General Competition | History | (आधुनिक भारत का इतिहास) | भारत में ब्रिटिश शासकों की आर्थिक नीति एवं उसका प्रभाव
भारत में ब्रिटिश राज्य के स्थापना का प्रमुख उद्देश्य आर्थिक शोषण था। ब्रिटेन ने अपनी व्यापारिक एवं आर्थिक लाभ के उद्देश्य से नीति में परिवर्तन किया। सभी समकालीन नीतियों दो तरफा थी।

General Competition | History | (आधुनिक भारत का इतिहास) | भारत में ब्रिटिश शासकों की आर्थिक नीति एवं उसका प्रभाव
- अंग्रेजों के भारत आगमन से पूर्व भारत का व्यापार एवं अर्थव्यवस्था दोनों वैश्विक स्तर पर समृद्धशाली था ।
- भारत की सकल घरेलू उत्पाद (अनुमानतः) समूचे विश्व में सर्वोपरी था। भारत का दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया तथा अनाज तथा कपड़ा का व्यापार होता था ।
- सम्पूर्ण विश्व में समस्त उपभोक्ता वस्तुओं की मांग की पूर्ति में भारत सक्षम था। जबकि भारत को बहुत थोड़े वस्तुओं की आयात की आवश्यकता पड़ती थी ।
- वैश्विक स्तर के व्यापारी भारत में सोने-चाँदी लेकर आते थे तथा भारत से वस्तुओं की खरीद करते थे ।
- इतिहासकारों के अनुसार 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत के पास विश्व अर्थव्यवस्था का 23% हिस्सेदारी था। जबकि औपनिवेशिक शासन के पश्चात् उसमें निरंतर कमी आती गई।
- भारत में वैश्विक व्यापारियों के द्वारा सोने-चाँदी से खरीद की जाती थी । अर्थात् भारत में वैश्विक सोने-चाँदी आगमन के मार्ग तो थे यही कारण था भारत लिए 'सोने का चिड़ियाँ' शब्द बन गया।
- तत्कालीन इतिहासकारों के अनुसार भारत निर्मित 90 प्रकार का कपड़ा यूरोप के बाजार में बिकता था एवं भारतीय वस्तुओं की मांग सर्वोच्च थीं।
- इतिहासकारों के अनुसार भारतीय कारीगरों द्वारा निर्मित मलमल की साड़ी उतनी महीन थी कि इसको एक अंगूठी के अंदर से भी पूरे धान को बाहर निकाला जा सकता था ।
औपनिवेशिक आगमन
- साम्राज्यवाद - साम्राज्यवार अंग्रेजी भाषा के 'इम्पेरियलिज्म' शब्द से बना है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है दूसरे देश के भू-क्षेत्र पर उपनिवेश बनाना |
- उपनिवेशवाद- उसका अर्थ सामान्यतः साम्राज्यवाद के आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति की प्रक्रिया में सहयोगी होना होता है।
- एक विद्वान के अनुसार- उपनिवेशवाद की प्रक्रिया एक अजगर की भांति कार्य करती है। इसमें विजीत राष्ट्र के राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक आवरण को तोड़कर नवीन व्यवस्था स्थापित किया जाता है। ठीक वैसे जिस प्रकार अजगर अपने शिकार ग्रहण से पूर्व सभी हड्डीयों को तोड़कर लचीला बना देता है।
- सामान्यतः साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु है। जिनका उद्देश्य राजनीतिक एवं आर्थिक वर्चस्व को स्थापित करता है। किंतु कुछ बिंदुओं पर उनमें असमानता भी स्थापित है। जो निम्न है-
- ब्रिटेन के द्वारा भारत के आर्थिक शोषण को रेखांकित सर्वप्रथम भारतीय अर्थशास्त्री दादा भाई नैरोजी ने किया था।
