की मृत्यु 16 अक्टूबर 1605 को हुई । उसे आगरा के निकट सिंकंदरा में दफनाया गया ।

जहाँगीर (1605–1627)

  • जन्म:- 1569 ई. में फतेहपुर सिकरी में
  • मूल नाम :- सलीम
  • पुरा नाम:- नुरूद्दीन मुहम्मद जहाँगीर
  • पिता:- अकबर
  • माता:- मरियम उज्जमानी (हरखाबाई / जोधाबाई)
  • राज्याभिषेक:- 1605 (गुरूवार)

प्रारंभिक कार्य

जहाँगीर शासक बनने के बाद 12 अध्यादेश जारी किया। जो प्रमुख है-
(1) करों (जकात, तमगा आदि) का निषेध
(2) सप्ताह में दो दिन गुरूवार (जहाँगीर के राज्याभिषेक के दिन ) एवं रविवार (अकबर का जन्मदिन) को पशु हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध।
(3) मदिरा तथा सभी प्रकार के मादक द्रव्यों की बिक्री का निषेध, आदि ।
  • जहाँगीर न्याय की जंजीर के लिए प्रसिद्ध रहा था । इन्होनें आगरा के किले की शाह बुर्ज के मध्य एक न्याय की जंजीर लगवाई ताकि दुःखी जनता अपनी शिकायतों को सम्राट के सम्मुख रख सकें ।

शहजादा खुसरों का विद्रोह (1606)

  • जहाँगीर के गद्दी पर बैठने के पश्चात् खुसरों मानसिंह और अजीज कोका की सहायता से विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह में सिक्ख धर्म के 5वें गुरु अर्जुनदेव ने भी साथ दिया था।
  • जहाँगीर ने विद्रोह को दबाते हुए खुसरों को आगरा के किले में बंदी बनाकर रखा गया। बाद के वर्षो में खुर्रम के साथ दक्षिण अभियान के समय खुसरों की हत्या कर दी गई। बाद में इसका शव इलाहाबाद में लाकर दफना दिया गया।
  • बादशाह जहाँगीर ने सिखों के 5वें गुरु अर्जुनदेव को खुसरों को समर्थन देने के कारण मौत के घाट उतार दिया ।

नूरजहाँ

  • यह मुलतः ईरान की रहने वाली थी। इसके बचपन का नाम मेहरून्निसा था। इनके पिता ग्यास बेग था जिसे जहाँगीर ने “एत्मादुद्दौला" की उपाधि प्रदान की। इनकी माता अस्मत बेगम थी जो गुलाब से इत्र निकालने की विधि खोजी थी ।
  • एत्मादुद्दौला का मकबरा आगरा में है जिसका निर्माण नूरजहाँ ने करवाया । सर्वप्रथम पितरादुरा का प्रयोग इसी में हुआ।
  • इनका पति अली कुली बेग था जिसे शेर अफगान कहा जाता था । इन्हीं से नूरजहाँ को लाडली बेगम नामक पुत्री की प्राप्ति हुई । लाडली बेगम का विवाह जहाँगीर के पुत्र शहरयार के साथ हुई।
  • 1607 ई. में शेर अफगान की मृत्यु के बाद मेहरून्निसा अकबर की विधवा सलीमा वेगम की सेवा में नियुक्त हुई । सर्वप्रथम जहाँगीर ने नवरोज त्योहार के अवसर पर मेहरून्निसा को देखा उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर जहाँगीर ने 1611 में उससे विवाह कर लिया।
  • विवाह के बाद उसे “नूरमहल" की उपाधि दी गई। बाद में यह उपाधि "नूरजहाँ" (संसार की रोशनी) कर दी गई।
  • नूरजहाँ, जहाँगीर के साथ झरोखा दर्शन देती थी। सिक्कों पर बादशाह के साथ उसका भी नाम अंकित होता था ।
  • माना जाता है कि शाही आदेशों पर बादशाह के बाद नूरजहाँ के हस्ताक्षर भी होते थे।

राजनैतिक अभियान

मेवाड़ विजय:-
जहाँगीर 1615 में मेवाड़ के शासक अमर सिंह को पराजित कर मेवाड़ को अपने साम्राज्य में मिलाया ।
कांगड़ा विजयः-
जहाँगीर ने 1620 ई. में कांगड़ा दुर्ग का अभियान किया। माना जाता है कि कांगड़ा दुर्ग का अभियान करने में अकबर भी असफल रहा था ।
  • कांगड़ा किला जीतने के उपलक्ष्य में जहाँगीर ने एक गाय को कटवाकर जश्न मनाया था।
दक्षिण अभियानः-
जहाँगीर दक्षिण भारत के खिलाफ अभियान किया । दक्षिण विजय की जिम्मेबारी उन्होनें खुर्रम को सौपा। दक्षिण भारत के अहमदनगर में जहाँगीर को सर्वाधिक चुनौती यहाँ के वजीर मलिक अंबर ने दिया जो अबीसीनिया मूल का था । मलिक अंबर गुरिल्ला / छापामार युद्ध नीति का विशेषज्ञ था ।
  • जहाँगीर की अधीनता बीजापुर के शासक आदिलशाह ने भी स्वीकार किया ।
  • दक्षिण विजय की खुशी में जहाँगीर ने खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि दिया।

कंधार की पराजय

  • कंधार अपने सामरिक और व्यापारिक महत्व के कारण भारत और फारस का मेरूदंड था । यह भारत का प्रवेश द्वार और मध्य एशिया और फारस से आने वाले आक्रमणकारियों को रोकने का प्रकृतिक युद्ध मोर्चा भी था ।
  • 1622 ई. में फारस के शाह अब्बास ने कंधार को मुगलों से पुनः छीन लिया। फलतः जहाँगीर के शासनकाल में ही कंधार, ईरानियों के कब्जे में चला गया था ।

विदेशियों के दौरे

  • कैप्टन हॉकिंस और सर टॉमस रॉ जहाँगीर के शासनकाल में व्यापारिक अनुमति प्राप्त करने भारत आए ।
  • हाकिंस एक साहसिक अंग्रेज नाविक था जो 1608 ई. में भारत ( सूरत में ) आया था; वह इंगलैंड के राजा जेम्स प्रथम से भारत के मुगल सम्राट अकबर के नाम एक पत्र लाया था। किंतु वह पहुँचा तो सम्राट अकबर की मृत्यु हो चुकी थी और जहाँगीर बादशाह बन गया था।
  • हाकिंस जहाँगीर से आगरा में मिला (1609) और फारसी में बात की। कैप्टन हाकिंस को जहाँगीर ने "इंगलिश खान" की उपाधि से सम्मानित किया था ।
  • सुर टॉमस रो 1615 में जेम्स प्रथम के राजदुत से सूरत में अंग्रेजों को व्यापार करने के लिए "फ़रमान " प्राप्त काने सफल हुआ।

मृत्यु

  • महावत खाँ ने झेलम नदी के तट पर 1626 ई. में जहाँगीर को बंदी बना लिया ।
  • 28 अक्टूबर 1627 को भीमवार नामक स्थान पर जहाँगीर की मृत्यु हो गयी। उसे लाहौर के शहादरा में रावी नदी के तट पर दफना दिया गया ।
  • जहाँगीर के मकबरा का निर्माण नूरजहाँ ने करवाया ।

अन्य तथ्य

  • जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा तुजुक - ए - जहाँगीरी लिखा जिसे पूरा करने का श्रेय मौतबिंद खाँ को है |
  • जहाँगीर के समय को चित्रकला का स्वर्णकाल कहा जाता है।
प्रमुख चित्रकारः-
आगा राजा, अबुल हसन, मुहम्मद नासिर, मुहम्मद मुराद, उस्ताद मंसूर, विशनदास, फारूख बेग इत्यादि ।
  • जहाँगीर ने आगा रजा के नेतृत्व में आगरा में चित्रणशाला की स्थापना की।
  • उस्ताद मंसूर एवं अबुल हसन को जहाँगीर ने क्रमशः नादिर - अल- उस एवं नादिरूज्जमा की उपाधि प्रदान की। मंसूर पक्षी का चित्र बनाता था।
  • जहाँगीर ने संस्कृत के कवि जगन्नाथ को "पंडित राज" की उपाधि दी।
  • जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा कि कोई चित्र चाहे वह किसी मृतक व्यक्ति या जीवित व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो, मैं देखते ही तुरंत बता सकता हूँ कि यह किस चित्रकार की कृति है ।
  • अशोक के कौशाम्बी स्तंभ पर समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति तथा जहाँगीर का लेख उत्कीर्ण है ।
  • जहाँगीर ने सवार पद में दो अस्पा एवं सिंह अस्पा की व्यवस्था की। सर्वप्रथम यह पद महावत खाँ को दिया गया ।

