विस्तार एवं संगठन–विजयनगर एवं बहमनी साम्राज्य

विस्तार एवं संगठन–विजयनगर एवं बहमनी साम्राज्य

विस्तार एवं संगठन–विजयनगर एवं बहमनी साम्राज्य

> दक्षिण भारत के राज्य
उत्तरी भारत के समान ही दक्षिण भारत में भी इस समय स्थिति सन्तोषजनक नहीं थी. इस समय दक्षिण भारत में दो प्रमुख राज्य थे—–(i) विजयनगर व (ii) बहमनी राज्य. इन दोनों के शासक एक-दूसरे के घोर शत्रु थे तथा आपसी युद्धों में वे अपनी शक्ति व्यय कर रहे थे.
विजयनगर राज्य हिन्दू राज्य था और सुदूर दक्षिण में स्थित था. बाबर के आक्रमण के समय यहाँ का शासक कृष्णदेव राय था. बाबर के अनुसार, यह दक्षिण भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था.
बहमनी राज्य अपना प्रारम्भिक वैभव खोकर 5 विभिन्न स्वतन्त्र राज्यों में विभक्त हो गया था तथा इन राज्यों के शासक आपस में सदैव संघर्षरत रहा करते थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि, 1526 ई. के लगभग भारत की राजनीतिक स्थिति बहुत ही सोचनीय थी. ऐसी स्थिति में एक दृढ़ निश्चयी और बलशाली व्यक्ति के लिए भारत को विजित करना कोई कठिन कार्य नहीं था.
> विजयनगर साम्राज्य
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल के दौरान हुई. उसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक मत प्रचलित हैं और वर्तमान में भी विवाद बना हुआ है, परन्तु डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव के अनुसार, संगम के पाँच पुत्रों में से दो हरिहर और बुक्का ने 1336 ई. में इस साम्राज्य की स्थापना की थी, जो प्रारम्भ में होयसल शासक वीर बल्लाल तृतीय के सामन्त के रूप में कार्यरत् थे और उन्होंने दिल्ली सल्तनत के दक्षिण में विस्तार का विरोध किया था.
वीर बल्लाल तृतीय ने तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर अनुगुन्दी नगर की स्थापना की थी, जो आगे चलकर विजय नगर बना और नवस्थापित साम्राज्य का केन्द्र बिन्दु भी.
1346 ई. में बल्लाल के उत्तराधिकारी विरुपाक्ष की मृत्यु हो जाने पर होयसल राज्य की सत्ता हरिहर एवं बुक्का के हाथों में केन्द्रित हो गई और इन्होंने अनुगुन्दी नगर (विजयनगर) को अपनी राजधानी बनाया. हरिहर व बुक्का को साम्राज्य की स्थापना के लिए प्रसिद्ध सन्त एवं विद्वान् माधव विद्यारण्य ने तथा उनके अनुज व वेदों के प्रसिद्ध टीकाकार सायणाचार्य द्वारा प्रेरणा दी गई थी. इस विजयनगर राज्य पर संगम, सलुव, तुलुव एवं आरविंदु नामक चार या जिसमें तुलुव वंश में इस साम्राज्य राजवंशों ने शासन किया का सर्वाधिक का सर्वाधिक प्रतापी राजा कृष्णदेव राय हुआ था.
> संगम वंश का इतिहास (1336 से 1485 ई.)  
संगम वंश में निम्नलिखित महत्वपूर्ण शासक हुए - 
(1) हरिहर प्रथम – यह विजयनगर राज्य का संस्थापक व संगम का पुत्र था. इसने 1336 ई. से 1356 ई. तक शासन किया.
(2) बुक्का (1356-1377 ई.) – हरिहर प्रथम के उत्तराधिकारी के रूप में उसका भाई विजयनगर सिंहासन पर बैठा. इसने 'वेद मार्ग प्रतिष्ठापक' की उपाधि ग्रहण की.
(3) हरिहर द्वितीय (1377-1404 ई.) – इसने महाराज की उपाधि ग्रहण की तथा कनारा, मैसूर, त्रिचनापल्ली, काँञ्ची आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की.
(4) देवराय प्रथम (1406-1422 ई.) – इसने तुंगभद्रा नदी पर बाँध बनाकर सिंचाई के लिए नहरें निकालीं एवं बहमनी सुल्तान फिरोजशाह के आक्रमण और आन्तरिक विद्रोहों का भी सामना करना पड़ा.
> संगम वंश के शासक देवराय द्वितीय पर टिप्पणी लिखो ?
वीर विजय का पुत्र देवराय द्वितीय (1426-1446 ई.) संगम वंश का सबसे महान् शासक माना जाता है. इसकी उपाधि 'इमाडीदेव राय' थी. इसने आन्ध्र प्रदेश कोंडविदु का दमन कर कृष्णा नदी तक विजयनगर की उत्तरी एवं पूर्वी सीमा को बढ़ाया. इसने उड़ीसा के ‘गजपति' को भी पराजित कर दिया. इसके शासनकाल की उल्लेखनीय घटना है कि, इसने अपनी सेना में कुछ तुर्क धनुर्धारियों की नियुक्ति की.