- दादाभाई नैरोजी ने Poverty and Unbritish rule of India नामक पुस्तक में भारत से हो रहे धन निकासी का सिद्धांत पेश किया था।
- भारतीय धन निकासी सिद्धांत को ही कार्ल मार्क्स (Karl Marx ) ने "Bleeding Process" की संज्ञा दी थी।
- इसी क्रम में भारतीय आई. सी. एस. अधिकारी (I.C.S. Officer) ने आर. सी. दत्त (R. C. Dutt) ने Economical History of India नामक पुस्तक लिखी थी।
- इस पुस्तक में भारतीय राजतंत्र तथा औपनिवेशिक शासन के कर वसूली (Tax Collection) के बीच तुलना किया गया थां
ब्रिटेन का व्यापारिक एकाधिकार
- प्रारंभ में ब्रिटेन के व्यापारी भारत के साथ व्यापार चांदी के निवेश से व्यापार करत थे। इससे उनको अतिशय लाभ प्राप्त होता था ।
- ईस्ट इंडिया कंपनी के लाभ एवं भारत के वस्तुओं की यूरोप के बाजार में मांग ने अंग्रेज व्यापारियों को भारत से व्यापार को प्रेरित किया।
- ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में व्यापारिक एकाधिकार हेतु राजनीतिक विजय को नीति का पालन किया।
- भारत में व्यापारिक बर्चस्व के लिए ब्रिटिश कंपनी दो समूहों से युद्ध कर रही थी। प्रथम यूरोपीय कंपनीयाँ तथा द्वितीय भारतीय देशी राज्य |
- चीनसुरा/दरा का युद्ध (1759 ) - इस युद्ध में अंग्रेजों ने डचों को पराजित कर भारत से बाहर कर दिया ।
- वांडिवास का युद्ध (1760) - उस युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसी कंपनी को पराजित किया। इस हार के पश्चात् फ्रांसीसी कंपनी भारत के व्यापार से बाहर हो गई।
देशी राज्य
- ईस्ट इंडिया कंपनी को औरंगजेब की मृत्यु (1707) के पश्चात् ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा।
- उत्तरोत्तर मुगल के शासकों की नीतियाँ एवं स्वतंत्र नवीन देशी राज्यों ने अंग्रेजों को भारत विजय के मार्ग को आसान बना दिया था।
- ईस्ट इंडिया कंपनी की प्लासी (1757) विजय ने भारत के लिए एक नवीन आर्थिक नीतियों को प्रेरित किया।
- वाणिज्यिक चरण (1757- 1813 ) - यह शोषण का व्यापारिक काल था । इस दौर में मुख्यत: अंग्रेजों ने बंगाल पर आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया था।
- इस दौर में इस्ट इंडिया कंपनी ने वस्तुओं को न्यूनतम मूल्य पर खरीदकर अधिकतम मूल्य पर बेचती थी।
- इस्ट इंडिया का प्राथमिक उद्देश्य भारत की राजनीतिक ता एवं राजस्व पर नियंत्रण स्थापित करना था।
- इस काल खण्ड में अंग्रेजों ने "मुक्त व्यापार नीति" (Free Trade Policy) का अनुपालन किया था।
- प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एड्म स्मिथ (Adom Smith) का सिद्धांत 'अहसतक्षेप नीति' (Laises Fair) का क्रिया नवयन भी इसी कालखण्ड में हुआ था।
- अंग्रेजों ने भारतीय व्यापारी, कृषक एवं नवाबों तीनों को लूटा था। कालांतर में कूटनीतिक प्रकार से नवाबों को बदनाम कर अंग्रेजों ने उनका स्थान ले लिया।
- इस दौर में ब्रिटिश सरकार की नीतियों ने भारत की परम्परागत कानून व्यवस्था को नष्ट किया एवं नवीन औपनिवेशिक व्यवस्थाओं को स्थापित किया था।
- इस दौर को पर्सिवल स्पीयर महोदय ने 'खुली एवं बेशर्म लूट' कहा था।
