अंग्रेजों का अवध, मराठों, सिखों व मैसूर से सम्बन्ध

अंग्रेजों का अवध, मराठों, सिखों व मैसूर से सम्बन्ध

अंग्रेजों का अवध, मराठों, सिखों व मैसूर से सम्बन्ध

अवध - आंग्ल सम्बन्ध
> वारेन हेस्टिंग्स की अवध के प्रति अपनाई गई नीति का मूल्यांकन
वारेन हेस्टिंग्स ने प्रारम्भ में जिस नीति का अवध के प्रति अनुसरण किया, उसका मुख्य उद्देश्य अवध को शक्तिशाली राज्य बनाना था, क्योंकि इस समय मुगल सम्राट जो कि, पहले अंग्रेजों का पेंशनर था, मराठों के संरक्षण में मराठों को सौंप दिए थे. अतः अब कम्पनी की सीमाएँ असुरक्षित हो गई थीं तथा अंग्रेजों को अब मराठा आक्रमण का भय बना रहता था. अतः कम्पनी की सीमा रक्षा के लिए कम्पनी एवं मराठा राज्य के मध्य अवध राज्य का चला गया था और उसने इलाहाबाद तथा कड़ा के जिले शक्तिशाली होना आवश्यक था. अवध के प्रति मित्रता रखने का एक अन्य कारण यह भी था कि कम्पनी के राज्य की रक्षा वह अफगानों से भी करना चाहता था. अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हेस्टिंग्स ने अवध के नवाब से 'बनारस की सन्धि' (1773 ई.) की, जिसके तहत् उसे इलाहाबाद और कड़ा के जिले लौटा दिए गए तथा बदले में नवाब ने अंग्रेजों को 25 लाख रुपया देना तय किया. इसके साथ ही यह भी तय किया गया कि कम्पनी अवध की सुरक्षा के लिए एक सेना अवध में रखेगी जिसका खर्चा नवाब वहन करेगा.
रुहेला युद्ध
रुहेलखण्ड हिमालय की तलहटी का एक छोटा-सा राज्य था तथा यहाँ का शासक हाफिज रहमत खाँ था. इस राज्य को व अवध को मराठा आक्रमण का भय होने के कारण 1772 ई. में दोनों राज्यों में यह सन्धि हुई थी कि मराठा आक्रमण के समय अवध रुहेलों को सैनिक सहायता देगा और बदले में उसे 40 लाख रुपए मिलेंगे. 1773 ई. में मराठों ने रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर दिया, परन्तु अवध की सेनाएँ देखकर मराठे बगैर युद्ध लड़े ही वापस लौट गए, अतः रुहेलों ने रुपया देने से अवध को मना कर दिया. इस पर अवध के नवाब ने अंग्रेजों की सहायता से रुहेलखण्ड पर आक्रमण कर दिया तथा रुहेल सरदार को मार डाला गया तथा उनका राज्य अवध में मिला लिया गया. केवल एक छोटा-सा हिस्सा रुहेला संस्थापक अली मुहम्मद के पुत्र फनुल्ला खाँ को दे दिया गया और उसके साथ यह सन्धि की गई कि आवश्यकता पड़ने पर वह अवध को सैनिक सहायता देगा तथा अन्य किसी शक्ति से सम्बन्ध नहीं रखेगा.
हेस्टिंग्स की नीति का मूल्यांकन
हेस्टिंग्स ने अवध के प्रति जो नीति अपनाई उसकी अनेक विद्वानों ने आलोचना की है. कानूनी या नैतिक दोनों ही दृष्टि से अवध की रुहेलों के विरुद्ध सहायता देना गलत था, क्योंकि रुहेलों ने कभी कोई कार्य अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं किया था. अल्फ्रेड लॉयल ने लिखा है कि "रुहेलों पर आक्रमण सिद्धान्ततः गलत था. धन-लोलुपता के कारण हेस्टिंग्स ने ब्रिटिश सेना को किराए पर लगाया था.” वास्तव में उसने अपनी सेना के वेतन और खर्च से बचने के लिए अवध का साथ दिया तथा अवध को इस समय कम्पनी का मित्र बनाए रखना आवश्यक था. अतः इसे देखते उसे सही भी कहा जा सकता है.
> वारेन हेस्टिंग्स की अवध की बेगमों के प्रति अपनाई गई नीति : टिप्पणी
अवध के भूतपूर्व नवाब शुजाउद्दौला की पत्नी तथा आसफुद्दौला की माता के पास अपार सम्पत्ति थी. आसफुद्दौला के अपनी माता की इस सम्पत्ति पर अधिकार करना चाहता था. उसका कहना था कि उसकी माता और अन्य बेगमों ने अनुचित तरीके से सम्पत्ति एकत्र कर रखी थी.
अवध के बेगमों का धन आसफुद्दौला इसलिए भी प्राप्त करना चाहता था कि उसे कम्पनी के बढ़ते हुए ऋण भार से मुक्ति मिले. अतः नवाब के आर्थिक संकट को देखते हुए बेगमों ने उसे पहले 25 लाख रुपए दिए और बाद में अंग्रेजों की मध्यस्थता से बेगमों ने 30 लाख रुपए और दे दिए. इस पर भी आसफुद्दौला को संतोष नहीं हुआ तथा उसने बेगमों का धन प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों से आक्रमण करने की आज्ञा माँगी, जिसे हेस्टिंग्स ने अनुमति दे दी फिर भी उसका बेगमों पर आक्रमण करने का साहस नहीं हुआ. इस पर अंग्रेज रेजिडेण्ट ने बेगमों पर यह अभियोग लगाया कि उन्होंने चैतसिंह की युद्ध में सहायता की थी. अतः अंग्रेज सेना ने उनके महल पर अधिकार कर उनकी सारी सम्पत्ति पर अधिकार कर लिया.
अनेक इतिहासकारों द्वारा बेगमों के प्रति हेस्टिंग्स द्वारा अपनाए गए इस व्यवहार की कड़े शब्दों में निन्दा की है. वास्तव में उसका यह व्यवहार पूर्णतः बर्बर और असभ्य था तथा किसी भी सभ्य कहे जाने वाले राष्ट्र या व्यक्ति के लिए यह काले धब्बे के समान है.