देवराय स्वयं विद्वान था तथा विद्वानों का बड़ा र था. इसके दरबार में तेलुगू कवि श्रीनाथ कुछ समय तक रहा. फारसी राजदूत अब्दुल रज्जाक ने देवराय द्वितीय के समय में ही विजयनगर की यात्रा की थी. फरिश्ता ने लिखा है कि, देवराय ने लगभग 2 हजार मुसलमानों को अपनी सेना में भर्ती किया तथा उन्हें जागीरें दीं. उसने मुसलमानों को मस्जिद निर्माण की स्वतन्त्रता दे रखी थी. एक अभिलेख में देवराय द्वितीय को 'गजबेटकर' ( हाथियों का शिकारी) कहा गया है. 1446 ई. में इनकी मृत्यु हो गई. इसने संस्कृत में एक नाटक 'महानाटक सुधानिधि' एवं 'ब्रह्मसूत्र' पर एक भाष्य भी लिखा था.
देवराय द्वितीय के बाद मल्लिकार्जुन (1446-1466 ई.) जिसे प्रौढ़ देवराय भी कहा जाता है व विरुपाक्ष द्वितीय (1466-1485 ई.) शासक बने, ये दोनों कमजोर शासक थे. अतः इनकी कमजोरी का फायदा उठाकर नरेश नायक ने सालुव नरसिंह को शासक बना दिया.
> सालुव वंश (1485–1506 ई.)
इस वंश के संस्थापक सालुव नरसिंह ने (1485-1491 ई.) तक शासन किया और इसके बाद इसका पुत्र इम्मादि नरसिंह शासक बना. इस समय यह अल्पायु था. अतः नरेशं नायक ने इसे वेनुगोंडा के दुर्ग में कैद कर दिया तथा स्वयं शासक बन गया. 1505 ई. में नरेश नायक के पुत्र वीर नरसिंह ने इम्माडि नरसिंह की हत्या कर दी और स्वयं शासक बन गया और उसने ‘तुलुव वंश' की नींव डाली.
> कृष्णदेव राय की उपलब्धियाँ
सम्पूर्ण विजयनगर साम्राज्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक कृष्णदेव राय (1509-1529) था. इसके शासनकाल में विजयनगर का ऐश्वर्य एवं शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई थी.
राजा कृष्णदेव राय ने अपने सैनिक अभियान में 1509-10 ई. में बीदर के सुल्तान महमूदशाह को अदोनी के समीप पराजित किया. 1510 ई. में उसने उम्मातूर के विद्रोही सामन्त को परास्त कर दिया. 1512 ई. में कृष्णदेव राय ने बीजापुर के सुल्तान युसुफ आदिलशाह को हराकर रायचूर के दोआब पर अधिकार कर लिया. इसके बाद उसने गुलवर्गा के किले पर अधिकार कर लिया. कृष्णदेव राय ने बीदर पर पुनः आक्रमण कर वहाँ के सुल्तान महमूदशाह को बरीद के कब्जे से छुड़ाकर पुनः सिंहासन पर बैठाया और साथ ही उसने 'यवन राज स्थापना चार्य' की उपाधि ग्रहण की.
1513 से 1518 ई. तक कृष्णदेव राय ने चार बार उड़ीसा पर आक्रमण किया तथा वहाँ के गजपति शासक प्रताप रुद्रदेव को प्रत्येक बार पराजित किया और प्रतापरुद्र ने अपनी पुत्री का विवाह कृष्णदेव राय के साथ कर दिया.
कृष्णदेव राय का अन्तिम सैन्य अभियान बीजापुर के विरुद्ध रहा जिसमें कृष्णदेव राय ने सुल्तान इस्माइल आदिलशाह को परास्त कर गुलबर्गा के किले को ध्वस्त कर दिया.
कृष्णदेव राय की इस विजय के साथ ही उसने अपने समस्त शत्रुओं को पराजित कर दिया और अपने श्रेष्ठ पराक्रम का परिचय दिया.
कृष्णदेव राय ने अरब एवं फारस से घोड़ों के व्यापार को नियमित करने के लिए पुर्तगाली अल्बुकर्क से मित्रता की तथा भट्टकल में उसे किला बनाने की अनुमति प्रदान की. उसके समय में डोमिगो पायस (पुर्तगाली यात्री) ने विजयनगर की यात्रा की और उसने उसके राज्य की खूब प्रशंसा की है.
कृष्णदेव राय स्वयं बड़ा विद्वान् व्यक्ति था. उसने तेलुगू में अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ 'अमुक्त माल्यदा' लिखा. उसने अपने दरबार में अनेक कवियों एवं विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया. पेदन्ना उसके दरबार का प्रमुख कवि था. उसने स्वारोचित सम्भव या मनुचरित्र तथा हरिकथा सरनसमू जैसे ग्रन्थों की रचना की. उसके दरबार में एक अन्य प्रमुख विद्वान ‘तेनालीराम' था जिसने 'पाण्डुरंग महात्म' की रचना की.