- द्वितीय चरण (1813-1857 ) औद्योगिक पूंजीवाद का चरण-
- यह यूरोप में नेपोलियन युग का दौर था । नेपोलियन बोनापार्ट की महाद्वीपीय व्यवस्था ने ब्रिटेन के व्यापार को संकुचित कर दिया था ।
- नेपालियन की मृत्यु के पश्चात् भारत का कच्चा माल ब्रिटेन को प्राप्त हुआ तथा ब्रिटेन में निर्मित वस्तुएँ भारत सहीत वैश्विक व्यापार का हिस्सा बिना था।
- 1760 के दशक में प्रारंभ हुआ औद्योगिक क्रांति ने भारत के हस्तशिल्प उद्योग को पूर्णतः नष्ट कर दिया।
- इस दौर में विभेदकारी आयात-निर्यात कर लगाए। इसके अंतर्गत आयात कर मात्र 3-5% लगाया गया। जबकि निर्यात कर 10% था ।
- इस विभेदकारी नीति के परिणाम में भारत में कपड़ा, बर्तन तथा कागज उद्योग नष्ट हो गए।
- अंग्रेजों ने भारत में राजस्व सुधार के अन्तर्गत स्थायी बंदोबस्ती व्यवस्था लागू किया। जिसका उद्देश्य भारत में अपने लिए शसक्त एवं शक्तिशाली समर्थक वर्ग को खड़ा करना तथा कृषि शोषण को बढ़ाना था।
- इस दौर में कृषि क्षेत्र के साथ वाणिज्य तथा समाज की मूलभूत नीतियों का भी शोषण हुआ।
- तृतीय चरण (1858-1947) वित्तीय पूंजीवाद का दौर-
- इस दौर में भारत को पूर्णतः ऋणी बनाया गया तथा अंग्रेजों ने भारत के आधुनिक औद्योगिक विकास में भी रूचि नहीं लिया।
- अंग्रेजों ने भारत में पूंजी निवेश के लिए चाय काफी एवं रबड़ तथा नील बागानों को चुना।
- भारत में रेलवे का विकास हुआ। रेलवे के विकास का प्राथमिक उद्देश्य भारत से बच्चे माल के परिवहन को बढ़ाना था।
- भारत में रेलवे विकास में विकास के निवेश को गारंटी प्रणाली" कहा गया।
- अंग्रेजों ने भारत मैं सूती मीलों तथा इस्पातों के कारखानों में पूंजी का निवेश नहीं किया ।
- भारत से प्राप्त पूंजी के बदौलत एक नवीन पूंजीपति वर्ग का उदय हुआ । इस वर्ग का भारत एवं वैश्विक स्तर पर श्रमिक वर्ग से संघर्ष भी प्रारंभ हो गया।
- वित्तीय पूंजीवाद के दुष्परिणामों ने भारत को आर्थिक रूप से अत्यधिक खोखला बना दिया।
- ईस्ट इंडिया कंपनी की समस्त ऋण को भारत के द्वारा चुकाए जाने का प्रावधान था।
- वेतन, भत्ते, तथा पेंशन के खर्चों को भी भारत पर ही सौंप दिया गया।
- भारत का धन ब्रिटेन गया तथा वापसी में वही धन ऋण के रूप में भारत को प्राप्त होने लगा।
- भारत एक गरीब राष्ट्र में परिवर्तित हो गया तथा दादाभाई नैरोजी ने इसी को धन निकासी सिद्धांत के रूप में सिद्ध किया।
धन बर्हिगमन सिद्धांत
- धन बर्हिगमन सिद्धांत का अर्थ भारत की धन-संपत्ति का इंग्लैंड के हस्तांतरण से था । इस आर्थिक प्रवाह के माध्यम से भारत का सर्वाधिक क्षति होता था ।
- धन बर्हिगमन सिद्धांत का प्रतिपादन प्रसिद्ध राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री दादा भाई नौरोजी ने किया था।
- 2 मई 1867 को लंदन में आयोजित इस्ट इंडिया एसोसिएशन की बैठक में दादा भाई नौरोजी ने अपनी लेख इंग्लैंड डेट टू इंडिया टू पावर्टी एण्ड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया में प्रस्तुत किया था।
- 'इंग्लैंड डेब्ट टू इंडिया' (भारत पर इंग्लैंड का ऋण ) नामक पुस्तक का प्रकाशन वर्ष 1901 में Swan Sonneschein ने लंदन में किया था।
