विदेश नीति
भारत की विदेश नीति भारत के राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा देने के लिए विश्व के अन्य राज्यों के साथ भारत के संबंधों का नियमन करती है।

विदेश नीति
भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत
- संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से भारत औपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और नस्लवाद और अब नव-उ -औपनिवेशवाद तथा नव-साम्राज्यवाद के विरुद्ध नीतियां लागू की हैं।
- 953 में विजयलक्ष्मी पंडित को संयुक्त राष्ट्र आमसभा का अध्यक्ष चुना गया।
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र द्वारा कोरिया, कांगो, अल सल्वाडोर, कंबोडिया, अंगोला, सोमालिया, मोजाम्बीक, सियरा लियोन, भूतपूर्व यूगोस्लाविया व अन्य में चलाए गए शांति अभियानों में सक्रिय से भाग लिया।
- भारत संयुक्त राष्ट्र के खुले कार्य समूहों (open ended) में सक्रियता से भाग लेता रहा है। भारत संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करने के लिए बनाए गए कार्य समूह का सह-अध्यक्ष था इसने 1997 में अपनी रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र को सौंपी।
- भारत कई बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है। अब भारत सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है।
भारतीय विदेश नीति के उद्देश्य
- भारत के महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना एवं तीव्र परिवर्तित अंतर्राष्ट्रयीय परिदृश्य पर नजर रखना, जिससे कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ कदम से कदम मिलाकर चला जा सके।
- नीति निर्णयन की स्वायत्तता को बनाये रखना तथा स्थायी, समृद्ध एवं सुरक्षित वैश्विक मानदंडों की स्थापना में अहम भूमिका का निर्वाह करना ।
- आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान को सहयोग व समर्थन देना।
- भारत के तीव्र आर्थिक विकास एवं वैश्विक निवेश को बढ़ाने वाले अंतर्राष्ट्रीय माहौल को विकसित करना, देश में विज्ञान एवं तकनीकी तथा प्रतिरक्षा को बढ़ावा देने वाले अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को संपन्न करना।
- पी-5 समूह के देशों के साथ घनिष्ठता से कार्य करना तथा विश्व की महाशक्तियों, यथा- अमेरिका, यूरोपीय समुदाय, जापान, रूस एवं चीन आदि के साथ सामरिक समझौते करना।
- परस्पर लाभकारी सहयोग के आधार पर पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को बढ़ाना एवं उन्हें सुदृढ़ करना तथा एक-दूसरे को सहयोग पहुंचाने की भावना से कार्य करना।
- दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन की सुदृढ़ता एवं स्थायित्व के लिये कार्य करना तथा इस क्षेत्र के देशों के आर्थिक हितों को प्रोत्साहित करना।
- सीमापार आतंकवाद को समाप्त करने का प्रयास करना तथा पाकिस्तान में कार्यरत आतंकवादी ढांचे को समाप्त करना।
- भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति (पूर्ववर्ती 'पूर्व की ओर देखो' नीति) को और पुष्ट करना तथा आसियान साझा हितों की प्रगति के लिए सहयोग करना।
- खाड़ी क्षेत्र के देशों के साथ सहयोग करना, जहां लगभग 4 मिलियन भारतीय रह रहे हैं और जो तेल और गैस आपूर्ति का मुख्य स्रोत हैं।
- क्षेत्रीय संगठनों, जैसे-बिम्सटेक, मेकांग-गंगा सहयोग, आईबीएसए और आईओरआर-एआरसी आदि के साथ सहयोगपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देना।
- जी-20 तथा यूरोपीय समुदाय जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठनों के साथ सहयोग एवं संबंधों को बढ़ावा देना।
