> रामगुप्त की ऐतिहासिकता पर विभिन्न विचारों का परीक्षण
समुद्रगुप्त (350–375 ई.) तथा चन्द्रगुप्त द्वितीय (375 - 412 ई.) के शासनकाल के मध्य में रामगुप्त नामक निर्बल शासक की ऐतिहासिकता के सन्दर्भ में अनेक मत प्रचलित हैं इसके पक्ष में निम्नलिखित साक्ष्य दिए गए -
1. साहित्यिक साक्ष्य
1. विशाखदत्त—मुद्राराक्षस.
2. बाणभट्ट – हर्षचरित.
3. राजशेखर–काव्य मीमांसा.
4. भोज - शृंगार प्रकाश.
5. अबुल हसन अली – मजमुल उततवारीख.
साहित्यिक साक्ष्यों में वर्णित सूचनाओं से यह निष्कर्षात्मक तथ्य उभरकर आता है कि समुद्रगुप्त के ज्येष्ठ पुत्र रामगुप्त ने जब शकों से हारकर अपनी पत्नी ध्रुवस्वामिनी को उन्हें सौंप दिया तो रामगुप्त के छोटे भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय ने छद्म वेश धारण कर शकपति की हत्या कर अपने कुल की मर्यादा बनाए रखी और बाद में अपने भाई की हत्या कर राजा बन गया.
2. अभिलेखीय साक्ष्य
गुप्त साम्राज्य के इतिहास की जानकारी के लिए अनेक अभिलेखीय साक्ष्य उपलब्ध हैं जिनके आधार पर गुप्त इतिहास की प्रामाणिकता को जाँचा एवं परखा जा सकता है. अभिलेखीय प्रमाणों में सर्वप्रमुख है 'समुद्रगुप्त का इलाहाबाद अभिलेख'. वास्तव में यह मौर्य शासक अशोक का अभिलेख था जिस पर बाद में समुद्रगुप्त के मन्त्री हरिषेण ने अपने स्वामी के विजय अभियानों का उल्लेख किया है. इस अभिलेख के अलावा स्कन्दगुप्त का भितरी स्तम्भ अभिलेख उदयगिरि गुहा अभिलेख, मथुरा प्रस्तर अभिलेख, साँची अभिलेख, गधवा अभिलेख, चन्द्रगुप्त द्वितीय का महरौली का कांबे लेख और मंगली लेख आदि भी गुप्त इतिहास के अभिलेख, संजन लेख (अमोघवर्ष प्रथम का), गोविन्द चतुर्थ महत्वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्य हैं.
3. मुद्राएँ
मालवा के दो स्थानों भिलसा तथा एरण से प्राप्त ताम्र मुद्राएँ जिनमें एक पर रामगुप्त अंकित है. एरण से प्राप्त रामगुप्त की मुद्रा पर सिंह तथा गरुड़ की आकृति अंकित है. गरुड़ की आकृति रामगुप्त की ऐतिहासिकता में सहायक है, क्योंकि यह गुप्तों का राजकीय चिह्न था. इसलिए रामगुप्त की ऐतिहासिकता को विश्वास बनाकर उसे चन्द्रगुप्त द्वितीय का अग्रज ठहराने में अहम् भूमिका निभाते हैं.
उपर्युक्त साक्ष्यों के बाद भी अनेक विद्वान् स्मिथ, राय चौधरी, बनर्जी, मजूमदार रामगुप्त की ऐतिहासिकता स्वीकार करने से इनकार करते हैं तथा निम्नलिखित तर्क देते हैं—
1. गुप्त अभिलेखों में चन्द्रगुप्त द्वितीय को समुद्रगुप्त का तत्परिगृहीत कहा गया है, यानि समुद्रगुप्त के बाद चन्द्रगुप्त ही राजा बना.
2. गुप्त लेखों में रामगुप्त का नाम नहीं है.
3. रामगुप्त की मुद्राएँ ताँबे की हैं जिन पर प्राकृत में लेख हैं, जबकि सम्राटों की मुद्राएँ स्वर्ण, रजत की हैं और उन पर संस्कृत में लेख है.
4. अपनी पत्नी को समर्पित होने के लिए तैयार होना, अपने भाई की हत्या कर उसकी विधवा पत्नी के साथ विवाह आदि कार्य गुप्तकाल की स्वस्थ परम्पराओं के नितान्त प्रतिकूल कार्य है.
इन तर्कों का विद्वानों द्वारा खण्डन किया गया है और रामगुप्त की ऐतिहासिकता प्रमाणित की है. विद्वानों के अनुसार रामगुप्त चूँकि परवर्ती उत्तराधिकारी चन्द्रगुप्त द्वितीय का भाई था, इसलिए गुप्त अभिलेखों में उसका उल्लेख नहीं है. इसी तरह मुद्राओं का निर्माण उन पर प्राकृत या संस्कृत का प्रयोग उस काल की आर्थिक दशा और मुद्राकारों की कला कुशलता को दर्शाता है. गुप्त अभिलेखों में प्रयुक्त ‘तत्परिगृहीत’ व ‘तत्यादानुध्यात' शब्द केवल औपचारिक थे और पुत्र अपने पिता के प्रति सम्मान प्रकट करने हेतु प्रयुक्त करते थे.
निष्कर्ष के रूप में यही कहा जा सकता है कि रामगुप्त गुप्तवंश के शासकों में से ही एक था. अभिलेखीय साक्ष्यों ने रामगुप्त की ऐतिहासिकता को और भी पुष्ट कर दिया है.
> समुद्रगुप्त भारत के नेपोलियन के रूप में
'हरिषेण द्वारा विरचित प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की विभिन्न विजयों एवं तत्कालीन राज्यों के प्रति उसकी नीति के परिप्रेक्ष्य में प्रसिद्ध ब्रिटिश इतिहासज्ञ विन्सेट स्मिथ ने इसे ‘भारत के नेपोलियन' के रूप में विहित किया है.
लेकिन समुद्रगुप्त अपेक्षाकृत अधिक महान् था, जहाँ नेपोलियन, वाटरलू के अन्तिम व निर्णायक युद्ध में पराजित हुआ, उसे सेण्ट हेलेना के द्वीप में निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा और उसी के साथ उसका साम्राज्य नष्ट हो गया, लेकिन समुद्रगुप्त ने गुप्त साम्राज्य को वह सम्बल व सुदृढ़ता प्रदान की कि वह आगामी 150 वर्षों तक पुष्पित एवं पल्लवित होता दृष्टिगत होता है.
> समुद्रगुप्त की दक्षिण नीति की समीक्षा
समुद्रगुप्त भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण शासक के रूप में ज्ञात है जिसकी विभिन्न उपलब्धियों का विवेचन हरिषेण द्वारा विरचित प्रयाग प्रशस्ति में वर्णित है. इससे ज्ञात होता है कि समुद्रगुप्त ने तत्कालीन विभिन्न व्यक्तियों एवं राज्यों के प्रति अलग-अलग नीतियों का अवलम्बन किया.
प्रशस्ति में उल्लिखित दक्षिण भारत के राज्य एवं शासक थे – कौशल का महेन्द्र, महाकान्तर का व्याघ्रराज, कोराल का मंतराजं, पिण्टुपुर का महेन्द्रगिरि, कोटूर का स्वामीदत्त, एरण्डपाल का दमन, अवमुक्त का नीलराज, वेंगी का हस्ति वर्मन, कांची का विष्णुगोप, देवराष्ट्र का कुबेर, पल्लक का उग्रसेन, कुशथलपुर का धनंजय इन सभी शासकों को समुद्रगुप्त ने परास्त किया था.