> लॉर्ड वेलेजली द्वारा अवध के प्रति अपनाई गई नीति
मई 1798 ई. में घोर साम्राज्यवादी वेलेजली गवर्नर जनरल बनकर भारत आया तथा आते ही उसने अवध को कम्पनी के शिकंजे में कसने की कोशिश की. उसकी नीति का मुख्य उद्देश्य मराठों के विरुद्ध अवध को एक महत्त्वपूर्ण अवरोध बनाना था. इसलिए वह अंग्रेजी सेना की संख्या को अवध में बढ़ाना चाहता था और दोआब की उपजाऊ भूमि पर नियन्त्रण स्थापित करना चाहता था. इससे उसके मराठों के विरुद्ध युद्ध अभियानों में रसद आदि की नियमित सहायता मिलती रहती. अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वेलेजली ने अवध के नवाब सआदत अली पर लगातार दवाब बढ़ाता गया और अन्ततः 1801 ई. में दोनों पक्षों में सन्धि हो गई. जिसके अनुसार अवध का आधा राज्य एवं दोआब का उपजाऊ क्षेत्र अंग्रेजों को प्राप्त हो गया. अवध की सेना को भंग कर दिया गया तथा अंग्रेजी फौज की संख्या बढ़ा दी गई और ब्रिटिश रेजिडेण्ट को अवध के आन्तरिक शासन में हस्तक्षेप का अधिकार प्रदान किया गया. वास्तविक शासन सत्ता के अधिकारी अब नवाब की जगह कम्पनी हो गई तथा अवध का राज्य चारों ओर से कम्पनी के राज्य से घिर गया. अब अंग्रेजों को मराठों के आक्रमण का भय भी समाप्त हो गया तथा बिना किसी परेशानी के अंग्रेज कम्पनी के राज्य की सीमाओं की रक्षा होने लगी, क्योंकि उनकी सेना के खर्च का भार नवाब के ऊपर था.
> अवध का कम्पनी के राज्य में विलीनीकरण
वेलेजली के समय में अवध के आधे राज्य पर कम्पनी का नियन्त्रण स्थापित हो चुका था और उसके दोआब के उपजाऊ क्षेत्र को भी कम्पनी ने हस्तगत कर लिया था. इसके साथ ही अवध में नवाब के खर्चे पर एक बड़ी अंग्रेजी सेना को अवध में रख दिया गया. फलस्वरूप अवध का अंग्रेजों द्वारा भरपूर आर्थिक शोषण प्रारम्भ हो गया, उससे अवध में आर्थिक विपन्नता एवं प्रशासनिक अव्यवस्था फैल गई. नवाब को अपनी व्यवस्था सुधारने का कोई अवसर नहीं मिला. अंग्रेजों का उस पर इतना दवाब बना रहता था कि वह सदैव उनके लिए पैसे की व्यवस्था करने में ही लगा रहता था. 
लॉर्ड हेस्टिंग्स ने नेपाल के युद्ध का बहाना बनाकर नवाब से लगभग 2 करोड़ रुपए प्राप्त कर लिए तथा इसके बदले में अवध के नवाब को अंग्रेजों ने बादशाह की उपाधि ग्रहण करने को कहा. इसी प्रकार लॉर्ड एमहर्स्ट ने भी नवाब से लगभग 50 लाख रुपए प्राप्त कर लिए.
नवाब की सोचनीय आर्थिक स्थिति के कारण जब वह अंग्रेजों की ओर अधिक आर्थिक सहायता देने में अक्षम हो गया, तब उसे विलियम बैंटिक ने सर्वप्रथम अपने प्रशासन में सुधार करने की चेतावनी दी, अन्यथा उसके राज्य को कम्पनी के राज्य में मिला लेने की धमकी. इसके उपरान्त भी अवध की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया.
इस पर लॉर्ड हार्डिंग्ज ने भी अवध के नवाब वाजिद अली शाह को 1847 में अवध की स्थिति को सुधारने के लिए धमकी परन्तु अवध की स्थिति यथावत् रही.
लॉर्ड डलहौजी ने अवध को कम्पनी के राज्य में मिलाने के लिए 'हड़प नीति' (Doctrine of laps) की नीति का अनुसरण किया. इसके तहत उसने अवध के शासन पर भ्रष्टाचार एवं कुशासन का आरोप लगाया और कर्नल स्लीमन को अवध के प्रशासन की जाँच के लिए भेजा, जिसने अवध में विद्रोह की संभावना को देखते हुए उसका कम्पनी के राज्य में विलय का विरोध किया. इस पर वेलेजली ने स्वयं अवध की यात्रा की तथा स्लीमन की जगह आउट्रम को अवध का नया रेजिडेण्ट नियुक्त कर दिया. आउट्रम ने एक सेना के साथ अवध की राजधानी लखनऊ में प्रवेश किया तथा नवाब वाजिद अली शाह के सम्मुख एक सन्धि-पत्र, जिसमें कहा गया था कि नवाब स्वेच्छा से गद्दी त्याग रहा है, प्रस्तुत कर उस पर हस्ताक्षर करने को कहा. नवाब के इनकार कर देने पर उसे बन्दी बना लिया गया और उसे कलकत्ता भेज दिया गया. 13 फरवरी, 1856 ई. को औपचारिक रूप से अवध को अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर देने की घोषणा डलहौजी द्वारा कर दी गई.
अवध के नवाब हमेशा ही कम्पनी के लिए मित्र की भूमिका का निर्वाह करते रहे थे. वे सदैव कम्पनी के वफादार रहे. उनके ऊपर प्रशासनिक भ्रष्टाचार एवं कुशासन का आरोप लगाकर, अवध को कम्पनी के राज्य में मिलाना सर्वथा अनुचित था, क्योंकि यह व्यवस्था अंग्रेजों की ही देन थी.
> 1775-82 ई. तक अंग्रेजों व मराठों के सम्बन्धों का निरूपण 
पृष्टभूमि
पेशवा माधवराव की 1772 ई. में अचानक मृत्यु हो जाने के बाद उसका छोटा भाई नारायणराव पेशवा बना जो अत्यन्त दुर्बल व्यक्ति था. अतः उसके चाचा रघुनाथराव उर्फ राघोबा ने 30 अगस्त, 1773 ई. को उसकी हत्या करवा दी और स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया. इसी बीच नारायणराव की पत्नी गंगाबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसको लेकर नाना फड़नवीस एवं अन्य महत्त्वपूर्ण मराठा सरदारों ने राघोबा का विरोध किया तथा नन्हे शिशु को पेशवा घोषित कर दिया.
इससे राघोबा की महत्वाकांक्षाओं पर पानी फिर गया तथा वह अंग्रेजों की शरण में बम्बई चला गया. यहीं से मराठा राजनीति में अंग्रेजों को हस्तक्षेप करने का अवसर मिला, जिसका परिणाम प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध के रूप में आया.
> प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-82 ई.)