शाहजहाँ (1627-1657)

प्रारंभिक जीवन

  • शाहजहाँ का जन्म लाहौर में 1592 ई. को मारवाड़ के राजा उदय सिंह की पुत्री जगतगोसाई (जोधाबाई) के गर्भ से हुआ था ।
  • शाहजहाँ के बचपन का नाम खुर्रम था ।
  • दक्षिण भारत में अहमदनगर के वजीर मलिक अंबर के विरूद्ध सफलता से खुश हो जहाँबीर ने खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि प्रदान की।
  • शाहजहाँ का विवाह 1612 ई. में नूरजहाँ के भाई आसफ खाँ की पुत्री "अर्जुमंदबानों बेगम" से हुआ था, जो इतिहास में "मुमताज महल" के नाम से विख्यात हुई। शाहजहाँ ने इन्हें “मल्लिका-ए-जमानी" की उपाधि दी थी ।
  • 1627 ई. में शाहजहाँ के मृत्यु के बाद मुगल इतिहास में पहली बार उत्तराधिकारी के मुद्दे पर खुर्रम और शहरयार के मध्य युद्ध हुआ ।
  • 1627 ई. में पिता जहाँगीर की मृत्यु के समय शाहजहाँ दक्षिण भारत में था । यहाँ दिल्ली में जहाँगीर की मृत्यु के बाद नूरजहाँ ने शहरयार को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया ।
  • शाहजहाँ ने आसफ खाँ (वकील) तथा राज्य दीवान ख्वाजा अबुल हसन की सहायता से उसका विरोध किया और अंततः युद्ध में विजयी होने के बाद उसने सत्ता ग्रहण किया।
  • 1628 ई. को शाहजहाँ " अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन मुहम्मद साहिब किरन - ए - सानी" की उपाधि धारण करके गद्दी पर बैठा। आगरा में शाहजहाँ का राज्याभिषेक हुआ ।
  • 1631 ई. में मुमताज तहल का निधन हो गया । उन्हीं के याद में शाहजहाँ ने आगरा में ताजमहल का निर्माण करवाया ।
  • ताजतहल का निर्माण 1631 से 1653 के बीच हुआ। इसके निर्माण में प्रयुक्त होने वाला संगमरमर मकराना (राजस्थान) से लाया जाता था । इनके दोनों ओर मस्जिद स्थित है जिनका निर्माण लाल पत्थर से हुआ है। यूनेस्को में 1983 ई. में इसे विश्व विरासत सूची में शामिल किया ।
  • उस्ताद ईसा ने ताजमहल की रूप रेखा तैयार किया ।
  • ताजमहल का निर्माण करने वाला मुख्य स्थापत्य कलाकार उस्ताद अहमद लाहौरी था ।

उत्तराधिकारी का युद्ध

शाहजहाँ को चार पुत्र और तीन पुत्री थी ।

पुत्र

(1) दारा शिकोह :-
यह शाहजहाँ का सबसे बड़ा और योग्य पुत्र था। शाहजहाँ उसे अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था। इन्होनें 52 उपनिषदों का "सिर-ए-अकबर" (महान रहस्य) नाम से फारसी में अनुवाद किया । पंजाब का सूबेदार था ।
  • लेनपूल में दारा शिकोह को "लघु अकबर" की संज्ञा दिया ।
  • शाहजहाँ ने दारा शिकोह को बुलंद इकबाल की उपाधि दिया । "मज्म - उल - बहरीन" दारा की मूल रचना थी !
(2) शाहशुजाः-
बंगाल का सूबेदार ।
(3) औरंगजेब:-
ढ़क्कन का सूबेदार ।
(4) मुरादबख्शः-
गुजरात का सूबेदार ।

पुत्री

(1) जहाँआरा:-
उत्तराधिकारी के युद्ध में दारा का साथ दी। यह विदुषी थी इन्होनें सूफी संत मोइनुद्दीन पर मोनिस-अल-अरवाह तथा मुल्ला शाह बदख्शी पर रिसाला साहिबिया लिखी ।
(2) रौशन आरा:- 
उत्तराधिकारी के युद्ध में औरंगजेब का साथ दी ।
(3) गौहन आराः- 
उत्तराधिकारी के युद्ध में शाहशुजा का साथ दी ।
  • सितंबर 1657 में शाहजहाँ के गंभीर रूप से बीमार पड़ने और मृत्यु का अफवाह फैलने के कारण उसके पुत्रों के बीच उत्तराधिकारी का युद्ध आरंभ हुआ।
(1) बहादुरगढ़ का युद्ध (बनारस):-
यह युद्ध फरवरी 1658 को शाहशुजा और मुगल शाही सेना के बीच हुआ । शाही सेना का नेतृत्व दारा शिकोह का पुत्र सुलेमान शिकोह एवं जयसिंह कर रहा था। इसमें शाहशुजा की पराजय हुई |
(2) धरमट का युद्ध (उज्जैन):-
यह युद्ध अप्रैल 1658 को औरंगजेब एवं मुगल शाही सेना के बीच हुई । इस युद्ध में दारा शिकोह की ओर से शाही सेना का नेतृत्व जोधपुर के राजा जसवंत सिंह व कासिम खाँ ने किया। इस युद्ध में अंततः शाही सेना पराजित हुई।
(3) सामूगढ़ का युद्ध:-
यह युद्ध जून 1658 ई. में औरंगजेब एवं दारा शिकोह के बीच हुआ। इसमें दारा की पराजय हुई। वह दिल्ली होते हुए ब्लुचिस्तान भाग गया। फलतः औरंगजेब पहले आगरा पर अधिकार किया पुनः दिल्ली पर अधिकार किया तथा जुलाई 1658 ई. में उन्होनें अपने को बादशाह घोषित करते हुए अपना राज्याभिषेक करवाया तथा शाहजहाँ को बंदी बनाकर आगरा के किला में रखा।
(4) खाजवाँ का युद्ध (इलाहाबाद):-
यह युद्ध जनवरी 1659 ई. में औरंगजेब तथा शाहशुजा के बीच हुई। इसमें शाहशुजा की पराजय हुई तथा वह हिन्दुस्तान छोड़कर भाग गया ।
(5) देवराय का युद्ध (अजमेर):-
यह युद्ध मार्च 1659 ई. में औरंगजेब तथा दारा शिकोह के बीच हुई। यह उत्तराधिकारी का अंतिम युद्ध था। इसमें दारा की पराजय हुई, उसे पकड़कर इस्लाम विरोधी करार देकर फाँसी पर लटका दिया। इस प्रकार उत्तराधिकारी के युद्ध में अंतिम विजय औरंगजेब की हुई तथा वह बादशाह बना।

