विस्तार संगठन - गुलाम, खिलजी एवं तुगलक वंश

विस्तार संगठन - गुलाम, खिलजी एवं तुगलक वंश

विस्तार संगठन - गुलाम, खिलजी एवं तुगलक वंश

> दिल्ली सल्तनत - गुलाम वंश
मुहम्मद गोरी के गुलाम के रूप में कुतुबुद्दीन ऐबक के कार्य
कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 ई. से पूर्व तक मुहम्मद गोरी के प्रतिनिधि के रूप में शासन किया. इस काल में उसने विलक्षणं सैनिक सफलताओं द्वारा गोरी के भारतीय साम्राज्य को विस्तृत एवं सुदृढ़ बनाया. गोरी के गुलाम के रूप में ऐबक ने भारत में निम्नलिखित कार्य किए –
  1. गोरी की अनुपस्थिति में ऐबक ने 1192 ई. में अजमेर, एवं मेरठ के विद्राहों का दमन किया. इसके बाद उसने दिल्ली पर अधिकार कर लिया जो आगे चलकर भारत के तुर्की राज्य की राजधानी बनी. ऐबक की इन विजयों से अजमेर से लेकर दिल्ली तक का सारा प्रदेश मुसलमानों के अधिकार में आ गया. 1194 ई. में उसने अजमेर के दूसरे विद्रोह का दमन किया और इसी वर्ष चन्दवार के युद्ध में कन्नौज के शासक जयचन्द को पराजित कर दिया. 1195 ई. में ऐबक ने कोइल (अलीगढ़) पर अधिकार कर लिया. इसके साथ ही उसने रणथम्भौर के प्रसिद्ध किले को जीत लिया. 
  2. 1196 ई. में ऐबक ने अजमेर प्रान्त के मेड़ों के विद्रोह का दमन किया. इसी वर्ष गुजरात के शासक भीमदेव पर आक्रमण किया और उसे पराजित कर राजधानी अन्हिलवाड़ा में भयंकर लूट मचाई.
  3. 1202 ई. में बुन्देलखण्ड के चन्देल शासक "को हराकर ऐबक ने सैनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कालिंजर दुर्ग पर अधिकार कर लिया.
  4. ऐबक ने महोबा, कालपी और बदायूँ को भी अपने अधीन किया. ऐबक ने इन सभी अभियानों में भयंकर लूटमार मचाई और मुस्लिम परम्परा के अनुसार मन्दिरों का विनाश किया तथा यथासम्भव हिन्दुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाया.
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, मुहम्मद गोरी के प्रतिनिधि के रूप में ऐबक ने भारत में उसके राज्य का अत्यधिक विस्तार किया.
> स्वतन्त्र शासक के रूप में ऐबक के कार्यों का मूल्यांकन
1206 ई. में मुहम्मद गोरी की मृत्यु का समाचार पाते ही कुतुबुद्दीन ने दिल्ली से लाहौर पहुँचकर अपने स्वतन्त्र होने की घोषणा कर दी तथा 24 जून, 1206 ई. को उसने अपना राज्याभिषेक कराया और शासक बनने के बाद निम्नलिखित कार्य किए -
  1. मुहम्मद गोरी की मृत्यु के बाद ताजुद्दीन याल्दौज ने गजनी पर अधिकार कर लिया. इसके बाद याल्दौज ने नासिरुद्दीन कुबाचा पर आक्रमण करके मुल्तान को हथियाने का प्रयत्न किया. ऐसी स्थिति में कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुबाचा के साथ मिलकर याल्दौज को परास्त कर दिया तथा गजनी पर अधिकार कर लिया, लेकिन उसे पुनः भारत लौटना पड़ा, क्योंकि याल्दौज ने पुनः गजनी पर अधिकार कर लिया, लेकिन इसके बाद उसने उसे कभी परेशान नहीं किया.
  2. गजनी में अपने शासनकाल के दौरान ऐबक ने उत्तराधिकारी सुल्तान महमूद से गुलामी से गुलामी का मुक्ति-पत्र प्राप्त कर लिया उसने ऐबक को राजकीय सत्ता के दो आवश्यक चिन्ह ‘धत्तर' और 'दण्ड' प्रदान किए. 
  3. कुतुबुद्दीन ऐबक ने कुछ शक्तिशाली तुर्की सरदारों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करके अपनी आन्तरिक स्थिति को मजबूत किया. सिन्ध और मुल्तान के शासक कुबाचा के साथ उसने अपनी बहन की शादी की. कि ताजुद्दीन एल्दौज की लड़की से उसने अपना स्वयं का विवाह किया तथा बिहार के गवर्नर इल्तुतमिश से अपनी लड़की का विवाह कर दिया. इन वैवाहिक सम्बन्धों से ऐबक ने तुर्क सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया. 
  4. बंगाल में अलीमर्दान नामक सरदार वहाँ के शासक बख्तियार खिलजी की हत्या करके खुद २ खुद शासक बन बैठा. उसके शासन से असन्तुष्ट होकर खिलजी सरदारों ने उसे जेल में डाल दिया और मोहम्मद शेख को शासक बना दिया. अलीमर्दान किसी तरह से जेल से भागकर ऐबक के पास पहुँचा तथा उसकी सहायता पाकर वह पुनः बंगाल का गवर्नर बन गया तथा ऐबक को टैक्स देना स्वीकार लिया.
  5. मुहम्मद गोरी की मृत्यु की सूचना मिलते ही राजपूत शासकों ने भारत में तुर्कों की सत्ता को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न किया. चन्देल शासक त्रैलोक्य वर्मन ने कालिंजर पर पुनः अधिकार कर लिया. अन्तर्वेद के कई छोटे-छोटे शासकों ने तुर्की सल्तनत को कर देना बन्द कर दिया.
ऐसी स्थिति में ऐबक ने विद्रोही हिन्दू सरदारों का बलपूर्वक दमन किया जिन हिन्दू सरदारों ने उसे कर देना स्वीकार कर लिया उन्हें उनकी भूमि का स्वामी बना रहने दिया गया, किन्तु याल्दौज के भय के कारण ऐबक अपनी पूरी शक्ति इनके विरुद्ध नहीं लगा सका.
इस प्रकार स्पष्ट है कि ऐबक ने स्वतन्त्र शासक की हैसियत से शासन करते हुए अपने जीते हुए नए राज्य को सुरक्षित रखा और प्रत्येक समस्या पर नियन्त्रण कायम किया.
> क्या ऐबक भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक था ?
गुलाम होते हुए भी ऐबक भारत में मुस्लिम राज्य का शासक बन गया. यह उसकी योग्यता, क्षमता और अथक परिश्रम का परिणाम था. कुछ इतिहासकारों ने ऐबक को भारत का प्रथम मुस्लिम शासक माना है, क्योंकि भारत में गोरी साम्राज्य को सुरक्षित रखने तथा उसके राज्य विस्तार का मुख्य श्रेय ऐबक को ही जाता है, लेकिन डॉ. आर.पी. त्रिपाठी एवं अन्य इतिहासकार निम्नलिखित कारणों से मुस्लिम राज्य का संस्थापक मानने से इन्कार करते हैं— 
1. ऐबक ने अपने नाम से कोई सिक्का जारी नहीं किया.
2. चौदहवीं सदी के विदेशी यात्री इब्नबतूता ने ऐबक का नाम भारत के सुल्तानों में नहीं गिनाया.
3. फिरोज तुगलक ने भी ऐबक का नाम सुल्तानों की सूची में नहीं लिखा है.
उपर्युक्त तर्कों के आधार पर हम चाहे ऐबक को संस्थापक न माने, लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि उसने ही भारत को गजनी के प्रभुत्व से मुक्त कराया तथा भारत में मुस्लिम राज्य के विस्तार का मार्ग खोल दिया. भारत में अपने 4 वर्षों के अल्प शासनकाल में ऐबक ने दिल्ली साम्राज्य की आधारशिला रखकर इस्लाम की बड़ी भारी सेवा की. भारत में तुर्की सरदारों को अपने साथ और अधीनता में लेकर उसने दिल्ली के तुर्की राज्य को एकता प्रदान की और दिल्ली सल्तनत की नींव डाली. यदि ऐबक ऐसा नहीं कर पाता तो सम्भव था कि भारत का तुर्की राज्य विभिन्न तुर्की सरदारों के पारस्परिक संघर्षों का शिकार बनकर टुकड़े-टुकड़े हो जाता और तब हिन्दू नरेश उसका समूल नाश कर देते. ऐबक के योग्य नेतृत्व एवं प्रबल शौर्य के कारण ऐसा नहीं हो सका. ऐसी स्थिति में उसे भारत में तुर्की राज्य का संस्थापक कहा जा सकता है.
किन्तु यदि हम गहराई से विचार करें तो उसे वास्तविक संस्थापक नहीं कह सकते, क्योंकि उसका अधिकांश समय विद्रोहों को कुचलने एवं षड्यन्त्रों को विफल करने में बीता, फिर भी उसे इनमें पूर्ण सफलता नहीं मिली. उसके समय में देश में अशान्ति एवं अव्यवस्था रही यद्यपि उसने भारत में गुलाम वंश की नींव डाली, परन्तु प्रशासकीय सुधारों द्वारा नवीन राज्य को संगठित करने का प्रयास उसने नहीं किया. परिणामस्वरूप उसके समय से ही भारत में विशृंखलन होना आरम्भ हो गया. इसी प्रकार कुतुबुद्दीन ऐबक ने अपनी कमजोरियों को देखते हुए सुल्तान की पदवी धारण नहीं की.
> इल्तुतमिश की कठिनाइयों का विवरण
कुतुबुद्दीन ऐबक के उत्तराधिकारी आरामशाह की अयोग्यता का लाभ उठाकर इल्तुतमिश ने दिल्ली पर आक्रमण कर उस पर अपना अधिकार कर लिया. शासक बनने के बाद उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिनका विवरण निम्नलिखित है—
कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के समय भारत का तुर्की राज्य पूर्णतया असंगठित था. शासन प्रबन्ध का भार मुख्यतः तुर्की सरदारों के नियन्त्रण में था जो इल्तुतमिश का विरोध कर रहे थे. इसके साथ ही दिल्ली में गोरी एवं ऐबक के समय के तुर्क सरदार मौजूद थे जो राजगद्दी पर अपना अधिकार मानते थे और वे इल्तुतमिश के स्थान पर किसी तुर्क को शासक बनाना चाहते थे.
इल्तुतमिश को सिन्ध और मुल्तान के शासक नासिरुद्दीन कुबाचा से बहुत अधिक खतरा था, क्योंकि ऐबक की मृत्यु के साथ ही उसने अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी थी. उसके साथ ही उसने भटिण्डा, कोहराम, सरसुती तथा लाहौर को अपने अधिकार में कर लिया था. कुतुबुद्दीन ऐबक का सगा बहनोई होने के कारण वह स्वयं अपने क को दिल्ली का दावेदार मानता था.
ऐबक की मृत्यु के तुरन्त बाद गजनी के शासक याल्दौज ने भी अपने को हिन्दुस्तान का शासक घोषित कर दिया तथा इल्तुतमिश को भारत में अपने सूबेदार के रूप में कार्य करने का संदेश भेजा.
इल्तुतमिश को राजपूतों के प्रतिरोध का भी सामना करने के लिए तैयार रहना था, क्योंकि जालौर और रणथम्भौर के चौहान, कालिंजर तथा अजयगढ़ के चन्देलों ने स्वयं को स्वतन्त्र घोषित कर दिया था.
मौके का लाभ उठाकर बंगाल के गवर्नर अलीमर्दान ने भी अपनी स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी तथा दिल्ली को कर देना बन्द कर दिया. इस पर खिलजी सरदारों ने अलीमर्दान का वध कर उसकी जगह हिसामुद्दीन एवाज को बंगाल का शासक बना दिया था.