दक्षिण भारत के इन राज्यों के प्रति समुद्रगुप्त की 'ग्रहण मोक्षानुग्रह' अर्थात् ‘अधिकार करने के बाद भी स्वतन्त्र कर अनुग्रह किया' की नीति अपनाई. उल्लेखनीय है कि समुद्रगुप्त ने आर्याव्रत के राज्यों को बलपूर्वक अपने साम्राज्य में विलीन (प्रसभोद्धरण) कर लिया था. ऐसी स्थिति में स्वाभाविक प्रश्न उपस्थित होता है कि समुद्रगुप्त ने दक्षिणी भारत के इन राज्यों को अधिकार करने के बाद भी स्वतन्त्र क्यों कर दिया ?
ग्रहणमोक्षानुग्रह की नीति के कारण ऐसा माना जाता है कि समुद्रगुप्त का दक्षिण भारत पर आक्रमण का लक्ष्य वहाँ पर बहुलता में उपलब्ध स्वर्ण को प्राप्त करना था और जब इस उद्देश्य की पूर्ति हो गई तो उसने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए इन राज्यों को स्वतन्त्र कर दिया, क्योंकि दक्षिण भारत की दुर्गम और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण दीर्घ अवधि तक दक्षिणी भारत पर आधिपत्य रख पाना सुगम नहीं था.
चक्रवर्ती के आदर्श के वास्तविक क्रियान्वयन हेतु भी कार्य समुद्रगुप्त ने यह कदम उठाया और जब एक बार यह सम्पन्न हो गया तो उसने उन्हें पुनः स्वतन्त्र कर दिया, ताकि उत्तरी भारत में शासनतन्त्र शिथिल न होने पाए.
एक सहज प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जब 700 वर्ष पूर्व मौर्य शासकों ने दीर्घ अवधि तक इस क्षेत्र पर अपना आधिपत्य बनाए रखा तो गुप्त साम्राज्य के महान् शासक समुद्रगुप्त के लिए क्या यह सम्भव नहीं था, वस्तुतः समुद्रगुप्त के बदलते हुए राजनीतिक परिवेश में मौर्ययुगीन केन्द्रीयकरण की अपेक्षा विकेन्द्रीकरण की प्रकृति और सामन्तीय परम्परा का आविर्भाव दृष्टिगत होता है. इस नीति का अनुकरण कर समुद्रगुप्त ने व्यावहारिक दृष्टिकोण एवं कूटनीतिक दक्षता का परिचय दिया.
> गुप्तयुगीन धार्मिक स्थिति
गुप्तकाल भारतीय इतिहास में उन्नयन का प्रतीक है, जहाँ जीवन के विभिन्न पक्षों में चहुँमुखी विकास दृष्टिगत होता है. धार्मिक दृष्टि से इस समय विभिन्न परम्पराएँ प्रचलित थीं जिनमें पारस्परिक सौहार्द्र एवं सहिष्णुता ज्ञात होती है.
इस समय मुख्यतः ब्राह्मण धर्म एवं परम्परा का विकास द्रष्टव्य है. गुप्त सम्राटों ने वैदिक धर्म के विभिन्न अनुष्ठानों एवं क्रियाविधियों को न केवल अपनाया, अपितु उन्हें पुनः प्रतिष्ठित किया. विभिन्न वैदिक यज्ञों का प्रारम्भ, गुप्त शासकों द्वारा सम्पादित, अश्वमेध, अग्निनिष्ठोम आदि यज्ञ, ब्राह्मणों एवं मन्दिरों को भूमि दान देने की परम्परा का आरम्भ, लोगों की पंच महायज्ञों के प्रति श्रद्धा, ब्राह्मण धर्म के प्रचलन को पुष्ट करती है, तो साथ ही हिन्दू धर्म के दो महत्वपूर्ण एवं लोकप्रिय सम्प्रदायों वैष्णव एवं शैव के साथसाथ पौराणिक धर्म एवं परम्परा जो आज के लोकप्रिय हिन्दू धर्म का आधार है, इस समय स्पष्ट परिलक्षित है.
वैष्णव धर्म - गुप्त सम्राटों के राज्याश्रय एवं व्यक्तिगत रुझान के कारण वैष्णव धर्म की लोकप्रियता काफी बढ़ चुकी थी. चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य सहित विभिन्न गुप्त शासकों द्वारा धारण 'परम भागवत' की उपाधि इसी की प्रतीक है.
गुप्तकालीन सिक्कों पर गरुड़, शंख, चक्र, गदा, पद्म एवं लक्ष्मी का अंकन भी गुप्त शासकों की वैष्णव समर्थक नीति को पुष्ट करता है.
स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख, बुद्धगुप्त का एरण, स्तम्भ लेख, विष्णु की स्तुति से प्रारम्भ हुआ है. जूनागढ़ लेख में ही चक्रपालित द्वारा विष्णु मन्दिर निर्माण का उल्लेख हुआ है तो महरौली का लौह स्तम्भ वैष्णव धर्म की लोकप्रियता का प्रतीक है, जिसमें विष्णु ध्वज की स्थापना सम्बन्धी साक्ष्य निहित है. वैष्णव धर्म प्रचलन की दृष्टि से देवगढ़ का दशावतार मन्दिर और तिगवा का विष्णु मन्दिर भी उल्लेखनीय प्रतिमान हैं.
शैव धर्म - गुप्त शासकों की वैष्णव धर्म समर्थक नीति के बावजूद भी शैव धर्म का पर्याप्त प्रचलन इस समय ज्ञात होता है. कालिदास की रचनाएँ – कुमारसम्भव, मेघदूत आदि से शैव धर्म के प्रचलन के साथ-साथ इसके विभिन्न मतों की जानकारी मिलती है. रघुवंश का प्रारम्भ तो पार्वती-परमेश्वर की आराधना से हुआ है. उदयगिरि लेख का रचयिता और चन्द्रगुप्त II का संधिविग्रहिक 'शाब वीरसेन' शैव धर्म के प्रति विशेष अनुरक्त था. ‘कर्मदण्डा अभिलेख' में कुमारगुप्त के अधिकारी ‘पृथ्वीसेन’ द्वारा शिव मन्दिर को दान देने का उल्लेख मिलता है, तो स्कन्दगुप्त का सामन्त 'हस्तिन' शैव उपासक था. भूमरा एवं नचना कुठार के मन्दिर इस धर्म की लोकप्रियता के प्रतीक हैं.
सूर्य पूजा – वत्सभट्टि द्वारा रचित मन्दसौर अभिलेख में सूर्य मन्दिर के निर्माण एवं जीर्णोद्धार तथा स्कन्दगुप्त के इन्दौर ताम्रपत्र का प्रारम्भ सूर्य पूजा के साथ होना, तत्कालीन समय में सूर्य पूजा की परम्परा के प्रमाण हैं.
पौराणिक धर्म एवं परम्परा जो आधुनिक लोकप्रिय हिन्दू धर्म के आधार हैं इसी समय आविर्भूत हुआ जिसमें मुख्यतः अवतारवाद, ईश्वर भक्ति, दान, दक्षिणा, व्रत, उपवास, तीर्थों का माहात्म्य आदि को विशेष महत्व दिया गया.