अंग्रेजों ने बम्बई के आसपास के प्रदेशों को मराठों से प्राप्त करने के उद्देश्य से रघुनाथराव से 7 मार्च, 1775 ई. को ‘सूरत की संधि’ की, जिसमें यह तय था कि अंग्रेज राघोबा को सैनिक सहायता देंगे और राघोबा उनको खर्च के लिए सालसेट, बेसिन तथा भड़ौंच के राजस्व का कुछ अंश देगा. अब अंग्रेज सेना ने 1775 ई. में पूना की सेना को हरा दिया, लेकिन सूरत की सन्धि को कलकत्ता कौंसिल जिसके अधीन अंग्रेजों की बम्बई कौसिल थी, ने इस सन्धि को अस्वीकार कर दिया और पूना सरकार के साथ 1 मार्च, 1776 ई. को ‘पुरन्दर की सन्धि' की जिसके अनुसार अंग्रेजों ने राघोबा का साथ छोड़ दिया और बदले में सालसेट एवं भड़ौंच से राजस्व वसूलने का अधिकार मराठों से लिया तथा युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में 12 लाख रुपए मराठों ने अंग्रेजों को दिया व राघोबा को पेंशन प्रदान कर दी गई.
‘पुरन्दर की सन्धि' को बम्बई कौंसिल ने स्वीकार न कर राघोबा का पक्ष लेकर मराठों से 1778 ई. में युद्ध प्रारम्भ कर दिया, जिसमें तेलगाँव के युद्ध में मराठों द्वारा बुरी तरह से पराजित कर दिया गया और उन्हें 'तेलगाँव की सन्धि' विवश होकर करनी पड़ी. जिसमें एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश लौटा दिए गए. इस सन्धि को कलकत्ता कौंसिल ने अपना राष्ट्रीय अपमान मानते हुए एक विशाल फौज मराठों के विरुद्ध भेजी, जिसने अनेक स्थानों पर अपना अधिकार जमा लिया और पूना की ओर बढ़ने लगी, जिसके फलस्वरूप सिन्धिया ने मध्यस्थता कर अंग्रेजों व मराठों के मध्य सन्धि करवा दी, जो सालबाई की सन्धि (17 मई, 1782) के नाम से जानी जाती है. इसके अनुसार, सालबाई पर अंग्रेजों का अधिकार स्वीकार कर लिया गया तथा अंग्रेजों ने शिशु पेशवा ( माधव नारायणराव) को पेशवा स्वीकार कर लिया और मराठों के प्रदेशों को अंग्रेजों ने लौटा दिया. 
इस सालबाई की सन्धि से अंग्रेजों एवं मराठों का आपसी संघर्ष समाप्त हो गया, परन्तु इससे अंग्रेजों को लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक हुई और उनकी आर्थिक स्थिति डाँवाडोल हो गई. अंग्रेजों को लाभ यह हुआ कि मराठों से सन्धि हो जाने पर वे निश्चिन्त होकर अपने शत्रुओं हैदरअली और टीपू तथा निजाम के विरुद्ध कार्यवाही कर सके और इसके साथ ही उन्हें मराठा संघ की फूट का पता चल गया, जिसका उन्होंने आगे चलकर लाभ उठाया.
> बेसीन की सन्धि की शर्तें व महत्व
इस सन्धि के अनुसार पूना में पेशवा ने अंग्रेज सेना का रहना स्वीकारा तथा उसके खर्चे के लिए 26 लाख रुपए आय वाले प्रदेश अंग्रेजों को दे दिए. अब अंग्रेज जनरल आर्थर वेलेजली ने सेना सहित पूना में प्रवेश कर बाजीराव द्वितीय को पुनः पेशवा बनवा दिया.
इस सन्धि से अंग्रेजों को पूना में अपनी सेना रखने का अवसर मिला तथा उन्होंने महाराष्ट्र में अपने पाँव जमाने प्रारम्भ कर दिए. इस सन्धि को मराठा सरदार पसन्द नहीं करते थे. फलतः अंग्रेजों व मराठों के मध्य द्वितीय युद्ध प्रारम्भ हो गया.
> द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803-06 ई.)
इस युद्ध की प्रमुख बात यह थी कि इसमें मराठा सरदारों अंग्रेजों से एक साथ न लड़कर अलग-अलग लड़े तथा सभी पराजित हो गए.
(1) सिन्धिया और भोंसले ने एक संयुक्त मोर्चा कायम कर अंग्रेजों से युद्ध प्रारम्भ किया, लेकिन यशवन्तराव होल्कर ने इसमें उनका साथ नहीं दिया, जिससे 4-5 महीने में अंग्रेज जनरल आर्थर वेलेजली ने मराठों को कई स्थानों पर पराजित कर उनकी शक्ति को नष्ट कर दिया. अब होल्कर सिंधिया और भोंसले का साथ देने के लिए युद्ध में कूद पड़ा, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी और अब वह भी पराजित हो गया और अन्त में 17 दिसम्बर, 1803 ई. को सन्धि हुई जो देवगाँव की सन्धि के नाम से जानी जाती है.
देवगाँव की संधि (17 दिसम्बर, 1803 ई.) के अनुसार, भोंसले ने अंग्रेजों को कटक तथा वर्धा नदी के पश्चिम के सभी क्षेत्र दे दिए तथा यह वादा किया कि पेशवा और निजाम के मध्य के संघर्ष में अंग्रेज मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे और साथ में अपनी राजधानी नागपुर में उसने एक अंग्रेजी रेजीडेण्ट रखना स्वीकार कर लिया.
इस युद्ध के दूसरे पक्ष सिन्धिया से अंग्रेजों ने 30 दिसम्बर, 1803 ई. को 'सुर्जी अर्जुनगाँव' की सन्धि की. जिसके अनुसार, सिन्धिया ने गंगा और यमुना के मध्य का क्षेत्र, जयपुर, जोधपुर और गोहर के उत्तर के सभी क्षेत्र एवं दक्षिण में अहमदनगर, भड़ौंच और अजन्ता की पहाड़ियों के दक्षिण के क्षेत्र अंग्रेजों को सौंप दिए. मुगल सम्राट् शाहआलम, पेशवा एवं निजाम पर से उसका नियन्त्रण समाप्त कर दिया गया और उसकी राजधानी में अंग्रेजी रेजीडेण्ट रहने लगा. इसके बाद उसने वेलेजली की सहायक सन्धि को स्वीकार कर लिया.