- धन विकास सिद्धांत का प्रबल समर्थन भारत के दो प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों डॉ. रमेश चंद्र दत्त एवं महादेव गोविन्द रानाडे ने लिया था।
- धन विकास सिद्धांत का दो समाचार पत्र 'अमृत बाजार पत्रिका' तथा लोकमान्य तिलक की पत्रिका मराठा ने उसका विरोध किया था।
- वर्ष 1813 के चार्टर एक्ट में कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार की समाप्ति कर दी गई थी इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत के आर्थिक शोषण पर पड़ा था।
- 1872 में महादेव गोविंद रानाडे ने भारत से पूंजी संसाधनों के बर्टिगमन की आलोचना किया था तथा दादाभाई नौरोजी ने इसको Evil's of Evil (अनिष्टों का अनिष्ट) की संज्ञा दी थी।
- दादा भाई नौरोजी ने धन निकासी सिद्धांत को भारत के सभी दुखों का मूल माना था तथा इसके लिए ढ़ेरो लेखा लिखा था ।
- प्रसिद्ध राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री रमेश चंद दत्त ने धन निकासी सिद्धांत को 'बहते हुए घाव' की संज्ञा दी थी।
- वर्ष 1901 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में बजट पर भाषण प्रस्तुत करते हुए गोपाल कृष्ण गोखले ने धन निष्कासन सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या किया था ।
भारत में भूराजस्व व्यवस्था
- भारत में कालांतर में भूराजस्व कल्याणकारी विषय रहा है। निम्न कर वसूली के दर के साथ किसानों को अर्त्याधिक कृषि सुविधाएं प्राप्त होती थी ।
- औपनिवेशिक शासन प्रणाली ने नवीन शोषणवादी भूराजस्व व्यवस्था लागू किया। जिसका प्राथमिक उद्देश्य अत्यधिक धन की वसूली करना था ।
- अंग्रेजों के द्वारा स्थापित द्वैध शासन ने बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा के भूराजस्व एवं आर्थिक क्रियाविधि को पूर्णत: प्रभावित किया था।
- भूराजस्व व्यवस्था
- इन समस्त भूखंड पर अंग्रेज समर्थित स्थायी बंदोबस्ती अथवा जमींदारी प्रथा लागू किया गया।
- इस प्रणाली को सर्वप्रथम बंगाल में लागू द्वैध शासन (1765) के साथ प्रारंभ किया गया था इसी क्रम में बंगाल में मुहम्मद रजां खां को बंगाल का नाइव सुबेदार नियुक्त किया गया था।
- उसको अंग्रेज अधिशासित समस्त भूमि के 19% भूभाग पर लागू किया गया।
- उस व्यवस्था को जमींदारी प्रथा / जागीरदारी प्रथा तथा इस्तेमरारी प्रथा भी कहा गया है।
- सर्वप्रथम वर्ष 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने बंगाल प्रांत के केंद्रीय खजाना को मुर्शीदाबाद से परिवर्तित कर कलकत्ता कर दिया।
- उसी समय लगान में पंचशाला व्यवस्था लागू किया गया था। इसमें उच्चतम बोली लगाने वाले व्यक्ति को लगान वसूली का अधिकार प्रदान किया जाता था।
- उसी क्रम में सर्वप्रथम 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट में बंगाल में कंपनी को स्थायी भू-प्रबंध करने का सुझाव दिया था।
- वर्ष 1786 में कर्नवालिस बंगाल का गर्वनर जनरल बना। भूराजस्व की समस्या पर विचार के लिए उसने रेवेन्यू बोर्ड का गठन भी किया था।