इन समग्र साक्ष्यों के परिप्रेक्ष्य में यह स्वीकार करना समीचीन है कि गुप्तकाल हिन्दू धर्म एवं उसके विभिन्न पक्षों के उन्नयन का प्रतीक है.
बौद्ध धर्म–फाह्यान के विवरण से ज्ञात होता है कि इस समय बौद्ध धर्म का स्वाभाविक विकास हो रहा था. कश्मीर, अफगानिस्तान एवं पंजाब इसके महत्त्वपूर्ण केन्द्र थे. वैशाली, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, बोधगया आदि अब उतने महत्वपूर्ण नहीं थे, लेकिन वहाँ इस धर्म का प्रचलन दिखाई देता है. गुप्त शासकों द्वारा वैष्णव धर्म को महत्त्व देने के बावजूद उनका दृष्टिकोण बौद्ध धर्म के प्रति उदार था. साँची के एक लेख के अनुसार चन्द्रगुप्त II का अधिकारी आम्रकदेव बौद्ध था जिसने 'काकनादार' के बौद्ध विहार को 25 दिनार दान में दिए थे जिसके सूद से वहाँ दीपक की व्यवस्था की गई तो इत्सिंग ने (चिलि-कि- तो) श्रीगुप्त द्वारा बौद्ध विहार के निर्माण का उल्लेख किया है.
जैन धर्म – गुप्तकाल में जैन धर्म विशेष प्रचलित नहीं था, लेकिन विशेष क्षेत्रों में इसके प्रचलन के साक्ष्य ज्ञात होते हैं. फाह्यान के अनुसार, प्रमुख नगरों में जैन देवालय विद्यमान थे. बल्लभी में इस समय वृहत जैन संगीति का आयोजन किया गया.
'कहौम अभिलेख' से ज्ञात होता है कि के क स्कन्दगुप्त समय भद्र नामक व्यक्ति ने 5 जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ स्थापित कराई थीं. दुर्जनपुर गाँव से प्राप्त रामगुप्त के लेख युक्त तीन जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की प्राप्ति भी जैन परम्परा एवं धर्म के प्रचलन की प्रतीक है. इस समय सर्वनन्दी सिद्धसेन एवं उमास्वति जैन आचार्यों ने जैन धर्म का प्रतिपादन किया.
> गुप्तकाल में दर्शन
दार्शनिक चिन्तन एवं अवधारणाओं के विकास की दृष्टि से गुप्तयुंग उल्लेखनीय है. इस समय कई दार्शनिक हुए जिन्होंने विभिन्न ग्रन्थों का सृजन कर कई महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रतिपादित किए.
शबर स्वामी का मीमांशा पर लिखा गया शबर भाष्य, ईश्वर कृष्ण की सांख्य कारिका, प्रशस्तपार का वैशेषिक दर्शन पर धर्म पदार्थ संग्रह इस युग के दार्शनिक चिन्तन के विकास के प्रमाण हैं. असंग, बसुबन्धु और दिंगनाग ने महायान के विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, तो जैन दर्शन से सम्बन्धित विभिन्न अवधारणाओं को सिद्धसेन, सर्वनन्दी एवं उमास्वाति जैसे आचार्यों ने प्रतिपादित किया. इसी समय दार्शनिक वाद-विवाद तथा प्रतिद्वन्द्वी मतों के तर्कपूर्ण खण्डन की प्रक्रिया भी प्रारम्भ हुई.
> विधि का संहिताकरण
प्राचीनकाल से ही शासक को यहाँ प्रजा के निमित्त विधि स्थापित करने का अधिकार ही नहीं था वह न केवल धर्म (ऋषि, मुनियों द्वारा निर्धारित व्यवहार नियम), व्यवहार (प्रजा के रीति-रिवाज एवं परम्पराएँ), चरित ( पूर्व काल के दृष्टान्त) के आधार पर शासन करने का अधिकारी था. नारद स्मृति का कथन है कि इन तीनों के अभाव में ही शासक अपना शासन (विधि) स्थापित कर सकता था. विधि सम्बन्धी मान्यताओं में लोक प्रचलित अवधारणाओं, विश्वासों और परिवर्तित अवस्थाओं के अनुसार परिवर्तन या संशोधन होता रहा है.
मुख्यतः मनुस्मृति में पहली बार विधियों का विशद् विवरण प्रस्तुत कर संकलित किया गया.
गुप्तयुग तक विधि साहित्य ने एक नया रूप धारण कर लिया और इस समय जहाँ एक ओर विधि से सम्बन्धित अवधारणा, सिद्धान्त एवं मान्यताओं में परिवर्तन हुआ. वहीं नवीन परिप्रेक्ष्य में उन्हें पुनः संकलित किया गया. संशोधित रूप में नई व्यवस्थाओं के साथ विधियों के पुनः संकलन का प्रयास विधि का संहिताकरण कहलाता है. इस दृष्टि से याज्ञवल्क्य, नारद, बृहस्पति, कात्यायन एवं पराशर स्मृतियाँ विशेष उल्लेखनीय हैं.
धर्मशास्त्रों के अनुसार विधि के 18 विषय थे किन्तु इनमें दीवानी और फौजदारी जैसा स्पष्ट विभेद नहीं था. यह स्पष्टतः गुप्तकाल में प्रथम बार दृष्टिगत होता है. बृहस्पति ने 18 विषयों की चर्चा करते हुए 14 को धर्म मूल (Civil) तथा 4 को हिंसा मूल बताया है. नारद ने विधि को इन विषयों के अतिरिक्त 132 उपविभेद भी बताए हैं. बढ़ते हुए भू-स्वामित्व के कारण धन सम्बन्धी विवाद अधिक दिखाई देते हैं और यही कारण है कि इस समय विधियों में इसके समाधान का प्रयास दृष्टिगत होता है. बृहस्पति ने चार प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख किया है ( प्रतिष्ठित, अप्रतिष्ठित, मुद्रित, शासित) — स्मृतियों में श्रेणी, पूग* एवं कुल के अपने न्यायालय होने का उल्लेख किया है. कात्यायन ने कृषकों, कारीगरों आदि को सलाह दी है कि वे अपना फैसला महत्तर के माध्यम से करवाए.
गुप्त अभिलेखों में इनका उल्लेख ग्राम व विधि शासन के प्रसंग में हुआ है.
यदि उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर न्यायालय किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचते थे तो 'दिव्य' का सहारा लिया जाता था जिनमें जल, अग्नि, विष प्रमुख थे. फाह्यान शारीरिक दण्ड की बात अस्वीकार करता है. जबकि इस समय के ग्रन्थों में इसका उल्लेख हुआ है. मृच्छकटिकम में मृत्युदण्ड सम्बन्धी साक्ष्य का स्पष्ट उल्लेख है.
> गुप्तकालीन साहित्य
साहित्य सृजन एवं संस्कृत भाषा के विकास की दृष्टि से गुप्तकाल भारतीय इतिहास में अद्वितीय है. इस समय के विभिन्न अभिलेख एवं साहित्यिक कृतियाँ इसकी पुष्टि के स्पष्ट परिचायक हैं. यहाँ तक कि बौद्ध एवं जैन ग्रन्थ भी पालि एवं प्राकृत के स्थान पर संस्कृत में सृजित हुए. गुप्त शासकों द्वारा अपने लेखों एवं मुद्राओं पर काव्यमयी एवं परिमार्जित संस्कृत का प्रयोग किया गया. समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति, वत्सभट्टी द्वारा विरचित मन्दसौर लेख तथा कालिदास की रचनाएँ संस्कृत भाषा के उन्नयन के उल्लेखनीय प्रतिमान हैं.