इन सब कठिनाइयों के अतिरिक्त उसको अपने राज्य की उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा को भी देखना था, क्योंकि मंगोलों द्वारा पराजित होकर ख्वारिज्म के शासक जलालुद्दीन मंगबर्नी इस सीमा पर आ बसा था तथा मंगोल उसका पीछा करते हुए भारत की सीमा तक आ गए थे.
इन कठिनाइयों के साथ-साथ उसकी समस्या यह भी थी कि वह एक गुलाम था तथा इस्लामी कानून के अनुसार एक गुलाम शासक नहीं बन सकता था तथा मुस्लिम धार्मिक वर्ग से उसे किसी सहयोग की आशा नहीं थी. इसके अतिरिक्त ऐबक के पुत्र और उत्तराधिकारी उसके मार्ग की बड़ी बाधा थे.
इस प्रकार स्पष्ट है इल्तुतमिश को राज्य के साथ-साथ काँटो से भरा ताज भी प्राप्त हुआ था जिसका उसने आगे चलकर सफलतापूर्वक समाधान किया.
> इल्तुतमिश ने अपनी समस्याओं का आसानी से समाधान किया, विवेचना
सुल्तान इल्तुतमिश को निम्नलिखित कारणों से अपनी समस्याओं के विरुद्ध सफलता मिली –
  1. इल्तुतमिश एक वीर, साहसी, दृढ़निश्चयी, सावधान एवं दूरदर्शी सेनानायक था. अपनी चारित्रिक विशेषताओं के बल पर उसने अपने शक्तिशाली शत्रुओं को कुचल दिया. इसके अतिरिक्त उसने सूफियों एवं सन्तों के प्रति बड़ा आदर-भाव रखा जिससे उसे मुस्लिम जनता का पूरा सहयोग मिला.
  2. इल्तुतमिश की सफलता का एक अन्य कारण उसके शत्रुओं में आपसी फूट तथा राजनीतिज्ञता की कमी थी. वे संयुक्त होकर इल्तुतमिश से सामना करने के बजाय आपसी संघर्ष का शिकार हो गए जिससे इनकी शक्ति क्षीण हो गई.
  3. इल्तुतमिश की सफलता में उसके द्वारा गुलामों के संगठन ‘तुर्कान-ए-चहलगानी' का सबसे बड़ा हाथ रहा. ये गुलाम इल्तुतमिश के प्रति सदैव स्वामीभक्त रहे.
  4. इल्तुतमिश के समय में मध् मध्य एशिया में मंगोलों ने भयंकर मारकाट मचा रखी थी जिससे वहाँ से अनेक योग्य लोग भारत आ गए जिन्हें इल्तुतमिश ने अपने दरबार में शरण दी तथा उनके सहयोग से उसने एक कुशल शासन प्रणाली का सूत्रपात किया.
  5. इल्तुतमिश ने अपने शत्रुओं के विरुद्ध अत्यन्त ही कठोर कदम उठाए. राजपूतों का दमन उसने बड़ी निर्ममता के • साथ किया. इन सबसे उसके शत्रुओं में भय व्याप्त हो गया तथा उसके सरदार अनुशासित हो गए.
  6. इल्तुतमिश ने मुस्लिम जगत के सर्वोच्च खलीफा द्वारा भारत के सुल्तान के रूप में मान्यता व 'खिलाफत' प्राप्त की जिससे उसकी भारत में स्थिति सुदृढ़ हो गई.
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि इल्तुतमिश ने अपनी दूरदर्शिता, राजनीतिज्ञता और सैनिक कुशलता के बल पर एक सुदृढ़ एवं संगठित राज्य स्थापित करने में सफलता प्राप्त की.
> दिल्ली सल्तनत के वास्तविक संस्थापक के रूप में इल्तुतमिश : मूल्यांकन  
इल्तुतमिश ने ऐबक के उत्तराधिकारी आरामशाह को परास्त कर दिल्ली की सत्ता प्राप्त की तथा कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा प्रारम्भ किए गए कार्यों को पूरा करने का प्रयास प्रारम्भ किया. उसने अपने विरोधियों का दमन किया तथा याल्दौज और कुबाचा को पराजित कर अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाया. उसने भारत के शक्तिशाली एवं महात्वाकांक्षी तुर्क सरदारों का दमन किया. वि . बंगाल एवं बिहार के खिलजी शासकों को हराकर अपने अधीन कर लिया.
इल्तुतमिश ने अपनी दूरदर्शिता से भारत पर चंगेज़ खाँ के होने वाले आक्रमणों से रक्षा की. इन सबके अतिरिक्त दोआब और राजस्थान के हिन्दू राजाओं का निर्ममतापूर्वक दमन कर दिया. इस प्रकार इल्तुतमिश ने न केवल राज्य में शान्ति-व्यवस्था को बनाया, बल्कि उसका विस्तार भी किया.
इल्तुतमिश ने विजय कार्यों के साथ-साथ सल्तनत में अनेक प्रशासकीय सुधार भी किए. इससे उसका प्रशासन मजबूत हो गया और शक्तिशाली सैनिक राजतन्त्र का इससे निर्माण हुआ. मुद्रा प्रणाली और न्याय व्यवस्था में भी उसने अनेक सुधार किए और भारतीय शासन प्रणाली को अरबी स्वरूप प्रदान किया. 
इल्तुतमिश ने भारत के मुस्लिम साम्राज्य को गजनी से पृथक् करके उसके स्वतन्त्र एवं स्थाई अस्तित्व का निर्माण की मान्यता गठिखलीफा से स्वयं के लिए सुल्तान की प्राप्त की. इससे नैतिक और वैधानिक दृष्टि से सल्तनत और अधिक बू हो गई.
इन सबके अतिरिक्त उसने अपने वैयक्तिक और चारित्रिक गुणों से सुल्तान तथा सुल्तान की पद-प्रतिष्ठा को और अधिक बढ़ाया. उसने अपने 26 वर्ष के शासनकाल में अथक परिश्रम करके अपने उत्तराधिकारियों के लिए एक विशाल सुसंगठित, सुव्यवस्थित और सुदृढ़ राज्य विरासत में छोड़ा. इस प्रकार यदि देखा जाए तो इल्तुतमिश ही भारत में मुस्लिम साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक कहलाने का अधिकार रखता है. डॉ. ए. के. निजामी के शब्दों में"ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की रूपरेखा के बारे में केवल दिमागी आकृति बनाई थी पर इल्तुतमिश ने उसे एक व्यक्तित्व, एक पद, एक प्रेरणा शक्ति, एक दिशा, एक शासन व्यवस्था और एक शासक वर्ग प्रदान किया." अतः उसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक कहा जा nh सकता है.
> रजिया सुल्ताना की असफलता के क्या कारण थे  ? 
रजिया सुल्ताना की असफलता के निम्नलिखित कारण थे
  1. अयोग्य शासक रुकुनुद्दीन फिरोज के समय तुर्क सरदारों को मनमानी करने के बहुत अधिक प्राप्त हो गए थे. जब रजिया ने उनको मनमानी करने से रोका तब वे उसे गद्दी से उतारने पर तुल गए.
  2. रजिया की असफलता का सर्वप्रमुख कारण उसका औरत होना था. बूढ़े तुर्की योद्धा उसके नेतृत्व में रहना और युद्ध लड़ना अपनी शान के विरुद्ध समझते थे.
  3. रजिया ने शासन कार्य चलाने के लिए पर्दे का परित्याग कर दिया और पुरुषों के वस्त्र धारण कर लिए. युद्धों का संचालन वह मर्दाना पोषाक में करने लगी. इन सब कार्यों से कट्टर सुन्नी मुसलमान अप्रसन्न हो गए और उसके विरुद्ध षड्यन्त्र रचने लगे.
  4. रजिया ने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए अनेक प्रशासनिक कदम उठाए और प्रशासनिक पदों का पुनर्वितरण किया. उसने अफ्रीका के हब्सी जमालुद्दीन याकूत को शाही अस्तबल का प्रधान (अमीर-ए-अखुर) बना दिया. रजिया के इस कार्य से तुर्कों में विरोध की ज्वाला भड़क उठी, तुर्की सरदारों को यह पसन्द नहीं आया कि, एक सुल्ताना अपने दरबार में एक दास को पसन्द करे.
उपर्युक्त सभी कारणों से उसके राज्य में विद्रोहों का ताँता लगा दिया. रजिया ने विद्रोहों को दबाने की भरसक चेष्टा की, लेकिन अपने जीवन से हाथ धोकर भी इसमें वह सफल न हो सकी.
> रजिया सुल्ताना का चरित्र एवं उसके कार्यों का मूल्यांकन
तेरहवीं सदी के भारतीय सुल्तानों में रजिया का व्यक्तित्व अत्यन्त प्रभावशाली था. मिन्हाजुस सिराज के अनुसार, वह एक महान् शासिका थी जिसमें एक शासक के सभी गुण विद्यमान थे. रुकुनुद्दीन फिरोज के समय की बिगड़ी हुई स्थिति को उसने बड़ी आसानी से सम्भाल लिया. शक्तिशाली तुर्क अमीरों के उग्र विरोध के बावजूद बड़े साहस और कौशल से उसने अपनी सत्ता सुदृढ़ कर ली तथा सन् 1236 से 1238 ई. तक वह निरन्तर सफल रही. उसने तुर्क सरदारों के विद्रोह को कुचला एवं रणथम्भौर के विद्रोही राजपूतों को पराजित किया. उसने तुर्क अमीरों की शक्ति को कम करने के लिए प्रतिद्वन्द्वी दल का गठन किया. उसने तुर्की अमीरों एवं सरदारों को शाही आज्ञा मानने के लिए विवश कर दिया. वे सुल्ताना की शक्ति से भय खाने लगे.
1238 ई. में गजनी ननियान के ख्वारिज्म सूबेदार मलिक हसन करलुग ने उससे जब मंगोलों के विरुद्ध सहायता माँगी तब उसने उसके प्रति सहानुभूति अवश्य प्रकट की, लेकिन सैनिक सहायता नहीं प्रदान की. इस प्रकार उसने अपने पिता की तरह ही भारत को मंगोल अ आक्रमण से बचाया.
वास्तव में एक नारी होने के दुर्भाग्य के कारण ही उसे तुर्क सरदारों का सहयोग नहीं मिल सका और अन्त में उसे असफल होना पड़ा. 
> मंगोलों के आक्रमण रोकने के लिए बलबन द्वारा अपनाई गई नीति 
भारत पर मंगोलों के आकमण बहुत पहले से ही होते हैं आ रहे थे तथा बलबन के समय इन आक्रमणों का खतरा बहुत अधिक बढ़ गया था. वे प्रतिवर्ष पंजाब और सिन्ध पर विभिन्न दिशाओं से आक्रमण कर लूटपाट एवं रक्तपात करते रहते थे. अतः बलबन ने अपने साम्राज्य की रक्षा करने के लिए उत्तर-पश्चिम सीमा की ओर विशेष ध्यान दिया और इस दिशा में उसने कुछ निश्चित कदम उठाए जो निम्नलिखित थे—
  1. जिन मार्गों से भारत पर मंगोलों के हमले होते थे उन मार्गों पर बलबन ने बहुत से नए और मजबूत दुर्गों का निर्माण करवाया और उनमें शक्तिशाली चौकियाँ स्थापित की गईं.
  2. बलबन ने इस क्षेत्र की रक्षा का दायित्व अपने चचेरे भाई शेरखाँ को सौंपा जो अत्यन्त ही योग्य सेनापति था. उसने अपनी वीरता से मंगोलों के हृदय में आतंक फैला दिया. 1270 ई. में शेर खाँ की मृत्यु के बाद उसने अपने योग्य पुत्र मुहम्मद को मुल्तान का एवं दूसरे पुत्र बुगरा खाँ को समाना का अधिकारी नियुक्त किया. ये ही दोनों प्रान्त मंगोलों के आक्रमणों के प्रमुख लक्ष्य थे.
