General Competition | History | (मध्यकालीन भारत का इतिहास) | विजयनगर और बहमनी साम्राज्य
विजयनगर राज्य की स्थापना हरिहर और बुक्का ( 1336 ) नाम के दो भाईयों ने की, जिनके तीन और भाई थें।

General Competition | History | (मध्यकालीन भारत का इतिहास) | विजयनगर और बहमनी साम्राज्य
विजयनगर साम्राज्य (1336-1565)
- विजयनगर का शाब्दिक अर्थ "जीत का शहर" होता है ।
- विजयनगर राज्य की स्थापना हरिहर और बुक्का ( 1336 ) नाम के दो भाईयों ने की, जिनके तीन और भाई थें।
- हरिहर और बुक्का वारंगल के काकतीय राजा के सामंत थें और बाद में कांपिली (कर्नाटक) नामक राज्य में मंत्री बन गयें।
- जब एक मुस्लमान विद्रोही को शरण देने के कारण कांपिली पर मुहम्मद बिन तुगलक ने आक्रमण करके उसे जीत लिया तो इन दोनों भाईयों को बंदी बनाकर इस्लाम में दीक्षित कर लिया ।
- इस्लाम धर्म स्वीकार करने के उपरांत इन्हें विद्रोहियों के दमन के लिए दक्षिण भारत भेजा गया ।
- दक्षिण भारत में फैली अराजकता और तुर्क सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाकर तुंगभद्रा नदी के किनारे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान को विजयनगर के रूप में बसाया और शासन करने लगें ।
- हरिहर और बुक्का ने अपने पिता की स्मृति स्मृति में संगम वंश की नींव रखी।
- ये दोनों भाई अपने गुरू विधारण्य की प्रेरणा से पुनः हिंदू बनें और विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की ।
- विजयनगर साम्राज्य के 4 राजवंश (संगम, सालुव, तुलुव और अरावीडु वंश) ने 300 वर्षो से अधिक समय तक शासन किया ।
- विजयनगर साम्राज्य की राजधानियाँ भी बदलती रही, जिनका क्रम है- आनेगोंडी → विजयनगर (हम्पी ) → पेनूकोंडा और चंद्रगिरी ।
- विजयनगर का वर्तमान नाम हम्पी (कर्नाटक, बेल्लारी जिला, तुंगभद्रा ) है ।
संगम वंश (1336 - 1485)
हरिहर प्रथम ( 1336 - 1356)
- यह इस वंश का प्रथम शासक हुआ । इन्होनें सर्वप्रथम अपनी राजधानी आनेगोंडी को बनाया और शासन के सातवें वर्ष राजधानी स्थानांतरित कर विजयनगर को बनाया ।
- इसका मुख्य सलाहकार संत विधारण्य था जिन्होनें "संगीतसार" नामक ग्रंथ की रचना किया।
- इन्हीं के शासनकाल में महाराष्ट्र में 1347 में बहमनी साम्राज्य की स्थापना हुई जिस कारण विजयनगर साम्राज्य का विस्तार रूक गया।
- 1356 में इनका निधन हो गया ।
बुक्का प्रथम (1356-1377)
- हरिहर प्रथम के निधन के बाद बुक्का प्रथम शासक बना, जिन्होनें "वेदमार्ग प्रतिष्ठापक" की उपाधि धारण की।
- बुक्का प्रथम के काल में दक्षिण भारत के मदुरै राज्य के खिलाफ अभियान कर उसे जीतकर विजयनगर साम्राज्य में शामिल किया गया। इस अभियान का नेतृत्व बुक्का प्रथम का पुत्र कंपन ने किया था। इस बात की जानकारी "मदुरै विजयम” नामक ग्रंथ से मिलती है जिसकी रचना कंपन की पत्नी गंगा देवी ने की है।
- इनके शासनकाल में बहमनी साम्राज्य से संघर्ष हुआ। बुक्का प्रथम ने मुद्गल के किले पर आक्रमण कर संघर्ष की शुरूआत की। इस संघर्ष के दौरान बहमनी के शासक मुहम्मदशाह प्रथम था । इस युद्ध में पहली बार तोपो (बारूद ) का प्रयोग हुआ ।
- माना जाता है कि हरिहर और बुक्का ने संयुक्त शासन चलाया। (पहली बार कुषाणों ने संयुक्त शासन चलाया ।)
हरिहर द्वितीय (1377-1406)
- 1377 ई. में बुक्का प्रथम के निधन के बाद हरिहर द्वितीय शासक बना ।