कृष्णदेव राय का समय तेलुगू साहित्य के क्षेत्र में ‘क्लासिकी युग' कहा गया है. उसने आन्ध्र भोज, अभिनव भोज, आन्ध्र पितामह आदि उपाधियाँ धारण कीं. उसने स्थापत्य के क्षेत्र में 'नागलपुर' नामक नया नगर बसाया तथा 'हजारा' एवं 'विट्टलस्वामी' नामक मन्दिरों का निर्माण करवाया. इस महान् शासक की 1529 ई. में मृत्यु हो गई.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, कृष्णदेव राय अपने समय का एक महान् शासक था. उसकी राजनीतिक, प्रशासनिक, आर्थिक एवं साहित्यिक आदि सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ रहीं.
> तालीकोटा के युद्ध / राक्षसी - तंगड़ी के युद्ध पर टिप्पणी
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद अच्युतदेव राय (15291542 ई.) शासक बना, लेकिन वह एक दुर्बल शासक था. अतः उसके समय में केन्द्रीय सत्ता कमजोर हो गई. उसके बाद सदाशिव राय (1542-1570 ई.) शासक बना. यह एक महात्वाकांक्षी शासक था, लेकिन इसके साथ ही वह अदूरदर्शी भी था. उसके समय में वास्तविक शासक उसका मन्त्री रामराय था.
रामराय ने दक्षिण के मुसलमान राज्यों के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप किया, क्योंकि वह समझता था कि इससे विजयनगर साम्राज्य की प्रतिष्ठा और शक्ति की पुनर्स्थापना हो सकेगी. 1543 ई. में रामराय ने बीजापुर के विरुद्ध अहमदनगर एवं गोलकुण्डा से मित्रता कर ली. कुछ वर्षों बाद रामराय ने अहमदनगर के विरुद्ध बीजापुर एवं गोलकुण्डा की तरफ से भाग लिया तथा अहमदनगर को उसने लूट लिया. उसने मस्जिदों को तोड़ा तथा कुरान का अपमान किया. इस्लाम के इस अपमान का स्वार्थी लोगों ने खूब बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार किया जिसके कारण दक्षिण भारत के मुसलमानी राज्यों ने विजयनगर के विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बना दिया. 
बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा तथा बीदर की सम्मिलित सेनाओं ने 23 जनवरी, 1565 ई. को तालीकोटा के युद्ध क्षेत्र में विजयनगर की सेना को निर्णायक पराजय दी. निर्णायक स्वयं बड़ी ही वीरतापूर्वक लड़ा, लेकिन वह पकड़ा गया तथा उसका वध अहमदनगर के सुल्तान ने स्वयं कर दिया. विजेताओं को घोड़ों, तम्बुओं, हीरे, जवाहरातों एवं नकदी के रूप में अतुल सम्पत्ति हाथ लगी. इसके बाद विजयी सेनाओं ने विजयनगर में प्रवेश किया तथा वहाँ भयंकर Mewary मारकाट के साथ उन्होंने पूरे शहर को तोड़ दिया.
‘एक विस्मृत साम्राज्य’ नामक एक ग्रन्थ का लेखक सेवेल ने लिखा है कि, “संसार के इतिहास में कभी भी इतने वैभवशाली नगर का इस प्रकार सहसा सर्वनाश नहीं किया जैसाकि विजयनगर का.
डॉ. ए. एल. श्रीवास्तव के अनुसार, तालीकोटा का युद्ध विजयनगर साम्राज्य के अस्तित्व को पूर्ण रूप से नहीं मिटा सका और इस विजय के बाद सुल्तानों की ईर्ष्या पुनः भड़क उठी और इसी के कारण वे विजयनगर के विरुद्ध मिलकर कार्य नहीं कर सके. इसी कारण विजयनगर कुछ हद तक अपनी खोई हुई शक्ति एवं भूमि को प्राप्त करने में समर्थ हो सका.
> अरविदु वंश
तालीकोटा के युद्ध के बाद रामराय का भाई तिरुमाल ने 'वेनुगौण्डा' को अपनी राजधानी बनाया तथा कुछ हद तक साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने में सफलता प्राप्त की. तिरुमाल एक महात्वाकांक्षी व्यक्ति था और 1570 ई. में उसने विजय नगर के वास्तविक शासक 'सदाशिव' को अपदस्थ कर सिंहासन पर अधिकार कर लिया. और अरविदु वंश की नींव डाली.
तिरुमाल के बाद उसका पुत्र रंग द्वितीय शासक बना वह एक योग्य शासक था उसने अपने पिता द्वारा प्राप्त राज्य को अक्षुण्ण रखा. रंग के बाद वैंकट द्वितीय शासक बना जिसने चंद्रगिरि को अपने राज्य की राजधानी बनाया. इसी के M शासनकाल में 1612 ई. में मैसूर में 'वाडियार' वंश स्थापना हुई. इस वंश का अन्तिम शासक रंग तृतीय हुआ इसमें इतनी शक्ति नहीं थी कि वह अपने विद्रोही सामन्तों का दमन कर सकता तथा बीजापुर एवं गोलकुण्डा के सुल्तानों के आक्रमणों को रोक पाता. अतः श्रीरंगपट्टम, बेदनूर, मदुरा, तंजीर आदि के सामन्तों ने अपने को स्वतन्त्र कर लिया और विजयनगर साम्राज्य जो तीन सदियों से चला आ रहा था, का अन्त हो गया.