प्रमुख व्रिदोह

बुंदेला राजपुत का विद्रोहः—
शाहजहाँ के शासनकाल में 1628 में बुंदेला सरदार जुझार सिंह के नेतृत्व में बुंदेलों ने शाहजहाँ के विरूद्ध विद्रोह किया। तत्पश्चात् शाहजहाँ स्वयं इस अभियान पर गया और विद्रोह को दबाया। अंततः 19 1629 ई. में जुझार सिंह ने आत्म समर्पण कर दिया। जुझार सिंह ने 5 वर्ष तक वफादारी से मुगल बादशाह की सेवा की और दक्षिण के युद्धों में भाग लिया । 1634 ई. में वह अपनी राजधानी ओरछा वापस चला गया । 1635 ई. में उसने गोंडवाना पर आक्रमण कर उसकी राजधानी चौरागद को जीत लिया तथा शासक प्रेमनारायण को मार दिया। एक अधीनस्थ शासक दूसरें अधीनस्थ शासक पर बिना बादशाह की आज्ञा के आक्रमण करें यह मुगल नीति के अनुसार अपराध था । अतः शाहजहाँ ने उसे गोंडवाना के बराबर जागीर देने को कहा जिसे मानने से जुझार सिंह ने इंकार कर दिया। अंततः मुगल सेना ने औरंगजेब के नेतृत्व में आक्रमण किया । 1635 में यह विद्रोह समाप्त हो गया ।
नोटः- बुंदेलों का सबसे प्रभावी विद्रोह औरंगजेब के शासन काल में छत्रसाल के नेतृत्व में हुआ था ।

खान-ए-जहाँलोदी का विद्रोह

  • शाहजहाँ के शासनकाल में एक अन्य विद्रोह उसके एक योग्य एवं सम्मानित अफगान सूबेदार "खान-ए-जहाँ लोदी" ने किया था ।
  • खान-ए-जहाँ लोदी ढ़क्कन का सूबेदार था । इसने बुंदेला विद्रोह दबाने में शाहजहाँ का साथ दिया था ।
  • अंततः 1631 ई. में खान-ए-जहाँ मारा गया और उसी के साथ विद्रोह समाप्त हो गया ।

पुर्तगालियों का विद्रोह

  • शाहजहाँ के शासनकाल आते-आते भारत में पुर्तगालियों शक्ति काफी मजबूत हो गया । पुर्तगाली भारतीय समाज और धर्म में अनावश्यक हस्तक्षेप करता था । वह हिन्दु और मुसलमानों को इसाई धर्म अपनाने के लिए विवश करता था और बाजारों में लूटमार प्रारंभ कर दी ।
  • शाहजहाँ ने 1632 ई. में पुर्तगालियों के विद्रोह को दबाने का आदेश दिया । अततः 4 महीने के बाद हुगली पर अधिकार कर लिया गया ।
सिख विद्रोह:-
शाहजहाँ एवं 6ठें सीख गुरू हरगोविन्द के बीच संघर्ष हुए, दोनो के बीच संघर्ष के मुख्य कारण, राजनीतिक और धार्मिक बिबाद था इस संघर्ष में सिख गुरु की पराजय हुई। वह काश्मीर के कीरतपुर के पहाड़ी में जाकर छिप गया ।

साम्राज्य विस्तार (दक्षिण अभियान )

अहमद नगरः– शाहजहाँ ने महावत खाँ के नेतृत्व में अहमदनगर पर आक्रमण किया और अंततः 1633 ई. तक उसे जीतकर मुगल साम्राज्य में मिला लिया तथा सुल्तान हुसैन शाह को ग्वालियर के किले में कैद कर दिया गया ।
गोलकुंडाः- अहमद नगर को साम्राज्य में मिलाने के बाद शाहजहाँ ने गोलकुंडा पर दबाब डाला। अंततः 1636 ई. में गोलकुंडा के शासक शख अब्दुल्ला कुतुबशाह ने मुगलो से संधि का ली।
  • गोलकुंडा पर अधिकार हो जाने के बाद शाहजहाँ औरंगजेब को दक्षिण के सुबेदार नियुक्त करके दिल्ली चला गया।
  • कलांतर में गोलकुंडा के वजीर मुहम्मद सईद ( मीर जुमला ) ने शाहजहाँ को कोहिनूर हीरा भेंट किया था ।
बीजापूरः- शाहजहाँ ने बीजापूर के शासक आदिलशाह II पर 1636 में आक्रमण किया और वह शाहजहाँ की अधीनता स्वीकार कर लिया ।
नोट- औरंगजेब को दो बार दक्षिण का सूबेदार बनाया गया था। प्रथम बार 1636-44 तक, द्वितीय बार 1653 – 56 तक ।

मध्य एशिया व उत्तर पश्चिम अभियान

कंधार :-
जहाँगीर के समय में 1622 ई. में कंधार मुगलों के अधिकार से निकलकर ईरानियों के हाथ में जा चुका था।
  • 1638 ई. में कंधार का किलेदार अली मर्दान खाँ ने ईरान के शाह के डर से कंधार का दुर्ग मुगलों को सौंप दिया। इस प्रकार कंधार पुनः मुगलों को प्राप्त हो गया ।
  • 1648 ई. में ईरान के शासक शाह अब्बास द्वितीय ने कंधार पर आक्रमण पर किया । उस समय कंधार का मुगल गर्वनर दौलत खाँ था । मुगल सेना की तरफ से किले की कोई सहायता पहुँच पाती, तब तक उस पर शाह अब्बास ने अधिकार कर लिया । 
नोट:- 1649 से कंधार हमेशा के लिए भारत से छीन गया ।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • शाहजहाँ के शासन काल को स्थापत्य कला का स्वर्णकाल कहा जाता है
शाहजहाँ द्वारा बनवायी गयी मुख्य इमारतः– ताजमहल, आगरा का मोती मस्जिद, दिल्ली का लाल किला, दीवाने - आम, दीवाने खास, दिल्ली का जामा मस्जिद एवं लाहौर किला स्थित शीश महल, आदि...
नोट- हुमायूँ के मकबरा को ताजमहल का पूर्ववर्ती माना जाता है ।
  • शाहजहाँ ने कोहिनूर हीरा जड़ित 'तख्त-ए-ताऊस" / मयूर सिंहासन का निर्माण कराया, जिसे बे बादल खाँ के नेतृत्व में तैयार किया गया ।
  • शाहजहाँ ने संगीतज्ञ लाल खाँ को "गुण समन्दर" की उपाधि एवं पंडित जगन्नाथ को "महाकविराय" की उपाधि दी जिसने “गंगालहरी” नामक पुस्तक लिखी ।

धार्मिक और राजपूत नीति

  • 1632 में शाहजहाँ अपने पिता के शासनकाल में बनवाए गए मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया तथा मुस्लिम कन्याओं का हिन्दुओं से विवाह पर रोक लगा दिया।
  • कालांतर में खंभात के निवासियों की प्रार्थना पर वहाँ गोवध पर रोक लगा दिया ।
  • अकबर द्वारा आरंभ इलाही संवत्" की जगह पुनः हिजरी संवत् का शुरूआत किया ।
  • विदार शाहजहाँ ने किसी भी राजपूत को सूबेदार का पद नहीं दिया। अपवाद स्वरूप राजा रघुनाथ को "शाही दीवान” जैसे महत्वपूर्ण पद दिया गया ।
  • शाहजहाँ का दरबारी कवि पहले कुदसी था, परंतु बाद में अबुकालीन हो गया ।
  • कृषि विकास के लिए "फैज" नामक नहर खुदवाया ।
  • अकबर की " आइन-ए-दहशाला" में परिवर्तन कर इजारेदारी या ठेकेदारी प्रथा को अपनाया ।
  • शाहजहाँ ने कश्मीर को लाहौर से, थट्टा को मुल्तान से, उड़ीसा को बंगाल से अलग कर 3 नए सूबे बनाया जिससे मुगल सम्राज्य में सूबों की संख्या 18 हो गई ।
  • शाहजहाँ ने मुगल साव्राज्य की राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की तथा शाहजहाँनाबाद नगर की स्थापना की। अकबर द्वारा मुगलकाल में अपनाई गई सिजदा को समाप्त कर चहार - ए - तस्लीम और जमीनबोस की परंपरा शुरू की।
  • शाहजहाँ लंबे समय तक औरंगजेब के बंदी के रूप में आगरा के किला में रहा, इस दरम्यान उसके साथ जहाँ आरा सेवा में रही। 1666 में शाहजहाँ का निधन हो गया। उसे आगरा के ताजमहल में मुमताज महल के कब्र के बगल में दफना दिया गया ।

औरंगजेब (आलमगीर), (1658-1707)