- हरिहर द्वितीय इस साम्राज्य का पहला शासक हुआ जिसने " महाराजाधिराज" की उपाधि धारण किया ।
- ऋग्वेद के सुप्रसिद्ध टीकाकार सायण इनके प्रधानमंत्री थें।
- निधन - 1406 ई. I
देवराय प्रथम (1406-1422)
- इनके शासनकाल में इटली यात्री "निकोलोकाण्टी" 1420 ई. में भारत की यात्रा पर आया ।
- इनके दरबार में लखन्ना या लक्ष्मीधर नामक व्यक्ति विदेश मंत्री के पद पर था। इन्हें समुंद्री व्यपार की बेहतर जानकारी थी ।
- देवराय प्रथम पहली बार तुर्की मुसलमानों को सेना में भर्ती किया ।
- इन्होनें सिंचाई हेतू हरिहर नदी और तुंगभद्रा नदी पर बांध बनवाया जिससे अनेक नहरें निकाली गई।
- देवराय प्रथम का संघर्ष बहमनी के सुल्तान फिरोजशाह बहमन के साथ हुआ। वस्तुतः इस संघर्ष में बहमनी के सुल्तान की विजयी हुई । देवराय प्रथम ने अपनी पुत्री का विवाह बहमनी के सुल्तान के साथ किया ।
- बहमनी और विजयनगर के बीच 1357 ई. से ही संघर्ष का दौर आरंभ हो गया जो लगभग 200 वर्षो तक चलते रहा। दोनों के बीच संघर्ष का मूलकारण कृष्णा और तुंगभद्रा नदी के बीच के रायचूर दोआब पर अधिकार करने को लेकर होता था ।
देवराय द्वितीय (1422-1446)
- देवराय द्वितीय संगम वंश का सबसे महान शासक था।
- देवराय द्वितीय गजबेटकर (हाथियों का शिकारी) इमादिदेवराय की उपाधि धारण की ।
- तेलगू विद्वान श्रीनाथ इनके दरबार में रहता था। इन्होनें “हरविलासम्" नामक ग्रंथ की रचना की थी ।
- इन्होनें भारी संख्या में मुसलमानों को अपनी सेना में शामिल किया।
- इनके काल में फारस (ईरान) के यात्री अब्दुर्रज्जाक 1442 में भारत की यात्रा पर आया ।
- देवराय द्वितीय ने संस्कृत ग्रंथ "महानाटक सुधानिधि" एवं "ब्रह्मसूत्र' पर भाष्य लिखा ।
- मृत्यु :- 1446 ई0
- देवराय द्वितीय का उत्तराधिकारी मल्लिकार्जुन हुआ जिसे प्रौददेवराय कहा जाता है ।
- अंतिम शासक:- विरूपाक्ष द्वितीय
सालुव वंश (1485-1505)
- 1485 ई. में संगम वंश के शासक विरूपाक्ष द्वितीय की उसके ही सेनापति सालुव नरसिंह ने हत्या कर विजयनगर में दूसरे राजवंश सालुव वंश की नींव रखीं।
- अंतिम शासक- इम्माडि नरसिंह की हत्या वीर नरसिंह ने करके तुलुव वंश की स्थापना किया ।
तुलुव वंश (1505-1565)
- 1505 में वीर नरसिंह ने तुलुव वंश की स्थापना किया। इनका निधन 1509 में हो गया तत्पश्चात् उसका सौतेला भाई कृष्णदेवराय शासक बना।
कृष्णदेवराय (1509-1529)
- कृष्णदेव राय अपनी माता नागल देवी के नाम पर नागलापुर नामक नगर की स्थापना की ।
- इनके शासनकाल में पुर्तगाल यात्री डोमिंग पायस और बारबोसा 1515 ई. में भारत की यात्रा पर आया ।
- इनके दरबार में तेलगू साहित्य के आठ सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थें, जिन्हें अष्टदिग्गज कहा जाता था । अष्टदिग्गज तेलगू कवियों में पेड्डाना सर्वप्रमुख था । इनके शासन काल को तेलगू साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है।
- कृष्णदेव राय ने तेलगू में "आमुक्तमाल्याद" एवं संस्कृत भाषा में "जाम्बवती कल्याणम्" नामक ग्रंथ की रचना की ।
- पेड्डाना को तेलगु भाषा का पितामाह कहते थें । इन्होनें हरिकथाशरणसय तथा मनुचरित की रचना किया ।
- तेनालीराम, कृष्णदेव राय के दरबार में रहता था, जिन्होनें "पाण्डुरंग महामात्य" की रचना किया।
- इनके दरबार में लक्ष्मीधर नामक संगीतकार रहता था जिन्होनें संगीत सूर्योदय नामक ग्रंथ लिखा ।