(2) होल्कर ने सिन्धिया और भोंसले के साथ अंग्रेजों की सन्धि हो जाने के बाद 1804 ई. में अंग्रेजों पर अकेले आक्रमण कर दिया. उसने छापामार प्रणाली के अनुसार, लड़ते हुए राजपूताने में कर्नल मोन्स को पराजित कर दिया. होल्कर ने भरतपुर के राजा को अपनी ओर मिलाकर दिल्ली पर असफल आक्रमण किया. इसी बीच वेलेजली को वापस बुला लिया गया तथा कर्नल लेक ने भारत के राजा से सन्धि कर ली.
वेलेजली के बाद कार्नवालिस को गवर्नर जनरल बनाकर भारत भेजा गया, जिसकी अचानक मृत्यु (8 अक्टूबर, 1805 ई.) हो गई. अब उसके स्थान पर कौशल के योग्य एवं अनुभवी सदस्य बार्लो को नियुक्त किया गया, जिसने होल्कर से सन्धि कर ली. यह सन्धि राजपुर घाट (7 जनवरी, 1806 ई.) की सन्धि के नाम से जानी जाती है. इसके अनुसार, होल्कर ने टोंक, रामपुर, बूँदी, कूँच बुन्देलखण्ड आदि क्षेत्रों से अपने दावे हटा लिए तथा अंग्रेजों ने उसके राज्य का अधिकांश भाग लौटा दिया.
इन सन्धियों के बाद भी अंग्रेजों व मराठों में स्थायी शान्ति स्थापित नहीं हो सकी. अंग्रेजों ने सिन्धिया तथा अप्पा साहब से अलग-अलग सन्धि कर उनकी स्वतन्त्रता को समाप्त कर दिया तथा 13 जून, 1817 ई. को पेशवा से सन्धि कर अंग्रेजों ने पेशवा को मराठा संघ के प्रमुख का पद छोड़ देने के लिए बाध्य कर दिया. इस पर पेशवा ने पूना की ब्रिटिश रेजीडेन्सी में आग लगा दी. नागपुर के अप्पा साहब और होल्कर ने भी युद्ध करना प्रारम्भ कर दिया, परन्तु अँग्रेजों ने सीतावल्दी में भोंसले को, मेंहदीपुर में होल्कर को तथा कोर्की को कोरेगाँव में व अश्ती में पेशवा को पराजित कर मराठा राज्य पर अपना पूर्ण आधिपत्य कायम कर लिया. 1817 व 1818 ई. में लड़े गए इस युद्ध को तृतीय आंग्लमराठा युद्ध के नाम से जाना जाता है.
इस युद्ध के बाद पेशवा के पद को समाप्त कर दिया गया तथा उसे पेंशन देकर कानपुर के पास बिठूर में जागीर दे दी गई. उसके राज्य का छोटा हिस्सा सतारा का राज्य शिवाजी के वंशज प्रतापसिंह को दे दिया गया और शेष भाग कम्पनी के राज्य के अधीन कर दिया गया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि शिवाजी के द्वारा स्थापित राज्य जिसे पेशवा बाजीराव एवं माधवराव ने साम्राज्य में बदला था, उसका अन्त सदा के लिए अंग्रेजों ने अपने तीसरे युद्ध में कर दिया तथा वे अब भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गए.
> अंग्रेजों के विरुद्ध मराठों के पराजय के कारण 
अंग्रेजों के विरुद्ध मराठों की असफलता के निम्नलिखित कारण थे—
1. प्रारम्भ में मराठा सरदारों में एकता थी उन पर पेशवा का प्रभावशाली नियन्त्रण था, लेकिन बाद में नारायणराव एवं बाजीराव द्वितीय के समय में मराठा सरदारों पर पेशवा का कोई नियन्त्रण नहीं रहा और वे स्वतन्त्र शासक की तरह व्यवहार करने लगे और उनके अन्दर आपसी ईर्ष्या-द्वेष ने कभी भी अंग्रेजों के विरुद्ध एक नहीं होने दिया, जो उनके पतन का एक निश्चित कारण बनी.
2. मराठा राज्य के पतन में मराठों की आर्थिक नीति ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया. उनकी कोई भी ठोस आर्थिक नीति नहीं थी. वे अक्सर लूट-मार किया करते थे, जिसके कारण उनके चारों ओर शत्रु पैदा हो गए. इसके साथ ही महाराष्ट्र की बंजर भूमि को उन्होंने सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया.
3. शिवाजी ने जागीर प्रथा को प्रोत्साहन नहीं दिया था, किन्तु उनकी मृत्यु के बाद मराठा राज्य विभिन्न जागीरों में बँट गया और विभिन्न क्षेत्रों के मराठा प्रमुखों में एकता एवं सामंजस्य का भारी अभाव था.
4. मराठों का सैन्य-संगठन भी अंग्रेजों की तुलना में दोषपूर्ण था. वे अपनी प्राचीन छापामार युद्ध-नीति को छोड़ चुके थे तथा मैदानी लड़ाई के अभ्यस्त नहीं थे, ऐसी स्थिति में उनकी पराजय स्वभाविक थी.
5. उस समय अंग्रेजों की तुलना में राष्ट्रीयता की भावना का देश में अभाव था. प्रत्येक मराठा सरदार अपने राज्य के लिए लड़ा न कि, अपने सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए, जबकि अंग्रेज सदैव अपने राष्ट्र के लिए लड़ते थे.
6. मराठा सरदार अधिकांशतः फ्रांसीसी सैन्य अधिकारियों द्वारा अपनी सेना को प्रशिक्षित कराते थे एवं अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करते थे, परन्तु समय आने पर फ्रांसीसी मराठों को कोई सहायता न पहुँचा सके.
7. मराठा साम्राज्य अत्यन्त विशाल था, लेकिन जिन प्रदेशों को मराठों ने जीता और कभी भी उनकी शासनव्यवस्था की ओर ध्यान नहीं दिया. उन्होंने जनहित के कल्याण के कार्य नहीं किए, जिससे उन्होंने आम जनता की सहानुभूति खो दी.
8. मराठा अपनी नीतियों के कारण से हैदराबाद के निजाम व मैसूर के टीपू को अपने साथ रखने में सफल नहीं हो सके. यदि वे इनको लेकर अंग्रेजों के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा कायम करते, तो निश्चित रूप से सफल होते.
9. अंग्रेजों से जब मराठों का संघर्ष हुआ उस समय तक मराठों के अनेक योग्य नेता; जैसे—महादजी सिन्धिया, अहिल्याबाई, तुकोजी होल्कर, नाना फड़नवीश आदि की मृत्यु हो चुकी थी. अतः योग्य नेतृत्व के अभाव में मराठों की हार निश्चित थी.
