नरसिंहराव सरकार व 'उदारीकरण' की शुरूआत

नरसिंहराव सरकार व 'उदारीकरण' की शुरूआत

नरसिंहराव सरकार व 'उदारीकरण' की शुरूआत

1. नरसिंहराव सरकार तथा भारत का आर्थिक उदारीकरण (1991-1996)
1991 का आम चुनाव मध्यावधि का चुनाव था। भारत की राजनीति में इन दो सालों यानि 1989-91 में कई ऐसी घटनाएं घटी जो राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से विभिन्न स्थिति को उत्पन्न करने वाली थी। अब भारत की आर्थिक स्थिति को संभालना आवश्यक था तथा इसके लिए एक स्थिर सरकार की आवश्यकता थी। यह चुनाव तीन ध वों के बीच लड़ा गया। एक तरफ कांग्रेस और दूसरी तरफ जनता दल तथा तीसरी तरफ भाजपा थी।
चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तथा इसे 232 सीटें मिली भारतीय जनता पार्टी को 119 सीटें मिली तथा वामपंथी दलों को भी अच्छी खासी सीटें मिली जो जनता दल के साथ अधिकतर स्थानों पर दोस्ताना मुकाबले में थी।
राष्ट्रपति श्री० आर० वेंकट रमण ने नरसिंहराव को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया तथा नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने। 21 जुन 1991 को राव ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। सही तौर पर यह एक अल्पमत की सरकार थी। दूसरी पार्टियों ने 2 साल के अन्दर काफी कुछ सीख लिया था तथा इस सरकार को आरम्भ में अस्थिर करने का प्रयास नहीं किया। नरसिंहराव एक अनुभवी नेता थे तथा धीरे-धीरे उन्होंने अपने पक्ष में बहुमत कर लिया।
नरसिंहराव की सरकार पूरे 5 साल चली। धीरे से ही सही उन्होंने कुछ अच्छे कदम उठाए। अब पंजाब में स्थिति सामान्य हो गयी। साम्प्रदायिक तनाव तथा जातीय हिंसा में कमी आयी। कश्मीर और असम में भी गुणात्मक सुधार आया। इस सरकार ने कुछ ऐसे फैसले किए जो भारत के भविष्य के लिए अहम योगदान कर सकते थे तथा किए भी।
नरसिंहराव सरकार को जिन वजहों से सबसे अधिक याद किया जाता है वह है 'आर्थिक उदारीकरण' यह फैसला भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम मोड़ साबित हुआ तथा सदा के लिए भारतीय अर्थ नीति बदल गई।
कुछ वर्षों से भारतीय अर्थव्यवस्थाओं में गंभीर रूकावटें निर्मित हो रही थीं जो बड़े स्तर पर अर्थनीति तथा स्थिति को हानि पहुंचा रही थी। इनके साथ कई समस्याएं भी उत्पन्न हो रही थी। इन सभी स्थितियों का परिणाम यह हुआ कि अब भुगतान संतुलन पर संकट के बादल मंडराने लगे। भारत का विदेशी मुद्रा कोष जहां 1990-91 में सिर्फ 2.24 अरब डॉलर रह गया वही कर्ज अदायगी अनुपात इसी के साथ 35% हो गया। 1990 में कुवैत पर हमला किया गया तथा इससे तेल की कीमत में भारी वृद्धि हुई तथा खाडी क्षेत्र में भारतीय निर्यात में गिरावट आई। इस कारण भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति दयनीय हो गई। भारत की अंतर्राष्ट्रीय साख बहुत कम हो गई। बाहर से कर्ज लेना बहुत ही कठिन हो गया तथ अनिवासी भारतीयों द्वारा जमा की गई विदेशी मुद्रा भी वापस ली जाने लगी।
उपरोक्त परिस्थिति में भारत को विदेशों से बाहर उधार मिलना बंद हो गया। भारत सरकार को मार्च 1991 में जब चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री थे तो स्विटजरलैंड के युनियन बैंक को 20 टन सोना बेचना पड़ा ताकि तुरंत लेन देन का काम चल सके। जुलाई 1991 तक विदेशी मुद्रा भण्डार अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा दिए गए कर्जों के बावजूद मांत्र दो सप्ताह के अन्दर आयात को पूरा कर सकता था। देश दिवालिया होने के दरवाजे पर खड़ा था।