- संयुक्त राष्ट्र परिषद में सुधार और पुनर्गठन तथा वैश्विक व्यवस्था में बहुध्रुवीय कल्पना करना, जो संप्रभुता और अहस्तक्षेप के सिद्धांतों का पालन करे।
- विकसित एवं विकासशील विश्व में समान आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों को बढ़ावा देना।
- वैश्विक नाभिकीय निःशस्त्रीकरण के लिये प्रयास करना तथा इसे समयबद्ध ढंग से प्राप्त करना।
- भारतीय डायस्पोरा (diaspora) के साथ निकटता से सतत आधार पर अन्योन्य क्रिया ताकि भारत के साथ इनके संबंधों को मजबूती प्रदान की जा सके और भारत के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में इनकी अहम् भूमिका को मान्यता प्रदान की जा सके।
भारत का गुजराल सिद्धांत
- बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल तथा श्रीलंका जैसे पड़ोसियों के साथ भारत को पारस्परिकता की अपेक्षा नहीं करके इन्हें नेक नियति से वह सब कुछ प्रदान करना चाहिए जो कि भारत कर सकता है।
- किसी भी दक्षिण एशियाई देश को क्षेत्र के किसी अन्य देश में हितों के खिलाफ अपनी भूमि का उपयोग नहीं करने देना चाहिए।
- किसी भी देश को दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नही करना चाहिए।
- सभी दक्षिण एशियाई देशों को एक-दूसरे की क्षेत्रीय शतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से हल करना चाहिए।
- सभी दक्षिण देशों को अपने विवाद शांतिपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से हल करना चाहिए।
भारत का परमाणु सिद्धांत
- विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक का निर्माण एवं अनुरक्षण
- "पहले उपयोग नहीं" की मुद्रा परमाणविक अस्त्र का उपयोग तभी किया जाएगा जब भारतीय भू-भाग पर अथवा भारतीय सुरक्षा बलों पर कहीं भी परमाणविक आक्रमण हुआ हो।
- पहले हमले का परमाणविक प्रत्युत्तर अत्यंत सघन होगा और उसे इस प्रकार संचालित किया जाएगा कि शत्रु पक्ष को अपूर्णीय और अस्वीकार्य स्तर की क्षति हो।
- परमाणविक प्रत्युत्तर आक्रमण के लिए सिर्फ राजनीतिक नेतृत्व ही अधिकृत होगा, जिसके नियंत्रण में न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी होगी।
- गैर परमाणविक देशों के खिलाफ परमाणु अस्त्रों का उपयोग नहीं |
- तथापि भारत के खिलाफ बड़े हमले अथवा भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ कहीं भी हमले में यदि जैविक अथवा रासायनिक अस्त्रों का उपयोग किया जाता है तो भारत के पाय परमाणु अस्त्रों से प्रत्युत्तर देने का विकल्प उपलब्ध होगा।
- परमाणु एवं प्रक्षेपास्त्र संबंधी सामग्री तथा प्रौद्योगिकी के निर्यात पर कड़ा नियंत्रण जारी रहेगा, फिसाइल पेटेरियल कट् ऑफ ट्रीटी निगोसिएशन (Fissile Material Cutoff Treaty Negotiations) में सहभागिता तथा परमाणु परीक्षणों पर रोक जारी रहेगी।
- परमाणुमुक्त विश्व के लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता जारी रहेगी और इसके लिए विश्वस्तरीय सत्यापन योग्य तथा भेदभाव मुक्त परमाणु निःशस्त्रीकरण के विचार को आगे बढ़ाया जाएगा।
भारत की मध्य एशिया को जोड़ो नीति
- भारत उच्चस्तरीय यात्राओं के आदान-प्रदान के माध्यम से मजबूत राजनीतिक सम्बन्ध बनाने की कोशिश जारी रखेगा। भारतीय नेता द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय मंचों पर नजदीकी संवाद व अंतर्क्रिया जारी रखेंगे।
- भारत सामरिक एवं सुरक्षा सहयोग को सुदृढ़ करेगा। भारत की पहले से ही कुछ मध्य एशियाई देशों के साथ रणनीतिक भागीदारी है। पूरा स्थान सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त शोध, आतंक निरोधक समन्वय तथा अफगानिस्तान पर चर्चा जारी है।