> बहमनी राज्य
बहमनी राज्य के संस्थापक अलाउद्दीन बहमनशाह के कार्यों पर टिप्पणी.
मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में 3 अगस्त, 1346 ई. को हसन नामक व्यक्ति ने, 'अबुल मुजफ्फर अलाउद्दीन बहमनशाह' नाम से सिंहासन पर बैठकर बहमनी साम्राज्य की स्थापना की वह इस्फंदिया के पुत्र ईरानी वीर बहमनशाह का वंशज होने का दावा करता था. इसलिए उसने बहमनशाह की उपाधि धारण की.
हसन एक शक्तिशाली शासक था तथा उसने राज्य के विस्तार के लिए अनेक युद्ध लड़े. निरन्तर युद्धों के कारण उसके राज्य की सीमाएँ उत्तर में बानगंगा से लेकर दक्षिण में कृष्णा नदी तक, पश्चिम में दौलताबाद से लेकर पूरब में भौंगरी तक फैल गई. उसने अपनी राजधानी गुलबर्गा में स्थापित की तथा शासन संचालन की सुदृढ़ व्यवस्था की. उसने अपने सम्पूर्ण राज्य को चार प्रान्तों (तरफ) में विभाजित किया; यथा— गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार एवं बीदर. इनका शासन चलाने के लिए उसने तरफदारों की नियुक्ति की. ये तरफदार अपनी निजी सेना रखते थे तथा अपने सैनिक एवं असैनिक अधिकारियों की नियुक्ति करते थे. हसन इस्लाम का प्रचारक था तथा उसका अपने सहधर्मियों के प्रति व्यवहार न्यायपूर्ण था. 11 फरवरी, 1358 ई. को उसकी मृत्यु हो गई. इसके बाद उसका पुत्र मुहम्मदशाह शासक बना जिसने बहमनी साम्राज्य में ठोस शासन-व्यवस्था को प्रारम्भ किया.
> मुहम्मदशाह (1358-1375 ई.)
यह बहमनशाह की मृत्यु के बाद शासक बना. इसने विजयनगर एवं वारंगल को जीत लिया. अधिक मद्यपान के कारण इसकी मृत्यु हो गई.
> अलाउद्दीन मुजाहिदशाह (1375-1378 ई.) 
इसने विजयनगर से सन्धि कर गुलबर्गा को वापस कर लिया.
> दाऊद प्रथम (1378 ई.)
> मुहम्मदशाह द्वितीय (1378-1397 ई.) 
यह एक शान्तिप्रिय एवं विद्या का संरक्षक सुल्तान था. 
> ताजुद्दीन फिरोजशाह (1397-1422 ई.) 
यह बहमनी राज्य के संस्थापक हसन का पौत्र था. यह विद्वान् एवं विद्वानों के सत्संग का शौकीन होते हुए भी इन्द्रिय सुख में लिप्त रहता था और संकीर्ण विचारों से युक्त मुसलमान था.
ताजुद्दीन ने विजयनगर साम्राज्य से तीन युद्ध लड़े जिसमें दो युद्धों में इसे विजय प्राप्त हुई, परन्तु तीसरे युद्ध में यह स्वयं बुरी तरह पराजित हो गया तथा युद्ध क्षेत्र से भाग गया. विजयनगर की सेना ने बहमनी राज्य की दक्षिणी एवं पूर्वी सीमा पर अपना अधिकार कर लिया. इन सब घटनाओं ने उसे बहुत अपमानित किया तथा उसी के भाई अहमदशाह ने 1422 ई. में उससे सत्ता हथिया ली.
> अहमदशाह (1422-1435 ई.) : टिप्पणी
अहमदशाह ने बहमनी राज्य की राजधानी को गुलबर्गा के स्थान पर बीदर को बनाया तथा इसका नाम मुहम्मदाबाद रखा. राजधानी परिवर्तन का प्रमुख कारण बीदर की स्थिति गुलबर्गा से अच्छी तथा जलवायु अधिक स्वास्थ्य प्रद थी.
अहमदशाह के शासनकाल की प्रमुख घटना है— उसके दरबार के स्थानीय मुसलमान अमीर एवं अफाकी (विदेशी अमीरों) के मध्य प्रतिद्वन्द्विता. इनमें धार्मिक मतभेद भी थे. देशी या दक्षिणी अमीर अधिकतर सुन्नी सम्प्रदाय के थे, जबकि अफाकी शिया थे. दरबारी झगड़ों के कारण प्रशासनव्यवस्था में शिथिलता आ गई.
अहमदशाह ने अपने पूर्वजों के समान ही विजयनगर के हिन्दू राज्य पर अनेक बार आक्रमण किए तथा एक बार विजयनगर को चारों ओर से घेर लिया जिससे राजा को हर्जाना देने के लिए बाध्य होना पड़ा. 1424-25 ई. में अहमदशाह ने बारंगल को जीतकर वहाँ के शासक को मार डाला तथा बारंगल को अपने राज्य में मिला लिया. अहमदशाह ने मालवा के हुसैनशाह को परास्त कर उसे भारी क्षति पहुँचाई तथा गुजरात पर भी अभियान किया, किन्तु सफल नहीं हो सका. कोंकण के सामन्त के विरुद्ध भी अहमदशाह ने अभियान किए थे, जिसे वह अन्तिम रूप से दबाने में सफल रहा. 1435 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.