इस समय विभिन्न कवि एवं विद्वान्, नाटककार एवं दार्शनिक हुए जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में विभिन्न साहित्यिक कृतियों का सृजन किया. प्रयाग प्रशस्ति का रचनाकार हरिषेण स्वयं एक महत्वपूर्ण विद्वान् था जिसके द्वारा विरचित यह प्रशस्ति चम्पू शैली का विशिष्ट उदाहरण है. मन्दसौर लेख भाषा की सरसता एवं अलंकारों की छटा की दृष्टि से उल्लेखनीय है. तत्कालीन साहित्यिक क्षितिज के उल्लेखनीय नक्षत्र हैं— कालिदास, जिनकी रचनाएँ संस्कृत साहित्य की अमूल्य निधि हैं. उनके काव्य ग्रन्थ रघुवंश, कुमारसम्भवम्, मेघदूत तथा ऋतु संहार तथा नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोवर्शीयम् इसी युग व प्रतिनिधित्व करते हैं.
इन ग्रन्थों में अलंकार योजना, भावों की अभिव्यक्ति भाषा की प्रांजलता, शैली की सरसता और शब्द चयन में मधुरता सुस्पष्ट है.
विशाखदत्त द्वारा विरचित मुद्राराक्षस एवं देवी चन्द्रगुप्तम् भी इस युग के उल्लेखनीय साहित्यिक ग्रंथ हैं, जिनमें क्रमश. नन्द, चन्द्रगुप्त मौर्य तथा रामगुप्त, चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य सम्बन्धी कथानकों का साहित्यिक प्रस्तुतीकरण है. अतः इनका ऐतिहासिक महत्व भी है. शूद्रक द्वारा विरचित 'मृच्छकटिकम्’ राजकीय जीवन एवं प्रसंगों के स्थान पर जनसामान्य का प्रतिनिधित्व करता है. नायक चारुदत्त नामक दरिद्र ब्राह्मण एवं नायिका बसन्तसेना गणिका के साथ-साथ विभिन्न सामान्य पात्रों से उसके कथानक का ताना-बाना विनिर्मित है. नाटक में भाव एवं कर्म का सन्तुलन एवं करुणा व हास्य का सामंजस्य है.
अमरसिंह कृत अमरकोष संस्कृत का महत्वपूर्ण कोश है तो वात्स्यायन का कामसूत्र, काम-जीवन एवं शृंगार के विभिन्न पक्षों का वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत करता है. भट्टि का 'रावण वध', विष्णु शर्मा का 'पंचतंत्र' आदि भी गुप्तयुगीन साहित्यिक गौरव के प्रतीक हैं.
विधि के संशोधन एवं संकलन की दृष्टि से विरचित विभिन्न स्मृति ग्रन्थ नारद, बृहस्पति, कात्यायन, पराशर आदि की रचना भी इसी समय हुई. यदि रामायण और महाभारत को अन्तिम रूप इसी समय दिया गया तो मुख्य पुराणों का रचना काल भी यही समय है.
दार्शनिक ग्रन्थों में ईश्वरसिंह की 'सांख्य कारिका', प्रशस्तपाद का 'पदार्थ धर्म संग्रह', बसुबन्धु का 'अभिधम्म कोश', सिद्धसेन का 'न्यायावतार' आदि उल्लेखनीय कृतियाँ हैं तो वैज्ञानिक ग्रन्थों में आर्यभट्ट का 'आर्यभट्टीय', 'दशगीतिका सूत्र' व वराहमिहिर की 'पंच सिद्धान्तिका' महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं. इस प्रकार साहित्यिक विकास की दृष्टि से गुप्त युग स्वर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है.
> गुप्तकाल में व्यापार का स्वरूप
गुप्तकाल में व्यापार में काफी प्रगति हुई. श्रेष्ठी और सार्थों ने व्यापार की प्रगति में अहं भूमिका निभाई. आन्तरिक व्यापार की वस्तुओं में दैनिक उपयोग की वस्तुएँ सम्मिलित थीं जिन्हें ग्रामों एवं नगरों के बाजारों में बेचा जाता था. विलासिता की वस्तुएँ दूरस्थ स्थानों से लाई जाती थीं. व्यापार के लिए अनेक नियम निर्धारित किए गए थे. गुप्तकाल में कीमतें सदैव स्थिर नहीं रहती थीं उनमें स्थान-स्थान पर अन्तर होता था. तौल की माप भी विभिन्न स्थानों पर भिन्न थी. आन्तरिक और बाह्य दोनों ही प्रकार के व्यापार सड़क और जलमार्गों द्वारा होते थे. व्यापारियों के लिए समुद्री मार्ग सुरक्षित नहीं था. चीन से भारत तक का मध्य एशियाई भाग खतरों से भरा था. विदेशी व्यापार समुद्र द्वारा मुख्यतः श्रीलंका, फारस, अरब, इथोपिया, रोम, चीन आदि देशों को होता था. गुप्तकाल में चीन के साथ भारत के वाणिज्यिक सम्बन्धों में वृद्धि हुई. भारत में आयातित चीन के रेशम चीनांशुक कहा जाता था. गुप्तकाल में भारत-रोम व्यापार का पतन हुआ. इस कारण पश्चिम के साथ भारत के व्यापार में कमी आई, लेकिन बेजेंटाइन साम्राज्य के साथ व्यापारिक सम्बन्ध सुधरे. बेजेंटाइन साम्राज्य को भारत से निर्यात की जाने वाली प्रमुख वस्तुएँ रेशम और मसाले थे. बेजेंटाइन साम्राज्य में रेशम व्यापार इतना विस्तृत हो चुका था कि को जस्टीनियन को रेशम की कीमत विनियमित करने के लिए यह कानून बनाना पड़ा कि एक पाउण्ड रेशम की कीमत सोने की आठ मुद्राओं से अधिक नहीं होनी चाहिए.
भारत के साथ दक्षिण-पूर्वी एशिया के व्यापारिक सम्बन्ध बढ़े, जिसका वहाँ के जनजीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा. व्यापार के माध्यम से वहाँ भारतीय संस्कृति भी विकसित हुई.
> गुप्तकालीन कला
कला की दृष्टि से गुप्तकाल उन्नयन का प्रतीक है. इसके काल का वैभव एवं गौरव तत्कालीन कलाकृतियों एवं स्मारकों में स्पष्ट परिलक्षित है. गुप्तयुगीन, शिल्पियों की पैनी दृष्टि, सुविकसित सौन्दर्य भावना, परिमार्जित एवं प्रौढ़ परिकल्पना, विलक्षण रचना कौशल तथा हस्तकला ने महत्वपूर्ण कलाकृतियों का सृजन किया जिसके कई पक्ष इस समय दृष्टिगत होते हैं.
(1) वास्तुकला – कलात्मक विकास की जो अभिव्यक्ति मूर्ति एवं चित्रकला में दिखाई देती है वह वास्तुकला के क्षेत्र में ज्ञात नहीं है. दुर्भाग्यवश इस क्षेत्र में गुप्तकालीन उपलब्धियों के अवशेष अत्यल्प हैं फिर भी यह अपने आपमें इसलिए महत्वपूर्ण है कि पहली बार मन्दिर निर्माण की परम्परा का आरम्भ इसी समय हुआ. इस समय के मन्दिरों की योजना एक ऊँचे वर्गाकार चबूतरे (पीठिका) पर आधारित है, जिसमें देवगढ़ के दशावतार मन्दिर को छोड़कर सभी की छतें सपाट हैं. गर्भगृह में प्रतिमा स्थित है जिसके चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है, लेकिन सभा कक्ष का अभाव है. इस युग के मन्दिरों में देवगढ़ का दशावतार मन्दिर, तिगवा पार्वती मन्दिर तथा भीतरगाँव का ईंटों से निर्मित मन्दिर का विष्णु मन्दिर भूमरा का शिव मन्दिर, नचना कुठार का उल्लेखनीय हैं.