- लॉर्ड कार्नवालिस ने भूमि बंदोबस्ती के लिए जमींदारों को लगान वसूलने का अधिकार दिया था।
- वर्ष 1790 में वार्षिक लगान के स्थान पर 10 वर्षीय लगान की व्यवस्था भी लागू कर दिया गया था।
- 22 मार्च 1793 में लागू स्थायी बंदोबस्ती इस्तमरारी व्यवस्था, तथा जागीरदारी व्यवस्था भी कहा गया।
- उस व्यवस्था में जमींदार अपनी जमींदारी सेवा के बदले 11% रखता है तथा बाकी शेष 89% अंग्रेजी खजाने में जमा करता था ।
- स्थायी बंदोबस्ती व्यवस्था में बंगाल की भूमि का स्वामी जमींदार को मान लिया गया था। इसके द्वारा दिया जाने वाला लगान हमेशा के लिए निर्धारित कर दिया गया था।
- इस व्यवस्था ने अंग्रेजी सरकार को जमींदारों के रूप में एक स्थायी सर्मथक प्राप्त हुआ था। इसका उपयोग अंग्रेजी ने भारत में अपने जड़ों को और मजबूत बनाने में किया।
- इस व्यवस्था को सूर्यास्त भी कहा गया। क्योंकि 1793 के अधिनियम 14 में जमींदारो के संपत्ति जब्त करने का प्रावधान था। नियत तय समय ( सायं 5 बजे ) तक वसूली जमा नहीं करने पर जमींदारी की ठेका अन्य व्यक्ति को दे दिया जाता था ।
रैयतवाड़ी व्यवस्था (The Rayotwari System)
- इस व्यवस्था में प्रत्येक जमीनधारक को भूस्वामी मानकर उसके साथ लगान देने की शर्तें तय कर दी गई थी।
- इस व्यवस्था में लगान की शर्तें अस्थायी तथा परिर्वतनशील थी।
- इस व्यवस्था के जनक टॉमस मुनरो तथा कैप्टन रोड थे।
- यह व्यवस्था सम्पूर्ण प्रसारित अंग्रेजी भूमि के 51% भू-भाग पर प्रचलित था।
- वर्ष 1792 में मद्रास के बारामहल जिले में इसका प्रथम प्रयोग कर्नल रोड़ ने रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू किया था।
- 1820-27 ई. में जब कर्नल रोड मद्रास का गर्वनर था। तब उसने रैयतवाडी व्यवस्था को समूचे मद्रास प्रेसीडेंसी में लागू किया था।
- रैयतवाड़ी व्यवस्था को बंबई प्रेसीडेंसी में सर्वप्रथम 1825 ई. में लागू किया गया था।
- इस व्यवस्था का लागू कराने में एल्फिंस्टन एवं चॉपलिन के रिपोर्ट की प्रमुख भूमिका थी।
- वर्ष 1858 तक वह समूचे दक्षिण भारत में लागू कर दिया।
- रैयतवाड़ी व्यवस्था में ही सरकार तथा किसानों के बीच सीधा सम्पर्क स्थापित हुआ था।
- इस व्यवस्था में भूमि पर निजी स्वामित्व का लाभ जनसंखया के बहुत बड़े भाग को प्राप्त हुआ था।
महालवाड़ी व्यवस्था (The Mahalwari system)
- इस व्यवस्था का सर्वप्रथम प्रस्ताव 1819 में हॉल्ट मैकेंजी ने किया था।
- मैकेंजी ने ब्रिटिश सरकार को भूमि सर्वेक्षण ( पैमाइस ) का सुझाव दिया था । तथा भूमि संबंधित व्यक्तियों को आंकड़े सुरक्षित रखा गया था।
- उस व्यवस्था में पहली बार लगान तय करने के लिए मानचित्रों तथा पंजियों का प्रयोग किया गया था।
- इस व्यवस्था में भूराजस्व वसूली हेतू लगान के निर्धारण गाव के समुह (महाल) को इकाई माना गया था ।
- उस प्रकार निर्धारित लगान वसूलने का दायित्व गांव के मुखिया को दिया गया था।
- हॉल्ट मैकेन्जी के उत्तरोक्त प्रस्तावों को वर्ष 1822 के रेग्यूलेशन - 7 के माध्यम से लागू किया गया।
