अंग्रेजी काल में शिक्षा का विकास

अंग्रेजी काल में शिक्षा का विकास

अंग्रेजी काल में शिक्षा का विकास

> भारत में अंग्रेजी शासनकाल में प्रारम्भ से लेकर 1854 ई. तक हुए शिक्षा के विकास को समझाइए.
ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा प्रारम्भ में शिक्षा के प्रयास में कोई रुचि नहीं ली गई. इस समय में नीति शिक्षण संस्थाएँ ही अधिक थीं, जोकि अनुदानों के माध्यम से चलती थी. इनमें पण्डित एवं मौलवी ही अध्यापक थे और परम्परागत धार्मिक एवं व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करते थे.
इस समय में कुछ अंग्रेज मिशनरियाँ एवं विवेकशील तथा उदार अंग्रेज अधिकारियों ने भी शिक्षा के प्रसार में लिए स्कूल खोले. वारेन हेस्टिंग्स ने सर्वप्रथम 'कलकत्ता मदरसा' 1781 ई. में खोला, जिसमें अरबी एवं फारसी भाषा में शिक्षा की व्यवस्था थी. बाद में उसी के सहयोग से 1785 ई. में विलियम जोन्स ने प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए 'एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल' की स्थापना की. इस समय 1791 ई. में बनारस में हिन्दू कानून एवं दर्शन के अध्ययन के लिए संस्कृत कॉलेज की स्थापना यहाँ के रेजिडेण्ट जोनाथन डंकन ने की और इसी तरह लॉर्ड वेलेजली ने 1800 ई. में कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की.
अंग्रेजी मिशनरियों; जैसे— कैरी, टाम्स, मार्समैन और वार्ड आदि ने कलकत्ता के निकट श्रीरामपुर में अंग्रेजी भाषा एवं शिक्षा के प्रचार का कार्य प्रारम्भ किया. 26 देशी भाषाओं में बाइबिल का अनुवाद किया गया. 1820 ई. में डेविड हेयर ने कलकत्ता में विशप कॉलेज की स्थापना की.
अंग्रेजों के समान ही कुछ उत्साही भारतीयों; जैसे— राजा राममोहन राय, राजा राधाकान्त देव, महाराजा तेजस चन्द्र रायबहादुर, जयनारायण घोषाल आदि ने भी शिक्षा की प्रगति के प्रयास किए. राजा राममोहन राय, डेविड हेयर और सर हाइड इस्ट ने मिलकर कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज खोला, जो आगे चलकर प्रेसीडेन्सी कॉलेज बन गया.
> कम्पनी द्वारा शिक्षा के लिए किए गए प्रयास
व्यक्तिगत तथा संस्थाओं के द्वारा शिक्षा-प्रसार का प्रयास किए जाने से अंग्रेज अधिकारी भी शिक्षा के महत्व को समझने लगे तथा उन्हें अब अंग्रेज समर्थक एक पढ़े-लिखे वर्ग की आवश्यकता अनुभव होने लगी. अतः इंगलैण्ड में ग्राण्ट और विलवर फोर्स ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार पर बल दिया और 1811 ई. में लॉर्ड मिण्टो, लैंसडाउन तथा हैवेड आदि ने मिलकर भारतीय शिक्षा की बुरी दशा पर एक घोषणा पत्र निकाला तथा शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए उपाय सुझाए, जिसके कारण 1813 ई. के एक्ट में शिक्षा पर व्यय के लिए एक लाख रुपए निर्धारित किए गए. 
1813 ई. के एक्ट से कम्पनी को मिले शिक्षा के विकास के लिए एक लाख रुपयों को साहित्य के पुनरुद्धार और उन्नति के लिए और भारत के स्थानीय विद्वानों को प्रोत्साहन देने के लिए, अंग्रेजी प्रदेशों में विज्ञान के आरम्भ और उन्नति के लिए खर्च किया जाना था. इस राशि के खर्च करने से पूर्व ही भाषा के माध्यम को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया. पाश्चात्य शिक्षा के समर्थक शिक्षा प्रदान करने का माध्यम 'अँग्रेजी' रखना चाहते थे, जबकि अन्य विद्वान् प्राचीन भाषा एवं साहित्य को ही विकसित करना चाहते थे. अतः लॉर्ड मैकाले को विलियम बैंटिक के समय में इस पर सुझाव देने के लिए नियुक्त किया गया.