  3. बलबन ने इस क्षेत्र की निगरानी रखने के लिए अपना अधिकांश समय राजधानी दिल्ली में रहना प्रारम्भ किया तथा बाहर जाना बन्द कर दिया. उत्तर-पश्चिम सीमा प्रान्त की सुरक्षा की वजह से ही उसने भारत के सुदूर प्रदेशों को जीतने का प्रयास नहीं किया.
बलबन के इन सभी प्रयत्नों के फलस्वरूप कुछ वर्षों तक उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर शान्ति बनी रही और मंगोल आक्रमणों की सम्भावना काफी कम हो गई, लेकिन 1285 ई. में तैमूर खाँ के नेतृत्व में एक विशाल मंगोल सेना ने पंजाब पर आक्रमण किया. बलबन के सबसे योग्य पुत्र मुहम्मद ने शत्रुओं को अपनी जान गँवाकर पराजित कर दिया. इससे बलवन को बड़ा भारी सदमा लगा और इसी सदमे से उसकी मृत्यु हो गई. 
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि, बलबन द्वारा किए गए उत्तर-पश्चिम की सुरक्षा के लिए उपायों से वह अपने राज्य की सुरक्षा मंगोलों के विरुद्ध कर सका.
> बलबन ने तुर्कान-ए-चहलगानी का अन्त क्यों और कैसे किया ?
इल्तुतमिश के समय में स्थापित चालीस गुलामों का संगठन बलबन के राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा था. राज्य की भूमि का एक बड़ा भू-भाग इनके अधीन था. ये तुर्क सरदार बड़े शक्तिशाली, कपटी, धूर्त थे तथा बलबन की निरंकुशता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थे. अतः बलबन ने इनको कुचलने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए
  1. बलबन ने छोटे सरदारों को उच्च पद देकर उनको तुर्क सरदारों के समकक्ष बना दिया.
  2. साधारण अपराध करने पर भी तुर्क सरदारों को कठोर दण्ड दिए गए. बदायूँ के शासक मलिक बकबक को अपने एक सेवक को मार डालने के अपराध में 500 कोड़े सरेआम लगवाए गए. इसी तरह अवध के सूबेदार हैबत खाँ को 500 कोड़े लगवाये गये और फिर 20 हजार टका हर्जाना मृतक की विधवा को दिलवाकर उसे मुक्त किया गया. चालीस तुर्क सरदारों में एक अत्यन्त योग्य एवं महत्वाकांक्षी व्यक्ति शेरखाँ, जोकि बलबन का चचेरा भाई था, को जहर देकर मरवा डाला.
  3. बलबन ने तुर्क सरदारों की जागीरों के पट्टे को जाँचने के लिए सरकारी हुक्म जारी किया. इस तरह उसने यह पता लगाया कि, सरदारों ने जायदाद के अनुकूल सेना रख रखी थी या नहीं. उसने अपराधी सरदारों की इस बहाने से जागीरें जब्त कर लीं या उन्हें दिल्ली से बहुत दूर पुरानी बड़ी जागीरों के बदले छोटी जागीरें दे दीं. 
  4. तुर्क सरदारों को अपनी जागीरों से बहुत अधिक आमदनी होती थी. अतः उसने आदेश निकाला कि, एक निश्चित सीमा से अधिक की आय को सरकारी खजाने में जमा कराया जाए. 
  5. बलबन ने अपने सारे राज्य में गुप्तचरों का जाल बिछा दिया तथा ये गुप्तचर प्रत्येक दिन उसके पास महत्वपूर्ण सूचनाएँ भेजते थे.
इस प्रकार स्पष्ट है कि, बलबन ने अपनी कठोर दमनकारी नीति से चालीसा संघ या तुर्क सरदारों की शक्ति को छिन्न-भिन्न कर दिया और सम्पूर्ण राज्य में सुल्तान के पद के गौरव का आतंक छा गया.
> बलबन के राजत्व सिद्धान्त की व्याख्या
बलबन के समय दिल्ली सल्तनत में सुल्तान की प्रतिष्ठा कम हो गई थी तथा तुर्क अमीर बहुत अधिक शक्तिशाली हो तथा वे राजाज्ञा की समय-समय पर अवहेलना किया करते थे. अतः राजपद की गरिमा को बनाने तथा अमीरों की शक्ति को कुचलने के लिए बलबन ने सर्वप्रथम फारस के इस्लामी राजत्व के राजनीतिक सिद्धान्तों व परम्पराओं के आधार पर अपने शासन को संगठित किया तथा अपने राजत्व के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया. उसने योग्य एवं प्रसिद्ध अधिकारियों को नियुक्त किया तथा कानूनों को कठोरता एवं उत्साह से लागू किया, ताकि राज्य शक्ति के पतन को रोका जा सके.
उसने राजपद को अमीरों की मेहरबानी नहीं, बल्कि ‘नियाबते खुदाई’ मानते हुए सुल्तान को 'जिल्ले अल्लाह ( ईश्वर का प्रतिनिधि) एवं ईश्वरीय प्रेरणा एवं क्रान्ति का भण्डार माना. राजत्व को उसने निरंकुशता का शारीरिक रूप माना. जनता में राजत्व के प्रति भय बनाए रखने के लिए वह = आवश्यक समझता था कि राजत्व को जनता के बीच नहीं जाना चाहिए अन्यथा जनता में राजपद पाने की लालसा जाग उठेगी. वह स्वयं कहता था कि- “जब भी मैं किसी नीच व्यक्ति को देखता हूँ, तो मेरी नसों का खून खौल उठता है." ऐसा सम्भवतः अपने दासत्व की ग्रन्थि से मुक्ति के लिए ऐसा करता था. इसी के साथ वह अपने को तुर्की के पौराणिक वीर ‘आफरियासियाब' का वंशज बताता था, ताकि लोग उसके उच्चकुलीन होने पर शक न कर सकें. उसने अपने दरबार को ईरानी शान और शौकत से सुसज्जित किया, 'सिजदा' और 'पायबोस' की परम्परा भी प्रचलित की तथा उसने अपने पौत्रों का नाम 'कैकुबाद' तथा 'केक्यूमर्श' भी ईरानी सम्राटों के नाम के आधार पर रखे.
दरबार में उसके पीछे प्रमुख अमीर बैठते थे तथा शेष लोग अपने पद के अनुसार खड़े रहते थे. दरबार में केवल वजीर ही उससे बात कर सकता था. वह न तो स्वयं हँसता था और न ही किसी को हँसने की इजाजत देता था. अपने निजी सेवकों तक से भी वह शाही पोशाक में मिलता था. दरबार में वह शाहजादा मुहम्मद की मृत्यु का समाचार सुनकर भी विचलित नहीं हुआ. इन सबका उद्देश्य जनता में राजपद का खौफ बनाए रखना था. वह खलीफा की धार्मिक सत्ता को स्वीकार करता था. वह कहता था- “राजा से प्राप्त संरक्षण के बदले जनता को अहसानमन्द रहना चाहिए." उसने ईश्वर व राजा तथा प्रजा के बीच त्रिपक्षीय सम्बन्ध को राज्य का आधार बनाने का प्रयास किया. राजत्व को वह एक विरासत मानता था तथा विरासत में प्राप्त राजत्व ही वास्तविक एवं औचित्यपूर्ण था.
> बलबन गुलाम वंश के महानतम शासक के रूप में : टिप्पणी
ग्यासुद्दीन बलबन के गुलाम वंश में निःसंदेह महानतम शासक होने का श्रेय दिया जा सकता है. इल्तुतमिश के अयोग्य और विलासी उत्तराधिकारियों के समय भारत में सारा मुस्लिम साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया था. बंगाल व बिहार विद्रोही हो गए थे तथा बहुत से हिन्दू शासकों ने अपनी सत्ता पुनः प्राप्त कर ली थी. इसके अतिरिक्त सल्तनत की सीमाएँ मंगोलों के आक्रमण से त्रस्त थीं. चालीस गुलामों का दल नृप निर्माता बन गया था, किन्तु बलबन ने अपने धैर्य एवं शौर्य से उखड़ते हुए मुस्लिम साम्राज्य की नींव फिर से जमाई तथा विद्रोही तत्वों को कुचलकर राजपद को पुनः प्रतिष्ठा दिलाई.
भीषण संकटकाल में बलबन एक सुयोग्य शासक सिद्ध हुआ. उसने अपने 40 वर्षों के शासनकाल में 'रक्त और लौह' की नीति को अपनाकर दिल्ली सल्तनत को प्रतिष्ठित किया और इन्हीं कारणों से उसे गुलाम वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा जा सकता है. डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसारमहान् योद्धा, शासक, नीति निपुण बलबन, जिसने घोर संकटग्रस्त, अल्पव्यस्क मुसलमान राज्य को संरक्षित रखकर नष्ट होने से बचाया, मध्यकालीन भारतीय इतिहास में सदैव उच्च स्थान पाने का अधिकारी रहेगा. उसने अलाउद्दीन के सफल शासन की भूमिका तैयार की यदि उसने भारत में संघर्षरत मुस्लिम शक्ति को दृढ़ एवं संरक्षित न किया होता तो अलाउद्दीन मंगोलों के आक्रमण का सफल प्रतिरोध करने तथा सुदूरवर्ती प्रदेशों को विजित करने में कभी सफल नहीं होता.
> खिलजी वंश
जलालुद्दीन खिलजी की असफलता के कारण
खिलजी वंश के संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी ने 1290 ई. से लेकर 1296 ई. तक शासन किया इस दौरान वह अनेक कमजोरियों का शिकार रहा जिसके कारण उसकी गिनती एक असफल शासक के रूप में की जाती है. उसकी निम्नलिखित कमजोरियाँ थीं-
  1. जिस समय जलालुद्दीन खिलजी शासक बना था उस समय 'रक्त और तलवार' की नीति में विश्वास करने वाला शासक ही सफल हो सकता था. जलालुद्दीन ने इस नीति को न अपनाकर बड़ी भारी भूल की.
  2. दिल्ली के तुर्क खिलजियों को तुर्क नहीं मानते थे. वे उनसे घृणा करते थे और उन्हें अपने से छोटा समझते थे. अतः उनका प्रयत्न यही रहा कि, जलालुद्दीन खिलजी शासन सत्ता से हाथ धो बैठे.
  3. जिस समय जलालुद्दीन शासक बना उसकी उम्र वृद्धावस्था के नजदीक थी तथा अब उसमें प्रभावशाली 15ढंग से शासन करने की योग्यता नहीं थी. वह आवश्यकता से अधिक उदार था और इसका लाभ उसके विरोधियों ने खूब उठाया.
  4. जलालुद्दीन ने राजपद और उसके शानो-शौकत की कोई परवाह नहीं की. वह मामले में सदैव उदासीन ही बना रहा. उसकी कृपा एवं दया की नीति ने उसके राज्य की नींव हिला दी.
  5. जलालुद्दीन के साथी अत्यन्त ही महात्वाकांक्षी व्यक्ति थे वे चाहते थे कि सुल्तान एक विजेता की भाँति रहे लेकिन वह उदार नीति का अनुसरण करता था. इस कारण से उसके साथियों में निराशा फैल गई और वे इससे छुटकारा पाने के लिए प्रयासरत हो गए.
  6. जलालुद्दीन अपने स्वभाव से सबको खुश रखना चाहता था, लेकिन उसके युग में यह सम्भव नहीं था. सभी को खुश रखने के चक्कर में वह किसी को भी खुश नहीं रख सका.
जलालुद्दीन की अतिशय उदारता और विनम्रता ने उसकी कब्र खोद दी. वास्तव में जलालुद्दीन इसलिए असफल नहीं हुआ कि उसमें वीरता, योग्यता एवं कुशलता की कमी थी. उसकी असफलता अथवा अयोग्यता उसकी 'शान्तिप्रियता' थी.