- इस व्यवस्था को बिटीश शासित समस्त भूमि के 30% पर लागू किया गया था लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल में वर्ष 1855 में सहारनपुर नियम के अनुसार लगान की एकमुश्त राशि 50% कर दिया गया।
- 1813 के औद्योगिकरण ने इंग्लैड की आर्थिक विकास को तीव्र किया। इसका सीधा प्रभाव भारत में कच्चे माल की पैदावार को अड्डा बना दिया।
- इंग्लैंड की औद्योगिक आर्थिक जरूरतों की पूर्ति हेतु भारत में कच्चेमाल उत्पादन का केन्द्र बना।
- भारत में प्रारंभिक दौर में कपास एवं कच्चा रेशम ब्रिटेन के बुनकरों के लिए उगाया जाता था। साथ ही चीन को भी बेचा जाता था।
- 1813 के चार्टर एक्ट के द्वारा भारत से मुक्त व्यापार करने के छूट मिल गया।
- 1833 – इस वर्ष अंग्रेज नागरिकों का भारत में भूमि खरीद पर छूट प्राप्त हुई थी। इसी अधिनियम ने भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का चाय एवं चीन से व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया था।
- 1835 - इस वर्ष भारत के असम में पहला चाय बगान स्थापित किया था। इसी क्रम में 1838 इस वर्ष पहली बार चाय को लंदन भेजा गया था। 1839 - इस वर्ष भारत में प्रथम असम चाय कंपनी की स्थापना किया गया था।
- भारत में कृषि की औद्योगिकरण ने भारत में कृषक मजदूरों के शोषण को बढ़ावा दिया था।
- भारत में नील की खेती तथा कृषकों के शोषण का प्रारंभ की कहानी दीनबंधु मित्र ने अपनी पुस्तक 'नील दर्पण' में किया था।
- भारतीय कृषकों के शोषण व अस्थिरता ने भारत में खेतीहर मजदूरों की संख्या में वृद्धिकर दिया। इसी क्रम में वर्ष 1928 में कृषि अध्ययन हेतु 'शाही' आयोग का गठन किया गया था।
- भारत में बढ़ते खेतीहर मजदूर एवं कृषि आधारित समस्याओं ने भारत में ग्रामीण कृषक गरीबी को बढ़ाया।
- इसी क्रम में वर्ष 1866-67 में भयंकर आकाल पड़े थे। डेनियन थाटनर ने 1890-1947 तक के आकालों को कृषि स्थिरता का काल कहा था।
भारत में गरीबी एवं अकाल का दौर
- 1757 से 1947 ई. तक के लगभग 290 वर्षों में औपनिवेशिक व्यवस्था ने भारत में गरीबी एवं अकाल में वृद्धि हुई। जो भारतीय राजतंत्र में लगभग न के बराबर था।
- औपनिवेशिक शासन व्यवस्था में 1757 से 1857 के बीच प्रथम अकाल 1769-70 में पड़ा था। यह इतना भीषण था कि बिहार, बंगाल तथा उड़ीसा की एक तिहाई आबादी नष्ट हो गई थी।
- इसी क्रम में 1781, 82 एवं 84 तथा 1792 ई. में मद्रास तथा उत्तरी भारत सूखा तथा अकाल पड़ा था।
- वर्ष 1837 में उत्तर प्रदेश तथा बिहार के कुछ क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा था। सरकार (ब्रिटिश) ने इस क्रम में तटस्थता की नीति अपनाई थी।
- भारत में एक आकड़ों के अनुसार तथा विलयम डिग्बी के विचार में 2 करोड़ 88 लाख लोग मारे गए ।
- 19वीं शताब्दी का सर्वाधिक जान-मान की क्षति 1876-78 ई. के अकाल में हुआ था।
- 1942-43 में हुए बंगाल अकाल का प्रमुख कारण फसलों की असफलता थी।
- भारत में प्रथम अकाल आयोग का गठन लार्ड लिंटन के कार्यकाल में हुआ था।
- इसी क्रम में 'दुर्भिक्ष आयुक्त' की नियुक्ति की सिफारिश मैकडोनल आयोग ने दिया था।