उपरोक्त परिस्थिति से निकलने के लिए नरसिंहराव सरकार ने अपने वित्त मंत्री डा० मनमोहन सिंह के नेतृत्व में आर्थिक सुधारों तथा बुनियादी सुधार का रास्ता अपनाया। ये आर्थिक सुधार अधिकतर लोगों के शब्दो में भारतीय आर्थिक क्रान्ति ही कहे जाते हैं।
एक जकड़ी हुई, बंद, ठहराव से भरी भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधारों की आवश्यकता बहुत दिनों से थी। वैसे मनमोहन सिंह ने कई वर्ष पहले एक अफसर के तौर पर तत्कालीन अर्थव्यवस्था में नयी-नीति तथा बदलाव लाने की पैरवी की थी। अब मनमोहन सिंह वित्तमंत्री थे। उन्होंने साहस दिखाया तथा “कम नियंत्रण तथा अधिक खुलेपन" की अर्थनीति का आधार तैयार किया।
इसके पहले 60 के दशक में इंदिरा गांधी के द्वारा अर्थव्यवस्था में इस तरह के कुछ बदलाव लाने के लिए शुरूआती प्रयास किए गए थे। सत्तर के दशक में भी कुछ सुधार किए गए जिसे 'चोरी-छिपे सुधार' कहा गया। रूपये के मुल्य को जानकर बाजार में स्वयं कम होने दिया गया। मूल्यन करना राजनीतिक दृष्टि से अव्यवहारिक था। रूपये को घटते स्टर्लिंग से जोड़ दिया गया। 1980 समय भी इंदिरा गांधी ने उदारीकरण के कुछ कदम उठाने की कोशिश की पर यह 1991 के उदारीकरण के सामने कुछ खास महत्व नहीं रखते थे।
मनमोहन सिंह ने 1991 में अपने आर्थिक सुधारों में निम्न बातों को शामिल किया । जैसे:- 
1. तुंरत वित्तीय सुधार
इसके तहत विनमय दर को बाजार से जोड़ देने पर आरम्भ में रूपए का 20% अवमूल्यन हो गया।
2. व्यापार तथा औद्यागिक नियंत्रणों का उदारीकरण
1. आयात आसान बना दिया गया।
2. औद्योगिक लाइसेंसिंग आसान तथा एम. आर. टी. पी कम की गई।
3. सार्वजिनक क्षेत्र में सुधार
धीरे-धीरे निजीकरण की पैरवी करना तथा निवेश की तरफ बढ़ना।
4. पूंजी बाजार और वित्तीय क्षेत्र में सुधार
विदेशी निवेश तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर से विभिन्न प्रतिबंधों को हटा दिया गया। महत्वपूर्ण रूप से विदेशी निवेश को आकर्षित करने की बात की गयी।
5. वैश्वीकरण का स्वागत
आर्थिक नियंत्रणों से अर्थव्यवस्था को मुक्त करना जिसमें भू-मण्डलीकरण की प्रक्रिया में भारत का भी योगदान हो । अर्थिक उदारीकरण के आने पर कई समस्याओं तथा संकटों के आने की भी शंका जाहिर की गई थी। कहा गया था कि इन कदमों से से लंबी मंदी आएगी तथा बड़े पैमाने पर गरीबी की स्थिति बनेगी क्योंकि मंदी के कारण बेरोजगारी भी बढ़ जाएगी। यह दूसरे देशों के आर्थिक उदारीकरण के प्रभाव को देखते हुए कहा गया था पर ऐसा नहीं हुआ।
1991 में भारत का कुल सकल घरेलू उत्पाद 0.8% रह गया लेकिन 1992-93 में यह 5.3% हो गया। 1993-94 में यह 6.2% रहा। यह 1996 आते-आते 7.5% तक पहुंच गया 1991 से लेकर 1997 के बीच कुल 23% रहा। 1992 से 1997 के बीच कुल घरेलु पूंजी निर्माण और कुल स्थिर पूंजी निर्माण भी 25.2% रहा तथा 22.3% रहा। 
1991 में औद्योगिक उत्पादन विकास दर बहुत ही कम 1 फीसदी से भी कम था तथा उत्पादन क्षेत्र में तो यह निगेटिव था।