> मंगोल आक्रमण और अलाउद्दीन खिलजी की मंगोल नीति
अलाउद्दीन के समय में मंगोलों का पहला आक्रमण 1297-98 ई. में कादर खाँ के नेतृत्व में हुआ. ट्रांसआक्सियाना के शासक दवा खाँ ने एक लाख सैनिक कादर खाँ के नेतृत्व में भेजे थे. कादर खाँ लाहौर तक बढ़ आया और उसने काफी लूटपाट मचाई. अलाउद्दीन खिलजी ने जफर खाँ और उलुग खाँ को कादर खाँ के विरुद भेजा. जालंधर के निकट कादर खाँ की विशाल सेना पराजित हुई. बीस हजार से अधिक मंगोल मारे गए और अनेक स्त्री-बच्चों को बन्दी बनाकर दिल्ली भेज दिया गया.
दवा खाँ के भाई सालदी के नेतृत्व में मंगोलों का दूसरा आक्रमण 1299 ई. में हुआ. उसने सेहवान पर अधिकार कर लिया, परन्तु वह भी जफर खाँ के हाथों पराजित हुआ. इस विजय से जफर खाँ की ख्याति इतनी बढ़ गई कि अलाउद्दीन खिलजी भी उसे खतरा मानने लगा.
तीसरा मंगोल आक्रमण दवा खाँ के पुत्र कुतलग ख्वाजा के नेतृत्व में 1299 ई. के अन्त में हुआ. इस अभियान में 2,00,000 मंगोल सैनिकों ने भाग लिया. कुतलग ख्वाजा वगैर, किसी विरोध का सामना किए दिल्ली तक आ पहुँचा. कुतलग ख्वाजा और अलाउद्दीन खिलजी के बीच कीली के मैदान में युद्ध हुआ. उलुग खाँ और जफर खाँ ने अलाउद्दीन का भरपूर सहयोग दिया. जफर खाँ ने मंगोलों के हौसले पस्त कर दिए पर मारा गया.
चौथा मंगोल आक्रमण तार्दीबेग के नेतृत्व में 1303 ई. में उस समय हुआ जब सुल्तान की अधिकांश सेना विभिन्न अभियानों पर गई हुई थी. अलाउद्दीन ने स्वयं को सीरी के किले में बन्द कर लिया. मंगोलों ने घेरा डाल दिया पर वे उसे जीत न सके और वापस लौट गए.
पाँचवाँ मंगोल आक्रमण 1305 ई. में अलीबेग और तार्तार खाँ के नेतृत्व में हुआ. इस बार मंगोल अमरोहा तक बढ़ आए. इस सेना को मलिक काफूर और गाजी मलिक ने परास्त कर वापस भेज दिया. 1306 ई. में इन्हीं मंगोल सेनापतियों ने पुनः असफल आक्रमण किया.
अलाउद्दीन के समय का अन्तिम मंगोल आक्रमणकारी इकबालमन्द था, परन्तु वह भी असफल रहा.
अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों का डटकर मुकाबला किया और उन्हें कभी सफल नहीं होने दिया.
> मंगोल आक्रमणों का प्रभाव
अलाउद्दीन खिलजी के समय हुए भारत पर मंगोल आक्रमणों का निम्नलिखित प्रभाव पड़ा - 
1. अलाउद्दीन ने मंगोलों के आक्रमण को विफल करने के उद्देश्य से एक विशाल और स्थाई सेना का गठन किया जो सदैव राजधानी में उपस्थित रहती थी. सीमा प्रान्त में नए दुर्गों का निर्माण किया गया तथा पुराने की मरम्मत करवाई गई.
2. मंगोलों के विरुद्ध बड़ी सेना तैयार करने में बहुत अधिक धनराशि की आवश्यकता पड़ी. अतः अलाउद्दीन ने राजस्व कर बढ़ाकर 1/2 कर दिया तथा बाजार नियन्त्रण व्यवस्था को लागू करने के लिए प्रेरित हुआ.
3. मंगोलों से निपटने के बाद अलाउद्दीन अपनी बड़ी सेना की सहायता से उत्तर व दक्षिण भारत के प्रदेशों को जीतने में सफल रहा.
> अलाउद्दीन खिलजी की विजयें :
(I) उत्तर भारत की विजय :
अलाउद्दीन ने 1296 ई. में शासक बनने के बाद सर्वप्रथम उत्तरी भारत के स्वतन्त्र राज्यों को जीतकर अपने राज्य में मिलाया. उसकी ये विजयें निम्नलिखित थीं –
(1) गुजरात - 1299 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सबसे योग्य सेनापतियों नुसरत खाँ एवं ऊलूग खाँ को गुजरात विजय के लिए एक विशाल सेना के साथ भेजा. गुजरात का शासक राजा कर्ण अपनी पुत्री देवल देवी के साथ भागकर दक्षिण में देवगिरी के शासक राजा रामचन्द्र की शरण में चला गया, किन्तु राजा कर्ण की रानी कमला देवी को मुसलमानों ने पकड़ लिया और उसे अलाउद्दीन के हरम में भेज दिया गया. गुजरात आक्रमण के दौरान नुसरत खाँ को मलिक काफूर हाथ लगा जो आगे चलकर अलाउद्दीन के दक्षिण के अभियानों का नायक बना.
(2) रणथम्भौर — रणथम्भौर के सैनिक दृष्टि से महत्व को देखते हुए अलाउद्दीन ने इस दुर्ग पर आक्रमण 1301 ई. में किया. यहाँ के चौहान वंशी शासक राणा हम्मीर ने मुसलमानी सेना से कड़ा संघर्ष किया तथा इसमें अलाउद्दीन का एक अत्यन्त योग्य सेनापति नुसरत खाँ मारा गया. इस सेना का नेतृत्व करने के लिए अलाउद्दीन स्वयं युद्ध क्षेत्र में उपस्थित हुआ तथा हम्मीर के दो मन्त्रियों रणमल और रत्नपाल को अपनी ओर मिलाकर रणथम्भौर पर अधिकार लिया.
(3) चित्तौड़ – चित्तौड़ पर अलाउद्दीन ने राजा रत्नसिंह की अत्यन्त रूपवती रानी पद्मिनी को प्राप्त करने के उद्देश्य से 1303 ई. में आक्रमण किया, परन्तु डॉ. गोपीनाथ शर्मा के अनुसार, अलाउद्दीन का उद्देश्य सम्पूर्ण उत्तरी भारत को जीतना था न कि केवल पद्मिनी को प्राप्त करना.
सुल्तान का उद्देश्य चाहे कुछ भी रहा हो उसने चित्तौड़ को घेर लिया और यह घेरा सात माह तक चलता रहा. इस युद्ध में रत्नसिंह के दो सेनापतियों 'गोरा' व 'बादल' ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया, लेकिन अन्त में जब किले में रसद सामग्री समाप्त हो गई तब अन्तिम युद्ध में राणा पराजित हो गया तथा राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर अपने प्राण त्याग दिए. क्रुद्ध और हताश अलाउद्दीन ने कत्ले आम का आदेश दे दिया जिस पर 30,000 निरअपराध लोग मार दिए गए. अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने पुत्र खिज्रखाँ के नाम पर 'खिज्रबाद' रख दिया तथा उसे यहाँ का शासक नियुक्त कर दिया.
(4) मालवा एवं जालौर – 1305 ई. में अलाउद्दीन ने मुल्तान के गवर्नर एन-उल-मुल्क को मालवा जीतने का आदेश दिया. मालवा का शासक राय महलक देव 1305 ई. में पराजित हो गया और इसी के साथ ही धार, उज्जैन, चंदेरी तथा माण्डू आदि स्थानों पर अलाउद्दीन का अधिकार हो गया.
लगभग 1311 ई. में अलाउद्दीन के सेनापतियों ने जालौर के शासक कान्हड़देव को परास्त कर उस पर अधिकार कर लिया.
इस प्रकार विभिन्न विजयों के फलस्वरूप अलाउद्दीन खिलजी 1299 से 1311 ई. के मध्य सम्पूर्ण उत्तरी भारत को जीतने में सफल रहा.
> अलाउद्दीन खिलजी की विजयें 
(II) दक्षिण भारत की विजय :
उत्तरी भारत विजित करने के बाद अलाउद्दीन ने दक्षिण भारत को जीतने के लिए अपने योग्य और वीर सेनापति मलिक काफूर को एक विशाल सेना के साथ दक्षिण भेजा. उसके निम्नलिखित दक्षिण अभियान रहे.
(1) देवगिरि–1306 ई. में मलिक काफूर ने देवगिरि पर आक्रमण किया. आक्रमण का प्रमुख कारण वहाँ के शासक रामचन्द्र का सुल्तान को कर देने के वादा करने के बाद भी कर न देना था. इसके अतिरिक्त गुजरात के शासक राजा कर्ण व उसकी पुत्री देवल देवी को उसने शरण दे रखी थी.
इस अभियान में रामचन्द्र ने बिना लड़े ही अपनी हार स्वीकार कर ली तथा हीरे आदि उपहारों के साथ वह दिल्ली गया, जहाँ सुल्तान अलाउद्दीन ने उसका स्वागत किया और ‘राय-रायान' की उपाधि से नवाजा. इसी अभियान में कर्ण की पुत्री देवल देवी को भी पकड़ लिया गया तथा उसका विवाह अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्रखाँ से कर दिया.
(2) वारंगल – 1309 ई. में देवगिरि के बाद मलिक काफूर ने तेलंगाना पर आक्रमण किया. वहाँ के शासक प्रताप रुद्रदेव ने थोड़े प्रतिरोध के बाद आत्मसमर्पण कर दिया. इस अभियान में मलिक काफूर को अतुल धन-सम्पत्ति हाथ लगी जिसे लेकर वह दिल्ली लौट गया.
(3) द्वार समुद्र – 1310 ई. में मलिक काफूर ने देवगिरि व वारंगल की सहायता से इस राज्य पर आक्रमण किया. यहाँ के शासक वीर बल्लाल तृतीय ने वीरतापूर्ण मुकाबला किया, किन्तु पराजित हो गया. उसने मुसलमानों की अधीनता स्वीकार कर अपनी सारी सम्पत्ति मलिक कफूर को समर्पित कर दी तथा वार्षिक कर देने का वायदा किया.
(4) माबर – 1311 ई. में द्वार समुद्र की विजय के बाद मलिक काफूर ने माबर के पाण्ड्य राज्य पर आक्रमण किया. इस समय वीर पाण्ड्य एवं सुन्दर पाण्ड्य के मध्य गद्दी के लिए संघर्ष चल रहा था फिर भी उन्होंने शत्रुओं से डटकर लोहा लिया और अन्त में वीर पाण्ड्य को वनों में भाग जाना पड़ा. मलिक काफूर ने अब इस प्रदेश पर मनमाने ढंग से अत्याचार किए तथा राजधानी मदुरा को जी भरकर लूटा. इस आकमण में मलिक काफूर को अतुलित धन-सम्पत्ति हाथ लगी और वह दिल्ली लौट गया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि 1306 ई. से लेकर 1312 ई. तक अलाउद्दीन ने समस्त दक्षिण भारत को जीत लिया तथा बहुत धन-सम्पत्ति को प्राप्त किया तथा दक्षिण के राज्य आपसी कलह के कारण अपनी स्वतन्त्रता खो बैठे.
> अलाउद्दीन की दक्षिण नीति : विवेचना
अलाउद्दीन की दक्षिण नीति के सम्बन्ध में निम्नलिखित तीन मत प्रचलित हैं-
1. अमीर खुसरो के अनुसार, अलाउद्दीन दक्षिण भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना चाहता था, इसलिए उसने वहाँ के हिन्दू मन्दिरों को तोड़ा तथा कई स्थानों पर मस्जिदें बनवाईं.
2. डॉ. के. एस. लाल एवं अयंगर के अनुसार, अलाउद्दीन का दक्षिण विजय का उद्देश्य इस्लाम का प्रचार-प्रसार नहीं था, बल्कि वहाँ की धन-सम्पत्ति को लूटना था. उत्तरी भारत में अपनी स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिए उसे धन की भारी आवश्यकता थी.
3. कुछ इतिहासकारों के अनुसार, अलाउद्दीन का उद्देश्य केवल दक्षिण भारत की विजय करना था.