> अलाउद्दीन द्वितीय (1435-54 ई.) : टिप्पणी
अहमदशाह के बाद उसका उत्तराधिकारी अलाउद्दीन द्वितीय हुआ, जिसने अपने भाई मुहम्मद के विद्रोह का दमन कर उसे ‘रायचूर के दोआब’ का सूबेदार नियुक्त किया जहाँ पर मुहम्मद ने अपने जीवन के अन्त तक वफादारी से कार्य किया.
अलाउद्दीन ने अपनी आन्तरिक स्थिति को मजबूत करने के बाद कोंकण पर आक्रमण कर उस क्षेत्र पर अपना प्रभावी नियन्त्रण स्थापित कर लिया. अलाउद्दीन ने संगमेश्वर के शासक को हराकर उसकी पुत्री से अपना विवाह कर लिया इस पर उसके श्वसुर खानदेश के नसीर खाँ ने अपनी पुत्री का पक्ष लेकर उस पर आक्रमण कर दिया, लेकिन वह हार गया.
अपने कुल की परम्परा के अनुसार अलाउद्दीन ने विजयनगर राज्य पर आक्रमण किया तथा बहुत-सा धन उसने वहाँ से प्राप्त किया. इस धन का उपयोग उसने एक अस्पताल के निर्माण में खर्च किया.
अलाउद्दीन द्वितीय की 1457 में मृत्यु हो गई.
> हुमायूँ (1457–1461 ई.) 
अलाउद्दीन द्वितीय का उत्तराधिकारी उसका सबसे बड़ा पुत्र हुमायूँ हुआ, जो एक अत्याचारी व्यक्ति था. लोग उसे ‘जालिम' के नाम से जानते थे. 
> निजामशाह ( 1461-1463 ई.) 
हुमायूँ की मृत्यु के बाद उसका अल्पव्यस्क पुत्र निजामशाह शासक बना जिसकी दो वर्षों बाद ही मृत्यु हो गई. 
> मुहम्मदशाह तृतीय (1463-82 ई.) : टिप्पणी
निजामशाह की मृत्यु के बाद उसी का भाई मुहम्मदशाह शासक बना जो मदिरा तथा व्यभिचार का शौकीन था. उसका शासन संचालन उसका प्रसिद्ध मन्त्री 'महमूद गँवा' किया करता था, जिसे उसने 'ख्वाजा जहाँ' की उपाधि प्रदान कर रखी थी.
महमूद गँवा ने कर्त्तव्यनिष्ठा एवं स्वामिभक्ति से बहमनी राज्य की सेवा की. उसने कोंकण के हिन्दू राजा का दमन कर उसके अनेक दुर्गों पर अधिकार कर लिया. इसके साथ ही गँवा ने संगमेश्वर के राजा से 'खुलमा का किला' भी जीत लिया. ssine
गँवा की उल्लेखनीय विजय विजयनगर साम्राज्य के प्रसिद्ध बन्दरगाह 'गोआ' पर विजय प्राप्त करना थी. इन विजयों के अतिरिक्त गँवा ने विजयनगर एवं उड़ीसा पर Manga सैनिक अभियान कर अपार धन सम्पत्ति लूटी. इसके बाद मुहम्मदशाह के शासनकाल में भयंकर अकाल पड़ गया तथा इसी दौरान दक्षिणी अमीरों ने गँवा के विरुद्ध षड्यन्त्र रचकर मुहम्मदशाह को उसके विरुद्ध भड़का दिया, अतः शराब के नशे में मुहम्मदशाह ने गँवा को मार डालने का आदेश दे दिया और 5 अप्रैल, 1481 ई. को गाँवा का वध कर दिया गया.
महमूद गँवा की मृत्यु के साथ ही बहमनी राज्य की एकता एवं शक्ति नष्ट हो गई तथा उसकी मृत्यु एक वर्ष बाद सुल्तान मुहम्मदशाह की मृत्यु हो गई.
> महमूदशाह (1482-1518 ई.)
मुहम्मदशाह का उत्तराधिकारी उसका छोटा पुत्र महमूदशाह हुआ जिसमें योग्यता एवं चरित्र का अभाव था, दक्षिणी एवं अफाकी अमीरों के मध्य इसके शासनकाल में संघर्ष और तीव्र हो गया तथा सूबेदारों ने राज्य के हितों की अवहेलना करनी प्रारम्भ कर दी. अतः महमूद की राजसत्ता राजधानी के आस-पास तक ही सीमित हो गई. 1518 ई. में इसकी मृत्यु हो गई.
> महमूदशाह के उत्तराधिकारी 
महमूदशाह के बाद अहमद चतुर्थ (1518 - 1520 ई.), अलाउद्दीनशाह (1520-23 ई.), वहीउल्लाह (1523-1526 ई.) शासक बने. ये सभी सुल्तान 'दक्षिण की लोमड़ी कहे जाने वाले तुर्क सरदार ‘बरीद-उल-मुमालिक' की कठपुतली बने रहे.
> करम उल्लाह (1526-1538 ई.)