- कृष्णदेव राय स्वयं आन्ध्रभौज, आन्ध्र - पितामह तथा अभिनवराज जैसी उपाधियाँ धारण किया ।
सैन्य अभियान
- कृष्णदेव राय 1510 में बीदर के शासक महमूद शाह को पराजित किया ।
- 1512 में रायचूर - दोआब और गुलवर्गा के दुर्गो को भी जीत लिया।
- 1513 - 18 ई. के बीच उड़ीसा के गजपति शासक के विरूद्ध कई बार युद्ध अभियान किया । उड़ीसा के शासक प्रताप रूद्रदेव ने कृष्णदेव राय से संधि कर उससे अपनी पुत्री का विवाह कराया।
- 1520 ई. में कृष्णदेव राय ने गोलकुंडा को हराकर वारंगल पर अधिकार कर लिया । अतः मात्र 10 वर्षो में कृष्णदेव राय ने अपने सभी विरोधियों को पराजित कर दक्षिण भारत में स्वयं एवं विजयनगर की प्रभुसत्ता को सिद्ध भी कर दिया ।
- कृष्णदेव राय ने हजारा एवं विट्ठलस्वामी मंदिर का निर्माण करवाया।
- कृष्णदेव राय मुगल शासक बाबर का समकालीन था ।
उत्तराधिकारी
- कृष्णदेव राय का निधन 1529 ई. में हो गया तत्पश्चात् उसका सौतेला भाई अच्युत देवराय शासक बना। पुर्तगाली यात्री नूनिज इन्हीं के शासनकाल में 1535 में भारत आया ।
- इसके पश्चात् सदाशिव राय शासक बना, जिस पर उसके मंत्री "रामराय” का अत्यधिक प्रभाव था।
- रामराय एक योग्य शासन - प्रबंधक था परंतु सफल कूटनीतिज्ञ न था । उसने बहमनी राज्य के खंडों से बने पाँच मुसलमानी राज्यों (अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंडा, बीदर और बरार) में परस्पर फूट डालने और एक-दूसरें के विरूद्ध सहायता देने की नीति अपनाई ।
- कलांतर में रामराय के खिलाफ दक्षिण भारत के चारों मुस्लिम राज्यों (अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुंडा और बीदर) ने "मुस्लिम महासंघ" का निर्माण कर 1565 ई. में तालीकोटा या राक्षसी तागंडी या बन्नीहट्टी के युद्ध में रामराय को परास्त किया ।
- उल्लेखनीय है कि संयुक्त मोर्चे में बरार शामिल नहीं था ।
- इस युद्ध के पश्चात् रामराय को पकड़कर उसकी हत्या कर दी गई, विजयनगर को लूट कर ध्वस्त कर दिया गया । इस प्रकार तालीकोटा के युद्ध से विजयनगर का पतन हो गया |
- वर्तमान में कर्नाटक के हम्पी नामक स्थान पर इसके अवशेष मिलते हैं ।
- तालिकोटा युद्ध के बाद सदाशिव ने तिरूमल के सहयोग से पेनुकोंडा को राजधानी बनाकर शासन प्रारंभ किया ।
- कलांतर में तिरूमल ने तुलुव वंश के अंतिम शासक सदाशिव को अपदस्थ कर पेनुकोंडा में अरावीडू वंश की स्थापना किया जो विजयनगर साम्राज्य के ऊपर शासन करने वाला चौथा एवं अंतिम राजवंश था ।
अरावीडू वंश (1570-1672)
- संस्थापक:- तिरूमल
- इस वंश के शासक वेकट द्वितीय ने चंद्रगिरि को अपनी राजधानी बनाया ।
- वेंकट द्वितीय के शासनकाल में ही वोडेयार ने 1612 ई. में मैसूर राज्य की स्थापना की थी ।
- अंतिम शासक:- श्रीरंग तृतीय
- विजयनगर के शासकों तथा बहमनी सुल्तानों के हितों का टकराव तीन अलग-अलग क्षेत्रों में था- तुंगभद्रा के दोआब में, कृष्णा-गोदावरी के डेल्टा क्षेत्र में और मराठवाड़ा प्रदेश में ।
- तुंगभद्रा दोआब कृष्ण और तुंगभद्रा नदियों के बीच पड़ता था ।
केन्द्रीय प्रशासन
- विजयनगर साम्राज्य में राजतंत्रात्मक एवं वंशानुगत शासन व्यवस्था का प्रचलन था । इस समय राजा को "राय" कहकर पुकारा जाता था।
- राजा के चयन में "नायकों" की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी ।
- विजयनगर कालीन सेनानायकों को " "नायक" कहा जाता था ।