वहीं 1992-93 में औद्योगिक उत्पादन की दर में जबरदस्त उछाल आया। अब यह 2.3% हो गया। 1993-94 में यह 9 फीसदी हो गया। 1993-94 में अभूतपूर्व 12.8% हो गया। कई वर्षो से मूल वस्तुओं का क्षेत्र नकारात्मक विकास दिखा रहा था। यह दर बढ़कर 1994-95 में 25 फीसदी हो गई। इससे यह आशंका गलत साबित हो गई तथा औद्योगिक उत्पादन 1994-95 में बढ़ कर 25% हो गया। अब यह पता लग गया कि एम०आर०टी०पी० की समाप्ति से इस पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ने के बजाए इसके विकास को मदद ही मिली। कृषि में विकास की रफ्तार बढ़ी तथा 1996-97 तक यह विकास दर 3 फीसदी हो गयी।
केन्द्रीय सरकार का वित्तीय घाटा 1990-91 में कुल राष्ट्रीय उत्पाद के 8.3% तक पहुंच चुका था। यह 1992 तथा 1997 में बंट कर लगभग 6 फीसदी पर आ गया। महत्व की बात यह है कि 1996-97 में 5.2% के कुल वित्तीय घाटे में से 4.7% सूद भुगतान पर खर्च हो रहा था। यह वित्तीय तिमाही का एक नतीजा था। प्राथमिक घाटा अर्थात् सूद भुगतान घाटा वित्तीय घाटा यानी चालु - वित्तीय दबाव या अति खर्चा होता है। यह 1996-1997 में सिर्फ 0.6% था जबकि 1990 में यह सकल घरेलू उत्पाद का 4.3% हो गया था और 1993-94 में 2.9% था।
देश की आर्थिक क्षेत्र में वैदेशिक स्थिति में काफी सुधार देखने को मिला। निर्यात के मामले में 1991-92 में डॉलर के हिसाब से 1.5 फीसदी की गिरावट आई लेकिन इसमें जल्द ही सुधार हुआ और 1993-96 में औसत विकास दर 20% तक पहुंच गई। महत्व की बात यह है कि भारत की आत्म निर्भरता इस स्तर पर बढ़ रही थी कि आयात के काफी बड़े भाग का भुगतान पर निर्यात के हाथ किया जाने लगा। आयात के भुगतान की तुलना में निर्यात में आय का अनुपात 80 के दशक में 60% से बढ़ कर 90 के दशक में 90 फीसदी हो गया।
चालू खाते के भुगतान संतुलन में घाटा 1990-91 में घरेलू उत्पाद में 3.2% तक पहुंच गया था। जो हानिकारक था। इस 1993-94 में घटाकर 0.4% तक लाया गया और 1995-96 में यह फिर बढ़कर 1.6% हो गया। फिर भी 1991-92 और 1997-98 के बीच औसत घाटा मात्र 1.1 फीसदी था। जो 7वीं योजना के 2.3% से काफी कम था। जनवरी 1991 में अंत तक सोना तथा एस०डी०आर० समेत विदेशी विनिमय कोष 30.4 अरब डॉलर के सम्मानजनक स्तर तक पहुंच गया था। इस कांप के सहारे सात महीनों तक आयात किया जा सकता था जबकि जुलाई 1991 में सिर्फ दो सप्ताह के आयात के लिए विदेशी मुद्रा उपलब्ध थी।
विपीनचन्द्रा अपनी ‘किताब आजादी के बाद भारत में कहते हैं कि कर्ज का संकट भी समाप्त होने लगा। भारत का विदेशी कर्जा तथा ळक्च का अनुपात 1991-92 में 41% के उच्च बिंदु पर था। 1995-96 में यह गिरकर 28.7% हो गया। कर्जा वापसी अनुपात भी 1990 में 35.3% से गिरकर 1997-98 में 19.5% हो गया। फिर भी चीन, मलेशिया और दक्षिण कोरिया के 10 फीसदी के नीचे के आंकड़ों से यह अभी काफी अधिक है।
80 के दशक तथा लगभग 1991 के उदारीकरण के बाद शेयर बाजार तथा स्टॉक मार्केट में काफी सुधार देखने को मिला तथा सही तौर पर ळवच के अनुपात के रूप में भारतीय स्टॉक बाजार में कुल बाजार पुंजीकरण 1980 में मात्र जो 5 फीसदी था अब वह 1990 में बढ़कर 13 प्रतिशत हो गया। 1991 के बाद हुए सुधारों में अब 1993 के अन्त तक बढ़कर 60% हो गए 1995 आते-आते यह स्टॉक बाजार विश्व का सबसे बड़ा बाजार हो गया।
मनमोहन सिंह ने 1997 में पूंजी शेयर नियंत्रण एक्ट को समाप्त कर दिया तथा इसके कारण विदेशी मुद्रा के निवेश में भारतीय कंपनियों ने अपनी शक्ति को बढ़ाया। इसका प्रयोग वह अपने विकास में कर रहे थे। इसमें पहले सरकार नए पूंजी शेयर और उनकी कीमते नियंत्रित किया करती थी।