उपर्युक्त तीनोंतों पर विचार करें तो पाते हैं कि उसका दक्षिण में इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना मुख्य उद्देश्य नहीं था, क्योंकि इस कार्य हेतु उसने दक्षिण के राज्यों को जीतने के बाद वहाँ कोई स्थाई प्रबन्ध नहीं किए और न ही उसका दक्षिण को विजित कर अपने राज्य का विस्तार करना था. सम्भवतः वह केवल अपने प्रभुत्व का विस्तार करना चाहता था.
अलाउद्दीन का उद्देश्य चाहे जो कुछ भी रहा हो पर इतना तो स्पष्ट है कि उसने अपने दक्षिण अभियान से बहुत बड़ी धनराशि प्राप्त की. इससे वह बहुत अधिक धनवान हो गया और इस धन से उसने एक बहुत बड़ी सेना एकत्र कर ली और इस विशाल सेना के खर्च के लिए ही उसने सम्भवतः दक्षिण में लूटपाट प्रारम्भ की और यही उसका मूल उद्देश्य दक्षिण अभियान का था.
> अलाउद्दीन का राजत्व सिद्धान्त
अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली सल्तनत का एक महान् शासक था जिसने राजनीति और शासन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी दूरदर्शिता और मौलिकता का प्रदर्शन किया. उसका राजत्व सिद्धान्त (Theory of Kingship) भी उसकी मौलिकता का सुन्दर प्रमाण है. अपनी स्थिति के सुदृढ़ होते ही उसने बलबन के राजत्व सिद्धान्त की पुनः स्थापना की, लेकिन उसका केवल अन्धानुकरण ही नहीं किया, वरन् अपनी खुद की सूझ-बूझ भी प्रदर्शित की.
अलाउद्दीन की प्रथम समस्या थी, हड़पें हुए राजत्व को जनता की दृष्टि में उचित सिद्ध करना, जिससे कि वह वास्तविक राजत्व के समकक्ष हो जाए जिसके लिए जनता में प्रेम, लगाव व भक्ति थी. वह ऐसे राजत्व में विश्वास करता था, जो अपने अस्तित्व द्वारा अपना औचित्य सिद्ध कर सके. ‘अमीर खुसरो' ने अलाउद्दीन के लिए राजत्व का प्रतिपादन किया और अलाउद्दीन को 'ईश्वर की छाया' माना गया, किन्तु वह शरीअत में दिए गए सिद्धान्त पर आधारित नहीं था और न ही उसने इस्लामी सिद्धान्तों का सहारा लिया. वह राजनीति में धन के महत्व को समझता था. उसने अपने अपार धन का प्रयोग जनता का हृदय जीतने में किया अलाउद्दीन ने अपने राजत्व को धर्म के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त करने का प्रयत्न किया.
दिल्ली सल्तनत के इतिहास में प्रथम बार उसने यह घोषणा की कि वह उलेमा वर्ग को राज्य की नीति-निर्धारित करने की आज्ञा नहीं देगा. उसने कहा कि, “धर्माधिकारियों की अपेक्षा मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि राज्य की भलाई के लिए क्या आवश्यक है एवं क्या लाभप्रद है?" उसने कहा कि, "मैं नहीं जानता कि कानून की दृष्टि में क्या उचित है और क्या अनुचित ? मैं राज्य की भलाई के लिए जो उचित समझता हूँ, उसे ही करने की आज्ञा देता हूँ. मैं नहीं जानता कयामत के दिन मेरा क्या होगा." वह जानता था कि, वह उन्हीं सिद्धान्तों पर शासन कर सकता है जिसे हिन्दू जनता स्वीकार करती हो. इसी कारण उसने बलबन की उच्च जातीयतावादी नीति का त्याग कर दिया और योग्यता के आधार पर पदों का वितरण किया. उसने अपनी सत्ता के लिए खलीफा का सहारा नहीं लिया फिर भी उसने सदैव अपने को 'खलीफा का नाइब' कहा. वह केवल सैद्धान्तिक दृष्टि से खिलाफत को जीवित रखना चाहता था. विद्रोहों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए उसने अपनी गुप्तचर व्यवस्था को अत्यन्त कुशल बना दिया. दिल्ली में उसने पूर्णतया शराबबन्दी करवा दी. मिल्क, इनाम तथा वक्फ में दी गई भूमि को जब्त कर लिया तथा अमीरों पर अत्यधिक कर लगा दिया जिससे वे अत्यधिक गरीब हो गए और षड्यन्त्रों के विषय में सोचना बन्द कर दिया. इस प्रकार उसने अपने राज्य को षड्यन्त्र रहित बना दिया.
> अलाउद्दीन खिलजी द्वारा किए गए प्रशासनिक सुधार
अलाउद्दीन खिलजी एक महान् विजेता ही नहीं वरन् एक कुशल शासन-प्रबन्धक भी था. अपने विशाल साम्राज्य की सुरक्षा के लिए उसने बड़ी कठोरता से शासन किया. साथ ही शासन के प्रत्येक क्षेत्र में उसने कुछ ऐसे सुधार भी किए जिन्हें आगे चलकर शेरशाह व अकबर ने भी अपनाया. उसके द्वारा प्रशासनिक क्षेत्र में भी निम्नलिखित सुधार किए गए -
  1. अलाउद्दीन ने मदिरापान पर प्रतिबन्ध लगा दिया तथा और उसने स्वयं शराब पीना बन्द कर दिया और शराब पीने वालों पर कठोर दण्ड की घोषणा की. चोरी से शराब तैयार करने वालों को अन्धे कुओं में फेंक दिया जाता था.
  2. प्रशासन के क्षेत्र में उसका दूसरा महत्पूर्ण कार्य पूर्व के सुल्तानों द्वारा मिल्क, इनाम एवं वक्फ में दी गई जागीरों को जब्त कर सम्पूर्ण भूमि को खालसा में परिवर्तित कर दिया. इससे राज्य की आय में काफी वृद्धि हुई.
  3. अलाउद्दीन ने राजस्व कर बढ़ाकर 1/2 कर दिया तथा उसने अन्य प्रकार के भी कई कर लगाए जिनसे प्रजा की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई और जनता अपनी आजीविका कमाने के लिए चिन्तित रहने लगी. इससे अलाउद्दीन को लाभ यह हुआ कि, लोगों के मन में विद्रोह की भावना समाप्त हो गई.
  4. अलाउद्दीन ने अमीरों, दरबारियों के आपसी मेल-जोल और सामाजिक दावतों पर प्रतिबन्ध लगा दिए, ताकि उन्हें शासन के विरुद्ध षड्यन्त्र रचने का मौका ही न मिले तथा यह नियम भी बना दिया कि सुल्तान की अनुमति के बिना अमीर व दरबारी न तो आपस में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करें और न ही दावतें दें.
  5. राज्य में विद्रोहों एवं षड्यन्त्रों पर काबू पाने के लिए अलाउद्दीन ने पूरे राज्य में गुप्तचरों का जाल बिछा दिया तथा ये गुप्तचर उसके कर्मचारियों एवं अधिकारियों की प्रत्येक गतिविधियों की जानकारी उस तक पहुँचाते थे.
  6. अलाउद्दीन ने हिन्दुओं के प्रति कठोर नीति का अनुसरण किया. बर्नी लिखता है कि, "सुल्तान ने ऐसी आज्ञाएँ जारी कीं जिनसे हिन्दुओं की बड़ी दुर्दशा हो गई. उनके घरों में सोना-चाँदी नामोनिशान के लिए भी नहीं रहे. हिन्दू मुकद्दम ( ग्राम का मुखिया), खुत (किसान) और चौधरी (राजस्व वसूल करने वाले ) आदि की दशा इतनी खराब हो गई कि उनको अपना गुजारा चलाने के लिए मुस्लिम सरदारों के यहाँ नौकरियाँ करनी पड़ीं.”
इस प्रकार स्पष्ट है कि अलाउद्दीन ने प्रशासन के क्षेत्र में अनेक सुधार किए तथा अपने राज्य को स्थिरता प्रदान की.
> अलाउद्दीन खिलजी के राजस्व सुधार
जियाउद्दीन बरनी ने अलाउद्दीन के राजस्व सुधारों का विस्तृत विवरण दिया है जिससे स्पष्ट होता है कि तुर्की सुल्तानों में अलाउद्दीन ही वह पहला सुल्तान था जिसने वित्तीय और राजस्व सुधारों में गहरी रुचि का प्रदर्शन किया और इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की. उसके द्वारा राजस्व व्यवस्था में अग्रलिखित सुधार किए गए –
  1. अमीरों, प्रशासकीय कर्मचारियों, धर्मशास्त्रियों आदि को दिए गए उन सभी भूमि अनुदानों को अलाउद्दीन ने वापस ले लिया, जोकि राज्य की ओर से उपहार, पुरस्कार या अनुदान के रूप में दिए गए थे. उसने उन सभी अमीरों के साथ कठोरता का व्यवहार किया जो उ अपने पुराने सुल्तान के प्रति वफादार नहीं थे, क्योंकि जब वे पुराने स्वामी का ही साथ न दे सके तो यह सम्भावना थी कि नए स्वामी के साथ भी अवसर आने पर साथ न देते.
  2. सुल्तान ने अधिकांश हिन्दू स्थानीय राजस्व कर्मचारियों, py जैसे—खुत, मुकद्दम, चौधरी आदि की सम्पत्ति जब्त कर ली, क्योंकि ये लोग राजस्व प्रशासन में बिचौलिए का कार्य करते थे और राजस्व का अधिकांश भाग चट कर जाते थे. अलाउद्दीन ने भूमि कर को बढ़ाकर 1/2 कर दिया तथा जमीदारों को छूट व सुविधाएँ देना बन्द कर दिया गया. उसने खेतों की उपज को अपने लगान का आधार बनाया. इसके अतिरिक्त व त दूध देने वाले जानवरों पर ‘चराई कर’ एवं ‘आवास कर' (घरई कर) भी लागू किया.
  3. सुल्तान अलाउद्दीन ने 'दीवान-ए-मुस्तखराज' नामक एक नए विभाग की स्थापना की जो राजस्व एकत्र करने वाले अधिकारियों के नाम बकाया राशि का जाँच करने और उसे वसूल करने का कार्य करता था. रिश्वत लेने वाले पदाधिकारियों चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान, कठोर दण्ड दिया जाता था.
  4. अलाउद्दीन ने राजस्व प्रशासन को संगठित करने के लिए भूमि की पैमाइस करवाई तथा उसके आधार पर करों का निर्धारण किया गया.
  5. राजस्व विभाग की कुशलता को बढ़ाने के लिए अनेक छोटे-बड़े नए अफसरों की नियुक्ति की गई तथा उनका वेतन बढ़ा दिया गया, ताकि वे रिश्वत न ग्रहण करें.
  6. अलाउद्दीन ने यह व्यवस्था कराई कि किसान भू- कर की अदायगी नकद या अनाज के रूप में कर सकें.
  7. राजस्व कर्मचारियों की जाँच के लिए 'शरफकाई' नामक अधिकारी की नियुक्ति की गई.
इन सब व्यवस्था के अतिरिक्त अलाउद्दीन ने गैरमुसलमानों से जजिया कर लिया, खुम्स (युद्ध में लूट का माल) व जकात (केवल मुसलमानों से) भी राज्य के प्रमुख आय के स्रोत थे. दक्षिण के राज्यों से वार्षिक कर लेने की व्यवस्था की गई. राजस्व प्रशासन संगठित करने से अलाउद्दीन को अपनी बड़ी सेना रखने में काफी सहायता मिली और करों की अधिकता ने जनता को निर्धन बना दिया जिससे उसकी विद्रोह करने की शक्ति क्षीण हो गई.