- नायक को वेतन के बदले जो भू-खंड दिया जाता था उसे "आमरम्" कहा जाता था ।
- युवराज के राज्याभिषेक को “युवराज पट्टाभिषेक" कहा जाता था ।
- सम्राट सर्वोच्च न्यायाधीश होता था ।
- राजा को परामर्श देने के लिए मंत्रिपरिषद होता था जिसे सभानायक कहते थें ।
प्रांतीय प्रशासन
- विजयनगर में प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखते हुए साम्राज्य को कई प्रांतों बाँटा गया। कृष्णदेव राय के काल में 6 प्रांतो का विवरण मिलता है ।
- विजयनगर प्रशासन में आयंगर और नायंगर व्यवस्था का प्रचलन था ।
भूमि के प्रकार
- वे कृषक मजदूर जो भूमि के क्रय-विक्रय के साथ ही हस्तांतरित हो जाते थें, कूदि कहलाते थें।
- विजयनगर का सैन्य विभाग कदाचार कहलाता था तथा इस विभाग का उच्च अधिकारी दण्डनायक या सेनापति होता था।
- टकसाल विभाग को जोरीखाना कहा जाता था ।
- उत्तर भारत से दक्षिण भारत में आकर बसे लोगों को "बड़वा' कहा जाता था ।
- चेट्टियों की तरह व्यापार में निपुण दस्तकार वर्ग के लोगों को वीर पंजाल कहा जाता था ।
- विजयनगर में दास - प्रथा प्रचलित थी । मनुष्यों के क्रय-विक्रय को वेसवग कहा जाता था।
- मंदिर में रहने वाली स्त्री को देवदासी कहा जाता था।
- सिंचाई व्यवस्था में पूंजी निवेश द्वारा भी आय प्राप्त की जाती थी, जिसे तमिल क्षेत्र में "दासवंदा" तथा आंध्र कर्नाटक क्षेत्र में ’कोट्टकुडगे" कहा जाता था ।
भू-राजस्व
- विजयनगर राज्य की आय का सबसे बड़ा स्त्रोत "लगान" था जिसकी दर ऊपज का 1/6 हुआ करता था ।
- इस समय विवाह कर प्रचलन था जो 'वर' एवं 'वधु' दोनों से लिया जाता था।
- विधवा से विवाह करने वाले इस कर से मुक्त था।
सिक्का
- विजयनगर का सर्वाधिक प्रसिद्ध सिक्का स्वर्ण का "वराह" था जो 52 ग्रेन का होता था । इसे ही पैगोडा कहा जाता था।
- चाँदी के छोटे सिक्के को "तार" कहा जाता था।
- हरिहर प्रथम के सिक्का पर हनुमान एवं गरूड़ की आकृतियाँ अंकित है ।
- सदाशिव राय के सिक्का पर लक्ष्मी नारायण का अंकन मिलता है।
- पुर्तगालियों ने विजयनगर के सिक्कों की तुलना "हूण" से की है।
सामाजिक व्यवस्था
- वर्ण एवं जाति व्यवस्था का प्रचलन था ।
- ब्राह्मणों को सर्वाधिक विशेषाधिकार प्राप्त था इन्हें मृत्युदंड से मुक्त रखा जाता था।
- समाज में क्षत्रिय वर्ण की अनुपस्थिति के कारण ब्राह्मणों के बाद दूसरा स्थान चेट्टियों या शेट्टियों का था। व्यवसाय / व्यापार करता था ।
- सदाशिव राय ने नाईयों पर से कर हटा दिया था ।
- पर्दा पर्था का प्रचलन नहीं था ।
- वेश्यावृत्ति का प्रचलन था ।
- सत्ती प्रथा विद्यमान था । सत्ती होने वाली स्त्रियों की स्मृति में "प्रस्तर स्मारक” बनायें जाते थें।
- समाज में बाल विवाह, दहेज प्रथा, विधवा विवाह का प्रचलन था ।
- युद्ध में वीरता दिखाने वाले पुरूष को "गंडपेद्र" नामक आभूषण पैरों में पहनाया जाता था।
बहमनी साम्राज्य
- बहमनी साम्राज्य की स्थापना मोहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में 1347 ई. में अलाउद्दीन हसन बहमन शाह ने किया। इनका मूल नाम हसन गंगू एवं जफर खाँ था । (1347 ई.-1358 ई.)
- अलाउद्दीन हसन ने हिन्दुओं के प्रति उदार नीति अपनाई । उसने राज्य में जजिया की वसूली पर प्रतिबंध लगा दिया ।
- फरवरी 1358 ई. में बहमन शाह की मृत्यु हो गई ।
मुहम्मदशाह I (1358 - 1375ई.)