10. अंग्रेज अपनी कूटनीतिक योग्यता, कुशल सैन्य-प्रबन्ध, श्रेष्ठ गुप्तचर व्यवस्था में मराठों से अधिक श्रेष्ठ थे, वे मराठों की प्रत्येक गतिविधि की जानकारी आसानी से प्राप्त कर लेते थे. इसके विपरीत अंग्रेजों की किसी भी गतिविधि की जानकारी मराठों को नहीं रहती थी.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, मराठों की पराजय के लिए उनकी आपसी फूट एवं कलह, दोषपूर्ण सैन्य संगठन, आर्थिक नीतियों का अभाव, राजपूत शासकों का असहयोग, योग्य नेतृत्व का अभाव आदि ने मिलकर ऐसा संयोग रचा कि मराठा राज्य जिसकी धाक कन्याकुमारी से लेकर पंजाब तक थी, उसका अस्तित्व अँग्रेजों द्वारा सदा-सदा के लिए समाप्त कर दिया गया.
> अंग्रेज-सिख सम्बन्ध
> रणजीतसिंह व अंग्रेजों के सम्बन्धों की विवेचना कीजिए. क्या रणजीत ने अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन उस ढंग से किया जिससे कि, उनके उत्तराधिकारियों को निष्कंटक राज्य प्राप्त हो सके ?
उन्होंने अपनी विजयों द्वारा सिखों के छोटे से राज्य को एक महाराजा रणजीतसिंह बड़े वीर एवं साहसी व्यक्ति थे हुई विशाल एवं संगठित राज्य में बदल दिया. उनकी बढ़ती शक्ति ने अंग्रेजों का ध्यान उनकी तरफ देने को विवश कर दिया. रणजीत ने इस समय सतलज नदी के पूर्व के प्रदेश लुधियाना और पटियाला को जीतकर अपने राज्य का हिस्सा बना लिया था. अतः इस ओर रणजीतसिंह के प्रसार को रोकना अंग्रेजों के लिए आवश्यक हो गया था. अतः अंग्रेज गवर्नर जनरल ने रणजीतसिंह से अनाक्रमण समझौता करने के लिए 'चार्ल्स मेटकॉफ' को भेजा. इस समय उन्होंने यह माँग की कि, उन्हें सिखों का 'सार्वभौम राजा' स्वीकार कर लिया जाए. कम्पनी ने इसे स्वीकार न कर रणजीतसिंह को बल प्रयोग द्वारा बाध्य करने के लिए 1809 ई. के फरवरी माह में एक अंग्रेज सेना भेजी. रणजीतसिंह ने अब अंग्रेजों से संघर्ष करने की अपेक्षा उन्होंने उनसे सन्धि करना उचित समझा. इधर अंग्रेज भी उनसे संघर्ष करने की स्थिति में नहीं थे. फलतः दोनों पक्षों में अमृतसर की सन्धि (25 अप्रैल, 1809) हुई, जिसकी शर्तें निम्नलिखित थीं – 
1. सतलज नदी को रणजीतसिंह के राज्य की दक्षिणी सीमा तय किया गया.
2. सतलज नदी के दक्षिण-पूर्व के सारे राज्य अंग्रेजी संरक्षण में स्वीकार किए गए.
3. लुधियाना में अंग्रेज सेना तैनात कर दी गई.
4. अंग्रेजों ने सतलज नदी के उत्तर में हस्तक्षेप न करने का आश्वासन दिया.
रणजीतसिंह की अंग्रेजों से की गई इस सन्धि से उनकी महत्वाकांक्षाओं पर पानी फिर गया. उनके राज्यं का पूर्व की ओर विस्तार रुक गया तथा कोई उपाय न देखते हुए उन्होंने उत्तर-पश्चिम तथा पश्चिम की ओर अपने राज्य का विस्तार जारी रखा, लेकिन उनका अंग्रेजों से संघर्ष करने का साहस न हुआ.
महाराजा रणजीतसिंह व कम्पनी 18 1828 से लेकर 1839 ई. तक सिन्ध को लेकर तनातनी चलती रही. रणजीतसिंह पर अधिकार करना चाहते थे और अंग्रेज भी इस उपजाऊ और व्यापारिक महत्व वाले प्रदेश को अपने नियन्त्रण में लेने के इच्छुक थे. फलतः लॉर्ड विलियम बैंटिक ने 1831 ई. में रणजीतसिंह से रोपड़ में भेंट की व पुरानी सन्धि की शर्तों को दोहराया. 1832 ई. में अंग्रेजों ने सिन्ध के अमीर से व्यापारिक सन्धि कर ली, इससे उन्हें बहुत अधिक दुःख हुआ. 1834 ई. में उनको शिकारपुर से अंग्रेजी फौजों के कारण विवश हो हटना पड़ा. 1835 ई. में अंग्रेजों ने फिरोजपुर पर भी अधिकार कर लिया, परन्तु वे कुछ नहीं कर सके. अंग्रेजों ने अफगान युद्ध के समय हुई सन्धि में रणजीतसिंह को भी सम्मिलित कर लिया, परन्तु रणजीतसिंह ने अपनी बुद्धिमानी से अंग्रेजों को अपने राज्य में हस्तक्षेप करने का अवसर नहीं दिया.
> प्रथम अंग्रेज- सिख युद्ध के कारण एवं परिणाम की समीक्षा
कारण- प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध का प्रमुख कारण सिख सेना का पंजाब में आतंक था. इस सेना की शक्ति को कम करने के उद्देश्य से और अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए रानी झिंडन सिख सेना को अंग्रेजों पर आक्रमण करने के लिए उकसा रही थी. उसका यह विचार था कि, यदि सिख सेना इस युद्ध में विजयी हुई तो उनके राज्य का विस्तार और होगा और यदि हार गई तो उसका प्रभाव पंजाब पर कम हो जाएगा.
अंग्रेजों ने भी सिखों की कमजोर राजनीतिक स्थिति को भुनाने का उपयुक्त अवसर माना. इस हेतु उन्होंने सतलज नदी के उस पार के कुछ सिख राज्य के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया. इस कारण से सिख सेना को युद्ध के लिए बाध्य होना पड़ा.
युद्ध-सिखों की खालसा सेना 13 दिसम्बर, 1845 ई. को सतलज नदी पार कर अंग्रेजों के विरुद्ध फिरोजपुर पहुँच गई. अब लॉर्ड हार्डिग्स ने सिखों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. सिख सेना ने बहुत ही बहादुरी से युद्ध किया, परन्तु लालसिंह तथा तेजसिंह जैसे देशद्रोहियों के कारण उन्हें पराजय का मुँह देखना पड़ा. मुदकी, फिरोजपुर, अलीवाल, सुबराव आदि के युद्धों में सिख सेना लगातार हारती गई और अंग्रेजों ने सतलज नदी को पार कर 20 फरवरी, 1846 को सिखों की राजधानी लाहौर पर अधिकार कर लिया. इससे सिखों को अंग्रेजों से सन्धि करने को विवश होना पड़ा और दोनों पक्षों में लाहौर की सन्धि हुई.