इस (2) मूर्तिकला – मूर्तिकला के विकास की दृष्टि से गुप्तकाल स्वर्ण युग का प्रतीक है. मथुरा, सारनाथ एवं पाटलिपुत्र मूर्तिकला के महत्वपूर्ण केन्द्र थे. कुषाण युगीन भौतिकता के नैतिकता स्पष्ट अभिव्यंजित है. कुषाणकालीन सादे प्रभास्थान पर इस समय की मूर्तियों में आध्यात्मिकता एवं मण्डल के स्थान पर अलंकृत प्रभामण्डल का प्रयोग भी उत्कीर्ण हैं, जिनका कुषाण युग में अभाव था. इस काल की समय की मूर्तियों में ज्ञातव्य है. साथ ही कुंचित केश भी मूर्तियों ने सारनाथ की पद्मासन में बैठी हुई बुद्ध मूर्ति, मथुरा से प्राप्त बुद्ध, विष्णु एवं महावीर की मूर्तियाँ तथा सुल्तानगंज से प्राप्त ताम्र निर्मित बुद्ध की मूर्ति विशेष उल्लेखनीय हैं. मूर्ति कला के अन्य प्रतीकों में उदयगिरि की पहाड़ी पर उत्कीर्ण विष्णु के बराह अवतार की मूर्ति, कौशाम्बी से प्राप्त सूर्य प्रतिमा, वाराणसी से प्राप्त गोवर्धनधारी कृष्ण की मूर्ति आदि भी महत्वपूर्ण हैं.
(3) चित्रकला – कलात्मक विकास का अन्य उल्लेखनीय पक्ष है— चित्रकला, जिसे विशेष सम्मान प्राप्त था. तत्कालीन ग्रन्थों में इसकी लोकप्रियता एवं महत्व के संकेत प्राप्त होते हैं. गुप्तकालीन चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अजन्ता की गुफाओं में भित्ति चित्रों के रूप में ज्ञात हैं. जिसमें मुख्यतः बुद्ध व बौधिसत्वों के चित्र, जातक कथाओं के वर्णनात्मक दृश्य तथा प्राकृतिक दृश्यों के साथ-साथ अप्सरा, गन्धर्व, यक्ष आदि के चित्र भी अभिचित्रित हैं.
अन्य चित्रकला का केन्द्र वाघ की गुफाएँ थीं जिसमें तत्कालीन वेशभूषा, केशविन्यास, शृंगार, अलंकार आदि लौकिक जीवन के विभिन्न पक्षों का चित्रण हुआ है.
संगीत के प्रति अभिरुचि भी इस समय सुस्पष्ट है. सिक्कों पर समुद्रगुप्त को वीणावादक के रूप में उत्कीर्ण किया गया है तो प्रयाग प्रशस्ति में हरिषेण ने उसे नारद एवं तुम्बरु से भी महान् संगीतकार बताया है.
इस प्रकार गुप्तकाल में कलात्मक विकास की प्रक्रिया कई पक्षों में स्पष्ट परिलक्षित है, जिनकी गुप्तकाल को स्वर्ण युग में प्रतिष्ठित करने में अहम् भूमिका है.
> गुप्तकाल में वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास
चतुर्थ सदी ईस्वी से सातवीं सदी ईस्वी तक भारत में विज्ञान की विभिन्न शाखाओं का विकास हुआ, जिनका उल्लेख तत्कालीन वैज्ञानिक ग्रन्थों में स्पष्टतः अभिव्यक्त है. मुख्यतः इस काल के प्रमुख गणितज्ञ ज्योतिष विद्या में भी निपुण थे और यही कारण है कि दोनों शाखाओं का समुचित विकास ज्ञात होता है. इस दृष्टि से आर्यभट्ट, भास्कर-I, वराहमिहिर एवं ब्रह्मगुप्त उल्लेखनीय हैं.
(1) आर्यभट्ट - आर्यभट्ट प्रसिद्ध गुप्तयुगीन गणितज्ञ था जिसके द्वारा. प्रतिपादित अवधारणाओं का बाद की शताब्दियों में अन्य गणितज्ञों ने लाभ उठाया. इनके उल्लेखनीय ग्रन्थों में आर्यभट्टीय (दस गीतिका सूत्र इसी का भाग है) तथा 'सूर्य सिद्धान्त'. यह आर्यभट्ट के प्रयत्नों का ही परिणाम था कि ज्योतिष को गणित से अलग शाखा के रूप में स्वीकार किया गया. उन्होंने दशमलव से सम्बन्धित सिद्धान्त को विकसित किया और ८ का मान (वृत्त का व्यास परिधि का अनुपात) निश्चित किया जो 2 या 3.142 स्वीकार्य है. इन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि “पृथ्वी गोल है तथा अपनी धुरी पर घूमने के कारण ग्रहण होता है."
(2) भास्कर-I—इन्होंने आर्यभट्ट के सिद्धान्तों पर टीकाएँ और स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना कर आर्यभट्ट द्वारा विहित अवधारणाओं को और अधिक पुष्ट किया. इनके उल्लेखनीय ग्रन्थ ‘महाभास्करीय, लघुभास्करीय एवं भास्य' हैं.
(3) वराहमिहिर—समय विवादास्पद होते हुए भी सामान्यतः इन्हें गुप्तयुगीन स्वीकार किया गया है. इन्होंने पंचसिद्धान्तिका, वृहत्जातक, लघुजातक, वृहत्संहिता जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की.
पंच सिद्धान्तिका के अनुसार ज्योतिष के 5 मुख्य सिद्धान्त विहित किए गए हैं— 'पैतामह', वाशिष्ट, सूर्य, पोलिस तथा रोमक.
वृहत् संहिता में ज्योतिष, वास्तु तथा तक्षण कला से सम्बन्धित विषयों का निरूपण हुआ है वराहमिहिर की ज्योतिष सम्बन्धी अवधारणाओं पर विदेशी प्रभाव होते हुए भी इनके द्वारा अभिव्यक्त सिद्धान्त गुप्तकालीन वैज्ञानिक परम्परा एवं विकास को पुष्ट करते हैं.
(4) ब्रह्मगुप्त - प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिष के ज्ञाता हुए हैं जिनकी उल्लेखनीय कृति है 'ब्रह्म सिद्धान्त' इनका महत्व ज्योतिषज्ञ के रूप में उतना नहीं है जितना ज्योतिष के इतिहासकार के रूप में..इन्होंने आर्यभट्ट, श्रीसेन, विष्णुचन्द्र, लात एवं प्रद्युम्न के सिद्धान्तों एवं प्रणालियों का उल्लेख करते हुए इनके प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाया है. मुख्यतः इस बात के लिए कि भारतीय ज्योतिष में विदेशी सिद्धान्तों को स्वीकार कर लिया गया.