- अलाउद्दीन हसन के मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुहम्मद शाह प्रथम शासक बना।
- इन्हीं के काल में विजयनगर एवं बहमनी के बीच संघर्ष का दौर आरंभ हुआ ।
- मुहम्मद शाह प्रथम का सारा जीवन विजयनगर और वारंगल से युद्ध एवं विजय से संबंधित रहा।
- मुहम्मद शाह प्रथम का सबसे बड़ा योगदान बहमनी की प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित करना था ।
- राज्य प्रबंधन के लिए उसने राज्य को चार तर्फी या अतराफों (प्रांतो)- (गुलबर्गा, दौलताबाद, बरार व बीदर) नें विभाजित किया और प्रत्येक का प्रबंध एक प्रांताध्यक्ष को सौंप दिया जिसे सेना रखना अनिवार्य था।
- इसी के काल में बारूद का प्रयोग पहली बार हुआ जिससे रक्षा संगठन में एक नई क्रांति पैदा हुई।
- 1375 ई. में मुहम्मद शाह प्रथम की मृत्यु हो गई ।
मुहम्मदशाह I के उत्तराधिकारी
- 1375 ई. में मुहम्मद शाह प्रथम की मृत्यु के पश्चात् अगले 22 वर्षो में 5 सुल्तान सत्तारूढ़ हुए। अलाउद्दीन मुहम्मद (1375-78), दाउद ( 1378), मुहम्मद शाह द्वितीय (1378-97), गयासुद्दीन (1397 ) और शम्सुद्दीन दाउद (1397) क्रमबार राजगद्दी पर बैठे। बहमनी साम्राज्य में इन शासकों का शासन कोई विशेष महत्व नहीं रखता ।
ताजुद्दीन फिरोजशाह (1397-1422)
- बहमनी राज्य का अगला महत्वपूर्ण शासक ताजुद्दीन फिरोजशाह था । जिसने 1397 से 1422 ई. तक शासन किया।
- फिरोजशाह ने खेरला के शासक नरसिंह राय को हराकर बरार का प्रांत जीता। उसने विजयनगर के शासक देवराय प्रथम को पराजित कर संधि करने पर बाध्य कर दिया था ।
- फिरोजशाह कला प्रेमी और एक सुलेखक था । उसे अरबी, फारसी और तुर्की के अलावा तेलगू, मराठी एवं मलयालम भाषा का अच्छा ज्ञान था । इन्होनें भीमा नदी के तट पर फिरोजाबाद की स्थापना किया।
शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम (1422-1436)
- शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम ने अपनी राजधानी गुलबर्गा से स्थानांतरित कर बीदर को बनाया । इस नवीन राजधानी को मुहम्मदाबाद के नाम से जाना जाता है ।
- शिहाबुद्दीन अहमद प्रथम ने 1425 ई. में तेलंगना, 1426 ई. में माहुर और 1429 ई. में मालवा के साथ युद्ध किया ।
- इसकी उदारता के कारण इसे अहमद शाह बली या संत अहमद भी कहा जाता है
- ऐसा माना जाता है कि दक्षिण के प्रसिद्ध संत हजरत गेसू दराज से उसका धनिष्ठ संबंध था ।
- गेसू दराज ने उर्दू पुस्तक "मिराज - उल - आशिकीन" की रचना की थी ।
अलाउद्दीन अहमद द्वितीय (1436-1458)
- अलाउद्दीन अहमद द्वितीय (1436 - 1458 ई.) अपने पिता की तरह योग्य एवं विद्वान शासक था ।
- इनका संपुर्ण शासनकाल में तेलंगना, गुजरात, खानदेश, विजयनगर, मालवा और उड़ीसा के साथ युद्ध में व्यतीत हुआ ।
- इसके शासनकाल में महमूद गवाँ को राज्य की सेवा में लिया गया ।
हुमायूँ शाह (1458–1461)
- अलाउद्दीन द्वितीय के बाद उसका पुत्र हुमायूँ शाह गद्दी पर सत्तासीन हुआ । जिसने 1458 ई. से 1461 ई. तक शासन किया।
- हुमायूँ शाह के शासन में महमूद गवाँ एक योग्य सेनानायक था। यही कारण है कि हुमायू शाह के शासनकाल की समस्त सफलताओं का श्रेय महमूद गवाँ को जाता है।
- हुमायू शाह को उसके क्रूर स्वभाव के कारण 'जालिम' कहा जाता है ।
- हुँमायू शाह को दक्कन का नीरों कहा गया है।
- हुँमायू शाह के मृत्यु के पश्चात् उसका अल्प वयस्क पुत्र निजामुद्दीन अहमद तृतीय (1461-63 ई.) सत्ता पर आसीन हुआ। इसके समय प्रधानमंत्री महमूद गवाँ का नियंत्रण संपूर्ण राज्य पर था ।
- इसके समय के बहमनी साम्राज्य अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक विस्तृत हो गया था।
- आंतरिक प्रबंधन के लिए महमूद गवाँ ने राज्य को आठ प्रांतों में विभक्त किया और प्रत्येक में तरफदार नियुक्त किए ।