लॉर्ड मैकाले अंग्रेजी भाषा एवं शिक्षा का कट्टर समर्थक था. उसके अनुसार, “यूरोप के एक अच्छे पुस्तकालय की अलमारी का एक शैल्फ समस्त भारतीय और अरब के साहित्य से अधिक मूल्यवान हैं.” अतः उसने एक ऐसे वर्ग के बनाने पर बल दिया कि जो रक्त और रंग की दृष्टि से भारतीय हों, परन्तु रुचि, विचार, आचरण आदि से अंग्रेज हों और इस उद्देश्य की पूर्ति केवल अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से ही हो सकती थी. वह जनसाधारण को शिक्षित करने के पक्ष में नहीं था. वह निस्पन्दन के सिद्धान्त (Theory of Filtration) में विश्वास करता था, जिसमें शिक्षा उच्च वर्ग से छन-छन करके निम्न वर्ग में पहुँचेगी. उसने अपनी यह रिपोर्ट 2 फरवरी, 1835 को गवर्नर जनरल विलियम बैंटिंक को सौंपी तथा इसे 7 मार्च, 1835 ई. को स्वीकार कर लिया गया.
इसके अनुसार, कम्पनी सरकार के भारत में यूरोपीय साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के प्रसार के लिए अंग्रेजी भाषा को माध्यम बनाया और स्कूलों और कॉलेजों में अंग्रेजी भाषा में शिक्षा दी जाने लगी और 1844 ई. में यह घोषणा कर दी गई कि, सरकारी नौकरी अंग्रेजी जानने वाले लोगों को ही दी जाएगी. इससे अंग्रेजी भाषा का तेजी से प्रसार होने लगा.
> 1854 ई. के शिक्षा के विकास के लिए वुड डिस्पैच पर टिप्पणी
1854 ई. में चार्ल्स वुड ने भारत में शिक्षा के लिए एक वृहत् योजना प्रस्तुत की, जिसे 'वुड डिस्पैच' या 'भारतीय शिक्षा का मैग्नाकार्टा' कहा जाता है. इसमें निम्नलिखित सुझाव दिए गए थे – 
1. कम्पनी सरकार शिक्षा, साहित्य, कला, दर्शन एवं विज्ञान का प्रसार करे.
2. ग्रामों में देशी भाषा का विकास हो, इसके लिए प्राथमिक विद्यालय और उनके ऊपर एंग्लो बर्नाक्यूलर हाईस्कूल और कॉलेज खोले जाएँ.
3. अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए अध्यापक प्रशिक्षण संस्थाएँ खोली जाएँ.
4. उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो, परन्तु देशी भाषाओं को भी प्रोत्साहन दिया जाए.
5. व्यावसायिक एवं प्राविधिक शिक्षा पर बल दिया जाए.
6. नीति शैक्षणिक संस्थाओं को बिना किसी भेदभाव के अनुदान प्रदान किए जाएँ.
7. तीनों प्रेसीडेंसी नगरों में लन्दन के समान विश्वविद्यालय स्थापित किए जाएँ.
8. शिक्षा के प्रशासन के लिए एक अलग से विभाग की स्थापना की जाए.
कम्पनी की सरकार ने 'वुड डिस्पैच' के सुझावों को अमल में लाने का प्रयास किया तथा उसने प्रान्तों में शिक्षा निदेशक एवं इनकी सहायता के लिए इंस्पेक्टर नियुक्त किए तथा इन्हें लोक-शिक्षा विभाग के अधीन रखा गया. कलकत्ता, बम्बई तथा मद्रास में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई. प्राथमिक विद्यालय, हाईस्कूल तथा कॉलेजों की संख्या में वृद्धि की गई तथा नीति-शिक्षण संस्थाओं को अनुदान भी दिया गया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में शिक्षा के प्रसार में वुड डिस्पैच का अत्यधिक महत्त्व है तथा इसी के सुझावों से भारत में वास्तविक अर्थों में आधुनिक शिक्षा की शुरूआत हुई.
> हण्टर आयोग ( The Hunter Comission ) पर टिप्पणी लिखिए.