  • औरंगजेब का जन्म 1618 ई. में गुजरात के " दोहद" नामक स्थान पर मुमताज महल के गर्भ से हुआ था, लेकिन उसके बचपन का अधिकांश समय नूरजहाँ के पास बीता ।
  • औरंगजेब का विवाह 1637 में फारस के राजघरानें के शाहनवाज की पुत्री दिलरास बानों बेगम (राबिया बीबी) से हुआ । औरंगजेब की पुत्री का नाम मेहरून्निसा था ।
  • औरंगजेब ऐसा मुगल शासक था जिसने दो वार राज्याभिषेक करवाया।
  • राज्याभिषेक के अवसर पर औरंगजेब ने "अब्दुल मुजफ्फर मुहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब बहादुर आलमगीर बादशाह गाजी" की उपाधि धारण की ।
नोट- व्यक्तिगत चरित्रिक गुणों के कारण औरंगजेब को जिंदापीर के नाम से जाना जाता था।
  • औरंगजेब ने जहाँआरा को "सहिबात - उज-जमानी" की उपाधि प्रदान की ।

राजनैतिक अभियान

दक्षिण अभियान में नेतृत्व का क्रमः- शाइस्ता खाँ - जयसिंह - मुअज्जम - बहादुर खाँ - शाहआलम- स्वयं औरंगजेब
बीजापुरः- 1656 की संधि को पूर्ण न कर पाने के आरोप में जयसिंह के नेतृत्व में बीजापुर पर आक्रमण किया गया । इस समय तक जयसिंह ने शिवाजी के साथ पुरंदर की संधि ( 1665 ) के तहत् यह आश्वासन ले लिया थ कि शिवाजी मुगलों की सहायता करेगा ।
  • 1666 ई. तक जयसिंह का यह अभियान असफल हो गया क्योंकि गोलकुंडा व मराठों की मदद भी बीजापुर को मिलती रहीं इस कारण औरंगजेब जयसिंह से नाखुश हो गया और उसे वापस बुला लिया ।
  • 1672-73 ई. में जब सिकंदर आदिलशाह शासक बना तो उसके समय दरबार दो गुटों में बँट गया, जिसमें एक गुट का नेतृत्व ख्वासा खाँ और दूसरे का बहलोल खाँ कर रहा था ।
  • इस गुटबंदी ने वहाँ की राजनीतिक एकता को प्रभावित किया अंततः 1686 ई. में औरंगजेब ने स्वयं नेतृत्व किया और बीजापुर को अपने साम्राज्य में मिला लिया ।
गोलकुंडा:- 1678 ई. तक यहाँ अब्दुल्ला कुतुबशाह का शासन था और वह किसी भी तरीके से अपने साम्राज्य को बचाने में सफल रहा। किंतु जब अबुल हसन शासक बना तो प्रशासन की वास्तविक जिम्मेदारी दो ब्राह्मण भाईयों मदन्ना और अखन्ना पर थी, जिनकी शिवाजी से मित्रवत संबंध था ।
  • 1687 ई. में औरंगजेब स्वयं गोलकुंडा का अभियान कर उसे अपने साम्राज्य में मिलाया ।
मराठा अभियान:- शिवाजी के नेतृत्व में मराठा मुगल संघर्ष की शुरूआत हुई और पुरंदर की संधि ( 1665) से अल्पकालिक समझौता भी हुआ ।
  • 1680 ई. में शिवाजी के मृत्यु के बाद ओरंगजेब ने कूटनीति की जगह शक्ति का सहारा लिया और शिवाजी के पुत्र शंभाजी की हत्या करवा दी तथा साहू (1689) को गिरफ्तार कर लिया ।

प्रमुख विद्रोह

जाट विद्रोहः- औरंगजेब के शासनकाल में तिलपत के जमींदार गोकुल जाट के नेतृत्व में जाटों ने विद्रोह कर दिया । मुगल सेना ने गोकुल को पराजित कर मृत्युदंड दिया ।
  • दूसरा जाट विद्रोह राजाराम के नेतृत्व में किया गया। राजाराम ने मुगल सेनापति की हत्या कर सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरें में लूट-पाट की।
  • इतिहासकार मनूची के अनुसार, "राजाराम ने अकबर की हड्डियों को खोद कर जला भी दिया ।" परंतु 1688 ई. में राजाराम एक युद्ध में परास्त हुआ और मारा गया ।
  • तीसरा जाट विद्रोह राजाराम के भतीजे चूड़ामन के नेतृत्व में हुआ जो दबाया नहीं जा सका, क्योंकि औरंगजेब इस समय दक्षिण विस्तार में लगा हुआ था । अंततः सूरजमल के नेतृत्व में जाटों ने एक स्वतंत्र राज्य भरतपुर की स्थापना की । 
बुंदेला विद्रोह:- चंपतराय बुंदेला ने 1661 ई. में विद्रोह किया । हलाँकि इस विद्रोह को जल्द ही दबा दिया गया। कलांतर में चंपतराय के बेटे छत्रशाल ने पुनः विद्रोह किया ।
  • 1705 ई. में औरंगजेब ने उससे संधि कर ली। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद वह बुंदेलखंड का स्वतंत्र शासक बना।
सतनामी विद्रोह:- सतनामी एक कृषक समुदाय का लोग था । इनका निवास क्षेत्र नारनौल था । इनके विद्रोह का कारण 1672 ई. में एक सैनिक और एक किसान के बीच लड़ाई का मुद्दा बना और इस क्षेत्र में विद्रोह शुरू हो गया, लेकिन मुगल साम्राज्य ने जल्द ही इस विद्रोह को दबा दिया ।
राजपूत विद्रोहः
मारवाड़:- मारवाड़ का शासक जसवंत सिंह था । 1678 में जसवंत सिंह की मृत्यु हो गई। मारवाड़ का कोई अधिकारिक उत्तराधिकारी घोषित ना होने के कारण औरंगजेब ने अस्थायी तौर पर मारवाड़ को केंदीय प्रशासन के अधीन कर दिया, जो आगे विद्रोह का कारण बना।
  • जसवंत सिंह का अल्पवयस्क पुत्र अजीत सिंह था जिसे दुर्गादास मारवाड़ का शासक बनाना चाहता था। फलतः दुर्गादास अजीत सिंह और उसकी माता जोधपुर जाकर विद्रोह शुरू कर दिया।
  • औरंगजेब का पुत्र अकबर II ने दुर्गादास के बहकावे में आकर अपने पिता के खिलाफ विद्रोह किया।
  • 1679 में विद्रोह को दबाने के लिए मुगल सेना मारवाड़ भेजी गयी। अंततः मारवाड़ पर मुगलों का पुनः नियंत्रण स्थापित हो गया |
  • इस अभियान के दौरान ही 1679 ई. में औरंगजेब ने हिन्दुओं पर "जजिया कर लगाना प्रारंभ कर दिया।
सिख विद्रोह:- औरंगजेब के विरूद्ध विद्रोह करने वाले में सिख अंतिम थें। यह उसके काल का एकमात्र विद्रोह था जो धार्मिक कारणों से हुआ था । सिख विद्रोह प्रमुखतः 1675 ई. में गुरू तेगबहादुर को प्राणदंड दिये जाने के बाद प्रारंभ हुआ ।
  • गुरू तेगबहादुर की मृत्यु के पश्चात् गुरू गोविन्द सिंह ने औरंगजेब की धार्मिक नीतियों का हमेशा विरोध किया । उन्होनें आनंदपुर में अपना मुख्यालय बनाया । गुरू गोविन्द सिंह ने अपनी मृत्यु से पहले ही "गुरू की गद्दी" को समाप्त कर दिया था और सिखों को एक कट्टर संप्रदाय बनाने में अपनी भूमिका अदा की।
  • औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी बहादुरशाह प्रथम ने गुरू गोविन्द सिंह के साथ संधि कर ली और गुरु ने दक्षिण भारत के युद्धों में उसका साथ दिया। 