उदारीकरण के परिणाम बृहत थे। अब विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर खरीद सकते थे तथा भारतीय कंपनियां विदेशी बाजार में धन इकट्ठा कर सकती थी। भारत में प्राथमिक बाजार में भारतीय कंपनियों के द्वारा जुटाई गई पूंजी 1980 में 92 करोड़ 90 लाख रूपये से बढ़कर 1985 में 2.5 अरब रूपये हो गई और 1990 में । खरब 23 अरब रूपये हो गई। 1993-94 में सह आकांडा 2 खरब 25 अरब रूपये हो गया।
उदारीकरण के फलस्वरूप भारत में पूंजी निवेश विशेषकर विदेशी पूंजी निवेश के नतीजे सकारात्मक निकले तथा 1991-1996 के बीच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश लगभग 100% बढ़ गया। 1991 के 12 करोड़ से बढ़कर यह 1996 में 2.1 अरब डॉलर हो गया।
कुल विदेशी निवेश जहां 1990-91 में 20 लाख डॉलर था वह 1995-96 में यह बढ़कर 4.9 अरबर डॉलर हो गया। इस एक प्रकार इसे एक विशाल सुधार की संज्ञा दी गयी । आर्थिक उदारीकरण की अलोचना भी कम नहीं हुई। परम्परागत रूप से वामपंथियों के विचारों में यह एक गरीब विरोधी कदम था। कम्यूनिस्ट पार्टियों ने यह कहा कि यह सुधार अधिकतर देशों में फेल चुका है तथा मंदी आ गई और विकास रुक गया परन्तु इसे गरीब विरोधी कहना शायद ठीक नहीं होगा क्योंकि जहां 1987-88 में गरीबी दर 38.9% थी वही 1995 में 36% थी । यह सही है कि जहां दूसरे देशों में गरीबी दर कम हुई वही यहां वामपंथियों की बात अंशतः सच साबित हुई क्योंकि जिस रफतार से गरीबी घटनी चाहिए थी उसमे ऐसा नहीं दिखा।
आर्थिक सुधारों के द्वारा भारत में उच्चतर विकास हासिल करने के साथ-साथ गरीबी का स्तर कम करने की आशा भी मुख्य प्रश्न यह है कि जब वित्तीय घाटा कम होगा तथा सरकारी खर्च में कमी होगी तो गरीबी दर में उतनी कमी क्यों न दिखी? सबसे बड़ा कारण कृषि का विकास था। कृषि के विकास में जितनी वृद्धि दिखनी चाहिए थी, उतनी नहीं दिखी तथा सही तौर पर यह अपने आप में एक सेटबैक था 1991-92 में सुखा तथा उत्पादन की कमी दोनो का सामना करना पड़ा जिसमें अनाज की कीमतों में वृद्धि हुई सरकार को समझाने में देरी हो गई तथा वह ग्रामीण रोजगार पर अधिक ध्यान देती रही। गरीबी निवारण कार्यक्रमों में अधिक वृद्धि नहीं की गई जो करनी चाहिए थी। इस कदम की आलोचना हुई। परंतु 1993-1994 में गरीबी के स्तर में सुधार देखने को मिला तथा 1992 के मुकाबले 1993-94 में ग्रामीण एवम् शहरी गरीबी दोनों स्तरों पर 6% की कमी आ चुकी थी। यह स्तर 1986-87 से 1990-91 के सुधार पूर्व के 5 वर्षो की औसत से कम था। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सुधार जनित स्थायित्व ने गरीबी स्तर पर बहुत ही गलत प्रभाव नहीं डाला। इस पर हमेशा में यही बात कही जाती रही है कि ढाँचागत सुधारों के प्रभावी परिणाम गरीबी पर कोई गलत प्रभाव नहीं डालते हैं बल्कि वे अर्थ तंत्र की पूरी ऊर्जा मुक्त कर उनका भला ही करेंगे।