> अलाउद्दीन के आर्थिक सुधार 
अलाउद्दीन खिलजी ने आर्थिक क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण सुधार किए तथा उसके द्वारा किए गए सुधारों में सबसे महत्वपूर्ण सुधार बाजारों पर नियन्त्रण था. उसने आदेश जारी कर बाजार अनाज से लेकर घोड़ों और गाय-बैलों से लेकर गुलामों तथा आयातित कपड़ों के मूल्य को नियन्त्रित करने के लिए तीन बाजारों की स्थापना की. इनमें एक खाद्यान्न के लिए, दूसरा पशुओं एवं गुलामों के लिए व तीसरा आयतित कपड़े के लिए.
खाद्यान्न के मूल्यों का नियन्त्रण मध्ययुगीन शासकों के लिए लगातार चिन्ता का विषय बना रहा, क्योंकि नगरों में सस्ते खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के बिना नागरिकों व सेना का समर्थन, निष्ठा तथा विश्वास प्राप्त नहीं किया जा सकता अतः अलाउद्दीन ने सभी प्रकार के अनाजों के भाव निश्चित अलाउद्दीन के समय में कीमतों का सस्तापन उतने महत्व का कर दिए. इन मूल्यों में कोई भी वृद्धि नहीं की जा सकती थी. था. नहीं है जितना कि बाजार में कीमतों की स्थिरता कीमतें निश्चित करके सुल्तान ने अनाज का बाजार और सरकारी विक्रयालय स्थापित किए. उत्पादन मूल्य उत्पादकों के लागत से बहुत ज्यादा नहीं होता था. इससे व्यापारियों को मुनाफाखोरी का अवसर नहीं मिलता था. उन्हें बाजार में शाहना नामक अधिकारी के पास अपना नाम दर्ज कराना होता था. घुमक्कड़ व्यापारियों के पास अनाज आसानी से उपलब्ध कराने के लिए दोआब और दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों से 50 प्रतिशत भू-राजस्व वसूलने का आदेश दिया. यह सारा उपलब्ध अनाजं बाजार में आता तथा उसे भण्डारगृहों में रखा जाता था. सुल्तान ने कालाबाजार व मुनाफाखोरी पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगा दिया. अकाल के समय इन सरकारी भण्डारों का अनाज जनता में वितरित किया जाता था.
‘सराय-ए-अदल' निर्मित वस्तुओं तथा बाहर के प्रदेशों से आने वाले माल का बाजार था. विशेष रूप से यह सरकारी सहायता से चलने वाला बाजार था. व्यापारियों द्वारा लाई गई प्रत्येक वस्तु 'सराय-ए-अदल' में ही रखी जाती थी. अलाउद्दीन ने कपड़ा व्यापारियों को खाद्यान्न व्यापारियों की अपेक्षा अधिक महत्व दिया. दिल्ली में व्यापार करने वाले व्यापारी को एक निश्चित मात्रा में माल लाकर सराय-ए-अदल में लाकर बेचने के इकरारनामे पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे. सुलतान ने राजकीय कोष से मुल्तानी व्यापारियों को अग्रिम धन दिया जिससे वे अन्यत्र माल खरीदकर सराय-ए-अदल में बेच सकें. 'परवाना नवीस' बहुमूल्य वस्त्रों की खरीद के लिए प्रतिष्ठित व्यक्तियों को ही परमिट देता था जिससे कोई साधारण व्यक्ति उत्तम श्रेणी का कपड़ा 'सराय-ए-अदल' से सस्ते भाव में खरीदकर चौगुने मूल्य पर न बेच सके.
इसी प्रकार अलाउद्दीन ने पशुओं और दासों की भी कीमतें निर्धारित कर दीं. विभिन्न श्रेणी के पशुओं और दासों की कीमतें भिन्न-भिन्न थीं तथा घोड़ों की कीमत निर्धारित कर उसने दलालों को कठोर दण्ड दिया.
मूल्य नियन्त्रण सम्बन्धी आदेशों के उल्लंघन पर कठोर दण्ड-व्यवस्था की गई, किन्तु फिर भी व्यापारी ग्राहकों को ठगते एवं छलते थे, खोटे बाँट रखते थे और अच्छी किस्म की वस्तुएँ अलग रखते थे. परिणामतः अलाउद्दीन अपने छोटे गुलाम लड़कों को वस्तुएँ खरीदने भेजता था. इस सामान की जाँच कर दोषी व्यापारी को दण्ड दिया जाता था. यदि वह कम तौलता था तो उसकी क्षतिपूर्ति उसके मांस को काटकर की जाती थी.
इस प्रकार अलाउद्दीन की कठोर नियन्त्रण प्रणाली ने, बाजार व्यवस्था को अलाउद्दीन के जीवनकाल में असफल नहीं होने दिया.
> अलाउद्दीन की बाजार नियन्त्रण व्यवस्था के सफल होने के कारण
अलाउद्दीन की आर्थिक सुधार योजना निम्नलिखित कारणों से सफल हुई—
  1. सम्पूर्ण योजना को सुचारु ढंग से संगठित किया गया. वस्तुओं की दरों को नियत कर दिया गया और साथ ही उनकी उपलब्धता को निरन्तर बनाए रखा गया.
  2. अनाज के भण्डारण हेतु राजधानी दिल्ली में बड़े-बड़े सरकारी गोदाम बनवाए गए जिसमें हजारों मन अनाज एकत्र रहता था.
  3. अकाल के समय राशनिंग की व्यवस्था की गई.
  4. कर्मचारी वर्ग की कार्यकुशलता एवं ईमानदारी का पूरा ध्यान रखा गया तथा अपराधी पाए जाने पर उन्हें उचित दण्ड दिया गया.
  5. सरकारी कर्मचारियों को पर्याप्त अधिकार दिए गए, ताकि वे अधिक कार्यकुशल बन सकें.
  6. अलाउद्दीन ने स्वयं भी बाजारों एवं मण्डियों के भावों की निगरानी रखी. उसने ऐसी व्यवस्था की कि उसके खुद के नौकरों तथा सरकारी विभाग द्वारा उसे नियमित रूप से जानकारी मिलती रहे.
> अलाउद्दीन के आर्थिक सुधारों का मूल्यांकन 
अलाउद्दीन ने जो आर्थिक सुधार लागू किए वे कुछ मायने में तो राज्य के लिए अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए एवं कहीं वे बहुत अधिक हानिप्रद भी रहे जो अन्त में खिलजी साम्राज्यवाद के लिए घातक बने. इस व्यवस्था के गुण-दोष निम्नलिखित हैं-
गुण : 
  1. अलाउद्दीन के पास विशाल स्थाई सेना थी. अलाउद्दीन अपने आर्थिक सुधारों की वजह से राजकोष पर बिना अतिरिक्त बोझ डाले ही ही इस का खर्चा चलाने में सन सफल रहा.
  2. दिल्ली और आस-पास के लोगों को वस्तुएँ सस्ते दामों पर प्राप्त होने लगीं.
  3. जिन पदाधिकारियों के वेतन घटाए नहीं गए थे उन्हें वस्तुओं के सस्ती होने से काफी सुविधाएँ मिल गईं. 
  4. व्यापार चलाने के लिए राज्य की ओर से पेशगी के रुपए उधार दिए जाने से मुल्तानी व्यापारियों तथा अन्य सौदागरों को काफ़ी लाभ मिला.
दोष :
अलाउद्दीन के आर्थिक सुधारों से कुल मिलाकर हानियाँ और परेशानियाँ ही अधिक हुई –
  1. जन-साधारण पर आर्थिक सुधारों का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा. किसानों, कारीगरों, व्यापारियों, दस्तकारों आदि को सरकार के हाथ अपना माल बहुत कम कीमत पर बेचने के लिए बाध्य होना पड़ा. 
  2. आर्थिक सुधार मूल रूप से सैनिकों के लिए किए गए थे जितनी कीमतें कम की गईं थी उसी मात्रा में सैनिकों के वेतन में कमी कर दी गई थी.
  3. इन आर्थिक सुधारों के कारण व्यापारी वर्ग में असन्तोष पनपा. वे न तो माल जमा कर सकते थे और न ही वस्तुओं को निश्चित भाव से अधिक पर बेच सकते थे. उनका नाम सरकारी अधिकारियों के पास दर्ज रहता था और वे छोटे-छोटे अपराधों पर या मामूली भूलों पर कठोर दण्ड पाते थे.
  4. दिल्ली में वस्तुओं की कीमत में और बाहर की कीमत में भारी अन्तर होने की वजह से व्यापारियों ने दिल्ली में माल लाना बन्द कर दिया. इसके अलावा अतिरिक्त अच्छी व बहुमूल्य वस्तुएँ सुगमता से प्राप्त नहीं हो पाती थीं.
  5. किसानों की अवस्था तो बहुत ही दयनीय बन गई. उन्हें उपज का आधा भाग सरकार को भूमि कर के रूप में देना पड़ता था और शेष में से अपने गुजारे लायक बचाकर बाकी सब निश्चित सस्ती दरों पर बेचना पड़ता था. इस प्रकार उन्हें अपने परिश्रम का फल नहीं मिल पाता था. 
इस प्रकार स्पष्ट है कि अलाउद्दीन की आर्थिक सुधार योजना तथा मूल्य-नियन्त्रण नीति कुल मिलाकर बहुत अधिक सन्तोषजनक नहीं थी. डॉ. पी. सरन के अनुसार, उसकी आर्थिक नीति एक गम्भीर और आवश्यक राजनीतिक परिस्थिति का परिगाम थी. 
> खिलजी वंश के पतन के कारण
जलालुद्दीन खिलजी और अलाउद्दीन खिलजी ने तलवार के बल पर ही राजगद्दी हासिल की थी और तलवार के द्वारा ही उनके वंश का अन्त हुआ. मुख्यतः अलाउद्दीन ने शक्ति और आतंक के बल पर शासन किया था और शक्ति के आधार पर ही उस साम्राज्य की सुरक्षा सम्भव हो सकी. उसके शासन के दौरान सरदान और नागरिक भयभीत होने के साथ असन्तुष्ट भी थे. इस कारण स्थायित्व के तत्वों का सर्वथा अभाव था. कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी में अलाउद्दीन खिलजी जैसी योग्यता न थी. अतः वह असन्तुष्ट सरदारों एवं नागरिकों पर नियन्त्रण न रख सका. सत्ता के प्रति प्रेम, वफादारी और श्रद्धा उत्पन्न करना शासक का परम कर्तव्य होता है जिसे अलाउद्दीन खिलजी पूर्ण न कर सका. जिसका खामियाजा उसके उत्तराधिकारियों को भुगतना पड़ा. उसने वे सभी कार्य किए जिससे जनता में असन्तोष बढ़ता. अतएव कहा जा सकता है कि अलाउद्दीन की प्रशासनिक नीतियाँ खिलजी साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण थीं. इसके अतिरिक्त खिलजी की अयोग्यता और उसके दुर्गुणों ने भी पतन को गति प्रदान की.
> गियासुद्दीन की प्रशासनिक नीति
गियासुद्दीन ने सत्ता हथियाने के बाद नस्ल के आधार पर तुर्की अमीरों का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया और उसमें सफलता भी प्राप्त की. उसने खुसरव के समर्थकों को भी पदों पर रहने दिया, ताकि वे भी सन्तुष्ट रहें. उसने अलाउद्दीन खिलजी के वंश की लड़कियों के विवाह तो कराए, लेकिन अनेक खिलजी सरदारों से उनकी जागीरें छीन लीं. उन्हें सरकारी पदों से हटा दिया. अलाउद्दीन खिलजी ने जिन व्यक्तियों की जागीरें छीन ली थीं उन्हें उसने वापस कर दिया. इस प्रकार उसने उदारता और कठोरता की नीति का समन्वय करते हुए सभी नागरिकों और सरदारों को सन्तुष्ट करने का प्रयास किया. गियासुद्दीन ने खुसराव द्वारा अनावश्यक रूप से वितरित किए गए धन को वापस लेने का प्रयास किया, लेकिन निजामुद्दीन औलिया से वह धन वापस न ले सका.