- 'प्रोस पोरस ब्रिटिश इंडिया' नामक पुस्तक की रचना विलियम डिग्बी से किया था ।
- कमिचैरी प्रथा बिहार तथा उड़ीसा में प्रचलित थी जो सामान्यतः कृषि दास हुआ करते थे।
- इसी क्रम में तमिलनाडु में 'पन्निवाल तथा गुजरात में हाली' समुह मजदूर कृषि दास कहलात थे।
अन्य भारतीय उद्योगों का विकास
- भारत में सबसे पहला उद्योग सूती वस्त्र उद्योग था जिसमें भारतीयों द्वारा पूंजी लगाया गया।
- वर्ष 1818 में प्रथम सूती वस्त्र मील कोलकत्ता के निकट फोर्ट ग्लोस्टर में लगाया गया था। किंतु यह मिल का सफल संचालन नहीं हो सका था ।
- द्वितीय मिल बंबई स्पनिंग एण्ड नीविंग कंपनी सन् 1853 में बंबई में कवास जी. एन. डाबर द्वारा स्थापित की गई थी।
- देश का प्रथम जूट कारखाना जॉर्ज ऑकलैंड द्वारा 1855 ई. कलकत्ता के निकट रिशंग नामक स्थान पर लगाया गया था।
- चीनी उद्योग भारत में सबसे पहले बेतिया (बिहार) में 1840 में लगाया गया था।
- भारत में चाय उद्योग का विकास वर्ष 1850 ई. के पश्चात् हुआ था।
- भारत में सीमेंट का प्रथम संयंत्र वर्ष 1905 में स्थापित किया गया था। इसी क्रम में 1910 में करनी सीमेंट कंपनी शुरू हुई थी ।
- भारत में लोहा और इस्पात उद्योग की स्थापना 1870 में 870 में हुआ था।
- बंगाल आयरन एवं स्टील कंपनी ने झरिया के निकट कुलटी एवं बंगाल में बर्नरपुर में अपने संयंत्र की स्थापना किया था।
- 1907 में जमशेदजी टाटा के द्वारा TISCO की स्थापना जमशेदपुर में किया गया।
- 1923 में भगवती विश्वेश्रैया आयरन एण्ड स्टील वर्क की स्थापना किया गया था। यह सार्वजनिक क्षेत्र की पहली इकाई थी।
महत्वपूर्ण तथ्य
- 'चार्ल्स ग्रांट' को भारत में आधुनिक शिक्षा का जन्मदाता कहा गया है।
- 'भारत में आधुनिक उद्योग की स्थापना वर्ष 1850 में हुई थी।
- 'कार्ल मार्क्स' ने भारत में रेलवे की स्थापना को 'आधुनिक उद्योग का अग्रदूत' जननी की संज्ञा दी थी।
- प्रथम आधुनिक पटसन मील की स्थापना वर्ष 1859 रिसड़ा बंगाल में हुई थी।
- 'इंपीरियल प्रेफरेंस' शब्द का प्रयोग भारत में ब्रिटिश आयातों पर दी गई विशेष रियायतों के लिए किया जाता था।
- बंबई में प्रथम सूती वस्त्र कारााना वर्ष 1854 में स्थापित किया गया था।
- वर्ष 1822 में पहली बार औपचारिक रूप से महालवाडी व्यवस्था लागू किया गया था।
- ब्रिटिश काल में बिहार में अफिम एवं शोरा का सर्वाधिक उत्पाद किया जाता था।
- बिहार में सर्वप्रथम रेल लाईन लार्ड डलहौजी के कार्यकाल में लगाई गयी थी।
- नील कृषकों की दुदर्शा पर बंगाल के प्रख्यात लेखक 'दीनबंधु मित्र' ने 'नील दर्पण' नामक पुस्तक की रचना किया था।
- अंग्रेजों के द्वारा सर्वप्रथम केरल के वायनाड जिला में कॉफी (कहवा) बगान लगाए गए थे।
- भारत में सर्वप्रथम रेलवे लाईन का निर्माण वर्ष 1853 में बंबई व थाणे नगरों के बीच हुआ था।
- भारत में अंग्रेजी शासन काल में स्थापित 1883 में पारित 'इल्बट बिल' का उद्देश्य भारतीय अदालतों में भारतीय एवं यूरोपीय व्यक्तियों के बीच के बराबरी को रोकना था।
- अंग्रेजी उपनिवेशकाल में भारत के उद्योगों का विकास पूंजी निवेश के कारण प्रभावित रहा था ।