गरीबी में सुधार आर्थिक उदारीकरण के बाद हुआ और इसके पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है। सरकार ने 1991 के बाद कई सारी योजनाएं बनायी जो सामाजिक तथा ग्रामीण विकास के लिए थी। ग्रामीण विकास पर 1991-92 में सरकार का खर्च जहां पूरे खर्च का 4 फीसदी था वहीं 1992-93 में यह 7.8% हो गया। 1993 से 1998 के बीच यह 10 फीसदी तक हो गया। वास्तविक कृषि मजदूरी जो 1991-92 में 6.2% घट गयी थी वहीं अलग दो सालों में यह 5% बढ़ गयी। 1993-94 में सुधार के पहले से कही आगे निकल गई। 1991-92 के निम्न स्तर के बाद कुल अर्थ तंत्र में जनित अतिरिक्त रोजगार 1994-95 में बढ़कर 72 लाख हो गया। 1992-93 तथा 1994-95 के बीच प्रतिवर्ष औसत रूप से 63 लाख नौकरियों प्राप्त हुई ये 80 के दशक में प्रतिवर्ष औसतन 48 लाख नौकरिया से कहीं अधिक थी।
उपरोक्त तथ्यों के अलावा मुद्रास्फिति पर भी काफी प्रभाव पड़ा । यह पूरी तरह नियंत्रण में रखा गया। 1991 में वा. र्षिक मुद्रास्फीति दर 17 फीसदी तक जा पहुंची थी वह 1996 की फरवरी में 5% से भी नीचे लायी गई। कुल मिलाकर सुधारों की पहल सफल होती जा रही थी लेकिन अभी भी बहु कुछ करना बाकी था। सबसे बड़ी बात कि किसी भी सरकार के लिए कोई बड़ी पहल के लिए सामान्य जनसमर्थन से भी अधिक समर्थन की आवश्यकता थी लेकिन जब सरकार अल्पमत में रहती हैं तो कोई भी कड़े कदम उठाने में हिचकती है।
उपरोक्त कारण जिसमें नरसिंहराव सरकार के पास पूर्ण समर्थन नहीं था बहुत सारे क्षेत्रों में चाहकर भी सुधार नहीं किए गए। प्रस्तुत उदारीकरण में और भी सुधार की आवश्यकता थी। मसलन सार्वजनिक बचत बढ़ाने तथा सरकारी राज. कोषीय घाटे कम करने में कोई भी गंभीर कदम नहीं उठाए गए। उच्च वित्तीय घाटा बना रहा तथा 1992-96 के बीच सार्वजनिक बचत की एवम् निवेश के बीच का अंतर सकल घरेलू उत्पाद के औसतन 7.1 फीसदी के उच्च आंकडे पर बना रहा। अनाज की सब्सिडी 1991-92 में 28.5 अरब रूपयों से बढ़कर 1996-97 में 61.14 अरब रूपये हो गई।
खाद सब्सिडी भी 1988-89 के 32.01 अरब रूपयों से बढ़कर 1989-90 में 45.42 अरब रूपये और 1995-96 में 62.35 अरब रूपय हो गई भारी सब्सिडी के फलस्वरूप कृषि में स्त्रोतों की कमी के कारण वास्तविक निवेश में गिरावट का रुझान पैदा हो गया। प्रसिद्ध कृषि अर्थशास्त्री सी. एच. हनुमंत राव ने 1992 में नोट किया सिर्फ खाद पर दी वार्षिक सब्सिडी केन्द्र तथा राज्यों द्वारा कृषि पर वार्षिक खर्चे के बराबर है (जैसा कि विपीनचन्द्र ने लिखा है) ।
उस काल में और भी नागरिक आपूर्ति वस्तुओं पर सब्सिडी दी जा रही थी। डीजल, कैरोसीन तेल और रसोईगैस पर भी बड़ी मात्रा में सब्सिडी लगातार दी जा रही थी। 1995-96 में इस एकमुश्त सब्सिडी की राशि 93.6 अरब रूपयों तक पहुंच गई थी। जिसके फलस्वरूप उस वर्ष कुल जमा घाटा करीब 1 खरब 55 अरब रूपयों तक पहुंच गया। तेल कोष घाटा सरकार द्वारा तेल कंपनियों को अदा किया जाने वाला कर्ज था, जिसका प्रयोग आरंभिक तौर पर भारी सब्सिडी देने के लिए किया गया। इसके फलस्वरूप तेल कंपनियां तेल क्षेत्र में अत्यंत आवश्यक निवेश करने में असमर्थ रहीं। इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र में सुधार के मामले में बहुत कम सफलता हासिल की गई है।
इसके अलावा चुनाव की जीत का लाभ भी सार्वजनिक खर्च से जुड़ता चला गया। सारी सरकारों को जीत के लिए लोक लुभावनी योजनाओं की घोषणा करने में सहुलियत होने लगी तथा विभिन्न राज्य सरकारें भी लागत से बहुत ही कम बिल चार्ज करने लगी। उसी काल में पंजाब सरकार ने तो बिजली पर भारी कर लगाने की जरूरत के उल्टे किसानों को मुफ्त बिजली परोसने की घोषणा कर दी। इससे पर्याप्त नुकसान उठाना पड़ा। इससे अर्थतंत्र पर विपरित प्रभाव पड़ा तथा कहीं-न-कहीं राजकोषीय घाटे का स्तर आवश्यकता से अधिक हो गया।