लाहौर की सन्धि (8 मार्च, 1845 ई.)
इस सन्धि की निम्नलिखित शर्तें थीं—
1. पंजाब का राज्य पुनः महाराजा रणजीतसिंह के अल्पव्यस्क पुत्र दिलीप को दे दिया तथा अंग्रेजों के इस युद्ध में सहायक रहे लालसिंह को मन्त्रि पद पर नियुक्ति दे दी गई.
2. दिलीपसिंह को रानी झिंडल के संरक्षण में रख दिया गया.
3. अंग्रेजों को युद्ध की क्षतिपूर्ति के लिए 1½ करोड़ रुपया देना स्वीकार करना पड़ा. इस हेतु उन्होंने कश्मीर का प्रदेश एक करोड़ में गुलाबसिंह डोंगरा को बेच दिया.
4. जालन्धर व दोआब के क्षेत्र पर अंग्रेजों का अधिकार स्वीकार कर लिया गया.
5. सिख सेना की संख्या कम कर दी गई. उसकी संख्या 20,000 हजार पैदल, 12,000 घुड़सवार तक सीमित कर दी गई. इसके अलावा इस युद्ध में काम आई सभी तोपें अंग्रेजों को देनी पड़ीं.
6. अंग्रेजों ने सिख राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने तथा राजा दिलीपसिंह की रक्षा का वचन दिया तथा उसकी सुरक्षा के लिए एक सेना बहाल कर दी गई.
लाहौर की सन्धि के बाद अंग्रेजों ने 16 दिसम्बर, 1846 ई. को भैरोंवाल की सन्धि सिखों से की, जिसमें लाहौर के अंग्रेज रेजीडेण्ट को पंजाब के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिल गया तथा सम्पूर्ण पंजाब में कहीं भी अंग्रेज सेना रखी जा सकती थी.
सिखों के इस युद्ध में पराजय हो जाने के बाद भी उनका मनोबल नहीं टूटा, के अपनी हार का कारण विद्रोहियों का विश्वासघात मानते हुए अगले युद्ध की तैयारी करने लगे.
> द्वितीय अंग्रेज-सिख युद्ध के कारण तथा परिणाम
कारण- प्रथम अंग्रेज-सिख युद्ध के बाद हुई लाहौर की सन्धि को सिख अत्यन्त ही अपमानजनक मानते थे. इस सन्धि ने पंजाब में अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित कर दिया था तथा अनेक महत्वपूर्ण पदों पर अंग्रेजों की नियुक्ति की जाने लगी. सिखों ने प्रथम युद्ध में अपनी पराजय का कारण अपनी वीरता की कमी को न मानकर विद्रोहियों के विश्वासघात को माना. इसी प्रकार रानी झिंडन को अपने अधिकारों के छिन जाने का बड़ा दुःख था और सिख जाति के लोग रानी के अपमान से बुरी तरह क्षुब्ध थे. अतः युद्ध होना स्वाभाविक ही था.
युद्ध का तात्कालिक कारण मूलराज का विद्रोह था. वह मुल्तान का गवर्नर था तथा उसने अपने क्षेत्र में अनेक सुधार किए, लेकिन मालगुजारी का पूरा रुपया लाहौर दरबार में नहीं भेज सका. अतः अंग्रेज रेजीडेण्ट के दबाव के कारण उसे हटाकर उसके स्थान पर काहनसिंह को मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया गया. जब काहनसिंह अंग्रेजों के साथ पद ग्रहण करने मुल्तान गया, तब मुल्तान की सम्पूर्ण जनता ने मूलराज के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. पर अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड डलहौजी ने अपनी साम्राज्यवादी नीति के तहत पंजाब को अंग्रेजी राज्य में मिलाने का फैसला कर लिया. 
युद्ध — लॉर्ड डलहौजी ने मुल्तान का बहाना बनाकर सिखों के विरुद्ध अक्टूबर, 1848 में युद्ध की घोषणा करते हुए जनरल गॉफ को मुल्तान भेजा, जिसने 1849 में विद्रोहियों को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया. लेकिन चिलियांवाला का युद्ध अनिर्णायक रहा और इसमें अंग्रेजों को भारी क्षति उठानी पड़ी. इस पर अंग्रेजों द्वारा चार्ल्स नेपियर को भेजा गया तथा गुजरात के निकट उसने प्रसिद्ध ‘तोपों के युद्ध' में सिखों को बुरी तरह से पराजित कर दिया और यही युद्ध सिखों के लिए निर्णायक रहा. इस पर लॉर्ड डलहौजी ने कहा कि, “इसे भारतवर्ष में ब्रिटिश युद्ध के इतिहास में सबसे अधिक स्मरणीय युद्धों में से समझना चाहिए."
परिणाम - इस युद्ध का सीधा और सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि, पंजाब को लॉर्ड डलहौजी की 29 मार्च, 1848 की घोषणा द्वारा अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया. महाराजा दिलीपसिंह को पेंशन देकर रानी झिंडन के साथ इंग्लैण्ड भेज दिया गया. सिख सेना को भंग कर दिया गया और पंजाब का प्रशासन कमिश्नरों को सौंप दिया गया तथा विद्रोहियों को दण्ड देकर उनकी जागीरों को छीन लिया गया.
समीक्षा – पंजाब का अंग्रेजी राज्य में विलय के लिए सिख सेना की अतिशय महत्वाकांक्षा तथा विद्रोही सरदारों का विश्वासघात प्रमुख रूप से जिम्मेदार थे. इसके बावजूद पंजांब की, प्रथम अंग्रेज सिख युद्ध के बाद, दुर्दशा का कारण अंग्रेज. रेजीडेण्ट एवं अंग्रेजों की नीतियाँ थीं. भैरोंवाल की सन्धि से सही प्रशासन के संचालन के लिए अंग्रेज रेजीडेण्ट उत्तरदायी था न कि, महाराजा दिलीपसिंह सिखों ने पूर्ण रूप से प्रारम्भ में विद्रोह नहीं किया तथा महाराजा ने अन्त तक किसी भी प्रकार के विद्रोह में भाग नहीं लिया. इस दृष्टिकोण से डलहौजी का यह कार्य एकदम से अनुचित था. इतिहासकार इवांस बेल ने ठीक ही लिखा है कि, “पंजाब का विलय कोई विलय नहीं था, यह तो विश्वासघात था” परन्तु अंग्रेजों ने भारत में अपने राज्य का विस्तार ही नैतिकता को ताक में रख कर किया था. इस विजय से अंग्रेजी राज्य की सीमाएँ अफगानिस्तान तक पहुँच गईं और अंग्रेजों का विजय का कार्य भारत में लगभग पूरा हो गया.