- 1482 ई. में शम्सुद्दीन मुहम्मद तृतीय (1463-1482) ने मुहम्मद गवाँ को राजद्रोह के आरोप में फाँसी दे दी।
- अंततः दो दशकों के अंदर ही बहमनी साम्राज्य का पतन हो गया।
- महमूद गवाँ ने बीदर में मदरसा की स्थापना करवाया ।
- महमूद गवाँ ने ईरान, ईराक और मिश्र के साथ पत्रों का आदान-प्रदान किया। इस पत्र व्यवहार को "रिजायुल इन्शा" के नाम से जाना जाता है।
- 1470 ई. में रूसी यात्री निकितन बहमनी साम्राज्य की यात्रा पर आया । ( मुहम्मद तृतीय)
- बहमनी वंश के अंतिम शासक कलीमउल्लाह थें ।
- बहमनी वंश का संस्थापक जीवन में कुछ बनने की धुन लेकर साहसिक मार्ग पर निकला एक अफगान था। जिसका नाम था अलाउद्दीन हुसन । उसका उत्थान गंगू नामक एक ब्राह्मण की सेवा में रहते हुए हुआ । इसलिए वह "हसनगंगू' के नाम से जाना जाता है। गद्दीनशीन होने के बाद उसने अलाउद्दीन हसन बहमन शाह का खिताब अपनाया। कहते हैं, कि वह अपने को ईरानी वीर पुरूष बहमन शाह का वंशज बताता था ।
अन्य प्रांतीय राज्यों का उदय
जौनपूर
- गोमती नदी के किनारें जौनपूर नगर की स्थापना फिरोज शाह तुगलक द्वारा अपने चचेरे भाई जौना खाँ की स्मृति में करायी गयी थी । जो बाद में शर्की साम्राज्य की राजधानी बनीं।
- स्वतंत्र जौनपूर राज्य की स्थापना का श्रेय जौनपूर के सूबेदार मलिक हुसैन सरवर को जाता है ।
- 1389 ई. में मलिक सरवर मुहम्मद शाह (फिरोज तुगलक का पुत्र) का वजीर बना ।
- मलिक सरवर ने सीमाओं का कोल (अलीगढ़) सँभल तथा मैनपुरी तक विस्तार किया। 1399 ई. में इसका मृत्यु हो गया।
- ख्वाजा जहान को मलिक-उस-शर्क (पूर्व की स्वामी) की उपाधि 1394 ई. में फिरोजशाह तुगलक के पुत्र सुल्तान महमूद ने दी थी।
जौनपूर के अन्य प्रमुख शासक
- मुबारक शाह (1399–1402 ई.), शम्सुद्दीन इब्राहिम शाह ( 1402-1436 ई.), महमूद शाह (1436 - 1451 ई.) और हुसैन शाह (1458-1500 ई.) ।
- लगभग 75 साल स्वतंत्र रहने के बाद जौनपूर पर बहलोल लोदी ने कब्जा कर लिया ।
- शर्की शासन के अंतर्गत विशेषकर इब्राहिम शाह के समय में जौनपूर में साहित्य एवं स्थापत्य कला के क्षेत्र में हुए विकास के कारण जौनपूर को भारत के सिराज के नाम से जाना गया।
- अटालादेवी की मस्जिद ( जौनपूर) का निर्माण 1408 ई. में शर्की सुल्तान इब्राहिम शाह द्वारा किया गया था ।
- अटालादेवी मस्जिद का निर्माण कन्नौज के राजा विजयचंद्र द्वारा निर्मित अटालादेवी के मंदिर को तोड़कर किया गया।
- जामा मस्जिद का निर्माण 1470 ई. में हुसैनशाह सर्की के द्वारा एवं लाल दरवाजा मस्जिद का निर्माण मुहम्मदशाह के द्वारा किया गया था ।
मालवा
- 1401 में दिलावर खाँ ने स्वतंत्र राज्य के रूप में मालवा की स्थापना की तथा धार को अपनी राजधानी बनाया ।
- 1405 ई. दिलावर खाँ की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अल्प खाँ 'हुसंगसाह' की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा । उसने मांडू को अपनी राजधानी घोषित की।
- हुसंगसाह सूफी संत शेख बुरहानद्दीन का शिष्य था ।
- उसने नर्मदा नदी के किनारें होशंगाबाद नामक नगर की स्थापना की ।
- 1436 ई. में हुसंगशाह के पुत्र मुहम्मद शाह की उसके वजीर महमूद खिलजी ने हत्या कर दी और सत्तासीन होकर मालवा में खिलजी वंश की नींव रखी।
- महमूद खिलजी मालवा का योग्यतम शासक था। उसने गुजरात, बहमनी, मेवाड़ राज्यों से युद्ध कियें ।
- मेवाड़ के राणा कुंभा के साथ युद्ध के उपरांत महमूद खिलजी और राणा कुंभा दोनों ने जीत का दावा किया तथा इसके उपलक्ष्य में राणा कुंभा ने चित्तौड़ में "विजय स्तंभ" तो महमूद खिलजी ने मांडू में (सात मंजिले वाले स्तंभ) का निर्माण करवाया ।