1996-97 में अर्थव्यवस्था में मंदी आना आंशिक रूप से पूर्वी एशियाई संकट का सबसे बड़ा परिणाम था। जापान में मंदी थी दक्षिण कोरिया, इण्डोनशिया, थाईलैण्ड तथा अन्य देशों में विकास की दरें ऋणात्मक हो गई। रूस और ब्राजील जैसे देशों में भी संकट की स्थिति पैदा हो गयी थी विश्व के स्तर पर विकास काफी धीमा पड़ गया। खास तौर पर 1998 में विश्व व्यापार का विकास। इस संकट के कारण पूंजी के अन्तर्राष्ट्रीय बहाव और निर्यात पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। भारत में विदेशी निवेश तथा भारतीय निर्यात में कमी का यह आंशिक कारण था। इसका लाभ चीन ने लिया क्योंकि भारत की ‘आसियान नीति' उस समय प्रारम्भिक स्तर पर थी तथा नरसिंहराव ने 'पूरब की ओर देखो' नीति आरम्भ की थी।
आर्थिक सुधारों के कारण नरसिंहराव तथा मनमोहन सिंह को हमेशा याद किया गया जाता रहेगा परंतु विभिन्न पि रस्थितियों के कारण नरसिंहराव सरकार का विवाद में पडना अंत में इन सबसे बड़े सुधारों को ढकने का कार्य किया। 1994 के बाद परिस्थिति बदली तथा नरसिंह राव सरकार को विभिन्न संकटों का सामाना करना पड़ा। झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को रिश्वत काण्ड, सेंट किट्स घोटाला तथा चन्द्रास्वामी प्रकरण नरसिंहराव सरकार को विपक्ष के द्वारा कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी था। विपक्ष में भारतीय जनता पार्टी को मुख्य विपक्षी दल की संवैधानिक जिम्मेदारी मिली हुई थी।
औपचारिक रूप से कहानी उस समय आरम्भ हुई जब कांग्रेस का आंतरिक कलह बढ़ने लगा । अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी जैसे नेता जो नरसिंह राव की तुलना में अपने को गांधी परिवार से अधिक नजदीक कहते थे, सरकार के फैसले के खिलाफ रहते थे। नरसिंहराव ने अपने प्रतिद्वन्दियों को कभी सामने से कुछ नहीं कहा। मामला उस समय और बिगड़ गया जब 'हवाला प्रकरण' समाचार पत्रों के मंकसपदमे (शीर्षक) बनने लगे।
इस प्रकरण में कांग्रेस से लेकर तमाम विपक्षी नेताओं का नाम आ गया। भारतीय राजनीति में भूचाल आ गया। यह एक अविश्वासी प्रकरण था। इसमें लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर शरद यादव तथा विद्या चरण शुक्ल का नाम भी था जो उस समय संसदीय कार्य मंत्री थे। इन सभी नेताओं के विरुद्ध घूसबाजी तथा विदेशी मुद्रा संबंधी उल्लघनों के आरोप लगाए गए।
हवाला प्रकरण में ले-देकर नरसिंहराव सराकर की भूमिका संदेहास्पद मानी गयी तथा राजनीति के एक धड़े ने इसके लिए साजिश को लेकर नरसिंहराव सरकार को कटघरे में रखा दिया गया। 1995 के मध्य में तत्कालीन झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसद शैलेन्द्र महतो ने भाजपा में जाने का फैसला किया।
भाजपा में उन्होंने यह कहा कि नरसिंहराव की सरकार को बचाने के लिए झारखण्ड मुक्ति मोर्चा को पैसा दिया गया था पर मैंने पैसे स्वीकार नहीं किये थे। यह एक प्रकार का आश्चर्यजनक तथा चुनाव के पहले की एक सांसद की स्वीकारोक्ति थी।