- भारत मध्य एशियाई साझेदारों के साथ बहुपाविक वार्ताएं पहले विद्यमान मंचों, जैसे- एससीओ यूरोशियन इकॉनोमिक कम्यूनिटी (EEC) तथा कस्टम यूनियन जैसे समुद्र संयुक्त प्रयासों से उत्पन्न 'सिनर्जी' का इस्तेमाल कर आगे बढ़ाना जारी रखेगा। भारत ने व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते का प्रस्ताव किया है कि अपने बाजार को यूरेशिया के साथ जोड़ने के लिए।
- भारत मध्य एशिया को ऊर्जा तथा प्राकृतिक संसाधनों के लिए दीर्घकालीन साझेदार के रूप में देखता हैं। मध्य एशिया में बड़ी जोत की कृषि योग्य जन्म भूमि है और भारत के लिए वहां अधिक मूल्यांकन की लाभप्रद फसलों के उत्पादन में सहयोग की बड़ी संभावना है।
- चिकित्सा एवं अन्य क्षेत्र जहां सहयोग की व्यापक संभावना है। भारत सरकार एशिया में सिविल अस्पताल/क्लिनिक स्थापित करने के सहयोग देने के लिए तैयार है।
- भारत में उच्च शिक्षा प्रणाली पश्चिमी विश्वविद्यालयों में ली जाने वाली फीस के एक अंश जितने खर्च पर ही काम करती है। इसे देखते हुए भारत विश्व में सेंट्रल एशियन यूनिवर्सिटी स्थापित करना चाहता है, जिससे कि आईटी प्रबंधन, दर्शन तथा भाषा आदि विषयों में विश्वस्तरीय शिक्षा का प्रबन्ध किया जा सके।
- भारत सेंट्रल एशियाई ई-नेटवर्क, जिसका केन्द्र भारत में होने स्थापित आने के लिए कार्य कर रहा है ताकि सभी पांच मध्य एशियाई देशों टेली- एजुकेशन तथा टेली-मेडिसीन संपर्कता स्थापित की जा सके।
- भारतीय कम्पनियां विनिर्माण क्षेत्र में अपनी क्षमता को प्रदर्शित कर सकती हैं और प्रतियोगी देशों पर विश्वस्तरीय संरचनाओं का निर्माण कर सकती हैं। मध्य एशियाई देश, विशेष रूप से कजाकिस्तान के पास लौह अयस्क तथा कोयला के असीमित भंडार हैं, साथ ही विपुल मात्रा में सस्ती बिजली है। भारत अनेक मध्यम आकार के स्टील ग्रेलिंग मिल आदि की स्थापना विशिष्ट उत्पदों की अपनी जरूरत के अनुसार भी कर सकता है।
- जहां तक भू-सम्पर्क की बात है, भारत में अंतर्राष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे (International North India Transport Corridor) के लिए प्रयास पुनः शुरू कर दिए हैं। जरूरत है कि जल्द से जल्द इस गलियारे की छूटी हुई घड़ियों को जोड़ने पाटने के तरीकों पर सार्थक चर्चा हो ।
- इस क्षेत्र में व्यवहार्य बैंकिंग अधिसूचना का अभाव व्यापार एवं निवेश में एक बड़ी बाधा है। भारतीय बैंक यहां अनुकूल नीतिगत वातावरण देखकर अपनी उपस्थिति और कहां तक विस्तारित कर सकते हैं।
- भारत और मध्य एशियाई देश वायु संपर्कता बढ़ाने के लिए मिल-जुलकर काम कर सकते हैं। भारत 'आउटवाइंड ट्रैवलर्स' के लिए सबसे बड़े बाजार में से है- 2011 में लगभग 21 बिलियन यूएस डॉलर । अनेक देशों में भारत ने अपने पर्यटन केन्द्र खोले हैं। मध्य एशिया के देश छुटियों का पसंदीदा गंतव्य बन सकते हैं, भारतीय फिल्म उद्योग के लिए भी जो सुंदर विदेशी लोकेशन की खोज में रहता है।
- लोगों के बीच संपर्क गहरे व अबाध हो, यह एक जरूरी शर्त है। भारत एवं मध्य एशिया के युवाओं एवं भविष्य में नेतृत्वकर्ताओं के बीच आपसी आदान-प्रदान बढ़ाने की जरूरत है। विद्यार्थियों का आदान प्रदान पहले से चल भी रहा है। भारत और मध्य एशिया, विद्वानों, अकादमिकों नागरिक समाज तथा युवा प्रतिनिधिमंडलों के विकसित मेल जोल एवं आने जाने को प्रोत्साहित कर सकते हैं, जिससे एक-दूसरे की संस्तुतियों को गहराई से समझने की अंतर्दृष्टि मिल सकेगी।
भारत की 'एक्ट ईस्ट नीति'