यह बहमनी राज्य का अन्तिम शासक था तथा ww इसके समय में बहमनी राज्य 5 स्वतन्त्र राज्यों; यथा— (1) बीजापुर, (2) अहमदनगर, (3) बरार, (4) गोलकुण्डा और (5) बीदर में बँट गया. 
इस प्रकार बहमनी साम्राज्य के कुल 18 शासकों ने 175 वर्ष तक शासन किया जिसमें से पाँच की हत्या की गई, तीन को अपदस्थ किया गया, दो को अन्धा किया गया व दो अत्यधिक मदिरापान के कारण मारे गए. इस प्रकार बहमनी साम्राज्य अपने ही शासकों की अयोग्यता, दरबारियों के षड्यन्त्र तथा निरन्तर संघर्षों के कारण समाप्त हो गया.
> विजयनगर साम्राज्य में स्थानीय ग्राम सभाओं की स्थिति
चोल काल तक ग्राम सभाओं एवं उनकी स्वायत्तता का स्वर्णिम युग रहा. लेकिन उसके बाद इन संस्थाओं का पतन आरम्भ हो गया और चौदहवीं शताब्दी तक आते-आते इनका अस्तित्व न के बराबर रह गया. डॉ. आर. एन. सोलीटोर के अनुसार विजयनगर साम्राज्य में ग्राम सभाएँ 'लघु गणतन्त्रों' के रूप में कार्यरत् रहीं.
इन स्थानीय ग्राम सभाओं के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी रहे उनमें प्रमुख था चौदहवीं शताब्दी का मलिक काफूर का दक्षिण भारत पर आक्रमण. इसके बाद मुस्लिमों के बार-बार अनेक आक्रमण हुए जिससे यहाँ की सामाजिक संरचना में परिवर्तन आ गया और सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ वहाँ के शासन तन्त्र और राजनीति की जड़ें भी खोखली हो गईं. नायंकार और आयागर संस्थाओं का विकास भी ग्राम सभाओं के पतन के लिए पर्याप्त रूप से उत्तरदायी था.
अतः स्पष्ट है कि विजयनगर साम्राज्य में ग्राम सभाओं की संख्या न के बराबर थी. अतः कहा जा सकता है कि उनका अस्तित्व समाप्त हो चुका था.
> विजयनगर प्रशासन में मन्दिरों की भूमिका
वियजनगर प्रशासन में मन्दिरों को अर्द्ध-राजनीतिक अधिकार प्राप्त थे. मन्दिरों के संचालन के लिए उन्हें करमुक्त भूमि अनुदान के रूप में दी जाती थी. मन्दिर कभी-कभी अपनी व्यवस्था के लिए स्थानीय कर भी वसूलते थे. कृष्णदेव राय ने चोलमण्डलम में मन्दिरों को 10,000 वराह दान में प्रदान किए और मन्दिरों को इतनी ही धनराशि कर के रूप में वसूल करने की अनुमति दी गई. मन्दिरों को क्रय-विक्रय का अधिकार भी प्राप्त था. 
मन्दिर बैंकों एवं ऋणदाता के रूप में भी कार्य करते थे और आपात स्थिति में ऋण प्रदान करते थे. अगर कर्जदार ऋण अदायगी नहीं कर पाता था, तो वह अपनी कुछ भूमि मन्दिर को सौंपकर कर से मुक्त हो जाता था. मन्दिर स्थानीय न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे और फौजदारी मामलों का निपटारा करते थे. वे लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करते थे. मन्दिरों का कार्य खाली पड़ी भूमि को कृषि योग्य बनाना, सिंचाई के लिए नहर और तालाब आदि बनवाना और विद्यालयों की व्यवस्था करना भी था.
> विजयनगर साम्राज्य : प्रशासन 
दक्षिण में विजयनगर का हिन्दू साम्राज्य लगभग 300 वर्षों तक अपना यश फैलाता रहा. इस अवधि में अनेक प्रतिभाशाली शासक हुए जिन्होंने निरन्तर युद्धों में व्यस्त रहने के बावजूद भी एक सुदृढ़ शासन व्यवस्था को स्थापित किया. विजयनगर की शासन व्यवस्था के विषय में ए. के. शास्त्री का विचार है कि “विजयनगर एक केन्द्रीयकृत राज्य था.' जबकि बर्टन स्टोन ने उसे विभाजित राज्य की संज्ञा दी है. कुल मिलाकर विजयनगर का साम्राज्य राजनीतिक रूप से खण्डित होने की बजाय अत्यधिक विस्तृत एवं संविभाजित था.
> केन्द्रीय शासन-प्रबन्ध
विजयनगर साम्राज्य का सर्वेसर्वा राजा होता था जिसे 'राय' कहा जाता था तथा इस काल में राज्य के प्राचीन 'सप्तांग सिद्धान्त' पर राज्य का गठन किया गया था. राजा के चुनाव में राज्य के मन्त्री एवं नायक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते थे. राजा को अपने अभिषेक के समयप्रजापालन एवं निष्ठा की शपथ ग्रहण करनी होती थी.