उसने किसानों से लगान के रूप में उपन का 1/5 से 1/3 भाग लेना शुरू कर दिया. इसके अतिरिक्त उसने आदेश दिए कि एक वर्ष में एक इक्ता के राजस्व में 1/11 या 1/10 से अधिक वृद्धि न की जाए. पुराने हिन्दू लगान अधिकारियों को उनके विशेषाधिकार पुनः दे दिए गए. सरकारी कर्मचारियों को करमुक्त जागीरें दी गईं. उसने नस्क और बटाई प्रथा को जारी रखा. उसने कर्मचारियों को निर्देश दे रखा था कि किसानों को परेशान न किया जाए. अगर कोई कर्मचारी ऐसा करता पाया जाता, तो उसे दण्डित किया जाता था. अपनी इस नीति से गियासुद्दीन ने किसानों, लगान अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों को सन्तुष्ट कर राज्य में स्थिरता का वातावरण तैयार किया, जिसके फलस्वरूप राज्य का उत्पादन बढ़ा और समृद्धि बढ़ी. 
गियासुद्दीन ने पुलों एव नहरों का निर्माण करवाया, न्याय एवं सैन्य व्यवस्था को दुरुस्त कर साम्राज्य को सुरक्षित बनाया.
> मुहम्मद तुगलक का चरित्र दो विरोधी तत्वों का मिश्रण था : विवेचना
मध्यकाल में दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों में मुहम्मद तुगलक निःसन्देह एक विशिष्ट एवं विचित्र व्यक्ति था. उसका चरित्र, व्यक्तित्व और कृतित्व असाधारण किन्तु विरोधाभासों से इतना परिपूर्ण था कि इतिहास में उसका स्थान निर्धारण करना एक कठिन कार्य है. उसके कार्यों को देखकर इतिहासकारों ने उसे पागल तक कहने में संकोच नहीं किया है. बरनी लिखता है कि, “ईश्वर ने सुल्तान मुहम्मद को एक अद्भुत जीव बनाया था. उसके विरोधाभासों एवं योग्यताओं को समझना आलिमों एवं बुद्धिमानों के लिए सम्भव नहीं है. उसे देखकर बुद्धि चकरा जाती है और उसके गुणों का अवलोकन कर चकित तथा स्तब्ध रह जाना पड़ता है.” वस्तुतः उसके साथ कुछ मौलिक गुण थे और साथ ही हमें उसमें अनेक दोष भी नजर आते हैं, जिनका विवरण निम्नलिखित है - 
मुहम्मद तुगलक अपने समय का प्रकाण्ड विद्वान था, उसमें योग्यता, सूझ-बूझ, बुद्धिमता, दानशीलता आदि अनेक उच्चकोटि के मानवीय गुण विद्यमान थे. वह गणित, ज्योतिष, भूगोल, चिकित्साशास्त्र एवं शरियत का ज्ञाता था.
मुहम्मद तुगलक लिखने एवं बोलने दोनों में दक्ष था. उसकी बुद्धि कुशाग्र, स्मरण शक्ति आश्चर्यजनक थी और वह असीम ज्ञान-पिपासु था, उसके विचार एवं जीवन स्तर बहुत ऊँचे थे. वह सामान्य व्यसनों से मुक्त था तथा स्वभाव से अत्यन्त विनम्र था.
मुहम्मद तुगलक अपने व्यक्तिगत जीवन में एक आस्थावान मुसलमान था तथा 5 बार नमाज पढ़ता था, लेकिन वह अन्धविश्वासी नहीं था. वह नियमों को अपने तर्क की कसौटी पर कसता था. वह उलेमा वर्ग की रूढ़िवादी व्यवस्था का विरोधी था. उसका नैतिक आचरण अनुकरणीय था. उसने एक से अधिक विवाह भी नहीं किया था. यह हिन्दुओं के प्रति अन्य सुल्तानों की अपेक्षा अधिक सहिष्णु था.
मुहम्मद तुगलक में अत्यधिक मौलिकता थी. नूतनता का वह पुजारी था. अतः नई-नई योजनाएँ बनाने और नए-नए कार्यों को जल्दी से पूरा कर देने में वह व्यावहारिकता की उपेक्षा कर देता था. सुल्तान ने प्रशासकीय, आर्थिक और सैनिक सभी क्षेत्रों में अभिनव प्रयोग किए, पर उसे यश न मिल सका, यह उसका दुर्भाग्य ही था कि उस जैसे प्रतिभाशाली मौलिक विचारों के धनी और ज्ञानी तथा अनुभवी शासक को लोगों ने ‘महान्' व की अपेक्षा ‘पागल’ कहा.
जो सुल्तान दया और उदारता की प्रतिमूर्ति था, सनक में आने पर वह मनुष्य के खून का प्यासा हो जाता था. उसके क्रोध से न तो मुसलमान बचता था और न ही हिन्दू. कोई कह नहीं सकता था कि उसका क्रोध कब भड़क उठेगा एक बार उसने 350 मनुष्यों की हत्या कराई.
वह एक विद्वान होते हुए भी बहुत अधिक घमण्डी था. उसमें दूरदर्शिता का अभाव था. उसका अहंकार इतना अधिक था कि वह विश्व-विजय का स्वप्न देखा करता था. उसमें व्यावहारिक ज्ञान की इतनी कमी थी कि वह किसी क्षेत्र में भी सफल नहीं हो सका. वह ऊँचे-से-ऊँचे सिद्धान्तों एवं कल्पनाओं में डूबा रहता था. लेनपूल ने लिखा है कि “मुहम्मद तुगलक के बहुत अधिक अच्छे विचार और इरादे होते हुए भी उसमें धैर्य की कमी थी. उसकी योजनाएँ सिद्धान्त रूप में ठोस होती थीं और कभी-कभी राजनीतिक सूझ भी होती थी, पर वे योजनाएँ अव्यावहारिक सिद्ध हुईं जिससे प्रजा व राज्य पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ा. यह सब कुछ सुल्तान की चारित्रिक कमियों के कारण हुआ. अपनी नीतियों की असफलता से वह क्रोधी एवं चिड़चिड़ा हो गया तथा अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठा तथा एक गड़बड़ी के बाद दूसरी गड़बड़ी करता चला गया.
इस प्रकार स्पष्ट है कि मुहम्मद तुगलक गुणों एवं अवगुणों का पुंज था. वास्तव में उसमें विरोधी गुण एक साथ भरे थे. वह एक ऐसा बादशाह था जिसकी अस्थिर प्रकृति के कारण उसके गुण-अवगुण में बदल जाते थे. इसलिए वह अपने समकालीन व्यक्तियों में अबूझ पहेली ही बना रहा. वास्तव में वह समय से पूर्व पैदा हुआ था.
> मुहम्मद तुगलक और उसकी योजनाएँ
मुहम्मद तुगलक ने अपने शासन प्रारम्भिक 10 वर्षों में प्रजा की खुशहाली के लिए अनेक योजनाओं का निर्माण किया, परन्तु व्यावहारिकता की कमी के कारण उसकी सारी योजनाएँ असफल हो गईं और उसे आलोचना का शिकार होना पड़ा. उसकी योजनाएँ निम्नलिखित थीं-
(1) दोआब में कर वृद्धि - मुहम्मद तुगलक ने अपने राज्यारोहण के समय प्रचुर मात्रा में धन लुटाकर राजकोष, जोकि पहले से ही लगभग खाली था और खाली कर दिया तथा जनकल्याण को देखते हुए और अधिक धन की आवश्यकता थी. अतः 1330 ई. में दोआब के अत्यन्त ही उपजाऊ क्षेत्र में भूमिकर पहले की अपेक्षा दोगुना कर दिया.
जिस समय मुहम्मद तुगलक ने इस क्षेत्र में कर बढ़ाया उसी समय दुर्भाग्य से इस इलाके में अकाल पड़ गया तथा उस वर्ष कोई भी फसल नहीं हुई इस पर तुगलक के अधिकारियों ने बड़ी ही कठोरता से करों की वसूली की तथा किसानों की दशा इतनी शोचनीय हो गई वे खेत छोड़कर वनों में भाग गये. इससे देश की कृषि को अधिक बहुत आघात लगा.
कुछ समय बाद जब सुल्तान को स्थिति का ज्ञान हुआ तो उसने बढ़ाए गए कर वापस ले लिए. इतना ही नहीं उसने जनता की सहायता के लिए ऋण, निःशुल्क भोजन, कुओं, तालाबों एवं नहरों आदि का निर्माण करवाया, लेकिन इतने प्रयत्नों के बावजूद भी दोआब पहले जैसा आबाद नहीं हो सका.
(2) कृषि विभाग ( दीवान-ए-कोही) की स्थापना – मुहम्मद तुगलक का दूसरा महत्वपूर्ण प्रयोग कृषि विभाग की स्थापना था. इसे स्थापित करने का उद्देश्य यह था कि राज्य की ओर से सीधी सहायता देकर कृषि योग्य भूमि का विस्तार किया जाए. इस कार्य हेतु 60 वर्ग मील भूमि का चुनाव किया गया तथा इसमें बारी-बारी से फसलें उगाई गईं तथा दो वर्ष तक इस क्षेत्र के लिए राजकोष से भारी धनराशि प्रदान की गई, लेकिन निम्नलिखित कारणों से यह प्रयोग असफल सिद्ध हो गया -
(A) कृषि के लिए जिस भूमि का चुनाव किया गया वह उपजाऊ नहीं थी.
(B) सुल्तान स्वयं इस ओर ध्यान न दे सका फलस्वरूप कर्मचारियों ने अपनी मनमानी की.
(C) यह प्रयोग केवल तीन वर्ष तक के लिए चलाया गया तथा इतनी कम अवधि में आशा के अनुरूप परिणाम नहीं निकल सका.
(D) राज-कर्मचारियों द्वारा राजकोषीय धन के दुरुपयोग के कारण भी यह योजना असफल रही.
डॉ. आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव के अनुसार, “राजस्वव्यवस्था इतिहास का सर्वाधिक विफल प्रयोग रहा और इसे त्याग देना पड़ा. " 
(3) राजधानी परिवर्तन – 1327 ई. में मुहम्मद तुगलक ने निम्नलिखित कारणों से अपनी राजधानी दिल्ली के स्थान पर दक्षिण के नगर देवगिरि बनाने का निश्चय किया - 
(A) बरनी के अनुसार, "देवगिरि दिल्ली की अपेक्षा साम्राज्य के केन्द्रीय स्थान पर था और वहाँ से विशाल साम्राज्य का शासन करना अधिक सुगम था.
(B) मुहम्मद तुगलक ने अपनी राजधानी को मंगोलों के हमलों से बचाने के लिए देवगिरि (दौलताबाद) को बनाया.
(C) डॉ. पी. सरन के अनुसार, राजधानी, परिवर्तन का वास्तविक कारण यह था कि वह उत्तर भारत के समान ही दक्षिण भारत में अपना शासन चलाना चाहता था.
(D) इब्नबतूता के अनुसार, सुल्तान प्रजा से रुष्ट हो गया था, क्योंकि उसकी प्रजा ने गुप्त-पत्रों के माध्यम से उसे गालियाँ भेजी थीं. अतः वह दिल्ली को नष्ट करने के बाद अपनी राजधानी दौलताबाद ले गया.
सुल्तान ने राजधानी परिवर्तन के आदेश दिए तथा मार्ग में जनता की सुविधा के लिए बहुत से इन्तजाम किए गए, लेकिन फिर भी जनता को अपार कष्टों का सामना करना पड़ा. बादशाह जब दक्षिण में रहने लगा तब उत्तर में प्रशासन शिथिल हो गया. अतः सुल्तान ने वापस नागरिकों को दिल्ली लौटने का आदेश दिया और लोगों को पुनः विषम कठिनाइयों का सामना करना पड़ा तथा राजकोष का विपुल धन बर्बाद हुआ और उसकी यह योजना पूर्णतया असफल हो गई.