गवर्नर जनरल एवं वायसराय लॉर्ड रिपन ने 1882 ई. में डब्ल्यू डब्ल्यू. हण्टर की अध्यक्षता में एक कमीशन नियुक्त किया, जिसका उद्देश्य 1854 ई. के बाद शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति का मूल्यांकन करना था. इस 20 सदस्यीय आयोग में 8 भारतीय सदस्य थे. इस आयोग ने निम्नलिखित सुझाव शिक्षा के क्षेत्र के लिए सरकार को दिए –
1. सरकार को धीरे-धीरे उच्च शिक्षा के संचालन के क्षेत्र से हट जाना चाहिए तथा कॉलेजों के संचालन के लिए सरकार को वित्तीय सहायता देनी चाहिए.
2. कॉलेजों में अनेक ऐच्छिक पाठ्यक्रमों का समावेश करना चाहिए.
3. सभी स्तर की शिक्षा पर नैतिक शिक्षा को अनिवार्य कर देना चाहिए.
4. छात्रों से ली जाने वाली फीस तथा छात्रवृत्ति सम्बन्धी नियम बना देने चाहिए.
5. फर्नीचर तथा पुस्तकालय की व्यवस्था स्कूलों में की जानी चाहिए.
6. सरकार को प्राथमिक शिक्षा के सुधार एवं विकास पर विशेष ध्यान देकर उसे स्थानीय भाषा और उपयोगी विषयों में पढ़ाने की व्यवस्था करनी चाहिए.
7. निजी क्षेत्र को शिक्षा के विकास के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.
8. महिला शिक्षा के विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए.
हण्टर कमीशन द्वारा सुझाए गए इन प्रस्तावों से 20वीं सदी के प्रारम्भ में शिक्षा की पर्याप्त दिशा में प्रगति हुई तथा पहले की अपेक्षा उच्च शिक्षा ग्रहण करने वालों की संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई. व्यावसायिक एवं प्राविधिक शिक्षा के क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई, लेकिन प्राथमिक शिक्षा में कोई विशेष बढ़ोत्तरी नहीं हुई.
> बुनियादी या बेसिक शिक्षा योजना : टिप्पणी
महात्मा गांधी ने अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था से असन्तुष्ट होकर जिस शिक्षा योजना का प्रारूप राष्ट्र के समक्ष 1937 ई. में प्रस्तुत किया, उसे 'बुनियादी शिक्षा योजना' के नाम से जाना जाता है. इसमें निम्नलिखित तथ्यों का समावेश किया गया था—
1. 7 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए.
2. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा ही होना चाहिए, जिससे विद्याथी स्वावलम्बी बन सकें.
3. विद्यार्थियों की रुचि के अनुसार, व्यावसायिक शिक्षा दी जानी चाहिए.
गांधीजी की यह योजना वास्तव में बहुत ही उपयोगी थी, परन्तु इसी समय द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ हो जाने के कारण इसे अमल में नहीं लाया जा सका.
> शिक्षा की सार्जेण्ट योजना : टिप्पणी
1944 ई. में सरकार के शिक्षा सलाहकार सर जॉन सार्जेण्ट ने भारत में शिक्षा के विकास के लिए जो योजना प्रस्तुत की, उसे 'शिक्षा की सार्जेण्ट योजना' के नाम से जाना जाता है, इसमें निम्नलिखित सुझाव दिए गए -
1. प्राथमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय स्थापित किए जाएँ.
2. 6 से 11 वर्ष के बालकों के लिए अनिवार्य, निःशुल्क और व्यापक शिक्षा प्रदान की जाए.
3. इण्टरमीडिएट कक्षाओं तक की पढ़ाई हाईस्कूलों में हो और स्नातक स्तर पर तीन वर्षों का पाठ्यक्रम हो.
4. कॉलेजों में प्रवेश-सम्बन्धी नियम निर्धारित किए जाएँ और राष्ट्रीय नवयुवक मण्डल की योजना प्रारम्भ की जाए.
अंग्रेज सरकार इस योजना को क्रियान्वित नहीं कर सकी, क्योंकि इसके पूर्व ही भारत स्वतन्त्र हो गया तथा उसके बाद भारत सरकार ने नवम्बर 1948 ई. में देश में शिक्षा के विकास के लिए राधाकृष्णन आयोग का गठन किया गया.
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