- भारत की एक्ट ईस्ट नीति एशिया-प्रशांत में निस्तारित पड़ोस पर केंद्रित है। पहले एक आर्थिक पद्धति के रूप में स्वीकार की गई नीति ने राजनीतिक, सामरिक तथा सांस्कृतिक आयाम ग्रहण कर लिए हैं जिसमें संवाद एवं सहयोग के लिए संस्थागत प्रक्रिया की स्थापना भी शामिल है।
- भारत इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया, जापान, कोरिया गणराज्य, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर तथा दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों एशियान (ASEAN) के साथ अपने सम्बन्धों के ऊपर उठाकर, उत्प्रभित कर सामरिक साझेदारी के स्तर पर ले गया। भारत ने एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ नजदीकी सम्बन्ध बनाए हैं।
- पुन: आसियान रीजनल फोरम (ARF) तथा ईस्ट एशिया सम्मिट (EAS) के अलावा ये कुछ क्षेत्रीय मंचों पर अपनी गहरी सक्रियता दिखाई है, जैसे- नि:संदेह (Bay of Bengal Initiative for Multi Sectoral Technical and Economic Cooperation), एशिया को-ऑपरेशन डायलॉग (ACD), मेकांग गंगा को-ऑपरेशन (MGC) तथा इंडियन ओसियन रिम एसोसिएशन (IORA) |
- 'एक्ट ईस्ट' नीति ने हमारी घरेलू कार्यसूची में भारत-आशियान सहयोग को प्राथमिकता दी है। खासकर अधिरचना, निर्माण, व्यापार, कौशल, नगरीय नवीकरण, स्मार्ट सिटीज, मेक इन इंडिया तथा अन्य नवीन योजनाओं के संदर्भ में संपर्कता परियोजनाएं, अंतरिक्ष सहयोग, एस. एंड टी. तथा नागरिक संपर्क क्षेत्रीय एकता एवं स्मृति के लिए 'स्प्रिंग बोर्ड' का कार्य कर सकता है।
- 'एक्ट ईस्ट' नीति का उद्देश्य आर्थिक सहयोग, सांस्कृतिक सम्बन्ध के साथ ही एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों के साथ सामरिक सम्बन्ध बढ़ाना है। इसके लिए द्विपक्षीय, क्षेत्रीय तथा बहुपार्श्विक स्तरों पर सतत् आबंधों की जरूरत है और इसका उपयोग अपने उत्तर-पूर्व के राज्यों, जैसे- अरुणाचल प्रदेश का अन्य पड़ोसी देशों के साथ संपर्क बढ़ाना हैं।
- हमारी 'एक्ट ईस्ट' नीति में उत्तर- -पूर्व को प्राथमिकता प्राप्त है। यह नीति उत्तर-पूर्वी भारत, अरुणाचल प्रदेश का आसियान क्षेत्र के साथ एक अंतरापृष्ठ निर्मित करती है।
- द्विपक्षीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर अनेक योजनाओं में उत्तर- -पूर्व की आसियान देशों के साथ युद्ध सम्पर्कता शामिल है जो व्यापार, संस्कृति, नागरिक संपर्क तथा भौतिक अधिसंरचना (सड़क, हवाई अड्डा, दूरसंचार, बिजली आदि) से संभव हो सकेगा।
- अगर सभ्यता के दृष्टिकोण से विचार करें तो बौद्ध तथा हिन्दू सम्बन्धों द्वारा लोगों के बीच नये संपर्क और संपर्कता बढ़ाने के लिए मजबूत किया जा रहा है।
- आसियान व उत्तर-पूर्व को जोड़ने के लिए संपर्कता के मामले में सुसंगत रणनीति विकसित करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। परिवहन अधिरचना, वायुयान संपर्कता में वृद्धि, अकादमिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के बीच संपर्क बढ़ाने के उपाय किए जा रहे हैं।
- भारत की आसियान के साथ आर्थिक संलग्नता को बढ़ाया गया है। क्षेत्रीय एकता तथा परियोजनाओं को लागू करने को प्राथमिकता की गई है। आसियान-भारत के बीच एग्रीमेंट ऑन ट्रेड इन सर्विस एंड इनवेस्टमेंट भारत तथा सात आसियान देशों के बीच 1 जुलाई, 2015 से लागू है।
- सामरिक मुद्दों पर भारत ने सुरक्षा हितों के लिए साझेदार बनाए हैं- द्विपक्षीय एवं बहुपक्षी फॉर्मेट में आतंकवाद विरोध, शांति एवं स्थिरता तथा अंतरराष्ट्रीय परम्पराओं एवं नियमों पर आधारित समुद्री सुरक्षा के संवर्धन के लिए नजदीकी सहयोग स्थापित किया जा रहा है।
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