(4) सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन 
मुहम्मद तुगलक ने 1330 ई. में अपने राज्य में पीतल व ताँबे के सिक्के जारी किए, जिसके कारण निम्नलिखित थे
(A) बरनी के अनुसार, सुल्तान ने राजकोष की हानि को पूरा करने और व्यापार को पुनः व्यवस्थित तथा उन्नत बनाने के लिए सांकेतिक मुद्रा चलाई.
(B) सुल्तान को नए-नए प्रयोग करने का बहुत अधिक शौक था और भारतीय मुद्रा इतिहास में एक नया अध्याय आरम्भ करने के उद्देश्य से ही उसने ताँबे के सिक्के चलाए.
(C) मुहम्मद तुगलक ने चीनी व ईरानी शासकों से प्रेरणा लेकर अपने यहाँ भी सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन किया. 
मुहम्मद तुगलक की यह योजना पूर्णतः असफल हो गई तथापि उसे सैद्धांतिक रूप से निराधार कहना गलत होगा. डॉ. मेंहदी हुसैन के अनुसार, सुल्तान का प्रयोग सामूहिक रूप से अच्छा था और राजनीतिज्ञपूर्ण था, परन्तु उसने इसे कार्यरूप देने में बहुत बड़ी गलती की. ताँबे के सिक्के चलाने से पूर्व टकसाल पर राज्य का एकाधिकार स्थापित करना चाहिए था और प्रचलित ताँबे के सिक्कों को राजकोष में जमा कर लेना चाहिए था, परन्तु सुल्तान ने ऐसा नहीं किया. जनता अपने पिछड़ेपन, अज्ञान और द्वेषभाव के कारण इस योजना के महत्व को न समझ सकी और उसकी यह योजना असफल हो गई.
सुल्तान की सबसे बड़ी भूल यह थी कि वह अपने युग की परिस्थितियों एवं कमियों को न समझ सका. इन परिस्थितियों में यह स्वभाविक था कि, उसकी योजनाएँ असफल हो गईं और उसे भयंकर निराशा का सामना करना पड़ा.
> क्या फिरोज तुगलक साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी था ?
अनेक इतिहासकार फिरोज तुगलक द्वारा अपनाई गई नीतियों को तुगलक साम्राज्य के पतन के लिए उत्तरदायी मानते हैं तथा इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत करते हैं - 
  1. फिरोज तुगलक ने साम्राज्य के अमीरों और सरदारों के प्रति अत्यधिक उदार नीति का अनुसरण किया. इससे अमीरों की क्षमतां, कुशलता एवं स्वामिभक्ति पर विपरीत असर पड़ा तथा वे अपने हितों की खातिर साम्राज्य के हितों का बलिदान करने लगे. साम्राज्य की सैनिक शक्ति पर इसका विशेष रूप से बुरा प्रभाव पड़ा.
  2. फिरोज तुगलक ने उलेमा वर्ग को अत्यधिक महत्व प्रदान किया. इससे प्रशासन में उलेमा वर्ग का हस्तक्षेप बहुत अधिक बढ़ गया. इससे सल्तनत में धार्मिक कट्टरता और पक्षपात बहुत अधिक बढ़ गए. 
  3. फिरोज तुगलक एक धर्मान्ध व्यक्ति था. उसने हिन्दुओं और गैर-सुन्नी जनता पर अत्यधिक अत्याचार किए जो अन्त में उसके साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुए.
  4. पूर्व के सभी सुल्तानों ने अपने राज्य में वजीर के महत्व को अधिक बढ़ने नहीं दिया, लेकिन फिरोज ने अपने वजीर मकबूल और बाद में उसके पुत्र जूनाशाह को असीमित अधिकार प्रदान कर दिए. फलस्वरूप इन्होंने अपने को शक्तिशाली बनाने के लिए महत्वपूर्ण पदों पर अपने समर्थकों की नियुक्ति की.
  5. फिरोज तुगलक को दासों को रखने का बहुत अधिक शौक था. इसलिए उसने दासों के विभाग 'दिवान-ए-बंदागान' की स्थापना की. जिस दास प्रथा को बलबन ने समाप्त कर दिया था उसी प्रथा को फिरोज ने सबल बनाकर गुलामों और दासों का एक ऐसा वर्ग पैदा कर दिया जो केवल अपने ही हितों की चिन्ता करने लगा और साम्राज्य के हितों के प्रति या उसी प्रया बेखबर हो गया.
  6. अपनी उदार व्यवस्था के कारण फिरोज अपनी सैन्य व्यवस्था को सुदृढ़ नहीं रख सका. सैनिकों की भर्ती में भी सुल्तान ने पैतृक अधिकार को मान्यता दे दी जिसके फलस्वरूप योग्य और युद्ध निपुण पिता के निर्बल पुत्र भी सेना में स्थान पाने लगे तथा फिरोज ने स्थाई सेना रखने की परम्परा को भी त्याग दिया. उसने अपने सैनिकों एवं पदाधिकारियों में जागीरों का पुनः वितरण कर दिया."
स्पष्ट है कि फिरोज की शिथिल और दुर्बल सैन्य नीति ने सल्तनत की सैनिक शक्ति को गहरा आघात पहुँचाया तथा सुल्तान की आवश्यकता से अधिक उदारता की नीति ने सैनिक शक्ति को निष्क्रिय बनाकर सल्तनत के विनाश को अवश्यम्भावी बना दिया.
> फिरोज तुगलक द्वारा किए गए प्रशासनिक सुधार कार्य : मूल्यांकन
यद्यपि फिरोज को तुगलक साम्राज्य के पतन के लिए जिम्मेदार माना जाता है, किन्तु उसके द्वारा किए गए सुधार इन सबसे महत्वपूर्ण हैं. उसके द्वारा किए गए सुधार कार्य जनता तथा राज्य की समृद्धि, सुख तथा शान्ति से सम्बन्धित थे.
फिरोज ने राजस्व सम्बन्धी अनेक सुधार किए, जिसमें ‘तकावी ऋण' समाप्त करना, अफसरों के वेतन बढ़ाना तथा राज्य की आय-व्यय का चिट्ठा तैयार करवाना मुख्य थे. फिरोज ने 24 प्रकार के विभिन्न करों को समाप्त कर दिया. उसके द्वारा शरीअत के अनुसार, केवल चार कर 'जजिया, जकात, खम्स और खिराज' ही लागू किए गए. फिरोज ने 'खम्स' में राज्य का हिस्सा 4/5 से घटाकर 1/5 कर दिया. उसकी एक अन्य उपलब्धि थी— आन्तरिक व्यापार को कर मुक्त करना जिससे राज्य में व्यापार का पर्याप्त विकास हो सका. उसने राज्य की नहरों से सिंचाई सुविधा प्राप्त करने पर 'सिंचाई शुल्क' लागू किया.
सुल्तान ने कृषि की उन्नति के लिए 5 नहरों का निर्माण करवाया. ये नहरें यमुना से हिसार तक, सिरमौर से हाँसी तक, यमुना से फिरोजाबाद, सतलज से घग्घर तक व सतलज से फिरोजाबाद तक बनवाई थीं. इनके अतिरिक्त वह फिरोजपुर, जौनपुर, हिसार, फिरोजशाह का कोटला, फरीदाबाद आदि शहरों को बसाने वाला था तथा सौ पुलों, 200 सरायों, तीस महलों, सौ कब्रों, चार मस्जिदों तथा दस समाधियों का निर्माता भी था. उसने 1200 बाग लगवाए जिनसे 1,80,000 टका वार्षिक आय होती थी.
वह शरा के अनुसार न्याय करता था तथा इसी उद्देश्य से उसने एक मुख्य काजी व प्रान्तों में सहायक काजियों की नियुक्ति की. साथ ही उसने दण्ड की कठोरता में कमी कर दी तथा मानवता के प्रति दया का प्रदर्शन किया. उसने एक रोजगार दफ्तर, एक चिकित्सा विभाग (दारुलसफा) तथा एक 'दिवाने खैरात' नामक विभागों की स्थापना की तथा दासों तक के लिए पृथक् विभाग खोला व उन्हें भी रोजगार प्रदान किए.
सुल्तान स्वयं विद्वान तथा विद्वानों का आश्रयदाता था. 'बरनी' तथा 'सिराज उसके दरबार की शोभा बढ़ाते थे. बरनी ने उसी के संरक्षण में तारीख-ए-फिरोजशाही एवं 'फतवा-ए-जहाँदारी' की रचना की. सुल्तान ने स्वयं अपनी आत्मकथा 'फूतूहात-ए-फिरोजशाही' लिखी. कांगड़ा विजय में प्राप्त संस्कृत के ग्रन्थों का फारसी में 'दलायसे फिरोजशाही' के नाम से अनुवाद करवाया.
किन्तु इन सारे सुधारों के बावजूद भी उसके द्वारा सेना को वंशानुगत बनाना, जागीरें देना, जजिया कर लगाना, उलेमा वर्ग का राजनीति में प्रभाव बढ़ाना उसे तुगलक साम्राज्य के पतन के लिए जिम्मेदार बना देता है.
> भारत पर तुगलक वंश के समय तैमूर के आक्रमण के कारण
तैमूर ने भारत पर आक्रमण करने से पूर्व अपने सरदारों से कहा कि, “मैं वहाँ के (भारत के) काफिरों को तलवार के घाट उतारकर मुस्लिम सिपाहियों को 'गाजी' की उपाधि प्रदान करना चाहता हूँ.” इसके अतिरिक्त तैमूर के भारत पर आक्रमण करने के निम्नलिखित कारण थे
  1. तैमूर एक महात्वाकांक्षी लुटेरा था जो अपने को भारत विजेता का गौरव प्रदान करना चाहता था.
  2. तैमूर ने जब भारत पर आक्रमण किया उस समय भारत में सर्वत्र कुव्यवस्था और भ्रष्टाचार का बोलबाला था तथा भारत की राजनैतिक स्थिति बड़ी सोचनीय थी. तैमूर के आक्रमण के लिए भारत की परिस्थितियाँ अनुकूल थीं.
  3. तैमूर भारत की धन सम्पदा से भली-भाँति अवगत था. उसने अतीत के आक्रमणकारियों द्वारा भारत की महान् लूट के वर्णन सुने थे. अतः वह भी इस सोने की चिड़िया को लूटने को लालायित हो गया.
  4. तैमूर ने इस्लाम का प्रचार एवं मूर्तिपूजक हिन्दुओं को नष्ट करने का अन्तिम बहाना किया तथा वह अपने इस कार्य से 'गाजी' की उपाधि पाने की लालसा लिए हुए था.
> तैमूर के भारत पर आक्रमण के निम्नलिखित प्रभाव पड़े
  1. तैमूर के आकमण से सर्वत्र अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई तथा दिल्ली सल्तनत का शासन छिन्नभिन्न हो गया. प्रान्तीय शासक अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतन्त्र हो गए.
  2. तैमूर के आक्रमण से तुगलक वंश का पतन हो गया.
  3. इस आक्रमण से सारा देश भीषण बर्बादी की आग में जलने लगा. देश की आर्थिक स्थिति को बड़ा धक्का लगा तथा जनता कंगाल हो गई. लाखों लोगों की हत्या किए जाने से सारा देश भय एवं शोक में डूब गया. चारों तरफ लाशों के सड़ने से महामारी एवं अन्य बीमारियाँ फैल गईं.
  4. पंजाब प्रान्त दिल्ली सल्तनत के हाथों से निकल गया और खिज्रखाँ वहाँ का शासक बना जो बाद में सैयद वंश का संस्थापक बना.
  5. इस आक्रमण से भारत के हिन्दुओं और मुसलमानों में और भी अधिक द्वेष बढ़ गया.
  6. तैमूर भारतीय कलाकारों को अपने साथ समरकन्द ले गया जिन्होंने उसे एक अत्यन्त सुन्दर नगर बना दिया. इस प्रकार से भारत व मध्य एशिया की कला का सम्मिश्रण हुआ.
तैमूर के आक्रमण के प्रभाव भारत पर अस्थायी ही पड़े, क्योंकि वह जिस गति से भारत आया उसी गति से इसे लूट कर चला गया.
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