अंग्रेज व मैसूर सम्बन्ध
> हैदरअली के समय में अंग्रेजों व मैसूर के सम्बन्ध 
हैदरअली ने एक साधारण परिवार में जन्म लेकर भी अपनी प्रतिभा एवं सैनिक योग्यता के बल पर मैसूर राज्य का सेनापति बना. सेनापति के रूप में उसने मैसूर की सेना का पुनर्गठन कर उसे यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित किया तथा अन्त में वह मैसूर के शासक कृष्णराज की 1766 ई. में मृत्यु हो जाने पर शासक बन गया.
शासक बनने के बाद हैदरअली ने वेदनूर, कनारा, सुण्ड, सिरा आदि प्रदेशों को जीतकर मैसूर राज्य में मिला लिया. इससे अंग्रेज, मराठे एवं निजाम ने चिन्तित होकर उसके विरुद्ध एक संगठन कायम कर लिया और हैदरअली को दक्षिण की राजनीति में अकेला कर दिया. अब मराठों ने हैदरअली पर आक्रमण किया जिसे उसने रिश्वत देकर लौटा दिया. इसी तरह उसने निजाम को भी अपनी ओर मिलाकर अँग्रेजों को अकेला कर दिया. अँग्रेजों ने अकेले ही हैदरअली पर आक्रमण किया. जब अँग्रेजों ने हैदरअली को 1768 ई. में त्रिनोमाली और चंगमा के युद्ध में पराजित कर दिया, तब निजाम पुनः पाला बदलकर अँग्रेजों के साथ चला गया. 
अब हैदरअली ने अकेले ही अपनी पूरी ताकत से अँग्रेजों के दक्षिण के प्रमुख केन्द्र मद्रास पर आक्रमण कर दिया. उसने अँग्रेजों को हराकर मंगलौर पर अधिकार कर लिया. इससे अँग्रेजों में घबराहट फैल गई और उन्होंने हैदरअली से मद्रास की सन्धि (अप्रैल 1769 ई.) कर ली और युद्ध को बन्द कर दिया गया. हैदरअली और अंग्रेजों के मध्य (1766 से 69 ई.) चले इस संघर्ष को 'प्रथम अँग्रेज - मैसूर युद्ध' के नाम से जाना जाता है.
मद्रास की सन्धि के अनुसार, दोनों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश लौटा दिए तथा दोनों ने एक-दूसरे को किसी तीसरे पक्ष के आक्रमण के समय सहायता देने का आश्वासन दिया. हैदरअली ने अंग्रेजों से एक बड़ी राशि युद्ध हर्जाने के रूप में भी वसूली. इससे हैदरअली की प्रतिष्ठा में बहुत अधिक वृद्धि हो गई तथा अँग्रेजों को इससे एक बड़ा आघात लगा. 
प्रथम अँग्रेज मैसूर युद्ध में मद्रास की सन्धि अंग्रेजों के लिए बहुत अधिक अपमानजनक थी तथा उस समय वारेन हेस्टिंग्स गवर्नर जनरल था. मराठों ने जब हैदरअली पर आक्रमण किया तब अँग्रेजों ने उसे कोई सहायता नहीं दी. अतः उसने अँग्रेजों को सबक सिखाने का निश्चय किया और 1779 ई. में अँग्रेजों के विरुद्ध मराठों और निजाम को मिलाकर एक संयुक्त मोर्चा कायम किया. इधर अंग्रेजों ने हैदरअली के मित्र फ्रांसीसियों के केन्द्र माही जो उसके राज्य में था, पर अधिकार कर लिया. इस पर हैदरअली ने बड़ी ही तीव्रता से अंग्रेजी सेना को हराकर अर्काट पर अधिकार कर लिया. इससे अंग्रेजों की स्थिति अत्यन्त ही दयनीय हो गई तब कलकत्ता से वारेन हेस्टिंग्स ने आयरकूट को एक बड़ी सेना के साथ भेजा व मराठों तथा निजाम को हैदरअली से कूटनीति द्वारा पृथक् कर दिया. आयरकूट ने हैदरअली को पोर्टोनोवा के युद्ध में (1783 ई.) बुरी तरह से पराजित कर दिया, लेकिन छिट-पुट संघर्ष दोनों में ही चलते रहे. इसी बीच हैदरअली की 1782 ई. में और आयरकूट की 1783 ई. में मृत्यु हो गई. अब हैदरअली के पुत्र टीपू सुल्तान ने युद्ध को जारी रखा. अन्त में 1784 ई. में 'मंगलौर की सन्धि' से शान्ति स्थापित हो गई. यह युद्ध 'द्वितीय अंग्रेज-मैसूर युद्ध' के नाम से जाना जाता है. मंगलौर की सन्धि के अनुसार, दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के जीते हुए प्रदेश तथा युद्धबन्दियों को लौटा दिया तथा अँग्रेजों ने यह वादा किया कि वे अब मैसूर के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. इससे टीपू की प्रतिष्ठा में बहुत अधिक वृद्धि हो गई. यद्यपि यह शान्ति स्थायी नहीं थी. 
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, हैदरअली ने मैसूर को एक संगठित राज्य में बदलकर अंग्रेजों को प्रथम युद्ध में पराजित कर उनसे अपमानजनक सन्धि स्वीकार करने पर विवश कर दिया. उसने अपनी कूटनीति का परिचय देते हुए अंग्रेजों को मराठों व निजाम से पृथक् कर दक्षिण की राजनीति में उन्हें अकेला कर दिया. हालांकि वह अंग्रेजों को अपने राज्य से पूर्ण रूप से बाहर निकालने के उद्देश्य में सफल नहीं हो सका, परन्तु वह एकमात्र अपने समय का ऐसा व्यक्ति था जिसने अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का बीड़ा उठाया था.
> टीपू सुल्तान और अंग्रेज सम्बन्ध या आंग्ल-मैसूर सम्बन्ध का द्वितीय चरण
द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद हुई 'मंगलौर की सन्धि' द्वारा स्थापित शान्ति व्यवस्था को टीपू और अंग्रेज दोनों ही अस्थायी मानते थे तथा दोनों ही भावी युद्ध को आवश्यक समझते थे. टीपू के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने टीपू की विरोधी शक्तियों, मराठे व निजाम को अपनी तरफ मिला लिया, इससे टीपू दक्षिण में अकेला पड़ गया.