(5) औषधि विज्ञान—औषधि विज्ञान का सैद्धान्तिक पक्ष बाग्भट्ट ने भी गुप्तकाल में सुविकसित दृष्टिगत होता है. (आष्टांग हृदय) आयुर्वेद से सम्बन्धित ग्रन्थ की रचना की. ऐसा जाना जाता है कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में आयुर्वेद का सुप्रसिद्ध चिकित्सक धनवन्तरि भी था जिसने विभिन्न रोगों के निदान से सम्बन्धित जानकारी प्रस्तुत की. 'नवनीतकम' नामक चिकित्साशास्त्र की रचना भी इसी समय की गई. पलकात्य नामक पशु चिकित्सक ने 'हस्त्यायुर्वेद' नामक नामक ग्रन्थ की रचना की जो हाथियों के रोगों और उनकी चिकित्सा से सम्बन्धित था, तो 'होली स्रोत’ द्वारा 'अश्वशाला' की रचना की गई.
भौतिक एवं रसायन विज्ञान का विकास भी इस समय सुविज्ञ है. वैशेषिक शाखा ने अणु सम्बन्धी सिद्धान्त का प्रतिपादन और प्रचार किया. बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन, रसायन एवं धातु विज्ञान का ज्ञाता था जिसने ये प्रमाणित किया कि सोना, चाँदी, ताँबा आदि खनिज पदार्थों के रासायनिक प्रयोग से रोगों का निवारण सम्भव है.
तकनीकि एवं विशेषीकृत ज्ञान मुख्यतः श्रेणियों के हाथों में था, जहाँ वंशानुगत व्यवसाय का प्रशिक्षण दिया जाता था. यद्यपि तकनीकि विकास के प्रतीकों के रूप में बहुत अधिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन फिर भी मेहरौली का लोह स्तम्भ, सुल्तानगंज से प्राप्त बुद्ध की ताम्र मूर्ति, स्वर्ण सिक्कों का बाहुल्य व उन पर उत्कीर्ण चित्रों, ताम्रपत्रों पर अंकित मोहरें इस युग धातु एवं तकनीकि ज्ञान के प्रमाण हैं.
> गुप्तकाल भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग के रूप में
गुप्तकाल भारतीय इतिहास में स्वर्ण युग के रूप में समाग्रत है. पारम्परिक भाषा में स्वर्ण युग से तात्पर्य ऐसे युग से है, जिसमें साहित्य, कला, धर्म, दर्शन का समुचित उ हो, राजनीतिक विशृंखलता के स्थान पर राष्ट्रीय एकीकरण की स्थापना तथा आर्थिक दृष्टि से समग्र देश में समृद्धि व्याप्त हो जनसामान्य निर्विघ्न अपना जीवनयापन कर सकें. यदि इस सन्दर्भ में गुप्त युग का मूल्यांकन करने का प्रयास करते हैं तो इसमें स्वर्णिम युग के कई तत्व परिलक्षित होते हैं. के
गुप्त शासकों ने कुषाण साम्राज्य के पतन के उपरान्त हुई रिक्तता एवं विखण्डन को समाप्त कर न केवल इसे एक विस्तृत रूप प्रदान किया, बल्कि शकों एवं हूणों जैसी विदेशी शक्तियों को पराजित कर राष्ट्रीयता की पुनः स्थापना की.
आर्थिक समृद्धि के भी पर्याप्त चिह्न गुप्तकाल में दिखाई देते हैं. देश के विभिन्न भागों से प्राप्त गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्के, सुविकसित नगरों का अस्तित्व, गुप्त अभिलेखों में की गई श्रेणियों की चर्चा विभिन्न कलाकृतियों का निर्माण साहित्यकारों को प्रश्रय एवं विपुल साहित्य का सृजन देश की आर्थिक सम्पन्नता के द्योतक हैं. संस्कृत भाषा एवं साहित्य के विकास की दृष्टि से गुप्त युग स्वर्ण युग का प्रतीक है. इस समय कालिदास, विशाखदत्त, शूद्रक, अमर सिंह, विष्णु शर्मा, आदि अनेक विद्वान् एवं साहित्यकार हुए, जिन्होंने विभिन्न साहित्यिक कृतियों का सृजन कर इसके विकास में उल्लेखनीय योगदान प्रदान किया. कालिदास की रचनाएँ आज भी विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं. आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, नागार्जुन आदि ने गणित, ज्योतिष, धातु विज्ञान, जैसी विज्ञान सम्बन्धी विभिन्न शाखाओं के विकास में अपना योगदान किया.
कला के क्षेत्र में यदि प्रथम बार मन्दिर निर्माण की परम्परा दृष्टिगत होती है, तो मूर्तिकला एवं चित्रकला उत्कृष्ट रूप में विकसित हुई. जहाँ मूर्तिकला भारतीयकरण एवं भावों के प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से उल्लेखनीय है, तो चित्रकला रेखिक निरूपण एवं रंगों के सुन्दर समन्वय के लिए सुविज्ञ है.
धार्मिक क्षेत्र में ब्राह्मण धर्म एवं परम्परा तथा उससे सम्बन्धित वैष्णव, शैव व पौराणिक धर्मों का उत्थान दिखाई देता है, तो बौद्ध एवं जैन धर्मों का अस्तित्व ज्ञात है. मुख्य बात यह है कि विभिन्न धर्मों में सहिष्णुता एवं सद्भाव के साथ-साथ शासकों की उदार नीति भी इस समय के धार्मिक जीवन का उल्लेखनीय पक्ष थी. इस प्रकार गुप्तकालीन जीवन के विभिन्न पक्षों में सम्यक् अनुशीलन के सन्दर्भ में यह स्वर्ण युग प्रतीत होता है.
लेकिन कुछ ऐसे संकेत भी मिलते हैं जो इसकी स्वर्णिमता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं. सामंतवाद और दास प्रथा का आरम्भ, विष्टि की परम्परा, स्त्रियों की स्थिति में गिरावट, सती, बाल विवाह और पर्दा प्रथा का प्रचलन, जातिगत, विषमता, फाह्यान द्वारा चाण्डालों की दयनीय स्थिति का उल्लेख इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है, तो साहित्यिक कवियों और कलात्मक प्रतीक उच्च वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए दिखाई देते हैं. फिर भी समग्र परिप्रेक्ष्य एवं अन्य साम्राज्यों के साथ तुलनात्मक विवेचन के संदर्भ में गुप्त युग को स्वर्ण युग के रूप में स्वीकारना समीचीन होगा.
> समुद्रगुप्त का दक्षिण अभियान
उत्तर भारत पर आधिपत्य स्थापित करने के बाद उसने समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत पर विजय की योजना बनाई. समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत के 12 राजाओं को विजित किया और उन्हें बन्दी बनाया. बाद में उन्हें स्वतन्त्र कर उनकी सत्ता उन्हें वापस सौंप दी. दक्षिण भारत के जिन शासकों को समुद्रगुप्त ने अपने अधीनस्थ किया वे प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार निम्नलिखित थे-
(1) कौशल का महेन्द्र – इसका राज्य बिलासपुर, रायपुर और संबलपुर क्षेत्र में विस्तृत था.
(2) महाकान्तार का व्याघ्रराज–महाकान्तार राज्य वर्तमान गोंडवाना क्षेत्र में अवस्थित था.
(3) कुराल का मंटराज – कुराल राज्य सोनपुर क्षेत्र में
महानदी के समीपवर्ती क्षेत्र में अवस्थि था.