- 1469 ई. में महमूद खिलजी की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र गयासुद्दीन गद्दी पर बैठा। वह नितांत विलासी प्रवृति का शासक सिद्ध हुआ ।
- ऐसा माना जाता है कि गयासुद्दीन के महल में 16000 (सोलह हजार) दासियाँ थी जिनमें से कई हिन्दु सरदारों की पुत्रियाँ थी ।
- उसने तुर्की और इथियोपियाई दासियों की एक अंगरक्षक सेना गठित की थी ।
- कालांतर में महमूद शाह द्वितीय के शासनकाल के दौरान गुजरात के शासक बहादुर शाह ने 1531 ई. में मालवा पर आक्रमण कर उसे अपने अधीन कर लिया तथा महमूद शाह द्वितीय मारा गया ।
- अंततः बादशाह अकबर ने 1562 ई. में अब्दुल्ला खाँ के नेतृत्व में मालवा पर विजय हेतु मुगल सेना भेजी । उस समय वहाँ का शासक बहादुर शाह था। जिसे परास्त कर मालवा को अंतिम रूप से मुगल साम्राज्य का हिस्सा बना लिया गया।
गुजरात
- गुजरात के शासक राजाकर्ण को पराजित कर अलाउद्दीन ने 1297 ई. में इसे दिल्ली सल्तनत में मिला लिया था ।
- 1391 ई. में मुहम्मद शाह तुगलक द्वारा नियुक्त गुजरात का सूबेदार जफर खाँ ने सुल्तान मुजफ्फर शाह की उपाधि धारण कर 1407 ई. में गुजरात का स्वतंत्र सुल्तान बना ।
- गुजरात के प्रमुख शासक थें:- अहमदशाह (1411–52 ई.), महमूदशाह बेगरा (1458-1511 ई.) और बहादुरशाह (1526-37 ई.)
- अहमदशाह ने असावल के निकट साबरमती नदी के किनारें अहमदाबाद नामक नगर बसाया और पाटन से राजधानी हटाकर अहमदाबाद को राजधानी बनाया ।
- गुजरात का सबसे प्रसिद्ध शासक महमूदशाह बेगरा था ।
- महमूद बेगरा ने गिरनार के निकट मुस्तफाबाद नामक नगर और चम्पानेर के निकट मुहम्दाबाद नगर बसाया।
- 1572 ई. में अकबर ने गुजरात को मुगल साम्राज्य में मिला लिया ।
- पुर्तगाली यात्री बारबोसा के अनुसार बचपन से ही महमूद बेगड़ा को किसी जहर का नियमित तौर पर सेवन कराया गया था। यदि कोई मक्खी उसके हाथ पर बैठ जाती थी तो वह तुरंत फुलकर मर जाती थी ।
मेवाड़ (आधुनिक उदयपुर)
- अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 ई. में मेवाड़ के गुहिल्लौत राजवंश के शासक रतन सिंह को पराजित कर मेवाड़ को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया ।
- दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक अव्यवस्था का लाभ उठाकर हम्मीर देव ने 1314 ई. में मेवाड़ राज्य की पुनः स्थापना कर वहाँ सिसोदिया वंश की नींव रखी।
- हम्मीर देव ने मुहम्मद बिन तुगलक के समय चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया तथा लगभग 64 वर्षो तक शासन किया ।
- 1420 ई. में मोकल गद्दी पर बैठा । उसने अनेक मंदिरों का जीर्णोधार करवाया तथा एकालिंग मंदिर के चारों ओर परकोटे का निर्माण करवाया ।
- 1433 ई. में मोकल के मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र राणा कुंभा मेवाड़ का शासक बना। उसके काल में मेवाड़ की शक्ति में प्रभावी वृद्धि हुई ।
- राणा कुंभा ने मारवाड़ के अधिकांश भाग को विजित कर अपने राज्य में शामिल कर लिया ।
- मालवा पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में उसने 1448 ई. में चित्तौड़ में "कीर्ति स्तंभ" का निर्माण जिसे हिन्दु देवशास्त्र का चित्रित कोष कहा जाता है ।
- राणा कुंभा ने चार स्थानीय भाषाओं में चार नाटकों की रचना की तथा जयदेव द्वारा रचित " गीत गोविन्द" पर "रसिकप्रिया" नामक टीका लिखी ।
- राणा कुंभा के मृत्यु के पश्चात् रायमल और तदोपरांत राणा सांगा (1509 - 1528 ई.) ने शासन सँभाला।
- 1518 में खतोली के युद्ध में राणा सांगा ने दिल्ली के शासक इब्राहिम लोदी को पराजित किया ।
- 1527 ई. में खानवा के युद्ध में राणा सांगा बादशाह बाबर से पराजित हुआ ।
- कालांतर में मेवाड़ की शक्ति क्षीण होती चली गई और अंततः जहाँगीर के समय इसे मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