कार्नवालिस ने निजाम को अपनी एक सेना सहित पत्र भेजा जिसमें उसकी मित्र शक्तियों का नाम था, लेकिन उसमें टीपू का नाम नहीं था. इधर टीपू ने फ्रांस के नेपोलियन और तुर्की के सुल्तान से सहायता प्राप्त करने का प्रयास करने में लग गया. इससे टीपू और कम्पनी में ठन गई और टीपू ने 1787 ई. को जुलाई माह में त्रावणकोर के राजा जोकि अंग्रेजों के संरक्षण में था, पर हमला कर दिया. इससे कार्नवालिस ने भी टीपू के विरुद्ध आक्रमण की घोषणा कर दी तथा जनरल मीडोज को टीपू के विरुद्ध भेजा, परन्तु टीपू ने उसे हराकर कर्नाटक के क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया. इसी बीच कार्नवालिस ने निजाम और मराठों से सन्धि कर ली तथा आपस में तीनों पक्ष टीपू की हार के बाद उसका राज्य बाँट लेने पर सहमत हो गए. 
अब टीपू के विरुद्ध युद्ध संचालन का नेतृत्व स्वयं कार्नवालिस ने करना प्रारम्भ किया तथा बंगलौर पर अधिकार कर लिया. इधर टीपू ने भी कोयम्बटूर पर अपना अधिकार जमा लिया, परन्तु दोनों पक्षों में श्रीरंगपट्टम में अन्तिम और निर्णायक युद्ध लड़ा गया जिसमें टीपू की हार हो गई और उसकी राजधानी पर अंग्रेजों का अधिकार हो जाने से दोनों पक्षों में सन्धि वार्ता हुई जिसे श्रीरंगपट्टम की सन्धि कहा जाता है. इससे मैसूर-आंग्ल तृतीय युद्ध समाप्त हो गया.
श्रीरंगपट्टम की सन्धि (मार्च 1792 ई.) के अनुसार टीपू का आधा राज्य उससे लेकर कम्पनी, मराठों तथा निजाम के मध्य बाँट लिया गया. इसके साथ ही टीपू ने लगभग 30 लाख पौण्ड युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में देना स्वीकार किया और अपने दो पुत्रों को जमानत के तौर पर कार्नवालिस को सौंप दिया. इससे दक्षिण में टीपू का प्रभाव कम हो गया तथा अंग्रेजों के पाँव दक्षिण में जम गए.
> चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)
टीपू ने तीसरे युद्ध में हार जाने के बाद भी अपना धैर्य नहीं खोया तथा सन्धि की शर्तों का ईमानदारी से पालन किया और इसके साथ ही उसने अपने राज्य की व्यवस्था को मजबूत कर अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार कर लिया. टीपू ने अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टम को पहले से अधिक मजबूत किलेबन्दी द्वारा सुरक्षित कर लिया. उसने अरब, काबुल, कुंस्तुनतुनिया एवं मारीशस में अपने दूत भेजे तथा वहाँ के शासकों से मदद का आश्वासन प्राप्त किया. इससे अंग्रेज चिन्तित हो गए.
ऐसी स्थिति में 1790 ई. में लाई वेलेजली गवर्नर जनरल बनकर भारत आया और आते ही उसने टीपू व फ्रांसीसियों को भारत में समाप्त करने का निश्चय कर लिया तथा टीपू पर विदेशी शक्तियों से साठ-गाँठ का आरोप लगाकर 20 फरवरी, 1799 ई. को श्रीरंगपट्टम को घेर लिया. टीपू किले की रक्षा करता हुआ 4 मई, 1799 ई. को मारा गया तथा उसके पुत्रों ने आत्मसमर्पण कर दिया. 
टीपू की मृत्यु के साथ ही अंग्रेजों ने मैसूर के राज्य को निजाम और अंग्रेजों ने आपस में बाँट लिया. मराठों ने इस बँटवारे में भाग लेने से मना कर दिया. मैसूर के छोटे-से भाग पर पुराने राजवंश के अवयस्क राजकुमार को गद्दी पर बैठाकर राजा घोषित कर उसके साथ सहायक सन्धि कर ली और अब मैसूर में अंग्रेजी नियन्त्रण स्थापित हो गया.
> टीपू सुल्तान के मरने के बाद मैसूर राज्य का बँटवारा
चतुर्थ मैसूर युद्ध में टीपू के मारे जाने के बाद अंग्रेजों को मैसूर की ओर से खतरा जो तीस वर्षों से निरन्तर चला आ रहा था, समाप्त हो गया. अंग्रेजों ने निजाम के साथ मैसूर का बँटवारा कर लिया, क्योंकि मराठों ने बँटवारे में भाग लेने से स्पष्ट मना कर दिया था.
(i) निजाम – गुटी, गुरमकोड और चुत्तल दुर्ग के प्रदेश. 
(ii) अंग्रेज – कनारा, विनाद, कोयम्बटूर, दारापुरम, श्रीरंगपट्टम और दो अन्य जिले.
(iii) मराठे – उत्तर-पश्चिम के कुछ प्रदेश मिले थे, जिसे उसने लेना अस्वीकार कर दिया.
इस प्रकार दोनों शक्तियों ने मैसूर के राज्य को आपस में बाँट लिया तथा शेष मैसूर राज्य को वाड्यार वंश के अवयस्क राजकुमार को देकर उसे राजा घोषित कर उसके साथ सहायक सन्धि कर ली, जिसके अनुसार-
1. मैसूर की रक्षा के लिए एक सेना वहाँ रहेगी, जिसका खर्चा 7 लाख पौण्ड मैसूर राज्य देगा.
2. युद्ध के समय मैसूर राज्य के साधनों का प्रयोग अंग्रेज अपनी इच्छानुसार कर सकेंगे.
3. आन्तरिक कुशासन के समय अंग्रेज मैसूर राज्य का शासन-प्रबन्ध अपने हाथ में ले लेंगे और बाद में विलियम बैंटिक ने मैसूर पर कुशासन का आरोप लगाकर मैसूर को अँग्रेजों ने अपने अधिकार में ले लिया.
मैसूर राज्य के इस बँटवारे ने उसके आकार एवं साधनों को सीमित कर दिया तथा बाद में उसकी अंग्रेजों से प्रतिरोध करने की शक्ति भी समाप्त हो गई.
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