भाजपा ने इसका मुद्दा काफी बड़े स्तर पर बनाया तथा आम चुनाव की एक साथ की पूर्व अवधि में एक हथियार के तौर पर प्रयोग किया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा, सेंट किट्स, चन्द्रा स्वामी प्रकरण तथा हवाला कोड ये अपने आप में नरसिंहराव सरकार के लिए अपयश था जिसने आर्थिक उदारीकरण जैसे बड़े कदम को ढक दिया।
7. 6 दिसंबर 1992 और बाबरी ढांचा विध्वंस
नरसिंहराव सरकार की ऐतिहासिक समीक्षा में बाबरी ढांचा पकरण की चर्चा करना भी अत्यंत आवश्यक है। 6 दिसम्बर 1992 को कार सेवकों के द्वारा बाबरी ढांचा को गिराने की घटना नरसिंहराव सरकार में ही हुई।
1991 में भाजपा की तरफ से 'राम मन्दिर का मुद्दा' बहुत बड़े स्तर पर उठाया गया तथा यह कहा गया कि 'राम मन्दिर' उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता में है। विश्व हिंदू परिषद भी इस मामले को लेकर आक्रामक मुद्रा में था। विश्व हिंदू परिषद ने पूरे भारत में राम जन्म भूमि को लेकर विरोध प्रदर्शन तथा धरना देना आरम्भ कर दिया। यही बात स्पष्ट रूप से कही गई कि “बाबरी ढांचा से पहले यहां मन्दिर था तथा उसे नष्ट कर बाबरी मस्जिद बनायी गई" लेकिन प्रशासन ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि प्राथमिकता में विध्वंस के बदले विध्वंस की बात की जा रही है। इससे पहले राजीव गांधी सरकार ने ढांचे का ताला खोलकर हर वर्ष राम लला की पूजा करने की स्वतंत्रता दे दी।
विश्व हिन्दू परिषद ने घोषणा की 6 दिसम्बर 1992 को राम मन्दिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ होगा। हजारों कार सेवक अयोध्या में एकत्रित हो गए। घोषणा में बताया गया है कि "मस्जिद के निकट प्रार्थना की जाएगी" ऐसा विश्व हिंदू परिषद की तरफ से विज्ञापन जारी कि गया। 
हजारों कार सेवक अयोध्या में उस मंच के पास इकट्ठा हो गए। मंच से नेताओं का भाषण होने लगा। तथा का सेवकों का दल धीरे-धीरे विवादित ढांचे की तरफ बढ़ने लगा। जबकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक तथा पुलिस दोनों के द्वारा इस पर रोक लगाने की बात कही गई थी। धीरे-धीरे भीड़ नियंत्रित हो गई तथा मस्जिद विध्वंस करने की तरफ बढ़ने लगी। कार सेवकों के पास लोहे की छड़ें तथा अन्य हथियार थे और जल्द ही कार सेवकों ने ढांचे के ऊपर चढ़ना आरम्भ किया।
आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेताओं की तरफ से बार-बार ऐसा न करने को कहा जाता रहा लेकिन वे बात नहीं माने। पुलिस ने अति गंभीर प्रयास नहीं किये क्योंकि पहले भी कार सेवकों की हत्या हो गई थी। ढांचे को ढहा दिया गया तथा सभी मलबे को तितर-बितर कर दिया गया।
बाबरी ढांचा विध्वंस एक दुर्भाग्यपूर्ण कारवाई माना गया तथा भाजपा ने औपचारिक सफाई दी कि यह भाजपा की तरफ से नहीं किया गया है तथा यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। उत्तर प्रदेश में दंगे भड़क गए तथा अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे 'काला दिन' बताया। महाराष्ट्र में शिवसेना ने मुम्बई में कुछ प्रदर्शन किए जिसमें वहां भी दंगे भड़के। 1993 में मुम्बई में याकुब मेंल के द्वारा दाऊद के इशारे पर कई जगह बम विस्फोट किए गए।
नरसिंहराव सरकार में उत्तर प्रदेश सहित सभी भाजपा शासित राज्यों की सरकार को बर्खास्त कर दिया। कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। ऐसा कहा जाता है कि नरसिंहराव सरकार ने बाबरी विध्वंस के मामले में काफी लचर रवैया अपनाया। नरसिंहराव सरकार ने ना पहले से कोई योजना बनाई और ना ही कोई कड़ा कदम उठाया तथा इस काण्ड को होने देने की सारी परिस्थितियों को एक मूकदर्शक के तौर पर विकसित होने दिया।