राजा के बाद प्रशासन में 'युवराज' का पद द्वितीय स्थान पर था. युवराज राजा का बड़ा पुत्र या राजपरिवार का कोई भी योग्य सदस्य बन सकता था. युवराज के राज्याभिषेक को 'युवराज पट्टाभिषेक' कहा जाता था, इस राज्य में संयुक्त शासन की व्यवस्था थी. जैसे- हरिहर एवं बुक्का तथा विजयराय एवं देवराय ने संयुक्त रूप से शासन का संचालन किया था. युवराज के अल्पायु होने पर राजा अपने किसी मन्त्री को उसका संरक्षक अपने जीवनकाल में ही नियुक्त कर देता था. कालान्तर में यही व्यवस्था विजयनगर के पतन का बहुत बड़ा कारण बनी.
यद्यपि राजा एवं युवराज उस समय की व्यवस्था के संस्थाओं, मन्त्रिपरिषद् एवं धार्मिक संस्थाओं द्वारा प्रभावशाली अनुसार निरंकुश थे, परन्तु उन पर व्यापारिक नियमों, ग्रामीण नियन्त्रण लगा रहता था. राज्य परिषद् राजा को सलाह एवं उसका अभिषेक करने का कार्य किया करती थी. राजा को राज्य परिषद् के अतिरिक्त सलाह देने के लिए अन्य परिषदों का भी गठन किया गया था, जिनमें प्रान्तीय गवर्नर, बड़े-बड़े नायक, सामन्त एवं व्यापारिक निगमों के प्रतिनिधि सदस्य सम्मिलित होते थे.
राजा के प्रशासनिक कार्यों में सहयोग देने के लिए ‘मन्त्रिपरिषद्’ की स्थापना की गई थी, जिसमें प्रधानमन्त्री मन्त्री, उपमन्त्री, विभागों के अध्यक्ष एवं कुछ राज-परिवार के सदस्य होते थे. मन्त्रिपरिषद् का मुखिया 'प्रधानी' या ‘महाप्रधानी’ कहलाता था. इसकी स्थिति प्रधानमन्त्री जैसी होती थी तथा प्रशासनिक व्यवस्था में इसका स्थान 'तृतीय' था. मन्त्रिपरिषद् के सदस्यों की संख्या 20 थी तथा इसके अध्यक्ष को 'सभानायक' कहा जाता था. प्रधानी भी कभीकभी मन्त्रिपरिषद् की अध्यक्षता किया करता था. राजा के लिए मन्त्रिपरिषद् की सलाह बाध्यकारी नहीं थी. केन्द्रीय प्रशासन में ‘दण्डनायक’ नामक एक उच्च पदाधिकारी होता था. सम्भवतः यह विभिन्न विभागों के अध्यक्ष का नाम था. दण्डनायक को न्यायाधीश, सेनापति, गवर्नर या अन्य प्रशासकीय अधिकारी का कार्यभार सौंपा जाता था. केन्द्रीय प्रशासन के कुछ अन्य छोटे अधिकारियों को कार्यकर्त्ता, कहा जाता था.
विजयनगर के केन्द्रीय-प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक सचिवालय की व्यवस्था होती थी, जिसमें विभागों का वर्गीकरण किया गया था. इन विभागों में ‘रायसम', 'कर्णीकम' या 'एकाउण्टेण्ट' होते थे.
> प्रान्तीय शासन प्रबन्ध
विजयनगर साम्राज्य अत्यन्त विस्तृत होने के कारण राज्य, प्रान्त या मण्डल में विभाजित किया गया था. कृष्णदेव राय के समय प्रान्तों की संख्या छः थी. प्रान्तों के प्रशासक सामान्यतया परिवार (राजा) के सदस्य होते थे. इन्हें सिक्कों को प्रसारित करने, नये कर लगाने, पुराने कर माफ करने एवं भूमिदान देने की स्वतन्त्रता थी. इन्हें भू-राजस्व वसूल कर उसका एक निश्चित भाग केन्द्र को भेजने का उत्तरदायित्व मिला था.
जित किया गया था. कोट्टम का एक अन्य नाम 'वलनाडु' भी प्रान्तों को मण्डल एवं 'मण्डल' को कोट्टम' में विभा था. वलनाडु को 'नाडु' में बाँटा था जिनकी स्थिति आज की तहसीलों के समान थी. नाडु आगे 'मेलाग्राम' में बँटे होते आयंगर व्यवस्था के थे, जिसमें 50 ग्राम सम्मिलित होते थे. ‘उर, या 'ग्राम' विजयनगर प्रशासन की सबसे छोटी इकाई थे. इनका शासन के आधार पर चलाया जाता था. famo
> स्थानीय शाखा (Local Administration)
विजयनगर का स्थानीय प्रशाासन चोलों के स्थानीय प्रशासन पर आधारित था. इस काल में गाँवों को अनेक वार्डों में बाँटा गया था. प्रत्येक वार्ड से कुछ लोगों को मिलाकर ‘सभा' या 'उर' का गठन किया जाता था. उर को गाँव के लिए नई भूमि या सम्पत्ति उपलब्ध कराने, सार्वजनिक भूमि को बेचने, गाँव की तरफ से सामूहिक निर्णय लेने तथा गाँव की भूमि को दान में देने का अधिकार होता था. वह छोटेमोटे दीवानी और फौजदारी मामलों का निपटारा कर सकती थी. नाडु गाँव से बड़ी राजनीतिक इकाई थी तथा इसकी सभा को 'नाट्टावार' के नाम से जाना जाता था. अधिकार क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत होने के कारण इस पर राजकीय नियन्त्रण लगाया जाता था.