धार्मिक नीति 

  • औरंगजेब एक कट्टर सुन्नी मुसलमान तथा रूढ़ीवादी शासक था। उसने कुरान (शरीयत) को अपने शासन का आधार बनाया ।
  • औरंगजेब ने मुद्राओं पर कलमा खुदवाना बंद कर दिया ।
  • औरंगजेब ने नवरोज का त्योहार मनाना, भाँग की खेती करना, गाना बजाना, झरोखा दर्शन, तुलादान प्रथा आदि पर प्रतिबंध लगा दिया ।
  • औरंगजेब ने दरबार में संगीत पर पाबंदी लगा दी तथा सरकारी संगीतज्ञों को अवकाश दे दिया । औरंगजेब स्वयं वीणा बजाने में दक्ष था ।
  • औरंगजेब ने 1665 ई. में हिन्दु मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया । इसके शासनकाल में तोड़े गए मंदिरों में सोमनाथ का मंदिर, बनारस का विश्वनाथ मंदिर एवं वीर सिंह देव द्वारा जहाँगीर काल में मथुरा में निर्मित केशव राय मंदिर था।
  • औरंगजेब दारूल हर्ब (काफिरों का देश ) को दारूल इस्लाम (इस्लाम का देश ) बनाना चाहता था ।
  • औरंगजेब के शासनकाल में मुगल सेना में सर्वाधिक हिंदु सेनापति था।
  • फ्रांसीसी यात्री फ्रांकोइस बरनीयर औरंगजेब के चिकित्सक था ।
  • औरंगजेब की मृत्यु 20 फरवरी 1707 को हुई । इसे खुलदाबाद जो अब रोजा कहलाता है, में दफनाया गया। औरंगजेब के समय सूबों की संख्या 20 थी । 

प्रमुख शब्द

वकील:- सम्राट के बाद शासन के कार्यों को संचालित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी वकील होता ( नियुक्त - मंत्री)
दीवान या वजीरः- राजस्व एवं वित्तीय विभाग अकबार के द्वारा लाया गया। ( अकबर के द्वारा लाया गया ।)
मीर बख्शी:- सेना का सर्वोच्च अधिकारी होता था । यह पद अकबर के शासन काल से प्रारंभ हुआ ।
विजारत:- मंत्रिपरिषद को कहा जाता था।
मनसबदारी व्यवस्थाः- यह दशमलब पद्वति पर आधरित थी, जिसमें 10 से 5000 तक मनसब दिया जाता था ।
मनसब का अर्थ 'पद' होता है और इससे निम्न बातों का पता चलता है
    • अधिकारी की पदानुमान की स्थिति
    • धारक का वेतन
    • नियत संख्या में सेना, धोड़े व हथियार का ज्ञान
  • मनसबदार का आशय ऐसे व्यक्तियों से था, जो राजकीय नैकरी में थे । ये एक समेकित व्यवस्था थी जिससे सैन्य, नागरिक तथा अमीर - कुलीन सभी शामील थी ।
  • 1577 में अकबार द्वारा इसकी शूरूआत की गई जो पहले यकल व्यवस्था के रूप में थी ।
  • 1592 ई. में इसका द्विवर्गीकरण कर 'जात' व 'सवार' पद से युक्त कर दिया गया ।
  • 'जात' व्यक्तिगत पद तथा वेतन से जुड़ा था तो सवार उसके पास घुड़सवारी की संख्या से ।
  • आइने अकबरी में 66 मनसब का उल्लेख किया गया। किंतु व्यवहारतः में 33 मनसब ही प्रदान किये जाते थे |
  • 2500-5000 - अमीर-ए-आजम, 500-2500 अमीर – 500 - मनसबदार

उत्तर मुगल काल (1707-1857)

बहादुर शाह प्रथमः- 1707-1712
जहाँदार शाहः- 1712-1713
फर्रुखशियरः- 1713-1719
रफी - उद्-दरजातः- फरवरी - जून 1719 ( क्षयरोग निधन )
रफी-उद-दौला:- जून - सितम्बर 1719 (क्षयरोग निधन )
मुहम्मदशाहः- 1719-1748
अहमदशाहः- 1748-1754
आलमगीर द्वितीयः- 1754-1758
शाहजहाँ तृतीयः- 1758-1759
शाहआलम द्वितीयः- 1759-1806
अकबर द्वितीयः- 1806-1837
बहादुरशाह द्वितीयः- 1837-1857
  • औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् उसके तीनों पुत्र मुअज्जम, मुहम्मद आजम तथा मुहम्मद कामबख्स में उत्तराधिकारी के लिए युद्ध हुआ, मिसमें मुअज्जम विजयी रहा ।
  • औरंगजेब के मृत्यु के समय मुअज्जम काबुल, आजम गुजरात और कामबख्स बीजापुर का सूबेदार था ।
  • जून 1707 ई. जाजऊ ( आगरा व धोलपुर के मध्य) नामक स्थान पर हुए उत्तराधिकरी के संघर्ष में मुअज्जम की सेना ने आजम को पराजित कर मुगल सिंहासन पर अधिकार किया।
  • 1707 ई. में मुअज्जम उत्तराधिकारी के युद्ध में सफल होने के बाद बहादुर शाह प्रथम की उपाधि धारण कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा ।

बहादुरशाह प्रथम (1707-1712)

  • बहादुरशाह को उसकी शासकीय क्षमता में अभिरूचि न होने के कारण "शाह - ए - बेखबर" के उपनाम से जाना जाता है । (खफी खाँ)
  • बहादुरशाह ने सिखों के 10वें गुरू गोविन्द सिंह के साथ मेल-मिलाप के संबंध स्थापित कियें।
  • इन्हीं के शासनकाल में गोविन्द सिंह की हत्या 1708 ई. में नर्मदा नदी के तट पर गुल खाँ नामक पठान ने कर दिया ।
  • गुरू गोविन्द सिंह के मृत्यु के पश्चात् एक सिख नेता बंदा बहादुर के नेतृत्व में पंजाब में सिखों ने बगावत कर दी । इससे तंग आकर बहादुरशाह ने सिखों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने का फैसला किया।
  • अंततः इसी नेता के विरूद्ध लड़ते हुए 1712 ई. में बहादुरशाह प्रथम की मृत्यु हो गई ।
  • 1712 ई. में बहादुरशाह के मृत्यु के पश्चात् उसके चार पुत्रों- जहाँदार शाह, अजीम -उस-शान, रफी-उस-शान और जमान शाह के बीच उत्तराधिकारी का युद्ध हुआ जिसमें जहाँदार शाह सफल रहा।

जहाँदार शाह (1712-1713)

  • जहाँदार शाह को "लंपट भूर्ख" कहा जाता था ।
  • जहाँदार शाह इरानी दल के नेता जुल्फिकार खाँ के सहयोग से गद्दी प्राप्त किया जिस कारण उन्हें वजीर का पट दिया ।
  • जहाँदार शाह ने आमेर के राजा जयसिंह को "मिर्जा राजा सवाई जयसिंह" की उपाधि दिया ।
  • जहाँदार के समय जजिया पर रोक लगा दी गई।
  • कृषि के क्षेत्र में इजारेदारी की प्रथा का शुरूआत किया।
  • 1713 ई. में जहाँदार शाह का भतीजा फर्रुखशियर ने हिन्दुस्तानी अमीर सैय्यद बंधु के सहयोग से बादशाह को सिंहासन से अपदस्थ कर हत्या करवा दी ।

फर्रुखशियर (1713-1719)

  • फर्रुखशियर को "घृणित कायर भी कहा जाता था ।
  • फर्रुखशियर के शासनकाल में सैय्यद बंधु अब्दुल्ला खाँ "वजीर" तथा हुसैन अली "मीरबख्सी" के पद पर नियुक्त हुए ।
  • 1717 ई. में फर्रुखशियर ने एक फरमान के जरियें अंग्रेजों को व्यापारिक छूट प्रदान की । इसे कंपनी का "मैग्नाकार्टा” कहा जाता । फर्रुशियर के शासनकाल में ही सिख नेता बंदाबहादुर को मृत्युदंड दे दिया गया ।
  • सैय्यद बंधुओं के बढ़ते हस्तक्षेप से भयभीत होकर फर्रुखशियर इनके खिलाफ षड्यंत्र रचने लगा, लेकिन समय से पूर्व इस षड्यंत्रों की जानकारी सैय्यद बंधुओं को लगने से उन्होनें मराठा पेशवा बालाजी विश्वनाथ, मारवाड़ के अजीत सिंह के सहयोग से जून 1719 ई. में फर्रुशियर की हत्या करवा दिया । 
  • फर्रुशियर के हत्या के बाद सैय्यद बंधुओं ने रफी-उद-दरजात को गद्दी पर बैठाया, जिसकी जल्द ही बिमारी के कारण निधन हो गया। तत्पश्चात रफी-उद-दौला को गद्दी पर बैठाया। वह अफीम का आदि था। इसकी भी जल्द ही मृत्यु हो गई । इसके पश्चात् रफी-उद-दौला के पुत्र रौशन अख्तर (मुहम्मद शाह) को सैय्यद बंधुओं ने अगला शासक बनाया।