(4) पिष्टपुरा का महेन्द्र - पिष्टपुरा आधुनिक पीतमपुरा था.
(5) कोटूटूर का स्वामीदत्त — कोट्र्र राज्य वर्तमान गंजम जिले में अवस्थित था.
(6) एरण्डपल्ल का दमन—यह भी गंजम जिले में था.
(7) काँची का विष्णुगोप–आधुनिक काँजीवरम ही काँची था.
(8) अवमुक्त का नीलराज.
(9) वेंगी का हस्तिवर्मन.
(10) पालक्क का उग्रसेन – पलक्क आधुनिक नेल्लार था.
(11) देवर राष्ट्र का कुबेर.
(12) कुस्थलपुरा का धनञ्जय.
> विज्ञान और प्रौद्योगिकी
(1) ब्रह्मगुप्त – यह गुप्तकालीन रेखागणितज्ञ था, जिन्होंने 'ब्रह्मस्फूट सिद्धान्त' तथा 'खण्डखाद्यम' नामक ग्रन्थ की रचना की. इन्हें गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त का जनक माना जाता है. इन्होंने न्यूटन से शदियों पहले बता दिया था कि प्रकृति के नियमानुसार सारी वस्तुएँ पृथ्वी पर गिरती हैं.
(2) वराहमिहिर – इनके 6 ग्रन्थ उल्लेखनीय हैं— पंचसिद्धान्तिका, विवाह पटल, योगमाया, वृहत्संहिता, वृहत्जातक और लघुजातक हैं. पंच सिद्धान्तिका में ज्योतिष के पाँच प्राचीन सिद्धान्तों को बताया गया है (पैतामह, रोमक, पौलिस, वाशिष्ट, सूर्य). वराहमिहिर ने यूनानी व भारतीय ज्योतिषशास्त्र का समन्वय करके 'रोमक' व 'पौलिस' नाम से नए सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया. वराहमिहिर के पुत्र प्रथुयशा ने फलित ज्योतिष पर 'षटपच्चशिका' ग्रन्थ की रचना की.
रोमक सिद्धान्त के जनक- लातदेव हैं.
(3) सुश्रुत – ये प्रसिद्ध चिकित्सक थे तथा इन्होंने 'सुश्रुत संहिता' नामक ग्रन्थ लिखा. इसने शल्य क्रिया में काम आने वाले बहुत से यन्त्रों का उल्लेख किया है, जो इस्पात से बने हुए थे. पट्टियों के बाँधने का विवरण भी इन्होंने दिया है. ये प्लास्टिक सर्जरी के आविष्कारक थे. मोतिया बिन्द व नेत्र के रोगों को शल्य क्रिया द्वारा ठीक करने ने का विवरण भी दिया है.
(4) नागार्जुन – प्रसिद्ध रसायनशास्त्री तथा धातु विज्ञान वेत्ता था. इन्होंने लौहशास्त्र, रूप रत्नाकर, कक्षपुट, आरोग्य मंजरी, योगसार, रसेन्द्र मंगल ग्रन्थों की रचना की. नागार्जुन ने रस चिकित्सा का आविष्कार किया तथा यह अवधारणा प्रदान की कि सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा आदि धातुओं में भी रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है. पारे की खोज उसका महत्त्वपूर्ण आविष्कार था.
> बाघ की चित्रकला
मध्य प्रदेश के बाघ की गुफाओं के भित्तिचित्र गुप्तकालीन कला के महत्त्वपूर्ण प्रतीक हैं. जहाँ अजन्ता के चित्र मुख्यतः धार्मिक विषयों से अभिप्रेरित हैं, वही बाघ के चित्रों में मानव के लौकिक जीवन का चित्रांकन दृष्टव्य है.
तत्कालीन वेशभूषा, केश विन्यास, शृंगार, अलंकार आदि की अभिव्यक्ति यहाँ के चित्रों में दृष्टव्य है, जिनका ऐतिहासिक महत्त्व भी है. उल्लेखनीय है कि बाघ के चित्रों का संयोजन एक ही समय हुआ है जिनमें प्रसिद्ध चित्र संगीत एवं नृत्य का एक दृश्य है.
> देवगढ़ का दशावतार मन्दिर
उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले में देवगढ़ का दशावतार मन्दिर गुप्तयुगीन वास्तुकला का महत्वपूर्ण प्रतीक है. इस मन्दिर में स्थापत्य का महत्वपूर्ण तथ्य है यह कि इसमें 12 मीटर ऊँचा शिखर है जिसे भारतीय मन्दिर निर्माण परम्परा में शिखर का प्रथम उदाहरण माना गया है. जहाँ अन्य मन्दिरों में केवल एक मण्डप होता था वहीं इसमें 4 मण्डप हैं जो गर्भगृह की चारों दिशाओं में स्थित हैं. मूर्ति प्रकोष्ठ की दीवारों के स्तम्भ विभिन्न मूर्तियों से अलंकृत हैं जो पौराणिक कथाओं का संकेत देती हैं. यहाँ प्राप्त मूर्तियों में विष्णु, राजेन्द्र मोक्ष, रामावतार, कृष्णावतार आदि उल्लेखनीय हैं.
> शूद्रक का मृच्छकटिकम्
शूद्रक द्वारा रचित मृच्छकटिकम् नाटक जिसका अर्थ है— मिट्टी की गाड़ी या खिलौना, गुप्तयुगीन अन्य कृतियों की तुलना में यह विशिष्ट इस रूप में है कि उसमें राजकीय जीवन एवं धार्मिक कथा प्रसंगों की अपेक्षा जनसामान्य को प्रतिध्वनित किया है. इसका नायक चारुदत्त एक दरिद्र ब्राह्मण सार्थवाह है तथा नायिका गणिका बसन्तसेना विभिन्न पात्रों द्वारा अभिव्यक्त प्रादेशिक विभिन्नताएँ स्पष्ट परिलक्षित हैं, जो यथार्थ जीवन पर आधारित प्रतीत होती हैं. नाटक में भाव और कर्म का सन्तुलन तथा करुणा और हास्य का सुन्दर सामंजस्य है.
> गुप्तकालीन प्रमुख मूर्तियाँ
> सारनाथ की बुद्ध मूर्ति
इसमें महात्मा बुद्ध पद्मासन में बैठे हैं और दोनों हाथ धर्म चक्र प्रवर्तन की मुद्रा में हैं. उनके शीर्ष के चारों ओर अलंकृत प्रभामण्डल है तथा शीश पर कुंचित केश दृष्टव्य हैं. महात्मा बुद्ध के मुख पर आध्यात्मिक शान्ति विराजमान है.
> मथुरा की बुद्ध मूर्ति
इसमें बुद्ध खड़े हुए दिखाए गए हैं और हाथ अभय मुद्रा में हैं मूर्ति के वस्त्र पारदर्शक हैं तथा इनमें आवर्तन हैं. मुखमुद्रा पर आध्यात्मिकता, करुणा एवं शान्ति के भाव हैं तथा शीश के चारों ओर अलंकृत प्रभामण्डल है.
> सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति
यह ताम्र निर्मित है. बुद्ध खड़े हुए दिखाए हैं. ऊँचाई 7½ फीट तथा वज़न एक टन है. शीश पर कुंचित केशवस्तु व प्रभामण्डल का अभाव है.
> मथुरा की विष्णु मूर्ति
इसमें भगवान् विष्णु रत्न जटित मुकुट धारण किए हुए हैं तथा कानों में आभूषण, शारीरिक अंगों में अनुपात, मुख पर करुणा और आध्यात्मिक शान्ति है.