बंगाल
- भौगोलिक रूप से दिल्ली से दुर स्थित होने के कारण बंगाल पर दिल्ली के शासकों का नियंत्रण उतना मजबूत नहीं रह पाता था, जितना अन्य प्रांतों पर रहता था । अतः समय-समय पर वहाँ विद्रोह होते रहते थें ।
- बलबन के काल में तुगरिल खाँ के विद्रोह के दमन के पश्चात् बलबन के पुत्र बुगरा खाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त किया गया।
- बलबन की मृत्यु के पश्चात् बुगरा खाँ को ही वहाँ का स्वतंत्र शासक मान लिया गया और उसने नासिरूद्दीन की उपाधि धारण की ।
- गयासुद्दीन तुगलक ने भी बंगाल पर अभियान किया तथा बंगाल का कुछ हिस्सा अपने अधीन कर लिया और शेष भाग नासिरूद्दीन को दे दिया ।
- मुहम्मद बिन तुगलक के समय बंगाल पुनः स्वतंत्र राज्य बन गया और वहाँ 1340 ई. में फखरूद्दीन मुबारक शाह ने स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया ।
- 1345 ई. में शम्सुद्दीन इलिहास शाह ने संपुर्ण बंगाल को अपने अधिकार में ले लिया। उसके शासनकाल में फिरोजशाह तुगलक ने प्रथम बार बंगाल पर आक्रमण किया; किंतु विफल रहा।
- तत्पश्चात् सिकंदर शाह गद्दी पर बैठा जिसने 1368 ई. में पाण्डुआ में अदीना मस्जिद का निर्माण करवाया। इसके काल में फिरोजशाह तुगलक ने पुनः आक्रमण किया और पुनः विफल रहा |
- कलांतर में गयासुद्दीन आजमशाह ( 1389-1409) और अलाउद्दीन हुसैनशाह (1493 - 1518 ई.) नामक दो प्रसिद्ध शासक हुए। इनके शासनकाल में बंगाल शक्तिशाली राज्य बना रहा ।
- अलाउद्दीन हुसैनशाह चैतन्य महाप्रभु का समकालीन था।
- हिन्दुओं के प्रति उदारता के कारण उसे "कृष्ण का अवतार”, “नृपति तिलक" और "जगत भुषण" जैसी उपाधियाँ से नवाजा गया।
- 1518 ई. में हुसैन शाह की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र नुसरत शाह गद्दी पर बैठा ।
- नुसरत शाह ने गौड़ में "सोना मस्जिद" एवं "कदम रसूल मस्जिद" का निर्माण करवाया ।
- इस वंश के अंतिम शासक गयासुद्दीन महमूद शाह को शेरशाह ने 1538 ई. में बंगाल से भगाकर समूचे बंगाल पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया ।
- तत्पश्चात् अकबर ने बंगाल को मुगल साम्राज्य का हिस्सा बनाया ।
कश्मीर
- 1301 ई. में सूहादेव ने कश्मीर में सुदृढ़ हिंदु राजवंश की नींव डाली ।
- उत्तर भारत के राज्यों में कश्मीर अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण महत्वपूर्ण रहा है ।
- 1339-40 ई. में शाहमीर ने सुल्तान शमसुद्दीन की उपाधि धारण कर कश्मीर में शाहमीर वंश की स्थापना की । वह कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक था।
- सिकंदर शाह (1389 - 1413 ) के मंत्री सुहाभट्ट ने धर्म परिवर्तन कर सिकंदर शाह के सहयोग से कश्मीर में बलपूर्वक हिन्दुओं को धर्म परिवर्तन के लिए विवश किया।
- कश्मीर का सुप्रसिद्ध शासक सुल्तान जैन - उल - आबिदीन था । जिसने 1420-70 ई. के मध्य शांति और प्रजा हित में कार्य किया ।
- आबिदीन ने जजिया और गौहत्या पर प्रतिबंध लगाया।
- अपने कल्याण कारी कार्यो और प्रजा के प्रति उदार नीति के कारण आज भी कश्मीर के लोग आबिदीन को बड़शाह (महान सुल्तान) कहते थें।
- जैन-उल-आबिदीन को कश्मीर का अकबर कहा जाता है ।
खानदेश
- तुगलक वंश के पतन के समय फिरोजशाह तुगलक के सूबेदार मलिक अहमद राजा फारूक्की ने नर्मदा एवं ताप्ती नदियों के बीच 1382 ई. में खानदेश की स्थापना की ।
- खानदेश की राजधानी बुरहानपुर थी । इसका सैनिक मुख्यालय असीरगढ़ था ।
- 1601 ई. में अकबर ने खानदेश को मुगल साम्राज्य में मिला लिया ।
वस्तुनिष्ठ प्रश्न एवं उत्तर
विजयनगर सम्राज्य (1336-1565)
बहमनी सम्राज्य
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