विभिन्न गुट

सैय्यद बंधु :- इसे भारतीय इतिहास में "किंग मेकर" के नाम से जाना जाता है। इन्होनें कुल चार लोगों को मुगल बादशाह बनाया ।
सैय्यद बंधु (दो भाई):- अब्दुल्ला खाँ और हुसैन अली खाँ था । सैय्यद बंधुओं के विरोधी नेताओं में तूरानी दल के संस्थापक चिनकिलिच खाँ प्रमुख थें। इन्हीं के प्रयासों से मुहम्मद रंगीला के समय में इन दोनों भाईयों की हत्या कर दी गर्द।
तुरानी गुटः- ये मध्य एशिया के सुन्नी मुसलमान थें। सैय्यद बंधुओं के पतन के बाद मुगल दरबार में इसी गुट का बोलबाला था। इस गुट में निजाम-उल-मुल्क (चिनकिलिच खाँ), अमीन खाँ और जकारिया खाँ प्रमुख था।
ईरानी गुटः— ये शिया मुसलमान था। इस गुट में जुल्फिकार खाँ, सआदत खाँ, अमीर खाँ प्रमुख था।
अफगानी गुटः- इस गुट में मुहम्मद खाँ एवं मुहम्मद बंगस प्रमुख थें ।

मुहम्मद शाह रंगीला (1719-1748)

  • मुहम्मद शाह को अधिक समय हरम में बिताने तथा उसके असंयत और विलासी आचरण के कारण "रंगीला बादशाह" कहा जाता था ।
  • मुहम्मद शाह के शासनकाल में 1739 ई. में ईरान के शासक नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया । नादिरशाह को ईरान का “नेपोलियन" कहा जाता था । (करनाल का युद्ध 1739)
  • नादिरशाह शाहजहाँ के द्वारा बनवायें गयें मयूर सिंहासन और कोहिनूर हीरा लेकर वापस ईरान चला गया ।
  • मयूर सिंहासन पर बैठने वाला अंतिम मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला था |
  • मुहम्मद शाह के शासनकाल में नादिरशाह के उत्तराधिकारी अहमदशाह अब्दाली ने भी विशाल सेना के साथ पंजाब पर आक्रमण किया ।

अहमदशाह बहादुर (1748-1754)

  • अहमदशाह का कार्यकाल अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणों के लिए जाना जाता है ।
  • अपने कुल सात आक्रमणों में अहमदशाह अब्दाली ने अहमदशाह के कार्यकाल में सबसे ज्यादा आक्रमण किया ।
  • अहमदशाह ने हिजड़ो के सरदार जावेद खाँ को "नवाब बहादुर" की उपाधि प्रदान की । 

आलमगीर द्वितीय (1754-1758)

  • इसका मूल नाम अजीजुद्दीन था ।
  • प्लासी के युद्ध के समय मुगल बादशाह था ।
  • 1758 ई. को इमाद-उल-मुल्क ने आलमगीर द्वितीय की हत्या करवा दी तथा बहादुरशाह प्रथम के पौत्र शाहजहाँ तृतीय (1758-59 ) को सिंहासन पर बैठा दिया ।

शाहआलम द्वितीय (1759-1806 )

  • आलमगीर के पुत्र अली गौहर ने बिहार में शाहआलम द्वितीय के नाम से स्वयं को मुगल बादशाह घोषित किया ।
  • शाहआलम द्वितीय ने 1764 ई. में हुए ऐतिहासिक महत्व के बक्सर युद्ध में मीरकासिम तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ मिलकर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरूद्ध लड़ाई लड़ी।
  • बक्सर के युद्ध में हार के बाद कई वर्षो तक शाहआलम द्वितीय अंग्रेजों का पेंशनभोगी बना रहा।
  • 1772 ई. में मराठा सरदार महादजी सिंधिया ने पेंशनभोगी शाहआलम द्वितीय को एक बार फिर राजधानी दिल्ली के मुगल सिंहासन पर बैठाया ।
  • शाह आलम द्वितीय के कार्यकाल में ही अंग्रेजों ने 1803 ई. में दिल्ली पर कब्जा कर लिया ।
  • गुलाम कादिर खाँ ने 1806 ई. में शाह आलम द्वितीय की हत्या करवा दी ।
  • शाह आलम द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अकबर द्वितीय शासक बना।
  • शाह आलम द्वितीय के शासनकाल में जनवरी 1761 ई. में अहमद शाह अब्दाली और मराठों के बीच पानीपत का तृतीय युद्ध हुआ ।

अकबर द्वितीय (1806 - 1837 )

  • अकबर द्वितीय अंग्रेजों के संरक्षण से बनने वाला प्रथम मुगल बादशाह था ।
  • अकबर द्वितीय ने ही राममोहन राय को "राजा" की उपाधि दी ।

बहादुरशाह द्वितीय (1837 – 1857 )

  • बहादुरशाह द्वितीय "जफर" के उपनाम से शायरी लिखा करता था, इसलिए इसे "बहादुरशाह जफर" के नाम से भी जाना जाता है।
  • 1857 ई. के संग्राम में विद्रोहियों का साथ देने के कारण रंगून निर्वासित कर दिया गया, जहाँ इसकी मृत्यु हो गई और वहाँ ही दफना दिया गया।
  • यह मुगल साम्राज्य का अंतिम शासक था । इसकी मृत्यु के पश्चात् मुगल साम्राज्य का भारत में अंत हो गया ।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उत्तर