- वर्ष 1833 के चार्टर एक्ट में इस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया गया।
- चार्ल्स वुड का घोषणा पत्र ( Dispatch, 1854) भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा ( महाधिकार पत्र ) कहा जाता है।
- वर्ष 1911 का “इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल " पेश किया गया था। जिसका उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क तथा अनिवार्य बनाना था ।
- वर्ष 1911 के इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल को "गोपाल कृष्ण गोने प्राथमिक शिक्षा का मौग्नाकाटी कहा था।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1931 के अधिनियम में मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रमों से संबंधित प्रस्ताव पारित किए गए थे।
- वर्ष 1931 के कराची अधिवेशन के अध्यक्ष सरदार वल्लभ भाई पटेल थे।
- भू-राजस्व से संबंधित कानून वर्ष 1762 में वर्द्धमान एवं मिदनापुर जिला में लागू किया गया था ।
- वारेन हेस्टिंग्स ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू का गठन किया था तथा इसकी नीलामी की अवधि 3 वर्ष से बढ़ाकर 5 वर्ष कर दिया था।
- इसी क्रम में वर्ष 1777 में इस संग्रह की अवधि को वार्षिक बना दिया तथा इसकी देखरेख के लिए यूरोपीय कलेक्टर भी नियुक्त किया गया था।
- वर्ष 1835 में कैप्टन विनगेट के द्वारा रैयतवाड़ी व्यवस्था को बंबई प्रेसीडेंसी में लागू किया गया था।
- लार्ड विलियम बैंटिक ने सूती वस्त्र बुनकरों के संबंध में कहा था “सूती वस्त्र बुनकरों के कंकाल भारत के मैदान को बंदरंग कर रहे हैं। "
- ब्रिटिश शोषण के खिलाफ वर्ष 1859-60 में बंगाल के किसानों ने 'नील विद्रोह' किया था।
- ब्रिटिश उपनिवेशकाल में 'होम चार्जेज' का अर्थ था-
- लंदन में इंडिया ऑफिस के भरण पोषण के लिए प्रयोग में लाए जाने वाली विधि
- भारत में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन तथा पेंशन देने हेतु प्रयोग में लाए जाने वाली विधि |
- वर्ष 1835 में लार्ड मैकाले ने 1835 के प्रपत्र में शिक्षा के माध्यम को अंग्रेजी को लागू किया था ।
- वर्ष 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अनुरोध पर राष्ट्रीय योजना समिति का निर्माण हुआ जिसके अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू थे।
- अकाल को रोकने तथा अकाल पीड़ितों की सहायता हेतु वर्ष 1883 में 'अकाल संहिता' (famine code ) बनाया गया था ।
- वर्ष 1916 में 'भारतीय औद्योगिक आयोग' की स्थापना किया गया था। इसके अध्यक्ष 'सर थामस हॉलैंड थे।
- वर्ष 1907 में भारत में प्रथम औद्योगिक सम्मेलन का आयोजन किया गया था ।
- अंग्रेजों ने वर्ष 1813 में भारतीय व्यापारिक शोषण हेतु 'मुक्त व्यापार नीति' (Free Trade Policy) का अनुपालन किया था।
- भारत में सर्वप्रथम ग्रेट इंडियन पेनेनसुलर कंपनी ने सेवा प्रारंभ किया था।
- वर्ष 1901 में 'Poverty and unbritish rule' नामक पुस्तक दादा भाई नैरोजी ने प्रकाशित की थी।
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