भारत में 90 दशक में ऐसी घटना की विदेश में भी आलोचना हुई। इसे “साम्प्रदायिक तौर पर घटना" के नाम से जाना गया तथा वर्षो तक इस घटना की निंदा की जाती रही।
बाबरी मस्जिद विध्वंस के 10 दिन बाद गृह मंत्रालय के आदेश पर एक आयोग गठित किया गया। यह आयोग नर सिंहराव सरकार की तरफ से अपनी धर्म-निरपेक्ष छवि बचाने की अंतिम कोशिश थी। जस्टिस (न्यायधीश) लिब्रहान की अध्यक्षता में यह आयोग गठित किया गया था। इस आयोग को बाबरी विध्वंस तथा उसके बाद हुए दंगे की जांच करने की 
जिम्मेवारी दी गई। आयोग को अपनी रिपोर्ट तीन माह के अन्दर पेश करनी थी। परंतु यह आश्चार्य जनक तथा संशय पैदा करने योग्य था कि इस आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया गया और 17 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद 30 जून 2009 को अपनी रिपोर्ट मनमोहन सिंह सरकार को सौंपी गई। इस रिपोर्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह (उत्तर प्रदेश) पर घटना को नियंत्रित न करने के लिए तीखी टिप्पणी की गई तथा उत्तर प्रदेश सरकार को दोषी ठहराया।
अब 1996 आ गया था तथा नरसिंहराव सरकार को जनादेश लेने का समय भी। कांग्रेस ने मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा को तीन बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पकड़ा दिए थे। जिसमें भ्रष्टाचार सबसे अधिक बड़ा मुद्दा था। भाजापा को कांग्रेस की 5 सालों की नाकामियों को जनता के सामने ले जाने का अवसर मिला था। उधर दलितों के कई हितैषी बन बए थे। सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में भाजपा जैसे दलित आधारित दल बनकर कांग्रेस के वोट बैंक को छीन लिया था। इसी तरह अटल जी का व्यक्तित्व इधर कार्य कर रहा था तथा मुम्बई अधिवेशन में अचानक आडवाणी जी ने अटल जी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया था।
अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय दलों का प्रमुख बढ़ गया था तथा इस प्रगति की हानि सीधे कांग्रेस को होने वाली थी 1996 का चुनाव अप्रैल-मई में लड़ा गया तथा भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। कांग्रेस अब दूसरे नम्बर की पार्टी थी भाजपा को 161 सीटें मिली थी तथा कांग्रेस को 140 सीटें मिली थी। नरसिंह राव ने इस्तीफा दे दिया तथा 16 मई को तत्कालीन राष्ट्रपति ने (डा० शंकर दयाल शर्मा) अटल जी को सबसे बड़े दल के नेता होने के कारण प्रध नमंत्री पद शपथ दिला दी।
नरसिंह राव का कार्यकाल एक प्रयोगात्मक कार्यकाल रहा। उन्होंने अपने वरिष्ठ मंत्रियों के सहयोग से आर्थिक तथा वैदेशिक क्षेत्र में अच्छे काम किए। विदेश नीति में उन्होंने अटल जी जैसे विपक्षी नेताओं की भी मदद लेने में कोई हि. चकिचाहट नहीं की पर ऐसा कहा जाता है कि उनके कार्यकाल के साथ इतिहास की मजबूरी तथा कांग्रेस की आंतरिक राजनीति ने न्याय नहीं किया।
दिसम्बर 2004 में नरसिंहराव जी की मृत्यु हो गई तथा विवादित परिस्थितियों में एक पूर्व प्रधानमंत्री का अंतिम संस्कार दिल्ली के बदले हैदराबाद में हुआ।
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