1. तुर्की भाषा में बाबर का शब्दिक अर्थ होता है ?
(a) बाघ
(b) शेर
(c) चीता
(d) महान
2. बाबर ने काबुल और गजनी पर अधिकार कब स्थापित किया ?
(a) 1494
(b) 1504
(c) 1507
(d) 1519
3. बाबर ने 1519 ई. में किस जाति के विरूद्ध अभियान कर 'बाजौर और भैरा' को अपने साम्राज्य में मिलाने का काम किया ?
(a) अफरसियाब
(b) युसूफजाई 
(c) तुरानी
(d) मंगोलॉयड
4. विचार कीजिए -
1. बाबर अपने पिता की ओर से चंगेज खाँ का वंशज था जबकि अपनी माता की ओर से तैमूर का वंशज था।
2. बादशाह की उपाधि धारन करने से पूर्व बाबर मिर्जा की पैतृक उपाधि धारण करता था।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/है ?
(a) केवल 1 
(b) केवल 2 
(c) 1 और 2
(d) न तो 1 न ही 2
5. अधोलिखित में बाबर विजित प्रदेशो को कालक्रमानुसार व्यवस्थित किजिये एवं कूट का प्रयोग कर सही का चयन कीजिए।
1. काबुल
2. समरकंद 
3. सियालकोट
4. पेशावर
5. बाजौर
कूट:
(a) 1, 2, 3, 4, 5
(b) 2, 1, 3, 4, 5
(c) 2, 1, 5, 3, 4
(d) 1, 3, 5, 4, 2
6. मुगल वंश के संस्थापक बाबर द्वारा सर्वप्रथम निम्नलिखित में से किस युद्ध में 'तुलगमा युद्ध पद्धति' का प्रयोग किया गया था ?
(a) खनावा का युद्ध (1527)
(b) चंदेरी का युद्ध (1528)
(c) पानीपथ का युद्ध (1526)
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
7. पानीपत के प्रथम युद्ध में बाबर द्वारा प्रयोग किया जाने वाला तोपखाने का नेतृत्व निम्न में से किसने किया था ?
(a) उस्ताद अली 
(b) मुस्ताफा खाँ
(c) A और B दोनों
(d) खरंम खाँ
8. बाबर ने अधोलिखित में से किस युद्ध के दौरान 'जिहाद' ( धर्म युद्ध) का नारा दिया तथा शराब के प्रयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया ?
(a) घाघरा का युद्ध 
(b) खानवा का युद्ध
(c) चंदेरी का युद्ध
(d) पानीपत का प्रथम युद्ध
9. खनावा के युद्ध (1527) के संबंध में विचार कीजिये-
1. यह युद्ध बाबर एवं अफगान शासक महमूद लोदी के बीच लड़ा गया था।
2. इस युद्ध को जीतने के पश्चात बाबर ने 'गाजी' की उपाधि धारण की।
3. इस युद्ध के दौरान बाबर ने मुसलमानो से वसूल किये जाने वाले 'तमगा कर' अथवा व्यापारिक कर को समाप्त कर दिया।
उपर्युक्त में से कौन - सा / से या गलत है / हैं ?  
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 एवं 2
(d) 2 एवं 3
10. बाबर का मकबरा अवस्थित है-
(a) शहादरा
(b) काबुल
(c) आगरा
(d) दिल्ली
11. मुबईयान पद्धशैली का जन्मदाता किसे माना जाता है।
(a) सुल्तान अनुसंद 
(b) उमर शेख मिर्जा
(c) बाबर
(d) हूमायूँ
12. बाबर ने अपनी आत्मकथा 'तुजुक - ए - बाबरी' मूलतः किस भाषा में लिखा था ?
(a) फारसी
(b) तुर्की
(c) अरबी
(d) उर्दू
13. 'तुजुक - ए - बाबरी' का फारसी में अनुवाद 'बाबरनामा' शीषर्क से किसके द्वारा किया गया ?
(a) बेवरीज
(b) पायन्दा खाँ
(c) अबुल फजल
(d) अब्दुर्रहीम खान खाना
14. बाबर द्वारा लड़ा गया वह कौन सा निर्णायक युद्ध था जिसमे भारत में मुगल वंश की नीव पड़ी-
(a) खानवा
(b) पानीपत का प्रथम युद्ध
(c) तराइन का प्रथम युद्ध
(d) पानीपत का द्वितीय युद्ध
15. बाबरनामा में बाबर ने किस शासक को अपने समकालीन भारत का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है ? 
(a) कृष्ण देव राय
(b) मूहम्मद लोदी
(c) अलाउद्दीन मसूदशाह
(d) देवराय - II 
16. बाबर के किस सेनापति ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया था ? 
(a) शैरवानी खाँ 
(b) मीर बक्की
(c) उस्ताद अली
(d) मुस्तफा खाँ 
17. बाबर बंदूक चलाने की कला सीखा था- 
(a) अफगान से 
(b) ईराक से
(c) तुर्क से
(d) ईरान से कोई नहीं
18. बाबर ने विभिन्न प्रकार के पत्रों का संकल्न किया था जिसे क्या कहा जाता है ? 
(a) रिसाल-ए- उसज 
(b) दार-उल- हर्ब
(c) तुजुक - ए - बाबरी
(d ) गज - ए - बाबरी
19. हुमायूँ का शब्दिक अर्थ होता है-
(a) महान 
(b) तेजस्वी
(c) भाग्यवान
(d) उपर्युक्त सभी
20. हुमायूँ शासक बनने से पूर्व कहाँ का सूबेदार था ? 
(a) समरकंद 
(b) बदख्शाँ
(c) फरगना
(d) स्यालकोट
21. हुमायूँ ने अपने चचेरा भाई सुलेमान मिर्जा को निम्नलिखित में से कौन-सा क्षेत्र प्रदान किया ?
(a) कंधार
(b) संभल
(c) बदरख्शाँ
(d) अलवर
22. हुमायूँ के द्वारा 1531 ई. कलिंजर का अभियान किया गया। इस समय यहाँ का शासक कौन था ?
(a) शेर खाँ में
(b) प्रताप रूद्रदेव
(c) मुहम्मद सुल्तान मिर्जा
(d) बहादर शाह
23. हुमायूँ ने चुनार के किले का घेराव कब किया ?
(a) 1531 ई.
(b) 1532 ई.
(c) 1533 ई.
(d) 1534 ई.
24. अधोलिखित में से किसने गुजरात के शासक बहादुर शाह के विरूद्ध हुमायूँ के पास राखी भेज कर मदद की गुहार लगायी ?
(a) रानी दुर्गावती
(b) रानी कर्णावती 
(c) चाँद बीबी
(d) रानी दिग्धा
25. निम्नलिखित युद्धो को कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिये- 
(a) बिलग्राम, चौसा, सरहिंद
(b) चौसा, सरहिन्द, बिलग्राम
(c) चौसा, बिलग्राम, सरहिंद
(d) सरहिंद, चौसा, बिलग्राम
26. भारत में अधोलिखित में से किसने अपनी एक दिन के शासन काल के दौरान चमड़ा का सिक्का जारी किया था ? 
(a) सुजात खाँ
(b) निजाम खाँ 
(c) हुमायूँ
(d) शेरशाह
27. वह निर्णायक युद्ध कौन-सा था जिसमें मुगलवंश की सत्ता को उखाड़ फेका और एक नये वंश सूरी वंश को स्थापित किया ?
(a) चौसा का युद्ध
(b) बिलग्राम/कन्नौज का युद्ध
(c) सरहिंद का युद्ध
(d) दोहरिया / दौरा का युद्ध
28. हुमायूँ चौसा के युद्ध (1539 ई.) के युद्ध में शेरशाह सूरी से पराजित होकर निम्नलिखित में से किसके सहायता से भागने में सफल हुआ ?
(a) फरीद खाँ
(b) निजाम खाँ
(c) खफी खाँ
(d) ईरान से कोई नहीं
29. हुमायूँ भारत से निर्वासित होने के पश्चात् अपना जीवन कहाँ व्यतित किया ?
(a) कंधार
(b) काबुल
(c) बदरखाँ
(d) समरकंद
30. सरहिंद का युद्ध (22 जून, 1555) किसके बीच लड़ा गया था ?
(a) हुमायूँ एवं शेरशाह सूरी
(b) हुमायूँ एवं सिकंदर सूरी
(c) अकबर एवं सिकंदर सूरी
(d) NOT
31. हुमायूँ का मकबरा कहाँ स्थित है ? 
(a) सिकंदरा 
(b) दिल्ली
(c) आगरा
(d) फिरोजपुर
32. हुमायूँ की मृत्यु पर किस इतिहासकार ने कहा है कि “हुमायूँ जीवन भर लड़खड़ाता रहा और लड़खराते हुए ही मर गया" ? 
(a) खफी खाँ 
(b) अब्दुर रहीम खाने खाना
(c) बदायूँनी
(d) लेनपुल
33. निम्नलिखित में से कौन ऐसा शासक था जो ज्योतिष में अत्यधिक विश्वास करता था ? 
(a) बाबर 
(b) शेरशाह