> देवगढ़ के दशावतार मन्दिर की मूर्तियाँ
इस मन्दिर में अनेक सुन्दर मूर्तियाँ विद्यमान हैं जिनमें शेष शय्या पर विराजमान 'विष्णु की मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है. इनकी नाभि से कमल निकला है जिस पर ब्रह्मा विराजमान हैं और आकाश में शिव-पार्वती विष्णु के दर्शन कर रहे हैं.
> वराह की मूर्ति
गुप्तकालीन मूर्तियों में उदयगिरि पहाड़ी पर उत्कीर्ण विष्णु की वराह अवतार मूर्ति के रूप में बड़ा ही सजीव बन पड़ा है, जिसमें पृथ्वी को पाताल से उठाते हुए दिखाया गया है.
> गुप्तकालीन प्रमुख मन्दिर
1. देवगढ़ का दशावतार मन्दिर.
2. भूमरा का शिव मन्दिर.
3. नचना कुठार का पार्वती मन्दिर.
4. भीतरगाँव का विष्णु मन्दिर (ईंटों से निर्मित).
5. तिगवा का विष्णु मन्दिर.
> जैन मूर्तियों
जैन मूर्तियों में मथुरा से प्राप्त महावीर की मूर्ति विशेष उल्लेखनीय है जिसमें वे पद्मासन में ध्यानमग्न मुद्रा में बैठे हैं.
> वाकाटक गुप्त सम्बन्ध
वाकाटक वंश एवं गुप्तवंश दोनों का उदय दक्षिण भारत व उत्तर भारत में लगभग एक ही समय हुआ. दोनों राजवंश अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वप्रमुख थे. ये दोनों ही राज्य अति मह्मत्वाकांक्षी एवं विस्तारवादी थे. अतः यह स्वाभाविक ही था क्रि दोनों राज्य एक-दूसरे की पूर्णतया उपेक्षा नहीं कर सकते थे. अलग-अलग नरेशों के समय दोनों वंशों में अलगअलग सम्बन्ध रहे, जिनका विवेचन निम्नलिखित है—
(1) प्रवरसेन प्रथम एवं चन्द्रगुप्त प्रथम [275 ई.-335 ई., 319-350 ईः]–प्रवरसेन एवं चन्द्रगुप्त दोनों ही अपने वंश के शक्तिशाली नरेश थे प्रवरसेन ने प्रसिद्ध नागवंशी नरेश भवनाग की पुत्री से अपने पुत्र का विवाह कर अपने को सम्राट घोषित कर दिया तथा चन्द्रगुप्त ने लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह कर उसके राज्य को अपने राज्य में मिलाने के बाद महाराजाधिराज घोषित कर दिया. इन दोनों शासकों के मध्य उस समय कैसे सम्बन्ध रहे पूर्णतया विवाद का विषय है. अतः स्पष्ट रूप से इस विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता.
(2) रुद्रसेन प्रथम [335-360 ई.] व समुद्रगुप्त [350375 ई.]–रुद्रसेन व समुद्रगुप्त के समय में वाकाटकों एवं गुप्तों के मध्य शत्रुता स्थापित हो गई थी, क्योंकि समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त के 9 राजाओं को पराजित किया था जिसमें से अधिकांश नागवंशी शासक थे और नाग वाकाटकों के मित्र थे. डॉ. के. पी. जायसवाल समुद्रगुप्त को उसकी व्याघ्र हनन मुद्रा जिसमें उसकी उपाधि 'राजा' है, के आधार पर उसे वाकाटकों के अधीन सामन्त मानते हैं, परन्तु विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर इस मत को अमान्य घोषित कर दिया गया है.
(3) पृथ्वीसेन प्रथम, समुद्रगुप्त एवं चन्द्रगुप्त द्वितीयपृथ्वीसेन (360–385 ई.) समुद्रगुप्त एवं चन्द्रगुप्त-II दोनों के समकालीन था. समुद्रगुप्त ने अपने दक्षिण अभियान में कौशल, महाकान्ता, कुराल आदि राज्यों को जीत लिया. ये पहले वाकाटकों के अधीन थे, परन्तु अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि ये राज्य प्रवरसेन प्रथम की मृत्यु के बाद स्वतन्त्र हो गए थे. अतः उसके इस अभियान का दोनों वंशों के ऊपर कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा.
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने पश्चिम के शकों का नाश करने के उद्देश्य से वाकाटकों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए उनसे मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने के प्रयास किए. इस प्रभावती गुप्ता का विवाह कर दिया. विवाह के कुछ समय हेतु उसने पृथ्वीसेन के पुत्र रुद्रसेन के साथ अपनी पुत्री बाद रुद्रसेन की मृत्यु हो जाने तथा उसके पुत्रों की अवयस्कता के कारण प्रभावतीं गुप्ता ने वाकाटक वंश की बागडोर सँभाली. उसका यह काल 390-410 ई. तक चला और इसी काल में चन्द्रगुप्त II ने गुजरात व काठियावाड़ के शकों का उन्मूलन कर दिया. इस कार्य में वाकाटकों द्वारा गुप्तों को प्रत्यक्ष सहयोग दिया गया.
(4) प्रवरसेन द्वितीय - प्रवरसेन द्वितीय ने 410-440 ई. तक शासन किया तथा इस काल में उसके 13 दानपात्र प्राप्त होते हैं, जिसमें उसने अपने नाना चन्द्रगुप्त द्वितीय का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया है. इन दानपात्रों के अनुसार उसका महाराष्ट्र पर नियन्त्रण था, जोकि पहले गुप्तों के अधीन था. अतः उनके मध्य मनमुटाव पैदा हो गया. 430 ई. के लगभग प्रवरसेन ने अपने पुत्र नरेन्द्रसेन का विवाह काकुत्स वर्मा ( कदम्ब वंश) की पुत्री अजितभट्टारिका से कर दिया. इसी की एक पुत्री का विवाह गुप्त वंश में भी हुआ था. अतः दोनों के मध्य का वैमनस्य समाप्त हो गया.
(5) नरेन्द्र सेन (440460 ई.) – यह गुप्त शासक कुमारगुप्त एवं स्कन्दगुप्त के समकालीन था. इसकी महात्वाकांक्षा के कारण दोनों वंशों के सम्बन्ध बिगड़ गए तथा नरेन्द्रसेन ने नलवंशी शासक को हराकर उसके राज्य को अपने राज्य में मिला लिया. गुप्तों पर इस समय पुष्यमित्रों के आक्रमण हो रहे थे. अतः ऐसी स्थिति में नरेन्द्रसेन ने मालवा, मेकल तथा कौशल के प्रदेश गुप्तों से छीन लिए, लेकिन स्कन्दगुप्त ने उन्हें पुनः गुप्त साम्राज्य में मिला लिया. उससे दोनों के मध्य सम्बन्धों में और अधिक कटुता आ गई.
(6) पृथ्वीसेन ( 460–480 ई.) – यह नरेन्द्रसेन का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था. इसने गुप्तों की कमजोरी का लाभ उठाकर मालवा एवं दक्षिणी कौशल छीन लिया और इसके बाद वाकाटकों का पतन हो गया तथा धीरे-धीरे गुप्त वंश अपनी आन्तरिक कमजोरियों के चलते पतन के मार्ग पर अग्रसर हो गया.
हमसे जुड़ें, हमें फॉलो करे ..