इस प्रकार स्पष्ट है कि विजयनगर राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था विकेन्द्रित होते हुए भी पर्याप्त रूप से केन्द्रीयकृत थी और इसके बावजूद भी स्थानीय संस्थाओं को काफी स्वतन्त्रता प्राप्त थी.
> विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में नायंगर एवं आयंगर-व्यवस्था 
(i) नायंगर-व्यवस्था
विजयनगर साम्राज्य की नायंगर-व्यवस्था की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है, कुछ इतिहासकारों के अनुसार विजयनगर के सेनानायकों को 'नायक' कहा जाता था, जबकि अन्य के अनुसार, 'नायक' भू-सामन्त होते थे. उन्हें वेतन के बदले एवं स्थानीय सेना के खर्च के बदले विशेष प्रकार के भूखण्ड दिये जाते थे, जिन्हें 'अमरम' कहा जाता था. ये नायक चूँकि 'अमरम' भूमि का प्रयोग करते थे. इस कारण इन्हें 'अमर नायक' भी कहा जाता था. अमरम भूमि की आय का एक निश्चित भाग राजकोष में जमा करना पड़ता था एवं इसी आय से राजा की सहायता के लिए एक सेना का रख-रखाव करना होता था. नायक को अमरम भूमि में शान्ति, सुरक्षा एवं अपराधों को रोकने का दायित्व का भी निर्वाह करना होता था. इसके अलावा जंगलों को साफ करना एवं कृषि योग्य भूमि का विस्तार करना भी उनके जिम्मे था. राजधानी में नायकों के दो सम्पर्क अधिकारी रहते थे. प्रथम नायक की सेना का सेनापति एवं द्वितीय प्रशासनिक अभिकर्ता ‘स्थापित' होता था. अच्युतदेव राय ने नायकों की उच्छृंख -7 नामक अधिकारियों की नियुक्ति की थी.
(ii) आयंगर-व्यवस्था
विजयनगर साम्राज्य में प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रत्येक ग्राम को स्वतन्त्र इकाई के रूप में संगठित करने का प्रयास किया गया था. इन ग्रामीण इकाइयों पर शासन हेतु बारह (12) प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति होती थी, जिनको सामूहिक रूप से 'आयंगर' कहा जाता था. ये अवैतनिक होते थे.
आयंगरों की सेवा के बदले इन्हें पूर्णतः कर-मुक्त एवं लगान-मुक्त भूमि प्रदान की जाती थी. इन लोगों का पद अनुवांशिक होता था. यह अपने पद को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच या गिरवी रख सकता था. ग्राम-स्तर की कोई भी सम्पत्ति या भूमि इन अधिकारियों की इजाजत के बगैर न तो बेची जा सकती थी और न ही दान में दी जा सकती थी. 'कर्णिक' नामक आयंगर के पास जमीन को क्रय-विक्रय से सम्बन्धित समस्त दस्तावेज होते थे.
> विजयनगर साम्राज्य में स्त्रियों की दशा
विजयनगर समाज में स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक थी. स्त्रियों को शिक्षा अर्जित करने का अधिकार था. कुछ स्त्रियाँ महान् विदुषियाँ एवं साहित्यकार थीं. सामान्यतः एक विवाह प्रथा प्रचलित थी पर शासक वर्ग और सम्पन्न वर्ग में विवाह का प्रचलन था. ब्राह्मणों में बहु बाल विवाह मुख्यतः चलन में था. विधवाओं की स्थिति सुधारने के लिए राज्य Mana द्वारा विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया गया. विजयनगर में विवाह कर आरोपित किए जाते थे, लेकिन विधवा पुनर्विवाह इस कर से मुक्त थे. 
उच्च वर्ग की स्त्रियों को घर पर ही शिक्षित किया जाता था. नृत्य और संगीत की शिक्षा उनके पाठ्यक्रम के महत्वपूर्ण अंग थे. लगभग प्रत्येक क्षेत्र में प्रवीण स्त्रियाँ मिल जाती थीं. स्त्रियाँ मल्लयोद्धा, भविष्यवक्ता, अंगरक्षिकाएँ, ज्योतिषी आदि होती थीं. युद्ध क्षेत्र में सैनिक के रूप में भी स्त्रियों की अहं भूमिका रहती थी. स्त्रियाँ विभिन्न राजकीय पदों पर भी नियुक्त की जाती थीं. विजयनगर शासक महिला अंगरक्षकों को अधिक विश्वसनीय मानते थे.
विजयनगर समाज में गणिकाओं को प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था. गणिकाएँ दो प्रकार की थीं—एक तो वे जो मन्दिरों से जुड़ी हुई थीं. दूसरी वे जो स्वतन्त्र रूप से आजीविका प्राप्त करती थीं. गणिकाएँ सुशिक्षित और सभ्य होती थीं और उनमें से अनेक को राज्य की ओर से विशेष अधिकार प्राप्त थे. विजयनगर समाज में सती प्रथा भी प्रचलित थी.
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