(c) हुमायूँ
(d) अकबर
34. अकबर का मूल नाम क्या था ?
(a) जहीरूद्दीन मुहम्मद अकबर
(b) जलालुीन मुहम्मद अकबर
(c) जलाल खाँ
(d) NOT
35. सर्वप्रथम अकबर को कहाँ का सूबेदार नियुक्त किया गया था ?
(a) काबुल
(b) गजनी
(c) संभबलपुर
(d) कालान्नौर
36. अकबर के संबंध में विचार कीजिये-
1. इसका जन्म 15 Oct. 1542 को अमरकोट के राजा वीरसाल क राजमहल में हुआ।
2. वह गणित का बहुत बड़ा ज्ञानी था।
3. इसका शाब्दिक अर्थ महान होता है।
4. इसका राज्याभिषेक 14 वर्ष के उम्र में गुरूदासपुर के निकट कलानौर नामक स्थान पर किया गया।
उपर्युक्त में से कौन - सा /से सही है/हैं ?
(a) 1, 2 एवं 4
(b) 2, 3 एवं 4
(c) 1, 3 एवं 4
(d) उपर्युक्त सभी 
37. अकबर के शासनकाल में कौन-सा क्षेत्र हेमू के नियंत्रण में था ?
(a) दिल्ली, मथुरा 
(b) अजमेर, बालाकोट
(c) गुजरात, दिल्ली
(d) आगरा, दिल्ली
38. हेमू एवं अकबर के बीच 5 Nov. 1556 को निम्नलिखित में से कौन-सा युद्ध लड़ा गया था ?
(a) पानीपत का द्वितीय युद्ध 
(b) बिलग्राम / कन्नौज का युद्ध
(c) तलीकोटा का युद्ध
(d) हल्दीघाटी का युद्ध
39. मध्यकाल के दौरान एक मात्र हिन्दु शासक कौन था जो दिल्ली के सिंहासन पर बैठा था ?
(a) पृथ्वीराज चौहान
(b) हेमचन्द्र
(c) महेश दास
(d) मान सिंह
40. किस काल को बैरम खाँ का संरक्षण का काल कहा जाता है ? 
(a) 1545-1560
(b) 1556-1560 
(c) 1556-1564
(d) 1560-1562
41. विचार कीजिये-
1. माहम अनगा
2. जीजी अनगा
3. अधम्म खाँ
4. बैरम खाँ
5. मुनिम खाँ
उपर्युक्त में से कौन-सा / से अतरवा खेल गुट से संबंधित सदस्य है/हैं ?
(a) 1. 2. 4 एवं 5
(b) 1, 2 एवं 3
(c) 1, 2, 3 एवं 5
(d) 1 एवं 3
42. बैरम खाँ मुगल घराने के संयंत्रो से निराश होकर विद्रोह कर दिया तत्पश्चात किस स्थान पर बैरम खाँ एवं मुगलशाही सेना के बीच युद्ध हुआ ? 
(a) तिलवारा 
(b) पाटन
(c) मच्छीवाड़ा
(d) कलानौर
43. खान-ए-खाना की उपाधि से किसे सम्मानित किया गया?
(a) अर्द्ध रहीम
(b) बैरम खाँ
(c) A और B दोनों
(d) NOT
44. मालवा का अभियान 1561 ई. में अकबर ने किसके नेतृत्व में किया ?
(a) पीर मुहम्मद
(b) अब्दुला खाँ उज्बेग
(c) आश्रम खाँ
(d) मुबारक खाँ
45. बाज बहादुर और रूपमती का समाधि कहाँ अवस्थित है?
(a) गाजीपुर 
(b) गुजरात
(c) अजमेर
(d) उज्जैन
46. किस राजपुत शासको ने सर्वप्रथम अकबर की अधीनता स्वीकार की थी ?
(a) भारमल 
(b) जयमल
(c) उदय सिंह
(d) सूरजन राय
47. अकबर के शासन काल के समय गोंडवाना या गढ़कटंगा की शासिका कौन थी ? 
(a) जोधाबाई
(b) रूपमती
(c) कर्णावती
(d) दुर्गावती
48. अधोलिखित में से अकबर के किस अभियान को उसके चरित्र पर कलंक या काला धब्बा माना जाता है |
(a) आमंड 
(b) मेवाड
(c) रणथंमोर
(d) गोंडवाना
49. हल्दीघाटी का युद्ध 1 जून 1576 ई. को महाराणा प्रताप एवं अकबर के बीच लड़ा गया था। नीचे दिये गए विकल्प का प्रयोग कर बताइए कि यह युद्ध किस पहाड़ी के निकट हुआ था ?
(a) त्रिशूल
(b) माउंट आबू
(c) अरावली
(d) अजंता
50. हल्दी घाटी युद्ध का नेतृत्व मुगल सेना की ओर से किसने किया था ?
(a) आसफ खाँ एवं मानसिंह
(b) अब्दुल्ला खाँ एवं महेश दास
(c) दौलत खाँ एवं मानसिह
(d) मुहम्मद खाँ एवं अब्दुल्ला खाँ
51. अकबर जिस समय गुजरात अभियान किया था उस समय वहाँ के शासक कौन था ?
(a) इतमाद खाँ
(b) मुजफ्फर खाँ
(c) मिर्जा हकीम खाँ
(d) युसूफ खाँ
52. टोडरमल द्वारा सर्वप्रथम भूमि बंदोवस्त कहाँ लागू किया गया था ? 
(a) मालवा में
(b) गुजरात में
(c) काबुल में
(d) बंगाल में
53. अधोलिखित में से किस विद्वान ने अकबर के गुजरात अभियान को सबसे द्रुतगामी या तेज गति वाला अभियान बताया है ?
(a) ए. ल. श्रीवास्तव 
(b) कनिंघम
(c) स्मिथ
(d) मान्संरट
54. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए एवं कूट का प्रयोग कर सही उत्तर का चयन कीजिए-
1. सिसोदिया राजपूत वंश ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की थी।
2. अकबर ने पहली बार खम्भात की खाड़ी में समुद्र को देखा और यही पुर्तगालियों से भी मुलाकात की।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन असत्य है/हैं ?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 एवं 2
(d) NOT
55. निम्नलिखित में कौन-सा पुर्तगाली अकबर के साथ काबुल अभियान पर गया था ?
(a) संत जुवियर
(b) पेल्सर्ट
(c) मानसरेट
(d) नुनीज
56. बीरबल किस विद्रोह को दबाते हुए मारा गया ?
(a) सिंध
(b) भील विद्रोह
(c) जाट विद्रोह
(d) युसूफजाई विद्रोह
57. अकबर द्वारा विजेत प्रदेशों को कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए-
1. गुजरात
2. कश्मीर
3. बंगाल एवं बिहार
4. ब्लूचिस्तान
कूट :
(a) 2, 1, 3, 4
(b) 1, 2, 3, 4
(c) 1, 3, 2, 4
(d) 4, 3, 2, 1
58. बंगाल एवं बिहार को अकबर ने किस वर्ष मुगल साम्राज्य में मिलाया ?
(a) 1581 ई. 
(b) 1576 ई.
(c) 1580 ई.
(d) 1572 ई.
59. अकबर ने गुजरात विजय के उपलक्ष्य में निम्नलिखित में से किसका निर्माण करवाया था ?
(a) फतेहपुर सीकरी
(b) बुलंद दरवाजा
(c) पंचमहल
(d) आगरा का लाल किला
60. निम्नलिखित में से किस राज्य ने स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार की ? 
(a) अहमद नगर 
(b) बीजापुर
(c) खानदेश
(d) गोलकुंडा
61. दक्षिण भारत के विजय के लिए किसके नेतृत्त्व में मुगल सम्राट अकबर द्वारा एक विशाल फौज भेजा गया था ?
(a) अदुरहीम 
(b) दौलत खाँ
(c) मानसिंह
(d) आदम खाँ 
62. पानीपत का प्रथम युद्ध किसके बीच हुआ था ? 
(a) बाबर और राणा सांगा के बीच
(b) हेमू और अकबर के बीच
(c) हुमायूँ और शेर खाँ के बीच
(d) बाबर और इब्राहिम लोदी के बीच 
63. 1527 ई. मैं खानवा के युद्ध में बाबर ने मेवाड़ के किस राजा हराया था ?
(a) राणा प्रताप
(b) मानसिंह 
(c) सवाई उदय सिंह
(d) राणा सांगा 
64. निम्नलिखितक में से किसने अपने बादशाह पति के लिये मकबरे का निर्माण कराया था ? 
(a) शाह बेगम ने
(b) हमीदा बानो बेगम
(c) मुमताज महल ने
(d) मेहरूनिसा बेगम ने
65. बाबर के संदर्भ में निम्नलिखित में कौन-सा कथन सही नहीं है ?
(a) इसे भारत प्रवेश हेतु राणा सांगा ने आमंत्रित किया था।
(b) बाबर ने सिंधु नदी पार कर भारत में प्रवेश किया था।
(c) इसने सर्वप्रथम 'भेरा' और स्यालकोट का किला जीता।
(d) इस समय पंजाब पर तुर्कों का शासन था ।
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